भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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शनिवार, 7 मई 2011

भाकपा ने गौतम बुद्धनगर (नोएडा) में हुए गोलीकांड की उच्च स्तरीय जांच कराये जाने की मांग

लखनऊ 7 अप्रैल। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव डा0 गिरीश ने आज गौतम बुद्धनगर (नोएडा) में हुए गोलीकांड जिसमें कि कई लोगों के मारे जाने और अन्य दर्जनों के घायल होने की खबर है, पर गहरा अफसोस जताया है। भाकपा ने इस समूचे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच कराये जाने की मांग की है।


यहॉ जारी एक प्रेस बयान में डा0 गिरीश ने कहा कि दिल्ली के लगभग डेढ सौ किमी0 की दूरी तक बेहद उपजाऊ जमीनो पर उतर प्रदेश सरकार के सर्वोच्च नेताओं, शासक दल को आर्थिक लाभ पहुचाने वाले उद्योगपतियों और व्यापारियों तथा शासक दल पोषित भू-माफियाओं और विल्डरों की कडी नजर है और वे येन-केन प्रकारेण किसानों की जमीनों को हडपने में जुटे हुए हैं। इससे वहां किसानों में बेहद आक्रोश है और वे अपनी जमीनों को बचाने के लिए लगातार संघर्षरत हैं। यही कारण है कि पिछले एक-डेढ साल में यहां हुए गोली काण्डों में कई लोगों की जाने जा चुकी हैं। लेकिन प्रदेश सरकार मगरूर तरीके से किसानों को बर्बाद करने में जुटी है।

भारतीय कम्युनिसट पार्टी सरकार के इस रवैये की कठोर शब्दों में निन्दा करती है और प्रदेश सरकार से मांग करती है कि किसानों की उपजाऊ जमीनों को हडपने की कार्रवाईयां तत्काल रोकी जायें। भाकपा केन्द्र सरकार से भी मांग करती है कि भू-अधिग्रहण कानून 1894 में अविलम्ब संशोधन किया जाए वरना सरकारों और शासन प्रणाली को किसानों के तीखे आक्रोश का सामना करना पडेगा।
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गुरुवार, 5 मई 2011

परमाणु ऊर्जा का मसला जरूरत का नहीं, राजनीति का है


फुकुषिमा के परमाणु विध्वंस से ये साफ हो गया है कि चाहे परमाणु संयंत्रों की सुरक्षा का कितना भी दावा किया जाए, वो पूरी तरह सुरक्षित नहीं कहे जा सकते। फुकुषिमा में चारों रिएक्टरों में हुए विस्फोट से परमाणु विकिरण कितने बड़े इलाके़ में पहुँचा है और इसके कितने दूरगामी असर होंगे, इन सवालों का ठीक-ठीक जवाब देने की स्थिति में न तो राजनीतिज्ञ हैं और न ही वैज्ञानिक। ऐसे में भारत में दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु संयंत्र स्थापित करने के पीछे भारत सरकार की ओर से दिये जा रहे तर्क हास्यास्पद हैं और उनमें से जनता के प्रति धोखे को साफ पहचाना जा सकता है।

संदर्भ केन्द्र की 12वीं सालगिरह के मौके पर इन्दौर प्रेस क्लब के राजेन्द्र माथुर सभागृह में 20 अप्रैल को आयोजित कार्यक्रम में मुंबई से आये डॉ. विवेक मोंटेरो ने दर्षकों-श्रोताओं को अपने व्याख्यान में फुकुषिमा से जैतापुर तक के परमाणु कार्यक्रम की यादगार यात्रा करवाते हुए, एक वैज्ञानिक होने के नाते न केवल परमाणु ऊर्जा की वैज्ञानिक कसौटियों को जाँचा-परखा, बल्कि एक सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता होने के नाते परमाणु ऊर्जा के पैरोकारों के तर्कों की आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक स्तर पर भी बखूबी जाँच-पड़ताल की।

संदर्भ केन्द्र की ओर से डॉ. जया मेहता ने डॉ. विवेक मोंटेरो का परिचय देते हुए कहा कि विवेक ने अमेरिका से भौतिकी में पीएचडी कर लेने के बाद और कुछ समय टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च में पोस्ट डॉक्टोरल रिसर्च फेलो रहने के बाद तमाम सुख-सुविधा वाले कैरियर को छोड़ मुंबई में मजदूरों के संघर्षों में शामिल होने का निष्चय किया। फिलहाल वे मजदूर संगठन सीटू के महाराष्ट्र के राज्य सचिव हैं और जैतापुर में चल रहे परमाणु संयंत्र विरोधी आंदोलन ‘‘कोंकण बचाओ समिति’’ में शामिल हैं।

डॉ. विवेक मोंटेरो ने अपने व्याख्यान में कहा कि भारत में परमाणु ऊर्जा के पक्ष में तीन बातें कही जाती हैं कि ये सस्ती है, सुरक्षित है और स्वच्छ यानि पर्यावरण हितैषी है। जबकि सच्चाई ये है कि इनमें से कोई एक भी बात सच नहीं है बल्कि तीनों झूठ हैं। देष की जनता को धोखे में रखकर भारत में परमाणु कार्यक्रम बरास्ता जैतापुर जिस दिषा में आगे बढ़ रहा है, वहाँ अगर कोई दुर्घटना नहीं भी होती है तो भी आर्थिक रूप से देष की जनता को एनरॉन जैसे, और उससे भी बड़े आर्थिक धोखे का षिकार बनाया जा रहा है। और अगर कोई दुर्घटना हो जाती है तो आबादी के घनत्व को देखते हुए ये सोचना ही भयावह है लेकिन निराधार नहीं, कि भारत में किसी भी परमाणु दुर्घटना से हो सकने वाली जनहानि का परिमाण कहीं बहुत ज्यादा होगा।

विवेक मोंटेरो ने कहा कि फुकुषिमा में परमाणु रिएक्टरों के भीतर हुए विस्फोटों को ये कहकर संदर्भ से अलगाने की कोषिष की जा रही है कि वहाँ तो सुनामी की वजह से ये तबाही मची। और भारत में तो सुनामी कभी आ नहीं सकती। उन्होंने कहा कि ये सच है कि फुकुषिमा में एक प्राकृतिक आपदा के नतीजे के तौर पर परमाणु रिसाव हुआ लेकिन जादूगुड़ा या तारापुर या रावतभाटा या कलपक्कम आदि जो भारत के मौजूदा परमाणु ऊर्जा संयंत्र हैं, जहाँ कोई बड़ी दुर्घटना नहीं हुई है, वहाँ के नजदीकी गाँवों और बस्तियों में रहने वाले लोगों में अनेक रेडियोधर्मिता से जुड़ी बीमारियों का फैलना साबित करता है कि परमाणु विकिरण के असर उससे कहीं ज्यादा हैं जितने सरकार या सरकारी वैज्ञानिक स्वीकार करते हैं। मोंटेरो ने कहा कि लोग आमतौर पर सोचते हैं कि परमाणु ऊर्जा सिर्फ बम के रूप में ही हानिकारक होती है अन्यथा नहीं। लेकिन सच ये है कि परमाणु बम में रेडियोएक्टिव पदार्थ कुछ किलो ही होता है और विस्फोट की वजह से उसका नुकसान एकबार में ही काफी ज्यादा होता है, जबकि एक रिएक्टर में रेडियाधर्मी परमाणु ईंधन टनों की मात्रा में होता है। अगर वह किसी भी कारण से बाहरी वातावरण के संपर्क में आ जाता है तो उससे रेडियोधर्मिता का खतरा बम से भी कई गुना ज्यादा बढ़ जाता है। उन्होंने परमाणु ऊर्जा के सस्ती व सुरक्षित होने के मिथ को तोड़ने के साथ ही इसके पर्यावरण हितैषी मिथ को भी तोड़ा। उन्होंने कहा कि परमाणु ईंधन को ठंडा रखने के लिए बहुत ज्यादा मात्रा में पानी उस पर लगातार छोड़ा जाता है। ये पानी परमाणु प्रदूषित हो जाता है और इसके असर जानलेवा भी होते हैं। फुकुषिमा में ऐसा ही साठ हजार टन पानी रोक कर के रखा हुआ था जिसमें से 11 हजार टन पानी समंदर में छोड़ा गया और बाकी अभी भी वहीं रोक कर के रखे हैं। जो पानी छोड़ा गया है, वो भी काफी रेडियोएक्टिव है और उसके खतरे भी मौजूद हैं।

जहाँ तक परमाणु ऊर्जा की लागत का सवाल है तो इसके लिए आवष्यक रिएक्टर तो बहुत महँगे हैं ही और भारत-अमेरिकी परमाणु करार की वजह से हम पूरी तरह तकनीकी मामले में विदेषों पर आश्रित हैं। साथ ही किसी भी परमाणु संयंत्र की लागत का अनुमान करते समय न तो उससे निकलने वाले परमाणु कचरे के निपटान की लागत को शामिल किया जाता है और न ही परमाणु संयंत्र की डीकमीषनिंग (ध्वंस) को। कोई दुर्घटना न भी हो तो भी एक अवस्था के बाद परमाणु संयंत्रों को बंद करना होता है और वैसी स्थिति में परमाणु संयंत्र का ध्वंस तथा उसके रेडिएषन कचरे को दफन करना बहुत बड़े खर्च का मामला होता है। और अगर परमाणु दुर्घटना हो जाए तो उसके खर्च का तो अनुमान ही मुमकिन नहीं। चेर्नोबिल की दुर्घटना से 1986 में 4000 वर्ग किमी का क्षेत्रफल हजारों वर्षों के लिए रहने योग्य नहीं रह गया। उन्होंने स्लाइड्स के माध्यम से बताया कि वहाँ हुए परमाणु ईंधन के रिसाव से करीब सवा लाख वर्ग किमी जमीन परमाणु विकिरण के भीषण असर से ग्रस्त है। कोई कहता है कि वहाँ सिर्फ 6 लोगों की मौत हुई जबकि कुछ के आँकड़े 9 लाख भी बताये जाते हैं। क्या इसकी कीमत का आकलन किया जा सकता है? विकिरण के असर को खत्म होने में 24500 वर्ष लगने का अनुमान है, तब तक ये जमीन किसी भी तरह के उपयोग के लिए न केवल बेकार रहेगी बल्कि इसे लोगों की पहुँच से दूर रखने के लिए इसकी सुरक्षा पर भी हजारों वर्षों तक खर्च करते रहना पड़ेगा।

उन्होंने कहा कि फुकुषिमा के हादसे के बाद से दुनिया के तमाम देषों ने अपने परमाणु कार्यक्रमों को स्थगित कर उन पर पुनर्विचार करना शुरू किया है। जर्मनी में तो वहाँ की सरकार ने परमाणु ऊर्जा को शून्य पर लाने की योजना बनाने की कार्रवाई भी शुरू कर दी है। खुद अमेरिका में 1976 के बाद से कोई भी नया परमाणु संयंत्र नहीं लगाया गया है। वे सिर्फ दूसरे कमजोर देषों को बेचने के लिए रिएक्टर बना रहे हैं। इसके बावजूद भारत सरकार ऊर्जा की जरूरत का बहाना लेकर जैतापुर में परमाणु संयंत्र लगाने के लिए आमादा है। इसके पीछे की वजहों का खुलासा करते हुए उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, स्वीडन और रूस के साथ ये करार किया है कि भारत इन चारों देषों से 10-10 हजार मेगावाट क्षमता के रिएक्टर खरीद कर अपने देष में स्थापित करेगा। ये हमारे देष की नयी विदेष नीति का नतीजा है जो हमारे सत्ताधीषों ने साम्राज्यवादी ताकतों के सामने गिरवी रख दी है। महाराष्ट्र के रत्नागिरि जिले में जैतापुर में लगाये जाने वाले परमाणु संयंत्र के बारे में उन्होंने बताया कि वहाँ फ्रांस की अरीवा कंपनी द्वारा लगाया जाने वाला परमाणु संयंत्र खुद फ्रांस में ही अभी सवालों के घेरे में है और हम भारत में उसे लगाने के लिए तैयार हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति सरकोजी की पिछले दिनों हुई भारत यात्रा के पीछे भी ये व्यापारिक समझौता ही प्रमुख था। उन्होने विभिन्न श्रोतों का हवाला देकर बताया कि परमाणु संसाधनों से बनने वाली ऊर्जा न केवल अन्य श्रोतों से प्राप्त हो सकने वाली ऊर्जा से महँगी होगी बल्कि वो देष की ऊर्जा की जरूरत को कहीं से भी पूरी कर सकने में सक्षम नहीं होगी। खुद सरकार मानती है कि परमाणु ऊर्जा हमारे मौजूदा कुल ऊर्जा उत्पादन का मात्र 3 से साढ़े तीन प्रतिषत है जो अगले 40 वर्षों के बाद अधिकाधिक 10 प्रतिषत तक पहुँच सकेगी, वो भी तब जब कोई विरोध या दुर्घटना न हो। उन्होंने कहा कि एक मीटिंग में मौजूदा पर्यावरण मंत्री जयराम रमेष ने उनसे बिलकुल साफ कहा था कि महाराष्ट्र के जैतापुर में बनने वाला परमाणु संयंत्र किसी भी कीमत पर बनकर रहेगा और इसकी वजह ऊर्जा की कमी नहीं बल्कि हमारी विदेष नीति और अन्य देषों के साथ हमारे रणनीतिक संबंध हैं।

जहाँ तक ऊर्जा की कमी का सवाल है, ये ऊर्जा की उपलब्धता से कम और उसके असमान वितरण से अधिक जुड़ा हुआ है। बहुत दिलचस्प तरह से इसका खुलासा करते हुए उन्होंने मुंबई के एक 27 मंजिला घर की स्लाइड दिखाते हुए कहा कि इस बंगले में एक परिवार रहता है और इसमें हैलीपैड, स्वीमिंग पूल आदि तरह-तरह की सुविधाएँ मौजूद हैं। इस बंगले में प्रति माह 6 लाख यूनिट बिजली की खपत होती है। ये बंगला अंबानी परिवार का है। दूसरी स्लाइड दिखाते हुए उन्होंने कहा कि शोलापुर में रहने वाले दस हजार परिवारों की कुल मासिक खपत भी 6 लाख यूनिट की है। अगर देष में बिजली की कमी है तो दस हजार परिवारों जितनी बिजली खर्च करने वाले अंबानी परिवार को तो सजा मिलनी चाहिए लेकिन उल्टे अंबानी को इतनी ज्यादा बिजली खर्च करने पर सरकार की ओर से कुल बिल पर 10 प्रतिषत की छूट भी मिलती है।

पवन, सौर तथा बायोमास जैसे विकल्पों का संक्षेप में ब्यौरा देकर अपनी बात समाप्त करते हुए उन्होंने कहा कि अगर परमाणु ऊर्जा इतनी महँगी, खतरनाक और नाकाफी है तो फिर उसे किस लिए देष की जनता पर थोपा जा रहा है-ये देष के लोगों को देष की सत्ता संभाले लोगों से पूछना चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय ताकतों के सामने और उनके मुनाफे की खातिर देष की राजनीति और देष के लोगों की सुरक्षा को दाँव पर लगाया जा रहा है। ये मसला ऊर्जा की जरूरत का नहीं बल्कि राजनीति के पतन का है और पतित राजनीति का मुकाबला राजनीति से अलग रहकर नहीं बल्कि सही राजनीति के जरिये ही किया जा सकता है।

कार्यक्रम की शुरुआत फैज की जन्मषती के मौके पर फैज की दो नज्मों पर संदर्भ केन्द्र की ओर से बनाये गये एक पोस्टर को जारी करने के साथ हुई। फैज की मषहूर नज्म ‘‘लाजिम है कि हम भी देखेंगे’’ को गाया सारिका श्रीवास्तव ने। इस मौके पर बड़ों व स्कूली बच्चों की ओर से परमाणु ऊर्जा के खतरों से आगाह करती एक पोस्टर प्रदर्षनी भी लगायी गई थी जिसका शीर्षक था, ‘‘जैतापुर की संघर्षषील जनता के नाम’’। विवेक मोंटेरो के व्याख्यान के पूर्व मुंबई की डॉक्युमेंट्री फिल्म बनाने वालीं मानसी पिंगले ने 10 मिनट की फिल्म ‘‘कोंकण जलतासा’’ (कोंकण जल रहा है) का भी प्रदर्षन किया। मानसी ने फिल्म के माध्यम से बताया कि जैतापुर में बनने वाले परमाणु संयंत्र के प्रति स्थानीय लोगों का विरोध पिछले चार वर्षों से लगातार जारी है। पुलिस उनका दमन कर रही है और प्रषासन कभी ज्यादा मुआवजे का लालच दे रहा है तो कभी धमका रहा है तो कभी अच्छे और उजले भविष्य का आष्वासन दे रहा है लेकिन अधिकांष लोगों ने अपनी जगह छोड़ने से इन्कार कर दिया है। फिल्म में प्रभावित गाँवों के लोग उन जगहों के नजदीक रहने वाले लोगों से जाकर मिलते और बात करते भी बताये गए जहाँ परमाणु संयंत्र पहले लग चुके हैं। पुराने संयंत्रों की वजह से उजड़े लोगों में से एक का ये बयान हमारे विकास के पूरे परिदृष्य को ही प्रतिबिंबित करता है कि ‘‘वो कहते थे कि जिंदगी में अच्छा होगा, फर्क पड़ेगा। लेकिन क्या बदला? पहले भी हमें बिजली नहीं मिलती थी और अब भी आठ-आठ घंटे की कटौती होती है।’’ ऐसे अनेक लोगों ने उन्हें पिछले कुछ वर्षों में पनपीं और बढ़ीं बीमारियों के बारे में भी बताया जिसकी वजह उन्हें सीधे-सीधे नजदीक मौजूद परमाणु संयंत्र के साथ जुड़ी लगती हैं। चूँकि सरकार उन गाँवों को प्रभावित ही नहीं मानती अतः उन्हें इलाज में भी काफी तकलीफों का सामना करना पड़ता है। फिल्म दस मिनट की अल्प अवधि में भी जैतापुर में चल रहे लोगों के संघर्ष और सरकार के दमन का चित्र खींचने में कामयाब रही।

अंत में हुए सवाल जवाबों के लम्बे दौर में भी अनेक श्रोताओं ने भागीदारी की। एक उल्लेखनीय सवाल ये था कि अगर चेर्नोबिल और फुकुषिमा ही दो मात्र परमाणु दुर्घटनाएँ हुईं हैं तो ऐसी दुर्घटनाएँ तो किसी भी तरीके के ऊर्जा संयंत्रों में होती रहती हैं, फिर परमाणु ऊर्जा का ही विरोध क्यों? जवाब में विवेक ने कहा कि अगर आप रेल में केरोसीन या पेट्रोल लेकर सफर करते हैं तो जरूरी नहीं कि उससे हर बार ट्रेन में आग ही लग जाए, लेकिन आप इसी आधार पर ट्रेन में पेट्रोल लेकर चलने को सही तो नहीं ठहराने लगते। दूसरी बात ये है कि चेर्नोबिल और फुकुषिमा बेषक सात तीव्रता वाली दो ही परमाणु दुर्घटनाएँ हुई हैं लेकिन कम तीव्रता वाली अनेक दुर्घटनाएँ दुनिया के अलग-अलग देषों में हुईं हैं। खुद भारत में भी ऐसी अनेक दुर्घटनाएँ हो चुकी हैं। परमाणु संयंत्रों की डीकमीषनिंग (विध्वंस), भारत के परमाणु ऊर्जा विभाग की गैर जिम्मेदार भूमिका, परमाणु कचरे की समस्या आदि पर भी विस्तृत सवाल-जवाब हुए।

(प्रस्तुति: विनीत तिवारी)

