भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

हमे जरूरत है चुनाव सुधारों की

उम्मीदवाद को अस्वीकार करने (राईट टु रिजेक्ट) का चुनाव आयोग द्वारा जो सुझााव दिया गया है उस पर विचार करते हुए उसका संदर्भ महत्वपूर्ण हो जाता है। उनका सुझाव असल में कुछ अस्पष्ट सा है। उसके निहितार्थ स्पष्ट नहीं है। किसी चुनाव क्षेत्र में निर्वाचन आयोग जनता से क्या अपेक्षा करता है- वह क,ख,ग या सभी उम्मीदवारों को अस्वीकार कर दे? यदि मतदाताओं का कुछ प्रतिशत हिस्सा अस्वीकार करने के लिए कहे तो उस प्रतिशत को 50 से अधिक होना चाहिए। उसके बाद भी, मान लें यदि 49 प्रतिशत ने अस्वीकार करने के अपने विकल्प का प्रयोग नहीं किया तो यह एक मुद्दा बन जाता है जिस पर भी ध्यान देने की जरूरत है।
इसमें एक खतरा यह भी है कि चुनाव के बहिष्कार की बात भी बन सकती है। इससे लोकतंत्र को मजबूत करने के लक्ष्य के बजाय, एक विपरीत नतीजा निकल सकता है जो एक अराजकता की दिशा में ले जा सकता है। चुनाव आयोग द्वारा एक तदर्थ किस्म का सुझाव है।
इसके बजाय, समय आ गया है कि देश व्यापक चुनाव सुधारों पर विचार करे। वर्तमान “फर्स्ट पास्ट दि पोस्ट” (जिसे सबसे अधिक मत पड़े उसे जीता हुआ मानने) का तरीका संतृप्ति के स्तर पर पहुंच गया है। यह हमारे जैसे लोकतंत्र में एक हद से आगे सफल नहीं हो सकता। एक संभव तरीका समानुपाती प्रतिनिधित्व की प्रणाली का हो सकता है। इस संबंध में हम अन्य देशों से भी सीख सकते हैं और सबसे बड़े लोकतंत्र में दूसरों से सीखने में कोई हानि नहीं।
“फर्स्ट पास्ट दि पोस्ट” की प्रणाली अब वास्तविकता को नहीं प्रतिबिंबित करती। उदाहरणार्थ, हाल के पंजाब में विधानसभा के चुनाव को लें जहां भारी मतदान हुआ। रिर्पोट थी कि 70 प्रतिशत के लगभग मतदान हुआ। पर काफी संभावना है कि ऐसे उम्मीदवार भी जीतेंगे जिन्हें लगभग 20 प्रतिशत मत ही मिले होंगे। यह हमारी व्यवस्था में एक अंतर्निहित कमजोरी है जिसे समानुपाती प्रतिनिधित्व की प्रणाली दूर कर सकती है। सभी पार्टियों को समान अवसर मिलना चाहिए। यह तब ही संभव है जब सरकार सभी पार्टियों के चुनाव के खर्च अपने ऊपर लेने के लिए राजी हो। जब एनडीए सत्ता में थी तो इन्द्रजीत सेन गुप्ता के नेतृत्व में इस मुद्दे पर विचार करने के लिए एक समिति बनी थी, डा. मनमोहन सिंह भी उस समिति में थे। समिति ने स्टेट फंडिंग (चुनाव का खर्च सरकार करे) की सिफारिश की थी। चुनाव आयोग स्वयं इस संबंध में कोई फैसले नहीं ले सकता है। वह एक स्वतंत्र निकाय है पर उसे भी अपनी शक्तियां संविधान से मिली हैं।
भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा है। चुनाव ही इसके अकेले स्रोत नहीं है। यह मौजूदा सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था पर निर्भर करता है, जब तक उसे न बदला जाये, भ्रष्टाचार जारी रहेगा।
- डी. राजा
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शनिवार, 14 अगस्त 2010

संसद में भाकपा - अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों के कल्याण का पैसा भी राष्ट्रमंडल खेलों में हजम

राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन की तैयारियों के सिलसिले में सामने आये व्यापक भ्रष्टाचार के संबंध में बोलते हुए भाकपा सांसद डी. राजा ने अनुसूचित जनजातियों के कल्याण के लिए चिन्हित पैसे को भी इन खेलों के आयोजन में खर्च किये जाने पर गंभीर आपत्ति की। उन्होंने कहा कि:
