भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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शनिवार, 8 दिसंबर 2012

भाकपा चलायेगी - ”प्रदेश सरकार वायदा निभाओ“ अभियान

लखनऊ 8 दिसम्बर। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी गन्ना मूल्य निर्धारण तथा किसानों के कर्जे माफ करने के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा किसानों के साथ की गयी धोखाधड़ी के खिलाफ आन्दोलन छेड़ेगी। उक्त आशय का निर्णय आज यहां सम्पन्न भाकपा की राज्य कार्यकारिणी बैठक में लिया गया।
निर्णयों के सम्बंध में जानकारी देते हुए भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि उत्तर प्रदेश की सपा सरकार ने गन्ने के जो मूल्य निर्धारित किये हैं, वे बेहद कम हैं। आज जबकि खाद, डीजल, कीटनाशक, बीज आदि सभी के दाम काफी बढ़ गये हैं और चीनी भी 40 रूपये किलो की दर से बिक रही है, ऐसे में गन्ने की कीमत कम से कम रू. 350.00 प्रति क्विंटल होनी चाहिए। भाकपा राज्य कार्यकारिणी ने इस बात पर भी गहरा रोष व्यक्त किया कि अपने सम्पूर्ण चुनावी अभियान में सपा ने किसानों के पचास हजार रूपये के कर्जों की माफी की घोषणा की थी लेकिन केवल एक वित्तीय संस्थान का कर्ज भी काफी बंदिशों के साथ माफ करना घोषित किया गया है जबकि अधिकतर किसान ‘किसान क्रेडिट कार्ड’ के जरिये राष्ट्रीयकृत बैंकों, सहकारी बैंकों एवं ग्रामीण बैंकों से कर्ज लेते हैं। प्रदेश के लगभग आठ करोड़ किसानों ने यही कर्जा ले रखा है जिसकी कोई माफी नहीं की गयी है। धान के खरीद केन्द्रों पर भी बेहद धांधलेबाजी है। नहरों में पानी आ नहीं रहा और बिजली की सप्लाई गांवों को जा नहीं रही। इन सबके चलते किसान बेहद परेशान है।
भाकपा राज्य कार्यकारिणी ने उपर्युक्त सभी सवालों को केन्द्रीय मुद्दा बनाते हुए 21 दिसम्बर से समूचे उत्तर प्रदेश में ”उत्तर प्रदेश सरकार वायदा निभाओ“ अभियान चलाने तथा 3 जनवरी 2013 को इन्हीं सवालों पर जिला केन्द्रों पर जुझारू धरने-प्रदर्शन करने का निर्णय लिया है।
इसके साथ ही खाद्य सुरक्षा के सवाल पर - हर परिवार को हर महीने 35 किलो अनाज 2 रूपये प्रति किलो की दर पर उपलब्ध कराने की कानूनी गारंटी तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली को वृहत्तर और भ्रष्टाचारमुक्त बनाने के सवाल पर 21 दिसम्बर से ही हस्ताक्षर अभियान प्रारम्भ करने का निर्णय भी लिया है। केन्द्रीय आह्वान पर होने वाले इस कार्यक्रम में भाकपा उत्तर प्रदेश में 10 लाख हस्ताक्षर जुटायेगी। इसके लिए भाकपा के कार्यकर्ता गांव-गांव और घर-चौपाल जायेंगे तथा स्टेशनों, बाजारों, हाटों, चट्टियों, सरकारी दफ्तरों, बैंकों और बस अड्डों के सामने शिविर लगा करके हस्ताक्षर करायेंगे। इसके अलावा एफडीआई के सवाल पर सपा, बसपा और कांग्रेस के रवैये को जनता के बीच उजागर किया जायेगा। भाकपा इस बात को भी जनता के बीच रखेगी कि भाजपा की साम्प्रदायिक एवं संकीर्ण नीतियां और विपक्षी दलों की इन नीतियों पर भाजपा से दूरी बनाने के लिए बहानेबाजी आर्थिक सवालों पर विपक्ष की एकता में बाधक बन रही हैं। इसके लिए विचार गोष्ठियां, सभायें एवं नुक्कड़ सभायें आयोजित की जायेंगी।
