भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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Communist Party of India, U.P. State Council

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सोमवार, 5 अप्रैल 2010

सब ताज उछाले जायेगें

हम देखेंगेलाजिम है कि हम भी देखेंगेवो दिन कि जिसका वादा हैजो लौह-ए-अजल में लिखा हैजब जुल्म ए सितम के कोह-ए-गरांरुई की तरह उड़ जाएँगेदम महकूमों के पाँव तलेजब धरती धड़ धड़ धड़केगीऔर अहल-ए-हिकम के सर ऊपरजब बिजली कड़ कड़ कड़केगीहम अहल-ए-सफा, मरदूद-ए-हरममसनद पे बिठाए जाएंगेसब ताज उछाले जाएंगेसब तख्त गिराए जाएंगेऔर राज करेगी खुल्क-ए-ख़ुदाजो मैं भी हूँ और तुम भी हो

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वो इन्तज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं

ये दाग़-दाग़ उज़ाला, ये शब गज़ीदा सहर
वो इन्तज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं

ये वो सहर तो नहीं कि जिसकी आरज़ू लेकर चले थे यार
कि मिल जायेगी कहीं न कहीं फ़लक के दश्त में तारों की आखिरी मंज़िल कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त मौज का साहिल कहीं तो जाके रुकेगा सफ़ीना-ए-ग़म-ए-दिल

जवाँ लहू की पुर-असरार शाहराहों में चले जो यार तो दामन पे कितने दाग़ पड़े पुकारती रहीं बाहें, बदन बुलाते रहे बहुत अज़ीज़ थी लेकिन रुखे-सहर की लगन

बहुत करीं था हसीना-ए-नूर का दामन सुबुक सुबुक थी तमन्ना, दबी-दबी थी थकन सुना है हो भी चुका है फ़िराके ज़ुल्मत-ओ-नूर सुना है हो भी चुका है विसाले-मंज़िल-ओ-गाम

बदल चुका है बहुत अहले दर्द का दस्तूर निशाते-वस्ल हलाल-ओ-अज़ाबे-हिज़्र हराम जिगर की आग, नज़र की उमंग, दिल की जलन किसी पे चारे हिज़्राँ का कुछ असर ही नहीं कहाँ से आई निग़ारे-सबा किधर को गयी अभी चिराग़े-सरे-रह को कुछ खबर ही नहीं

अभी गरानी-ए-शब में कमी नहीं आई निज़ाते-दीदा-ओ-दिल की घड़ी नहीं आई चले चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आई
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रविवार, 4 अप्रैल 2010

अंतर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट एवं वर्कर्स पार्टियों के सम्मेलन के कार्यकारी दल की बैठक

पुर्तगाल की कम्युनिस्ट पार्टी और दक्षिण अफ्रीका की कम्युनिस्ट पार्टी के निमंत्रण पर अंतर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट एवं वर्कर्स पार्टियों के सम्मेलन के कार्यकारी दल की बैठक लिस्बन (पुर्तगाल) में 13 और 14 मार्च को हुई।पहले ही तरह ही यह बैठक उन सभी पार्टियों के लिए खुली थी जिन्होंने अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लिया था। बैठक में वर्किंग ग्रुप के सभी सदस्यों सहित 13 पार्टियों - दक्षिण अफ्रीकी कम्युनिस्ट पार्टी, बेल्जियम की वर्कर्स पार्टी, ब्राजील की कम्युनिस्ट पार्टी, बोहमिया और मोराविया की कम्युनिस्ट पार्टी, साइप्रस की कम्युनिस्ट पार्टी, क्यूबा की कम्युनिस्ट पार्टी, स्पेन की कम्युनिस्ट पार्टी, ग्रीस की कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, भाकपा (मा), लेबनान की कम्युनिस्ट पार्टी, पुर्तगाल की कम्युनिस्ट पार्टी तथा रूसी संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के प्रतिनिधि उपस्थित थे।बैठक का उद्देश्य था कम्युनिस्ट एवं वर्कर्स पार्टियों के 12वें अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन की तैयारी करना जो दक्षिण अफ्रीका में होगा और दक्षिण अफ्रीका की कम्युनिस्ट पार्टी उसकी मेजबानी करेगी। बैठक में फैसला किया गया कि अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन जोहान्सबर्ग में इस साल 3, 4 और 5 दिसम्बर को होगा। सम्मेलन का विषय होगा, ”पूंजीवाद का गहरा होता संकट, सार्वभौमिकता की रक्षा, सामाजिक गठबंधनों को गहरा करने तथा शांति, प्रगति एवं समाजवाद के लिए संघर्ष में साम्राज्यवाद विरोधी मोर्चा को मजबूत बनाने में कम्युनिस्टों का कर्तव्य“।बैठक में ताजा अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं, पूंजीवाद के गहराते संकट और पूंजीवाद की बौखलाहट तथा मजदूरों एवं लोगों द्वारा उसका डटकर मुकाबला करने के बारे में सार्थक विचार-विमर्श हुआ। बैठक में समाजवादी क्यूबा के साथ एकजुटता प्रकट की गयी तथा इस संबंध में एक प्रस्ताव पारित किया गया।बैठक में भाग लेने वाली पार्टियों ने भी साइप्रस की जनता के संघर्ष के साथ एकजुटता प्रकट की जो तुर्की के कब्जे के खिलाफ तथा दोनों देशों के एकीकरण के लिए संघर्ष कर रही है।बैठक में भाग लेने वालों ने नवम्बर 2009 में दिल्ली में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में पारित प्रस्ताव के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहरायी। इस संदर्भ में नाजी-फासिस्टवाद पर विजय की 65वीं वर्षगांठ मनाने का फैसला किया गया तथा इस बारे में एक संयुक्त बयान जारी किया गया जिसमें 9 मई 2010 को विभिन्न देशों में प्रदर्शन आयोजित करने का आह्वान किया गया। ”शांति के लिए नोटो के खिलाफ“ शीर्षक से एक घोषणा जारी की गयी जिसमें विश्व भर में मजदूरों एवं सामाजिक संगठनों का आह्वान किया गया कि वे शांति के लिए तथा युद्ध तथा नाटो के खिलाफ संघर्ष में व्यापक भागीदारी करें।सम्मेलन में भाकपा की ओर से उसके अंतर्राष्ट्रीय विभाग के सचिव पल्लब सेनगुप्ता ने भाग लिया।
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बजट 2010-11: गहराते सामाजिक असमानता के खतरनाक आयाम

किसी भी साल के बजट को दो स्तरों या तत्वों के रूप में देखा जा सकता है, कम से कम उसे समझने के प्रयास की शुरूआत के रूप में। एक तो उसमें राजकीय आय और व्यय के पुराने, नये और प्रस्तावित आंकड़े या संख्या होती है जिनका सिलसिलेवार पूरा ब्यौरा विभिन्न मदों में बजट के दस्तावेजों में दर्शाया जाता है। दूसरे कुछ गुणात्मक पहलू होते हैं जो विशेष रूप से चुने हुए जुमलों, वाक्यांशों और सिद्धांतों की दुहाई देते हैं। ये एक ओर तो सरकार के कामकाज और चरित्र को जन-हितैषी साबित करने के मकसद से चुने या गढ़े जाते हैं। दूसरे, उन्हें इस तरह बहु अथवा द्विअर्थी रखा जाता है कि हमारे गैर-बराबरीमय समाज में सत्ता और शक्ति के असली ध्रुवों को भी अपनी सरकार की नीयत, नीतियों, निर्णयों और कार्यों पर भरोसा बना रह सके। वैसे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से बजट तथा नीति निर्माण में इन तबकों की दखल और सीधी भागीदारी पिछले दो दशकों से लगातार बढ़ी है। जैसे-जैसे आम आदमी का जीवन दूभर होता जाता है, उसे अधिकाधिक हाशिये पर डाल दिया जाता है। उसी के साथ-साथ यह आकर्षक जुमलों, मोटी संख्याओं या नम्बरों का खेल भी नटवरलाली रूप ग्रहण करता जाता है। ऐसा ही गुणात्मक, सैद्धांतिक स्तर पर भी किया जाता है।
वर्तमान बजट
सन् 2010-11 के लिये प्रस्तावित बजट के ये दोनों पक्ष काफी अंशों तक इनकी दीर्घकालिक प्रवृत्तियों को प्रकट करते हैं। इस साल पेश बजट पुरानी, जमी-जमायी आर्थिक वृद्धि दर बढ़ाने के लिए निजी निवेश तथा तथाकथित उद्यमिता को बढ़ाने के लिए, राज्य की ‘समर्थकारी’ भूमिका को रेखांकित करने के लिए अपने बड़े मुद्दे के राजकीय खर्च को काफी कड़ाई से नियंत्रित करता है। इसका मकसद है सरकार बाजार से कम कर्ज उठाये ताकि कम ब्याज दरों पर निजी क्षेत्र, खासकर कम्पनी क्षेत्र, को प्रचुर मात्रा में कर्ज उपलब्ध होता रहे। निजी क्षेत्र को बैंक खोलने की इजाजत भी इसी काम को आगे बढ़ायेगी। राज्य खर्च की कानून हदबंदी राज्य को अपने पैर पसारने से भी रोकता है ताकि सार्वजनिक सेवाओं तक राज्य को बाहर रखकर या हाशिये पर डालकर उच्च शिक्षा, जटिल-महंगी चिकित्सा, यातायात, मूलभूत आधार क्षेत्रीय सेवाओं आदि के मलाईदार हमेशा मांग में रहने वाले भारी मुनाफादायक क्षेत्र बड़ी-बड़ी कम्पनियों के हाथ में आ जायें। बस इन कामों के ‘सार्वजनिक’ चरित्र का इस्तेमाल बायेबिली गैप फंड यानी मुनाफे की अप्रर्याप्तता को पूरा करने के लिए सार्वजनिक धन की छद्मरूप से सहायता लेकर किया जा सके।
बजट और जनता
हां, गांवों की पाठशाला या वहां की चिकित्सा व्यवस्था या गांवों को जोड़ने वाली सड़के, गांवों तथा कस्बों की सफाई, पानी आपूर्ति की व्यवस्था, बाढ़ नियंत्रण आदि अनाकर्षक काम जरूर सरकार के हाथों में रहे। किन्तु ये काम भी इतने विशाल हैं, खासकर शिक्षा के अधिकार की कानूनी मान्यता तथा सबके लिए स्वास्थ्य जैसे जुमलों के प्रचलन के कारण कि इनके लिए खर्च की अगर समुचित तजवीज की जाये तो वित्तमंत्री को इस अति धनी तथा समृद्ध से समृद्धतर होते वर्ग की जेब में हाथ डालना ही पड़ेगा। कुछ अंशों तक इस ‘खतरे’ में अपने समतुल्य और बिरादराना तबकों को बचाने के लिए अब सेवाकर तथा अन्य प्रत्यक्ष करों का दामन ज्यादा अंशों तक थामा जा रहा है और आय, सम्पत्ति तथा मुनाफे आदि पर लगने वाले प्रत्यक्ष करों में कटौती की गयी हैं किन्तु एक तीर से दो पंछियों को मार गिराने में माहिर शासक वर्ग ने सरकारी कम्पनियों के शेयर, बाजार में निजी क्षेत्र को बेचकर एक भारी राशि, चालीस हजार करोड़ रुपयों की अपने खर्च को पूरा करने का फैसला भी बजट में जोड़ दिया है। इससे न केवल धनी वर्ग का संभावित कर भार कम होगा, किन्तु मलाईदार, जन धन तथा त्याग से बने नवरत्नों, मुक्त सार्वजनिक क्षेत्र में कई तरह से संेधमारी के रास्ते भी हमारे कम्पनी क्षेत्र के तथा शेयर बाजार के स्टोरियों को मिल जायेंगे।
जो बाजार स्वयं अपने को किसी अनुशासन में नहीं रख पाता है, जहां अरबों के सत्यमनुमा घोटाले आम प्रवृत्ति है जिनका यदाकदा ही और बहुधा आकस्मिक भंडाफोड होता है, जो विकट उतार-चढ़ाव के दौर से केवल मानसिक और ‘एनिमल स्पिरिट्स’ भेड़चाल प्रवृत्ति के कारण अस्थिरता का दूसरा नाम बन गया है, उसके द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के कम्पनियों को अनुशासित करने की कोशिश एक भारी अंर्तविरोध ही दर्शाता है। किन्तु हमारे बाजारवादी शासक जो पश्चिम के भयावह, जनविरोधी अर्थशास्त्र के कायल हैं और उन्हीं के सुझाये रास्ते पर आंखे मूंद कर चलते हैं, अपने राजकोषीय अनुशासन और बजट
प्रबंधन कानून के प्रति इतने संजीदा तथा समर्पित हैं कि वे (जैसा कि कार्ल पोलान्यी ने दशकों पहले कहा था) आर्थिक उन्नयन के लिए किसी भी सामाजिक कीमत को अधिक और गैर वाजिब नहीं मानते हैं।