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सोमवार, 2 मई 2011

प्रगतिशील लेखक संघ के पचहत्तर साल


मशाल की लौ

प्रगतिशील लेखक संघ को अंग्रेजी में पीडब्ल्यूए और उर्दू में तरक्कीपसंद मुसन्निफीन के नाम से जाना जाता है। इसकी स्थापना 10 अप्रैल 1936 के दिन आयोजित अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक अधिवेशन में हुई थी। यह अधिवेशन 9 अप्रैल से शुरू होकर लखनऊ के रफा-ए-आम हॉल में दो दिनांे तक चला। उसके अगले दिन ही अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना भी की गई थी। प्रलेस के स्थापना सम्मेलन में सज्जाद जहीर महामंत्री चुने गए थे। बहुत तेजी से यह संगठन पूरे हिंदुस्तान में सभी भारतीय भाषाओं के नए-पुराने लेखकों का विश्वसनीय साथी और मंच बन गया। इस संगठन की भावना ने एक चिनगारी का काम किया। चारांे तरफ लेखकों की एक जुटता की लहर फैल गई। अभिव्यक्ति की आजादी के तहत अंग्रेजीराज के आंदोलन के हिस्से के तौर पर और सामाजिक रूढ़िवाद के विरूद्ध सतत संघर्ष के अंतर्गत यह एक व्यापक संगठन बन गया। इस के संगठन के पीछे कुछ ऐतिहासिक स्थितियां थी।

विश्वमंदी, अंग्रेजी राज की नृशंसता, जागीरदारों-जमींदारों का शोषण उत्पीड़न जैसे हालात ने इस दिशा में बहम भूमिका निभाई। अंग्रेजी हुकूमत ने बर्बर प्रेस एक्ट के जरिए स्वाधीनता आंदोलन का समर्थन करने वाली पत्र-पत्रिकाओं को चुप कराने की कोशिश की। राजद्रोह कानून के तहत 1930 से 1934 के बीच 384 पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन पररोक लगाई गई। यहां तक कि विदेशों से आने वाले साहित्य पर पाबंदी और बाजार में मौजूद जन-साहित्य की जब्ती की गई। रूस यात्रा के संस्मरण के रूप में लिखित रवींद्रनाथ टैगोर की पुस्तिका ‘रूस से चिट्ठी’ पर 1934 में ऐसी पाबंदी लगी कि उसका वितरण बंद हो गया। ऐसे दमघोंटू माहौल में अभिव्यक्ति की आजादी के लिए छटपटाहट बढ़ती चली गई। इस पृष्ठभूमि में सत्य जीवन वर्मा ने हिंदी लेखक संघ बनाया और सितंबर 1934 में लेखकों से उस संगठन की सदस्यता के लिए अपील कीः संगठन का यह युग है। सारा संसार संगठन की ओर दौड़ रहा है। समाज में प्रत्येक श्रेणी के लोग अपना-अपना संगठन कर रहे है। यह अत्यंत वांछनीय है।

इसके अलावा प्रेमचंद और रामचंद्र टंडन के बीच बातचीत शुरू हुई क्योंकि ये दोनों लेखक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा और लेखकों के परस्पर सहयोग से सहकारी प्रकाशन संस्थान के लिए प्रयत्नशील थे। इसी क्रम में भारतीय साहित्य परिषद की स्थापना हुई और हिंदुस्तानी एकडेमी की गतिविधियों का नया संदर्भ सामने आया।

भारत के युवा लेखक समुदाय की नई यथार्थवादी रचना प्रवृत्तियों के उभार और लेखक संगठन बनाने की आवश्यकताओं के इस व्यापक परिप्रेक्ष्य में अंतर्राष्ट्रीय घटनाक्रमों को भी देखना जरूरी है। स्पेन में सार्वजनिक मताधिकार के तहत लोकतांत्रिक प्रणाली से चुने गए गणतंत्रवादियों को सत्ता नहीं सौंपी गई और जनरल फ्रैंको के नेतृत्व में फासीवादियों ने बर्बर नरसंहार का तंडाव रचा। जर्मनी और इटली में हिटलर और मुसोलिनी के नेतृत्व में सारी दुनिया के लिए फासिज्म का खतरा मंडराने लगा। इन समस्याओं को ध्यान रखकर 1935 में पेरिस का वह सम्मेलन जो ‘संस्कृति की रक्षा क लिए विश्व लेखक अधिवेशन के नाम से प्रसिद्ध हुआ, उसके प्रमुख आह्वान कर्ता रोम्या रोंला, ईइम फार्स्टर, आंद्रे मालरो, टामस मान, वाल्डे फ्रैंक, मैक्सिम गोर्की और हेनरी बारबूज थे।

वहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए एक घोषणापत्र पारित किया गया। इसी सिलसिले की एक कड़ी के रूप में लंदन के युवा भारतीय संस्कृति कर्मियों द्वारा 1935 में प्रगतिशील लेखक संघ स्थापित करने के उद्देश्य से एक मसौदा तैयार हुआ। इस अभियान के प्रमुख लोगों में सज्जाद जहीर, मुल्कराज आनंद, प्रमोद सेनगुप्त, अहमद अली, हीरेन मुखर्जी, ज्योति घोष, महमूदुज्जफर, डा. मोहम्मद दीन तासीर वैगरह के नाम उल्लेखनीय है। लंदन से भेजे गए उस मसौदे के संबंध में प्रेमचंद ने ‘हंस’ की ओर से समर्थन का इजहार किया और प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के प्रयासांे का स्वागत किया।

प्रलेस की स्थापना के सिलसिले में प्रेमचंद से अध्यक्षता के लिए स्वीकृति ली गई थी। लंदन में बनाए गए कच्चे मसौदे की प्रतियां अलीगढ़ में डा. मोहम्मद अशरफ, हैदाराबाद के डा. युसूफ हुसैन खान, मुंबई में डा. हत्थी सिंह, अमृतसर में डा. रशीद जहां, फ़ैज़ अहमद फै़ज़ को भेज दिया गया था। इनके अलावा पंडित नेहरू, सरोजिनी नायडू, मामा वरेरकर, वल्लतोल, फ़िराक़, जैनेंद्र कुमार, मौलवी अब्दुल हक़, जोश मलीहाबादी, मुशी दयानारायण निगम से भी संपक्र कियागया। सज्जाद जहीर ने स्वयं सारे हिंदुस्तान के संस्कृतिकर्मियों से खतो-किताबत किया और सबकी सहमति से सम्मेलन आयोजित किया।

उसमें विभिन्न भाषा-भाषी क्षेत्र के नए-पुराने करीब ढाई सौ लेखक उपस्थित थे। सुमित्रानंदन पंत, यशपाल, भीष्म साहनी, केदारनाथ अग्रवाल, उप्रंद्रनाथ अशक, रामवृक्ष बेलीपुरी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, शमशेर बाहदुर सिंह, नागार्जुन, दिनकर, राहुल सांस्कृत्यायन, रामप्रसाद घिल्डियाल पहाड़ी, प्रकाशचंद्र गुप्त, अमृतराय, भैरव प्रसाद गुप्त, कृशन चादर, राजेन्द्र सिंह बेदी, कुर्रतुल ऐन हैदर, इस्मत चुगताई, देवेंद्र सत्यार्थी, मखदूम, वामिक जौनपुरी, गोपाल सिंह नेपाली, सुदर्शन, शील, विजन भषचार्य, कैफी आजमी, सरदार जाफरी, मजरूह सुल्तानपुरी, बलराज साहनी, मंटो, राम विलास शर्मा, शिवदान सिंह चौहान, ख्वाजा अहमद अब्बास, साहिर, हसरत मोहानी वगैरह सब के सब शुरूआती दौर में उत्साहपूर्वक इस आंदोलन से जुड़ गए। स्थापना सम्मेलन में उपस्थित लोगों की सूची तो कहीं भी उपलब्ध नहीं ह ैपर बाद में अलग-अलग प्रांतों में स्थापित शाखाओं में भाग लेने वालों की सूची बड़ी लंबी है। जब जनगीतकारों को प्रलेस में शामिल किया गया तो लेखकों की तादाद और भी बढ़ गई। सज्जाद जहीर की किताब रौशनाई तकक्कीपसंद तहरीक की यादें ही एक प्रामाणिक दस्तावेज है, जिससे प्रलेस के इतिहास की अहम बातें और तथ्यों की जानकारी मिलती है। इसके साथ ही रेखा अवस्थी की पुस्तक ‘प्रगतिवाद और समानांतर साहित्य’ सारे दस्तावेजों के साथ 1930 और 1953 तक का पूरा विवेचन प्रस्तुत करती है।

घोषणा पत्र

‘भारतीय समाज में बड़े-बड़े परिवर्तन हो रहे हैं। पुराने विचारों और विश्वासों की जड़े हिलती जा रही हैं और एक नए समाज का जन्म हो रहा है। भारतीय लेखकों का धर्म है कि वे भारतीय जीवन में पैदा होने वाली क्रांति को शब्द और रूप दें और राष्ट्र को उन्नति के र्मा पर चलाने में सहायक हों।

भारतीय साहित्य की विशेषता यह है वह जीवन की यथार्थताओं से भागता है और वह वास्तविकता से मुंह मोड़कर भक्ति और उपासना की शरण में जा छिपा है। नतीजा यह हुआ के वह निस्वेज और निष्प्राण हो गया है। रूप में भी अर्थ में भी और आज हमारे साहित्य ने विचार और बुद्धि का एक प्रकार से बहिष्कार कर दिया है।

हमारे इस संघ का उद्देश्य यह है कि साहित्य और दूसरी कलाओं को अप्रगतिशील वर्गों के आधिपत्य से निकाल कर उन्हें जनता के निकटतम संपर्क में लाया जाए, उनमें जीवन अज्ञैर वास्तविकता लाई जाए और वे उसे उज्जवल भविष्य का मार्ग दिखाए जिसके लिए मानवता इस युग में संघर्षशील है।

हम भारतीय संस्कृति की परंपराओं की रक्षा करते हुए देश की पतनोन्मुख प्रवृत्तियों की बड़ी निर्दयता से आलोचना करेंगे। हम इस संघ के द्वारा हर उस भावना को व्यक्त करेंगे जो हमारे देश को क नए और बेहतर जीवन का मार्ग दिखाए। इस काम में हम अपनी और विदेशों की सभ्यता तथा संस्कृति से लाभ उठाएंगे। हम चाहते हैं कि भारत का नया साहित्य जीवन की बुनियादी समस्याओं को अपना विषय बनाएं वे हैं हमारी रोटी, हमारी दरिद्रता, हमारी सामाजिक अवनति की और हमारी राजनीतिक पराधीनता की समस्याएं। वह सब कुछ जो हमें निष्क्रियता, अकर्मण्यता और अंधविश्वास की ओर ले जाता है, हेय है। हम उसका विरोध करते हैं।

वह सब कुछ जो हमसे समीक्षा की प्रवृत्ति लाता है और हमंे प्रियतम रूढ़ियों को बुद्धि की कसौटी पर कसने के लिए प्रोत्साहित करता है, जो हमें कर्मठ बनाता है और इसमें संगठन की शक्ति लाता है, उसी को हम प्रगतिशील मानते हैं। संघ के उद्देश्य होंगेः (1) भारत में तमाम प्रगतिशील लेखकों को जोड़कर संगठन की शाखाएं कायम करना और साहित्य छापकर उद्देश्यों को जन-जन तक पहुंचाना। (2) प्रगतिशील लेखकों और अनुवादकों को प्रोत्साहित करना और प्रतिक्रियावादी प्रवृत्तियों के विरुद्ध संघर्ष करके देशवासियों के स्वाधीनता संग्राम को आगे बढ़ाना। (3) प्रगतिशील लेखकों की सहायता करना। (4) स्वतंत्रता और स्वतंत्र विचार की रक्षा करना।

इस घोषणा पत्र को आम सहमति से पारित करने के साथ-साथ 10 अप्रैल 1936 के उक्त अधिवेशन में 4 प्रस्ताव भी स्वीकृत किए गए जो विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, युद्ध, छात्रों के अधिकार और शांति सम्मेलन की आवश्यकताओं से संबंधित थे।

प्रेमचंद ने उक्त अधिवेशन में जो अध्यक्षीय भाषण दिया था, उसमें विस्तार से सभी प्रमुख प्रश्नों पर विचार किए गए थे। अपने भाषण के अंत में प्रेमचंद ने कहा थाः ‘हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाइयांे का प्रकाश हो- जो हम में गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं क्यों अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।’ प्रेमचंद के इस आह्वान के अनुसार रंचना कर्म को स्थानीय अंचल की बोली बानी और खेतिहर आबादी की भावनाओं से जोड़ा गया। छायावायिों से भिन्न ढंग की यह रचनाशीलता स्थानीय रंगत लेकर चली और लोकप्रिय हुई।

1953 तक प्रगतिशील लेखक संघ संपूर्ण भारत के साहित्यिक परिदृश्य पर न केवल छाया रहा बल्कि संगठन के विस्तार और लोकप्रिय सृजनशीलता का प्रेरक बिंदु बना रहा। प्रारंभ में तो इप्टा (जननाट्य संघ) को प्रलेस की एक शाखा के रूप में स्थापित किया गया था। पर बाद में वह एक स्वतंत्र संगठन बन गया। इप्टा की गतिविधियों की वजह से भी प्रलेस को देश-व्यापी प्रयसा मिला। पर 1942 में ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ के आंदोलन के दौर में फासिज्म के खतरे के सवाल पर और 1947 के 15 अगस्त के दिन अंग्रेजी राज द्वारा कांग्रेस पार्टी को सत्ता सौंपने के संदर्भ मंे नीतिगत मामलों पर लेखकों के बीच मतभेद बढ़ते गए। 1942 और 1947 के उन मतभेदों की वजह से आजादी के बाद संगठन के तौर पर प्रगतिशील लेखक संघ में बिखराव शुरू हो गया। दरअसल ये मतभेद नई परिस्थ्तिियों के कारण पैदा हुए थे।

- मुरली मनोहर प्रसाद सिंह

(साभार: जनसत्ता)
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शनिवार, 30 अप्रैल 2011

कुरूक्षेत्र में होगा भारतीय खेत मजदूर यूनियन का 12वां राष्ट्रीय अधिवेशन


पानीपतः भारतीय खेत मजदूर यूनियन का 12वां राष्ट्रीय महाधिवेशन 11 से 14 अक्टूबर 2011 को कुरूक्षेत्र में आयोजित किया जायेगा, यह निर्णय 29 मार्च को भगतसिंह स्मारक, सभागार में सम्पन्न हरियाणा खेत मजदूर यूनियन के राज्य स्तरीय कार्यकर्ता सम्मेलन में लिया गया। कार्यकर्ता सम्मेलन की अध्यक्षता यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष जिले सिंह पाल ने की और संचालन यूनियन के प्रदेश महासचिव दरियाव सिंह कश्यम ने किया। ज्ञात हो हरियाणा खेत मजदूर यूनियन की भारतीय खेत मजदूर यूनियन की राज्य इकाई है, सम्मेलन में राज्य भर से आये सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने भाग लिया।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के केन्द्रीय सचिव अमरजीत कौर ने कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए कहा कि केन्द्र व राज्य सरकारे खेत मजदूरों के उत्थान के लिये ठोस कदम नहीं उठा रही, ग्रामीण गरीबों के लिये जा आधी-अधूरी योजनाएं चल रही हैं उनमंे भ्रष्टाचार का बोल-बाला है। उन्हांेने कहा कि आज देश में अरबपतियों-खरबपतियों की संख्या बढ़ रही है लेकिन गरीबों की संख्या में कमी नहीं आ रही। केन्द्रीय बजट की चर्चा करते हुए अमरजीत कौर ने कहा कि भारत गांवों में बसता है लेकिन इस बजट में ग्रामीण विकास एवं मनरेगा के लिये पिछले वर्ष के मुकाबले कम रकम आवंटित की गई है यह चिन्ता की बात है। उन्होंने कहा कि बी.के.एम.यू. के राष्ट्रीय सम्मेलन की तैयारी में जी-जान से जुटना होगा और खेत मजदूरों के बीच केन्द्र व राज्य सरकार की जन विरोधी नीतियों के खिलाफ जनमत तैयार करना होगा।

भारतीय खेत मजदूर यूनियन के राष्ट्रीय महासचिव एवं पूर्व सांसद नागेन्दनाथ ओझा ने कहा कि बी.के.एम.यू. का राष्ट्रीय सम्मेलन कराने का बहुत बड़ा कार्य हरियाणा के साथियों ने अपने जिम्मे लिया है। उन्होंने कहा कि यह सम्मेलन यूनियन की 2010 की सदस्यता के आधार पर होगा। हमारी यूनियन की सदस्यता संख्या 15 लाख हैं इस सम्मेलन में असम, त्रिपुरा, उड़ीसा, तमिलनाडू, केरल, आंध्रप्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल सहित देश के 25 राज्यों से 1000 से अधिक प्रतिनिधि शामिल होंगे। उन्होंने कहा कि भारतीय खेत मजदूर यूनियन ने मोगा में अपने स्थापना सम्मेलन से लगातार खेत मजदूरों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए अनेक आंदोलन चलाये हैं। कुरूक्षेत्र सम्मेलन खेत मजदूर आंदोलन को तेज करने में मददगार साबित होगा।

सम्मेलन केा हरियाणा एटक के महासचिव जयपाल, हरियाणा बैंक अम्पलाईज फैडरेशन के महासचिव एन.पी. मुंजाल, हरियाणा किसान सभा के प्रदेश अध्यक्ष सम्पूर्ण सिंह पुरी, महासचिव सतपाल सिंह बैनीवाल, सी.पी.आई. के प्रदेश सचिव रघबीर सिंह चौधरी ने भी सम्बोधित किया। रामकुमार मलिक, फकीर चन्द, प्र्रेमसिंह, गुरचरण सिंह, जिलेसिंह पाल, मन्जीत सिंह, रामदिया धीमान आदि ने भी सम्मेलन में विचार प्रकट किये और सम्मेलन की सफलता में भरपूर सहयोग देने का आश्वासन दिया। सम्मेलन की तैयारी में मई और जून महीने में विशेष फंड संग्रह अभियान चलाने का निर्णय लिया गया। इस दौरान राज्य में 30 हजार परिवारों तक सम्पर्क किया जायेगा।
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गुरुवार, 28 अप्रैल 2011

डा. कमला प्रसाद - हमें हताश कर गया है उनका जाना


प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय सचिव प्रख्यात आलोचक डा. कमला प्रसाद का न रहना हिन्दी-उर्दू साहित्य तथा प्रगतिशील जनवादी सांस्कृतिक आन्दोलन के कार्यकर्ताओं-शुभचिन्तकों के लिए किसी बड़े आघात की तरह है। यह उनकी लोकप्रियता के कारण ही है कि उनके निधन के समाचार से व्यापक साहित्यिक सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर दौड़ गयी। शोक की इस बेला में वैचारिक सांगठनिक सीमाएं बेमानी हो गयीं। उन्होंने बहुत कम समय में देश के सुदूर अंचलों तक जो लोकप्रियता अर्जित की थी, कठिन परिश्रम, निरन्तर सक्रियता तथा दृष्टिगत उदारता के बिना वह संभव नहीं है। उदारता जो वैचारिक विचलन का प्रमाण न हो। उन्हें “कमाण्डर” की प्यार भरी उपाधि इसी कारण मिल पायी कि वह सदैव रहनुमाई के लिए तैयार रहते। लक्ष्य की कठिनाई उन्हें हताश नहीं कर पाती। मैंने उन्हें कभी हताश और निराश नहीं देखा। थक कर बैठ जाने की मनः स्थिति में भी वह कभी नहीं दिखे। हालत यह थी कि स्वास्थ्य की चिंता किये बिना वह काम करने को प्राथमिकता देते। दूर की यात्राएं करते।

