भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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रविवार, 29 जून 2014

केंद्र सरकार की महंगाई बढ़ाने वाली नीतियों और प्रदेश की कानून व्यवस्था की जर्जर हालत के खिलाफ भाकपा ने आन्दोलन का निर्णय लिया.

लखनऊ- २९ जून- २०१४. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य काउन्सिल की दो दिवसीय बैठक आज यहाँ संपन्न हुयी. आज की बैठक की अध्यक्षता का. सुरेन्द्र राम ने की. बैठक के निर्णयों की जानकारी देते हुए राज्य सचिव डॉ. गिरीश ने कहा कि हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा महंगाई बढ़ाने वाले कई कदम उठाये हैं जिससे खुदरा और थोक बाज़ार में चीजों के दामों में उछाल दर्ज किया गया है. खरीफ फसलों के खरीद मूल्य भी लागत की तुलना में काफी कम बढ़ाये गये हैं जिससे किसान ठगा महसूस कर रहे हैं. आम जनता अभी से ठगा महसूस करने लगी है. राज्य सरकार भी महंगाई की इस मार को और तेज कर रही है. उसने जनहित की लैपटाप, कन्या विद्याधन एवं बेरोजगारी भत्ता जैसी योजनाओं को भी इस लिए समाप्त कर दिया क्योंकि लोकसभा चुनाव में जनता ने उन्हें करारा झटका दे दिया. महिलाओं से दुराचरण की घटनाओं को रोकने में और कानून-व्यवस्था को पटरी पर लाने में यह सरकार विफल रही है. गन्ना बकायों का भुगतान तो हो नहीं पाया, सूखे की इस स्थिति में बिजली संकट और नहरों में पानी न आने से खरीफ की फसलों पर असर पड़ रहा है. अतएव भाकपा राज्य काउन्सिल ने केंद्र और राज्य सरकार के इन गरीब और किसान विरोधी कदमों के खिलाफ १४ जुलाई को प्रदेश के सभी जिला मुख्यालयों पर धरने और प्रदर्शन आयोजित करने का निर्णय लिया है. डॉ. गिरीश ने बताया कि प्रदेश में विधान सभा एवं लोक सभा के होने वाले उपचुनावों में भी भाकपा ने प्रत्याशी खड़े करने का निर्णय लिया है.
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शनिवार, 28 जून 2014

महंगाई को केन्द्र एवं राज्य सरकारें दे रहीं हैं बढ़ावा

लखनऊ 28 जून। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य कौंसिल की दो दिवसीय बैठक आज यहां भाकपा के राज्य कार्यालय पर अतुल कुमार सिंह की अध्यक्षता में शुरू हो गयी है।
बैठक में राज्य सचिव डा. गिरीश ने राजनैतिक एवं संगठनात्मक रिपोर्ट पेश की जिस पर चर्चा चल रही है। बैठक का यह मानना है कि मोदी सरकार ने जिस प्रकार यात्री भाड़े और रेल भाड़े के साथ-साथ डीजल के दामों में बढ़ोतरी एवं चीनी के आयात शुल्क में वृद्धि जैसे महंगाई बढ़ाने वाले फैसले लिये हैं, उससे आसमान छूती महंगाई से जनता को निकट भविष्य में किसी भी प्रकार की राहत मिलना सम्भव नहीं है। न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करते समय भी फसलों की आ रही लागत को विचार में नहीं लिया गया और किसान विरोधी फैसला किया गया है।
सोने का आयात खोल देने से सोने के भावों में आई गिरावट में बड़े पूंजीपतियों ने अपने काले धन का निवेश सोने में कर देने के कारण सोने के भाव फिर बढ़ गये। वैसे भी सोने की खरीद-फरोख्त जनता के बड़े तबके द्वारा नहीं की जाती है।
मोदी सरकार बनने की प्रत्याशा में सरकार बनने के पूर्व से ही कुलांचे मार रहा शेयर बाजार अब लड़खड़ाने लगा है और विदेशी मुद्रा बाजार में रूपये की वैल्यू लगातार गिर रही है जिसके कारण तमाम जिन्सों के दामों में बढ़ोतरी के आसार पैदा हो रहे हैं। अपने निर्णयों से मोदी सरकार ने यह संकेत दे दिया है कि वह महंगाई फैलाने वाले और बेरोजगारी बढ़ाने वाली कांग्रेस की नई आर्थिक नीतियों को ही आगे बढ़ायेगी। मोदी सरकार ने पहले ही कड़े फैसलों का संकेत दे दिया है और निश्चित रूप से यह कड़े फैसले आम जनता के ही खिलाफ लिये जायेंगे न कि मुनाफाखोरों और बड़े घरानों के खिलाफ।
राज्य सरकार के कार्यों की समीक्षा करते हुए बैठक में सामान्य राय यह है कि लोक सभा चुनावों के परिणामों से सपा ने कोई सबक नहीं लिया है और पूरी तरह एक जन विरोधी बजट पेश किया गया है। नये बजट में सरकार ने लैपटाप, कन्या विद्या धन तथा बेरोजगारी भत्ता जैसी कई योजनाओं को खत्म कर दिया। सवाल उठता है कि क्या उन लोगों को अब उसकी जरूरत नहीं है? या फिर इस सबका उद्देश्य केवल वोट हासिल करना था। और जब जनता ने वोट नहीं दिया तो एक झटके में उससे सभी कुछ छीन लिया गया।
कानून-व्यवस्था के मामले में भी सरकार नकारा साबित हुई है। प्रदेश में प्रति दिन लगभग एक दर्जन बालिकाओं के साथ बलात्कार, बलात्कार के बाद हत्या या हत्या के प्रयास की खबरें आ रही हैं। अब तो पुलिस अधिकारियों और कर्मियों पर दुराचार के आरोप लग रहे हैं। सरकार केवल नौकरशाहों को उद्देश्यहीन तरीके से थोक में लगातार इधर से उधर कर रही है और कानून-व्यवस्था को सुधारने के कोई प्रयास नहीं कर रही है।
वर्षा के बारे में मौसम विभाग के स्पष्ट संकेतों के बावजूद सूखे से निपटने के मोर्चे पर सरकार ने अभी सोचना भी शुरू नहीं किया है। बिजली में बेतहाशा कटौती के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में अभी तक कृषि कार्य शुरू नहीं हो सका है। सरकार बिजली की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी कर महंगाई को आगे बढ़ाने का ही काम कर रही है।
बैठक अभी चल रही है और कल तक चलेगी। कई सांगठनिक एवं कार्यक्रम सम्बंधी फैसले लिये जा सकते हैं।


कार्यालय सचिव
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बुधवार, 25 जून 2014

मोदी सरकार का एक माह- अच्छे दिनों की बदरंग शुरुआत.

किसी भी सरकार के मूल्यांकन के लिये एक माह का कार्यकाल पर्याप्त नहीं कहा जा सकता. लेकिन केंद्र सरकार ने एक माह में जिस तरह ताबड़तोड़ फैसले लिये हैं और आम जनता में इसकी जैसी तीखी प्रतिक्रिया हुई है उसके चलते बरबस ही सरकार के कामकाज पर चर्चा शुरू होगयी है. शुरुआत चुनाव नतीजे आते ही होगयी थी. भारतीय जनता पार्टी को इस बार पर्याप्त बहुमत हासिल हुआ है अतएव उसे सरकार गठन के लिए कोई अतिरिक्त व्यवस्था नहीं करनी थी. फिर भी उसने परिणामों के ठीक दस दिन बाद- २६ मई को भव्य शपथ ग्रहण समारोह का आयोजन किया. लोकतंत्र में राजतंत्र जैसा शपथग्रहण आजादी के बाद पहली बार देखने को मिला. सभी पड़ोसी क्षत्रपों को शपथग्रहण समारोह का आमंत्रण दिया गया था. अम्बानी, अदानी जैसे धनपति और कई फिल्म सेलिब्रिटी समारोह के खास मेहमान थे. तो फिर व्यवस्था भी भव्य की ही जानी थी. लेकिन पूरे दस दिनों तक इतने बड़े देश में कोई जबाबदेह सरकार नहीं थी. इसकी जिम्मेदारी तो फिर भाजपा की ही बनती है. इसका पहला खामियाजा गोरखधाम एक्सप्रेस के उन निर्दोष रेल यात्रियों को भुगतना पड़ा जो शपथग्रहण के दिन ही दुर्घटनाग्रस्त होगयी और लगभग दो दर्जन लोग काल कवलित होगये. इधर मृतकों और घायलों के परिवारीजनों का करुण क्रंदन जारी था और उधर राजतिलक का लकदक आयोजन चल रहा था. कहाबत है रोम जब जल रहा था तो नीरो बांसुरी बजा रहा था. ऐसा यदि किसी अन्य दल ने किया होता तो भाजपा ने जरूर आसमान सिर पर उठा लिया होता. लेकिन इतने बड़े हादसे के बाद भी श्री मोदी ने समारोह को सादगी से आयोजित करने की सदाशयता नहीं दिखाई. सरकार के आगाज के साथ ही सेंसेक्स ने जो छलांग लगाई, शेयर बाज़ार के बड़े खिलाड़ी मालामाल होगये. सोने का आयात खोल दिया गया और परिणामतः सोने के दाम काफी नीचे आगये. आम लोगों को भ्रम हुआ कि उनके अच्छे दिन आगये और अब वे भी सस्ते सोने के आभूषण पहन सकेंगे. लेकिन उनका यह सपना पलक झपकते ही धूल धूसरित होगया और सोने की कीमतें फिर से चढ़ने लगीं. लेकिन इस बीच काले धन वालों ने जम कर सोना खरीदा और अब उसे वह ऊंची कीमतों पर बेचेंगे. उनके तो अच्छे दिन आही गये. विपक्ष खासकर वामपंथी विपक्ष लगातार कहता रहा है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों ही आर्थिक नवउदारवाद की नीतियों की पोषक हैं अतएव महंगाई भ्रष्टाचार एवं बेरोजगारी जैसे सवालों पर जनता को भाजपा से ज्यादा उम्मीद नहीं करनी चाहिये. यह तब स्पष्ट होगया जब केंद्र सरकार ने अपने जश्नकाल में ही डीजल की कीमतें बड़ा कर महंगाई बढ़ने देने का रास्ता खोल दिया और मई माह में थोक और खुदरा बाज़ार में महंगाई ने बढ़त जारी रखी. अब रेल किराये में १४.२प्रतिशत और मालभाड़े में ६.४प्रतिशत की बढ़ोत्तरी कर महंगाई को छलांग लगाने का रास्ता हमबार कर दिया. रही सही कमी चीनी पर आयात शुल्क में १५ के स्थान पर ४०प्रतिशत की वृध्दि ने कर दी. निर्यात पर प्रति टन रु. ३३०० की दर से दी जाने वाली सब्सिडी को सितंबर तक बढ़ा दिया गया. पेट्रौल में दस प्रतिशत एथनाल मिलाने की छूट दे दी. परिणामस्वरूप बाज़ार में एक ही झटके में चीनी के दामों में एक रु. प्रति किलो की बढोत्तरी होगयी जो चंद दिनों में रु.३.०० प्रति किलो तक जा सकती है. एक तरफ उपभोक्ताओं पर भीषण कहर वरपा किया गया वहीं चीनी उद्योग समूह को रु.४४०० करोड़ का व्याजमुक्त अतिरिक्त ऋण देने का निर्णय भी ले डाला. पूर्ववर्ती केंद्र सरकार पहले ही इस मद में रु.६६०० करोड़ दे चुकी है. यह सब किसानों के मिलों पर बकाये के भुगतान के नाम पर किया जारहा है. नीति वही पुरानी है केवल अमल करने वाले बदल गये हैं. आज भी यह सब कुछ विकास के नाम पर किया जारहा है. दिन दो दिन में गैस और केरोसिन के दाम बढ़ाये जाने हैं जो चौतरफा महंगाई वृध्दि का रास्ता खोलेंगे. प्याज के दामों में वृध्दि जारी है और वह रुलाने के स्तर तक पहुँच कर ठहरेगी. आम बजट और रेल बजट की तस्वीर भी कुछ कुछ दिखाई देने लगी है. जनविरोधी इन नीतियों को आसानी से लोगों के गले उतारने की फिराक में विभाजनकारी एजेंडे को पहले ही दिन से चालू कर दिया गया. अनुच्छेद ३७० और कामन सिविलकोड पर अलग अलग प्रवक्ता पैरवी करते दिखे. राम मन्दिर का निर्माण अभी ठन्डे बस्ते में है लेकिन बहुसंख्यक समुदाय की भावनाओं के दोहन के लिये गंगा की शुध्दि को साइन बोर्ड के तौर पर स्तेमाल किया जारहा है. गंगा की शुध्दि के लिये कड़े नैतिक कदम उठाने की जरूरत है पर एनडीए सरकार मुद्दे को सिर्फ गरमाए रखना चाहती है. सोशल मीडिया पर हिंदी के प्रयोग को बलात लादने के गृह मन्त्रालय के फैसले को भी इसी श्रेणी में रखा जारहा है. इराक युध्द को लेकर भी केंद्र सरकार अँधेरे में हाथ पैर मार रही है और वहां फंसे भारतीय कार्मिकों की सुरक्षित वापसी के लिये कुछ भी नहीं कर पायी है. यहाँ बहुत याद करने पर भी एक माह में सरकार का एक भी काम याद नहीं आपारहा जिसे आम जनता के लिये अच्छे दिनों की शुरूआत माना जासके. जनता का दोहन करने वालों के लिये अच्छे दिनों की शुरुआत अवश्य होगयी. मोदी ने जब कुछ कठोर कदम उठाने की बात की थी तो सभी ने अलग अलग अलग मायने निकाले थे. कुछ ने माना था कि बेतहाशा दौलत वालों को कटघरे में लाया जायेगा. काले धनवालों की एक सूची भी सरकार के पास है. लगा कि उन पर कार्यवाही होगी. बैंकों के बड़े बकायेदारों से बसूली का मामला भी सरकार के सामने है. लोग उम्मीद कर रहे हैं कि छप्पन इंच के सीने वाला प्रधानमन्त्री अवश्य ही कुछ करेगा. लेकिन पहला माह कारपोरेटों को लाभ पहुँचाने और आमजनों की कठिनाइयाँ बढ़ाने वाला ही दिखा. निश्चय ही जनता आने वाले माहों में अच्छे दिनों के आने की उम्मीद लगाये बैठी है. डा. गिरीश.
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मंगलवार, 24 जून 2014

दलितों और महिलाओं पर जुल्म रोकने में नाकामयाब ऊतर प्रदेश सरकार स्तीफा दे.

