भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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मंगलवार, 14 अगस्त 2012

सबके लिए खाद्य सुरक्षा का संघर्ष सफल बनाओ

देश सूखे, बेरोजगारी और मुद्रास्फीति में उलझ रहा है। किसानों की आत्महत्यायें लगातार जारी हैं। कीमतें बढ़ रही हैं। लोगों में बेचैनी है।
 परंतु प्रमुख राजनीतिक दल खासतौर पर कांग्रेस नीति यूपीए-2 और भापजा के नेतृत्व वाला राजग राष्ट्रपति चुनावों की जोड़तोड़ और अपनी आंतरिक समस्याओं में ही उलझा हुआ है। गोवा, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में नाकामयाब रहने एवं आंध्र प्रदेश उप चुनावों में करारी शिकस्त के बाद अब कांग्रेस का पूरा ध्यान राहुल गांधी पर ही केंद्रित है जो अपनी वास्तविक छवि से भी बड़ा पेश किए जाने के बावजूद कांग्रेसी तबकों तक में कोई जादू नहीं चला पाए।
 यूपीए एनसीपी की ओर से एक समन्वय समिति बनाने को लेकर भीतरी दबाव झेल रही है, जिसके लिए एनसीपी ने केबिनेट की बैठक में आने से भी इंकार कर दिया है। त्रिणमूल और डीएमके भी अपने-अपने कारणों से नाखुश हैं।
 जदयू और शिवसेना के पीए संगमा को राष्ट्रपति चुनावों में समर्थन नहीं देने के सदमें से भाजपा को अभी बाहर आना बाकी हैं। उसने कर्नाटक में मुख्यमंत्री बदलकर साम्प्रदायिक जातिवादी शक्तियों के सामने बेशर्मी से समर्पण का उदाहरण पेश किया है। इसके अलावा कर्नाटक भाजपा में राष्ट्रपति चुनाव को लेकर भी टूट थी। नरेन्द्र मोदी और अन्य 2014 की प्रधानमंत्री मृगतृष्णा के लिए आंतरिक लड़ाई को ढोह रहे हैं।
भारतीय कार्पोरेट घराने देश को डरा रहे हैं
भारतीय कार्पोरेट घराने देश को डरा रहे हैं कि यदि उनकी इच्छाओं की पूर्ति वाले कठोर निर्णय नहीं लिए गए तो यह भारत को एक संकट की ओर धकेल देगा। ‘‘टाईम’’ पत्रिका ने डा. मनमोहन सिंह को एक ‘‘अंडर एचीवर’’ बताया तो ओबामा भी उन पर बहुराष्ट्रीय निगम समर्थक सुधारों को लागू करने का दबाव डाल रहे हैं ताकि उनके लिए दरवाजे खोलकर उन्हें देश की लूट की सुविधा दी जा सके। जबकि सच्चाई यह है कि पिछले चार सालों में भारतीय निगमों और सबसे बड़े अमीरों ने 5 लाख करोड़ रु. का अतिरिक्त मुनाफा कमाया है और उनकी दौलत दो गुनी हुई है तो वहीं आम आदमी की दरिद्रता बढ़ी है। डा. मनमोहन सिंह कार्पोरेट के लिए आधे परफार्म करने वाले सिद्ध हुए, तो वहीं आम आदमी के लिए कुछ भी परफार्म नहीं करने वाले सिद्ध हुए हैं।
 यह केवल वामपंथ है जो जनता के सवालों की बात कर रहा है ओर एक जुझारू लड़ाई के लिए जनता को लामबद्ध कर रहा है।
 खाद्य सुरक्षा के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान चलाने के वामपंथ के आव्हान को कई राज्यों ने लागू किया है। बैठकों, रैलियों ओर कंवेशनों का दौर जारी है और पं. बंगाल, असम, मणिपुर, केरल और दूसरे अन्य राज्यों में व्यापक धरने और प्रदर्शनों की रूपरेखा तैयार हो रही है। इनमें से अधिकतर राज्य अपनी विधान सभाओं के सामने धरना देंगे और ठीक उसी तरह संसद के सामने भी 30 जुलाई से 3 अगस्त तक राष्ट्रव्यापी धरना अभियान चलेगा।
 दिल्ली ओर उसके आसपास के राज्य हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, पश्चिम उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्यप्रदेश दिल्ली के साथ मिलकर संसद पर
धरने के लिए जनता को लामबद्ध करेगें, हैंडबिल और पोस्टर पहले ही छप चुके हैं। विस्तार से व्याख्या करने वाली एक पुस्तिका ंिहंदी और अंग्रेजी में प्रकाशित हो चुकी है। समाज के प्रत्येक हिस्से से अच्छी प्रतिक्रिया प्राप्त हो रही है।
 कुछ लोगों को आश्चर्य हो रहा है कि जब विधेयक संसद के समक्ष लंबित है तो खाद्य सुरक्षा पर आंदोलन क्यो। वर्तमान लंबित पड़ा विधेयक बेहद कमजोर और जनता के हितों के एकदम खिलाफ है।
 वित्त मंत्री का कहना है कि सब्सिडी की चिंता में उनकी रातों की नींद गायब है। पिछले चार वर्षों में कार्पोरेट घरानों को 24 लाख करोड़ की सब्सिडी और छूट दी जा चुकी है। योजना आयोग के एक शौचालय में 35 लाख रुपये खर्च करने वाले मोंटेक सिंह अहलूवालिया कहते हैं कि 26 रु. खर्च करने वाला ग्रामीण गरीबी रेखा से ऊपर है। गृहमंत्री चिदंबरम भी हैरान हैं कि 15 रु. पानी की बोतल और 20 रु.आइसक्रीम पर खर्च करने वाला आदमी चावल में 1 रु. की बढ़ोत्तरी का विरोध क्यों करता है। 20 रु. या 200 रु. की आइसक्रीम खाने वाले और 50,000 रु0 की विदेशी शराब खरीदने वाले आदमी वह नहंी हैं जो चावल और गेहूं की दाम बढ़ोतरी का विरोध करते हैं। यह नेता जो इस अंतर को नहीं समझते हैं वही देश के नीति निर्माता हैं।
 वामपंथ सार्वभौमिक जन वितरण प्रणाली की मांग करता है। सरकार हरेक साल लगभग 6 से 8 करोड़ टन गेहूं चावल खरीदती है। लगभग 30 से 50 लाख टन खाद्यान्न भंडारण की उचित व्यवस्ष्था के अभाव में सड़ जाते हैं। लोग भूखों मर रहे हैं और सरकार उच्चतम न्यायालय के दिशा निर्देशों के बावजूद जरूरत मंदों और गरीबों को मुफ्त अनाज बांटने से इंकार कर रही है।
 भाजपा के नेतृत्व वाले राजग ने पहले जनता की जरूरतों को नजर अंदाज करके खाद्यान्न का निर्यात किया था। अब मनमोहन सिंह की सरकार भी पैसा बनाने के लिए खाद्यान्न निर्यात करने की योजना बना रही है बावजूद इसके कि देश के कई राज्य अभूतपूर्व सूखे से प्रभावित हैं।
 जबकि कांग्रेस और उसका समर्थक मीडिया ऐसा पेश करने की कोशिश कर रहा है इस खाद्य सुरक्षा विधेयक से देश की 70 प्रतिशत आबादी को 3 रु. किलो की दर पर खाद्यान्न प्राप्त होंगे।
 दूसरी तरफ मोंटेक सिंह अहलुवालिया और डा. रंगा राजन और उनके साथी 26 रु. और 32 रु. की हास्यास्पद गरीेबी रेखा निर्धारित करके यह जताने की कोशिश कर रहे हैं कि गरीबी घट गई है। योजना आयोग की इसी कोशिश को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने उच्चतम न्यायालय के सामने पेश किया। इस स्थिति में अधिकारिक गरीबी की रेखा से महज 23 प्रतिशत आबादी ही रह जायेगी। खाद्य सुरक्षा विधेयक के लिए गरीबी रेखा का यह मापदंड एक अजूबा ही होगा।
 कई राज्यों में राज्य सरकारें 2 रु. किलो ही राशन दे रही हैं जबकि तमिलनाडु में प्रत्येक परिवार को 20 किलो ग्राम चावल का एक बैग बिल्कुल मुफ्त दिया जा रहा है। यदि सीमित साधनों के साथ एक राज्य ऐसा कर सकता है तो कं्रेद्र सरकार क्यों नहीं कर सकती है?
सबके लिए पीडीएस की क्या कीमत होगी?
 यहां तक कि राष्ट्रीय सेंपल सर्वे के सबसे वैज्ञानिक आंकड़ों में भी इसे समाहित किया गया है जिसके आधार पर अर्जुन सेन गुप्ता ने अपनी असंगठित क्षेत्र की शानदार रिपोर्ट कंेद्रित की हैं कि देश की 77 प्रतिशत आबादी 20 रु. रोज से भी कम अपने भोजन पर खर्च करती है। यह आंकड़े कुछ वर्षों पहले के हैं। परंतु अब रुपये का मूल्य घट चुका है। रुपये की क्रयशक्ति पिछले दो दशक में गिरकर 22 पैसे तक पहुंच चुकी है।
 जब सरकार गरीबी कम नहीं कर सकती है उसे खाद्य सुरक्षा मुहैया कराना चाहिए जिससे आम जनता जी सके। यह कल्याणकारी उपाय अथवा दया नहीं बल्कि एक जनवादी सरकार की राजनीतिक जवाबदेही है।
 गरीबी के विभिन्न आँकड़े हो सकते हैं जो कि वास्तविक संख्या से अलग भी हो सकते हैं  अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान इसे 30 करोड़ आंकता है तो वहीं ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय का मानना है कि यह संख्या 41 करोड़ है। गरीबी रेखा से ऊपर भी एक बड़ी संख्या बाजार दामों पर भोजन खरीद पाने में सक्षम नहीं है। इसीलिए खाद्य सुरक्षा की तुरंत आवश्यकता है।
 सकल घरेलू उत्पाद की विकास दर आम आदमी के जीवन को सुधारने में कोई सहायाता नहीं करती है। उदारवादी नीतियां लोगों के जीवन को और दूभर कर रही हैं। कार्पोरेट घरानों को ध्यान में रखकर बनाई जा रही आर्थिक नीतियां गलत दिशा में जा रही हैं। इसीलिए जीडीपी की विकास दर जो भी हो 10 प्रतिशत अथवा 12 प्रतिशत उससे गरीबी की समस्या हल होने नहीं जा रही है। यह उस ट्रेन की गति बढ़ाये जाने की तरह है जो कभी भी अपनी मंजिल गरीबों और जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पाती है।
क्या सबके लिए पीडीएस असहनीय महंगा है?
 यह महंगा नहीं जैसा कि कई अर्थशास्त्रियों द्वारा इसे बताया जाता है। आइये गणना करें।
 1008 लाख टन खाद्यान्न उपलब्ध कराना संभव है। एफसीआई 2010 में 5000 टन खाद्यान्न ही उपलब्ध कराना संभव है। एफसीआई 2010 में 500 टन खाद्यान्न ही उपलब्ध करा सका जो कुल खाद्य उत्पादन का 23 प्रतिशत था। एकदम अभी सरकार के पास 6 से 8 करोड़ टन खाद्यान्न का भंडार है। अभी 300 से 400 लाख टन खाद्यान्न की आवश्यकता है पूरे देश को खिलाने के लिए। परंतु इसके लिए एक नीति की आवश्यकता है। जिसके लिए ईमानदारी की जरूरत हैं। इसके लिए इच्छाशक्ति चाहिए। यह सब वर्तमान सरकार के पास नहीं है। इसीलिए यह संघर्ष है।
 यह उपलब्ध आंकड़े दर्शाते हैं कि सबके लिए पीडीएस का नतीजा कोई असामान्य लागत नहीं है। यदि सरकार में इच्छाशक्ति हो तो वह थोड़े से प्रयास से ही देश के हर दरवाजों पर खाद्यान्न मुहैया कराया जा सकता ह।ै।
 यह सरकार को चुनना होगा कि वह जनता के साथ है अथवा कार्पोरेट घरानों के साथ है।
 यदि सरकार कुछ बड़े कार्पोरेट घरानों को संतुष्ट करने के लिए इतना खर्च कर सकती है तो क्यों नहीं 24 करोड़ परिवारों को खाना देने के लिए 2 लाख करोड़ खर्च करती हैं।
 कुछ लोग बेशर्मी से यह तर्क दे रहे हैं कि मुफ्त या सब्सिडी वाला खाना देना जनता को आलसी बना देगा, जैसे कि देश की दौलत का उत्पादन बगैर परिश्रमी जनता के खून पसीना बहाए हो रहा है।
 सरकार को समझ दी जानी चाहिए। उन्हें उनकी नीतियां बदलने के लिए मजबूर किया जाना चाहिए। शिक्षा और स्वास्थ्य के अलावा भोजन, पेयजल और आवास भी जनता का अधिकार है।
 वामपंथ की खाद्य सुरक्षा की लड़ाई एक बड़ी लड़ाई की शुरुआत भर है। यह संघर्ष आगे बढ़ेगा। जनवादी, धर्म निरपेक्ष और एक समान सोच रखने वाले लोगों को बड़ी संख्या में इस लड़ाई को सफल बनाने में लामबद्ध किया जाएगा। आओ सबके लिए खाद्य सुरक्षा के इस संघर्ष को सफल बनाएं।
- एस. सुधाकर रेड्डी
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ड्रीम नहीं क्रीमी प्रोजेक्ट है प्रस्तावित लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस हाईवे - भाकपा

