भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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मंगलवार, 9 अगस्त 2011

लो क सं घ र्ष !: आल इण्डिया स्टूडेन्ट्स फेडरेशन का इतिहास: महेश राठी भाग 4

आठवाँ सम्मेलन
ए0आई0एस0एफ0 का आठवाँ सम्मेलन 28 से 31 दिसम्बर 1944 को कलकत्ता में संपन्न हुआ। सम्मेलन में 76 हजार सदस्यों के प्रतिनिधि के तौर पर 987 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। सम्मेलन को संबोधित करते हुए डाॅ0 बी0सी0 राॅय और सरोजिनी नायडू ने ए0आई0एस0एफ0 के राहत कार्यों की भरपूर प्रशंसा की। सम्मेलन के बाद स्वतः स्फूर्त एवं संगठित आंदोलनों की एक लम्बी श्रृंखला ही मानो शुरू हो गई। स्टूडेन्ट्स फैडरेशन ने कई छात्र संगठनों से मिलकर 26 जनवरी 1945 को स्वतंत्रता दिवस का आयोजन किया। संगठन ने कांग्रेस नेताओं की रिहाई के उत्साह में देश के कई शहरों में कार्यक्रमों का आयोजन किया। वहीं कूच बिहार में 21 अगस्त 1945 को छात्रों पर हमले के विरोध स्वरूप कलकत्ता में एक जनसभा आयेजित की गई जिसमें 35 हजार से अधिक छात्रों ने भाग लिया।
छात्र आंदोलन का उभार 1944-45
हिटलर पर सोवियत संघ की विजय और विश्वयुद्ध की समाप्ति के साथ ही पूरी दुनिया के गुलाम देशों में सम्राज्यवाद से मुक्ति का आंदोलन निर्णायक रूप से तेज हो गया।
विश्वयुद्ध के फौरन बाद आजाद हिंद फौज के तीन अधिकारियांे सहगल, ढिल्लो और शाहनवाज पर ऐतिहासिक मुकदमा शुरू हुआ। इस मुकदमें के विरोध और अधिकारियों की आजादी के लिए पूरे देश में आन्दोलन शुरू हो गए। ए0आई0एस0एफ0 के आवाह्न पर देश भर में छात्रों ने विरोध प्रदर्शनों का आयोजन किया।
इसी बीच छात्र आंदोलनों का संगठन केवल देश के पैमाने पर ही नहीं दुनिया के स्तर पर भी खड़ा हो रहा था और इसमें भी ए0आई0एस0एफ0 ने मजबूत भागेदारी दर्ज कराई। नवम्बर 1945 में लंदन में वल्र्ड फैडरेशन आॅफ डेमोक्रेटिक यूथ का गठन हुआ जिसमें ए0आई0एस0एफ0 की तरफ से मिस के बूमला ने शिरकत करते हुए
सर्वाधिक मतों के साथ कार्यकारिणी के चुनाव में जीत दर्ज की।
नौंवाँ सम्मेलन
ए0आई0एस0एफ0 के नौंवें सम्मेलन की शुरूआत 20 जनवरी 1946 को आन्ध्र प्रदेश के गंुटूर में हुई। जिसमें देश भर से 571 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। सम्मेलन स्थल का नाम अजाद हिंद फौज के समर्थन में चले आंदोलनों के समय शहीद हुए रामेश्वर के नाम पर रखा गया। इसके साथ ही सम्मेलन ने बम्बई मिल मालिकों द्वारा कत्ल करा दिए गए ए0आई0एस0एफ0 मुखपत्र के प्रबन्धक बी0 गोलवला के लिए शोक भी प्रकट किया। फरवरी 1946 में नौसैनिक विद्रोह हुआ जिसके समर्थन में छात्र और मजदूर भी सड़कों पर उतर आए। नौसैनिक विद्रोह के समर्थन में ए0आई0एस0एफ0 से संबद्ध बम्बई छात्र यूनियन ने एक हैण्डबिल निकाल कर हड़ताल का आवाह्न किया और यूनियन के इस आवाह्न पर भारी संख्या में छात्र मजदूरों और नौसैनिकों के समर्थन में आए। आजाद हिंद फौज के कैप्टन रशीद की गिरफ्तारी और जेल के विरोध में एक जनांदोलन बंगाल में उठ खड़ा हुआ। बंगाल प्रांतीय स्टूडेन्ट्स फैडरेशन ने फरवरी 1946 में राज्य भर में प्रदर्शनों और बैठकों की झड़ी लगा दी। 25 जुलाई 1946 को संगठन ने बंगाल एसेम्बली के सामने राजनैतिक कैदियों की रिहाई के लिए बड़ा प्रदर्शन किया जिसमें 15 हजार छात्रों ने भाग लिया। मार्च 1946 में ब्रिटिश सरकार ने तीन सदस्यीय कैबिनेट मिशन का गठन किया। इस मिशन का उद्देश्य राष्ट्रीय नेताओ के बीच मतभेदों को सुलझाने और डोमिनियन स्टेट्स की अपनी इच्छा को लागू करने का था। कैबिनेट मिशन अपने मकसद में बेशक असफल रहा मगर सरकार ने मई 1946 में एक योजना घोषित कर दी। योजना से प्रांतों और रियासतों में डोमिनियन स्टेट्स लागू हो गया। अंग्रेजों ने भारत विभाजन की योजना तैयार कर ली थी साथ ही साम्प्रदायिक आधार पर चुनाव की भी तैयारी हो रही