यहां तक कि अपने रचनाकार व्यक्तित्व की प्राथमिकताओं तक को उन्होंने संगठन व आन्दोलन के विस्तार की चिंता में तिलांजलि दे दी थी। वह प्रखर आलोचक थे, उनकी बुनियादी पहचान आलोचक के रूप में ही थी, इस रूप में उन्होंने कई मूल्यवान कृतियां हिन्दी को दीं। प्रगतिशील लेखक संघ की स्वर्ण जयंती के अवसर पर उनके द्वारा सम्पादित पुस्तक “प्रगतिशील आलोचना” की मांग आज भी बनी हुई है। ठीक उसी तरह जैसे साहित्य शास्त्र, छायावाद प्रकृति और प्रयोग छायावादोत्तर काव्य की सामाजिक सांस्कृतिक, आधुनिक हिन्दी कविता और आलोचना की द्वन्दात्मकता, समकालीन हिन्दी निबन्ध मध्ययुगीन रचना और मूल्य आलोचक और आलोचना तथा इन जैसी कुछ अन्य महत्वपूर्ण पुस्तकों से हम उनके योगदान का अनुमान लगा सकते हैं। यह योगदान तब अधिक व्यापक हो जाता है जब हम उनके कुशल सम्पादन में प्रकाशित होने वाली पत्रिका वसुधा के विशेषांकों पर नज़र डालते हैं। समकालीन जीवन के तक़रीबन सभी ज्वलन्त मुद्दों पर उन्होंने यादगार विशेषांक प्रकाशित किये। विभिन्न भाषाओं के साहित्य पर केन्द्रित विशेषांकों की उन्होंने जैसे एक श्रृंखला ही खड़ी कर दी। उर्दू साहित्य पर उन्होंने दो अंक केन्द्रित किये। जिनका व्यापक स्वागत हुआ।

भाषाई संकीर्णता को तोड़ते हुए विभिन्न भाषाओं के रचनाकारों को साथ लेकर चलने की प्रगतिशील आन्दोलन की गरिमापूर्ण मूल्यवान परम्परा को आगे बढ़ाने में उन्होंने जिस उत्साह का प्रदर्शन किया वह वास्तव में अपूर्व है। जो प्रमाणित करता है कि प्रगतिशीलता की सैद्धांतिकी से प्रतिबद्ध हुए बिना एसेा कर पाना संभव नहीं। यह उनके प्रतिबद्ध व्यक्तित्व का ही चमत्कार था कि दो वर्ष पूर्व बिहार के बेगूसराय जिले के गोदर गोवा में प्रगतिशील लेखक संघ का सफ़ल अधिवेशन सम्पन्न हो सका। जिसमें अनेक भारतीय भाषाओं के साथ ही बंगलादेश के लेखकों का प्रतिनिधिमण्डल भी शरीक हुआ। जनवादी लेखक संघ तथा जनसंस्कृति मंच के प्रतिनिधि भी वहां मौजूद थे। आंचलिक भाषाओं के लेखकों का उस अधिवेशन की ओर आकृष्ट होना एक बड़ी घटना थी, शिथिल पड़ते प्रगतिशील आन्दोलन में उन्होंने अपनी सक्रियता से जैसे नये प्राण फूंक दिये थे। जिसके सबसे ज्यादा उत्तेजक दृश्य मध्य प्रदेश में दिखाई पड़े। वहां के सुदूर अंचलों तक में प्रगतिशील लेखक संघ की न केवल इकाइयां गठित हुई बल्कि उन्होंने अपनी सक्रियता भी बनाये रखी; यहां भी कमला प्रसाद जी की उस सांस्कृतिक समझ का प्रभाव साफ़ देखा जा सकता है, जो स्थानीय - आंचलिक सांस्कृतिक विशिष्टताओं तथा रचनाकारों से गहरे सामंजस्य की सीख देती है। वैचारिक संकीर्णता का अतिक्रमण करते हुए संयुक्त प्रयास-साझा मंच इस सांस्कृतिक समझ का अनिवार्य अंग है। यह तथ्य बहुत लोगों को विस्मित कर सकता है कि प्रगतिशील लेखक संघ के स्वर्ण जयंती आयोजन (अप्रैल 1986) में उर्दू-हिन्दी लेखकों के बीच विवाद व कटुता की स्थिति बन जाने के बावजूद उन्होंने इस घटना के थोड़े दिनों बाद ही भोपाल में फै़ज़ अहमद फै़ज़ परएक भव्य-विचारपूर्ण समारोह आयोजित कर दिखाया; हिन्दी-उर्दू लेखकों का ऐसा शानदार समागम मैंने बहुत कम देखा है। एक ही मंच पर दो भाषाओं के दिग्गजों के बीच पाकिस्तान व दूसरे देशों से आये रचनाकार। यह भी वह ही कर सकते थे कि इतने महत्वपूर्ण आयोजन में उन्होंने मुझ जैसे साधारण व्यक्ति को आलेख प्रस्तुत करने का सम्मान दिया। शिव मंगल सिंह सुमन, त्रिलोचन शास्त्री, मजरूह सुल्तानपुरी भगवत रावत और शफ़ीका फ़रहत की सक्रियता कार्यक्रम को अतिरिक्त गरिमा प्रदान कर रही थी। सज्जाद जहीर की जन्म शताब्दी को भी उन्होंने जिस गहरे आत्मीय भाव से संगठन व आन्दोलन के विस्तार का आधार बनाने का स्वप्न देखा वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। लगातार दो वर्ष तक देश के विभिन्न अंचलों में जन्मशताब्दी आयोजनों का सिलसिला विस्मृति के धुंधलके में जाते सबके प्यारे बन्ने भाई को जैसे नया जीवन दे गया। विभिन्न साहित्यिक सांस्कृतिक मुद्दों पर जीवन्त बहस की वह यादगार बेला थी। इस अवसर पर ‘वसुधा’ के संग्रहणीय विशेषांक का प्रकाशन भी बड़ी घटना के रूप में देखा गया। किसी पत्रिका को सांगठनिक वैचारिक तथा सृजनात्मक उद्देश्यों के पक्ष में समान निष्ठा व उद्वेग से इस्तेमाल करने से ऐसे उदाहरण विरल ही होते हैं। जहां विचार गुणवत्ता को स्खलित नहीं करते नई उठान देते हैं। उन्होंने प्रतिबद्धता के दबाव में पत्रिका की स्तरीयता को कभी प्रभावित नहीं होने दिया। सन् 2011 में पड़ने वाली हिन्दी-उर्दू के कई विद्धानों कवियों की जन्म शताब्दी को लेकर भी वह काफ़ी उत्साहित थे। वसुधा तथा सांगठनिक सर्कुलरों के माध्यम से वह प्रगतिशील आन्दोलन से जुड़े लोगों का इन शताब्दियों को बड़े पैमाने और संयुक्त रूप से आयेाजित करने का आह्वान कर रहे थे। चिंता एक ही थी कैसे ज़्यादा से ज़्यादा व नये आते हुए रचनाकारों को संगठन व आन्दोलन से जोड़ा जाये। कैसे प्रगतिशील आन्दोलन की उपलब्धियों के योगदानों और उससे जुड़ी ऐतिहासिक विभूतियों से नई पीढ़ी को परिचित कराया जा सके और कैसे इस बहाने आज के जरूरी मुद्दों पर सार्थक संवाद-विमर्श संभव हो सके। इस संन्दर्भ में प्रगतिशील आन्दोलन से शुरूआती जुडाव के बाद करीब-करीब उसके विरोधी हो गये उपन्सासकार और कवि हीरानन्द वात्साययन अज्ञेय को साथ जोड़कर चलने की उनकी सलाह का विशेष महत्व है कि अज्ञेय का भी यह जन्म शताब्दी वर्ष हैं इसके विपरीत कलावादियों ने अपने कार्यक्रम फ़ोल्डर में अज्ञेय और शमशेर बहादुर सिंह को ही प्रमुखता दी। कमला प्रसाद ने अपने दृष्टिकोण तथा सक्रियता से साबित किया कि संस्कृति व कला की वास्तविक रक्षा व चिंता प्रगतिशील वजन की नज़रिये के लोग ही कर सकते हैं।

उन्हें एक चिंता लगतार सताती थी कि दक्षिण भारत के रचनाकारों से कैसे उत्तर व पूर्वी भारत के रचनाकारों का जीवन्त संवाद संभव हो सके, कैसे संगठन के राष्ट्रीय अधिवेशन को दक्षिण के किसी राज्य में संभव बनाया जा सके। दो माह पूर्व ही कालीकट में राष्ट्रीय समिति की बैठक तथा आगामी राष्ट्रीय अधिवेशन केरल में ही करने का प्रस्ताव इस सिलसिले की महत्वपूर्ण कड़ियां है। जुझारू प्रतिबद्धता तथा दृष्टिकोण की व्यापकता वाले ऐसे व्यक्ति का अचानक चिरविदा ले लेना हम सब को हतप्रभ व हताश कर गया है।
- शकील सिद्दीकी
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बुधवार, 27 अप्रैल 2011

देवी ,तुम तो काले धन की बैसाखी पर टिकी हुई हो - नागार्जुन


( यह कविता इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि कल तृणमूल की अध्यक्षा ममता बनर्जी ने अपने एक भाषण में कॉमरेड़ों को 1972-77 जैसे सबक सिखा देने की सरेआम धमकी है, वे मंच पर घूम घूमकर भाषण दे रही हैं, उल्लेखनीय है यह दौर पश्चिम बंगाल में अर्द्धफासीवादी आतंक के नाम से जाना जाता है, इस दौर में 1200 से ज्यादा सदस्य कांग्रेस की गुण्डावाहिनी के हाथों मारे गए थे और 50 हजार से ज्यादा को राज्य छोड़कर बाहर जाना पड़ा था, उस समय बाबा नागार्जुन ने यह कविता लिखी थी ,जो ऐतिहासिक दस्तावेज है,यह कविता आज भी प्रासंगिक है, इसके कुछ अंश यहां दे रहे हैं)

लाभ-लोभ के नागपाश में

जकड़ गए हैं अंग तुम्हारे

घनी धुंध है भीतर -बाहर

दिन में भी गिनती हो तारे।




नाच रही हो ठुमक रही हो

बीच-बीच में मुस्काती हो

बीच-बीच में भवें तान कर

आग दृगों से बरसाती हो।




रंग लेपकर ,फूँक मारकर

उड़ा रहीं सौ -सौ गुब्बारे

महाशक्ति के मद में डूबीं

भूल गई हो पिछले नारे।




चुकने वाली है अब तो

डायन की बहुरूपी माया

ठगिनी तू ने बहुत दिनों तक

जन-जन को यों ही भरमाया।



(ममता बनर्जी ने जमकर पैसा खर्च किया है और इसमें काले धन की बड़ी भूमिका भी है, ढ़ेर सारे वाम और दाएँ बाजू के बुद्धिजीवी भी उसकी सेवा में हैं, अपराधियों से लेकर बुद्धिजीवियों तक का ऐसा भयानक गठबंधन बेमिसाल है, ममता बनर्जी पर बाबा की कविता का यह अंश काफी घटता है)



जैसी प्रतिमा, जैसी देवी

वैसे ही नटगोत्र पुजारी

नए सिंह, महिषासुर अभिनव

नए भगत श्रद्धा-संचारी



ग्रह-उपग्रह सब थकित -चकित हैं

सभी हो रहे चन्दामामा

चन्दारानी की सेवा में

लिखा सभी ने राजीनामा

(ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल के चुनाव भाषणों में एक बार भी मँहगाई का जिक्र नहीं किया है। भ्रष्टाचार पर कुछ नहीं बोला है। कल से सरेआम धमका रही हैं । बार बार पश्चिम बंगाल के पिछड़ेपन का रोना रो रही हैं ,और मीडिया महिमामंडन में लगा है, इस पर बाबा की पंक्तियां पढ़ें)

मँहगाई का तुझे पता क्या !

जाने क्या तू पीर पराई !

इर्द-गिर्द बस तीस-हजारी

साहबान की मुस्की छाई !



तुझ को बहुत-बहुत खलता है

'अपनी जनता ' का पिछड़ापन

महामूल्य रेशम में लिपटी

यों ही करतीं जीवन-यापन



ठगों-उचक्कों की मलकाइन

प्रजातंत्र की ओ हत्यारी

अबके हमको पता चल गया

है तू किन वर्गों की प्यारी


(ममता बनर्जी ने अंध कम्युनिस्ट विरोध के आधार पर पापुलिज्म की राजनीति का जो सिक्का चला है वह भविष्य में पश्चिम बंगाल की राजनीति के लिए अशुभ संकेत है। बाबा ने ऐसी ही परिस्थितियों पर लिखा था, पढ़ें -)


जन-मन भरम रहा है नकली

मत-पत्रों की मृग-माय़ा में

विचर रही तू महाकाल के

काले पंखों की छाया में



सौ कंसों की खीझ भरी है

इस सुरसा के दिल के अंदर

कंधों पर बैठे हैं इस के

धन-पिशाच के मस्त-कलंदर


गोली-गोले,पुलिस -मिलिटरी

इर्द-गिर्द हैं घेरे चलते

इसकी छलिया मुस्कानों पर

धन-कुबेर के दीपक जलते

- लेखक जगदीश्‍वर चतुर्वेदी, कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर हैं .....
Courtsey : Mr Jagdishwar Chaturvedi & http://suchanroshan.blogspot.com/2011/04/blog-post_26.html
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पूरे मई महीने सड़कों पर उतर कर उत्तर प्रदेश में आन्दोलन करेगी भाकपा

लखनऊ 27 अप्रैल। देश की जनता को तबाह कर रहे मंहगाई और भ्रष्टाचार की जननी कांग्रेस नीत केन्द्र सरकार को बेनकाब करने, कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार एवं रोजगार के मोर्चे पर पूरी तरह से विफल बसपा की राज्य सरकार को कठघरे में खड़े करने तथा गुजरात से लेकर उत्तर प्रदेश तक भाजपा के साम्प्रदायिक एजेंडे को उजागर करने हेतु भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने पूरे मई महीने में एक व्यापक और जुझारू जन अभियान चलाने की रूप-रेखा तैयार की है।

इस सम्बंध में जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने बताया कि इस अभियान की मोटे तौर पर रूपरेखा गत दिनों राष्ट्रीय नेताओं की उपस्थिति में लखनऊ में सम्पन्न राज्य कार्यकारिणी की बैठक में तैयार कर ली गयी थी जिसे मौजूदा परिस्थिति के अनुसार और व्यापक रूप दे दिया गया है।

उन्होंने बताया कि अभियान का शुभारम्भ मेहनतकशों के अंतर्राष्ट्रीय पर्व मई दिवस (1 मई) से होगा। भाकपा के सहयोग से चलने वाले सभी श्रमिक एवं कर्मचारी संगठनों का आह्वान किया गया है कि वे इस दिन मंहगाई, भ्रष्टाचार, श्रमिकों एवं कर्मचारियों के अधिकारों के हनन आदि सवालों पर रैलियां, प्रदर्शन, विचारगोष्ठियां और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करें।

भाकपा अपनी गतिविधियों का संचालन जनता से धन एवं अनाज एकत्रित करके करती आयी है। अतएव 13, 14 एवं 15 मई को पूरे प्रदेश में अनाज एवं धन संग्रह अभियान चलाया जायेगा। भाकपा कार्यकर्ता टोलियां बनाकर जनता के बीच जायेंगे और उससे आर्थिक सहयोग मांगेंगे।

भाकपा के अभियान का तीसरा चरण ‘गांव चलो-मोहल्ला घूमो’ होगा जो 16 मई से शुरू होकर 30 मई तक चलेगा। इस अभियान के अंतर्गत उपर्युक्त सवालों के अतिरिक्त मंहगाई, भ्रष्टाचार, केन्द्र सरकार की परमाणु ऊर्जा नीति तथा सरकार की अमरीका परस्ती, किसानों की भूमि के अधिग्रहण, बुनकरों, मनरेगा मजदूरों, खेतिहर मजदूरों, आशा-आंगनवाडी सेविकाओं, हेल्थ वर्कर्स और शिक्षित बेरोजगारों के सवालों को लेकर गांवों, कस्बों तथा शहरों में व्यापक रूप से जन-जागरण अभियान चलाया जायेगा। सभायें, नुक्कड़ सभायें, चौपाल बैठकें, साईकिल एवं पैदल यात्रायें जगह-जगह आयोजित की जायेंगी।

इस अभियान का समापन 30 मई को जिला अथवा तहसील केन्द्रों पर विशाल एवं जुझारू प्रदर्शनों के साथ किया जायेगा। डा. गिरीश ने बताया कि जिलों-जिलों में आन्दोलन की तैयारी तेज कर दी गयी है और वे स्वयं इस अभियान को गति प्रदान करने के उद्देश्य से 28 अप्रैल से प्रदेशव्यापी दौरे पर निकल रहे हैं।

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मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

मजदूर वर्ग का अंतर्राष्ट्रीय पर्व मई दिवस

प्रपंचपूर्ण पूंजीवादी निजाम पर करारी चोट करो

वर्ष 2011 के मई दिवस के मौके पर हम अरब और उत्तर अफ्रीकी देशों में लोकतंत्र की नई लहर का स्वागत करेंगे, वहीं जापान के त्रासद भूकंप में हजारों लोगों के जान-माल के नुकसान पर शोक प्रकट करेंगे। भूकंप से क्षतिग्रस्त फुकुशिमा डायची आणविक संयंत्र से फैले विनाशक विकिरण ने द्वितीय विश्वयुद्ध में हिरोशिमा-नागासाकी पर एटम बम गिराये जाने की हृदय विदारक खौफनाक याद को फिर से ताजा कर दिया है।

इस वर्ष का मई दिवस दुनिया की पांच सबसे बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं - ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिणी अफ्रीका (ब्रिक्स) के ऐतिहासिक सान्या सम्मेलन के महत्वाकांक्षी घोषणापत्र और उसके दूरगामी संदेशों को भी याद करेगा, जो मानवता के इतिहास में पहली मर्तबा साम्राज्यवादी विश्व शक्ति संतुलन की गंभीर चुनौती को स्वर देता है और आने वाले दिनों में अंतर्राष्ट्रीय सम्बंधों को नई दिशा और गति प्रदान करने का भरोसा उत्पन्न करता है। सोवियत यूनियन के टूटने के बाद साम्राज्यवादियों ने ‘इतिहास का अंत’ कहकर उत्सव मनाया था तथा पूंजीवाद को ‘मानवता की नियति’ घोषित किया था। लेकिन दुनियां ने जल्दी ही देखा कि किस तरह तथाकथित शीतयुद्ध का अंत करने वालों ने ही झूठे बहाने बनाकर इराक में और फिर अफगानिस्तान में क्रूर वास्तविक युद्ध छेड़ दिया। इन दो देशों में युद्ध की विभीषका की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि साम्राज्यवादी सैन्य संगठन नाटो ने लीबिया पर बमबारी शुरू कर दी है। इसलिए ब्रिक्स देशों के सान्या सम्मेलन ने उचित ही लीबिया पर बल प्रयोग की आलोचना की है। ब्रिक्स घोषणापत्र में कहा गया है कि लीबिया में तटस्थ पर्यवेक्षक भेजने के बजाय नाटो फौज द्वारा की जा रही अबाध बमबारी और विद्रोही गुटों को हथियारों की आपूर्ति सुरक्षा परिषद प्रस्ताव की सीमा का अतिक्रमण करता है और यह भी कि किसी देश के घरेलू मामलों में विदेशी हस्तक्षेप अनुचित है। लोकतंत्र में देश की जनता अपनी सरकार स्वयं चुनती है। सर्वविदित है कि साम्राज्यवादी घरेलू झगड़ों का फायदा उठाकर हमेशा अपनी युद्ध पिपाशा शांत करते हैं। इराक, अफगानिस्तान और अब लीबिया के अकूत तेल भंडारों पर कब्जा करने की साम्राज्यवादी मंसूबों को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

