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मंगलवार, 13 जुलाई 2010

नागार्जुन की याद


नागार्जुन को ध्यान में रखते हुए उनसे संबंधित ढेर सारी बातें सामने आने के लिए होड़ मचाने लगती हैं। वे ऐसी बातें हैं, जो उनके बाद की पीढ़ी से लेकर आज तक के लेखकों में दुर्लभ हैं। नागार्जुन जिस दौर में साहित्य जगत में कलम लेकर आये, उस दौर में जीवन में किसी ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए पहले त्याग करना अनिवार्य समझा जाता था। निराला ने एक गीत में लिखा है ‘जला है जीवन यह आतप में दीर्घ काल’। नागार्जुन के जीवन पर यह कथा पूरी तरह घटित होता है।
सन 1951 या 52 में जब बिहार राष्ट्र भाषा परिषद का गठन किया गया था तभी नागार्जुन के सामने एक प्रस्ताव रखा गया था कि यदि वे स्वीकार करें, तो परिषद में विद्यापीठ कायम करके उस पर उनको बिठाया जा सकता है। इस पर नागार्जुन ने अपने मित्रों से बात करते हुए कहा कि यह तो सरकारी नौकरी होगी, यदि मैं इसे स्वीकार कर लूंगा, तो सरकार के प्रति व्यंग्य कौन लिखेगा। स्पष्ट है कि नागार्जुन अपने रचानात्मक संस्कार को छोड़ने को तैयार नहीं थे। अतः उन्होंने विद्यापति पीठ का प्रस्ताव नामंजूर कर दिया।
1957 या 58 में उन्हें हिमालय प्रेस से प्रकाशित पत्रिका ‘बालक’ का सम्पादक बनाया गया। उन्हांेने स्वीकार भी कर लिया। ‘बालक’ में चारित्रिक परिवर्तन कर दिया उन्होंने। अंधविष्वास वासी लोक कथाओं के बदले वह बालोपयोगी एवं वैज्ञानिक कथाएं छापने लगे। लेकिन इस पद पर वे मात्र तीन महीने रह सके, बोले- इस तरह मुष्किल है। एक दिन उठकर निकले, वे फिर उधर नहीं गए।
एक और प्रसंग याद आता है। सन 1967 में बिहार में भयानक अकाल पड़ा था। अकाल के दौर में ही चौथा आम चुनाव हुआ, तो बिहार में कांग्रेस हार गयी और संविद सरकार बनी जिसमें कम्युनिस्ट पार्टी भी शामिल थी। कम्युनिस्ट नेता इन्द्रदीप सिंह राजस्व के साथ ही अकाल राहत मंत्री भी थे। उन दिनों नागार्जुन हिन्दी साहित्य सम्मेलन भवन में ठहरे थे। मैं कुछ दिनों के लिए पटना आया था और सम्मेलन भवन में ठहरा था। तभी एक दिन बाबा ने बताया- अरे भाई आज हरिनंदन ठाकुर आए थे, अभी वे राहत कार्यों के सचिव हैं। कह रहे थे कि आप एक काम कर दीजिए, अकाल के इलाकों में घूमिये और आकल पर राहत की स्थिति के बारे में मेरे पास एक रिपोर्ट भेज दीजिए। आप जैसे रहते हैं, जहां रहते हैं, वैसे ही वहां रहिए, किसी कार्यालय में जमकर बैठने की जरूरत नहीं है। स्थिति को देखकर आपका लेखक जो अनुभव करता है वही आप लिख दीजिएगा, सरकार आपको मानदेय देगी और घूमने का प्रबंध भी कर देगी। इतना बोलते हुए उन्हांेने कहा- मैंने सोचने का समय लिया है, अब तुम बताओ क्या करना चाहिए! मैंने कहा- एक तो यह बदली हुई सरकार है, दूसरे यह राहत कार्य विभाग एक कम्युनिस्ट के हाथ में है, तीसरे, आप सरकार को आलोचनात्मक रिपोर्ट भी दे सकते हैं, चौथे, यह नौकरी तो है नहीं; अतः इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेने से कोई हर्ज तो नहीं है। वे बोले- ठीक कहते हो तुम। उन्होंने काम स्वीकार कर लिया, लेकिन यह काम भी दो-तीन महीनों से ज्यादा नहीं कर सके। बोले- अरे सब कुछ के बावजूद यह तो हो ही गया है कि मैं बिहार में बंध गया हूं, कलकत्ता? इलाहाबाद, दिल्ली कहीं भी नहीं जा पा रहा हूं। अतः उन्होंने इस आशय का पत्र सरकार को भेज दिया और निकल पड़े यात्रा पर।
असल में नागार्जुन वैकल्पिक सांस्कृतिक चेतना के वाहक थे, वैकल्पिक मूल्यों के प्रतीक थे, वे इस चेतना और प्रतीकत्व को छोड़ने को किसी भी कीमत पर तैयार नहीं थे। यही तो नागार्जुन के लेखकीय यक्तित्व का आकर्षण था। नये लेखक उनसे अक्सर मिलते रहते थे, वे चाहे जहां रहे। वे उनसे साहित्य के बारे में बातंे करते थे, साहित्य रचना के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते थे। मैं उनसे पहली बार 1953 में मिला जब मैं भागलपुर में इंटर प्रथम वर्ष का छात्र था। वे एआईएसएफ (आल इंडिया स्टुडेंट्स फेडरेशन) के भागलपुर जिला सम्मेलन के अवसर पर आयोजित कवि सम्मेलन में भाग लेने आए थे। सन् 52 में उनका उन्यास ‘बलचनमा’ छपा था, जिसकी बड़ी चर्चा हो रही थी। मैंने यह उपन्यास खरीदकर कुछ दिन पहले ही पढ़ा था। बेचन जी उस समय एमए प्रथम वर्ष में पढ़ रहे थे, लेकिन साहित्य के बारे में उनकी जानकारी और समझ बहुत अच्छी थी। वे कहते थे कि ‘बलचनमा’ में प्रेमचंद की परंपरा को आगे बढ़ाया है। मैं एआईएमएफ का सदस्य नहीं था, लेकिन कवि सम्मेलन में उपस्थित हुआ। बेचन जी संचालन कर रहे थे। मुझसे पूछा- कविता सुनाईगा। मुझे हिम्मत नहीं हुई। लेकिन उसी मंच पर नागार्जुन से उन्होंने मुझे मिलाया। नागार्जुन भगवान पुस्तकालय में ठहरे थे, वही बेचन जी भी रहते थे, क्योंकि उस समय उनके पिता श्री उग्र मोहन झा पुस्तकाध्यक्ष थे। मैं दूसरे दिन प्रातः बाबा से मिलने भगवान पुस्तकालय पहंुचा। उन्होंने पूछा- क्या लिखते हो? मैं कहा- अभी तो शुरूआत है, कोशिश कर रहा हूं कि लिख पाऊं। वे खुश हुए सुनकर। बोले- देखो, जो भी लिखो लेकिन भाषा को रगड़ मारो, ओढ़ना-बिछोना बना लो, उसे लेकर सड़क पर चलो, जीवन की भाषा ही जीवंत भाषा होती है। उनकी इस बात का मुझ पर गहरा असर पड़ा। उस दिन तक मैं संस्कृतनिष्ठ भाषा लिखता था और समझता भी यही था कि संस्कृतनिष्ठ भाषा अच्छी होती है। स्कूल में मैंने संस्कृत पढ़ी थी, इसलिए संस्कृत शब्दों के लिए मुझे भटकना नहीं पड़ता था। लेकिन दूसरे ही दिन से जो कुछ भी लिखता, उसे संस्कृत के तत्सम शब्दों से मुक्त रखने की कोशिश करने लगा। इस काम में कुछ समय लगा। उस समय हमारे गृह नगर गोड्डा (झारखंड) से कुछ तरुण लेखक एक पत्रिका ‘नव जागरण’ नाम से निकालते थे। उनमें मैं भी शामिल था। उसका दूसरा अंक मैंने उन्हें दिया। पटना लौटकर उन्होंने एक पोस्ट कार्ड पर मुझे पत्र लिखा- ‘आठ-दस तरूणों का सचेत गिरोह क्या नहीं कर सकता है? उन्होंने हमें उत्साहित किया। वह पत्र पत्रिका के अगले अंक के मुखपृष्ठ पर हमने छाप दिया। वहीं अंतिम अंक हो गया; क्योंकि गोड्डा में कांग्रेसी लोग हल्ला करने लगे कि ये लड़के कम्युनिस्ट हो रहे हैं। उनमें कोई कम्युनिस्ट नहीं था, लेकिन वहां के कांग्रेसियों को किसी आसन्न संकट का अहसास हुआ। इसके प्रभाव से ही पत्रिका बंद हो गई। लेकिन मेरा संपर्क नागार्जन से न केवल बना रहा, बल्कि लगातार गहरा होता गया। वे बराबर हमें चिट्ठियां लिखते रहे, अफसोस है कि वे चिट्ठियां आज उपलब्ध नहीं है।
मैं पटना आया 1957 में, एमए (हिन्दी) पढ़ने। वे उन दिनों पटना में मछुआ टोली में रहते थे। वहीं रहकर उन्होंने ‘वरुण के बेटे’ उपन्यास लिखा था। मैं खोजते-खोजते उनके आवास पर पहुंच गया। उनके आवास पर ‘मधुकर गंगाधर’ से परिचय हुआ। वे उस साल एमए करके निकल गए थे और अजन्ता प्रेस से प्रकाशित पत्रिका में काम कर रहे थे। अक्सर शाम हो हम लोग अजन्ता प्रेस में मिलते थे। बाबा तो केन्द्र में रहते ही थे। एक दिन उनके साथ अशोक राजपथ पर चले जा रह थे, शाम का समय था, बी.एन. कालेज के सामने उन दिनों भारत कॉफी हाउस था। उन्होंने कहा- चलो तुमको कॉफी पिलाए। मैंने कहा- मैं तो चाय-कॉफी कुछ नहीं पीता। यह सुन कर वे बोले-अरे, लेखन के रास्ते पर चले हो, तो कॉफी नहीं पीओगे, तो कॉफी हाउस नहीं जाओगे, तो आधुनिकाओं का सौरभ कैसे पाओगे। मैं गौर से उनको देखने लगा-बलचनमा और वरूण के बेटे को लेखक ऐसा कह रहा था! खैर उनका अनुगमन करते हुए कॉफी हाउस में दाखिल हुआ और उनके साथ कॉफी के साथ ही उनके यक्तित्व का नया स्वाद लिया।
