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शनिवार, 19 जनवरी 2019
at 11:32 am | 0 comments |
Matter for Pamphlate
( 5 फरबरी 2019 को जिला मुख्यालयों पर होने वाले
आंदोलन के पर्चे का प्रारूप )
झूठी नाकारा और झांसेबाज़ सरकार को जगाने को 5
फरबरी 2019 को जिला मुख्यालय चलो
किसानों कामगारों महिलाओं और सभी कमजोरों की आवाज
बुलंद करने को भाकपा का प्रदर्शन
भाइयो और बहिनो,
केन्द्र और प्रदेश की झूठी, नाकारा और झांसेबाज़ सरकारों के कारनामों से हर तबका परेशान है। सरकार की
गोधन नीति से तो किसान ही नहीं हर आदमी परेशान है। आवारा पशुओं के झुंड किसानों की
फसल को नष्ट कर रहे हैं। पीड़ित किसान भीषण सर्दी में ठिठुरते हुये फसलों की रखवाली
कर रहे हैं। खूंख्वार सांड उन पर हमले बोल रहे हैं। हर दिन किसी न किसी के मारे
जाने या घायल होने की खबरें मिल रही हैं। किसान जब उन्हें पकड़ कर बंद करते हैं तो उन
पर मुकदमे दर्ज किये जारहे हैं। कई जगह इन पशुओं को लेकर किसानों में आपसी झगड़े भी
होराहे हैं। सरकार और संघियों द्वारा नियंत्रित पशुशालायें धन के दोहन का जरिया
बनी हुयी हैं। वहाँ से गायों/ बछड़ों को भगा दिया जाता है या फिर चारा पानी नहीं
दिया जाता। वे भूख से तड़प तड़प कर मर रहे हैं। भाजपाई और संघी गोभक्तों का चोगा पहन
कर पशु व्यापारियों को प्रताड़ित कर रहे हैं और पुलिस से मिल कर उनसे धन वसूल रहे
हैं। इनमें से शायद ही कोई हो जो गाय को पालता हो।
दूसरे किसान कामगार भी बेहद परेशान हैं। खुद
मुख्यमंत्री ने 14 दिन के भीतर गन्ने के बकाए का मय ब्याज के भुगतान कराने अथवा
मिल मालिकों के खिलाफ मुकदमे लिखे जाने का वायदा किया था। लेकिन पुराने बकाये का
भुगतान तो दूर नए बकाये और होगये। पहले धान बाजरा की फसलों की उचित कीमतें न मिलने
से परेशान किसान अब आलू आदि की कीमतों में गिरावट का खामियाजा भुगत रहा है। ग्रामीण
नौजवानो और मजदूरों को रोजगार देने वाली मनरेगा को पर्याप्त धन न मिलने से वह दम
तोड़ रही है। धन के अभाव में लोग बच्चों की फीस तक नहीं देपारहे और कई तो परेशान हो
आत्महत्याएं कर रहे हैं। सरकार ने बिजली के दाम बड़ा दिये और भुगतान करने में असमर्थ
लोगों के कनेक्सन काटे जारहे हैं। उनके खिलाफ मुकदमे दर्ज किये जराहे हैं।
ये सरकार रामराज लाने का सपना दिखा कर सत्ता में
आयी थी पर प्रदेश में अपराधों की बाड़ ने लोगों को परेशान कर दिया है। हर तरह के
अपराध चरम पर हैं। पर सबसे बड़ी दुर्दशा बहू बेटियों की है। प्रतिदिन उनके साथ
बलात्कार और सामूहिक बलात्कार की दिल दहलाने वाली घटनायेँ होरही हैं। कई की हत्या
कर दी जाती है तो कई सिस्टम से तंग आकर आत्महत्यायें कर रही हैं। यह योगी सरकार के
माथे पर कलंक है। दलितों अल्पसंख्यकों पर भी तमाम तरह के अत्याचार होरहे हैं।
सरकारी योजनायेँ भ्रष्टाचार की भेंट चड़ चुकीं हैं तो पुलिस प्रशासन में खुल कर
भ्रष्टाचार होरहा है। आम आदमी तवाह बरवाद होरहा है।
रोजगार घट रहे हैं। साढ़े चार लाख स्थान केन्द्रीय सेवाओं
में तो 40 लाख राज्यों की सेवाओं में खाली पड़े हैं जिन्हें भरा नहीं जारहा।
भर्तियों में धांधली के चलते भर्ती प्रक्रियाएं बाधित होरही हैं। रोजगार देने के नाम
पर सामान्य आरक्षण का झुनझुना पकड़ा दिया जिनके नए नियम बनाने तक भर्ती प्रक्रिया रुकी
रहेगी। फिर चुनावी आचार संहिता लग जायेगी तो भर्तियाँ भी रुक जाएंगी। हर तरह से
युवाओं पर ही गाज गिर रही है। दो करोड़ को रोजगार देने का वायदा पकौड़े तलने की
नसीहत में बदल गया। किसानों की आमदनी दो गुना होना तो दूर वे पुनः कर्ज के जाल में
फंस गये। कालाधन कम होने के बजाय और भी बड़ गया। सरकार की नीतियों- नोटबंदी, जीएसटी और खनन प्रक्रिया के भ्रष्टाचार में डूबे रहने से मजदूर मिस्त्री
आदि बेकार बैठे हैं। ऊपर से महंगाई सबके लिए डायन बनी हुयी है। पेट्रोल डीजल रसोई
गैस जैसी जरूरी चीजें बेहद महंगी हैं। डालर के मुक़ाबले रुपये की कीमत का असर हर
चीज पर पड़ रहा है। घपले घोटालों में तो पिछली सरकारों के रिकार्ड को ही तोड़ दिया।
जनता की इन सभी संगीन परेशानियों की फिक्र न तो
केन्द्र सरकार को है और न उत्तर प्रदेश सरकार को। पूरे 5 साल उन्होने राम मंदिर
गंगा गाय की थोथी गाथा गाते ही गुजार दिये। अब कह रहे हैं कि मंदिर 2025 में बनेगा।
चुनावों में फिर से वे कुछ थोथे नारे लेकर आयेंगे और आप सभी को छलने की दोबारा
कोशिश करेंगे। आप सभी को इनके इस छल से सावधान रहना होगा।
उपरयुक्त जनता की प्रमुख समस्याओं को लेकर भारतीय
कम्युनिस्ट पार्टी ने उत्तर प्रदेश भर में जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन करने का
निर्णय लिया है। हम अपने इस जनपद में भी 5 फरबरी को जिला मुख्यालय पर प्रदर्शन/
धरना आयोजित करने जारहे हैं। आपसे अनुरोध है कि आप भी शामिल हों।
निवेदक
जिला काउंसिल
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी जनपद-
………………………….
सोमवार, 14 जनवरी 2019
at 5:35 pm | 0 comments |
CPI will work for unity of left, democratic and secular forces to defeat BJP in next parliament election of U.P.
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य कार्यकारिणी ने आगामी लोकसभा चुनावों में आरएसएस एवं उसके द्वारा नियंत्रित भाजपा को हराने को वामपंथी, लोकतान्त्रिक एवं धर्मनिरपेक्ष शक्तियों की एकता स्थापित करने पर बल दिया है.
यहाँ दो दिनों तक चली पार्टी की राज्य कार्यकारिणी की बैठक में इस तथ्य को
शिद्दत से रेखांकित किया कि गत साढ़े चार सालों में किसानों, कामगारों, नौजवानों,
छात्रों, महिलाओं और अन्य कमजोर तबकों के ज्वलंत सवालों पर वामपंथी दलों ने ही सडकों
पर उतर कर संघर्ष किया है. देश के कई भागों और राजधानी दिल्ली में किसानों के बडे
बड़े जमावडों और 8 एवं 9 जनवरी की श्रमिक वर्ग की देशव्यापी हड़तालों में भी लाल
झंडों की रहनुमाई को सारे देश ने खुली आँखों से देखा है.
उत्तर प्रदेश सहित देश के अन्य भागों में कई और मोर्चों पर भी संघर्ष हुए हैं.
जहाँ भी भाजपा और संघ ने अपनी फासीवादी हिन्दुत्ववादी राजनीति का हमला बोला है,
उसका वैचारिक जबाव भी भाकपा और वामपंथ ने दिया है. भाजपा अध्यक्ष द्वारा दीगयी
वैचारिक युध्द की चुनौती का जबाव भी वामपंथ ही दे सकता है. भाकपा राज्य
कार्यकारिणी का यह स्पष्ट मत है कि कोई सुस्पष्ट विचारधारा से रहित गठजोड़ संघ और
भाजपा को चुनौती नहीं देसकता. अतएव किसी ऐसे गठजोड़ जिसमें कि भाकपा और वामपंथ की
मौजूदगी न हो से भाजपा और संघ को हराने की कल्पना भी नहीं की जासकती.