नवउदारवाद के दुराग्रहों के समावेशी विकास की मखमली चादर में लपेटने के प्रयासों की कुछ अन्य बानगियां इस बजट में खोज पाना कोई मुश्किल काम नहीं है। कहा गया है कि तेज आर्थिक बढ़ोतरी सरकार को समाज तथा आम जन के कल्याण हेतु अधिक संसाधन उपलब्ध कराती है। इस साल के बजट अनुमान चालू कीमतों पर 12.5 प्रतिशत राष्ट्रीय आय वृद्धि की परिकल्पना पर बनाये गये प्रतीत होते हैं। जाहिर है कि राष्ट्रीय आय की वकालत उसके द्वारा ज्यादा बखूबी सामाजिक दायित्व पूरी करने की क्षमता पैदा होने का दावा करने वालों को कम से कम हर सामाजिक सेवा और गरीब तथा खास कर ग्रामीण गरीब तथा हर साल श्रम शक्ति में शामिल होते 120 लाख युवा वर्ग के लिए पुराने आबंटन को कम से कम 12.5 प्रतिशत से ज्यादा तो बढ़ाना ही चाहिए था। किन्तु शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, तंग बस्तियों और गांवों के लिए आधारभूत सेवाओं, रोजगार सृजन, सिंचाई, स्वच्छता तथा पेयजल आदि किसी भी काम के लिए राष्ट्रीय आय की अनुमानित वृद्धि के अनुपात में आबंटन नहीं किया गया है।
रोजगार एवं शिक्षा
इस बार रोजगार वृद्धि का कोई टारगेट भी घोषित नहीं किया गया है। शिक्षा के अधिकार को अमल में लाने के लिए कम से कम 81 हजार करोड़ रुपये सलाना चाहिए, किन्तु तजबीज मात्र 48 हजार रुपयों से कुछ कम की गयी है। उच्च शिक्षा के लिए 16.7 हजार करोड़ रु. की व्यवस्था तो हास्यास्पद लगती है, जब यह देखा जाता है, कि स्वयं छात्र अपनी उच्च शिक्षा के खर्च को निजी स्तर पर पूरा करने के लिए पिछले वर्ष बीस हजार करोड़ रुपयों से ज्यादा का निजी कर्ज बैंकों से लेने को विवश हुए थे। ऊपर तुर्रा यह कि उच्च शिक्षित युवकों को भी बेरोजगारी का सामना भी करना पड़ता है। चिकित्सा खर्च अब अस्पतालों के कम्पनीकरण के कारण निजी जेबों पर इतना भारी पड़ने लगा है कि वह अब किसानों और मध्य आय तबके तक के कर्ज के चक्र में फंसने का एक मुख्य कारण बन गया है। फिर भी सबके लिए स्वास्थ्य बीमा अभी कहीं भी कार्यान्वयन के क्षितिज पर नजर नहीं आता है।
यहां बहु-चर्चित, बहु-प्रशंसित और कई अर्थों में पहली गंभीर जनहितकर योजना ‘मनरेगा’ के बारे में इस साल के बजट की आपराधिक बेरूखी का अलग से उल्लेख बजट और समावेशी विकास की असलियत को समझने के लिए जरूरी है। इस तथाकथित फ्लैगशिप स्कीम के लिये महज एक हजार करोड़ की अतिरिक्त राशि की व्यवस्था संशय पैदा करती है कि यह कहीं घोषित प्राथमिकताओं के बारे में पुनर्विचार का संकेत तो नहीं है। बहरहाल केवल 5 करोड़ से कम परिवार इस योजना का आंशिक लाभ उठा पाये हैं और लाभान्वित से बाहर लोगों का आकलन 70 प्रतिशत तक किया जा रहा है। मात्र 65 लाख लोगों को एक सौ दिन का रोजगार मिल पाने की बात स्वयं गांव विकास मंत्री मानते हैं। इस साल न्यूनतम दिहाड़ी भी 100 रुपये प्रस्तावित है। सबसे गंभीर बात यह कि 15 रुपये से कम दैनिक खर्च पर लोगों को गरीब मानने वाले लोगों ने क्या कभी यह आकलन किया है कि लगभग 20 प्रतिशत खाद्य पदार्थों की कीमत बढ़ने का असर भुखमरी, कुपोषण, श्रम उत्पादकता तथा अपराधों के बढ़ने आदि पर क्या होता है? इस बेरुखी के मुकाबले आमतौर पर करोड़पति-अरबपति निर्यातकों को वैश्विक मंदी के झटके से उबारने के लिए अपनी पहल और लाॅबीज के मिले जुले असर के प्रति अतिउदार शासकों का खुमान इतना प्रबल है कि उनके लिए सहायता कोष जारी करने में राज के बीज अनुशासन को भुला दिया जाता है। अत्यंत शर्मनाक और कारपोरेट समूहों की अंध भक्ति का और उदाहरण क्या हो सकता है सिवा इसके कि कम्पनियों के पक्ष में कर खर्च रूपी ‘प्रोत्साहन’ की मात्रा ‘मनरेगा’ से एक सौ गुणा बढ़ाकर पिछले साल के चार लाख करोड़ रुपये में से अब 5 लाख करोड़ रुपये कर दी गयी है, बदले में खाद्यान्न, भ्रष्टाचार और हवाला रूपी प्रतिफल पाने के लिए। सारे देश में मनरेगा लागू करना वैसा ही है जैसे 98 प्रतिशत गांवों में स्कूल खोल देना। अभी भी 12 करोड़ से ज्यादा बालक-बालिकाएं विद्यमान घटिया और गैर-सार्थक शिक्षा से भी वंचित हैं।
वास्तव में देखा जाये तो मनरेगा में मजदूरी नहीं राहत राशि ही बांटी जा रही है क्योंकि 100 दिन का काम और कमरतोड़ मेहनत के बाद भी पूरी दिहाड़ी का वक्त पर नहीं मिलना इस काम को रोजगार साबित नहीं कर सकता है। बजट के दिन वाॅल स्ट्रीट जर्नल भारत के वित्तमंत्री के नाम खुली चिट्ठी छाप कर यह राय देता है कि अब सरकार के सामने दकियानूसी दक्षिणपंथी तथा वामपंथी कोई चुनौती बाकी नहीं बची है। अतः वे अब तथाकथित सुधारों की सड़क पर दौड़े तथा सामाजिक सेवाओं आदि झंझटो से अपने को आजाद कर ले। क्या मनरेगा के लिए मात्र एक हजार करोड़ रुपये का चालू कीमतों पर अतिरिक्त आवंटन इसी प्रतिष्ठित पत्र की राय के प्रति सकारात्मक रूख तो नहीं दर्शाता है? याद रहे कि सरकार के कई भूतपूर्व और वर्तमान सलाहकार भी नरेगा के खिलाफ लिख चके हैं और गांवों के बड़े धनी किसान भी खेत मजदूरों को मनरेगा द्वारा प्राप्त विकल्प से परेशान हैं।
बजट का फलसफा
चन्द अन्य पहलुओं का खुलासा बजट के अंकों और फलसफे दोनों का असली खाका खींचते हैं। पिछले साल वेतन आयोग के 102 हजार करोड़ रुपये बांट कर तथा चार लाख करोड़ का मंदी-विरोधी प्रोत्साहन पैकेज देकर राष्ट्रीय आय की वृद्धि को हवा दी गयी थी। इस आय तथा उसी बढ़त के असंतुलित तथा जनहित उपेक्षक रूप से चर्चा तक नहीं होती तो फिर उनसे दो-दो हाथ होने की तजबीजों का तो सवाल ही पैदा नहीं होता है। आयकर तथा कम्पनी कर में कमी समृद्ध लोगों को अप्रत्याशित अनायास अतिरिक्त आमदनी देकर आय की असमानता घटाने की मृतप्राय कोशिशों के ताबूत में और अधिक कील ठोक दी गयी है। इसके बलबूते अनप्रयुक्त उत्पादन क्षमता का उपयोग, नए निवेश के अवसर और विदेशी पूंजी को आकर्षित करने का आधार तैयार किया गया लगता है ताकि ‘ग्रोथ बढ़ती रहे चाहे वह एक कैंसर ग्रस्त अर्थव्यवस्था को ही और ज्यादा क्यों न फुलायें’। अप्रत्यक्ष करों का प्रत्यक्ष करों में की गयी कमी से लगभग दोगुना इजाफा कृषि जन्य पदार्थों की महंगाई को औद्योगिक उत्पादों तक ले जायेगा, खासकर ऊर्जा क्षेत्र की कीमतों को बढ़ाकर जहां पहले ही भारी भरकम बोझ विद्यमान है। लगता है कि सरकार केवल अपने द्वारा कर लगाकर आम जनता की जेब हल्की करने भर से संतुष्ट नहीं है। बाजार तक सरकार की साठगांठ से तेजी से बढ़ती महंगाई रूपी दानवी कारारोपण सरकार के चहेते पूंजीपति वर्ग की आय बढ़ाता है और देश के उत्पादन ढांचे के आम आदमी की जरूरतों के लिए उत्पादन तथा रोजगार अवसरों से विमुख करता जा रहा है।
कर संरचना
हमारे अप्रत्यक्ष करों की संरचना भी भारतीय उद्योगों के खिलाफ और आयातों यानी विदेशी उत्पादकों के हितों को बढ़ाने वाली बनती जा रही है। कई सालों से उत्पाद-शुल्क के रूप में भारत के देसी उद्योगों से ज्यादा राजस्व वसूला जा रहा है और काफी तुलना में विदेशी माल से कम राजस्व एकत्रित किया जा रहा है। इस दौरान मुक्त आयात नीति के कारण हमारा आयात बिल बेइन्तहा बढ़ा है। किन्तु सन् 2008-09 में सीमा शुल्क से प्राप्त 99879 करोड़ रुपये के मुकाबले देसी उत्पाद शुल्क से 108613 करोड़ रुपयों का राजस्व एकत्रित किया गया। सन् 2010-11 के अनुमान इसी प्रवृत्ति पर मोहर लगाते है। देसी माल खरीदने वाले साल भर में सत्रह हजार करोड़ रुपये ज्यादा सरकारी खजाने में भेजेंगे। देश के अपने उद्योगों के खिलाफ यह पक्षपात न केवल देश से रोजगार के अवसरों का निर्यात करता है बल्कि व्यापार घाटे को बढ़ता है और विदेशी पूंजी तथा भगौड़ी आवास पूंजी को आकर्षित करने वाली नीतियां अपनाने की बाध्यता को बढ़ाती है। अब तो एक-दो साल पहले यह स्थिति नजर आयी थी कि देश का आंतरिक औद्योगिक उत्पादन देश में आयातित औद्योगिक माल से कम हो चुका था। क्या यह देश के अनौद्योगीकरण की एक नयी किश्त की शुरुआत नहीं हैं?

