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रविवार, 21 जुलाई 2013
बिजली का निजीकरण पूरी तरह जनविरोधी - भाकपा करेगी तीखा विरोध
शनिवार, 20 जुलाई 2013
at 10:22 am | 0 comments | आर एस पी, फारवर्ड ब्लाक, सी पी आई, सी पी एम
वामपंथी दलों के राष्ट्रीय कन्वेंशन का घोषणा-पत्र (उत्तर प्रदेश के परिप्रेक्ष्य में)
कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार के शासन काल में खाने-पीने की आवश्यक वस्तुओं सहित हर चीज़ के दामों में भारी वृद्धि हुई है. मंहगाई की मार से जनता त्राहि-२ कर उठी है. किसान हितों के विपरीत नीतियों के चलते उनकी आर्थिक हालत जर्जर है और बड़ी संख्या में किसानों ने आत्म-हत्याएं की हैं. जमीनों पर बिल्डरों, खनन माफियाओं और कार्पोरेट घरानों का कब्जा होता जा रहा है. बेरोजगारी की दर में हैरान करने वाली वृद्धि हुई है. पांच साल से कम के ४५ प्रतिशत बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. शिक्षा,इलाज,पेय जल और यहाँ तक कि पर्याप्त भोजन आबादी के बड़े हिस्से को मिल नहीं पा रहा है.
एक ओर जनता जहाँ इस कदर तंग हाल है वहीं संप्रग सरकार ने कार्पोरेट समूहों और बड़े,करोबारियों को भूमि,खनिज, गैस तथा स्पैकट्रम जैसे प्राकृतिक संसाधनों को लूटने की खुली छूट दे दी है. क्षेत्र की विशालकाय संपदाओं को धीरे-२ इन्हीं के हवाले किया जा रहा है. पिछले बजट में इन पर ५ लाख करोड़ रूपये के टैक्स को छोड़ दिया गया. जबकि पेट्रोलियम उत्पादों और उर्वरकों पर दी जाने वाली सब्सिडी में कटौती कर दी गयी. सरकार ने हर क्षेत्र में बड़े-२ घोटालों और भ्रष्टाचार को खुला प्रश्रय दिया है और जनता की अपार संपत्ति उसके हाथों से छिन कर घोटालेबाजों की तिजोरियों में चली गयी. यह सरकार विदेशी वित्तीय पूंजी को लाभ पहुंचाने के लिए खुदरा बाजार में विदेशी निवेश को बढ़ावा दे रही है, परिणाम स्वरूप हमारे लगभग ४ करोड़ खुदरा व्यापारियों की आजीविका संकट में है.
महिलाओं को भोग की वस्तु बना कर रख दिया है अतएव उनके प्रति यौन हिंसा में वृद्धि हुई है. समाज में बराबरी के दर्जे से उन्हें वंचित किया जा रहा है. दलितों पर उत्पीडन बढ़ा है और उन्हें उनके बुनियादी हकों और आर्थिक उत्पादन की गतिविधियों में उनकी भागीदारी से वंचित रखा जा रहा है. मुस्लिम अल्पसंख्यकों की हालत सच्चर कमेटी ने उजागर कर दी है लेकिन इन हालातों में सुधार लाने को बहुत कुछ नहीं किया गया है, आतंकवाद से लड़ाई के नाम पर अक्सर बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों को निशाना बनाया जाता है.
कांग्रेसनीत संप्रग सरकार ने हमारी घोषित विदेश नीति को पलट कर एक ऐसी विदेश नीति को अपनाया है जो हमारे घरेलू हितों की परवाह किये बिना हमें अमेरिकी हितों के पक्ष में खड़ी कर रही है. सीरिया में बढ़ते अमेरिकी –नाटो हस्तक्षेप के साथ भारत की गुप-चुप सहमति और अमेरिकी दबाव में ईरान से तेल की आपूर्ति में लगातार कटौती इसके ताजा उदाहरण हैं.
स्पष्ट है कि संप्रग सरकार की नीतियां जनविरोधी एवं जनवाद विरोधी हैं. वैकल्पिक नीतियों को आगे बढाने को कांग्रेस और संप्रग का न केवल विरोध करना होगा अपितु उन्हें सत्ता से हटाना होगा.
भाजपा की आर्थिक नीतियाँ पूरी तरह वही हैं जो कांग्रेस और संप्रग की. ऊपर से भाजपा घनघोर सम्प्रदायवादी है और समाज का बंटवारा कर मुक्त बाजार की लूट की व्यवस्था को मौका मुहैय्या कराती है. भावी लोकसभा चुनाव में अपनी जीत के लिए उसने मोदी का चेहरा आगे किया है. मोदी के गुजरात माडल का एक ही अर्थ है –मुस्लिम अल्पसंख्यकों का कत्ले आम और कारपोरेट समूहों की पौ बारह. इसीलिये पूंजीवादी तत्व मोदी का गुणगान कर रहे हैं. इस बात को सरासर छिपाया जा रहा है कि गुजरात में ग्रामीणों, गरीबों,आदिवासियों की हालत बेहद खराब है और सबसे ज्यादा कुपोषण गुजरात में है.
भाजपा संप्रग सरकार के भ्रष्टाचार पर कितनी भी हाय-तौबा करे लेकिन उसका भी दामन घपलों-घोटालों की गन्दगी से अटा पड़ा है. कर्नाटक की उसकी सरकार ने अवैध खनन से हजारों करोड़ की लूट की और विधान सभा चुनावों में उसे भारी हार का सामना करना पड़ा.
आर .एस.एस.और भाजपा ने पिछले एक-डेढ़ साल में उत्तर प्रदेश के कई शहर-कस्बों में साम्प्रदायिक तनाव और हिंसा फैलाने का काम किया है. अब वे पुनः अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के मुद्दों को पुनर्जीवित कर रहे हैं और जम्मू व कश्मीर के सम्बन्ध में संविधान की धारा ३७० को हटाये जाने के अपने ऐजेंडे को आगे बढाने के लिए मौके का इन्तजार कर रहे हैं.