”वामपंथ, दक्षिणपंथ और मध्यमार्ग के मध्य मतभेदों के बावजूद सदन ने इस मुद्दे को बहस के लिए लिया है। इससे पता चलता है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के कल्याण के प्रति हरेक को सरोकार है। हम आज जिस बात की चर्चा कर रहे हैं वह तो आइसबर्ग की दिखने वाली चोटी मात्र है, असल मसला इससे बहुत बड़ा है। अनुसूचित जाति के लिए विशेष अंगभूत योजना (स्पेशल कम्पोनेन्ट प्लान) और आदिवासी उपयोजना के प्रश्न वृहत्तर मुद्दे हैं और मेरे पास जानकारी है कि कई राज्य सरकारें आज भी स्पेशल कम्पोनेन्ट प्लान या ट्राइबल सब प्लान के लिए पैसा चिन्हित नहीं करती। केन्द्र सरकार के 24 से अधिक केन्द्रीय विभागों में इन योजनाओं के लिए कोई अलग आबंटन नहीं है और वे समझते हैं कि इसके लिए अलग पैसा आबंटन की जरूरत नहीं। इतना कहने के बाद, मैं कहना चाहता हूं कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के कल्याण के लिए तय पैसे को अन्यत्र खर्च कर देना अक्षम्य है। यह संवैधानिक दायित्वों के साथ विश्वासघात है, चाहे वह केन्द्र सरकार हो या कोई राज्य सरकार। इसे संविधान की भावना के विरूद्ध एक अपराध मानना होगा। सरकार दावा करती है कि यह आम आदमी की सरकार है, पर वह जो कुछ भी कर रही है, वह आम आदमी के खिलाफ है।
यह मात्र एक अत्याचार नहीं है। यह आज के जमाने का एक गंभीर अत्याचार है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के लोग राष्ट्र के लिए जो दौलत पैदा करते हैं, उसमें उनके वाजिब हिस्से को हड़प कर लिया जाये। यह लोकतंत्र के नाम पर चुनी जाने वाली सरकारों द्वारा किये जाने वाला भयंकर अपराध है। ऐसी चीजें जारी रहें, इसे सहन नहीं किया जा सकता। राष्ट्रमंडल खेल देश के लिए गौरव की बात होने चाहिये थे पर यह शर्म की बात बन रही है। सरकार के पास क्या जवाब है?यह एक गंभीर अपराध है। आज यह दिल्ली में हो रहा है, कल अन्य राज्यों में हो सकता है। अतः यह सही समय है कि केन्द्र सरकार हस्तक्षेप करे और जो कुछ हुआ है, उसे सुधारे। यह पैसा वापस दिया जाये और अनुसूचित जातियों के लिए स्पेशल कम्पोनेन्ट प्लान और ट्राइबल सब प्लान को योजना आयोग के दिशानिर्देशों के तहत इन लोगों के कल्याण के लिए योजनाओं के रूप में समझा जाना चाहिये।“
- डी. राजा
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शनिवार, 22 मई 2010

संसद में भाकपा - दंतेवाड़ा में 62वीं बटालियन पर माओवादियों के हमले पर बयान

उप सभापति महोदय। सर्वप्रथम हमारी पार्टी यानि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवानों की हत्या की कड़े से कड़े शब्दों में भर्त्सना करती है। हमारी पार्टी मारे गये उन जवानों के परिवार के सदस्यों के प्रति संवेदना और सहानुभूति प्रगट करती है। छत्तीसगढ़ में हुई घटना पर गृहमंत्री का बयान विशेष है। लेकिन मैं अति विशेष होना चाहता हूं।