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शुक्रवार, 30 मार्च 2018
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रामराज्य और समाजवाद
उत्तर प्रदेश के
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा बजट भाषण पर चर्चा के दौरान विधान परिषद् में
“समाजवाद” को लेकर दिए गये वक्तव्य ने एक नई बहस को जन्म देदिया है. हो सकता है कि
बड़बोले श्री आदित्यनाथ ने यह बातें समाजवादी पार्टी के नाम में विहित समाजवाद को
लक्षित कर कही हों, लेकिन उन्होंने इसे व्यापक फलक देते हुये जो कुछ कहा वह
आश्चर्य में डालने वाला है. उन्होंने कहाकि प्रदेश की जनता अब तय कर चुकी है कि
उन्हें समाजवाद नहीं रामराज्य चाहिये. उन्होंने न केवल समाजवाद को धोखा कहा बल्कि
उसे समाप्तवाद तक कह डाला. उन्होंने समाजवाद की तुलना जर्मनी के नाजीवाद और इटली
के फासीवाद तक से कर डाली.
विपक्षी सदस्यों द्वारा यह
याद दिलाने पर कि समाजवाद शब्द संविधान की प्रस्तावना में दर्ज है, और
मुख्यमंत्रीजी उसे धोखा बता रहे हैं; वे भागते नजर आये. उन्होंने विपक्ष से
प्रतिप्रश्न किया कि संविधान में समाजवाद शब्द कब जोड़ा गया? उनका आशय इसे इंदिरा
सरकार से जोड़ कर खारिज करना था जिनके कि कार्यकाल में संसद ने इसे संविधान में
जोड़ा.
अब यह तो समय ही बतायेगा कि
प्रदेश की जनता क्या तय कर चुकी है और आगे क्या तय करेगी. लोकतंत्र में समय समय पर
सरकारों के क्रियाकलापों और कार्यप्रणाली के अनुसार जनता अपना मत और मंतव्य बदलती
रहती है, यह योगी आदित्यनाथ से ज्यादा कौन जानता है. जिस गोरखपुर की लोकसभा सीट पर
दशकों से योगीमठ का कब्ज़ा था उसे मतदाताओं ने एक पल में उनसे छीन लिया.
वस्तुतः रामराज्य एक कल्पना
है जिसका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं. यह एक मिथक है; हमारे मनीषियों और
कवियों की सुशासन के बारे में एक सुखद परिकल्पना है. यह अभी तक के इतिहास के किसी
दौर में न तो अस्तित्व में था, और न ही इसके अस्तित्व के कहीं कोई प्रमाण ही मिलते हैं. लेकिन राम के आख्यान के लोकप्रिय
होने के बाद शासक और शासक तबके रामराज्य का नाम लेकर जन- मानस को भरमाते रहे हैं. योगी
जैसे शासकों के लिये ये पूंजीवाद की विकृतियों को ढांपने की कवायद मात्र है.
लेकिन समाजवाद गत चार
शताब्दियों के राजनैतिक चिंतकों के अब तक की शासन व्यवस्थाओं के अध्ययन के उपरांत
अधिरूपित की गयी समाज व्यवस्था है जिसको मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन के विचारों ने
गढ़ा, और जो आज से सौ वर्ष पहले रूस की समाजवादी क्रांति के बाद अस्तित्व में आई.
यद्यपि अनेक बाह्य और आतंरिक कारणों से लगभग सात दशकों तक अस्तित्व में रहने के
बाद रूस की यह समाजवादी व्यवस्था ढह गयी लेकिन इसकी विशाल उपलब्धियां आज भी
पूंजीवादी व्यवस्था को मुहं चिड़ा रही हैं. क्यूबा और वियतनाम जैसे देश आज भी इस
व्यवस्था के जरिये अपने नागरिकों के जीवन को समुन्नत बना रहे हैं तो लैटिन अमेरिका
एवं अफरीकी महाद्वीप के कई देश तमाम
दबावों के बावजूद इस दिशा में बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं.
भारत में आधुनिक समाजवाद का
स्वरूप हमारी आजादी के आन्दोलन और विश्व सर्वहारा के क्रांतिकारी आन्दोलन के साथ
मजबूती से जुड़ा है. वह किसी की दया या कृपा पर निर्भर नहीं है. कार्ल मार्क्स,
एंगेल्स और लेनिन भारत की दुर्दशा और उसके भविष्य को बहुत बारीकी से देख रहे थे.
कार्ल मार्क्स ने भारत को ‘महान और दिलचस्प’ देश कहने के साथ ही “ हमारी भाषाओं और
धर्मों का उद्गम” कहा. मार्क्स और एंगेल्स ने सिध्द किया कि जैसे ही विश्व
सर्वहारा का क्रांतिकारी संघर्ष प्रबल होगा और भारत तथा अन्य पराधीन देशों की जनता
स्वाधीनता के लिये सचेत और संगठित होकर संघर्ष करने लगेगी “इस महान और दिलचस्प देश
की मुक्ति और पुनरुत्थान और समूची औपनिवेशिक प्रणाली का पतन अपरिहार्य हो जायेगा.”
मार्क्स और एंगेल्स ने सन
1853 में ही लिखा था, “ भारत के लोग उन नये तत्वों से, जिन्हें ब्रिटिश
पूंजीपतियों ने उनके बीच बिखेरा है ( रेल, तार, पानी के जहाज आदि ) तब तक कोई लाभ
नहीं उठा सकेंगे, जब तक खुद ब्रिटेन में औद्योगिक सर्वहारा आज के शासक वर्ग की जगह
न ले ले या जब तक भारतीय लोग स्वयं इतने मजबूत न होजायें कि अंग्रेजों के जुए को
पूरी तरह उतार फेंकें. कुछ भी हो, हम पूरी तरह आश्वस्त रह सकते हैं कि भविष्य में,
कुछ कम या ज्यादा लंबे अर्से के बाद इस महान और दिलचस्प देश का पुनरुत्थान होगा.”
अंग्रेजी हुकूमत द्वारा की
जारही भारत की लूट पर पर मार्क्स की पैनी नजर थी. उन्होंने 1881 में लिखा था कि
“जो माल भारतीय प्रति वर्ष मुफ्त इग्लेंड भेजने को मजबूर होते हैं, उनकी कीमत ही
भारत के छह करोड़ औद्योगिक और खेतिहर कामगारों की कुल आमदनी से अधिक है. यह
क्षोभजनक बात है. वहां एक के बाद एक भुखमरी के साल आते हैं और भुखमरी का आकार भी
इतना बड़ा होता है कि यूरोप में आज तक उसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता.”
भारत के प्रथम स्वतंत्रता
संग्राम पर भी मार्क्स और एंगेल्स अपनी सतर्क नजरें गढ़ाए हुए थे और उन्होंने उसे
राष्ट्रीय विद्रोह माना था. उन्होंने लिखा कि उन्नीसवीं सदी के मध्य में भारत का
यह विद्रोह “ ब्रिटिश आधिपत्य के खिलाफ महान एशियायी राष्ट्रों के सर्वव्यापी
असंतोष की एक महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति है.”
मार्क्स एंगेल्स की इस समझ
को आगे बढाते हुये लेनिन ने 1908 में लिखा कि “भारत में ब्रिटिश शासन पध्दति के
नाम पर जो लूटमार और हिसायें की जारही हैं उनका कोई अंत नहीं.” उन्होंने 1912 में
पुनः लिखा कि “ इग्लेंड देश ( भारत ) के उद्योग का गला घोंट रहा है.” 1913 में
लेनिन ने लिखा कि ब्रिटिश पूंजी भारत तथा अन्य उपनिवेशों को “ बहुत निर्दयता के
साथ और जमींदाराना ढंग से गुलाम बनाती और लूटती है.” आगे यह भी लिखा कि भारत की
“लगभग 30 करोड़ आबादी ब्रिटिश नौकरशाही द्वारा लूटे जाने और सताये जाने के लिये छोड़
दी गयी है.” लेनिन उस दौर के राष्ट्रीय स्वाधीनता आन्दोलन के उभार में जनवादी
तत्वों के उदय को भली प्रकार देख रहे थे. उन्होंने बाल गंगाधर तिलक को “भारतीय
जनवादी” कहा.
परतंत्र भारत की ब्रिटिश
शासकों द्वारा की जारही निर्मम लूट के विरुध्द संघर्ष में ही भारत में समाजवाद की वैचारिक
नींव पड़ी.
19 वीं सदी के अंतिम दशक
में स्वामी विवेकानंद ने भी भारत के जनवादी समाजवादी स्वरुप का अनुमान लगा लिया
था. उन्होंने भविष्यवाणी की कि “भावी महापरिवर्तन, जिसे एक ऐसे नये युग का
सूत्रपात करना है जिसमें सत्ता शूद्रों ( श्रम जीवियों ) के हाथ में होगी, संभवतः
रूस से ही शुरू होगा.”
बीसवीं सदी के पहले दशक में
ही भारत के प्रवासी स्वतंत्रता सेनानी अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी मंचों से सहायता
लेने का प्रयास करने लगे थे. वे दूसरे सोशलिस्ट इंटरनेशनल के अधिवेशनों में भाग
लेने लगे थे. इनमें दादाभाई नौरोजी, मैडम कामा, एस. आर. राना, बी. बी. एस. अय्यर
और श्यामजी कृष्ण वर्मा प्रमुख हैं. उन्होंने उन मंचों पर भारत की परिस्थिति पर
प्रस्ताव पेश किये और भाषण दिये. मैडम कामा ने पहली बार स्टुटगार्ड अधिवेशन में
तिरंगा झंडा फहराया और कहा कि आदर्श सामाजिक व्यवस्था का तकाजा है कि कहीं की भी
जनता गुलाम न रहे. भारत की जनता जागेगी और हमारे रूसी साथियों द्वारा दिखाये
रास्ते पर चलेगी, जिन्हें हम अपना बहुत ही बन्धुत्वपूर्ण अभिवादन भेजते हैं.
बाल गंगाधर तिलक की
गिरफ्तारी पर 1908 में बंबई के मजदूरों द्वारा की गयी पहली राजनैतिक हड़ताल पर
टिप्पणी करते हुये लेनिन ने लिखा कि “जनता का भारत अपने बुध्दिजीवियों और
राजनेताओं के रक्षार्थ खड़ा होरहा है.” उन्होंने भविष्यवाणी की कि “ भारत में भी सर्वहारा
सजग राजनीतिक जन- संघर्ष के स्तर पर जा पहुंचा है. इन परिस्थितियों में भारत में
अंग्रेजी- रूसी ढंग की शासन व्यवस्था के दिन बस गिने चुने रह गये हैं.”
