भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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शनिवार, 19 नवंबर 2011

अक्टूबर क्रांति, इतिहास और भावी समाजवाद

7 नवंबर को हम फिर से एक बार हर वर्ष की तरह रूसी क्रांति की वर्षगांठ मना रहे हैं। यह इतिहास की ऐसी असाधारण घटना है जिस पर काफी कुछ लिखा जा चुका है, लिखा जा रहा है और आगे भी उस पर लिखा जाता रहेगा।
 यह बार-बार दोहराया जा चुका है और फिर कहा जाना चाहिए कि रूसी क्रांति एक महान ऐतिहासिक घटना, एक महान क्रांति थी। रूसी क्रांति और महान नेता लेनिन से बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है। हम उन्हें महान जरूर कहते हैं लेकिन उनका अध्ययन कितना करते हैं और उनसे कितना सीखते हैं इस पर हरेक व्यक्ति स्वयं ही विचार करे तो अच्छा रहेगा।
लेनिन: रूसी क्रांति के सिद्धांतकार लेनिन एक महान सिद्धांतकार थे जो मार्क्सवाद को नई मंजिलों पर ले गए। से साम्राज्यवादी युग के सिद्धांतकार माने जाते हैं। आजकल राजनीति में पढ़ने वालों की संख्या घटती जा रही है। स्वयं कम्युनिस्ट आंदोलन में मार्क्स और लेनिन के बारे में, उनकी प्रशंसा में तारीफ के पुल बांधे जाते हैं, लेकिन यह सब बिना यह जाने और पढ़े कि वास्तव में लेनिन ने क्या लिखा था और क्यों। उन्होंने न सिर्फ राजनीति, दर्शन और अर्थशास्त्र का अध्ययन किया बल्कि अपने युग के सभी विज्ञानों का जहां तक हो सके गहन अध्ययन किया। मसलन उन्होंने 20वीं सदी के आरम्भ में रूस में कृषि में पंजीवाद के विकास संबंधी शोधकार्य किया और इसमें कई वर्ष लगाए। इसके लिए उन्होंने योरोप की लाइब्रेरियों में काफी समय बिताया। आजकल लाइब्रेरी में बैठने और किताबें पढ़ने का मजाक उड़ाया जाता है और कहा जाता है कि ”किताबें पढ़कर प्रोफेसर बनना है क्या? मैदान में जाओ और काम करो!“ उन्हें लेनिन से सीखने की आवश्यकता है। बिना इस प्रकार के अध्ययन के रूसी क्रांति संभव नहीं थी। लेनिन ने 1905-07 की प्रथम रूसी क्रांति की विफलता के बाद फिर गहन अध्ययन का सहारा लिया। इसी क्रांति के दौरान सोवियतों का जन्म हुआ था और इसी के दौरान जनवादी क्रांति की मंजिल का सिद्धांत उन्होंने अधिक ठोस रूप में विकसित किया।
 लेनिन ने कई विषयों के अध्ययन के अलावा एटम संबंधी गहरी खोजों पर अपना ध्यान केन्द्रित किया। उस समय तक एटम अंतिम कण माना जाता था लेकिन तब उसके अंदर इलेक्ट्रान तथा अन्य कणों की खोज की गई। इसका दर्शन के लिए बड़ा महत्व था। इससे पदार्थ की असीम गहनता का पता चलता है।  कई लोग फिर भी पूछेंगे कि इस एटम और दर्शन के अध्ययन का क्रांति तथा समाजवाद से क्या मतलब है? शायद लोग सोचे कि ठीक है, लेनिन को शौक होगा या अपना ”सामान्य ज्ञान“ बढ़ाने के लिए उन्होंने कुछ पढ़ लिया होगा। लेकिन बात ऐसी नहीं थी। एटम के खंडन ने दर्शन में तीव्र विवाद को जन्म दिया। दार्शनिकों के एक हिस्से ने इसे पदार्थवाद का खंडन माना क्योंकि एटम ‘खंडित’ हो गया था।
 लेनिन ने भौतिकवाद के समर्थन में ‘एम्पीरियो-क्रिटिसिज्म’ लिखा। उन्होंने साबित किया कि एटम के अंदर अन्य कणों एवं ऊर्जा स्रोतों की खोजों ने द्वंदात्मक भौतिकवाद को आगे विकसित किया है। उन्होंने अपने समय के सभी मुख्य वैज्ञानिक साहित्य, तथ्यों और खोजों का व्यापकता तथा गहराई से अध्ययन किया।
 लेनिन ने यह कार्य इतना महत्वपूर्ण समझा कि उन्होंने इस पुस्तक के तुरन्त और बड़ी संख्या में प्रकाशन पर जोर दिया। पुस्तक ने उस समय के क्रांतिकारियों की दार्शनिक समझ स्पष्ट करने में बड़ी भूमिका अदा की।
साम्राज्यवाद का अध्ययन: रूस एक कमजोर कड़ी लेनिन साम्राज्यवादी युग के महान सिद्धांतकार थे। वे हॉब्सन और हिल्फरडिंग के सिद्धांतों को आगे ले गए। उन्होंने पंूजीवाद के विकास की नई मंजिल का विवेचन करते हुए साम्राज्यवाद का सिद्धान्त पेश किया जिसकी पांॅच विशेषताएं बताई।
 साम्राज्यवाद के सिद्धान्त से कई नतीजे निकलते हैं। इनमें क्रांति की जनवादी मंजिल महत्वपूर्ण है जिससे रूसी पार्टी में फूट पड़ गई और बोल्शेविक तथा मेंशेविक पार्टियां बनीं जो फिर कभी एक नहीं हो पाई। साम्राज्यवाद के बारे में भी उनमें गहरा मतभेद था। दोनों पार्टियों के बीच मतभेद सैद्धांतिक थे, व्यक्तिगत नहीं।
 औपनिवेशिक गुलाम देशों में आजादी की लड़ाई और उसके साथ रूसी क्रांतिकारियों की एकजुटता का सिद्धांत और व्यवहार भी इसी से विकसित हुआ। लेनिन ने साम्राज्यवाद- विरोधी मोर्चे का सिद्धांत पेश किया। लेनिन ने साम्राज्यवाद के युग में आर्थिक संकट के व्यवस्था के आम संकट में बदल जाने की ओर ध्यान दिलाया। साम्राज्यवाद ने विश्व अर्थव्यवस्था में असमान विकास को और भी तेज कर दिया तथा उसमें गुणात्मक परिवर्तन ला दिया।
 इन्हीं प्रक्रियाओं के कारण रूस में क्रांति की परिस्थितियांॅ पैदा हुई।
रूसी क्रांति के कारण 1917 की रूसी क्रांति के कारणों पर विचार करते हुए अक्सर ही एक महत्वपूर्ण कारक की अनदेखी कर दी जाती है। लेनिन ने रूस को साम्राज्यवादी श्रंृखला की सबसे कमजोर कड़ी बताया। प्रथम विश्व युद्ध के आते-आते साम्राज्यवाद के सारे अंतर्विरोध तीखे होते गए और वे सबसे बढ़कर रूस पर केन्द्रित होते गए। यह रूसी क्रांति का सबसे महत्वपूर्ण कारण था, हालांकि कई अन्य कारण भी थे।
प्रथम सफल मजदूर क्रांति रूसी क्रांति एक ऐसी मूलगामी सर्वहारा समाजवादी क्रांति थी जो साम्राज्यवादी युग में हुई। साथ ही इसमें जनवादी क्रांति के शक्तिशाली तत्व थे। इसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। लेनिन ने समाजवाद की ओर बढ़ने के लिए व्यापक एवं गहन जनवादी क्रांति की जरूरत पर जोर दिया। इसलिए उन्होंने क्रांति ‘नई अर्थनीति’ या ‘नेप’ अपनाया। आज रूसी क्रांति के पतन के कारणों के संदर्भ में लेनिन की इन रचनाओं पर अधिक गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
 लेनिन ने रूसी क्रांति के फरवरी (मार्च) और अक्टूबर (नवम्बर) 1917 के बीच क्रांति के उतार-चढ़ावों, टेढ़े-मेढ़े रास्तों और डाइलेक्टिक्स पर जो लिखा है वह गंभीरता से पढ़ने लायक है। वह क्रांति के आंतरिक द्वन्द्व को दर्शाता है। पार्टी और सोवियतों के बीच संबंधों, क्रांति के शांतिपूर्ण और हथियारबंद मार्गो तथा तरीकों, सत्ता के बदलते स्वरूपों इत्यादि पर ये लेख अत्यंत ही शिक्षाप्रद है।
 लेनिन ने अप्रैल, 1917 में एक असाधारण लेख लिखा जो ‘अप्रैल थीसिस’ के नाम से जाना जाता है। वैसे जब क्रांति जोरों पर थी तो लेनिन सेंट पीटर्सबर्ग या पेट्रोग्राड (बाद में लेनिनग्राड) के बाहर एक कोने में बैठकर ‘राज्य और क्रांति’ नामक पुस्तक लिख रहे थे। इस पर उनके साथ रह रहे साथी को आश्चर्य हुआ था कि वे ऐसे उथल-पुथल के समय शांत भाव से ‘लिख’ क्यों रहे हैं?
