अक्तूबर क्रांति और
वर्तमान में उसकी प्रासंगिकता
डा. गिरीश
कुछ प्रगतिशील और अतिवादी
वाम- बुध्दिजीवी कहते हैं कि सोवियत संघ इसलिये बिखर गया कि समाजवादी क्रांति को
एक ऐसे देश में निष्पन्न किया गया जो औद्योगिक रुप से पिछड़ा था. यह जारशाही रुस
में क्रांतिकारी शक्तियों का स्वाभाविक निष्पाद नहीं था. अपितु लेनिन और उनकी
पार्टी ने अनिच्छुक लोगों पर इसे थोप दिया था.
लेकिन यह सच नहीं है. लेनिन
ने अपनी पुस्तक ‘इम्पीरियलिज्म’ में कई नतीजे निकाले थे. उनके अनुसार औद्योगिक रुप से
विकसित प्रत्येक देश में व्यापार, औद्योगिक पूंजी और बैंकें एकाधिकारवादी वित्तीय पूंजी में
विलीन होजाते हैं जिन्हें उस राज्य की सत्ता का पूरा सहयोग हासिल रहता है. इस
एकाधिकारवादी पूंजी के असमान विकास के चलते कोलौनीज के बंदरवांट के लिये विश्व
युध्द अवश्यंभावी है. युध्द से उत्पन्न हालात भी क्रांति के लिये आधार तैयार करते
हैं. पहले और दूसरे दोनों विश्व युध्दों ने क्रांति का रास्ता खोला. प्रथम
विश्वयुध्द के बाद यदि रुस में समाजवादी क्रांति संभव हुयी तो दूसरे के बाद भारत
सहित तमाम देश आजाद हुये.
लेनिन ने कहाकि समाजवादी
क्रांति वहीं होगी जहां साम्राज्यवाद की चेन की कड़ियां सबसे कमजोर होंगी. जारशाही
रुस साम्राज्यवादी शृंखला की सबसे कमजोर कड़ी है. उन्होने कहाकि एक देश में
समाजवादी क्रांति का सफल होना संभव है क्योंकि वहाँ समाजवाद के निर्माण के लिये साम्राज्यवादी
देशों के आपसी टकरावों को स्तेमाल किया जासकता है. अंतत: रूस में 1917 में क्रांति
निष्पन्न हुयी.
तमाम कठिनाइयों का सामना
करते हुये सोवियत संघ में समाजवाद के निर्माण का काम चल ही रहा था कि तीस के दशक
में साम्राज्यवादी देशों ने उपनिवेशों के बंटवारे के लिये दूसरा विश्वयुध्द छेड़
दिया. निश्चय ही साम्राज्यवादी देशों के फासिस्टी खीमे को साम्राज्यवादी देशों का
गैर फासिस्टी खीमा नहीं हरा सकता था. यह सोवियत संघ और उसकी लाल सेना ही थी जिसने
हिटलर और उसके फासीवाद के खतरनाक इरादों को ध्वस्त कर दिया. यदि उस समय फासिज्म
विजयी हुआ होता तो भारत की आजादी कम से कम 15 अगस्त 1947 की तिथि पर तो नहीं ही
हुयी होती.
यह जल्द इसलिये संभव हुआ
क्योंकि दूसरे विश्व युध्द के अंत ने विश्व में राजनैतिक शक्तियों के संतुलन को
पूरी तरह बदल दिया था. फासीवाद ध्वस्त होचुका था. साम्राज्यवाद कमजोर हो गया था. सोवियत
संघ सामरिक दृष्टि से मजबूत देश के रुप में उभरा था जिसका नैतिक बल दूसरे देशों से
ऊंचा था. परिणामस्वरुप एक दशक के भीतर सारे औपनिवेशिक देशों ने आजादी हासिल कर ली.
भारत उनमें सबसे पहला था जहाँ का राष्ट्रीय आंदोलन उन्नत मंज़िलें हासिल कर चुका
था. सोवियत संघ की मदद से नव स्वतंत्र देशों ने अपनी आर्थिक आजादी की राह तलाशना
शुरु कर दी.
ब्रिटिश- अमेरिकी सैनिक
प्रतिरोध के बावजूद 1949 में चीन में समाजवादी क्रांति की जीत हुयी. 1950 में चीन
और कोरियाई सेनाओं के संयुक्त प्रयासों से कोरिया में अमेरिका की हार हुयी. 1962
में सोवियत संघ की मदद से क्यूबा की क्रांति विजयी हुयी. 1974 में वियतनाम में
अमेरिका की सबसे शर्मनाक पराजय हुयी. उसके बाद चिली में वोट के माध्यम से
कम्युनिस्टों और सोशलिस्टों की सरकार बनी जिसे अमेरिकी साम्राज्यवाद ने सैनिक
प्रतिक्रांति के जरिये कुचल दिया. यह वह दौर था जब पांचों महाद्वीपों के देशों में
लाल परचम एक ताकत था. 1960 तक अपने निर्णायक हथियारों के बल पर सोवियत संघ साम्राज्यवादियों
के बरावर की ताकत बन चुका था.