1917 में भारतीय राष्ट्रीय
कांग्रेस के अधिवेशन में एनीबीसेंट ने कहा कि “रूसी क्रांति तथा यूरोप और एशिया
में रूसी जनतंत्र के संभावित उदय ने भारत में पहले से विद्यमान परिस्थितियों को
पूर्णतया बदल दिया है.” अक्टूबर क्रांति के बाद 1918 में बाल गंगाधर तिलक ने लिखा
कि “अभिजातों की जमीनों के किसानों को बांटे जाने के परिणामस्वरूप सेना और जनता
में लेनिन का प्रभाव बढ़ गया है.” 1920 में लाला लाजपत राय ने कहा कि “पूंजीवादी और
साम्राज्यवादी सत्य की अपेक्षा समाजवादी, वोलशेविक सत्य कहीं ज्यादा श्रेष्ठ,
विश्वसनीय और मानवीय है. 1919 में बोल्शेविज्म का अर्थ स्पष्ट करते हुए तत्कालीन
विद्वान विपिनचंद पाल ने लिखा कि इसका अर्थ है कि “धनिकों और तथाकथित उच्च वर्गों
की ओर से उत्पीडन को नकारते हुये सभी लोगों को आजादी और सुख से रहने का अधिकार.”
उन्होंने यह भी कहा कि “ बोल्शेविक सभी प्रकार के आर्थिक और पूंजीवादी शोषण तथा
सट्टेबाजी के खिलाफ हैं और वे सामाजिक असमानता का विरोध करते हैं. कवीन्द्र
रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने 1918 में क्रांतिकारी रूस की तुलना “उस भोर के तारे” से की
जो “नवयुग के प्रभात का संदेश लेकर आता है.”
भारत की अस्थाई सरकार जो
काबुल में स्थापित हुयी थी के राष्ट्रपति राजा महेन्द्रप्रताप और प्रधानमंत्री
बरकतुल्लाह खान के नेतृत्व में प्रवासी भारतीय क्रांतिकारियों का एक प्रतिनिधिमंडल
लेनिन से मिला था जिनसे लेनिन ने कहा कि “हम मुसलमानों और गैर मुसलमानों की घनिष्ठ
एकता का स्वागत करते हैं. हमारी कामना है कि यह एकता पूरब के समस्त मेहनतकशों को
एक सूत्र में पिरोये.”
शहीदे आज़म भगत सिंह और उनके
साथियों को ‘क्रांतिकारी’ या ‘क्रांतिकारी
आतंकवादी’ कहा जाता है. लेकिन वे भारत में समाजवाद/ साम्यवाद के अधिष्ठाता कहे जा
सकते हैं. अपने मित्र सुखदेव को उन्होंने लिखा था- “तुम और मैं तो जिन्दा नहीं
रहेंगे लेकिन हमारी जनता जिन्दा रहेगी. मार्क्सवाद लेनिनवाद के ध्येय और साम्यवाद
की विजय निश्चित है.”
दिल्ली के सेशन जज के सामने
दिये वक्तव्य में उन्होंने कहा- “क्रांति से हमारा अभिप्राय यह है कि प्रत्यक्ष
अन्याय पर आधारित वर्त्तमान व्यवस्था बदलनी चाहिये. वास्तविक उत्पादनकर्ता या
मजदूर को समाज का अत्यावश्यक हिस्सा बनाने के स्थान पर, शोषक उनकी मेहनत के फल छीन
लेते हैं और उन्हें उनके सामान्य अधिकारों से वंचित कर दिया जाता है. एक तरफ तो है
किसान जो सबके लिये अनाज उगाता है, अपने परिवार के साथ भूखा मरता है, बुनकर जो
विश्व बाज़ार को कपड़ा सप्लाई करता है, अपने बच्चों का तन ढकने को पर्याप्त कपड़ा
नहीं प्राप्त कर सकता, राज, लोहार, और बढई जो शानदार महल तैयार करते हैं, खुद
गन्दी बस्तियों में जीते और मरते हैं; और दूसरी तरफ हैं समाज के परजीवी, पूंजीवादी
शोषक जो अपनी सनक पर ही लाखों की रकम उड़ा देते हैं. ये भयानक असमानतायें और जबरन
थोपी गयी विकृतियां विप्लव की तरफ ले जारही हैं. ये हालात ज्यादा दिन नहीं चल सकते
और यह स्पष्ट होगया है कि वर्त्तमान समाज व्यवस्था ज्वालामुखी के किनारे खड़ी जश्न
मना रही है....... इस सभ्यता की पूरी इमारत अगर वक्त रहते बचायी नहीं गयी तो लड़खड़ा
कर ढह जायेगी. इसलिए एक मूलभूत परिवर्तन आवश्यक है. और जो इस बात को समझते हैं,
उनका कर्तव्य है कि समाजवादी आधार पर समाज का पुनर्गठन किया जाये.
डा. भीमराव अंबेडकर को
आमतौर पर जातिवाद विरोधी, आरक्षण के पुरोधा और संविधान निर्माता के रूप में जाना
जाता है, लेकिन उनके मन मस्तिष्क में भी समाजवाद की साफ़ तस्वीर थी. उन्होने
संविधान सभा में कहा था कि 26 जनवरी 1950
को हम एक विरोधाभासी स्थिति में प्रवेश करने जारहे हैं, जहां राजनीति में तो हमने
नागरिकों को समानता दे दी है. परन्तु सामाजिक एवं आर्थिक जीवन में ऐतिहासिक कारणों
से हम समानता से दूर रहे हैं. अतः हमें शीघ्र- अतिशीघ्र राजनीतिक एवं सामाजिक-
आथिक जीवन में इस विरोधाभास को खत्म करना होगा. वरना जो लोग इस असमानता से
उत्पीड़ित हैं, वे इस सभा द्वारा इतने परिश्रम से बनाये हुये राजनैतिक लोकतंत्र के
भवन को ध्वस्त कर देंगे. अपने पत्र ‘मूकनायक’ में डा. अंबेडकर ने 1920 में लिखा था कि भारत की आजादी के साथ सभी
वर्गों को धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर बराबरी की गारंटी होनी
चाहिए और हर व्यक्ति को अपनी प्रगति के लिये अनुकूल स्थितियां भी हासिल हों.
संविधान के प्रारूप की
व्याख्यात्मक टिपण्णी में भी इस बात पर बल दिया गया है कि देश के तीव्र विकास के
लिये स्टेट सोशलिज्म वांछित है,........ निजी क्षेत्र कृषि में कोई सम्रध्दी नहीं
ला सकते. 6 करोड़ अछूतों को जो भूमिहीन मजदूर हैं, उनके जीवन में खुशी चकबंदी और
हदबंदी कानूनों से नहीं आ सकती, केवल सरकारी खेती इसका समाधान है.
डा. अंबेडकर प्रत्येक
नागरिक की मूल आवश्यकताओं की आपूर्ति किसी भी लोकतंत्र का प्रथम कर्तव्य मानते थे.
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में वांछित आर्थिक प्रणाली के बारे में उनके
विचार “ स्टेट एंड माइनारिटीज” नामक पुस्तिका में स्पष्टरूपेण वर्णित हैं. वे
साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के खुले विरोधी थे. उनकी सोच में कार्ल मार्क्स और गौतम
बुध्द के विचारों का अभूतपूर्व समन्वय है. उन्होंने “प्रिवीपर्स” की समाप्ति ,
बैंकों, बीमा कंपनियों और कोयला खदानों के राष्ट्रीयकरण की बात बहुत पहले उठाई थी.
वे समाजवाद और सार्वजनिक क्षेत्र के पक्षधर थे.
आजादी के आन्दोलन की इन
तमाम धाराओं को अपना आदर्श मानते हुए हमने स्वतन्त्र भारत में मिश्रित
अर्थव्यवस्था की नीति अपनाई जिसका लक्ष्य उत्तरोत्तर सार्वजनिक उद्योग और सामूहिक
खेती की व्यवस्था को मजबूत करते हुये समाजवाद की ओर बढ़ना था. इसी क्रम में राजाओं
के प्रिवीपर्स खत्म किये गये और बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया. संविधान की
प्रस्तावना में समाजवाद के उद्देश्य को समाहित किया गया. इन सारी उपलब्धियों पर
पलट वार हमें भूमंडलीकरण, आर्थिक नव उदार की व्यवस्था के रूप में देखने को मिला.
लेकिन इसके तहत असमानता- और गरीबी- अमीरी के बीच चौड़ी होती खाई ने समाजवाद की
प्रासंगिकता को पुनर्स्थापित कर दिया है, जिस पर पर्दा डालने की कोशिश में
रामराज्य का शिगूफा छोड़ा गया है.
डा. गिरीश
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रामराज्य और समाजवाद
त्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा बजट भाषण पर चर्चा के दौरान विधान परिषद् में “समाजवाद” को लेकर दिए गये वक्तव्य ने एक नई बहस को जन्म देदिया है. हो सकता है कि बड़बोले श्री आदित्यनाथ ने यह बातें समाजवादी पार्टी के नाम में विहित समाजवाद को लक्षित कर कही हों, लेकिन उन्होंने इसे व्यापक फलक देते हुये जो कुछ कहा वह आश्चर्य में डालने वाला है. उन्होंने कहाकि प्रदेश की जनता अब तय कर चुकी है कि उन्हें समाजवाद नहीं रामराज्य चाहिये. उन्होंने न केवल समाजवाद को धोखा कहा बल्कि उसे समाप्तवाद तक कह डाला. उन्होंने समाजवाद की तुलना जर्मनी के नाजीवाद और इटली के फासीवाद तक से कर डाली.
विपक्षी सदस्यों द्वारा यह याद दिलाने पर कि समाजवाद शब्द संविधान की प्रस्तावना में दर्ज है, और मुख्यमंत्रीजी उसे धोखा बता रहे हैं; वे भागते नजर आये. उन्होंने विपक्ष से प्रतिप्रश्न किया कि संविधान में समाजवाद शब्द कब जोड़ा गया? उनका आशय इसे इंदिरा सरकार से जोड़ कर खारिज करना था जिनके कि कार्यकाल में संसद ने इसे संविधान में जोड़ा.
अब यह तो समय ही बतायेगा कि प्रदेश की जनता क्या तय कर चुकी है और आगे क्या तय करेगी. लोकतंत्र में समय समय पर सरकारों के क्रियाकलापों और कार्यप्रणाली के अनुसार जनता अपना मत और मंतव्य बदलती रहती है, यह योगी आदित्यनाथ से ज्यादा कौन जानता है. जिस गोरखपुर की लोकसभा सीट पर दशकों से योगीमठ का कब्ज़ा था उसे मतदाताओं ने एक पल में उनसे छीन लिया.
वस्तुतः रामराज्य एक कल्पना है जिसका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं. यह एक मिथक है; हमारे मनीषियों और कवियों की सुशासन के बारे में एक सुखद परिकल्पना है. यह अभी तक के इतिहास के किसी दौर में न तो अस्तित्व में था, और न ही इसके अस्तित्व के कहीं कोई प्रमाण ही मिलते हैं. लेकिन राम के आख्यान के लोकप्रिय होने के बाद शासक और शासक तबके रामराज्य का नाम लेकर जन- मानस को भरमाते रहे हैं. योगी जैसे शासकों के लिये ये पूंजीवाद की विकृतियों को ढांपने की कवायद मात्र है.