थी। चुनावों के बाद मुस्लिम लीग ने अंतरिम सरकार में शामिल होने से इंकार कर दिया। साथ ही मुस्लिम लीग ने देश विभाजन और पाकिस्तान बनाने की सार्वजनिक घोषणा करते हुए उसके लिए खुला संघर्ष छेड़ने का एलान भी कर दिया। अन्त में अगस्त 1946 में जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन हुआ और सितम्बर 1946 में मुस्लिम लीग भी इसमें शामिल हो गई परन्तु उसने एसेम्बली का बहिष्कार जारी रखा। ए0आई0एस0एफ0 अंग्रेजों की साम्प्रदायिक विभाजन की कुचेष्टा और इससे बचाव के लिए जन आंदोलनों और जन लामबन्दी की जरूरत को पहले ही रेखांकित कर चुका था।
अन्तर्राष्ट्रीय छात्र सम्मेलन 31 अगस्त 1946 को चेकोस्लोवाकिया की राजधानी प्राग में हुई। इसमें दुनिया भर के 39 देशों से 300 छात्रों ने भाग लिया। भारत का प्रतिनिधित्व ए0आई0एस0एफ0 की तरफ से गौतम चटोपाध्याय ने किया। सम्मेलन ने इंटरनेशनल यूनियन और स्टूडेन्ट्स (आई0यू0एस0) की स्थापना की। इस बीच शिक्षा के लोकतंत्रीकरण के विषय पर ए0आई0एस0एफ0 ने एक विशेष सम्मेलन का आयोजन किया जिसमें इस विषय पर एक ऐतिहासिक महत्व का दस्तावेज भी पेश किया गया।
1946 में देश के कई भागों में साम्प्रदायिक दंगे भड़क उठे। जिसमें हिंदू-मुसलमान दोनों पक्षों के निर्दोष लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। देश ने पहली बार इस स्तर के नरसंहार को देखा था। इन दंगों की पटकथा ब्रिटिश साम्राज्यवाद के मंसूबो के साथ मिलकर मुस्लिम लीग, आर0एस0एस0, हिंदू महासभा और अन्य साम्प्रदायिक संगठनों ने लिखी थी। दंगों की इस आग में कलकत्ता, बिहार और बम्बई जैसे कई महत्वपूर्ण शहर सुलग उठे। नोआबाली ने इस अभूतपूर्व नरसंहार के सबसे अमानवीय रूप को देखा। बावजूद इसके कम्युनिस्ट और कांग्रेस के धर्मनिरपेक्ष लोग दंगों की रोकथाम के लिए सामने आए। ए0आई0एस0एफ0 ने दंगांे की परवाह नहीं करते हुए सक्रियता के साथ राहत कार्यो में भाग लिया। यह ए0आई0एस0एफ0 ही था जिसने दंगांे की परवाह नहीं करते हुए भी दंगों की आग के बीच दिल्ली में हिंदू-मुस्लिम एकता यात्रा की पहल की। ए0आई0एस0एफ0 ने ही बंगाल में दंगा राहत फण्ड की शुरुआत की।
दसवाँ सम्मेलन
ए0आई0एस0एफ0 के दसवंे सम्मेलन की शुरुआत 3 जनवरी 1947 को दिल्ली में हुई जिसमें 1500 प्रतिनिधियों और पर्यवेक्षकों ने भाग लिया। सम्मेलन के फौरन बाद ए0आई0एस0एफ0 ने 21 जनवरी को वियतनाम दिवस के रूप में मनाया। आॅल इण्डिया स्टूडेन्ट्स कांग्रेस और मुस्लिम स्टूडेन्ट्स लीग ने भी कलकत्ता में इसका स्वागत किया। कलकत्ता के 50 हजार छात्रों ने इस दिन हड़ताल में भाग लिया। शान्तिपूर्ण प्रदर्शन पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया। छात्रों का गुस्सा फूट पड़ा और वे सड़कों पर उतर आए। भारी विरोध प्रदर्शन के साथ रैली हुई जिस पर पुलिस ने गोलीबारी की जिससे दो छात्र प्रदर्शन के साथ स्थल पर ही शहीद हो गए। अगले ही दिन सरकार को भारी विरोध प्रदर्शनों और हड़ताल का सामना करना पड़ा। विरोध प्रदर्शनों और हड़तालों का यह दौर पूरे फरवरी माह चलता रहा। वियतनाम स्टूडेन्ट्स एसोसिएशन ने अपने मार्च सत्र में मारे गए छात्रों की याद में विशेष प्रस्ताव पारित किया।

(क्रमश:)

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लो क सं घ र्ष !: आल इण्डिया स्टूडेन्ट्स फेडरेशन का इतिहास: महेश राठी भाग 4

आठवाँ सम्मेलन
ए0आई0एस0एफ0 का आठवाँ सम्मेलन 28 से 31 दिसम्बर 1944 को कलकत्ता में संपन्न हुआ। सम्मेलन में 76 हजार सदस्यों के प्रतिनिधि के तौर पर 987 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। सम्मेलन को संबोधित करते हुए डाॅ0 बी0सी0 राॅय और सरोजिनी नायडू ने ए0आई0एस0एफ0 के राहत कार्यों की भरपूर प्रशंसा की। सम्मेलन के बाद स्वतः स्फूर्त एवं संगठित आंदोलनों की एक लम्बी श्रृंखला ही मानो शुरू हो गई। स्टूडेन्ट्स फैडरेशन ने कई छात्र संगठनों से मिलकर 26 जनवरी 1945 को स्वतंत्रता दिवस का आयोजन किया। संगठन ने कांग्रेस नेताओं की रिहाई के उत्साह में देश के कई शहरों में कार्यक्रमों का आयोजन किया। वहीं कूच बिहार में 21 अगस्त 1945 को छात्रों पर हमले के विरोध स्वरूप कलकत्ता में एक जनसभा आयेजित की गई जिसमें 35 हजार से अधिक छात्रों ने भाग लिया।