पर 1960 के बाद
साम्राज्यवाद ने अपनी वित्तीय पूंजी के आधुनिकीकरण और उसके भूमंडलीकरण के लिये
सचेतन कदम उठाये. वैज्ञानिक और तकनीकी क्रांति ने पूंजीवाद को उत्पादन के हर
क्षेत्र में नयी उचाइयां हासिल करने में मदद की. लेनिन ने जिस साम्राज्यवाद की
व्याख्या की थी वह नया चरित्र ग्रहण कर रहा था. इजारेदार राष्ट्रीय- राजकीय पूंजी
वित्तीय पूंजी का भूमंडलीय ग्रिड बन गयी. लेकिन दुनियां के कम्युनिस्ट इन बदलावों से
अनभिज्ञ थे और उन्होने मार्क्सवाद की किताबें तब खोलीं जब 1990 में सोवियत रूस का
पतन होगया. वे लेनिन की इसी प्रस्थापना पर अटके रहे कि “साम्राज्यवाद पूंजीवाद के
विकास की अंतिम स्टेज है. पूंजीवादी विश्व का एकमात्र भविष्य सामाजिक विघटन और
समाजवाद में उसकी परिणति है.”
1960 से 80 के बीच बढत
हासिल कर चुके विश्व पूंजीवाद ने मजदूरवर्ग पर हमले तेज कर दिये. सोवियत संघ को
उसने हथियारों की होड़ में फंसने को मजबूर किया जिसे सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था
झेल नहीं पायी. आक्रामक कदम उठाते हुये साम्राज्यवादियों ने विकासशील देशों के
राष्ट्रीय पूंजीपतिवर्ग को भूमंडलीकरण, निजीकरण और उदारीकरण की राह पर चलने को बाध्य किया. सोवियत
संघ इस भूमंडलीय वित्तीय पूंजी की चुनौती का मुकाबला करने को आर्थिक और राजनीतिक
रणनीति बनाने में असफल रहा. इससे समूचा विश्व परिदृश्य ही बदल गया. विजेता की
हैसियत में विश्व साम्राज्यवाद ने हुंकार भरी कि “मार्क्सवाद मर चुका है और
पूंजीवाद का कोई विकल्प नहीं है.”
आज अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी इतनी शक्तिशाली होगयी है
कि कुछ कल्याणकारी कार्यों के बल पर अपने शोषण को आसानी से छिपा रही है. इस तरह वह
अभावग्रस्तों के क्रांतिकारी आंदोलनों की धार को कमजोरकर रही है. मोदी सरकार
द्वारा चलायी गयी उज्ज्वला योजना, गरीबों के घरों में शौचालयों का निर्माण और
अब मुफ्त बिजली कनेक्शन इसके ताजा उदाहरण हैं.
90 के दशक में विकासशील देशों द्वारा साम्राज्यवादी नीतियों
के सामने घुटने टेक देने के बाद यूरोप में पूंजीवाद ने छलांग भरी. पर इसमें रोजगार
की दर शून्य थी. इससे दुनियां का वातावरण बिगड़ा और विश्व बैंक के कर्जों का भार
बढने लगा. अतएव हमें पुन: मार्क्सवाद की तह में जाना पड़ा. मार्क्स गत शताब्दी के
महानतम बुध्दिजीवी घोषित किये गये.
साढे तीन दशक के घटनाक्रमों ने यह जाहिर कर दिया कि सारी
बुराइयां कारपोरेट जगत के कुछ महारथियों के सिंडीकेट द्वारा पैदा की जारही हैं
जिसका प्रबंधन अमेरिकी नियंत्रण वाली विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोश जैसी
संस्थाओं के हाथ में है. भारत में चंद कारपोरेट घरानों की पूंजी में अप्रत्याशित
इजाफा और गरीबी की सीमा के नीचे चले जारहे लोगों का अनुपात विस्मयकारी है.
इस व्यवस्था पर पहला विश्वव्यापी हमला 1999 में सियेटल में
विश्व के लोगों ने बोला और तबसे प्रतिरोध की ताकतें निरंतर संगठित होती जारही हैं.
एकध्रुवीय विश्व की स्थिति का लाभ उठाते हुये अमेरिकी
साम्राज्यवाद ने संयुक्त राष्ट्र संघ को समाप्त करने की ठानी. बढते भूमंडलीय
तापमान, जैविक युध्द, बारुदी सुरंगें और खतरनाक हथियार
हठाने तथा नस्लवाद जैसे सवालों पर उसने हाथ खींच लिये. उसने अंतरिक्ष में नाभिकीय
हथियार स्थापित कर हर प्रकार के हमलों से सुरक्षित शक्ति बन जाने की की कोशिश की.