लेकिन समाजवाद गत चार शताब्दियों के राजनैतिक चिंतकों के अब तक की शासन व्यवस्थाओं के अध्ययन के उपरांत अधिरूपित की गयी समाज व्यवस्था है जिसको मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन के विचारों ने गढ़ा, और जो आज से सौ वर्ष पहले रूस की समाजवादी क्रांति के बाद अस्तित्व में आई. यद्यपि अनेक बाह्य और आतंरिक कारणों से लगभग सात दशकों तक अस्तित्व में रहने के बाद रूस की यह समाजवादी व्यवस्था ढह गयी लेकिन इसकी विशाल उपलब्धियां आज भी पूंजीवादी व्यवस्था को मुहं चिड़ा रही हैं. क्यूबा और वियतनाम जैसे देश आज भी इस व्यवस्था के जरिये अपने नागरिकों के जीवन को समुन्नत बना रहे हैं तो लैटिन अमेरिका एवं अफरीकी महाद्वीप के कई देश तमाम दबावों के बावजूद इस दिशा में बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं.
भारत में आधुनिक समाजवाद का स्वरूप हमारी आजादी के आन्दोलन और विश्व सर्वहारा के क्रांतिकारी आन्दोलन के साथ मजबूती से जुड़ा है. वह किसी की दया या कृपा पर निर्भर नहीं है. कार्ल मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन भारत की दुर्दशा और उसके भविष्य को बहुत बारीकी से देख रहे थे. कार्ल मार्क्स ने भारत को ‘महान और दिलचस्प’ देश कहने के साथ ही “ हमारी भाषाओं और धर्मों का उद्गम” कहा. मार्क्स और एंगेल्स ने सिध्द किया कि जैसे ही विश्व सर्वहारा का क्रांतिकारी संघर्ष प्रबल होगा और भारत तथा अन्य पराधीन देशों की जनता स्वाधीनता के लिये सचेत और संगठित होकर संघर्ष करने लगेगी “इस महान और दिलचस्प देश की मुक्ति और पुनरुत्थान और समूची औपनिवेशिक प्रणाली का पतन अपरिहार्य हो जायेगा.”
मार्क्स और एंगेल्स ने सन 1853 में ही लिखा था, “ भारत के लोग उन नये तत्वों से, जिन्हें ब्रिटिश पूंजीपतियों ने उनके बीच बिखेरा है ( रेल, तार, पानी के जहाज आदि ) तब तक कोई लाभ नहीं उठा सकेंगे, जब तक खुद ब्रिटेन में औद्योगिक सर्वहारा आज के शासक वर्ग की जगह न ले ले या जब तक भारतीय लोग स्वयं इतने मजबूत न होजायें कि अंग्रेजों के जुए को पूरी तरह उतार फेंकें. कुछ भी हो, हम पूरी तरह आश्वस्त रह सकते हैं कि भविष्य में, कुछ कम या ज्यादा लंबे अर्से के बाद इस महान और दिलचस्प देश का पुनरुत्थान होगा.”
अंग्रेजी हुकूमत द्वारा की जारही भारत की लूट पर पर मार्क्स की पैनी नजर थी. उन्होंने 1881 में लिखा था कि “जो माल भारतीय प्रति वर्ष मुफ्त इग्लेंड भेजने को मजबूर होते हैं, उनकी कीमत ही भारत के छह करोड़ औद्योगिक और खेतिहर कामगारों की कुल आमदनी से अधिक है. यह क्षोभजनक बात है. वहां एक के बाद एक भुखमरी के साल आते हैं और भुखमरी का आकार भी इतना बड़ा होता है कि यूरोप में आज तक उसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता.”
भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम पर भी मार्क्स और एंगेल्स अपनी सतर्क नजरें गढ़ाए हुए थे और उन्होंने उसे राष्ट्रीय विद्रोह माना था. उन्होंने लिखा कि उन्नीसवीं सदी के मध्य में भारत का यह विद्रोह “ ब्रिटिश आधिपत्य के खिलाफ महान एशियायी राष्ट्रों के सर्वव्यापी असंतोष की एक महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति है.”
मार्क्स एंगेल्स की इस समझ को आगे बढाते हुये लेनिन ने 1908 में लिखा कि “भारत में ब्रिटिश शासन पध्दति के नाम पर जो लूटमार और हिसायें की जारही हैं उनका कोई अंत नहीं.” उन्होंने 1912 में पुनः लिखा कि “ इग्लेंड देश ( भारत ) के उद्योग का गला घोंट रहा है.” 1913 में लेनिन ने लिखा कि ब्रिटिश पूंजी भारत तथा अन्य उपनिवेशों को “ बहुत निर्दयता के साथ और जमींदाराना ढंग से गुलाम बनाती और लूटती है.” आगे यह भी लिखा कि भारत की “लगभग 30 करोड़ आबादी ब्रिटिश नौकरशाही द्वारा लूटे जाने और सताये जाने के लिये छोड़ दी गयी है.” लेनिन उस दौर के राष्ट्रीय स्वाधीनता आन्दोलन के उभार में जनवादी तत्वों के उदय को भली प्रकार देख रहे थे. उन्होंने बाल गंगाधर तिलक को “भारतीय जनवादी” कहा.
परतंत्र भारत की ब्रिटिश शासकों द्वारा की जारही निर्मम लूट के विरुध्द संघर्ष में ही भारत में समाजवाद की वैचारिक नींव पड़ी.
19 वीं सदी के अंतिम दशक में स्वामी विवेकानंद ने भी भारत के जनवादी समाजवादी स्वरुप का अनुमान लगा लिया था. उन्होंने भविष्यवाणी की कि “भावी महापरिवर्तन, जिसे एक ऐसे नये युग का सूत्रपात करना है जिसमें सत्ता शूद्रों ( श्रम जीवियों ) के हाथ में होगी, संभवतः रूस से ही शुरू होगा.”
बीसवीं सदी के पहले दशक में ही भारत के प्रवासी स्वतंत्रता सेनानी अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी मंचों से सहायता लेने का प्रयास करने लगे थे. वे दूसरे सोशलिस्ट इंटरनेशनल के अधिवेशनों में भाग लेने लगे थे. इनमें दादाभाई नौरोजी, मैडम कामा, एस. आर. राना, बी. बी. एस. अय्यर और श्यामजी कृष्ण वर्मा प्रमुख हैं. उन्होंने उन मंचों पर भारत की परिस्थिति पर प्रस्ताव पेश किये और भाषण दिये. मैडम कामा ने पहली बार स्टुटगार्ड अधिवेशन में तिरंगा झंडा फहराया और कहा कि आदर्श सामाजिक व्यवस्था का तकाजा है कि कहीं की भी जनता गुलाम न रहे. भारत की जनता जागेगी और हमारे रूसी साथियों द्वारा दिखाये रास्ते पर चलेगी, जिन्हें हम अपना बहुत ही बन्धुत्वपूर्ण अभिवादन भेजते हैं.
बाल गंगाधर तिलक की गिरफ्तारी पर 1908 में बंबई के मजदूरों द्वारा की गयी पहली राजनैतिक हड़ताल पर टिप्पणी करते हुये लेनिन ने लिखा कि “जनता का भारत अपने बुध्दिजीवियों और राजनेताओं के रक्षार्थ खड़ा होरहा है.” उन्होंने भविष्यवाणी की कि “ भारत में भी सर्वहारा सजग राजनीतिक जन- संघर्ष के स्तर पर जा पहुंचा है. इन परिस्थितियों में भारत में अंग्रेजी- रूसी ढंग की शासन व्यवस्था के दिन बस गिने चुने रह गये हैं.”
1917 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में एनीबीसेंट ने कहा कि “रूसी क्रांति तथा यूरोप और एशिया में रूसी जनतंत्र के संभावित उदय ने भारत में पहले से विद्यमान परिस्थितियों को पूर्णतया बदल दिया है.” अक्टूबर क्रांति के बाद 1918 में बाल गंगाधर तिलक ने लिखा कि “अभिजातों की जमीनों के किसानों को बांटे जाने के परिणामस्वरूप सेना और जनता में लेनिन का प्रभाव बढ़ गया है.” 1920 में लाला लाजपत राय ने कहा कि “पूंजीवादी और साम्राज्यवादी सत्य की अपेक्षा समाजवादी, वोलशेविक सत्य कहीं ज्यादा श्रेष्ठ, विश्वसनीय और मानवीय है. 1919 में बोल्शेविज्म का अर्थ स्पष्ट करते हुए तत्कालीन विद्वान विपिनचंद पाल ने लिखा कि इसका अर्थ है कि “धनिकों और तथाकथित उच्च वर्गों की ओर से उत्पीडन को नकारते हुये सभी लोगों को आजादी और सुख से रहने का अधिकार.” उन्होंने यह भी कहा कि “ बोल्शेविक सभी प्रकार के आर्थिक और पूंजीवादी शोषण तथा सट्टेबाजी के खिलाफ हैं और वे सामाजिक असमानता का विरोध करते हैं. कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने 1918 में क्रांतिकारी रूस की तुलना “उस भोर के तारे” से की जो “नवयुग के प्रभात का संदेश लेकर आता है.”
भारत की अस्थाई सरकार जो काबुल में स्थापित हुयी थी के राष्ट्रपति राजा महेन्द्रप्रताप और प्रधानमंत्री बरकतुल्लाह खान के नेतृत्व में प्रवासी भारतीय क्रांतिकारियों का एक प्रतिनिधिमंडल लेनिन से मिला था जिनसे लेनिन ने कहा कि “हम मुसलमानों और गैर मुसलमानों की घनिष्ठ एकता का स्वागत करते हैं. हमारी कामना है कि यह एकता पूरब के समस्त मेहनतकशों को एक सूत्र में पिरोये.”
शहीदे आज़म भगत सिंह और उनके साथियों को ‘क्रांतिकारी’ या ‘क्रांतिकारी आतंकवादी’ कहा जाता है. लेकिन वे भारत में समाजवाद/ साम्यवाद के अधिष्ठाता कहे जा सकते हैं. अपने मित्र सुखदेव को उन्होंने लिखा था- “तुम और मैं तो जिन्दा नहीं रहेंगे लेकिन हमारी जनता जिन्दा रहेगी. मार्क्सवाद लेनिनवाद के ध्येय और साम्यवाद की विजय निश्चित है.”