नीतियों और कार्यक्रम के सन्दर्भ में भाजपा,कांग्रेस का विकल्प नहीं है. अतएव सभी धर्म निरपेक्ष,देश भक्त और जनवादी ताकतों का यह कर्तव्य है कि भाजपा को कदापि सत्ता में न आने दें.
यह बहुत ही खतरनाक है कि देश की राजनीति में पैसे की ताकत और व्यापारिक प्रतिष्ठानों का प्रभुत्व बढ़ता जा रहा है. चुनावों में बड़े पैमाने पर धन के इस्तेमाल से राजनीतिक व्यवस्था दूषित हो रही है. जनादेश में जनता की आकांक्षा की जगह धन की ताकत परिलक्षित हो रही है. इसे रोकना होगा. पैसे की ताकत को रोकने के लिए चुनाव सुधारों की फौरी जरूरत है. बुनियादी सुधार के तौर पर आंशिक सूची व्यवस्था के साथ समानुपातिक प्रतिनिधित्व को लागू करने की जरूरत है. इससे एक हद तक धन बल और बाहु बल के दुरूपयोग पर रोक लगेगी.
देश को और अधिक संघीय व्यवस्था की जरूरत है. शक्तियों और संसाधनों का केंद्र के हाथों में संकेन्द्रण को कम किया जाना चाहिए. राज्यों की शक्तियों और अधिकारों को बढ़ाना होगा. जहाँ तक संसाधनों के हस्तांतरण का सम्बन्ध है तो पिछड़े राज्यों को विशेष दर्जा दिया जाना चाहिए. इसके लिए केंद्र राज्य संबंधों के पुनर्गठन की आवश्यकता है.
कांग्रेस नीत यूं.पी.ए.और भाजपा नीत एन. डी. ए. दोनों ही अंतर्विरोधों में फंसे हुए हैं और उनका दायरा सिकुड़ रहा है. ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि दोनों ही प्रमुख दल उन नीतियों और कार्यक्रमों को आगे बढ़ाते रहे हैं जो जनता के हितों में न होकर एक छोटे से दौलतमंद तबके के हित में है. वाम दलों के नेतृत्व वाली राज्य सरकारों को छोड़ कर अन्य राज्य सरकारों ने भी आर्थिक नव उदारवाद के ढाँचे को ही आगे बढ़ाया है. अतएव ये सरकारें केंद्र सरकार के गर्भ से पैदा हो रही जनविरोधी और जनतंत्र विरोधी कार्यवाहियों से मुक्त नहीं हैं. उत्तर प्रदेश सरकार की नीतियां भी कार्पोरेट समूहों,बड़े उद्योग समूहों तथा दलाल-माफियाओं के हित में काम कर रही हैं और किसान,कामगार,दस्तकार और आम आदमी की कठिनाइयाँ बढ़ा रही हैं. यह सरकार अपने चुनावी वायदों को भी पूरा करने से मुकर रही है. किसानों के कर्जे माफ़ नहीं किये गए,समस्त बेरोजगारों को भत्ता देने का वायदा अधूरा पड़ा है,किसानों की जमीनों का बड़े पैमाने पर अधिग्रहण जारी है,बिजली की कीमतों में भारी बढ़ोत्तरी कर दी गयी है,पेट्रोल,डीजल,गैस के ऊपर वैट की दरें कम करने को सरकार तैयार नहीं है,मंहगाई को रोकने में सरकार की कोई भूमिका नहीं है,शिक्षा एवं चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में निजी पूंजी का फैलाव आम आदमी की कठिनाइयों में इजाफा कर रहा है. शासन-प्रशासन में भ्रष्टाचार एवं क़ानून व्यवस्था की बदतर हालत लोकजीवन और सामाजिक सौहार्द पर भारी पड़ रही है. प्रदेश का मुख्य विपक्षी पार्टी बसपा है जो जनता के हित में कभी बोलती तक नहीं. शासक दल और मुख्य विपक्षी दल दोनों ही चुनावी मकसद से जातीय एजेंडे को ही आगे बढ़ा रहे हैं.
आज की जरूरत है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों की नीतियों और उनके राजनीतिक मंचों को खारिज किया जाये. उत्तर प्रदेश सरकार की जनविरोधी कारगुजारियों के विरुद्ध आवाज उठाई जाए तथा बसपा जैसे दलों की मौक़ा परस्ती का पर्दाफ़ाश किया जाए.
देश को एक विकल्प की जरूरत है. ऐसा विकल्प केवल वैकल्पिक नीतियों के आधार पर ही उभर सकता है. एक वैकल्पिक नीति मंच होना चाहिए जिसके इर्द-गिर्द एक राजनीतिक विकल्प बनाया जा सकता है.
देश और प्रदेशों में चल रही आर्थिक नीतियों की जगह वैकल्पिक आर्थिक नीतियां, धर्म निरपेक्ष और सामजिक न्याय की हिफाजत,संघीय ढाँचे की मजबूती और एक स्वतंत्र विदेश नीति,ये तमाम एक वैकल्पिक नीति मंच की महत्वपूर्ण विशेषताएं हैं.
वामपंथी दलों ने आर्थिक,राजनीतिक और सामजिक क्षेत्र में एक ऐसे वैकल्पिक नीति मंच को सामने रखा है. इस वैकल्पिक मंच की मुख्य विशेषताएं हैं:
१.भूमि सुधार के क़दमों को लागू करना. अतिरिक्त जमीन का भूमिहीनों के बीच वितरण. हर एक भूमिहीन परिवार को घर बनाने के लिए जमीन सुनिश्चित करना. जबरन भूमि अधिग्रहण की समाप्ति. लखनऊ आगरा हाईवे जैसे गैर जरूरी मार्गों के निर्माण की योजना को रद्द करना. स्वामीनाथन आयोग की रपट के आधार पर किसानों को वाजिब मूल्य और सस्ता ऋण.
२.अधिक रोजगार के लिए आधारभूत ढाँचे और विनिर्माण व दूसरे उद्योगों हेतु सार्वजनिक निवेश को बढ़ाना . खनन व तेल संसाधनों का राष्ट्रीयकरण. उत्तर प्रदेश में रिक्त पड़े सभी प्रकार के पदों को भरा जाना, बंद पड़ी मिलों को पुनः चलाना.
