जमींदारी उन्मूलन विधेयक विधान सभा में पास होने के कुछ दिन पूर्व संयुक्त प्रान्त (उत्तर प्रदेश) सभी राजाओं, तालुकेदारों तथा जमींदारों की एक बैठक जनपद बहराइच के चरदा किला (राजा बलरामपुर की एक तहसील) के पास बुलाई गयी थी। इस सभा का आयोजन महाराजा बलरामपुर पटेश्वरी प्रसाद सिंह ने किया था।इस आम सभा में संयुक्त प्रान्त के राजाओं के संघ को बुलाया गया था। इसमें जमींदारी उन्मूलन कानून सरकार द्वारा वापस लेने के लिये प्रस्ताव पास करके सरकार पर दबाव बनाना था। अगर सरकार प्रस्ताव वापस नहीं लेती है तो आन्दोलन की क्या रूप रेखा होगी इस पर भी विचार करना था।राजाओं, तालुकेदारों तथा जमींदारों के अधिकारी तथा उनके कर्मचारियों से आम किसान-मजदूर त्राहि-त्राहि कर रहे थे। जमींदार नाराज होने पर जोत भूमि को बेदखल करके बदल देते थे। घरेलू वृक्ष जैसे अमरुद, कटहल, नींबू आदि नहीं लगाने देेते थे। जमींदार के नाम बाग किए बगैर किसान बाग नहीं लगा सकता था। चरदा क्षेत्र में आर.एस.पी. के साथ मिल कर कम्युनिस्ट पार्टी ने सन् 1948 ई. से ही भूमि बेदखल के विरोध में आवाज बुलंद करना प्रारम्भ कर दिया था। गोविन्द बल्लभ पन्त सरकार ने पार्टी पर प्रतिबंध लगा दिया था।पार्टी कार्यकर्ता गांवों में भूमि बेदखली के खिलाफ जगह-जगह जनसभायें करते थे। सभा के लिये प्रचार प्रसार बाबा का. कुन्जादास घोड़े पर बैठ कर तुरही द्वारा आवाज बुलन्द करते थे, इसके विरोध में रियासत के विसरवार (चौकीदार) मीटिंग में जाने से आम जनता को रोकने का प्रयास करते थे। रियासत के ठेकेदार जो गांवों में ही रहते थे वह भी मना करते थे। 15 अगस्त सन् 1947 को देश आजाद हो गया। उस समय कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता का. पवन सुतदास, का. विजय कुमार नौरंग और जरवल रोड के पास के जमींदार सैय्यद अतहर मंेहदी चरदा क्षेत्र में रियासतों के खिलाफ जोरदार अभियान चला कर किसानों को रियासतों की जोत वाली भूमि पर मालिकाना हक दिलाने का प्रचार करते थे। सन् 1952 में देश का आम चुनाव हुआ। उस समय उ.प्र. में कांग्रेस पार्टी सत्ता में आ गई। उसी समय एक घटना घटी कि उ.प्र. में पूरी की पूरी आर.एस.पी. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में मिल गयी। उसके प्रमुख नेता एवं अध्यक्ष दादा योगेश चटर्जी द्वारा घोषणा होते ही इस क्षेत्र के नेता का. राम हर्ष विद्रोही ने राजाओं के खिलाफ अपना आन्दोलन तेज कर दिया।उ.प्र. सरकार ने जमींदारी उन्मूलन कानून पास कराने के लिये विधानसभा में पेश बिल पेश होते ही उ.प्र. के सभी राजा, जमींदार सकते में आ गये और अपने संगठन ताल्लुकदार संघ उ.प्र. की एक आम सभा जनपद बहराइच के रियासत बलरामपुर के तहसील चरदा में बुलाने का ऐलान किया गया। अपने नियत समय पर प्रदेश के सभी राजा, ताल्लुकेदार, जमींदार तथा रियासत बलरामपुर के सभी ग्रामों के ठेकेदार चरदा में एकत्र हुये। एक बड़े पंडाल जो राजा नानपारा का था ‘दल बादल’ लगाया गया जिसमें 5000 से अधिक लोग बैठ सकते थे मंच पर सभी राजागण विराजमान हुये।