भाकपा राज्य कार्यकारिणी का यह भी मत है कि भाजपा के खिलाफ जमीनी स्तर पर लोग लामबंद
होरहे हैं. वे भाजपा को हराना चाहते हैं. पर वे एक समूचे विपक्ष की एकता देखना
चाहते हैं. दुर्भाग्य है कि कुछ लोगों की वजह से ऐसा नहीं होसका. उत्तर प्रदेश में
भाजपा/ आरएसएस के विरुध्द संघर्ष राष्ट्रीय संघर्ष का हिस्सा है जिसे वामपंथी
लोकतान्त्रिक एवं धर्मनिरपेक्ष शक्तियों के गठजोड़ से ही आगे बढ़ाया जा सकता है.
अतएव भाकपा ऐसी सभी ताकतों को एकजुट करने का प्रयास करेगी.
भाकपा राज्य कार्यकारिणी ने आवारा पशुओं से किसानों की फसल की बरवादी और
जनहानि, महिलाओं के साथ बदसलूकी की बढ़ती घटनाओं एवं यूपी की चरमराई कानून व्यवस्था,
गन्ना/ आलू उत्पादक किसानों की बदहाली, कर्जमाफी, महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार
आदि सभी सवालों पर आगामी 5 फरबरी को जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन करने का निर्णय भी
लिया है. इसके अलाबा कई क्षेत्रीय रैलियां/ सभाएं भी आयोजित की जायेंगीं.
बैठक में भाकपा के केन्द्रीय सचिव का. अतुल अंजान ने भी विचार रखे. राज्य सचिव
डा. गिरीश ने राजनैतिक रिपोर्ट पेश की. अध्यक्षता का. कल्पनाथ गुप्ता ने की. का.
अर्विन्दराज स्वरूप, अशोक मिश्र, सदरुद्दीन राना, सुधीर अवस्थी, गफ्फार अब्बास,
रामचंद ' सरस', रामरक्षा, नसीम अंसारी, दीनानाथ सिंह, शिरोमन राजपूत, शरीफ अहमद,
अजय सिंह, हामिद अली, राजेन्द्र यादव, राजेश तिवारी, फूलचंद यादव एवं मोतीलाल ने
विचार व्यक्त किये.
डा. गिरीश
at 5:29 pm | 0 comments |
Press Note of Cpi Central
New Delhi,
January 14, 2019
Press
Release
The National Secretariat of the Communist Party of India
issued the following statement on January 14, 2019:
The National Secretariat of the Communist Party of India has
condemned the action of police to submit a charge sheet after 1000 days and to
falsely implicate Kanhaiya Kumar the ex-president of JNU. This is politically
motivated action by police to please the masters and has been done keeping
coming Lok Sabha election in mind. This is how the present government is
subverting the authority to serve its political need. We are confident that
people will see this game and defeat the designs of government.
(Roykutty)
Office Secretary
गुरुवार, 10 जनवरी 2019
at 1:36 pm | 0 comments |
प्रधानमंत्री की सभाओं में होरहा है सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग और भ्रष्टाचार: भाकपा उत्तर प्रदेश
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की उत्तर प्रदेश राज्य इकाई ने आरोप लगाया है कि कल प्रधानमंत्री की आगरा में हुयी चुनाव सभा की इमारत पूरी तरह से सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार के ढांचे पर टिकी थी जिसकी कि अविलंब जांच किए जाने की जरूरत है।
भाकपा के राज्य सचिव डा॰ गिरीश ने उपर्युक्त आरोप यहां
जारी एक प्रेस बयान में लगाया है।
उन्होने कहाकि प्रधानमंत्री जी आगरा में आम सभा के मंच
से जब सारी मर्यादायें भुला कर विपक्ष पर बौखलाहट निकाल रहे थे और अपने को चौकीदार
साबित करने को- “ चौकीदार जागता है, चौकीदार सामने खड़ा
है, पूरी ईमानदारी के साथ खड़ा है” जैसे जुमले उछाल रहे थे तो
वे भूल गये कि जिस सभा को वे संबोधित कर रहे हैं उसका लहीम- सहीम खर्चा और साधन शासकीय
मशीनरी के बल पर भारी भ्रष्टाचार के जरिये जुटाये गये हैं।
डा॰ गिरीश ने आरोप लगाया कि सभा में भीड़ लाने को जो
वाहन लाये गये वे सब प्रशासन ने जुटाये। आगरा सहित आसपास के तमाम जिलों जहां से भीड़
लायी जानी थी सर्दी का बहाना बना कर स्कूलों की कहीं दो दिन तो कहीं तीन दिनों की छुट्टी
करा दी गयी और बच्चों को स्कूल लाने लेजाने वाली बसों को जबरिया भीड़ लेजाने को जुटाया
गया। परिवहन संबंधी विभाग और पुलिस प्रशासन ने अन्य अनेक वाहनों की भी व्यवस्था की।
इतना ही नहीं रैली स्थल की व्यापक व्यवस्थाओं – मंच, शामियाना, कुर्सियों आदि की व्यवस्था के लिये सरकारी
विभागों से कमीशन और हेरा फेरी वाला धन जुटाया गया और छोटे बड़े जन प्रतिनिधियों के
माध्यम से भीड़ के लिये भोजन और दिहाड़ी देने को रकम इकट्ठा की गयी। अंततः मोदीजी की
इस हुंकार का सारा भार जनता के कंधों पर ही आन पड़ा। उन्होने कहाकि उत्तर प्रदेश में
भाजपा की सरकार बनने के बाद से चौकीदार की जहां भी सभाएं आयोजित की गईं हैं, उसका खर्चा इसी पवित्र क्रिया से जुटाया गया है।
यह चरित्र और नैतिकता की दुहाई देने वालों के गाल पर
कडा तमाचा है। लेकिन लोकतांत्रिक मूल्यों का यह तकाजा है कि इसकी जांच होनी चाहिये।
डा॰ गिरीश ने कहाकि शासक दल ने अभी से घोषणाओं, लोकार्पण और शिलान्यासों
के नाम पर ख़र्चीले आयोजनों के जरिये चुनाव अभियान छेड़ दिया है और इसमें बड़े पैमाने
पर शासकीय मशीनरी का दुरुपयोग कर कदाचार किया जारहा है। आज यह स्पष्ट होगया कि अपने
को कामकाजी बताने वाले प्रधानमंत्री ने आखिर लोकपाल की नियुक्ति क्यों नहीं की।
डा॰ गिरीश ने कहाकि इतने बड़े लोकतन्त्र में आखिर कोई
तो होगा जो भाजपा के इस भ्रष्टाचार का संग्यान ले और कड़ी कार्यवाही करे। राष्ट्रपति, निर्वाचन आयोग, सीबीआई, ईडी अथवा
सतर्कता आयोग किसी को तो आगे आना चाहिये ताकि लोकतन्त्र पर जनता का भरोसा बना रहे।
और नहीं तो संसदीय समिति के जरिये ही इस सब की जांच कराके सच्चाई को उजागर किया जाना
चाहिए। अन्यथा भाकपा इस सवाल को जनता की अदालत में लेजाएगी।
डा॰ गिरीश
शुक्रवार, 28 दिसंबर 2018
at 7:37 pm | 0 comments |
Press Note of CPI, U.P.