बात 1958 की है। होली के अवसर पर बाल शिक्षा समिति, हिन्दुस्तारनी प्रेस यानी रामदहिन मिश्र के प्रतिष्ठान में कवि-सम्मेलन था। बाबा भी आमंत्रित थे। पटना के तमाम कवि-लेखक वहां मौजूद थे। नागार्जुन की बारी आयी, तो माईक पर खड़े होकर उन्होंने कहा- मैंने सुना था कि इस कवि-सम्मेलन में शिक्षा मंत्री भी रहेंगे, तो मैंने उनके लिए यह खास टुकड़ा लिखा, वे नहीं है, तब भी मैं सुना रहा हूं। यह टुकड़ा उनके कोई मुसाहिब पहुंचा ही देंगे। उन दिनों कुमार गंगानंद सिंह बिहार के शिक्षा मंत्री थे। तो बाबा ने कविता सुनाई-
अभी-अभी उस दिन मिनिस्टर जी आए थे,
बत्तीसी दिखलाइ थी, वायदे दुहराये थे,
भाखा लटपटायी थी, नैन शरमाये थे,
छपा हुआ भाषण भी नैन से सटाये थे।
इसके बाद श्री मथुरा प्रसाद दीक्षित खड़े हो गए और कहने लगे- यह तो एकदम व्यक्तिगत आक्षेप है, इसे वापस लीजिए। बाबा ने इस पर कहा- ठीक है, अंतिम पंक्ति को संशोधन करके ऐसा कर देता हूं- ‘छपा हुआ भाषण भी पढ़ नहीं पाये थे’। इसके बाद स्थिति शांत हुई।
इसी प्रसंग में एक बात और याद आ रही है। नागार्जुन ने राजनैतिक व्यक्तित्वों पर जितना लिखा है, उतना किसी दूसरे किसी कवि ने नहीं लिखा। पंडित नेहरू, जयप्रकाश, इन्दिरा गांधी आदि पर अनेक कविताएं अनेक मनोदशाओं में लिखी हैं। पंडित नेहरू के निधन के बाद उन्होंने एक लंबी कविता लिखी, जिसकी पहली पंक्ति हैं- ‘तुम रह जाते दस साल और। इस कविता को लेकर काफी विवाद हुआ था। यहां मुझे वह प्रसंग याद आ रहा है, जो बाबा ने खुद बताया था। दिल्ली में एक दिन बाबा पहुंच गए राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त के यहां। उन्होंने उन्हें कई कविताएं सुनायी, जिनमें पंडित नेहरु पर लिखी उपर्युक्त कविता भी थी। इसके अलावा जयप्रकाश नारायण, इंदिरा गांधी, मोरारजी देसाई आदि पर लिखी कविताएं थी। कहने की जरूरत नहीं कि सभी उपर्युक्त व्यक्तित्वों के खिलाफ व्यंग्यात्मक ढंग से लिखी गयी थी। चुपचाप कविताएं सुन लेने के बाद गुप्त जी ने अपना गुप्त गुस्सा जाहिर करते हुए कहा- ‘मैं तुम्हें जब चलता हुआ देखता हूं तो लगता है कि विष का मटका डोलता हुआ चला जा रहा है।’ बाबा ने मुझे बताया कि मुझे भी गुस्सा आ गया और मैंने कहा- ‘मैं तो यह समझता हूं कि इस जनतंत्र के युग में जो मेरी इन कविताओं को बर्दाष्त नहीं कर सकता उसे मैं राष्ट्रकवि नहीं मानता’। यह कहकर बाबा उठे और चल दिये।
एक बार मैं और बाबा इलाहाबाद में साथ-साथ परिमल प्रकाशन के स्वामी शिवकुमार सहाय के यहां ठहरे थे। एक दिन बाबा ने पूछा- पंत जी से कभी मिले हो। मैंने कहा- नहीं। फिर वे बोले- अरे चलो तुम्हें मिलाता हूं उनसे। एक दिन संध्या समय हम लोग पंत जी के मम्फोर्ड गंज के आवास पर पहुंचे! छोटा-सा मकान, लेकिन लताओं और वृक्षों से घिरा हुआ। पंत जी हम लोगों को अंदर ले गए, बैठक में बिठाया। बाबा ने मेरा परिचय देते हुए कहा-छायावादी काव्य की भाषा पर काम करके पीएचडी हासिल की है इन्होंने, कविताओं के साथ आलोचना भी लिखते हैं, आंदोलन भी करते हैं, कई बार जेल हो आये हैं। पंत जी बाबा की बात सुन रहे थे और मैं देख रहा था कि उनके चेहरे पर भाव आ-जा रहे थे। उन्होंने अत्यंत मर्मस्पर्शी स्वर में पूछा- ‘जेल में तो बड़ा कष्ट हुआ होगा।’ मैंने कहा- ‘आंदोलनकारी साथियों के झुंड में शामिल होकर जेल जाना तो किसी त्यौहार की तरह आनंददायी होता है।’ पंत जी भीतर गये और नमकीन लेकर आये। एक बाबा को दी और एक मुझे। मुझे लगा जैसे मेरे जेल-कष्ट को पंत जी कुछ कम करने की कोशिश कर रहे हैं। फिर कुछ देर गपशप करते हुए चाय पीकर हम लोग पंत जी को प्रणाम कर विदा हुए। पंत जी अपने अहाते के गेट तक आये। लौटते हुए रास्ते में बाबा ने बताया- अमृत राय से इनकी बड़ी दोस्ती है, जब बाजार या कहीं जाना होता है, तो अमृत को फोन करते हैं और वे गाड़ी लेकर आ जाते हैं।
दूसरे दिन शाम को बाबा के साथ इलाहाबाद कॉफी हाउस पहुंचे। वहां बहुत से लेखक मिले, जिन्हें मैं जानता था, लेकिन पहचानता नहीं था। वहां नरेश मेहता थे, विजय नारायण साही थे, डा. रघुवंश, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लक्ष्मीकांत वर्मा, मार्केण्डेय आदि थे। अनेक नये लोग भी थे, गिरिधर राठी आदि। कविता की चर्चा चली तो नरेश मेहता ने कहा- आध्ुानिक हिन्दी कविता में अकेले नागार्जुन हैं, जिनकी कविताओं को पढ़कर उनके देश-काल का पता चलता है। इस पर साही जी ने बाबा की राजनैतिक कविताओं का जिक्र करते हुए उनकी राजनैतिक अस्थिरता की बात कही। इस पर बाबा ने कहा- देखो, साही, तुम सोशलिस्ट हो और मैं कम्युनिस्ट; फिर भी डा. लोहिया मेरी कविताओं की फोटो कापी कर बंटवाते हैं, तुम्हारे पास ऐसी कोई कविता है जिसे डा. लोहिया आम लोगों में बंटवाने की बात सोचें?
बाबा पटना में रह रहे थे। मैं अक्सर गर्मी-छुट्टी और पूजा छुट्टी में पटना आता था अपने शोध कार्य के लिए। बात सन् 64 की है। मैंने बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के तत्कालीन प्रधानमंत्री को पत्र लिखा कि मैं पटना आ रहा हूं, सम्मेलन भवन में मेरे ठहरने का प्रबंध कर दीजिए। सम्मेलन से तो कोई जवाब नहीं मिला लेकिन बाबा का एक कार्ड मिला- तुम्हारा पत्र सम्मेलन की मेज पर देखा, मेरा कहना है कि इस बार तुम मेरे साथ ठहरो, मैं अकेला हूं। मैं खुश हुआ और छुट्टी होते ही पटना आ गया। बाबा का आवास उन दिनों पटना टेªनिंग स्कूल की बगल में एक खपरैल के मकान में था। मुझे सुविधा भी हुई, राष्ट्रभाषा परिषद का भवन वहां से नजदीक पड़ता था। मैं सुबह नाश्ता करके निकलता था और शाम पांच बजे के बाद लौटता था। एक दिन बातचीत करते हुए बाबा ने कहा- बगल के मकान में राज्य सरकार के एक खुफिया अधिकारी रहते हैं। कह रहे थे, आपकी बहुत-सी कविताएं खुफिया विभाग की फाईल में हैं। बाबा ने कहा- रखे रहिए, संग्रह निकालना होगा, तो आपकी फाईल से ही ले लेंगे।
एक दिन रात के भोजन के बाद बाबा ने कहा- चलो गंगा किनारे कुछ देर टहलेंगे। गंगा-तट वहां से बहुत करीब था। तो हम लोग निकले। चांदनी रात थी। गंगा की धारा चांदनी में चमक रही थी। गंगा किनारे बहुत से मंदिर और मठ हैं। एक मठ के आगे लंबा-चौड़ा सहन बना हुआ था, सीमंेट से। टहलने का विचार छोड़कर हम लोग उस सहन के किनारे बैठ गये। गंगा की धारा उसे धक्का मारते हुए बह रही थी। हम लोग देर तक बैटे गपशप करते रहे। इतने में एक आदमी वहां पहुंचा और जोर-जोर से बोलने लगा- यह क्या कर दिया, आप लोगों ने, चप्पल पहने यहां चले आए, छिःछिः, अपवित्र कर दिया मंदिर को। इस पर बाबा ने भी उसी स्वर में कहा- मंदिर में क्या होता है सो हमें भी मालूम है, उन कुकृत्यों से मंदिर अपवित्र नहीं होता है और हम मंदिर के आंगन में चप्पल पहने चले आए तो अपवित्र हो गया? इतना सुनते ही वह आदमी- अरे बाप रे, यह कैसा-कैसा आदमी यहां चला आया- यह कहते हुए भीतर की ओर दौड़कर गया। मुझे लगा कि वह अपने लोगों को बुलाने गया है। मैंने कहा- बाबा, अब जल्दी से खिसकिये यहां से। और हम लोग तेजी से निकल गए और बगल में ही एक मोड़ था, उससे मुड़कर ओझल हो गये। मठवाले निकले होंगे, तो हमें वहां न पाकर झुझलाकर रह गए होंगे।
