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रविवार, 10 जून 2018
at 6:26 pm | 0 comments |
Agitation Prograam of CPi, U. P.
जनविरोधी और लोकतंत्रविरोधी भाजपा सरकार के खिलाफ भाकपा
अभियान चलायेगी
20 जून को महंगाई विरोधी प्रदर्शनों से शुरूआत होगी
लखनऊ- 10 जून 2018, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य काउंसिल की दो दिवसीय
बैठक आज यहाँ संपन्न हुयी. बैठक की अध्यक्षता अमेरिका सिंह यादव ने की. बैठक में
पार्टी के दो केन्द्रीय सचिव का. अतुल कुमार अनजान एवं का. शमीम फैजी दोनों दिन
उपस्थित रहे. उन्होंने राष्ट्रीय राजनैतिक परिद्रश्य पर विस्तार से चर्चा की.
राज्य सचिव डा. गिरीश ने राजनैतिक एवं सांगठनिक रिपोर्ट प्रस्तुत की.
कुल मिला कर बैठक में हुयी चर्चा का निष्कर्ष है कि भाजपा की केन्द्र और उत्तर
प्रदेश की सरकार जनता से किये अपने वायदों को पूरा करने में पूरी तरह विफल रही
हैं. आज ये सरकारें जनता के लिये असहनीय बोझ बन गयी हैं और जनता इनसे फ़ौरन निजात
पाना चाहती है. हाल में देश भर में हुए उपचुनावों के नतीजों से भी यह जाहिर होगया
है. अतएव भाकपा ने जनमुक्ति के लिये व्यापक कार्य योजना तैयार की है. जिनमें
स्वतन्त्र अभियानों के साथ धर्मनिरपेक्ष, लोकतान्त्रिक और वामपंथी शक्तियों का एक
प्लेटफार्म का निर्माण करना भी शामिल है. आगामी दिनों में भाकपा कई बुनियादी सवालों
को लेकर सडकों पर उतरेगी.
भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने यहाँ जारी प्रेस बयान में बताया कि आगामी 20
जून को आसमान छूती महंगाई के खिलाफ जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन किये जायेंगे और पेट्रोल
डीजल पर से उत्पाद कर हठाने और उन्हें नीचे
लाने की मांग की जायेगी. मोदी सरकार की विफलताओं और उत्तर प्रदेश सरकार की
जनविरोधी नीतियों को उजागर करने को 1 अगस्त से 14 अगस्त के बीच व्यापक अभियान
चलाया जायेगा. 'देश बचाओ संविधान बचाओ' 'जनविरोधी भाजपा सरकार को सता से बाहर करो'
नारे के साथ देश के कोने कोनों से जत्थे निकालने की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की
प्रस्तावित योजना को पूर्ण समर्थन प्रदान किया जायेगा. सांगठनिक कार्यवाही के तहत
कोल्लम में हाल में ही संपन्न भाकपा के राष्ट्रीय महाधिवेशन के फैसलों को जिलों से
शाखाओं तक पहुँचाने को विस्तरित कार्यकर्ता बैठकें आयोजित की जायेंगीं.
भाकपा राज्य काउंसिल ने उत्तर प्रदेश में अपनी समस्त जिला इकाइयों का आह्वान
किया है कि वे इन अभियानों की तैयारियों में मुस्तैदी से जुट जायें और उन्हें
अधिकतम स्तर तक कामयाब बनायें.
राज्य काउंसिल ने एक 25 सदस्यीय कार्यकारिणी का चुनाव भी किया जिसमें राज्य
सचिव डा. गिरीश, सहसचिव का. अर्विन्दराज स्वरूप एवं का. इम्तियाज़ अहमद के अलाबा 22
अन्य शामिल हैं. का. प्रदीप तिवारी को पुनः कोषाध्यक्ष चुना गया है.
डा. गिरीश, राज्य
सचिव
भाकपा, उत्तर प्रदेश
गुरुवार, 31 मई 2018
at 2:08 pm | 0 comments |
CPI, U.P. on Results of Kairana and Nuurpur elections.
कैराना और नूरपुर
में भाजपा की हार पर भाकपा ने मतदाताओं को दी बधाई
कारपोरेटों को
मालामाल और आमजनों को कंगाल बनाने का नतीजा हैं यह परिणाम
लखनऊ- 31 मई 2018, भारतीय
कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा और नूरपुर
विधान सभा सीटों पर भाजपा की करारी हार को भाजपा द्वारा चलाई जारही आर्थिक
नवउदारवाद की नीतियों- जिनके चलते बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, किसानों की
तंगहाली तथा गरीबों और मजदूरों की बदहाली बड़ी है, की पराजय बताया है. यह उत्तर
प्रदेश सरकार द्वारा दलितों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं और अन्य कमजोर वर्गों पर ढाये
जारहे जुल्मों- अत्याचारों और बदतर क़ानून व्यवस्था और किसानों- कामगारों की
उपेक्षा को लेकर भाजपा को आम मतदाताओं का कड़ा जबाव है. यह कारपोरेटों को मालामाल
और आम आदमी को कंगाल बनाने का नतीजा है.
गोरखपुर और फूलपुर की
वीआईपी लोकसभा सीटों पर हार के बाद हुयी इस हार ने यह साबित कर दिया है कि गाय,
गोबर, गंगा, दंगा, जिन्ना और टीपू जैसे सवालों के जरिये विभाजन पैदा करने और वोट
हासिल करने की नीति को अब आम जनता भलीभांति समझ चुकी है. ये चुनाव नतीजे इस बात का
सबूत हैं कि जनविरोधी नीतियों और झूठे वायदों के बल पर कोई दल लंबे समय तक जनता का
विश्वास बनाए नहीं रख सकता.
यह हार इसलिए भी महत्वपूर्ण
है कि यहां सारी राजनैतिक मर्यादाएं और नैतिकतायें लांघ कर चुनाव प्रचार बंद होने
और मतदान से पहले दोनों चुनाव क्षेत्रों के अति सन्निकट प्रधानमंत्री ने 27 मई को लोकार्पण
की आड़ में रोडशो और रैली कर विपक्ष पर तीखे हमले बोले थे और कई लुभावनी घोषणायें
की थीं. भाकपा और राष्ट्रीय लोकदल ने तो इस अवैध रैली को निरस्त करने की मांग
निर्वाचन आयोग से की थी. मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, दर्जनों केन्द्रीय और प्रदेश
के मंत्रियों तथा भाजपा के शीर्षस्थ नेताओं ने वहां जमकर चुनाव अभियान चलाया था. भाजपा
ने दोनों ही क्षेत्रों में सहानुभूति भुनाने को मृत प्रतिनिधियों की बेटी और पत्नी
को चुनाव मैदान में उतारा था और ईवीएम में गडबड़ियाँ हुयीं थीं सो अलग.
ये परिणाम मोदी और योगी की
लोकप्रियता की कलई खोलने वाले हैं जिनकी दुहाई भाजपाई दिन रात दिया करती है.
भाकपा और वामपंथ ने केन्द्र
और उत्तर प्रदेश सरकार की जनविरोधी, सांप्रदायिक और फासीवादी नीतियों को शिकस्त
देने और राजनैतिक अपरिहार्यता को ध्यान में रखते हुये कैराना, नूरपुर और इससे पहले
गोरखपुर तथा फूलपुर में गैर- भाजपा दलों के प्रत्याशियों को समर्थन दिया था. संयुक्त
वामपंथ के इस निर्णय से भी भाजपा की हार सुनिश्चित हुयी है. हमें अपने इस निर्णय
पर प्रशन्नता है. भाकपा और वामपंथ इन क्षेत्रों के मतदाताओं को इस सूझबूझपूर्ण
निर्णय के लिये बधाई देते हैं.
देश के अन्य भागों में हुये
उपचुनावों के नतीजे भी अधिकतर भाजपा के विपक्ष में जारहे हैं. ये नतीजे 2019 की
तस्वीर साफ़ करने को पर्याप्त हैं.
डा. गिरीश, राज्य सचिव
भाकपा, उत्तर प्रदेश
गुरुवार, 24 मई 2018
at 4:58 pm | 0 comments |
CPI furtherdemands cancelation of Modi's programm on 27th in Baghpat
पीएम मोदी के
कार्यक्रम पर रोक न लगाने का निर्णय अविवेकी एवं पक्षपातपूर्ण
भाकपा ने निर्वाचन
आयोग से पुनर्विचार करने की मांग की
लखनऊ- भारतीय कम्युनिस्ट
पार्टी उत्तर प्रदेश के राज्य सचिव मंडल ने पीएम मोदी की 27 मई की रैली और
लोकार्पण कार्यक्रम को बेहद लचर तर्कों को आधार बना कर प्रतिबंधित न करने के फैसले
को अविवेकपूर्ण और पक्षपातपूर्ण बताया है. भाकपा ने लोकहित और लोकतंत्र के हित में
अपने इस निर्णय पर पुनर्विचार करने की मांग की है.
यहाँ जारी एक प्रेस बयान
में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहाकि निर्वाचन आयोग ने उन परिस्थितियों पर
गौर नहीं किया जिसके आधार पर 27 मई को प्रस्तावित रैली एवं लोकार्पण कार्यक्रम को
प्रतिबंधित करने की मांग की गयी है.
सभी जानते हैं कि गत लोकसभा
चुनावों के दरम्यान प्रत्येक मतदान के दिन मोदी ने कहीं न कहीं रोडशो अथवा रैलियाँ
आयोजित की थीं. एक तरफ क्षेत्र विशेष में मतदान चल रहा होता था तो दूसरी तरफ भाजपा
के क्रीत टीवी चैनल उसका लाइव प्रसारण कर रहे होते थे. इससे मतदाताओं का प्रभावित
होना स्वाभाविक था. बाद में भाजपा के पक्ष में आये आश्चर्यजनक चुनाव नतीजों से भी
यह साबित होगया था.
डा. गिरीश ने आरोप लगाया कि
बाद में कई विधानसभा चुनावों और उपचुनावों में भी भाजपा ने इस हथकंडे का प्रयोग
किया. गुजरात विधान सभा के चुनावों का प्रचार थमने के बाद भी श्री मोदी ने वहां “यो
यो फेरी” का उद्घाटन किया था यह भी सभी के संज्ञान में है.