इस साल के मई दिवस को बहुचर्चित वैश्वीकृत मुक्त बाजार व्यवस्था की विफलता, उसका प्रकट दिवालियापन और लूट-खसोट मचाने वाले पूंजीपतियों-कारपोरेटियों को मुंह तोड़ जवाब देने के लिए मजदूरों-कर्मचारियों के विश्वव्यापी अनवरत एकताबद्ध संघर्षों के लिए सर्वदा याद किया जाएगा। भारत समेत यूरोप और अमरीका में भी मजदूरों, कर्मचारियों एवं श्रमजीवियों ने लाखों की संख्या में सड़कों पर निकल कर अपने हकों की हिफाजत में आवाज बुलंद की है।

‘कोई विकल्प नहीं’ (टिना - देयर इज नो आल्टरनेटिव) के बहुप्रचारित गुब्बारे की हवा निकल गयी, जब अमेरिका और यूरोप के दैत्याकार बैंकों का विशाल वित्तीय साम्राज्य ताश के पत्ते की तरह बिखर गया। अभेद्य समझे जाने वाले उनके वित्तीय ताने-बाने बालू की दीवार साबित हुए। ‘सरकार का सरोकार व्यापार करना नहीं’ का राग अलापने वाले मगरमच्छों ने सरकारों के सामने हाथ फैलाकर याचनाएं कीं। सरकारों ने भी उन्हें उपकृत किया और अपने खजाने खोल दिए। आम जनता के कंधों पर वित्तीय संकट का समाधान किया जाने लगा। बजट घाटा कम करने और प्रशासकीय सादगी बरतने के नाम पर वेतन कटौती, छंटनी, स्वास्थ्य एवं सामाजिक सुरक्षा सुविधाओं की वापसी और कटौतियां आम हो गयीं। इसके विरोध में लाखों मजदूर, कर्मचारी, छात्र, नौजवान और आम नागरिक सड़कों पर उतर आये। विश्वव्यापी स्वतःस्फूर्त प्रतिरोध जाग उठा।

भारतीय शासकों ने जनता से वायदा किया कि उदारीकरण और निजीकरण की नई आर्थिक नीतियों के अवलंबन से रोजगार बढ़ेगा और लोगों की आमदनी भी बढ़ेगी, लेकिन व्यवहार में उल्टा हुआ। रोजगार घट गया और लोगों की आय भी घट गयी। मजदूरों के काम के घंटे बढ़ा दिये गये और उनका पारिश्रमिक घटा दिया गया। सार्वजनिक क्षेत्र कमजोर हुआ और देश की निर्भरता विदेशों पर बढ़ गयी, यह सब उद्योग की प्रतियोगिता क्षमता बढ़ाने के नाम पर किया गया। फलतः पूंजीपतियों का मुनाफा बेशुमार बढ़ गया। देश में करोड़पतियों की संख्या बढ़ने लगी, किंतु दूसरी तरफ बेरोजगारी, भूख, गरीबी, बीमारी, कुपोषण और विपन्नता बढ़ गयी। जीवनोपयोगी चीजों के दाम आकाश छूने लगे, रोजगारविहीन विकास के पूंजीवादी पथ का यही लाजिमी नतीजा है। नयी वैज्ञानिक तकनीकी की उपलब्धियों को पूंजीपतियों ने हथिया लिया।

स्वाभाविक ही इसके विरोध में आपसी मतभेदों को भुलाकर श्रमिक वर्ग इकट्ठा हुए। ट्रेड यूनियनों की एकता बनी, लगातार एक के बाद एक राष्ट्रव्यापी अभियान चलाये गये। 7 सितम्बर 2009 की राष्ट्रव्यापी आम हड़ताल और 23 फरवरी 2011 की दिल्ली महारैली को मजदूर आंदोलन के इतिहास में हमेशा याद किया जाएगा।

सत्तासीन शासक वर्ग मदांध है। वह जन भावनाओं की उपेक्षा करता है। राजनेता और नौकरशाही अपराधकर्मियों की सांठगांठ से सरकारी खजाने को लूट रहे हैं। भ्रष्टाचार का नंगा नाच हो रहा है। सरकार लोकतांत्रिक आंदोलनों के प्रति संवेदनाविहीन है। देश में हताशा और निराशा व्याप्त है।

फिर भी सब कुछ खो नहीं गया है। जनता जाग रही है। मेहनतकश आवाम हथियार नहीं डालने वाले हैं। वे फिर से कमर कस रहे हैं। नयी चेतना और उमंग के साथ श्रमिक वर्ग और उनकी ट्रेड यूनियनें शासक-शोषकों पर करारी चोट के लिए लामबंद हो रहे हैं। शासक वर्ग को उनके कुकर्मों का खामियाजा भुगतना ही पड़ेगा।

मजदूर वर्ग के इस अंतर्राष्ट्रीय पर्व के मौके पर हम दुनियां में सुख, समृद्धि और शांति के निरंतर संघर्ष का संकल्प लें। यह मौका है, हम संगठित होकर मानवता के दुश्मन शासक-शोषकों के प्रपंचपूर्ण पूंजीवादी निजाम को शिकस्त देने के लिए करारी चोट करें।

लड़ने के दिन हैं, जीतने के दिन हैं,

आने वाले दिन, हमारे ही दिन हैं!!
- सत्य नारायण ठाकुर
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हरियाणा - जनता के हर तबके में व्यापक असंतोष


पिछले दिनों में हरियाणा में जाटो को पिछड़ा वर्ग में शामिल करने की मांग को लेकर व्यापक आंदोलन चलाया गया। राज्य में जींद, नरवाना, उकलाना, पानीपत आदि कई जगहों पर रेलवे ट्रैक पर जाट जाति के लोगांे-बच्चो, बूढ़ो, महिलाओं, युवको ने लगभग 18 दिन तक कब्जा करके रखा। रेलवे लाईन पर शामियाना लगाकर रात दिन धरना लगाया गया। परिणाम स्वरुप राज्य में रेलवे मार्ग बाकायदा अवरुद्ध हो गया। हाईकोर्ट द्वारा आंदोलनकारियों से रेलवे ट्रैक खाली करवाने के आदेश के बाद राज्य में एक पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया गया। सरकार के इस कदम से उत्साहित होकर राज्य में ब्राहमण, त्यागी, रोड, राजपूत, पंजाबी आदि जातियों ने भी छिट-फुट बैठकों का सिलसिला शुरु कर दिया है और आरक्षण को लेकर यें जातियां भी आंदोलन की दिशा में बढ़ने की तैयारी में हैं। दूसरी और पिछड़ी जातियों में 27 प्रतिशत आरक्षण बचाने की मुहिम शुरु हो गई है, पिछड़ा वर्ग के लोग भी किसी अन्य जाति को पिछड़ा वर्ग में शामिल नही करने की मांग को लेकर आंदोलन चलाने की चर्चा करने लगे हैं। इसके अलावा राज्य में मिर्चपुर कांड भी सुर्खियों मे रहा जहां पिछले वर्ष उच्च जाति की भीड़ ने बदले की भावना से दलित बस्ती में आग लगा दी थी जिसमें ताराचंद बाल्मिकी व उसकी विकलांग युवा लड़की की जलने से मौत हो गई थी और बाल्मिकी जाति के 50 के करीब घर जल गये थे। मिर्चपुर कांड की सुनवाई के लिये यह मुकदमा दिल्ली (रोहिणी) की अदालत में स्थानांतरित कर देने के विरोध में उच्च जाति के लोगो ने व्यापक आंदोलन चलाया जबकि अधिकतर पीड़ित दलित अभी भी हिसार के तवंर फार्म में शरण लिये हुए है और दलितों की पैरवी कर रहे एक वकील को भी पैरवी छोडने की धमकी दी जा रही है।

पिछले एक साल से राज्य के फतेहाबाद जिले में गोरखपुर गांव के पास परमाणु बिजली संयत्र लगाने के विरोध में किसान फतेहाबाद जिला मुख्यालय पर धरना लगा रहे है । गत दिनों जापान में आये भंयकर भूंकप एवं सुनामी से फुकुशिमा परमाणु संयत्र के नष्ट होने और उसके बाद फैलने वाले विकिरण से हुए नुकसान से इस आंदोलन को बल मिला है। फतेहाबाद में आंदोलनकारी किसानों के हौंसले बुलंद है। इसके साथ ही सिरसा, फरीदाबाद, सोनीपत आदि जिलों में भी उपजाऊ कृषि भूमि के अधिग्रहण के विरोध में किसान आंदोलन चला रहे है।

राज्य में कर्मचारी संगठन भी अपनी मांगों के लिये लगातार आवाज उठाते आ रहे है, वर्ष के शुरु में हरियाणा कर्मचारी महासंघ के प्रांतीय प्रधान एवं महासचिव क्रमशः रमेश शर्मा एवं बीरसिंह ने अपनी मांगों को लेकर जींद में आमरण अनशन शुरु किया था। परिणाम स्वरुप सरकार को मांगांे पर सहानुभूति पूर्वक विचार करने का आश्वासन देना पड़ा, लेकिन सरकार इन मांगों पर अमल करने बजाएं जनसेवा के विभागों में पब्लिक प्राईवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) लागू कर रही है, रोडवेज में नई बसें शामिल करने के बजाए निजी बसों के लिए परमिट देने का राग अलाप रही है । स्कूली शिक्षा को बेहतर बनाने की दिशा में ठोस कदम नही उठाया जा रहा, अध्यापकों की भर्ती नही की जा रही। दूसरे विभागों में खाली पड़े पदो की भर्ती पर एक तरह से अघोषित प्रतिबंध लगाया हुआ है।

बीपीएल परिवारों एवं आर्थिक रुप से पिछड़े वर्ग के गरीब लोगों को रिहायशी प्लाट देने की योजना 2008 से अभी तक पूरी नही हो सकी है। अभी तक 10 प्रतिशत जरुरतमंद लोगों को भी प्लाट नही दिये जा सके हैं। इस सवाल पर ग्रामीण गरीबों में चर्चा होनी शुरु हो गई है कि क्या उन्हें 100-100 वर्ग गज के प्लाट मिल सकेंगें? देर सबेर इस सवाल पर भी लोगो को लामबंद होना होगा। इसके अलावा राज्य के बहुत सारे गांव में शामलात जमीन पर बसे दलित, पिछड़े परिवारो को उजाड़ने का काम भी पिछले अरसे में तेज हुआ है जहां उच्च जातियों के दबंग लोगों के साथ-साथ सरंपच भी स्वयं जेसीबी से बने बनाये घरों को उजाड़ रहे हैं, कई जगहो पर खेत मजदूर यूनियन के कार्यकर्ताओं, कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं के हस्तक्षेप के चलते और लगातार आंदोलन के कारण बेघर लोगो को पुनः बसाया जा सका है लेकिन कई जगहों पर संघर्ष जारी है। ग्रामीण गरीबों की अन्य योजनाओं में भ्रष्टाचार व्यापक रुप धारण कर चुका है चाहे इन्दिरा आवास योजना हो या कन्यादान योजना हो सभी जगह सुविधा शुल्क के बिना फाईल आगे नही बढ़ती। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून के तहत ग्रामिणो को सभी जगह काम की बात तो दूर सभी जरुरत मंदो का पंजीकरण तक नही हुआ है, जहां जाब कार्ड के बाद काम मिला है उन्हें महीनांे तक काम के पैसे नही मिलते।

राज्य में औद्योगिक श्रमिको में भी बैचेनी बढ़ रही है, महंगाई एवं मंदी का बहाना बना कर प्रबंधक श्रमिकांे की छंटनी कर रहे हैं । दूसरी तरफ श्रमिकों पर काम का बोझ भी बढ़ा दिया गया है। श्रम कानूनों पर पालना नही हो रही, बहुमत में श्रमिकांे के नाम हाजरी रजिस्टर में नही लिखे जाते, राज्य में यूनियनों के पंजीकरण भी नही हो रहे।

किसानों ने बहुत मेहनत करके गेहूं का उत्पादन किया है लेकिन मंडियों में गेहूं की बेकद्री चिन्ता का विषय बना हुआ है। गेहूं का समय पर उठान ना होने के कारण किसानों को कई-कई दिन मंडियों में रहना पड़ रहा है। बेमौसमी बारिश के कारण किसानों का काफी नुकसान हुआ है यह नुकसान गेहंू के साथ-साथ सब्जियों की फसल में भी हुआ है जिसकी भरपाई करना भी सरकार के पाले में है हालांकि राज्य सरकार ने स्पेशल गिरदावरी कराने का आदेश दे दिया है लेकिन गिरदावरी ठीक हो यह सवाल मुख्य है। किसानों को गेहूँ की बुआई के समय बीज एवं डी.ए.पी. खाद के संकट का मुकाबला करना पड़ा था। अब नरमा (कपास) का बीज नदारद है। आलम यह है कि नरमे बीज का जहंा 825 रुपये प्रति पैकेट है उसे 1000 रुपये प्रति पैकेट तक बेचा जा रहा है और 1000 रुपये पैकेट वाला बीज 1500 रुपये तक बेचा जा रहा है। इसके बावजूद किसानों को बीज मिल नही रहा है। गत दिवस टोहाना मे तो थाने में पुलिस की देख रेख में किसानो को नरमा का बीज लाईन में लग कर लेना पड़ा हांलांकि बहुत सारे किसान बीज से वंचित रह गये हैं। किसानों को नहरी पानी एंव बिजली आपूर्ति की समस्या से जूझना पड़ रहा है।

हरियाणा में कानून व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। राज्य में एक परिवार के 7-7 सदस्यो के कत्ल हो रहे हैं। दो-दो विधवा महिलाओं को लोगो के सामने जमानत पर आया एक बलात्कारी डंडो से पीटकर मार रहा है। रेवाडी में एक युवक के अपहरण के बाद हत्या हो गई, पानीपत के एक बच्चे का दो वर्ष से सुराग नही लग रहा। चौरी, डकैती, अपहरण, महिलाओं के साथ छेड़-छाड़, यौन शोषण लगातार बढ़ रहा है। राज्य में अलग से हरियाणा गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की मांग को लेकर भी आंदोलन चल रहा है, इस आंदोलन को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने भी समर्थन दिया है। लेकिन चिन्ता की बात है कि 18 अप्रैल को हरियाणा गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की युवा विंग के प्रदेशाध्यक्ष कवलजीत सिंह अजराना ने कुरुक्षेत्र में एक पत्रकार सम्मेलन में जरनैल सिंह भिंडरावाला को शहीद का दर्जा देते हुए कहा कि आज सिख पंथ को अनेकों भिंडरावालों की आवश्यकता है। इस ब्यान से लगता है कि राज्य में पुनः हिन्दु-सिख रिश्तो में खटास पैदा न हो जाए। ऐसे हालात में राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी इन सवालो को नही उठा रही दूसरी पार्टी के मुखिया खेतो में जाकर गेहूं काट रहे है। कहने का तात्पर्य है कि वे समझते है कि जनता के आक्रोश का लाभ अन्ततः उन्हे ही मिलेगा जबकि पूर्व में इनके शासन के दौरान भी राज्य की जनता को इनसे किसी प्रकार की राहत नही मिली थी। इसलिये जनता के हर तबके में पनत रहे आक्रोश को हमे समझना होगा तथा अन्य वाम जनवादी ताकतो को साथ लेकर व्यापक अभियान चलाना होगा। किसान सभा, खेत मजदूर यूनियन, नोजवान सभा, एटक सहित तमाम संगठनो को सक्रिय होकर इन समस्याओं पर वर्गीय आधार पर जनता को लामबंद करने के लिए समय रहते ठोस कदम उठाने चाहिए।

- दरियाव सिंह कश्यप
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तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में भाकपा प्रत्याशी















1 -  शिवगंगाई                एस. गुणशेखरन

2 - पेन्नाग्राम                 एन. नानजप्पन

3 - वल्पाराई                  एम. अरूमुगम

4 - तिरूतुराईपुंडी           के. कुलगंनाथन

5 - थाल्ली                     टी. राम चन्द्रन

6 - पुडकोट्टाई                एस.पी. मुत्तुकुमारन

7 - कुनूर                      ए. बेली

8 - श्री विल्लीपुतुर       वी. पोन्नू पंाडियन

9 - भवानी सागर         पी. एल. सुन्दरम

10 - गुडियातम            के. लिंगमुतु
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आंदोलन के औचित्य, तरीकों और उसके पीछे के लोगों पर है सवाल


(जंतर-मंतर पर हुये आन्दोलन को समाप्त हुये तीन सप्ताह बीत चुके हैं। जन लोकपाल बिल पर बनी समिति में शामिल लोगों के विषय में और आन्दोलन के तमाम पहलुओं पर व्यापक बहस इस बीच छिड़ चुकी है। बहस आगे भी जारी रहेगी।


प्रस्तुत आलेख जंतर-मंतर आन्दोलन की समाप्ति के बाद तत्काल प्रतिक्रिया के रूप में लिखा गया था जिसमें कई महत्वपूर्ण बिन्दु उठाये गये हैं। जरूरी नहीं कि आलेख के हर बिन्दु से हम सहमत हैं पर व्यापक बहस चले, इस दृष्टि से इस आलेख का प्रकाशन किया जा रहा है। - कार्यकारी सम्पादक)

अन्ना हजारे का अनशन खत्म हो चुका है। आजादी की तथाकथित दूसरी लड़ाई के दावों के बीच गांधीवादी हजारे और उनके साथी अब सरकार को लोकपाल विधेयक का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए 15 अगस्त तक का अल्टिमेटम देकर जंतर मंतर से हट गए हैं और मीडिया, खासकर टीवी चैनलों के जरिए ही सही देश के उभरते मध्यमवर्ग का एक हिस्सा भ्रष्टाचार के खिलाफ इस ऐतिहासिक जीत की खुशी में होली और दीवाली एक साथ मनाने में तल्लीन है। पर भ्रष्टाचार के खिलाफ मोमबत्ती जलाने, सिर पर गांधी टोपी पहनकर चंद घंटों के लिए उपवास पर बैठ जाने के बाद क्या अब भ्रष्टाचार इस देश से खत्म हो जाएगा? या फिर लोकपाल गठित हो जाना ही भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे बड़ी जीत होगी?

एक बड़े लोकतांत्रिक देश के जिम्मेदार नागरिक की हैसियत से हमें यह अवश्य देखना चाहिए कि आखिर हजारे के पीछे कौन सी ताकतें हैं? जिस आंदोलन को मीडिया ने जन आंदोलन का नाम दे डाला, यहां तक कि कुछ चैनलों के कुछ नामचीन संपादकों को दिल्ली के इंडिया गेट और जंतर मंतर पर जुटे लोग मिस्र के तहरीर चौक की याद दिलाने लगे, वो क्या सच में इस देश की जनता अथवा पूरे नागरिक समाज का वास्तविक प्रतिनिधित्व करता है?

मीडिया के जरिए ही सही हजारे और उनके साथी ऐसी पवित्र गाय सरीखे हो गए हैं, जिनकी आलोचना करना ही मानों पाप हो गया है। आंदोलन के औचित्य, तरीके, उसके पीछे के लोग और जन लोकपाल बिल के मसौदे पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। देश में एक मजबूत लोकपाल व्यवस्था की स्थापना हो, यह मांग पुरानी है। राजनेताओं और अफसरों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों की तुरंत जांच और प्रभावी कार्रवाई होना जरूरी है लेकिन क्या जन लोकपाल ही समस्याओं का जवाब है?