एक बार बाबा इलाहाबाद से पटना आने वाले थे, उन्होंने पहले पत्र लिख दिया था। उन दिनों मैं विधायक क्लब में रह रहा था। मैं स्टेशन गया उनको ले आने। गाड़ी आयी, मैं उनके इंतजार में खड़ा रहा, लेकिन वे कहीं दिखाई नहीं पड़े। नहीं आये, यह समझ कर मैं लौट आया। थोड़ी देर बाद देखा कि वे आ रहे हैं पैदल ही अपना झोला कंधे से लटकाये और कंधे पर भी कोई सामान था। मैंने देखा और दौड़ कर उनके पास गया। कंधे पर का सामान ले लिया, देखा वह तो फटा हुआ था, रस चू रहा था। मैंने कहा- बाबा मैं तो स्टेशन गया था। बोले- चलो, पहले पहुंच लें तब बतायेंगे। जाहिर है वे बहुत थक गए थे। उस दिन ‘पटना बंद’ का आह्वान कुछ दलों ने किया था। सवारियां बंद थी, अतः बाबा को स्टेशन से पैदल आना पड़ा था। क्लब पहुंचकर पहले पानी पिया, कुछ देर में मिजाज ठंडा हुआ, फिर चाय पी तो बोले- अरे भाई, टेªन में भीड़ इतनी थी कि मैं प्लेटफार्म पर उतर नहीं पाया और गाड़ी खुल गयी। वह तो समझो कि किसी ने जंजीर खींचकर गाड़ी रोक दी, तो मैं वहां प्लेटफार्म से थोड़ा आगे जाकर उतर पाया, नहीं तो पटना सिटी से पहले क्या उतर पाता। वहां पर उतरने में तरबूज गिर गया और फट गया। मैंने सोचा कि बच्चों को इलाहाबादी तरबूज खिलायें, इसलिये लेता आया। फटे हुए तरबूज को गमछे में बांधा और कंधे पर उठाया। इतने में वहां पर टीटी आ गया और कहने लगा- बिना टिकट हैं, बाबा, इसलिए प्लेटफार्म पर नहीं उतरकर यहां उतर गये। खीझ से मैंने कहा- आपको मुझे देखकर ऐसा लगता है कि मैं बिना टिकट हूं? यह कहते हुए टिकट दिखाया, तो वह ‘माफ कीजिए, कहकर चला गया। ‘बंद’ के कारण रिक्शा नहीं मिला। लेकिन कहने लगे- कोई बात नहीं, आखिर मैं तरबूज ले ही आया। यह कहते हुए वे हंसने लगे। पटना में रहने पर कॉफी हाउस जरूर जाते थे। यह 1978 कर बात है। शाम को कॉफी हाउस जाने लगे तो मुझसे पूछा- चलोगे? उस दिन शाम को एक जरूरी काम था, इसलिए मैंने कहा- बाबा आज तो नहीं जा सकूंगा। ठीक है, ठीक है, कोई बात नहीं। कॉफी हाउस तो अक्सर वे लोग जाते हैं जिनको समय और पैसा जरूरत से ज्यादा है, मैं तो जाता हूं इसलिए कि बहुत से लोगों से भेंट हो जाती है। बाबा कई दिनों तक ठहरे। एक दिन मैंने कहा- बाबा ‘उत्तर शती’ के लिए कोई कविता दीजिए न! बोले- कोर्ठ ताजा कविता दूंगा यहीं लिखकर। एक दिन सुबह-सुबह बाबा ने कहा देखो जी कविता तैयार है, पहले तुम सुन लो। मैंने कहा- हां, हां, जरुर सुनाइए। और वे सुनाने लगे-
‘किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है,
कौन है बुझा-बुझा, कौन यहां पस्त है,
कौन है खिला-खिला कौन यहां मस्त है’।
कुछ ऐसी ही पंक्तियों से कविता शुरू हुई थी। कविता की गति-यति नृत्य की धुन पर बन गयी थी, इसलिए सुनाते हुए वे खड़ा होकर नृत्य करने लगे। अद्भुत दृश्य था वह। वे सुना रहे थे और नृत्य कर रहे थे, उसी समय भीतर से मेरा पुत्र भास्कर वहां आ गया। बाबा ने उसे थोड़ा झिड़कते हुए कहा- उधर जाओ! वह चला गया और दिन भर वहां नहीं आया। जब शाम को बाबा कॉफी हाउस चले गए तो वह बाहर वाले कमरे में आया और बोला - बाबूजी कविता सुनिए-
किसकी है जनवरी किसका अगस्त है
कौन है बुझा-बुझा कौन यहां मस्त है
मैं हूं बुझा-बुझा मैं यहां पस्त हूं
बाबा हैं खिले-खिले बाबा यहां मस्त हैं।
मैं सुनकर चकित हो गया। सात-आठ का लड़का, उसने सुबह की डांट पर इतनी अच्छी प्रतिक्रिया व्यक्त की। बाबा लौटे तो मैंने धीरे से उन्हें यह प्रतिक्रिया बतायी। सुनकर बोले- वाह, यह तो कमाल है। भास्कर को पुकारते रहे, वह नहीं आया। अगली सुबह उन्होंने भास्कर को बुलाया, तो वह आया। बाबा उसे लेकर विधायक कैंटीन चले गए और वहां उसे रसगुल्ला खिलाकर लाए। अब दोनों खुश थे।
मैं डायरी नहीं लिखता, लिखता रहता तो बाबा के संस्मरणों की मोटी किताब हो जाती। यों मैंने अन्यत्र भी उनके बारे में संस्मरण लिखे हैं। अंत करते-करते दो प्रसंगों की चर्चा और करना चाहता हूं।
बाबा मेरे यहां ठहरे हुए थे। यह 1989 की बात रही होगी। एक दिन सुबह ही आ गए भागवत झा आजाद। यह कहना प्रासंगिक होगा कि आजाद जी मेरे नजदीकी रिश्तेदार हैं, इसलिए अक्सर आते थे। उस दिन आए तो बड़े आदर से बाबा से मिले और बोले- आज चलिए मेरे साथ, दिन भर वहीं रहियेगा, आपको मैं पहुंचा दूंगा। बाबा उनके साथ चले गये। वे फिर शाम को पहुंचा गये। मैंने उनके जाने के बाद पूछा- बाबा, क्या-क्या हुआ वहां दिन भर। इस पर बोले- अरे, खाना-पीना हुआ और उन्होंने लंबी कविता लिखी है, बल्कि पूरी पुस्तक ही है, सुनाया उन्होंने और पूछा- कैसी है बाबा? तो मैंने (बाबा) कहा- ‘अरे अब बुढापे का दिन है, नाती पोता खेलाइये।’ यह भी उनकी कविताओं पर बाबा की बेबाक टिप्पणी।
बाबा को राजभाषा विभाग की ओर से राजेन्द्र शिखर-सम्मान देने की घोषणा की गयी।
उस समय मुख्यमंत्री लालू प्रसाद थे। बाबा समारोह में उपस्थित हुए और राशि सहित सम्मान ग्रहण किया। लाल प्रसाद ने समारोह के समय ही किसी को भेजकर बाजार से च्यवनप्राश मंगाया और बाबा को दिया यह कहते हुए कि च्यवपप्राश खाइए और ढेर दिनों तक स्वस्थ रहिये। दूसरे दिन एक अखबार का प्रतिनिधि पहुंचा भेंटवार्ता लेने। ढेर सारी बातों के साथ बाबा ने कह दिया, अरे, लालू तो शत्रुघ्न सिन्हा से भी ज्यादा नाटकिया है। इसी शीर्षक से वह भेंट वार्ता छपी थी। यह काम बाबा से ही संभव था। उत्तर प्रदेश सरकार का सम्मान स्वयं इंदिरा गांधी के हाथों से लेते समय बाबा ने कह दिया था- मैंने आपके खिलाफ बहुत-सी कविताएं लिखी है।
बैजनाथ मिश्र, यात्री नागार्जुन का ऐतिहासिक-सांस्कृतिक-राजनैतिक यात्रा का अंत 5 नवंबर 1998 को लहरिया सरय के पंडा सराय स्थित किराये के आवास में हो गया। मैं अंत्येष्टी में शामिल हुआ। मैं, अरूण कमल और मनोज मेहता साथ पहुंचे पंडा सराय। हृषिकेश सुलभ, मदन कश्यप और अनिल विभाकर भी पटना से पहुंच चुके थे; रांची से रवि भूषण भी आये थे। राज्य सरकार ने राजकीय सम्मान के साथ अत्यंष्टि कराने का फैसला किया था। अंतः दरभंगा के जिलाधीश ज्योतिभ्रमर तुबिद और पुलिस अधीक्षक शोभा अहोतकर तथा अन्य अनेक अधिकारी मौजूद थे। हम लोगों के पहुंचते ही पंडासराय से बाबा के जन्मग्राम तरौनी के लिए शव-यात्रा निकल पड़ी। गांव के घर के बिना घेरे वाले आंगन में बाबा को रखा गया थोड़ी ही देर में गांव के लोग जमा हो गए और गांव से अंत्येष्टी स्थल के लिए यात्रा शुरू हुई; और डेढ़ वर्ष पहले फरवरी में जहां उनकी पत्नी अपराजिता देवी की अंतिम क्रिया हुई थी, उसी जगह के लिए लोग बाबा को कंधे पर ले चले। मुझे कंधा लगाने का सुअवसर मिला। स्थल पर एक शामियाना सरकार ने लगवाया था। कुर्सियां भी लगी थी। पुलिस के बंदूकधारी जवान भी खड़े थे। राज्य सरकार के चार मंत्री उपस्थित थे। शिवानंद तिवारी भी थे। मैथिली के अनेक लेखक उपस्थित थे। अखबारों के प्रतिनिधि और दूरदर्शन वाले भी थे। एक उल्लेखनीय बात यह थी कि खेत मजदूर महिलाएं बड़ी संख्या में मौजूद थी। वहां आम तौर से महिलाएं शव यात्रा में नहीं जाती हैं। लेकिन बाबा के प्रति प्रेम के कारण ये रिवाज तोड़ा दिया गया। ऐसा लग रहा था बलाचनमा के परिवार के लोग अंतिम प्रणाम करने आए थे।
दूरदर्शन वाले मेरे पास आये और पूछा आप क्या सोच रहे हैं? मैंने कहा- मैं यह सोच रहा हूं कि यह यात्री युवावस्था में विवाह के बाद घर छोड़कर निकल गया था और बारह वर्ष तक बाहर ही घूमता रहा, इस यात्री ने घर छोड़ते समय मैंथिली में लिखा था-
मां मिथिले, ई अंतिम प्रणाम
अहिबातक पातिल फोडि-फोडि
जा रहल छी हम आन ठाम
मां मिथिले ई अंतिम प्रणाम।
उस ‘युग-युग धावित यात्री’ की अंतिम क्रिया गांव में हो रही है। लेकिन उसके पहले जीवन में भी साबित हुआ कि कविता का अंतिम प्रणाम सार्थक नहीं हो सका। हिन्दी में एक कविता में उन्होनंे लिखा-
याद आता है तुम्हारा सिंदूर तिलकित भाल,
याद आता है अपना वह तैरानी ग्राम।
कविता लंबी है। सबसे अधिक मुझे यह कविता याद आ रही है, जो उन्होंने बहुत दिनों के बाद गांव लौटने की आंतरिक अनुभूति को व्यक्त करते हुए लिखी-
बहुत दिनों के बाद अबको देखी मैंने
पकी-सुनहली फसलों की मुस्कान
बहुत दिनों के बाद,
बहुत दिनों के बाद अबकी मैंने छू पाया
गंवई पगडंडी की चंदनवर्णी धूल
बहुत दिनों के बाद,
बहुत दिनों के बाद अबकी मैनं जी भर सूंघे
मौलसिरी के ताजे टटके फूल
बहुत दिनों के बाद
बहुत दिनों के बाद अबकी मैंने जी भर गन्ने चूसे,
ताल-मखाने खाये
बहुत दिनों के बाद
बहुत दिनों के बाद अबकी मैं जी भर सुन पाया
धान कूटती किशोरियों की कोकिल कंठी तान
बहुत दिनों के बाद
बहुत दिनों के बाद अबकी मैंने जी भर भोगे
रूप, रस, गंध, शब्द, स्पर्ष सब साथ-साथ
इस भू पर बहुत दिनों के बाद