उन्होंने निर्वाचन आयोग से
सवाल कियाकि क्या निर्वाचन आयोग ने प्रधानमंत्री सचिवालय से यह पूछा कि जब
सर्वोच्च न्यायालय ने ईस्टर्न पेरिफेरल हाइवे के लोकार्पण के लिये 31 मई तक की समय
सीमा निर्धारित की है तो क्यों नहीं यह कार्यक्रम 28 मई के बाद रखा गया? क्यों
जानबूझ कर यह कार्यक्रम कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा के निर्वाचन के समय
चुनाव प्रचार बन्द होजाने और मतदान से पहले रखा गया?
भाकपा ने यह भी प्रश्न किया
है कि क्या निर्वाचन आयोग इस बात की गारंटी करेगा कि श्री मोदी के इन कार्यक्रमों
में इन दोनों चुनाव क्षेत्रों के मतदाताओं को नहीं लाया जायेगा? क्या उनके लाने
लेजाने और खाने- पीने पर धन खर्च नहीं किया जाएगा? क्या इन कार्यक्रमों का टीवी
चैनलों को प्रभावित कर लाइव प्रसारण अथवा बार बार समाचार प्रसारण नहीं कराया
जायेगा और वह इन दोनों मतदेय क्षेत्रों में प्रसारित नहीं होगा? क्या मतदान वाले दिन
दोनों चुनाव क्षेत्रों में बंटने वाले समाचार पत्र मोदीजी के भाषणों और कथित
घोषणाओं से भरे नहीं होंगे? और क्या इस सबसे दोनों क्षेत्रों के मतदाता प्रभावित
नहीं होंगे?
इन सारी स्थितियों-
परिस्थितियों पर गंभीरता से विचार कर निर्णय लेने के बजाय शामली के जिलाधिकारी की
इस रिपोर्ट कि आचार संहिता तो शामली में लगी है, निर्वाचन आयोग ने यह सुविधाजनक
निर्णय लेलिया. कौन नहीं जानता कि उपचुनावों में आचार संहिता संबंधित जिले में ही
लगती है. निर्वाचन आयोग को शासक दल की मंशा और दोनों कार्यक्रमों से पैदा होने
वाली परिस्थितियों का परीक्षण भी करना चाहिये. भाकपा ने निर्वाचन आयोग से अपने
उपर्युक्त फैसले पर पुनर्विचार करने की अपील की है.
ज्ञातव्य होकि गत दिन भाकपा
ने एक बयान जारी कर मोदी द्वारा किये जाने वाले लोकार्पण कार्यक्रम और चुनाव
क्षेत्रों के समीपस्थ जिले में प्रस्तावित रैली को रद्द करने की मांग की थी और फिर
राष्ट्रीय लोकदल ने निर्वाचन आयोग से लिखित अपील की थी.
डा. गिरीश
मंगलवार, 22 मई 2018
at 1:41 pm | 0 comments |
CPI demands postponment of BJP Railly in Bahapat, U.P.
कैराना लोकसभा और
नूरपुर विधान सभा क्षेत्रों का प्रचार थमने और मतदान से पहले होने जारही मोदी की
बागपत रैली और लोकार्पण कार्यक्रम पर रोक लगाये निर्वाचन आयोग
भाकपा ने की मांग
लखनऊ- 22 मई, 2018—भारतीय
कम्युनिस्ट पार्टी उत्तर प्रदेश के राज्य सचिव मंडल ने केन्द्रीय निर्वाचन आयोग से
मांग की है कि वह उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा सीटों पर
प्रचार थमने के बाद से मतदान संपन्न होने के दरम्यान उत्तर प्रदेश में
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा प्रस्तावित लोकार्पण कार्यक्रमों और आम सभाओं
को प्रतिबंधित करें.
ज्ञातव्य हो कि उपर्युक्त
दोनों सीटों पर 26 मई को सायंकाल प्रचार कार्य थम जायेगा और 28 मई की शाम पांच बजे
तक मतदान होगा.
भाजपा और प्रधानमंत्री ने इस
प्रचारबन्दी और मतदान की अवधि में बड़ी चतुराई से 27 मई को समीपस्थ जिले बागपत के
मवीकलां में ईस्टर्न पेरिफेरल हाईवे का उद्घाटन करने और खेकडा में आमसभा करने का
कार्यक्रम निर्धारित कर लिया है. इस कार्यक्रम में अपने खर्च पर और बड़े पैमाने पर भाजपा दोनों चुनाव क्षेत्रों से जनता और
मतदाताओं को लेजाने में जुटी है. साथ ही समूची कार्यवाही और लोकलुभावन घोषणाओं को
टीवी चैनलों एवं अन्य समाचार माध्यमों के जरिये फैला कर मतदाताओं को प्रभावित किया
जायेगा.
गत लोक सभा चुनावों और कई
विधानसभा चुनावों के दरम्यान भी भाजपा और श्री मोदी ने किसी एरिया विशेष में मतदान
के दिन किसी अन्य क्षेत्र में रैली, आमसभा अथवा रोडशो आयोजित कर संचार माध्यमों के
जरिये मतदाताओं को प्रभावित करने का षडयंत्र किया था. यही कहानी वे 27 मई को दोहराने
जारहे हैं. जब माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 31 मई तक इस हाईवे के लोकार्पण की छूट
देरखी है तो यह कार्यक्रम 28 मई के बाद की किसी तिथि पर आयोजित किया जासकता है. माननीय
सर्वोच्च न्यायालय को भी संज्ञान लेना चाहिये कि उनके आदेश की आड़ में राजनैतिक खेल
तो नहीं खेला जारहा है.
भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश
ने भाजपा की इस कार्यवाही को आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन और नियम विरुध्द बताते
हुये इस पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है.
डा. गिरीश, राज्य सचिव
भाकपा, उत्तर प्रदेश
बुधवार, 16 मई 2018
at 6:03 pm | 0 comments |
वाराणसी पुल हादसे पर भाकपा ने शोक जताया
लखनऊ- 16 मई 2018, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, उत्तर प्रदेश के राज्य सचिव मंडल
ने गत दिन वाराणसी में हुये निर्माणाधीन पुल हादसे में हुयी निर्दोष नागरिकों की मौतों
पर गहरा दुःख जताया है और शोकातुर उनके परिवारों के प्रति गहरी सहानुभूति व्यक्त
की है. भाकपा ने घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की है.
यहाँ जारी एक बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि यह एक
मानवजनित त्रासदी है जिसकी जिम्मेदारी केंद्र और राज्य सरकार को लेनी चाहिये.
संपूर्ण मामला भ्रष्टाचार और अहमन्यता की देन है जिसकी जद में आकर कई दर्जनों की
जानें चली गयीं और अन्य अनेक गंभीर रूप से घायल हैं.
भाकपा ने प्रत्येक मृतक परिवार को रूपये पचास लाख बतौर जनहानि मुआबजा दिया
जाने, हर मृतक के एक आश्रित को सरकारी नौकरी देने, घायलों का सुचारू संपूर्ण इलाज
और उन्हें कम से कम पांच लाख रुपये की सहायता राशि दिये जाने की मांग की है. यदि
कोई घायल व्यक्ति विकलांग होजाता है तो उसे भी नौकरी दी जानी चाहिए.
भाकपा की राय है कि क्योंकि यह निर्माण कार्य स्वयं प्रधानमंत्री जी के संसदीय
क्षेत्र में होरहा था और इसकी उच्च स्तर पर निगरानी चल रही थी तो जिम्मेदारी भी
उच्च स्तर पर बनती है. पर सरकार छोटी मछलियों को निशाना बना रही हैं. ये बहुत
अनुचित है. घुमक्कड़ प्रधानमंत्री को भी तत्काल अपने संसदीय क्षेत्र के पीड़ितों का
दुःख बांटने आना चाहिए था.
भाकपा ने अपनी जिला कमेटी को निर्देश दिया कि वह पीड़ितों के दुःख दर्द में
शामिल रहे और हादसे के जिम्मेदार लोगों को सजा दिलाने की आवाज को बुलंद रखे.
डा. गिरीश
शुक्रवार, 4 मई 2018
at 12:47 pm | 0 comments |
प्राकृतिक आपदा की मार को गंभीरता से नहीं लेरहीं हैं केन्द्र और उत्तर प्रदेश की सरकार: भाकपा
लखनऊ- 4 मई भारतीय
कम्युनिस्ट पार्टी के उत्तर प्रदेश राज्य सचिव मंडल ने विगत दिन आये बवंडर से हुये
जान और माल के भारी नुकसान पर गहरी चिन्ता व्यक्त की है. पार्टी ने आपदा में
मृतकों के परिवारों के प्रति गहरी संवेदना का इजहार करते हुये सरकार से आपदा राहत
के लिये फौरी कदम उठाने की मांग की है.
यहां जारी एक प्रेस बयान
में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहाकि तूफ़ान से देश में 100 से अधिक लोगों
की जानें चली गयीं. सर्वाधिक तवाही उत्तर प्रदेश में हुयी है. अकेले आगरा में ही
50 से अधिक लोगों की जानें जाचुकी हैं. सैअक्दों लोग घायल हैं. बड़े पैमाने पर
फसलों, पशुधन और इमारतों को नुकसान पहुंचा है. आगरा के अलावा बिजनौर, बरेली,
सहारनपुर, पीलीभीत, फीरोजाबाद, चित्रकूट, मुज़फ्फरनगर, रायबरेली और उन्नाव जिलों
में भी भारी तवाही हुयी है. लेकिन राहत और बचाव कार्यों के नाम पर अभी तक कागजी
कार्यवाही ही देखने में आरही है.
डा. गिरीश ने कहाकि मौसम
विभाग द्वारा पहले से दी गयी चेतावनियों को नोटिस में लेकर जरुरी तैयारियां की
गयीं होतीं तो इस भारी हानि से किसी हद तक बचा जा सकता था. अब भी आगे और बवंडर आने
की चेतावनी को भी बहुत गंभीरता से नहीं लिया जारहा. प्राकृतिक आपदा से लगे आघातों को भरने की कोशिशों के बजाय पूरी सरकार, भाजपा
और संघ गिरोह जिन्ना प्रकरण खड़ा कर वोटों की फसल उगाने में जुटा है. मोदी जी और
जोगी जी कर्णाटक में चुनाव अभियान में जुटे हैं. पीड़ित जनता को संवेदनहीन प्रशासन
के रहमोकरम पर छोड़ दिया गया है.