३.टैक्स संबंधी उपायों में चोर दरवाजों को बंद करना और क़ानून सम्मत टैक्सों की उगाही सुनिश्चित करना. देश में सट्टेबाज वित्तीय पूंजी के प्रवेश पर नियंत्रण. वित्तीय क्षेत्र को निजी धनपतियों के लिए खोले जाने पर रोक. खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नहीं. प्रदेश में पेट्रोलियम पदार्थों पर वैट कम करना.
४.सार्वजनिक जन वितरण प्रणाली को लागू करना जिसमें सभी परिवारों को हर महीने अधिकतम २ रूपये किलो की दर से ३५ किलो अनाज मिले,इसे सुनिश्चित करने के लिए खाद्य सुरक्षा क़ानून को पारित किया जाना चाहिए संप्रग द्वारा बनाया मौजूदा क़ानून खाद्य सुरक्षा प्रदान करने में असमर्थ है. प्रदेश में एक के बाद एक हो रहे खाद्यान घोटालों पर कारगर रोक तथा दोषियों को कड़ी सजा दिया जाना.
५.धर्मनिरपेक्षता के बुनियादी सिद्धांत के रूप में धर्म और राज्य को एक दूसरे से अलग रखने को संविधान में प्राविधान स्थापित करना. साम्प्रदायिक ताकतों पर लगाम लगाने के लिए ठोस कारवाई हो तथा उत्तर प्रदेश में हुए दंगों की उच्च स्तरीय जांच और दोषियों के विरुद्ध ठोस कार्यवाही की जाए.
६.शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए धन आबंटन में बढ़ोत्तरी. स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाओं के निजीकरण पर रोक. शिक्षा का अधिकार क़ानून में अमल की गारंटी. प्रदेश में स्वास्थ्य विभाग में हुए घोटालों के दोषियों को सजा.
७.उच्च स्तरीय भ्रष्टाचार पर नकेल के लिए ठोस कदम. जांच करने की स्वतंत्र शक्तियों वाला लोकपाल क़ानून बने. चुनाव सुधार हों. उत्तर प्रदेश की पूर्व सरकार के कार्यकाल में हुए घोटालों के दोषियों को कड़ी सजा. मौजूदा शासन-प्रशासन में भ्रष्टाचार पर रोक.
८.महिलाओं को सभी क्षेत्रों में बराबर अधिकार. संसद और विधायिकाओं में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण :दलितों के हकों की हिफाजत और एस सी/एस टी के लिए आरक्षण का निजी क्षेत्र तक विस्तार. अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण पर रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट को लागू करना.आतंकवाद के नाम पर निर्दोषों को प्रताड़ित किये जाने पर रोक. आदिवासियों के लिए पांचवी व छठी अनुसूची के अधिकारों की रक्षा. उत्तर प्रदेश में महिलाओं,दलितों,अल्पसंख्यकों एवं आदिवासियों पर हो रहे अत्याचारों पर कारगर रोक.
९.मेहनतकश वर्गों के अधिकार –जायज न्यूनतम वेतन और सामजिक सुरक्षा उपायों का कडाई से अनुपालन, श्रम की ठेकेदारी और अनियमित काम की समाप्ति. उत्तर प्रदेश में श्रम कानूनों का पालन हो. न्यूनतम वेतनमान रूपये ११०००/-प्रतिमाह हो.
१०.स्वतंत्र विदेश नीति अपनाओ. अमेरिका परस्ती एवं साम्राज्यवाद परस्ती छोडो.
११.उत्तर प्रदेश में क़ानून व्यवस्था बेहद खराब है. यहाँ माफिया-पुलिस-गुंडाराज चल रहा है. प्रदेश में क़ानून के राज की स्थापना की जाए.
वामपंथी दल सभी जनवादी ताकतों,जनवादी दलों और जनसंगठनों से इस वैकल्पिक राजनीतिक मंच को समर्थन देने की अपील करते हैं. वामपंथी दल इस मंच के पक्ष में समर्थन जुटाने के लिए एक राजनीतिक अभियान चला रहे हैं. आइये और इस अभियान में जुटिये ताकि हम सब एक ताकतवर राजनीतिक विकल्प के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ सकें और आम आदमी के जीवन को बेहतर बना सकें.
शुक्रवार, 19 जुलाई 2013
at 8:54 am | 1 comments | आशा मिश्रा, प्रदेशन, महिला फेडरेशन, विधानसभा
पुलिस विरोध के बावजूद विधानसभा पर 'महिलाओं का विरोध-प्रदर्शन'
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| दायें से दूसरे-का .आशा मिश्रा प्रादेशिक महासचिव ,भारतीय महिला फेडरेशन |
गुरुवार, 18 जुलाई 2013
at 8:23 am | 0 comments | CPI, Karnataka, Posco, South Korean Company
Posco Withdraws Plan for Steel Plant in India--great success of CPI
Posco Withdraws Plan for Steel Plant in India-By Sean McLain, Saurabh Chaturvedi, Kanga Kong
South Korean Company Cites Rights Delays, Local Opposition for Dropping $5.3 Billion Project
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A file photo of supporters of the Communist Party of India at a protest rally in New Delhi against Posco.
Saurabh Das/Associated Press |
बुधवार, 17 जुलाई 2013
at 6:39 pm | 0 comments | एफ डी आई, दूर संचार, बीमा, रक्षा क्षेत्र
संचार क्षेत्र में विदेशी पूँजी निवेश बेहद घातक. भाकपा ने वापस लेने की मांग की.