महिलाओं के बाद अब दलितों पर हमलाबर सामन्ती और पुलिस हमलाबरों को जेल भेजो- भाकपा. लखनऊ- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव डा. गिरीश ने राज्य सरकार को कटघरे में खड़े करते हुए कहाकि अभी तक यह सरकार महिलाओं और बच्चियों से दरिंदगी और उनकी निर्मम हत्यायों को रोक पाने में तो पूरी तरह विफल रही अब इसके शासनकाल में दलितों पर सामन्ती और पुलिसिया दमन सारी सीमायें पार कर गये हैं. कल ही बाराबंकी के सतरिख थाने में गत माह हुई हत्या के सिलसिले में एक दलित श्री राम सुरेश और उसकी पत्नी कौशल्या को लाया गया और राम सुरेश को इस हद तक पीटा गया कि उसकी मौत होगयी. इतना ही नहीं उसकी लाश को बिना घरवालों को बताये मोर्चरी में लाकर रख दिया गया. इसी तरह हाथरस जनपद के सिकंदरा राऊ थानान्तर्गत एक गाँव में दबंगों ने एक दलित युवक को बेरहमी से पीटा और परिजनों के तमाम आग्रह के बाद भी घटना की रिपोर्ट नहीं लिखी गयी. हौसलाबुलंद सामंतों ने दलित के घर में आग लगा कर उसे जला कर ख़ाक कर दिया. अब बसपा- भाजपा , सपा जैसी पार्टियाँ मामले पर राजनैतिक रोटियां सेंक रही हैं. भाकपा ने अखिलेश सरकार से मांग की कि या तो वह इन जघन्य अपराधों को रोके या विदाई ले. डा. गिरीश.
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सोमवार, 16 जून 2014

बिना विलम्ब कानून व्यवस्था को पटरी पर लाये उत्तर प्रदेश सरकार- भाकपा

लखनऊ- १६ जून २०१४- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने दिन- दिन बद से बदतर होती जा रही उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था पर गहरी चिंता व्यक्त की है. यहाँ जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा.गिरीश ने कहा कि अब तक महिलाएं, बच्चियां, आम आदमी और अपराधियों से नेता बने लोग ही बिगडी कानून व्यवस्था के शिकार हो रहे थे लेकिन अब तो पुलिस भी अपराधियों के निशाने पर है. गत रात फिरोजाबाद में बदमाशों ने दो सिपाहियों की हत्या कर दी और आज हत्या के विरोध में सड़कों पर उतरे आक्रोशित लोगों ने न केवल बड़े पैमाने पर तोड़- फोड़ की अपितु पथराब में एक बड़े पुलिस अधिकारी भी घायल हुए हैं. बलात्कार, बलात्कारों के बाद हत्या और उसके बाद महिलाओं को फांसी पर लटकाने की घटनायें थमने का नाम नहीं लेरही हैं. भाकपा इस बात पर गहरी चिंता जाहिर करती है की राज्य सरकार कानून- व्यवस्था पटरी पर लाने में पूरी तरह असफल है और निहित स्वार्थी राजनैतिक तत्वों ने इन हालातों पर घ्रणित राजनीति शुरू कर दी है. कुछ पार्टियाँ और संगठन इन घटनाओं की आड़ में सांप्रदायिक और जातीय खेल खेलने में जुट गये हैं. ठीक उसी तर्ज़ पर जैसाकि गत वर्ष मुज़फ्फरनगर में किया गया. सभी को इसे गंभीरता से लेना चाहिये. भाकपा राज्य सरकार से मांग करती है कि बिना विलम्ब किये कानून व्यवस्था को काबू में लाये और इसकी आड़ में राजनैतिक रोटियां सैंकने वाले तत्वों का पर्दाफाश करे. डा. गिरीश
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शनिवार, 14 जून 2014

रेलों के ठहराव रद्द करने के विरोध में भाकपा ने रेलमंत्री को खत लिखा

लखनऊ- १४ जून २०१४, उत्तर प्रदेश के विभिन्न स्टेशनों से चलने वाली और गुजरने वाली लगभग दो दर्जन ट्रेनों के कई ठहरावों के रद्द किये जाने के प्रस्ताव पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है. भाकपा ने इस प्रस्ताव को तत्काल रद्द करने की मांग की है. रेल मंत्री को लिखे गये पत्र में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा है कि जिन ट्रेनों के विभिन्न स्टेशनों पर ठहरावों को रद्द करने की घोषणा रेलवे ने की है, वे जनता की मांग पर उनकी सुविधा के लिए निश्चित किये गये थे. अब जनता से इस सुविधा को छीनने की कोशिश की जारही है. इससे आमजनता को बड़ी मुसीबतों का सामना करना पड़ेगा और सरकार को भी जनता के विरोध का सामना करना पड़ेगा. इसलिए बेहतर यही होगा कि जनता से इस सुविधा को छीना न जाये. डा. गिरीश ने कहा कि यद्यपि इस प्रस्ताव को ३० सितंबर तक के लिये स्थगित कर दिया गया है लेकिन भाकपा जनहित में ऐसे जनविरोधी प्रस्ताव को पूरी तरह रद्द करने की मांग करती है. डा. गिरीश
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गुरुवार, 12 जून 2014

महिलाओं की रक्षा और कानून के राज के लिये भाकपा ने किया प्रदेशव्यापी प्रदर्शन

अत्याचार रोके न गये तो आन्दोलन को और तेज किया जायेगा - भाकपा
लखनऊ 12 जून। प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ दरिंदगी और अत्याचारों की वारदातें थमने का नाम नहीं ले रहीं हैं। कानून व्यवस्था भी दिन-प्रति-दिन बद से बदतर होती जा रही है। शहर हो या गांव महिलाओं का तो सड़कों पर निकलना और सुरक्षित लौट के घर आना बेहद मुश्किल हो गया है। घर में भी वे हिंसा की शिकार हो रही हैं। इस स्थिति को लम्बे समय तक बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। महिलाओं और संवेदनशील समाज की इस पीड़ा को आज भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने मजबूत आवाज प्रदान की। “महिलाओं की रक्षा करो, कानून का राज कायम करो” नारे के तहत भाकपा की तमाम जिला इकाइयों ने आज जिला केन्द्रों पर जुझारू तेवरों के साथ धरने-प्रदर्शंन आयोजित किये और महामहिम राज्यपाल को संबोधित ज्ञापन जिलाधिकारियों को सौंपे।
बदायूं के कटरा सआदत गंज में सामूहिक बलात्कार के बाद दो किशोरियों को फांसी पर लटकाने और हर दिन लगभग दर्जन भर महिलाओं के साथ दुराचार और अनेक जगह उनकी हत्यायों को गंभीरता से लेते हुये भाकपा ने अपनी समस्त जिला इकाइयों का आह्वान किया था कि वे आज के दिन इस ज्वलंत समस्या को लेकर जिला केन्द्रों पर व्यापक तैयारी के साथ धरने प्रदर्शन आयोजित करें और प्रदर्शनों में महिलाओं की अच्छी भागीदारी सुनिश्चित करें। आन्दोलन को कामयाब बनाने के लिए भाकपा के राज्य नेतृत्व ने प्रदेश के विभिन्न भागों के दौरे किये और भाकपा का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल राज्य सचिव के नेतृत्व में कटरा सआदतगंज भी गया था।
आज सुबह 11 बजे से ही एक के बाद एक जिले से सफल प्रदर्शनों की रिपोर्ट भाकपा के राज्य मुख्यालय को प्राप्त होने लगी थीं। बदायूं, जहां की घटना ने सारी दुनियां का ध्यान आकर्षित किया था, जिला कलेक्ट्रेट के समक्ष एक विशाल धरना दिया गया जिसका नेतृत्व महिला फेडरेशन की नेता प्रो. निशा राठौर एवं भाकपा के जिला सचिव रघुराज सिंह ने किया। राज्यपाल महोदय को संबोधित ज्ञापन जिलाधिकारी को सौंपा गया। बदायूं के मंडलीय मुख्यालय बरेली में भी भाकपा एवं महिला फेडरेशन ने एक संयुक्त धरना कलेक्ट्रेट के समक्ष तिकोनियां पार्क में दिया और व्यापक नारेबाजी की। बाद में जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपा गया जोकि राज्यपाल को संबोधित था। प्रदर्शन का नेतृत्व भाकपा जिला सचिव राजेश तिवारी, ट्रेड यूनियन नेता तारकेश्वर चतुर्वेदी, युवा नेता मसर्रत वारसी तथा महिला फेडेरेशन की नेता सबीना बेगम ने किया। इसी मंडल के जनपद शाहजहांपुर में भी जिला कलेक्ट्रेट पर भारी नारेबाजी के साथ प्रदर्शन किया गया और जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपा गया। नेतृत्व जिला सचिव मोहम्मद सलीम, रामशंकर नेताजी, सुरेश नेताजी, जुगेन्द्र कौर एवं पद्मावती ने किया।
संतकबीर नगर में जिला कलेक्ट्रेट पर हुए प्रदर्शन में पुरुषों के अतिरिक्त लगभग दो सौ से अधिक महिलाओं ने भारी नारेबाजी के बीच ज्ञापन दिया। नेतृत्व भाकपा जिला सचिव श्रीमती हरजीत कौर, महिला फेडरेशन की नेता श्रीमती सुनीता मोदनवाल तथा शिव कुमार गुप्ता ने किया। देवरिया में भी जिला सचिव चक्रपाणी तिवारी एवं आनंद चौरसिया के नेतृत्व में धरना आयोजित किया गया। लखनऊ में महिला फेडरेशन की नेत्री श्रीमती आशा मिश्रा, श्रीमती बबिता एवं भाकपा जिला सचिव मोहम्मद खालिक के नेतृत्व में पार्टी के जिला कार्यालय कैसरबाग से जिलाधिकारी कार्यालय तक जुलूस निकाला तथा कलेक्ट्रेट पर सभा के उपरान्त उपजिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपा।
प्रदेश के पश्चिमी भाग गाज़ियाबाद में पार्टी के जिला सचिव जितेन्द्र शर्मा के नेतृत्व में जिलाधिकारी कार्यालय के बाहर बड़ा धरना लगाया गया जिसमें महिलाओं की भागीदारी शानदार रही। भारी नारेबाजी के बाद जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपा गया। अलीगढ में भी भाकपा एवं महिला फेडरेशन के कार्यकर्ता निषेधाज्ञा तोड़ कर जिलाधिकारी कार्यालय परिसर में घुस गये और जिलाधिकारी कार्यालय के समक्ष भीषण नारेबाजी की और ज्ञापन सौंपा। नेतृत्व जिला सचिव प्रो. सुहेव शेरवानी, रामबाबू गुप्ता एवं इक़बाल मंद ने किया।
फैजाबाद में तहसील के बाहर तिकौनियां पार्क में हुए धरने का नेतृत्व जिला सचिव रामतीर्थ पाठक, रामजी यादव, परमा देवी तथा रीता देवी ने किया। जनपद मऊ में जिला कलेक्ट्रेट के समक्ष धरना दिया गया जिसका नेतृत्व पूर्व विधायक इम्तियाज़ अहमद एवं विनोद राय ने किया। इसके बाद जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपा गया। सुल्तानपुर में शारदा पाण्डेय के नेतृत्व में जिलाधिकारी कार्यालय पर प्रदर्शन कर ज्ञापन सौंपा। इसी तरह ललितपुर में बाबूलाल अहिरवार, जिला सचिव के नेतृत्व में ज्ञापन दिया गया। हाथरस में पार्टी के कार्यवाहक सचिव चरण सिंह बघेल, नगर सचिव जगदीश आर्य एवं आर. डी. आर्य के नेतृत्व में ज्ञापन जिलाधिकारी को सौंपा गया। कानपुर महानगर में राज्य सहसचिव अरविन्द राज स्वरूप, जिला सचिव ओमप्रकाश आनंद तथा महिला फेडरेशन की नेता श्रीमती उमा गुप्ता के नेतृत्व में राम आसरे पार्क में धरना दिया गया और सभा की गयी। सिटी मजिस्ट्रेट ने वहां पहुँच कर ज्ञापन प्राप्त किया।
अन्य जिलों में भी धरने प्रदर्शनों के आयोजन की रिपोर्ट राज्य कार्यालय को लगातार प्राप्त हो रही है।
भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने बताया कि महामहिम राज्यपाल को संबोधित ज्ञापनों में प्रदेश में महिलाओं के ऊपर चलाये जा रहे दमन चक्र की कड़े शब्दों में निंदा की गयी है और जर्जर बन चुकी कानून व्यवस्था की हालत पर तीखा आक्रोश प्रकट किया गया है। भाकपा राज्य सचिव मंडल ने महामहिम राज्यपाल से मांग की है कि वे महिलाओं की सुरक्षा और कानून के शासन के लिये अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग करते हुए राज्य सरकार को कड़े निर्देश जारी करें। भाकपा राज्य सचिव मंडल ने राज्य सरकार को चेतावनी दी है कि यदि उसने इस दिशा में सही कदम शीघ्र न उठाये तो भाकपा और व्यापक आन्दोलन करेगी और इसकी रुपरेखा 28-29 जून को होने जा रही राज्य काउन्सिल की बैठक में तैयार की जायेगी। डा. गिरीश ने पार्टी के कार्यकर्ताओं को बधाई दी कि उन्होंने इस भीषण गर्मीं में जनहित के सवालों पर सडकों पर उतर कर आवाज बुलंद की।

कार्यालय सचिव
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बुधवार, 11 जून 2014

”महिलाओं की रक्षा करो, कानून का राज कायम करो“ नारे के तहत भाकपा समस्त उत्तर प्रदेश में करेगी धरना-प्रदर्शन

लखनऊ  11 जून। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने इस बात पर गहरी चिन्ता व्यक्त की है कि प्रदेश सरकार के लाख दावों के बावजूद उत्तर प्रदेश में महिलाओं एवं बालिकाओं के साथ दरिन्दगी और उनकी हत्याओं की वारदातों में कोई कमी नहीं आई है।
शासक दल के नेताओं और सर्वोच्च पुलिस प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा इस सम्बंध में दिये जा रहे गैरजिम्मेदाराना बयान अपराधी तत्वों की हौसला अफजाई करते हैं। वहीं शासक दल एवं उसकी पिट्ठू पुलिस द्वारा अपराधियों को दिया जा रहा संरक्षण अपराधों को बढ़ा रहा है और पीड़ितों को न्याय से वंचित रख रहा है।
भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि उत्तर प्रदेश महिलाओं के लिए कसाईखाना जैसा बन गया है, जहां प्रतिदिन औसतन एक दर्जन दरिन्दगी की वारदातें अंजाम दी जा रही हैं। हत्या एवं दूसरे अपराधों में तेजी से वृद्धि हुई है।
अतएव भाकपा कल दिनांक 12 जून 2014 को ”महिलाओं की रक्षा करो! कानून का राज कायम करो!!“ नारे के तहत प्रदेश भर में जिला मुख्यालयों पर धरने/प्रदर्शनों का आयोजन करेगी और महामहिम राज्यपाल को सम्बोधित ज्ञापन जिलाधिकारियों को सौंपे जायेंगे।
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गुरुवार, 5 जून 2014

एआईएसएफ की मांग - ”टैबलेट दो, लैपटॉप दो - वरना गद्दी छोड़ दो“

लखनऊ 5 जून। आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (एआईएसएफ) ने आज अपनी राज्य स्तरीय कार्यकर्ता बैठक में 12 अगस्त को अपने स्थापना दिवस पर प्रदेश के सभी जिला मुख्यालयों पर विचार गोष्ठियां आयोजित करने का फैसला लिया। विचार गोष्ठियों का नारा होगा - ”टैबलेट दो, लैपटॉप दो - वरना गद्दी छोड़ दो“ तथा ”शिक्षा का बाजारीकरण बन्द करो“।
फेडरेशन ने जून माह में पूरी तैयारी कर पूरे प्रदेश में जुलाई एवं अगस्त माह में सघन सदस्यता अभियान चलाने, सितम्बर में जिला सम्मेलन आयोजित करने तथा अक्टूबर माह में राज्य सम्मेलन आयोजित करने का फैसला भी लिया।
फेडरेशन ने ”सामाजिक परिवर्तन के लिए शिक्षा में सुधार“ विषय पर एक राज्य स्तरीय गोष्ठी लखनऊ में आयोजित करने का भी फैसला लिया है जिसमें शिक्षा शास्त्रियों तथा समाज शास्त्रियों को आमंत्रित किया जायेगा। फेडरेशन ने सोशल मीडिया पर भी अपनी गतिविधियां तेज करने का फैसला लिया है।
फेडरेशन की कार्यकर्ता बैठक ने सांगठनिक कारणों से राज्य कमेटी को भंग कर दिया तथा एक तदर्थ समिति का गठन किया जो अगले राज्य सम्मेलन तक राज्य कार्यालय का कार्य देखेगी। ओंकार नाथ पाण्डेय को तदर्थ समिति का संयोजक तथा अमरेश चौधरी को सह संयोजक बनाया गया है। तदर्थ समिति के अन्य सदस्य हैं - रजनीश मिश्रा, तिलक राम मांझी, हरी मोहन त्रिपाठी, कु. शिवानी मौर्या तथा उत्कर्ष त्रिपाठी।
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बुधवार, 4 जून 2014

भाकपा के प्रतिनिधिमंडल ने सआदत गंज का दौरा किया. सपा समर्थकों एवं पुलिस को ठहराया घटना के लिये जिम्मेदार