 ‘अप्रैल थीसिस’ में लेनिन ने पहली बार ‘द्वैध सत्ता’ का सिद्धांत पेश किया था, अर्थात अब क्रांति किसी भी ओर जा सकती थी- जनता के हक में या राजतंत्र अथवा बड़े पूंजीपतियों के हक में। इसका कारण था सत्ता का दो हिस्सों में बंटना जो इतिहास की असाधारण घटना थी। आगे विकास इस पर निर्भर करता था कि सोवियत क्रांति का चरित्र पहचानती है या नहीं।
लेनिन और सोवियत सत्ता रूसी और सोवियत क्रांति की उपलब्धियों के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका और लिखा जाना चाहिए। इतिहास में रूसी क्रांति के स्थान, योगदान और भूमिका को कोई मिटा नहीं सकता है। समाजवाद के निर्माण का यह पहला प्रयत्न था जिसने बहुत कुछ हासिल किया। आज साम्राज्यवादी शक्तियां रूसी क्रांति और उसके योगदान को न सिर्फ विकृत कर रही है बल्कि उसे मिटाने की कोशिश कर रही हैं यहां तक कि वे द्वितीय विश्वयुद्ध में सोवियत संघ की भूमिका को तोड़-मरोड़ रही है।
 सोवियत क्रांति की उपलब्धियों के साथ-साथ हमें उसकी कमियों का भी ख्याल करना चाहिए ताकि भविष्य में बेहतर समाजवाद का निर्माण किया जा सके। इसके लिए इतिहास से और स्वयं लेनिन से सीखने की जरूरत है। क्रांति के बाद 1924 की जनवरी में अपनी मृत्यु तक लेनिन सोवियत सत्ता में नकारात्मक रूझानों के प्रति बड़े ही सचेत और चिंतित थे। उनकी चुनी हुई रचनाओं (‘सेलेक्टेड वर्क्स’) के तीसरे खंड का यदि गंभीरता से अध्ययन किया जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है। उन्होंने सोवियत सत्ता में नौकरशाही के बढ़ते रूझान का बार-बार विरोध किया है। अपनी रचना ”आन कोआपरेशन“ (सहयोग के बारे में) में उन्होंने जनतंत्र पर जोर दिया है। रोजा लक्सेम्वर्ग (सुप्रसिद्ध जर्मन कम्युनिस्ट नेता) तथा स्वयं लेनिन इस तथ्य की आलोचना कर रहे थे कि सोवियतों की सत्ता वास्तव में पार्टी की सत्ता बनती जा रही थी। लेनिन ने सत्ता को जनतांत्रिक और जन आधारित बनाने की पूरी कोशिश की।
केन्द्रीकरण: समाजवाद-विरोधी 1922 में लेनिन की मर्जी के खिलाफ स्तालिन को पार्टी का महासचिव बनाया गया। उस वक्त महासचिव का पद ज्यादा महत्व का नहीं होता था लेकिन जल्द ही वह महत्व का बन गया और बात गंभीर हो गई, जैसा कि लेनिन ने पूर्वानुमान लगाया था। उन्होंने एक बार नहीं, कई बार स्तालिन को हटाने की मांग की। यह तथ्य लेनिन की संकलित रचनाआंे में मिल जाते हैं।
 लेनिन की मृत्यु (जनवरी, 1924) के बाद स्तालिन के नेतृत्व में सोवियत संघ ने बहुत सारी उपलब्धियां हासिल की। लेकिन साथ ही एक अत्यंत नकारात्मक और घातक रूझान भी पैदा हुई जो ‘स्तालिनवाद’ के नाम से जानी जाती है। यहां हम स्थान की कमी के कारण उस पर विस्तार से चर्चा नहीं कर पायेंगे। इतना कहना ही काफी होगा कि लेनिन का अंदेशा सही निकला। अतिकेन्द्रीकृत नौकरशाही और एक व्यक्ति के हाथों में सत्ता के केन्द्रीकरण समाजवाद के लिए न सिर्फ हानिकारक है बल्कि घातक भी। सोवियत संघ के पतन के कारणों में यह भी है। इसलिए इससे बचने की आवश्यकता है।
समाजवाद, जनतंत्र और तकनीकी क्रांति का युग पिछले लगभग तीन दशकों में विश्व मंे भारी परिवर्तन हुए हैं और कई मायनों में वे गुणात्मक परिवर्तन है। सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप में केन्द्रीकृत समाजवादी सत्ताओं का पतन हो गया। इनसे गंभीरता से सीख लेने की आवश्यकता है। जहांॅ रूसी क्रांति ने समाजवाद की प्रथम मिसाल पेश की, वहीं यह भी सिखाया कि समाजवाद के निर्माण में नकारात्मक तरीके नहीं अपनाए जा सकते हैं, समाजवाद का निर्माण गलत तरीकों से नहीं हो सकता। समाजवाद और कम्युनिज्म का ध्येय आज भी बरकरार है लेकिन उनकी ओर बढ़ने के तरीके एवं मार्ग बदल गए हैं। यहांॅ भी लेनिन से सीखने की जरूरत है उन्होंने बारम्बार दूसरे देशों से रूसी क्रांति का रास्ता नहीं अपनाने, उसकी नकल नहीं करने की अपील की थी और चेतावनी दी थी।
 इतना स्पष्ट है कि आप बिना जनतंत्र के समाजवाद का रास्ता नहीं अपना सकते। आज की सूचना क्रांति के युग में यह बात और भी उजागर हो उठती है। सूचना और तकनीकी क्रांति वर्गों और व्यक्तियों को अधिक जनतांत्रिक बनाती हैं, उनके हाथों में जनतांत्रिक माध्यम पेश करती है। पिछले दो-तीन दशकों में हमारी आंखों के सामने सूचना तकनीकी क्रांति का असाधारण प्रसार हुआ है। क्या समाजवादी शक्तियां इनका पूरा इस्तेमाल कर रही हैं? इसके अलावा बाजार की शक्तियों का भी बड़े पैमाने पर प्रसार हुआ है। भविष्य में समाजवाद में बाजार समाप्त करने का नहीं, बल्कि बाजार के जनवादीकरण का प्रश्न होगा। आज वियतनाम, चीन, क्यूबा, लैटिन अमरीकी देशों के सामने यह एक महत्वपूर्ण समस्या है।
समाज और मजदूर वर्ग की बदलती संरचना और समाजवाद खेद का विषय है कि इस प्रश्न पर बहुत कम ध्यान दिया जा रहा है। रूसी क्रांति के समय खास तरह का मजदूर वर्ग था और एक अलग किस्म की सामाजिक संरचना थी। आज के मजदूर वर्ग की संरचना (ढांचा) बदल रही है। सूचना और सेवा में कार्यरत श्रमिकों की संख्या तथा प्रतिशत बढ़ रहा है। इसके अलावा समाज की भी संरचना तेजी से बदल रही है, खासतौर पर उसका शहरीकरण हो रहा है जिसके नकारात्मक और सकारात्मक दोनों ही पक्ष हैं।
 इसलिए भावी सामाजिक परिवर्तनों और समाजवाद को इन बदली परिस्थितियों का ध्यान रखना पड़ेगा। रूसी क्रांति के रास्ते और तौर-तरीकों को छोड़ना होगा। आज लैटिन अमरीका के दर्जन से अधिक देशों में मूलगामी परिवर्तन चल रहे हैं। वे भले ही क्यूबा की प्रशंसा करते हों, उससे दोस्ती रखते हों लेकिन वे क्यूबा से बिल्कुल अलग रास्ता अपनाए हुए हैं। जब हम रूसी क्रांति की वर्षगांठ मना रहे हैं तो एक और बात का ध्यान रखा जाना चाहिए। वह यह कि ऐतिहासिक भौतिकवाद के नियम समाजवाद पर भी लागू होते हैं, आज भी लागू हैं। यह महत्वपूर्ण पहलू रूस और पूर्वी योरप के शासक भूल गए थे। परिवर्तन, द्वन्द्व, अंतर्विरोध और उनका हल, निरंतर गति, नई और बदलती आवश्यकताएं एवं मांगें, विचारों- मतों का अंतर और द्वन्द्व, यहां तक कि खुला विरोध, समाजवाद का नई मंजिलों में पहुंॅचने, वस्तुगत नियम, संकट इत्यादि समाजवाद में भी होते हैं। समाजवाद में भी वस्तुगत परिस्थितियां ही निर्माण के तौर- तरीके तय करेंगी, पार्टी नहीं। पार्टी, अन्य संगठन मात्र माध्यम होंगे। सोवियत संघ में अक्सर ही यह बात भुलाकर वस्तुगत परिस्थितियों पर मनोवादी विचार थोपे गये थे। समाजवाद के अंतर्गत भी उत्पादन के साधनों और उत्पादन संबंधों के बीच टकराव चलता है। इनकी ओर भी स्वयं लेनिन ने कई बार ध्यान खींचा था।
 भावी समाजवाद के संदर्भ में हमें रूसी क्रांति के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं से काफी कुछ सीखना है।
- अनिल राजिमवाले
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मंगलवार, 17 मई 2011