आज छत्तीसगढ़ में जनजातियों के लोग मजबूरन हाशिये पर आ रहे हैं। उन्हें कठोर यातनाएं दी जा रही हैं। खनन कार्यो, प्रोजेक्ट और विकास कार्यों के नाम पर उन्हें अपने निवास स्थान से हटाया जा रहा है। वन सम्पदा निगमित क्षेत्र और बहुराष्ट्रीय निगमों को सौंपा जा रहा है। छत्तीसगढ़ के आदिवासियों पर थोपी जा रही नवउदारवादी नीतियों के कारण वहां नई स्थिति उत्पन्न हो गई है। सर्वप्रथम इसे समझने की जरूरत है। मैं सभी राजनैतिक दलों से अनुरोध करता हूं कि इस समस्या पर धैर्य से विचार करें। यहां मैं डा। अम्बेडकर को उद्धृत करना चाहूंगा। संविधान पीठ में अपेन अंतिम भाषण में उन्होंने कहा था कि “अगर हम संविधान का इस्तेमाल जनता की समस्याओं को समझने और उसका समाधान करने के लिए एक असरदार औजार के रूप में करने में असफल होते हैं तो इसका परिणाम अराजकता का बोलबाला हो सकता है।” यह डा. अम्बेडकर की चेतावनी थी।उग्रवाद: गलत रास्ताआज वामपंथी उग्रवाद जो कर रहा है वह अराजकतावाद ही है। कम्युनिस्ट होने की हैसियत से हम उनके तरीकों से सहमत नहीं है और हम उनकी भर्त्सना करते हैं। लेनिन के समय भी ऐसा ही था। उन्होनंे कहा था कि वामपंथी उग्रवाद और वामपंथी साम्यवाद ‘बचपन की अराजकता’ है। राजनीति में वामंपथी उग्रवाद का रूझान एक प्रवृत्ति है। इससे वैचारिक और राजनैतिक स्तर पर लड़ना होगा और नियम-कानून के अंतर्गत इसका समाधान करना होगा। इससे निपटने के लिए सरकार को सही नीति बनानी होगी। आज हम देख रहे हैं कि इस संबंध में सरकार की नीति त्रुटिपूर्ण है। यह गलत नीति है और सरकार को नीति का पुनर्निर्धारण करना चाहिए। जहां तक छत्तीसगढ़ का संबंध है सरकार को अपनी नीति के संबंध में पुनर्विचार करनी चाहिए।‘सलवा जुडूम’ से हानिइस सदन में मैंने कई बार ‘सलवा जुडुम’ का मामला उठाया है। आज हम इस समस्या को उठा रहे हैं क्योंकि हम छत्तीसगढ़ की स्थिति पर बहस कर रहे हैं। बयान का संबंध छत्तीसगढ़ में घटी घटना से है। इसलिए पहले भी मैंने ‘सलवा जुडुम’ की समस्या को उठाया था। आज छत्तीसगढ़ में क्या हो रहा है? न्याय देने और ‘सलवा जुडुम’ पीड़ितों को पुनर्वास देने में असफलता के कारण माओवादियों की संख्या बढ़ रही है।सलवा जुडुम के पीड़ितों को न तो न्याय मिला है और न ही उनका पुर्नवास हुआ है। इसका परिणाम माओवादियों के द्वारा भर्ती किये जाने की संख्या में वृद्धि हुई है। मैं खुफिया का आंकड़ा प्रस्तुत कर रहा हूं कि ‘सलवा जुडुम’ शुरू होने के बाद माओवादियों द्वारा भर्ती किये जाने में कम से कम 22 प्रतिशत की वृद्धि हुई हैं। अगर मैं गलत हूं तो गृहमंत्री मेरे बयान को सुधार सकते हैं। भारत सरकार को इसके संबंध में राजनीति नहीं करनी चाहिए। इसे न तो छत्तीसगढ़ में और न ही पश्चिम बंगाल में राजनीति करनी चाहिए। इस समस्या पर न तो गृहमंत्री और न ही रेल मंत्री को राजनीति करनी चाहिए। अगर इस तरह की राजनीति होती है तो हम देश के प्रजातांत्रिक ढांचे को क्षति पहुंचा रहे हैं।सरकारों की उदासीनतामैं इस ओर ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा कि 17.10.2008 को छत्तीसगढ़ सरकार ने स्वीकार किया कि सलवा जुडुम के कारण जलाये गये घरों के कारण पीड़ितों का पुनर्वास करने के साथ ही उनकी क्षतिपूर्ति भी करेगी। लेकिन पिछले दो वर्षों में इसने कुछ नहीं किया है। यह एक तथ्य है। लेकिन भारत सरकार ने अदालत में स्वीकार करने के बाद कि सलवा जुडुम ने घरों को जलाया है ओर अन्य गैरकानूनी काम किए हैं, वह सलवा जुडुम की जय जयकार कर रही है। खुफिया और सुरक्षाकर्मियों के द्वारा किये गये हिंसक कार्यो की भी कोई अनदेखी नहीं कर सकता है। गरीब आदिवासी दो तरह के हिंसकों के बीच फंसे हुए हैं। सलवा जुडुम भी हमारी संसदीय प्रजातंत्र के लिए खतरा है। अगर आप कहते हैं कि वामपंथी उग्रवाद संसदीय प्रजातंत्र के लिए खतरा है तो एक गैर सरकारी संगठन सलवा जुडुम भी प्रजातांत्रिक राजनीति के लिए खतरा है।