लखनऊ 14 अगस्त। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य मंत्रिपरिषद ने कहा कि यमुना एक्सप्रेस हाईवे की तरह ही मुख्यमंत्री का ड्रीम प्रोजेक्ट - लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस हाईवे किसानों, वाहन स्वामियों एवं क्षेत्रीय जनता की बर्बादी लायेगा। निश्चय ही सरकार में बैठे लोगों एवं निर्माण एजेंसी के लिए यह क्रीमी प्रोजेक्ट साबित होगा।
यहां जारी एक प्रेस बयान में भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि सरकार का यह कथन कि इस मार्ग के निर्माण के लिए उपजाऊ जमीनें कम ही ली जायेंगी; सच्चाई से कोसों दूर है। नहरों के किनारे खाली पड़ी सरकारी जमीन 6 लेन हाईवे तो क्या तो 2 लेन हाईवे के लिए पर्याप्त नहीं है। अतएव इस मार्ग के निर्माण के लिए, इसके किनारे हरित पट्टी, झील, तालाब तथा प्लेजर ग्राउंड्स बनाने के लिए अलग से जमीनें ली जायेंगी। जाहिर है कि 8 जिलों के किसानों के लिए बरबादी का पैगाम है इस हाईवे की घोषणा।
भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि निश्चय ही किसान अपनी रोजी-रोटी का आधार - जमीन बचाना चाहेंगे और अपने सपनों की पूर्ति में उन्हें बाधा देखने वाले शासक उन पर गोलियां चलवायेंगे। यमुना एक्सप्रेस वे की कहानी इसका स्पष्ट प्रमाण है।
सरकार की पीपीपी मॉडल नीति पर सवाल खड़े करते हुए भाकपा ने कहा है कि यह नीति उद्योगपतियों, राजनेताओं और नौकरशाहों को मालामाल और आम लोगों को कंगाल करने वाली है। जिन उद्योग समूहों से इस नीति के तहत कार्य कराये जा रहे हैं, उनमें नेता और नौकरशाह सभी का पैसा लगा है।
भाकपा ने कहा कि हमारे वाहनधारकों का एक बहुत ही छोटा समूह है जो इतने महंगे टोल टैक्स को झेल सकता है। दो पहिया वाहन धारक, अधिकांश कार धारक और लघु एवं मझोले वाहनों से माल ढोने वालों को ऐसे मार्गों पर वाहन चलाना बेहद महंगा पड़ता है। बस से यात्रा करने वालों को भी ज्यादा किराया अदा करना पड़ता है। लेकिन यह एक के बाद एक बनने वाली राज्य सरकारें हैं कि चन्द लोगों के ”फील गुड“ के लिए जनता के हितों को तबाह कर रहीं हैं।
एक तथ्य यह भी है कि टोल टैक्स वसूलने वाले मार्गों की संख्या लगातार बढ़ रही है और निर्माण एजेंसियां उनकी लागत ज्यादा बता कर अधिकाधिक टोलटैक्स लगा रही हैं। दूसरा खतरा यह भी है कि इन मार्गों पर वाहनों की संख्या बढ़ाने और अधिक टोल टैक्स वसूलने की गरज से दूसरे सरकारी मार्गों की हालत खराब रखी जायेगी ताकि आम जनता एक्सप्रेस हाईवे पर चलने को मजबूर हो और उसकी जेब ढीली हो।
भाकपा ने अपनी इस मांग को दोहराया है कि पहले से मौजूद मार्गों का विकास किया जाये और ड्रीम प्रोजेक्ट्स का कम्पटीशन चला कर किसानों, वाहन धारकों और जनता को बरबाद करने का काम बन्द किया जाये।
भाकपा ने इस प्रकार के प्रोजेक्ट्स से पर्यावरण एवं खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताते हुए जनता से इन प्रकार के प्रयासों के खिलाफ पुरजोर विरोध की अपील की है।



कार्यालय सचिव
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सोमवार, 13 अगस्त 2012

बुन्देलखंड की समस्याओं पर भाकपा राज्य सचिव का मुख्यमंत्री को खुला पत्र

 


13 अगस्त 2012
मुख्यमंत्री
उत्तर प्रदेश सरकार
लखनऊ

विषय: बुन्देलखंड की जनता की ज्वलंत समस्याओं के सम्बंध में

महोदय,
जिस बुन्देलखंड के नाम पर पिछले कई वर्षों से हर राजनैतिक दल राजनैतिक रोटियां सेंक रहा था, उसकी हालत आज और बदतर हो गई है। वहां की जनता बड़े पैमाने पर पलायन कर रही है और भयंकर कर्जग्रस्तता के चलते हजारों किसानों ने आत्महत्यायें की हैं। आपके सत्ता में आने के बाद से भी आत्महत्या करने वालों की संख्या एक सौ को पार कर गई है और प्रतिदिन हर जिले में कोई न कोई किसान-मजदूर आत्महत्या कर रहा रहा है।
बुन्देलखंड की इस हालत के लिए प्रकृति जिम्मेदार है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। केन, बेतवा, घसान, पहुच, चन्द्रावल, जमुना, वधेन, चम्बल, पयस्विनी एवं वाल्मिकी आदि नदियां पर्याप्त पानी देती रही हैं लेकिन कुप्रबंधन के चलते न तो खेत को पानी मिलता है न पेट को। पर्याप्त खनिज एवं वन संपदा यहां है। बुन्देलखंड के मात्र सात जिलों से 500 करोड़ रूपये से भी अधिक वार्षिक केवल पत्थर के खनन से सरकार को मिलता है। बालू, जंगल की लकड़ी, नदियों की मछली एवं नदियों के घाट तथा जमीन के क्रय-विक्रय से इससे भी बड़ी धनराशि प्रति वर्ष राजस्व के रूप में प्राप्त होती है।
जितना राजस्व सरकारी खजाने में आ रहा है, उसका कई गुना ज्यादा अधिकारी-माफिया-राजनेताओं की तिकड़ी हड़प रही है। यही वजह है कि बुन्देखंड की सारी राजनीति बालू, दारू, पत्थर के खनन, क्रेशर मशीनों के मालिकों और ठेकेदारों के हाथों में सिमट गई है, जो इन अवैध धंधों से करोड़ों करोड़ की कमाई कर रहे हैं। इसके अलावा बुन्देलखंड पैकेज और मनरेगा की धनराशि का भी आधे से ज्यादा भाग इन्हीं सबके द्वारा हड़पा जा रहा है, जिसमें ग्राम पंचायतें भी शामिल हैं। अकेले ललितपुर जिले में ही भूमि संरक्षण विभाग, लघु सिंचाई विभाग एवं पंचायतों द्वारा दो अरब रूपये का घोटाला किया गया है।
कानूनी तौर पर निषिद्ध होने के बावजूद बुन्देलखंड में साहूकारी प्रथा बेरोकटोक जारी है। ये साहूकार प्रशासन और बैंकों की सांठ-गांठ के चलते 60 प्रतिशत की दर से ब्याज वसूलते हैं।
माननीय मुख्यमंत्री जी,
आपने अपने चुनाव घोषणापत्र एवं चुनाव अभियान में किसानों के कर्जे माफ करने की बात जोर-शोर से कही थी लेकिन किसानों से जबरिया कर्ज वसूली बेबाक तरीके से जारी है और उनका उत्पीड़न किया जा रहा है। यद्यपि माननीय उच्च न्यायालय में पीआईएल सं. 34465 विचाराधीन है और उसके निस्तारण तक माननीय उच्च न्यायालय ने कर्ज वसूली न किये जाने के आदेश पारित कर रखे हैं फिर भी बैंक और सरकारी मशीनरी मिल कर जबरिया वसूली में जुटे हैं। बांदा जिले में ही स्टेट बैंक की भूमि विकास शाखा अतर्रा द्वारा 199 आर.सी. काटी गईं हैं जिनके जरिये दबाव बनाकर तहसीलकर्मी किसानों को जमीनें बेच कर कर्ज अदा करने को मजबूर कर रहे हैं।
अतएव आपसे अनुरोध है कि बुन्देलखंड की जनता की समस्याओं के निस्तारण के लिए निम्न मांगों पर त्वरित कार्यवाही करें।
  1. बुन्देलखंड के कर्जग्रस्त किसानों के समस्त कर्ज माफ किये जायें। ऋण वसूली पर तत्काल रोक लगाई जाये।
  2. साहूकारों, दलालों तथा माफियाओं को चिन्हित कर उन्हें कानून के हवाले किया जाये। साहूकारी प्रथा को फौरन रोका जाये।
  3. बुन्देलखंड पैकेज एवं मनरेगा में हुये भ्रष्टाचार की सीबीआई जांच कराई जाये।
  4. नदियों में बैराज बनाकर विद्युत उत्पादन एवं सिंचाई की योजनायें बनाई जायें, पंचनदा तथा ग्रेटर गगऊ बांध का निर्माण किया जाये। ब्रिटिश शासनकाल में बुन्देलखंड में बिछाये गये नहरों के नेटवर्क की सफाई के नाम पर हर साल अरबों रूपये गबन किये जा रहे हैं। इसकी जांच कराई जाये और वहां की नहरों की सफाई सुनिश्चित की जाये।
  5. कृषि आधारित उद्योग लगाकर लोगों को रोजगार मुहैया कराया जाये। पलायन रोकने को अन्य रोजगार योजनायें भी चलाई जायें।
  6. किसानों को ट्यूबवेल एवं विद्युत कनेक्शन मुफ्त दिये जायें।
  7. किसानों और खेतिहर मजदूरों को बिना ब्याज के कर्ज दिये जायें।
  8. वहां की प्राकृतिक सम्पदाओं की रक्षा के लिये ठोस कदम उठाये जायें। पर्यावरण की रक्षा से ही सूखा, अतिवृष्टि की विडम्बना से बुन्देलखंड को बचाया जा सकता है।
  9. सरकारी शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार कर इनके व्यवसाईकरण पर रोक लगाई जाये।
  10. सभी गरीबों के लिये रू. दो लाख की लागत वाले भवन बनाकर आबंटित किये जायें।
  11. राजनेताओं, अधिकारियों और माफियाओं की आय से अधिक सम्पत्तियों की जांच कराके उनके विरूद्ध कड़ी कार्यवाही की जाये।
आशा ही नहीं पूरा विश्वास है, आप उपर्युक्त मुद्दों पर शीघ्र निर्णायक कार्यवाही करेंगे।
सधन्यवाद।
भ व दी य

