अयोध्या-
सर्वोच्च
न्यायालय ने फैसला सुनाया है, समाधान अभी बाकी है
सर्वोच्च न्यायालय की विशिष्ट पीठ द्वारा राम जन्मभूमि-
बाबरी मस्जिद विवाद पर 9 नवंबर 2019 को एकमत से दिये गये फैसले के पक्ष और विपक्ष
में जब देश भर में बहस छिड़ी हुयी है, भारतीय
कम्युनिस्ट पार्टी, उत्तर प्रदेश के एक उच्च स्तरीय
प्रतिनिधिमंडल ने 28 नवंबर को फैजाबाद/ अयोध्या पहुंच कर फैसले के बाद वहां विवाद से
जुड़े पक्षों, प्रबुध्द जनों और आमजनों से उनके सोच और हालात
की जानकारी ली।
अपने एक दिवसीय दौरे में भाकपा प्रतिनिधिमंडल ने
तमाम लोगों से भेंट की। उनमें कोर्ट में श्री राम जन्म भूमि के प्रमुख पक्षकार और निर्मोही
अखाड़ा के महंत दिनेन्द्र दास, बाबरी मस्जिद के पक्षकार श्री
इकबाल अंसारी, सूरज कुंज मन्दिर के महन्त श्री जुगल किशोर
शास्त्री एवं दैनिक जनमोर्चा के स्थानीय संपादक श्री क्रष्ण प्रताप सिंह आदि
प्रमुख थे। प्रतिनिधिमंडल की भेंट बाबरी मस्जिद के एक और पक्षकार हाजी महबूब से भी
होनी थी पर तय समय पर उनके अन्यत्र व्यस्त होजाने के कारण यह भेंट नहीं होसकी।
देश भर के राम जन्मभूमि आंदोलन के समर्थक सर्वोच
न्यायालय के इस फैसले से गदगद हैं और इसे हिंदूराज स्थापित करने की दिशा में एक
मास्टर स्ट्रोक मान कर चल रहे हैं। वहीं अन्य असंख्य हैं जो इस फैसले को तथ्यों, सबूतों और कानून के शासन के ऊपर आस्था और विश्वास की विजय मान रहे हैं। उनका
आरोप है कि जिन हिंसक अपराधियों ने 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद का ढांचा गिरा
दिया और जिन्होने 1949 में ढांचे के भीतर मूर्तियाँ घुसाईं, को
सर्वोच्च न्यायालय ने पुरुष्क्रत किया है। इस निर्णय ने हमारे संविधान में विहित
देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे की अवधारणा की अवहेलना की है।
देश भर में चल रहे इस विचार मंथन से अन्यमनस्क
अयोध्या यद्यपि ‘न खुशी न गम’
के स्थायी भाव में मस्त जान पड़ती है लेकिन गहराई में जाने पर पता चलता है कि ऊपर
से शांत तालाब की तलहटी में भारी हलचल मौजूद है। वह इस मुद्दे पर देश भर के
सरोकारों से कम, अपने अंदर के सरोकारों से ज्यादा जूझती नजर
आती है।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के तीन सप्ताह बीत
जाने के बाद भी भारी बेरीकेडिंग और तैनात पुलिस बलों से आच्छादित अयोध्या में
श्रध्दालुओं के आवागमन में कोई कमी नहीं आयी अपितु एक महन्त जी के अनुसार यह 1985 –
90 की तुलना में कई गुना बढ़ी है। मन्दिर आंदोलन ने अयोध्या को काशी और मथुरा की
तरह आस्थावानों की प्रमुख पसन्द बना दिया है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद
श्रध्दालुओं की आमद में और इजाफा हुआ है और आम दुकानदार और पंडे- पुजारी इससे बेहद
खुश हैं। वहीं एक चायखाना चलाने वाली महिला
की प्रातिक्रिया थी कि जिन लोगों के कारण अयोध्या को बार बार पाबंदियां और कर्फ़्यू