इस एक ध्रुवीय विश्व के मंसूबे को बनाये रखने को अमेरिकी साम्राज्यवाद ने मुस्लिम
पुनरुत्थानवादियों के साथ खुला खेल खेला. उसने इस्लामिक आतंकवाद को लोकतांत्रिक
पार्टियों, ताकतों और राष्ट्रों को कमजोर करने और अपने
हथियारों को कानूनी/ गैर कानूनी तरीके से बेचने को स्तेमाल किया. मुस्लिम
पुनरुत्थानवाद का भयदोहन कर भारत में जड़ जमा रही हिंदुत्व की ताकतों को भी उसने
समर्थन प्रदान किया. लेकिन 11 सितंबर 2001 को अमेरिकी आर्थिक प्रतिष्ठान पर हुये
हमले ने अमेरिकी साम्राज्यवाद को अपनी कुछ रणनीतियों में परिवर्तन करने को बाध्य
किया. स्टार वार उड़नछू होगया. आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लामबंदी के लिये संयुक्त
राष्ट्र संघ की जरूरत महसूस की जाने लगी.
विश्व को एक ध्रुवीय बनाये रखने को अमेरिका ने साम्राज्यवाद
के लिये चुनौती बने राष्ट्रों और नेताओं को समाप्त करने और साम्राज्यवादपरस्त टापुओं
को मजबूत करने की नीति अपनाई. ईराक और लीबिया में सीधे सैनिक हस्तक्षेप के जरिये
तख्ता पलट कराया. पाकिस्तान की सीमा में घुस कर ओसामा बिन लादेन का एनकाउंटर किया.
अफगानिस्तान की बरवादी तक युध्द थोपे रखा. यूक्रेन और सीरिया में हस्तक्षेप किया लेकिन
आतंकवाद के वाहक पुनरुत्थानवादी संगठनों और उनके पोषक देशों के खिलाफ कोई कार्यवाही
नहीं की. उसने वेनेज्वेला आदि दक्षिण अमेरिकी देशों और उत्तर कोरिया के खिलाफ अघोषित
युध्द छेड़ा हुआ है. लेकिन उत्तर कोरिया अमेरिकी साम्राज्यवाद के लिये खुली चुनौती
बना हुआ है, और अब ट्रंप ने उससे वार्ता की पेशकश की है.
अक्तूबर क्रांति हमें याद दिलाती है कि हम अपने देश की
परिस्थितियों के अनुसार संघर्षों की रूपरेखा तैयार करें. पडौसी देशोंसे हमारा
टकराव न्यूनतम होना चाहिये. चीन से परंपरागत और कृत्रिम टकरावों को कम करना
चाहिये. अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका, म्यांमार और नेपाल की शांति और लोकतंत्र
को मजबूत करने वाली ताकतों के साथ समन्वय स्थापित करना चाहिये. अमेरिकी
साम्राज्यवाद के विरोध में तीसरी दुनियां के देशों की एकता के लिये हमें निरंतर
आवाज उठानी चाहिये.
हमें धार्मिक पुनरुत्थानवाद के हर ब्रांड के विरुध्द निर्मम
संघर्ष करना होग. नस्लीय अलगाववाद और आतंकवाद के खिलाफ सदैव आवाज उठानी चाहिये. जन
गण के बीच समरसता और सुदृढ लोकतंत्र ही भारतीय क्रांति को आगे बढाने में सहायक
होसकते है.
आज जमीनों का पुनर्वितरण फिर
से राष्ट्रीय एजेंडा बन चुका है. पूंजीवाद साम्राज्यवाद के साथ मिल कर भारतीय
ग्राम्य जीवन के परंपरागत ताने बाने को नष्ट कर रहा है. विकास के नाम पर बेतहाशा
भूमि अधिग्रहण, उसके लिये कानूनों में बदलाव, बेरोजगारी और ग्रामीण क्षेत्रों से अधिकाधिक श्रम शक्तियों
का खदेड़े जाना विश्व बैंक द्वारा निर्देशित परियोजनाओं का मूल आधार बन चुका है. भूमि
सुधार और सामूहिक खेती से ग्रामीण जीवन में नयी जान फूंकी जा सकती है.
सार्वजनिक क्षेत्र को बचाने
और उसे और भी मजबूत बनाने के संघर्ष को हमें धार देनी होगी. हमें यह ध्यान में
रखना चाहिये पूंजीवाद में मजदूरों के श्रम का अतिरिक्त अधिशेष पूंजीवाद को मजबूती
देता है और उसके समाप्त होने से समाजवाद का निर्माण होता है. अतएव हमें मेहनतकशों
चाहे वे मजदूर, दस्तकार अथवा किसान हों उनके श्रम का संपूर्ण फल दिलाने को संघर्ष चलाना होगा.
इन संघर्षों को फासीवादी शक्तियों के विरुध्द संघर्ष से जोड़ना होगा.
अक्तूबर क्रांति की 100वीं
वर्षगांठ पर हमें वाम और कम्युनिस्ट एकता के लिये त्वरित कदम उठाने को प्रतिबध्द
होना होगा.
( जौनपुर, उत्तर प्रदेश में 8 अक्तूबर
को अक्तूबर क्रांति की 100 वीं वर्षगांठ पर हुयी विचार गोष्ठी में दिये गये भाषण पर
आधारित )