लखनऊ- ४ जून २०१४. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी एवं उसके सहयोगी संगठनों के प्रतिनिधियों ने बदायूं जनपद के कटरा सआदतगंज पहुँच कर पीड़ित परिवार से भेंट की, उनके प्रति सहानुभूति प्रकट की तथा उस स्थल को भी देखा जिसमें दो किशोरियों के साथ बलात्कार के बाद उन्हें फांसी पर लटका दिया गया था. भाकपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य एवं उत्तर प्रदेश के राज्य सचिव डॉ. गिरीश के नेत्रत्व में वहां पहुंचे प्रतिनिधिमंडल में भाकपा की राष्ट्रीय परिषद् के सदस्य एवं हरियाणा प्रदेश के सचिव का. दरयाब सिंह कश्यप, पार्टी की राज्य कार्यकारिणी के सदस्य का. अजय सिंह, राज्य काउन्सिल के सदस्य एवं गाज़ियाबाद के जिला सचिव का. जितेन्द्र शर्मा, बरेली के जिला सचिव राजेश तिवारी, बदायूं के जिला सचिव रघुराज सिंह, उत्तर प्रदेश महिला फेडरेशन की काउन्सिल सदस्य प्रोफेसर निशा राठोड़, जिला संयोजक विमला, भारतीय खेत मजदूर यूनियन के राष्ट्रीय सचिव का. विजेंद्र निर्मल, उत्तर प्रदेश किसान सभा के सचिव का. रामप्रताप त्रिपाठी, उपाध्यक्ष का. छीतरसिंह, दिल्ली विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसर सदाशिव,बरेली से पार्टी के प्रत्याशी रहे का. मसर्रत वारसी, वरिष्ठ पार्टी नेता डी.डी. बेलवाल, शाहजहांपुर के वरिष्ठ नेता का. सुरेश कुमार, का. प्रेमपाल सिंह, प्रवीण नेगी, सुरेन्द्र सिंह, सुखलाल भारती, सुरेन्द्र सिंह, हरपाल यादव, राकेश सिंह, रामप्रकाश, मुन्नालाल, राकेश सिंह सहित लगभग ५० कार्यकर्ता शामिल थे जो आठ गाड़ियों के काफिले के साथ वहां पहुंचे थे. प्रतिनिधि मंडल को पीड़ित परिवार एवं उपस्थित महिलाओं ने बताया कि गाँव के दबंग लोग जो समाजवादी पार्टी के समर्थक हैं, अक्सर गाँव के कमजोर परिवारों की महिलाओं और किशोरियों से अशोभनीय व्यवहार करते हैं. उनके पशु कमजोर तबकों के किसानों के खेतों में चरते हैं और कोई उनसे मना करने की हिम्मत जुटाता है तो उसके साथ मारपीट करते हैं. एक गरीब महिला ने बताया कि उसके बेटे की पिछले वर्ष हत्या करदी गई और आज तक पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं की. पुलिस हर मामले में और हमेशा इन दबंगों का ही साथ देती है और यह दमन चक्र सपा की सरकार आते ही और बढ़ जाता है. महिलाओं ने बताया कि गाँव में शौचालयों का बेहद अभाव है. शिक्षा के लिये कोई कालेज भी नहीं है. उनकी पीड़ा इस बात को लेकर भी झलकी कि अभी तो सभी लोग यहाँ आ- जा रहे हैं, जब कुछ दिनों बाद लोगों का आना- जाना बंद होजायेगा तो गाँव के ये दबंग तत्व फिर दबंगई करेंगे. प्रतिनिधिमंडल की ओर से डॉ. गिरीश ने उपस्थित लोगों से कहा कि हम लोग आपका दर्द बाँटने आये हैं सहानुभूति के दो शब्द कहने आये हैं तथा आपकी आवाज को आवाज देने का भरोसा दिलाने आये हैं. हमारे पास अन्य दलों की तरह देने को न धन है न झूठे बायदे. न ही हम औरों की तरह वोट की राजनीति करते हैं. हम पीड़ित परिवार की प्रशंसा करते हैं कि आज के युग में जब लोग एक एक पैसे के लिए सर्वस्व लुटाने को तैय्यार हैं इस परिवार ने सरकार की मदद को ठुकरा दिया अपराधियों को सजा दिलाने की दृढ़ता दिखाई. सभी लोगों ने भाकपा की इस भावना को सराहनीय बताया. भाकपा की यह स्पष्ट राय है कि सआदतगंज की इस घटना के लिए स्थानीय पुलिस पूरी तरह जिम्मेदार है. वह वहां अपराधियों को प्रश्रय देने में जुटी थी और पीड़ित परिवार को ही डरा धमका रही थी. राज्य सरकार कई दिनों तक अपराधियों के प्रति सहानुभूति का रवैय्या अख्तियार किये रही. ठीक उसी तरह जैसे सी.ओ. पुलिस जिया उल हक हत्याकांड में अपनाती रही थी. वह तब हरकत में आयी जब मामला काफी तूल पकड़ गया. भाकपा मांग करती है कि पीड़ित परिवार और गाँव के अन्य कमजोरों की जान माल और आबरू की सुरक्षा हेतु कड़े कदम उठाये जायें, वहां थाने और चौकियों पर कमजोर वर्गों से आने वाला स्टाफ तैनात किया जाये, तत्कालीन थानाध्यक्ष उसैहत सहित तमाम दोषी पुलिसजनों को सस्पेंड किया जाये, मृतक दोनों बहिनों के नाम पर वहां एक सरकारी बालिका विद्यालय खोला जाये, हर घर में शौचालय बनबाये जायें तथा अति पिछड़े इस क्षेत्र के विकास के लिए वहां सार्वजनिक क्षेत्र में उद्योग लगाए जायें. डॉ. गिरीश ने कहा है कि आज उतर प्रदेश महिलाओं के लिये तो कसाईघर बन कर रह गया है. हर दिन प्रदेश भर में लगभग दर्जनभर महिलाओं के साथ दरिंदगी की ख़बरें मिल रहीं हैं. प्रदेश की कानून व्यवस्था समाप्त ही होगयी है. इसकी नैतिक जिम्मेदारी मुख्यमंत्री को अपने ऊपर लेनी चाहिये और सरकार को त्यागपत्र देदेना चाहिये. भाकपा ने महिलाओं की सुरक्षा के प्रश्न पर व्यापक आन्दोलन छेड़ने का निश्चय किया है. प्रदेश भर में जन जागरण छेड़ दिया है और १२ जून को भाकपा “महिलाओं की रक्षा करो” नारे के साथ सभी जिला मुख्यालयों पर धरने प्रदर्शनों का आयोजन करेगी. डॉ. गिरीश
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सोमवार, 2 जून 2014

महिलाओं की सुरक्षा की मांग को लेकर सड़कों पर उतरेगी भाकपा

लखनऊ 2 जून। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य कार्यकारिणी की एक बैठक आज यहां सम्पन्न हुई। बैठक में चुनाव परिणामों एवं चुनाव के बाद पैदा हुई राजनैतिक स्थिति पर गहन मंथन किया गया तथा उत्तर प्रदेश में महिलाओं की इज्जत और उनकी जिन्दगी पर हो रहे गहरे आक्रमणों पर चर्चा हुई। साथ ही उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था एवं बिजली कटौती से पैदा हुए संकट से भी विचार हुआ। भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश द्वारा इस सम्बंध में प्रस्तुत लिखित रिपोर्ट पर हुई चर्चा में 20 साथियों ने भाग लिया।
भाकपा राज्य कार्यकारिणी ने इस बात पर गहरा रोष प्रकट किया कि उत्तर प्रदेश में महिलाओं की जिन्दगी और इज्जत तार-तार हो रही है। प्रतिदिन लगभग दर्जन भर संगीन वारदातों की खबरें राज्य भर से प्राप्त हो रही हैं। पुलिस और प्रशासन में पैठ बनाये हुए असामाजिक और गुण्डा तत्व इन घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं और पुलिस प्रशासन ऐसे अपराधियों को प्रश्रय दे रहा है। राज्य सरकार भी कुछ कर नहीं पा रही। भाकपा ने तय किया कि महिलाओं की सुरक्षा के इस सवाल पर सघन आन्दोलन चलाया जाये। इस हेतु 12 जून को भाकपा महिलाओं को सुरक्षा दिये जाने के लिए सभी जिला केन्द्रों पर प्रदर्शन करेगी। साथ ही भाकपा का एक प्रतिनिधिमंडल राज्य सचिव डा. गिरीश के नेतृत्व में कल दिनांक 3 जून को बदायूं पहुंचेगा और पीड़ित परिवार के साथ दुःख बांटेगा।
भाकपा ने प्रदेश में कानून-व्यवस्था की भी नाजुक स्थिति पर नाराजगी जाहिर की है। प्रदेश में पैदा हुए अभूतपूर्व बिजली संकट पर भाकपा ने मांग की है कि केन्द्र और राज्य सरकारें इस संकट का निदान खोजें, परस्पर बयानबाजी से कोई हल निकलने वाला नहीं है। गन्ना किसानों के मिलों पर पड़े बकाये के भुगतान और गन्ने की अगली फसल के लिए उचित मूल्य निर्धारण के लिए भी भाकपा आन्दोलन की रूपरेखा बनाने जा रही है।
राज्य कार्यकारिणी ने इस बात का नोटिस लिया कि नई सरकार को सत्तारूढ़ हुए एक पखवाड़ा बीत रहा है परन्तु अभी तक महंगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी जैसी समस्याओं से निबटने की कोई सक्रियता केन्द्र सरकार ने नहीं दिखाई है। कथित अच्छे दिनों की शुरूआत रेल दुर्घटना में मरे लगभग 2 दर्जन लोगों से हुई और अब डीजल के दाम बढ़ा कर इस कड़ी को और आगे बढ़ाया गया है। लोगों को एकजुट करने के बजाय धारा 370 और कॉमन सिविल कोड जैसे विभाजनकारी एजेंडे चालू कर दिये गये हैं और सरकार महंगाई के बारे में चिन्तित दिखाई ही नहीं दे रही है। विदेशी बैंकों में जमा धन की एक सूची केन्द्र सरकार के पास पहले से ही है लेकिन वायदे के अनुसार उसको भारत में लाने का कार्य शुरू नहीं किया गया है। एक भारी भरकम जांच कमेटी बना कर लोगों को इस धन को अपनी सुविधा के अनुसार ठिकाने लगाने का वक्त दे दिया गया है। उद्योगपतियों और पूंजीपतियों पर बैंकों के एनपीए बकायों को वसूली करने का अभियान भी अभी शुरू नहीं किया गया है।
पार्टी की राज्य कौंसिल की बैठक 28-29 जून को लखनऊ में आयोजित करने का फैसला लिया गया है ताकि उसमें सभी बिन्दुओं की समीक्षा कर भविष्य की रणनीति तैयार की जा सके।


कार्यालय सचिव
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शनिवार, 31 मई 2014

महिलाओं की इज्जत और उनके जानमाल की रक्षा के लिये भाकपा निर्णायक संघर्ष छेड़ेगी

महिलाओं की इज्जत और जानमाल की सुरक्षा के लिये भाकपा छेड़ेगी निर्णायक संघर्ष लखनऊ- ३१ मई २०१४. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने कहाकि बदायूं जनपद में दो किशोरियों की दुराचार के बाद की गई हत्या की बारदातें विचलित करने वाली हैं. आज ही जनपद आजमगढ़ में किशोरी के साथ हुई सामूहिक दुराचार की घटना के प्रकाश में आने से यह स्पष्ट होगया हैकि प्रदेश में सरकार नाम की कोई हस्ती है ही नहीं. अराजकता और अत्याचार का नंगा नाच जारी है. यह अब बेहद असहनीय होगया है. भाकपा महिलाओं की आबरू और उनकी जानमाल की रक्षा के लिये जिला स्तर से लेकर राज्य स्तर तक संघर्ष चलाएगी और यह संघर्ष तब तक जारी रहेगा जब तक पीड़ित महिलाओं को न्याय नहीं मिल जाता और वह निर्भयता से सडकों पर निकल सकें ऐसा वातावरण नहीं बन जाता. यहाँ संपन्न पार्टी के राज्य सचिव मंडल की बैठक को संबोधित करते हुए पार्टी के राज्य सचिव डॉ. गिरीश ने कहाकि पिछले लगभग एक माह में प्रदेश में महिलाओं के साथ दुराचार की घटनाओं में काफी इजाफा हुआ है. अभी कुछ ही दिन पहले बागपत जिले के छपरौली में छात्रा के साथ सामूहिक दुष्कर्म हुआ, मुजफ्फर नगर के ककरौली में भी नाबालिग के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ, गाज़ियाबाद के मोदी नगर में किशोरी के साथ सामूहिक दुष्कर्म हुआ तथा बिजनौर के धामपुर में भी दुराचार की घटनायें प्रकाश में आयी हैं. इटावा से जहाँ दुराचार और इसके बाद पीडिता के परिजनों के साथ मारपीट की घटनायें सामने आयी हैं वहीं सीतापुर में तो महिला के साथ कार में दुराचार के बाद उसे बाहर फैंक दिया गया. ऊपर से एक आई जी बचकाना बयान देरहे हैं कि उत्तर प्रदेश में दुराचार की बारदातें आबादी की तुलना में कम हैं. भाकपा की दृढ़ राय है कि इन घटनाओं की नैतिक जिम्मेदारी मुख्यमंत्री को स्वयं स्वीकार करनी चाहिये और पीड़ितों को न्याय दिलाने तथा सभी दोषियों को दण्डित किये जाने हेतु शीघ्र ठोस कदम उठाये जाने चाहिये. भाकपा राज्य सचिव मंडल ने पार्टी की बदायूं एवं आजमगढ़ जिला कमेटियों को पहले ही निर्देश देदिया हैकि वह घटना स्थल पहुँच कर पीड़ितों का दुःख बांटें और छान- बीन कर कल सुबह तक रिपोर्ट राज्य केंद्र को भेजें. कल यहाँ राज्य केंद्र पर होने वाली भाकपा की राज्य कार्यकारिणी की बैठक में इस सम्वेदनशील मुद्दे पर अगली कार्यवाही पर निर्णय लिया जायेगा. राज्य सचिव मंडल ने प्रदेश में होरही अभूतपूर्व बिजली कटौती का भी नोटिस लिया और सरकार से मांग की कि वह समस्या का सार्थक समाधान खोजे, बहानेबाजी से कोई लाभ होने वाला नहीं. डॉ.गिरीश
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बुधवार, 21 मई 2014

एआईएसएफ के प्रसार हेतु विद्यार्थी कैडर बैठक

एआईएसएफ के उत्तर प्रदेश में प्रसार के लिए विद्यार्थियों की एक राज्य स्तरीय बैठक लखनऊ में भाकपा के राज्य कार्यालय पर 5 जून 2014 को पूर्वांहन 10.00 बजे से आहूत की गयी है। पार्टी के सभी साथियों,  तमाम जन संगठनों पर कार्यरत साथियों तथा एआईएसएफ के पूर्व कार्यकर्ताओं से अनुरोध है कि इस अत्यावश्यक बैठक को सफल बनाने के लिए अपने-अपने जिले/क्षेत्र से नेतृत्व कर सकने लायक विद्यार्थियों को बैठक में भाग लेने के लिए भेजने का कष्ट करें।
हमारा पूरा प्रयास है कि आसन्न अकादमिक सत्र में एआईएसएफ का संगठन उत्तर प्रदेश में एक स्वरूप ग्रहण कर सके और विद्यार्थियों के व्यापक तबकों को संगठन की ओर आकर्षित करने लायक संगठन तैयार हो सके। इस उद्देश्य को बिना आप सभी के सहयोग के पूरा कर सकना सम्भव नहीं है।
अस्तु आप सभी से अनुरोध है कि इस कार्य पर ध्यान देने का कष्ट करें और यथा सम्भव राज्य केन्द्र को सहयोग प्रदान करें।
- डा. गिरीश, राज्य सचिव, भाकपा
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बुधवार, 14 मई 2014

पश्चिम बंगाल में मतदान के दौरान हिंसा और धांधली के खिलाफ वामपंथ का विरोध प्रदर्शन.