भाकपा ने मृतकों के
परिवारों को रु. 4 लाख और घायलों को घोषित 50 हजार की सहायता को अपर्याप्त बताया
है. भाकपा ने प्रत्येक मृतक के परिवार को रु. 10 लाख और घायलों को कम से कम 2 लाख
दिए जाने की मांग की है. साथ ही फसल और अन्य हानियों का तत्काल सर्वे कराकर हानि की शत- प्रतिशत भरपाई की मांग की है.
डा. गिरीश
गुरुवार, 3 मई 2018
at 1:34 pm | 0 comments | जिन्ना, भाकपा, भाजपा, संघ परिवार
जिन्ना की तस्वीर की आड़ में देश को नफ़रत की आग में झोंकने में जुटे हैं भाजपा और संघ परिवार: भाकपा उत्तर प्रदेश
लखनऊ- 3 मई, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के
राज्य सचिव मंडल ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय छात्र संघ भवन में लगी मोहम्मद अली
जिन्ना की तस्वीर को हठाने की आरएसएस/ भाजपा की मांग और इसकी आड़ में सांप्रदायिकता
फ़ैलाने, गुंडागर्दी करने तथा हिंसा भड़काने की कोशिशों की कड़े शब्दों में निन्दा की
है.
यहां जारी एक प्रेस बयान
में भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहाकि भाजपा देश चलाने और जनता से किये वायदों
को पूरा करने में पूरी तरह विफल रही है. अतएव जनता को विभाजित करने को वह ऐसे
संवेदनशील मुद्दे खड़े कर रही है जिनसे देश और समाज को भारी क्षति पहुंचेगी.
ताज़ा मामला एएमयू में लगी
जिन्ना की तस्वीर को हठाने का है. डा. गिरीश ने कहाकि आरएसएस और जनसंघ 1977 में
जनता पार्टी की सरकार में शामिल थे. 1999 से 2004 तक भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए की
सरकार थी. और अब 4 साल से अपार बहुमत वाली भाजपा सरकार केन्द्र में है. उत्तर
प्रदेश में भी 1966 से आज तक अनेकों बार भाजपा शासन में रही है. लेकिन कभी संघ
परिवार को जिन्ना की तस्वीर हठाने की याद नहीं आयी.
लेकिन अब जबकि भाजपा हर
मोर्चे पर पूरी तरह विफल होचुकी है, और काला धन वापस लाने, हर नागरिक को रु. -15 लाख
देने, दो करोड़ युवाओं को हर साल रोजगार देने, किसानों की आमदनी दोगुना किये जाने
तथा स्वच्छ प्रशासन देने जैसे उसके खास वायदों को पूरा करने से मुकर गयी है तो
उसने तमाम विभाजनकारी मुद्दे उठाना शुरू कर दिया है. वोट की राजनीति के लिये वह देश
की युवा पीढ़ी के दिलों में नफरत का जहर घोल रही है और उन्हें अपनी घ्रणित राजनीति
का मोहरा बना रही है. अपने कुत्सित उद्देश्यों को पूरा करने को पहले उसने कासगंज
में विद्यार्थियों को दंगों की आग में झोंका तो अब अलीगढ में छात्र- नौजवानों को
नफरत की आग का ईंधन बनाया जारहा है.
जो भाजपा सरकार पूर्ण बहुमत
में होते हुये न मंदिर निर्माण करा पायी, न धारा 370 को हठा पायी 2019 के लोक सभा चुनावों के निकट आने और कर्नाटक विधानसभा चुनावों में फायदा
उठाने को वह अब जिन्ना की तस्वीर हठाने के नाम पर हिंसा और उपद्रव
पैदा कर रही है. रिकार्ड गवाह हैं कि हर चुनाव से पहले भाजपा गड़े मुर्दे उखाड़ना
शुरू कर देती है. आजादी के आन्दोलन से बाहर रहा संघ परिवार कभी भी देश में अनेक
जगह लगी अंग्रेज शासकों की मूर्तियों को हठाने की मांग नहीं करता. नहीं भाजपा
सरकार ने कभी पाकिस्तान से कूटनीतिक संबंध तोड़े हैं. अपितु श्री मोदी तो वहां बिना
आमंत्रण के ही जाचुके हैं. भाजपा को यह भी जबाव देना होगा कि उसके अनुयायी डा.
आंबेडकर और पेरियार की प्रतिमाएं क्यों तोड़ा करते हैं? क्या पेरियार और आंबेडकर ने
भी पाकिस्तान बनाया था?
डा. गिरीश ने कहाकि जहाँ तक
अलीगढ का सवाल है वहां संघी संगठनों को हिंसा और उत्पात भड़काने की खुली छूट
स्थानीय प्रशासन ने दी. उन्हें यदि एएमयू परिसर से दूर ही रोकने के बजाय पुलिस-
प्रशासन कथित जागरण मंच वालों की सुरक्षा में लगा था. भाकपा का आरोप है कि योगी
राज में पुलिस प्रशासन बेहद दबाव में काम कर रहा है. इसीलिये समूचा प्रदेश
अराजकता, गुंडागर्दी और सांप्रदायिकता की गिरफ्त में है. मुख्यमंत्री को क़ानून
व्यवस्था सुधारने से ज्यादा भाजपा के डूबते जहाज को बचाने की फ़िक्र है. कल आये
तूफ़ान में आधा सैकड़ा से अधिक लोगों के मारे जाने और भारी तबाही के बावजूद वे
कर्नाटक विधान सभा चुनाव में वोट बटोरने की कबायद में लगे हैं.
भाकपा ने अलीगढ़ में उत्पात
मचाने वाले संघियों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत कार्यवाही किये
जाने की मांग की है.
डा. गिरीश
सोमवार, 23 अप्रैल 2018
at 12:30 pm | 0 comments |
पेट्रोल- डीजल की कीमतें तत्काल नीचे लायी जायें : डा. गिरीश
लखनऊ- गत
दो दिन पहले रिकार्ड तोड़ चुकी पेट्रोल और डीजल दोनों की कीमतों में कल फिर 19 पैसे
प्रति लीटर की वृध्दि कर दी गयी. गत दो दिन पहले की वृध्दि में ही पेट्रोल ने
पिछले पांच साल का रिकार्ड तोडा दिया था जबकि डीजल पहली बार अब तक की इस ऐतिहासिक
उंचाई पर पहुंचा था.
अंतर्राष्ट्रीय बाजार में
कच्चे तेल के दामों में होरही वृध्दि के नाम पर प्रति दिन की जारही इस वृध्दि के
विरुध्द अब आवाज उठाना जरुरी होगया है. क्योंकि जब अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में
पेट्रोलियम पदार्थों के दाम रिकार्ड नीचाई पर थे तब सरकार ने कर भार बढ़ा कर उपभोक्ताओं
को इसका लाभ मिलने से वंचित किया और अब जबकि कच्चे तेल के दाम ऊपर की ओर खिसक रहे
हैं तो बाजार व्यवस्था के नाम पर प्रतिदिन कीमतें बढ़ाई जारही हैं. आम उपभोक्ता ही
नहीं समूचा बाजार इससे से ठगा महसूस कर रहे हैं.
‘एक देश एक टैक्स’ नारे के
तहत लागू किये गये जीएसटी से पेट्रोलियम पदार्थों को बाहर रखना सरकार की बदनीयती
का परिचायक है. यह अतार्किक व्यवस्था ज्यादा दिन नहीं चलने देनी चाहिए.
पेट्रोलियम पदार्थों की
कीमतों में वृध्दि के तात्कालिक और दूरगामी प्रभाव होते हैं. इससे किराया- भाड़ा बढ़
जाता है, अतः प्रत्येक उपभोक्ता वस्तु की कीमतें बढ़ जाती हैं. सिंचाई की लागत, खाद
बीज डीजल बिजली कीटनाशकों आदि की कीमतें बढ़ने से कृषि उत्पाद महंगे होजाते हैं.
जिन उद्योगों में पेट्रोलियम पदार्थों से उत्पादन होता है वहां तो दोहरी मार पड़ती
है. मुद्रास्फीति की दर बड़ने से चहुन्तरफा महंगाई की मार झेलनी पड़ती है. विकास
ठिठक जाता है.
लेकिन आश्चर्य की बात है कि
विकास विकास का दिन रात ढिंढोरा पीटने वाली सरकार सब कुछ भूल, लूट में लगी है.
संप्रग सरकार के ज़माने में बाहर से समर्थन देरहे वामदलों ने पेट्रोल डीजल के दाम न
बढ़ने देने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी, और उपभोक्ताओं को लाभ पहुँचाया था. पर एनडीए
के घटक दल मौन हैं. आम जनता के हित में उन्हें सरकार पर दबाव बनाना चाहिए.
लेकिन सबसे ज्यादा
आश्चर्यजनक इस मुद्दे पर मध्यम वर्ग की चुप्पी है. जाति- धर्म की राजनीति में बंटा
और निजी स्वार्थों के लिये ही मुखर होने वाले मध्यवर्ग को अब अपने जबड़े इस बढ़ोतरी
के खिलाफ खोलने चाहिए.
मैं भाकपा कार्यकर्ताओं,
वामपंथी साथियों और जनहितैषी अन्य शक्तियों से आग्रह करता हूँ कि वे किसी न किसी
रूप में पेट्रोलियम पदार्थों की महंगाई पर प्रतिरोध दर्ज करायें और सरकार से मांग
करें कि वह इन पर कर भार तत्काल घटा कर कीमतों को नीचे लाये. इन्हें जीएसटी के
दायरे में लाने के लिये सभी को दबाव बनाने की जरूरत है.
और अंत में कुछ निजी उपाय.
मैं स्वयं सप्ताह में एक दिन पेट्रोल डीजल उपयोग न करने का उपवास करूंगा. सप्ताह
में एक दिन ऐसे किसी वाहन में यात्रा नहीं करूंगा जो पेट्रोल अथवा डीजल से चलता
हो. आप भी यह प्रयास सकते हैं.