छात्र आंदोलन का उभार 1944-45
हिटलर पर सोवियत संघ की विजय और विश्वयुद्ध की समाप्ति के साथ ही पूरी दुनिया के गुलाम देशों में सम्राज्यवाद से मुक्ति का आंदोलन निर्णायक रूप से तेज हो गया।
विश्वयुद्ध के फौरन बाद आजाद हिंद फौज के तीन अधिकारियांे सहगल, ढिल्लो और शाहनवाज पर ऐतिहासिक मुकदमा शुरू हुआ। इस मुकदमें के विरोध और अधिकारियों की आजादी के लिए पूरे देश में आन्दोलन शुरू हो गए। ए0आई0एस0एफ0 के आवाह्न पर देश भर में छात्रों ने विरोध प्रदर्शनों का आयोजन किया।
इसी बीच छात्र आंदोलनों का संगठन केवल देश के पैमाने पर ही नहीं दुनिया के स्तर पर भी खड़ा हो रहा था और इसमें भी ए0आई0एस0एफ0 ने मजबूत भागेदारी दर्ज कराई। नवम्बर 1945 में लंदन में वल्र्ड फैडरेशन आॅफ डेमोक्रेटिक यूथ का गठन हुआ जिसमें ए0आई0एस0एफ0 की तरफ से मिस के बूमला ने शिरकत करते हुए
सर्वाधिक मतों के साथ कार्यकारिणी के चुनाव में जीत दर्ज की।
नौंवाँ सम्मेलन
ए0आई0एस0एफ0 के नौंवें सम्मेलन की शुरूआत 20 जनवरी 1946 को आन्ध्र प्रदेश के गंुटूर में हुई। जिसमें देश भर से 571 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। सम्मेलन स्थल का नाम अजाद हिंद फौज के समर्थन में चले आंदोलनों के समय शहीद हुए रामेश्वर के नाम पर रखा गया। इसके साथ ही सम्मेलन ने बम्बई मिल मालिकों द्वारा कत्ल करा दिए गए ए0आई0एस0एफ0 मुखपत्र के प्रबन्धक बी0 गोलवला के लिए शोक भी प्रकट किया। फरवरी 1946 में नौसैनिक विद्रोह हुआ जिसके समर्थन में छात्र और मजदूर भी सड़कों पर उतर आए। नौसैनिक विद्रोह के समर्थन में ए0आई0एस0एफ0 से संबद्ध बम्बई छात्र यूनियन ने एक हैण्डबिल निकाल कर हड़ताल का आवाह्न किया और यूनियन के इस आवाह्न पर भारी संख्या में छात्र मजदूरों और नौसैनिकों के समर्थन में आए। आजाद हिंद फौज के कैप्टन रशीद की गिरफ्तारी और जेल के विरोध में एक जनांदोलन बंगाल में उठ खड़ा हुआ। बंगाल प्रांतीय स्टूडेन्ट्स फैडरेशन ने फरवरी 1946 में राज्य भर में प्रदर्शनों और बैठकों की झड़ी लगा दी। 25 जुलाई 1946 को संगठन ने बंगाल एसेम्बली के सामने राजनैतिक कैदियों की रिहाई के लिए बड़ा प्रदर्शन किया जिसमें 15 हजार छात्रों ने भाग लिया। मार्च 1946 में ब्रिटिश सरकार ने तीन सदस्यीय कैबिनेट मिशन का गठन किया। इस मिशन का उद्देश्य राष्ट्रीय नेताओ के बीच मतभेदों को सुलझाने और डोमिनियन स्टेट्स की अपनी इच्छा को लागू करने का था। कैबिनेट मिशन अपने मकसद में बेशक असफल रहा मगर सरकार ने मई 1946 में एक योजना घोषित कर दी। योजना से प्रांतों और रियासतों में डोमिनियन स्टेट्स लागू हो गया। अंग्रेजों ने भारत विभाजन की योजना तैयार कर ली थी साथ ही साम्प्रदायिक आधार पर चुनाव की भी तैयारी हो रही थी। चुनावों के बाद मुस्लिम लीग ने अंतरिम सरकार में शामिल होने से इंकार कर दिया। साथ ही मुस्लिम लीग ने देश विभाजन और पाकिस्तान बनाने की सार्वजनिक घोषणा करते हुए उसके लिए खुला संघर्ष छेड़ने का एलान भी कर दिया। अन्त में अगस्त 1946 में जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन हुआ और सितम्बर 1946 में मुस्लिम लीग भी इसमें शामिल हो गई परन्तु उसने एसेम्बली का बहिष्कार जारी रखा। ए0आई0एस0एफ0 अंग्रेजों की साम्प्रदायिक विभाजन की कुचेष्टा और इससे बचाव के लिए जन आंदोलनों और जन लामबन्दी की जरूरत को पहले ही रेखांकित कर चुका था।