लखनऊ- १४, मई. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी एवं वामपंथी दलों ने पश्चिम बंगाल में आखिरी चरण के मतदान के दौरान तृणमूल कांग्रेस समर्थकों द्वारा बड़े पैमाने पर की गई हिंसा, धांधली और अराजकता के विरुध्द वामपंथी दलों के राष्ट्रव्यापी आह्वान पर आज समूचे उत्तर प्रदेश में विरोध प्रदर्शनों का आयोजन किया. वामदलों ने इन घटनाओं के लिए जिम्मेदार तृणमूल कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं के विरुध्द कड़ी कार्यवाही की मांग की तथा गडबडी वाले लगभग १००० बूथों पर पुनर्मतदान कराये जाने की मांग की. यहाँ जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डॉ. गिरीश ने बताया कि यद्यपि आज प्रदेश भर में अवकाश था और सरकारी कार्यालय बंद थे, फिर भी प्रदेश में अधिकतर जिलों में भाकपा कार्यकर्ता सडकों पर उतरे और विरोध प्रदर्शन किये. निर्वाचन आयोग को सम्बोधित ज्ञापन जिले के प्रशासनिक अधिकारियों को सौंपे गये. राजधानी लखनऊ में भाकपा एवं माकपा के कार्यकर्ताओं ने विधान भवन के सामने प्रदर्शन किया और इन घटनाओं के लिये जिम्मेदार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी का पुतला फूंका. प्रदर्शन का नेत्रत्व भाकपा के जिला सचिव मोहम्मद खालिक एवं माकपा के जिला सचिव छोटे लाल ने किया. बाद में मोहम्मद खालिक के नेत्रत्व में एक प्रतिनिधि मंडल ने सिटी मजिस्ट्रेट हरिप्रसाद शाही के कार्यालय में पहुंच कर निर्वाचन आयोग को संबोधित ज्ञापन प्राप्य कराया. इसी तरह के विरोध प्रदर्शन भाकपा की मथुरा, हाथरस, आगरा, मैनपुरी, अलीगढ़, गाज़ियाबाद, मेरठ, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, जे. पी. नगर, मुरादाबाद, बरेली, शाहजहांपुर, कानपुर, फतेहपुर, जालौन, झाँसी, बाँदा, इलाहाबाद, फैजाबाद, सुल्तानपुर, बलरामपुर, कुशीनगर, देवरिया, गोरखपुर, मऊ, आजमगढ़, बस्ती, जौनपुर, प्रतापगढ़, राबर्ट्सगंज एवं चंदौली जिला कमेटियों ने भी आयोजित किये. भाकपा राज्य सचिव डॉ. गिरीश ने अपने बयान में कहा कि आशा की जाती है कि निर्वाचन आयोग मामले को गंभीरता से लेगा और लोकतंत्र के हित में उन बूथों पर दोबारा मतदान के आदेश तत्काल देगा जहाँ हिंसा और हथियारों के बल पर लोगों को मतदान से रोका गया है और फर्जी मतदान किया गया है. तृणमूल कांग्रेस के नेताओं द्वारा प्रायोजित हिंसा और धांधली की घटनाओं के मामलों में कड़ी से कड़ी कार्यवाही की जानी चाहिये. डॉ. गिरीश
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रविवार, 11 मई 2014

सांप्रदायिक विष- वमन एवं प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम हैं मेरठ की घटनायें. राज्य सरकार कड़े कदम उठाए--भाकपा

लखनऊ- ११ मई, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने कल घटित हुई मेरठ की घटनाओं पर गहरी चिंता व्यक्त की है. भाकपा ने मांग की है कि इन घटनाओं के लिए जिम्मेदार लोगों को चिन्हित कर उनके खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्यवाही की जाये. यहाँ जारी एक बयान में भाकपा के राज्य सचिव डॉ. गिरीश ने कहा कि पिछले दिनों मेरठ, मुजफ्फरनगर एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हुये दंगों से संप्रदायों के बीच गहरी खाई पैदा होगई थी. इस बीच भाजपा एवं संघ परिवार ने अपने चुनाव अभियान में बड़े पैमाने पर विष- वमन किया और इस खाई को और भी चौड़ा करने का काम किया है. ऐसे गरमाए माहौल में संवेदनशील स्थानों पर कोई भी छोटी घटना भयावह रूप ले सकती है. मेरठ की घटना इसी वातावरण की देन प्रतीत होती हैं. डॉ. गिरीश ने कहाकि घटनास्थल के हालात बताते हैं कि एक विवादित स्थान पर होरहे निर्माण को लेकर पैदा हुई तनातनी को अगर स्थानीय पुलिस- प्रशासन ने सख्ती से हाथ के हाथ दबा दिया होता तो मामला इतना तूल नहीं पकड़ता. पुलिस- प्रशासन की इसी ढिलाई का फायदा उठाते हुये वहां सांप्रदायिक शक्तियाँ सक्रिय होगयीं और वहां खूनी संघर्ष होगया. मेरठ और आसपास के जिलों के तमाम भाजपा नेता वहां जुट गये थे. डॉ. गिरीश ने राज्य सरकार से मांग की है कि वे घटनाओं के जिम्मेदार सभी तत्वों को चिन्हित कर शीघ्र कानूनी कार्यवाही करे. उन्होंने चेतावनी दी है कि चुनाव परिणाम आने पर बौखलाये तत्व ऐसी और भी वारदातों को अंजाम दे सकते हैं अतएव राज्य सरकार को कड़ी चौकसी बरतनी चाहिये. साथ ही प्रदेश की जनता से भी अपील की कि वह सांप्रदायिक तत्वों के उकसाबे में न आये डॉ. गिरीश
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शनिवार, 10 मई 2014

सरमाये एवं मीडिया का नग्न नृत्य और असहाय चुनाव आयोग

लोक सभा चुनाव के अंतिम दौर का प्रचार आज सायं समाप्त हो जायेगा और इस अंक के पाठकों तक पहुंचने के पहले चुनाव परिणाम घोषित हो चुके होंगे और नई सरकार के गठन की कवायद चल रही होगी। लोक सभा चुनावों के चुनाव परिणामों के बारे में कोई भी टिप्पणी परिणाम आने के बाद ही की जा सकती है लेकिन इस चुनाव के दौरान जिस तरह सरमाये एवं मीडिया ने एक व्यक्ति विशेष को प्रधानमंत्री बनाने के लिए अभियान चलाया और जिस तरह चुनावों के दौरान धर्म एवं जातियों में मतदाताओं के संकीर्ण ध्रुवीकरण के प्रयास हुए, वह दोनों निहायत चिन्ताजनक है। भारतीय संविधान की आत्मा जार-जार की जाती रही। इस पूरे चुनाव के दौरान मुद्दे गायब रहे, जनता के सरोकार गायब रहे और चुनाव की प्रक्रिया पूरी हो गई। जिस विकास की बातें की गईं, उस तरह का विकास पूरे देश में जगह-जगह पिछले 23 सालों में देखने को मिलता रहा है। इस दौर में हर चीज बढ़ती रही है, सरमायेदारों का सरमाया बढ़ता चला गया है और गरीबों की गरीबी बढ़ती चली गई है। महंगाई, बेरोजगारी, दमन, उत्पीड़न, अपराध सब प्रगति के पथ पर बेरोकटोक आगे बढ़ते रहे हैं। नई आर्थिक नीतियों की शुरूआत में नीति नियंताओं और साम्राज्यवादी अर्थशास्त्रियों का दावा था कि सरमायेदारों का सरमाया बढ़ने से टपक-टपक कर पैसा आम जनता तक पहुंचने लगेगा और यह सिद्धान्त ‘ट्रिकल डाउन’ थ्योरी के रूप में जाना गया। 23 साल बीत गये हैं परन्तु ऐसा होता कहीं दिखाई नहीं दिया। ऊपर से नीचे टपकता धन कहीं दिखाई नहीं दिया। उलटे नीचे से उछल कर धन ऊपर वालों की तिजोरियों में जाता रहा।
तीव्र ध्रुवीकरण के लिए नेता अनाप-शनाप बोलते रहे। लम्बे समय तक चुनाव आयोग खामोश रहा। अमित शाह, तोगड़िया, गिरिराज सिंह और बाबा रामदेव सरीखे अन्यान्य के आपत्तिजनक बयानों को लेकर निर्वाचन आयोग पर उदारता बरतने के आरोप लगते रहे। फिर उसने कुछ को नोटिसें और कुछ के खिलाफ एफआईआर लिखाने के निर्देश दिये। शुरूआत में अमित शाह एवं आजम खां के उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार करने पर पाबंदी लगा दी परन्तु बाद में अमित शाह के माफी मांगने के बाद उन पर लगाया गया प्रतिबंध वापस ले लिया गया। सवाल उठता है कि ऐसा क्यों किया गया? यदि एक अपराध किया जाता है तो दुनियां के किसी भी कानून में माफी मांग लेने से अपराध की तीव्रता कम नहीं हो जाती। चुनाव आयोग को बार-बार चैलेन्ज किया जाता रहा। कभी आजम खां ने तो कभी मोदी ने संवैधानिक संस्था पर दवाब बनाने के प्रयास किये। वाराणसी में बिना अनुमति मोदी ने रोड शो किया और ध्रुवीकरण के तमाम प्रयास किये। चुनाव आयोग निरपेक्ष भाव से देखता रहा। संवैधानिक संस्थाओं को सार्वजनिक रूप से चैलेन्ज करना लोकतंत्र के लिए एक बड़ा खतरा है।
विज्ञापनों एवं पेड न्यूज की भरमार रही। इलेक्ट्रानिक मीडिया पूरी तरह और प्रिंट मीडिया का बहुत बड़ा हिस्सा बिका हुआ साफ दिखाई दिया। विज्ञापनों के अलावा खबरों तथा सर्वेक्षणों को इस प्रकार पेश किया गया कि जनता का अधिसंख्यक तबका मानने लगा है कि मीडिया बिका हुआ था। मीडिया की विश्वसनीयता पर अभूतपूर्व प्रश्नचिन्ह लग गया है।
चुनावों के दौरान कई स्थानों पर पैसे के बल पर मतदाताओं के खरीदने के नापाक प्रयास किये जाने के समाचार हैं। कई स्थानों पर बूथ कैपचरिंग की भी घटनायें हुई हैं। आश्चर्य का विषय है कि कई पोलिंग बूथों पर 100 प्रतिशत से अधिक मत पड़ने के समाचार मिले हैं। ऐसा कैसे सम्भव हुआ, इसका कोई उत्तर किसी के पास नहीं है।
सबसे अधिक चिन्ता का विषय यह है कि चुनावों के दौरान मीडिया में वामपंथ को कोई स्थान नहीं मिला। चुनाव सर्वक्षणों में वामपंथ को 20 सीटों के करीब सिमटा दिया गया। चुनाव परिणाम क्या होंगे, इस बारे में कयास लगाने की कोई आवश्यकता नहीं है। यह अंक पाठकों तक पहुंचते-पहुंचते चुनाव परिणाम घोषित हो चुके होंगे।
चुनाव परिणाम कुछ भी हों, देश पिछले 23 सालों से जिन आर्थिक नीतियों के रास्ते पर चल रहा है, उसमें बदलाव की कोई भी संभावना नहीं दिखाई दे रही है। अगर तीसरे मोर्चे की भी सरकार बन जाती है, तो उसमें अधिसंख्यक वहीं क्षेत्रीय राजनैतिक दल होंगे जो अपने-अपने राज्यों में जनविरोधी पूंजीवादी आर्थिक नीतियों को अमल में लाते रहे हैं।
इन आर्थिक नीतियों में बदलाव के लिए चुनावों के बाद वामपंथ, विशेषकर भाकपा को अपनी रणनीति में सुधार की दिशा में निर्ममता के साथ आगे बढ़ना होगा। प्रखर जनांदोलनों के जरिये जनता को पंूजीवाद के खिलाफ लामबंद करने की दिशा में हमें आगे बढ़ना होगा।
इस चुनाव के दौरान चुनाव सुधारों की आवश्यकता बहुत ही प्रबलता के साथ महसूस की गई। इस दिशा में प्रखर जनांदोलन समय की मांग है। भाकपा को इसके लिए पहल करनी होगी।
- प्रदीप तिवारी
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आकाशवाणी से ९.५.१४ को प्रसारित डॉ.गिरीश का चुनाव प्रसारण.

देश के मतदाता भाइयो और बहिनों, 16वीं लोकसभा के लिए चुनाव अभियान अपने अंतिम दौर में है। देश की विभिन्न राजनैतिक पार्टियों एवं ताकतों ने मतदाताओं को लुभाने के लिए आक्रामक अभियान चलाया हुआ है। हमारे देश के चुनावी इतिहास में यह पहली बार हुआ है जब पूंजीपतिवर्ग खास कर कार्पाेरेट घराने सांप्रदायिक ताकतों के पक्ष में पूरी ताकत से अभियान चला रहे हैं और मतदाताओं को प्रभावित करने के लिये वे प्रचार माध्यमों का भरपूर स्तेमाल कर रहे हैं। कार्पाेरेट्स इस नतीजे पर पहुंच चुके हैं कि अपना हित साधने के लिये जितना काम उन्होंने कांग्रेस से लिया है उससे कहीं ज्यादा काम वे भाजपा और उसके काल्पनिक प्रधानमंत्री से ले सकेंगे। कार्पाेरेट घराने यह भी जानते हैं कि यूपीए सरकार ने जब भी कार्पाेरेट्स के पक्ष में फैसला लिया तो विपक्ष में होने के बाबजूद भाजपा ने उसका साथ दिया। देश की जनता निश्चित ही कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार से आजिज आ चुकी है। अभूतपूर्व महंगाई, हर क्षेत्र में लगातार बढ़ रहा भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और रोजगारों के छिनते चले जाने, निजीकरण के चलते शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं के आमजनों के लिए दुर्लभ हो जाने, डीजल, पेट्रोल और गैस एवं जनहित में अन्य वस्तुओं पर दी जाने वाली सब्सिडीज को योजनाबद्ध तरीके से घटाते जाने तथा सार्वजनिक वितरण व्यवस्था को विभाजित और पंगु बना डालने जैसी उसकी कारगुजारियों ने जनता की मुसीबतों को बेहद बढ़ा दिया है। अतएव लोग कांग्रेस से बेहद नाराज हैं। आम जनता की इस नाराजगी को भुनाने के लिये ही भाजपा और संघ परिवार ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। वे देश की शीर्ष सत्ता पर आसीन हो कर अपने संरक्षक कार्पाेरेट घरानों के आर्थिक एवं व्यावसायिक एजेंडे तथा संघ परिवार के सांप्रदायिक एजेंडे को लागू करना चाहते हैं। परन्तु यहाँ सवाल यह है कि क्या बीजेपी वाकई कोई ऐसा वास्तविक बदलाव ला सकती है जैसा जनता चाहती है? सवाल यह भी है कि यूपीए सरकार ने जब संसद में जनविरोधी, किसान विरोधी और मजदूर विरोधी कई कानून पारित करने की कोशिश की तो क्या कभी भाजपा ने उसे रोकने की कोशिश की? सरकार ने जब जनता की मुसीबतें बढ़ाने वाले कई फैसले लिए अथवा कार्यवाहियां कीं तो क्या कभी भाजपा ने इनको रोकने की कोशिश की? क्या भाजपा की आर्थिक नीतियाँ और दृष्टिकोण कांग्रेस से किसी भी तरह अलग हैं? इन सभी का जबाब है - नहीं, नहीं, बिलकुल नहीं। स्पष्ट है कि भाजपा देश में सांप्रदायिक विभाजन कर अपने विनाशकारी आर्थिक एजेंडे को ही मुस्तैदी से लागू करेगी और जिन समस्यायों से जनता छुटकारा पाना चाहती है, भाजपा के पास उनके समाधान का कोई रास्ता नहीं है। देश के कई राज्यों में वामदलों से अलग कई दल हैं जो क्षेत्रीय पहचान अथवा सामाजिक न्याय के सवालों को उठाकर सत्ता में आते रहे हैं। परन्तु उनकी आर्थिक नीतियां भी कांग्रेस और भाजपा के समान हैं। राज्यों में सत्ता में आने पर ये पार्टियाँ भी आर्थिक नव उदारवाद की उन्हीं नीतियों को लागू करती हैं जिनसे खेती और कुटीर उद्योग बर्बाद होते हैं और महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और कुपोषण जैसी समस्यायें पैदा होती हैं। सत्ता में भागीदारी के लिए ऐसे दल सांप्रदायिक भाजपा से भी जुड़ जाते हैं। देश के मौजूदा परिदृश्य को सत्ता शीर्ष पर केवल पार्टियों को बदल कर नहीं बदला जा सकता। इसको आर्थिक नव उदारवाद की नीतियों को पलट कर वैकल्पिक नीतियों को लागू कर ही बदला जा सकता है। और केवल वामपंथ ही ऐसी वैकल्पिक नीतियों को पेश करता रहा है और वामपंथ के पास ही हालात बदलने का बुनियादी रास्ता है। यह मुख्यतः वामपंथ ही है जो मजदूर वर्ग, किसानों, दस्तकारों, अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों, महिलाओं, युवाओं, छात्रों तथा पूंजीवादी व्यवस्था के शोषण के शिकार सभी मेहनतकशों के हितों की रक्षा में लगातार संघर्ष करता रहा है। सदन में उसकी संख्या कुछ भी रही हो, जनता के पक्ष में नीतियां बनवाने में और संसद के बाहर संघर्षरत जनता की मांगों को बुलंद करने में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी एक अग्रणी ताकत के रूप में काम करती रही है। आज की परिस्थिति का तकाजा है कि देश की संप्रभुता, जनता की रोजी-रोटी, आवास, रोजगार, स्वास्थ्य एवं शिक्षा के अधिकार और धर्मनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक व्यवस्था को संसद के अंदर और बाहर मजबूत करने के लिए वामपंथ और जोरदार तथा लम्बा संघर्ष चलाये। इसके लिए जरूरी है कि १6वीं लोकसभा में वामपंथ का एक मजबूत ब्लाक पहुंचे। अतएव आप सभी से विनम्र निवेदन है कि लोकसभा चुनावों में जहां-जहां भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार मैदान में हैं, वहां भाकपा के चुनाव निशान - ”बाल हंसिया“ के सामने वाला बटन दबा कर उन्हें भारी बहुमत से विजयी बनायें। धन्यवाद!
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निर्वाचन आयोग पर भाजपा के हमलों की भाकपा निंदा करती है.