अ0भा0 किसान सभा की 75 की वर्षगांठ के अवसर पर


अखिल भारतीय किसान सभा का संक्षिप्त इतिहास और कुछ उपलब्धियां
1936 का वर्ष भारत के किसान आंदोलन में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। जनवरी, 1936 में मेरठ (उ0प्र0) में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का अखिल भारतीय सम्मेलन सम्पन्न हुआ। इसमें किसानों की स्थिति पर विशेष विचार हुआ। 15 जनवरी (1936) को किसान आंदोलन से संबंधित नेताओं एवं कार्यकर्ताओं की वहीं बैठक हुई। वहां किसान संगठन बनाने के लिए एक संगठन समिति का गठन किया गया। समिति का कार्य था एक अखिल भारतीय किसान कांग्रेस का आयोजन करना। समिति के संयोजक थे एन0जी0 रंगा और जय प्रकाश नारायण।

अखिल भारतीय किसान सम्मेलन 11 अप्रैल, 1936 को लखनऊ में आयोजित किया गया जब वहां भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अखिल भारतीय अधिवेशन चल रहा था। सम्मेलन में अखिल भारतीय किसान कांग्रेस की स्थापना की गई। कुछ ने इसे अखिल भारतीय किसान संघ भी कहा। आगे चलकर इसका नाम अखिल भारतीय किसान सभा कर दिया गया।

पृष्ठभूमि

अ0भा0 किसान सभा की स्थापना कई दशकों के संघर्षों का परिणाम था। साथ ही वह कई वर्षों से संगठन बनाने के प्रयत्नों का परिणाम भी था। जैसा कि सभी जानते हैं भारत में किसान आंदोलन की लंबी पंरपरा और इतिहास रहा है।

1936 से पहले भारत के विभिन्न प्रदेशों और क्षेत्रों में कई किसान संगठनों का जन्म हो चुका था। मसलन, बिहार में 1920 और 30 के दशकों में कई किसान सम्मेलन तथा संगठन बने। बिहार प्रदेश किसान सभा का प्रथम सम्मेलन 18 जून, 1933 को बिहटा में हुआ और दूसरा सम्मेलन 1935 में हाजीपुर में सम्पन्न हुआ।

इसी प्रकार पंजाब, संयुक्त प्रांत (यू0पी0), बंगाल, आंध्र तथा अन्य कई प्रदेशों में किसान सभाएं गठित की गई तथा उनके सम्मेलन आयोजित किए गए। इतना ही नही,ं उनके नेतृत्व में कई आन्दोलन संगठित किए गए।

अ0भा0 किसान सभा की स्थापना (1936)

11 अप्रैल, 1936 को लखनऊ में आरंभ अ0भा0 किसान सभा की स्थापना सम्मेलन की अध्यक्षता सुप्रसिद्ध किसान नेता स्वामी सहजानंद ने की। उन्होंने अपने अध्यक्षीय भाषण में भूमि सुधारों पर जोर दिया और कहा कि जमींदारी व्यवस्था किसानों की समस्या की जड़ है।

सम्मेलन को सम्बोधित करने वालों में सोहन सिंह जोश, राम मनोहर लोहिया तथा अन्य कई महत्वपूर्ण नेता भी थे। सम्मेलन में भाग लेने वालों में इन्दुलाल याज्ञनिक, के0एम0 अशरफ, एन0जी0 रंगा, जय प्रकाश नारायण तथा अन्य थे।