अन्तर्राष्ट्रीय छात्र सम्मेलन 31 अगस्त 1946 को चेकोस्लोवाकिया की राजधानी प्राग में हुई। इसमें दुनिया भर के 39 देशों से 300 छात्रों ने भाग लिया। भारत का प्रतिनिधित्व ए0आई0एस0एफ0 की तरफ से गौतम चटोपाध्याय ने किया। सम्मेलन ने इंटरनेशनल यूनियन और स्टूडेन्ट्स (आई0यू0एस0) की स्थापना की। इस बीच शिक्षा के लोकतंत्रीकरण के विषय पर ए0आई0एस0एफ0 ने एक विशेष सम्मेलन का आयोजन किया जिसमें इस विषय पर एक ऐतिहासिक महत्व का दस्तावेज भी पेश किया गया।
1946 में देश के कई भागों में साम्प्रदायिक दंगे भड़क उठे। जिसमें हिंदू-मुसलमान दोनों पक्षों के निर्दोष लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। देश ने पहली बार इस स्तर के नरसंहार को देखा था। इन दंगों की पटकथा ब्रिटिश साम्राज्यवाद के मंसूबो के साथ मिलकर मुस्लिम लीग, आर0एस0एस0, हिंदू महासभा और अन्य साम्प्रदायिक संगठनों ने लिखी थी। दंगों की इस आग में कलकत्ता, बिहार और बम्बई जैसे कई महत्वपूर्ण शहर सुलग उठे। नोआबाली ने इस अभूतपूर्व नरसंहार के सबसे अमानवीय रूप को देखा। बावजूद इसके कम्युनिस्ट और कांग्रेस के धर्मनिरपेक्ष लोग दंगों की रोकथाम के लिए सामने आए। ए0आई0एस0एफ0 ने दंगांे की परवाह नहीं करते हुए सक्रियता के साथ राहत कार्यो में भाग लिया। यह ए0आई0एस0एफ0 ही था जिसने दंगांे की परवाह नहीं करते हुए भी दंगों की आग के बीच दिल्ली में हिंदू-मुस्लिम एकता यात्रा की पहल की। ए0आई0एस0एफ0 ने ही बंगाल में दंगा राहत फण्ड की शुरुआत की।
दसवाँ सम्मेलन
ए0आई0एस0एफ0 के दसवंे सम्मेलन की शुरुआत 3 जनवरी 1947 को दिल्ली में हुई जिसमें 1500 प्रतिनिधियों और पर्यवेक्षकों ने भाग लिया। सम्मेलन के फौरन बाद ए0आई0एस0एफ0 ने 21 जनवरी को वियतनाम दिवस के रूप में मनाया। आॅल इण्डिया स्टूडेन्ट्स कांग्रेस और मुस्लिम स्टूडेन्ट्स लीग ने भी कलकत्ता में इसका स्वागत किया। कलकत्ता के 50 हजार छात्रों ने इस दिन हड़ताल में भाग लिया। शान्तिपूर्ण प्रदर्शन पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया। छात्रों का गुस्सा फूट पड़ा और वे सड़कों पर उतर आए। भारी विरोध प्रदर्शन के साथ रैली हुई जिस पर पुलिस ने गोलीबारी की जिससे दो छात्र प्रदर्शन के साथ स्थल पर ही शहीद हो गए। अगले ही दिन सरकार को भारी विरोध प्रदर्शनों और हड़ताल का सामना करना पड़ा। विरोध प्रदर्शनों और हड़तालों का यह दौर पूरे फरवरी माह चलता रहा। वियतनाम स्टूडेन्ट्स एसोसिएशन ने अपने मार्च सत्र में मारे गए छात्रों की याद में विशेष प्रस्ताव पारित किया।

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सोमवार, 8 अगस्त 2011

लो क सं घ र्ष !: आल इण्डिया स्टूडेन्ट्स फेडरेशन का इतिहास: महेश राठी भाग 3

ए0आई0एस0एफ0 की स्थापना के बाद का समय
सम्मेलन की स्थापना के बाद 1936 और 1937 का साल छात्रों की अभूतपूर्व गतिविधियों और सक्रियता का दौर था। इन छात्र गतिविधियों को कुचलने के लिए फैजाबाद, कानपुर और अलीगढ़ में कई छात्रों को निलम्बित कर दिया गया। इस कार्यवाही ने छात्र आन्दोलन और उनकी गतिविधियों को और हवा दी जिससे लगातार धरने, प्रदर्शनों और छात्र हड़तालों का लम्बा सिलसिला शुरू हो गया। आन्दोलन की इस अविराम आँधी के बाद 1937 में होने वाले चुनावों में ए0आई0एस0एफ0 ने कांग्रेस का खुलकर समर्थन किया जिससे कांग्रेस को चुनावों में जीत हासिल हुई।
छात्र नेता रमेश चन्द्र सिन्हा और जे0जे0 भट्टाचार्य की गिरफ्तारी के विरोध में यू0पी0 के छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किया। गिरफ्तारी का विरोध करते हुए और अपनी 37 सूत्री माँगों के लिए प्रदर्शन करते हुए 15 हजार छात्र उस समय के यू0पी0 के मुख्यमंत्री गोविन्द बल्लभ पन्त के निवास के सामने पहुँच गए। इसी तरह के छात्र आंदोलन कलकत्ता, मद्रास सहित देश के अन्य भागों में भी दिखाई दिए। स्टूडेन्ट्स फैडरेशन ने नवम्बर 1936 से अपने मुखपत्र स्टूडेन्ट्स ट्रिब्यून का प्रकाशन शुरू किया तो वहीं मुम्बई