दूर दर्शन वालो ने इसके बाद पूछा- बाबा सबदिन सत्ता के खिलाफ लड़ते रहे, अभी सत्ता उनको बंदूकों की सलामी देने आया है इसे आप किस तरह देख रहे हैं? मैंने कहा- बाबा तो सचमुच जीवन भर सत्ता के खिलाफ लड़ते रहे और लड़ते-लड़ते उन्होंने जो हैसियत हासिल की है वह बहुत बड़ी और ऐतिहासिक है। इसलिए उन्हें सलामी देकर सत्ता अपनी लोकप्रियता बढ़ाना चाहती है।
तमाम उपस्थित लोग बड़े खुश हुए मेरा उत्तर सुनकर। लेकिन इसके कुछ देर बाद राज्य सरकार के चार मंत्री उठकर चले गए। अभी अंत्येष्टि बाकी थी और इस तरह बीच में ही मंत्रियों का चला जाना राजकीय सम्मान में कमी करना था। अखबारों में इसकी चर्चा हुई।
- खगेन्द्र ठाकुर
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गुरुवार, 10 जून 2010

ऐतिहासिक विरासत की जन्मशती

सन् 1911 हमारे आधुनिक इतिहास में कई दृष्टियों से बहुत महत्वपूर्ण है। सन् 1905 में साम्प्रदायिक आधार पर बंगाल का बंटवारा अंग्रेजी सरकार ने किया था। इस फैसले के खिलाफ देश भर में आंदोलन छिड़ गया। ऐसा आंदोलन हुआ कि 1911 में सरकार ने बंग-भंग योजना वापस कर ली। यह हमारे राष्ट्रीय स्वाधीनता-संग्राम की पहली बड़ी विजय थी। लेकिन उसी समय बिहार को बंगाल से अलग राज्य बनाने का आंदोलन वल रहा था। 1911 में यह आंदोलन उफान पर था। फलतः 1912 में बिहार-उड़ीसा को बंगाल से अलग कर दिया गया। आगे चलकर 1911 देश के साहित्यिक- सांस्कृतिक इतिहास में इसलिए अत्यन्त महत्वपूर्ण हो गया कि सन् 1911 में जन्मे कई लोग इतने बड़े और महत्वपूर्ण रचनाकार हो गये कि साहित्य के इतिहास को नयी दिशा मिली, नयी ऊंचाई मिली। अब 2011 में हम उनकी जन्मशती मनाने की तैयारी में लग गये हैं।हम देश की अन्य भाषाओं के रचनाकारों के बारे में नहीं जानते, लेकिन हिन्दी के महान कविगण हैं- शमशेर बहादुर सिंह, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल और अज्ञेय। भाषा की और देश की सीमा को लांघकर पूरे भारतीय उपमहाद्वीप की जनता में अत्यंत लोकप्रिय फैज अहमद फैज की भी जन्मशती इसी वर्ष आ गयी है। इन महान रचनाकारों की जन्मशती मनाने का दायित्व हम पर उनको श्रद्धांजलि अर्पित करने की दृष्टि से नहीं, बल्कि इतिहास के द्वारा सौंपा गया है। एक विरासत के रूप में। क्या है यह विरासत? हम जो आज अपने जीवन में, लेखन में और समाज में लड़ाई लड़ रहे हैं, यह भी कह सकते हैं कि लड़ने को मजबूर हैं, उसे लड़ते हुए ही हम पीछे मुड़कर देखते हैं कि इस संबंध में हमारे पुरखों ने, हमारे पूर्व पुरुषों ने क्या किया है? हम देखते हैं कि जो लड़ाई हम लड़ रहे हैं, वही लड़ाई अपने समय में वे लड़ रहे थे। वे कुछ कर गये, कुछ बाकी रहा। इसे इतिहास की भाषा में यों कह सकते हैं कि ऐतिहासिक विकास के दौर में हमारे पुरखों ने कुछ उपलब्ध किया और कुछ बाकी रह गया। इतिहास ने जो प्राप्त किया, वह हमारी शक्ति है, जो नहीं उपलब्ध किया जा सका वह इतिहास का प्राप्य है, यानी उसे प्राप्त करना है। यह इतिहास का प्राप्य ही हमारी विरासत है। इसलिए विरासत कोई साधारण चीज नहीं है, वह बड़ी ऐतिहासिक जवाबदेही है। साहित्य में वह जवाबदेही इस रूप में आती है कि हमारे पूर्वज कवियों या लेखकों के बाद यथार्थ में जो नयापन आया, जीवन और समाज में विकास की गति से जो नये लक्षण प्रकट हुए, जो नयी समस्याएं आयीं, उन सबका मुकाबला करने, उन्हें प्रगति की दृष्टि से साहित्य में लाने का दायित्व बाद के कवियों-लेखकों पर आता है। हम पर वह उसी रूप में आया है। इस सबको चरितार्थ करने में हम कहां तक सफल हो पाये, यह देखना एक बात है, लेकिन आज जो लड़ाई हम लड़ रहे हैं, उसमें उनसे कितनी मदद मिलती है, यह भी हमें देखना है। इसी प्रक्रिया में विरासत तय होती है। इन कवियों ने अपने-अपने ढंग से छायावादोत्तर काल में युगांतरकारी भूमिका अदा की है। उन्होंने आमतौर से आगे की हिन्दी कविता के विकास का स्वरूप तय किया। इसीलिए हम उन्हें याद करते रहे हैं और अब उनकी जन्मशती मनाने की तैयारी कर रहे हैं। अतः इनकी जन्मशती मनाना कोई औपचारिक काम नहीं, एक दायित्व का निर्वाह करना है।शमशेर बहादुर सिंह तीन जनवरी 1911 को अपनी ननिहाल देहरादून में पैदा हुए। वे जन्मना जाट थे। 12 मई 93 को अहमदाबाद में उन्होंने अंतिम सांस ली जहां वे कई वर्षों से रंजना अरगड़े के साथ रह रहे थे। छायावादोत्त्तर काल के कवियों में, खासकर के शमशेर और नागार्जुन पर, निराला की लापरवाह जीवन पद्धति का असर दिखायी पड़ता है। नागार्जुन पर राहुल सांकृत्यायन का भी असर पड़ा, वे राहुल जी की संगति में रहे भी। सामाजिक दायित्व को ऐतिहासिक रूप से स्वीकार करते हुए, कविता के óोत के रूप में सामाजिक जीवन को मानते हुए भी छायावादी लापरवाही जीते देख कर हमें कुछ अचरज होता रहा है।शमशेर का जीवन बहुत उतार-चढ़ाव और ऊबाड़-खाबड़ भरा रहा है। यों उनके ननिहाल का वातावरण बहुत अच्छा था। वे कहते हैं - ‘ननिहाल का जो वातावरण था वह बड़ा शाइस्ता, बहुत ही सुसभ्य था, सभी अदब-कायदे सिखाए जाते थे और भाषण गलत नहीं बोलने दिया जाता था।’ इस वातावरण में शमशेर के बचपन में साहित्य और कला के संस्कारों का बीज पड़ा। शमशेर की मां उनके पिता की तीसरी पत्नी थी, वह भी 1920 में चल बसी, जब शमशेर मात्र नौ बरस के थे। पिता तारीफ सिंह अपने पुत्रों को कहानियां सुनाया करते थे। कहानियों में महाभारत, रामायण, अलिफ लैला, चन्द्रकांता संतति, भरतनाथ आदि जैसी कहानियां होती। शमशेर कबूल करते हैं इन कथाओं का रूमानी प्रभाव ही उन्हें कविता की तरफ ले आया। घर में सुधा, माधुरी, सरस्वती, मस्ताना जोगी आदि पत्रिकाएं मंगायी जाती थीं। बेशक इन पत्रिकाओं के पाठक थे शमशेर। इसका भी प्रभाव उनकी चेतना पर पड़ा। 1929 में एंटेªस पास करने के बाद शमशेर की शादी कर दी गयी। लेकिन कुछ साल बाद ही वे चल बसीं। पिता ने दूसरी शादी की बात चलायी, लेकिन शमशेर ने यह कह कर इन्कार कर दिया कि यदि मैं गुजर जाता, तो वह बेचारी जीवन भर वैधष्य झेलती रहती, फिर मैं क्यों उसे भूल कर शादी कर लूं। दूसरी शादी नहीं की। पिता ने गुस्से में घर से निकल जाने को कहा और वे निकल गये। निकल गये तो निकल गये। अपने प्रयत्न से बीए किया, एमए किया अंग्रेजी में। चित्र कला की शिक्षा भी ली। यहां पूरी जीवनी नहीं लिखी जा सकती।शमशेर कम्युनिस्ट आंदोलन के सम्पर्क में आये, मार्क्सवाद को पढ़ा और स्वीकार भी किया। उन्हीं दिनों उन्होंने मुंबई में कम्युनिस्ट पार्टी के केन्द्रीय कम्यून में रह कर ‘जनयुग’ में सम्पादकीय विभाग में काम किया। कुछ साल वहां रहे, फिर निकल गये।शमशेर हिन्दी के अपने ढंग के कवि थे। कह सकते हैं शमशेर जैसा दूसरा कवि नहीं। “दूसरा सप्तक” के कवियों में वे शामिल किए गए, लेकिन उम्र और रचना कर्म की दृष्टि से वे “तारसप्तक” में लिये जा सकते थे, पता नहीं क्यों नहीं लिया गया। एक किंवदंती है कि अज्ञेय ने नागार्जुन से तारसप्तक के लिए कविता मांगी थी, लेकिन उन्होंने कविताएं नहीं दीं। तारसप्तक की योजना, संकलन और प्रकाशन के बारे में काफी बातें हिन्दी आलोचना में हो चुकी हैं और यह स्पष्ट हो चुका है कि इसकी योजना मुक्तिबोध ने बनायी थी, लेकिन प्रकाशन की सुविधा के लिए अज्ञेय जी को तारसप्तक सौंप दिया गया। उसमें शामिल अधिकतर कवि उस प्रयोगवाद के विरोधी थे, जिसकी चर्चा ‘तारसप्तक’ के साथ होती रही। हालत यह है कि छायावादोत्तर कविता के इतिहास को समग्रता में देखने पर उसका महत्व क्षीण होता हुआ लगता है, क्योंकि तारसप्तक वास्तव में किसी प्रवृति का प्रवर्तक अब नहीं महसूस होता।