भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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रविवार, 9 जून 2013

लखनऊ इप्टा ने मनाया 70वां स्थापना दिवस



 सेंसेक्स के मायाजाल में गोते लगाता आदमी, किसान क्रेडिट कार्ड तथा लुभावने कृषि ऋण में उलझता भोला किसान, इलेक्ट्रानिक मीडिया की चकाचौंध में भ्रमित नव युवतियां, सुबह से शाम तक मेहनत करता संविदा कर्मी, भविष्य के सुनहरे सपने देखता नव युवक यह  सभी फंसे हैं फन्दों में जिनका संचालन अपने को सर्वशक्तिमान मानने वाली शक्तियों द्वारा होता है। इन सभी को जाग्रत  करता है समाज का प्रगतिशील नौजवान। एक फंदे से छूटने के बाद यही वर्ग फंसता है जाति-धर्म के फंदे में, जहां केवल समस्याएँ हैं समाधान कोई नहीं। यह भाव है नाटक ‘मकड़जाल’ का, जिसका लेखन एवं निर्देशन इप्टा उत्तर प्रदेश के महामंत्री का.राकेश ने किया. इसका मंचन इप्टा की 70वी वर्षगाँठ पर 25 मई 2013 को इप्टा प्रांगण, कैसर बाग़, लखनऊ में दर्शकों की भारी भीड़ के मध्य हुआ. इसमें विभिन्न पात्रों को सशक्त रूप से राजू पांडे, देवाशीष, इच्छा शंकर, श्रद्धा, अनुज,विकास मिश्र, अनुराग तथा राकेश दिवेदी ने अभिनीत किया।इसके पूर्व एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसका विषय था ”मूल्य हीनता के दौर में प्रतिबद्धता एवं व्यापक सांस्कृतिक एकता की ज़रुरत“। विषय प्रवर्तन करते हुए प्रगतिशील लेखक संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी तथा सुपरिचित आलोचक वीरेन्द्र यादव ने कहा कि २५ मई १९४३ को जब इप्टा की स्थापना हुई थी तब कोई लेखक,साहित्यकार,संगीतकार या बुद्धिजीवी वर्ग से सम्बद्ध ऐसा कोई व्यक्ति नहीं था जो इप्टा से जुड़ा न हो, लेकिन आज इसका दायरा कुछ लोगों तक ही सीमित है। आज साहित्य की कसौटी से लेकर सामाजिक आन्दोलन में कोई भी खरा नहीं उतर रहा है। हम न आंदोलनों से न ही विचारों से कोई बड़ी मुहिम खड़ा कर पा रहे हैं। उन्होंने कहा कि इप्टा को आत्मालोचना व बदलाव की ज़रुरत है। गोष्ठी में भाग लेते हुए जन संस्कृति मंच के कौशल किशोर ने कहा कि जो संगठन जन-सांस्कृतिक आन्दोलनों का उद्देश्य लेकर बनाए गए थे उनका इतिहास बेहद शानदार रहा है, लेकिन अब यह औपचारिकता भर रह गए हैं। प्रो. रूप रेखा वर्मा का विचार था कि इस तरह की विचारधारा वाले सभी संगठनों को अपनी असमानताओं के बजाये समानताओं को ध्यान में रखते हुए आगे बढना होगा। डॉ. रमेश दीक्षित की चिंता थी कि जनता के किसी वर्ग के साथ किसी संगठन का जीवंत सम्पर्क नहीं है। सारे वामपंथी कार्यक्रम केवल माध्यम वर्ग तक ही सीमित हैं. गोष्ठी में सर्वश्री शकील सिद्दीकी, अनीता श्रीवास्तव, सुशीला पुरी, सूर्यमोहन कुलश्रेष्ठ,दीपक कबीर ने भी अपने विचार रखे। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कवि नरेश सक्सेना ने कहा कि मूल्य हीनता के इस दौर में आम लोगों को बहुत ही मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। स्थिति यह हो गयी है कि कार्य पालिका पर सवाल तो उठाये जाते रहे हैं लेकिन मौजूदा समय में कुछ मामले ऐसे आये कि न्यायपालिका पर भी लोगों को भरोसा करना मुश्किल हो गया है। अब इस स्थिति में आम जन जाए तो कहाँ जाए। इस मुश्किल दौर में व्यापक सांस्कृतिक एकता की ज़रुरत है जिसमें आम लोगों की समस्या पर संघर्ष किया जा सकता है।
गोष्ठी का सन्चालन करते हुए का. राकेश ने कहा कि आज के समय में लोगों के पास रंगमंच के अतिरिक्त भी मनोरंजन के साधन उपलब्ध हैं और दूसरी तरफ रंगकर्मी भी जल्द सफल होने की कामना रख रहे हैं। यही कारण है कि सामाजिक चेतना को बनाए रखने के लिए किया जाने वाला रंगकर्म कुछ कमज़ोर हुआ है। यात्राओं के नाम पर लोगों को जुटाया जाएगा और उनमें मानवीय मूल्यों को बचाने की कोशिश होगी. प्रयास किया जाएगा कि आपसी भाई-चारा कायम रहे।
इस आयोजन में इप्टा के जुगल किशोर, अखिलेश दीक्षित, ओ.पी अवस्थी, प्रदीप घोष, सुखेन्दु मंडल, ज्ञान चन्द्र शुक्ल, राजीव भटनागर, मुख्तार अहमद, विपिन मिश्रा, शैलेन्द्र आदि ने सक्रिय भूमिका निभाई।
(प्रस्तुति - ओ.पी अवस्थी )          
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शनिवार, 10 नवंबर 2012