से स्टूडेन्ट्स काॅल और कलकत्ता से छात्र अभिजन का प्रकाशन शुरू हुआ। ए0आई0एस0एफ0 के गठन ने केवल भारत में ही नहीं विदेशों में शिक्षा ग्रहण कर रहे भारतीय छात्रों को भी संगठन बनाने के लिए प्रेरित किया। यूरोप में पढ़ने वाले छात्रों द्वारा 1937 में ऐसी ही एक कोशिश आॅक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज मजलिस की पहल पर एक सम्मेलन के रूप में लंदन में हुई। इस सम्मेलन में दस ब्रिटिश विश्वविद्यालयों के अलावा कई छात्र संगठनांे एवं भारत से आए बिरादराना संगठनों के छात्र नेताओं ने हिस्सा लिया। यहाँ पर ब्रिटेन और आयरलैंड में शिक्षारत भारतीय छात्रों का एक फैडरेशन बनाने का निर्णय लिया गया इसके अलावा भारत में ए0आई0एस0एफ0 से संपर्क बनाने का भी फैसला हुआ।
तीसरा ए0आई0एस0एफ0 सम्मेलन
ए0आई0एस0एफ0 का तीसरा सम्मेलन 1938 में 1 से 3 जनवरी तक मद्रास में आयोजित किया गया। इस बीच ए0आई0एस0एफ0 का फैलाव दूर दराज के गाँवांे और कई प्रांतों में भी हुआ। ए0आई0एस0एफ0 के काम का फैलाव राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर तेजी से हुआ। तीसरे सम्मेलन ने अंसार हरवानी को महासचिव के तौर पर चुना।
चैथा सम्मेलन
ए0आई0एस0एफ0 एक व्यापक जनाधार वाले छात्र आंदोलन के रूप में उभर रहा था। ए0आई0एस0एफ0 का चैथा सम्मेलन 1 से तीन जनवरी 1939 को कलकत्ता में आयोजित किया गया। चालीस हजार से अधिक सदस्य छात्रों के प्रतिनिधि के रूप में देश भर से इस सम्मेलन में 800 छात्रों ने भाग लिया। इसके अलावा 1500 और छात्रों ने पर्यवेक्षक के रूप मंे सम्मेलन की तमाम कार्यवाही में भाग लिया। एम0एल0 शाह सम्मेलन में नए महासचिव चुने गए।
1939 में ए0आई0एस0एफ0 ने कई देशव्यापी आंदोलनों का नेतृत्व किया। उड़ीसा के मेडिकल छात्रों की माँगांे को लेकर राज्य में बडे़ अंादोलन की शुरुआत हुई जिसका बाद में देश भर में प्रभाव नजर आया। छात्रों ने प्रदर्शन, हड़ताल और सत्याग्रह जैसे विरोध के सभी तरीकों का प्रयोग किया। अन्ततोगत्वा प्रशासन को छात्रों की माँगों के समक्ष झुकना पड़ा। नाजीवाद और फासीवाद के बढ़ते खतरे के बीच 1 सितम्बर 1939 को दूसरे विश्वयुद्ध की शुरुआत हुई। ब्रिटिश सरकार ने बगैर भारतीय नेताआंे से मंत्रणा किए भारत के युद्ध में शामिल होने की घोषणा कर दी। अंग्रेजांे की इस घोषणा का पूरे देश में जोरदार विरोध हुआ और बम्बई के मजदूरों ने 2 अक्टूबर 1939 को ऐतिहासिक युद्ध विरोधी हड़ताल का आयोजन किया। इस ऐतिहासिक हड़ताल के समर्थन मंे छात्रों ने 8-9 अक्टूबर 1939 को नागपुर में एक बड़ी रैली और कन्वेंशन का आयोजन किया। इस रैली की अध्यक्षता सुभाष चन्द्र बोस और स्वामी सहजानन्द सरस्वती ने की।
पाँचवाँ सम्मेलन
विश्वयुद्ध की इसी छाया के बीच 1-2 जनवरी 1940 को ए0आई0एस0एफ0 का पाँचवाँ सम्मेलन दिल्ली में आयोजित किया गया। सम्मेलन ने युद्ध की कठोर शब्दों में निन्दा करते हुए 26 जनवरी को भारत का स्वतंत्रता दिवस मनाने का निर्णय किया। एम0एल0 शाह को फिर से संगठन का महासचिव निर्वाचित किया गया।
भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के नेताओं ने युद्ध के दौरान एक प्रोविजनल सरकार बनाने की माँग की जिसे ब्रिटिश सरकार ने खारिज कर दिया। इसके जवाब में ब्रिटिश सरकार 8 अगस्त 1940 को 1 अगस्त प्रस्ताव लेकर आ गई। ए0आई0एस0एफ0 ने पहले भी इस प्रकार के डिफेंस आॅफ आॅर्डिनेंस का बंगाल में विरोध किया था। इसके अलावा ए0आई0एस0एफ0 ने कपड़ा मजदूरांे की युद्ध विरोधी 1940 की बम्बई हड़ताल का बेहद सक्रिय ढ़ंग से समर्थन किया था। इसके बाद देशभर में विरोध प्रदर्शनों, हड़तालों और विरोधांे का दौर शुरू हुआ। छात्र भी बड़ी संख्या में ब्रिटिश सरकार के इस विरोध के समर्थन में आए। ए0आई0एस0एफ0 की एक बुकलेट ‘‘रोल आॅफ स्टूडेन्ट्स इन एन्टी इम्पीरियस्टि स्ट्रगल’’ भी अंग्रेज सरकार ने जब्त कर लिया।
