भाकपा ने यूपी निजी विश्वविद्यालय अधिनियम को असंवैधानिक
बताया
तत्काल वापस लेने की मांग की
लखनऊ- भारतीय कम्युनिस्ट
पार्टी के राज्य सचिव मण्डल ने यूपी केबिनेट द्वारा पारित ‘उत्तर
प्रदेश निजी विश्वविद्यालय अध्यादेश 2019' जिसका कि उद्देश्य
इन विश्वविद्यालयों में राष्ट्रविरोधी गतिविधियां रोकना बताया जारहा है, को अभिव्यक्ति एवं शिक्षा के आधार और अधिकार पर बड़ा हमला बताया है। भाकपा
ने इस अध्यादेश पर कड़ी आपत्ति जताते हुये इसे रद्द करने की मांग की है।
एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा॰ गिरीश ने
कहाकि ऐसा अध्यादेश लाने से पहले राज्य सरकार को बताना चाहिये कि किस निजी विश्वविद्यालय
में और क्या राष्ट्रविरोधी गतिविधियां होरही हैं और यदि होरहीं हैं तो वे अब तक क्यों
जनता के संज्ञान में नहीं लायी गईं? क्यों अब तक उनके
खिलाफ कानूनी कार्यवाही नहीं की गयी? जेएनयू के कथित टुकड़े- टुकड़े
गैंग जिसकी कि चार्जशीट अदालत द्वारा रद्द की जाचुकी है का बहाना बना कर थोपे जाने
वाले इस अध्यादेश को स्वीकार नहीं किया जासकता।
भाकपा ने कहाकि इस तुगलकी अध्यादेश के जरिये भाजपा सरकार
उन विश्वविद्यालयों में छात्रों एवं शिक्षकों की लोकतान्त्रिक गतिविधियों को कुचलना
चाहती है और संघ नियंत्रित छात्र एवं शिक्षक संगठनों को वाक ओवर देना चाहती है।भाजपा
को लोकतान्त्रिक और विपरीत विचार बर्दाश्त नहीं। वह उन्हें कुचलने को तमाम हथकंडे अपना
रही है। यह अध्यादेश भी उनमें से एक है।
सच तो यह है कि संघ नियंत्रित विद्यालयों और बौध्दिक
शिविरों में आबादी के बड़े हिस्से के प्रति घ्रणा और विद्वेष पैदा करने वाली शिक्षा
दी जाती है तथा गांधी, नेहरू के प्रति घ्रणा और नाथूराम गोडसे
के प्रति श्रध्दा पैदा की जाती है। असल जरूरत उसे रोके जाने की है।
भाकपा ने कहाकि निजी हाथों में सिमटी शिक्षा आज व्यापार
बन गयी है। वह गरीबों और निम्न मध्यम वर्ग के लिये सुलभ नहीं है। जरूरत शिक्षा का राष्ट्रीयकरण
करने और उसका बजट बढ़ा कर उसे सर्वसुलभ बनाने की है। सभी को समान शिक्षा दिये जाने का
निर्देश माननीय उच्च न्यायालय द्वारा कई साल पहले दिया जाचुका है और भाकपा इसे लागू
कराने के लिये माननीय राज्यपाल महोदय को तभी ज्ञापन देचुकी है जब सपा की सरकार थी।
लेकिन भाजपा इस बुनियादी सवाल से ध्यान हटाने को ऐसे हथकंडे अपना रही है। भाजपा सरकार
छात्रसंघों के चुनाव कराने से भी कतरा रही।
भाकपा ने सभी लोकतान्त्रिक शक्तियों से अपील की कि वे
इस गैर जरूरी और असंवैधानिक अध्यादेश को रद्द किए जाने हेतु आवाज उठायेँ।
केवल भाकपा ने ही उठाया सवाल।
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