सी पी आई का साहस ---राष्ट्रीय सहारा
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को धन्यवाद दिया जाना चाहिए कि उसने देश के लोकतंत्र की सबलता के प्रतीक ˜सूचना का अधिकार कानून की मर्यादा का खयाल रखा और पार्टी से संबंधित सवालों का बेबाकी से जवाब दिया। हैरानी यह है कि जिस कांग्रेस की अगुवाई में देश को यह युगांतरकारी अधिकार मिला था वही पार्टी इस कानून के लिहाज में पीछे रह गई। यह और अफसोसनाक है कि लोकतांत्रिक लिहाज की इस अवज्ञा में बीजेपी, सीपीएम, एनसीपी और बीएसपी जैसे राष्ट्रीय दलों ने भी उसका साथ दिया। राजनीतिक दलों को इस कानून की जद में लाए जाने की विरोधी खुद सीपीआई भी है लेकिन तिरस्कार की जगह उसने इस व्यवस्था का सम्मान रखा और साथ में लोकतांत्रिक अंदाज में अपनी आलोचना भी रखी। लेकिन बाकी पार्टियों के आचरण से झलक गया है कि वे किसी भी हालत में अपनी ˜सूचना अपने वोटरों के साथ साझा करने को तैयार नहीं हैं। खबर है कि कानून मंत्रालय ने सूचना अधिकार कानून में वे संशोधन भी तैयार कर लिए हैं जो राजनीतिक पार्टियों के लिए कवच का काम करेंगे। पहले र्चचा थी कि अध्यादेश के रास्ते ये संशोधन प्रभावी कर दिए जाएंगे। लेकिन खाद्य सुरक्षा के तुरंत बाद दूसरा अध्यादेश, वह भी ऐसे संवेदनशील मसले पर लाए जाने से शायद बचना चाह रही थी सरकार। सरकार को मालूम है कि सूचना कानून में इस सेंध के बाद कैसा बवाल मचना है। इसीलिए वह सभी पार्टियों को साथ कर संसद के रास्ते इस कानून की धार को मंद करने की राह पर चलना चाहेगी। अब यह देखिए कि सीपीआई ने इस कानून के तहत यही तो बताया कि उसे पिछले वर्षो में कहां से और कितना फंड मिला। बड़े चंदों की रसीदें भी उसने दिखाई। पारदर्शिता के इस आचरण से पूरे देश के दिल पर थोड़ा मरहम तो जरूर लगा होगा जो महाभ्रष्टाचारों की अनंत कथा सुन-सुन कर सुलगने लगा है। सूचना के अधिकार को अपने कामकाज में दखलंदाजी के रूप में क्यों ले रही हैं पार्टियां! सभी पार्टियां चंदे पर चलती हैं और रकम की मात्रा सत्ता में उनकी हनक के अनुपात में घटती-बढ़ती रहती है। चंदे के स्रेत और मात्रा को गोपनीयता के चादर में छुपाना पार्टियों की विश्वसनीयता पर सवाल उठा देता है। राजनीतिक पार्टियों की हैसियत वोटर बनाते हैं और पार्टियों को आज नहीं तो कल उनके प्रति अपनी जिम्मेदारी भी समझनी होगी। केंद्रीय सूचना आयोग की डेडलाइन खत्म होने के बाद अब उन पार्टियों के खिलाफ कार्रवाई का रास्ता खुल गया है जिन्होंने मांगी गई सूचना निर्धारित समय तक नहीं दी। लेकिन, कार्रवाई के लिए भी डेढ़ महीने का अंतराल है। जाहिर है कि पार्टियां इस अंतराल के अंदर ही कानून में बदलाव लाना चाहेंगी। जनहित के लिए बनने वाले कानून भले पार्टियों के बीच घमासान में दब कर दम तोड़ देते हों, सूचना अधिकार पर चलने वाली तलवार का हाथ कोई रोक नहीं पाएगा। कानून में बदलाव वही लोग करने वाले होंगे जिन्हें देश ने इसी काम के लिए चुन कर भेजा है। यह बात दीगर है कि वे ताकत का इस्तेमाल लोकतंत्र की मजबूती नहीं, बल्कि अपने हितों की पूर्ति के लिए कर रहे होंगे।
मंगलवार, 16 जुलाई 2013
at 6:25 pm | 0 comments | मीडिया, मुख्यमंत्री, लैपटाप, समाजवादी
फिर चर्चा में है लैप-टाप
रविवार, 14 जुलाई 2013
CPI demands rollback of gas price hike---S Sudhakar Reddy
Maintaining that the Cabinet decision to hike gas prices from USD 4.2 to USD 8.4 per unit would increase the burden on the people, CPI General Secretary S Sudhakar Reddy claimed that the decision was taken "despite opposition from Left Parties, your allies and even your cabinet ministers."
In a letter to Prime Minister Manmohan Singh, he alleged that the government's decision was taken "to satisfy RIL gas company which willfully reduced the gas production to 19 per cent in KG6 (basin). We urge upon you to reconsider and withdraw this decision."
Terming as "strange" government's argument that the move would boost investment in gas extraction, he said "the price increase will be a burden on people to pay Rs 16,000 crores for every additional dollar increase of gas price every year in fertilizes and power sectors alone."
Reddy also asked as to why the price of "gas produced in India by our companies with some foreign companies collaboration is being fixed in US dollars rather than in Indian rupees. This looks very illogical. The price from beginning is in dollars. It looks that there is a deep conspiracy behind this method adopted."
Noting that the rupee value was "fast shrinking" and had depreciated 13 per cent since May, he said this would not only raise petro product prices, but education and travel would cost more too and deficit financing would increase.
"The gas which is produced in India is becoming costly with every fall in the value of rupee. One corporate house Nawab enjoys the profits at the cost of 'aam aadmi'. This is unacceptable," he said in the letter.
"I urge upon you to reconsider the whole decision and instruct that the price of the gas produced in India should be fixed in Indian currency, to save the nation from further loot," Reddy said.
गुरुवार, 11 जुलाई 2013
at 2:03 pm | 0 comments | राजनीति
राजनीति में अपराधीकरण और जातिगत रैलियों पर रोक का भाकपा ने किया स्वागत
बुधवार, 10 जुलाई 2013
at 4:49 pm | 0 comments | CPI, RTI, S. Sudhakar Reddy
RTI and CPI
at 8:54 am | 0 comments | BJP'sdesperation, D. Raja
'Desperate' BJP trying to polarise nation on communal lines--- D. Raja
Raja alleged that the BJP is trying to do is undermine the political system in the country.
"We do not elect Prime Minister directly, it is not our system. Even we do not elect the President directly. Whichever party gets adequate number to form the government, whichever coalition gets adequate number to form the government after elections; it is their prerogative to choose the leader," said Raja.