ए0आई0एस0एफ0 का छठाँ सम्मेलन
ए0आई0एस0एफ0 का छठा सम्मेलन एक महत्वपूर्ण घटना थी। यह समय संगठन के लिए बेहद कठिन एवं निर्णायक था। ए0आई0एस0एफ0 के इस ऐतिहासिक सम्मेलन का आयोजन 25-26 दिसम्बर 1940 को नागपुर में किया गया। कई तरह की राजनैतिक धाराओं और राष्ट्रवादी आंदोलनों के साँझे छात्र आन्दोलन के अन्तर्विरोध इस सम्मेलन के दौरान उभर कर सतह पर आ गए थे। लम्बे समय के वैचारिक संघर्ष अब एक नए निर्णायक मुक़ाम पर पहँुच चुके थे। वामपंथी, दक्षिणपंथी, मध्यमार्गी और कई अन्य राजनैतिक रुझान वाले इसी छठें सम्मेलन में कई तरह के मुद्दों के साथ ही राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय सवालों पर बहस में उलझ गए थे। ब्रिटिश सरकार के रुख से लेकर राष्ट्रीय सरकार के गठन के कांग्रेस के प्रस्ताव विश्वयुद्ध के प्रति और उसके चरित्र को लेकर सभी के अपने विचार थे। गांधीवादी, माक्र्सवादी, सोशलिस्ट, कांग्रेसी सोशलिस्ट से लेकर रायवादी और ट्राटस्कीवादियों सहित सभी के इन परिस्थितियांे को लेकर अपने-अपने विचार थे। हालाँकि छात्रों का एक बड़ा हिस्सा इन विचारधाराओं से इतर छात्रों की समस्याआंे को लेकर चिन्तित था।
अन्ततोगत्वा सम्मेलन के प्रतिनिधि दो हिस्सों में बँट गए। एक हिस्सा जो अति राष्ट्रवादी था और दूसरा हिस्सा जो कम्युनिस्टों से संबंधित था और सांगठनिक एवं राजनैतिक तौर पर अधिक स्पष्ट भी था। दोनांे गुटों ने राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय सवालों को लेकर अपना-अपना कठोर रुख कायम कर लिया। इस गुटबाजी के कारण नागपुर सम्मेलन में ए0आई0एस0एफ0 दो भागों में बँट गया। एक हिस्सा जिसने वामपंथी नेता एम0 फारूकी को अपना महासचिव चुना तो दूसरे हिस्से ने एम0एल0 शाह को अपना महासचिव चुना। प्रो0 सतीश कालेकर ने दोनांे गुटों को मिलाने की भरपूर कोशिश की मगर दोनों गुटों के कठोर रुख के कारण उन्हंे असफलता ही हाथ लगी। इस फूट के कारण देश का छात्र आंदोलन दो फाड़ हो गया और जिसके कारण छात्रों में काफी निराशा और असंतोष था।
इसी बीच 22 जून 1941 में नाजी जर्मनी ने समाजवादी सोवियत संघ पर बड़ा हमला कर दिया। अब द्वितीय विश्वयुद्ध में एक गुणात्मक परिवर्तन आ चुका था। हिटलर के फासीवादी इरादांे के खिलाफ लड़ाई में ब्रिटेन भी सोवियत संघ के साथ शामिल हो गया। दुनिया में पहले सर्वहारा राज्य पर आक्रमण के साथ ही अब यह संघर्ष साम्राज्यवादी अन्तर्विरोधों के संघर्ष से बदलकर सर्वहारा पर हमले और नाजीवादी हमले से बचाव का एक जनयुद्ध बन चुका था।
सातवाँ सम्मेलन
ऐसी परिस्थितियांे में ए0आई0एस0एफ0 का सातवाँ सममेलन 31 दिसम्बर 1941 को शुरू हुआ। विश्वयुद्ध के चरित्र पर लम्बी और बड़ी बहस के बाद संगठन ने नाजी जर्मनी के खिलाफ युद्ध की किसी भी कोशिश के समर्थन करने का प्रस्ताव पारित किया। विश्वयुद्ध में आए इस गुणात्मक परिवर्तन और नाजी जर्मनी के खिलाफ सोवियत संघ के समर्थन का आवाह्न संगठन की बड़ी उपलब्धि थी। दरअसल नाजी जर्मनी के सामने इस युद्ध में सोवियत संघ ही सबसे बड़ा खतरा और बाधा थी, अब सोवियत का समर्थन ही दुनिया में फासीवाद के खतरे को रोक सकता था। इतिहास गवाह है कि ऐसा हुआ भी। ए0आई0एस0एफ0 के इस आवह्न के बावजूद सरकार ने संगठन की राह में रुकावटें खड़ी करना जारी रखा। ए0आई0एस0एफ0 ने एक राष्ट्रीय सरकार गठित करने की माँग रखी। संगठन के कुछ राष्ट्रवादी छात्रों ने जापानी सेनाआंे के सामने समर्पण की बात भी रखी जिसे ए0आई0एस0एफ0 ने आत्मघाती कदम कह कर एकदम खारिज कर दिया। फासीवादी खतरे का सामना करने के लिए ए0आई0एस0एफ0 ने देशव्यापी सघन अभियान चलाया। फासीवादी खतरे के खिलाफ इस मुहिम के तहत संगठन ने 15 मई 1942 को दिल्ली में एक सफल डिफेंस कंवेंशन का भी आयोजन किया जिसके फौरन बाद 9 अगस्त 1942 से कांग्रेस ने ‘‘भारत छोड़ो‘‘ आंदोलन का आवाह्न कर दिया।
