दीपोत्सव अपना रौद्र रूप दिखा कर गुजर गया। अढ़ाई सौ रुपये लीटर तेल, दीपक तो नाममात्र को ही जले। शत्रु देश चीन की लड़ियां फुलझड़ियां ही हावी दिखीं। गरीब घरों के बच्चे अमीरों की आबादी में एक मोमबत्ती, एक अदद पटाखे अथवा कोई खाली दीपक ही मिल जाये, ललचाते घूमते दिखे। मिठाई तो दूर कई घरों में सामान्य पकवान तक नहीं बने।
वहीं अमीरों और अमीर होने का दम्भ पाले मध्यमवर्ग का उल्लास पागलपन की हद तक था। पकवान मिठाइयां उन्हें मुबारक। मेरा एतराज पागलपन की सारी हदें पार चुके पटाखेबाजी से है। सर्वोच्च न्यायालय ने जहरीले पटाखे न चलाने की सीख क्या देदी, संघ परिवार और उसका समूचा प्रचारतंत्र चिंघाड़ उठा। "ये सारी पाबन्दियों हिंदुओं पर ही क्यों?" जैसे सवालों की झड़ी लग गयी। संदेश ये था कि खूब फोड़ो पटाखे।
हिंदुत्व के इस उन्माद ने तर्क और हानि जैसे प्रश्नों को पीछे धकेल दिया। जिन पटाखों की खोज चीन ने की, आज भी अधिकतर बारूद चीन से ही आरही है, पर रामराज्य में चीन विरोधी राष्ट्रवाद घल्लूघारा होगया। जो बुज़ुर्गवान शुध्द हवा की तलाश में सुबह सुबह पार्कों बगीचों का रुख करते हैं नाती पोतों के साथ पाकिस्तान और मुसलमानों को संदेश देने में जुटे थे। हिंदू नामधारी तमाम निरीह प्राणियों के फेफड़ों में धुआं उंडेल रहे थे। मासूम सा तर्क था पाकिस्तान और मुसलमानों को सन्देश देना है तो इत्ती कुर्बानी तो करनी होगी।
मुझे याद है कि 2014 से पहले टीवी चैनलों पर दीवाली के हफ्ते भर पहले से सैलिब्रिटीज की अपीलें आने लगतीं थीं कि पटाखे नहीं चलाने। पक्ष विपक्ष के नेतागण भी स्वास्थ्य पर्यावरण की रक्षा के लिए सावधान करते नजर आते। पर अब बात अलग है। 24 कैरट का रामराज है। धुआं भी झेलना है और असह्य कानफोड़ू शोर भी।
सारी शासकीय मशीनरी ने कानों में तेल डाल लिया था। कानून और उसके रक्षक कुंभकर्णी निद्रा में सोये थे। रात डेढ़ दो बजे तक चले इस महाताण्डव की कोई शिकायत तक सुनने को तैयार न था। वाट्सएप मेसेज अभी तक टच नहीं किये गए। राजसत्ता के इशारों को हमारी ब्यूरोक्रेसी से अधिक भगवान? भी नहीं समझते।
सो बुजुर्गों ने, बीमारों ने, नवजातों ने रात भर धुआं झेला और नीन्द खराब की। सुबह उठे तो आसमान में उषा की लालिमा की जगह धुएं की कालिमा छायी हुयी थीं। जो आज दोपहर तक राहु की तरह रोशनी को निगले हुये है।