हमने बजट में शामिल तत्वों, नीतियों और प्रावधानों की चर्चा अब तक की है। किसानों से कर्ज चुकाने पर ब्याज की दर में दो फीसदी की कमी जैसे कुछ वांछनीय और प्रशंसनीय कदमों पर उल्लास प्रकट किया जाना चाहिए। किन्तु सैकड़ों ऐसे जनहितकारी काम हैं जिनका अतापता बजट के किसी कोने में दिन में चिराग लेकर ढूंढ़ने पर भी नहीं लगेगा। वैसे कृषि के नाम पर बड़ी देसी-परदेसी कम्पनियों के पक्ष में नई सौगातों की बौछार की गयी है तथा 50 करोड़, छोटे, सीमांत किसानों की विशेष जरूरतों को नजरअंदाज किया गया है।
नवउदारवादी नीतियां
कुल मिलाकर इन नवउदारवादी नीतियों का कोई भी समर्थक यह दावा करने में समर्थ नजर नहीं आता है कि जो यह कह सके कि वृद्धि दर के लक्ष्य को प्राप्त करके, देसी-विदेशी पूंजी को चरने के लिए नए हर-भरे चारागाह देकर मुनाफा स्फीति की बेलगाम गति की ओर बढ़ाकर, अगला वित्तमंत्री अपने बजट भाषण में यह दबे स्वर में भी कह सके कि तीव्र बढ़त दर और समावेशी विकास की लघु बुनियादों के मजबूत करके हम कम से कम घटी गरीबी, बढ़ी खाद्य सुरक्षा, कम बेरोजगारी तथा कम से कम अपरिवर्तित विषमताओं और स्वास्थ्य पर्यावरण की दिशा में एक शुरूआत भर तो कर ही पाये हैं। इस साल के सीमांतक नवीन बजटीय
प्रावधान नव-उदारवाद के मृतप्रायः घोड़े को और अधिक हरी घास तथा हरे चने खिलाकर पिछले बीस सालों से मजबूत होती दुष्प्रवृत्तियों और कुविकास के चक्र को उल्टा घुमाना तो दूर रोक तक नहीं पायेंगे। क्या नक्सलवादी चुनौतियों को इन मूलभूत प्रवृत्तियों को मजबूती देकर कुछ छुटमुट प्रादेशिक स्तर तक सीमित प्रयासों से निपटा जा सकेगा? ऐसे अनेक सवाल जनता को इस बजट के निर्णयकर्ताओं और सलाहकारों से पूछने होंगे यदि भारत की जनता का विकास और जीवन जीने के अधिकार को जमीनी सच्चाई बनाना है।

कहा जाता है कि हजारों करोड़ रुपयों का आबंटन जनविकास के सामाजिक तथा कल्याणकारी कार्यक्रमों के लिये किया गया है। खासकर नवउदारवाद का समावेशी विकास से परिणय कराकर, उदाहरणार्थ, इस वर्ष के बजट में सामाजिक सेवाओं के लिये आबंटित योजना तथा योजना इतर राशि (157053 करोड़ रुपयांे), आधारभूत संरचना तथा गांवों और शहरों के गरीबों के लक्षित कार्यक्रमो की लम्बी फेहरिस्त तथा विशाल राशि का हवाला दिया जाता है। हम फिर भी यह मानते हैं कि ऐसा नवउदारवादी समावेशी विकास
अधिसंख्यक भारतवासियों की किसी भी अब तक चिरस्थाई बनी विशाल तथा कष्टकर समस्या का समाधान नहीं कर पायेगा। कुछ तथ्यों और विचारों पर नजर डालने से हमारे मत का औचित्य समझ में आ जाना चाहिए। कुल बजट खर्च करीब ग्यारह लाख करोड़ रुपये का है जो सारी राष्ट्रीय आय के करीब छठे हिस्से के करीब होता है। हमारे गैर-बराबरीमय देश में कम, अनिश्चित आमदनी वाले लोगों को जो कई आर्थिकेत्तर संख्याओं के सहारे जीते हैं, उनका अनुपात अस्सी प्रतिशत से ज्यादा है और उनकी सार्वजनिक खर्च की जरूरत भी सम्पन्न अल्पसंख्य (और आयकरों विभेदित विषमतामय) तबकों से कई गुना ज्यादा होती है। किन्तु खर्च में गरीब बहुमत का तुलनात्मक हिस्सा कम तथा शीर्षस्थ एक प्रतिशत से भी काफी कम लोगों का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष हिस्सा पूर्णमात्रा तथा तुलनात्मक दोनों तरह से बहुत ज्यादा होता है। उदारहरण के लिए लगाये गये करों से कम्पनी तथा बड़े व्यवसायों को अनेक छूटें और रियायतें दशकों से जारी है। पिछले बजट में लगाये गये करों को छोड़कर “प्रोत्साहन“ के बतौर करीब चार लाख करोड़ रुपये का कर-खर्च किया गया था। अब यह 5 लाख करोड़ हो रहा है। कम आय वाले तबकों का दशकों का बजट बमुश्किल इस खर्च के बराबर आता है। इस साल भी इस प्रक्रिया के तहत जनता के नाम पर जारी खाद्य तथा खाद सब्सिडी में कटौती की गयी है। दूसरी ओर कम्पनी कर की छूटों को हटाने की बकाया भर की गयी है और उन्हें सब्सिडी में कटौती से 5.5 गुना से ज्यादा बढ़ा दिया गया है।
सरकारी खर्च का लाभ
सरकारी खर्च का सीधा या अप्रत्यक्ष लाभ सामान तथा सेवाएं सप्लाई करने के रूप में धनी वर्ग को मिलता है। बजट भाषण में सरकारी तंत्र के नकारेपन और अकुशलता को एक भारी दिक्कत माना गया है। इसे और ज्यादा नौकरशाहीपूर्ण तरीकों से नहीं मिटाया जा सकता है। जब तक समावेशन में एक निश्चित तथा घोषित या ज्ञात काल खंड में हर भारतीय को साधिकार, सम्मानजनक मानवीय जीवन बिताने के न्यूनतम संसाधनों की पक्की गारंटी के साथ व्यवस्था नहीं की जाती है और पहले से ही समृद्ध, शीर्षस्थ तबकों के हकों में शक्ति और संसाधनों का अत्यधिक केन्द्रीकरण जारी रहता है, ये आंशिक कवरेज वाली, आंशिक कल्याण तथा संभावित क्षमता निर्माता स्कीमें राजनीतिक तिकड़मबाजी तथा भ्रष्टाचार के स्त्रोत बने रहेंगे। गरीबों से काम कराके उन्हें मजदूरी तक नहीं देने की असंख्य घटनाएं वास्तव में एक नई दास प्रथा तथा कफनचोरों की याद ताजा करते हैं। शीर्षस्थ तबकों और उनके लग्गू-भग्गू लोगों के पास निजी विवेक जो जवाबदेहविहीन मनमानी का दूसरा नाम है, का जितना बड़ा दायरा छोड़ा जायेगा, करोड़ों गरीबों को दिये गये हकों और संसाधनों की चोरी होती रहेगी। सबको पर्याप्त लाभ निश्चित अवधि में गारंटी करके इन आपराधिक अमानवीय रूझानों से मुक्ति की शुरूआत की जा सकती है। सबको लाभार्थी बनाने की गारंटी उनमें गलाकाट स्पर्धा की जगह पारस्परिक समर्थकारी एकजुटता की जड़े मजबूत करेगी। जब हम सम्पन्न लोगों को विकास प्रक्रिया का कर्ताधर्ता बनाते हैं जो शेष लोगों के स्वावलम्बन की नींव खोद देते हैं।

राजकीय दानधीरता और राजनीतिक प्रचार की भावना से पीड़ित तथाकथित विकास और कल्याण योजनाएं एक ओर तो शासन तंत्र और अर्थव्यवस्था के संचालित होते रहने की न्यूनतम जरूरतों का भाग है और दूसरी ओर लोकतांत्रिक व्यवस्था द्वारा आरोपित राजनीतिक तकाजा है। संक्षेप में आय सम्पत्ति और सत्ता के केन्द्रीकरण के साथ जनता को कुछ सीमित और कुछ लोगों को अनुकम्पा और निजीविवेक आधारित “लाभ“ तो दिया जा सके है, किन्तु अनेकों को वंचित रखकर, उन्हें संभावित लाभार्थियों की लम्बी क्यू में इंतजारत रख करके। यह किसी ऐसे विकास का आधार नहीं बन सकता है जो सामाजिक असमावेशन का उन्मूलन कर सके और भावी जनपे्ररित विकास का आधार बन सके।