(डा. गिरीश)
राज्य सचिव
09412173664
07379697069
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रविवार, 12 अगस्त 2012

जिन्होंने कैमरे से राजनीतिक कार्य किया - सुनील जाना

यह 2010 के नवंबर की बात रही होगी जब हम लोगों ने औरंगाबाद में 9 से 13 दिसंबर 2010 के दौरान होने वाले अखिल भारतीय किसान सभा के सम्मेलन के लिए आसान जुबान में खेती के अध्ययन के अपने नतीजों को एक पुस्तिका की शक़्ल में लिखना शुरू किया। जया रात-दिन सिर खपा रही थी कि किस तरह भारत की खेती जैसे एक बेहद पेचीदा मसले को, जिसे समझने में हमें ख़ुद तीन साल से ज़्यादा समय लगा, एक छोटी सी पुस्तिका में समेटा जाए। मैं टाइप करता जा रहा था और साथ ही साथ हिंदी में अनुवाद का काम भी चलता जा रहा था। मेरठ से रजनीष को बुला लिया था और किसी तरह रात-दिन एक करके एक ऐसी पुस्तिका तैयार हो गई जिसमंे भारी-भरकम आँकड़े देखकर आम लोग डरें नहीं, और अगर पढ़ना शुरू कर दें तो जो खेती-बाड़ी न भी जानते हों, उन्हें भी उसमें छिपे ग़रीब-अमीर के फ़र्क़ और शोषण के पारंपरिक और आधुनिक तौर-तरीकों के बारे में कुछ जानकारी हासिल हो सके।
अनुवाद के साथ-साथ, किताब के कवर और किताब के साथ दी जा सकने वाली कविताओं आदि का काम विभाजन के अघोषित समझौते के तहत मेरे ही जिम्मे रहता है। किताब के लिए कवर के लिए तस्वीरें खोजते-खोजते गूगल पर एक काली-सफ़ेद तस्वीर पर निगाह ठहर गई। बोलती हुई तस्वीर थी। थी तो काली-सफ़ेद लेकिन क्या शानदार तस्वीर थी कि मन की निगाह फ़ोटोग्राफ़र के भीतर गहरे तक शरीक लाल रंग को साफ़ पहचान सकती थी। तस्वीर 1945 की थी। पंजाब के झण्डीवालाँ गाँव के किसान झण्डा लेकर किसान सभा की कॉन्फ्रेंस के लिए जा रहे हैं। कुछ बुजुर्ग हैं कुछ जवान हैं। कुछ के पैरों में चप्पल है कुछ नंगे पैर हैं लेकिन सबके पैरों, हाथों, चेहरों पर गजब का आत्मविष्वास है, मजबूती है।
हमारे एक मित्र का कहना है कि मैं साँड़ हो गया हूँ जो जहाँ लाल देखा, उछलने लगता हूँ। अब उस तस्वीर में तो झण्डा काला-सफ़ेद ही था, फिर भी मैं मन में उसमें लाल देखकर उछलने लगा। तस्वीर के बारे में और जानकारी हासिल की तो अपनी पीठ थपथपाने का जी हो आया कि बग़ैर ख्याति जाने ही मैंने एक अच्छी कलाकृति को पहचान लिया था। बाद में कहीं पढ़ा भी कि उस फ़ोटोग्राफ़र की तस्वीरों की ख़ासियत और ताक़त यही है कि उन्हें फ़ोटोग्राफ़ी की गहरी समझ रखने वाले हेनरी कार्टर-ब्रेसां से लेकर मेरे जैसे साधारण और अनभिज्ञ लोग भी पसंद कर सकते हैं।
वह तस्वीर सुनील जाना ने ली थी जो 1940 के दषक में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के फ़ोटोग्राफ़र थे। उनकी तस्वीरों की एक वेबसाइट मिली जिसे 1998 में सुनील जाना के चित्रों की न्यूयॉर्क में लगी एक प्रदर्षनी के वक़्त बड़ी मेहनत से उनके बेटे अर्जुन जाना ने तैयार किया था। उससे पता चला कि वह कई मायनों में दुनिया के अद्वितीय फ़ोटोग्राफ़र हैं। वेबसाइट से ही मिला एक ईमेल पता। मैंने थरथराते हाथों से एक ईमेल टाइप किया। एक वरिष्ठ कलाकार कॉमरेड को जो किसी दौर में एक किंवदंती हुआ करते थे, यह अनुरोध करते हुए कि आपका खींची 65 वर्ष पुरानी एक तस्वीर हम एक छोटी सी पुस्तिका के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति चाहते हैं, मुझे रोमांच हो रहा था।
ईमेल का जवाब भी लगभग तत्काल ही आ गया। लेकिन सुनील जाना का नहीं, अर्जुन जाना का। अर्जुन सुनील जाना के बेटे हैं। उन्होंने लिखा कि उनकी माँ शोभा जाना और पिता जो क्रमषः 83 और 92 वर्ष के हैं। अमेरिका में कैलिफ़ोर्निया के बर्कले शहर में रहते हैं, जबकि अर्जुन काम के सिलसिले में ब्रुकलिन, न्यूयॉर्क में रहते हैं। अर्जुन ने यह भी लिखा कि उन्होंने मेरा मेल अपने माँ-पिता को आगे भेज दिया है और उनके स्वास्थ्य को देखते हुए जैसे ही उन्हें समय मिलेगा, वे जवाब देंगे। उन्होंने यह भी लिखा कि वे मेरा मेल पढ़कर बहुत ख़ुष होंगे।
एक सप्ताह तक फिर कोई जवाब नहीं आया। मैंने फिर अर्जुन को मेल किया कि अब सम्मेलन के लिए वक़्त कम बचा है और किताब छपने के लिए चंद रोज़ में तैयार हो जाएगी। आप अपने पिता से फ़ोन पर ही अनुमति लेकर हमें ईमेल कर दें तो अच्छा होगा। इसके जवाब में अर्जुन का मेल आया कि उनके माँ-पिता के साथ-साथ वे ख़ुद भी स्वास्थ्य संबंधी काफ़ी तक़लीफ़ों से गुज़र रहे हैं लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि चूँकि आप लोगों की पुस्तिका का व्यावसायिक उपयोग नहीं होना है अतः उन्हें लगता है कि उनके पिता को इस पर आपत्ति नहीं होगी। उन्होंने वेबसाइट पर उपलब्ध तस्वीरों में से किसी भी तस्वीर के इस्तेमाल की अनुमति हमें दे दी।
जैसे ही यह मेल मैंने देखा तो प्रेस में फ़ोन किया। पुस्तिका प्रेस में जा चुकी थी। वैकल्पिक कवर छप चुका था। हमने तय किया कि हम पुस्तिका के अंदर चित्र को छापेंगे और सुनील जाना का पूरा उल्लेख करेंगे। पुस्तिका छपी। सुनील जाना का चित्र भी।
इस बीच अर्जुन जाना के साथ ईमेल का आदान-प्रदान गाहे-बगाहे हुआ। इंटरनेट के माध्यम से ही पता चला कि वे कविताएँ भी लिखते हैं। अंग्रेजी में लिखीं उनकी कविताएँ पढ़ीं भी।
बीच में यह विवाद भी पढ़ने में आया कि भारत सरकार ने सुनील जाना को पद्मश्री देने की घोशणा कर दी जिस पर सरकार और अवार्ड की सूचना देने गए अधिकारियों की काफ़ी किरकिरी हुई क्योंकि पद्मश्री से उन्हें 1974 में ही सम्मानित किया जा चुका था। अंततः सरकार ने कहा कि गलती से पद्मश्री घोषित हो गया, दरअसल देना तो हम पद्मभूषण चाहते थे।
तब भी सोचा कि अर्जुन जाना को मेल किया जाए। लेकिन हम लोग अपने-अपने कामों में उलझ गए। अधूरे कामों की लगातार बढ़ती जाती सूची में यह काम भी जुड़ गया कि कभी अर्जुन जाना को इत्मीनान से एक लंबा मेल लिखेंगे।
फिर लगभग संपर्क टूटा रहा। इस बीच अर्जुन की कुछ कविताएँ मेल पर आयीं भी जिन्हें मैंने कविता के साथ न्याय करने और ससम्मान पढ़ने के लिए सहेज कर रख लिया। अभी चंद रोज़ पहले ही ख़बर पढ़ी कि सुनील जाना 21 जून 2012 को नहीं रहे।
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उनके बंगाल के अकाल के चित्र ‘पीपुल्स वार’ में छपे थे जो उस वक़्त भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का अख़बार था। उन चित्रों के छपने से बंगाल के अकाल की जो विभीषिका उभरी, उसने सारी दुनिया को स्तब्ध कर दिया। बंगाल में लाखों लोग भूख से मर रहे हैं, यह ख़बर विदेषों तक पहुँचना तो दूर, भारत के भी दीगर हिस्सों में नहीं पहुँच पा रही थी। अख़बार, जो उस वक़्त मौजूद सबसे व्यापक संचार माध्यम थे, वे भी ब्रिटिष सरकार के हुक़्म के मुताबिक ख़बर छाप रहे थे। जब ‘पीपुल्स वार’ में सुनील जाना के खींचे गए और चित्त प्रसाद के बनाये गए चित्र प्रकाषित हुए तब सारी दुनिया का ध्यान बंगाल के अकाल की तरफ़ गया। वे तस्वीरें और चित्र अपने आप में कहानी थे - हक़ीक़त बयान करती एक ताक़तवर कहानी। वे चित्र यह बताने में सक्षम थे कि बंगाल का अकाल केवल अवर्षा, अति वर्षा या किसी क़ुदरती क़हर का नतीजा नहीं, बल्कि दूसरे विष्वयुद्ध में शरीक अंग्रेजी साम्राज्यवाद की जमाखोरी और अमानवीय नीतियों का नतीजा था जिसने ग़रीब भारतीय जनता की साढ़े तीन लाख जानों को अपनी साम्राज्यवादी हवस की बलि चढ़ा दिया था। उन तस्वीरों से दुनिया के सामने बंगाल के अकाल का भयानक सच आया जिससे अंग्रेजों के ख़िलाफ़ देष में और देष के बाहर भी ग़ुस्सा उमड़ पड़ा।
बंगाल के अकाल की उन तस्वीरों और चित्रों में जर्जर इंसानों की, कंकाल हो चुके लोगों की कतारें की कतारें नज़र आती हैं। उन चित्रों के पोस्टकार्ड बनाकर उस ज़माने में दुनिया भर में भेजा गया और बंगाल के भुखमरी से जूझते लोगों को मदद मुहैया की गई।
बंगाल के अकाल के चित्रों ने सुनील जाना को दुनिया भर में प्रसिद्धि दिला दी लेकिन ख़ुद सुनील जाना के लिए वह अनुभव बहुत त्रासद था। भला एक वामपंथी दिमाग और विचार रखने वाला व्यक्ति कैसे इस बात पर ख़ुषी महसूस कर सकता है कि उसने जिन ज़िंदा कंकालों या भूख से मरते या मर चुके लोगों के फोटो खींचे हैं, उसने उन्हें प्रसिद्धि दिला दी। बाद में 1998 में एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा कि मेरे लिए यह बहुत मुष्किल था कि मैं भूख से मरते लोगों की मदद करने के बजाय उन्हें कैमरे में उतारूँ। मुझे उन कॉमरेड्स और लोगों से रष्क होता था जो अपना आगा-पीछा न सोचकर दुर्भिक्ष पीड़ित लोगों की मदद और राहत के काम में लगे थे। मेरा मन होता कि मैं भी कैमरा छोड़कर वही करूँ। लेकिन पी. सी. जोषी, जो मुझे अपने साथ बंगाल के गाँवों में लेकर आये थे और जो मेरे षिक्षक, शुभचिंतक, सलाहकार थे, उन्होंने मुझे समझाया कि जो हो रहा है उसका दस्तावेज़ बनाना ज़रूरी है ताकि लोग जानें कि यहाँ दरअसल हालात क्या हैं। मैंने दिल पर पत्थर रखकर कैमरा सँभाला और फोटो खींचता रहा।
बाद में सुनील जाना के खींचे गए गाँधी, नेहरू, जिन्ना, शेख अब्दुल्ला, फ़ैज़, जे. कृष्णमूर्ति, आदि ख्यात लोगों के चित्र भी बहुत प्रसिद्ध हुए। देष के विभाजन के उनके खींचे अनेक चित्र अपने आप में इतिहास के अध्याय हैं। एनसीईआरटी की स्कूली किताबों में भी उनके अनेक चित्रों का इस्तेमाल किया गया है।
सुनील जाना 1918 में 17 अप्रैल को डिब्रूगढ़, आसाम में पैदा हुए थे। उनके पिता कलकत्ता के नामी वकील थे और सुनील जाना की पढ़ाई-लिखाई भी कलकत्ते में ही हुई। सेंट ज़ेवियर और प्रेसिडेंसी कॉलेज में अपनी पढ़ाई के दौरान ही वे वामपंथी राजनीति के संपर्क में आ गए थे और बाद में 1943 में पी. सी. जोषी के संपर्क में आने पर उन्होंने पढ़ाई अधूरी ही छोड़कर पूरी तरह वामपंथ का रास्ता अपना लिया। पी. सी. जोषी उन दिनों अकाल के हालात का जायजा लेने बंगाल के भीतरी ग्रामीण इलाक़ों में जा रहे थे। उनके साथ चित्रकार चित्तप्रसाद भी जा रहे थे। दोनों ने सुनील जाना को भी साथ ले लिया। सुनील जाना बताते हैं ‘पी. सी. जोषी लिखते थे और मैं तस्वीरें खींचता था। उनके पास बिल्कुल साधारण सा एक कोडक कैमरा था। बस, वहीं से मेरी ज़िंदगी बदल गई।’ उधर पी.सी. जोषी कलकत्ता से वापस लौटे, उधर सुनील जाना उड़ीसा के अकाल पीड़ितों की तस्वीरें लेने चले गए। उधर पी.सी. जोषी की रिपोर्ट और सुनील जाना की खींचीं तस्वीरें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के अख़बार ‘पीपुल्स वार’ में छपीं तो सारी दुनिया के कम्युनिस्ट देषों की प्रेस ने उन्हें छापा और सुनील जाना अचानक ही भारत के बेहतरीन फोटोग्राफर के तौर पर स्थापित हो गए। पी. सी. जोषी ने उनकी फोटोग्राफी और विचारधारा के प्रति उनकी समझ को देखते हुए उन्हें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का फोटोग्राफर बनाया। सुनील जाना ने एक इंटरव्यू में बताया है कि मैं और मेरे घर के लोग चाहते थे कि मैं कम्युनिस्ट पार्टी का फोटोग्राफर बनने के पहले अपनी परीक्षाएँ दे दूँ ताकि डिग्री तो पूरी हो जाए। लेकिन पी. सी. जोषी ने कहा कि ‘बिल्कुल नहीं। यह परीक्षाएँ वगैरह बिल्कुल बकवास और ग़ैरज़रूरी है।’ फिर मुझे भी महसूस हुआ कि हाँ, वाकई, यह निहायत ही ग़ैरज़रूरी हैं।