हिन्दी कविता में शमशेर की स्थिति एक अर्थ में निराला की तरह दिखती है और वह अर्थ यह है कि वे लगभग सर्वमान्य कवि हैं, यानि उनकी कविताओं के प्रशंसक प्रगतिवादी, प्रयोगवादी, नयी कवितावादी, अकवितावादी आदि सभी हैं और उसके यानी बीसवीें सदी के आठवें दशक में और उसके बाद आये कवि भी उनके सामने नतमस्तक हैं। डा. रामविलास शर्मा ने उनकी ऐसी आलोचना जरूर की है, जो उनके अनुकूल नहीं। मैंने देखा कि प्रगतिशील लेखक संघ के जबलपुर अधिवेशन, 1980 में एक विचारगोष्ठी में, जिसके अध्यक्ष अमृत राय थे और संचालन मैं कर रहा था, विश्वम्भर नाथ उपाध्याय ने कह दिया कि शमशेर रेडियो पर अमुक का संगीत सुनकर कविता लिखने को प्रेरित होते हैं, तो शमशेर जी बोले तो कुछ नहीं, लेकिन उनका चेहरा तमतमा जरुर गया था। मुझे याद आता है कि एक बार दिल्ली में प्रलेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी समिति की बैठक ऐवाने गालिब में हो रही थी, उस समय महासचिव भीष्म साहनी थे। गोष्ठी के अंतराल में नागार्जुन, शमशेर और असमिया के प्रसिद्ध कवि मेरे साथ समय बिताने के लिए अजय भवन चले आये। मेरे कमरे में यह अंतराल गोष्ठी हो गयी। मैंने शमशेर जी से कहा कि जनशक्ति के लिए कविताएं दीजिए न! इस पर उन्होंने कहा- “यहीं मैं संकट में पड़ जाता हूं। मैं जो लिख रहा हूं, वह जनशक्ति के पाठकों के पल्ले तो पड़ेगा नहीं। क्या करूं, मैं शर्मिन्दा हूं।” एक प्रसंग और याद आता है। मैं एक बार भोपाल गया हुआ था। एक कवि मित्र ने डा. कमला प्रसाद से पीएचडी की उपधि के लिए काम करने के संबंध पूछा- किसी आधुनिक कवि पर काम करना चाहता हूं, सुझाव दीजिए। कमला जी ने कहा- ‘शमशेर पर कीजिए’। कवि मित्र ने कहा- नहीं भाई, शमशेर पर काम नहीं कर पाऊंगा, उनको तो समझना ही मुश्किल है। शमशेर के जो प्रशंसक, आलोचक और पाठक हैं, वे दो बाते कहते हैं- एक तो यह कि वे घोषणा करते हैं कि शमशेर प्रगतिशीलता से प्रतिबद्ध हैं लेकिन उनकी कविताएं प्रगतिशील या मार्क्सवादी विचारों से प्रभाव के मुक्त है।शमशेर के प्रिय कवि छायावादियों में निराला थे, प्रयोगवादियों में अज्ञेय और प्रगतिशीलों में नागार्जुन। लेकिन स्वयं शमशेर तीनों से अलग ढंग से कवि हैं, किसी ने शमशेर को मुक्त मन का कहा है, तो किसी ने युद्ध कवि। मैं पूछना चाहता हूं कि कोई आदमी मुक्त मन का हो सकता हैं? यदि कोई समाज से मुक्त होगा, तो भी क्या परिवार से, बच्चों से, उनकी समस्याओं से मुक्त हो सकता है? इनसे मुक्त होगा तो गैर-जवाबदेह होगा या फिर अदृश्य शक्ति को समर्पित हो कर मनुष्यत्व से ही मुक्त हो जाएगा। और युद्ध मनुष्य अथवा युद्ध कवि कैसे होगा? सामाजिक यथार्थ, राजनीतिक यथार्थ या मानवीय चिंतन से अलग मनुष्य अथवा कवि को कुछ लोग शुद्ध कवि कहते हैं। लेकिन क्या शमशेर ऐसे कवि हैं? शमशेर क्या कोई भी कवि शुद्ध होगा तो वह कवि ही नहीं होगा। शमशेर इन सबको पढ़ते तो शायद यही कहते- हमारे भी हैं ये मेहरबान कैसे-कैसे? यह सही है कि शमशेर दुरुह कवि हैं, लेकिन दुरुहता भाषागत नहीं, अंतर्वस्तुगत है। उनकी अभिव्यक्ति में जो पेचीदगी दिखायी पड़ती है, वह उनकी काव्य चेतना से बनती है। उनके प्रशंसकों ने उनकी दुरुहता को स्वीकार किया है और ऐसे विद्वानों ने उन पर जो लिखा है, वह प्रायः प्रभववादी आलोचना हो गयी है। यहां इतना कह कर उनका प्रसंग समाप्त करता हूं कि उनकी अंतर्वस्तु का भेद खुल जाने पर हम पाते हैं कि वे प्रगतिशील चेतना से अलग नहीं है। उनकी काव्य चेतना समष्टिवादी है, व्यक्तिवादी नहीं। यों एक बात और शमशेर पर लिखने वालों को पढ़कर मुझे कहने का मन करता हैं कि शमशेर के कवि व्यक्तित्व को ऐसा आतंक या दबदबा उनके पाठकों और आलोचकों पर है कि कोई सही ढंग से सही समझ नहीं पाता। शायद जन्मशती से संबंधित आयोजन के जरिये उनको समझने का नया प्रयत्न हो। शमशेर ने जिस राजनीति को स्वीकार किया उससे उन्हें तब निराशा भी हुई, जब उसमें उन्हें असंगति दिखयी पडी। वे एक शेर में कहते हैं -“राह तो एक ही थी हम दोनों कीआप किधर से आये-गयेहम यहां लुट गए पिट गयेआप राजभवन में पाये गये।”नागार्जुन का जन्म दरभंगा जिले के तरौनी गांव में हुआ। वर्ष 1911 में ही। वे कहते थे- ज्येष्ठ पूर्णिमा को। तारीख नहीं बताते थे। कबीर का भी जन्म ज्येष्ठ पूर्णिमा को ही हुआ था। इस बार ज्येष्ठ पूर्णिमा चौबीस जून को पड़ेगी। आधुनिक कबीर की जन्मशती का प्रारम्भिक दिन। नागार्जुन को लम्मीकांत वर्मा ने अपने एक लेख में ‘फौजी कवि’ कहा। इसके दो अर्थ हो सकते हैं- एक तो लड़ाकू और हर समय लड़ने को तत्पर रहना, दूसरे किसी के कमान पर लड़ने जाना। कहने का तात्पर्य यह कि नागार्जुन स्वाभाविक कवि नहंी हैं। मुक्त कवि नहीं हैं, नागार्जुन स्वयं अपने को ‘जन कवि’ और प्रतिबद्ध कहते हैं। एकाध अपवाद को छोड़कर प्रायः सभी मानते हैं कि नागार्जुन हिन्दी के अकेले कवि हैं, जो श्रेष्ठता और जनप्रियता में संतुलन बिठा सके हैं। यह गुण उस दौर के किसी और कवि में नहीं है। यहरं फिर शमशेर याद आ गये। अरुण कमल ने स्त्री-देह के प्रति उनकी उत्कंठा को जो उदाहरण दिया है, वह किसी सामान्य नहीं सम्भ्रांत स्त्री का शारीरिक सौन्दर्य है। मैं कहना चाहता हूं कि जिसके मन में स्त्री-देह के प्रति आकर्षण होता है, वह किसी एक दो नहीं सामान्यतः तमाम स्त्रियों की देह के प्रति होता है। दूसरी बात यह कि जयशंकर प्रसाद ने ‘कामायनी’ में ऐसे ठोस सौन्दर्य का बिम्ब कई जगह खींचा है और वह शालीन सौन्दर्य से भरा है। नागार्जुन के यहां ऐसे सौन्दर्य बिम्ब का अभाव है। उनकी दृष्टि जीवन की विभिन्न अवस्थाओं पर ज्यादा रहती है। होठ और सीने के उभार तथा जांघों की नदी के बदले पेट और सीने की हड्डियों को देखते हैं, ऐसे लोगों के जीवन के भवितव्य पर वे नजर डालते हैं और उसमें हस्तक्षेप करते हैं। महात्मा गांधी ने प्रेमचंद के बारे में एक बार कहा कि यदि इस दौर का इतिहास खो जाए, तो प्रेमचंद के कथा-साहित्य के आधार पर इतिहास फिर से लिखा जा सकता है। यह बात जरा सी बदल कर नागार्जुन की कविताओं के बारे में कही जा सकती है कि यदि स्वातंत्रयोत्तर भारत का राजनीतिक इतिहास लिखना हो तो नागार्जुन की कविताओं के आधार पर लिखा जा सकता है। उनके उपन्यास इसमें मददगार साबित होंगे। यों यह कहा जा सकता है कि नागार्जुन के उपन्यासों में मिथिला की परम्परागत संस्कृति तो व्यक्त हुई ही है, इस संस्कृति की सदियों के खिलाफ संघर्ष के माध्यम से एक नयी संस्कृति के निर्माण की रूपरेखा भी उसमें मिलती है। नागार्जुन अथवा यात्री की वैकल्पिक संस्कृति का स्वरूप सामन्तवादी और पूंजीवादी समाज को बदल कर समाजवादी संस्कृति के रूप में बताता हैं। नागार्जुन का बलचनबा प्रेमचंद के गोबर का अगला विकास दिखाई पड़ता है। ‘यात्री’ नाम से वह मैथिली में कविताएं लिखते रहे हैं। उनकी पहली मैथिली कविता 1929 में छपी थी। बौद्ध बन जाने पर उनका नाम नागार्जुन रखा गया। प्रायः दो हजार साल पहले बौद्ध परम्परा में नागार्जुन नाम का एक दार्शनिक हुआ था। वही धारण करके वैद्यनाथ मिश्र नागार्जुन हो गये और हिन्दी, संस्कृत, बंगला और सिंहाली में कविताएं तथा अन्य विधाओं में रचनाएं करते रहे। यह बेशक कहा जा सकता है कि यात्री ने मैथिली साहित्य की विकास धारा को नया मोड़ दिया, यानी नयी मानसिकता, नयी अंतर्वस्तु दी। उसे पूरी तरह से नया मिजाज दिया और मैथिली में नये युग का सूत्रपात किया। एक तरफ वे मिथिला की चेतना को मिथिला से बाहर ले गये, दूसरी तरफ बाहर के जीवनानुभवों को ठेठ मैथिली में चित्रित करते हैं। नागार्जुन की रचनाओं में राजनीति और व्यंग्य संस्कार की तरह घुले हुए हैं। यहां यह कह देना जरूरी है कि संस्कार का संबंध किसी पूर्वजन्म से नहीं होता, क्यांेकि कोई पूर्व जन्म या पुनर्जन्म होता ही नहीं है। गीता में भी कहा गया है -जन्मया जायते शुद्रःसंस्कारद्विजुच्येते।