सन् 2010-11 के बजट के वैचारिक आधार में सच्ची, सर्वसमावेशी, समतामय सामाजिक न्याय को कोई स्थान नहीं दिया गया है। उसका मकसद और वह भी सुदूर तथा अनिश्चित रूप से निचले बीस प्रतिशत लोगों के अन्त्योदय के द्वारा एक प्रतिशत से भी कम सुपर रईसों की सम्पत्ति में इजाफा करते हुए एक शीर्षोदयी रणनीति के द्वारा भारत की राष्ट्रीय आय को दुनिया के अन्य देशों की तुलना में ऊंचे स्तर तक ले जाना है। राष्ट्रीय आय का विशाल एबसोल्यूट आकार मुख्यतः हमारे विशाल भौतिक तथा जंकीय आकार का नतीजा है। नवउदारवादी बार-बार पैंतरे बदलते हैं, नये-नये स्वांग भरते हैं, नये-नये जुमले उछालते हैं ताकि बाजार के शीर्षस्थ अति लघु तबकों के हित को राष्ट्र हित का पर्याय बनाकर पोसा जाये और जनमत से मंजूर भी करा लिया जाये। राज्य की भूमिका घटाने के नाम पर उसे एक अतिलघु वर्ग का हथियार बना लिया गया है।

निरंतर बढ़ती हुई मात्रा में कई छद्म तथा खुले रूपों में ऐसी बजटीय तथा अन्य नीतियों को चलाते हुए हमारे शासक वर्ग ने लोकतंत्र की प्रक्रिया अपनाते हुए लोकतंत्र को एक गैर लोकतांत्रिक प्रतिफलदायक निजाम में बदल दिया है। आज चुनौती इन प्रक्रियाओं को समन्द कर उन्हें बहुमुखी, बहुमतावादी, अनेक संस्थाओं, रणनीतियों और जनउभार के बीच प्रभावी तालमेल स्थापित कर चालबाजियों भरी सामाजिक परिवर्तन को दूषित दिशाओं से हटाकर उन्हें लोकतांत्रिक सात्विक सार तत्वों से विमुखित करना है। हर बजट ऐसी चुनौतियों को नए सिरे से रेखांकित करता आ रहा है और सन् 2010-11 का बजट कोई अपवाद नहीं बल्कि उसकी अगली किश्त है। सीधे-सीधे बजट के संदर्भ में प्रगतिशील सार्वजनिक खर्च पैटर्न को प्रगतिशील कराधान तथा राजस्व प्राप्ति के अन्य तरीकों द्वारा पूरा करवाना एक घोर उपेक्षित किन्तु अति अपेक्षित और वांछित जरूरत है।

कमल नयन काबरा
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शनिवार, 3 अप्रैल 2010

संसद में महंगाई के खिलाफ गूंज : गुरूदास दासगुप्ता का भाषण

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के गुरूदास दासगुप्ता ने लोकसभा में मूल्यवृद्धि पर बहस में भाग लेते हुए कहा कि मुख्य बात यह है कि मूल्यवृद्धि का कारण यदि खाद्यान्नों की कमी है तो यह कमी कल नहीं हुई। खाद्यान्नों की कमी लंबे अर्से से कृषि से जुड़ी रही है। मौजूदा सरकार छह सालों से सत्ता में है। इस अवधि में कमी को दूर करने तथा कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए क्या कदम उठाये गये? सत्तापक्ष के सदस्यों ने जो भाषण दिये हैं वे स्थिति की गंभीरता को प्रतिबिंबित नहीं करते।
मूल्यवृद्धि की विशेषता
दूसरी बात यह कि गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों के लिए यदि सार्वजनिक वितरण प्रणाली ने काम नहीं किया तो आप इसके लिए किसको दोषी मानते हैं? सरकार पूरे देश की है, केवल दिल्ली या कोलकाता की नही है। स्थित को सुधारने के लिए क्या किया गया? मैं केवल इतना समझ पाया हूं कि वायदा कारोबार पर चयनित ढंग से प्रतिबंध लगाया गया है, एक आर्थिक कदम के रूप में इस पर प्रतिबंध नहीं लगाया है। इसलिए मैं कहना चाहूंगा कि आपने अपना केस ठीक से नहीं रखा है। हम सभी इससे सहमत हैं कि देश के खाद्यान्नों की मूल्यस्फीति में भूचाल आया हुआ है।
शरद पवार पिछले छह साल से कृषि मंत्री हैं। डा. मनमोहन सिंह पिछले छह साल से प्रधानमंत्री और यूपीए सत्ता में है। इस अवधि में मूल्यवृद्धि रोकने के लिए क्या कदम उठाये, क्योंकि इन कदमों का कोई नतीजा नहीं निकला? ऐसा लगता है कि राष्ट्र को जिन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है सरकार उनके प्रति संवेदनशील नहीं है।
इसलिए मूल्यवृद्धि की विशेषता क्या है। मूल्यवृद्धि की विशेषता यह है कि मोबाइल फोन सस्ता हो गया है लेकिन दाल महंगी हो गयी है। रेल यात्रा सस्ती हो गयी है लेकिन तेल महंगा हो गया है। मतलब यह कि सभी उपभोक्ता वस्तुएं जो जिंदा रहने के लिए जरूरी हैं, काफी महंगी हो गयी है। यह सब सरकार की आर्थिक नीति का नतीजा है। इस स्थिति के लिए सरकार की पूरी आर्थिक नीति जिम्मेदार है। वायदा कारोबार पर पूरी तरह रोक लगाने से किसने रोका था? हमने सभी वायदा कारोबार पर रोक लगाने की मांग की थी लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया। खाद्यान्नों का निर्यात करने की इजाजत किसनेे दी। सरकार ने दी। किसने खाद्य सुरक्षा को कमजोर करने के लिए नकदी फसल को तरजीह दी? किसने खाद्यान्न भंडारों के विपरीत बड़े पैमाने पर बैंक ऋण मुहैया कराया? क्या आप मुझे बतायेंगे कि किसने नकदी फसल को तरजीह दी और खाद्यान्न भंडारों के विपरीत बैंक ऋण क्यों मुहैया कराया गया? बैंक ऋण के विपरीत खाद्यान्नों के भंडार में 5 प्रतिशत से बढ़ाकर 25 प्रतिशत की वृद्धि क्यों की गयी?
सरकार की पूरी आर्थिक नीति इसके लिए जिम्मेदार है। इसलिए मेरा आरोप है कि पर्याप्त कदम उठाये बिना मनमाना उदारीकरण मूल्यवृद्धि का कारण है।
मूल्यवृद्धि रोकने के लिए सरकार ने क्या कदम उठाये हैं? केवल यह विश्वास कि बाजार अर्थव्यवस्था से सब ठीक हो जायेगा। बाजार अर्थव्यवस्था में सरकार का विश्वास, मनमाने ढंग से उदारीकरण में उसका विश्वास, भूमण्डलीय में उसका विश्वास है जिसके चलते देश की यह हालत हो गयी है। हमने मांग की थी कि आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन किया जाये, लेकिन संशोधन नहीं किया गया। आंकड़ों की कालाबाजारी केवल भारत में ही नहीं, पूरे विश्व में सबसे बड़ा रहस्य है। मूल्यों को कैसे नियंत्रित किया जाये? केवल यही मुद्दा नहीं है। आज देश में अनाज का कारोबार सबसे मुनाफे का कारोबार है। सुषमा स्वराज ने चीनी की बात कही है। मैं पूरे अनाज कारोबार की बात कर रहा हूं। क्या आप विश्वास करेंगे कि एक साल में अनाज कारोबार में 300 प्रतिशत का मुनाफा हुआ है?ये पैसे कहां से आये? ये पैसे राष्ट्रीयकृत बैंकों से आये। ये पैसे क्यों आये? क्योंकि सरकार ने अनाज का कारोबार करने वालों के लिए राष्ट्रीयकृत बैंकों के दरवाजे खोल दिये। आम लोगों की मुसीबतें बढ़ाने के लिए जनता के पैसे का इस्तेमाल किया गया।
महंगाई और सब्सिडी
मैं कहता हूं कि बंगाल काफी दूर है। आंध्र प्रदेश में क्या हो रहा है? छत्तीसगढ़ में क्या हो रहा है? पुणे में क्या हो रहा है? समस्या यह है कि बढ़ती कीमतों की चिंता करने वाला कोई नहीं है, भुखमरी की चिन्ता करने वाला कोई नहीं है। मेरा सुझाव है कृषि के क्षेत्र में अधिकाधिक निवेश होना चाहिए। सरकार सिंचाई की सुविधा को बढ़ाए, भूमि का व्यापरीकरण बन्द हो, भूमि का गैर कृषि उद्देश्यों के लिए विपणन बंद हो , किसानों को फसल का समर्थन मूल्य मिले तथा देहातों के लिए एक विशाल सामाजिक संरचना बनायी जाये। दूसरा सरकार को सट्टेबाजी, स्टाक का बाजारीकरण, वादा कारोबार तथा अन्न व्यापार के लिए बैंकों से कर्ज को रोक देना चाहिए।
आज हम जीडीपी का 1 प्रतिशत अन्न सब्सिडी पर खर्च करते हैं। मैं मांग करता हूं कि इसके लिए 3 प्रतिशत सब्सिडी दी जाये ताकि 23.96 करोड़ लोगों को सस्ते दामों पर अन्न मिले। सरकार को देश के हक में काम करना चाहिए, जनता के हक में काम करना चाहिए। इसके लिए नीति में परिवर्तन होना चाहिए। जब तक गरीबी है, जब तक बेरोजगारी है, जब तक भुखमरी है, जब तक हरिजनों और आदिम जातियों पर अत्याचार होतें रहेंगे, माओवाद को पनपने का अवसर मिलेगा।
हम मोआवादियों द्वारा हिंसा के खिलाफ हैं। मैं यह कहना चाहता हूं कि अगर आप महंगाई नहीं रोकेंगे, भुखमरी नहीं रोकेंगे, जरूरत के अनुसार अन मुहैया नहीं कराएंगे, बेरोजगारी की समस्या हल नहीं करेंगे, यह देश बंट जाएगा, सरकार साख खो देगी, जनता का विश्वास खो देगी, जो हम नहीं चाहते हैं। (संक्षिप्त)
डी. राजा का भाषण
डी. राजा ने बहस में भाग लेते हुए मूल्यवृद्धि के लिए सरकार कोे जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि आज देश में महंगाई सबसे ज्वलंत समस्या बनी हुई है। सभी जरूरी चीजों के मूल्यों में कई गुना वृद्धि हो गयी है। यही कारण है कि हमने मूल्यवृद्धि पर व्यापक बहस की मांग की। मैं सभी राजनीतिक दलों से अपील करता हूं कि वे बहस के दौरान लोगों की गंभीर चिंताओं को ध्यान में रखे। लोगों में गुस्सा है और निराशा की भावना है।
लोगों का कहना है कि जितना ही आप बात करते हैं उतना ही ज्यादा मूल्य बढ़ते हैं। यही निराशावाद है तथा संसद एवं संसद सदस्यों के प्रति लोगों की भावना है। हमें पूरी गंभीरता के साथ इस मुद्दे पर बहस करनी चाहिए। सरकार को इस बारे में अधिक संवेदनशील होना चाहिए। लोग सोचते हैं कि सरकार लाचार है। सरकार उपाय करने के लिए अंधेरे में हाथ-पांव चला रही है। लेकिन मैं इससे सहमत नहीं हूं। सरकार जानती है, जो सत्ता में हैं वे जानते हैं कि देश में क्या हो रहा है। लेकिन वे कुछ करना नहीं चाहते। सरकार चाहती तो मुद्रास्फीति और मूल्यवृद्धि रोकने के लिए सख्त कदम उठाती। लेकिन वह कारवाई करना नहीं चाहती। क्यों? क्योंकि सरकार, यूपीए 2 विकास के नवउदारवादी रास्ते के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है। सरकार मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था की नीति पर चल रही है। सरकार बड़े औद्योगिक घरानों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों को उदार पूर्वक रियायतें देने की नीति पर चल रही है। पहले सरकार कहा करती थी कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल, खाद्यान्नों आदि के मूल्य बढ़ गये हैं इसलिए भारत में भी मूल्य बढ़ेंगे। लेकिन मुद्रास्फीति की दर में काफी गिरावट आ गयी, यहां तक कि शून्य पर पहुंच गयी फिर भी कीमतें कम नहीं हुई। इसका आर्थिक तर्क क्या है? सरकार के पास इसका स्पष्टीकरण क्या है? सरकार ने मानसून एवं कम वर्षा की बात कही। लेकिन देश के अनेक हिस्सों में भारी वर्षा हुई, बाढ़ भी आयी। सरकार को इन सबका पूर्वानुमान होना चाहिए था। अब क्या हो रहा है। वे एक दूसरे पर दोषारोपण कर रहे हैं। कृषि मंत्री शरद पवार के कुछ बयानों से देश में भय और आशंका की स्थिति पैदा हुई।
हमारे सुझाव
कुछ लोग सोचते हैं कि जब हम सरकार की आलोचना करते हैं तो कोई सुझाव नहीं देते। अवश्य की हमने सुझाव दिया है और देते रहे हैं। जब हमने यूपीए-1 सरकार का समर्थन किया था तो हमने सरकार को काफी सार्थक सुझाव दिये थे मुद्रास्फीति और मूल्यवृद्धि रोकने के लिए। हमने सरकार से तभी कहा था आज भी कह रहा हूं कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली सबके लिए लागू क्यों नहीं करते? गरीबी रेखा के नीचे (बीपीएल) और गरीबी रेखा के ऊपर (एपीएल) के बीच क्यों विभाजन है जो काफी त्रुटिपूर्ण है और उसमें संशोधन करने की जरूरत है तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली का विस्तार करके उसे मजबूत बनाने की जरूरत है। लेकिन सरकार का दृष्टिकोण भिन्न है और वह धीरे-धीरे इसे समाप्त करना चाहती है। इसी प्रकार हम सरकार से आवश्यक वस्तु अधिनियम को कारगर एवं मजबूत बनाने की मांग करते हैं लेकिन सरकार ऐसा क्यों नहीं कर रही है? देश में आज जो स्थिति पैदा हुई है उसके लिए सरकार की नीति जिम्मेदार है। सरकार को गरीबों को नहीं, बड़े उद्योगपतियों एवं कारपोरेट घरानों की चिंता है। इसलिए वह नवउदारवाद की नीति पर चल रही है ताकि बड़े उद्योगपतियों और कारपोरेट घरानों को खुश रखा जा सके।
केवल कृषि उत्पादन बढ़ाने और आत्मनिर्भरता की बात करना काफी नहीं है, सरकार को सही मायने में ठोस कदम उठाना होगा। यदि सरकार ठोस कदम नहीं उठायेगी तो यहां बहस करना बेकार है। आज लोग क्या सोचते हैं, संसद एवं संसद सदस्यों के प्रति उनकी क्या सोच है, क्या भावना है? आमतौर पर वे यही कहते हैं कि संसद में चाहे जितनी बहस हो ले, संसद सदस्य जितना चिल्ला लें, कीमतें कम नहीं होगी, कीमतें ऐसी ही बढ़ती रहेंगी। इस तरह की सोच निराश को जन्म देती है जो खतरनाक है, लोकतंत्र के लिए घातक है। चूंकि हम लोकतंत्र में विश्वास करते हैं तो हम सरकार से कहना चाहते हैं कि वह कीमतें रोकने के लिए ठोस कदम उठाये। लोग यही चाहते हंै। (संक्षिप्त)
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गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के राज्य नाट्य समारोह में आगरा इप्टा की प्रस्तुति