उसके बाद जोषी उन्हें लेकर मुंबई चले गए जहाँ उस वक़्त पार्टी का मुख्यालय था। वे पार्टी के होल टाइमर बने। चित्तप्रसाद और वे वहीं साथ-साथ रहा करते थे। दोनों ही इप्टा और प्रगतिषील लेखक संघ से गहरे जुड़े हुए थे। उस वक़्त उन्हें 20 रुपये भत्ता मिलता था जिसमें से 10 रुपये वहाँ की सांझी रसोई में चला जाता था।
उसके बाद पार्टी उनसे जहाँ जाने को कहती, वहाँ जाते, तस्वीरें खींचते। धरनों, सभाओं, आंदोलनों, गिरफ़्तारियों, दमन, नौसेना विद्रोह, किसान विद्रोह, काँग्रेस, मुस्लिम लीग, बांग्लादेष युद्ध तमाम नेताओं और आंदोलनों के साथ-साथ वे आम मेहनतकष लोगों के गौरवपूर्ण जीवन को भी दर्ज करते चलते। उनके मुताबिक वे आम लोगों और आम दृष्यों की ख़ास तस्वीरें लेकर यह बताना चाहते थे कि कम्युनिस्ट पार्टी किन लोगों के लिए है। ज़ाहिर है सुनील जाना को इतनी स्वतंत्रता के साथ काम करने का अवसर देने में पी. सी. जोषी की गहरी सांगठनिक सूझ और कला की पारखी दृष्टि का विषेष महत्त्व था।
‘पीपुल्स वार’ और बाद में ‘पीपुल्स एज’ में उन्हें एक पन्ना ही फोटो फीचर के लिए दिया गया जिसमें सुनील जाना ने आम लोगों की ज़िंदगियों, उनके संघर्षों, काम करते हुए मेहनकष लोगों के सौंदर्य, नाव खेते, घानी चलाते, मछली पकड़ते, कोयला खदानों में, घरों-खेतों में मेहनत करते स्त्री-पुरुषों से लेकर तीर-कमान थामे आदिवासियों, मोर्चे पर जाते किसान-मज़दूरों, तेलंगाना के क्रांतिकारियों तक के बेहतरीन फोटोग्राफ्स से कम्युनिस्ट पार्टी के विचार और प्रतिबद्धता को लोगों के बीच स्थापित किया।
जब सुनील जाना, उनके चित्र और उस ज़रिये बंगाल के अकाल पर दुनिया भर की नज़र गई तो उस ज़माने की बेहद प्रसिद्ध पत्रिका ‘लाइफ़’ और ‘लाइफ़’ की अत्यंत प्रसिद्ध फ़ोटोग्राफ़र मार्गरेट बुर्क व्हाइट हिंदुस्तान के अकाल को कवर करने के लिए हिंदुस्तान आईं।
मार्गरेट बुर्क व्हाइट तब तक सारी दुनिया में दुनिया में युद्ध की पहली महिला पत्रकार होने, सोवियत संघ की ज़मीन पर आमंत्रित और वहाँ के भारी उद्याोगों की तस्वीरें लेने वाली पहली विदेषी पत्रकार होने, वैष्विक मंदी की बोलती तस्वीरों और साथ ही स्टालिन का मुस्कुराता हुआ दुर्लभ चित्र लेने के लिए सारी दुनिया में विख्यात हो चुकी थीं। उनके बारे में किसी ने लिखा है ‘‘वह महिला जिसे भूमध्य सागर में टॉरपीडो से उड़ाया गया, जिस पर जर्मनी के हवाई बेड़े ने बमबारी की, जिसे आर्कटिक के एक द्वीप पर छोड़ दिया गया और जिसका हवाई जहाज ध्वस्त होने पर उसे चेसापीक की खाड़ी से बाहर निकाला गया, उसे लाइफ़ पत्रिका के स्टाफ़ के लोग मैगी-दि इंडिस्ट्रक्टिबल (अविनाषी) कहा करते थे।’’
तब तक अकाल बंगाल से आंध्र और दक्षिण के अन्य हिस्सों तक पहुँच गया था। मार्गरेट बुर्क व्हाइट कम्युनिस्ट पार्टी के संपर्क में आईं और वहाँ पी. सी. जोषी ने सुनील जाना से उनका परिचय करवाया। मार्गरेट बुर्क व्हाइट को भारत में अपना कोई रास्ता दिखाने वाला और मददगार चाहिए था। इत्तफ़ाक से सुनील जाना पहले ही वहाँ जाने की योजना बना चुके थे। तय हुआ कि दोनों साथ-साथ जाएँगे। सुनील जाना ने फ्रंटलाइन पत्रिका में प्रकाषित वी. के. रामचंद्रन को दिए एक इंटरव्यू में बताया कि ‘पहली बार, कम्युनिस्ट पार्टी के हिस्से का ख़र्च ‘लाइफ़’ पत्रिका ने उठाया और पहली ही बार मैं रेल के फ़र्स्ट क्लास मैं बैठा।’
मार्गरेट बुर्क व्हाइट भारत में 1945 से 1948 तक रहीं। उन्होंने भारत की राजनीतिक हलचलों को दर्ज करने के साथ ही भारत के कोनों-अंतरों को, यहाँ के आम जन-जीवन को भी देखा और पहचाना। उस पूरे प्रवास और यात्रा में मार्गरेट बुर्क व्हाइट ने अपने लिए अलग तस्वीरें खींचीं और सुनील जाना ने अपना काम किया। दोनों ने स्वतंत्र काम किया और इस दौरान हुई उनकी दोस्ती जीवनपर्यंत चली। आज जो तस्वीरें गाँधी, नेहरू, जिन्ना, शेख अब्दुल्ला या विभाजन आदि की हम देखते हैं, उनमें बहुत इन्हीं दोनों की खींची तस्वीरें हैं। यहाँ तक कि गाँधीजी की हत्या के सिर्फ़ एक घंटे पहले मार्गरेट बुर्क व्हाइट ने उनका इंटरव्यू किया था और तस्वीरें खींची थीं।
उस दौर के बारे में सुनील जाना ने बताया है, ‘‘मैं अपनी पार्टी और राजनीतिक विचारधारा का एक प्रतिबद्ध कार्यकर्त्ता था। मैं एक समर्पित कम्युनिस्ट था। साथ ही इतने सौंदर्य से भरे इतनी विविधताओं वाले देष में फ़ोटोग्राफ़र होना, मुझे लगता था कि मुझ पर देष की विषेष कृपा रही है।’’
कम्युनिस्ट पार्टी में जब 1948 में मतभेद हुए और कॉमरेड पी. सी. जोषी पार्टी के महासचिव पद पर नहीं रहे तभी सुनील जाना और कम्युनिस्ट पार्टी में भी दूरी बन गई। कॉमरेड पी. सी. जोषी उनके लिए बहुत मायने रखते थे। सुनील जाना ने 1947-48 में कलकत्ते में अपना एक फ़ोटो स्टूडियो खोला और उन्होंने कलात्मक फ़ोटोग्राफ़ी के काम को जारी रखते हुए उन्होंने देष भर में बिखरे प्राचीन स्मारकों, मंदिरों आदि के स्थापत्य को और विभिन्न भारतीय नृत्यों की तस्वीरें खींच उन्हें दस्तावेज़ बनाना शुरू किया। शांताराव, रागिनी देवी, इंद्राणी रहमान, बड़े ग़ुलाम अली ख़ान जैसे उस वक़्त के महान कलाकारों की उन्होंने यादगार तस्वीरें खींचीं। उन्होंने 1949 में कलकत्ता फ़िल्म सोसायटी की स्थापना की जिनमें चिदानंद दासगुप्ता, हरि दासगुप्ता और अन्य लोगों के साथ-साथ सत्यजित राय भी शरीक थे। सुनील जाना की पहली किताब ‘दि सेकंड क्रिएचर’ का कवर सत्यजित राय ने ही डिज़ाइन किया था। उसके बाद उनकी ‘डांसेज़ ऑफ़ दि गोल्डन हॉल’ और ‘दि ट्राइबल्स ऑफ इंडिया’ शीर्षक से दो किताबें और आयीं। ‘दि ट्राइबल्स ऑफ़ इंडिया’ किताब पर उनका काम प्रसिद्ध नृतत्वविज्ञानी वेरियर एल्विन के साथ था। उनकी एक किताब ‘फ़ोटोग्राफ़िंग इंडिया’ प्रकाषित होने के पहले ही उनकी मृत्यु हो गई। यह किताब जल्द ही ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाषित होगी जिसमें सुनील जाना ने न केवल छः दषकों में फैले अपने चित्रों को समेटा है बल्कि इसमें आत्मकथात्मकता भी है और साथ ही 9/11 के बाद अमेरिका में रहने के अपने अनुभव भी उन्होंने लिखे हैं।
कम लोग ही यह बात जानते हैं कि कैमरे की आँख से दुनिया को पूरी तीव्रता के साथ पकड़ने वाले सुनील जाना की सिर्फ़ एक आँख ही दुरुस्त थी। दूसरी कभी बचपन में ही ग्लूकोमा की षिकार हो गई थी। इसके बावजूद सुनील जाना अपने निगेटिव्स को ख़ुद ही डेवलप किया करते थे। आख़िरी वर्षों में उनकी दूसरी आँख ने भी उनका साथ छोड़ दिया था। उन्होंने फ़ोटोग्राफ़ी का कोई विधिवत ज्ञान हासिल नहीं किया था। जो सीखा, करके सीखा और उस ज़माने के जो उस्ताद फ़ोटोग्राफ़र माने जाते थे, उनके पास जाकर सीखा। तीस के दषक से 90 के दषक तक, साठ वर्ष तक वे फ़ोटोग्राफ़ी करते रहे। इन साठ वर्षों में उन्होंने किसान-मज़दूरों के संघर्षों, आज़ादी के आंदोलन, भारत के प्राचीन स्थापत्य से लेकर आज़ाद भारत के तीर्थ कहे जाने वाले उद्योगों, बाँधों, कल-कारखानों, रेलवे लाइनों तक के निर्माण को, राजनीतिक-सामाजिक- सांस्कृतिक-वैज्ञानिक विभूतियों से लेकर देष के विभिन्न आदिवासी समुदायों, दंगों, अकाल, लाषों के ढेर, विद्रोह, विभाजन, विस्थापन से लेकर मनुष्य के श्रम और उन्मुक्त जीवन सौंदर्य को उन्होंने तस्वीरों में दर्ज किया। अर्जुन ने अपने पिता की तस्वीरों के बारे में कहा है कि उनके चित्रों में एक कविता जैसा गठन होता है।
सत्तर के दषक तक उनकी प्रदर्षनियाँ देष-विदेष में अनेक जगह लगती रहीं। योरप के पूर्व समाजवादी देषों में अनेक जगह उनके चित्र प्रदर्षित हुए। बाद में, 1978 में वे लंदन जा बसे जहाँ उनकी पत्नी शोभा डॉक्टर थीं। वहाँ उनके चित्रों की अनेक प्रदर्षनियाँ लगीं, उन्हें अनेक सम्मान मिले। लंदन में 1992 में नेहरू सेंटर के खुलने के तत्काल बाद उसमें सुनील जाना की तस्वीरों पर केन्द्रित कार्यक्रम हुआ। उनके काम और जीवन पर बीबीसी टीवी और आईटीवी ने दो डॉक्युमेंट्री फ़िल्में बनायीं। उनकी खींची तस्वीरों के बड़े-बड़े प्रदर्षन दिल्ली, मुंबई, कोलकाता में हुए। हवाना महोत्सव में उनकी तस्वीरें दिखायीं गईं। विष्वविख्यात नृत्यांगना इंद्राणी रहमान के बेटे राम रहमान ने, जो स्वये एक प्रसिद्ध फ़ोटोग्राफ़र भी हैं, 1998 में सुनील जाना की तस्वीरों की एक प्रदर्षनी न्यूयॉर्क की 678 कला वीथिका में आयोजित की थी जिसे गजब की सराहना मिली। लंदन से 2002 में जाना दंपति अमेरिका आ गए और तब से वहीं रह रहे थे।
आख़िरी वक़्त तक उन्होंने जीवन और समाजवाद में अपना विष्वास नहीं डिगने दिया। वे एक दृष्य इतिहास अपने पीछे छोड़ कर गए हैं। इस खजाने और इसे बनाने वाले, दोनों की अनेक दषकों से देखभाल करने का काम चुपचाप करती आ रहीं थीं उनकी पत्नी शोभा जाना का निधन 86 की उम्र में 18 मई 2012 को ही हुआ था। वे पेषे से डॉक्टर थीं। उनके निधन के बाद सुनील जाना बमुष्किल एक महीना ही अपनी साँसें खींच पाये। उनकी बेटी और अर्जुन की बहन मोनुआ जाना का निधन असमय ही सन् 2004 में हो गया था।
सुनील जाना और शोभा जाना के निधन की ख़बर पर कॉमरेड बर्धन ने अर्जुन को शोक-संदेष भेजा। जब वह बोल रहे थे और मैं टाइप कर रहा था तो मुझे वे पुराने दिनों में जाते-आते दिख रहे थे। मुझे कभी-कभी लगता है कि मुझे भी उसी वक़्त में होना था। क्या लोग हुआ करते थे उस दौर में।
सुनील जाना भले कम्युनिस्ट पार्टी के बाद में सदस्य न रहे हों लेकिन उनका आदर्ष आजीवन समाजवाद ही बना रहा। उन्होंने 1998 में इंटरव्यू में कहा था,‘‘बेषक आज भी मेरा यक़ीन समाजवाद में ही है। पूँजीवाद एक असभ्य और पाषविक व्यवस्था है जिसकी बुनियाद लालच है।’’ राम रहमान ने उनके बारे में सही कहा है कि ‘‘सुनील जाना बाक़ी फ़ोटोग्राफ़रों से अलग थे। वे एक सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ता थे और उनका राजनीतिक कार्य ही फ़ोटोग्राफ़ी था।’’
दुनिया कई मायनों में बहुत छोटी हो गई है लेकिन इतनी भी नहीं कि हम तमाम इप्टा-प्रलेसं के दोस्त उनके बेटे अर्जुन के पास पहुँच सकें और कहें कि हम सब तुम्हारे साथ ही हैं। फिर भी, यह तो हम सब कहना ही चाहते हैं कि सुनील जाना हमारे भी परिवार के हिस्से थे और रहेंगे और इस नाते अर्जुन भी दुनिया के विषाल कम्युनिस्ट परिवार का हिस्सा है, अकेला नहीं।




