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सोमवार, 5 अप्रैल 2010

सब ताज उछाले जायेगें

हम देखेंगेलाजिम है कि हम भी देखेंगेवो दिन कि जिसका वादा हैजो लौह-ए-अजल में लिखा हैजब जुल्म ए सितम के कोह-ए-गरांरुई की तरह उड़ जाएँगेदम महकूमों के पाँव तलेजब धरती धड़ धड़ धड़केगीऔर अहल-ए-हिकम के सर ऊपरजब बिजली कड़ कड़ कड़केगीहम अहल-ए-सफा, मरदूद-ए-हरममसनद पे बिठाए जाएंगेसब ताज उछाले जाएंगेसब तख्त गिराए जाएंगेऔर राज करेगी खुल्क-ए-ख़ुदाजो मैं भी हूँ और तुम भी हो

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