जन्म से सभी शुद्र होते हैं, संस्कार से कुछ लोग द्विज कहे जाते हैं। अतः संस्कार अर्जित किये जाते हैं, और उससे व्यक्तित्व में परिष्कार होता चलता है। इसी तरह राजनीतिक चेतना और व्यंग्य दोनों ही नागार्जुन ने अपने संघर्ष और साहस से अर्जित किये। यहां यह कहना प्रासंगिक होगा कि जैसे मध्यकाल में मनुष्य के जीवन का असंतोष और विद्रोह-भाव धर्म के जरिये व्यक्त होते थे, उसी तरह आधुनिक युग में जनता की ऐतिहासिक कार्रवाइयों के द्वारा, जनता के सड़कों पर संघर्ष के लिए उतर जाने के कारण राजनीतिक चेतना, संघर्ष-चेतना और व्यंग्य की भाषा में कविता बोलने लगी। यह कविता के इतिहास में नयी कविता के रूप में सामने आयी, वह नयी कविता नहीं जो छठे दशक में प्रयेागवादियों के द्वारा लिखी गयी। नागार्जुन ने छायावादी कविता को निशाना बना कर कहा- “कुहासे सी भाषा,न सांझ की न भोर की।”यह कविता के रहस्य बन जाने पर चोट है, उसे रहस्यात्मकता से मुक्त करने का आह्वान उसमें है। इसी तरह प्रयोगवादियों को लक्ष्य करके नागार्जुन ने कहा-‘भिंचा-भिंचा है हृदय तुम्हारा,आओ उस पर लोहा कर दें।’अतः नागार्जुन को याद करने का मतलब है, सामाजिक बदलाव के लिए जन-कारवाई में शामिल होना और मनुष्य की रचनाशीलता को नया तेवर देना। भारतेंदु को नागार्जुन ने ‘जनभाषा लिखवैया’ कहा है। स्वयं नागार्जुन ने भी वही किया है। आधुनिकीकरण और जनतंत्रीकरण की प्रक्रिया में जन चेतना और जन कार्रवाई का कोई पहलू उनसे नहीं छूटा है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नाजिम हिकमत, पाबलो नेरुदा, लोर्का, ब्रेख्त आदि से उनकी संगति बैठती है। जन कविता की एक नयी कोटि अस्तित्व में नागार्जुन के जरिये हिन्दी में और यात्री के जरिए मैथिली में आयी। नागार्जुन और यात्री को याद करने का अर्थ है इतिहास की इस महान परम्परा का नया अध्याय लिखना। मुझे यह कहते हुए अफसोस हो रहा है कि नागार्जुन को धीरे-धीरे भुलाने की कोशिश की जा रही है। आज के यानी पिछले पच्चीस-तीस वर्षों के बीच आये कवि रघुवीर सहाय और धूमिल की जितनी चर्चा करते रहे हैं, उतनी नागार्जुन की नहीं। मैं बेहिचक कहना चाहता हूं कि रघुवीर सहाय और धूमिल की कविताओं ने जो हलचल मचायी, वह देश में मध्यवर्ग के द्वारा लोहियावाद की नकारात्मक राजनीति की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है। इस पर नये सिरे से विचार करने की जरूरत है। मुक्तिबोध और नागार्जुन की काव्य चेतना का भी तुलनात्मक अध्ययन करना जरुरी है। मुक्तिबोध की कविताओं में पूंजीवादी व्यवस्था और शासन का जो आतंक चित्रित है, वह नागार्जुन में नहीं हैं, क्योंकि उनकी कविताओं को पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि कवि की अपनी कार्रवाई के अनुभवों से कविता बनी है। पूंजीवादी व्यवस्था और शासन समाज में आतंक तो फैलाते हैं, लेकिन उस आतंक के खिलाफ संघर्ष में शामिल होने से आतंक टूटता है। इसके प्रमाण में नागार्जुन की ये दो पंक्तियां काफी हैं-”जली ठूंठ पर बैठ करगयी कोकिला कूकबाल न बांका कर सकीशासन की बन्दूक।“नागार्जुन के यहां तो कभी-कभी शासन को ही भयभीत होते देखते हैं-”वह अकाल वाला थाना पड़ता है काफी दूर“ को पढ़कर देखें। नागार्जुन ने अपनी जीवन यात्रा का अंत पांच नवम्बर 1998 को किया।केदारनाथ अग्रवाल एक अप्रैल 1911 को पैदा हुए। वे बांदा में रहते थे और वहां वकालत करते थे। वे वहां प्रतिष्ठित वकील थे और कहते थे कि अदालत के आईने में ही उन्होंने समाज का चरित्र देखा, यह देखा कि हमारा समाज कितना अन्यायपूर्ण है। केदार बाबू युवावस्था में ही प्रगतिशील लेखक संघ के सम्पर्क में आये। फिर डा. रामविलास शर्मा से भी सम्पर्क हुआ। वे स्वीकार करते हैं कि इन परिचयों ने उनकी मानसिक बनावट और रचनाशीलता को प्रभावित किया, उसे नयी दिशा में प्रवाहित करने में योगदान किया। इसी प्रक्रिया में वे मार्क्सवाद के समीप पहुंचे, उसे पढ़ा और स्वीकार किया। यहां उल्लेखनीय है कि मार्क्सवाद को तो प्रायः सभी प्रगतिशील कवियों और लेखकों ने अपनाया, लेकिन सबने उसे एक ही तरह से नहीं बरता। शमशेर ने भी मार्क्सवाद को स्वीकार किया, कुछ दिन पार्टी कम्यून में रह कर काम भी किया, कई कविताएं कम्युनिस्ट आंदोलन की घटनाओं और व्यक्तियों पर लिखीं, फिर भी जीवन-अनुभूतियों एवं संवेदनाओं को ऐसी संश्लिष्ट और जटिल अभिव्यक्ति दी कि वहां मार्क्सवाद से कोई सम्पर्क दिखायी नहीं पड़ता। नागार्जुन ने भी मार्क्सवाद को अपनाया, अनेक किसान आंदोलनों में भाग लिया, जेल गये, फिर भी कविताओं की अन्तर्वस्तु वे दृश्य जगत के सम्पर्क से प्राप्त करते हैं, यहां तक कि राजनीतिक व्यक्तियों पर लिखित कविताओं की भी। लेकिन वे कम्युनिस्ट पार्टी और नेताओं की गतिविधियों को क्रांतिकारी परिवर्तन की दृष्टि से शंका की नजर से देखते हैं। केदारनाथ अग्रवाल समाज के क्रांतिकारी परिवर्तन के बारे में मार्क्सवाद के ऐतिहासिक निर्णय को स्वीकार करके चलते हैं। इस सरलीकरण का प्रभाव उनकी अनेक कविताओं पर है। इसके अलावा मनुष्य की समाजिक पीड़ा और उसके दूर करने की दृष्टि से मनुष्य के पुरुषार्थ पर उनको विश्वास एवं भरोसा है। ‘घर में एक हथौड़े वाला और हुआ’ शीर्षक कविता इस लिहाज से महत्वपूर्ण है। इसी कविता में आगे चलकर वे कहते हैंः “हाथी सा बलवाल जहाजी हाथों वाला और हुआ।इसके अलावा उन्हें मनुष्य की सामाजिक पीड़ा और उसको दूर करने की दृष्टि से मनुष्य के पुरुषार्थ पर विश्वास एवं भरोसा है। “घर में एक हथौड़े वाला और हुआ” शीर्षक कविता इस लिहाज से महत्वपूर्ण है। इस कविता में आगे चल कर वे कहते हैं:”हाथी सा बलवान जहाजी हाथों वाला हुआसुन लेगी सरकार कयामत ढाने वाला और हुआ।“वे कविता को भी एक शक्ति मानते है, मानवीय शक्ति। वे कहते हैं कि-“जीवन ने मुझको जब-जब तोड़ा,हमने कविता से नाता जोड़ा।”यह ऐतिहासिक रूप से सही है कि कविता जीवन को शक्ति देती है। हां, सभी तरह की कविताएं नहीं, देखने की बात यह है कि कविता में कैसा मनुष्य चित्रित है। एक कविता में वे कहते हैं-वह जन मारे नहीं मरेगाजीवल की धूल चाट कर जो बड़ा हुआ है।इसका प्रतिलोम सोचें तो पता चलेगा, कि जो आरामतलब है और अकेला है, वह टूट जाता है। एक और कविता में केदार कहते हैं-हम बड़े नहींफिर भी बड़े हैंइसलिए कि लोग जहां गिर पड़े हैंहम वहां तने खड़े हैं.................................काल की मार मेंजहां दूसरे झरे हैंहम वहां अब भीहरे के हरे हैं।केदार की कविताओं में एक नया आदमी दिखायी पड़ता है, जो कवि की चेतना और संघर्षशीलता के प्रभाव से रूप लेता है। एक छोटी सी कविता में केदार कहते हैं-तेज धार का कर्मठ पानीमार रहा है घूंसे कस करतोड़ रहा है तट चट्टानीकेदार की कविताओं का मूल व्यक्तित्व यही है-तेज धार का कर्मठ पानी।केदार के बारे में नागार्जुन ने उन पर लिखी कविता में कहा है-कालिंजर का चौड़ा सीना वह भी तुम हो,केन कूल की कानी मिट्टी, वह भी तुम हो,काल रात्रि में लाठी लेकर खेतों कीकरता जो रखवाली वह भी तुम होइसी तरह की पंक्तियों से नागार्जुन ने केदार के कवि व्यक्तित्व को बड़े सही रूप में व्यंजित किया है। एक कविता में वे कहते हैंःरनिया मेरी देश बहन है।रनिया एक मेहनतकश परिवार की युवती, उससे कवि बहनापा जोड़ता है, इस आधार पर कि वह इसी देश की मिट्टी पर पली-बढ़ी है कवि की तरह ही। रिश्ते का इससे ठोस आधार और क्या हो सकता है? केदार की कविताओं का फलक बहुत व्यापक है, विविधतापूर्ण है। नये-नये बिम्बांे और नये-नये प्रसंगों से हिन्दी कविता को कवि ने समृद्ध किया है। मानव प्रकृति से लेकर मानेवतर प्रकृति तक केदार की कविता फैली हुई है। अपनी जमीन से, अपनी जनता से, और अपनी मिट्टी से कवि का स्वाभाविक और घनिष्ठ संबंध है। न्याय के लिए संघर्ष और प्रेम के लिए ललक उनकी कविताओं का सार तत्व है। जीवन के आखिरी वर्षों में उन्होंने दिवंगता पत्नी को ध्यान में रख कर अनेक गीत लिखे, जो ‘हे मेरी तुम’ के नाम से संग्रहित हैं। लेकिन केदार पाठकों के द्वारा और कविता के इतिहास में अपने रचना काल के पूर्वार्द्ध में लिखित कविताओं के कारण ही जाने जाते हैं। केदार की विरासत हम तक और आगे की पीढ़ियों तक उन्हीं कवितओं के माध्यम से पहुंचेगी। इसके साथ ही शिल्प-शैली और भाषा के निजत्व के कारण भी वे याद किये जाएंगे। नामवर जी ने बहुत पहले कहीं लिखा था कि केदार की कविताओं को पढ़ कर कलेजा ऊंचा हो जाता है। आज जब नयी पीढ़ी में व्यावसायत्मिका प्रवृत्ति विकसित की जा रही है, तब हमारा दायित्व और कर्तव्य होता है कि प्रगतिशीलता और मानवता के लिए संघर्ष करते हुए इन परवर्ती साहित्यकारों ने जो नया सौन्दर्यबोध हमें दिया है, उसे नयी पीढ़ी की चेतना में प्रविष्ट कराने का अभियान चलाएं। यदि जन्मशती मनाते हुए हम इस दिशा में कुछ कर सके, तो यह संस्कृति के क्षेत्र में ऐतिहासिक काम होगा।