लखनऊ- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने कहा है कि अपनी अपेक्षित जीत से काफी दूर दिखाई देरही भाजपा इस कदर बौखला गई है कि अब वह संवैधानिक संस्थाओं पर हमले करने पर उतर आयी है. हाल ही में उसने चुनाव आयोग को निशाना बनाया है. भाजपा और उसके प्रवक्ताओं ने चुनाव आयोग पर चहुँतरफा हमले बोल दिए हैं. भाकपा इसकी कड़े शब्दों में निंदा करती है. यहाँ जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डॉ. गिरीश ने कहा कि भले ही भाजपा भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का उपयोग करते हुये ही सत्ता और राजनीति में भागीदारी करती है, लेकिन वह संविधान और संवैधानिक संस्थाओं की विरोधी है. उसकी सांप्रदायिक राजनीति एवं उसके द्वारा बाबरी ढांचे का तोड़ा जाना आदि अनेक उदाहरण हैं जो इस तथ्य की पुष्टि करते हैं. अब निर्वाचन आयोग द्वारा वाराणसी में उसकी सभा को सुरक्षा कारणों से अनुमति न दिए जाने पर भाजपा बुरी तरह तिलमिला गई है और निर्वाचन आयोग पर तीखे हमले कर रही है. वह मतदाताओं को यह संदेश देना चाहती है कि चुनाव आयोग उसके साथ ज्यादती कर रहा है. इस तरह वह मतदाताओं की हमदर्दी बटोरना चाहती है. वह भूल गयी कि अमितशाह, तोगड़िया, गिरिराज सिंह और बाबा रामदेव के आपत्तिजनक बयानों को लेकर निर्वाचन आयोग पर भाजपा के प्रति कथित उदारता बरतने के आरोप लगते रहे हैं. भाकपा ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त को बधाई दी है कि उन्होंने दोटूक शब्दों में भाजपा की धौंसपट्टी में न आने का ऐलान कर दिया. किसी भी संवैधानिक संस्था पर हमले को भाकपा बेहद आपत्तिजनक मानती है और भाजपा को चेतावनी देना चाहती है कि वह अपनी संविधान विरोधी कारगुजारियों से बाज आये वरना भाकपा संवैधानिक संस्थाओं की रक्षा के लिए जनांदोलन चलायेगी और भाजपा को बेनकाब करेगी. डॉ. गिरीश
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Election Telecast of CPI on Doordarshn. (9.5.14.) By Dr.Girish.

प्रिय मतदाता भाइयों एवं बहनों, आप सभी लोक सभा के चुनावों की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं और आप सभी को पिछले चुनावों की तुलना में ज्यादा विवेक और सूझ-बूझ के साथ मत का प्रयोग करना है क्योंकि देश के सामने जैसी चुनौतियाँ आज हैं, पहले कभी न थीं। जनता की जैसी हालत आज है, वैसी कभी न थी। पूंजीवादी नीतियों और सरकारों की कारगुजारियों के चलते आज महंगाई सातवें आसमान पर है। महंगाई ने आम और गरीब लोगों की मुसीबतें बेहद बढ़ा दी हैं। अनेक लोग आधे पेट सोने को मजबूर हैं। एक ओर मुट्ठी भर लोग अरबों-खरबों की सम्पत्ति के स्वामी हैं तो बहुमत लोग बेहद गरीब हैं। खुद सरकार ने स्वीकार किया है कि 78 प्रतिशत लोग प्रतिदिन 20 रूपये से कम में गुजारा करते हैं। एक तिहाई बच्चे और 50 फीसदी मातायें कुपोषण की शिकार हैं। केंद्र और राज्य सरकारों की जनविरोधी नीतियों के कारण देश के किसान कंगाल हो चुके हैं। कर्ज में डूबे किसान आत्महत्यायें कर रहे हैं। मजदूरों और कर्मचारियों के न तो जीवन की सुरक्षा है न उनकी नौकरियों की। बढ़ती जा रही बेरोजगारी नौजवानों के लिए अभिशाप बन चुकी है। रिक्त होने वाले पदों पर नौकरियां नहीं दी जा रहीं हैं। शिक्षा का बजट लगातार कम हो रहा है। दोहरी शिक्षा प्रणाली और बेहद महंगी फ़ीस के कारण आम आदमी बच्चों को पढ़ा ही नहीं पा रहा है। केंद्र की सरकार इस बीच तमाम घपलों-घोटालों में जुटी रही। लाखों करोड़ के इन घोटालों में जनता के पसीने की कमाई सरकारी खजाने से निकल कर भ्रष्टाचारियों की तिजोरियों में पहुंच गयी। आम लोग विकास से वंचित रह गये। मुख्य विपक्षी दल भाजपा भी भ्रष्टाचार से अछूती नहीं है। उसने भ्रष्टाचार जैसे सवालों पर संसद में कभी सार्थक बहस नहीं होने दी। इसके दो राष्ट्रीय अध्यक्षों पर भ्रष्टाचार के संगीन आरोप लगे जिनमें से एक को न्यायालय से सजा तक मिली। कर्नाटक के इसके पूर्व मुख्यमंत्री सहित कई मंत्रियों पर लगे भ्रष्टाचार की खबरें जगजाहिर हैं। इस दौर में हमारे प्राकृतिक संसाधनों की बेपनाह लूट चलती रही। इन भ्रष्टाचार और घोटालों के सभी मामलों पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने मजबूत आवाज उठाई और कोयला आबंटन घोटाला तथा एक उद्योग समूह द्वारा निकाली जाने वाली गैस के दाम कई गुने किये जाने के घपले को तो भाकपा के नेताओं ने ही उजागर किया था। हालात यह हैं कि करोड़ों लोगों के पास रहने को घर नहीं है। शहरों की आबादी का बड़ा भाग झुग्गी-झोपड़ियों में रह रहा है। बड़ी संख्या में लोगों को स्वच्छ पेयजल नहीं मिलता। शहरों-कस्बों में उच्चस्तरीय प्रदूषण के चलते श्वांस लेना कठिन है। कुपोषण, प्रदूषण और दूषित जल से बीमारियों में इजाफा हो रहा है। ऊपर से इलाज इतने महंगे हो गये हैं कि आम आदमी बिना इलाज के तड़प-तड़प कर मर रहा है। यह सब पूंजीवादी नीतियों को निर्ममता से चलाने का दुष्परिणाम है। पिछले दो दशकों में यह व्यवस्था आर्थिक नवउदारवाद के आवरण में लपेट कर चलायी जाती रही है। इसके चलते देश की दौलत का बहुत बड़ा भाग पूंजीपतियों और कारपोरेट घरानों की झोली में पहुँच चुका है जिसका बड़ा भाग विदेशी बैंकों में डाला जा चुका है। अभावों के महासागर में धकेल दी गई जनता में भारी असंतोष और गुस्सा है। केंद्र में सत्ता में होने के कारण कांग्रेस इन हालातों के लिए जिम्मेदार है। कांग्रेस से नाराज लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि कांग्रेस के समान आर्थिक नीतियों पर ही चलने वाली भाजपा उनके जीवन में कोई बदलाव नहीं ला सकती। वह और भी मुस्तैदी से गरीबों की लूट का एजेंडा चलाएगी। लोगों की इस नाराजगी को भुनाने के लिए भाजपा एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। कारपोरेटों की पूँजी और उनके द्वारा नियंत्रित मीडिया उसके प्रचार अभियान को धार देने में जुटे हैं। भाजपा किसी भी कीमत पर सत्ता में आने को छटपटा रही है तो कारपोरेट घराने उसे सत्ता में बैठा देने को आतुर हैं ताकि कारपोरेटों को मालामाल और आमजनों को कंगाल बनाने के एजेंडे को निर्ममता से लागू किया जा सके। वामपंथी दलों को तो इस कारपोरेटी मीडिया ने पूरी तरह किनारे कर रखा है। जनता को लुभाने को गुजरात के कथित विकास की लम्बी-चौड़ी बातें की जा रही हैं। आजादी के पहले ही गुजरात में पूँजी का विकास देश के अन्य भागों की तुलना में ज्यादा हो चुका था। गत दशक में तो वहां किसानों की जमीनें बेहद कम कीमत पर अधिग्रहण कर पूंजीपतियों को मुफ्त में सौंपी गयी हैं। यहाँ तक कि सीमाओं की रक्षा के उद्देश्य से कच्छ में बसाये गये सिक्ख किसानों को भी नहीं बक्शा गया और उनकी जमीनें अधिगृहीत कर बड़े उद्योग समूहों को दे दी गयीं। वहां कुपोषण, शिशु मृत्युदर और जननी मृत्युदर देश के अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा है। मजदूरों को तो साधारण अधिकार भी प्राप्त नहीं हैं। नये रोजगार सृजन में गुजरात पीछे है तथा वहां तरक्की की दर राष्ट्रीय दर से कम है। दशकों पहले हुये विकास को भी भाजपा अपने सत्ताकाल के विकास के रूप में प्रचारित कर रही है। देश में संसदीय प्रणाली लागू है जिसके अंतर्गत चुन कर आने वाले सांसदों का बहुमत प्रधानमंत्री का चुनाव करता है। लेकिन सत्ता पाने को व्याकुल भाजपा एवं संघ परिवार ने साम्प्रदायिक विभाजन को तीव्र कर वोट पाने की गरज से घनघोर सांप्रदायिक व्यक्ति को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित कर दिया है। यह संसदीय प्रणाली को बदल कर राष्ट्रपति प्रणाली लागू करने की भाजपा की चिर-परिचित नीति को आगे बढाने का प्रयास भी है। सांप्रदायिक विभाजन को तीखा करने की गरज से भाजपा और संघ परिवार के नेता तमाम भड़काने वाली बयानबाजियां कर रहे हैं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की यह राय है कि हमारा महान देश अनेक धर्मों, संप्रदायों, भाषाओं और संस्कृतियों का संमिश्रण है। धर्मनिरपेक्षता हमारी राष्ट्रीय एकता का मुख्य आधार है। हम सभी धर्माबलंबियों को यह भरोसा दिलाने के पक्षधर हैं कि वे सुरक्षित हैं और उन्हें समान अवसर मिलेंगे। देश में सांप्रदायिकता के लिए कोई स्थान नहीं है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने हमेशा देश और देश की जनता के हित में अभूतपूर्व योगदान किया है। आजादी की लड़ाई में हम किसी से पीछे न थे। इतिहास गवाह है कि जमींदारी के उन्मूलन और व्यापक भूमि सुधार के लिए हमने निर्णायक आन्दोलन किये। बैंकों का राष्ट्रीयकरण कराने और राजाओं का प्रिवीपर्स समाप्त कराने में हमने ठोस भूमिका निभाई। सार्वजनिक क्षेत्र की मजबूती के लिए हमने मजबूत आवाज उठाई। हमारे समर्थन पर टिकी संप्रग-1 सरकार को मनरेगा, सूचना का अधिकार अधिनियम, आदिवासी अधिकार अधिनियम, घरेलू हिंसा विरोधी अधिनियम आदि पारित करने के लिए बाध्य किया। सांप्रदायिक सौहार्द बनाये रखने को हम हमेशा मैदान में डटे रहे। हाल में भी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने महंगाई को नीचे लाने, भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त करने, सभी को खाद्य सुरक्षा दिलाने, सार्वजनिक वितरण प्रणाली को व्यापक बनाने, किसानों को उनकी पैदावारों का समुचित मूल्य दिलाने, किसानों बुनकरों दस्तकारों और सभी जरूरतमन्दों को रूपये 3000/- प्रति माह पेंशन दिलाने, मजदूरों को उचित वेतन दिलाने, ठेकेदारी प्रथा समाप्त कराने, बेरोजगारों को रोजगार दिलाने, शिक्षा का बाजारीकरण रोके जाने, स्वास्थ्य सेवाओं को आमजन के लिए सुलभ बनाने आदि के लिए भी निरंतर आवाज उठाई है। महिलाओं, आदिवासियों, दलितों एवं अल्पसंख्यकों के सशक्तीकरण के लिए भी हम अनवरत संघर्ष करते रहे हैं। इस तथ्य की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि देश और समाज के समक्ष मौजूद चुनौतियों से तभी निपटा जा सकता है जब आर्थिक नवउदारवाद की नीतियों की जगह जनता के बुनियादी हितों को साधने वाली वैकल्पिक नीतियों को आगे बढाया जाये। और यह तभी संभव होगा जब संसद में एक मजबूत वामपंथी ब्लाक जीत कर आये। यह वामपंथी ब्लाक ही संसद से सडक तक इन मुद्दों पर संघर्ष करेगा। मतदाता भाइयो और बहिनों, मौजूदा निजाम को बदलो, इससे से भी बदतर निजाम को आने से रोको और वामपंथी जनवादी ताकतों के हाथ मजबूत करो। अतएव आपसे अनुरोध है कि जहां-जहां भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं वहां उनके चुनाव निशान - “हंसिया बाली“ के सामने वाला बटन दबा कर उन्हें भारी बहुमत से विजयी बनायें। धन्यवाद!
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शनिवार, 26 अप्रैल 2014

बौखलाये भाजपाई और उनके समर्थकों की भड़कावेपूर्ण बयानबाजी की भाकपा ने कड़े शब्दों में निंदा की.

लखनऊ- २६ अप्रैल २०१४. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने कल लखनऊ में बाबा रामदेव द्वारा दलितों, दलित लड़कियों और महिलाओं के प्रति बेहद आपत्तिजनक टिप्पणियां किये जाने की कड़े शब्दों में निंदा की है. भाकपा ने बाबा रामदेव एवं भड़काऊ और आपत्तिजनक बयान देने वाले अन्य भाजपाइयों के विरुध्द कठोर कार्यवाही की मांग की है. भाकपा ने रामदेव से दलितों, दलित बालिकाओं और महिलाओं से फ़ौरन माफ़ी मांगने की मांग भी की है. यहाँ जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डॉ. गिरीश ने कहाकि अभी तो सत्ता उनकी पहुँच से कोसों दूर है, लेकिन भाजपाई और उसके समर्थक अभी से बौखला गये हैं. इसलिए वे दलितों, दलित बालिकाओं, महिलाओं एवं अल्पसंख्यकों के प्रति अनर्गल और भड़कावेपूर्ण बयानबाजी पर उतर आये हैं. इस क्रम में पहले गिर्राज सिंह फिर प्रवीण तोगड़िया और अब बाबा रामदेव ने घिनौना बयान दिया है. उन्होंने कहाकि राहुल गाँधी और श्री मोदी की पत्नी के सन्दर्भ में बाबा रामदेव ने जो घ्रणित प्रलाप किया है उसे इस बयान में उद्धृत तक नहीं किया जासकता क्योंकि उससे उन सभी तबकों को चोट ही पहुंचेगी जिनके बारे में ये बयान दिए गये हैं. लेकिन ये सभी बयान बेहद आपत्तिजनक हैं और भारतीय सभ्यता और संस्कृति पर सीधा आक्रमण हैं, जिसकी कि भाजपा दुहाई देते नहीं अघाती. लेकिन इन बयानों से दलितों, स्त्रियों, अल्पसंख्यकों तथा समाज के अन्य कमजोर तबकों के प्रति भाजपा के सोच की सच्चाई उजागर होजाती है. भाकपा बाबा रामदेव, प्रवीन तोगड़िया, गिर्राज सिंह एवं ऐसे बयान देने वाले अन्य सभी लोगों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्यवाही किये जाने की मांग करती है. साथ ही सभी सभ्य एवं मर्यादित लोगों से अपील करती है कि वे इन बयानों के प्रति अपना विरोध जताएं. डॉ. गिरीश, राज्य सचिव भाकपा, उत्तर प्रदेश
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शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

बलात्कार सम्बन्धी बयान: मुलायमसिंह माफ़ी मांगें. भाकपा की मांग.