सम्मेलन में विभिन्न विषयों पर प्रस्ताव पास किए गए, जैसे किसानों की आर्थिक शोषण से मुक्ति, किसान सभा का गठन, राष्ट्रीय आजादी के आंदोलन में हिस्सा लेते हुए भविष्य में मेहनतकशों के राज्य के लिए संघर्ष करना, सामंती व्यवस्था के विभिन्न रूप (जमींदारी, मालगुजारी, जेनमी, इत्यादि) समाप्त किए जाएं, इत्यादि।

सम्मेलन में अखिल भारतीय किसान कमेटी (ए.आई.के.सी.) तथा इसकी कार्यकारिणी के रूप में केन्द्रीय किसान काउंसिल (सी.के.सी.) का गठन किया गया। स्वामी सहजानंद सरस्वती अ0भा0 किसान सभा के अध्यक्ष तथा एन0जी0 रंगा महासचिव बनाए गए।

सम्मेलन में निम्नलिखित प्रदेशों से प्रतिनिधियों ने भाग लिया- बिहार, बंगाल, आंध्र, तमिलनाडु, मलाबार, मध्य प्रांत (सी.पी), पंजाब, गुजरात, दिल्ली, इत्यादि।

सम्मेलन में एक किसान मैनिफैस्टों (किसान घोषणापत्र) की रूपरेखा तैयार की गई जिसे ए.आई.के.सी. ने बाद में अगस्त 1936 में बंबई में स्वीकार किया। यह भी निर्णय लिया गया कि इंदुलाल याज्ञनिक के संपादकत्व में एक बुलेटिन प्रकाशित किया जाए।

1936 का वर्ष भारत के जन- आंदोलन में एक महत्वपूर्ण वर्ष साबित हुआ। अ.भा. किसान सभा के अलावा उस वर्ष ए.आई.एस.एफ. तथा प्रगतिशील लेखक संघ (पी.डब्ल्यू.ए.) जैसे जनसंगठनों की स्थापना भी की गई। ये तीनों ही मिले- जुले जनसंगठन थे जिनमें कम्युनिस्टों समेत कई अन्य वामपंथी, प्रगतिशील और राष्ट्रवादी तत्व भी शामिल थे।

यह देश में उभरते संयुक्त जनआंदोलनों और संयुक्त मोर्चे का प्रतीक था। साम्राज्यवाद तथा फासिज्म के बढ़ते खतरे के संदर्भ में व्यापक संयुक्त मोर्चे की रणनीति विशेष महत्व की हो उठी।

किसान दिवस

अ.भा. किसान सभा की स्थापना ने भारत के किसान आंदोलन को अधिक ठोस और संगठित रूप देते हुए उसे एक स्पष्ट दिशा प्रदान की। इस सिलसिले में एक महत्वपूर्ण घटना थी 17 अगस्त 1936 को अ.भा. किसान दिवस का मनाया जाना। स्वामी सहजानंद ने लखनऊ सम्मेलन के निर्णयानुसार उस दिन सारे देश में सभा, प्रदर्शनों इत्यादि के जरिए दिवस मनाने की अपील की।

अ.भा. किसान सभा का फैजपुर अधिवेशन

उसी वर्ष, 1936 में ही अ.भा. किसान का दूसरा अधिवेशन फैजपुर (महाराष्ट्र) में ”तिलकनगर“ में आयोजित किया गया। 25-26 दिसम्बर को यह अधिवेशन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की विषय समिति के पंडाल में सम्पन्न हुआ।

इस सम्मेलन की खास बात यह भी है कि लगभग 500 किसान प्रदर्शनकारी एवं प्रतिनिधि वी.एम. भुस्कुटे और जे. बुखारी के नेतृत्व में 12 दिसम्बर को मनमाड से पैदल चल पड़े और 200 मील से भी अधिक की यात्रा करते हुए 25 दिसम्बर को फैजपुर पहुंॅचे। वे लाल झंडे लिए हुए थे। उनके स्वागत के लिए खड़े थे- नेहरू, बंकिम मुखर्जी, एम0एन0 रॉय, नरेन्द्र देव, युसूफ मेहर अली, एस0ए0 डांगे, जय प्रकाश नारायण, मीनू मसानी तथा अन्य।

26 दिसम्बर को 15000 लोगों की विशाल रैली आयोजित की गई।

अ0भा0 किसान सभा का झंडा

अ0भा0 किसान समिति ने नियामतपुर, गया (बिहार) की 14 जुलाई, 1937 की बैठक में अपना नाम अ0भा0 किसान कांग्रेस से बदलकर अ0भा0 किसान सभा कर दिया। बैठक में किसान सभा के झंडे के बारे में भी विचार किया गया। कई प्रादेशिक किसान सभाएं लाल रंग के झंडे का प्रयोग कर रही थी। आगे 27-28 अक्टूबर, 1937 की अपनी कलकत्ता बैठक में अखिल भारतीय किसान सभा ने औपचारिक रूप से लाल झंडा स्वीकार किया। उस समय इस पर हंसिया हथौड़ा हुआ करता था बाद में आजादी के बाद सिर्फ हंसिया ही रखा गया।

अ0भा0 किसान सभा ने स्पष्ट किया कि तिरंगा झंडा हमारी आजादी के संघर्ष का झंडा है जिसके नेतृत्व में किसान अंग्रेजों के खिलाफ लड़ रहे थे। उसमें और लाल झंडे में कोई टकराव नहीं था। लाल झंडा संगठन का प्रतीक था।

अविस्मरणीय संघर्ष

अखिल भारतीय किसान सभा का इतिहास अविस्मरणीय और असाधारण संघर्षांे का इतिहास है, चाहे वह आजादी से पहले हो या बाद में। यहांॅ हम कुछ के उल्लेख भर ही कर पाएंगे।

1937 से आरंभ होकर किसान सभा ने हर वर्ष 1 सितम्बर अ0भा0 किसान दिवस के रूप में मनाया। 27 मार्च, 1938 को ”अखिल भारतीय कर्जा माफी दिवस“ मनाया गया। किसान सभा की ओर से मई दिवस पहली बार 1938 में मनाया गया। किसान सभा के महासचिव स्वामी सहजानंद ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (सी0एस0पी0) के महासचिव जय प्रकाश नारायण और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव पी0सी0 जोशी द्वारा 20 मार्च, 1938 को भाकपा को कानूनी घोषित करने संबंधी दिवस मनाने की अपील का पूर्ण समर्थन किया।

अ0भा0 किसान सभा के गठन के बाद विभिन्न प्रांतों में आन्दोलन फूट पड़े और किसान सभाओं का गठन तेज हो गया। बंगाल में 16-17 अगस्त, 1936 को प्रादेशिक संगठन समिति बनाई गई। 24 परगना जिले में खास भूमि संबंधी और बर्दवान में नहर टैक्स कम करने के लिए संघर्ष चले।

बिहार में सुप्रसिद्ध बकाश्त आंदोलन मुंगेर जिले से आरंभ हुआ। 26 नवम्बर, 1937 का दिन अविस्मरणीय था। सारे प्रांत से एक लाख किसान पटना में लेजिस्लेटिव असेंबली (विधान सभा) के सामने इकटठा हो गए। उन्होंने विभिन्न टैक्सों में कमी तथा बिहार काश्तकारी कानून में सुधार की मांगे बुलंद की।