हरदोई में २२-२७ मार्च २०१० के मध्य उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी द्वारा आयोजित राज्य नाट्य समारोह में आगरा इप्टा द्वारा गोपाल राजू कृत 'किस्सा एक अजनबी का" का मंचन कामरेड दिलीप रघुवंशी के निर्देशन में किया गया। नाटक के चार चित्र पेश है।




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विद्युत वितरण के निजीकरण का विरोध

लखनऊ 31 मार्च। आगरा में विद्युत वितरण के कार्य को बहुराष्ट्रीय कम्पनी ‘टोरेन्ट’ को सौंपे जाने की भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने तीव्र निन्दा करते हुए रोष जाहिर किया है। भाकपा ने पूर्व विद्युत बोर्ड की बेशकीमती परिसम्पत्तियों को औने-पौने दाम पर सरमायेदारों को सौंपने के लिए 20 साल पूर्व शुरू की गयी निजीकरण की प्रक्रिया की ओर एक बड़ा खतरनाक कदम बताया है।
यहां जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में भाकपा ने बिजली बोर्ड के निजीकरण की प्रक्रिया को जनविरोधी बताते हुए कहा है कि 16 साल पहले ग्रेटर नोएडा में इसी तरह का किया गया प्रयोग असफल रहा था और करोड़ों रूपये का चूना बिजली बोर्ड को लगा था। प्रदेश सरकार ने इससे कोई सबक नहीं लिया है।
भाकपा ने इस पूरी प्रक्रिया में भ्रष्टाचार व्याप्त होने की ओर इशारा करते हुए कहा है कि पावर कारपोरेशन ने औसत बिजली विक्रय मूल्य आगरा में 4.00 रूपये प्रति यूनिट तथा कानपुर में 4.25 रूपये प्रति यूनिट होने के तथ्य को टेन्डर फार्म में गलत तरीके से घटा कर क्रमशः 2.62 रूपये तथा 3.55 रूपये प्रति यूनिट लिखा गया जबकि टोरेन्ट कम्पनी से हुए समझौते के अनुसार यह कम्पनी केवल 1.54 रूपये तथा 2.00 रूपये प्रति यूनिट ही पावर कारपोरेशन को अदा करेगी। भाकपा ने कहा है कि इस गड़बड़ घोटाले से हजारों करोड़ रूपये का नुकसान पावर कारपोरेशन को होगा वहीं दूसरी ओर बिजली उपभोक्ताओं को अपनी जेबों को भी ढीला करना होगा।
भाकपा ने बिजली कर्मचारियों से कार्य बहिष्कार के बजाय सीधी कार्यवाही का अनुरोध करते हुए कहा है कि निजीकरण के खिलाफ यह लड़ाई केवल बिजली कर्मचारियों के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती है। भाकपा ने जनता के व्यापक तबकों से इसका सड़कों पर विरोध करने का आह्वान किया है।


(शमशेर बहादुर सिंह)
कार्यालय सचिव
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बुधवार, 31 मार्च 2010

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, उत्तर प्रदेश के ब्लॉग की प्रिंट मीडिया में चर्चा शुरू


हमें भाई पाबला ने जमशेदपुर से सुचना दी है की हमारे ब्लॉग की चर्चा प्रिंट मीडिया में शुरू हो गयी है। उनकी क्लिप्पिंग को हमने ऊपर चस्पा की है। हम पाबला भाई के आभारी है।
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बुधवार, 24 मार्च 2010

तू जिंदा है तो ज़िन्दगी की जीत में यकीन कर

तू जिंदा है तो ज़िन्दगी की जीत में यकीन कर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर। तू जिंदा है ....

ये ग़म के और चार दिन, सितम के और चार दिन,
ये दिन भी जायेंगे गुज़र, गुज़र गए हज़ार दिन।
कभी तो होगी इस चमन पे भी बहार की नज़र,
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर। तू जिंदा है...

हमारे कारवां को मंजिलों का इंतज़ार है,
ये आँधियों, ये बिजलियों की पीठ पर सवार है।
तू आ कदम मिला के चल, चलेंगे एक साथ हम,
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर. तू जिंदा है ...

ज़मीं के पेट में पली अगन, पले हैं ज़लज़ले,
टिके न टिक सकेंगे भूख रोग के स्वराज ये,
मुसीबतों के सर कुचल चलेंगे एक साथ हम,
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर। तू जिंदा है...

बुरी है आग पेट की, बुरे हैं दिल के दाग ये,
न दब सकेंगे, एक दिन बनेंगे इन्कलाब ये,
गिरेंगे ज़ुल्म के महल, बनेंगे फिर नवीन घर,
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर. तू जिंदा है...
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NFIW ON PROPOSED FOOD SECURITY BILL

NFIW ON PROPOSED FOOD SECURITY BILL

The National Federation of Indian Women (NFIW) oppose the proposed Food Security. The Bill guarantees just 25 kg of wheat or rice for Rs 3/- per kg per month, that too for a limited number of BPL families and increases the prices of the food grains for the APL Families.

At present the BPL families in most of the states get 35kg of food grains either for Rs. 1 or for Rs. 2 pre kg.. In this background the proposed Bill will not only snatch away the existing entitlements of the poor but it will bring a situation of food insecurity.