डा. गिरीश
शनिवार, 21 अप्रैल 2018
at 1:31 pm | 0 comments |
भाजपा को सत्ता से बेदखल करने को लामबंद होरही हैं देश की प्रमुख कम्युनिस्ट पार्टियां
देश की तीन प्रमुख कम्युनिस्ट
पार्टियां अन्य वामपंथी जनवादी दलों को साथ लेकर केंद्र की घोर जनविरोधी, छलिया,
सांप्रदायिक और फासीवादी रुझानों से परिपूर्ण भाजपा की केन्द्र सरकार को 2019 में
सत्ता सिंहासन से अपदस्थ करने की रणनीति को अंजाम देने में जुटी हैं. भारतीय कम्युनिस्ट
आन्दोलन में विभाजन के बाद यह पहला अवसर है जब देश की तीन कम्युनिस्ट पार्टियां-
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ( मार्क्सवादी ) तथा भाकपा-
माले ( लिबरेशन ) एक सामान्य राजनैतिक रणनीति बनाने के बेहद करीब हैं.
देश की सबसे पुरानी
कम्युनिस्ट पार्टी- भाकपा ने लगभग 10 माह पूर्व ही अपनी इस परिकल्पना को प्रस्तुत
कर दिया था कि भाजपा द्वारा जनता, हमारे सामाजिक ताने बाने, लोकतंत्र और संविधान
पर किये जारहे हमलों का जबाव देने के लिये एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक और वामपंथी
शक्तियों प्लेटफार्म तैयार किया जाये. 25 से 29 अप्रैल तक केरल के शहर कोल्लम में
होने जारहे भाकपा के 23 वें महाधिवेशन में इसी रणनीति को अंतिम रूप दिया जाना है.
शब्दों का हेर फेर होसकता
है लेकिन माकपा के हैदराबाद में चल रहे 22 वें महाधिवेशन में कल पारित राजनैतिक
प्रस्ताव में इस बात पर जोर दिया गया है कि हमारी मुख्य लड़ाई भाजपा/ आरएसएस से है
और इसे परास्त करने को जनता के व्यापकतम हिस्सों को लामबंद किया जाना चाहिये. गत
माह संपन्न भाकपा- माले के महाधिवेशन में पारित प्रस्ताव में भाजपा को मुख्य
चुनौती मानते हुये इसे सत्ता से हठाने को वामपंथी लोकतांत्रिक शक्तियों को बड़े
पैमाने पर गोलबंद करने की जरूरत पर बल दिया गया.
निश्चय ही देश की
लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष ताकतों को लामबंद करने में कम्युनिस्ट पार्टियों की
साझा रणनीति एक आधार का काम करेगी. वामपंथ में बन रही इस व्यापक रणनीतिक एकता के
वस्तुगत और अपरिहार्य कारण भी हैं.
देश आजादी के बाद के सबसे
जटिल संकट से गुजर रहा है. देश और अधिकतर राज्यों की सत्ता ऐसे समूह के हाथों में
केन्द्रित है जो संपूर्णतः देश के मेहनतकशों के हितों पर डाका डाल कर पूंजीपतियों
की तिजौरियां भरने को प्रतिबध्द है. देश की आबादी का लगभग 70 प्रतिशत भाग आज भी
ग्रामों में रहता है. यह ग्रामीण भारत खेती और खेती से जुड़े लघु उद्यमों पर आश्रित
है. आज यह ग्रामीण समुदाय आर्थिक रूप से सबसे अधिक असुरक्षित और विपन्न है. कारण-
खेती बेहद घाटे का सौदा बन चुकी है. पूंजीवादी अर्थतंत्र खेती के बल पर टिका हुआ
है पर खेती किसान की लागत और उसके परिश्रम को निगल रहा है. खेती बदहाल है तो उससे
जुड़े लघु और कुटीर उद्योग भी वरबाद हैं.
खेती और उसकी बदहाली के कई
कारण हैं. कृषि उत्पादों की कीमतें तय करने का अधिकार किसान के पास नहीं है. कुछेक
खाद्यान्नों की कीमतें सरकार तय करती है तो फल सब्जी और कई अन्य की कीमतें मंडी
में मांग- आपूर्ति के आधार पर तय होती हैं. यह लागत, जमीन के किराये और किसान के परिश्रम
की तुलना में काफी कम होती हैं. इसके अलाबा खेती में काम आने वाली हर वस्तु की
कीमत मुनाफे पर आधारित बाजार निर्धारित करता है. इससे खेत्ती का लागत मूल्य बढ़
जाता है. प्राकृतिक आपदाओं की मार भी किसानों के ऊपर ही पड़ती है.
इन्हीं वजहों से किसान
निरंतर घाटे के चलते कर्जदार होता जारहा है. बैंक ऋण हासिल करने में आने वाली
कठिनाइयां उसे सूदखोरों से कर्ज लेने को बाध्य करती हैं. यही वजह है कि कर्ज में
डूबे पीड़ित किसानों द्वारा आत्महत्यायें करने का दौर थमने का नाम नहीं लेरहा.
भाजपा और मोदी ने गत लोकसभा चुनावों के दौरान किसानों की आमदनी दोगुना करने का
वायदा किया था. अन्य वायदों की तरह यह भी जुमला साबित हुआ. ग्रामीण श्रमिकों की
जीवनरेखा- मनरेगा को भी सीमित कर दिया गया है.
यद्यपि गत शताब्दी के
सातवें दशक से ही मन्दी और उद्योग बन्दी शुरू होगयी थी लेकिन 1991 में शुरू हुये
आर्थिक नवउदारवाद के दौर में मंदी और उद्योग बंदी की यह रफ़्तार और तेज होगयी. मोदी
सरकार के कतिपय कदमों जिनमें नोटबन्दी और जीएसटी का लागू किया जाना प्रमुख हैं, ने
हालातों को और संगीन बना दिया है. फलतः हमारी अर्थव्यवस्था में चहुँतरफा गिरावट
स्पष्ट दिखाई दे रही है. डालर के मुकाबले रूपये की कीमत गिर कर निम्नतम स्तर पर
पहुंच गयी है. आयात बढ़ा है और निर्यात घटा है. सकल घरेलू उत्पाद ( जीएसटी ) की दर
हो या औद्योगिक उत्पादन की दर, हरएक में लगातार क्षरण होरहा है.
अतएव बेरोजगारी में बेतहाशा
वृध्दि हुयी है. मोदीजी ने दो करोड़ नौजवानों को हर वर्ष रोजगार देने का वायदा किया
था पर उन्हें रोजगार देने के बजाय सिर्फ मुद्रा, स्टार्टअप, स्किल इंडिया और
डिजिटल इंडिया आदि नारों से बहलाने की कोशिश की जारही है. पूंजीपतियों जिनके कतिपय
हिस्से आज कारपोरेट घराने बन चुके हैं, को लाभ पहुंचाने को जनता की गाड़े पसीने की
कमाई से स्थापित हुये व स्वदेशी बुध्दिमत्ता और परिश्रम से विकसित हुये सार्वजनिक
उद्यमों को उनके हाथों बेचा जारहा है. बैंकों में जमा आम जनता के धन को धनिक वर्ग
को दिलाया जारहा है जिसे वे वापस करने के बजाय बट्टे खाते में डलवा रहे हैं या फिर
बैंकों से भारी रकमें लेकर विदेशों को भाग रहे हैं. बैंकों से लगातार होरही इन
अवैध निकासियों का भार सामान्य निवेशकों पर डाला जारहा है. जितने घपले घोटाले
संप्रग सरकार के दो कार्यकालों में हुये थे उससे कहीं ज्यादा राजग/ भाजपा के चार
सालों में होचुके हैं.
अब पेट्रोल और डीजल की
कीमतों ने ऐतिहासिक ऊंचाई छू ली है. जिससे पहले से आसमान छूरही महंगाई को और भी
पंख लगने वाले हैं. पेटोलियम पदार्थों के सस्ते होते हुए भी उपभोक्ताओं को महंगे दामों
पर बेचने वाली सरकार अब बढ़ती कीमतों का भार अपने सर पर लेने को तैयार है न उसको
जीएसटी के अंतर्गत लाने को तैयार है.
सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली
को वरबाद करने की प्रक्रिया दशकों से जारी थी लेकिन मोदी राज में वह और तेज हुयी
है. शिक्षा का बजट निम्नतम स्तर पर ला दिया गया है. अब चुनींदा और प्रतिष्ठित
विश्वविद्यालयों को निजीकरण की दिशा में धकेला जारहा है. नीति यह है कि इसे इतना
महंगा बना दिया जाये कि समाज के सामान्य हिस्से इससे वंचित होजायें और वे लुटेरी
और शोषक पूंजीवादी व्यवस्था की भट्टी में जलने वाले सस्ते ईंधन के तौर पर स्तेमाल
होते रहें. इस उद्देश्य से श्रम कानूनों को भी कमजोर बनाया जारहा है. शिक्षा को
धर्मान्धता, पाखण्ड, पोंगापंथ और सांप्रदायिकता फ़ैलाने का औजार बनाने को इसके
पाठ्यक्रमों में प्रतिगामी बदलाव किये जारहे हैं. इतिहास, कला और संस्कृति की
व्याख्या संघ के द्रष्टिकोण से की जारही है.
स्वास्थ्य सेवायें भी सरकार
के निशाने पर हैं और वे भी बेहद महंगी और आम आदमी की पहुंच से बाहर होती चली जारही
हैं. सार्वजनिक वितरण प्रणाली को पंगु बना कर गरीबों के मुहँ का निवाला छीना जारहा
है. हर तरह की सब्सिडी को खत्म किया जारहा है.
आतंकवाद को समाप्त करने और
सीमापार के दुश्मनों का खात्मा करने के मोदी और भाजपा के दावों का खोखलापन इसीसे
से जाहिर होजाता है कि गत चार सालों में पूर्व के भारत- पाक युध्दों से भी अधिक
संख्या में हमारे सैनिक और अन्य सुरक्षा बलों के जवान शहीद होचुके हैं.
मोदी, भाजपा और आरएसएस की
तिकड़ी और कारपोरेट हितों की पोषक इस सरकार के प्रति जनता का मोहभंग तेजी से बढ़ रहा
है. हाल में कई राज्यों में हुये उपचुनावों, निकाय और अन्य चुनावों के परिणामों ने
भाजपा के पैरों तले से जमीन के खिसकने का संकेत दे दिया है. उत्तर प्रदेश के गोरखपुर
और फूलपुर की लोकसभा सीटें जिन पर प्रदेश के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री जीते थे, पर भाजपा की करारी हार ने साबित कर
दिया है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की पराजय का रास्ता तैयार होरहा है.
उनका दावा कि “मोदी का कोई विकल्प नहीं”, उत्तर प्रदेश में ही दम तोड़ रहा है.