पंजाब के मांटगोमरी जिले में 40 हजार किसानों (काश्तकारों) का जमीन के ठेके के खिलाफ संघर्ष फूट पड़ा। काश्तकार फसल के आधे हिस्से की मांग कर रहे थे।

उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रदेश में घल्ला घीर के नवाब के विरोध में संघर्ष चल पड़ा।

1936 के दिसम्बर महीने में मध्यप्रांत या सी0पी0 (मराठी) में किसान सभा गठित की गई। 28 नवम्बर, 1937 को नागपुर में विधायिका के सामने हजारों किसानों का मार्च आयोजित किया गया। प्रादेशिक किसान सम्मेलन 1938 में नागपुर में आयोजित किया गया। मध्यप्रांत (हिंदुस्तानी) में महाकोशल किसान सम्मेलन दिसम्बर, 1937 में संपन्न हुआ।

सूरमा घाटी में ”टैक्स मत दो“ आंदोलन हुआ जिसमें 1937-38 में हजारों किसानों ने भाग लिया।

उत्कल प्रादेशिक किसान सभा 1935 में ही गठित हो चुकी थी। 1937 के किसान दिवस के अवसर पर 15 हजार किसानों ने कटक में मार्च किया।

बिहार में रेओरा (गया), बड़हिया टाल (मुंगेर), राघवपुर (दरभंगा), अन्नवारी (सारण), मुरियार (शाहाबाद) इत्यादि स्थानों में ऐतिहासिक किसान आंदोलन हुए जिन्हें आमतौर पर ”बकाश्त आंदोलन“ कहा जाता है। सुप्रसिद्ध लेखक, इतिहासकार, दार्शनिक और बौद्ध दर्शन के विद्वान राहुल सांकृत्यायन इन्हीं आंदोलनों से किसान नेता के रूप में उभरे। कार्यानंद शर्मा अन्य प्रसिद्ध नेता थे।

मलाबार और आंध्र में ऐतिहासिक किसान संघर्ष हुए। मलाबार में ऑल मालाबार पेजंट्स यूनियन का गठन हुआ।

किसान स्कूल और संस्थान

किसान सभा के इतिहास का एक अनजाना-सा पृष्ठ है इंडियन सेंट्रल किसान स्कूल (भारतीय कंेद्रीय किसान स्कूल) और पेजंट इंस्टीट्यूट (किसान संस्थान) का निर्माण। इनकी स्थापना काफी पहले दिसम्बर, 1933 में आंध्र प्रदेश के नीटुब्रोले में की गई और 1938 आते-आते यह काफी मजबूत संस्था बन गई। यहांॅ नियमित राजनैतिक स्कूल लगा करते और शोध कार्य, प्रकाशन तथा पुस्तकालय निर्माण का कार्य चला करता।

1937 के आम चुनाव और किसान सभा

1937 में सीमित मताधिकार के आधार पर ब्रिटिश भारतीय प्रांतों में आम चुनाव हुए। इनमें कांग्रेस की भारी जीत हुई। किसान सभा ने चुनावों में काम करने का फैसला किया। उसने तय किया कि सामंती विचारों और बड़े सामंतों के समर्थक उम्मीदवारों को हराया जाए और किसान परस्त उम्मीदवारों को जिताया जाए। इस उद्देश्य में उसे काफी सफलता मिली और सामंती तत्वों को पीछे धकेला जा सका।

इसके अलावा 1937-39 के कांग्रेस मंत्रिमंडलों के अधीन मिले कई जनतांत्रिक अधिकारों का प्रयोग किसान सभा और आम किसानों ने उठाया। बड़े पैमाने पर किसान आंदोलन फूट पड़ने का यह भी एक बड़ा कारण रहा।

किसान आंदोलन

1940 के दशक में किसान सभा की भागीदारी से या उसके नेतृत्व में कई ऐतिहासिक आंदोलन हुए- कय्यूर (1943), पुन्नप्रा- वायालार (1946), तेभागा (1946), तेलगांना (1946), बकाश्त (1940 का दशक- यू0पी0 बिहार), इत्यादि। इनमें से कुछ सशस्त्र संघर्ष थे, जैसे तेलगांना। इतिहास में इनके बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है।

आंध्र तथा अन्य कुछ क्षेत्रों में किसान- मार्च

यह अनोखा और अनूठा आंदोलन 1937-38 में हुआ था। आंध्र के इच्छापुर से 3 जुलाई 1937 को हजारों किसानों ने एक हजार मील लंबा पैदल मार्च आरंभ किया। अ0भा0 किसान सभा के अध्यक्ष प्रो0 एन0जी0 रंगा ने इसका शुभारंभ किया। यह अनूठा और ऐतिहासिक मार्च 27 मार्च, 1938 को मद्रास में समाप्त हुआ। इसके अलावा कुछ और दूरी उन्होंने बसों में भी तय की। उन्होंन ‘प्रधानमंत्री’ (मुख्यमंत्री) और राजस्व मंत्री को अपनी मांगे पेश कीं।

इससे मिलते-जुलते पैदल मार्च दिसम्बर, 1938 में मलाबार और कोयम्बतूर में, दक्षिण कनारा जिले में, तमिलनाडू और आंध्र में दर्जनों की संख्या में, महाराष्ट्र के विदर्भ में 1938-39 में अकाल और भुखमरी के खिलाफ, खरगोन में 1937 में, तथा अन्य जगहों पर निकाले गए।

गुजरात में भी किसान सभा का शक्तिशाली आंदोलन था।

बंगाल के अकाल (1943) ने बंगाल और भारत के किसान आंदोलन को एक अलग मोड़ दिया। लाखों किसान भूख से मर गए। फलस्वरूप जनता सामाजिक आर्थिक पक्ष पर सोचने पर मजबूर हो गई। अकाल ने बंगाल और उत्तर-पूर्वी भारत में कृषि और कृषि संबंधों की तस्वीर बद दी।

भारत की आजादी के संघर्ष में किसानों का तथा विशेष तौर पर अखिल भारतीय किसान सभा का विशेष योगदान रहा। 1945 में द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति पर भारत में जो साम्राज्यवाद विरोधी उभार आया उसमें किसानों की विशेष भूमिका रही।

आजादी के बाद किसान सभा की कुछ विशेषताएं

अ0भा0 किसान सभा आजादी के समय एक अत्यंत शक्तिशाली संगठन बन चुका था। उसने 1947 में आजादी का स्वागत किया और उसके जश्न में हिस्सा लिया।

1947-48 में किसान सभा पर वामपंथी संकीर्णतावादी दुस्साहसिक समझ हावी हो गई। जो बी.टी. आर-लाइन के रूप में सुविख्यात है। हम उसके विस्तार में यहां नहीं जा रहे हैं। लेकिन इसका परिणाम यह हुआ कि किसानों का सबसे मजबूत संगठन और हथियार 1950 आते- आते पूरी तरह बिखर गया।

अ0भा0 किसान सभा को पुनः उभरने में वर्षाे लग गए। जब तक वह उभरकर लीक पर आ रहा था तो उसे फिर साठ के दशक में माओवादी तोड़फोड का सामना करना पड़ा।