भाकपा की जिला इकाईयों द्वारा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिये सरकारी योजनाओं को लागू करने में बरती जा रही उदासीनता के खिलाफ 10 दिसम्बर को जिला केन्द्रों पर प्रदर्शन किया जायेगा।
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बुधवार, 12 सितंबर 2012

प्रत्येक परिवार को 2 रूपये किलो की दर से हर माह 35 किलो अनाज के लिए भाकपा एवं वाम दलों का ऐतिहासिक आन्दोलन

लखनऊ 12 सितम्बर। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य मंत्रिपरिषद की ओर से जारी प्रेस बयान में पार्टी के राज्य सह सचिव अरविन्द राज स्वरूप ने कहा है:
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी एवं अन्य वामपंथी दलों के राष्ट्रीय आह्वान पर उत्तर प्रदेश के समस्त जनपदों में आम जनता के लिये खाद्य सुरक्षा के मुद्दे पर आज ‘राष्ट्रीय मांग दिवस’ मनाया गया।
विभिन्न जनपदों की पार्टी इकाइयों ने मांग दिवस मनाने के लिए धरने, प्रदर्शनों एवं जुलूसों का आयोजन किया। राष्ट्रीय नेतृत्व ने निर्णय किया था कि मांग दिवस पर विरोध प्रदर्शन जिला मुख्यालयों अथवा शहर की सीमाओं में एफसीआई के गोदामों के समक्ष कार्यक्रम आयोजित किया जाये।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी एवं अन्य वाम दलों ने आम जन की खाद्य सुरक्षा की प्राप्ति के लिये मांग की है कि बीपीएल एवं एपीएल के बटवारे के स्थान पर समस्त जनता के लिये सार्वजनिक वितरण प्रणाली लागू की जाये। खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अधिकतम दो रूपये प्रति किलो के हिसाब से कम से कम 35 कि.ग्रा. अनाज हर परिवार को उपलब्ध कराया जाये, योजना आयोग के गरीबी पर जारी किये गये फर्जी आंकडे खारिज किये जायें तथा इन आंकड़ों को कल्याणकारी योजनाओं के आबंटन का आधार न बनाया जाये, किसानों की उपज की लाभकारी कीमतें दी जायें और उनकी जरूरतों की सामग्री कम दामों पर उपलब्ध कराई जाये तथा इस विषय में स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू किया जाये, समस्त जनता के लिए राशन की गारंटी की जाये, कैश कूपन देने का फैसला निरस्त किया जाये तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सार्वभौमिक और भ्रष्टाचारमुक्त बनाया जाये। इन मांगों के साथ-साथ मंहगाई, भ्रष्टाचार एवं काले धन के सवालों को भी उठाया गया।