-  विनीत तिवारी comvineet@gmail.com
इस ब्लाग के साथ प्रकाशित छायाचित्र कापीराईट प्रोटेक्टेड हैं। लेख प्रकाशित किया जा सकता है परन्तु फोटो छापने के लिए कामरेड सुनील जाना के पुत्र से सम्पर्क करें। - सम्पादक
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बुधवार, 8 अगस्त 2012

अखिलेश न करें यमुना एक्सप्रेस वे का उद्घाटन

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल द्वारा जारी एक प्रेस बयान में मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव से मांग की गयी है कि वे आम जनता तथा किसानों के हितों की रक्षा की गारंटी किये बिना जमुना एक्सप्रेस वे का उद्घाटन न करें .
भाकपा के राज्य सचिव डॉ.गिरीश ने कहा कि सेवा प्रदाता (जे.पी.ग्रुप) ने अभी तक उन तमाम किसानों का भुगतान नहीं किया है जिनकी जमीनें इस मार्ग के निर्माण के लिए अधिग्रहीत की गयीं हैं .साथ ही अभी भी इस मार्ग से जोड़ने वाली तमाम सर्विस रोड्स बनायी नहीं गयी हैं .सबसे ज्यादा चोंकाने वाली बात यह हैकि कि इसपर प्रस्तावित टोल टैक्स इतना ज्यादा हैकि आम आदमी की कमर ही टूट जाए .ज्ञातव्य हो कि यह छोटे वाहनों (कार आदि ) पर रु.२.१० प्रति कि.मी. और बड़े वाहनों पर इससे भी ज्यादा प्रस्तावित है .भाकपा ने इसे जनता की जेब पर डाका करार दिया है .
डॉ. गिरीश ने मुख्यमंत्री जी से मांग की कि वे पहले किसानों के बकायों का भुगतान कराएं, सभी अधूरे निर्माणों को पूरा करवाएं तथा छोटे वाहनों का टोल टेक्स रु.१.०० प्रति कि. मी. तथा बड़े वाहनों का रु.२.०० प्रति कि.मी. की दर से निर्धारित कराएं; तभी इस मार्ग का उद्घाटन करें .वरना यह लूट मार्ग ही साबित होगा .
डॉ.गिरीश . राज्य सचिव , भाकपा , उ.प्र.
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मंगलवार, 7 अगस्त 2012