"But choosing the leader before election itself shows the weakness of that party. It cannot project any policy, it cannot project any programme. It wants to project a personality who is very controversial personality in the country," he added.
Raja further alleged that it shows the desperation on the BJP's part.
"I do not think there is a wave for Modi. I do not know in which world the BJP is living, but it shows the big desperation on the part of the BJP. The BJP is extremely desperate; somehow it wants to come to power and wants to win the elections," said Raja.
"So, the BJP tries all tricks and BJP wants to communalise the situation, it wants to polarise the people on the communal lines. It can go to any extent to divide the people, polarise the people which is not in the interest of democracy," he added.
सोमवार, 8 जुलाई 2013
at 6:37 pm | 0 comments | आतंकवादी, बोधगया, भाकपा सौहार्द
बोधगया में आतंकी हमला सौहार्द को बिगाड़ने की साजिश
at 4:26 pm | 0 comments | आरएसपी, फार्बर्ड ब्लाक, भाकपा, माकपा, लोकतान्त्रिक विकल्प, वामपंथी
उत्तर प्रदेश में वाम - लोकतान्त्रिक विकल्प के निर्माण हेतु वामदलों कदम बढ़ाये |
रविवार, 7 जुलाई 2013
at 3:59 pm | 1 comments |
30 सितम्बर को भाकपा करेगी बड़ा जमावड़ा
उपर्युक्त निर्णय आज यहां सम्पन्न भाकपा की राज्य कार्यकारिणी की बैठक में लिया गया। बैठक की अध्यक्षता का. राम धन ने की।
बैठक को सम्बोधित करते हुए भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि लगातार बढ़ रही महंगाई से जनता बेहद परेशान है। पेट्रोल और डीजल के दाम लगातार बढ़ाये जा रहे हैं और इसके चलते हर वस्तु के दाम आसमान छू रहे हैं। महंगाई से निजात दिलाने को भाकपा और वाम दल एक व्यापक खाद्य सुरक्षा विधेयक संसद में लाने की मांग कर रहे थे ताकि हर परिवार को हर माह पैंतीस किलो अनाज 2 रूपये प्रति किलो की दर से मिल सके। लेकिन आगामी लोकसभा चुनावों में वोटों पर नजर गड़ाये बैठी केन्द्र सरकार ने एक आधा अधूरा खाद्य सुरक्षा कानून अध्यादेश के जरिये बना डाला जिसके जरिये जनता को भूख से बचाना और खाद्यान्नों की सुरक्षा सम्भव नहीं है। अतएव वाम दल एक व्यापक खाद्य सुरक्षा कानून की लड़ाई आगे भी जारी रखेंगे।
भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि महंगाई और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी केन्द्र सरकार से लोगों का मोहभंग हो रहा है जिसके चलते छिन्न-भिन्न हो चुके राजग तथा भाजपा के मन में सत्ता पर आरूढ़ होने का गुबार चढ़ा हुआ है। लेकिन इसके लिए वह कोई जनपरक कार्यक्रम लाने में असमर्थ है और फिर से घनघोर साम्प्रदायिक एजेण्डे पर आगे बढ़ रही है। उत्तर प्रदेश की जनता भाजपा के इस सपने को चुनावों में धूल धूसरित कर देगी।
भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि उत्तर प्रदेश की सरकार अपने चुनावी वायदे पूरे करने से या तो मुकर रही है और जिन वायदों को पूरा करने का उपक्रम किया जा रहा है, उस पर बड़े पैमाने पर सरकारी धन व्यय किया जा रहा है। लैपटॉॅप का वितरण इसका उदाहरण है, जिसे प्रशासन के जरिये बिना किसी खर्चे के जरिये बाटा जा सकता था। यह सरकार बिजली के दाम बढ़ा चुकी है, पेट्रोल-डीजल पर वैट कम करने को तैयार नहीं है, कानून-व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है और शासन-प्रशासन पंगुता की स्थिति में है। प्रदेश का शासक दल हो या मुख्य विपक्षी दल बसपा दोनों अपने जातीय समीकरण के बल पर ही लोकसभा चुनावों में जाना चाहते हैं, जनता के हितों से जुड़े मुद्दों की उन्हें कोई परवाह नहीं है।
इसलिए उत्तर प्रदेश में वामपंथी दल एक नीतिगत और कार्यक्रम आधारित विकल्प बनाने की दिशा में गम्भीरता से विचार कर रहे हैं। भाकपा राज्य कार्यकारिणी ने इस बात पर जोर दिया कि सूबे के चारों वामपंथी दलों को वह साथ लेकर हाल ही में 1 जुलाई को हुए वाम दलों के केन्द्रीय कन्वेंशन के लक्ष्यों को आगे बढ़ाते हुए उत्तर प्रदेश में अभियान चलाया जाये। इसके लिए भाकपा, माकपा, आरएसपी और फारवर्ड ब्लाक के राज्य नेतृत्व की एक बैठक 8 जुलाई को 11 बजे भाकपा राज्य कार्यालय पर बुलाई गई है।
(शमशेर बहादुर सिंह)
कार्यालय सचिव
शनिवार, 6 जुलाई 2013
at 8:59 am | 1 comments | Antony, BDCA, D. Raja
Chinese General's warning to India is unwarranted and provocative: D. Raja
"If the Chinese Army Chief has made such a statement, it is unwarranted and provocative. At a time when Defence Minister of India A.K. Antony is on a visit to China, the resolution of border dispute between India and China is at higher level at the level of political leadership of both the countries, both India and China," Raja told the media here
"When the Chinese Premier came to India, he made it very clear China wants a handshake of friendship with India. If that is the spirit, the Chinese Army Chief must restraint, he should not make such provocative statements particularly at the time when our own Defence Minister A.K. Antony is on a official visit to China," he added.
Major General Luo Yuan has warned India against provoking 'new trouble' by increasing its military deployment at the border.
Major General Luo Yuan, who was talking to the foreign media in Beijing, said 'there is no denying that there are tensions and problems between China and India particularly at the border areas'.
"There is still problem of 90,000 sq km of territory still occupied by the Indian side. These are the problems left over from history and we should look at it with cool head," he said.