उच्चतम न्यायालय18.2.2010 को उच्चतम न्यायालय ने आवेदकों से पुनर्वास की विस्तृत योजना प्रस्तुत करने को कहा था। मै आवेदकों का नाम बताता हूं क्योंकि मामला उच्चतम न्यायालय में हैं। ये नाम हैं - नंदिनी सुन्दर तथा अन्य, करतराम जोड़ा, मनीष कुंजाम-हमारी पार्टी के नेता, अखिल भारतीय आदिवासी महासभा के नेता (जो भाकपा का है) तथा अन्य। उच्चतम न्यायालय के द्वारा मांगी गई जानकारी देने में छत्तीसगढ़ राज्य सरकार को दो सप्ताह लगा। लेकिन आज तक उसने कुछ नहीं किया है। उक्त पुनर्वास कार्यक्रम के प्रमुख अवयव निम्नतम लिखित हैं:1. सर्वेक्षण के द्वारा पीड़ित व्यक्तियों की पहचान,2. प्रखण्ड मुख्यालय में जिला न्यायाधीशों आदि की बैठकें3. बलात्कार और हत्या जैसे जघन्य अपराधों से निपटना और गांवों में आवश्यक सेवा बहाल करना।इन सबों की निगरानी वरिष्ठ सेवानिवृत जज या भारत सरकार के सेवानिवृत सचिव करेंगे। शांति बहाल करने का एकमात्र तरीका प्रशासन को बहाल करना और न्याय प्रदान करना है। मैं बता रहा हूं कि प्रमुख सेवा में विलम्ब नहीं होना चाहिए क्योंकि वे आदिवासी कल्पना से परे यातनाओं तथा विपदाओं से गुजरे हैं। मैं फिर कह रहा हूं कि उनकी दशा अति दयनीय है। उनका कुपोषण का स्तर तीसरे दर्जे का है। आप वहां से आये किसी भी व्यक्ति, जो जनजाति का है या उनके बीच काम किया है, से इसकी जानकारी ले सकते हैं। आपकों पता चल जायेगा कि वहां तीसरे दर्जें का कुपोषण है। खाद्य कमिश्नर ने ऐसा बयान उच्चतम न्यायालय के समक्ष दिया है। सभी बाजार बंद हैं जिसे खोलने की जरूरत है। जन वितरण प्रणाली को बहाल करने की जरूरत है। आदिवासियों के लिए खाद्यान्न प्राप्त करने का वही एकमात्र स्रोत है। सभी दुकानों के साथ-साथ स्कूल भी बंद हैं। सवाल है कि इस समस्या से कैसे निपटा जाये? माओवादियों का कहना है कि वे किसी खास तरह के युद्धविराम के लिए राजी है और उन ग्रामों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली को बहाल किये जाने के पक्षधर हैं। उक्त समाचार 14.4.2010 के ‘हिन्दू’ दैनिक में आया है। माओवादियों ने यह भी संकेत दिया है कि वे एक साथ युद्धविराम के लिए तैयार हैं। क्या सरकार अपनी बात पर अड़ी रह सकती है? सरकार का कहना है कि उनके द्वारा हिंसा बंद करने के बाद ही वह बात कर सकती है। लेकिन युद्धविराम या हिंसा को बंद करना दोनों पक्षों के बीच सहमति का मामला है। सरकार को भी खुले दिमाग से सामने आना चाहिए। हमें नागालैंड में समस्याओं से निपटने का अनुभव है। अब एक संकेत है जिसे भी 14.4.2010 के ‘हिन्दू’ में प्रकाशित किया गया है।अब मैं अपने कुछ अनुभवों की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा। मैं लोगों से मिलता हूं। ऐसे लोग भी हैं जो अहिंसा में विश्वास करते हैं। वे छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के बीच काम करते हैं। उन लोगों को वहां काम करने नहीं दिया जाता है। उनको परेशान किया जाता है। उनके विरूद्ध मुदकमा दायर किया गया है और उन्हें वहां से निष्कासित किया जा रहा है। अब वे छत्तीसगढ़ के बाहर हैं। अगर हमारे पास आदिवासी लोगों के पास पहुंचने का प्रजातांत्रिक साधन नहीं है तो हम उनका विश्वास कैसे हासिल कर सकते हैं? माओवादियों और आम ग्रामीणों के बीच पहचान करना असम्भव है। पुलिस की कारवाई से दोनों तरफ हिंसा बढ़ेगी।