क्रिकेट वर्ल्ड कप के जुनून में डूबे देश और टीम इंडिया के करिश्माई प्रदर्शन के उल्लास से सराबोर आम भारतीयों के लिए चंद दिनों पहले तक न तो अन्ना हजारे कोई खबर थे और न लोकपाल व्यवस्था के होने या न होने का सवाल उन्हें झकझोर रहा था। क्रिकेट की दीवानगी के बीच बाजार देख रहे टीवी चैनलों, उनके मालिकों और संपादकों को भारत-पाकिस्तान के सेमीफाइनल मुकाबले को जंग के मैदान में बदलने से फुर्सत नहीं थी। हजारे के आंदोलन को एक नए युग की शुरुआत बता रही मीडिया की जमात के बीच भी अधिकतर को न तो अन्ना की सुध थी और न लोकपाल, जन लोकपाल की पेचीदगियों की समझ और न उसे समझने की फुर्सत।

लेकिन अचानक ही मानों नवक्रांति का बिगुल बज उठा। 23 साल बाद भारत के क्रिकेट विश्वकप जीतने पर स्पेशल बुलेटिनों में बहस कर रहे टीवी एंकर और उनके संपादक अचानक हजारेमय हो गए। ठंडे बस्ते में धूल खा रहा लोकपाल बिल का मसला जिंदा हो गया। अन्ना हजारे के पीछे-पीछे समाचार चैनलों की ओबी वैन और उनके नामचीन चेहरे जंतर मंतर दौड़ पड़े। और शुरू हो गया मीडिया के जरिए आजादी की दूसरी लड़ाई का माहौल बनना। टीवी की व्यापक पहुंच ने दो दिन बीतते बीतते अन्ना और उनके जनलोकपाल बिल की मांग को भारत के मध्यमवर्गीय घरों तक पहुंचा दिया। बड़े ही सुनियोजित तरीके से और समाचार पत्रों और चैनलों के जरिए आम जनता से आजादी की इस दूसरी लड़ाई में कूद पड़ने का आह्वान होने लगा। अपने अराजनैतिक सरोकारों और एक सिरे से राजनीतिज्ञों को चोर करार देने वाले मध्य और उच्च मध्यवर्ग के तमाम रहनुमा सुबह से लेकर रात तक टीवी चैनलों के स्टूडियों में बैठकर अन्ना के अनशन को आजाद भारत का सबसे बड़ा जनांदोलन बताने लगे। फिल्म और कला जगत के कथित बुद्विजीवियों की एक जमात तो जंतर मंतर पहुंचकर सीधे नेताओं और राजनीतिक दलों को अलविदा बोलने के लिए कहने लगी जोकि लोकतंत्र के लिए एक निहायत अवांछित कार्यवाही के अलावा कुछ नहीं था।

और मीडिया के जरिए निहायत ही एकतरफा और गैर जिम्मेदाराना तरीके से रचे गए अन्नामय उन्माद में किसी भी सवाल-जवाब और विमर्श के लिए कोई जगह नहीं बची थी। समाचार चैनलों ने तो यह रुख अख्तियार कर लिया कि या तो आप अन्ना के साथ हैं, नहीं तो भ्रष्टाचारियों के साथ। यह नजरिया निश्चित तौर पर गलत था, क्योंकि अन्ना हजारे और उनका आंदोलन देश के संपूर्ण नागरिक समाज का प्रतिनिधित्व कतई नहीं कर रहा था। एकतरफा खबरों के जुनून में शामिल समाचार माध्यमों ने यह कभी नहीं बताया कि दरअसल अन्ना के आंदोलन के पीछे का सच क्या है? लोकपाल बिल की जायज मांग के पीछे दरअसल कौन से चेहरे हैं और उनकी अपनी छवि कैसी है।

जनता के समक्ष एक ऐसी तस्वीर पेश की गई कि हजारे मानों अकेले ही चले थे और उनके साथ कारवां जुड़ता चला गया जो सच्चाई से कोसों दूर है। असलियत यह है कि अन्ना एक चेहरा - एक पाक-साफ महात्मानुमा चेहरा भर ही हैं। खुद कभी अन्ना ने भी अपने पांच दिनों के अनशन के दौरान यह नहीं बताया कि अनाप शनाप दौलत इकट्ठा करने वाले योग गुरू तथा तमाम बड़े भ्रष्ट कारपोरेट घरानों के मालिकों के आध्यात्मिक रहनुमा उनके आंदोलन की रीढ़ की हड्डी थे, जिनके खुद का दामन पाक-साफ नहीं है।

विश्वास न हो तो इंडिया अगेंस्ट करप्शन मूवमेंट का इतिहास उठाकर देख लीजिए। जनलोकपाल बिल के समर्थन में अन्ना का अनशन भी दरअसल इसी अभियान का हिस्सा था। बाबाओं और आध्यात्मिक गुरुओं के अलावा अभियान के गठन में कुछ और नाम भी हैं। क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई, राजनेताओं की जवाबदेही सुनिश्चित करने और पारदर्शी शासन व्यवस्था के सूत्रधार इस तरह के लोग हो सकते हैं? क्या वजह थी कि योगगुरू और उनके लोग चार दिन तक परदे के पीछे से आंदोलन को हवा देने के लिए तमाम सोशल नेटवर्किंग साइटों पर सक्रिय रहने से लेकर शहर-शहर आंदोलन करवाने में जुटे रहे और मीडिया मैनेजमेंट भी करते रहे, लेकिन खुद हजारे के मंच पर आने से बचते रहे। वह चौथे दिन कुछ इस अंदाज में जंतर मंतर पहुंचे मानों हजारे की मुहिम में एक हाथ लगाने आ गए हों। दूसरे अध्यात्मिक गुरू खुद इस दौरान विदेश में रहे, लेकिन उनके संगठन ने अपनी पूरी ताकत हजारे के पक्ष में झोंक दी। विदेशों में भी अन्ना के समर्थन में जिन जुलूसों को समाचार चैनलों ने खूब दिखाया वो भी दरअसल इसी संगठन के लोग थे।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में आंदोलन करना गलत नहीं है पर योग और अध्यात्मिक गुरूओं ने परदे के पीछे से भूमिका क्यों निभाई, यह प्रश्न उठता है। यह इनकी रणनीतिक तैयारी का हिस्सा था। इन जैसे लोगों के शुरु से ही खुलकर आ जाने पर एक आम भारतीय इसे गंभीरता से न लेता। यही नहीं अराजनैतिक करार दिए गए इस आंदोलन को शायद भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भी गुपचुप समर्थन मिला और आज भी मिल रहा है। हजारे के अनशन के दौरान मैं खुद ऐसे समर्थन प्रदर्शनों और अनशनों का गवाह बना जिसमें तमाम लोग संघ या भाजपा के कार्यकर्ता थे। लखनऊ में ही भाजपा युवा मोर्चे के लोगों ने अपनी राजनीतिक पहचान छुपाते हुए अन्ना के समर्थन में तिरंगा यात्रा निकाली।

फिर एक सवाल अन्ना से भी है कि एक लोकपाल बिल को भ्रष्टाचार के खिलाफ ब्रहमास्त्र की तरह प्रोजेक्ट कर रहे अन्ना की भ्रष्टाचार के कारणों की समझ क्या है? कटु सत्य है कि मौजूदा दौर में राजनीतिक भ्रष्टाचार चरम पर है। मंत्री से लेकर संतरी तक देश की लूट में लगे हैं। सरकारों के स्तर पर नेताओं और कारपोरेट जगत का एक ऐसा कार्टेल बन गया है कि पूंजीवाद की पोषक आर्थिक नीतियां कारपोरेट घरानों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के फायदे यानी पूंजी के मुनाफे के हिसाब से बनती बिगड़ती हैं। 1990 के दशक से शुरू हुए आर्थिक सुधारों और नई मुक्त बाजार की अर्थव्यवस्था के दौर में सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार के जितने मामले सामने आए हैं, उतने पहले नहीं सुनाई पड़ते थे। राजीव गांधी के शासन काल में 64 करोड़ का बोफोर्स घोटाला इतना बड़ा था कि केंद्र की सरकार तक चली गई।

पर आर्थिक सुधारों के युग में राजनेताओं और पूंजीपतियों, कारपोरेट घरानों का ऐसा गठजोड़ बना कि भ्रष्टाचार के आंकड़े चंद करोड़ से निकलकर सैकड़ों करोड़ से होते हुए अब लाखों करोड़ तक पहुंच गए हैं। पौने दो लाख करोड़ का 2-जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाला इस खतरनाक गठबंधन का एक बड़ा उदाहरण है। खाने और खिलाने के इस खेल में टाटा से लेकर अंबानी तक सब शामिल हैं। सवाल है कि ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ से जुड़े लोगों ने कभी भी आर्थिक नीतियों के सवाल पर आवाज उठाई? क्या कभी भी इन लोगों ने कारपोरेट जगत की लूट के खिलाफ आवाज उठाई? सिविल सोसाइटी के स्वयंभू रहनुमा बताएं कि भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाली आर्थिक नीतियों पर उनका नजरिया क्या है? सवाल सिर्फ व्यक्तिगत ईमानदारी का नहीं होता। बेदी को अगर दिल्ली का पुलिस कमिश्नर बना दिया गया होता तो वह शायद आज भी सरकारी सेवा में होती और रोजगार एवं शिक्षा के सवाल पर किसी प्रदर्शन को रोकने के लिए अपने मातहतों को जंग के निर्देश भी दे रही होतीं। सवाल आंदोलन के पीछे की समझ और इरादे पर है। क्या लोकपाल के आ जाने के बाद कारपोरेट जगत के द्वारा अपने फायदे के लिए नेताओं को भ्रष्टाचार के लिए उकसाने का खेल खत्म हो जाएगा? क्या वो परिस्थितियां खत्म हो जाएंगी जिनकी बुनियाद पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है? खैर इस सवाल पर इनसे जवाब की उम्मीद न रखें। योगगुरू के सहारा इंडिया जैसे उद्योग समूहों से संबंध जगजाहिर हैं और अध्यात्मिक गुरू के बड़े पूंजीपतियों और कारपोरेट हस्तियों से। इनमें कई तो मीडिया समूहों के मालिक हैं। यहां यह भी सवाल है कि क्या कुछ मीडिया समूहों के खुद ही अन्ना के अनशन का एक्टिविस्ट बन जाने के पीछे कहीं यही अध्यात्मिक प्रेरणा तो नहीं थी? भ्रष्ट पूंजीपतियों-राजनीतिज्ञों के साथ आन्दोलन के कर्णधारों की दुरभिसंधि की आशंका को भी प्रथमदृष्टि से नकारा नहीं जा सकता क्योंकि इसके जरिये रोज खुल रहे घपलों-घोटालों के कारण भ्रष्टाचार के खिलाफ आम जनता में पैदा हो रहे आक्रोश में कमी तो आयी ही है।

खैर इन बातों से अलग हजारे समर्थित जनलोकपाल बिल, लोकपाल के रूप में देश के सीईओ की नियुक्ति करने जैसा होगा। संसदीय व्यवस्था वाले देश में, जहां प्रधानमंत्री का पद एक संवैधानिक संस्था है और हमारी संसद देश की सबसे बड़ी नीति निर्धारक, वहां प्रधानमंत्री से लेकर मंत्री और संसद के सदस्य के साथ-साथ न्यायपालिका तक के खिलाफ जनता के किसी भी व्यक्ति द्वारा शिकायत किए जाने पर लोकपाल द्वारा उसे सीधे संज्ञान में लेकर जांच करने, मुकदमा चलाने और यहां तक की सजा भी सुना सकने का अधिकार क्या संवैधानिक संस्थाओं तथा संविधान द्वारा स्थापित व्यवस्था को छिन्न-भिन्न नहीं करेगा? राजनीतिक भ्रष्टाचार से निपटने का मतलब यह कतई नहीं होना चाहिए कि लोकतंत्र की नींव को ही कमजोर कर दें। सर्वाेच्च पदों और संसद की गरिमा भी बची रहे और संसद तथा सरकार में बैठे भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई भी हो, ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए।

यही नहीं जनलोकपाल बिल जहां एक तरफ लोकपाल को असीमित अधिकार देने की वकालत करता है, वह लोकपाल के ही खिलाफ शिकायत होने पर जांच के तरीकों पर स्पष्ट नहीं है। या यह कहें कि जिस देश में न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका के बीच अधिकारों का बंटवारा चेक ऐंड बैलेंस की परंपरा के आधार पर है, वहां लोकपाल तीनों ही इकाइयों के वाचडाग के रूप में तो होगा पर उस संस्था के भीतर किसी संभावित भ्रष्टाचार से कैसे निपटा जाएगा?

यह साफ है कि लोकपाल बिल का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए जिस कमेटी का गठन हुआ है, वह देश की जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करती। जिन पांच लोगों को सिविल सोसाइटी के नुंमाइंदे के तौर पर कमेटी में रखा गया है, उनमें अन्ना हजारे के अलावा अन्य सभी अन्ना समर्थित हैं या यूं कहें कि अन्ना के लोग हैं, वो लोग हैं जो जनलोकपाल के पैरोकार हैं। यह इसलिए भी खतरनाक है क्योंकि देश के इतिहास में पहली बार बनी सरकार और स्वयंभू नागरिक समाज के मिले जुले प्रतिनिधियों वाली ड्राफ्टिंग समिति दरअसल कहीं न कहीं एक ऐसा भाव पैदा करती है कि मानों सरकार और एक व्यक्ति के बीच समानता का भाव है। आज अन्ना हजारे हैं, कल किसी और मांग को लेकर किसी और चेहरे के पीछे वैसा ही उभार खड़ा करने की कोशिश नहीं होगी, इसकी क्या गारंटी है?

जाहिर है हमें यह समझना होगा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों में बहुत गुस्सा है और होना भी चाहिए लेकिन समस्या का स्थाई हल राजनीतिक सुधारों में है। देश की राजनीति की दशा और दिशा बदले जाने की जरूरत है, जनता से जुड़े आर्थिक सवालों, जमीन और रोजगार के सवालों पर राजनीतिक संघर्ष की जरूरत है। ऐसे में जनता के प्रति राजनीतिक दलों और नेताओं की जवाबदेही बढ़ेगी। जाति और मजहब के आधार पर चुनकर आने वाली सरकारों से आप यह उम्मीद नहीं कर सकते। इसलिए खाली एक लोकपाल विधेयक आ जाने से ही कोई बड़ा क्रांतिकारी परिवर्तन हो जाएगा, ऐसा नहीं लगता। भ्रष्टाचार के खिलाफ अराजनैतिक नहीं राजनैतिक संघर्ष छेड़ना पड़ेगा। प्रगतिशील सोच रखने वाले राजनीतिक दलों के लिए अन्ना का यह अनशन अपने तमाम विरोधाभासों के बीच इसलिए आंख खोलने वाला होना चाहिए कि उन्हें जनता के गुस्से को समझना होगा। अगर सही राजनीतिक नेतृत्व नहीं मिलेगा तो अन्ना जैसे अराजनैतिक दिखने वाले आंदोलन फिर होंगे, और अच्छे नेतृत्व के अभाव में जनता फिर से भ्रमित होगी।

- प्रबोध




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शनिवार, 23 अप्रैल 2011

अत्यधिक प्रासंगिक हो गया है - ”गाँव चलो-मोहल्ला घूमो“ अभियान

अत्यधिक प्रासंगिक हो गया है - ”गाँव चलो-मोहल्ला घूमो“ अभियान


गत कई वर्षों में उत्तर प्रदेश में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की इकाइयां और उसके नेता/कार्यकर्ता बेहद सक्रिय रहे हैं। जन-समस्याओं पर आन्दोलन दर आन्दोलन चलाये गये हैं, राष्ट्र एवं प्रान्त स्तरीय कार्यक्रमों में आशा से अधिक भागीदारी की है, पार्टी शिक्षा पर बेहद ध्यान दिया गया है और दो राज्य स्तरीय एवं दर्जनों क्षेत्रीय एवं जिला स्तरीय प्रशिक्षण शिविर आयोजित किये गये हैं, जन संगठनों में जान डालने की कोशिशें जारी हैं, कई सीटों पर लोकसभा चुनावों एवं विधानसभा के उप चुनावों में भागीदारी की गयी है, त्रि-स्तरीय पंचायत चुनाव लड़े और जीते गये हैं, महंगाई और बढ़ती गतिविधियों से बढ़ते खर्चों को पूरा करने को अनाज एवं धन संग्रह अभियान चलाने की कोशिशें की गयी हैं, राज्य मुख्यालय पर बेहद जरूरी सुविधायें जुटाई गयी हैं और संभवतः पहली बार राज्य मुख्यालय पर एक नया चार पहिया वाहन खरीदा गया है। यह सारी गतिविधियां उत्तर प्रदेश में पार्टी के विकास और विस्तार की छटपटाहट की द्योतक हैं।

अब हमारे सामने कई महत्वपूर्ण चुनौतियां मौजूद हैं। देश की ही भांति उत्तर प्रदेश की जनता भी तमाम समस्याओं से जूझ रही है। केन्द्र और राज्य सरकार दोनों जनता पर कुल्हाड़ा चला रही हैं मगर विपक्ष की बड़ी पार्टियां जनता के सरोकारों को उठा नहीं पा रही हैं। एक राजनैतिक विकल्पशून्यता की स्थिति से उत्तर प्रदेश गुजर रहा है। इस स्थिति का लाभ उठाने की कोशिश में कई ताकतें जुट गई हैं। श्री अन्ना हजारे के जन लोकपाल बिल की ड्राफ्ट कमेटी में अपने प्रतिनिधि रखवाने के आन्दोलन के प्रति भ्रष्टाचार से पीड़ित जनता - खासकर मध्यम वर्ग में काफी लगाव दिखा। वहीं भ्रष्टाचार से धन अर्जन करने वालों में इस अवसर को अपने को सदाचारी जताने को भुनाने की होड़ लगी रही। ऐसे प्रयास आगे भी होंगे। इन सवालों पर भाकपा और वामपंथ की सक्रियता और संघर्षशीलता ही ऐसे भटकावों को रोक सकती है।

प्रदेश में दो-दो चुनाव सामने हैं। विधान सभा चुनाव जहां अप्रैल-मई 2012 में वांछित है वहीं नगर निकायों के चुनाव नवम्बर-दिसम्बर 2011 में। लेकिन दोनों के ही समय से पूर्व होने के कयास लगाये जा रहे हैं। नगर निकाय चुनाव जून-जुलाई में कराने की तैयारी चल रही है तो विधान सभा चुनाव अक्टूबर-नवम्बर 2011 में कराये जाने की संभावना है। तमाम दलों ने इनकी तैयारी शुरू कर दी है। लेकिन हमारी स्थिति भिन्न है। हम चुनावी तैयारियां भी आन्दोलन और सांगठनिक कार्यों को तेज करके ही किया करते हैं।

उपर्युक्त दृष्टि से 13, 14 एवं 15 मई को चलाया जाने वाला धन एवं अनाज संग्रह अभियान हमारे लिये बेहद महत्वपूर्ण है। इसे कैसे सफल बनाया जाये, इसकी चर्चा ”पार्टी जीवन“ के गत अंक में की जा चुकी है।

गत दिनों सम्पन्न राज्य कार्यकारिणी की बैठक में बहुत सोच-समझ कर ही ”गांव चलो-मोहल्ला घूमो“ अभियान व्यापक तौर पर चलाने का निर्णय लिया गया था। जन-जागरण अभियान 16 मई से 29 मई तक चलाया जाना है जिसका समापन 30 मई को जिला मुख्यालयों पर जुझारू धरने/प्रदर्शनों के साथ किया जाना है। जाहिर है ज्वलन्त सवालों पर जिलाधिकारी के माध्यम से महामहिम राष्ट्रपति एवं राज्यपाल महोदय को ज्ञापन तो सौंपे ही जायेंगे।