पूरी दुनिया में फासीवादी खतरे और भारतीय सीमा पर खड़ी हिटलर की सहयोगी जापानी फौजों के कारण ए0आई0एस0एफ0 ‘‘भारत छोड़ो‘‘ आंदोलन और उसके समय से सहमत नहीं था। बावजूद इसके ए0आई0एस0एफ0 ने आंदोलन के दौरान गिरफ्तार राजनेताआंे की रिहाई के लिए देशव्यापी आन्दोलन चलाया। इसी के साथ ए0आई0एस0एफ0 ने जापानी खतरे का सामना करने के लिए आसाम, बंगाल और मणिपुर के सीमावर्ती इलाकों में सशस्त्र और बिना हथियारांे के जत्थों का गठन किया।
1943 में देश बडे़ अकाल की चपेट में आ चुका था। बम्बई, आसाम, बंगाल, उड़ीसा, बिहार और मद्रास आदि बुरी तरह इस अकाल की चपेट में आ चुके थे। जहाँ देश की एक तिहाई आबादी इस अकाल का शिकार थी वहीं बंगाल इस अकाल की सबसे बुरी तरह चपेट में था। ए0आई0एस0एफ0 ने इस संकट के समय में राहत कार्यों में बढ़-चढ़कर भागेदारी की, साथ ही राहत सामग्री और फण्ड के लिए देशव्यापी अभियान भी चलाया। ए0आई0एस0एफ0 ने इस दौरान सस्ता अनाज मुहैया कराने के लिए जहाँ बंगाल में ढेरों सस्ती दर की दुकानंे चलाईं तो वहीं कई सारी रसोइयाँ भी भूखों को खाना खिलाने के लिए चलाई। इस सारे राहत कार्यो में ए0आई0एस0एफ0 के तीन हजार कार्यकर्ताओं ने प्रतिबद्धता के साथ काम किया।

क्रमश:
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रविवार, 7 अगस्त 2011

लो क सं घ र्ष !: आल इण्डिया स्टूडेन्ट्स फेडरेशन का इतिहास: महेश राठी भाग 2

इसी क्रम में आगे चलकर 26, मार्च 1931 को कराँची में पं0 जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में एक अखिल भारतीय छात्र सम्मेलन का आयेजन किया गया। इस सम्मेलन में देशभर से 700 प्रतिनिधियों ने भाग लिया परन्तु किसी कारणवश यह एक अखिल भारतीय छात्र संगठन का रूप धारण नहीं कर पाया।
ए0आई0एस0एफ0 की स्थापना की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। संयुक्त प्रांत (यूपी) के उस समय के गवर्नर सर मालकाम हैली उस समय के युवा छात्र संगठन के उभार को लेकर काफी फिक्रमंद थे। उनकी कोशिश थी कि छात्रों के असंतोष से बनने वाले किसी प्रभावी छात्र संगठन से पहले सरकार की ओर से कोई आधिकारिक ढ़ाचा खड़ा किया जाए। इसके मद्देनजर इलाहाबाद, बनारस, आगरा, अलीगढ़ और लखनऊ के छात्रों की एक बैठक लखनऊ विश्वविद्यालय के उप कुलपति द्वारा बुलाई गई। परन्तु यह कोशिश ब्रिटिश अधिकारियों को भारी पड़ी। राष्ट्रवादी छात्रों ने बैठक और उसकी कार्यवाही को अपने कब्जे में ले लिया। एम0 बदयँूद्दीन, पी0एन0 भार्गव, शफी नकवी, जमाल अहमद किदवई और जगदीश रस्तोगी सरीखे छात्रों ने ब्रिटिश साम्राज्य की मंशाओं को ध्वस्त कर दिया। इस बैठक में जार्ज वी0 पर एक शोक प्रस्ताव लाया गया जिसके विरोध में उपर्युक्त छात्र ब्रिटिश कम्युनिस्ट नेता एवं सांसद सापुरजी सकतवाला की मृत्यु पर एक शोक प्रस्ताव लेकर आ गए। परन्तु उपकुलपति ने शोक प्रस्ताव में सकतवाला के नाम जोड़े जाने का मुखर विरोध किया। छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही करने की धमकी भी दी गई यहाँ तक कि तीन छात्रों को विश्वविद्यालय से निलंबित भी कर दिया गया। बावजूद इस घटनाक्रम के बैठक का 50 छात्रों ने बहिष्कार कर दिया। इसके बाद छात्र नेताओं ने निर्णय किया कि यदि फौरन एक अखिल भारतीय छात्र संगठन का निर्माण नहीं किया गया तो ब्रिटिश प्रशासन अपना कठपुतली छात्र संगठन खड़ा कर लेगा। परिणाम स्वरूप यू0पी0 विश्वविद्यालय छात्र फैडरेशन ने तुरन्त अपनी कार्यकारिणी की एक बैठक 23 जनवरी 1936 को बुलाकर निर्णय किया कि उन्हें तत्काल प्रभाव से एक अखिल भारतीय छात्र सम्मेलन बुलाना चाहिए अन्यथा ब्रिटिश सरकार ऐसी पहल करके एक सरकारी छात्र संगठन खड़ा कर देगी। अन्ततोगत्वा अखिल भारतीय सम्मेलन बुलाने की तारीख 12-13 अगस्त 1936 तय की गई।