फिर भी आजाद भारत में किसान सभा ने कई महत्वपूर्ण और यादगार योगदान दिए। इनमें से दो-तीन का ही हम जिक्र भर ही कर पाएंगे।

पहला, पचास के दशक में अ0भा0 किसान सभा ने जमींदारी उन्मूलन के लिए तथा किसानों में जमीन के बंटवारे के प्रश्न को लेकर असाधारण संघर्ष किए। फलस्वरूप, पचास के दशक के मध्य तक हमारे देश में सामंती उत्पादन- पद्धति लगभग समाप्त हो गई।

दूसरा, संघर्ष समाप्त नहीं हुआ; व्यापक भूमि- सुधारों का संघर्ष आगे जारी रहा। विशेष तौर पर ‘60, ‘70 और ‘80 के दशकों में बड़े भूस्वामियों के विरूद्ध आंदोलन चलाए गये, उनकी भूमि के अधिग्रहण और सीलिंग से अधिक भूिम को भूमिहीनों तथा गरीब किसानों के बीच बांटने की मांग की। स्वयं किसान सभा ने कई जगहों पर हजारों एकड़ फालतू भूमि पर कब्जा करके उसे भूमिहीनों में बांटा। भूमि पर पट्टे दिलवाने का संघर्ष इसका महत्वपूर्ण अंग था।

तीसरा, काफी समय से किसान सभा में महसूस किया जा था कि खेत मजदूरों का अलग अ0भा0 संगठन बने। जमींदारी उन्मूलन और कृषि में पंूजीवादी संबंधों के प्रवेश से खेत मजदूर और ग्रामीण सर्वहारा महत्वपूर्ण तबके के रूप में सामने आये इन सारे कारणों से अ0भा0 किसान सभा और भाकपा की पहल पर 1968 में खेत मजदूरों का अलग संगठन, भारतीय खेत मजदूर संघ (बी.के.एम.यू.) 1968 में गठित किया गया। इससे पहले किसान और खेत मजदूर एक ही संगठन में थे।

आज अखिल भारतीय किसान सभा देश और दुनिया के बदलते परिवेश में किसानों की मांगों और नई समस्याओं को सुलझाने के लिए सतत संघर्षशील है।

- अनिल राजिमवाले
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गुरुवार, 20 मई 2010

