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शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

आओ और सड़कों पर फैला ख़ून देखो...

सब कुछ
एक भारी चिल्लाहट थी, नमकीन चीज़ें,
धड़कती हुई रोटी के ढेर,
मेरी आर्ग्यूवेलस की बस्ती के बाज़ार में जहां मूर्ति
सागर की सफ़ेद मछलियों के बीच एक बेजान दावत-सी लगती थी,
जैतून का तेल जहां कलछुली तक पहुंचता था,
पांवों और हाथों की गंभीर धड़कन जहां
रास्तों में भर जाती थी,
जहां जिंदगी की तेज़ गंध
ढेरों में रखीं मछलियां,
जहां सर्द धूप पड़ती हुई छतों के सांचे, जिन पर
वायु-सूचकों के मुर्गे थक जाते हैं,
जहां आलुओं के सुहावने उन्मत् हाथी-दांत,
सागर तक फैले हुए टमाटर जहां थे

और एक सुबह सब-कुछ जल उठा
और एक सुबह आग की लपटें
पृथ्वी से बाहर लोगों को निगलती हुईं
निकल आईं,
और तबसे आगे आग
और तबसे आगे बारूद
और तबसे आगे ख़ून

डाकू वायुयानों और मूरों के साथ
डाकू अंगूठियों और राजकुल-महिलाओं के साथ
डाकू काले चोगे पहने हुए मठाधीशों के साथ
हवा से होकर बच्चों को मारने आए
और सड़कों पर बच्चों का ख़ून बहने लगा
बच्चों का ख़ून जैसा होता है

विश्वासघाती
सेनापतियो:
मेरे मृत आवास को देखो
टुकड़े हुए स्पेन को देखो:
लेकिन हरेक मृत आवास से फूलों की जगह
प्रज्वलित धातु बाहर निकलती है
स्पेन के हरेक गह्वर से
स्पेन बाहर निकलता है
लेकिन हरेक मृत बच्चे की आंखों से एक बंदूक बाहर आती है
लेकिन हरेक जुर्म से गोलियों का जन् होता है
जो तुम्हारे अंदर वह जगह ढूंढ ही लेंगी
जहां दिल रहता है

तुम पूछोगे: क्यों नहीं मेरी कविता
तुमसे नींद की, पत्तियों की, मेरी मातृभूमि के
भव् ज्वालामुखियों की बात करती है
आओ और देखो
सड़कों पर फैला ख़ून
आओ और सड़कों पर फैला ख़ून देखो...

हम

हम लेखक हैं
कथाकार हैं
हम जीवन के भाष्यकार हैं
हम कवि हैं जनवादी।
चंद, सूर,
तुलसी, कबीर के
संतों के, हरिचंद वीर के
हम वंशज बढ़भागी।
प्रिय भारत की
परम्परा के
जीवन की संस्कृति-सत्ता के
हम कर्मठ युगवादी
हम श्रस्ता हैं,
श्रम शासन के
मुद मंगल के उत्पादन के
हम द्रष्टा हितवादी।
भुत, भविष्यत्,
वर्तमान के
समता के शाश्वत विधान के
हम हैं मानववादी।
हम कवि हैं जनवादी।


गुरुवार, 17 सितंबर 2009

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य अल्पसंख्यक समिति की बैठक

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की उत्तर प्रदेश राज्य काउंसिल की अल्पसंख्यक समिति की बैठक १० अक्टूबर २००९ को लखनऊ में राज्य कार्यालय पर शाम को ५.३० बजे से शुरू होगी जिसमें स्ल्पसंख्यक जनता की समस्याओं पर चर्चा होगी और आन्दोलन की रूप रेखा तैयार की जायेगी.

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा मथुरा में यमुना एक्सप्रेस वे विकास प्राधिकरण द्वारा भूमि अधिग्रहण के खिलाफ किसान सम्मलेन