लेकिन संपूर्ण सत्ता का
स्वाद चख चुकी भाजपा और उसका रिंग मास्टर आरएसएस इसे इतनी आसानी से छोड़ने वाला
नहीं. बेनकाबी जितनी तेजी से बढ़ रही है उसको नकाब पहनाने के प्रयास भी उतनी ही
तेजी से बढ़ रहे हैं. अतएव हर वह हथकंडा जो जनता को गुमराह और विभाजित कर सके
अपनाया जारहा है. सभी जानते हैं कि मंदिर- मस्जिद विवाद सर्वोच्च न्यायालय के
विचाराधीन है और उसका फैसला आने पर ही हल हो सकता है. फिर भी मंदिर निर्माण के लिये
लगातार तीखे बोल बोले जारहे हैं. कथित लव जिहाद, गोरक्षा और तीन तलाक जैसे मुद्दों
की आड़ में अल्पसंख्यकों और दलितों को निशाना बनाया जारहा है. दंगे कराये जारहे हैं
और दंगों तथा हत्याओं में संलिप्त संघी
अपराधियों को आरोपों से मुक्त किया जारहा है. आरक्षण के सवाल पर भी भाजपा समाज को
बांटने का काम कर रही है. विभाजनकारी यह एजेंडा दिन व दिन धारदार बनाया जाना है.
संविधान और न्यायिक प्रणाली तक को बदलने का प्रयास जारी है.
कारपोरेट हितों की पोषक और
फासिस्टी रुझानों से सराबोर इस सरकार को सत्ताच्युत करना आज हर लोकतंत्रवादी ताकत
का सबसे प्रमुख लक्ष्य बन गया है. कम्युनिस्ट पार्टियां महसूस करती हैं कि जनविरोधी,
लोकतंत्र और संविधान विरोधी इस सरकार को अपदस्थ करने को एक व्यापक और व्यावहारिक
रणनीति बनाई जाये. सभी लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और वामपंथी ताकतों का एक
प्लेटफार्म तैयार कर संघर्षों को नयी उंचाइयों तक लेजाया जाये. बरवादी की जड़
आर्थिक नवउदारवाद की नीतियों का एक आर्थिक- सामजिक विकल्प पेश किया जाए.
सांप्रदायिकता, धर्मान्धता और रूढ़िवादिता के खिलाफ वैचारिक मुहीम चलाई जाये. तीनों
कम्युनिस्ट पार्टियों के राजनैतिक दस्तावेजों में इन तथ्यों को शिद्दत के साथ
रेखांकित किया गया है. भारत के वामपंथी लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष आन्दोलन के
लिये यह एक नयी शुरुआत है.
डा. गिरीश
शुक्रवार, 20 अप्रैल 2018
at 6:13 pm | 0 comments |
बलात्कार रोको, दलितों का उत्पीडन बन्द करो, अपराध रोको : वामदल
लखनऊ- कठुआ, उन्नाव, एटा, सिकंदरा राऊ ( हाथरस ), नोएडा, पीलीभीत, सूरत तथा देश और उत्तर
प्रदेश के हर कोने से महिलाओं और अबोध बालिकाओं के साथ बलात्कार, सामूहिक बलात्कार
और बलात्कार के बाद हत्याओं की दिल दहलाने वाली खबरें आरही हैं. विदेशों तक में इन
शर्मनाक वारदातों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन होरहे हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ तक ने
इन घटनाओं पर गहरी चिन्ता जतायी है. अल्पसंख्यकों के बाद अब दलित- गरीब और पिछड़े सामंती
और सरकारी उत्पीडन के शिकार होरहे हैं. फर्जी एनकाउंटरों में नौजवान मौत के घाट
उतारे जारहे हैं. अपराध थमने के बजाय बढ़ते ही जारहे हैं. पुलिस प्रशासन लूट खसोट
में मस्त है. आमजन त्राहि त्राहि कर रहा है.
इन सभी मुद्दों पर केन्द्र
और उत्तर प्रदेश की सरकार की निद्रा तोड़ने के उद्देश्य से आज वामपंथी दलों ने
समूचे उत्तर प्रदेश में जिला और तहसील मुख्यालयों पर विरोध प्रदर्शन किये.
प्रदर्शनों के बाद जिले के संबंधित अधिकारियों को राष्ट्रपति और राज्यपाल को
संबोधित ज्ञापन दिए गए. ज्ञापनों में प्रमुख रूप से बलात्कारियों के खिलाफ सख्त और
त्वरित कार्यवाही किये जाने, दलितों- कमजोरों का उत्पीडन रोके जाने, अपराधों पर
नियंत्रण करने और राजनैतिक उद्देश्य से किये जारहे एन्काउन्टरों को रोके जाने की
मांग की गयी.
वामदलों का आरोप है कि
भाजपा और उसकी सरकार दबंगों, सामंतवादी और जातिवादी तत्वों तथा शोषक वर्गों के
हितों को साधने में लगी है, शासक दल के विधायक और सांसद जो आपराधिक और आर्थिक
आपराधिक प्रष्ठभूमि के हैं, एक के बाद एक वारदातों को अंजाम देरहे हैं लेकिन
ध्रतराष्ट्रवादी सरकार उनको बचाने में लगी रहती है. 2 अप्रैल के भारत बंद के बाद
दलितों पर नए हमलों की शुरूआत होचुकी है और उन्हें जेलों में ठूँसा जारहा है.
महिलाओं की रक्षा का भरोसा दिलाने के बजाय भाजपा के अग्रणी नेता उनके प्रति कड़वे
बोल बोल रहे हैं. कठुआ में तो भाजपा के मंत्रियों और नेताओं ने बलात्कारियों के
पक्ष में जुलूस निकाले.
वामपंथी दलों ने आरोप लगाया
है कि एनकाउन्टर के नाम पर योगी सरकार राजनीति कर रही है. सुनियोजित तरीके से
दलितों अल्पसंख्यकों और अन्य गरीबों के घरों के नौजवानों की हत्या की जारही है. 14
सौ से अधिक इन हत्याओं के बावजूद अपराधों में कमी न आना इस बात का जीता जागता
प्रमाण है कि अपराधी आजाद घूम रहे हैं और निर्दोष लोग मौत के घाट उतारे जारहे हैं.
वामदलों के इस आन्दोलन में भारतीय
कम्युनिस्ट पार्टी, भाकपा- ( मार्क्सवादी ), भाकपा- माले, फारबर्ड ब्लाक और
एसयूसीआई- सी के कार्यकर्ताओं ने भाग लिया. भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने दाबा
किया कि फसलों की कटाई और मढ़ाई के सीजन के बावजूद वामदलों के इस आन्दोलन में बड़ी
संख्या में लोगों ने भाग लिया.
डा. गिरीश
रविवार, 8 अप्रैल 2018
at 5:12 pm | 0 comments |
९ अप्रेल जन्म दिवस पर : अद्भुत घुमक्कड़, प्रखर साहित्यकार और समाजवादी क्रांति के अग्रदूत थे महापंडित राहुल सांकृत्यायन
बहुभाषाविद, अग्रणी विचारक,
यायावर, इतिहासविद, तत्वान्वेषी, युगपरिवर्तनकारी साहित्य के रचयिता, किसान नेता,
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, साम्यवादी चिन्तक बहुमुखी प्रतिभा के धनी महापंडित
राहुल सान्क्रत्यायन की 125 वीं जन्मशती इस वर्ष सारा देश और विश्व मनाने जारहा
है. लेकिन बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी इस मनीषी के बारे में युवा पीढ़ी पूरी तरह
अनभिज्ञ है. जबकि गत शताब्दी के उत्तरार्ध्द में उनकी पुस्तक “ वोल्गा से गंगा” के
प्रति नौजवानों की दीवानगी देखते बनती थी और बुक स्टालों पर उसका स्टाक निल होते
देर नहीं लगती थी.
9 अप्रेल 1893 में उत्तर
प्रदेश के जनपद- आजमगढ़ के ग्राम- पन्दहा में अपनी ननिहाल में जन्मे राहुल
सान्क्रत्यायन का बचपन का नाम केदारनाथ पाण्डेय था. लेकिन जीवन के हर क्षेत्र में
चरैवेति चरैवेति सिध्दांत को व्यवहार में उतारने वाले राहुल जी के नाम में भी
क्रमशः परिवर्तन होता गया जो अंततः महापंडित राहुल सान्क्रत्यायन पर जाकर थमा.
बचपन में परिवारियों द्वारा रचाये विवाह की प्रतिक्रिया में घर से भागे बालक केदार
जब मठ की शरण में गये तो उनका नाम राम उदार दास होगया. जब बौध्द धर्म अपनाया तो
राहुल कहलाये और जब काशी की पंडित सभा ने उन्हें महापंडित की उपाधि दी तो वे
महापंडित राहुल बने और अपने सान्क्रत्यायन गोत्र के चलते महापंडित राहुल
सान्क्रत्यायन नाम से पुकारे जाने लगे. बाद में इसी नाम से उनकी ख्याति हुयी.
वैष्णव परिवार में जन्मे
राहुल जी की वैचारिक यायावरी भी कम रोचक नहीं है. वेदान्त अध्ययन के बाद मंदिरों
में पशु बलि दिए जाने के खिलाफ जब उन्होंने भाषण दिया तो अयोध्या के सनातनी
पुरोहितों ने उन्हें लाठियों से पीटा. तदुपरांत वे आर्य समाजी होगये. जब आर्य समाज
उनकी ज्ञान पिपासा को शांत नहीं कर सका तो उन्होंने बौध्द धर्म अपना लिया. अंततः
जीवन संघर्षों ने उन्हें मार्क्सवादी बना दिया.
