ओ दिल्ली वाली ताई!
खूब बढ़ाओ महंगाई
ओ दिल्ली वाली ताई!
तेरे ऊपर जो बैठे हैं
हैं तेरे ही तो भाई््?
दिल्ली वालों को दिखलायेगी
तू कैसे कैसे खेल
क्या हुआ जो इस खातिर
निकले जनता का तेल!
जनता का क्या है
जनता तो है हरजाई!
लूट की आंधी खूब चली है
जो लूट सके सो लूट
खेल तमाशा कोई दिखा कर
कोई अंबानी को देकर छूट।
तुम लूटो दिल्ली को
देश को मनमोहन भाई।
जनता अभी कराहेगी
सौ सौ आंसू अभी बहायेगी
खेतों में, खलिहानों में
हाहाकार मौत अभी मचायेगी!
उम्मीद नहीं दूर तलक
होने को कोई सुनवाई।
पर करवट लेना वक्त कभी जो
छिड़ेगा सड़कों पर संग्राम
भूखी नंगी जनता जब उमड़ेगी
गूंजेगा धनपतियों का त्राहिमाम्
तू भी जब चीखेगी -
”मेरा क्या होगा सांई?“
खूब बढ़ाओ महंगाई
ओ दिल्ली वाली ताई
तेरे ऊपर जो बैठे हैं
हैं तेरे ही तो भाई?
- सुमन्त
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