Major General Luo Yuan, who was responding to a question about People's Liberation Army's (PLA) views on India-China relations in the backdrop of Antony's visit, said: "The Indian side should not provoke new problems and increase the military deployment at the border areas and start new trouble."
Antony is the first Indian Defence Minister in seven years to visit China. He will have formal talks with his Chinese counterpart General Chang Wanquan during his four-day official visit to Beijing.
The recent border incursion by Chinese troops, finalisation of the Border Defence Coordination Agreement (BDCA) to maintain peace at the disputed borders as well as resumption of bilateral military exercises is on the top priority of Antony's agenda for talks with the Chinese leadership.
He is also expected to call on Premier Li Keqiang, besides visiting a military installation and command centre.
Antony's visit to China comes just days after the 16th round of border talks between National Security Advisor Shivshankar Menon and his Chinese counterpart Yang Jiechi here during which the two sides had a threadbare discussion on mutual concerns, especially the incursion of China's People's Liberation Army troops into the Depsang Valley on April 15. (ANI)
शुक्रवार, 5 जुलाई 2013
at 6:11 pm | 0 comments | cynical hypocrisy, penalty
Deliberate attempt to sabotage--- GURUDAS DAS GUPTA
Dated 20.6.2013
RESPONSE TO MINISTER OF PETROLEUM,
MR. VEERAPPA MOILY’S STATEMENT
BY GURUDAS DAS GUPTA, MEMBER OF PARLIAMENT
Mr. Moily’s statement is misleading and malicious. I request
him to kindly identify the vested interest I am representing.
The point in question is that Mr. Jaipal Reddy had issued the order
imposing penalty on RIL for deliberately reducing the production level.
It is amazing that he says that the file did not come to him. The
matter was in the public domain. Everybody knew the penalty that had
been imposed but the Minister who succeeds Mr. Jaipal Reddy does not
know the matter. It is a deliberate ignorance to shift the burden on to
his officers. It is all well known that Reliance refused to pay
penalty, asked for arbitration. Even two arbitrators had been appointed
by both the parties. Even lawyers have been appointed by the Ministry
of Petroleum. In fact, the two judges were involved in discussion to
nominate the third. Such a long, long process that has taken place
during the time of his predecessor cannot be unknown to him. Government
is a continuing process. When a new Minister takes office he must know
what his predecessor has done. Mr. Moily in an interview to Economic
Times on 23rd January, 2013 had made a statement. To quote, “The
Government is thinking to junk the arbitration and start direct
negotiations.” He further said that the government has a weak case in
arbitration. If Minister speaks in this way, what is the message that
goes to his officials? The most intriguing is that on the one hand he
says that the file was not put up to him, on the other, he makes a
public statement debunking arbitration. It is a case of cynical
hypocrisy. Therefore, it is not a case of ignorance but a deliberate
attempt to sabotage the process of realizing the penalty and undermining
arbitration. The second question that arises is that why he has not
given the notice for penalty for the year of 2012-13 when the production
had further declined. In fact, if the calculation is correctly made,
the penalty should have been 1.7 billion dollars.
Why he is
closing his eyes to further sharp decline in the current year which is
almost 19 per cent of the approved level of production.
In
case of relinquishment of the area given to Reliance, the CAG asked for
vacation of at least 50 per cent of the allotted area. The Director
General of Hydrocarbon has submitted his report categorically stating
that 83 per cent of the area should be surrendered. Why he has not
taken any action so far. Why he is allowing Reliance to occupy 6000 sq.
km area illegally.
In fact, the Minister in a statement
published in a number of papers on 16th June, 2013 said that he will not
be guided by technical advice but shall always favour production and
investment. Here again he is speaking against relinquishment to favour
the corporate raising the slogan of ‘improving production and
investment.’
All of us would welcome massive investment in
the oil and gas sector to make India self-reliant but that cannot be at
the cost of loot of national resources.
Therefore, the
collusion of the Minister with the corporate is clear. He wants to
condone the criminality of underproduction and consequent damage to the
Indian economy and allow the corporate to grab 6000 sq. km in violation
of the contract.
गुरुवार, 4 जुलाई 2013
at 4:18 pm | 0 comments | ए.बी.बर्धन, प्रकाश करात, भाकपा, माकपा, वामपंथी दल, सुधाकर रेड्डी
नीतियों और कार्य क्रमों पर आधारित विकल्प ही देश को आगे ले जा सकता है -वामपंथी दलों के सम्मेलन का आह्वान .
मंगलवार, 2 जुलाई 2013
The gas price rise is without merits: Gurudas Dasgupta
Gurudas Dasgupta, a Communist Party of India senior, has been at the forefront in opposing a rise in the price of natural gas, on the ground that the real beneficiary is Reliance Industries Ltd (RIL). He explains his stand to Sanjay Jog. Edited excerpts:
What is your comment on the Centre's decision to increase the gas price from April 1, 2014?
Disastrous. Why was the pricing done in dollars when imported coal is not being so priced? Linking it with the dollar means the contractor will be the beneficiary. This was done during the BJP-led NDA government and the UPA government is continuing that line. In the wake of a declining exchange rate, the country will lose heavily and disproportionately.
Why are you opposing it?
The government has agreed to double the price without any scientific study of cost of production per unit, what has been the actual revenue and the profit. It is reported that the contractor has recovered much more that what was invested. Further, the government did not study the impact on the two main users, the fertiliser and power sectors.
The increase in the price of power per unit will involve more subsidy from the states. Stakeholders are not consulted and the government has taken the decision without due diligence. The government has responded to arm-twisting methods of corporate entities. Our battle will continue in and outside Parliament.
Do you stick to your earlier observation that the gas price rise is a scam?
Certainly. In view of the collusion between companies and the petroleum ministry, we have seen that a petroleum minister was removed in the past. Also, the timing: the deal has been struck on the eve of elections. It is a known fact that this corporate (read RIL) is generous in making political investments.
The finance minister said the rise was due to low domestic output.
A villain's argument. It will further accentuate price rise, will increase the electricity cost, spur the industrial cost of production and will ultimately be placed on the shoulders of consumers.
What were the options to avoid a gas price rise?