अनेक सवाल हैं जो इस अभियान के अंतर्गत जनता के बीच स्पष्टता से रखे जाने हैं। उत्तर अफ्रीकी देशों की जनता लम्बे समय से तानाशाही, कुशासन, भ्रष्टाचार एवं अत्याचारों से त्रस्त है। जनता सड़कों पर उतरी तो एक के बाद एक तानाशाही उखड़ने या लड़खड़ाने लगीं। पहले ट्यूनीशिया की जनता ने निरंकुश शासक को खदेड़ा तो फिर मिस्र की जनता ने 32 सालों से राज चला रहे होस्नी मुबारक को हटा कर ही दम लिया। बहरीन, यमन, सीरिया, जोर्डन, लीबिया की जनता ने करवट ली और वहां भी आन्दोलन जोर पकड़ने लगा। अब समूचे अरब जगत में यह आग धधक रही है। दुनियां के लोकतंत्रवादी एवं प्रगतिशील सोच के लोगों में इन घटनाक्रमों से भारी उत्साह जगा है। मगर ऊपर से लोकतांत्रिक शक्तियों की विजय पर खुशी जताने वाली अमेरिका और यूरोप के कुछ देशों की सरकारों को जनता की यह बढ़ती ताकत रास नहीं आई। वे इन आन्दोलनों में भीतरघात की कोशिशों में जुट गईं। बहरीन की जनता के आन्दोलन को सऊदी अरब के माध्यम से दबाने की कोशिश की गयी। लेकिन लीबिया में तो अमेरिका, यूरोपीय यूनियन और नाटो देशों ने सीधे सैनिक कार्यवाही कर डाली और लीबिया में भारी तबाही मचा दी है। इससे लीबिया की जनता के अपने निर्णय के अधिकार का हनन तो हुआ ही, लीबियाई संकट का अंतर्राष्ट्रीयकरण हो गया। इससे कर्नल गद्दाफी को ही लाभ पहुंचा क्योंकि इराक की तबाही देख चुका विश्व जनमत अमेरिकी गुट की इस कारगुजारी को गले नहीं उतार पा रहा है। बाहरी हमला फौरन रोका जाये और संकट का हल बातचीत से निकाला जाना चाहिये, यह मांग जोर पकड़ रही है। अरब जगत में चल रही बदलाव की यह आंधी भ्रष्टाचार और जनलूट में आकंठ डूबे भारत के शोषक वर्गों एवं उनके द्वारा संचालित सरकारों और पार्टियों के लिए एक बड़ी चेतावनी है।

जापान में आये भयंकर भूकंप एवं सुनामी के बाद वहां के परमाणु ऊर्जा संयंत्रों - खासकर फुकुशिमा संयंत्र में आग लग गयी। तापमान बढ़ने से रेडियम छड़ें पिघलने लगीं और बड़े पैमाने पर हानिकर रेडियोधर्मी विकिरण (रेडियेशन) होने लगा। यह विकिरण इतना जबरदस्त था कि तमाम बचावकर्मी ही जान बचाकर भागने लगे। चेरनोबिल परमाणु बिजली घर में हुए हादसे से भी यह बड़ा हादसा है। इससे मिट्टी, पानी, पर्यावरण, समुद्र सभी प्रदूषित हो गये हैं। खाद्य पदार्थों सहित तमाम उपभोक्ता वस्तुयें इसकी चपेट में हैं। इसने मानवता ही नहीं समूची प्रकृति को असीमित बरबादी की मांद में धकेल दिया है। यह हादसा समूचे विश्व की आंखें खोलने को काफी है। चीन में भी परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को लगाने का जनता सड़कों पर उतर कर विरोध कर रही है। लेकिन हमारे देश की सरकार इससे कोई सबक लेने को तैयार नहीं। जैतापुर (महाराष्ट्र) के अलावा गुजरात और हरियाणा में नये परमाणु बिजली घर बनाने का काम जारी है जबकि स्थानीय जनता, पर्यावरणविद और किसान इसका पुरजोर विरोध कर रहे हैं। विरोध कर रही जनता को अब दमन के बल पर दबाया जा रहा है। जैतापुर प्लांट का विरोध कर रहे आन्दोलन में पुलिस की गोली से एक नागरिक शहीद हो चुका है।जिन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को इसके निर्माण का काम सौंपा जा रहा है, उनकी विश्वसनीयता संदिग्ध है। भूकंप की स्थिति या तकनीकी खराबी आने पर जन-धन की भयंकर बरबादी अवश्यंभावी है। हमारे मौजूदा परमाणु बिजलीघरों की सुरक्षा के सम्बंध में भी हम अधिक नहीं जानते। तारापुर परमाणु संयंत्र की बनावट फुकुशिमा जैसी ही है। समझा जा सकता है कि यदि कोई बड़ा भूकम्प आया तो हमारा क्या हाल होगा। यह समझ में ही नहीं आ रहा है कि विकास के नाम पर विनाश का ये रास्ता किसके कहने पर अपनाया जा रहा है। कहीं यूरेनियम आपूर्ति कर भारी मुनाफा बटोरने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कहने पर तो नहीं? जो भी हो फुकुशिमा की त्रासदी के बाद भारत-अमेरिकी परमाणु करार के वक्त भाकपा और वामदलों द्वारा खड़े किये गये सवाल आज फिर से प्रासंगिक हो गये हैं। हमें इस सवाल को जनता के बीच ले जाना है। साथ ही परमाणु करार के समर्थन में उतरी समाजवादी पार्टी से भी सवाल किया जाना चाहिये कि उसने इसका समर्थन क्यों किया?

देश में इस बार रबी की फसल में बम्पर पैदावार हुई है जिसका श्रेय देश के किसानों और खेतिहर मजदूरों को जाता है जिन्होंने तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अधिक अनाज का उत्पादन किया। लेकिन प्याज, लहसुन और सब्जियों की भरपूर पैदावार के बावजूद महंगाई थमने का नाम नहीं ले रही है। मार्च महीने में महंगाई की दर पिछली 8.31 प्रतिशत से बढ़कर 8.98 हो गई जबकि भारतीय रिजर्व बैंक ने इसके घटने का दावा किया था। केन्द्र सरकार की आर्थिक उदारीकरण की नीतियां, जिसके तहत पेट्रोलियम की कीमतें लगातार बढ़ाई जा रही हैं, इसके लिए जिम्मेदार हैं। राज्य सरकार द्वारा जमाखोरी एवं कालाबाजारी पर रोक न लगाना, राशन प्रणाली एवं अन्य राहतकारी योजनाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं है। कुछ भी हो महंगाई की मार से आम आदमी तबाह हो रहा है। रोज कमा कर खाने वालों की जान के लाले पड़े हुए हैं। हमारे अभियान का यह एक प्रमुख मुद्दा रहना चाहिए।

एक के बाद एक उजागर हो रहे महाघोटालों और उनमें नेता, अफसर, पूंजीपति, उद्योगपति और दलालों की संलिप्तता ने जन-मानस को झकझोर कर रख दिया है। हाल ही में 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाला, कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला, आदर्श हाउसिंग सोसाइटी घोटाला, इसरो में हुआ घोटाला, पामोलिन तेल घोटाला, मनरेगा योजना तथा गरीबी उन्मूलन की अन्य तमाम सरकारी योजनाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार, भूमि-अधिग्रहण में चल रहे घोटाले तथा उच्च पदस्थ नेताओं को धन इकट्ठा कर मुहैया कराने के घोटाले लगातार सामने आ रहे हैं। कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा तथा कई क्षेत्रीय दल इन घोटालों में साफ दोषी दिखाई दे रहे हैं। भ्रष्टाचार आज समाज में कैंसर का रूप ले चुका है जिससे आम और गरीब आदमी बेहद परेशान है। उन्हें इसके भंवरजाल से निकलने का कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा है। भाकपा और वामदलों ने सड़क से लेकर संसद तक इसके खिलाफ आवाज उठाई है लेकिन यह आवाज जनता की आवाज अभी तक नहीं बन पायी है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि इस देश में केवल और केवल वामपंथी हैं जिनको भ्रष्टाचार छू तक नहीं पाया है। लेकिन मीडिया हमारी भूमिका को पूरी तरह दबाता रहा है। अतएव अब भ्रष्टाचार के खिलाफ कई तात्कालिक तत्व सक्रिय हो गये हैं और मीडिया उन्हें पूरी ताकत से उछाल रहा है। कार्पोरेट मीडिया नहीं चाहता कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई बन जाये जोकि वामपंथ का लक्ष्य है। पूंजीवादी व्यवस्था में जहां हर तरह से पूंजी के विस्तार की छूट है, कुछ कानूनों और कुछ कदमों से भ्रष्टाचार रूकने वाला नहीं है। हमें भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग को तेज तो करना ही है, इसे व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन की लड़ाई में तब्दील करना है। इसके लिये व्यापक जन-लामबंदी आवश्यक है।

उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था जार-जार हो चुकी है। दलितों, महिलाओं, आदिवासियों तथा अन्य कमजोर वर्गों को सबसे अधिक दमन का शिकार होना पड़ रहा है। पुलिस व प्रशासन न केवल आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे हैं अपितु वे सत्ता शिखर के लिये धन जुटाने का औजार बन गये हैं। तीन माह के भीतर राजधानी में दो-दो सीएमओ की जघन्य हत्यायें इसका ज्वलंत उदाहरण हैं। अब सरकार और उसके वरिष्ठ अधिकारियों पर हसन अली से सम्बंध होने के आरोप उजागर हो रहे हैं। प्रशासन शासक दल के औजारों की तरह काम कर रहा है। विपक्ष की लोकतांत्रिक गतिविधियों को कुचलने के प्रयास हो रहे हैं। त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में जबरदस्त तरीके से जोर जबरदस्ती कर सत्ता पर कब्जा जमा लिया गया। अब नगर निकायों पर बलात् कब्जा करने की तैयारी है। इसके लिए अध्यक्षों के सीधे चुनाव रोकने सम्बंधी विधेयक को विधान सभा में आनन-फानन में जबरदस्ती पारित कर घोषित कर दिया गया जिसको महामहिम राज्यपाल महोदय ने स्वीकृत नहीं किया। इन चुनावों को पार्टी के चुनाव चिन्ह पर लड़ने से भी रोका जा रहा है। लोकतंत्र को नेस्तनाबूद करने की इस साजिश का हम विरोध करते रहेंगे और दोनों कदमों को वापस लेने की मांग करते हैं।

भाकपा ने प्रदेश के बुनकरों के हित में लड़ाई लड़ी और कुछ राहतें उन्हें दिलाने में कामयाबी हासिल की है। लेकिन बुनकर समुदाय के तमाम सवाल अब भी मुंह बायें खड़े हैं। मनरेगा मजदूर काम और दाम से वंचित किये जा रहे हैं। आशा, आंगनबाड़ी, मिड डे मील रसोइये, हेल्थ वर्कर्स तथा असंगठित क्षेत्र के तमाम मेहनतकश अति अल्प वेतन और बेहद कम सुविधाओं में जीवनयापन को मजबूर हैं। खेतिहर मजदूरों के सवाल भी जहां थे वहीं लटके पड़े हैं।

विकास के नाम पर पूरे प्रदेश में किसानों की उपजाऊ जमीनों का जबरिया अधिग्रहण किया जा रहा है। इसके विरूद्ध हमने कई आन्दोलन चलाये और कई जगह सफलता भी हासिल की। आज के दौर में यह मामूली बात नहीं है। लेकिन इस सवाल को और अधिक गंभीरता से लेना है। किसान विरोधी भूमि अधिग्रहण कानून 1894 को हमें हर कीमत पर बदलवाना है। इस बीच रासायनिक खादों, कृषि उपकरणों, बीजों, कीटनाशकों, बिजली और डीजल आदि के दामों में बड़ी बढ़ोतरी हुई है जबकि उनकी पैदावार के दाम उसी अनुपात में नहीं बढ़ाये गये हैं। किसान लगातार घाटे में जा रहे हैं और कर्ज के जाल में फंसते जा रहे हैं। उनमें से तमाम आत्महत्यायें कर चुके हैं। हाल में आये आंधी, पानी, ओलों से भी रबी की फसल को बड़ा नुकसान पहुंचा है। उनकी इस हानि का शत-प्रतिशत मुआवजा तत्काल मिलना चाहिये तथा लगान, आबपाशी आदि माफ किया जाना चाहिये। उनका अनाज सरकारी खरीद केन्द्रों पर बेरोकटोक खरीदा जाना चाहिये। खरीद केन्द्र सुचारू काम करें यह भी हमें देखना चाहिये।

प्रदेश में शासन एवं प्रशासन में तमाम स्थान रिक्त पड़े हैं। प्राइमरी से लेकर उच्च शिक्षण संस्थाओं में तमाम जगह खाली पड़ी हैं। ये स्थान भरे नहीं जा रहे और यदि भरे जा रहे हैं तो भारी रिश्वतखोरी जारी है। प्रदेश के नौजवान दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। पढ़ाई दुकानदारी में तब्दील कर दी गई है। स्तरहीन निजी स्कूल डिग्रियां बेच रहे हैं। भारी फीस वसूली जा रही है। आम नागरिक बच्चों को पढ़ा नहीं पा रहे हैं। सरकारी स्कूलों में सीटों की कमी है। तमाम लोग वहां दाखिलों से वंचित रहने हैं। शिक्षा का बाजारीकरण रोके बिना जनशिक्षा संभव नहीं और बिना जन शिक्षा के देश का विकास संभव नहीं है। इस सबको अभियान में महत्वपूर्ण जगह दी जानी चाहिये।

उपर्युक्त सवालों के साथ-साथ स्थानीय समस्याओं को लेकर हमें गांव, मोहल्लों, कस्बों, नगरों और महानगरों में अलख जगानी है। पर्चे छाप कर बांटे जाने चाहिये। ग्रामों में रात और दोपहर को चौपालें लगाई जायें। अखबारों को खबरें लगातार दी जायें। जनता से 30 मई को जिला/तहसील केन्द्रों पर होने वाले प्रदर्शन में व्यापक रूप से भाग लेने का आह्वान किया जाये।

जहां-जहां जायें वहां जन संगठनों की स्थापना का प्रयास करें। पार्टी की शाखायें व सदस्यता स्थापित करें। जहां चुनाव लड़े जाने हैं, वहां बूथ स्तर पर कमेटियां गठित करें। पार्टी के अखबारों के वार्षिक ग्राहक बनाये जायें। पार्टी संचालन के लिये लोगों से धन और अनाज भी अवश्य मांगें। हर तरह से अभियान को कारगर बनाया जाये।

जिला कार्यकारिणी और काउसिंल की बैठक कर इसकी व्यापक रूपरेखा तैयार करनी चाहिये। शाखाओं और मध्यवर्ती कमेटियों को भी सक्रिय करना चाहिये। हर सदस्य एवं जन संगठनों को इसमें भागीदार बनाना चाहिये। इसके जरिये जनता को उसके ज्वलन्त सवालों पर लामबंद करने के साथ-साथ हम अपनी चुनावी तैयारियों को भी आगे बढ़ा पायेंगे।

अतएव ”गांव चलो, मुहल्ला घूमों“ अभियान में हमें पूरी तरह कमर कस कर उतरना है। विकल्पशून्यता की इस स्थिति में हमें प्रदेश में अपनी ताकत में इजाफा करने के इस अवसर को गंवाना नहीं है। यही वक्त का तकाजा है और यही हमारा दायित्व है।

(डा. गिरीश)






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शनिवार, 9 अप्रैल 2011

भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग जारी रहे ................


विगत दिनों केन्द्र और कई राज्य सरकारों के भ्रष्टाचार और घपले-घोटालों का खुलासा होने से आम जनता व्यथित और आक्रोशित थी। यद्यपि संसद से लेकर सड़क तक इसके खिलाफ अनेक अभियान चल रहे थे लेकिन वामपंथी दलों को छोड़ अन्य अभियान चलाने वालों की विश्सनीयता जनता के बीच संदिग्ध थी। ऐसे में एक गैर राजनीतिक मंच से शुरू हुए आन्दोलन के प्रति जनता के कतिपय हिस्सों का लगाव स्वाभाविक था और जनता को उम्मीद जगी कि भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक जंग शुरू हो चुकी है। लेकिन अन्ना हजारे और भारत की पूंजीवाद सरकार में लोकपाल कानून पर नागरिक समाज (सिविल सोसाईटी) और केन्द्र सरकार में कांग्रेस पार्टी के मंत्रियों की एक समिति गठित करने पर अंततः सहमति बन गयी।

पूंजीवादी समाचार माध्यमों ने घोषणा कर दी है, ”जनता जीत गयी है“, ”इंडिया जीत गया है“ आदि-आदि। कुछ ऐसा दिखाने की कोशिश की जा रही है कि आज से भ्रष्टाचार हिन्दुस्तान में समाप्त हो जायेगा। यह भी दर्शाया जा रहा है कि जन लोकपाल कानून ऐसा कानून होगा जिसमें भ्रष्टाचार से निपटने की सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान शक्तियां सन्निहित होंगी। अगर ऐसा हो पाता है तो हमारी शुभकामनायें। लेकिन मीडिया के इन डायलागों से भ्रमित होने की जरूरत नहीं है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि प्रस्तावित कानून स्वयं में चाहे कितना शक्तिशाली हो लेकिन अगर प्रस्तावित अधिकरण या एजेंसी में बालाकृष्ण और थॉमस जैसों को बैठा दिया जायेगा तो उस कानून का हस्र क्या होगा?

भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष इतना आसान भी नहीं है। अंततः जनता द्वारा लोकतंत्र में चुनावों के दौरान इससे निपटने की समझदारी जब तक विकसित नहीं होती, चुनावों में जनता भ्रष्टाचारियों को धूल चटाने के लिए कटिबद्ध नहीं होती तब तक यह संघर्ष परवान नहीं चढ़ सकता और हमें इसके लिए संघर्ष जारी रखना है।

वैसे तो भ्रष्टाचार हमेशा से कई रूपों में भारतीय समाज में चला आ रहा है। वह आजादी के बाद और भी फूला फला। लेकिन दो दशक पहले तक मात्रात्मक रूप से यह जितना फल-फूल नहीं पाया था, उससे कई गुना वह पूंजी परस्त आर्थिक नीतियों - ”उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण“ के दौर में फला-फूला और नई बुलन्दियों को छुआ। पिछले दो सालों के अन्दर केन्द्रीय सरकार के अनगिनत संस्थागत भ्रष्टाचार खुल चुके हैं और उससे कहीं कई गुना ज्यादा अभी जनता के सामने आने बाकी हैं। उत्तर प्रदेश की राज्य सरकार के भी कई मामले खुले और कई अभी खुलने बाकी हैं। उन घपलों-घोटालों का नाम बार-बार उद्घृत करने की कोई आवश्यकता नहीं है। न ही संप्रग-2 सरकार में शामिल अथवा बाहर से सहयोग दे रहे सपा-बसपा जैसे राजनीतिक दल भ्रष्टाचार से मुक्त हैं और न ही प्रमुख विपक्षी दल भाजपा और उसके सहयोगियों के ही दामन साफ हैं।

लगातार खुल रहे घपलों और घोटालों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ आम जनता के मध्य गुस्सा पैदा किया था। इस आन्दोलन की इस सतही सफलता ने जनता के एक तबके के मध्य इस गुस्से की धार को कम करने का काम किया है। हमें बहुत ही मुस्तैदी के साथ इस प्रक्रिया को रोकना है। इस आन्दोलन की यह अल्प सफलता कोई मील का पत्थर नहीं है। भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष में मेहनतकश तबकों और आम अवाम की जीत नहीं है जैसाकि मीडिया चिंघाड़-चिंघाड़ कर हमारे ऊपर लादने की कोशिश कर रहा है। चन्द लोगों के आत्म-अनुभूत हो जाने मात्र से न तो भ्रष्टाचार मिट जायेगा और न ही भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष की जरूरत समाप्त हो जायेगी।

संसद पर ट्रेड यूनियनों द्वारा आयोजित 3 लाख मजदूरों की रैली अखबारों की सुर्खियां तो छोड़िए किसी कोने की न्यूज भी नहीं बनतीं। मजदूर-किसानों के बड़े-बड़े संघर्ष छोटी-मोटी न्यूज नहीं बनते। लेकिन किन कारकों से चन्द हजार लोगों का जमाबड़ा पूंजी नियंत्रित समाचार माध्यमों में बड़ी जगह और बड़ा महत्व पा जाता है? आम और निरन्तर संघर्षरत जनता को इसकी गहन मीमांसा की जरूरत है और इस दुरभिसंधि को समझने की जरूरत है। इससे जनता के व्यापक तबकों को इस प्रकार के आन्दोलनों के निहितार्थों को समझने में मदद मिलेगी।

वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था का उप-उत्पाद है भ्रष्टाचार जो अकेले फलता-फूलता नहीं बल्कि महंगाई, बेरोजगारी, बढ़ती असमानता तथा समाज के जातीय, धार्मिक एवं क्षेत्रीय संकीर्ण विभाजन के साथ मेहनतकशों का जीवन दूभर करता है। इन सभी बुराईयों का अन्त वर्तमान व्यवस्था के अन्त में सन्निहित है। इसलिए भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई मूलतः वर्तमान व्यवस्था और उसके अन्यान्य जन विरोधी उप-उत्पादों के खिलाफ अनवरत चलने वाले संघर्ष का ही आवश्यक हिस्सा है और हमें इसके खिलाफ लड़ाई में व्यापक जन लामबंदी जारी रखनी है। हमें असंगठितों को संगठित करने, आम जनता में वर्गीय चेतना को विकसित करने तथा उन्हें वर्तमान व्यवस्था के खिलाफ उनके स्वयं के हित में संघर्ष करने के लिए प्रेरित करना है। मौजूदा भ्रष्ट सरकारों और राजसत्ता के खिलाफ जनता के आक्रोश को ठंडा करने की कारगुजारियों पर हमें नजर रखनी होगी। आमजन को भी आगाह करना होगा।

भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग जारी है और जारी रहेगी.................।

- प्रदीप तिवारी
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बुधवार, 6 अप्रैल 2011

कविता को बनते देखा है


(कवि चन्द्रकान्त देवताले को मराठी का प्रतिष्ठित ‘कुसुमाग्रज राष्ट्रीय सम्मान’ 26 मार्च 2011 को नासिक में विष्णु खरे द्वारा दिया गया। इस अवसर पर इंदौर के साथी विनीत तिवारी द्वारा लिखा गया बेहद अन्तरंग आलेख। विनीत के बारे में कथाकार मित्र शशिभूषण लिखते हैं की वह करते ज्यादा हैं और लिखते कम, तो इन मायनों में यह आलेख खास है।)

रात जब सुबह में बदल रही होती है और धीरे-धीरे आपके आसपास की चीजें अपना काला लिबास छोड़ अपना स्पष्ट आकार और रंग ग्रहण करती हैं, तो वो अनुभव हो चुकी सुबह को देखने के अनुभव के बराबर नहीं, बल्कि अलग होता है। किसी हो चुके को देखना एक अनुभव होता है लेकिन हो चुकने के पहले होने की प्रक्रिया को देखना एक अलग और गाढ़ा अनुभव होता है। शायद इसीलिए नागार्जुन ने घिरे हुए बादल को देखने के बजाय बादल को घिरते देखा।

मेरे लिए देवतालेजी की अनेक कविताएँ उनके बनने की प्रक्रियाओं के दौरान मेरी दोस्त बनीं और इसीलिए वे मेरे लिए उनकी कविता के सामान्य पाठक या आलोचकों के आस्वाद से अधिक या कम भले नहीं, लेकिन थोड़ा अलग मायना ज़रूर रखती हैं। उनसे दोस्ती

किसी यत्न से नहीं हुई। दरअसल देवतालेजी की ही एक कविता है जिसमें वे कहते हैं कि एक कवि को एक जासूस की तरह चौकन्ना होना चाहिए। उनकी उस कविता से प्रेरित होकर मैंने उनकी ही कविताओं की जासूसी शुरू कर दी कि वो कहाँ से पैदा होती हैं, कहाँ से भाषा जुटाती हैं और किस तरह के हथियार या फटकार या पुचकार लेकर पाठकों-श्रोताओं से पेश आती हैं कविता को बनते देखना किसी चित्रकार को चित्र बनाते देखने से या किसी नाटक के कलाकार को रिहर्सल करते देखने जैसा है भी और नहीं भी। फर्क ये है कि कविता को बनते देखने के लिए आपको दृश्य और दृष्टा, यानी कवि के अदृश्य संबंध को महसूस करना होता है।

एक कवि किसी पड़ोसी के घर नीबू माँगने जाए और नीबू न मिले; घर पर कुछ औरतें चंदा माँगने आएँ और उनसे कवि का सामान्य संवाद हो; दो शहरों के बीच अपनी आवाजाही की मुश्किल को एक कवि अपनी सुविधा की ढाल बना रहा हो; पत्नी नियंत्रित पति की हरकतों को एक कवि चुपचाप कनखियों से देख रहा हो; और फिर कुछ दिनों बाद इन्हीं घटनाओं के इर्द-गिर्द कई बार तो नामजद शिकायतों और उलाहनों के साथ देवतालेजी की कविता प्रकट हो जाती थी। मैंने इन सामान्य हरकतों पर नजर रखतीं एक कवि की जासूसी नजरों की जासूसी की और उनकी कविताओं को इस तरह बनते हुए देखा।

दरअसल कुछ महीनों तक हम दोनों लगभग हर शाम इंदौर में उनके घर पर साथ ही बिताया करते थे। कुमार अंबुज के इंदौर रहने के दौरान शुरू हुई रोज की दोस्ताना बैठकें उनके जाने के बाद देवतालेजी और अजीत चौधरी के इंदौर रहते-रहते तक चलती रहीं। इन बैठकों में अजीत चौधरी, आशुतोष दुबे, विवेक गुप्ता, रवीन्द्र व्यास, जितेन्द्र चौहान, प्रदीप मिश्र, उत्पल बैनर्जी आदि बाकी चेहरे बदलते रहते थे पर हम दो चेहरे वही रहते थे। बातचीत भी कविता तक सीमित नहीं रहती थी। अक्सर सांगठनिक चिंताओं से लेकर साहित्य, समाज और साहित्य की तथाकथित सात्विक और मूर्धन्य विभूतियों की खबर ली जाती रहती थी। उसी बीच कभी कमा भाभी का फोन आ जाता था और देवतालेजी उन्हें ये बताकर कि ‘विनीत यहाँ है,’ एक तरह से उन्हें अपनी ओर से निश्चिंत कर दिया करते थे। उन्होंने शायद ही कभी वैसा कोई अकादमिक व्याख्यान दिया हो जो अपने निर्जीव चरित्र की वजह से कुख्यात होते हैं। साहित्य, पर्यावरण या विकास या राजनीति पर उनका संबोधन हो या कविता-पाठ हो, वो हमेशा आत्मीय और रोचक तरह से हड़बड़ाया सा, लेकिन भरपूर चौकन्नेपन के साथ सीधे दिलों में उतर जाने वाला होता रहा है।

देवतालेजी ने कभी अपनी तरफ से किसी को कुछ सिखाने की कोशिश की हो, ऐसा भी मुझे याद नहीं। वो सामने वाले की समझदारी पर इतना यकीन करते हैं कि जिसे जो सीखना होगा, वो मेरे बगैर सिखाये भी मुझसे सीख जाएगा। उसे ही वो जासूसी कहते हैं। खुद उन्होंने भी ऐसे ही सीखा है। बगैर उनके किसी लंबे-चौड़े व्याख्यान और विश्लेषण के उनसे मैंने जो सीखा, उसमें ये बात अहम है कि कविताओं और जीवन के कद को नापने की क्या युक्तियाँ हो सकती हैं, चाहे वो जीवन और कविताएँ खुद की हों या दूसरों की। मैं जब उनसे मिला तब अपनी कविताओं को फेयर करके कहीं भेजने में उन्हें जाने क्या बाधा खड़ी रहती थी।

उसे आलस्य तो नहीं कहा जा सकता। तमाम ज्ञापन, परिपत्र वे बगैर देर किये अपनी खूबसूरत और बल खाती हैंडराइटिंग में फटाक से लिख देते थे लेकिन कविताएँ....। चार-पाँच मर्तबा तो ऐसा हुआ कि फोन करके मुझे बुलाया कि मेरी कविताएँ फेयर कर दे भैया। मैं इसे अपनी जासूसी सीखने में उनका सकारात्मक योगदान मानता हूँ। कविताएँ फेयर करवाते समय या कोई नयी कविता सुनाते समय वो कभी-कभार राय भी पूछ लिया करते थे। अपनी समझ में जो आया, वो अपन ने कह दिया। उनका मूड हुआ तो माना या न मानने का तर्क बता दिया, वर्ना एकाध तुर्श इशारे से समझा दिया कि ‘‘तुमसे पूछ लिया तो ये मत समझो कि ज्यादा होशियार हो।’’

जो लोग उन्हें जानते हैं, वे ये भी जानते हैं कि उनसे कितनी आजादी ली जा सकती है, ये वो ही तय करते हैं। इसी वजह से एकाध बार आपस में दोस्ताना रस्साकशी भी हो गयी। कुछ महीने बीच में बातचीत बंद हो गयी। फिर अंत में भाभी ने एक दिन बुलाकर दोनों की रस्सी के बल ढीले कर दिए। ऐसे ही उनकी एक कविता ने एक और सीख दी। ‘‘मैं नहीं चाहता कि सब मुझे नमस्कार करें और मेरा कोई दुश्मन न हो।’’सबके लिए भले लगने जैसे काम उन्होंने नहीं किये। बेशक उनकी कविताओं में आयी औरत को पाठकों-आलोचकों ने अधिक लक्ष्य किया हो लेकिन मुझे उनकी सीधी राजनीतिक कार्रवाई के आवेग और आवेश में लिखी गईं कविताओं ने ज्यादा आकर्षित किया। पोखरण विस्फोट के मौके पर तमाम संकोची बुद्धिजीवी साहित्यकारों के बीच वे अगली कतार में थे जब उन्होंने बयान दिया कि, ‘‘मैं जानता हूँ कि जो मैं कह रहा हूँ, उससे मुझे राष्ट्रविरोधी और देशद्राही माना जा सकता है, लेकिल मैं ये खतरा उठाकर भी कहना चाहताहूँ कि पोखरण के परमाणु परीक्षण जनविरोधी और दो देशों की जनता को युद्ध के उन्माद में धकेलकर विवेकहीन बनाने की शासकों की साजिश है, और मैं इनकी निंदा करता हूँ।’’ उनकी कविता ‘‘दुर्लभ मौका आपने गँवा दिया महामहिम’’ उसी वक्त उनकी लिखी गयी और मेरी प्रिय कविताओं में से एक है।

उनकी लम्बी कविता ‘‘भूखण्ड तप रहा है’’ का करीब सवा घंटे का अनवरत सामूहिक पाठ हम लोगों ने पोखरणविस्फोट के बाद वाले हिरोशिमा दिवस पर किया और एक भी श्रोता अपनी जगह छोड़कर नहीं गया।

कभी नर्मदा आंदोलन के आंदोलनकारी इंदौर में धरने पर बैठे तो, या कभी सरकार ने उन्हें दमन करके जेलों में ठूँसा तो, कभी इंदौर में तंग बस्तियों को अतिक्रमण के नाम पर उजाड़ा गया तो, साम्प्रदायिकता के खिलाफ प्रदर्शन हुआ तो, और ऐसे अनेक मौकों पर जब तक देवतालेजी इंदौर रहे, वे हमेशा हमारे साथ रहे। वे कहते भी थे कि बचपन में वे कम्युनिस्ट नेता होमी दाजी के चुनाव प्रचार में परचे बाँटा करते थे।

प्रगतिशील लेखक संघ में इंदौर में हम सभी साथियों ने काफी काम किया और 2004 में मध्य प्रदेश का यादगार नवाँ राज्य सम्मेलन भी मुमकिन किया जिसमें ए. के. हंगल, प्रोफेसर रणधीर सिंह, डॉ नामवरसिंह, ज्ञानरंजन, कमलाप्रसाद समेत तमाम हिन्दी के साहित्यकार इकट्ठे हुए। उसके लिए देवतालेजी पूरी जिम्मेदारी के साथ बराबरी से चंदा इकट्ठा करने से लेकर व्यवस्थापन के काम में भी जुटे रहे। यहाँ शायद ये बताना प्रासंगिक होगा कि मेरी और उनकी उम्र में करीब 35 बरस का फासला है। इस फासले का अहसास उन्होंने न काम करते वक्त कभी कराया और न ही मस्ती करते वक्त। बल्कि मस्ती में तो वो मुझसे कमउम्र ही हैं।

उनके बारे में ये नोट मैं सफर के दौरान लिख रहा हूँ और उनकी एक भी कविता की किताब या कविताएँ सिवाय याददाश्त के इस वक्त मेरे पास मौजूद नहीं हैं। फिर भी, मेरे भीतर उनकी कविताओं में मौजूद समुद्र, सेब, चंद्रमा, चाँद जैसी रोटी बेलती माँ, नीबू, बालम ककड़ी बेचतीं लड़कियाँ, नंगे बस्तर को कपड़े पहनाता हाई पॉवर, शर्मिंदा न होने को तैयार महामहिम, पत्थर की बेंच, धरती पर सदियों से कपड़े पछीटती हुई और नहाते हुए रोती हुई औरत, दो बेटियों का पिता, दरद लेती हुई बाई, आशा कोटिया, कमा भाभी, अनु, कनु और चीनू, सबकी याद उमड़ रही है। उनके भीतर मौजूद भूखण्ड की तपन और उसका आयतन, सब उमड़ रहा है। यही मेरे लिए उनकी कविताओं से सच्ची दोस्ती और अच्छी जासूसी का हासिल है।

- विनीत तिवारी

दिल-ए-नादाँ
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सोमवार, 4 अप्रैल 2011

लोकतंत्र का आयात-निर्यात नहीं हो सकता - लीबिया के घरेलू संकट का अमरीकी इलाज नहीं चलेगा

लोकतंत्र का आयात-निर्यात नहीं हो सकता



लीबिया के घरेलू संकट का अमरीकी इलाज नहीं चलेगा


संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद लीबिया को उड़ान क्षेत्र वर्जित क्षेत्र घोषित किया तो लीबिया सरकार ने इसका स्वागत करते हुए तुरन्त युद्ध स्थगन की घोषणा की। इसके कोई भी संकेत नहीं हैं कि लीबिया ने उड़ान-वर्जन घोषणा का उल्लंघन किया। फिर भी सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव का बहाना बनाकर प्रथम दिन ही अमरीकी-ब्रिटिश-फ्रांसीसी धुरी के लड़ाकू विमानों ने ढ़ाई सौ से ज्यादा हमले किये, बम बरसाये और मिसायलें दागीं। युद्धक विमानों द्वारा नागरिक ठिकानों पर हमले किये गये, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गये और हजारों के घायल होने की खबर है। यह लीबिया पर खुल्लम-खुल्ला आक्रमण है। स्पष्ट है कि राष्ट्र संघ के ‘नो फ्लाई जोन’ के प्रस्ताव की मूल भावना का अमरीकी-ब्रिटिश-फ्रांसीसी धुरी ने उल्लंघन करके लीबियायी तेल क्षेत्र को कब्जाने की नीयत से लीबिया पर नंगा साम्राज्यवादी आक्रमण किया है। अरब लीग समेत भारत एवं अन्य देशों ने इस आक्रमण की निन्दा की है और बात-चीत के माध्यम से संकट के समाधान का रास्ता निकालने की अपील की है। भारत की संसद ने भी युद्ध बंदी की अपील की है और लीबिया के घरेलू मामले में विदेशी हस्तक्षेप पर विरोध जताया है।

यह भी ज्ञातव्य है कि लीबिया को उड़ान वर्जित क्षेत्र घोषित करने के प्रस्ताव को सुरक्षा परिषद में भारत, चीन, रूस, जर्मनी और ब्राजील ने समर्थन नहीं किया था, क्योंकि पाश्चात्य देश आक्रमण की योजना पहले ही बना चुके थे। किसी देश के घरेलू मामले में विदेशी हस्तक्षेप करना उस देश की सार्वभौमिक प्रभुसत्ता पर हमला है।

पिछले हफ्ते साउदी अरब के शाह ने अपने देश में जन-प्रदर्शनों को इस्लाम विरूद्ध घोषित कर जुलूस निकालने पर और सभा करने पर पाबंदी लगायी है। भला जनता के हक के लिये प्रदर्शन करना धर्म विरूद्ध कैसे हो सकता है। कोई आश्चर्य नहीं कि जो शासक अपने देश में लोकतंत्र की हत्या करते हैं, वे लीबिया में लोकतंत्र की बहाली के नाम पर विदेशी सैनिक आक्रमण का समर्थन करते हैं। पिछले सप्ताह ही बहरीन में जन प्रतिरोध को कुचलने के लिए साउदी अरब ने अपनी सेना भेजी है। साउदी अरब की सेना ने बहरीन में प्रदर्शनकारियों को टैंकों से रौंदा है और हेलिकाप्टरों से कहर बरसाये हैं। इस पर अमरीका सहित पश्चिमी राष्ट्राध्यक्षों ने चुप्पी साधी है। उन्हें वहां लोकतंत्र का हनन दिखाई नहीं पड़ता। अरब मुल्कों में शासकों द्वारा जनता को प्रताड़ित किया जाता है और शिया समुदाय को शिकार बनाया जा रहा है।

इराक में सद्दाम हुसैन के बहुप्रचारित विनाशक हथियारों का आज तक अता-पता नहीं चला, जिसके बहाने पर उस आक्रमण किया गया था। अफगानिस्तान में ओसामा बिन लादिन पकड़ा नहीं गया। इसल में दोनों ही आक्रमणों का उद्देश्य तेल भंडारों पर कब्जा करना था, सो पूरा हुआ। लीबिया अकेले यूरोपीय देशों को 20 प्रतिशत तेल की आपूर्ति करता है। इसलिये लीबिया पर आक्रमण भी लीबियाई तेल भंडारों को हथियाना होगा।

रही लोकतंत्र की बात, सो अरब मुल्कों में कहीं लोकतंत्र नहीं है, उसी प्रकार लीबिया में भी नहीं। कर्नल मैमर गद्दाफी को समझने के लिए लीबिया का इतिहास-भूगोल भी समझना उपयोगी है। वर्ष 1969 में ब्रिटिश-फ्रांसीसी कठपुतली बादशाह किंग इदरीश को हटाकर कर्नल गद्दाफी ने सत्ता संभाली को राजशाही को समाप्त कर लीबियन अरब रिपब्लिक की स्थापना की। नई सरकार का नारा था: ”आजादी, समाजवाद और एकता“।

मिस्र, लीबिया, ट्यूनीशिया, अलजीरिया और मोरक्को भूमध्य सागर के किनारे फैले उत्तरी अफ्रीकी देश हैं, जो स्वेज नहर की मार्फत अरब सागर से अटलांटिक महासागर तक जुड़े हैं। इस क्षेत्र में इन दिनों लोकतंत्र की बयान बह रही है। इसी क्षेत्र में हजारों वर्षों की प्राचीन सभ्यता फली-फूली थी, जिसके अवशेष मिस्र के पिरामिडों में आज भी देखे जा सकते हैं। तारीख और अंकों की ईजाद इन्हीं लोगों ने की थी। प्राचीनतम ग्रीक भाषा में यूरोप, एशिया और लीबिया की भौगोलिक चर्चा है। ‘लीबिया’ शब्द का अर्थ है ‘आजाद’। प्राचीन मिस्र में यह शब्द लड़ाकू बर्बर जनजाति के लिए प्रयुक्त होता था। लीबिया अर्थात बर्बर जनजाति का मुकाबला मिस्री फराहों से हुआ करता था। कालक्रम में दोनों मिल गये। कोई दो सौ वर्षों तक ईसापूर्व 945 से 730 तक मिस्र पर लीबिया वंश का शासन था।