12 सितम्बर के पूर्व इन मुद्दों को आम जनता के बीच ले जाने के लिए पूरे प्रदेश में 27 अगस्त से 11 सितम्बर तक पूरे पखवाडे व्यापक प्रचार अभियान चलाया गया तथा इस अभियान में पद यात्रायें, आम सभायें, नुक्कड़ सभायें, साईकिल मार्च और संवाददाता सम्मेलन आयोजित किये गये।
समाचार भेजे जाने तक भाकपा राज्य कार्यालय पर 60 जिलों से सूचनायें प्राप्त हो चुकी हैं। लखनऊ, सीतापुर, कानपुर, कानपुर (देहात), वाराणसी, गोरखपुर, इलाहाबाद, फैजाबाद, आगरा, हाथरस, अलीगढ़, मेरठ, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, गाजियाबाद, मऊ, आजमगढ़, गाजीपुर, बलिया, जौनपुर, बागपत, मैनपुरी, देवरिया, चंदौली, बांदा, अलीगढ़, गाजियाबाद, बलरामपुर आदि जिलों में असरदार कार्यक्रम सम्पन्न हुए। उरई में हजारों की संख्या में जनता ने भागीदारी की तथा कलेक्ट्रेट में पुलिस घेरे को तोड़ कर बड़ी आम सभा की। कार्यक्रम को सम्पन्न करने के बाद प्रधानमंत्री के नाम सम्बोधित ज्ञापन जिलाधिकारियों को दिये गये।
इस अवसर पर पार्टी की राज्य मंत्रिपरिषद के साथियों एवं पदाधिकारियों ने विभिन्न जिलों में उपस्थित रहकर कार्यकर्ताओं का उत्साहवर्धन किया। हाथरस में राज्य सचिव डा. गिरीश ने, लखनऊ में राज्य सह सचिव अरविन्द राज स्वरूप, अशोक मिश्र तथा आशा मिश्रा ने, मऊ में राज्य सह सचिव इम्तियाज अहमद, पूर्व विधायक ने कार्यक्रमों में भागीदारी की। राज्य कार्यकारिणी के सदस्यगण भी विभिन्न जिलों के कार्यक्रमों में व्यस्त रहे।
धरनों एवं प्रदर्शनों के बाद सम्पन्न हुई सभाओं में वक्ताओं ने कहा कि मई 2012 को सरकारी गोदामों में गेहूं और चावल का 7 करोड 70 लाख टन का बड़ा भण्डार भरा पड़ा है परन्तु इस इनाज को सरकार बर्बाद अथवा चूहों के खाने के लिये देने को तत्पर है परन्तु आम जनता को बांटने में उसको मजबूरी दिखाई देती है। किसान आत्महत्यायें करते हैं पर खाद्यान्न नीति बड़े पूंजीपतियों तथा अमरीका और यूरोप के देशों को प्रसन्न करने के उद्देश्य से बनाई गयी हैं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी इन नीतियों के खिलाफ आन्दोलन कर रही है और आम जनता की खाद्य सुरक्षा मांग रही है। नेताओं ने कहा कि यह संघर्ष ऐतिहासिक है और एक-आध करोड़ को छोड़ कर देश की 120 करोड जनता का आन्दोलन है।


कार्यालय सचिव
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मंगलवार, 14 अगस्त 2012

सबके लिए खाद्य सुरक्षा का संघर्ष सफल बनाओ

देश सूखे, बेरोजगारी और मुद्रास्फीति में उलझ रहा है। किसानों की आत्महत्यायें लगातार जारी हैं। कीमतें बढ़ रही हैं। लोगों में बेचैनी है।
 परंतु प्रमुख राजनीतिक दल खासतौर पर कांग्रेस नीति यूपीए-2 और भापजा के नेतृत्व वाला राजग राष्ट्रपति चुनावों की जोड़तोड़ और अपनी आंतरिक समस्याओं में ही उलझा हुआ है। गोवा, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में नाकामयाब रहने एवं आंध्र प्रदेश उप चुनावों में करारी शिकस्त के बाद अब कांग्रेस का पूरा ध्यान राहुल गांधी पर ही केंद्रित है जो अपनी वास्तविक छवि से भी बड़ा पेश किए जाने के बावजूद कांग्रेसी तबकों तक में कोई जादू नहीं चला पाए।