नोएडा में नमाज पर दुर्भावना
से लगाई पाबंदी निरस्त की जाये: भाकपा
लखनऊ- 28 दिसंबर 2018, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, उत्तर प्रदेश के राज्य सचिव
मंडल ने नोएडा प्रशासन द्वारा सार्वजनिक स्थलों पर नमाज अदा करने पर लगाई पाबंदी को
पूरी तरह अनुचित बताया है। कल ही केन्द्र सरकार ने लोकसभा में तीन तलाक रोकने के नाम
पर एक ऐसा बिल पास कराया जिसका मुस्लिम महिलाओं के हितों से दूर दूर तक कोई रिश्ता
नहीं। भाकपा ने भाजपा की केन्द्र और उत्तर प्रदेश की सरकारों पर आरोप लगाया कि वे वोटों
के ध्रुवीकरण के लिए अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ एकतरफा युध्द छेड़े हुये है।
सभी जानते हैं कि नोएडा प्रशासन ने अनुमति न होने के
नाम पर पार्कों व अन्य सार्वजनिक स्थलों पर नमाज पड़े जाने पर रोक लगादी है। इतना ही
नहीं प्रशासन ने नमाज रोकने के नाम पर पार्क में पानी भर दिया। लेकिन उत्तर प्रदेश
की सरकार बिना किसी अनुमति के तमाम पार्कों में आरएसएस की शाखाएं लगाने की छूट दिये
हुये है। जबकि नमाज एक धार्मिक क्रिया है जबकि संघ की शाखाओं में विद्वेष और हिसा फैलाने
का वैचारिक आधार तैयार किया जाता है। गत दिनों तो इन शाखाओं में सुप्रीम कोर्ट के विरोध
में समूह गान गाया जारहा था। सुबह पार्कों में शुध्द वातावरण की तलाश में आने वाले
लोगों को संघ की इन देशविरोधी संविधान विरोधी गतिविधियों से ठेस पहुंचती है। अतएव संघ
की शाखाओं को सार्वजनिक स्थल पर लगाने से रोका जाना चाहिए।
भाकपा राज्य सचिव डा॰ गिरीश ने महामहिम राष्ट्रपति महोदय
और उत्तर प्रदेश के राज्य पाल से अपील की है कि वे हस्तक्षेप करें और नोएडा प्रशासन
की इस कार्यवाही को निरस्त करायें।
डा॰ गिरीश
गुरुवार, 27 दिसंबर 2018
at 7:37 pm | 0 comments |
बिखराव की ओर एनडीए और टूट की ओर भाजपा
अपने घनघोर कट्टरपंथी एजेंडे को जनता पर जबरिया थोपने, 2014 के लोकसभा चुनावों में मतदाताओं से किये
वायदों से पूरी तरह मुकरने और काम करने की जगह थोथी बयानबाजी के
चलते राष्ट्रीय
जनतान्त्रिक गठबंधन (एनडीए) और भाजपा के प्रति जनता में भारी आक्रोश पैदा हुआ है।
हाल ही में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा की करारी हार और पिछले दिनों हुये लोकसभा
और विधानसभा की सीटों के उपचुनावों में उसकी उल्लेखनीय पराजय ने आग में घी का काम किया है। यही वजह है कि आज एनडीए बिखर रहा है
और भाजपा कण कण करके टूट रही है। हालात ये हैं कि 2019 के चुनाव आते आते एनडीए के ध्वंसावशेष ही
दिखेंगे और
भाजपा 2014 के पूर्व की स्थिति में पहुँच जायेगी।
तेलगू देशम पार्टी ने तो एनडीए को पहले ही तलाक देदिया था तो आतंकवाद से निपटने में असफलता के चलते बदनामी
झेल रही भाजपा ने जम्मू कश्मीर में पीडीपी से खुद ही हाथ छुड़ा लिया। अब एनडीए के आधा दर्जन से अधिक घटक दल खुल कर विद्रोह पथ पर हैं तो अन्य कई के अंदर अंदर आग सुलग रही है। उनका धैर्य
कब जबाव दे जाएगा और विलगाव के स्वर कब फूट पड़ेंगे कहा नहीं जासकता।
यूपी के फूलपुर और गोरखपुर
के लोकसभा उपचुनावों से शुरू हुयी और कैराना में परवान चढ़ी विपक्षी एकता ने ऐसा ज़ोर पकड़ा कि साल का अन्त
आते आते एनडीए के विखराव की आधारशिला तैयार होगयी। इन चुनावों में सपा,
बसपा और रालोद ने वामपंथी दलों के सहयोग से तीनों प्रतिष्ठापूर्ण सीटें जीत लीं।
इस जीत ने विपक्ष और जनता में आत्मविश्वास जगाया कि भाजपा को हराया जासकता है। तीन
हिन्दी भाषी राज्यों की सत्ता भाजपा के हाथ से निकल जाने पर तो यह आत्मविश्वास
हिलोरें लेने लगा। सत्तापक्ष की हताशा के चलते एक के बाद एक सहयोगी दल के असंतोष
से एनडीए दरकने लगा। भाजपा एक मजबूत पार्टी से मजबूर पार्टी की स्थिति में आगयी।
इससे भाजपा कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा और असुरक्षा की भावना के चलते भाजपा से भी
लोग किनारा करने लगे।
बिहार की राष्ट्रीय लोक समता
पार्टी साढ़े चार साल तक सत्ता में साथ निभाने के बाद एनडीए को छोड़ कर संप्रग का
हिस्सा बन गयी। उसने आरोप लगाया कि मोदी सरकार ने पिछड़ों और गरीबों के लिये कोई
काम नहीं किया।
कार्पोरेट्स नियंत्रित आज
की राजनीति में विचार और सिध्दांत की जगह चुनावों में जीत हार और सत्ता प्राप्ति
की संभावना पार्टियों के बीच हाथ मिलाने का आधार बनते हैं। जब तक ये संभावनायें
भाजपा के पास थीं, पार्टियों का प्रवाह भाजपा की ओर था। 2014 में
मोदी लहर में जिनको जीत और सत्ता दिख रही थी वे भाजपा के साथ आये,
उनको लाभ मिला। पर आज हालात बदल गये हैं और इस प्रवाह की दिशा भी उलट चुकी है।
केन्द्र सरकार के शासन के
साड़े चार सालों में दलितों के साथ भारी अन्याय हुआ है। इससे वे उद्वेलित और
आंदोलित हैं। इससे विचलित बिहार के दुसाधों के आधार वाली पार्टी लोजपा भी असुरक्षित
समझने लगी। उसके नेताओं ने ताबड़तोड़ बयानबाजी कर भाजपा को बैक फुट पर लादिया। गत
लोकसभा चुनावों में बिहार में 30 सीटें लड़ कर 22 सीटें जीतने वाली भाजपा को मात्र
17 सीटों पर संतोष करना पड़ा। उसे जीती हुयी पांच सीटों की कुर्बानी लोजपा और जदयू
के लिये करनी पड़ी। एक राज्यसभा सीट भी लोजपा को देनी पड़ी।
राजनीति के पर्यवेक्षक अभी
भी इसे स्थायी समाधान नहीं, “पैच अप” मान रहे हैं। यदि भाजपा ने साख बचाने की
गरज से मंदिर निर्माण के लिये अध्यादेश लाने की कोशिश की तो दोनों की राहें जुदा
होसकतीं हैं। क्योंकि दोनों के जनाधार के समक्ष मंदिर नहीं,
किसान- कामगारों की दयनीय स्थिति का मुद्दा प्रमुख है। नीतीश कुमार की भी यही स्थिति
है। वे कह भी चुके हैं कि राम मंदिर का मुद्दा सहमति या अदालत से हल होगा।
महाराष्ट्र में भाजपा की
पुश्तैनी सहयोगी रही शिवसेना भी आँखें तरेर रही है। वह लगातार भाजपा को कठघरे में
खड़ा कर रही है। इसके सुप्रीमो उद्धव ठाकरे ने तो यहाँ तक कह डाला कि 'दिन
बदल रहे हैं, चौकीदार ही अब चोरी कर रहे हैं।'
उद्धव राफेल विमान सौदे में घोटाले को उजागर करने की मांग भी जोरदारी से कर रहे
हैं।
सुभासपा के नेता और योगी
सरकार में काबीना मंत्री श्री ओमप्रकाश राजभर राज्य सरकार के गठन के दिन से ही उस
पर खुले हमले बोल रहे हैं। सुभासपा ने अब भाजपा के केंद्रीय नेत्रत्व पर भी
हल्ला बोल दिया है। वह आरक्षण को तीन
भागों में बांटने की मांग को लेकर धरना प्रदर्शन कर रही है। भाजपा की हिम्मत नहीं
कि उसे बाहर का रास्ता दिखा सके।
जातीय और क्षेत्रीय पहचान तथा सामाजिक न्याय के
प्रश्न पर क्षेत्रीय पार्टियों का अभ्युदय हुआ था। भाजपा और संघ का हिन्दुत्वनामी
कट्टरपंथ क्षेत्रीय दलों की आकांक्षाओं को रौंद रहा है। अतएव एनडीए के घटक अपना दल
को भी अपना अस्तित्व खतरे में नजर आरहा है। इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष ने प्रदेश
सरकार पर सम्मान न देने का आरोप लगाया। उन्होने कहाकि ‘मौजूदा हालात में सोचना पड़ेगा कि जहां सम्मान न हो,
स्वाभिमान न हो, वहां क्यों रहें?’