Why rely on a single contractor? As per the production sharing contract, the government should have taken control of the area in which the contractor had failed to produce. The government should have made the allocation of that area to other contractors, through international competitive bidding. That would have substantially reduced our dependence on a single contractor, as there would have been many more contractors. However, the government is deliberately allowing monopoly of a single contractor.
Do you want government to reconsider its decision?
The defaulting contractor (RIL) should have been put under pressure to produce the 80 million standard cubic metres a day of gas as promised in the contract. Instead, it has taken the statement of a single contractor as correct and decided to increase the gas price. It is the government's job to protect the interest of the country and also its natural resources.
The government has clearly defaulted in discharging its constitutional duty. It will have to review its decision and the rise in price must be done only after a proper technical evaluation.
शनिवार, 29 जून 2013
असली माजरा क्या है?---डॉ गिरीश
पेट्रोल
की कीमतें फिर बढ़ा दी गईं.जबसे पेट्रोल-डीजल की कीमतों को नियंत्रण से
मुक्त किया गया है तब से यह सवाल बेमानी हो गया है कि इतनी जल्दी फिर
बढ़ोत्तरी.इसी माह में यह तीसरी बढ़ोत्तरी है.पहले अन्तराष्ट्रीय बाज़ारों में
कच्चे तेल की कीमतों में वृध्दि को बहाना बनाया जाता था,और अब रूपये के
मूल्य में गिरावट को बहाना बनाया जा रहा है.बहाना कोई भी हो इस वृध्दि को
भुगतना तो जनता को ही है .उस असहाय जनता को जो पहले से ही कमरतोड़ महंगाई की
मार से त्रस्त है.
यहाँ यह उल्लेखनीय है कि जब भी डीजल या पेट्रोल के
दाम बढ़ते हैं राज्य सरकारों को खुद ब खुद इसका लाभ पहुंचता है क्योंकि बढ़ी
कीमतों पर स्वतः ही वेट (राज्य का कर )लग जाता है.कई राज्य सरकारों ने इन
पर वेट में छूट दे रखी है और वहां की जनता को थोड़ी सी राहत मिली हुई है
.लेकिन अपनी उत्तर प्रदेश की सरकार तो हर चीज के दाम बढाने में लगी है तो
फिर इन पर ही वेट घटा कर अपनी नाक कैसे कटवा सकती है.शायद इसी लिए सपा ने
केंद्र सरकार को समर्थन दे रखा है कि वे वहां बढ़ाते रहें और ये यहाँ उस पर
बड़ा टेक्स बसूलते रहें.
एक बात और...दो दशक पहले एक आन्दोलन चल रहा
था-मन्दिर निर्माण का .उसी के साथ-साथ वही ताकतें एक और आन्दोलन चला रहीं
थीं-निजीकरण का. गला फाड़-फाड़ कर कहा जारहा था कि सरकार का काम व्यापार करना
नहीं,उद्योग चलाना नहीं.सब्सिडी देना नहीं,सार्वजनिक क्षेत्र के लोग काम
नहीं करते और वे घाटे में हैं अतः सबका निजीकरण कर देना चाहिये .शायद
मन्दिर आन्दोलन तो छतरी था,छुपा एजेंडा यही था.मन्दिर तो बना नहीं लेकिन
शिक्षा इलाज उद्योग बैंक बीमा आदि सभी का निजीकरण हो गया और पेट्रोल डीजल
गैस सभी नियन्त्रण मुक्त हो गये .अब इसके कुफल जनता भुगत रही है. लेकिन अभी
भी बहुतों की समझ में नहीं आरहा कि असली माजरा क्या है?
यहाँ यह उल्लेखनीय है कि जब भी डीजल या पेट्रोल के दाम बढ़ते हैं राज्य सरकारों को खुद ब खुद इसका लाभ पहुंचता है क्योंकि बढ़ी कीमतों पर स्वतः ही वेट (राज्य का कर )लग जाता है.कई राज्य सरकारों ने इन पर वेट में छूट दे रखी है और वहां की जनता को थोड़ी सी राहत मिली हुई है .लेकिन अपनी उत्तर प्रदेश की सरकार तो हर चीज के दाम बढाने में लगी है तो फिर इन पर ही वेट घटा कर अपनी नाक कैसे कटवा सकती है.शायद इसी लिए सपा ने केंद्र सरकार को समर्थन दे रखा है कि वे वहां बढ़ाते रहें और ये यहाँ उस पर बड़ा टेक्स बसूलते रहें.
एक बात और...दो दशक पहले एक आन्दोलन चल रहा था-मन्दिर निर्माण का .उसी के साथ-साथ वही ताकतें एक और आन्दोलन चला रहीं थीं-निजीकरण का. गला फाड़-फाड़ कर कहा जारहा था कि सरकार का काम व्यापार करना नहीं,उद्योग चलाना नहीं.सब्सिडी देना नहीं,सार्वजनिक क्षेत्र के लोग काम नहीं करते और वे घाटे में हैं अतः सबका निजीकरण कर देना चाहिये .शायद मन्दिर आन्दोलन तो छतरी था,छुपा एजेंडा यही था.मन्दिर तो बना नहीं लेकिन शिक्षा इलाज उद्योग बैंक बीमा आदि सभी का निजीकरण हो गया और पेट्रोल डीजल गैस सभी नियन्त्रण मुक्त हो गये .अब इसके कुफल जनता भुगत रही है. लेकिन अभी भी बहुतों की समझ में नहीं आरहा कि असली माजरा क्या है?