जीवन अमूल्य है। केन्द्रीय रिजर्व पुलिस के जवानों का जीवन अमूल्य है। एक ग्रामीण या गरीब आदिवासी का भी जीवन अमूल्य है। हमें उन गरीब आदिवासियों के विषय में सोचना होगा। यही मूल समस्या है जिस पर हमें ध्यान देना है। पंचायत के शिड्यूल क्षेत्र में विस्तार के 5वीं शिड्यूल का लगातार उल्लंघन हो रहा है। उसी प्रकार संविधान के अंतर्गत आदिवासियों को दिये गए सभी अधिकारों का भी उल्लंघन हो रहा है। मैं पूछना चाहता हूं कि लगातार ये उल्लंघन क्यों हो रहे हैं? यह किसी एक राजनैतिक दल की समस्या नहीं है। मैं सभी दलों से पूछला चाहता हूं कि स्वतंत्रता के 60 साल से अधिक हो जाने के बाद भी हमारे देश में आदिवासी लोग क्यों उतनी दयनीय और जोखिम भरे हालत में रह रहे हैं। इसके लिए कौन जिम्मेदार है? क्या यह राज्य सरकारों की असफलता नहीं है? क्या यह केन्द्र सरकार की असफलता नहीं है? क्या यह हम लोगों की सामूहिक असफलता नहीं है? मैं यहां उपस्थित सभी व्यक्तियों की अर्न्तआत्मा से अपील करता हूं। मैं पूरी संसद की अर्न्तआत्मा से अपील करता हूं। क्या यह हम लोगों की सामूहिक जिम्मेदारी नहीं है? आदिवासी लोग दयनीय हालत में क्यों रहें? यह मूल समस्या है और इसका समाधान होना चाहिए। मेरी समझ से इस संबंध में केन्द्रीय सरकार के द्वारा अपनाई गई नीति सही नहीं है। यह नीति गलत है। मैं राजनीति और गृह मंत्री के द्वारा संसद के बाहर दिये गये बयान के विवाद में नहीं पड़ना चाहता हूं। मैं इस विवाद में नहीं पड़ना चाहता क्योंकि गृहमंत्री के काम करने का तरीका गलत है। वे पश्चिम बंगाल में कुछ कहते है तो दिल्ली में कुछ और कहते हैं। हमारे देश में यह सब क्या हो रहा है? गृहमंत्री पूरे देश का गृहमंत्री होता है। अगर मामला बंगाल में मुख्यमंत्री के टेबल पर रूकता है तो यह छत्तीसगढ़ में क्यों नहीं रूकता है? अंत में वे कहते हैं कि वे पूरी नैतिक जिम्मेदारी लेते है और मामला दिल्ली में उनके टेबल पर आकर रूकता है। फिर वे बयान देते हैं कि 2-3 साल में वे माओवादियों का खात्मा कर देंगे। आखिर इन सबके पीछे नीति क्या है?सरकार से सवालमैं सरकार से पूछना चाहता हूं। क्या यह बता सकती है? कि उसकी क्या नीति है? जब तक हम आदिवासी लोगों को विश्वास में नहीं लेते है और आदिवासियों के बीच भेद पैदा कर आपस में लड़ाने वाले गैर सरकारी तत्वों को बढ़ावा देना बंद नहीं करते हैं तब तक हम वामपंथी उग्रवाद से लड़ाई में नहीं जीत सकते हैं। यह एक रूझान है जो जारी रहेगी। जब तक हमारे देश में बड़े स्तर पर असमानता और असंतोष है तब तक आपको वामपंथी उग्रवाद मिलता रहेगा। प्रजातंत्र में हमें छत्तीसगढ़ के बहुमत के विषय में सोचना होगा। यह उनके भविष्य का सवाल है। अगर हम आदिवासी लोगों की मनोस्थिति को नहीं समझ सकते हैं तो हम प्रजातंत्र की मूल भावना को भी नहीं समझ सकते हैं। अगर इस देश के आदिवासियों को प्रजातंत्र नहीं सुरक्षा प्रदान कर सकता है तो प्रजातंत्र का क्या मतलब है? आदिवासियों की सुरक्षा ही हमारे