ईसापूर्व दूसरी सदी में रोमनों ने लीबिया को गुलाम बनाया और बाद के सात सौ वर्षों (146 ई.पू. से 670 ई.) तक रोमनों ने यहां शासन किया। रोमन साम्राज्य के अधीन त्रिपोलितानिया और साइरेनायका की गिनती धनी प्रांतों में की जाने लगी। अलेक्जेंड्रिया और इसके कई बंदरगाह व्यापारिक नगर के रूप में विकसित और प्रसिद्ध हुए। इसी दौर में यहां ईसाई और यहूदी धर्म का प्रसार हुआ और प्रशासनिक मामलों में इस क्षेत्र को लीबिया पुकारा जाने लगा।

इस्लाम के उदय के बाद 647 ई. में लीबिया पर अरबों ने आक्रमण किया। 800 ई. तक यह बगदाद के कब्जे में रहा। बगदाद के खलिफाओं के कमजोर पड़ने के बाद इब्राहिम अधलाब ने लीबिया को स्वतंत्र घोषित किया। फिर 1050-52 ई. में इस पर बानू हिलाल ने कब्जा किया। हिलाल वंश का राज कोई 500 वर्षों तक रहा। बाद में इसे तुर्क आटोमान साम्राज्य ने कब्जाया। ढ़ाई सौ वर्षों तक लीबिया आटोमन साम्राज्य का अंग रहा। फिर 1911 ई. में इटली ने इस पर आक्रमण कर उपनिवेश बनाया। तानाशाह मुसोलिनी ने इसे इटली का प्रांत घोषित किया। द्वितीय विश्व युद्ध में मुसोलिनी के पराभव के बाद लीबिया पर फ्रांस और ब्रिट्रेन ने संयुक्त रूप से कब्जा किया। विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद सोवियत यूनियन की पहल पर मित्र राष्ट्रों की सहमति से संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा लीबिया को 24 सितम्बर 1951 को स्वतंत्र राज्य घोषित किया गया और पुराने बादशाह इदरीश को बुलाकर गद्दी पर बैठाया गया।

राष्ट्र, राष्ट्रीयता और लोकतंत्र के आधुनिक अर्थ में अरब और अफ्रीकी देशों के शासको के चरित्र को नहीं समझा जा सकता है। इन देशों के शासकों और शासन तंत्र में आज भी पुराने कबिलाई तत्व और व्यवहार मौजूद हैं, जो आधुनिक राष्ट्र और राष्ट्रीयता तथा लोकतंत्र के मार्ग में बाधक हैं। इसीलिए इन देशों में सेना की बड़ी भूमिका है। इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इन देशों में फौज की बड़ी भूमिका राष्ट्र और राष्ट्रीयता के निर्माण में भी है।

लीबिया में ही कोई 15 कबिलाई समुदाय हैं और उनके अपने प्रभाव क्षेत्र भी हैं। कद्दाफी टाईटल भी एक कबिला विशेष की पहचान है। मौमर गद्दाफी की विशेषता है कि इसने लीबिया को लोकतंत्र घोषित किया और अरब राष्ट्रीयता का जोरदार प्रचार किया। इराक के सद्दाम हुसैन की तर्ज पर गद्दाफी ने कट्टर इस्लाम से अलग हटकर क्रांति और समाजवाद का नारा बुलन्द किया था। गद्दाफी ने महिलाओं की भर्ती फौज में की और महिला फौज की सुरक्षा टुकड़ी का निर्माण किया।

अन्य अरब देशों की तरह लीबिया में भी शासन की बुनियाद फौज रही है। पाकिस्तान से लेकर इरान, इराक, साउदी अरब, मिस्र, सूडान आदि तमाम देशों में सरकारों का स्थायित्व फौजों पर निर्भर है। लोकतांत्रिक बयार भी इन देशों की फौजों की सहमति से बहती है और मिटती है। इसे हमने पिछले दशकों में अपने पड़ोसी पाकिस्तान और बंगलादेश में भी देखा है। जाहिर है, फौजी शासन की सीमाएं होती हैं। फौजी शासन जनता की आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सकता। कोई दो हजार वर्षों के क्रूर आक्रमणों और विदेशी गुलामी से मुक्त लीबिया का आजाद मिजाज अवाम निश्चय ही किसी विदेशी प्रभुत्व को बर्दाश्त नहीं करेगा और न ही स्वीकार करेगा किसी स्वदेशी तानाशाह को भी।

शांति का नोबल पुरस्कार प्राप्त अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा ने लीबिया पर आक्रमण को अंजाम दिया है। इराक और अफगानिस्तान के बाद यह तीसरा देश है जहां के जनगण विदेशी आक्रमण की मुसीबतों के शिकार बनाये गये हैं। सोवियत यूनियन के ढहने के बाद विश्व जनमत भी मुखर नहीं प्रतीत होता है। लोगों को अभी भी याद है कि किस प्रकार स्वेज नहर संकट के समय सोवियत चेतावनी के सामने इसी अमरीकी-ब्रिटिश-फ्रांसीसी धुरी के हमलावर विमान छः घंटे के अंदर वापस अपने बिलों में समा गये थे।

शांति के हित में सर्वथा उचित होगा कि लीबिया में विदेशी हस्तक्षेप तुरन्त बंद किया जाये। लीबिया के घरेलू मसलों का हल लीबिया की जनता पर छोड़ना चाहिये। अगर इराक और अफगानिस्तान में विदेशी हस्तक्षेप समाधान साबित नहीं हुआ तो यह विदेशी हस्तक्षेप निश्चित ही लीबिया में भी नाकाम साबित होगा।

इस क्षेत्र में विशाल तेल भंडार पर कब्जा करने की साम्राज्यवादी वैश्विक लिप्ता को अनदेखा नहीं किया जा सकता। साम्राज्यवादी ताकतें इराक की तरह लीबिया में भी कबिनाई विरोधाभाष को भड़काकर लीबिया को तोड़ने में लगी हैं। लोकतंत्र आयात-निर्यात की वस्तु नहीं है। लोकतंत्र में देश की जनता अपनी सरकार की किस्मत स्वयं तय करती है। लीबिया में भी बाहर से विदेशी कठपुतली सरकार बनाने की कवायद निश्चय ही नाकाम होगी।
 
- सत्य नारायण ठाकुर
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मंगलवार, 29 मार्च 2011

पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनावों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के प्रत्याशी


1 - कलिम्पोंग दार्जीलिंग विक्रम छेत्री

2 - इटाहार उत्तर दिनाजपुर श्रीकुमार मुखर्जी

3 - कांडी मुर्शिदाबाद एनुल हक

4 - गायघाट (अ.जा.) 24 परगना उत्तर माओंज कांति बिश्वास

5 - हिंगलगंज (अ.जा.) 24 परगना उत्तर आनन्द मंडल

6 - सोनारपुर (दक्षिण) 24 परगना दक्षिण तड़ित चक्रबर्ती

7 - श्रीरामपुर हुगली पार्थसारथी रेज

8 - तामलुक पूर्व मेदिनीपुर जगन्नाथ मित्रा

9 - पांसकुड़ा (पश्चिम) पूर्व मेदिनीपुर निर्मल कुमार बेरा

10 - नन्दीग्राम पूर्व मेदिनीपुर परमानन्द भारती

11 - पतासपुर पूर्व मेदिनीपुर माखन नायक

12 - कांठी (दक्षिण) पूर्व मेदिनीपुर उत्तर कुमार प्रधान

13 - डान्टोन पश्चिमी मेदिनीपुर अरूण महापात्र

14 - मेदिनीपुर पश्चिमी मेदिनीपुर संतोष राणा
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असम विधान सभा चुनावों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के प्रत्याशी


1 - लखीमपुर लखीमपुर अरूप कालिता

2 - नवबोसिया लखीमपुर हरेन बरूआ

3 - बिहपुरिया लखीमपुर निर्दलीय को समर्थन

4 - बोटड्रबा नागांव जतीन भुयान

5 - कालियाबोर नागांव प्रमोद भुयान

6 - बोकाहाट गोलाघाट बोलो बोरा

7 - लाहोवाल डिब्रूगढ़ रतुल गोगोई

8 - दुलियाजान डिबू्रगढ़ पुलक गोगोई

9 - शिवसागर शिवसागर प्रमोद गोगोई

10 - नजीरा शिवसागर द्रुपद बर्गोहेन

11 - टीटाबोर जोरहट कुला दास

12 - मोरियानी जोरहट जोन ताती

13 - दुधानोई (अ.ज.जा.) ग्वालपाड़ा भूपेन्द्र राभा

14 - बिलासीपाड़ा (पश्चिमी) ढूब्री गियासुद्दीन अहमद

15 - बिलासीपाड़ा (पूर्व) ढुब्री बिपिन बर्मन

16 - गोलकगंज ढुब्री मनोरंजन चक्रवर्ती

17 - राताबाड़ी (अ.जा.) करीमगंज रागेन्द्र चौ. दास

18 - करीमगंज (उत्तर) करीमगंज सत्यजीत पॉल पुरकायस्थ

19 - मोरीगांव मोरीगांव मुनिन महन्ता

20 - गुवाहाटी (पूर्व) कामरूप (मेट्रो) उपेन तालुकदार

21 - ढलाई (अ.जा.) कछार ब्रजेन्द्र दास
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केरल विधान सभा चुनावों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के प्रत्याशी


क्रम चुनाव क्षेत्र जिला प्रत्याशी

1 - नेदुमंगद तिरूअनन्तपुरम एड. पी. रामचन्द्रन नायर

2 - चिरायिकिंल (अ.जा.) तिरूअनन्तपुरम वी. शशि

3 - पुनालुर कोल्लम एड. के. राजू

4 - चादया मंगलम कोल्लम मुल्लाक्करन रत्नाकर

5 - करूणागपल्ली कोल्लम सी. दिवाकरन

6 - चतान्नूर कोल्लम जी. एस. जयलाल

7 - अडूर (अ.जा.) पतनाम्थित्ता चित्तायम गोपकुमार

8 - हरिप्पद अलाप्पुझा जी. कृष्णप्रसाद

9 - चेरथला अलाप्पुझा पी. तिलोत्तमन

10 - कंजिराप्पली कोट्टायम एड. सुरेश टी. नायर

11 - वैकॉम (अ.जा.) कोट्टायम के. अजित

12 - पीरिनेडु इदुक्की ई. एस. बिजिमोल

13 - मूवात्तुलुपुझा एर्नाकुलम बाबू पॉल

14 - परूर एर्नाकुलम पन्नीयन रवीन्द्रन

15 - कोडुन्गल्लूर त्रिशूर के. जी. शिवानन्दन

16 - करिप्पामंगलम त्रिशूर वी. एस. सुनील कुमार

17 - ओलुर त्रिशूर राजाजी मैथ्यू थॉमस

18 - नाल्तिका (अ.जा.) त्रिशूर गीता गोपी

19 - त्रिशूर त्रिशूर पी. बालचन्द्रन

20 - पट्टाम्बी पालक्कड़ के. पी. सुरेश राज

21 - मन्नारकाड पालक्कड़ वी. चामुन्नी

22 - इरानाड मालाप्पुरम अशरफ अली कलियात

23 - तिरूरंगाडी मालाप्पुरम एड. के. के. समद

24 - मंजेरी मालाप्पुरम प्रो. पी. गौरी

25 - नादपुरम कोझिकोड ई. के. विजयन

26 - इरिक्कुर कन्नूर एड. पी. संतोष कुमार

27 - कान्हान्गड़ कसरगोड ई. चन्द्रशेखरन
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रविवार, 27 मार्च 2011

तर्क, विनम्रता और दृढ़ता के योग थे कमला प्रसाद


अच्छे आलोचक, साहित्य सर्जक की उनकी भूमिका परसाई रचनावली और वसुधा जैसे प्रगतिशील प्रकाशन से ही स्पष्ट हो जाती है, लेकिन वे इससे कहीं ज्यादा एक कार्यकर्ता और संगठनकर्ता थे। प्रगतिशील लेखक संघ का पूरे देश में विस्तार इसका उदाहरण है। कैंसर के बावजूद सतत कार्य करते कमला प्रसाद 25 मार्च 2011 को हमसे विदा हो गए। मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव विनीत तिवारी ने उन्हें इन शब्दों में याद किया।


उनसे आप लड़ सकते थे, नाराज हो सकते थे, लेकिन वो लड़ाई और नाराजगी कायम नहीं रह सकती थी। वे आलोचक थे इसलिए विश्लेषण उनका सहज स्वभाव था, साथ ही वे संगठनकर्ता थे इसलिए अपनी आलोचना सुनने, खामियों को दुरुस्त करने और दूसरों को गलतियां सुधारने का भरपूर मौका देने का जबर्दस्त संयम उनके पास था। कोई अगर एक अच्छे कार्यक्रम की अस्पष्ट सी आकांक्षा भी प्रकट कर दे, तो वे उसके सामने संसाधनों के प्रबंध से लेकर वक्ता, विषय आदि का विस्तृत खाका खींच निश्चित कर देते थे कि कार्यक्रम हो। सक्रियता और गतिविधि में उनका गहरा यकीन था। वे कहते भी थे कि अगर कुछ हो रहा है तो उसमें कुछ गलत भी हो सकता है और उसे ठीक भी किया जा सकता है। पूरी तरह पवित्र और सही तो वही बने रह सकते हैं जो कुछ करते ही न हों।
मध्य प्रदेश के प्रगतिशील लेखक संघ का महासचिव होने के नाते मेरा अनेक इकाइयों में जाना हुआ। हर जगह छोटे-बड़े अनेक साहित्यकार उनसे अपने परिचय का जिक्र करते। मुझे देखने का तो मौका नहीं मिला लेकिन कुमार अंबुज, हरिओम, योगेश वगैरह से कितनी ही बार जाना कि उन्होंने संगठनकर्ता के नाते कितनी ही असुविधाजनक यात्राएं कीं। कहीं से इकाई बनाने का संकेत मिलते ही शनिवार-रविवार की छुट्टी में चल देते। रिजर्वेशन तो दूर की बात, सीट न मिलने पर घंटों खड़े रहकर भी संगठन के विस्तार की चाह में दूर-दूर दौड़े जाते थे। वे अपना वैचारिक और सांगठनिक गुरू परसाई जी को कहा करते थे और उन्होंने अपने गुरू के नाम और काम को आगे ही बढ़Þाया। नामवर जी से लेकर होशंगाबाद के गोपीकांत घोष तक उन्हें कमांडर कहते थे। कार्यक्रम की योजना वे कमांडर की ही तरह बनाते भी थे और फिर एक साधारण कार्यकर्ता की तरह काम में हिस्सा भी बंटाते थे, लेकिन कभी शायद ही किसी ने उन्हें आदेशात्मक भाषा में बात करते सुना हो। उल्टे हम कुछ साथियों को तो कई बार कुछ अयोग्य व्यक्तियों के प्रति उनकी उतनी विनम्रता भी बर्दाश्त नहीं होती थी। लेकिन सांस्कृतिक संगठन बनाने का काम तुनकमिजाजी और अक्खड़पन से नहीं, बल्कि तर्क, विनय और दृढ़ता के योग से बनता है, यह सीख हमने उनके काम को देखते-देखते हासिल की। उनको याद करते हुए राजेन्द्र शर्मा की याद न आए, मुमकिन ही नहीं। राजेन्द्र शर्मा ने जैसे उनके काम में जितना हो सके उतना हिस्सा बंटाने को ही अपना मिशन बना लिया था।
कमला प्रसाद की प्रतिष्ठा आलोचक के रूप में, लेखक व संपादक के रूप में खूब रही है। लेकिन मेरा मानना है कि उन्होंने सांगठनिक कार्य का चयन अपनी प्राथमिकता के तौर पर कर लिया था और इसलिए अपनी लेखकीय क्षमताओं के भरपूर दोहन के बारे में वे बहुत सजग कभी नहीं रहे। उनका अपना लेखन, किसी हद तक पठन-पाठन भी, संगठन के रोज के कामों के चलते किसी न किसी तरह प्रभावित होता ही था। फिर भी उन्होंने खूब लिखा। 'वसुधा' में उनके संपादकीय तो अनेक रचनाकारों के लिए राजनीतिक व संस्कृतिकर्म के रिश्तों की बुनियादी शिक्षा, और अनेक के लिए रचनात्मक असहमति व लेखन के लिए उकसावा भी हुआ करते थे। लेकिन वे ऐसे लोगों की बिरादरी में थे, जिन्होंने संगठन के लिए, और नए रचनाकार तैयार करने के लिए अपने खुद के लेखक की महत्त्वाकांक्षा को कहीं पीछे छोड़ दिया था।
प्रगतिशील लेखक संगठन का देश भर में विस्तार। पहले हिन्दी क्षेत्र में संगठन को एक साथ सक्रिय करना, फिर उर्दू के लेखकों से संपर्क और हिन्दी-उर्दू की प्रगतिशील ताकतों को इकट्ठा करना, फिर कश्मीर में, उत्तर-पूर्व में, बंगाल में और दक्षिण भारत में संगठन का आधार तैयार करना, और फिर समान विचार वाले संगठनों से भी संवाद कायम करना, इस सबके साथ-साथ 'वसुधा' का संपादन। दरअसल इतना काम आदमी तब ही कर सकता है, जब उसके सामने एक बड़ा लक्ष्य हो। यह एक बड़े विजन वाले व्यक्ति की कार्यपद्धति थी। अभी एक महीना पहले जब कालीकट, केरल में हम लोग राष्ट्रीय कार्य परिषद की बैठक में साथ में थे, तभी देश भर से आए संगठन के प्रतिनिधियों ने बेहद प्यार और सम्मान के साथ उनका 75वां जन्मदिन वहीं सामूहिक रूप से मनाया था। कैंसर का असर उनके शरीर पर भले ही दिखने लगा था, लेकिन कैंसर उनके मन पर बिल्कुल बेअसर था। वहां बैठक में और बाद में केरल से भोपाल तक के सफर के दौरान उनके पास ढेर सारे सांगठनिक कामों की फेहरिस्त थी, ढेर सारी योजनाएं थीं। सांप्रदायिक और साम्राज्यवादी ताकतों से अपने सांस्कृतिक औजारों से किस तरह मुकाबला किया जाए, किस तरह हम समाजवादी दुनिया के निर्माण में एक ईंट लगाने की अपनी भूमिका ठीक से निभा सकें, यह सोचते उनका मन कभी थकता नहीं था।
उनके जाने से उस पूरी प्रक्रिया में ही एक अवरोध आएगा, जो उन्होंने शुरू की थी। लेकिन हम उम्मीद करें कि देश में उनके जोड़े इतने सारे लेखक मिलकर उसे रुकने नहीं देंगे, आगे बढ़ाएंगे, यही उनके जाने के बाद उन्हें अपने साथ बनाए रखने का तरीका है, और यही उनके प्रति श्रद्धांजलि भी।

- विनीत तिवारी
महासचिव, मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ,
संपर्क: 2, चिनार अपार्टमेंट, 172, श्रीनगर एक्सटेंशन, इन्दौर-452018
मोबाइल: ०९८९३१९२७४०

(२७ मार्च २०११ को दैनिक जनवाणी में प्रकाशित)
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