झेलने पड़ते हैं और गरीबों की रोजी- रोटी पर बन आती है, वे अब भी चुप बैठने वाले नहीं हैं। वह गरीब महिला अब भी मौजूद भारी
वैरीकेडिंग पर भी सवाल उठाती है।
मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड और जमात ए इस्लामी जैसे
संगठन जहां सर्वोच्च न्यायालय में रिव्यू याचिका दायर करने की घोषणा कर चुके हैं और
जमीयत उलमा –ए- हिन्द ने तो अब रिव्यू याचिका दायर भी कर दी है। पर बाबरी मस्जिद
के मुद्दई हाजी इकबाल अंसारी मीडिया के समक्ष दो टूक कहते हैं ‘ मुद्दा खत्म होगया, पिटीशन से मतभेद पैदा होंगे।‘ उन्हीं के आवास पर मीडियाकर्मियों द्वारा भाकपा प्रतिनिधिमंडल से इस
मुद्दे पर पूछे जाने पर भाकपा प्रतिनिधिमंडल ने जब स्पष्ट कहाकि रिट पिटीशन में
जाना किसी का भी संवैधानिक अधिकार है तो उन्होने इसका विरोध भी नहीं किया। वे एक
सीधे सादे इन्सान जान पड़े।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बाबरी मस्जिद पक्ष को 5
एकड़ जमीन देने के मामले पर भी भिन्न भिन्न रायें दिखीं। कुछ हैं जो जमीन लेने के
पक्ष में नहीं हैं। कई अन्य सुझाव हवा में तैर रहे हैं। पर इकबाल अंसारी साहब ने मुहिम
छेड़ दी है कि उनके घर के सामने स्थित जमीन सरकार दे और उस पर महिलाओं के लिये एक
कौमी एकता अस्पताल खोला जाये। ज्ञात हो कि राम की इस नगरी में महिलाओं के लिये न
तो कोई सरकारी अस्पताल है और न ही किसी अस्पताल में महिला चिकित्सक की तैनाती है।
ऐसे में महिलाओं को इलाज और प्रसव के लिये या तो नगर से बाहर जाना होता है या फिर
महंगे और लुटेरे किस्म के निजी अस्पतालों की शरण लेनी पड़ती है।
ऐसे में इकबाल अंसारी की इस मुहिम को बल मिल सकता
है। भाकपा की स्थानीय इकाई महिला चिकित्सालय के निर्माण और सरकारी अस्पतालों में
महिला चिकित्सक की तैनाती के लिये निरंतर आंदोलन चला रही है। यह आश्चर्यजनक ही है
कि जो सरकार अयोध्या में विशाल मूर्तियों के निर्माण और दीपोत्सवों पर जनता की
गाड़ी कमाई का अरबों रुपये फूँक रही है वह महिलाओं की चिकित्सा के सवाल से बेशर्मी
से मुंह मोड़े हुये है।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयानुसार सरकार द्वारा
गठित किये जाने वाले ट्रस्ट पर आधिपत्य जमाने और उसमें जगह पाने लिये विभिन्न
पक्षों में चल रही प्रतिस्पर्धा के बीच निर्मोही अखाड़े के महन्त श्री दिनेन्द्र
दास ने बहुत सध कर अपनी प्रतिक्रिया दी। कहा कि निर्मोही अखाड़े ने तो सबसे पहले
मुकदमा लड़ा। अखाड़े ने मुकदमे के लिये जमीन तक बेच दी। वे बताते हैं कि अखाडा परिषद
के निर्णय के बाद इसके पंचों से प्रधानमंत्री से मिलने का समय मांगा है। विश्व
हिन्दू परिषद द्वारा मन्दिर निर्माण के लिये एकत्रित धन, मन्दिर के उसके माडल और तराशे पत्थरों को सरकार को सौंपने के सवाल पर वे
कहते हैं कि रामजी का पैसा है, विहिप को स्वयं देदेना
चाहिये। अगर नहीं तो सरकार निर्णय लेगी। मन्दिर निर्माण का प्रश्न राजनीति से अलग