मीडिया की गैर जिम्मेदाराना भूमिका

देश सूखा, बेरोजगारी और मुद्रास्फीति में उलझा है। किसानों को उनके उत्पादों का पूरा मूल्य नहीं मिलता। आत्महत्याओं का सिलसिला जारी है। कहीं किसान आत्महत्यायें कर रहे हैं, कहीं बेरोजगारी से तंग नौजवान आत्महत्यायें कर रहे हैं और कहीं भूख से लोगों की जाने जा रही हैं तो कहीं लोग बिना इलाज के मर रहे हैं।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली ठप्प हो चुकी है। सट्टेबाजों के आगे सरकार नत-मस्तक है। विकास दर को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाने के लिए तरह-तरह के उपक्रम चल रहे हैं। चालू खाते का घाटा बढ़ता चला जा रहा हैं। सरकार को केवल (विदेशी) निवेशकों की चिन्ता है। लोग भूख से मर रहे हैं तो मरते रहें। सरकार भारी सब्सिडी देकर खाद्यान्न का निर्यात तो कर सकती है परन्तु भूखे देशवासियों को निवाला नहीं दे सकती।
30 जुलाई से वामपंथी दलों - भाकपा, माकपा, आरएसपी और फारवर्ड ब्लाक ने आम जनता के लिए ”खाद्य सुरक्षा“ पर पांच दिवसीय धरना दिल्ली के जंतर-मंतर पर दिया। धरने पर रोजाना 5000 से अधिक का जनमानस रोजाना शामिल होता रहा। धरने में शामिल होने वाले लोग प्रतिदिन बदल रहे थे। देश के कोने-कोने से प्रतीकात्मक रूप से जनता प्रतिदिन आती थी, धरने में शरीक होती थी और वापस लौट जाती थी।
इस आन्दोलन की एक प्रमुख मांग थी - एपीएल और बीपीएल की श्रेणियों को समाप्त कर देश के हर परिवार को 2 रूपये प्रति किलोग्राम की दर से 35 किलो अनाज का पैकेट घर-घर पहुंचाने की व्यवस्था की कानूनी गारंटी की जाये।
इसी जंतर मंतर पर दूसरी ओर एक दूसरा आन्दोलन चल रहा था - अन्ना टीम का आन्दोलन। इस आन्दोलन को चलाने वालों में तरह-तरह के लोग शामिल थे। यह आन्दोलन पिछले साल जब शुरू हुआ था तब से ही इसे चलाने वालों के चरित्र पर उंगलियां उठी थीं। शुरूआती दौर में ही इस आन्दोलन पर लगभग एक सौ करोड़ रूपये का खर्चा आया था। पूरे देश में तिरंगा झंडा, अन्ना के चेहरे वाली टीशर्ट, बैनरों आदि की बाढ़ आई हुई थी। यह सब व्यवस्था रातों-रात सम्भव नहीं थी। लोगों ने इस खर्च के श्रोत पर भी सवाल खड़े किये थे।
यह दूसरा आन्दोलन भी 3 अगस्त को समाप्त हो गया - इस घोषणा के साथ कि वह अब राजनीतिक विकल्प पेश करने के लिए काम करेगा। हालांकि एक दिन पहले तक वे राजनीति से दूर रहने की कसमें खा रहे थे।
मध्यम वर्ग में इस दूसरे आन्दोलन के प्रति उपजी सहानुभूति के स्पष्ट कारण थे। एक के बाद एक लगातार खुलते घपले-घोटालों की खबरों से आम जनता उद्वेलित थी। उसमें गुस्सा था। आजकल का वह मध्यम वर्ग जो टीवी पर चैनलों को बदल-बदल कर अपनी शाम काटता है, वह इस आन्दोलन के पहले दौर में बहुत प्रभावित हुआ था।
पूंजी नियंत्रित समाचार माध्यम (मीडिया) का एक बड़ा हिस्सा इस आन्दोलन की खबरों से अटा पड़ा था और पहले वाले आन्दोलन का उसने बहिष्कार कर रखा था। इस बहिष्कार का एक कारण तो मालिकों की नीति थी तो दूसरी ओर मीडिया में काम कर रहे अति उत्साही और अतार्किक लोग थे।
इंदौर में 5 अगस्त को वरिष्ठ पत्रकार महेन्द्र जोशी की याद में ‘अण्णा आन्दोलन, मीडिया और आन्दोलन की परिणति’ विषय पर आयोजित परिचर्चा में भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू ने मीडिया पर आरोप लगाते हुए कहा कि (अण्णा हजारे के) आन्दोलन के दौरान मीडिया का एक बड़ा हिस्सा भावनाओं में बह गया और उसने गैर जिम्मेदाराना बर्ताव किया। काटजू ने स्पष्ट कहा कि तटस्थ भाव से रिपोर्टिंग करने के बजाय वे खुद आन्दोलन का हिस्सा बन गये। काटजू ने कहा, ”आपमें (पत्रकारों में) गुणदोष के आधार पर विवेचना की क्षमता होनी चाहिये। आपको घटनाओं का तार्किक विश्लेषण करना था। लेकिन आप भी उसी जज्बात में बह गए। .... बाबरी मस्जिद आन्दोलन के दौरान भी हिंदी प्रेस का एक हिस्सा कारसेवक हो गया था। यह मीडिया का भारी दोष था।”
इस आन्दोलन के बारे में बाकायदा दलील देते हुए काटजू ने कहा कि अगर उनकी बातें मान ली जायें तो भ्रष्टाचार दो गुना हो जायेगा क्योंकि आजकल की निम्न नैतिकता के चलते अधिकतर निरंकुश लोकपालों के ब्लैकमेलर हो जाने का खतरा है।
इस आन्दोलन द्वारा देश को राजनैतिक विकल्प देने के सवाल पर काटजू ने कहा कि अन्ना ने कहा कि वे खुद चुनाव नहीं लड़ेंगे क्योंकि चुनाव लड़ने में 15-20 करोड़ रूपये खर्च होते है और इतनी मोटी रकम उनके पास नहीं है। उन्होंने सवाल किया कि फिर चुनाव में 15-20 करोड़ रूपये खर्च करने लायक ईमानदार उम्मीदवार वे कहां से लायेंगे? उन्होंने मीडिया पर आरोप जड़ते हुए कहा कि गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, दवाइयों की किल्लत के अहम मुद्दों को प्रमुखता से दिखाने के बजाय वे क्रिकेट को अफीम की तरह परोस रहे हैं। उन्होंने मीडिया को सलाह दी कि वह जनता के बौद्धिक स्तर को अपनी रिपोर्टिंग से ऊंचा उठायें।
वास्तविक मुद्दों पर चुप्पी तथा गैर मुद्दों को सनसनी के तौर पर पेश कर राजनीति को मुद्दाविहीन बनाना मीडिया को बन्द करना चाहिए। इस मामले में हम जो कुछ कहना चाहते थे, कमोबेश वही न्यायमूर्ति काटजू ने कह दिया। मीडिया को इससे सबक लेना चाहिए। वैसे हमें भी वैकल्पिक मीडिया के लिए कुछ करना चाहिए।
- प्रदीप तिवारी
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सोमवार, 6 अगस्त 2012

चीनी मिलों पर किसानों के बकायों का शीघ्र भुगतान न कराया गया तो फैलेगा किसान आन्दोलन - भाकपा

लखनऊ 6 अगस्त। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य मंत्रिपरिषद ने उत्तर प्रदेश सरकार से मांग की है कि वह चीनी मिलों पर किसानों के भारी बकाये का तत्काल भुगतान कराये। भाकपा ने चेतावनी दी है कि यदि किसानों के बकाये का तत्काल भुगतान नहीं कराया गया तो प्रदेश भर में किसान आन्दोलन भड़क उठेगा।
यहां जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि प्रदेश के चीनी मिलों पर गन्ना किसानों का वर्ष 2011-12 का 1800 करोड़ बकाया है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस बकाये के भुगतान का आदेश जारी कर दिया है लेकिन फिर भी राज्य सरकार और चीनी मिलों के मालिकों के बीच चल रही सांठगांठ के चलते किसानों के धन के भुगतान को टाला जा रहा है।
भाकपा राज्य सचिव ने कहा कि इस भुगतान के विलम्बित होने से किसानों में भारी आक्रोश पनप रहा है और वे जगह-जगह आन्दोलन करने को बाध्य हो रहे हैं। मेरठ जनपद की मवाना चीनी मिल पर भी किसानों का 66 करोड़ रूपये बकाया है जो ब्याज समेत 71 करोड़ हो चुका है। इस बकाये की अदायगी की मांग को लेकर भाकपा समर्थित किसान सभा ने मवाना चीनी मिल के मुख्यद्वार पर अनिश्चितकालीन धरना-प्रदर्शन शुरू कर दिया है जिसमें सैकड़ों किसानों ने भागीदारी की है। का. जितेन्द्र कुमार सिंह के नेतृत्व में चल रहे इस धरने के माध्यम से मांग की जा रही है कि मवाना चीनी मिल मय ब्याज के किसानों के समस्त बकाये का अविलम्ब भुगतान करे। इसी तरह के आन्दोलन की रूपरेखा अन्य जिलों में भी बनती नजर आ रही है।
भाकपा राज्य सचिवमंडल ने गन्ना किसानों के आन्दोलन का पुरजोर समर्थन करते हुए चेतावनी दी कि यदि यह भुगतान तत्काल नहीं कराया गया तो किसान आन्दोलन प्रदेश भर में फैल जायेगा।
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गुरुवार, 2 अगस्त 2012

वो सुबह कभी तो आएगी



इन काली सदियों के सर से जब रात का आंचल ढलकेगा
जब दुख के बादल पिघलेंगे जब सुख का सागर झलकेगा
जब अम्बर झूम के नाचेगा जब धरती नगमे गाएगी

वो सुबह कभी तो आएगी
जिस सुबह की ख़ातिर जुग जुग से हम सब मर मर के जीते हैं
जिस सुबह के अमृत की धुन में हम ज़हर के प्याले पीते हैं
इन भूखी प्यासी रूहों पर इक दिन तो करम फ़रमाएगी

वो सुबह कभी तो आएगी

माना कि अभी तेरे मेरे अरमानों की क़ीमत कुछ भी नहीं
मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर इन्सानों की क़ीमत कुछ भी नहीं
इन्सानों की इज्जत जब झूठे सिक्कों में न तोली जाएगी

वो सुबह कभी तो आएगी

दौलत के लिए जब औरत की इस्मत को ना बेचा जाएगा
चाहत को ना कुचला जाएगा, इज्जत को न बेचा जाएगा
अपनी काली करतूतों पर जब ये दुनिया शर्माएगी

वो सुबह कभी तो आएगी

बीतेंगे कभी तो दिन आख़िर ये भूख के और बेकारी के
टूटेंगे कभी तो बुत आख़िर दौलत की इजारादारी के
जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जाएगी

वो सुबह कभी तो आएगी

मजबूर बुढ़ापा जब सूनी राहों की धूल न फांकेगा
मासूम लड़कपन जब गंदी गलियों में भीख न मांगेगा
हक़ मांगने वालों को जिस दिन सूली न दिखाई जाएगी

वो सुबह कभी तो आएगी

फ़आक़ों की चिताओ पर जिस दिन इन्सां न जलाए जाएंगे
सीने के दहकते दोज़ख में अरमां न जलाए जाएंगे
ये नरक से भी गंदी दुनिया, जब स्वर्ग बनाई जाएगी

वो सुबह कभी तो आएगी

जिस सुबह की ख़ातिर जुग जुग से हम सब मर मर के जीते
जिस सुबह के अमृत की धुन में हम ज़हर के प्याले पीते हैं
वो सुबह न आए आज मगर, वो सुबह कभी तो आएगी
वो सुबह न आए आज मगर, वो सुबह कभी तो आएगी

वो सुबह कभी तो आएगी
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बुधवार, 1 अगस्त 2012

क्या मीडिया का यह रोल उचित है?