There fore NFIW DEMANDS THAT-

a) the government enacts a universal Food Security Bill.
b) The food grains distributing under this Act should be healthy and nutritious.
c) It should be made a statutory obligation of the Government to ensure that nutritious and safe food is available in the PDS for a lesser price.
d) In the name of Food Security government should not distribute Genetically modified products through PDS
e) Strict control and monitoring of national –international corporates.
f) Steps must be taken to prevent patenting of food and seeds.
g) Stress should be given to procure food grains which is locally produced, environmentally safe and culturally appropriate.
h) Women should be involved in every stage of framing the food Policy and its implementation.
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मंगलवार, 23 मार्च 2010

वीर भगत सिंह आज अगर, उस देश की तुम दुर्दशा देखते


शहीद दिवस के अवसर पर विशेष

जिस पर अपना सर्वस्व लुटाया, जिसके खातिर प्राण दिए थे।
वीर भगत सिंह आज अगर, उस देश की तुम दुर्दशा देखते॥
आँख सजल तुम्हारी होती, प्राणों में कटु विष घुल जाता।
पीड़ित जनता की दशा देखकर, ह्रदय विकल व्यथित हो जाता ॥
जहाँ देश के कर्णधार ही, लाशों पर रोटियाँ सेकते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
तुम जैसे वीर सपूतों ने, निज रक्त से जिसको सींचा था।
यह देश तुम्हारे लिए स्वर्ग से सुन्दर एक बगीचा था॥
अपनी आँखों के समक्ष, तुम कैसे जलता इसे देखते ।
वीर भगत सिंह आज अगर........
जिस स्वाधीन देश का तुमने, देखा था सुन्दर सपना।
फांसी के फंदे को चूमा था, करने को साकार कल्पना॥
उसी स्वतन्त्र देश के वासी, आज न्याय की भीख मांगते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
अपराधी, भ्रष्टों के आगे, असहाय दिख रहा न्यायतंत्र।
धनपशु, दबंगों के समक्ष, दम तोड़ रहा है लोकतंत्र।
जहाँ देश के रखवालों से, प्राण बचाते लोग घुमते॥
वीर भगत सिंह आज अगर........
साम्राज्यवाद का सिंहासन, भुजबल से तोड़ गिराया था
देश के नव युवकों को तुमने, मुक्ति मार्ग दिखाया था॥
जो दीप जलाये थे तुमने, अन्याय की आंधी से बुझते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
जिधर देखिये उधर आज, हिंसा अपहरण घोटाला है।
अन्याय से पीड़ित जनता, भ्रष्टाचार का बोल बाला है॥
लुट रही अस्मिता चौराहे पर, भीष्म पितामह खड़े देखते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
साम्राज्यवाद के प्रतिनिधि बनकर, देश लुटेरे लूट रहे।
बंधुता, एकता, देश प्रेम के बंधन दिन-दिन टूट रहे॥
जनता के सेवक जनता का ही, आज यहाँ पर रक्त चूसते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
बंधू! आज दुर्गन्ध आ रही, सत्ता के गलियारों से।
विधान सभाएं, संसद शोभित अपराधी हत्यारों से।
आज विदेशी नहीं, स्वदेशी ही जनता को यहाँ लूटते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
पूँजीपतियों नेताओं का अब, सत्ता में गठजोड़ यहाँ।
किसके साथ माफिया कितने, लगा हुआ है होड़ यहाँ ॥
अत्याचारी अन्यायी, निर्बल जनता की खाल नोचते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
शहरों, गाँवों की गलियों में, चीखें आज सुनाई देती।
अमिट लकीरें चिंता की, माथों पर साफ़ दिखाई देती॥
घुट-घुट कर मरती अबलाओं के, प्रतिदिन यहाँ चिता जलते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
घायल राम, मूर्छित लक्ष्मण, रावण रण में हुंकार रहा।
कंस कृष्ण को, पांडवों को, दुःशासन ललकार रहा॥
जनरल डायर के वंशज, आतंक मचाते यहाँ घूमते।
वीर भगत सिंह आज अगर, उस देश की तुम दुर्दशा देखते॥


-मोहम्मद जमील शास्त्री
( सलाहकार लोकसंघर्ष पत्रिका )
शहीद दिवस के अवसर पर भगत सिंह, राजगुरु सहदेव को लोकसंघर्ष परिवार का शत्-शत् नमन
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मंगलवार, 16 मार्च 2010

लो क सं घ र्ष !: उक्रेन में राष्ट्रपति चुनावः अमरीकी साम्राज्यवाद के लिए एक झटका

1990-91 में विश्व में एकध्रुवीय हो जाने और अमरीका का इसका अगुआ बन जाने के बाद से ही उसने विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी गतिविधियां तेज कर दी हैं। लेकिन यूरोप और खासकर पूर्वी यूरोप पर उसका विशेष ध्यान है। इस अभियान में उसने सर्वप्रथम युगोस्वालिया को सभी अंतर्राष्ट्रीय कानूनों और मान्यताओं की अवहेलना करते हुए कई भागों में विभक्त कर दिया। इसके साथ ही उसका दूसरा निशाना उन राष्ट्रों पर था, जो पहले समाजवादी खेमों के सदस्य थे। इस मुहिम में इन राष्ट्रों को नाटो सैनिक संगठन में सम्मिलित करना शामिल थे। इसके साथ ही मध्य एशिया के राष्ट्रों और इनके माध्यम से कैस्पियन सागर के तेल सम्पदा पर अधिकार जमाना इनकी नीति का भाग था।
शुरू में उसे कुछ सफलता भी मिली, जैसे कि बुल्गारिया, पोलैंड, रूमानिया आदि को नाटो का सदस्य बनाया गया और इनमें से कुछ में अमरीकी नाटो फौजी अड्डे भी स्थापित किये गये। लेकिन अभियान के इस क्रम में उसे बड़ा झटका ज्याॅर्जिया संकट के रूप में लगा। लम्बे समय से अमरीका उक्रेन को नाटो में शामिल करने के लिए प्रयत्नशील है। इस संबंध में उतार-चढ़ाव होता रहा है।
उक्रेन में अभी-अभी राष्ट्रपति का आम चुनाव संपन्न हुआ है। वहां की चुनाव प्रणाली के अनुसार राष्ट्रपति प्रत्यक्ष वोटरों द्वारा दो चरणों में चुना जाता है। पहले चरण में कई उम्मीदवार लड़ सकते हैं। यदि किसी को 50 प्रतिशत से अधिक नहीं मिला तो दो अधिक मत पाने वाले दूसरे चरण में लड़ते हैं। इस चुनाव के पहले दौर (31 जनवरी) में विक्टर यानुकोविच और वर्तमान प्रधानमंत्री युलिया तिमोशेको को क्रमशः 35 अज्ञैर 25 प्रशित मत मिले हैं जबकि उक्रेन के नाटों में शामिल करने की नीति के समर्थक वर्तमान राष्ट्रपति युश्चेको को मात्र 5 प्रतिशत ही मत मिल पाए हैं। इसका मतलब था कि अन्तिम दौर में जीतने वाला अमरीका समर्थक नहीं होता। क्योंकि यानुकोविच और तिमोशेकों दोनों ही अमरीका-विरोधी हैं। इस प्रकार उक्रेन को नाटो में शामिल करने के अमरीका मंसूबे पर पूर्ण विराम लग जाएगा। यह अमरीका के लिए बड़ा झटका है। इसके अलावा और अन्य तरह से भी उक्रेन महत्वपूर्ण है। यानुकोविच को मात्र 5 प्रतिशत मत मिलना नाटो सदस्य बनाने की उनकी अमरीका परस्त नीति को रद्द किया जाना है।
कैस्पियन सागर से तेल और गैस की आपूर्ति पश्चिम यूरोप के राष्ट्रों को कई माध्यम से होती है। इसमें रूस, तर्कमेनिस्तान समझौता अजरबैजान के तेल गैस के रूस के रास्ते पश्चिम यूरोप जाने और रूस-तुर्की के रास्ते पश्चिम यूरोप जाने और रूस-तुर्की समझौता जो गैस/तेल को दक्षिण यूरोप भेजेंगे, प्रमुख हैं। येश्चेंका इन सबके खिलाफ थे और वे चाहते थे कि रूस को इन सबसे अलग कर सारी तेल/गैस उक्रेन से ही होकर पश्चिम यूरोप को जाये। लेकिन स्पष्ट रूप से यह सब ख्याली पुलाव बन कर ही रह जायगा।
उपरोक्त तेल राजनीति का सीधा संबंध कैस्पियन सागर के तेल और गैस भंडार से है। पहले वह पूर्व सोवियत संघ की सम्पदा थी। उसके ध्वस्त होने के बाद वह सोवियत संघ से अलग हुए और कैस्पियन सागर से लगे राष्ट्रों की सम्पत्ति है। विभिन्न समझौतों के कारण इस तेल/गैस भंडार पर वर्चस्व स्थापित करना भी एक उद्देश्य रहा है। लेकिन उक्रेन के इस चुनाव से उसकी इस नीति को मुंह की खानी पड़ी है।
यूश्चेंको उक्रेन में सेवास्तोपोल में रूसी सैनिक अड्डे के भी खिलाफ थे। इस सैनिक अड्डे का काला सागर पर वर्चस्व से सम्बंध है। काला सागर से लगे बुल्गारिया और रूमानिया में पहले से ही अमरीका ने सैनिक अड्डा स्थापित कर रखा है और उसका उद्देश्य काला सागर पर अपना दबदबा जमाना है। उसका यह मंसूबा भी धराशायी होता दीख रहा है।
ज्याॅर्जिया के संबंध में भी युश्चेंको/रूस की संकट भत्र्सना के पक्षधर थे। उक्रेन की आने वाली सरकार की इस मामले में भी अलग नीति होगी। कुछ दिन पहले उक्रेन से गुजरने वाली पाइप-लाइन के संबंध में रूस के साथ उक्रेन का संकट हुआ था। ये पाइप-लाइन पश्चिम यूरोप को भी जा रही है और इस संकट का असर पश्चिम यूरोप को पहुंचने वाले तेल और गैैस की आपूर्ति पर पड़ा था। इसलिए पश्चिम यूरोप के देश भी इस संबंध में अमरीका के विरूद्ध और रूस समर्थक नीति रखते हैं। इन सब घटनाओं का यह अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिए कि उक्रेन में रूस पक्षी सरकार आने वाली है। लेकिन लड़ने वाले दोनों उम्मीदवारों ने साफ कर दिया है कि उनकी नीति तर्कसंगत और उक्रेनपक्षी होगी।
कुल मिलाकर आने वाले दिनों में अमरीकी नीति को इस क्षेत्र में भारी झटका लगने जा रहा है और ओबामा के लिए सांप-छछंुदर की स्थिति उत्पन्न होने वाली है। अगर ओबामा उक्रेन के संबंध में रूस के साथ टकराव की स्थिति पैदा करते हैं तो उनका रूस के साथ संबंध को ‘रिसेट’ करने (सामान्य बनाने) का कार्यक्रम धरा रह जायगा। अगर वह उक्रेन संबंधी नीति पर पीछे हटते हैं तो इसकी विरोधी रिपब्लिकन पार्टी इसकी नींद हराम करेगी।
चुनाव के दूसरे और अंतिम दौर में जिसमें सिर्फ दो सबसे अधिक मत पाने वाले उम्मीदवार ही लड़ते हैं। 7 फरवरी को दूसरे दौर में उक्रेन के विरोधी उम्मीदवार यानुकोविच ने प्रधानमंत्री तिमोशेको को राष्ट्रपति की दौड़ में बहुत थोड़े से मतों से हरा दिया। यानुकोविच को 48.40 तथा तिमोशेको को 45.99 प्रतिशत मत मिले। पश्चिमी देशों ने अपनी निराशा स्पष्ट की है। यूरोपीय संसद की परिषद के ‘रैपोर्टियर’ ने चुनावी नतीजे को ‘त्रासदी’ करार दिया है।
चुनाव नतीजे यानुकोविच के लिए नाटकीय वापसी है। वे भूतपूर्व प्रधानमंत्री हैं। 2004 के चुनावों में पश्चिम के हस्तक्षेप से चुनावी नतीजे उनके विरोध में गए जिसे “नारंगी क्रांति“ (!) कहा गया।
अब वे राष्ट्रपति के रूप में वापस आ गए हैं। जाहिर है उक्रेन दृढ़तापूर्वक पश्चिम-विरोध पर चलेगा; कम से कम संभावना तो यही लगती हैं।

