देश और लोकतंत्र को
बचाने के लिये 'धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और वामपंथी प्लेटफार्म' तैयार किया जाये
भारत छोड़ो आंदोलन की
वर्षगांठ पर भाकपा ने किया आह्वान
लखनऊ/ हाथरस- 9 अगस्त 2017, भारत छोड़ो आंदोलन की
वर्षगांठ पर आज भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने समूचे उत्तर प्रदेश में कई कार्यक्रम
आयोजित किये. इस अवसर पर सभायें, विचार गोष्ठियां और जहां- तहां धरने/ प्रदर्शन किये गये.
लखनऊ में एनसीपी द्वारा गांधी प्रतिमा पर आयोजित धरने में भाकपा ने शिरकत की तो
अन्य कई जगहों पर वामपंथी और लोकतांत्रिक संगठनों द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में
भाकपा कार्यकर्ताओं और नेताओं ने भाग लिया.
हाथरस में भाकपा के
तत्वावधान में- "आज के राजनैतिक संदर्भों में भारत छोड़ो आंदोलन का
संदेश" विषय पर एक विचारगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें मुख्य वक्ता भाकपा
के राज्य सचिव डा. गिरीश थे.
डा. गिरीश ने कहा कि
महात्मा गांधी के नेतृत्व में 'अंग्रेजो भारत छोड़ो' नारे के साथ हुये इस आंदोलन में देश के लाखों
लोग सड़कों पर उतर आये थे जिससे भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिल गयी थी और
पांच साल बाद ही अंग्रेजों को यहां से भागना पड़ा था. आज़ादी से पहले और उसके बाद हम
सबने एक ऐसे भारत के निर्माण का सपना देखा था जिसमें देश के हर नागरिक को रोटी, कपड़ा, मकान, इलाज, रोजगार, पढाई और सम्मान उपलब्ध हो
और सभी बोली- भाषाओं तथा धर्मों और रीति रिवाजों को मानने वाले लोग शांति और
भाईचारे के साथ देश की तरक्की में योगदान करें. लेकिन आज उसके ठीक विपरीत घटित
होरहा है.
उन्होने कहाकि आज कर्ज में
डूबे किसान और दस्तकार आत्महत्यायें कर रहे हैं और उनके कर्जमाफी पर बहुत चिल्लपों
मची है लेकिन कार्पोरेट और पूंजीपति समर्थक इस सरकार ने गत पांच वित्तीय वर्षों में
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लगभग 2. 5 लाख करोड़ रुपये के ऋण को ‘डूबा ऋण’ घोषित किया है. इसमें से
81,683 करोड़ रुपये पिछले वित्त वर्ष- 2016- 17 के हैं. यदि इस धन को सख्ती से
बसूला जाये तो इससे देश के किसानों- कामगारों पर बैंकों का बकाया ऋण आसानी से माफ
किया जा सकेगा. इसी तरह यदि बैंकों के अब तक के समस्त ना चुकता ऋणों ( एनपीए ) को
बकायेदारों से बसूल कर लिया जाये तो देश के समस्त किसानों और मजदूरों को कम से कम
10 साल तक 10 हजार रुपये प्रति माह पेंशन देने लायक धन जुटाया जा सकता है. लेकिन
इस सरकार ने पिछले तीन सालों में कारपोरेट पूंजी को टैक्स घटा कर कई रियायतें दीं
हैं और गरीबों की कमर तोड़ने का काम किया है.
उन्होने कहाकि पाकिस्तान
जैसे अर्ध्द लोकतांत्रिक देश में पनामा लीक्स पेपर्स में नाम आने पर वहां के प्रधानमंत्री
को कुर्सी छोड़नी पड़ी है, लेकिन भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में इस सूची के नाम क्यों
उजागर नहीं किये जारहे हैं?
डा. गिरीश ने कहा कि मौजूदा
केंद्र सरकार अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर सर्वसत्ताहरण के प्रयासों में लगी है.