दिल्ली के सेशन जज के सामने दिये वक्तव्य में उन्होंने कहा- “क्रांति से हमारा अभिप्राय यह है कि प्रत्यक्ष अन्याय पर आधारित वर्त्तमान व्यवस्था बदलनी चाहिये. वास्तविक उत्पादनकर्ता या मजदूर को समाज का अत्यावश्यक हिस्सा बनाने के स्थान पर, शोषक उनकी मेहनत के फल छीन लेते हैं और उन्हें उनके सामान्य अधिकारों से वंचित कर दिया जाता है. एक तरफ तो है किसान जो सबके लिये अनाज उगाता है, अपने परिवार के साथ भूखा मरता है, बुनकर जो विश्व बाज़ार को कपड़ा सप्लाई करता है, अपने बच्चों का तन ढकने को पर्याप्त कपड़ा नहीं प्राप्त कर सकता, राज, लोहार, और बढई जो शानदार महल तैयार करते हैं, खुद गन्दी बस्तियों में जीते और मरते हैं; और दूसरी तरफ हैं समाज के परजीवी, पूंजीवादी शोषक जो अपनी सनक पर ही लाखों की रकम उड़ा देते हैं. ये भयानक असमानतायें और जबरन थोपी गयी विकृतियां विप्लव की तरफ ले जारही हैं. ये हालात ज्यादा दिन नहीं चल सकते और यह स्पष्ट होगया है कि वर्त्तमान समाज व्यवस्था ज्वालामुखी के किनारे खड़ी जश्न मना रही है....... इस सभ्यता की पूरी इमारत अगर वक्त रहते बचायी नहीं गयी तो लड़खड़ा कर ढह जायेगी. इसलिए एक मूलभूत परिवर्तन आवश्यक है. और जो इस बात को समझते हैं, उनका कर्तव्य है कि समाजवादी आधार पर समाज का पुनर्गठन किया जाये.
डा. भीमराव अंबेडकर को आमतौर पर जातिवाद विरोधी, आरक्षण के पुरोधा और संविधान निर्माता के रूप में जाना जाता है, लेकिन उनके मन मस्तिष्क में भी समाजवाद की साफ़ तस्वीर थी. उन्होने संविधान सभा में कहा था कि 26 जनवरी 1950 को हम एक विरोधाभासी स्थिति में प्रवेश करने जारहे हैं, जहां राजनीति में तो हमने नागरिकों को समानता दे दी है. परन्तु सामाजिक एवं आर्थिक जीवन में ऐतिहासिक कारणों से हम समानता से दूर रहे हैं. अतः हमें शीघ्र- अतिशीघ्र राजनीतिक एवं सामाजिक- आथिक जीवन में इस विरोधाभास को खत्म करना होगा. वरना जो लोग इस असमानता से उत्पीड़ित हैं, वे इस सभा द्वारा इतने परिश्रम से बनाये हुये राजनैतिक लोकतंत्र के भवन को ध्वस्त कर देंगे. अपने पत्र ‘मूकनायक’ में डा. अंबेडकर ने 1920 में लिखा था कि भारत की आजादी के साथ सभी वर्गों को धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर बराबरी की गारंटी होनी चाहिए और हर व्यक्ति को अपनी प्रगति के लिये अनुकूल स्थितियां भी हासिल हों.
संविधान के प्रारूप की व्याख्यात्मक टिपण्णी में भी इस बात पर बल दिया गया है कि देश के तीव्र विकास के लिये स्टेट सोशलिज्म वांछित है,........ निजी क्षेत्र कृषि में कोई सम्रध्दी नहीं ला सकते. 6 करोड़ अछूतों को जो भूमिहीन मजदूर हैं, उनके जीवन में खुशी चकबंदी और हदबंदी कानूनों से नहीं आ सकती, केवल सरकारी खेती इसका समाधान है.
डा. अंबेडकर प्रत्येक नागरिक की मूल आवश्यकताओं की आपूर्ति किसी भी लोकतंत्र का प्रथम कर्तव्य मानते थे. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में वांछित आर्थिक प्रणाली के बारे में उनके विचार “ स्टेट एंड माइनारिटीज” नामक पुस्तिका में स्पष्टरूपेण वर्णित हैं. वे साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के खुले विरोधी थे. उनकी सोच में कार्ल मार्क्स और गौतम बुध्द के विचारों का अभूतपूर्व समन्वय है. उन्होंने “प्रिवीपर्स” की समाप्ति , बैंकों, बीमा कंपनियों और कोयला खदानों के राष्ट्रीयकरण की बात बहुत पहले उठाई थी. वे समाजवाद और सार्वजनिक क्षेत्र के पक्षधर थे.
आजादी के आन्दोलन की इन तमाम धाराओं को अपना आदर्श मानते हुए हमने स्वतन्त्र भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था की नीति अपनाई जिसका लक्ष्य उत्तरोत्तर सार्वजनिक उद्योग और सामूहिक खेती की व्यवस्था को मजबूत करते हुये समाजवाद की ओर बढ़ना था. इसी क्रम में राजाओं के प्रिवीपर्स खत्म किये गये और बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया. संविधान की प्रस्तावना में समाजवाद के उद्देश्य को समाहित किया गया. इन सारी उपलब्धियों पर पलट वार हमें भूमंडलीकरण, आर्थिक नव उदार की व्यवस्था के रूप में देखने को मिला. लेकिन इसके तहत असमानता- और गरीबी- अमीरी के बीच चौड़ी होती खाई ने समाजवाद की प्रासंगिकता को पुनर्स्थापित कर दिया है, जिस पर पर्दा डालने की कोशिश में रामराज्य का शिगूफा छोड़ा गया है.
डा. गिरीश
मंगलवार, 27 मार्च 2018
at 11:27 am | 0 comments |
विद्युत् व्यवस्था के निजीकरण का फैसला वापस ले उत्तर प्रदेश सरकार : भाकपा
लखनऊ- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पांच
महानगरों की विद्युत् व्यवस्था के निजीकरण को उपभोक्ता, कर्मचारियों और समाज के
हितों के विपरीत और पूंजीपतियों और ठेकेदारों के हित में बताया है. भाकपा ने इस
जनविरोधी फैसले को वापस लेने की राज्य सरकार से मांग की है.
यहां जारी एक प्रेस बयान
में पार्टी के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहाकि जहां जहां, जिस जिस व्यवस्था का भी
निजीकरण किया गया उससे आम जनता अथवा सरकार को कोई लाभ नहीं हुआ, केवल प्रायवेट
कंपनियों को लाभ पहुंचा है. पूर्व में टोरेंट कंपनी को सौंपी गयी आगरा और नोएडा की
विद्युत् व्यवस्था ने भी उपभोक्ताओं की कठिनाइयां ही बढ़ाई हैं.
भाकपा राज्य सचिव ने
निजीकरण के विरुध्द चल रहे विद्युत् कर्मचारियों और अधिकारियों के आन्दोलन का
समर्थन करते हुये भाकपा की जिला इकाइयों का आह्वान किया है कि वे जनहित में
विद्युत् कर्मचारी और अधिकारियों के आन्दोलन का समर्थन करें ताकि सरकार अपने इस
जनविरोधी फैसले को वापस लेने को बाध्य हो.
डा. गिरीश
शनिवार, 24 मार्च 2018
at 5:39 pm | 0 comments |
राज्य सभा चुनाव- यह लोकतंत्र की हार और लट्ठ तंत्र की जीत है: भाकपा
लखनऊ- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने गत दिन प्रदेश में हुए राज्य सभा के
चुनाव में भाजपा द्वारा धनबल, सत्ताबल और हर अनैतिक हथकंडा अपना कर 9 वीं सीट
हथियाने की करतूत की कड़े शब्दों में भर्त्सना की है. पार्टी ने निर्वाचन आयोग और
न्यायिक निर्णयों पर भी आश्चर्य व्यक्त किया है.
यहां जारी एक प्रेस बयान
में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहाकि गोरखपुर और फूलपुर में हुये उपचुनावों
में अपनी करारी हार से भाजपा पूरी तरह बौखला गयी थी और इस हार से अपने कार्यकर्ताओं
में पैदा हुयी हताशा को मिटाने को उसने अनैतिक रूप से नौवां प्रत्याशी उतार दिया.
इस प्रत्याशी की जीत के लिये भाजपा ने तमाम घ्रणित हथकंडे अपनाये और बसपा
प्रत्याशी को हराने के लिये सारी पूंजीवादी- सामंतवादी ताकतें एकजुट होगयीं. यह
लोकतंत्र की हार और लट्ठ तंत्र की जीत है.
भाकपा ने कहाकि गोरखपुर और
फूलपुर में जनता द्वारा कूड़ेदान में फैंक दी गयी भाजपा राज्य सभा चुनाव में इस
अनैतिक जीत को गोरखपुर और फूलपुर की हार का बदला बता कर जनता और मतदाताओं का अपमान
कर रही है और अपने इस घनघोर अनैतिक कृत्य पर पर्दा डालने की कोशिश कर रही है.
भाजपा पोषित मीडिया न केवल भाजपा के पक्ष को ही परवान चढ़ा रहा है अपितु योगी-
मोदी- शाह मंडली के इस पाप को “ मास्टर स्ट्रोक” बता रहा है. इसका जबाव आने वाले
चुनावों में जनता अवश्य देगी.
भाकपा ने कहाकि पूर्व में
भाजपा से गठबंधन करने वाले और सत्ता लोलुप, दल- बदलू और सामंती सोच के लोगों को
अपने दल से जिताने वाले दलों को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना होगा.
डा. गिरीश
गुरुवार, 15 मार्च 2018
at 2:40 pm | 0 comments |
Three days State Conference of CPI, Uttar Pradesh from 16th to 18th march in Mau
भारतीय कम्युनिस्ट
पार्टी का 23 वां राज्य सम्मेलन मऊ में
लखनऊ- 15 मार्च 2019,
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, उत्तर प्रदेश का 23 वां राज्य सम्मेलन 16, 17 एवं 18
मार्च, 2018 को मऊ में होने जारहा है. सम्मेलन में वर्तमान राष्ट्रीय परिद्रश्य
में भाकपा और वामपंथ की भूमिका खासकर भाजपा सरकार को 2019 में सत्ता से हठाने की
रणनीति पर विचार किया जायेगा. साथ ही केन्द्र और उत्तर प्रदेश सरकार के जनविरोधी
कृत्यों के खिलाफ सघन और व्यापक आन्दोलन की रणनीति तैयार की जायेगी.
सम्मेलन का शुभारंभ 16
मार्च को मऊ में रोडवेज बस अड्डे के निकट सोनीधापा मैदान में एक विशाल रैली से
होगी. अपरान्ह 12 बजे से होने वाली इस रैली को भाकपा के केन्द्रीय सचिव द्वय
कामरेड अतुल कुमार अनजान व कामरेड शमीम फैजी, भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश,
सहसचिव द्वय का. अरविन्दराज स्वरूप तथा इम्तियाज अहमद ( पूर्व विधायक, मऊ ) आदि
संबोधित करेंगे.
सम्मेलन का प्रतिनिधि सत्र
सायं 4 बजे से नगरपालिका के कम्युनिटी हाल में होगा जिसका उद्घाटन का. शमीम फैजी
करेंगे. तदुपरांत राज्य सचिव व सहसचिव द्वारा राजनैतिक और सांगठनिक रिपोर्टें
प्रस्तुत की जायेंगी. रिपोर्टों पर प्रतिनिधि साथी अपने विचार रखेंगे.