लखनऊ- ११, अप्रेल २०१४—भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने श्री मुलायम सिंह यादव के उस बयान की कड़े से कड़े शब्दों में भर्त्सना की है जिसमें उन्होंने बलात्कार जैसे जघन्यतम अपराध को लडकों की छोटी सी गलती करार दिया है और बलात्कारियों को फांसी की सजा का विरोध किया है. इतना ही नहीं सपा सुप्रीमो ने इस कानून को ही बदलने तक की धमकी दे डाली है. यहाँ जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डॉ. गिरीश ने कहाकि मुलायम सिंह जैसा व्यक्ति जो देश के सबसे बड़े सूबे, जहाँ बलात्कार भी सबसे ज्यादा होते हैं में शासन कर रहे दल के मुखिया हैं. ऐसे व्यक्ति द्वारा बलात्कारियों के पक्ष में दिए बयान से बलात्कारियों के हौसले और भी बढेंगे और महिलाओं की सुरक्षा और भी खतरे में पड़ जायेगी. भाकपा इस बयान पर कड़ी आपत्ति जताती है और श्री यादव से स्पष्ट मांग करती है कि वे इस घिनोने बयान के लिए समाज खास कर महिलाओं से अविलम्ब माफी मांगें. भाकपा राज्य सचिव ने कहाकि इस जघन्य अपराध के खिलाफ बने कानून को बदलने का सपना श्री यादव नहीं ही देखें तो अच्छा है. पहले तो वे कानून बदलने की हैसियत में ही नहीं आपायेंगे और ऐसा कदम उठायेंगे तो उन्हें कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा. भाकपा स्वयं ऐसे किसी कदम का पुरजोर विरोध करेगी. डॉ. गिरीश
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गुरुवार, 10 अप्रैल 2014

मोदी का ढोंग बेनकाब: सार्वजनिक जीवन में बने रहने का खोया नैतिक अधिकार. चुनाव लड़ने पर रोक लगाये आयोग.

लखनऊ- १० अप्रेल २०१४. अपने नामांकन पत्र में यशोदा बेन को पत्नी स्वीकार करने के बाद मोदी, उनके आका संघ परिवार एवं भाजपा का ढोंग पूरी तरह बेनकाब हो गया है. शुचिता, पवित्रता एवं भारतीय संस्कृति के अलमबरदार होने के दाबे करने वाले भाजपाई तो अब मुहं दिखाने के काबिल नहीं रहे. यशोदा बेन के जीवन को बरबाद करने वाले और इतनी बड़ी घटना को अब तक छिपा कर रखने वाले श्री मोदी को तो अब सार्वजनिक जीवन में रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है. भाकपा मोदी से सभी पदों से स्तीफा देने और उनके आका आर.एस.एस. से देश और देश की महिलाओं से सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांगने की मांग करती है. यहाँ जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डॉ. गिरीश ने कहाकि देश के सर्वोच्च पद पर आँख गड़ाए बैठे श्री मोदी दो दिन पहले तक अपने आपको अकेला बताते रहे और दूसरों पर आपत्तिजनक और बेहद भद्दी टिप्पड़ियां करते रहे. लेकिन कल निर्वाचन आयोग के भय से उन्हें अपने नामांकन पत्र में अपनी पत्नी का नाम भरना पड़ा और उनके जीवन का बेहद कलुषित पन्ना उघड़ कर सामने आगया. इसके बाद तो उन्हें सार्वजनिक जीवन में रहने का कोई अधिकार नहीं है. इससे भी बढ़ी बात यह है कि श्री मोदी ने अब तक लड़े सभी चुनावों में इस तथ्य को छिपाया और कानून का उल्लंघन किया. निर्वाचन आयोग को उनका गुजरात विधान सभा का चुनाव तत्काल रद्द करना चाहिये तथा उनके कल भरे नामांकन को निरस्त कर उनके छह वर्ष तक चुनाव लड़ने पर रोक लगा देनी चाहिये. डॉ. गिरीश.
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शनिवार, 5 अप्रैल 2014

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का चुनाव घोषणा पत्र

देश चौराहे पर खड़ा है। नव उदारवादी नीतियों पर बेशर्मी के साथ चलते जाने के कारण देश एक ऐसे संकट में पड़ गया है जो हर गुजरते दिन के साथ बढ़ रहा है। देश की जनता भूख, सभी आवश्यक वस्तुओं की आसमान छूती कीमतों, लगातार बढ़ती महंगाई और बढ़ती आर्थिक असमानता से त्रस्त है। पिछले दो दशकों के दौरान एक के बाद आने वाली दूसरी सरकार जिन नीतियों पर चलती रही हैं, वे कारपोरेटों के पक्ष में और जनता के हितों के सरासर विपरीत रही। इन नीतियों के कारण अर्थव्यवस्था लगातार गिरती जा रही है। राष्ट्रीय एवं प्राकृतिक संसाधनों को बेशर्मी के साथ लूटा गया और शीर्षस्थ नौकरशाही की मिलीभगत से कारपोरेट घरानों और शासक राजनीतिक नेताओं के बीच इस लूट का बंटवारा हुआ, जिसके फलस्वरूप लाखों-करोड़ों रूपये के अभूतपूर्व बड़े घपले-घोटाले हुए। इस लूट और भ्रष्टाचार के पर्दाफाश के बावजूद शासक वर्ग आर्थिक विकास के उसी विनाशकारी रास्ते पर आगे बढ़ने पर आमादा है। अब यही लुटेरे, और कारपोरेट घराने देश में एक ऐसी सरकार लाने की कोशिश कर रहे हैं जो इनकी और अधिक खिदमत और ताबेदारी करे। इसके लिए वे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और इसके धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को तबाह करने को भी तैयार हैं।
देश की जनता 16वीं लोकसभा के लिए ऐसे समय में मतदान करने जा रही है जब देश धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र और आर्थिक सम्प्रभुता के गंभीर खतरे से दो-चार है।
दो दशक पहले देश गठबंधन सरकार के दौर में दाखिल हुआ और इन चुनावों के बाद भी एक अन्य गठबंधन सरकार ही बनने वाली है क्योंकि किसी भी पार्टी या चुनाव पूर्व गठबंधन को बहुमत मिलने वाला नहीं है। चुनाव बाद के परिदृश्य में जबर्दस्त राजनीतिक मंथन एवं गहमा-गहमी होगी जिसके फलस्वरूप राजनीतिक ताकतों की फिर से कतारबंदी होगी। चुनाव से पहले और चुनाव के बाद दोनों ही परिदृश्यों में मुख्य मुद्दा लाजिमी तौर पर यह होगा कि देश किस रास्ते पर आगे चले - नवउदारवाद के विनाशकारी रास्ते पर चलना जारी रखे या एक ऐसे कार्यक्रम आधारित विकल्प पर आगे बढ़े जो वर्तमान विनाशकारी रास्ते को पलटे और ऐसे विकास का सूत्रपात करे जिससे विकास के लाभ सभी को बराबर मिलें और जो देश में बहुलवाद और धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने की रक्षा करे और उसे और अधिक मजबूत करे।
कांग्रेस का चुनावी ग्राफ निश्चित तौर पर गिर रहा है क्योंकि संप्रग-2 सरकार स्वतंत्रता के बाद की सबसे अधिक भ्रष्ट और सबसे अधिक कुशासन की सरकार साबित हुई है। रोज-रोज सामने आने वाले बड़े-बड़े घपलों और घोटालों ने इसका हाल बिगाड़ दिया है। भ्रष्टाचार के कारण इसके लगभग आधा दर्जन मंत्रियों को सरकार से हटना पड़ा। एक मंत्री को तो 1.75 लाख करोड़ रूपये के घोटाले 2जी घोटाले में जेल भी जाना पड़ा। एक अन्य मंत्री को हटाना पड़ा क्योंकि उन्हें कोयला घोटाले के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में चल रही जांच रिपोर्ट में हस्तक्षेप करने का दोषी पाया गया जिसमें प्रधानमंत्री कार्यालय पर सीधे उंगली उठाई गई थी। कुछ मंत्रियों को अपने विभागों से इसलिए हटाया गया क्योंकि वे कारपोरेटों और अंतर्राष्ट्रीय वित्त पूंजी के इशारों पर चलने को तैयार नहीं थे।
अब यह और भी अधिक स्पष्ट हो गया है कि वित्त पूंजी और साम्राज्यवादी एजेंसियों का पक्ष लेने के कई मुद्दों पर शासक संप्रग-2 और मुख्य विपक्ष भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए के बीच सीधी साठगांठ रही है। 15वीं लोकसभा में संसद के सभी सत्रों में न केवल कार्यवाहियों में रूकावटें एवं बाधाएं देखने में आयी बल्कि उसे इस बात का भी श्रेय जाता है कि उसमें पारित न हो सकने वाले बिलों की संख्या सबसे अधिक रही। उसमें अधिकतम कार्य दिवस बर्बाद हुए और साथ ही संसद के कार्य दिनों में भी भारी गिरावट आयी। वामपंथ ने जब भी उन बुनियादी, सामाजिक, आर्थिक समस्याओं को उठाना चाहा जिनसे जनता दो-चार है, दोनों पूंजीवादी राजनैतिक पार्टियों ने बुनियादी मुद्दों पर किसी सार्थक बहस को भितरघात करने के लिए परस्पर मिलीभगत कर ली। दूसरी तरफ, बैंकों एवं बीमा क्षेत्रों को निजी क्षेत्र, जिसमें बहुराष्ट्रीय निगम शामिल हैं, के हवाले करने के लिए कांग्रेस और भाजपा ने आपस में साठगांठ की।
अपने मुनाफों को अधिकतम बढ़ाने की कोशिश में कारपोरेट घरानों ने उसे अपने इशारों पर नचाने के लिए सरकार में जोड़तोड़ करना जारी रखा, जिसका नतीजा आर्थिक संकट के और अधिक गहराने के रूप में सामने आया। 2008 के बाद से लगभग सभी आवश्यक वस्तुओं की कीमतें दोगुना हो गयी हैं। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, भारत उन देशों में शामिल है जहां पर बेरोजगारों की संख्या सबसे अधिक है। देश की काम करने योग्य आबादी के लगभग 4 प्रतिशत हिस्से के पास कोई रोजगार नहीं है।
कारखाना बंदी और रोजगारों के आउटसोर्सिंग एवं ठेकाकरण के परिणामस्वरूप पहले से रोजगार में लगे हजारों-हजार लोगों से भी उनका रोजगार छीन गया है। अनेक सरकारी विभागों में ‘‘नई भर्ती नहीं की जाये’’ का आदेश लागू है। सार्वजनिक क्षेत्र की इकाईयों को आउटसोर्सिंग के लिए मजबूर किया जा रहा है। रोजगार सृजन सरकार की प्राथमिकताओं में सबसे नीचे है। मजदूर वर्ग खतरे में है। ट्रेड यूनियन अधिकारों में लगातार कटौती की जा रही है। एक के बाद दूसरे क्षेत्रों को ट्रेड यूनियन अधिकारों से बाहर के क्षेत्र घोषित किया जा रहा है।
राष्ट्रीय एवं प्राकृतिक संसाधनों की लूट संप्रग-2 सरकार की एक अन्य खासियत है। उसने अपने हर बजट में बढ़ते वित्तीय घाटे को पूरा करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की मुनाफा कमाने वाली इकाईयों के शेयरों को निजी क्षेत्र के हवाले करने की योजना बनाई। उसने जानबूझकर, सोझ समझकर प्राकृतिक संसाधनों को निजी क्षेत्र के हवाले करने की इजाजत दी। संप्रग-2 सरकार के सबसे बड़े घोटाले, जिसमें मुकेश अंबानी की कंपनी द्वारा निकाली गयी गैस के लिए दोगुनी कीमत देना शामिल है, मुनाफों को बढ़ाने के लिए प्राकृतिक संसाधनों की लूट का सबसे बड़ा उदाहरण है।
नव उदारवाद की नीतियों पर चलने का एक अन्य नतीजा है बढ़ती आर्थिक असमानता। एक तरफ भारत में सबसे अधिक अरबपति हैं तो दूसरी तरफ गरीबी के रेखा से नीचे वालों की संख्या भी सबसे अधिक है। हमारे देश के 70 प्रतिशत से भी अधिक लोग 20 रूपये प्रति दिन भी खर्च करने में समर्थ नहीं हैं। इस सरकार को जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों में कटौती करने का भी श्रेय जाता है। आतंकवाद से लड़ने के नाम पर इसने अटल बिहारी बाजपेयी की पिछली भाजपा नीत राजग सरकार की उन नीतियों को जारी रखा है जिनमें ‘‘सभ्यता के टकराव’’ के उस अमरीकन सिद्धांत को अंगीकार कर लिया था जो मुस्लिम समुदाय को सभ्य जगत के लिए एक खतरे का नाम देता है। हजारों युवाओं को, अधिकांशतः शिक्षित युवाओं को गिरफ्तार किया गया और यहां तक कि एफआईआर दर्ज किये बिना जेल में रखा गया। जनता को उसके लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित करने के लिए टाडा, एस्मा एवं पोटा की तर्ज पर काले कानून पारित किये गये हैं।
विदेश नीति अमरीकी साम्राज्यवाद की खिदमतगार-ताबेदार बनती जा रही है। अमरीकी दबाव में आकर राष्ट्रीय हितों की बलि चढ़ाई जा रही है। रक्षा तैयारियों को मजबूत करने के नाम पर संकटग्रस्त अमरीकी अर्थव्यवस्था, विशेष तौर पर इसके सैन्य-औद्योगिक कॉम्पलेक्स को मदद करने के लिए अमरीका और इस्राइल से साजो-सामान खरीदा जा रहा है। यहां तक कि इस सरकार ने अमरीकी साम्राज्यवादियों के दबाव में आकर ईरान-पाकिस्तान-भारत गैस पाइप लाइन परियोजना को भी रद्द कर दिया। उसने हमारे राष्ट्रीय हितों को भी बलि चढ़ाकर अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक एवं राजनीतिक मंचों पर साम्राज्यवादियों के साथ साठगांठ की। विश्व व्यापार संगठन में अमरीकियों को खुश करने के लिए उसने ब्रिक्स देशों की सहमति के विरूद्ध काम किया। सीरिया और ईरान के परमाणु विकल्प जैसे नाजुक मुद्दों पर हमारी पोजीशन इस तरह के आत्मसमर्पण का एक स्पष्ट उदाहरण है।
कुल मिलाकर यह एक ऐसी सरकार साबित हुई है जो कारपोरेट पूंजी और अंतर्राष्ट्रीय वित्त पूंजी के हित साधती है।
परन्तु संप्रग-2 सरकार का अधिकतम दोहन करने के बाद कारपोरेट पूंजी और अंतर्राष्ट्रीय वित्त पूंजी अब एक ऐसी सरकार लाने की कोशिश कर रही हैं जो उनकी खिदमत और ताबेदारी इस सरकार से भी अधिक करे। इसके लिए उन्होंने भाजपा के नरेन्द्र मोदी को चुन लिया है जिनके दामन पर 2002 के खून के दाग हैं और जो अपनी अधिनायकवादी सोच के लिए जाने जाते हैं। गुजरात में अपने एक दशक के मुख्यमंत्री काल में उन्होंने तीन पूर्व भाजपा मुख्यमंत्रियों को ठिकाने लगा दिया और उनके साथ उस नेता को भी हटा दिया जो बाजपेयी सरकार में गुजरात से अकेला मंत्री था। कारपोरेट घरानों द्वारा संचालित संचार माध्यमों ने नव-फासीवादी रूझान के इस व्यक्ति को उछालने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है।
परन्तु विकास के गुजरात मॉडल की सच्चाई का हर गुजरते दिन के साथ पर्दाफाश हो रहा है। उनकी सरकार केवल बड़े पंूजीपतियों के लिये ही है। उनके लिए उसने किसानों को उनकी जमीन से बेदखल कर दिया और यह बेदखली इस हद तक हुई है कि अब गुजरात उन शीर्ष राज्यों में से है जहां कृषि योग्य जमीन सबसे अधिक कम हुई है। किसानों की जमीन को तथाकथित औद्योगीकरण के लिए अधिग्रहण कर लिया गया और बिल्डर माफिया के हवाले कर दिया गया। यहां तक कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जिन किसानों को कच्छ के सीमावर्ती इलाके में बसाया गया था उन्हें भी उस अदानी समूह के हितों की सेवा करने के लिए बेदखल किया जा रहा है जिसके पास उस जिले में पहले ही दो बन्दरगाह हैं। अदानी, टाटा, अम्बानी और एस्सार घरानों को ब्याज सब्सिडी दी गई है और खरबों रूपये 0.1 प्रतिशत की ब्याज दर पर दिये गये हैं जिनका वापस भुगतान 20 वर्ष या उससे भी बाद शुरू होगा। इसके फलस्वरूप गुजरात सरकार के खजाने में सामाजिक क्षेत्र के लिए कोई पैसा ही नहीं रह गया है। नरेन्द्र मोदी सरकार के एक दशक की खास निशानियां हैं बच्चों एवं महिलाओं का कुपोषण, शिक्षा एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा का पूरी तरह से व्यवसायीकरण और बढ़ती बेरोजगारी।
मुस्लिम अल्पसंख्यकों को ऐसी तंग एवं गंदी बस्तियों में जहां केवल वे ही रहते हैं, रहने को जबरन भेजने के काम ने भी मोदीत्व का पर्दाफाश कर दिया है। हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद मोदी सरकार ने केन्द्र सरकार द्वारा वित्त पोषित अल्पसंख्यक-उन्मुखी सामाजिक-आर्थिक एवं शैक्षणिक स्कीमों पर अमल करने से इन्कार कर दिया है। मुसलमान दंगे से पहले जहां रहते थे अपने उन मकानों में वापस जाने में असमर्थ हैं और अहमदाबाद में जूहूपुरा जैसी ऐसी गंदी बस्तियों में रह रहे हैं जहां केवल मुसलमान ही रहते हैं।
कारपोरेटों की इससे भी अधिक खिदमत और ताबेदारी करने वाली सरकार बनाने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए देश के धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक ताने-बाने पर भी हमले किये जा रहे हैं। मतदाताओं के साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को आगे बढ़ाने के लिए हर किस्म की तरकीब और चालाकी का इस्तेमाल किया जा रहा है। मुजफ्फरनगर इस खेल का एक सुस्पष्ट उदाहरण है।
आजादी के बाद, वामपंथ, विशेषकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का संसद के अंदर और बाहर जनता के लिए संघर्ष करने का एक शानदार रिकार्ड रहा है। सदन में उसकी संख्या कुछ भी रही हो, जनता के पक्ष में नीतियां बनवाने में और संसद के बाहर संघर्षरत जनता की मांगों को बुलंद करने में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी एक अग्रणी संसदीय ताकत के रूप में उभरी है। प्रोफेसर हीरेन मुखर्जी, भूपेश गुप्ता, इन्द्रजीत गुप्ता, गीता मुखर्जी एवं अन्य भाकपा नेताओं ने जनता के अधिकारों के लिए संघर्ष और मेहनतकश जनता के संसदीय एवं इतर संसदीय संघर्षों को जोड़ने में उदाहरण कायम किये हैं।
आज की परिस्थिति का तकाजा है कि देश की सम्प्रभुता, जनता की रोजी-रोटी, आवास, शिक्षा एवं जन स्वास्थ्य के अधिकार की रक्षा के लिए और धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक व्यवस्था को संसद के अंदर एवं बाहर दोनों जगह मजबूत करने के लिए वामपंथ और अधिक जोरदार और लगातार एवं लम्बा संघर्ष चलाए। इसके लिए यह आवश्यक है कि 16वीं लोकसभा में वामपंथ का अपेक्षाकृत अधिक प्रतिनिधित्व हो। लोकसभा में एक मजबूत लेफ्ट ब्लॉक आये, यह समय का तकाजा है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी निम्न घोषणा पत्र पेश करती है जो वैकल्पिक सामाजिक-आर्थिक नीतियों का एक आधार बनेः