प्रगतिशील आंदोलन और कविता के विकास में फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’ का योगदान और महत्व सबसे अलग है। जब सज्जाद जहीर इंग्लैंड से लौटे और हिन्दुस्तान में प्रगतिशील लेखक संघ के गठन की कोशिश में लग गये, तो इसी क्रम में अमृतसर डॉ. महमूदद़ जफ़र के यहां पहुंचे तो वहीं अंग्रेजी के युवा अध्यापक फै़ज़ अहमद ‘फै़ज़’ से उनकी मुलाकाल हुई और बातचीत के क्रम में मालूम हुआ कि फ़ैज़ तो पहले ही से वहां प्रगतिशील लेखक संघ या ‘अंजुमन तरक़्क़ीपसंद मुसन्नफ़ीन’ बनाने की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने कुछ लेखकों की सूची भी बना रखी थी। सज्जाद जहीर मन में सोचने लगे- अरे, यहां मेरे बिना ही और मुझ से पहले से अंजुमन बनाने की तैयारी है। वे चकित भी हुए और प्रसन्न भी। यही फै़ज़ आगे चलकर भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे बड़े शायरों में शुमार किये गये, आज भी किये जा रहे हैं। उन्होंने उन्हीं दिनों वह नज़्म लिखी थी, जिसकी ये पंक्तियां तब से अब तक समाज और जिन्दगी के ही नहीं इतिहास के नये तकाजे का इजहार करती हुई उद्धत की जाती रही हैं-मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग।मैंने समझा था कि तू है तो दरख्शां है हयात,तेरा गम है तो गम-ए-दहर का झगड़ा क्या हैइन पंक्तियों में यह बात कही गयी है कि प्रेमिका की मुहब्बत के बारे में पुरानी समझ गलत साबित हो गयी। समझ यह थी कि तेरा गम है, तो सांसारिक दुख का क्या मतलब? लेकिन आज की असलियत यह है कि-और भी दुख हैं जमाने में मुहब्बत के सिवाराहते हैं और भी वस्ल की राहत के सिवा।मुहब्बत करने से जो गम मिलता है, वह तो है ही, लेकिन गम और तरह के भी हैं। गम की नहीं मिलन के सुख के अलावा सुख भी और तरह के हैं।ं व्यापक नजरिया अनुभव से तो आता ही है, तरक्की पसंद तहरीक से भी आता है। हिन्दी के श्रेष्ठ कवि दिनकर (जिनकी जन्मशती हम हाल में मना चुके हैं) ने एक गीत में लिखा है-माया के मोहक वन की क्या कहूं परदेशीभय है हंस दोगे सुन कर मेरी नादानी परदेसी।जब देश गुलाम हो और गुलामी के खिलाफ आर-पार की लड़ाई चल रही हो तो माया के मोहक वन की कहानी नादानी ही कही जाएगी।“सोच” शीर्षक एक नज़्म में फ़ैज़ कहते हैं कि‘तेरा दिल गमगीं है तो क्यागमगीं ये दुनिया सारी है।’लेकिन वे यह भी कहते हैं कि गम तो हर हालत में घातक है, उसे खत्म होना चाहिए। गम के खिलाफ जंग छेड़ते हैं फैज। दुनिया में जो दौलत वाले सुखी लोग हैं, उनका सुख बांटना चाहिए। इसी नज्म के अन्तिम बंद में वे कहते हैं-हमने माना जंग कड़ी हैसर फूटेगा, खून बहेगाखून में हम भी बह जाएंगेहम न रहेंगे, गम न रहेगा।गम जितना कठिन है, उसके खिलाफ लड़ना जितना कठिन है, उतना ही कठिन है गम को नष्ट करने का फैज का संकल्प।भारत बंट गया, बंटने से एक नया देश पाकिस्तान बना। आगे चल कर पाकिस्तान भी बंट गया और पूर्वी पाकिस्तान हो गया बांगलादेश, फैज ने यह सब देखा।फैज 1911 में अविभाजित पंजाब के स्यालकोट में पैदा हुए थे। बंटवारे के बाद उनकी जन्मभूमि पाकिस्तान में चली गयी। देशभक्त फैज पाकिस्तान में रहे। लेकिन फैज पर भोपाल में आयोजित बहुत बड़े समारोह को संबोधित करते हुए शिव मंगल सिंह सुमन ने कहा-‘फैज को बांट दो तो समझे।’ जाहिर है कि फैज का व्यक्तित्व आज भी भारत के जनगण को प्रिय है। आज भी यहां की जनसभाओं में मेहनतकशों के पक्षधर फैज का गीत गाते हैं-हम मेहनतकश जगवालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे।एक ख्ेात नहीं एक देश नहीं हम सारी दुनिया मांगेंगेऔर इस देश के अदीबों के लिए तो वे जितने ही अपने हैं, उतने निराला, नागार्जुन या और कोई और जितने रवीन्द्रनाथ, विष्णु दे, सुभाष मुखोपाध्याय या कोई और जितने वल्लातोल, सुब्रहमण्य भारती और श्री श्री या जितने विन्दा करन्दीकर या कोई और। फैज देशभक्त होने के साथ ही जनतंत्र के लिए भी कुर्बान होने को तत्पर रहते थे। जनतांत्रिक व्यवस्था के बिना देश के साथ क्या अपनापन। लेकिन फैज को अपने देश में जनतंत्र नहीं मिला। तानाशाही का प्रहार वे लगातार देखते रहे। वे एक नज्म में किस दर्द के साथ लिखते हैं यह देखिए-निसार मैं तेरी गलियों के ऐ वतनके जहां चली है रस्म के कोई न सर उठा के चलेजो कोई चाहने वाला तवाफ को निकलेनजर चुरा के चले जिस्मों जां बचा के चले।लेकिन फैज यह जानते-समझते हैं कि जनता तानाशाही को बर्दाश्त नहीं कर सकती, वह तो जनतंत्र के लिए न्यौछावर होती है। उसी नज्म में फैज कहते हैं-यूं ही हमेशा उलझती रही है जुल्म से खल्कन उनकी रस्म नयी है न अपनी रीत नयी,यूं ही हमेशा खिलाये हैं हमने आग में फूलन उनकी हार नयी है न अपनी जीत नई।फैज जनतंत्र के साथ मनुष्यता की खोज करते हैं और मनुष्यता उनकी नजर में है दूसरों के दर्द को अमानत के रूप में कबूल करना। यह ऐसी चीज है, ऐसी इंसानियत है, जो नाबराबरी वाले समाज में नहीं मिलती। वे एक रूबाई में कहते हैं -मकतल में न मस्जिद न खराबात में कोईहम किसकी अमानत में गम-ए बार--ए जहां देंशायद कोई उनमें से कफन फाड़ के निकलेअब जायें शहीदों के मजारों पे अजां देंकैसा भयानक समाज है यह, कैसा दर्दनाक अनुभव है; यहां कोई धर्मस्थलों में भी दूसरों के दर्द को बांटने वाला नहीं मिलता। लेकिन कोई फैज हर हालत को झेलने के लिए तैयार रहे हैं।वे प्रेम के भी कवि हैं, लेकिन प्रेम भाव को वे कहां तक ले जाते हैं, यह देखिए-गम-ए-जहां हो, रुख-ए-यार हो के दस्ते अदूसलूक जिससे किया हमने आशिकाना किया।यहां आशिकाना का उदात्तीकरण किया है फैज ने। यह आशिकाना केवल प्रेमिका या प्रेम के लिए नहीं, दुनिया में मिलने वाले गम और दुश्मन के हाथ के लिए भी है। ऐसे ‘आशिकाना’ का इजहार करने वाला फैज ही कह सकता है -मुकाम फैज कोई राह में जंचा ही नहींजो कूए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले।ऐसे फैज को याद करना भी कोई मामूली बात नहीं है। लेकिन हम उन्हें याद कर रहे हैं। फैज की शायरी मनुष्य को ताकत देती है, रास्ता दिखाती है।अज्ञेय यानी सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन। जैनेन्द्र ने एक कहानी प्रेमचंद के पास ‘हंस’ में छपने के लिए भेज दी, लेकिन उसमें लेखक का नाम नहीं था। प्रेमचंद ने पूछा- कहानी का लेखक कौन है? जैनेन्द्र ने शायद यह कहा कि वह अपना नाम नहीं देना चाहता। तो फिर प्रेमचंद ने ही अज्ञेय नाम देकर कहानी छाप दी और स.