17 मार्च को होने वाले
प्रतिनिधि सत्र में सुबह 10 बजे अन्य वामपंथी दलों के नेता अपनी एकजुटता का इजहार
करेंगे. सम्मेलन का समापन 18 मार्च को दोपहर में का. अतुल अनजान द्वारा किया
जायेगा.
at 2:32 pm | 0 comments |
गरीबों की लूट और पूंजीपतियों को छूट को जनता का जबाव हैं गोरखपुर और फूलपुर के चुनाव नतीजे : भाकपा
लखनऊ- 15 मार्च 2018,
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने उत्तर प्रदेश की गोरखपुर और
फूलपुर की बहुचर्चित लोकसभा सीटों पर हुये उपचुनावों में भाजपा को कड़ी शिकस्त देने
और संयुक्त विपक्ष के सपा प्रत्याशी को भारी मतों से विजयी बनाने के लिये दोनों
संसदीय क्षेत्रों की जनता को हार्दिक बधाई दी है.
यहां जारी एक प्रेस बयान
में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहाकि पिछले चार वर्षों से केन्द्र में और
गत एक वर्ष से उत्तर प्रदेश में अंबानियों, अदानियों, मोदियों और माल्याओं जैसे
कारपोरेट लुटेरों को मालामाल करने वाली सरकारें चल रही हैं जिनकी लूट के शिकार
समाज के व्यापक हिस्से- किसान, कामगार, दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक, महिलायें, नौजवान
और छात्र आदि सभी होरहे हैं. उनकी चहुँतरफा लूट और सामाजिक उत्पीडन पर पर्दा डालने
को भाजपा और संघ परिवार धर्म की आड़ में सांप्रदायिक विद्वेष फैलाते रहे हैं. उत्तर
प्रदेश और बिहार की जनता ने इसका माकूल जबाव देदिया है.
भाजपा की यह हार कोई
सामान्य हार नहीं है. यह उस प्रदेश में हुयी है जिसे संघ, भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी ने हिदुत्व की प्रयोगशाला
बनाने को चुना है. यह दोनों सीटें भाजपा के दो कर्णधारों- मुख्यमंत्री और
उपमुख्यमंत्री की सीटें हैं जिनके कन्धों पर भाजपा ने 2019 में अपनी नैया पार
लगाने की जिम्मेदारी डाली है. उत्तर प्रदेश में वामपंथ सहित विपक्ष के व्यापकतम
हिस्सों ने अभूतपूर्व एकता का प्रदर्शन कर आगामी लोकसभा चुनावों के लिए स्पष्ट सन्देश
देदिया है और भाजपा के इस दर्प कि मोदी- योगी का कोई विकल्प नही, को चकनाचूर कर
दिया है. लोकतंत्र में विकल्प जनता बनाती है, झूठ- फरेब पर आधारित कोई गिरोह लंबे
समय तक लोगों की आँखों में धूल नहीं झोंक सकता; इन चुनाव परिणामों ने साबित कर
दिया है.
भाकपा ने प्रदेश के सभी
वामपंथी दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं को बधाई दी है जिन्होंने पूर्ण एकजुटता के
साथ भाजपा को हराने के लिये काम किया. भाकपा ने समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज
पार्टी के नेत्रत्व को भी बधाई दी जिन्होंने फासीवाद की चुनौती को समझा और एकजुट
होकर उसका जबाव दिया.
डा. गिरीश
मंगलवार, 27 फ़रवरी 2018
at 6:19 pm | 0 comments |
भाकपा नेता और पूर्व सांसद का. प्रबोध पंडा के निधन पर उत्तर प्रदेश भाकपा ने शोक जताया
लखनऊ- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, उत्तर प्रदेश के राज्य सचिव मंडल ने पार्टी की
राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य, पार्टी की पश्चिमी बंगाल राज्य काउंसिल के सचिव,
अखिल भारतीय किसान सभा के अध्यक्ष और पूर्व सांसद कामरेड प्रबोध पंडा के निधन पर
गहरा शोक व्यक्त किया है और उन्हें क्रांतिकारी श्रध्दांजलि अर्पित की है.
72 वर्षीय मगर कल तक पूरी
तरह सक्रिय का. पंडा का निधन आज (27 फरबरी ) को अलख सुबह कलकत्ता स्थित भाकपा
राज्य कार्यालय- “भूपेश भवन” स्थिति उनके आवासीय कक्ष में एक गहरे ह्रदय आघात के
चलते होगया.
पश्चिम बंगाल के पूर्व
मेदिनीपुर जनपद में 7 फरबरी 1946 में एक किसान परिवार में जन्मे प्रबोध पंडा कम
उम्र में ही छात्र आन्दोलन के माध्यम से सार्वजनिक जीवन में आगये थे. बाद में
किसान आंदोलनों में हिस्सा लेते हुए वे गत शताब्दी के छटवें दशक में वे भाकपा में
शामिल हुये और वर्षों तक पार्टी की मिदनापुर जिला काउंसिल के सचिव रहे.
कामरेड प्रबोध पंडा पहली
बार कामरेड गीता मुखर्जी के निधन से रिक्त सीट पर 2001 में हुए उपचुनाव में 13 वीं
लोकसभा के सदस्य चुने गये. 2004 और 2009 में हुए 14वीं और 15वीं लोकसभा के लिए वे
लगातार चुने गये थे. अपने समूचे संसदीय कार्यकाल में वे गरीबों, किसानों और
मजदूरों की मुखर आवाज बने और विभाजनकारी तथा सांप्रदायिक शक्तियों के विरुध्द तीखे
संघर्ष करते रहे. संसद की जल सरंक्षण और प्रबंधन समिति के संयोजक के रूप में
उन्होंने इसकी नीति निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की.
प्रबोध पंडा लंबे समय से
भाकपा की राष्ट्रीय परिषद के सदस्य रहे. 2014 में वे भाकपा की पश्चिम बंगाल राज्य
काउंसिल के सचिव चुने गये. इसके बाद वे पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य
चुने गये. हाल ही में दिसंबर 2017 में हुये पश्चिम बंगाल राज्य इकाई के सम्मेलन
में अगले तीन वर्षों के लिये पुनः सचिव चुने गये थे.
वे लगभग एक दशक से अखिल
भारतीय किसान सभा के अध्यक्ष थे.
भाकपा उत्तर प्रदेश के सचिव
डा. गिरीश ने कहाकि उनके इस आकस्मिक निधन से गरीबों, दलितों, शोषितों, अल्पसंख्यकों,
किसानों और मजदूरों के आन्दोलन को गहरा धक्का पहुंचा है. पश्चिम बंगाल ही नहीं देश
भर के कम्युनिस्ट और वामपंथी आन्दोलन को गहरी क्षति हुयी है. ऐसे समय में जब भाकपा
अप्रेल माह में अपना राष्ट्रीय महाधिवेशन आयोजित कर लुटेरी कारपोरेट व्यवस्था और
उभरते फासीवाद के खिलाफ संघर्ष की नीति निर्धारण में जुटी है, कामरेड प्रबोध पंडा के
अमूल्य सुझावों से हम वंचित होगये हैं.
भाकपा उतर प्रदेश उनके
प्रति आदरसूचक श्रध्दांजलि अर्पित करती है. उनके परिवार जिसमें उनकी पत्नी और
पुत्र शामिल हैं के गम में पूरी तरह शरीक होते हुये, इस अपार कष्ट को सहने में
सक्षम होने की कामना करती है. भाकपा उत्तर प्रदेश अपने पश्चिम बंगाल के साथियों के
साथ इस विषम स्थिति में खड़े होने और कामरेड प्रबोध पंडा के शोषणरहित समाज का
निर्माण करने के संघर्ष को आगे बढाने का संकल्प लेती है.
डा. गिरीश
बुधवार, 7 फ़रवरी 2018
at 12:38 pm | 0 comments |
गरीबों को गरीब तथा अमीरों को अमीर बनाने वाला है आम बजट
“ऐसा कोई सगा नहीं, जिसको
हमने ठगा नहीं.” सैकड़ों सालों से कानपुर के प्रसिध्द ‘ठग्गू के लड्डू’ बेचने वाले
का यही नारा है. अपने केन्द्रीय वित्तमंत्री जी ने भी बजट बनाते हुए ठग्गू के लड्डू
बेचने वाले के इसी नारे पर अमल किया है.
यूं तो आज़ादी के बाद से
पूंजीवादी और अब कारपोरेटी सरकारों द्वारा पेश किये जाते रहे हर बजट को सरकारें
लोक लुभावन होने का दावा करती रही हैं लेकिन आज़ादी के 70 साल बाद भी जनता की हालत
में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ है. देश के तीस करोड़ से अधिक लोग आज भी गरीबी की
सीमा के नीचे हैं तो 12 करोड़ जिनमें अधिकतर बच्चे हैं, कुपोषण के शिकार हैं. बजट
दर बजट आते रहे और गरीबी अमीरी के बीच खाई निरंतर चौड़ी होती रही. गत साढ़े तीन
सालों में यह खाई और भी चौड़ी होती गयी और देश के कई धनवान व्यापारिक घराने दुनिया
के धनाढ्यों की सूची में आगये हैं. देश की दौलत केवल 1 से 10 प्रतिशत तक लोगों के
हाथों में सिमटती जारही है जबकि गरीबों की संख्या लगातार बढ़ती जारही है. केंद्र
सरकार का यह बजट इस खाई को और अधिक चौड़ा
करेगा. यही वजह है कि उद्योग जगत ने इसकी तारीफ़ की है और व्यापारी, लघु उद्यमी,
मध्य वर्ग, किसान, मजदूर, महिलायें, विद्यार्थी और नौजवान आदि सभी इससे निराश हुए
हैं.
सबसे ज्यादा धोखाधडी किसानों
के साथ हुयी है जिनसे गत लोकसभा चुनावों के समय उनकी आमदनी दोगुना करने का झांसा
दिया गया था. बाद में सरकार अपने इस वायदे से मुकर गयी और सर्वोच्च न्यायालय में
लिखित रूप से कहाकि किसानों की आमदनी को डेढ़ गुना नहीं किया जासकता. अब अचानक बजट
भाषण में उनकी आमद डेढ़ गुना बढाने का दावा किया गया है. बिना यह बताये कि किसानों
की जरूरत वाली चीजों के दाम कितने घटाए जायेंगे और सभी फसलों का समर्थन मूल्य कितना
बढाया जाएगा. फसलों की मौजूदा कीमत में लगभग पचास फीसद बढ़ोत्तरी की दरकार है और
पिछले साढ़े तीन साल के अनुभव बताते हैं कि समर्थन मूल्यों में मामूली वृध्दि ही
होगी. फसल बीमा योजना के आंकड़े बताते हैं कि उसके जरिये निजी क्षेत्र की कंपनियों
ने अरबों रुपये प्रीमियम के रूप में किसानों की जेब से निकलवा लिए और फसल हानि की
भरपाई के नाम पर उन्हें प्याज के टुकड़े ही मिले.