उन्होने केन्द्र में राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल की अनदेखी का आरोप भी लगाया और सभी
विकल्प खुले रखने का संकेत दिया। उल्लेखनीय है कि अपना दल ने पांच साल में यह पहला
बड़ा हमला बोला है।
पंजाब में अकाली दल ने आँखें दिखाना शुरू कर दीं
हैं तो तमिलनाड्डु में भाजपा खोखली होचुकी एआईएडीएमके की बैसाखियों पर निर्भर है।
पूर्वोत्तर में विपरीतधर्मी पार्टियों के साथ हनीमून के दौर से गुजर रही भाजपा से
उनका कब तलाक होजायेगा कोई नहीं जानता।
एनडीए ही नहीं 2019 में पुनर्वास की चिन्ता में डूबी
भाजपा भी आंतरिक विघटन की पीड़ा से गुजर रही है। एक एक कर सहयोगी दल भाजपा से छिटक
रहे हैं। इससे भाजपा में छटपटाहट है। कर्नाटक में जीत के जादुयी आंकड़े से दूर रही
भाजपा के पांच राज्यों में चुनावी हार से कार्यकर्ताओं का मनोबल और भी टूटा है। वे
अब मोदी के करिश्मे और संघ की दानवी ताकत पर भरोसा नहीं कर पारहे हैं। हार की
ज़िम्मेदारी तय न करने पर भी सवाल उठ रहे हैं। श्री नितिन गडकरी ने इशारों इशारों
में नरेन्द्र मोदी और अमितशाह पर सवाल उठाया कि ‘सफलता के
कई पिता होते हैं पर असफलता अनाथ होती है। कामयाब होने पर उसका श्रेय लेने को कई
लोग दौड़े चले आते हैं, पर नाकाम होने पर लोग एक दूसरे पर
अंगुलियां उठाते हैं।‘
जहाज डूबने को होता है तो चूहे भी उसे छोड़ कर भागने
लगते हैं। पाला बदलने का दौर शुरू होगया है। हर दिन किसी न किसी भाजपाई के पार्टी
छोड़ने की खबरें अखबारों की सुर्खियां बन रही हैं। 40 से 50
फीसदी सांसदों की टिकिटें काटने की भाजपा की योजना है। टिकिट गँवाने वाले ये सांसद
क्या गुल खिलायेंगे, सहज अनुमान लगाया जासकता है।
कार्पोरेट्स को लाभ पहुंचाने और किसान कामगारों की
उपेक्षा के चलते समस्याओं का अंबार लग गया है और पीड़ित तबके उनसे जूझ रहे हैं। हाल
ही में देश के कई भागों और राजधानी में किसानों ने बड़ी संख्या में एकत्रित हो
हुंकार भरी है। देश के व्यापकतम मजदूर तबके 8 व 9 जनवरी को हड़ताल पर जाने वाले
हैं। शिक्षक, बैंक कर्मी, व्यापारी, दलित, पिछड़े और महिलाएं सभी आंदोलनरत हैं। जमीनी
स्तर पर वंचित और उपेक्षित तबकों की हलचल जिस तेजी से बड़ रही है उसी तेजी से संघ
और भाजपा की बेचैनी बड़ रही है। स्थिति यहां तक पहुंच गयी है कि साढ़े चार साल में
पहली बार भाजपा नेताओं की सभाओं में लोग प्रतिरोध जता रहे हैं। एक ओर लोग ‘मन्दिर नहीं तो वोट नहीं’ जैसे नारे लगा रहे हैं तो
दूसरी ओर महंगाई भ्रष्टाचार और बेरोजगारी से आजिज़ युवक सभाओं में पत्थर फेंक रहे
हैं।
दशहरे पर अपने भाषण में मन्दिर राग छेड़ने वाले संघ प्रमुख
पांच राज्यों के चुनाव परिणामों से उसकी निस्सारिता को समझ चुके हैं। परन्तु अन्य
कोई विकल्प सामने न देख संघ “मन्दिर शरणम गच्छामि” के उद्घोष
को मजबूर है। गंगा, गाय, नामों के बदलने
और मूर्तियों के निर्माण से भी हानि की भरपाई हो नहीं पारही है। ऐसे में न्यायालय
से मन्दिर- मस्जिद प्रकरण पर जल्द फैसला आता न देख विश्वसनीयता की रक्षा के लिए केन्द्र
सरकार मन्दिर निर्माण के लिये अध्यादेश ला सकती है।
इस अध्यादेश का हश्र क्या होगा यह तो वक्त ही
बताएगा पर बचे- खुचे एनडीए को खंड खंड करने और भाजपा के विघटन के लिये यह काफी
होगा । भाजपा के गैर संघी लोगों को अब यह राह स्वीकार्य नहीं।
डा॰ गिरीश
27- 12- 2018
बुधवार, 12 दिसंबर 2018
at 1:34 pm | 0 comments |
बुलंदशहर की घटना के असली मुजरिमों को बचाने में जुटी है उत्तर प्रदेश सरकार और उसके मातहत मशीनरी
लखनऊ- उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जनपद में 3 दिसंबर
को हुये अराजकता के नाच को जिसमें कि एक कर्तव्यनिष्ठ पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या
और एक तमाशवीन युवक की दर्दनाक मौत हुयी, के दस दिन बीतने
के बाद भी पुलिस और प्रशासन इस पर से रहस्य की चादर हठा नहीं पारहे हैं। उलटे
पुलिस और प्रशासन के रवैये से लग रहा है कि वह येन केन प्रकारेण असली अपराधियों जो
कि स्पष्टतः संघ गिरोह से संबन्धित हैं, को क्लीन चिट देकर
कुछ निर्दोषों और तमाशवीनों को बलि का बकरा बना रहे हैं।
ज्ञातव्य होकि जनपद बुलन्दशहर की स्याना कोतवाली के
अंतर्गत महाव गांव के एक किसान के गन्ने के खेत में कुछ म्रत पशुओं के अवशेष खेत
मालिक को 3 दिसंबर को सुबह पड़े मिले थे। किसान ने इसकी सूचना स्याना पुलिस को दी
तो वह घटनास्थल पर पहुंची और उपस्थित ग्रामीणों को रिपोर्ट लिख कर उचित कार्यवाही
करने का आश्वासन भी दिया। ग्रामीण इससे संतुष्ट भी होगये। पर सुनियोजित उद्देश्यों
के लिये हिंसा भड़काने को उतारू संघ गिरोह को यह मंजूर नहीं था।
अतएव बजरंगदल के जिलाध्यक्ष और भाजपा के दूसरे
आंगिक संगठनों ने वहाँ कथित गोकशी की अफवाहें फैला कर कई गांवों की भीड़ इकट्ठी कर
ली। वे म्रत पशुओं के अवशेष एक ट्रेक्टर में डाल कर पुलिस चौकी चिंगरावटी पर ले आए
और वहां जाम लगा दिया। संघियों ने अपने उत्तेजक बयानों और नारे बाजी से भीड़ को उकसाया
और पथराव शुरू होगया। इस बीच पुलिस को बल प्रयोग भी करना पड़ा। बेहद दुखद है कि
संघियों द्वारा लगाई इस आग के चलते स्याना कोतवाली के इंचार्ज की ह्त्या कर दी गयी
और एक स्थानीय युवक सुमित भी मारा गया।
ज्यों ज्यों समय व्यतीत होरहा है घटना की परतें और
साजिशें सामने आती जारही हैं। बुलंदशर में घटना के कई दिनों पहले से मुस्लिमों का
इज़्तजा चल रहा था जिसमें कि अल्पसंख्यकों की भारी भीड़ जुटी थी। पश्चिमी उत्तर
प्रदेश को हिंसा की आग में झौंकने के लिये संघ गिरोह ने इसे एक नायाब मौका समझा।
उन्होने ग्रामीण क्षेत्रों में अफवाहें फैलायीं कि मुस्लिमों के समारोह में आए
लोगों को गोमांस परोसने के लिये बड़े पैमाने पर गायें काटी जारही हैं। लेकिन आम
जनता सच्चाई जानती थी और वह टस से मस नहीं हुयी। उलटे कई ग्रामों में गैर
मुस्लिमों ने मुस्लिम समारोह में आये अल्पसंख्यकों को नमाज पढ़ने के लिये मंदिरों
और अपने आवासों में जगह दी। इससे संघी बौखला गये।
अपनी साज़िशों को अंजाम देने के लिये संघियों ने
पशुओं की खाल उतारने वाले मजदूरों से गन्ने के खेत में म्रत पशुओं के अंग गिरवा
दिये और बिना जांच के ही कुछ गरीब मुस्लिमों को गिरफ्तार करने को दबाव बनाया। पर
पुलिस इंस्पेक्टर स्याना बिना जांच किए गिरफ्तारी करने को तैयार नहीं थे।
इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह दादरी के अखलाक हत्याकांड की जांच से भी जुड़े थे और
उन्हें लगातार धमकियाँ भी मिल रहीं थीं।
अब जनता के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या
संघियों ने एक तीर से कई निशाने साधने की साजिश की थी? क्या उनका उद्देश्य छत्तीसगड और मध्य प्रदेश के चुनावों में भाजपा की
दुर्गति की खबरों के बीच राजस्थान चुनाव से पहले ध्रुवीकरण को अंजाम देने की साजिश
रची थी? अथवा लोकसभा चुनावों से पहले पूर्व की भांति पश्चिमी उत्तर प्रदेश को फिर से हिंसा और हिंसा
के जरिये विभाजन पैदा करने का कोई महाषडयंत्र था?