देश के संसदीय प्रजातंत्र की सुरक्षा है। भारत सारकार को इन समस्याओं का समाधान निकालना चाहिए और इसके लिए अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करना चाहिए। गृहमंत्री ने कहा है कि वे जांच रिपोर्ट पेश करेंगे। देखना है कि वे क्या रिपोर्ट पेश करते हैं। जांच रिपोर्ट में वे बातें नहीं होनी चाहिए जो गृहमंत्री कहते रहे हैं। यह एक गंभीर समस्या है और सदन को इसे गंभीरता से लेना चाहिए। जो घटनाएं घर्टी हैं उसकी भर्त्सना की जानी चाहिए और आने वाले दिनों में इसकी पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन इसके लिए केन्द्र सरकार को उचित नीति बनानी चाहिए। हमारे सामने सवाल है कि क्या केन्द्र में समुचित नीति बनाने की इच्छाशक्ति है? मैं इन्हीं शब्दों के साथ अपना वक्तव्य समाप्त करता हूं।
- डी. राजा
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मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

शिक्षा गरीबों की पहुंच से बाहर

1915 में केरल के एक गांव अरूहाबलम में दलित क्रांतिकारी अय्यान्कली एक अछूत लड़की पुलैया को एक मलयालम स्कूल में दाखिला दिलाने ले गये। ऊंची जाति वालों ने दाखिला लेने से मना कर दिया और स्कूल में आग लगा दी ताकि अछूत बच्चे ‘शिक्षा संस्था को अपवित्र‘ न कर सकें। इसके बाद देश के इतिहास में पहली कृषि हड़ताल हुई। यह हड़ताल मजदूरी बढ़ाने के लिए नहीं बल्कि स्कूलों में प्रवेश की मांग को लेकर हुई। इस घटना के करीब सौ साल बाद तथा भारतीय गणतंत्र के 60 साल के प्रयासों के बाद आज भी शिक्षा तथा शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश उतना ही दुर्लभ होगा जितना कि उस छोटी लड़की पुलैया के लिए था। इस बार प्रवेश के अधिकार के बारे में पूछा नहीं जायेगा बल्कि शिक्षा के खर्च के बारे में सवाल उठेगा।कर्ज-प्रेरित शिक्षाएक राष्ट्र के रूप में दलितों, आदिवासियों के बच्चों, लड़कियों तथा ग्रामीण इलाकों में छोटे एवं मझोले किसानों और शहरी क्षेत्रों में मेहनतकश औद्योगिक मजदूरों के बच्चों को पढ़ाने में आने वाली कठिनाइयों से गुजर चुके हैं। यहां तक कि नौकरी करने वाले मध्यवर्ग के लोग भी अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए कम फीस वाले सरकारी स्कूलों में जाना पसन्द करते हैं। यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलायंस-2 के मानव संसाधन विकास मंत्री का सपना पूरा होना है तो हमारे देश के नौकरीयाफ्ता तमाम मध्यवर्ग के लोग बैंकों के कर्जों से लद जायेंगे। अब से 10 साल बाद विदर्भ और तेलंगाना के कर्ज से लदे किसानों तथा अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त मध्य एवं उच्च मध्य वर्गों के नौकरी करने वालों के बीच कोई अंतर नहीं रह जायेगा।कोई उन बच्चों के अभिभावकों की पीड़ा की कल्पना कर सकता है जो अपने बच्चों को आस्ट्रेलिया भेजने के लिए बैंकों से कर्ज लेते हैं और कर्ज चुकाने के लिए परेशानी उठाते हैं? निजी बीमा कंपनियां और बैंक टेलीविजन पर लाइव क्रिकेट मैच के दौरान विज्ञापन देते हैं ताकि अभिभावक अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए कर्ज के जाल में फंस सकें। ऐसा इस तथ्य के कारण कि शिक्षा जो अभी तक महंगी, काफी खर्चीली, भूमंडलीकृत एंव निजीकृत बिजनेस की चीज हो गयी