 यूपीए एनसीपी की ओर से एक समन्वय समिति बनाने को लेकर भीतरी दबाव झेल रही है, जिसके लिए एनसीपी ने केबिनेट की बैठक में आने से भी इंकार कर दिया है। त्रिणमूल और डीएमके भी अपने-अपने कारणों से नाखुश हैं।
 जदयू और शिवसेना के पीए संगमा को राष्ट्रपति चुनावों में समर्थन नहीं देने के सदमें से भाजपा को अभी बाहर आना बाकी हैं। उसने कर्नाटक में मुख्यमंत्री बदलकर साम्प्रदायिक जातिवादी शक्तियों के सामने बेशर्मी से समर्पण का उदाहरण पेश किया है। इसके अलावा कर्नाटक भाजपा में राष्ट्रपति चुनाव को लेकर भी टूट थी। नरेन्द्र मोदी और अन्य 2014 की प्रधानमंत्री मृगतृष्णा के लिए आंतरिक लड़ाई को ढोह रहे हैं।
भारतीय कार्पोरेट घराने देश को डरा रहे हैं
भारतीय कार्पोरेट घराने देश को डरा रहे हैं कि यदि उनकी इच्छाओं की पूर्ति वाले कठोर निर्णय नहीं लिए गए तो यह भारत को एक संकट की ओर धकेल देगा। ‘‘टाईम’’ पत्रिका ने डा. मनमोहन सिंह को एक ‘‘अंडर एचीवर’’ बताया तो ओबामा भी उन पर बहुराष्ट्रीय निगम समर्थक सुधारों को लागू करने का दबाव डाल रहे हैं ताकि उनके लिए दरवाजे खोलकर उन्हें देश की लूट की सुविधा दी जा सके। जबकि सच्चाई यह है कि पिछले चार सालों में भारतीय निगमों और सबसे बड़े अमीरों ने 5 लाख करोड़ रु. का अतिरिक्त मुनाफा कमाया है और उनकी दौलत दो गुनी हुई है तो वहीं आम आदमी की दरिद्रता बढ़ी है। डा. मनमोहन सिंह कार्पोरेट के लिए आधे परफार्म करने वाले सिद्ध हुए, तो वहीं आम आदमी के लिए कुछ भी परफार्म नहीं करने वाले सिद्ध हुए हैं।
 यह केवल वामपंथ है जो जनता के सवालों की बात कर रहा है ओर एक जुझारू लड़ाई के लिए जनता को लामबद्ध कर रहा है।
 खाद्य सुरक्षा के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान चलाने के वामपंथ के आव्हान को कई राज्यों ने लागू किया है। बैठकों, रैलियों ओर कंवेशनों का दौर जारी है और पं. बंगाल, असम, मणिपुर, केरल और दूसरे अन्य राज्यों में व्यापक धरने और प्रदर्शनों की रूपरेखा तैयार हो रही है। इनमें से अधिकतर राज्य अपनी विधान सभाओं के सामने धरना देंगे और ठीक उसी तरह संसद के सामने भी 30 जुलाई से 3 अगस्त तक राष्ट्रव्यापी धरना अभियान चलेगा।
 दिल्ली ओर उसके आसपास के राज्य हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, पश्चिम उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्यप्रदेश दिल्ली के साथ मिलकर संसद पर
धरने के लिए जनता को लामबद्ध करेगें, हैंडबिल और पोस्टर पहले ही छप चुके हैं। विस्तार से व्याख्या करने वाली एक पुस्तिका ंिहंदी और अंग्रेजी में प्रकाशित हो चुकी है। समाज के प्रत्येक हिस्से से अच्छी प्रतिक्रिया प्राप्त हो रही है।