मध्यवर्ग और अच्छी तनख्वाह पाने
वाले जिनका बड़ा हिस्सा भाजपा और उसकी सरकार का पिट्ठू बना हुआ है, को उम्मीद थी कि
उन्हें आयकर आदि में रियायतें मिलेंगी. लेकिन उन्हें इस बजट से भारी निराशा हुयी
है. सरकार की ठग प्रवृत्ति का इससे बढ़ा उदहरण क्या मिलेगा कि पेट्रोल डीजल पर दो
फीसद उत्पाद कर घटाया तो उतना ही उस पर सेस लगा दिया. अंबानी का पेट्रोल महँगा बिक
सके इसलिये विश्व बाज़ार में कच्चा तेल सस्ता होने के बावजूद उसे उपभोक्ताओं के लिए
महंगा बनाया हुआ है. नोटबंदी और जीएसटी से लुटा पिटा लघु उद्यमी और व्यापारी राहत
की आस लगाए बैठा था मगर उसे भी निराशा ही हाथ लगी है. महिलाओं की मौजूदा स्थिति
में बदलाव शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और सुरक्षा के जरिये ही आसकता है, पर बजट इस
पर मौन है.
मजदूर वर्ग इस सरकार की
प्राथमिकता में कभी नहीं रहा और इस बजट में भी उसकी घनघोर उपेक्षा की गयी है. यहाँ
तक कि ग्रामीण रोजगार देने वाली मनरेगा को भी अपेक्षित बजट आबंटन नहीं मिला.
शिक्षा का बजट 4 फीसद भी नहीं किया गया. सरकार शिक्षा ऋण पर जोर देती रही है. पर
बिना रोजगार की गारंटी किये यह ऋण उन्हें पकोड़ा बेचने को ही बाध्य करेगा और यही
सरकार की मंशा भी है. रोजगार देने वाली योजनाओं की नामौजूदगी और चार साल में कीगयी
उपेक्षा से नौजवानों में भारी निराशा है. वे आवेदनों की लहीम सहीम फीस, साक्षात्कारों
के बाद भी नियुक्तियां न होने और भर्ती की आयुसीमा घटने से भी नाखुश हैं. उज्ज्वला
योजना ने इस सरकार को वोट दिलाये हैं अतएव उसे जारी रखा गया है. लेकिन बहुचर्चित
स्वास्थ्य बीमा योजना का धन बीमा कंपनियां हडप जायेंगी और इसका भी हश्र फसल बीमा
योजना जैसा होगा.
राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति,
राज्यपालों और सांसदों के वेतनों में अप्रत्याशित वृध्दि गरीबों और आम जनता के जले
पर नमक छिडकने वाली है.
आज़ादी के बाद यह पहला बजट
है जिसमें एक भी नई रेल चलाने या उनके फेरे बढाने की कोई घोषणा नहीं हुयी. बुलट
ट्रेन के सपने दिखाने वाली सरकार को आम आदमी की सुगम यात्रा की कोई फ़िक्र नहीं है.
जहां तक हाथरस का सवाल है यहाँ
के लोगों को आशा थी कि उन्होंने भाजपा को सांसद, विधायक और नगरपालिका का चेयरमेन
दिया है, इसका उसे पुरूस्कार मिलेगा. लेकिन हाथरसवासियों को न तो कोई नयी ट्रेन
मिली न बहुप्रतीक्षित ओवरब्रिज. न कोई उद्योग मिला न शिक्षण संस्थान. हाथरस के लोग
अपने को ठगा महसूस कर रहे हैं.
इस सरकार का पिछला बजट भी
इसी तर्ज पर था. इसने भी गरीबी अमीरी की खाई को चौड़ा किया है. ओक्सफेम की रिपोट के
अनुसार 2017 में अर्जित कुल संपत्ति का 73 प्रतिशत भाग मात्र एक प्रतिशत लोगों के
हाथों में चला गया जबकि शेष 99 प्रतिशत लोगों को इसका केवल 27 प्रतिशत हिस्सा ही
मिला. इन 1 प्रतिशत लोगों की संपत्तियां बढ़ कर 20. 9 लाख करोड़ होगयी हैं. इस
सर्वेक्षण के अनुसार देश की कुल संपत्ति का 58 फीसद भाग एक फीसद लोगों के पास है
जबकि विश्व स्तर पर यह अनुपात कम है और 1
फीसद लोगों के पास 50 फीसद संपत्ति है. जाहिर है भारत में गरीबी और अमीरी की खाई
दुनिया में सबसे अधिक है और इसी विषमता पर पर्दा डालने को भाजपा और संघ परिवार
कृत्रिम मुद्दे उठा कर हिन्दू मुस्लिम विभाजन पैदा कर रहे हैं.
डा. गिरीश, राज्य सचिव
भाकपा, उत्तर प्रदेश
शनिवार, 13 जनवरी 2018
at 1:05 pm | 0 comments |
नेतान्याहू की भारत यात्रा पर 15 जनवरी को विरोध प्रदर्शन करेंगे वामपंथी दल
लखनऊ- 13 जनवरी 2018,
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव डा. गिरीश एवं भारत की कम्युनिस्ट पार्टी
( मार्क्सवादी ) के सचिव का. हीरालाल ने कहाकि इजरायल के प्रधानमंत्री नेतान्याहू
के भारत आगमन का उत्तर प्रदेश में पुरजोर विरोध किया जायेगा. उन्होंने दोनों
पार्टियों की जिला कमेटियों का आह्वान किया कि वे दूसरे वामपंथी दलों,
धर्मनिरपेक्ष और साम्राज्यवाद विरोधी ताकतों को साथ लेकर विरोध प्रदर्शन करें और महामहिम
राष्ट्रपति को संवोधित ज्ञापन भेजें.
यहाँ जारी एक प्रेस बयान
में नेताद्वय ने कहाकि हाल के दिनों में हमारी घोषित राष्ट्रीय नीति और परंपराओं
में प्रतिगामी बदलाव हुये जिसके परिणामस्वरूप नेतान्याहू के भारत आगमन पर लाल
कारपेट्स बिछाये जारहे हैं. भारतीय समाज सदैव से फिलिस्तीनियों के साथ खड़ा रहा है
और आज भी वह अमेरिका समर्थित इजरायल की दादागीरी के विरुध्द है.
आपत्तिजनक बात यह है कि 6
दिसंबर 2017 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जेरुशलम को इजरायल की राजधानी
के रूप में मान्यता देदी. यह कदम अंतर्राष्ट्रीय कानूनों और पश्चिमी तट और पूर्वी
जेरुशलम पर इजरायल के कब्जे के खिलाफ सुरक्षा परिषद् में पारित विभिन्न प्रस्तावों
के खिलाफ है. जेरुशलम अंतर्राष्ट्रीय संप्रभुता के अधीन है और इजरायल उसके किसी
हिस्से पर दावा नहीं कर सकता. लेकिन इजरायल ने पूर्वी जेरुशलम पर 1967 से कब्ज़ा
जमा रखा है.
अब ट्रंप द्वारा लिए गए इस
अपराधिक फैसले के खिलाफ उसी दिन से सभी जगह विरोध प्रदर्शन होरहे हैं. विरोध
प्रदर्शन करने वाले 10 फिलिस्तीनी मारे जाचुके हैं और 170 बच्चों सहित 600 लोग गिरफ्तार किये गए हैं.
आज भारत इजरायली हथियारों
का सबसे बड़ा खरीददार है. आज इजरायल के साथ किसी भी सहयोग का मतलब अंतर्राष्ट्रीय
कानूनों का उल्लंघन और फिलिस्तीनियों के अधिकारों का हनन है. हथियारों की खरीद
अथवा अन्य व्यापारिक गतिविधियों से इजरायल के पास पहुँचने वाला हमारा धन
फिलिस्तीनियों के दमन और उनकी भूमियों पर कब्जा करने की इजरायली कारगुजारी को
मजबूत करता है.
भारत में नेतान्याहू का
स्वागत इजरायल के अपराधों का खुला समर्थन है. उत्तर प्रदेश और देश भर के सभी
प्रगतिशील लोगों को इसका विरोध करना चाहिये. फिलिस्तीनियों के उत्पीडन की हर
कार्यवाही पर हमें प्रतिरोध जताना चाहिए. आज फिलिस्तीनियों के साथ खड़े होना
धर्मनिरपेक्षता, समानता और न्याय के साथ खड़ा होना है. आज हम अपने समाज में भी इन
उद्देश्यों के लिए संघर्षरत हैं. ये मूल्य भारत की फिलिस्तीनियों के प्रति लंबे
समय से चली आरही एकजुटता के आधार स्तंभ हैं. आज नेतान्याहू के कूटनीतिक दौरे का
प्रबल विरोध करके हमें फिर से अपनी परंपरागत एकजुटता को पुनर्जीवित और पुनर्स्थापित करना
होगा. हमें इजरायल से नए व्यापारिक सौदों से परहेज करना होगा और पुरानों को रद्द
करने पर विचार करना होगा.
अतएव हम उत्तर प्रदेश के
प्रबुध्द लोगों से अपील करते हैं कि वे नेतान्याहू के भारत दौरे के खिलाफ 15 जनवरी
को विरोध प्रदर्शन करें. भाकपा और माकपा ने अपनी सभी इकाइयों से भी अपील की है कि
वे जनता के व्यापक हिस्सों को विरोध प्रदर्शन में उतारें.
जारी द्वारा-
डा. गिरीश, राज्य
सचिव
भाकपा, उत्तर प्रदेश
शुक्रवार, 12 जनवरी 2018
at 12:21 pm | 0 comments |
बाराबंकी- जहरीली शराब काण्ड के लिये राज्य सरकार जिम्मेदार : भाकपा
लखनऊ- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी उत्तर प्रदेश के राज्य सचिव मंडल ने बाराबंकी में जहरीली
शराब पीने से दर्जन भर नागरिकों की मौत पर गहरा दुःख प्रकट किया है और शोक संतप्त
परिवारोंb के प्रति गहरी संवेदनाओं का इजहार किया है. भाकपा ने हर मृतक के परिवार
को रूपये 10 लाख और इलाज करा रहे लोगों को रुपये 2 लाख की आर्थिक सहायता तत्काल दिए
जाने की मांग की है.
यहाँ जारी एक प्रेस बयान
में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने इस बात पर हैरत जतायी कि चन्द माह पूर्व
जनपद एटा के अलीगंज में जहरीली शराब से हुयी कई दर्जन लोगों की मौतों से मौजूदा
राज्य सरकार ने कोई सबक नहीं लिया और एक और ह्रदयविदारक हादसा होगया. सरकार की
संवेदनहीनता का इससे बढ़ा उदहारण क्या होगा कि प्रशासन ने मुआबजे का लालच देकर
पीड़ित परिवारों से बयान दिलवाए कि मौतें ठंड के कारण हुयी हैं. सच तो यह है कि इन
मौतों के लिये केवल और केवल राज्य सरकार और उसकी मशीनरी जिम्मेदार है.
भाकपा ने कहा की सरकार को
इस घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेनी चाहिये और नीचे से ऊपर तक जिम्मेदार लोगों के
खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्यवाही की जानी चाहिये.