  • नवउदारीकरण को अपनाने के लिए उठाये गये कदमों की पूरी तरह समीक्षा और दुरूस्तगी के लिए समूचित कदम;
  • खुदरा व्यापार में एफडीआई नहीं। एफडीआई केवल उन्हीं क्षेत्रों में जहां यह उच्च टेक्नालोजी, रोजगार सृजन और परिसम्पत्ति निर्माण के लिए आवश्यक हो।
  • सार्वजनिक परिसम्पत्तियों की रक्षा, सार्वजनिक क्षेत्र को मजबूत करना और राज्य की भूमिका पर फिर से जोर, सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों का निजीकरण बंद करो, गैस, पेट्रोल एवं खनिज आदि प्राकृतिक संसाधनों को आगे निजी क्षेत्र के हवाले न करना;
  • प्रभावी कराधान (टैक्सेशन) कदम और वैध एवं तर्क संगत टैक्सों की वसूली को सुनिश्चित करना, आयकर छूट की सीमा को बढ़ाना और जो लोग टैक्स दे सकते हैं उनके लिए टैक्स में क्रमिक वृद्धि।
  • खनिज, तेल, गैस जैसे तमाम प्राकृतिक संसाधनों का राज्य ही एकमात्र स्वामी रहे; 
  • पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप नहीं, क्योंकि यह निजी क्षेत्र द्वारा इसके फायदों को हड़पने को वैध बना रहा है और घाटे को संस्थागत रूप दे रहा है; 
  • आवास, शिक्षा आदि के लिए कम ब्याज पर आसान ऋण। जो ऋण पहले लिये गये हैं रेपो रेट का उनके ईएमआई पर असर नहीं पड़ना चाहिए; 
  • जिन कारपोरेट बैंक ऋणों को बैंकों ने गैर निष्पादित परिसम्पत्ति (एनपीए) करार कर दिया है उनकी वसूली के लिए कठोरतम कानूनी कदम; डिफाल्टरों की परिसम्पत्ति जब्त की जाये;
  • विदेशी बैंकों में जमा काले धन को वापस लाया जाये। काले धन के ट्रांसफर को रोकने के तंत्र को मजबूत बनाओ;
  • विकास के रास्ते को इस तरह पुनः निरूपित करो कि वह न्यायसंगत वितरण और सामाजिक न्याय के साथ आर्थिक विकास की दिशा मे ले जाये; 
  • सभी के लिए आवास, खाद्य सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा; महिला एवं बच्चों में कुपोषण को खत्म करने के लिए विशेष जोर;
  • मनरेगा स्कीम की तरह शहरों के बेरोजगारों के लिए काम का अधिकार सुनिश्चित करो;
  • बड़ी कम्पनियां के लिए ऑडिट के लिए कानून; और
  • कैग को एक संवैधानिक प्राधिकार बनाया जाये। 
  • लघु एवं मझोले उद्योग एवं कुटीर उद्योग
  • लघु एवं मझोले और कुटीर उद्योग, जो भूमंडलीय मंदी के कारण बर्बाद हो गये हैं, उनकी रक्षा;
  • इन क्षेत्रों को सब्सिडी युक्त ब्याज पर ऋणों का प्रावधान, खासकर उन उद्योगों को जो इनके उत्पादों के निर्यात पर निर्भर हैं;
  • इन क्षेत्रों द्वारा लिये गये ऋणों की वसूली पर स्थगन और इनके उत्पादों के लिए आरक्षण;
  • स्थानीय बाजार की जरूरतों को पूरा करने में मदद के लिए उन्हें सब्सिडी;
  • हैण्डीक्राफ्ट और कुटीर उद्योगों में फिर से जान फूंकने के लिए विशेष पैकेज क्योंकि ये उद्योग रोजगार के अधिकतम अवसर प्रदान करते हैं।

चुनाव सुधारों के संबंध में

  • वर्तमान व्यवस्था में जिस उम्मीदवार को पड़ने वाले वोटों में से सबसे अधिक वोट मिलते हैं उसको निर्वाचित माना जाता है, इससे जिन लोगों या पार्टियों को 50 प्रतिशत से कम मत मिल जाते हैं वह भी जीत जाता है। इससे धन बल और बाहुबल को बढ़ावा मिलता है। इस व्यवस्था को बदला जाना चाहिए;
  • आंशिक सूची व्यवस्था के साथ समानुपातिक प्रतिनिधित्व व्यवस्था को लागू किया जाये; और 
  • जो लोग सशस्त्र बलों एवं विदेशी मिशनों में काम कर रहे हैं वह मताधिकार का प्रयोग कर सकें इसके लिए तंत्र।

विशिष्ट क्षेत्रीय एवं राज्य स्तर मुद्दों के संबंध में

  • पिछड़े राज्यों को स्पेशल स्टेट्स;
  • जिन क्षेत्रों में कथित वाम उग्रवाद चल रहा है वहां वार्ता और उन क्षेत्रों के विकास के लिए स्पेशल पैकेज के क्रियान्वयन के जरिये शांति बहाली के लिए विशेष प्रयास;
  • अंतर-राज्य श्रम प्रव्रजन कानून 1979 (इंटर-स्टेट माइग्रेशन ऑफ लेबर एक्ट 1979) और शहरी एवं ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में प्रव्रजन मजदूरों की रक्षा के लिए संबंधित कानूनों में संशोधन;
  • असम एवं अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में नृवंशीय (एथनीक) एवं साम्प्रदायिक भीतरघात को रोकने के लिए पैकेजों के जरिये विशेष प्रयास।
  • मणिपुर, कश्मीर एवं अन्य पूर्वाेत्तर क्षेत्रों से सशस्त्र बल विशेष शक्ति कानून (अफस्पा) को निरस्त किया जाये।

कृषि क्षेत्र 

  • सिंचाई, बीज और उर्वरकों जैसी सुविधाएं सभी किसानों को उचित एवं कुछ मामलों में सब्सिडीयुक्त मूल्य पर मिलें इसके लिए कृषि क्षेत्र में सरकारी निवेश में पर्याप्त वृद्धि;
  • कृषि एवं बुआई के लिए भूमि सुनिश्चित करने के लिए मूलगामी भूमि सुधार एवं भूमिहीनों को भूमि वितरण; 
  • निजी बीज कारपोरेशनों का पक्ष लेने वाले कदमों को बंद किया जाना चाहिए;
  • व्यापक एवं अनिवार्य फसल बीमा जिसके लिए प्रीमियम का भुगतान राज्य या केन्द्र सरकार द्वारा किया जाये;
  • छोटे एवं सीमांत किसानों को ब्याज मुक्त ऋण;
  • कृषि उत्पादों के लिए लाभकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य;
  • स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों पर अमल;
  • किसानों, खेत मजदूरों और ग्रामीण दस्तकारों समेत सभी को 3000 रूपये मासिक पेंशन; और 
  • खेत मजदूरों के लिए केन्द्रीय कानून को पारित करना। राज्यों एवं केन्द्र में कृषि के लिए अलग बजट।

विदेश नीति

  • स्वतंत्र विदेश नीति पर चलो, अमेरिका जैसी साम्राज्यवादी ताकतों के सामने कोई आत्म-समर्पण नहीं;
  • अपने पड़ोसियों के साथ अच्छे पड़ोसी संबंधों को बढ़ावा दो;
  • श्रीलंका के तमिलों के लिए एक राजनीतिक समाधान पर जोर दो और 2009 में श्रीलंका में युद्ध के अंतिम दौर में जो मानवाधिकार उल्लंघन और युद्ध अपराध हुए उनके सम्बंध में विश्वसनीय जांच;
  • क्षेत्रीय सहयोग के संवर्धन पर जोर। ब्रिक्स एवं शंघाई सहयोग संगठन जैसे ग्रुपिंग्स में और अधिक सक्रिय भूमिका; और 
  • गुट निरपेक्ष आंदोलन को सार्थक तरीके से मजबूत करना।

शिक्षा नीति

  • सरकार द्वारा प्राइमरी से सेकेंडरी स्तर तक निःशुल्क एवं सर्वसुलभ शिक्षा के लिए गारंटी दी जाए;
  • शिक्षा पर खर्च को बढ़ाकर सकल घरेलू उत्पाद का कम से कम 10प्रतिशत किया जाय;
  • शिक्षा का व्यवसायीकरण नहीं, सभी को समान गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा, समान स्कूल प्रणाली, मेडिकल शिक्षा समेत सभी पेशेवर शिक्षा संस्थानों में दाखिले के लिए और अधिक अवसर; 
  • प्राइमरी से उच्चतर शिक्षा के सरकारी शिक्षा संस्थानों में तमाम रिक्त पदों को भरकर सभी स्तर पर सरकारी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाना;
  • तर्कबुद्धिवाद ;रैशनलिज्मद्ध और वैज्ञानिक स्वभाव को प्रोत्साहित करने के लिए पाठ्यक्रम में बदलाव। संविधान विहित प्रावधानों के अनुसार धर्मनिरेक्षता की रक्षा;
  • छात्रों के लिए सभी लोकतांत्रिक अधिकारों की गारंटी;
  • अगले 5 वर्षोंं में निरक्षरता का खात्मा करो।

रोजगार के और अधिक अवसर

  • बुनियादी अधिकार के रूप में काम के अधिकार की गांरटी; 
  • सभी बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता;
  • स्वरोजगार से जुड़े लोगों, दस्तकारों एवं विकलंागों के लिए विशेष बैंक क्रेडिट नीति को सुनिश्चित करो;
  • नौकरियों में भर्ती पर रोक और सरकारी विभागों एवं सार्वजनिक क्षेत्र इकाइयों में वर्तमान रोजगार में कटौती को समाप्त करो; और
  • पंूजी सघन विकास के बजाय रोजगार सघन विकास पर जोर दिया जाये।

खाद्य सुरक्षा

  • सभी परिवारों को 2 रुपये प्रति किलो के अधिकतम भाव पर 35 किलो खाद्यान्न का प्रावधान;
  • सर्वसुलभ (यूनिवर्सल) सार्वजनिक वितरण प्रणाली स्थापित की जाये और उसे विस्तारित किया जाये;
  • आवश्यक वस्तुओं की जमाखोरी के विरूद्ध कठोरतम कानूनी कदम; और
  • किसी भी वस्तु में फॉरवर्ड ट्रेडिंग नहीं।

सामाजिक सुरक्षा

  • सर्वसुलभ (यूनिवर्सल) वृद्धावस्था पेंशन का ग्रामीण एवं शहरी इलाकों में सभी के लिए विस्तार; और
  • पेंशन को रहन-सहन के खर्च के साथ लिंक करो।

स्वास्थ्य सेवा

  • स्वास्थ्य सेवा पर सकल घरेलू उत्पाद का 5 प्रतिशत खर्च सुनिश्चित करो;
  • स्वास्थ्य सेवा एक बुनियादी अधिकार बनाया जाना चाहिए।

भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाना

  • जांच की स्वतंत्र शक्ति के साथ लोकपाल कानून को मजबूत करो; 
  • राष्ट्रीय एवं प्राकृतिक संसाधनों की लूट को बंद करो क्योंकि बड़े घपलों और घोटालों की जड़ में यही चीज है;
  • सरकारी कामकाज के सभी स्तरों पर पूरी तरह पारदर्शिता;
  • सूचना के अधिकार कानून को कमजोर नहीं करना;
  • शिकायत निवारण कानून बनाओ; और
  • बाकी पड़े कानूनों को पारित करो, शिकायतकर्ताओं/ जानकारी देने वालों की रक्षा के संबंध में कानून को मजबूत करो।

न्यायिक सुधार

  • वहनीय खर्च पर सभी को समय पर न्याय मिले इसे सुनिश्चित करना;
  • न्यायिक व्यवस्था का विस्तार करो;
  • राष्ट्रीय न्यायिक आयोग का गठन करो; और
  • राजद्रोह धारा एवं अन्य क्रूर कानूनों को हटाने के लिए भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में समुचित संशोधन लाओ;
  • जजों की नियुक्ति में पारदर्शिता।