 कुछ लोगों को आश्चर्य हो रहा है कि जब विधेयक संसद के समक्ष लंबित है तो खाद्य सुरक्षा पर आंदोलन क्यो। वर्तमान लंबित पड़ा विधेयक बेहद कमजोर और जनता के हितों के एकदम खिलाफ है।
 वित्त मंत्री का कहना है कि सब्सिडी की चिंता में उनकी रातों की नींद गायब है। पिछले चार वर्षों में कार्पोरेट घरानों को 24 लाख करोड़ की सब्सिडी और छूट दी जा चुकी है। योजना आयोग के एक शौचालय में 35 लाख रुपये खर्च करने वाले मोंटेक सिंह अहलूवालिया कहते हैं कि 26 रु. खर्च करने वाला ग्रामीण गरीबी रेखा से ऊपर है। गृहमंत्री चिदंबरम भी हैरान हैं कि 15 रु. पानी की बोतल और 20 रु.आइसक्रीम पर खर्च करने वाला आदमी चावल में 1 रु. की बढ़ोत्तरी का विरोध क्यों करता है। 20 रु. या 200 रु. की आइसक्रीम खाने वाले और 50,000 रु0 की विदेशी शराब खरीदने वाले आदमी वह नहंी हैं जो चावल और गेहूं की दाम बढ़ोतरी का विरोध करते हैं। यह नेता जो इस अंतर को नहीं समझते हैं वही देश के नीति निर्माता हैं।
 वामपंथ सार्वभौमिक जन वितरण प्रणाली की मांग करता है। सरकार हरेक साल लगभग 6 से 8 करोड़ टन गेहूं चावल खरीदती है। लगभग 30 से 50 लाख टन खाद्यान्न भंडारण की उचित व्यवस्ष्था के अभाव में सड़ जाते हैं। लोग भूखों मर रहे हैं और सरकार उच्चतम न्यायालय के दिशा निर्देशों के बावजूद जरूरत मंदों और गरीबों को मुफ्त अनाज बांटने से इंकार कर रही है।
 भाजपा के नेतृत्व वाले राजग ने पहले जनता की जरूरतों को नजर अंदाज करके खाद्यान्न का निर्यात किया था। अब मनमोहन सिंह की सरकार भी पैसा बनाने के लिए खाद्यान्न निर्यात करने की योजना बना रही है बावजूद इसके कि देश के कई राज्य अभूतपूर्व सूखे से प्रभावित हैं।
 जबकि कांग्रेस और उसका समर्थक मीडिया ऐसा पेश करने की कोशिश कर रहा है इस खाद्य सुरक्षा विधेयक से देश की 70 प्रतिशत आबादी को 3 रु. किलो की दर पर खाद्यान्न प्राप्त होंगे।
 दूसरी तरफ मोंटेक सिंह अहलुवालिया और डा. रंगा राजन और उनके साथी 26 रु. और 32 रु. की हास्यास्पद गरीेबी रेखा निर्धारित करके यह जताने की कोशिश कर रहे हैं कि गरीबी घट गई है। योजना आयोग की इसी कोशिश को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने उच्चतम न्यायालय के सामने पेश किया। इस स्थिति में अधिकारिक गरीबी की रेखा से महज 23 प्रतिशत आबादी ही रह जायेगी। खाद्य सुरक्षा विधेयक के लिए गरीबी रेखा का यह मापदंड एक अजूबा ही होगा।
 कई राज्यों में राज्य सरकारें 2 रु. किलो ही राशन दे रही हैं जबकि तमिलनाडु में प्रत्येक परिवार को 20 किलो ग्राम चावल का एक बैग बिल्कुल मुफ्त दिया जा रहा है। यदि सीमित साधनों के साथ एक राज्य ऐसा कर सकता है तो कं्रेद्र सरकार क्यों नहीं कर सकती है?
सबके लिए पीडीएस की क्या कीमत होगी?