पी0 एन0 भार्गव की अध्यक्षता में प्रस्तावित सम्मेलन के लिए एक स्वागत समिति का गठन किया गया। इस स्वागत समिति की तर्ज पर यू0पी0 के सभी प्रमुख जिलो में भी तैयारी समितियों का गठन किया गया। इसके साथ ही देश के सभी छात्र संगठनो और कांग्रेस, सोशलिस्ट पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सहित सभी राजनैतिक धड़ांे से संपर्क करने का काम विधिवत शुरू हुआ। सम्मेलन की घोषणा ने देश भर में उत्साह का संचार कर दिया और सभी छात्र नेता और संगठन उत्साह पूर्वक सम्मेलन की तैयारियों में लग गए। सम्मेलन में बेहद जनवादी तरीके से नेतृत्व का चुनाव हुआ। सम्मेलन की प्रतिनिधि फीस एक रूपया थी।
ए0आई0एस0एफ0 का स्थापना सम्मेलन लखनऊ के सर गंगा राम मैमोरियल हाॅल में संपन्न हुआ। सम्मेलन में 936 प्रतिनिधियांे ने भाग लिया जिसमें 200 स्थानीय और शेष 11 प्रांतीय संगठनों के प्रतिनिधि थे। सम्मेलन में महात्मा गांधी, रवीन्द्र नाथ टैगोर, सर तेज बहादुर सप्रू और श्रीनिवास शास्त्री सरीखे गणमान्य व्यक्तियों के बधाई संदेश भी प्राप्त हुए। सभी विश्वविद्यालयों के प्रतिनिधित्व के साथ यह विद्यार्थियों की सबसे बड़ी गोलबंदी थी।
स्वागत समिति के अध्यक्ष के तौर पर पी0एन0 भार्गव ने स्वागत भाषण दिया और पं0 जवाहर लाल नेहरू के भाषण से सम्मेलन का उद्घाटन हुआ। अपने उद्घाटन भाषण में जवाहर लाल नेहरू ने तत्कालीन राजनैतिक परिस्थितियांे का विश्लेषण करते हुए छात्रों से आजादी का परचम उठाने का आह्वान किया। इसके अलावा अपने अध्यक्षीय भाषण में जिन्ना ने भी इस बात की खुशी जाहिर की कि देश के अलग-अलग जाति और समुदाय के लोग आज यहाँ पर एक साझे मकसद के लिए एकत्र हुए हैं। आजादी की लड़ाई में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने के अलावा कई सवालों पर सम्मेलन द्वारा प्रस्ताव भी पारित किए गए।
ए0आई0एस0एफ0 के इस स्थापना सम्मेलन में पी0एन0 भार्गव पहले महासचिव निर्वाचित हुए। इसी के साथ स्टूडेन्ट्स ट्रिब्यून भी ए0आई0एस0एफ0 का पहला आधिकारिक मुखपत्र बना। ए0आई0एस0एफ0 का गठन एक ऐसी ऐतिहासिक घटना थी जिसने पूरे छात्र समुदाय में एक जोश के साथ परिपक्वता का संचार किया। ए0आई0एस0एफ0 का दूसरा सम्मेलन महज तीन महीने के अन्तराल पर ही 22 नवम्बर 1936 को लाहौर में संपन्न हुआ। इस सम्मेलन में ए0आई0एस0एफ0 का संविधान तैयार करने पर सहमति हुई। शरत चन्द्र बोस की अध्यक्षता में हुए दूसरे सम्मेलन में 150 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। शरत चन्द्र बोस ने अपने अध्यक्षीय भाषण में छात्रों को रूसी क्रान्ति से प्रेरणा लेने के लिए प्रेरित किया। सम्मेलन ने स्पेन में नाजी जर्मन की अनुचित दखलंदाजी के खिलाफ भी एक प्रस्ताव पारित किया। देश भर में चल रहे छात्र आंदोलनों के आधार पर ए0आई0एस0एफ0 ने छात्रांे का एक माँगपत्र भी लाहौर सम्मेलन में तैयार किया।
लाहौर सम्मेलन में एक ओर उल्लेखनीय घटना घटी। यहाँ पर कुछ मुस्लिम छात्रों द्वारा 1936 के अन्त में लखनऊ में एक आल इंडिया मुस्लिम छात्र सम्मेलन आयोजित किए जाने से संबंधित प्रस्ताव लाने की कोशिश की गई। परन्तु उन्हें मुस्लिम छात्रों का ही भारी विरोध झेलना पड़ा और उनकी योजना धराशायी हो गई। प्रतिनिधिया ने इस अलग संगठन के विचार के खिलाफ एक जनसभा का आयोजन किया। इस जनसभा में अलग मुस्लिम छात्र संगठन के विचार का भारी विरोध हुआ। यहाँ तक कि अली सरदार जाफरी इस विचार के विरोध में एक प्रस्ताव भी ले आए। इसके अलावा मौलाना अब्दुल कलाम आजाद और खान अब्दुल गफ्फार खान के संदेश भी सम्मेलन में पढ़े गए। जिसमें उन्होनें किसी भी मुस्लिम छात्र संगठन के विचार का विरोध करते हुए छात्रों से अधिक से अधिक संख्या में ए0आई0एस0एफ0 में शामिल होने का आह्वान किया। अलग मुस्लिम छात्र सम्मेलन के विचार को प्रतिपादित करने वाले इफि़्तख़ार हसन ने इसके पक्ष में कई तर्क दिए मगर उनकी बात को छात्रों ने एकदम खारिज कर दिया।

क्रमश:
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