यमुना एक्सप्रेस वे विकास प्राधिकरण के नम पर आगरा, मथुरा, अलीगढ, महामायानगर जिलों की कृषि योग्य जमीनों का अधिग्रहण कर ८५० राजस्वा ग्रामो के अस्तित्व को समाप्त कर उस इलाके में रह रहे लाखो किसानों एवं ग्रामीण मजदूरों के सामने आजीविका का संकट उत्पन्न करने तथा हजारों सालो से चले आ रहे प्राकृतिक संतुलन को समाप्त कर देने की साजिश के खिलाफ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की उत्तर प्रदेश राज्य काउंसिल ४ अक्टूबर को सुबह १०.०० बजे से मथुरा शहर में कामरेड धर्मेन्द्र स्मृति सभागार, बिजलीघर, मथुरा कैंट में इन चार जनपदों के किसानो का विशाल प्रतिनिधि सम्मलेन आयोजित करेगी जिसमे राज्य सरकार के इस भ्रष्ट फैसले के विरोध में आन्दोलन की रूप रेखा तय की जायेगी। सम्मलेन में आने वाले प्रतिनिधि मथुरा के हमारे निम्न साथिओं से फ़ोन पर संपर्क कर सकते है।
कामरेड गफ्फार अब्बास ९८९७७६८७३५
कामरेड गिरधारी लाल चतुर्वेदी ९२५९२७१३१४
कामरेड बाबु लाल ९३५८७०८२३७

शनिवार, 12 सितंबर 2009

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी उत्तर प्रदेश राज्य काउंसिल द्वारा कार्यशाला

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की उत्तर प्रदेश राज्य काउंसिल दिनांक ११ अक्टूबर को अपने राज्य कार्यकारिणी के सदस्यों तथा जिला सचिवों के लिए एक विशेष कार्यशाला का आयोजन कर रही है.

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य कार्यकारिणी की बैठक

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की उत्तर प्रदेश राज्य कार्यकारिणी की बैठक दिनांक १० अक्टूबर २००९ को लखनऊ में राज्य कार्यालय पर होगी जिसमें रास्ट्रीय सचिव कामरेड सुधाकर रेड्डी भी उपस्थित रहेंगे।

पाश के ५९वे जन्मदिवस ९ सितम्बर २००९ पर उनकी एक कविता - "सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना"

श्रम की लूट सब से खतरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सब से खतरनाक नहीं होती
गद्दारी-लोभ की मुट्ठी सब से खतरनाक नहीं होती
बैठे-सोये पकड़े जाना - बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकडे जाना - बुरा तो है
पर सब से खतरनाक नहीं होता

कपट से शोर में
सही होते हुए भी दब जाना - बुरा तो है
किसी जुगनू की लौ में पढ़ने लग जाना - बुरा तो है
भींच कर जबड़े बस वक़्त काट लेना - बुरा तो है
सब से खतरनाक नहीं होता
सब के खतरनाक होता है

मुर्दा शान्ति से मर जाना
न होना तड़प का, सब सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौट कर घर आना
सब से खतरनाक होता है
हमारे सापनों का मर जाना
सब से खतरनाक वह घरी होती है
तुम्हारी कलाई पर चलती हुई भी जो
तुम्हारी नज़रों के लिए रुकी होती है

सब से खतरनाक वो आँख होती है
जो सब कुछ देखती हुई भी ठंडी बर्फ होती है
जिसकी नज़र दुनिया को
मुहब्बत से चूमना भूल जाती है
जो चीजों से उठती अंधेपन की
भाप पर मोहित हो जाती है
जो रोज़मर्रा की साधारणता को पीती हुई
एक लक्ष्यहीन दुहराव के दुष्चक्र में ही गुम जाती है

सब से खतरनाक वो चाँद होता है
जो हर कत्ल कांड के बाद
वीरान हुए आंगनों में चदता है
लेकिन तुम्हारी आंखों में मिर्चों की तरह नहीं लड़ता है

सबसे खतरनाक वो गीत होता है
तुम्हारे कान तक पहुचनें के लिए
जो विलाप को लांघता है

डरे हुए लोगों के दरवाजे पर जो
गुंडे की तरह हुंकारता है
सब से खतरनाक वो रात होती है
जो उतरती है जीवित रूह के आकाशों पर
जिसमें सिर्फ़ उल्लू बोलते, गीदर हुआंते
चिपक जाता स्थायी अँधेरा बंद दरवाजों की चौगाठों पर

सब से खतरनाक वो दिशा होती है
जिसमें आत्मा का सूरज डूब जाए
और उसकी मुर्दा धूप की कोई फाँस
तुम्हारे जिस्म के पूरब में चुभ जाए
श्रम की लूट सबसे खतरनाक नही होती
पुलिस की मर सबसे खतरनाक नहीं होती
गद्दारी लोभ की मुट्ठी सबसे खतरनाक नहीं होती