है जिसे बेचा जा सकता है। दुर्भाग्यवश ऐसा लगता है कि भारतीय मध्यवर्ग संप्रग-2 द्वारा भावी शिक्षा पर होने वाला खर्च के तैयार किए जा रहे खाके से अनभिज्ञ है। पहला सबूत यह है कि संप्रग-2 सरकार का संविधान के 95वें संशोधन को, जिसने अनुच्छेद 15(5) को शामिल करके दलितों, आदिवासियों एवं पिछड़ों के लिए शिक्षा को सुगम कर दिया है, लागू करने के प्रति न तो दिलचस्पी है और न ही प्रतिबद्धता। इस संविधान संशोधन के जरिए सभी सरकारी तथा सहायता प्राप्त और सहायता नहीं प्राप्त करने वाले शिक्षण संस्थाओं में इन वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है। लेकिन वह संप्रग-2 सरकार में होने वाला नहीं है।महंगी होती शिक्षासंप्रग-2 सरकार के आने के बाद शिक्षा अचानक बिकाऊ चीज बन गयी है और इसीलिए इस तरह का बयान सुनने को मिलता है कि शिक्षा को सरकार के चंगुल से मुक्त किया जा रहा है, उच्च शिक्षा परिदृश्य को बेहतर किया जा रहा है आदि आदि। भविष्य में इस तरह की जो दूसरी बात है वह यह कि शिक्षण संस्थाओं के आवेदन फार्म को ऊंची कीमत पर बेचा जायेगा। निजी शिक्षण संस्थाओं में आवेदन फार्म का मूल्य 500 रू. से शुरू होता है और 500 रू. से कभी कम नहीं रहता है, बाद में सरकारी शिक्षण संस्थाओं में भी यही होने वाला है। उसके बाद गरीबी रेखा से नीचे के छात्र जिनके परिवार की आमदनी अर्जुन सेनगुप्ता कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार रोजाना 20 रू. से अधिक नहीं है, क्या इस खर्च को वहन कर पाएगा? एक आवेदन फार्म खरीदने के लिए पूरे परिवार को एक महीना तक भूखे रहना पड़ेगा। आवेदन फार्म के मूल्य इतने ज्यादा हैं कि वे दैनिक मजदूरी करने वाले दो लोगों के पूरे एक महीने के वेतन के बराबर हैं। इसमें आश्चर्य नहीं कि संप्रग-2 सरकार का इरादा यह है कि शिक्षा को गरीबों की पहुंच के बाहर रखा जाए चाहे उनकी कोई भी जाति हो।दुर्भाग्य से शिक्षा का अधिकार केवल सरकार की संस्थाओं तक सीमित होगा तथा उन गरीब बच्चों को किसी ‘इलीट’ (विशिष्ट) पब्लिक स्कूल में प्रवेश पाने का अधिकार नहीं होगा क्योंकि न तो सरकार पब्लिक स्कूल की ऊंची फीस देगी और न ही पब्लिक स्कूल गरीब बच्चों को लेने के लिए तैयार हैं। इस प्रकार 2015 तक फिर कोई गरीब लड़की पुलैया होगी जो किसी पब्लिक स्कूल के बाहर खड़ी इंतजार कर रही होगी और उस समय तक आत्महत्या करने का दृश्य विदर्भ के किसानों से हटकर शहरी भारत के शिक्षित मध्य वर्ग तक पहुंच जायेगा। संप्रग-2 सरकार जो कुछ भी कर रही है वह है मानव संसाधन विकास मंत्री के इस सपने को साकार करना कि भारत को ‘बिजनेस हब’ बना देना है जहां शिक्षा बिकाऊ है। यह ‘शिक्षा के अधिकार’ के बावजूद होगा।शिक्षा बिल और मुकदमेंइन लक्ष्यों और उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए एचआरडी मंत्री ने शिक्षा ट्रिब्यूनल बिल लाया है जिसमें छात्रों और संस्थाओं के बीच होने वाले विवादों को निपटाया जायेगा। इसका मतलब होगा कि हमारे देश के वकीलों को ज्यादा काम मिल जायेगा। वे फौजदारी और अन्य मुकदमों के अलावा ऐसे मुकदमें भी लड़ेंगे जो शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच होंगे तथा विश्वविद्यालयों एवं कालेजों के विद्यार्थी अपने विवाद सुलझाने के लिए अदालत के चक्कर लगाते रहेंगे जिसका कोई अंत नहीं होगा। इसलिए यह वही है जो संप्रग सरकार चाहती है! यह वही है जो वकील से बने मंत्री चाहते हैं!