विश्व और भारत में श्रमिक दिवस: कुछ अनजाने पन्ने

मई दिवस के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है, फिर भी कुछ ऐसे पहलू हैं जो अज्ञात है। कुछ भ्रांतियों का स्पष्टीकरण और इस विषय पर भारत तथा विश्व के बारे में कम ज्ञात तथ्यों को उजागर करने की आवश्यकता है। यह जानना दिलचस्प होगा कि श्रमिक दिवस का उदय ‘मई दिवस’ के रूप में नहीं हुआ था। वास्तव में अमरीका में श्रमिक दिवस मनाने की पुरानी परम्परा रही है जो बहुत पहले से ही चली आ रही थी। अमरीका में मजदूर आंदोलन यूरोप व अमरीका में आए औद्योगिक सैलाब का हिस्सा था। परिणामस्वरूप जगह-जगह जन आंदोलन रहे थे। इनका संबंध 1770 के दशक की अमरीका की आजादी की लड़ाई तथा 1860 के दशक के गृह युद्ध से भी था।इंग्लैंड के मजदूर संगठन विश्व में सबसे पहले अस्तित्व में आए।यह 18वीं सदी की मध्य का समय था, मजदूर एवं टेªड यूनियन संगठन 19वीं सदी के अंत तक काफी मजबूत हो गए क्योंकि यूरोप के दूसरे देशों में भी इस प्रकार के संगठन अस्तित्व में आने लग गए थे।अमरीका में मजदूर आंदोलनइसी समय अमरीका में भी मजदूर संगठन बन रहे थे। वहां मजदूरों के आरम्भिक संगठन 18वीं सदी के अंत में 19वीं सदी की आरम्भ में बनने शुरू हुए। मिसाल के तौर पर फिलाडेलफिया के शूमेकर्स (जूता बनाने वालों) के संगठन, बाल्टीमोर के टेलर्स (दर्जी) के संगठन तथा न्यूयार्क के प्रिन्टर्स के संगठन 1792 में बन चुके थे। फर्नीचर बनाने वालों में 1796 में और ‘शिपराइट्स’ ने 1803 में न्यूयार्क में संगठन बने। हड़ताल तोड़ने वालों के खिलाफ पूरे अमरीका में संघर्ष चला जो उस देश में संगठित मजदूरों का अपने किस्म का अलग आंदोलन था। हड़ताल तोड़ने वालों के खिलाफ पूरे अमरीका में संघर्ष चला जो उस देश में संगठित मजदूरों का अपने किस्म का अलग आंदोलन था। हड़ताल तोड़ना घोर अपराध माना जाता था और हड़ताल तोड़ने वालों को तत्काल यूनियन से निकाल दिया जाता था।18 का दशक अमरीका में टेªड यूनियनों के शीघ्र गति से विस्तार का समय था, खास करके 1833-37 तक का काल। इस दौरान मजदूरों के जो संगठन बने उनमें शामिल थे - बुनकरों, बुक वाइन्डरों, दर्जियों, जूते बनाने वालों, फैक्ट्री में काम करने वालों तथा महिला मजदूरों के संगठन। उसी दौरान स्थानीय स्तर पर भी मजदूर संगठन बनना शुरू हो गया था; इनमें शामिल थे फिलाडेलफिया मैकेनिकों की टेªड एसोसिएशन तथा इसी प्रकार की अन्य यूनियनें जो दूसरें शहरों जैसे बोस्टन, न्यूयार्क, बाल्टीमोर आदि में बन रही थी। 1836 में 13 सिटी इंटर टेªड यूनियन ऐसासिएशन मोजूद थीं जिसमें जनरल टेªड यूनियन ऑफ न्यूयार्क (1833) भी शामिल थी जो अति सक्रिय थी। इसके पास स्थाई स्ट्राइक फन्ड था तथा एक दैनिक अखबार इसका निकलता था। इसके संबंध दूसरे शहरों में भी थे। राष्ट्रव्यापी संगठन बनाने की कोशिश भी की गयी यानी नेशनल टेªड्स यूनियन जो 1834 में बनायी गयी।दैनिक काम के घंटे घटाने के कुछ पुराने संघर्षकाम के घंटों को घटाने के लिए किया गया संघर्ष अति आरम्भिक तथा प्रभावशाली संघर्षों में एक था जिसमें अमरीकी मजदूर तहरीक का योगदान था। न्यू इंग्लैंड के वर्किंग मेन्स ऐसासिएशन ने सन् 1832 में काम के घंटे घटा कर 10 घंटे प्रतिदिन के संघर्ष की शुरूआत की। आंदोलन के नेता पहले से ही राजनैतिक नारे लगा रहे थे। सेठ लूथर जैसे एसोसिएशन के नेता इग्लैंड को फैक्ट्री व्यवस्था की नकल करने की नीति का विरोध कर रहे थे। अमरीकी मजदूर वर्ग भी आजादी की घोषणा से जुड़ा हुआ था तथा मजदूर मांग कर रहे थे मजदूरो केअधिकारांे का सम्मान हो।यहां यह ऐतिहासिक तथ्य ध्यान देने योग्य है अमरीकी मजदूर वर्ग और नीग्रो के बीच गहरी एकता हो गयी और वे 1776 के अमरीकी क्रांति चाहते थे। 4 जुलाई को अमरीका की आजादी का दिवस मनाया जाता है। बड़ी संख्या में आम मजदूर इसमें भाग लेते रहे थे।बड़ी सक्रियता से मजदूरों तथा आम जनता ने आजादी के संघर्ष में हिस्सा लिया। उदाहरण के तौर पर 11वीं पेन्सिल्वनिया बटालियन के अधिकांश सैनिक मजदूर थे। नीग्रों और आजाद गुलामों को रोड्स आइलैंड, 72 मासचुसेटस शहर और पेन्सिल्वानिया की सेनाओं में भर्ती किया गया। अमरीका क्रांति सेना पीपुल्स आर्मी (जनसेना) थीं। इसने अपने नारों तथा उद्देश्यों से अमरीकी मजदूर तहरीक पर एक अमिट छाप छोड़ी।कई पीढ़ियों तक 4 जुलाई मजदूर तहरीक के दिवस की तर्ज पर मनाया जाता रहा। मजदूरों द्वारा बैठकें आयोजित की जातीं, त्योहार मनाया जाता, परेड निकाली जाती तथा दावत दी जाती थी तथा मजदूरों की मांगे उठाई जाती है।1835 तक अमरीकी मजदूरों ने काम के 10 घंटे प्रतिदिन का अधिकार देश के कुछ हिस्सों में प्राप्त कर लिया था। उस वर्ष मजदूर यूनियनों की एक आम हड़ताल फिलाडेलफिया में हुई। शहर के प्रशासकों को मजबूरन इस मांग को मानना पड़ा। परिणाम स्वरूप पूरे देश में इस मांग को मनवाने के लिए जनसैलाब उमड़ पड़ा।10 घंटे काम का पहला कानून 1847 में न्यायपालिका द्वारा पास करवाकर हेम्पशायर में लागू किया गया। इसी प्रकार के कानून मेन तथा पेन्सिल्वानिया राज्यों द्वारा 1848 में पास किए गए। 1860 के दशक के शुरूआत तक 10 घंटे काम का दिन पूरे अमरीका में लागू हो गया।राजनैतिक संगठनमजदूरों की राजनैतिक पार्टियां यूरोप से पहले अमरीका में अस्तित्व में आ चुकी थी। अमरीका मंे काल्पनिक समाजवादी आंदोलन की एक मजबूत परम्परा रही। इसका एक कारण था विशाल भौगोलिक क्षेत्रफल का होना जहां कोई भी काल्पनिक समाजवादी प्रयोग कर सकता था। थामस स्किडमोर, जार्ज रिप्ले, फ्रांसिस राइट, राबर्ट डेल ओवेन (सुप्रसिद्ध रावट ओवेन का पुत्र), होरेस ग्रीले आदि उस समय अमरीका के मजदूर वर्ग के नेता थे उनमें सेअधिकतर काल्पनिक समाजवादी थे। बहुत से काल्पनिक समाजवादी संगठन ओवेन, फूनरिये आदि के प्रभाव में आए; बाद में बहुतों ने प्रथम इंटरनेशनल से प्रभावित होगर मार्क्सवाद तथा वैज्ञानिक समाजवाद अपनाया।पहली मजदूर राजनैतिक पार्टी सन् 1828 में फिलाडेल्फिया (अमरीका) में बनी। अगले 6 वर्षों में 60 से अधिक शहरों में मजदूर राजनैतिक पार्टियों का गठन हुआ। उनकी मांगों में राजनैतिक सामाजिक मुद्दे जैसे 10 घंटे का कार्य दिवस, बच्चों की शिक्षा, सेना में अनिवार्य सेवा की समाप्ति, कर्जदारों के लिए सजा की समाप्ति, मजदूरी की अदायगी मुद्रा में, आयकर का प्रावधान इत्यादि शामिल थे।मजदूर पार्टियों ने नगर पालिकाओं तथा विधासभाओं इत्यादि में चुनाव भी लड़े। सन् 1829 में 20 मजदूर प्रत्याशी फेडरेलिस्टों तथा डेमोक्रेट्स की मदद से फिलाडेलफिया में चुनाव जीत गए। 10 घंटे कार्य दिवस के संघर्ष की बदौलत न्यूयार्क में वर्किंग मैन्स पार्टी बनी। 1829 के विधानसभा चुनाव में इस पार्टी कोे 28 प्रतिशत वोट मिले तथा इसके प्रत्याशियों को विजय हासिल हुई।अमरीका में फैक्ट्री मजदूरों की पहली रेकार्ड में शामिल हड़ताल सन् 1828 में हुई। कारण यह था कि न्यू जर्सी के पेटरसन में मिल मालिकों ने भोजन अवकाश का समय 12 बजे के बजाय 1 बजे करने की कोशिश की। मजदूर अधिकतर बच्चे थे। उन्हें डर था कि मालिकों का अगला कदम भोजन अवकाश समाप्त करने का हो सकता है। हड़ताल तुड़वाने के लिए सेना को बुलाया गया। 