 यहां तक कि राष्ट्रीय सेंपल सर्वे के सबसे वैज्ञानिक आंकड़ों में भी इसे समाहित किया गया है जिसके आधार पर अर्जुन सेन गुप्ता ने अपनी असंगठित क्षेत्र की शानदार रिपोर्ट कंेद्रित की हैं कि देश की 77 प्रतिशत आबादी 20 रु. रोज से भी कम अपने भोजन पर खर्च करती है। यह आंकड़े कुछ वर्षों पहले के हैं। परंतु अब रुपये का मूल्य घट चुका है। रुपये की क्रयशक्ति पिछले दो दशक में गिरकर 22 पैसे तक पहुंच चुकी है।
 जब सरकार गरीबी कम नहीं कर सकती है उसे खाद्य सुरक्षा मुहैया कराना चाहिए जिससे आम जनता जी सके। यह कल्याणकारी उपाय अथवा दया नहीं बल्कि एक जनवादी सरकार की राजनीतिक जवाबदेही है।
 गरीबी के विभिन्न आँकड़े हो सकते हैं जो कि वास्तविक संख्या से अलग भी हो सकते हैं  अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान इसे 30 करोड़ आंकता है तो वहीं ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय का मानना है कि यह संख्या 41 करोड़ है। गरीबी रेखा से ऊपर भी एक बड़ी संख्या बाजार दामों पर भोजन खरीद पाने में सक्षम नहीं है। इसीलिए खाद्य सुरक्षा की तुरंत आवश्यकता है।
 सकल घरेलू उत्पाद की विकास दर आम आदमी के जीवन को सुधारने में कोई सहायाता नहीं करती है। उदारवादी नीतियां लोगों के जीवन को और दूभर कर रही हैं। कार्पोरेट घरानों को ध्यान में रखकर बनाई जा रही आर्थिक नीतियां गलत दिशा में जा रही हैं। इसीलिए जीडीपी की विकास दर जो भी हो 10 प्रतिशत अथवा 12 प्रतिशत उससे गरीबी की समस्या हल होने नहीं जा रही है। यह उस ट्रेन की गति बढ़ाये जाने की तरह है जो कभी भी अपनी मंजिल गरीबों और जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पाती है।
क्या सबके लिए पीडीएस असहनीय महंगा है?
 यह महंगा नहीं जैसा कि कई अर्थशास्त्रियों द्वारा इसे बताया जाता है। आइये गणना करें।
 1008 लाख टन खाद्यान्न उपलब्ध कराना संभव है। एफसीआई 2010 में 5000 टन खाद्यान्न ही उपलब्ध कराना संभव है। एफसीआई 2010 में 500 टन खाद्यान्न ही उपलब्ध करा सका जो कुल खाद्य उत्पादन का 23 प्रतिशत था। एकदम अभी सरकार के पास 6 से 8 करोड़ टन खाद्यान्न का भंडार है। अभी 300 से 400 लाख टन खाद्यान्न की आवश्यकता है पूरे देश को खिलाने के लिए। परंतु इसके लिए एक नीति की आवश्यकता है। जिसके लिए ईमानदारी की जरूरत हैं। इसके लिए इच्छाशक्ति चाहिए। यह सब वर्तमान सरकार के पास नहीं है। इसीलिए यह संघर्ष है।
 यह उपलब्ध आंकड़े दर्शाते हैं कि सबके लिए पीडीएस का नतीजा कोई असामान्य लागत नहीं है। यदि सरकार में इच्छाशक्ति हो तो वह थोड़े से प्रयास से ही देश के हर दरवाजों पर खाद्यान्न मुहैया कराया जा सकता ह।ै।
 यह सरकार को चुनना होगा कि वह जनता के साथ है अथवा कार्पोरेट घरानों के साथ है।
 यदि सरकार कुछ बड़े कार्पोरेट घरानों को संतुष्ट करने के लिए इतना खर्च कर सकती है तो क्यों नहीं 24 करोड़ परिवारों को खाना देने के लिए 2 लाख करोड़ खर्च करती हैं।
 कुछ लोग बेशर्मी से यह तर्क दे रहे हैं कि मुफ्त या सब्सिडी वाला खाना देना जनता को आलसी बना देगा, जैसे कि देश की दौलत का उत्पादन बगैर परिश्रमी जनता के खून पसीना बहाए हो रहा है।
 सरकार को समझ दी जानी चाहिए। उन्हें उनकी नीतियां बदलने के लिए मजबूर किया जाना चाहिए। शिक्षा और स्वास्थ्य के अलावा भोजन, पेयजल और आवास भी जनता का अधिकार है।
 वामपंथ की खाद्य सुरक्षा की लड़ाई एक बड़ी लड़ाई की शुरुआत भर है। यह संघर्ष आगे बढ़ेगा। जनवादी, धर्म निरपेक्ष और एक समान सोच रखने वाले लोगों को बड़ी संख्या में इस लड़ाई को सफल बनाने में लामबद्ध किया जाएगा। आओ सबके लिए खाद्य सुरक्षा के इस संघर्ष को सफल बनाएं।
- एस. सुधाकर रेड्डी
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बुधवार, 1 अगस्त 2012

क्या मीडिया का यह रोल उचित है?