लखनऊ 1 अगस्त। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य एवं उत्तर प्रदेश राज्य सचिव डॉ. गिरीश ने निम्नलिखित प्रेस बयान जारी किया है:

उस समय जब 100 में से 77 लोग 20 रूपये रोज में गुजारा करने को मजबूर हैं उस समय बीपीएल और एपीएल का लफड़ा खतम कर क्या हर परिवार को 35 कि.ग्रा. अनाज हर परिवार को हर माह 2 रु. प्रति कि.ग्रा. की दर पर मुहैय्या कराने की मांग से बढ कर कोई और मांग उचित हो सकती है? उस समय जब देश का किसान अपना पसीना बहा कर खाद्यान्नों के उत्पादन में जुटा हो; उसे उसकी पैदावारों की बाजिव कीमतें दिलाने और उन्हें खाद, बीज, कीटनाशक तथा डीजल आदि उचित मूल्य पर दिलाने की की मांग से अधिक महत्वपूर्ण कोई और मांग हो सकती है क्या? बेहद मेहनत से पैदा किये खाद्यान्न भण्डारण की व्यवस्था के अभाव में नष्ट हो रहे हों तो उनके भण्डारण की समुचित व्यवस्था की मांग करना कोई गुनाह है क्या? और इन मुद्दों को प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा अधिनियम में शामिल कराने की आवाज उठाना अनुचित है क्या? इन प्रश्नों का केवल यह जवाब है कि यह मांगे अनुचित नहीं बल्कि उचित हैं।
और जब देश भर की जनता कमरतोड़ महंगाई से त्राहि-त्राहि कर रही हो तथा महाभ्रष्टाचार के खिलाफ सडकों पर उतर रही हो उस वक्त वामपंथी दलों द्वारा राजधानी दिल्ली में दिया जा रहा पांच दिवसीय महाधरना नजरअंदाज किये जाने योग्य है क्या? इस प्रश्न का केवल एक ही उत्तर है कि कदापि नहीं।
लेकिन यही हो रहा है. उपर्युक्त ज्वलंत सवालों पर देश के चारों वामदल जो देश की राजनीति को जनोन्मुख बनाने में अहम् भूमिका निभाते रहे हैं, 30 जुलाई से जंतर मंतर पर पांच दिवसीय धरना दे रहे हैं जिसमें प्रतिदिन हजारों गरीब, मजदूर ,किसान भाग ले रहे हैं। इतना ही नहीं चारों दलों का शीर्ष नेतृत्व प्रतिदिन धरने में कार्यकर्ताओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर बैठ रहे हैं। लेकिन प्रमुख समाचार पत्रों और न्यूज़ चैनलों द्वारा इस धरने को अपने समाचारों में पूरी तरह से नजरअंदाज करना एकदम विचित्र मगर सही घटना है जिस पर सहज विश्वास करना बेहद कठिन है। मीडिया का यह रवैय्या न केवल आश्चर्यजनक है अपितु खुद उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लगाने वाला है जिसका दावा मीडिया चीख कर करता रहा है।
डॉ. गिरीश ने मीडिया से अपेक्षा जताई है कि वह जन हित के इन प्रमुख सवालों पर अनुकूल रुख अपनाएगा और निष्पक्षता की अपनी छवि को बनाये रखने में अपनी ही मदद करेगा।


कार्यालय सचिव
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रविवार, 29 जुलाई 2012

LEFT PARTIES' DHARNA FOR FOOD SECURITY & AGAINST GALLOPING PRICE RISE & CORRUPTION


Communist Party Of India, Communist Party Of India (Marxisit), Revolutionary Socialist Party and All India Forward Block are jointly organizing a all India massive five days Dharana at Jantar Mantar New Delhi from on 30 th July to 3 rd August 2012 on Food Security to all and a comprehensive food Security Bill, the realistic objective of providing food to all. Besides Food Security, galloping inflation & corruption are also issues. This Dharana will start from 10 A.M. to 6 P.M. every day on all the five days. This Dharana will be joined by the workers of all four left parties from all the states of the country. Large numbers of women and students will also participate. This Dharana will Demand as:

  • No BPL or APL, we demand a universal public distribution system.
  • 35 kg of foodgrain at not more than Rs.2 per kg every month for each family. (A bag of 35 Kgs of ration be delivered to every family of the country at their door steps on a payment of Rs 70/- for which suitable mechanism be evolved by the Governments.) 
  • Scrap the planning Commission’s bogus poverty estimates as the basis for welfare rights.
  • Implement the Swaminathan Commission recommendations for a fair price and profit margin for farmers.
  • No to cash coupons but ensured ration to all.
  • Effective curb on inflation, stop forward trading of food grains.
  • Effective & powerful Lokpal Bill.

Top Leaders of all the four left parties will joined the Dharana on first Day.Com. S. Sudhaker Readdy, General Secretary ,CPI, Com. Prakash Karat, General Secretary CPM, Com.T.J. Chandrachudan General Secretary RSP And Com. Devbrata Biswas General Secretary AIFB, Com. A. B. Bhardhan,Com.Amarjeet Kaur, Com. Guru Das Das Gupta, MP, Com. Sita Ram Yaachury MP, Com. D. Raja MP, Com. Vasudev Acharya MP,Com. Brinda Karat, Com. Abni Roy, Com. Dr Girish and Com. Dev Rajan etc.

Delhi leaders Prof. Dinesh C Varshney and Com. Vijendra Sharma, Com. Dhirendra Sharma, Secretary, Delhi CPI, Com. P. M. S. Grewal Secretary, Delhi CPM, Com. Ashit Ganguly Secretary ,Delhi RSP, Com. Dharmendra Verma Secretary Delhi AIFB etc will sit in Dharana for all five days.

All MPs, MLA’s, Corporators as well as others local bodies representatives of all the parties will participate in five day Dharana.

On the first day, more than 5000 CPI workers from Uttar Pradesh led by CPI State Secretary Dr Girish shall participate in the Dharna.

Media people are requested to visit dharna, participate in it & telecast/broadcast/publish the even prominently to show that solidarity with the cause. Non-coverage of the event by the media shall mean in unequivocal terms that media is against food security for all and is in favour of galloping price rise & corruption.
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शनिवार, 7 जुलाई 2012

सुश्री मायावती की आय से अधिक सम्पत्तियों की नए सिरे से सीबीआई जांच की संस्तुति करे राज्य सरकार - भाकपा

लखनऊ 7 जुलाई। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य मंत्रिपरिषद की बैठक आज यहां सम्पन्न हुई। बैठक की अध्यक्षता राज्य सचिव डा. गिरीश ने की।
बैठक में बसपा सुप्रीमो सुश्री मायावती द्वारा अर्जित आय से अधिक सम्पत्तियों सम्बंधी प्रकरण पर गंभीरता से विचार किया गया। इस मुद्दे पर एक प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया गया।
प्रस्ताव में कहा गया है कि इस सवाल को राष्ट्रपति चुनाव पर चल रही सौदेबाजी से अलग करके नहीं देखा जा सकता क्योंकि कांग्रेस नीत केन्द्र सरकार क्षेत्रीय एवं जातिवादी दलों से सौदेबाजी के लिए सीबीआई का लगातार इस्तेमाल करती रही है। यह अनायास नहीं है कि कांग्रेस को घनघोर मनुवादी पार्टी कह कर लगातार कोसने वाली बसपा ने राष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी को अपना समर्थन दे दिया और उसका पुरस्कार भी सुश्री मायावती को चुनाव के पहले ही प्राप्त हो गया।
मुमकिन है कि अभी कुछ और दलों से हुई सौदेबाजी के नतीजे भी सामने आ जायें।
जहां तक सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस प्रकरण में दिये गये निर्णय का सवाल है, न्यायालय ने अपना पक्ष स्पष्ट कर दिया है कि आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में सीबीआई जांच का आदेश उसने नहीं दिया था। लेकिन सुश्री मायावती ने 2003 से लेकर 2012 के मध्य अकूत सम्पत्तियां अर्जित की हैं। जिनके श्रोत का खुलासा होना जनहित में बेहद जरूरी है। अतएव भाकपा मांग करती है कि राज्य सरकार सुश्री मायावती की आय से अधिक सम्पत्तियों की सीबीआई द्वारा जांच की संस्तुति केन्द्र सरकार से करे और केन्द्र सरकार सीबीआई को नई एफआईआर दर्ज कर जांच का आदेश दे। यदि राज्य सरकार ऐसा नहीं करती तो बसपा के भ्रष्टाचार से लड़ने के उसके दावे खोखले ही समझे जायेंगे; प्रस्ताव में कहा गया है।
भाकपा ने चेतावनी दी है कि वह भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उतर कर संघर्ष जारी रखेगी।
डा. गिरीश ने बताया कि पार्टी की राज्य कार्यकारिणी की बैठक रविवार 8 जुलाई को पूर्वान्ह साढ़े दस बजे से पार्टी के राज्य कार्यालय पर होगी जिसमें भ्रष्टाचार, मंहगाई, खाद्य सुरक्षा आदि प्रमुख मामलों पर आन्दोलन की रूपरेखा तैयार की जायेगी।
मंत्रिपरिषद की बैठक में डा. गिरीश के अतिरिक्त अशोक मिश्र, इम्तियाज अहमद पूर्व विधायक, अरविन्द राज स्वरूप, आशा मिश्रा एवं सदरूद्दीन राना ने भाग लिया।
कार्यालय सचिव
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शनिवार, 16 जून 2012

नगर निकाय चुनाव - वामपंथी दलों में बनी आपसी सहयोग की सहमति

लखनऊ 16 जून। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, भाकपा (माले), आल इंडिया फारवर्ड ब्लाक एवं रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी ने फैसला लिया है कि वे उत्तर प्रदेश में चार चरणों में होने जा रहे स्थानीय निकाय चुनावों में एक दूसरे के प्रत्याशियों का समर्थन करेंगे।
यहां सम्पन्न एक बैठक के बाद एक संयुक्त बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश, भाकपा (माले) की राज्य स्थाई समिति के सदस्य अरूण कुमार, फारवर्ड ब्लाक के प्रदेश अध्यक्ष राम किशोर तथा आरएसपी के प्रदेश सचिव संतोष गुप्ता ने कहा कि चारों वामपंथी दल यद्यपि प्रदेश में सीमित सीटों पर ही चुनाव लड़ रहे हैं लेकिन वे वामपंथी दल ही हैं जो निकायों को भ्रष्टाचार से निजात दिलाने तथा वहां जनहितों को पूरा कराने में सक्षम हैं। अब तक विजयी होते रहे पूंजीवादी दलों के पदाधिकारियों ने इन निकायों में भारी भ्रष्टाचार किया है और जनता के अधिकारों का हनन किया है। अतएव ऐसे प्रत्याशियों से जनता का मोहभंग हो रहा है और वह वामपंथ को एक सहयोगी की भूमिका में देख रही है।
वामपंथी दलों ने जनता की आकांक्षाओं की पूर्ति हेतु ही अपने प्रभाव के क्षेत्रों में नगर निगम के मेयर, नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष एवं नगर पंचायतों के चेयरमैन के पदों पर तथा अन्य अनेक वार्डों में सदस्यों के लिए प्रत्याशी उतारे हैं। चारों वामदलों के नेताओं ने अपनी जिला कमेटियों और कार्यकर्ताओं का आह्वान किया है कि वे एक दूसरे दलों के प्रत्याशियों का पुरजोर समर्थन करें।
चारों वाम दलों ने प्रदेश के मतदाताओं से भी अपील की है कि वे इन निकाय चुनावों में वामदलों के प्रत्याशियों के पक्ष में मतदान कर इन निकायों में स्वच्छ प्रशासन प्रदान करने तथा जनता के हितों की बहाली के लिए मार्ग प्रशस्त करें।
(डा. गिरीश)
राज्य सचिव
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी  
 (अरूण कुमार)
सदस्य, राज्य स्थाई समिति
भाकपा (माले) 
  (राम किशोर)
अध्यक्ष
फारवर्ड ब्लाक, उ.प्र.  
 (संतोष गुप्ता)
सचिव
आरएसपी, उ.प्र.
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गुरुवार, 14 जून 2012