इसके बाद आता है विदेशी शिक्षा प्रदायक बिल जो देश में विदेशी संस्थाओं को काम करने की इजाजत देंगे। वे शायद डालरों या यूरो में फीस लें जिससे विदेशी शिक्षा के पीछे पागल मध्यवर्गीय लोग बैंकों और कर्जदारों के पीछे भागंेगे ताकि वे शिक्षण शुल्क अदा कर सकें। संप्रग सरकार यहीं नहीं रूकती। अब अधिकृत प्रामाणिकता देने वाली एजेंसियों को देश में कार्य करने का अधिकार होगा, देशी और विदेशी दोनों। वे सारे देश में घूमकर निजी शिक्षण संस्थाओं को अंकित करेंगे - एक से पांच ‘तारे’ देकर। इस प्रकार विदेशी शिक्षण संस्थाएं और तब विदेशी प्रामाणिकता प्रदान करने वाली एजेंसियां हमारी संस्थाओं का मूल्यांकन करेंगी। हमारे देश में पहले ही एन.ए.ए.सी अर्थात राष्ट्रीय आकलन और प्रामाणिकता परिषद है। इसे यूजीसी ने सर्वोत्तम और प्रामाणिक संस्था के रूप में विकसित किया है। यह बंगलौर में है और इसकी देखरेख गोवर्धन महंता और प्र्रो. एच.ए.रंगनाथ सरीखे उच्च कोटि के विद्वान कर रहे हैं। फिर भी सरकार ने विदेशी संस्थाओं के लिए द्वार खोल दिये हैं।हमारे देश में वकीलों के पास अब बड़ा काम रहेगा। अब सरकार एक और बिल ला रही है। इसमें कैपिटेशन फीस पर रोक लगाने की बात की जा रही है। लेकिन वास्तव में अध्यापकों पर तकनीकी, मेडिकल संस्थाओं और विश्वविद्यालयों में अनियमितताओं पर रोक लगाने के नाम पर अंकुश लगाए जाएंगे। इसके पास होने के बाद पुलिस बार-बार किसी न किसी बहाने परिसरों में जाया करेगी। सुविधाएं न होने या अध्यापकों की वास्तविक/अवास्तविक गलतियों के नाम पर पुलिस को छूट मिल जायेगी। बिल में 25 किस्म के उल्लंघनों का जिक्र है। बिल का उल्लंघन करने पर केन्द्र सरकार राज्य सरकारों के अधिकार छीनते हुए शिक्षकों को सीधे 50 लाख रूपयों का दंड या 10 वर्षों तक की सजा दे सकती है! मौका मिलने पर हमारी पुलिस भारतीय दंड संहिता की धारा 420 तथा अन्य धाराएं भी लगा सकती है। यह सब जालसाजी से संबंधित होगा अर्थात हमारे शिक्षक अपराधी कहलाएंगे।इसका अर्थ यह नहीं है कि हमारे देश में लोगों को उल्लू बनाने वाली संस्थाएं नहीं हैं। लेकिन संसद को इस बात का ध्यान देना होगा कि आपराधिक रूझान है या नहीं। आखिर शिक्षण संस्थाएं ज्ञानार्जन के केन्द्र हैं न कि मुकदमेंबाजी के।हमारा मानव संसाधन मंत्रालय और संप्रग सरकार को देश के संघीय ढांचे के अंतर्गत राज्य सरकारों के अधिकारों की जरा भी चिन्ता नहीं है। शिक्षा देने या भाषाई संस्कृति एवं एकता संबंधी उनके अपने कुछ अधिकार हैं। एक समय ऐसा आएगा जब राज्यों में केन्द्रीय सरकार के हस्तक्षेप या किसी मानव संसाधन मंत्री द्वारा शिक्षा क्षेत्र में किसी को दबाने, नियंत्रित करने, प्रमाणपत्र देने, अपराधी घोषित करने के दखल पर पछतावा करना पड़ेगा। विश्व व्यापार संगठन के पीछे चलने के कारण संप्रग-2 शिक्षा के बाजारीकरण और निजीकरण की परिस्थितियां पैदा कर रही है। ये ‘विशेष शिक्षा क्षेत्र’ अलग किस्म के ‘सेज’ होंगे। बिना शक इससे अमीरों और गरीबों के बीच की खाई बढ़ेगी, भेदभाव बढ़ेगा, वह भी एक ऐसे देश में जहां शिक्षा गरीब-अमीर, ग्रामीण-शहरी में विभाजन का मुख्य प्रेरक है।
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