1820 और 1830 के दशकों में महिलाएं आंदोलनों में अलग मोर्चो पर हुआ करती थीं। परिणामस्वरूप 1834 में एक फैक्ट्री गर्ल्स एसोसिएशन बनायी गयी।मजदूर दूसरी पार्टियों में भी सक्रिय थे खासकर डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन पार्टियों में। वास्तव में ये पार्टियां मजदूरों पर काफी हद तक निर्भर थीं।उन दिनों पार्टियां मजदूरों और उनकी मांगों से अधिक घनिष्ठ रिश्ता रखती थी। बाद में ऐसा नहीं रहा।मई दिवस की शुरूआतजैसा हम देख चुके हैं कि मई दिवस के अस्तित्व में आने से पहले भी अमरीका में मजदूर दिवस किसी न किसी रूप में मनाया जाता था। मजदूर दिवस मनाने के लिए सितम्बर में कोई दिन निश्चित किया जाता था, खास करके इसके पहले हफ्ते में। यह बड़े उत्सव का अवसर होता था। मजदूर और उनके परिवार जलसे और मेले के रूप में इकट्ठे होतें।मजदूर दिवस व मई दिवस का जन्म अमरीका में मजदूर आंदोलन तथा उनके टेªड यूनियन संगठनों के कार्यकलापों और घटनाओं के कारण हुआ। अमरीका में दो बड़े टेªड यूनियन संगठन थे। पहला था नाइट्स ऑफ लेबर और दूसरा अमरीकन फैडरेशन ऑफ लेबर या एएफएल। पहले यह फेडरेशन ऑफ आर्गनाइज्ड टेªडर्स एण्ड लेबर यूनियन्स (एफओटीएलयू) ऑफ दी यूएस एण्ड कनाडा के नाम से जाना जाता था। 18 मई 1882 में सेन्ट्रल लेबर यूनियन ऑफ न्यूयार्क की एक बैठक में पीटर मैग्वार ने एक प्रस्ताव रखा जिसमें एक दिन मजदूर उत्सव मनाने की बात थी। उसने इसके लिए सितम्बर के पहले सोमवार का दिन सुझाया। वह साल का वह समय था जो जुलाई और ‘धन्यवाद देने वाला दिन’ के बीच में पड़ता था।विभिन्न व्यवसायों के 30,000 से अधिक मजदूरों ने 5 दिसम्बर को न्यूयार्क की सड़कों पर परेड निकाली तथा नारा दिया: “8 घंटे काम के दिए, 8 घंटे आराम के लिए तथा 8 घंटे हमारी मर्जी पर।“ इसे 1883 में दोहराया गया। 1884 में न्यूयार्क सेंट्रल लेबर यूनियन ने मजदूर दिवस परेड के लिए सितम्बर माह के पहले सोमवार का दिन तय किया। यह सितम्बर की पहली तारीख को पड़ रहा था। दूसरे शहरों में भी इस दिन को अंतर्राष्ट्रीय त्योहार के रूप में कई शहरों में मार्च निकाले गए। मजदूरों ने लाल झंडे, बैनरों तथा बाजूबंदों का प्रदर्शन, मीटिंगों, प्रदर्शनों तथा दूसरे मौकों पर किया।सन् 1884 में एफओटीएलयू ने हर वर्ष सितम्बर के पहले सोमवार को मजदूरों के राष्ट्रीय अवकाश मनाने का निर्णया लिया। पूरे देश में इसका आह्वान किया गया। 7 सितम्बर 1883 को पहली बार राष्ट्रीय पैमाने पर सितम्बर के पहले सोमवार को मजदूर अवकाश दिवस के रूप में मनाया गया। इसके साथ ही अधिक से अधिक राज्यों ने मजदूर दिवस के दिन छुट्टी मनाना शुरू कर दिया।इन यूनियनों तथा उनके राष्ट्रों की संस्थाओं ने अपने वर्ग की एकता, खासकर अपने 8 घंटे प्रतिदिन काम की मांग को प्रदर्शित करने हेतु पहली मई को मजदूर दिवस मनाने का फैसला किया। यह 1 मई 1886 से मानाया जायेग, उन्होंने फैसला किया। कुछ राज्यों में पहले से ही आठ घंटे काम का चलन था परन्तु इसे कानूनी मान्यता नहीं थी; इस मांग को लेकर पूरे अमरीका में 1 मई 1886 को हड़ताल हुई।मई 1886 से कुछ वर्षों पहले देशव्यापी हड़ताल तथा संघर्ष के दिन के बारे में सोचा गया। उदाहरण के तौर पर सितम्बर में राष्ट्रव्यापी संघर्ष राष्ट्रीय टेªड यूनियनों द्वारा 1885 और 1886 में तय किए गए।वास्तव में मजदूर दिवस तथा कार्य दिवस संबंधी आंदोलन राष्ट्रीय यूनियनों द्वारा 1885 और 1886 में सितम्बर के लिए सोचा गया था, लेकिन बहुत से कारणों की वजह से, जिसमें व्यापारिक चक्र भी शामिल था, उन्हें मई के लिए परिवर्तित कर दिया। इस समय तक काम के घंटे 10 प्रतिदिन का संघर्ष बदल कर 8 घंटे प्रतिदिन का बन गया।मई दिवस का बाकी इतिहास सबको अच्छी तरह मालूम है; उसे बताने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन यहां एक बात का स्पष्टीकरण देना आवश्यक है। यह कहना कि लाल झंडे का जन्म मई 1886 में शिकागो में हुआ था, गलत है। वास्तव में अमरीका में लाल झंडे का चलन 1886 से बहुत पहले ही था।इसके अलावा, 1830 के दशक में यूरोप में लाल झंडा मजदूर वर्ग की पहचान बन चुका था। मजदूरों ने अपनी राजनैतिक पहचान का प्रतीक लाल झंडा जून 1832 में पेरिस में फहराया था।भारत में मई दिवसयह ध्यान देने की बात है कि भारत में मजदूरों की होने वाली पहली हड़तालों में अप्रैल-मई 1862 की हड़ताल थी जब 1200 मजदूरों ने हावड़ा रेलवे स्टेशन पर कई दिनों के लिए काम बन्द कर दिया था। इस घटना की खासियत यह है कि मजदूरों की मांग काम के घंटों का घटाकर 8 घंटे प्रतिदिन करने की थी क्योंकि लोकोमोटिव विभाग में काम करने वाले मजदूर 8 घंटे ही काम करते थे। अतः इन मजदूरों ने भी यही मांग उठाई। यह घटना अमरीका में ऐतिहासिक मई दिवस मनाए जाने से करीब 24 वर्ष पहले की थी।अब हम भारत में मई दिवस मनाए जाने के कुछ प्रारंभिक उदाहरणों का संक्षेप में वर्णन करेंगे। जहां तक मालूम है, मई दिवस भारत में 1923 में पहली बार मनाया गया था। सिंगारवेलु चेट्टियार देश के आरम्भ के कम्युनिस्टों में से एक तथा प्रभावशाली टेªड यूनियन और मजदूर तहरीक के नेता थे। उन्होंने अप्रैल 1923 में भारत में मई दिवस मनाने का सुझाव दिया क्योंकि दुनिया भर के मजदूर इसे मनाते थे। उन्होंने फिर कहा कि सारे देश में इस मौके पर मीटिंगे होनी चाहिए। मद्रास में मई दिवस मनाने की अपील की गयी। इस अवसर पर वहां दो जनसभाएं हुई तथा दो जुलूस निकाले गए, पहला उत्तरी मद्रास के मजदूरों का हाईकोर्ट ‘बीच’ पर तथा दूसरा दक्षिण मद्रास के ट्रिप्लिकेन ‘बीच’ पर। सिंगारवेलू ने इस दिन मजदूर किसान पार्टी की स्थापना की घोषणा की तथा उसके घोषणा पत्र पर प्रकाश डाला। कई कांग्रेसी नेताओं ने भी मीटिंगों में भाग लिया।सिंगारवेलू ने हाईकार्ट ‘बीच’ की बैठक की अध्यक्षता की। उनकी दूसरी बैठक की अध्यक्षता एस. कृष्णास्वामी शर्मा ने की तथा पार्टी का घोषणा पत्र पीएस वेलायुथम द्वारा पढ़ा गया।बैठकों की रिपोर्ट कई दैनिक समाचार पत्रों में छपी। मास्को से छपने वाले वैनगार्ड ने इसे भारत में पहला मई दिवस बताया। (15 जून 1923)फिर दुबारा 1927 सिंगारवेलु की पहल पर मई दिवस मनाया गया, लेकिन इस बार उनके घर मद्रास में। इस मौके पर उन्होंने मजदूरों तथा अन्य लोगों को दोपहर की दावत दी। शाम को एक विशाल जूलुस निकाला गया जिसने बाद में एक जनसभा का रूप ले लिया, इस बैठक की अध्यक्षता डा. पी. वारादराजुलू ने की। यह कहा जाता है तत्काल लाल झंडा उपलब्ध न होने के कारण सिंगारवेलु ने अपनी लड़की की लाल साड़ी का झंडा बनाकर अपने घर पर लहराया।इस प्रकार हम मजदूर वर्ग के संघर्ष और मई दिवस तथा खासकर लाल झंडे के इतिहास के कई दिलचस्प तथा ज्ञानवर्धन प्रकरण पाते हैं।
- अनिल राजिमवाले
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