रहना चाहिये। यह पूछे जाने पर कि निर्णय हुआ है समाधान नहीं हुआ, वे कहते हैं कि 95 प्रतिशत ठीक होचुका है।
बैरीकेडिंग के चलते भाकपा प्रतिनिधिमंडल सूरज कुंज
मन्दिर नहीं पहुंच सका। लेकिन उसके महन्त जुगल किशोर शास्त्री ने सदाशयता का परिचय
दिया और वे प्रतिनिधिमंडल से मिलने मुख्य सड़क तक चल कर आगये। वहीं एक महिला द्वारा
संचालित छोटे से चाय खाने पर उनसे बेवाक चर्चा हुयी।
वे धारा प्रवाह बोलने लगे- ‘हिन्दू बंटा हुआ है, उसमें दलित वर्ग अलग है जो इन
झमेलों से परेशानी महसूस करता है, पर वो बोल नहीं सकता, वो कमजोर हैं, विश्व हिन्दू परिषद का माहौल पहले से
कम हुआ है, आस्था संविधान सम्मत नहीं है, राष्ट्रवाद संकीर्ण सोच है, महंतों में निजी हितों
की लड़ाई है, नेपाल में विकास हुआ है,
असल लड़ाई हक- हकूक की है, कम्युनिस्ट उसीको लड़ते हैं, वे किसी संकीर्णता में नहीं।‘
वे बिना रुके बोलते जाते हैं- ‘ मुसलमानों के साथ न्याय नहीं होता, हमेशा मुसलमानों
को दबाने का प्रयास किया जाता है, मुसलमानों पर जुल्म आगे भी
बढ़ेगा, इसका प्रतिकार करना चाहिए,
निर्णय का विरोध होना चाहिये, यह विरोध संविधान सम्मत है, हम कम्युनिस्टों को पसंद करते हैं,’ आदि।
स्थानीय समाचार पत्र जनमोर्चा कार्यालय में अपने
कार्य में मशगूल संपादक क्रष्ण प्रताप सिंह से चर्चा हुयी तो लगा कि वे महन्त जुगल
किशोर शास्त्री की बात को ही आगे बढ़ा रहे हैं। वे कहते हैं- ‘ स्वीकार कर लेना चाहिये कि हिन्दू राष्ट्र बन चुका है, फैसला आया तो तमाम हिन्दू खुश थे, मामला केवल
मंदिर- मस्जिद का नहीं था, सवाल मुसलमान की हैसियत दोयम
दर्जे की बनाने का है, यह आगे भी चलेगा, प्रधानमंत्री ने झारखंड में भाषण दिया कि 60 साल पुराना विवाद हमने 6 माह
में निपटा दिया, यह सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना है, इससे लंबी लड़ाई लड़नी ही होगी, जितनी ज्यादा लड़ाई हम
लड़ लेंगे हमारी संतानों को उतनी ही कम लड़नी पड़ेगी,’ आदि।
मंदिर निर्माण की आगे की तस्वीर के बारे में वे
इतना ही कहते हैं- ‘ हिन्दू धर्म के ठेकेदारों में लड़ाई
होगी, ट्रस्ट गठन का मामला कोर्ट में जा सकता है।‘
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद भी तमाम झगड़े
टंटों में उलझी है अयोध्या।
भाकपा के इस प्रतिनिधिमंडल में इन पक्तियों के लेखक
के अतिरिक्त भाकपा फैजाबाद के जिला सचिव का॰ रामतीरथ पाठक, राज्य काउंसिल के सदस्य का॰ अशोक तिवारी, उत्तर
प्रदेश नौजवान सभा के अध्यक्ष का॰ विनय पाठक, भाकपा अयोध्या
के वरिष्ठ नेता का॰ संपूर्णानन्द बाजपेयी, नगर सचिव का॰ ब्रजेन्द्र
श्रीवास्तव, वरिष्ठ भाकपा नेता का॰ सूर्यकांत पाण्डेय एवं
खेत मजदूर यूनियन के वरिष्ठ नेता का॰ अखिलेश चतुर्वेदी शामिल थे।
डा॰ गिरीश, राज्य सचिव दिनांक- 4 दिसंबर 2019
भाकपा, उत्तर प्रदेश
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