हिन्दी भाषा और साहित्य को
राहुल जी ने जो कुछ दिया वह अभी तक अकेले किसी विद्वान ने नहीं दिया. लगभग दो सौ पुस्तकों
की रचना और अनुवाद का श्रेय उन्हें जाता है. यात्रा वृत्तान्त, यात्रा साहित्य,
कहानियां, उपन्यास, निबन्ध, आत्मकथा, जीवनियाँ, विश्व दर्शन आदि सभी पर उन्होंने लिखा
और अनुवाद किया. किन्नर देश की ओर, कुमाऊँ, दार्जिलिंग परिचय, यात्रा के पन्ने,
घुमक्कड़ शास्त्र तथा मध्य एशिया का इतिहास जैसी पुस्तकें उनके घुमक्कड़ी के ज्ञान
पर आधारित हैं. उन्हें भारत का ह्वेनसांग कहा जाए तो कम है. घुमक्कड़ों के लिये
उन्होंने सन्देश दिया कि “ कमर बांध लो घुमक्कड़ो संसार तुम्हारे स्वागत के लिये
बेकरार है”. वे हिंदी यात्रा साहित्य के पितामह थे. मध्य एशिया और काकेशस भ्रमण पर
भी उन्होंने ग्रन्थ लिखे. उनकी दो खण्डों में लिखी पुस्तक “मध्य एशिया का इतिहास”
तत्कालीन सोवियत संघ के विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल थी.
वोल्गा से गंगा उनकी कालजयी
रचना है. छठवीं ईसा पूर्व के बोल्गा नदी तट से लेकर 1942 के पटना के गंगाघाट तक की
मानव की ढाई हजार वर्ष की ऐतिहासिक- सांस्कृतिक यात्रा को रोचक 20 कहानियों में
निबध्द कर देना राहुल के ही वश की बात है. ज्ञान की भूख में भारत और विश्व का निरंतर
भ्रमण करने वाले राहुलजी जहाँ भी जाते वहां की भाषा बोली सीख जाते और उन पर निबंध
और टिप्पणियाँ लिखते जाते. वे 36 भाषाओं के ज्ञाता थे. भारत की संस्कृति, साहित्य
और समाज का उन्होंने गूढ़ अध्यन किया. प्राचीन और वर्त्तमान साहित्य के चिंतन को आत्मसात
कर उन्होंने उसे मौलिक द्रष्टि दी.
बौध्द धर्म की ओर झुकाव
होने के बाद उन्होंने तिब्बत और श्रीलंका की यात्रायें कीं. उनकी घुमक्कड़ी, शोध,
खोज और लेखन साथ साथ चलते थे. उन्होंने ड्राइंग रूम में बैठ कर शायद ही कुछ लिखा
हो. अपनी चार बार की तिब्बत यात्रा के दौरान उन्होंने तिब्बती भाषा में अनूदित वे
ग्रन्थ खोज निकाले जो भारत में नष्ट कर दिए गए थे. आर्थिक और तमाम कठिनाइयों का
सामना करते हुये वे इस ज्ञान- राशि को 18 खच्चरों पर लाद कर भारत ले आये जो पटना
संग्रहालय में रखी गयीं हैं और शोधार्थियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं.
जब वे दक्षिण भारत गए तो
उन्होंने संस्कृत भाषा और उसके सम्रध्द साहित्य का अध्ययन किया. तिब्बत में पाली
भाषा और पालिग्रंथों का अध्यन किया, लाहौर में उन्होंने अरबी भाषा सीखी और
इस्लामिक ग्रन्थोंका अध्ययन किया. उन्होंने “इस्लाम धर्म की रूपरेखा” नामक पुस्तक
लिखी जो मुस्लिम और गैर मुस्लिम दोनों कट्टरपंथियों को जबाव है. उनकी औपचारिक
शिक्षा मात्र प्राथमिक थी लेकिन अपनी विद्वता के बल पर वे लेनिनग्राद में संस्कृत
के अध्यापक बने. श्रीलंका के विश्वविद्यालय ने उन्हें बौध्द दर्शन का प्रोफेसर
नियुक्त किया जहां वे बहुत कम वेतन पर पढ़ाते थे. उनकी विद्वता से प्रभावित नेहरूजी
उन्हें किसी विश्विद्यालय का कुलपति बनाना चाहते थे मगर उनके शिक्षामंत्री ने
औपचारिक डिग्रियां न होने के कारण हाथ खड़े कर दिये.
राहुल जी की राजनैतिक
यात्रा कम रोचक नहीं है. 1917 की रूस की समाजवादी क्रांति ने उन्हें गहरे से
झकझोरा. 1940 नें अखिल भारतीय किसान सभा, बिहार कमेटी के अध्यक्ष के रूप में वे
जमींदारों के जुल्म के खिलाफ लड़ने को किसानों के साथ हंसिया लेकर खेतों में उतर
पड़े. उन पर लाठियों से हमला हुआ और वे गंभीर रूप से घायल हुये. उन्होंने कई
जनसंघर्षों का सक्रिय नेतृत्व किया. किसानों कामगारों की आवाज को मुखर अभिव्यक्ति
दी. इन आन्दोलनों में सक्रीय भागीदारी के चलते उन्हें एक साल की जेल हुयी. देवली कैम्प ( जेल ) में उन्होंने विश्व
प्रसिध्द पुस्तक “दर्शन- दिग्दर्शन” लिख डाली.
1942 के भारत छोडो आन्दोलन
के बाद किसान सभा के संस्थापक स्वामी सहजानंद सरस्वती के साप्ताहिक अखबार “हुंकार”
का उन्हें संपादक बनाया गया. अंग्रेजी हुकूमत ने उस समय फूट डालो और राज करो की
नीति के तहत एक विज्ञापन जारी किया जिसमें हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन के नेताओं की
विक्रत तस्वीर पेश की गयी थी. राहुल जी ने इस विज्ञापन को छापना मंजूर नहीं किया
और वह अख़बार ही छोड़ दिया.
मार्क्सवाद, अनात्मवाद,
बुध्द के जनतंत्र में विश्वास और व्यक्तिगत संपत्ति के विरोध जैसी सामान बातों के
चलते वे बौध्द दर्शन और मार्क्सवाद को साथ लेकर चले. उन्होंने मार्क्सवादी
विचारधारा को भारतीय समाज की ठोस परिस्थितियों का आकलन करके ही लागू करने पर जोर
दिया. उनकी पुस्तकों “वैज्ञानिक भौतिकवाद”
और “दर्शन दिग्दर्शन” में इस पर पर्याप्त प्रकाश डाला गया है. उन्होंने समाज
परिवर्तन के सिपाहियों को शिक्षित करने के उद्देश्य से “भागो नहीं दुनियां को बदलो”
और “तुम्हारी क्षय” जैसी पुस्तकें लिखीं.
राहुलजी एक राष्ट्रभाषा के
सिध्दांत के प्रबल हिमायती थे. वे कहते थे कि बिना भाषा के राष्ट्र गूंगा है. उनका
कहना था कि राष्ट्रभाषा और जनपदीय भाषाओं के विकास में कोई विरोधाभाष नहीं. अपने
भाषागत सिध्दांतों पर अटल राहुल जी ने 1947 के अखिल भारतीय साहित्य सम्मलेन के
अध्यक्ष के रूप में पहले से लिखित भाषण को पढ़ने से मना कर दिया. उन्होंने जो भाषण
दिया वह अल्पसंख्यक संस्कृति और भाषाई सवाल पर कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों के
विपरीत था. अतएव उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता से वंचित कर दिया गया. परन्तु
इससे न उन्होंने अपने विचार बदले और न ही तेबर. वे निरंतर संघर्षरत रहे. नए भारत
के निर्माण का उनका मधुर स्वप्न उनकी पुस्तक “बाईसवीं सदी” में देखने को मिलता है.
1953- 54 के दौरान वे पुनः भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल कर लिए गए.
आजीवन देश विदेश घूमने वाले
राहुल जी अपने पिता के गाँव कनैला अधेढ़ अवस्था में गये और अपनी विवाहिता पत्नी से
मिले जिन्हें उन्होंने पहली बार देखा था. उनके अजस्र त्याग को देख वे भावुक होगये.
अपनी भावुकता को उन्होंने अपनी पुस्तक “कनैला की कथा” में बेहद भावुक शब्दों में
लिखा है. उन्हें पद्मभूषण और पद्म विभूषण जैसे पुरुष्कारों से नवाजा गया. 1993 में
उनकी जन्मशती पर एक डाक टिकिट भी जारी किया गया.
स्मृति लोप होजाने पर
उन्हें इलाज के लिये मास्को लेजाया गया. पर उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ. मास्को
से लौटने के बाद 14 अगस्त 1963 में 70 वर्ष की आयु में दार्जिलिंग में उनका निधन
होगया. आज इस बेजोड़ शख्सिय्त को युवा पीढी से रूबरू कराने की ख़ास जरूरत है.
डा. गिरीश
सोमवार, 2 अप्रैल 2018
at 7:40 pm | 0 comments |
भारत बंद की गंभीरता को समझ नहीं पायी भाजपा: भाकपा
लखनऊ- 2 अप्रेल 2018,
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने अनुसूचित जाति/ जनजाति उत्पीडन
प्रतिरोधक क़ानून को कमजोर किये जाने के विरोध में विभिन्न दलित संगठनों द्वारा
आयोजित भारत बंद के दौरान उत्तर प्रदेश सहित देश के विभिन्न राज्यों में भड़की
हिंसा को संबन्धित राज्य सरकारों की विफलता बताया है. भाकपा ने इन हिंसक
कार्यवाहियों में हुयी धन और जन हानि पर गहरी चिंता व्यक्त की है. पार्टी ने इस
हिंसा के बहाने भाजपा सरकारों द्वारा दलित समुदाय और आन्दोलन समर्थकों पर जगह जगह
किये जारहे पुलिस दमन की निंदा की है. पार्टी ने सभी पक्षों से शान्ति बनाये रखने
की अपील की है.
यहां जारी एक प्रेस बयान
में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहाकि गत चार वर्षों में एनडीए की केन्द्र
सरकार और एक साल में उत्तर प्रदेश सरकार के कदमों से अनुसूचित जातियों, जनजातियों
और अन्य गरीबों में बेहद गुस्सा है. उनकी जमीनें छीनी जारही हैं, उनके लिये
निर्धारित सरकारी योजनाओं का लाभ उन्हें नहीं मिल पारहा, भाजपा और आरएसएस समर्थित
गुंडे उनका उत्पीडन कर रहे हैं, महिलाओं के साथ बदसलूकी की वारदातें बड़ी हैं, पुलिस
उन्हें प्रताड़ित कर रही है, जगह जगह डा. अंबेडकर, लेनिन और दलितों की अस्मिता के
प्रतीक महापुरुषों की मूर्तियाँ तोड़ी जारही है, आरक्षण समाप्त करने की बातें की
जारही हैं तथा संविधान को बदलने की धमकियां दी जारही हैं.