भारत भूषण प्रसाद
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रविवार, 14 मार्च 2010

भगत सिंह की याद में उनकी शहादत के 75 वर्ष पूरे होने पर

भगत सिंह की याद में
उनकी शहादत के 75 वर्ष पूरे होने पर






ब्रिटिश सरकार ने 23 मार्च 1931 को भगत सिंह को फाँसी दी तो वे केवल तेईस साल के थे। लेकिन आज तक वे हिन्दुस्तान के नौजवानों के आदर्श बने हुए हैं। इस छोटी सी उम्र में उन्होंने जितना काम किया और जितनी बहादुरी दिखायी, उसे केवल याद कर लेना काफी नहीं है। हम उन्हें श्रध्दांजलि देते हैं। 1926 में भगत सिंह ने नौजवान भारत सभा का गठन किया। नौजवानों का यह संगठन ब्रिटिश साम्राज्यवाद के शोषण के कारनामे लोगों के सामने रखने के लिए बनाया गया था। मुजफ्फर अहमद, जो कि कम्युनिस्ट पार्टी के स्थापना सदस्य थे, अठारह साल के भगत सिंह के साथ अपनी मुलाकात को याद करते हैं। कम्युनिस्ट पार्टी का गठन 1925 में कानपुर में हुआ था और कानपुर बोल्शेविक कान्स्पिरेसी केस के तहत अब्दुल मजीद और मुजफ्फर अहमद गिरफ्तार कर लिए गये थे। भगत सिंह कॉमरेड अब्दुल मजीद के घर उन दोनों का सम्मान करने गये। जाहिर है, अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत से ही भगत सिंह का रुझान कम्युनिस्ट आंदोलन की तरफ था।

1930 में जब भगत सिंह जेल में थे, और उन्हें फाँसी लगना लगभग तय था, उन्होंने एक पुस्तिका लिखी, “मैं नास्तिक क्यों हूँ।यह पुस्तिका कई बार छापी गयी है और खूब पढ़ी गयी है। इसके 1970 के संस्करण की भूमिका में इतिहासकार विपिन चंद्र ने लिखा है कि 1925 और 1928 के बीच भगत सिंह ने बहुत गहन और विस्तृत अध्ययन किया। उन्होंने जो पढ़ा, उसमें रूसी क्रांति और सोवियत यूनियन के विकास संबंधी साहित् प्रमुख था। उन दिनों इस तरह की किताबें जुटाना और पढ़ना केवल कठिन ही नहीं बल्कि एक क्रांतिकारी काम था। भगत सिंह ने अपने अन्य क्रांतिकारी नौजवान साथियों को भी पढ़ने की आदत लगायी और उन्हें सुलझे तरीके से विचार करना सिखाया।

1924 में जब भगत सिंह 16 साल के थे, तो वे हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) में शामिल हो गये। यह एसोसिएशन सशस्त्र आंदोलन के जरिये ब्रिटिश साम्राज्यवाद को खत् करना चाहता था। 1927 तक HRA के अधिकतर नेता गिरफ्तार किए जा चुके थे और कुछ तो फाँसी के तख्ते तक पहुँच चुके थे। HRA का नेतृत् अब चंद्रशेखर आजाद और कुछ अन्य नौजवान साथियों के कंधों पर पड़ा। इनमें से प्रमुख थे भगत सिंह। 1928 बीतते भगत सिंह और उनके साथियों ने यह त् कर लिया कि उनका अंतिम लक्ष् समाजवाद कायम करना है। उन्होंने संगठन का नाम HRA से बदलकर हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) रख लिया। यह सोशलिस्ट शब्द संगठन में जोड़ने से एक महत्त्वपूर्ण तब्दीली आयी और इसके पीछे सबसे बड़ा हाथ था भगत सिंह का। सोशलिज्म शब्द की समझ भगत सिंह के जेहन में एकदम साफ थी। उनकी यह विचारधारा मार्क्सवाद की किताबों और सोवियत यूनियन के अनुभवों के आधार पर बनी थी। ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ तब तक जो सशस्त्र संघर्ष हुए थे, उन्हें भगत सिंह ने मार्क्सवादी नजरिये से गहराई से समझने की कोशिश की।

दिल्ली असेम्बली में बम फेंकने के बाद 8 अप्रैल 1929 के दिन भगत सिंह बटुकेश्वर दत्त के साथ जेल पहुँचे। बम फेंककर भागने के बजाय उन्होंने गिरफ्तार होने का विकल्प चुना। जेल में उनकी गतिविधियों का पूरा लेखा-जोखा आज हमें उपलब्ध है। उन दिनों भगत सिंह का अध्ययन ज्यादा सिलसिलेवार और परिपक्व हुआ। लेकिन अध्ययन के साथ-साथ भगत सिंह ने जेल में राजनैतिक कैदियों के साथ होने वाले बुरे सलूक के खिलाफ एक लम्बी जंग भी छेड़ी। यह जंग सशस्त्र क्रांतिकारी जंग नहीं थी, बल्कि गांधीवादी किस्म की अहिंसक लड़ाई थी। कई महीनों तक भगत सिंह और उनके साथी भूख हड़ताल पर डटे रहे। उनके जेल में रहते दिल्ली एसेम्बली बम कांड और लाहौर षडयंत्र के मामलों की सुनवाई हुई। बटुकेश्वर दत्त को देशनिकाले की और भगत सिंह , सुखदेव और राजगुरू को फाँसी की सजा हुई।

बेहिसाब क्रूरता के बावजूद ब्रिटिश सरकार उनके हौसलों को पस् नहीं कर पायी। सुश्री राज्यम सिन्हा ने अपने पति विजय कुमार सिन्हा की याद में एक किताब लिखी। किताब का नाम हैएक क्रांतिकारी के बलिदान की खोज।इस पुस्तक में उन्होंने विजय कुमार सिन्हा और उनके दोस् भगत सिंह के बारे में कुछ मार्मिक बातें लिखी हैं। इन क्रांतिकारी साथियों ने कोर्ट में हथकड़ी पहनने से इन्कार कर दिया था। कोर्ट मान भी गयी, लेकिन अपने दिये हुए वादे का आदर नहीं कर पायी। जब कैदी कोर्ट में घुसे तो झड़प शुरू हो गयी और फिर बेहिसाब क्रूरता और हिंसा हुई। - “जब पुलिस को यह लगा कि उनकी इज्जत पर बट्टा लग रहा है तो पठान पुलिस के विशेष दस्ते को बुलाया गया जिन्होंने निर्दयता के साथ कैदियों को पीटना शुरू किया। पठान पुलिस दस्ता अपनी क्रूरता के लिए खास तौर पर जाना जाता था। भगत सिंह के ऊपर आठ पठान दरिंदे झपटे और अपने कँटीले बूटों से उन्हें ठोकर मारने लगे। यही नहीं, उनपर लाठियाँ भी चलाई गयीं। एक यूरोपियन अफसर राबर्टस ने भगत सिंह की ओर इशारा करते हुए कहा कि यही वो आदमी है, इसे और मारो। पिटाई के बाद वे इन क्रांतिकारियों को घसीटते हुए ऐसे ले गये, जैसे भगत सिंह लकड़ी के ठूँठ हों। उन्हें एक लकड़ी की बेंच पर पटक दिया गया। ये सारा हँगामा कोर्ट कंपाउंड के भीतर बहुतेरे लोगों के सामने हुआ। मजिस्ट्रेट खुद भी यह नजारा देख रहे थे। लेकिन उन्होंने इसे रोकने की कोई कोशिश नहीं की। उन्होंने बाद में बहाना यह बनाया कि वे कोर्ट के प्रमुख नहीं थे, इसलिए पुलिस को रोकना उनकी जिम्मेदारी नहीं थी।

शिव वर्मा, जो बाद में सीपीएम के सीनियर कॉमरेड बने और अजय कुमार घोष, जो सीपीआई के महासचिव हुए, इस वारदात में बेहोश हो गये। तब भगत सिंह उठे और अपनी बुलंद आवाज में कोर्ट से कहा, “मैं कोर्ट को बधाई देना चाहता हूँ ! शिव वर्मा बेहोश पड़े हैं। यदि वे मर गये तो ध्यान रहे, जिम्मेदारी कोर्ट की ही होगी।

भगत सिंह उस समय केवल बाईस वर्ष के थे लेकिन उनकी बुलंद शख्सियत ने ब्रिटिश सरकार को दहला दिया था। ब्रिटिश सरकार उन आतंकवादी गुटों से निपटना तो जानती थी, जिनका आतंकवाद उलझी हुई धार्मिक राष्ट्रवादी विचारधारा पर आधारित होता था। लेकिन जब हिन्दुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन का नाम बदलकर हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन हो गया और भगत सिंह उसके मुख्य विचारक बन गये तो ब्रिटिश साम्राज्यवादी सरकार दहशत में गयी। भगत सिंह के परिपक्व विचार जेल और कोर्ट में उनकी निर्भीक बुलंद आवाज के सहारे सारे देश में गूँजने लगे। देश की जनता अब उनके साथ थी। राजनीतिक कैदियों के साथ जेलों में जिस तरह का अमानवीय बर्ताव किया जाता था, उसके खिलाफ भगत सिंह ने जंग छेड़ दी और बार-बार भूख हड़ताल की। उनका एक प्यारा साथी जतिन दास ऐसी ही एक भूख हड़ताल के दौरान लाहौर जेल में अपने प्राण गँवा बैठा। जब उसके शव को लाहौर से कलकत्ता ले जाया गया, तो लाखों का हुजूम कॉमरेड को आखिरी सलामी देने स्टेशन पर उमड़ आया।

कांग्रेस पार्टी का इतिहास लिखने वाले बी. पट्टाभिरमैया के अनुसार इस दौरान भगत सिंह और उनके साथियों की लोकप्रियता उतनी ही थी, जितनी महात्मा गांधी की !