तीसरे और चौथे दौर के निकाय चुनावों में भाकपा ने प्रत्याशी उतारे

    लखनऊ 14 जून। तीसरे और चौथे चरण के निकाय चुनावों में भी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कई प्रत्याशी नगर पालिका परिषद एवं नगर पंचायत के अध्यक्ष/चेयरमैन के पद हेतु चुनाव मैदान में उतरे हैं। इसके अलावा सैकड़ों वार्डों में भी भाकपा प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे हैं।

उपर्युक्त जानकारी देते हुए भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने बताया कि नगर पालिका परिषद शाहजहांपुर के अध्यक्ष पद हेतु श्रीमती अंजू, धनौरा से नरेश चन्द्रा, बछराऊं से जाकिर कुरैशी, जलाली से शशि देवी, अतर्रा से शोभा देवी कुरील, तिन्दवारी से रमाकान्त पटेल, मंटौंज से महावीर प्रजापति, गुरूसराय से भागीरथ श्रीवास, प्रतापगढ़ से शीतला प्रसाद सुजान, बांगरमऊ से मास्टर हामिद अली तथा खड्डा नगर पंचायत से शैलेश उपाध्याय चुनाव मैदान में हैं। इसके अलावा पहले दो दौर की सूची पूर्व में ही जारी कर दी गई है।

भाकपा राज्य सचिव ने दावा किया कि नगर निकायों में अब तक चुने जाते रहे पूंजीवादी दलों के प्रत्याशी भ्रष्टाचार में लिप्त रहे हैं और उन्होंने निकाय संस्थाओं को खोखला करके रख दिया है। इसलिये जहां भी भाकपा के प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं, जनता भी उनके साथ लामबंद हो रही है।


कार्यालय सचिव
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रविवार, 10 जून 2012

होशियार! पेट्रोल कीमतों पर जनता की सहनशीलता को परखा है संप्रग ने

23 मई को जब संप्रग सरकार ने पेट्रोल की कीमतों में साढ़े सात रूपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की घोषणा की, उस समय इतनी ज्यादा मूल्यवृद्धि का कोई आधार नहीं था। उसके बाद दो रूपये प्रति लीटर के करीब दामों में कमी की जा चुकी है और परसो 8 मई को वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने कलकत्ता में पेट्रोल की कीमतों में और कमी के संकेत दिये। कारण तो यही बताया गया है कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कीमतों के कम होने के कारण ऐसा होगा। बात दीगर है जब दाम बढ़ाये गये थे तब भी अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार कमी हो रही थी और इन पन्द्रह दिनों के दौरान सिंगापुर क्रूड की कीमतें 107 से 109 डालर के बीच चल रही हैं।
अगर पेट्रोल की कीमतें और कम होती हैं तो जनता को राहत ही मिलेगी। लेकिन मनमोहन और प्रणव जनता पर बढ़ते बोझ के प्रमुख कारण अमरीका के इशारों पर ईरान से सस्ता कच्चा तेल खरीदना कम करते जाने और डॉलर के सापेक्ष रूपये की गिरती कीमतों के बारे में खामोश हैं। अगर डालर के सामने रूपया इसी तरह गिरता रहा जैसाकि वह पिछले 21 सालों में गिरता रहा है, तो अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की गिरती कीमतों का भी कोई असर नहीं हो पायेगा।
एक दूसरी बात, कल एक निजी टीवी चैनल को दिये गये साक्षात्मकार में केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा कि ”अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों के उतार-चढ़ाव से पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्यों को जोड़ने के राजग के फैसले को बदलकर संप्रग सरकार ने गलत किया है। सरकार को व्यापक राष्ट्रहित में कड़े फैसले लेने चाहिए भले ही वे जनता को न सुहाएं।“ जाने अनजाने शरद पवार कई बातें कह गये। एक तो यह कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दामों तथा अमरीकी डालर से पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों को जोड़ने यानी कीमतों को डीरेगुलेट करने का फैसला भाजपा नीत राजग सरकार ने लिया था। इसके साथ उन्होंने जो नहीं कहा, उसे भी समझ ही लिया जाये कि राजग सरकार के इस फैसले को संप्रग-1 की सरकार ने वाम दलों के दवाब में बदला था और वाम दलों की संसद में ताकत घटते ही बनी संप्रग-2 की सरकार ने एक बार फिर पेट्रोल की कीमतों को डीरेगुलेट कर दिया और बार-बार डीजल की कीमतों को भी डीरेगुलेट करने की बात की जा रही है। दूसरा, पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी सहित देश की तमाम क्षेत्रीय पार्टियों (जिसमें सपा और बसपा दोनों शामिल हैं) के लिए देश हित वही है जो अमरीकी साम्राज्यवाद को सुहाता हो और उन्हें इसकी कतई कोई चिन्ता नहीं है कि जनता को वह सुहाता है कि नहीं। पवार ने इस तरह एक बार फिर यह साफ करने की कोशिश की कि उन्हें न किसानों की चिन्ता है, न ही महाराष्ट्र की और न ही दुनियां के सबसे बड़े लोकतंत्र के लोक (जनता) की। इससे इन पार्टियों का वर्गीय चरित्र साफ हो जाता है।
वैसे अगर देखा जाये तो वास्तविक समस्या इस देश की जनता के साथ है। उसने ”जेहि विधि राखे राम, तेहि विधि रहिये“ की तर्ज पर अपने ऊपर होने वाले आक्रमणों को सहने की जबरदस्त शक्ति विकसित कर ली है। मंहगाई बढ़ रही है तो बढ़े, जनता सड़कों पर नहीं दिखाई देती। भ्रष्टाचार बढ़ रहा है तो बढ़े उसे कोई चिन्ता नहीं है, वह सड़क पर नहीं आ सकती। पेट्रोल की कीमतों में साढ़े सात रूपये लीटर की थर्रा देने वाली बढ़ोतरी कर दी गयी लेकिन वह सड़क पर नहीं आई। वामपंथी दलों ने विरोध जताया, उनके कार्यकर्ता सड़कों पर उतरे तो देखादेखी दूसरे राजनीतिक दलों ने भी फर्ज अदायगी में अपने कार्यकर्ताओं को सड़क पर उतारा लेकिन जनता तो सड़कों पर नहीं आई।
संप्रग-2 सरकार ने एसिड टेस्ट कर लिया कि जनता साढ़े सात रूपये लीटर तक भी बर्दाश्त कर लेती है यानी पूंजीवादी रणनीतिकारों के शब्दों में बर्दाश्त कर सकती है। जब बर्दाश्त कर सकती है तो निश्चित रूप से उसे बर्दाश्त कराया जायेगा, बार-बार बर्दाश्त कराया जायेगा और तब तक बर्दाश्त कराया जायेगा जब तक वह बर्दाश्त करती रहेगी।
हमारे विरोध के तरीके शायद पुराने पड़ चुके हैं। कहीं न कहीं हमारी रणनीतियों में कोई कमी है कि हम इतना जबरदस्त प्रहार होने पर भी जनता को बर्दाश्त न करने के लिए उद्वेलित नहीं कर पा रहे हैं। हम सबको मिल कर इस पर सोचना चाहिए और आन्दोलन के वे तरीके विकसित करने चाहिए जिससे बर्दाश्त करने की जनता की ताकत कम हो सके और वह एक बार फिर से सड़को पर उतरना सीखे जैसा कि वह पिछली शताब्दी के पहले 8 दशकों तक उतरा करती थी।
- प्रदीप तिवारी
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शनिवार, 2 जून 2012

कामरेड भानु प्रताप सिंह का निधन


लखनऊ 2 जून। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की उत्तर प्रदेश राज्य कौंसिल सदस्य कामरेड भानु प्रताप सिंह का 70 साल की आयु में 31 मई को लम्बी बीमारी के बाद निधन हो गया। वे लगभग एक दशक तक भाकपा की राज्य कार्यकारिणी के सदस्य रहे थे। वे लगभग एक साल से हृदय रोग से ग्रस्त थे और पीजीआई लखनऊ में उनका दो बार आपरेशन हो चुका था। उनके निधन का समाचार मिलते ही भाकपा के राज्य कार्यालय पर पार्टी के ध्वज को उनके सम्मान में झुका दिया गया और एक संक्षिप्त शोक सभा में उन्हें श्रद्धांजलि दी गयी।
आजमगढ़ जनपद के खरसहन कलां गांव में जन्में कामरेड भानु प्रताप सिंह की शिक्षा-दीक्षा आजमगढ़ जनपद में ही हुई। वहीं वे मार्क्सवाद के प्रति आकर्षित हुए। हिंडालको कारखाने में नौकरी पाने पर वे साठ के दशक में रेणूकूट चले गये। हिंडालको में मजदूरों के शोषण के फलस्वरूप उन्होंने हिंडालको प्रगतिशील मजदूर सभा के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ट्रेड यूनियन के अपने कामों के साथ फैक्ट्री में भी अपने काम को पूर्ण तल्लीनता और लगन के साथ करने के कारण वे केवल हिंडालको के श्रमिकों बल्कि वहां के प्रबंधन द्वारा भी सम्मान की निगाहों से देखे जाते थे। वे ट्रेड यूनियन आन्दोलन के उन नेताओं की विरासत का प्रतिनिधित्व करते थे जिन्होंने अपना सर्वस्व मजदूर आन्दोलन में गंवा दिया। ट्रेड यूनियन कामों के कारण उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया था।
लगभग एक दशक पहले उन्होंने सोनभद्र जनपद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कुलवक्ती कार्यकर्ता के रूप में अपनी पारी शुरू की और उन्होंने सोनभद्र के पठारों के गांव-गांव की खाक छानी और वहां रहने वाले किसानों, खेत मजदूरों तथा आदिवासियों के मध्य पार्टी के काम को शुरू किया और पार्टी संगठन को एक मजबूत आधार प्रदान किया। उन्होंने कभी अपने परिवार की चिन्ता की और ही अपने आराम या खाने की। कोई आय का जरिया होने के बावजूद वे पूरी लगन से सोनभद्र जनपद में जनता को संघर्षों में उतारने और उसे संगठित करने का प्रयास करते रहे। जहां रात हो जाती, वही जो कुछ मिल जाता खाकर सो जाते थे और अगली सुबह अपने अगले गंतव्य की ओर चल देते थे। जीवन की इन्हीं विषम परिस्थितियों में उन्हें कब हृदय रोग हो गया पता नहीं चला।
कामरेड भानु प्रताप सिंह के निधन से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने अपना एक लगनशील सिपाही खो दिया है तो सोनभद्र की गरीब जनता ने अपने संघर्षों के एक प्रणेता को। उनके निधन से उत्पन्न शून्य को कभी भरा नहीं जा सकेगा।
कल उनकी अंतेष्टि उनके पैत्रक गांव खरसहन कलां में कर दी गयी।

कार्यालय सचिव

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