ऐसे में एस. सी. -एस. टी.
एक्ट को लेकर सर्वोच्च न्यायलय में दायर वाद में केंद्र सरकार और भाजपा की
षड्यंत्रकारी भूमिका और न्यायालय के निर्णय के बाद देश भर के दलितों में आक्रोश की
लहर दौड़ गयी. प्रतिरोध इतना व्यापक था कि स्वयं भाजपा के अन्दर अनुसूचित वर्ग के
लोगों ने इस निर्णय पर खुल कर अप्रशन्नता जतायी.
लेकिन अधिकतर राज्यों में भाजपा
की सरकारें इस आक्रोश के प्रति मगरूर बनी रहीं और आंदोलन की आड़ में असामाजिक
तत्वों ने हिंसा फैला दी जिसमें जान और माल का बेहद नुकसान हुआ है. भाकपा इस पर
गहरी चिंता प्रकट करती है. लेकिन इस हिंसा के बाद पुलिस ने आन्दोलनकारियों के
खिलाफ बिना सम्यक विवेचना के ही उत्पीडनात्मक कार्यवाहियां शुरू कर दी हैं जिनको
कदापि उचित नहीं ठहराया जा सकता. केवल हिंसा के लिए जिम्मेदार असामाजिक तत्वों के
खिलाफ कार्यवाही की जानी चाहिये, भाकपा मांग करती है.
डा. गिरीश
शुक्रवार, 30 मार्च 2018
at 5:04 pm | 0 comments |
रामराज्य और समाजवाद
उत्तर प्रदेश के
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा बजट भाषण पर चर्चा के दौरान विधान परिषद् में
“समाजवाद” को लेकर दिए गये वक्तव्य ने एक नई बहस को जन्म देदिया है. हो सकता है कि
बड़बोले श्री आदित्यनाथ ने यह बातें समाजवादी पार्टी के नाम में विहित समाजवाद को
लक्षित कर कही हों, लेकिन उन्होंने इसे व्यापक फलक देते हुये जो कुछ कहा वह
आश्चर्य में डालने वाला है. उन्होंने कहाकि प्रदेश की जनता अब तय कर चुकी है कि
उन्हें समाजवाद नहीं रामराज्य चाहिये. उन्होंने न केवल समाजवाद को धोखा कहा बल्कि
उसे समाप्तवाद तक कह डाला. उन्होंने समाजवाद की तुलना जर्मनी के नाजीवाद और इटली
के फासीवाद तक से कर डाली.
विपक्षी सदस्यों द्वारा यह
याद दिलाने पर कि समाजवाद शब्द संविधान की प्रस्तावना में दर्ज है, और
मुख्यमंत्रीजी उसे धोखा बता रहे हैं; वे भागते नजर आये. उन्होंने विपक्ष से
प्रतिप्रश्न किया कि संविधान में समाजवाद शब्द कब जोड़ा गया? उनका आशय इसे इंदिरा
सरकार से जोड़ कर खारिज करना था जिनके कि कार्यकाल में संसद ने इसे संविधान में
जोड़ा.
अब यह तो समय ही बतायेगा कि
प्रदेश की जनता क्या तय कर चुकी है और आगे क्या तय करेगी. लोकतंत्र में समय समय पर
सरकारों के क्रियाकलापों और कार्यप्रणाली के अनुसार जनता अपना मत और मंतव्य बदलती
रहती है, यह योगी आदित्यनाथ से ज्यादा कौन जानता है. जिस गोरखपुर की लोकसभा सीट पर
दशकों से योगीमठ का कब्ज़ा था उसे मतदाताओं ने एक पल में उनसे छीन लिया.
वस्तुतः रामराज्य एक कल्पना
है जिसका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं. यह एक मिथक है; हमारे मनीषियों और
कवियों की सुशासन के बारे में एक सुखद परिकल्पना है. यह अभी तक के इतिहास के किसी
दौर में न तो अस्तित्व में था, और न ही इसके अस्तित्व के कहीं कोई प्रमाण ही मिलते हैं. लेकिन राम के आख्यान के लोकप्रिय
होने के बाद शासक और शासक तबके रामराज्य का नाम लेकर जन- मानस को भरमाते रहे हैं. योगी
जैसे शासकों के लिये ये पूंजीवाद की विकृतियों को ढांपने की कवायद मात्र है.
लेकिन समाजवाद गत चार
शताब्दियों के राजनैतिक चिंतकों के अब तक की शासन व्यवस्थाओं के अध्ययन के उपरांत
अधिरूपित की गयी समाज व्यवस्था है जिसको मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन के विचारों ने
गढ़ा, और जो आज से सौ वर्ष पहले रूस की समाजवादी क्रांति के बाद अस्तित्व में आई.
यद्यपि अनेक बाह्य और आतंरिक कारणों से लगभग सात दशकों तक अस्तित्व में रहने के
बाद रूस की यह समाजवादी व्यवस्था ढह गयी लेकिन इसकी विशाल उपलब्धियां आज भी
पूंजीवादी व्यवस्था को मुहं चिड़ा रही हैं. क्यूबा और वियतनाम जैसे देश आज भी इस
व्यवस्था के जरिये अपने नागरिकों के जीवन को समुन्नत बना रहे हैं तो लैटिन अमेरिका
एवं अफरीकी महाद्वीप के कई देश तमाम
दबावों के बावजूद इस दिशा में बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं.
भारत में आधुनिक समाजवाद का
स्वरूप हमारी आजादी के आन्दोलन और विश्व सर्वहारा के क्रांतिकारी आन्दोलन के साथ
मजबूती से जुड़ा है. वह किसी की दया या कृपा पर निर्भर नहीं है. कार्ल मार्क्स,
एंगेल्स और लेनिन भारत की दुर्दशा और उसके भविष्य को बहुत बारीकी से देख रहे थे.
कार्ल मार्क्स ने भारत को ‘महान और दिलचस्प’ देश कहने के साथ ही “ हमारी भाषाओं और
धर्मों का उद्गम” कहा. मार्क्स और एंगेल्स ने सिध्द किया कि जैसे ही विश्व
सर्वहारा का क्रांतिकारी संघर्ष प्रबल होगा और भारत तथा अन्य पराधीन देशों की जनता
स्वाधीनता के लिये सचेत और संगठित होकर संघर्ष करने लगेगी “इस महान और दिलचस्प देश
की मुक्ति और पुनरुत्थान और समूची औपनिवेशिक प्रणाली का पतन अपरिहार्य हो जायेगा.”
मार्क्स और एंगेल्स ने सन
1853 में ही लिखा था, “ भारत के लोग उन नये तत्वों से, जिन्हें ब्रिटिश
पूंजीपतियों ने उनके बीच बिखेरा है ( रेल, तार, पानी के जहाज आदि ) तब तक कोई लाभ
नहीं उठा सकेंगे, जब तक खुद ब्रिटेन में औद्योगिक सर्वहारा आज के शासक वर्ग की जगह
न ले ले या जब तक भारतीय लोग स्वयं इतने मजबूत न होजायें कि अंग्रेजों के जुए को
पूरी तरह उतार फेंकें. कुछ भी हो, हम पूरी तरह आश्वस्त रह सकते हैं कि भविष्य में,
कुछ कम या ज्यादा लंबे अर्से के बाद इस महान और दिलचस्प देश का पुनरुत्थान होगा.”
अंग्रेजी हुकूमत द्वारा की
जारही भारत की लूट पर पर मार्क्स की पैनी नजर थी. उन्होंने 1881 में लिखा था कि
“जो माल भारतीय प्रति वर्ष मुफ्त इग्लेंड भेजने को मजबूर होते हैं, उनकी कीमत ही
भारत के छह करोड़ औद्योगिक और खेतिहर कामगारों की कुल आमदनी से अधिक है. यह
क्षोभजनक बात है. वहां एक के बाद एक भुखमरी के साल आते हैं और भुखमरी का आकार भी
इतना बड़ा होता है कि यूरोप में आज तक उसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता.”
भारत के प्रथम स्वतंत्रता
संग्राम पर भी मार्क्स और एंगेल्स अपनी सतर्क नजरें गढ़ाए हुए थे और उन्होंने उसे
राष्ट्रीय विद्रोह माना था. उन्होंने लिखा कि उन्नीसवीं सदी के मध्य में भारत का
यह विद्रोह “ ब्रिटिश आधिपत्य के खिलाफ महान एशियायी राष्ट्रों के सर्वव्यापी
असंतोष की एक महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति है.”
मार्क्स एंगेल्स की इस समझ
को आगे बढाते हुये लेनिन ने 1908 में लिखा कि “भारत में ब्रिटिश शासन पध्दति के
नाम पर जो लूटमार और हिसायें की जारही हैं उनका कोई अंत नहीं.” उन्होंने 1912 में
पुनः लिखा कि “ इग्लेंड देश ( भारत ) के उद्योग का गला घोंट रहा है.” 1913 में
लेनिन ने लिखा कि ब्रिटिश पूंजी भारत तथा अन्य उपनिवेशों को “ बहुत निर्दयता के
साथ और जमींदाराना ढंग से गुलाम बनाती और लूटती है.” आगे यह भी लिखा कि भारत की
“लगभग 30 करोड़ आबादी ब्रिटिश नौकरशाही द्वारा लूटे जाने और सताये जाने के लिये छोड़
दी गयी है.” लेनिन उस दौर के राष्ट्रीय स्वाधीनता आन्दोलन के उभार में जनवादी
तत्वों के उदय को भली प्रकार देख रहे थे. उन्होंने बाल गंगाधर तिलक को “भारतीय
जनवादी” कहा.
परतंत्र भारत की ब्रिटिश
शासकों द्वारा की जारही निर्मम लूट के विरुध्द संघर्ष में ही भारत में समाजवाद की वैचारिक
नींव पड़ी.
19 वीं सदी के अंतिम दशक
में स्वामी विवेकानंद ने भी भारत के जनवादी समाजवादी स्वरुप का अनुमान लगा लिया
था. उन्होंने भविष्यवाणी की कि “भावी महापरिवर्तन, जिसे एक ऐसे नये युग का
सूत्रपात करना है जिसमें सत्ता शूद्रों ( श्रम जीवियों ) के हाथ में होगी, संभवतः
रूस से ही शुरू होगा.”