नन्हे हाथ मलाला

इन नन्हे हाथों से होकर,
आवाज़ उठेजी, गूंजेगी।
इन नन्हे हाथों में बन परचम
आजादी खुलकर झूमेगी।।

ये हाथ खींचकर लायेंगे,
तारीक वक़्त में सूरज को।
ये हाथ उड़ा ले जायेंगे,
उस परीदेश में तितली को।।

ये हाथ करेंगे अब हिसाब,
उन दबी सिसकती फसलों का।
ये हाथ लिखेंगे मुस्तकबिल,
अब आने वाली नस्लों का।।

ये हाथ बनायेंगे अपनी,
शफ्फाफ़ सुनहरी दुनिया को।
वो दुनिया जसमें जंग नहीं,
औरत बच्चों पर जुल्म नहीं,
वो दुनिया जो बस अपनी हो,
बस इतनी की मैं हंस तो सकूं
और हंसने से मिरे,
तुम्हें डर ना लगे।।
(दुनिया की सबसे बहादुर बेटी मलाला युसुफजई के लिए)
- पंकज निगम
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रविवार, 26 अगस्त 2012

कामरेड अवतार कृष्ण हंगल दिवंगत

वयोवृद्ध कम्युनिस्ट, प्रख्यात स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, सांस्कृतिक आन्दोलन के पुरोधा, भारतीय रंगमंच के शिखर पुरूष एवं  बॉलीवुड के प्रख्यात अभिनेता अवतार कृष्ण हंगल का रविवार को 98 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वह काफी समय से बीमार थे। 13 अगस्त को अपने स्नानघर में फिसल कर गिरने से उनके दाएं जांघ की हड्डी टूट गई थी और रीढ़ की हड्डी में चोट आई थी। सर्जरी कराने के लिए उन्हें 16 अगस्त को  उपनगरीय सांताक्रूज के आशा पारेख अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उनकी सर्जरी नहीं हो पाई क्योंकि उन्हें सीने व सांस लेने में तकलीफ हो रही थी।
वे भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। साम्प्रदायिकता के खिलाफ एक योद्धा की भूमिका में उन्होंने भूखा रहना पसन्द किया परन्तु समर्पण नहीं किया था। ज्ञातव्य हो कि लम्बे दौर तक शिवसेना और भाजपा की साम्प्रदायिक गुंडागीरी के कारण उन्हें फिल्मों में काम मिलना बन्द हो गया था। परन्तु साम्प्रदायिकता के खिलाफ उनके संघर्ष में कभी कोई कमी नहीं आई।
15 अगस्त 1917 को मौजूदा पाकिस्तान के सियालकोट में उनका जन्म हुआ था और भारत विभाजन के दर्द के साथ वे मुम्बई पहुंचे थे। उनका बचपन पेशावर में गुजरा था। अभिनय का शौक भी उन्हें बचपन से ही था लेकिन शुरुआत में उन्होंने इसे कभी गम्भीरता से नहीं लिया। हंगल ने अपने अभिनय के सफर की शुरुआत उम्र के 50वें पड़ाव पर की। वर्ष 1966 में बनी बासु भट्टाचार्य की फिल्म तीसरी कसम में वह पहली बार रूपहले पर्दे पर नजर आए। उसके बाद वह जाने-माने चरित्र अभिनेता के रूप में पहचाने जाने लगे। वह कभी रामू काका के रूप में नजर आए तो कभी इमाम साहब के रूप में। खुद हंगल को फिल्म शोले में इमाम साहब तथा शौकीन में इंदरसेन उर्फ एंडरसन की भूमिकाएं बहुत पसंद थीं। अब तक करीब 200 फिल्मों में अभिनय कर चुके हंगल को भारतीय सिनेमा में योगदान के लिए वर्ष 2006 में पद्म भूषण से नवाजा गया। हंगल ऑस्कर के लिए नामित फिल्म लगान में शंभू काका के रूप में नजर आए। फिल्मों में आखिरी बार वह दिल मांगे मोर में अभिनय करते दिखे। उन्होंने 200 से अधिक फिल्मों में काम किया था। उन्होंने नमक हराम, शोले, शौकीन, आईना, बावर्ची जैसी फिल्मों में भूमिका निभाई था। सात साल के बाद हाल ही में वह एक टीवी सीरियल ‘मधुबाला’ के एक दृश्य में नजर आए थे। शोले में एक अंधे बुजुर्ग मुस्लिम की भूमिका में उनका एक डॉयलाग ‘इतना सन्नाटा को है भाई’ आज तक लोकप्रिय है। हंगल ने शशि कपूर और रेखा अभिनीत फिल्म काली घटा में बतौर खलनायक काम किया था। हालांकि बॉक्स ऑफिस पर यह फिल्म असफल रही थी लेकिन हंगल के अभिनय की सभी ने दिल खोलकर तारीफ की थी।