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि पुलिस इंस्पेक्टर की
हत्या ने संघियों के मंसूबे पर पानी फेर दिया। इस हिंसा से पुलिसकर्मियों और आम
जनता के बीच योगी सरकार और संघ गिरोह के विरोध में जबर्दस्त गुस्सा था जिसकी
चिनगारियों से संघ गिरोह के पंख झुलसते नजर आये। अब कई किस्म की जाँचें बैठा दी
गईं हैं। संघ गिरोह के लोगों को बचाने के प्रयास जारी हैं। एक फौजी को हत्यारा
साबित करने की कवायद चल रही है। डीजीपी सहित तमाम आला अधिकारी पहले तो संघ परिवार
का नाम लेने से बचते रहे और अब संघ परिवार को क्लीन चिट देने को तत्पर जान पड़ते
हैं। पर अब इसका फैसला जनता की अदालत में
होना बाकी है, भले ही कार्यपालिका मामले पर कितनी ही लीपापोती
क्यों न कर दे।
भारतीय
कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मण्डल ने उसी दिन हुयी उस घटना पर गहरा दुख और
आक्रोश व्यक्त किया था। एक प्रेस बयान में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने आरोप लगाया
था कि समूची घटना के पीछे भाजपा, बजरंग दल और आरएसएस के
समर्थकों की साजिश है जो 2019 के चुनावों से पहले दंगा भड़काने, समाज को बांटने और कानून व्यवस्था को भंग करने पर उतारू हैं।
भाकपा का आरोप है कि जनता के बीच पूरी तरह बेनकाब
होचुके संघ और भाजपा अब सांप्रदायिक उन्माद पैदा करने पर उतारू हैं। जगह जगह
गोहत्या का नाटक खड़ा कर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जारहा है। धर्मसभा, कमल यात्रा और अन्य कई तरीकों से उन्माद और भय पैदा किया जारहा है।
लोकसभा चुनावों से पहले ऐसी तमाम वारदातों को अंजाम देने की साजिश है। कुत्सित
राजनैतिक उद्देश्यों से पश्चिमी उत्तर प्रदेश को मुजफ्फरनगर की तरह फिर से दंगों
की आग में झौंकने का षडयंत्र है।
भाकपा ने कहाकि
योगीजी यूपी में रामराज्य की बातें करते रहे हैं लेकिन वो रामराज्य तो दूर दूर तक
नहीं दिखाई देरहा। अब तक उनकी गैर कानूनी सेनाएं अल्पसंख्यकों, दलितों और कमजोरों पर हमले बोल रही थीं, अब उनके
निशाने पर पुलिस भी आगयी है। योगीजी और भाजपा को इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिये।
भाकपा ने यह भी कहाकि माननीय उच्च न्यायालय को
स्वतः संग्यान लेकर जांच के लिये गठित टीमों की जांच पर निगरानी रखनी चाहिये क्योंकि सत्ता
के दबाव में जांच को हत्याकांड से हठा कर कथित गोकशी की ओर मोड़ा जासकता है और संघ
गिरोह को क्लीन चिट दी जासकती है। भाकपा
ने लावारिश गायों और सांडों को बाड़ों में बंद करने की मांग भी की है जो न केवल किसानों
की फसलें उजाड़ रहें अपितु तमाम लोगों की
जानें भी लेरहे हैं।
भाकपा ने प्रदेश की जनता से अपील की है कि वह
प्रदेश को दंगों और विभाजन की आग में झौंकने की भाजपा और संघ की साजिश से सावधान
रहें और हर कीमत पर शान्ति बनाए रखें। भाकपा ने शहीद इंस्पेक्टर और म्रतक ग्रामीण
के परिवारों को न्याय दिये जाने की मांग भी की है।
डा॰ गिरीश
सोमवार, 3 दिसंबर 2018
at 7:06 pm | 0 comments |
CPI on Bulandashahar carnage
बुलन्दशहर की त्रासद घटना संघ और भाजपा की साजिश का
परिणाम
यूपी में रामराज्य कहाँ है बतायें योगी: भाकपा
लखनऊ- 3 दिसंबर 2018, भारतीय कम्युनिस्ट
पार्टी के राज्य सचिव मण्डल ने आज जनपद बुलन्दशहर की स्याना कोतवाली के अंतर्गत हुयी
उस घटना पर गहरा दुख और आक्रोश व्यक्त किया है जिसमें एक पुलिस इंस्पेक्टर और एक ग्रामीण
की हत्या होगयी।
यहां जारी एक प्रेस बयान में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी
के राज्य सचिव डा॰ गिरीश ने आरोप लगाया कि समूची घटना के पीछे भाजपा, बजरंग दल और आरएसएस के समर्थकों की साजिश है जो 2019 के चुनावों से पहले दंगा
भड़काने, समाज को बांटने और कानून व्यवस्था को भंग करने पर उतारू
हैं।
भाकपा का आरोप है कि जनता के बीच पूरी तरह बेनकाब होचुके
संघ और भाजपा अब सांप्रदायिक उन्माद पैदा करने पर उतारू हैं। जगह जगह गोहत्या का नाटक
खड़ा कर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जारहा है। धर्मसभा, कमल यात्रा और अन्य कई तरीकों से उन्माद और भय पैदा किया जारहा है। 6 दिसंबर
से पहले ऐसी तमाम वारदातों को अंजाम देने की साजिश है। कुत्सित राजनैतिक उद्देश्यों
से पश्चिमी उत्तर प्रदेश को मुजफ्फरनगर की तरह फिर से दंगों की आग में झौंका जासकता
है।
डा॰ गिरीश ने कहाकि योगीजी यूपी में रामराज्य की बातें
करते रहे हैं लेकिन वो रामराज्य तो दूर दूर तक नहीं दिखाई देरहा। अब तक उनकी गैर कानूनी
सेनाएं अल्पसंख्यकों, दलितों और कमजोरों पर हमले बोल रही
थीं, अब उनके निशाने पर पुलिस भी आगयी है। योगीजी और भाजपा को
इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिये।
भाकपा राज्य सचिव ने कहाकि माननीय उच्च न्यायालय को
स्वतः संग्यान लेकर जांच के लिये गठित एसआईटी की जांच पर निगरानी रखनी चाहिये क्योंकि
सत्ता के दबाव में जांच को हत्याकांड से हठा कर कथित गोकशी की ओर मोड़ा जासकता है। भाकपा
ने लावारिश गायों और सांडों को बाड़ों में बंद करने की मांग भी की है जो न केवल फसलें
उजाड़ रहें अपितु लोगों की जानें भी लेरहे हैं।
भाकपा ने प्रदेश की जनता से अपील की है कि वह प्रदेश
को दंगों और विभाजन की आग में झौंकने की भाजपा और संघ की साजिश से सावधान रहें और हर
कीमत पर शान्ति बनाए रखें। भाकपा ने शहीद इंस्पेक्टर और म्रतक ग्रामीण के परिवारों
को न्याय दिये जाने की मांग भी की है।
डा॰ गिरीश
शुक्रवार, 30 नवंबर 2018
at 9:06 am | 0 comments |
Mr. Modee Must Go: Farmers Gathered in Delhi.