डा. गिरीश,
बुधवार, 20 दिसंबर 2017
at 5:53 pm | 0 comments |
विद्यत दरों में वृध्दि के खिलाफ प्रदेश भर में सडकों पर उतरे वामपंथी
लखनऊ- राज्य सरकार
द्वारा 30 नवंबर को बिजली के दामों में की गयी भारी वृध्दि के विरोध में वामपंथी
दलों ने आज समूचे उत्तर प्रदेश में जुझारू प्रदर्शन किये और जगह जगह राज्यपाल को संबोधित
ज्ञापन सौंपे गये. ज्ञापनों में जनता, किसानों और व्यापारियों की कमर तोड़ देने
वाली इस वृध्दि को तत्काल वापस लेने की मांग की गयी है.
ज्ञातव्य हो कि प्रदेश में 29 नवंबर तक निकाय चुनाव होरहे थे, जिनके पूरे होते
ही अगले दिन बिजली की कीमतों में बढ़ोत्तरी का यह तोहफा भाजपा सरकार द्वारा जनता के
ऊपर थोप दिया गया. वामदलों ने 1 नवंबर को बैठक कर इसको वापस लेने की मांग की
अन्यथा सडकों पर उतरने की चेतावनी डी थी. तदनुसार 12 से 19 दिसंबर तक जन अभियान
चलाया गया जो पूर्ण सफल रहा और आज जिलों जिलों में शानदार प्रदर्शन किये गये जिनकी
खबरें राज्य मुख्यालय को लगातार प्राप्त होरही हैं. वामपंथी दलों ने दावा किया है
कि इन प्रदर्शनों में बीस हजार से अधिक जनता सडकों पर उतरी.
सबसे शानदार प्रदर्शन सहारनपुर में हुआ जहाँ पांच सौ से अधिक किसान मजदूर
जिनमें बड़ी संख्या में महिलायें शामिल थीं, ने स्थानीय गांधी पार्क से कलक्ट्रेट
तक जुझारू तेवरों के साथ जुलूस निकाला. भीषण नारेबाजी के बाद यह प्रदर्शन सभा में
तब्दील होगया. सभा को भाकपा के सचिव जनेश्वर उपाध्याय, सहसचिव शहनाज बेगम, शरीफ
अहमद, मेयर प्रत्याशी रहे फरीद अहमद, भाकपा(मा.) के तिलक राजभाटिया, सचिव राव दाऊद
व नवनीत और माले के मेलाराम ने संबोधित किया. मुरादाबाद में भी भाकपा, माकपा, माले
और एसयूसीआई के सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने एक प्रदर्शनकारी जुलूस निकाला और
कलेक्ट्रेट पर पहुँच कर सभा की और ज्ञापन दिया. बलिया में रेलवे स्टेशन से
कलेक्ट्रेट तक सैकड़ों भाकपा कार्यकर्ताओं ने जुलूस निकाला, सभा की गयी और ज्ञापन
सौंपा गया. भाकपा नेता दीनानाथ सिंह आदि ने सभा को संबोधित किया.
इलाहाबाद में वामपंथी दलों के सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने जिला मुख्यालय पर शानदार
प्रदर्शन किया, सभा की और ज्ञापन सौंपा. इससे पूर्व सात दिनों तक संयुक्त रूप से
जन अभियान भी चलाया गया. यह संपूर्ण अभियान भाकपा राज्य कार्यकारिणी के सदस्य नसीम
अंसारी, सीपीएम के जिला सचिव अखिल, माले के सचिव कमाल उसरी और एसयूसीआई-सी के सचिव
राजेन्द्र सिंह के नेतृत्व में संपन्न हुआ. शाहजहांपुर में भाकपा ने कलक्ट्रेट पर प्रदर्शन
कर ज्ञापन सौंपा. आम सभा को वरिष्ठ नेता रमाशंकर, जिला सचिव मो. सलीम तथा सुरेश कुमार
नेताजी ने संबोधित किया. इससे पहले सप्ताह भर तक चले अभियान में सभाएं, जन चौपाल
और पुतला दहन आदि आयोजित किये गए.
मथुरा में भाकपा नेता का. गफ्फार अब्बास एडवोकेट और भाकपा- माले के सचिव का.
नसीर शाह के नेतृत्व में सैकड़ों कार्यकर्ताओं द्वारा जिला कलेक्ट्रेट से जुलूस
निकाला गया और केंट स्थित बिजली घर का घेराव किया गया. कई घंटों के प्रदर्शन और सभा
के बाद विद्युत् अभियंता को ज्ञापन सौंपा गया. मैनपुरी में भाकपा के जिला सचिव का.
रामधन और किसान सभा के सचिव राधेश्याम यादव के नेतृत्व में जिलाधिकारी कार्यालय पर
धरना एवं सभा का आयोजन किया गया और ज्ञापन सौंपा गया.
अलीगढ में भाकपा और माकपा के संयुक्त तत्वावधान में जिला कलेक्ट्रेट पर
प्रदर्शन कर राज्यपाल को संबोधित ज्ञापन उप नगर मजिस्ट्रेट को सौंपा गया. भाकपा
सचिव प्रो. सुहेव शेरवानी एवं माकपा के नेता मो. इदरीस के नेतृत्व में हुए इस
आन्दोलन में रामबाबू गुप्ता एवं इकबाल मंद आदि प्रमुख रूप से शामिल थे. हाथरस में
भाकपा कार्यकर्ताओं ने एसडीएम सदर के कार्यालय पर धरना दिया और सभा की. ज्ञापन उप
जिलाधिकारी को सौंपा गया. जिला सचिव का. चरणसिंह बघेल के नेतृत्व में हुये इस
कार्यक्रम में सत्यपाल रावल, संजय खां, राजाराम कुशवाहा, आर. डी. आर्य एवं गीतम
सिंह आदि प्रमुखतः मौजूद रहे.
जनपद मऊ में भाकपा, भाकपा (मा.), भाकपा- माले तथा एसयूसीआई ने गाजीपुर चौराहे
से संयुक्त जुलूस निकाला जो कलक्ट्रेट पहुँच कर सभा में परिवर्तित होगया. सभा को
भाकपा के पूर्व विधायक इम्तेयाज़ अहमद, विनोद राय, रामसोच यादव, इतवारी देवी, माकपा
के वीरेन्द्र व शेरबहादुर, माले के वसंत व विनोद सिंह, एसयूसीआई के शैलेन्द्र तथा
त्रिभुवन ने संबोधित किया. चंदौली में भाकपा और माकपा के कार्यकर्ताओं ने एसडीएम
चकिया के कार्यालय पर प्रदर्शन कर ज्ञापन सौंपा जिसका नेतृत्व माकपा नेता रामअचल यादव
एवं भाकपा नेता सुखदेव मिश्र ने किया. भदोही में भी भाकपा, माकपा और माले के
सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन कर ज्ञापन सौंपा.
आजमगढ़ में भाकपा, माकपा और माले के कार्यकर्ताओं ने कलक्ट्रेट पर प्रदर्शन
किया जिसका नेत्रत्व श्रीकांत सिंह और रामायण सिंह आदि ने किया. मेरठ में भाकपा
नेता शरीफ अहमद, माकपा सचिव रजनीश और आरएसपी के रंजीत वर्मा के नेतृत्व में सैकड़ों
वामपंथियों ने कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन कर ज्ञापन दिया. गोरखपुर में सीपीआई और
सीपीएम के कार्यकर्ताओं ने गांधी प्रतिमा पर धरना दिया जिसमें महिलाओं की भी अच्छी
भागीदारी थी. देवरिया में जिला मुख्यालय और सलेमपुर तहसील पर धरने दिए गए. कासगंज
और एटा में भी भाकपा और माकपा कार्यकर्ताओं ने कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन किये.
कुशीनगर में भाकपा और माकपा के कार्यकर्ताओं ने जिला मुख्यालय पर जोरदार
प्रदर्शन किया. हरदोई में भी जिला मुख्यालय पर धरना दिया गया. इटावा में माकपा ने
मुकुट सिंह के नेतृत्व में कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन कर ज्ञापन सौंपा. बुलंदशहर में
जिला मुख्यालय पर माकपा ने तो भाकपा ने स्याना में प्रदर्शन किया. कानपूर में
माकपा और भाकपा कार्यकर्ताओं ने बड़े चौराहे से कलेक्ट्रेट तक जुलूस निकाल कर
ज्ञापन सौंपा. जनपद जालौन के जिला मुख्यालय उरई में गत दिन ही भाकपा द्वारा
प्रदर्शन किया जाचुका है.
राजधानी लखनऊ में भाकपा, माकपा और भाकपा- माले के सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने एक
शानदार जुलुस माकपा कार्यालय से निकाला जो विधानसभा मार्ग, हजरतगंज चौराहा होते
हुए शक्ति भवन पहुंचा. वहां भीषण नारेबाजी और सभा के बाद ज्ञापन विद्युत् अधिकारी
को सौंपा गया. सभा को आशा मिश्र, मो. खालिक, कांती मिश्र, परमानन्द द्विवेदी, मो.
अकरम, कल्पना पाण्डेय, प्रदीप शर्मा, आर.एस. बाजपेयी, सीमा राना, नंदिनी बोरकर तथा
रमेश सिंह सेंगर आदि ने संबोधित किया.
बांदा में भाकपा और माले ने अशोक लाट चौराहे पर धरना दिया और सभा की. सभा को
राम चन्द्र सरस, रामधारी भाई, वकार अहमद, श्यामबाबू तिवारी तथा राम प्रवेश ने
संवोधित किया. चित्रकूट में जनपद और तहसील मुख्यालयों पर अमित यादव के नेतृत्व में
प्रदर्शन किये गए. सभाओं को राम प्रसाद, विनोद पाल और संदीप पांडे आदि ने संवोधित
किया.
जौनपुर में भाकपा, माकपा और एसयूसीआई
ने पोलिटेक्निक चौराहे से कलेक्ट्रेट तक जुलूस निकला और आम सभा की. सभा को
कल्पनाथ गुप्ता, सालिग्राम पटेल, सुभाष पटेल, आर. आर. यादव, सत्यनारायण पटेल, ऊदल
यादव, किरणशंकर रघुवंशी तथा रविशंकर मौर्या ने संबोधित किया. गोंडा में भाकपा के
सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने जिला मुख्यालय पर धरना दिया, आम सभा की और ज्ञापन दिया.
भाकपा के सुरेश त्रिपाठी, दीनानाथ त्रिपाठी, रघुनाथ, माकपा के राजीव तथा माले के
जमाल ने संबोधित किया. बरेली में भी भाकपा ने ज्ञापन सौंपा.