सभा की अध्यक्षता के लिये महाराजा बलरामपुर पटेश्वरी सिंह का नाम प्रस्तावित किया गया। संचालन राजा नानपारा सआदत अली खां कर रहे थे। कुछ कहने के लिये राजा काला कांकर जैसे ही खड़े हुये वैसे ही पंडाल में बैठे कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता तथा सदस्य जो जेब में लाल झंडा लिये थे अपने डंडों में लगाकर खड़े हो गये और नारा लगाना प्रारम्भ कर दिया कम्युनिस्ट पार्टी जिन्दाबाद-इन्कलाब, जिन्दाबाद, राजाओं की मनमानी नहीं चलेगी, जमींदारी प्रथा-समाप्त होगी, खेत जोतने वालों को मिलेगा तथा कुछ कार्यकर्ता पंडाल गिराने लगे। मंच से सारे राजा भाग खड़े हुए। पुलिस तथा रियासत के सिपाही कर्मचारी मूक दर्शक की तरह खडे़ रहे।मीटिंग असफल होने पर राजा बलरामपुर पता लगाने लगे कि किस नेता के अगुवाई में यह दंगा हो गया और मीटिंग असफल हो गयी। पता चला कि उनके राज्य के रामपुर निगहा के ठेकेदार पं. सियाराम का पुत्र राम हर्ष जो कम्युनिस्ट है उसी की अगुवाई में यह आन्दोलन हुआ है। इस आन्दोलन में जिले भर के कम्युनिस्ट आये हुये थे जिसमें प्रमुख रूप से का. कामता प्रसाद आर्य, का. स्वामी दयाल त्रिपाठी, का. सैय्यद अतहर मेंहदी (जो स्वयं जमींदार थे और मंच पर विराजमान थे), का. पवन सुतदास, का. विजय कुमार नौरंग तथा छोटेलाल कुरील सभी इस बैठक को विफल करने के लिये एकत्र थे। राजा बलरामपुर ने पं. सियाराम की 500 बीघा भूमि बेदखल कर दिया जिसमें न्यायालय ने केवल 100 बीघा भूमि वापस कराई, शेष भूमि जब्त हो गयी। इस आन्दोलन से जिले के कांग्रेस पार्टी के सभी नेता कम्युनिस्ट पार्टी की इस सफलता से घबड़ा कर कम्युनिस्टों के खिलाफ कुचक्र रचने लगे। इतने ही में चरदा भोज के बाबा गंज बाजार में एक दुकानदार राम बरन के घर डकैती पड़ गयी थी। उस डकैती में कांग्रेसी नेताओं ने का. राम हर्ष विद्रोही, का. स्वामी दयाल त्रिपाठी तथा श्यामता प्रसाद आर्य जैसे जिले के लगभग 10 प्रमुख नेताओं के नाम एफ.आर.आई. में दर्ज करा दिया। पार्टी के प्रमुख नेता का. डा. जेड.ए. अहमद की पैरवी में यह तफसील सी.आई.डी. को सौंपी गयी। सी.आई.डी. ने सभी कम्युनिस्टों को अपने जांच से निकाल दिया।इस आन्दोलन से चरदा तथा इकौना क्षेत्र में भाकपा का अच्छा प्रभाव पड़ा। जनता भी कम्युनिस्टों की कार्यवाही से प्रभावित हुई। उधर जमींदारी उन्मूलन कानून भी पास हो गया। सारी रियासतें समाप्त हो गयी। किसानों को भूमि का मालिकाना हक भी प्राप्त हो गया।कम्युनिस्टों ने विजय तो हासिल किया परन्तु अपने कार्यकर्ताओं को पार्टी से लैस बहुत दिनों तक नहीं कर पाया जिससे हम अधिक आगे बढ़ नहीं पाये जोकि पार्टी के लिए आत्म मंथन का विषय होना चाहिए।(का. रामहर्ष विद्रोही के घर पुराने पार्टी रिकार्डों तथा मौखिक वार्ता केआधार पर)
- रूप नारायण पाण्डे
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