किसानों के हालात भले न बदलें सरकार जरूर बदल देगा
किसानों का आक्रोश
नई दिल्ली- अखिल भारतीय किसान सभा सहित देश के लगभग
दो सौ किसान संगठनों के बैनर तले बड़ी संख्या में यहाँ रामलीला मैदान में पहुँच चुके
हैं। कल चार अलग अलग दिशाओं से किसानों ने रामलीला ग्राउंड तक पैदल मार्च किया। आज
वे रामलीला ग्राउंड से संसद जाने की तैयारी में हैं जहां वे अपनी खुली संसद आयोजित
कर अपनी व्यथा प्रकट करेंगे।
मौसम की दुश्वारियों और यात्रा की कठिनाइयों को झेलते
हुये ये किसान यूं ही दिल्ली नहीं पहुंचे हैं। इसके पीछे उनकी वह महापीड़ा छिपी है जो
उन्हें पूंजीवादी दलों की सरकारों खास कर इन साढ़े चार साल में मोदी सरकार ने दी है।
वर्ष दर वर्ष अपनी बदहाली और कंगाली से झूझते किसान फांसी के फंदे पर झूलते रहे और
राजसत्तायेँ अट्टहास करती रहीं।
अपने चुनाव अभियान में मोदी ने किसानों के कर्जे माफी
और उनकी आमद दो गुना करने का वायदा किया था, लेकिन सरकार ने किसानों
के प्रति वही धोखाधड़ी का रवैया अपनाया जिसे की वह अन्य तबकों के लिए अपनाती रही है।
उन्होने भाजपा और मोदी पर बड़ा भरोसा किया था और उन्हें भारी बहुमत से सत्ता सौंपी थी। लेकिन आमदनी दोगुना करना तो दूर वे और भी बदहाली
के गर्त में धकेल दिये गए।
अतएव आज वे मांग कर रहे हैं कि उनकी आमदनी डेढ़ गुना
करने का बिल संसद में पास किया जाये और एक बार उन्हें सारे कर्जों से मुक्त किया जाये।
वे स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करने की मांग भी कर रहे हैं जिसके बारे में सरकार
और भाजपा भ्रम फैला रही है कि उसे तो लागू कर दिया गया। इसके अलाबा तमाम क्षेत्रीय
समस्याएँ भी हैं। कहीं गन्ने का उन्हे भुगतान नहीं मिला तो कहीं चीनीं मिलें नहीं चलीं।
कहीं धान, बाजरा, आलू प्याज का मूल्य नहीं मिला तो महंगे डीजल, बिजली और फर्तीलाइजर्स ने उनकी कमर तोड़ रखी है। अनेक ऐसे सवाल हैं जो उनके
आक्रोश को बड़ा रहे हैं और उन्हें खींच कर दिल्ली ले आए हैं।
एक तरफ उनमें इस सरकार के प्रति गहरा गुस्सा है तो दूसरी
ओर अपनी अभूतपूर्व एकता पर भारी उत्साह है। यह गुस्सा और उत्साह भले ही उनके हालात
न बदले लेकिन मौजूदा सरकार को जरूर बदल देगा। देखना है सरकार उनके प्रति सहानुभूति
का रवैया अपनाती है या फिर उन्हें कोरे आश्वासन और झूठे दाबों से टरकाती है। पर इतना
तय है कि किसानों का यह सैलाब अब किसी झूठ को और सहने को तैयार नहीं।
डा। गिरीश,
रविवार, 18 नवंबर 2018
at 5:34 pm | 0 comments |
जनता के आम हितों से किनाराकशी भाजपा को महंगी पड़ेगी : भाकपा
लखनऊ- 18 नवंबर: भारतीय कम्युनिस्ट
पार्टी की राज्य काउंसिल की बैठक यहां मथुरा के वरिष्ठ नेता कामरेड गफ्फार अब्बास एडवोकेट
की अध्यक्षता में संपन्न हुयी।
बैठक में देश और प्रदेश के मौजूदा हालात पर राज्य सचिव
डा॰ गिरीश ने एक व्यापक समीक्षा रिपोर्ट प्रस्तुत की जिस पर 20 साथियों ने चर्चा में
भाग लिया। बैठक में कार्यक्रम एवं संगठन संबंधी कई महत्वपूर्ण निर्णय लिये गये।
डा॰ गिरीश ने कहाकि केन्द्र और उत्तर प्रदेश की सरकार
हर मोर्चे पर विफल होचुकी हैं। चुनावों के समय भाजपा ने जनता से जो भी वायदे किये उनमें
से एक भी पूरा नहीं किया गया। इन सरकारों की अकर्मण्यता और अहमन्यता ने सारे रिकार्ड
तोड़ दिये हैं। परिणामस्वरूप बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार और कमजोर तबकों पर अत्याचार की मार से लोग कराह उठे हैं। रुपये
की कीमत में अभूतपूर्व गिरावट सरकार कथित कुशलता की कलई खोलने को काफी है। इसका नतीजा
है कि सरकार का जनाधार बुरी तरह खिसका है। यही वजह है कि देश भर में हाल में हुये कई
उपचुनावों में भाजपा को भारी पराजय का मुख देखना पड़ा है।
डा॰ गिरीश ने कहाकि पांच राज्यों की विधान सभाओं के
चुनावों और लोकसभा चुनावों में संभावित पराजय
के भय से समूचे संघ परिवार ने विभाजनकारी और सांप्रदायिक एजेंडों पर पूरी ताकत झोंक
दी है। सत्ता के चार सालों में मंदिर निर्माण पर पूरी खामोशी ओड़े रही भाजपा और संघ
गिरोह ने अब मंदिर निर्माण का बेसुरा राग छेड़ दिया है। शहरों के ऐतिहासिक लोकप्रिय
नामों को भी जबरिया बदला जारहा है। इस नाम परिवर्तन की सनक पर जनता का भारी मात्रा
में धन व्यय किया जारहा है। गंगा को स्वच्छ बनाने के नाम पर ये गंगाभक्त बड़ी धनराशि
डकार गये और गंगा की हालत आज भी जैसी की तैसी बनी हुयी है। इनकी गोवंश रक्षा नीति ने आवारा पशुओं के विशाल
झुंड पैदा कर दिये हैं जो किसानों की फसल उजाड़ रहे हैं और लोगों की जानें लेरहे हैं।
समूची जनता त्राहि त्राहि कर रही है।
अतएव जनता की आँखों में धूल झोंकने की गरज से और एक
क्षत्र तानाशाही लादने के उद्देश्य से सर्वोच्च न्यायालय को निशाना बनाया जारहा है।
यह देश लोकतन्त्र और संविधान के लिये बहुत ही घातक है। वोट और सत्ता की भूख ने उन्हें
अंधा बना दिया है। मोदी, योगी, भागवत और
उनके अन्य सभी नेता अनापशनाप झूठ वमन कर रहे हैं और गोदी मीडिया तटस्थता का चोला दूर
फेंक उनके कीर्तन में लगा है। लेकिन भाकपा की राय है कि ये न 1989 है न 1992, जबकि देश की जनता को उन्होने बरगला लिया था। जनहितों से किनारा कर भ्रामक
एजेंडे पर काम करना उनके लिये उलटा पड़ने वाला है, डा॰ गिरीश ने
कहा।
इन चुनौतियों से निपटने को भाकपा ने वामपंथी दलों के
साथ मिल कर व्यापक जन चेतना निर्मित करने को अभियान चलाने पर ज़ोर दिया। 3 से 6 दिसंबर
के बीच जिलों जिलों में “संविधान, धर्मनिरपेक्षता एवं लोकतन्त्र
के समक्ष चुनौतियां” विषय पर विचार गोष्ठियाँ एवं सभा आदि आयोजित की जायेंगी। भारत
की कम्युनिस्ट पार्टी ( मार्क्सवादी ) से इस मुद्दे पर सहमति बन चुकी है। अन्य वामपंथी
दलों से भी चर्चा की जाएगी।
भाकपा ने अपने जिला स्तरीय नेताओं को राजनैतिक प्रशिक्षण
देने हेतु एक चार दिवसीय शिविर आयोजित करने का निर्णय भी लिया। यह शिविर 6 से 9 दिसंबर
के बीच बदायूं में होगा। इसमें जिला सचिव और सहसचिवों को भाग लेना है।
भाकपा राज्य कार्यकारिणी ने 29 और 30 दिसंबर को दिल्ली
में होने वाले देश के किसानों के संयुक्त आंदोलन को समर्थन प्रदान किया है और ज्यादा
से ज्यादा किसान साथियों से दिल्ली पहुँचने की अपील की है।
बैठक में पार्टी की लोकसभा चुनावों की तैयारी पर भी
चर्चा हुयी। भाकपा प्रदेश में 10 सीटें लड़ने की योजना पर कार्य कर रही है।
डा॰ गिरीश, राज्य सचिव
मंगलवार, 6 नवंबर 2018
at 1:42 pm | 0 comments |
हाथरस और हरदोई हादसों पर भाकपा ने गहरा दुख जताया
लखनऊ- 6 नवंबर
2018, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी उत्तर प्रदेश के राज्य सचिव डा॰ गिरीश ने कल हरदोई
जनपद में रेल हादसे में चार मजदूरों की मौत और हाथरस में पुलिस द्वारा विकलांग दलित
की हत्या पर गहरा दुख और क्षोभ प्रकट किया है। डा॰ गिरीश ने प्रत्येक म्रतक के परिवार
को रुपये 20- 20 लाख का मुआबजा तथा परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने की मांग की है।