जेल में अपनी जिन्दगी के आखिरी दिनों में भगत सिंह ने बेहिसाब पढ़ाई की। यह जानते हुए भी कि उनके राजनीतिक कर्मों की वजह से उन्हें फाँसी होने वाली है, वे लगातार पढ़ते रहे। यहाँ तक कि फाँसी के तख्ते पर जाने के कुछ समय पहले तक वे लेनिन की एक किताब पढ़ रहे थे, जो उन्होंने अपने वकील से मँगायी थी। पंजाबी क्रांतिकारी कवि पाश ने भगत सिंह को श्रध्दांजलि देते हुए लिखा है, “लेनिन की किताब के उस पन्ने को, जो भगत सिंह फाँसी के तख्ते पर जाने से पहले अधूरा छोड़ गये थे, आज के नौजवानों को पढ़कर पूरा करना है।गौरतलब है कि पाश अपने प्रिय नेता के बलिदान वाले दिन, 23 मार्च को ही खालिस्तानी आतंकवादियों द्वारा मार दिये गये।

भगत सिंह ने जेल में रहते हुए जो चिट्ठियॉं लिखते थे, उनमें हमेशा किताबों की एक सूची रहती थी। उनसे मिलने आने वाले लोग लाहौर के द्वारकादास पुस्तकालय से वे पुस्तकें लेकर आते थे। वे किताबें मुख्य रूप से मार्क्सवाद, अर्थशास्त्र, इतिहास और रचनात्मक साहित् की होती थीं। अपने दोस् जयदेव गुप्ता को 24 जुलाई 1930 को जो ख़त भगत सिंह ने लिखा, उसमें कहा कि अपने छोटे भाई कुलबीर के साथ ये किताबें भेज दें : 1) मिलिटेरिज् (कार्ल लाईपनिस्ट), 2) व्हाई मेन फाईट (बर्न्टेड रसेल), 3) सोवियत् ऐट वर्क 4) कॉलेप्स ऑफ दि सेकेण्ड इंटरनेशनल 5) लेफ्ट विंग कम्यूनिज्म (लेनिन) 6) म्युचुअल एज (प्रिंस क्रॉप्टोकिन) 7) फील्ड, फैक्टरीज एण्ड वर्कशॉप्स, 8) सिविल वार इन फ्रांस (मार्क्स), 9) लैंड रिवोल्यूशन इन रशिया, 10) पंजाब पैजेण्ट्स इन प्रोस्पेरिटी एण्ड डेट (डार्लिंग) 11) हिस्टोरिकल मैटेरियलिज्म (बुखारिन) और 12) स्पाई (ऊपटॉन सिंक्लेयर का उपन्यास)

भगत सिंह औपचारिक रूप से ज्यादा पढ़ाई या प्रशिक्षण हासिल नहीं कर पाए थे, फिर भी उन्हें चार भाषाओं का अच्छा ज्ञान था। उन्होंने पंजाबी, हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी भाषाओं में लिखा है। जेल से मिले उनके नोटबुक में 108 लेखकों के लेखन और 43 किताबों में से चुने हुए अंश मौजूद हैं। ये अंश मुख्य रूप से मार्क्स और एंगेल्स के लेखन से लिए गए हैं। उनके अलावा उन्होंने थॉमस पाएने, देकार्ट, मैकियावेली, स्पिनोजा, लार्ड बायरन, मार्क ट्वेन, एपिक्यूरस, फ्रांसिस बेकन, मदन मोहन मालवीय और बिपिन चंद्र पाल के लेखन के अंश भी लिए हैं। उस नोटबुक में भगत सिंह का मौलिक एवं विस्तृत लेखन भी मिलता है, जोदि साईंस ऑफ दि स्टेटशीर्षक से है। ऐसा लगता है कि भगत सिंह आदिम साम्यवाद से आधुनिक समाजवाद तक समाज के राजनीतिक इतिहास पर कोई किताब या निबंध लिखने की सोच रहे थे।

जिस बहादुरी और दृढ़ता के साथ भगत सिंह ने मौत का सामना किया, आज के नौजवानों के सामने उसकी दूसरी मिसाल चे ग्वारा ही हो सकते हैं। चे ग्वारा ने क्रांतिकारी देश क्यूबा में मंत्री की सुरक्षित कुर्सी को छोड़कर बोलिविया के जंगलों में अमेरिकी साम्राज्यवाद से लड़ने का विकल्प चुना। चे ग्वारा राष्ट्रीय सीमाएँ लाँघकर लातिनी अमेरिका के लोगों को पढ़ना-लिखना सिखाते थे। ये सच है कि चे ग्वारा का व्यक्तिगत अनुभव भगत सिंह की तुलना में बहुत ज्यादा विस्तृत था, और उसी वजह से उनके विचार भी अधिक परिपक्व थे। लेकिन क्रांति के लिए समर्पण और क्रांति का उन्माद दोनों ही नौजवान साथियों में एक जैसा था। दोनों ने साम्राज्यवाद और पूँजीवादी शोषण के खिलाफ लड़ाई लड़ी। दोनों ने ही अपने उस मकसद के लिए जान दे दी, जो उन्हें अपनी जिन्दगी से भी ज्यादा प्यारा था।

20 मार्च 1931 को, अपने शहादत के ठीक तीन दिन पहले भगत सिंह ने पंजाब के गवर्नर को एक चिट्ठी लिखी, “हम यह स्पष्ट घोषणा करें कि लड़ाई जारी है। और यह लड़ाई तब तक जारी रहेगी, जब तक हिन्दुस्तान के मेहनतकश इंसानों और यहाँ की प्राकृतिक सम्पदा का कुछ चुने हुए लोगों द्वारा शोषण किया जाता रहेगा। ये शोषक केवल ब्रिटिश पूँजीपति भी हो सकते हैं, ब्रिटिश और हिन्दुस्तानी एक साथ भी हो सकते हैं, और केवल हिन्दुस्तानी भी। शोषण का यह घिनौना काम ब्रिटिश और हिन्दुस्तानी अफसरशाही मिलकर भी कर सकती है, और केवल हिन्दुस्तानी अफसरशाही भी कर सकती है। इनमें कोई फर्क नहीं है। यदि तुम्हारी सरकार हिन्दुस्तान के नेताओं को लालच देकर अपने में मिला लेती है, और थोड़े समय के लिए हमारे आंदोलन का उत्साह कम भी हो जाता है, तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता। यदि हिन्दुस्तानी आंदोलन और क्रांतिकारी पार्टी लड़ाई के गहरे अँधियारे में एक बार फिर अपने-आपको अकेला पाती है, तो भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा। लड़ाई फिर भी जारी रहेगी। लड़ाई फिर से नये उत्साह के साथ, पहले से ज्यादा मुखरता और दृढ़ता के साथ लड़ी जाएगी। लड़ाई तबतक लड़ी जाएगी, जबतक सोशलिस्ट रिपब्लिक की स्थापना नहीं हो जाती। लड़ाई तब तक लड़ी जाएगी, जब तक हम इस समाज व्यवस्था को बदल कर एक नयी समाज व्यवस्था नहीं बना लेते। ऐसी समाज व्यवस्था, जिसमें सारी जनता खुशहाल होगी, और हर तरह का शोषण खत् हो जाएगा। एक ऐसी समाज व्यवस्था, जहाँ हम इंसानियत को एक सच्ची और हमेशा कायम रहने वाली शांति के दौर में ले जाएँगे......... पूँजीवादी और साम्राज्यवादी शोषण के दिन अब जल्द ही खत् होंगे। यह लड़ाई हमसे शुरू हुई है, हमारे साथ खत् हो जाएगी। इतिहास के इस दौर में, समाज व्यवस्था के इस विकृत परिप्रेक्ष् में, इस लड़ाई को होने से कोई नहीं रोक सकता। हमारा यह छोटा सा बलिदान, बलिदानों की श्रृंखला में एक कड़ी होगा। यह श्रृंखला मि. दास के अतुलनीय बलिदान, कॉमरेड भगवतीचरण की मर्मांतक कुर्बानी और चंद्रशेखर आजाद के भव्य मृतयुवरण से सुशोभित है।

उसी 20 मार्च्र के दिन नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने दिल्ली की एक आम सभा में कहा, “आज भगत सिंह इंसान के दर्जे से ऊपर उठकर एक प्रतीक बन गया है। भगत सिंह क्रांति के उस जुनून का नाम है, जो पूरे देश की जनतापर छा गया है।

फ्री प्रेस जर्नल ने अपने 24 मार्च 1931 के संस्करण में लिखा, “शहीद भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव आज जिन्दा नहीं हैं। लेकिन उनकी कुर्बानी में उन्हीं की जीत है, यह हम सबको पता है। ब्रिटिश अफसरशाही केवल उनके नश्वर शरीर को ही खत् कर पायी, उनका जज्बा आज देश के हर इंसान के भीतर जिन्दा है। और इस अर्थ में भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव अमर हैं। अफसरशाही उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती। इस देश में शहीद भगत सिंह और उनके साथी स्वतंत्रता के लिए दी गयी कुर्बानी के लिए हमेशा याद किए जाएँगे।सचमुच, 1931 के ब्रिटिश राज के उन आकाओं और कारिंदों की याद आज किसी को नहीं, लेकिन तेईस साल का वह नौजवान, जो फाँसी के तख्ते पर चढ़ा, आज भी लाखों दिलों की धड़कन है।

आज अगर हम भगत सिंह की जेल डायरी और कोर्ट में दिये गये वक्तव्य पढ़ें, और उसमें से केवलब्रिटिशशब्द को हटाकर उसकी जगहअमेरिकनडाल दें, तो आज का परिदृश्य सामने जाएगा। भगत सिंह के जेहन में यह बात बिल्कुल साफ थी, कि शोषक ब्रिटिश हों या हिन्दुस्तानी, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। आज लालच के मारे हिन्दुस्तानी नेता और अफसर अमरीकी खेमे में जा घुसे हैं। लेकिन भगत सिंह के ये शब्द हमारे कानों में गूँज रहे हैं - “लड़ाई जारी रहेगी।आज के बोलिविया में चे ग्वारा और अलान्दे फिर जीवित हो उठे हैं। लातिनी अमेरिका की इस नयी क्रांति से अमरीका सहम गया है। उसी तरह हिन्दुस्तान में भगत सिंह के फिर जी उठने का डर बुशों और ब्लेयरों को सताता रहे।

विपिन चंद्र ने सही लिखा है कि हम हिन्दुस्तानियों के लिए यह बड़ी त्रासदी है कि इतनी विलक्षण सोच वाले व्यक्ति के बहुमूल्य जीवन को साम्राज्यवादी शासन ने इतनी जल्दी खत् कर डाला। उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद ऐसे घिनौने काम करता ही है, चाहे हिन्दुस्तान हो या वियतनाम, इराक हो, फिलीस्तीन हो या लातिन अमरीका। लेकिन लोग इस तरह के जुर्मों का बदला अपनी तरह से लेते हैं। वे अपनी लड़ाई और ज्यादा उग्रता से लड़ते हैं। आज नहीं तो कल, लड़ाई और तेज होगी, और ताकतवर होगी। हमारा काम है क्रांतिकारियों की लगाई आग को अपने जेहन में ताजा बनाए रखना। ऐसा करके हम अपनी कल की लड़ाई को जीतने की तैयारी कर रहे होते हैं।

--लेखक, श्री चमनलाल, प्राध्यापक, जे एन यू, दिल्ली
अनुवादक , सुश्री जया मेहता एवं सुधीर साहू
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