वामपंथी दलों का कहना है कि बिजली के दामों में हुयी इस वृध्दि से महंगाई में
और अधिक वृध्दि होगी और पहले से भारी तबाही झेल रहे किसान और तवाह होंगे. किसानों
गरीबों और आम जनता पर बढ़ोत्तरी थोपना और उद्योगपतियों को छूट देना योगी सरकार के
दोगले चरित्र को उजागर करता है. वामदलों ने आज इन प्रदर्शनों के माध्यम से जनता के
आक्रोश को दर्ज करा दिया है और यह आन्दोलन आगे भी जारी रहेगा. वामदलों के नेताओं
ने इस आन्दोलन कजो सफल बनाने के लिए वामपंथी कार्यकर्ताओं और आम जनता को बधाई दी
है.
जारी द्वारा-
डा. गिरीश, राज्य सचिव
सोमवार, 11 दिसंबर 2017
at 1:38 pm | 0 comments |
नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टियों की जीत पर भाकपा ने दी बधाई
लखनऊ- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य कौंसिल की दो दिवसीय बैठक यहां भाकपा राज्य
मुख्यालय पर संपन्न हुयी, बैठक की अध्यक्षता भाकपा के वरिष्ठ नेता कामरेड नसीम
अंसारी ने की.
बैठक में अंतर्राष्ट्रीय,
राष्ट्रीय और उत्तर प्रदेश के राजनैतिक हालातों पर एक विस्तृत रिपोर्ट राज्य सचिव
डा. गिरीश ने प्रस्तुत की जिस पर हुयी व्यापक चर्चा में 30 प्रतिनिधियों ने भाग
लिया.
अंतर्राष्ट्रीय जगत पर हुयी
चर्चा में प्रतिनिधियों ने नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टियों की एकतरफा जीत पर भारी
खुशी का इजहार किया और नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टियों के नेताओं कार्यकर्ताओं और
आम जनता को बधाई दी. ऐसे समय जब कार्पोरेटी ताकतें, उनकी पिट्ठू सरकार और मीडिया
कम्युनिस्ट पार्टियों और कम्युनिस्टों की समाप्ति की घोषणा करते नहीं थकते उस समय
नेपाल में कम्युनिस्टों की भारी जीत भारत समेत तमाम दुनियां के शोषितों- पीड़ितों
को उनकी मुक्ति के प्रति भरोसा जताता है. नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टियों की यह
एकता भारत में कम्युनिस्ट और वामपंथी एकता के प्रति प्रेरित करती है.
बैठक में अमेरिका द्वारा
येरुशलम को इजरायल की राजधानी के रूप में मान्यता देने और वहां दूतावास स्थापित
करने के कदम की कड़े शब्दों में निंदा की. अमेरिका का यह कदम प्रभुत्ववादी है जिससे
उस क्षेत्र में तनाव बढ़ रहा है और शांति स्थापित करने की प्रक्रिया बाधित हुयी है.
यह कदम स्वयं अमेरिका की पूर्व की स्थिति के विपरीत है और यूरोपियन यूनियन के
देशों सहित अनेक देशों ने इसकी आलोचना की है. भारत की हमेशा यह दृढ राय रही है कि
फिलिस्तीन की समस्या का हल बातचीत के जरिये निकाला जाना चाहिए, अतएव भारत सरकार को
तत्काल अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करनी चाहिये, बैठक में पारित प्रस्ताव में कहा गया
है.
राज्य काउंसिल बैठक में
पारित रिपोर्ट में कहा गया है कि केन्द्र और उत्तर प्रदेश सरकार पूरी तरह जनता के
हितों की उपेक्षा कर रही हैं और और पूंजीपति वर्ग, खास कर कार्पोरेट घरानों को
मजबूत कर रही हैं. इन सरकारों की नीतियों के परिणामस्वरूप अर्थव्यवस्था में गिरावट
आयी है, निर्यात में कमी आयी है, बेरोजगारी बढ़ी है, भ्रष्टाचार के तमाम मामले
सामने आरहे हैं, किसानों की हालत बदतर होरही है, दलितों अल्पसंख्यकों और अन्य सभी
कमजोरों पर हमले बढ़ रहे हैं. भाजपा द्वारा किये गए तमाम वायदे आज जुमले साबित
होचुके हैं.
उत्तर प्रदेश में भी योगी
सरकार के आठ माह के शासनकाल में अपराधों ने पैर पसारे हैं. बलात्कार, सामूहिक
बलात्कार और बलात्कार के बाद हत्याओं का सिलसिला थमने का नाम नहीं लेरहा. राजधानी
लखनऊ तक में आये दिन होरही बलात्कार की घटनायें राज्य सरकार के दाबों की कलई खोल
रही हैं. सरकारी विभागों और पुलिस विभाग के भ्रष्टाचार ने आम लोगों को परेशान कर
रखा है. दबंगई और गुंडई से जनता बदहाल है और पुलिस- प्रशासन नत- मस्तक है.
भाजपा की इन नीतियों के
चलते जनता का उससे मोहभंग हुआ है. अपनी करतूतों और असफलताओं से जनता का ध्यान हठाने को भाजपा और संघ परिवार
संवेदनशील मुद्दों को हवा देता रहता है. ये भाजपा की विफलताओं का ही परिणाम है कि
हाल में देश में हुए कई उपचुनावों में भाजपा की करारी हर हुयी है. उत्तर प्रदेश
निकायों में भी नगर निगमों में अधिक सीट जीतने के अलाबा अन्य सभी जगहों पर हर
तरीके से भाजपा को पराजय का मुहँ देखना पड़ा है. सरकार की असफलताओं से आक्रोशित
जनता के तमाम हिस्से आंदोलनरत हैं और सडकों पर उतर रहे हैं.
भाकपा राज्य कौंसिल ने इस
दरम्यान की गयी अपनी तमाम गतिविधियों की समीक्षा की और आगे के अभियानों की रूपरेखा
तैयार की. निकाय चुनावों में भाकपा ने सीमित तौर पर भाग लिया. पार्टी बांदा जनपद
की अतर्रा नगरपालिका परिषद् के अध्यक्ष पद पर सम्मानजनक मतों से विजयी हुयी हुयी
है और सात सभासद के पद हासिल करने में कामयाब रही है. पार्टी के एक दर्जन से अधिक
सभासद और एक नगर पंचायत अध्यक्ष और भी निर्वाचित हुए हैं जिनको सिम्बल नहीं दिया
जसका था.
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा
बिजली की दरों में की गयी अप्रत्याशित वृध्दि के खिलाफ अन्य वामपंथी दलों के साथ
मिल कर कल- 12 से 19 दिसंबर तक जनाभियान चलाने और 20 दिसंबर को जिला मुख्यालयों पर
प्रदर्शन करने का निश्चय किया है. जन अभियान के तहत सभाएं नुक्कड़ सभायें और जनता
चौपाल लगाने का आह्वान किया गया.
26 जनवरी को संविधान,
लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की रक्षा दिवस मनाने का निर्णय किया गया.
भाकपा का हर तीन वर्ष बाद
होने वाला राज्य सम्मेलन 16 से 18 मार्च 2018 को जनपद मऊ में आयोजित होगा. सभी
जिला सम्मलेन 15 फरवरी तक पूरे कर लिए जायेंगे.
डा. गिरीश
बुधवार, 6 दिसंबर 2017
at 5:39 pm | 0 comments |
बाबरी मस्जिद ध्वंस की वरसी पर वाम दलों ने उत्तर प्रदेश में काला दिवस आयोजित किया
लखनऊ- 6 दिसंबर बाबरी
मस्जिद की 25 वीं शहादत और डा. भीमराव अंबेडकर के परिनिर्वाण दिवस पर वामदलों ने
आज समूचे प्रदेश में कला दिवस मनाया. इस अवसर पर धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र की
रक्षा और दलितों अल्पसंख्यकों और शोषितों की सुरक्षा के संकल्प के साथ धरने,
प्रदर्शन और सभायें की गयीं तथा जिलाधिकारियों के माध्यम से महामहिम राष्ट्रपति को
संवोधित ज्ञापन प्रेषित किये गये.
राजधानी लखनऊ में भाकपा,
माकपा, भाकपा- (माले), एसयुसीआई- सी और फारवर्ड ब्लाक ने हजरतगंज स्थित डा.
अंबेडकर प्रतिमा के समक्ष प्रदर्शन और सभा की. मथुरा में वामदलों ने जिलाधिकारी कार्यालय
पर प्रदर्शन किया. सोनभद्र में राबर्ट्सगंज जिला मुख्यालय पर धरना दिया गया तो
इलाहाबाद में गोष्ठी और धरना डिया गया. फरुखाबाद में फरुखाबाद जिला मुख्यालय और
कायमगंज तहसील दोनों ही जगह कला दिवस मनाया गया. बदायू में भाकपने कई संगठनों के
साथ प्रदर्शन किया तो बलिया और अलीगढ़ में काली पट्टियां बाँध कर विरोध जताया गया.
समाचार लिखते वक्त भी राज्य मुख्यालय पर वामदलों द्वारा जिलों
में आयोजित किये गए विरोध प्रदर्शनों की लगातार रिपोर्टें मिल रही हैं.
डा. गिरीश
शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017
at 2:16 pm | 0 comments |
बिजली दरों में बढ़ोत्तरी की भाकपा ने निन्दा की: जिला इकाइयों को विरोध प्रदर्शन का दिया निर्देश
लखनऊ- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी
के राज्य सचिव मंडल ने बिजली के दामों में बेतहाशा बढ़ोत्तरी की कठोर शब्दों में
निंदा की. पार्टी ने जनहित में इस बढ़ोत्तरी को तत्काल वापस लेने की मांग की.
यहाँ जारी एक प्रेस बयान
में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि निकाय चुनावों में भोले- भाले
मतदाताओं से वोट हथिया लेने के बाद भाजपा सरकार ने उन्हें महंगी बिजली का तोहफा
दिया है. आम लोग जब नए साल का जश्न मना कर चुके होंगे तब उनके हाथों में नये और बढे
हुये बिजली बिल का बधाई पत्र होगा. यह ऐसी बढ़ोत्तरी है जो हर वर्ग, हर तबके पर
थोपी गयी है. शहरी और ग्रामीण गरीब हों या किसान सभी को निशाना बनाया गया है. इससे
पहले से ही आसमान छूरही महंगाई और भी बड़ेगी और आम जनता का जीवन और भी कठिन
होजायेगा.
भाकपा राज्य सचिव ने आरोप
लगाया कि भाजपा सरकार के आठ माह के कार्यकाल में बिजली के उत्पादन, वितरण और उसकी उपलब्धता
की दर में कोई सुधार नहीं आया और वह पिछली सरकारों से भी पिछड़ गयी है. लेकिन बहुमत
के नशे में चूर सरकार अपनी अक्षमता का भार आम जनता के ऊपर लाद रही है. यह सब जनता
की बर्दाश्त की सीमा से बाहर जारहा है.
भाकपा राज्य सचिव मंडल ने
अपनी जिला इकाइयों से अपील की है कि वे इस बढोत्तरी का पुरजोर विरोध करें. लगातार
विरोध प्रदर्शन संगठित करें और इनमें वामपंथी जनवादी दलों और शक्तियों का साथ लें.
डा. गिरीश
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