चीन की तरह इसकी नीति आंतरिक विस्तारवादी है. अपने सर्वसत्ताहरण और विस्तारवाद को
आगे बढाने को वह सभी पार्टियों में तोड़- फोड़ कर रही है और उनके एक से एक दागी
नेताओं से दल बदल करा कर भाजपा में शामिल करा रही है. कल गुजरात से राज्यसभा के चुनाव
में उसने जो कुछ किया उससे लोकतंत्र शर्मसार हुआ है. वह ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ और ‘वामपंथ मुक्त भारत’ जैसे अलोकतांत्रिक नारे
देरही है. सारी नैतिक मर्यादायें ताक पर रख विपक्ष की सरकारों को अपने अधीन कर रही
है. अतएव आज लोकतंत्र को भारी खतरा पैदा होगया है. गरीबों के हक सरे आम छीन रही इस
सरकार ने गरीबों को भ्रमित करने को मंदिर निर्माण, गोरक्षा, गंगा की पवित्रता और लव जेहाद जैसे मुद्दे उछाल
रखे हैं और इन्हीं को लेकर वह दलितों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं आदि पर निरंतर हमले करा रही है.
गरीबों को मिलने वाली तमाम राहतों को समाप्त करती जारही इस सरकार ने गरीबों को
अनेक पाबंदियों में जकड़ डाला है.
वह ऐसा क्यों कर रही है? इस सवाल के जबाव में डा.
गिरीश ने कहा कि सता पर काबिज संघ और उसकी चेरी भाजपा ने अपने को आज़ादी की लड़ाई से
न केवल दूर रखा अपितु सांप्रदायिकता को भड़का कर आज़ादी की राह में रोड़े अटकाये. वह
जनता से भी कोसों दूर रही है. उसने भारत के उदार और सामासिक ताने बाने को छिन्न
भिन्न करने को कट्टर हिंदुत्व का सिध्दांत गड़ा और कथित हिंदू राष्ट्र के मोहजाल
में तमाम जनता को फांस लिया. आज सत्ता में पहुंचने पर इनका असली- विभाजक और
जनविरोधी चेहरा सामने आगया है. लोग समझते जारहे हैं कि आरएसएस एक नस्लवादी सत्ता
हड़प गिरोह है और धर्म उसका मुखौटा मात्र है.
उन्होने कहाकि आज की
राजनैतिक पृष्ठभूमि में भारत छोड़ो आंदोलन का यही संदेश है कि हम सब लोकतंत्र की
रक्षा के लिये, पूंजीपतियों और कारपोरेट्स को आम नागरिक की कीमत पर एकतरफा बढ़ावा देने की
कोशिशों को रोके जाने, सत्तर साल में हमने जो कुछ हासिल किया है उसको बरवाद होने
से रोके जाने और देश की एकता अखंडता को बचाने के लिये मिल कर संघर्ष करें.
लोकतंत्र में ही अपने अधिकारों को हासिल करने की लड़ाई लड़ी जा सकती है. उन्होने
कहाकि इसीलिये भाकपा ने इन मुद्दों पर संघर्ष के लिये एक 'धर्मनिर्पेक्ष, लोकतांत्रिक और वामपंथी
प्लेटफार्म' के निर्माण का आह्वान किया है. उन्होने कहाकि यह प्लेटफार्म देशहित में काम
करेगा चुनावी हितों से इसे नहीं जुड़ने दिया जायेगा. उन्होने सभी धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और वामपंथी
शक्तियों से इस दिशा में शीघ्र और ठोस कदम उठाने की अपील की.
गोष्ठी को जिला सचिव
चरनसिंह बघेल, जगदीश आर्य, राजाराम, नबाव खां, आर. डी. आर्य, नूर मुहम्मद, पपेंद्र कुमार, संजय खान, गौरीशंकर बघेल, होशियार सिंह एवं शैलेंद्र कुमार सिंह आदि ने संबोधित
किया.
समाचार मेल किये जाने तक लगभग
दो दर्जन जिलों से कार्यक्रम आयोजित किये जाने के समाचार प्राप्त हुये हैं.