शुक्रवार, 28 जून 2013
at 10:29 am | 0 comments | प्रदीप तिवारी, भाजपा, राजग, वामपंथ, संप्रग-2
बिखरा राजग, अब संप्रग-2 की बारी
मोदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मजबूत कैडर हैं, संघ ने बहुत कुछ हिटलर और मुसोलिनी से सीखा और हिटलर के गुरू का यह कहना था कि किसी झूठ को सौ बार बोलने पर वह सच लगने लगता है। इतिहास में हमने स्टोव बाबा और गणेश जी के दुग्धपान जैसे तमाम झूठों का सच देखा है। मोदी इस गुरूवाणी पर बहुत यकीन रखते हैं और उन्होंने मीडिया - इलेक्ट्रानिक, प्रिन्ट एवं सोशल को प्रभावित करने का एक शक्तिशाली तंत्र विकसित कर रखा है। मोदी उत्तराखंड एक चाटर्ड हवाई जहाज से जाते हैं, वहां वे 80 इनोवा कारों को किराए पर लेते हैं और उसके ठीक 24 घंटों के बाद 15,000 गुजरातियों को बचा कर गुजरात पहुंचाने का दावा कर दिया जाता है। प्राकृतिक विपदा से जहां इतनी बड़ी विभीषिका आई हुई हो, रास्ते बंद हों, 10 दिन से अधिक का समय बीत जाने पर भी सेना हेलीकाप्टरों से लोगों को निकाल नहीं पाई है, वहां 80 इनोवा 24 घंटों में कैसे 15,000 गुजरातियों को गुजरात पहुंचा देती हैं, इसकी मीमांसा हम सुधी पाठकों पर छोड़ देते हैं। वे खुद तय कर लें कि मोदी से बड़ा मक्कार राजनीतिज्ञ हिन्दुस्तान में कोई दूसरा नहीं होगा। इसी के साथ हम अपने मूल विषय पर लौट चलते हैं।
राजग के विघटन के बाद क्या? यह एक सवाल है, जिस पर आज-कल हर आदमी बात करना चाहता है। क्या संप्रग-2 मजबूत हो रहा है? क्या तमाम घपले-घोटालों और महंगाई के बावजूद संप्रग-2 फिर एक बार सत्ता की ओर लौट रहा है? वैसे तो संप्रग-2 का विकल्प राजग नहीं था क्योंकि दोनों की आर्थिक नीतियों में कोई फर्क नहीं है। जनता जो बदलाव चाहती है वह नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के रास्ते आने वाला नहीं है। भाजपा खुद अपनी दुर्गति का एहसास कर छटपटा रही थी और इसी छटपटाहट में उसने मोदी का कार्ड खेलने की कोशिश की। यहां स्पष्ट करना जरूरी हो जाता है कि गुजरात गुजरात है, महाराष्ट्र महाराष्ट्र है और तमिलनाडु तमिलनाडु है। इन राज्यों में जो राजनीतिक युक्तियां कामयाब हो जाती हैं, वे पूरे हिन्दुस्तान में कामयाब हो ही नहीं सकती हैं। आडवाणी और नितीश की छटपटाहट के पीछे यही सत्य था, जिसे भाजपा अपनी छटपटाहट में देखना ही नहीं चाहती क्योंकि ऊपर यानी संघ के आदेश हैं।
संप्रग-2 आसन्न लोकसभा चुनावों में विजय प्राप्त करेगी, ऐसा तो वर्तमान हालातों में लगता नहीं है। जनता में भ्रष्टाचार के खिलाफ गुस्से को शान्त करने का सरमायेदारों ने जो गैर-राजनीतिक तरीका यानी भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल कानून का आन्दोलन चलाया था, उसका असर एक बार फिर समाप्त हो रहा है। जनता में गुस्सा पनप रहा है। जब गुस्सा पनप रहा है तो वह कहीं तो कहीं निकलेगा ही और अगर चुनाव सामान्य परिस्थितियों में हो जाते हैं, तो संप्रग-2 का सत्ता में वापस आना नामुमकिन लगता है।
संप्रग-2 में भी इस समय कुल 24 दल हैं। कुछ अन्दर तक शामिल हैं तो कुछ बाहर बैठ कर सहारा दिये हुये हैं। कोई मंत्री बन कर सहारा दिये हुये है तो कोई सीबीआई के खौफ से सहारा दिये हुये है। काठ की हांड़ी के नीचे जल रही आग ने हाड़ी के अधिसंख्यक हिस्से को जला दिया है। संप्रग-2 एक डूबता हुआ जहाज है और राजनीति में डूबते हुए जहाज से पहले चूहे भागते हैं और एक बार जो भगदड़ शुरू होती है तो रूकने का नाम नहीं लेती। देखना दिलचस्प होगा कि यह भगदड़ कब शुरू होती है - चुनावों के कितना पहले? कांग्रेसी बहुत खुश हैं कि वे 24 हैं लेकिन उनकी खुशी जल्दी ही काफूर होने वाली है। जमाना था जब राजग में 24 दल थे और इतिहास में यही लिखा जाने वाला है कि संप्रग-2 में 24 दल थे।
किसी मोर्चे के रूप में चुनावों के पूर्व कोई विकल्प उभर सकेगा ऐसा नहीं लगता है परन्तु वामपंथ को अपने इतिहास से सबक लेते हुए बहुत संभल-संभल कर चलना होगा। पहली बात, उसे अपनी वैकल्पिक आर्थिक नीतियों की स्पष्ट व्याख्या करनी होगी। जब तक यह अंक आम जनता तक पहुंचेगा, 1 जुलाई को दिल्ली सम्मेलन में वामपंथ उस वैकल्पिक नीति को पेश कर चुका होगा और उसी के इर्द-गिर्द एक सैद्धान्तिक मोर्चा खड़ा करने की शुरूआत करेगा। जनता ऐसे आर्थिक-राजनैतिक विकल्प के इर्द-गिर्द लामबंद हो सकती है। दूसरे उसे पिछले चुनावों की अपेक्षा अपने अधिक उम्मीदवार देने का प्रयास करना चाहिए और अधिक से अधिक सीटों को जीतने के लिए लड़ना चाहिए जिससे वह अपने पिछले आकड़े 60 के आगे निकल सके। 60 से आगे निकलने का मतलब होगा कि चुनाव पश्चात् होने वाले ध्रुवीकरण का केन्द्र यानी न्यूक्लियस वामपंथ होगा न कि कोई अन्य क्षेत्रीय दल। वामपंथी कतारों को भी अभी से ही जुट जाना चाहिए। यह वक्त धन इकट्ठा करने का है, जनता को लामबंद करने का है और जनता के गुस्से को धार देने का है। उन्हें इस समय इसी मुहिम पर जुटना चाहिए।
- प्रदीप तिवारी, 23 जून 2013
गुरुवार, 27 जून 2013
वामपंथी लोकतान्त्रिक विकल्प ---डॉ.गिरीश
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