ही. वात्स्यायन का नाम साहित्य में अज्ञेय हो गया। अज्ञेय का जन्म 1911 में ही हुआ। उनका जीवन विविधता पूर्ण कामों से भरा हुआ है। फौज में काम किया, फिर वहां से मुक्त होकर साहित्य में आये। अपने फौजी जीवन का संस्मरण भी उन्होंने लिखा है। साहित्य में आने के बाद कुछ दिनों तक प्रगतिशील लेखक संघ से भी जुड़े रहे थे। लेकिन प्रगतिशील उन्हें रास नहीं आयी। जो हो, उन्होंने साहित्य के इतिहास में अपनी पहचान अपने लेखन के जरिये बनायी। अज्ञेय से मतभेद होना सहज और स्वाभाविक है, उसी तरह जैसे स्वयं अज्ञेय का प्रगतिवादी साहित्य और प्रगतिशील आंदोलन से मतभेद होना सहज और स्वाभाविक है। मतभेद हो सकता है, लेकिन कोई भी उनकी उपेक्षा नहीं कर सकता। मुझे कई बार अज्ञेय से मिलने, बातें करने और उनका व्याख्यान सुनने का सुअवसर मिला। इसके बावजूद मैं यह नहीं कह सकता कि मेरा उनसे परिचय था। वे बहुत कम बोलते थे। वे अच्छे वक्ता थे, वक्तृत्व कला की दृष्टि से , यह भी कहा जा सकता है कि वे अच्छे श्रोता भी थे। उन्होंने उपन्यास, कहानी और कविता तीनों क्षेत्रों में महत्वपूर्ण लेखन किया। ‘शेखर एक जीवनी’ ऐसा उपन्यास है जो हिन्दी के श्रेष्ठ उपन्यासों में गिना जाता है। यह ध्यान देने की बात है कि यह उपन्यास तब लिखा और प्रकाशित किया गया, जब अपना देश स्वाधीनता के लिए निर्णायक लड़ाई लड़ रहा था। गांधी जी ने ‘करो या मरो’ का नारा देश को दिया। दिनकर उन्हीं दिनों लिख रहे थे-लहू में तैर-तैर के नहा रही जवानियांनये सुरों में भिंजिनी बजा रही जवानियांउसी समय अज्ञेय जी का शेखर इस पूरे माहौल से अलग रहता है, छात्रावास के अपने कमरे में बैठा रहता है, निकलता है तो नदी किनारे या किसी पार्क के कोने में जा कर बैठा रहता है, या फिर डी.एच. लारेंस की कविताएं पढ़ता है, जिनमें जीवन की अग्रगति के लिए कोई प्रेरणा नहीं है। उनका एक उपन्यास ‘अपने-अपने अजनबी’ का पात्र चारों तरफ बर्फ गिरते हुए देखकर दरवाजें बंद कर घर में बैठ जाता है और बर्फ पिघलने की प्रतीक्षा करता है। स्वयं इस विषय स्थिति का सामना करने का उपक्रम नहीं करता। अज्ञेय की समग्र रचनात्मक चेतना का प्रतिनिधित्व करने वाली यह कविता है -हम नदी के द्वीप हैं.................................हम धारा नहीं है।स्थिर समर्पण है हमाराहम सदा के द्वीप हैं óोतस्विनी के।किन्तु हम बहते नहीं हैं।क्यों कि बहना रेत होना हैहम बहेंगे तो रहेंगे ही नहीं।यह अस्तित्ववादी दर्शन की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है। कवि मनुष्य को बताता है कि अपने अस्तित्व की रक्षा पहले करनी चाहिए, सामाजिक जीवन की धारा में बहना ठीक नहीं है। अज्ञेय आधुनिक कवि हैं, लेकिन उनकी आधुनिकता अस्तित्वाद और पूंजीवाद की लक्ष्मण रेखा को नहीं लांघती।अज्ञेय का एक निबंध संग्रह 1945 में ही छपा था ‘त्रिशंकु’ नाम से। उसमें प्रकाशित एक लेख में कहते हैं- “साहित्य में प्रगतिशीलता की मांग करने वाले प्रायः एक मौलिक सत्य को भूल जाते हैं। प्रगतिशीलता कहां से उत्पन्न होती है, इसकी परीक्षा करने से पहले एक और बात जानना जरूरी है कि साहित्य-कोई भी कला कहां से उत्पन्न होती है। कला के मूलोदभव की जांच करें तो स्पष्ट हो जाएगा कि प्रगतिवाद का सिद्धांत राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्र में भले ही स्वीकार हो सके, साहित्य, साहित्य सृष्टि के क्षेत्र में अस्वीकार्य ही रहेगा।” (त्रिशंकु. पृ. 76)। असल में अज्ञेय जी यह बात भूलते रहे कि स्वयं उनका शेखर, शशि, भुवन, रेखा आदि समाज से ही उठाये गये हैं। हमारा समजा बहुढांचीय है, बहुस्तरीय है, इसलिए उसमें होरी, गोबर और बलचनामा है, तो शेखर और भुवन और रेखा भी हैं। प्रेमचंद, यशपाल, नागार्जुन आदि के साहित्य का यथार्थ एक तरह का है, तो अज्ञेय और जैनेन्द्र के साहित्य का यथार्थ दूसरी तरह का। लेकिन यथार्थ तो दोनों में है। अज्ञेय ने साहित्य और सामान्य जन-जीवन के संबंध का, साधनहीनों के पक्ष की राजनीति का, विषम और अन्यायपूर्ण मानव-संबंध को बदलकर न्यायपूर्ण बनाने का संघर्ष का साहित्य में विरोध करने का दायित्व अपने ऊपर ले लिया था, अतः इस रूप में उनको अवश्य याद करना चाहिए और नये सिरे से समझने की कोशिश करनी चाहिए।अज्ञेय ने साहित्य को राजनीति से अलग रखने की बात कही, लेकिन वत्सलनिधि की ओर से “जय जानकी जीवन यात्रा” का आयोजन अपने नेतृत्व में करके उन्होंने देश के दायें बाजू की राजनीति को राम जानकी रथयात्रा निकालने की मशाल दिखायी। सम्पूर्ण क्रांति के पक्ष में उन्होंने कविता लिखी जो “महावृक्ष के नीचे” में संकलित है। यों उनकी अनेक कहानियां और अनेक कविताएं ऐसी तो है ही, जो मानव मूल्य को व्यक्त करती हैं। उनकी ‘शरणदाता’ कहानी और ‘इतिहास की हवा’ जैसी कविता मानव-मूल्य के लिए मशहूर हैं। इन बड़े रचनाकारेां ने जिस सदी में अपना साहित्य रचा, वह स्वतंत्रता, समानता, जनतंत्र, वैज्ञानिक बुद्धि आदि के विकास के लिए भीषण संघर्षों, महायुद्धों और भ्रांति के लिए तड़प की सदी रही है।पिछले बीस पच्चीस वर्षों में हिन्दी कविता का विकास हुआ है और जिन कवियों के माध्यम से विकास हुआ है, उन पर जब हम गौर करते हैं, हमें थोड़ी निराशा होती है यह देखकर कि उनमें यह विचार कर रहा है कि किसी आंदोलन और विचारधारा से प्रभावित कविता श्रेष्ठ नहीं होती। मैं यह नहीं कहना चाहता कि कवियों को उसी तरह आंदोलन में उतर जाना चाहिए जैसे राहुल जी उतरे थे, नागार्जुन उतरे थे। केदारनाथ अग्रवाल प्रतिबद्ध कविताएं जरूर लिखते रहे, उनसे प्रेरणा भी मिलती रही है, लेकिन वे जीवन में राजनीति कर्मी नहीं थे। शमशेर कुछ वर्षो तक राजनीतिकर्मी थे, बाद में नहीं। मैं लिख चुका हूं कि उनकी कविताओं से संगति बैठाना कितना कठिन है। फैज तो प्रायः जीवन भर कवि और राजनीतिकर्मी भी रहे, वह भी तानाशाही का मुबाकला करते हुए। आज के युवा कवियों में समाज के प्रति सद्भावना तो है, मानव चेतना तो है। कविता हो या मनुष्यता, संवेदना हो या केवल वेदना उन सबकों कविता में स्थान देते हुए वे अच्छी चीजों और बातों के बचे रहने की आशा और आकांक्षा व्यक्त करते हैं। वे कहते या लिखते हैं कि कविता बची रहेगी, संवेदना बची रहेगी, बचा रहेगा प्रेम। वे इन सबके खरीदारों की पहचान करते हैं, लेकिन यह सब कैसे बचा रहेगा, कौन बचाएगा उन्हें, स्वयं कवियों की कोई भूमिका इसमें होगी या नहीं, इन सबके बारे में आज के युवा कवि प्रायः मौन रहते हैं, या कतरा जाते हैं। जनता किसी न किसी रूप में संघर्ष में है, लेकिन जन कार्रवाई का चित्रण आज भी कविताओं में प्रायः नहीं दिखायी पड़ता है। यह युग ऐसा है, जिसमें चमत्कारों और चमत्कारी लोगों को समाज में बहुत मान मिलता है। यही कारण है कि आज के युवा ‘शार्ट-कर्ट’ से सिद्धि और प्रसिद्धि के चमत्कारी शिखर पर पहुंचना चाहते हैं। आज सुविधा ऐसी है कि सिद्धि के बारे में तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन प्रसिद्धि के लिए बहुत जद्दोजहद नहीं करनी पड़ती। आज पत्रिकाएं बहुत हैं, कुछ रचनाएं छपा कर ही समस्त हिन्दी क्षेत्र में प्रसिद्धि तो मिल ही जाती है। लेकिन जनता और जन आंदोलन से उनका लगाव कमजोर पड़ा है। साहिर लुधियानी ने कभी कहा था कि ‘वह सुबह हमीं से आएगी।’ आज का कवि इतना कहता है कि वह सुबह कभी न कभी तो आएगी। आज की पीढ़ी के रचनाकार पुरस्कारों को आलोचनात्मक मूल्यांकन या यथार्थ समझते हैं। इससे रचना और रचनाकार पर जो प्रभाव पड़ता है, उससे साहित्य का तो कल्याण नहीं होता। मैं यह कहते हुए आज के युवा कवियों की प्रतिभा को नजरअंदाज नहीं करता, हां जीवनगत कमजोरी से प्रभावित रचना की ओर संकेत जरूर कर रहा हूं। मैं मानता हूं कि कोई अच्छा कवि दूसरे की तरह नहीं लिखता। मैं यह नहीं कहता कि नागार्जुन या केदार की तरह लिखें, लेकिन इतना जरूर कहना चाहता हूं कि कवि या लेखक जिन जनतांत्रिक मूल्यों को बचाना चाहते हैं, उनको जनता की मदद के बिना नहीं बचाया जा सकता। अतः आज के कवियों के लिए इतना तो जरूरी है ही कि उनकी कविताओं की तरफ जनता आकृष्ट हो, जनता से उनका संबंध कायम हो। साहित्य और जनता के संबंध को तोड़ना पूंजीवाद की पुरानी साजिश है। कभी डा. नामवर सिंह ने कहा था कि पूंजीवादी प्रगतिशीलों को पहले उपेक्षा के द्वारा मारना चाहता है, वे उपेक्षा को झेल जाते हैं, और जिन्दादिली के साथ रहते हैं; तो पूंजीवाद उनका विरोध करके उन्हें खत्म करना चाहता है, विरोध से भी काम नहीं बनता, तो पूंजीवाद प्रगतिशीलों को आदर देने लगता है और यह आदर उनकी धार को अवश्य कुंद कर देता है। इस पर गौर करने की जरूरत है।
- खगेन्द्र ठाकुर
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