बीसवीं सदी के पहले दशक में
ही भारत के प्रवासी स्वतंत्रता सेनानी अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी मंचों से सहायता
लेने का प्रयास करने लगे थे. वे दूसरे सोशलिस्ट इंटरनेशनल के अधिवेशनों में भाग
लेने लगे थे. इनमें दादाभाई नौरोजी, मैडम कामा, एस. आर. राना, बी. बी. एस. अय्यर
और श्यामजी कृष्ण वर्मा प्रमुख हैं. उन्होंने उन मंचों पर भारत की परिस्थिति पर
प्रस्ताव पेश किये और भाषण दिये. मैडम कामा ने पहली बार स्टुटगार्ड अधिवेशन में
तिरंगा झंडा फहराया और कहा कि आदर्श सामाजिक व्यवस्था का तकाजा है कि कहीं की भी
जनता गुलाम न रहे. भारत की जनता जागेगी और हमारे रूसी साथियों द्वारा दिखाये
रास्ते पर चलेगी, जिन्हें हम अपना बहुत ही बन्धुत्वपूर्ण अभिवादन भेजते हैं.
बाल गंगाधर तिलक की
गिरफ्तारी पर 1908 में बंबई के मजदूरों द्वारा की गयी पहली राजनैतिक हड़ताल पर
टिप्पणी करते हुये लेनिन ने लिखा कि “जनता का भारत अपने बुध्दिजीवियों और
राजनेताओं के रक्षार्थ खड़ा होरहा है.” उन्होंने भविष्यवाणी की कि “ भारत में भी सर्वहारा
सजग राजनीतिक जन- संघर्ष के स्तर पर जा पहुंचा है. इन परिस्थितियों में भारत में
अंग्रेजी- रूसी ढंग की शासन व्यवस्था के दिन बस गिने चुने रह गये हैं.”
1917 में भारतीय राष्ट्रीय
कांग्रेस के अधिवेशन में एनीबीसेंट ने कहा कि “रूसी क्रांति तथा यूरोप और एशिया
में रूसी जनतंत्र के संभावित उदय ने भारत में पहले से विद्यमान परिस्थितियों को
पूर्णतया बदल दिया है.” अक्टूबर क्रांति के बाद 1918 में बाल गंगाधर तिलक ने लिखा
कि “अभिजातों की जमीनों के किसानों को बांटे जाने के परिणामस्वरूप सेना और जनता
में लेनिन का प्रभाव बढ़ गया है.” 1920 में लाला लाजपत राय ने कहा कि “पूंजीवादी और
साम्राज्यवादी सत्य की अपेक्षा समाजवादी, वोलशेविक सत्य कहीं ज्यादा श्रेष्ठ,
विश्वसनीय और मानवीय है. 1919 में बोल्शेविज्म का अर्थ स्पष्ट करते हुए तत्कालीन
विद्वान विपिनचंद पाल ने लिखा कि इसका अर्थ है कि “धनिकों और तथाकथित उच्च वर्गों
की ओर से उत्पीडन को नकारते हुये सभी लोगों को आजादी और सुख से रहने का अधिकार.”
उन्होंने यह भी कहा कि “ बोल्शेविक सभी प्रकार के आर्थिक और पूंजीवादी शोषण तथा
सट्टेबाजी के खिलाफ हैं और वे सामाजिक असमानता का विरोध करते हैं. कवीन्द्र
रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने 1918 में क्रांतिकारी रूस की तुलना “उस भोर के तारे” से की
जो “नवयुग के प्रभात का संदेश लेकर आता है.”
भारत की अस्थाई सरकार जो
काबुल में स्थापित हुयी थी के राष्ट्रपति राजा महेन्द्रप्रताप और प्रधानमंत्री
बरकतुल्लाह खान के नेतृत्व में प्रवासी भारतीय क्रांतिकारियों का एक प्रतिनिधिमंडल
लेनिन से मिला था जिनसे लेनिन ने कहा कि “हम मुसलमानों और गैर मुसलमानों की घनिष्ठ
एकता का स्वागत करते हैं. हमारी कामना है कि यह एकता पूरब के समस्त मेहनतकशों को
एक सूत्र में पिरोये.”
शहीदे आज़म भगत सिंह और उनके
साथियों को ‘क्रांतिकारी’ या ‘क्रांतिकारी
आतंकवादी’ कहा जाता है. लेकिन वे भारत में समाजवाद/ साम्यवाद के अधिष्ठाता कहे जा
सकते हैं. अपने मित्र सुखदेव को उन्होंने लिखा था- “तुम और मैं तो जिन्दा नहीं
रहेंगे लेकिन हमारी जनता जिन्दा रहेगी. मार्क्सवाद लेनिनवाद के ध्येय और साम्यवाद
की विजय निश्चित है.”
दिल्ली के सेशन जज के सामने
दिये वक्तव्य में उन्होंने कहा- “क्रांति से हमारा अभिप्राय यह है कि प्रत्यक्ष
अन्याय पर आधारित वर्त्तमान व्यवस्था बदलनी चाहिये. वास्तविक उत्पादनकर्ता या
मजदूर को समाज का अत्यावश्यक हिस्सा बनाने के स्थान पर, शोषक उनकी मेहनत के फल छीन
लेते हैं और उन्हें उनके सामान्य अधिकारों से वंचित कर दिया जाता है. एक तरफ तो है
किसान जो सबके लिये अनाज उगाता है, अपने परिवार के साथ भूखा मरता है, बुनकर जो
विश्व बाज़ार को कपड़ा सप्लाई करता है, अपने बच्चों का तन ढकने को पर्याप्त कपड़ा
नहीं प्राप्त कर सकता, राज, लोहार, और बढई जो शानदार महल तैयार करते हैं, खुद
गन्दी बस्तियों में जीते और मरते हैं; और दूसरी तरफ हैं समाज के परजीवी, पूंजीवादी
शोषक जो अपनी सनक पर ही लाखों की रकम उड़ा देते हैं. ये भयानक असमानतायें और जबरन
थोपी गयी विकृतियां विप्लव की तरफ ले जारही हैं. ये हालात ज्यादा दिन नहीं चल सकते
और यह स्पष्ट होगया है कि वर्त्तमान समाज व्यवस्था ज्वालामुखी के किनारे खड़ी जश्न
मना रही है....... इस सभ्यता की पूरी इमारत अगर वक्त रहते बचायी नहीं गयी तो लड़खड़ा
कर ढह जायेगी. इसलिए एक मूलभूत परिवर्तन आवश्यक है. और जो इस बात को समझते हैं,
उनका कर्तव्य है कि समाजवादी आधार पर समाज का पुनर्गठन किया जाये.
डा. भीमराव अंबेडकर को
आमतौर पर जातिवाद विरोधी, आरक्षण के पुरोधा और संविधान निर्माता के रूप में जाना
जाता है, लेकिन उनके मन मस्तिष्क में भी समाजवाद की साफ़ तस्वीर थी. उन्होने
संविधान सभा में कहा था कि 26 जनवरी 1950
को हम एक विरोधाभासी स्थिति में प्रवेश करने जारहे हैं, जहां राजनीति में तो हमने
नागरिकों को समानता दे दी है. परन्तु सामाजिक एवं आर्थिक जीवन में ऐतिहासिक कारणों
से हम समानता से दूर रहे हैं. अतः हमें शीघ्र- अतिशीघ्र राजनीतिक एवं सामाजिक-
आथिक जीवन में इस विरोधाभास को खत्म करना होगा. वरना जो लोग इस असमानता से
उत्पीड़ित हैं, वे इस सभा द्वारा इतने परिश्रम से बनाये हुये राजनैतिक लोकतंत्र के
भवन को ध्वस्त कर देंगे. अपने पत्र ‘मूकनायक’ में डा. अंबेडकर ने 1920 में लिखा था कि भारत की आजादी के साथ सभी
वर्गों को धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर बराबरी की गारंटी होनी
चाहिए और हर व्यक्ति को अपनी प्रगति के लिये अनुकूल स्थितियां भी हासिल हों.
संविधान के प्रारूप की
व्याख्यात्मक टिपण्णी में भी इस बात पर बल दिया गया है कि देश के तीव्र विकास के
लिये स्टेट सोशलिज्म वांछित है,........ निजी क्षेत्र कृषि में कोई सम्रध्दी नहीं
ला सकते. 6 करोड़ अछूतों को जो भूमिहीन मजदूर हैं, उनके जीवन में खुशी चकबंदी और
हदबंदी कानूनों से नहीं आ सकती, केवल सरकारी खेती इसका समाधान है.
डा. अंबेडकर प्रत्येक
नागरिक की मूल आवश्यकताओं की आपूर्ति किसी भी लोकतंत्र का प्रथम कर्तव्य मानते थे.
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में वांछित आर्थिक प्रणाली के बारे में उनके
विचार “ स्टेट एंड माइनारिटीज” नामक पुस्तिका में स्पष्टरूपेण वर्णित हैं. वे
साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के खुले विरोधी थे. उनकी सोच में कार्ल मार्क्स और गौतम
बुध्द के विचारों का अभूतपूर्व समन्वय है. उन्होंने “प्रिवीपर्स” की समाप्ति ,
बैंकों, बीमा कंपनियों और कोयला खदानों के राष्ट्रीयकरण की बात बहुत पहले उठाई थी.
वे समाजवाद और सार्वजनिक क्षेत्र के पक्षधर थे.
आजादी के आन्दोलन की इन
तमाम धाराओं को अपना आदर्श मानते हुए हमने स्वतन्त्र भारत में मिश्रित
अर्थव्यवस्था की नीति अपनाई जिसका लक्ष्य उत्तरोत्तर सार्वजनिक उद्योग और सामूहिक
खेती की व्यवस्था को मजबूत करते हुये समाजवाद की ओर बढ़ना था. इसी क्रम में राजाओं
के प्रिवीपर्स खत्म किये गये और बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया. संविधान की
प्रस्तावना में समाजवाद के उद्देश्य को समाहित किया गया. इन सारी उपलब्धियों पर
पलट वार हमें भूमंडलीकरण, आर्थिक नव उदार की व्यवस्था के रूप में देखने को मिला.
लेकिन इसके तहत असमानता- और गरीबी- अमीरी के बीच चौड़ी होती खाई ने समाजवाद की
प्रासंगिकता को पुनर्स्थापित कर दिया है, जिस पर पर्दा डालने की कोशिश में
रामराज्य का शिगूफा छोड़ा गया है.
डा. गिरीश
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