हिन्दी फिल्मों में अकसर निरीह से पिता, दादा और नौकर की भूमिकाओं में दिखाई देने वाले हंगल एक बेहतरीन अभिनेता के साथ-साथ अच्छे टेलर भी थे। जिंदगी के 50 वसंत देखने के बाद फिल्मों का रुख करने वाले हंगल ने अपनी आत्मकथा ‘लाइफ एण्ड टाइम्स ऑफ ए.के. हंगल’ में लिखा है कि उनके पिता के एक मित्र ने उन्हें दर्जी बनने का सुझाव देते हुए कहा था कि इससे वह स्वतंत्र रूप से अपनी आजीविका चला सकते हैं और कपड़े सिलने का कारोबार एक फलता-फूलता उद्योग भी है। उन्हें यह विचार बहुत पसंद आया और इस तरह न्यायाधीशों और बड़े सरकारी मुलाजिमों के घर के चिराग ने टेलरिंग में अपना भविष्य तलाशने का फैसला किया। हालांकि उन्होंने बड़े जतन से अपनी राह बनाई क्योंकि टेलरिंग के नाम पर उन्हें बटन तक टांकना नहीं आता था। उनके बहनोई ने इस काम में हंगल की मदद की और उन्हें इंग्लैंड में प्रशिक्षित एक दर्जी के पास ले गए। उस दर्जी ने हंगल को प्रशिक्षण देने के लिए 500 रुपए मांगे जिन्हें हासिल करने के लिए हंगल को दर्जीगीरी अपनाने के फैसले से पहले ही नाराज हो चुके अपने पिता हरि किशन हंगल से गुजारिश करनी पड़ी। उन्होंने अपने पिता को धन मांगने के लिए कई खत लिखे लेकिन किसी का जवाब नहीं आया। आखिर में उन्होंने इस धमकी के साथ लिखा कि अगर पैसे नहीं मिले तो वह कभी घर वापस नहीं लौटेंगे। इस बार पिता का दिल पसीज गया और धन मिलते ही हंगल को टेलरिंग का उस्ताद मिल गया।
अभी कुछ साल पहले वे इप्टा के नए साथियों को एक्टिंग का प्रशिक्षण देने लखनऊ आये थे और कई दिनों तक यहां रहे थे। स्वतंत्रता संग्राम की घटनाओं पर उनके लिखे लेख ”पार्टी जीवन“ में प्रकाशित हुए थे।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की उत्तर प्रदेश राज्य कौंसिल एवं ”पार्टी जीवन“ की ओर से अपने इस पुरोधा को आखिरी सलाम।
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सोमवार, 26 अप्रैल 2010

World Dance Day: 29th April, २०१० - International Message by Julio Bocca (Argentina)

Dance is discipline, work, teaching, communication. With it we save on words that perhaps others would not understand and, instead, we establish a universal language familiar to everyone. It gives us pleasure, it makes us free and it comforts us from the impossibility we humans have to fly like birds, bringing us closer to heaven, to the sacred, to the infinite.
It is a sublime art, different each time, so much like making love that at the end of each performance it leaves our heart beating very hard and looking forward to the next time.
English translation by Marcia De La Garza (Original in Spanish)
History of World Dance Day – 29th April
In 1982 the Dance Committee of the ITI founded International Dance Day to be celebrated every year on the 29th April, anniversary of Jean-Georges Noverre (1727-1810), the creator of modern ballet. The intention of the «International Dance Day Message» is to celebrate Dance, to revel in the universality of this art form, to cross all political, cultural and ethnic barriers and bring people together with a common language - Dance.
Every year a message from an outstanding choreographer or dancer is circulated throughout the world. The personality is selected by the founding entity of the International Dance Day - the International Dance Committee of the ITI, which collaborates with World Dance Alliance, a Cooperating Member of the ITI.
Together with the World Dance Alliance, ITI and its Dance Committee are celebrating International Dance Day at UNESCO in Paris.




Circulated by:
Indian People’s Theatre Association (IPTA).
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