लखनऊ 1 अगस्त। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य एवं उत्तर प्रदेश राज्य सचिव डॉ. गिरीश ने निम्नलिखित प्रेस बयान जारी किया है:

उस समय जब 100 में से 77 लोग 20 रूपये रोज में गुजारा करने को मजबूर हैं उस समय बीपीएल और एपीएल का लफड़ा खतम कर क्या हर परिवार को 35 कि.ग्रा. अनाज हर परिवार को हर माह 2 रु. प्रति कि.ग्रा. की दर पर मुहैय्या कराने की मांग से बढ कर कोई और मांग उचित हो सकती है? उस समय जब देश का किसान अपना पसीना बहा कर खाद्यान्नों के उत्पादन में जुटा हो; उसे उसकी पैदावारों की बाजिव कीमतें दिलाने और उन्हें खाद, बीज, कीटनाशक तथा डीजल आदि उचित मूल्य पर दिलाने की की मांग से अधिक महत्वपूर्ण कोई और मांग हो सकती है क्या? बेहद मेहनत से पैदा किये खाद्यान्न भण्डारण की व्यवस्था के अभाव में नष्ट हो रहे हों तो उनके भण्डारण की समुचित व्यवस्था की मांग करना कोई गुनाह है क्या? और इन मुद्दों को प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा अधिनियम में शामिल कराने की आवाज उठाना अनुचित है क्या? इन प्रश्नों का केवल यह जवाब है कि यह मांगे अनुचित नहीं बल्कि उचित हैं।
और जब देश भर की जनता कमरतोड़ महंगाई से त्राहि-त्राहि कर रही हो तथा महाभ्रष्टाचार के खिलाफ सडकों पर उतर रही हो उस वक्त वामपंथी दलों द्वारा राजधानी दिल्ली में दिया जा रहा पांच दिवसीय महाधरना नजरअंदाज किये जाने योग्य है क्या? इस प्रश्न का केवल एक ही उत्तर है कि कदापि नहीं।
लेकिन यही हो रहा है. उपर्युक्त ज्वलंत सवालों पर देश के चारों वामदल जो देश की राजनीति को जनोन्मुख बनाने में अहम् भूमिका निभाते रहे हैं, 30 जुलाई से जंतर मंतर पर पांच दिवसीय धरना दे रहे हैं जिसमें प्रतिदिन हजारों गरीब, मजदूर ,किसान भाग ले रहे हैं। इतना ही नहीं चारों दलों का शीर्ष नेतृत्व प्रतिदिन धरने में कार्यकर्ताओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर बैठ रहे हैं। लेकिन प्रमुख समाचार पत्रों और न्यूज़ चैनलों द्वारा इस धरने को अपने समाचारों में पूरी तरह से नजरअंदाज करना एकदम विचित्र मगर सही घटना है जिस पर सहज विश्वास करना बेहद कठिन है। मीडिया का यह रवैय्या न केवल आश्चर्यजनक है अपितु खुद उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लगाने वाला है जिसका दावा मीडिया चीख कर करता रहा है।
डॉ. गिरीश ने मीडिया से अपेक्षा जताई है कि वह जन हित के इन प्रमुख सवालों पर अनुकूल रुख अपनाएगा और निष्पक्षता की अपनी छवि को बनाये रखने में अपनी ही मदद करेगा।


कार्यालय सचिव
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