यहाँ जारी एक प्रेस बयान में डा॰ गिरीश ने कहाकि भाजपा
शासन में प्रशासनिक लापरवाही और अत्याचारों की सारी हदें टूट गयी हैं। एक माह में ही
केवल उत्तर प्रदेश की सीमा के अंतर्गत कई बड़े रेल हादसे हुये जिनमें दर्जनों लोग जान
से हाथ धो बैठे। अपराधों और सड़क हादसों में भी हर रोज तमाम लोग मारे जारहे हैं। योगी
की पुलिस अब रक्षक नहीं भक्षक का काम कर रही है। इसका सीधा कारण है कि केंद्र और राज्य
की सरकारें हरी कीर्तन में व्यस्त व्यस्त हैं, शासन प्रशासन पर उनका
कतई ध्यान नहीं है।
उन्होने कहाकि इससे बड़ी बिडंबना क्या होगी कि कल हाथरस
में पुलिस ने ठेला लगाकर जीवनयापन करने वाले विकलांग दलित युवक से धौंस मांगी और न
देपाने पर पीट पीट कर उसकी हत्या कर दी। भारी जन दबाव के चलते हत्यारे दरोगा के खिलाफ
एफआईआर दर्ज हुयी है लेकिन अभी उसकी गिरफ्तारी किया जाना जरूरी है। साथ ही म्रतक परिवार
को वो सभी सुविधायें और पावनायें दी जानी चाहिये जो कि लखनऊ में पुलिस द्वारा मारे
गये श्री तिवारी के परिवार को दी गईं थीं, डा॰ गिरीश ने मांग
की है।
डा॰ गिरीश, राज्य सचिव
भाकपा , उत्तर प्रदेश
शनिवार, 3 नवंबर 2018
at 1:41 pm | 0 comments |
न्यायिक सक्रियता, संघ की बौखलाहट और मन्दिर राग
अदालतों के हाल के कुछ निर्णयों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक
संघ, उसके आनुसांगिक संगठनों खासकर भाजपा की बौखलाहट निरंतर बढ़ती जारही है। इस
बौखलाहट के चलते एक ओर वह सर्वोच्च न्यायालय पर हमलावर हुये हैं वहीं उन सबने अयोध्या
में मन्दिर निर्माण का कीर्तन पुनः तेज कर दिया है। सारी सीमायें लांघ कर सर्वोच्च
न्यायालय पर जिस भौंडे ढंग से हमले किये जारहे हैं वे देश और लोकतान्त्रिक समाज के
लिये बेहद चिंता का सबब बनते जारहे हैं। अंततः ये हमले हमारी लोकतान्त्रिक प्रणाली
और संविधान के ऊपर हैं।
इसी बीच संघ, विश्व हिन्दू
परिषद और संघ के तमाम सहोदरों ने चार साल की हैरान करने वाली चुप्पी को तोड़ते हुये
अयोध्या में मन्दिर आंदोलन को धार देना शुरू कर दिया है। अब बात यहां तक पहुंच गयी
है कि अध्यादेश लाकर और कानून बना कर मन्दिर बनाने की मांग की जारही है। यह मांग
किसी और ने नहीं विजयादशमी पर अपने परंपरागत भाषण में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने
स्वयं की। नाटकीयता की हद यह है कि सरकार का नियंता संघ अपनी ही सरकार से मांग
करने का अभिनय कर रहा है।
लेकिन महामुख
के खुलते ही दसों मुख खुल गये हैं। कथित विहिप और संत समाज तो पहले ही अभियान की
रूपरेखा तैयार कर चुके थे अब गिरराज किशोर और सुब्रह्मण्यम स्वामी सरीखे भाजपा के
वाचाल भी सक्रिय होगये हैं। एक दो नहीं संवैधानिक पदों पर बैठे कोई दर्जन भर
दुर्मुख एक ही भाषा बोल रहे हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने
तो यहां तक कह डाला कि मन्दिर निर्माण तो जारी है। उप मुख्यमंत्री केशव मौर्य ने
कहाकि 2019 से पहले ही मन्दिर का निर्माण अवश्य होगा भले ही उसके लिये कानून बनाना
पड़े। राम भक्त दर्शाने की होड़ मची है। तोगड़िया और शिवसेना प्रमुख देखने में भले ही
अलग दिखाई देते हों पर उनका मन्दिर राग भाजपा और संघ के लिये आधार तैयार करने वाला
ही नजर आरहा है।
केरल के सबरीमाला मन्दिर के मामले में सर्वोच्च
न्यायालय द्वारा सभी स्त्रियों के प्रवेश के निर्णय पर संघ और भाजपा ने सारी
सीमायें लांघ कर अपनी फौजें सड़कों पर उतार दीं। इतना ही नहीं भाजपा अध्यक्ष अमित
शाह ने सर्वोच्च न्यायालय को खुल्लमखुला नसीहत दे डाली कि सर्वोच्च न्यायालय को
ऐसे निर्णय नहीं देने चाहिये जो जनता की आस्था के विपरीत हों और जिन्हें लागू नहीं
किया जासके। यह सर्वोच्च न्यायालय की सर्वोच्चता और हमारे संविधान पर खुला हमला है
जिसके तहत व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की
सर्वोच्चता स्थापित की गयी है। इस प्रकरण ने संघ और भाजपा के नारी सम्मान और स्वातंत्र्य
के प्रति ढोंग को भी उजागर कर दिया। एक केन्द्रीय महिला मन्त्री ने तो बेहद फूहड़ बयान
देकर नारी की निजता पर घ्रणित हमला बोला।
ऐसा नहीं कि भाजपा ऐसा पहली बार कर रही है। वह ऐसा
बार- बार और लगातार करती आयी है। आस्था और श्रध्दा उसके राजनीतिक कवच- कुंडल हैं। इन्हीं
की आड़ में इस समूह ने 6 दिसंबर 1992 को राष्ट्रीय एकता परिषद को दिये अपने वचन और
सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की धज्जियां बिखेरते हुये अयोध्या के विवादित
ढांचे को ही ज़मींदोज़ कर दिया था।
सर्वोच्च न्यायालय पर संघ परिवार का ताज़ा हमला उसके
अधीन विचारधीन अयोध्या विवाद की सुनवाई जनवरी 2019 में शुरू करने के फैसले को लेकर
है। संघ भली प्रकार जानता है कि 29 अक्तूबर को सक्षम बेंच के अभाव में सुनवाई संभव
नहीं थी और एक सक्षम बेंच के गठन के लिये भी वक्त चाहिये होता है। लेकिन संघ को तो
राजनीति करनी थी। पहले कहा गया कि यह सब कांग्रेस के दबाव में किया जारहा है। जब
यह पटाखा फुस्स होगया तो कहा जाने लगाकि सर्वोच्च न्यायालय करोड़ों हिंदुओं की
भावना से खिलवाड़ न करे। यह सर्वोच्च न्यायालय को खुली धमकी है जो अपने वोट बैंक को
बरगलाने के लिये की जारही है।
सर्वोच्च न्यायालय ही नहीं तमाम स्वायत्त संस्थाओं
को भी संघ परिवार तहस नहस कर रहा है। निर्वाचन आयोग, सीबीआई, सीवीसी और अब रिजर्व बैंक को निशाने पर लिया गया है।
संघ और भाजपा की इस बौखलाहट और कारगुजारियों के
लिये पर्याप्त कारण भी हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा और मोदीजी द्वारा
जनता को तमाम सब्जबाग दिखाये गये थे। आज उनकी कलई पूरी तरह खुल गयी है। दो करोड़
नौजवानों को हर वर्ष रोजगार देने का वायदा अब उन्हें पकौड़े तलने की नसीहत में बदल
गया है। किसानों की आमदनी दोगुनी करने, विदेशों से
कालाधन वापस लाकर हर खाते में रुपये- 15 लाख पहुंचाने,
आतंकवाद की रीड़ तोड़ने, पाकिस्तान की आँखों में आँखें डाल कर
बात करने जैसे झांसे और “न खाऊँगा न खाने दूंगा” जैसी कसमें सभी तार- तार होचुके
हैं। भाजपा स्वयं इन्हें चुनावी जुमला बता चुकी है।
नोटबंदी और जीएसटी लागू करने के दुष्परिणाम सभी के
सामने हैं। पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों में
अभूतपूर्व व्रध्दी और कमरतोड़ महंगाई, अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार
में रुपये की निरंतर गिरती कीमत और भ्रष्टाचार के मोर्चे पर मोदी सरकार की विफलता
ने भाजपा के पैरों तले से जमीन खिसका दी है। राफेल विमान सौदे में सीधे
प्रधानमंत्री की लिप्तता ने डूबते जहाज की पैंदी में एक और छेद कर दिया। इसे भाजपा
भी समझ रही है और संघ भी। विकास, स्वच्छता अभियान और विदेशों
में छवि निर्माण के ढोंग भी परवान नहीं चड़ सके। सरदार पटेल की विशाल प्रतिमा पर चढ़
कर फायदा उठाने का मंसूबा आरएसएस के बारे में सरदार पटेल के स्पष्ट विचारों ने
धराशायी कर दिया।