पुलिस सुधार

  • पुलिस बल में ऐसा सुधार जिससे वह उत्पीड़न के लिए राज्य के एक हथियार, जैसा कि आज वह है, के स्थान पर जनता की सेवा के लिए एक संस्था बने; और
  • पुलिस सुधार आयोग रिपोर्ट पर अमल करो।

महिलाओं के लिए 

  • लिंग समानता, सभी क्षेत्रों में महिलाओं को समान अधिकार;
  • महिला सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत तंत्र; हिंसा की पीड़ित महिलाओं के लिए फास्ट टैªक कोर्ट सुनिश्चित करो;
  • संसद एवं विधान सभाओं मंे महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण के लिए कानून, स्थानीय निकायों मंे 50 प्रतिशत आरक्षण;
  • लिंग स्तर की पारदर्शिता एवं जवाबदेही;
  • समलैंगिकों, उभयलैंगिकों एवं लिंग परिवर्तितों को समान अधिकार सुनिश्चित करो।

मजदूर वर्ग के लिए

  • कठिन संघर्षों के बाद प्राप्त ट्रेड यूनियन अधिकारों की रक्षा;
  • विशेष आर्थिक क्षेत्र एवं सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में ट्रेड यूनियन कानून लागू करो;
  • उचित न्यूनतम मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा कदमों को लागू करना;
  • ठेके पर काम कराने, आउटसोर्सिग और कैजुअल मजदूरी को समाप्त करना;
  • आंगनवाडी, आशा मिड-डे-मील और घरेलू वर्करों समेत असंगठित मजदूरों के लिए सामाजिक सुरक्षा;
  • पहले की सुनिश्चित, गारंटीशुदा पेंशन योजना की बहाली;
  • हाथ से शौच-सफाई के काम (मैनुअल स्केवेंजिग) को खत्म करो;
  • बाल-मजदूरी एवं बंधुआ मजदूरी के चलन को खत्म करने के लिए कानूनी प्रावधानों पर सख्ती से अमल।

अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए

  • एससी /एसटी सब-प्लान के लिए केन्द्र और राज्य दोनों स्तरों पर कानून;
  • उत्पीड़न के विरूद्ध कानूनों को अधिक प्रभावी बनाने के लिए उनमें संशोधन किया जाए;
  • वन सम्पदा पर वनवासियों को अधिकार देने वाले कानूनों को समग्रता से लागू किया जाए;
  • निजी क्षेत्र एवं पीपीपी संस्थानों समेत सभी क्षेत्रों में अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति/ अन्य पिछड़ा वर्ग के हित मंे आरक्षण नीति पर उचित अमल को सुनिश्चित करो;
  • रोजगार के सभी प्रवर्गों में एससी/एसटी के लिए आरक्षित पदों को पूरी तरह भरने को सुनिश्चित करने के लिए एक तंत्र बनाया जाए;
  • जनजाति आबादी वाले सभी क्षेत्रों को संविधान की 5वीं अनुसूची ;पेसाद्ध के अन्तर्गत लाया जाए;
  • आदिवासियों के लिए पांचवीं और छठी अनुसूची अधिकारों की रक्षा करना;
  • आदिवासी स्वायत्ता की रक्षा एवं संवर्धन के लिए बने कानूनों में समुचित संशोधन;
  • वन भूमि से आदिवासियों की बेदखली पर प्रतिबंध।

मछली उद्योग एवं मछुआरा समुदाय

  • मछली उद्योग और मछली पालन से जुड़े मजदूरों समेत मछुआरा समुदाय से संबंधित मुद्दों को डील करने के लिए अलग मंत्रालय बनाओ;
  • मछुआरा समुदाय को अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति का स्टेट्स देने के संबंध में विचार करो;
  • भारतीय मछुआरा समुदाय के अधिकारों की रक्षा करो; समुद्र में जाकर मछली पकड़ने वाले लोगों और मछुआरा समुदाय को विदेशी ताकतों के हमले से बचाओ। 

धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए

  • सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिशों को पूरी तरह और ईमानदारी से लागू करना, दलितों और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों को सुविधाएं देने के संदर्भ मंे धार्मिक आधार पर भेद-भाव खत्म करना; 
  • एससी/एसटी सब प्लान की तर्ज पर केन्द्र और राज्य दोनों स्तर पर अल्पसंख्यकों के लिए एक सब प्लान का प्रावधान करना;
  • साम्प्रदायिक हिंसा पर नियंत्रण के लिए कठोर कानून बनाए जाए और दंगा पीड़ितों का उचित पुनर्वास सुनिश्चित किया जाए;
  • अल्पसंख्यक आयोग को वैधानिक दर्जा दिया जाए;
  • सभी मकबूजा वक्फ भूमि और संपत्ति को वापिस करो, वक्फ की आय को अल्पसंख्यक समुदाय के सामाजिक-आर्थिक और शैक्षिक सुधार में इस्तेमाल किया जाए;
  • अल्पसंख्यकों के लिए 15 सूत्रीय प्रधानमंत्री कार्यक्रम समेत सभी सरकारी स्कीमों को समग्रता से लागू करना; 
  • उर्दू समेत मातृभाषा के माध्यम से प्राथमिक शिक्षा से लेकर माध्यमिक स्तर तक शिक्षा सुनिश्ेिचत की जाए; और
  • धार्मिक आधार पर होने वाले भेदभाव को रोकने के लिए भर्ती के सभी रास्तों के मैकेनिज्म को ठीक करो।

आंतकवाद के संबंध में

  • आंतकवाद के संबंध में नीति में संशोधन करो, ‘सभ्यता के टकराव‘ के सिद्धांत पर आधारित अवधारणा को त्याग दो; 
  • एफआईआर और चार्जशीट बगैर सालों से हिरासत में लिए गए युवकों को रिहा करो;
  • न्यायालय द्वारा सभी रिहा किए गए आंतक के अभियुक्तों का सरकारी रोजगार और पर्याप्त वित्तीय मुआवजे के साथ पुनर्वास करो; 
  • मासूम नौजवानों को फंसाने वाले और फर्जी मुठभेड़ करने वाले अधिकारियों को सजा दो; और
  • गैर-कानूनी गतिविधि (निवारण) कानून (यूएपीए) समेत सभी काले कानूनों को रद्द करो।

केन्द्र-राज्य संबंध

  • संघवाद को मजबूत करो;
  • राजस्व एवं वित्तीय संसाधनों के उचित हिस्सा बंटाने को नये सिरे से तय करो और सुनिश्चित करो।

शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्तियों के लिए

  • शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्तियों के लिए रोजगार और आजीविका के लिए विशेष कानून; और
  • विकलांग अधिकार कानून को लागू करो।

वरिष्ठ नागरिकों के लिए

  • आयकर दाताओं को छोड़कर अन्य सभी को वृद्धावस्था पेंशन; और
  • देश के सभी 622 जिलों में प्रत्येक में कम से कम एक वृृद्धावस्था आवास (ओल्ड होम) सरकार द्वारा चलाया जाए।

युवकों के संबंध में

  • एक व्यापक युवा नीति बनाओ;
  • निर्णय लेने वाले सभी निकायों में युवकों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करो; और
  • युवाओं के सभी तबकों तक खेल-कूद की समान पहुंच को सुनिश्चित कराने के लिए खेल एवं क्रीड़ा नीति बनाओ। स्कूलों एवं शिक्षा संस्थानों मंे खेल-कूद एवं क्रीड़ा के लिए पर्याप्त बुनियादी ढांचा बनाओ।

बाल अधिकारों के संबंध में

  • गुणवत्तापूर्ण डे- केयर सेवा;
  • पैदा होने से लेकर छः साल तक की उम्र के बच्चे को देखभाल और शिक्षा का अधिकार;
  • कार्यस्थलों पर शिशु सदनों का प्रावधान करो;
  • कुपोषण का अंत करो;
  • बच्चों के गिरते हुए लैंगिक अनुपात को रोको; और
  • सकल घरेलू उत्पाद का 3 प्रतिशत बच्चों की देखभाल में खर्च किया जाए।

संचार माध्यमों के संबंध में

  • इलेक्ट्रोनिक और प्रिन्ट मीडिया दोनों पर कॉरपोरेट घरानों द्वारा कब्जा करने की कोशिशों को रोको;
  • पत्रकारों के लिए वेज बोर्डों द्वारा की गयी सिफारिशों पर दृढ़ता से पूरी तरह अमल कर और पत्रकारों की नियुक्ति में अनुबंध व्यवस्था (कॉन्ट्रेक्ट सिस्टम) को खत्म कर पत्रकारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बहाल किया जाए;
  • प्रसार भारती को वास्तविक रूप में जन प्रसारण सेवा बनाने के लिए और अधिक संसाधन मुहैय्या कराए जाएं। 

संस्कृति के संबंध में

  • बहुलवादी राष्ट्रीय संस्कृति की रक्षा करो;
  • एकरूपवादी (मोनोलिथिक) व्यवस्था को थोपने की कोशिशों को नाकाम करो;
  • संस्कृति की सभी धाराओं के साथ सरकार एक जैसा बर्ताव करें;
  • सभी भाषाओं को बढ़ावा देना;
  • आठवीं अनुसूची में शामिल सभी भाषाओं के साथ राष्ट्रीय भाषा के रूप में व्यवहार किया जाए;
  • आदिवासी और क्षेत्र-विशिष्ट संस्कृतियों को बढ़ावा देना; और
  • आदिवासी लिपियों और बोलियांे को विकसित करना।

पर्यावरण नीति

  • पर्यावरण के संरक्षण के लिए एक व्यापक नीति तैयार करो;
  • पर्यावरण की जरूरतों और विकास के बीच एक संतुलित दृष्टिकोण;
  • पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली खतरनाक टेक्नोलॉजी पर प्रतिबंध लगाओ;
  • प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए सार्वजनिक परिवहन और पर्यावरण-अनुकूल परिवहन व्यवस्था का विकास करना।

जल-संसाधनों का संरक्षण 

  • जल-संसाधनों को व्यवसायिक उद्देश्य के लिए लीज पर न दिया जाये;
  • सभी को साफ पीने का पानी सुनिश्चित करो;
  • भूमिगत जल संसाधनों के अंधाधुंध इस्तेमाल पर नियंत्रण लगाओ; और
  • वर्षा जल संचयन के साथ-साथ परंपरागत झीलों, तालाबों और अन्य जल संसाधनों का संरक्षण करना।

विज्ञान और टेक्नोलॉजी के संबंध में

  • ज्ञान और आर्थिक विकास को सुनिश्चित करने के लिए एक व्यापक विज्ञान और टेक्नोलॉजी नीति;
  • प्रतिभा पलायन पर नियंत्रण करो;
  • शोध और विकास के लिए अधिक फंड ;
  • राष्ट्रीय हितों के संरक्षण के लिए वर्तमान पेटेंट कानून में संशोधन करो; और
  • परमाणु दायित्व कानून को कमजोर न किया जाय।

मतदाताओं से अपील
कारपोरेट पंूजी केन्द्र में एक कमजोर, अपनी खिदमतगार और दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादी सरकार बनाने की कोशिश कर रही है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और अन्य वामपंथी पार्टियां विकास का फायदा आबादी की सभी तबकों तक पहुंचाने के लिए जो सामाजिक-आर्थिक नीतियां अपनाई जायेगी उनके संबंध में निरंतर एवं सुसंगत तरीके से एक सुस्पष्ट समझ बनाने के लिए कोशिश करती रही है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, जिसका एक बेहतर जीवन के लिए संसद के अंदर और बाहर जनता के संघर्षोंं को जोड़कर चलाने का एक गौरवपूर्ण रिकॉर्ड रहा है, मतदाताओं से अपील करती है कि वे देश के विभिन्न हिस्सों मंे उसके उम्मीदवारों को वोट दें।
आपका वोटः 

  • नव उदारवादी एवं जन विरोधी आर्थिक नीतियों को बदलेगा;
  • वर्तमान भ्रष्ट सरकार को सत्ता से हटायेगा;
  • सांप्रदायिक ताकतों को सत्ता पर कब्जा करने से रोकेगा; और
  • एक जनतापक्षीय विकल्प के लिए पथ-प्रशस्त करेगा।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवारों को वोट दें।
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शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014

उत्तर प्रदेश में आठ लोकसभा क्षेत्रों में भाकपा ने प्रत्याशी उतारे.

लखनऊ- ४ मार्च, २०१४. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने आजमगढ़ जनपद की लालगंज(अनु.) लोकसभा क्षेत्र से भी प्रत्याशी घोषित किया है. कामरेड हरी प्रसाद सोनकर वहां भाकपा के प्रत्याशी होंगे. उपर्युक्त जानकारी देते हुये भाकपा के राज्य सचिव डॉ. गिरीश ने बताया कि अब भाकपा प्रदेश में आठ लोक सभा सीटों पर चुनाव लड़ने जा रही है. जिन अन्य क्षेत्रों से भाकपा ने प्रत्याशी उतारे हैं वे हैं- बरेली से मसर्रत वारसी उर्फ़ पप्पू भाई, खीरी से विपनेश शुक्ल, बाँदा से राम चन्द्र यादव सरस, गोंडा से ओमप्रकाश, घोसी से अतुल कुमार अनजान, मछली शहर(अनु.) से सुभाष गौतम तथा राबर्ट्सगंज(अनु.) से अशोक कुमार कनोजिया एडवोकेट. भाकपा कार्यालय द्वारा जारी विज्ञप्ति के अनुसार भाकपा राज्य सचिव डॉ. गिरीश एवं सहसचिव अरविंद राज स्वरूप कल दिनांक- ५ अप्रैल से पूर्वांचल के चुनावी दौरे पर जारहे हैं. वे ५ अप्रैल को लालगंज(सु.) लोक सभा क्षेत्र के अंतर्गत दुर्गा भाभी बालिका विद्यालय कन्दरा में सुबह ११ बजे एक कार्यकर्ता सम्मेलन को संबोधित करेंगे तथा ६ अप्रैल को राबर्ट्सगंज(सु.) क्षेत्र के अंतर्गत रेनुकूट में कार्यकर्ता सम्मेलन को सम्बोधित करेंगे. डॉ. गिरीश,राज्य सचिव भाकपा, उत्तर प्रदेश.
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गुरुवार, 27 मार्च 2014

राज्य सरकार ने नहीं निभाया राजधर्म--भाकपा

लखनऊ- २७, मार्च, २०१४. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने कहा कि मुजफ्फरनगर के दंगों पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उत्तर प्रदेश की सरकार इन दंगों के फ़ैलने देने की गुनहगार है और उसे अब इन दंगों की नैतिक जिम्मेदारी कबूल कर लेनी चाहिये. लेकिन इस फैसले की आड़ में भाजपा द्वारा अपने को निर्दोष साबित करने की कोशिशों को भी भाकपा कतई बर्दाश्त नहीं करेगी और दंगों में उसकी संलिप्तता का भी पर्दाफाश करेगी. सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर भाकपा की प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए भाकपा के राज्य सचिव डॉ.गिरीश ने कहा कि वे स्वयं और उनकी पार्टी शुरू से ही कहती आरही है कि मुजफ्फरनगर दंगों में राज्य सरकार अपने राजनैतिक स्वार्थों को पूरा करने में जुटी रही और उसने दंगों को रोकने और फैलने से रोकने के लिये समुचित प्रयास नहीं किये. राज्य सरकार अपने कर्तव्य निर्वहन की दोषी है. अब सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उसे कटघरे में खड़ा कर देने के बाद राज्य सरकार को इसकी नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार कर लेनी चाहिये. भाकपा राज्य सचिव ने कहा कि इस फैसले की आड़ में भाजपा अपने को पाक दामन साबित करने में जुट गयी है. उसकी इस कोशिश का भाकपा पर्दाफाश करेगी. इस हेतु शीघ्र ही एक “खुलासा पत्र” जारी किया जायेगा. डॉ. गिरीश ने राज्य सरकार से मांग की कि वह इस फैसले को अमली जमा पहनाये और दंगे के दोषी वे चाहे किसी भी सम्प्रदाय अथवा पार्टी से सम्बंधित हों को तत्काल गिरफ्तार करे, सभी पीड़ितों को समान मुआबजा दे तथा वहां से पलायित लोगों को उनके गांवों में बसाने को ठोस कदम तत्काल उठाये. डॉ. गिरीश, राज्य सचिव भाकपा , उत्तर प्रदेश
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