हाल के कुछ न्यायिक फैसलों ने भी संघ और भाजपा की
कथनी करनी और दोगलेपन को उजागर किया है। सबरीमाला मन्दिर में सभी आयु की महिलाओं
के प्रवेश, शहरी नक्सल के नाम पर गिरफ्तार बुध्दिजीवियों
की गिरफ्तारी के मामले को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विचार के लिये स्वीकार करना, सीबीआई प्रकरण पर सर्वोच्च न्यायालय की सक्रियता,
दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा 31 वर्ष पुराने हाशिमपुरा मामले में दोषियों को आजीवन
कारावास की सजा सुनाना और उत्तर प्रदेश में 68,500 शिक्षकों
की भर्ती में हुये घोटाले की इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा सीबीआई से जांच के
आदेश पारित करना आदि तमाम मामले हैं जो भाजपा, संघ और उनकी
सरकारों की कारगुजारियों को बेनकाब करते हैं।
इन सब से बौखलाया संघ परिवार मन्दिर मुद्दे की
सुनवाई को जनवरी तक बढ़ाए जाने को कुटिलता से आस्था का प्रश्न बना कर सर्वोच्च
न्यायालय पर हमले बोल रहा है। हर तरफ से घिरे और पूरी तरह बेनकाब संघ के सामने
“मन्दिर शरणम गच्छामि” के अलाबा कोई रास्ता नहीं है। अतएव अध्यादेश लाकर अथवा
कानून बना कर मन्दिर बनाने की आवाजें तेज हो गईं हैं। मोहन भागवत और भाजपा अध्यक्ष
अमित शाह के बीच हुई गुफ्तगू भी इसी उद्देश्य से है। संघ के महासचिव ने 1992 जैसा आंदोलन
छेड़ने की धमकी दी है। यह साख बचाने और चेहरा छिपाने की कवायद भी होसकती हैं।
अब देखना यह है कि क्या संघ के निर्देशों का पालन
करते हुये केन्द्र सरकार संसद के शीतकालीन सत्र से पहले मन्दिर निर्माण के लिये
अध्यादेश लाएगी? या फिर संसद में कोई बिल लाकर यह जताने का
प्रयास करेगी कि वह तो मन्दिर निर्माण के लिये प्रतिबध्द है। लेकिन इस बिल के अधर
में लटक जाने के पर्याप्त कारण मौजूद हैं। पर भाजपा को लोगों को भ्रमित करने का
बहाना तो मिल ही जाएगा। कानूनी पेंच यह भी है कि अयोध्या के विवादित भूखंड का
अदालती निर्णय आने से पहले वहाँ कोई निर्माण संभव नहीं है। भाजपा और संघ यह भली
प्रकार जानते हैं। अतएव मन्दिर राग अलापना उनकी मजबूरी है तो न्यायपालिका को धमकाना
उनकी राजनैतिक जरूरत। इसे वे निरंतर जारी रखेंगे भले ही देश के लोकतान्त्रिक ढांचे
को कितनी ही क्षति क्यों न उठानी पड़े।
डा॰ गिरीश
गुरुवार, 1 नवंबर 2018
at 5:20 pm | 0 comments |
CPI on Hashimpura
हाशिमपुरा पर न्यायपालिका का फैसला संवैधानिक मूल्यों
के प्रति उम्मीद जगाने वाला है
भाकपा ने फैसले का किया स्वागत
लखनऊ- 1 नवंबर 2018, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, उत्तर प्रदेश के राज्य
सचिव मंडल ने 31 वर्ष पुराने मेरठ के हाशिमपुरा जनसंहार के दोषी 16 पीएसी कर्मियों को आजीवन
कारावास की सजा के फैसले का स्वागत किया है। ऐसे समय में जब उत्तर प्रदेश और देश में
कई संगीन मामलों के पीड़ित न्याय की आस लगाये बैठे हैं, इस फैसले ने उनमें न्याय के लिये नई उम्मीद
जगाई है। भाकपा ने पीड़ितों की हानि की विकरालता को देखते हुये उन्हें पर्याप्त मुआबजे
की मांग भी की है।
यहां जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा॰
गिरीश ने कहाकि अभी मोब लिंचिंग, सांप्रदायिक दंगों और नरसंहार, बम ब्लास्ट, फर्जी मुठभेड़ें और जेनयू के छात्र नजीब
के लापता होने के कई मामले जांच और न्यायिक प्रक्रिया से गुजर रहे हैं। देर से ही मगर
दुरुस्त आये इस फैसले ने जहां पीड़ित वर्ग में न्याय की उम्मीद जागी है वहीं आस्था, धर्म, जातीय और सांप्रदायिक विद्वेष से लथपथ ताकतों
को म्यान में रहने का संदेश दिया है। यह प्रशासनिक मशीनरी और उन सुरक्षा बलों के लिये
भी एक सबक है जो घ्रणा और हिंसा की राजनीति करने वालों के हाथों की कठपुतली बन कर भक्षक
बन जाते हैं।
यह फैसला इसलिये भी महत्वपूर्ण है कि अल्पसंख्यकवाद
और तुष्टीकरण का हौवा खड़ा करने वाली भाजपा और आरएसएस जैसी ताकतों को भी यह कठघरे में
खड़ा करता है। ये ताक़तें अल्पसंख्यकों की रक्षा हेतु आवाज उठाने वाली ताकतों पर अल्पसंख्यकवाद
और तुष्टीकरण के मिथ्या आरोप मढ़ती रहती हैं और अपनी हिंसा, विद्वेष और सांप्रदायिक राजनीति को जायज ठहराने की कोशिशों में लिप्त रहती
हैं। इतना ही नहीं ये ताक़तें प्रशासनिक मशीनरी और सुरक्षाबलों में अपनी घुसपैठ और उनके
सांप्रदायीकरण का निरंतर प्रयास करती रहती हैं, खासकर तब जब वे
सत्ता में होती हैं।
अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि अल्पसंख्यक समुदाय
को निशाना बना कर हत्याएं की गई हैं। यह हिरासत में मौत का मामला है। इसमें मानवाधिकार
का हनन किया गया है और पीड़ितों को न्याय दिलाने में तीन दशक लग गए। इतने समय बाद न्याय
मिलना न्यायपालिका के उद्देश्य को पूरा नहीं करता है। इस मामले में निर्दोष और निहत्थे
लोगों की जानबूझ कर हत्या की गई है। यह किसी भी सुरक्षाबल और राज्य व्यवस्था के लिये
शर्मनाक है।
निश्चय ही हमारी न्यायपालिका का यह फैसला हमारे संविधान
में विहित धर्मनिरपेक्षता, लोकतन्त्र और न्यायिक समानता के मूल्यों
को परिपुष्ट करता है और दीर्घकालिक प्रभाव डालने वाला है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी
इस फैसले का तहे दिल से स्वागत करती है।
डा॰ गिरीश, राज्य सचिव
भाकपा, उत्तर प्रदेश
गुरुवार, 18 अक्टूबर 2018
at 5:50 pm | 0 comments |
श्री नारायण दत्त तिवारी के निधन पर भाकपा ने शोक जताया
लखनऊ- 18 अक्तूबर 2018, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मण्डल ने
स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री, पूर्व केन्द्रीय मंत्री, पूर्व राज्यपाल, धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को समर्पित, उदार, सहज तथा लोकप्रिय नेता श्री नारायण दत्त तिवारी के निधन पर गहरा शोक व्यक्त
किया है। पार्टी ने शोक संतप्त परिवार और उनके सगे- संबंधियों के प्रति सहानुभूति प्रकट
करते हुये उन्हें इस पीढ़ा को सहन कर पाने में समर्थ होने की कामना की है।
यहां जारी एक प्रैस बयान
में पार्टी के राज्य सचिव डा॰ गिरीश ने कहाकि श्री तिवारी आजीवन सांप्रदायिकता, जातिवाद और विभाजन की राजनीति का विरोध करते रहे।
सत्ता पक्ष में और सत्तासीन रहते हुये भी उन्होने सभी को सहज सम्मान दिया और विपक्ष
की बात को भी पूरा महत्व दिया। मौजूदा व्यवस्था में विकास की तमाम सीमाओं के बावजूद
उन्होने उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड के विकास को हर संभव प्रयत्न किया। आम जनता के
लिए भी वे सहजता से उपलब्ध्द रहे। उनका जीवन आज के दंभी, मौकापरस्त और फूटपरस्त नेताओं के लिए एक गहरे सबक
की तरह है। उनके निधन से सादगी, मिलनसारिता और सबके प्रति मैत्री भाव के एक युग की सामाप्ति होगयी है, जिसको पुनर्जीवित करने के प्रयास किये जाने चाहिये।
उत्तर प्रदेश भाकपा उन्हें श्रध्दा सुमन अर्पित करती है।
डा॰ गिरीश, राज्य सचिव
भाकपा, उत्तर प्रदेश
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