भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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बुधवार, 9 सितंबर 2020

अर्थव्यवस्था की बरवादी और लोकतन्त्र पर खतरों के विरूध्द भाकपा का देशव्यापी प्रतिरोध दिवस 14 सितंबर को


 

लखनऊ- भारत की अर्थव्यवस्था को खंडहर में तब्दील कर देने और लोकतन्त्र को गहरे संकट में फंसा देने के विरोध में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी 14 सितंबर को सारे देश में प्रतिरोध दर्ज करायेगी। ज्ञातव्य हो कि इसी दिन संसद का सत्र शुरू होने जा रहा है।

यह निर्णय गत दिन जूम ‘एप’ के माध्यम से संपन्न पार्टी के केन्द्रीय सचिव मण्डल की बैठक में लिया गया है।

बड़े पैमाने पर बेरोजगारी पैदा करने वाली, गरीबी बढ़ाने वाली एवं जीवनयापन के साधनों को तहस नहस करने वाली मोदी सरकार की विनाशकारी आर्थिक नीतियों के विरूध्द जनता को संगठित किया जायेगा।

देश की अर्थव्यवस्था के बारे में लगातार झूठे दाबे करने और झूठ बोलने वाली वित्त मंत्री को सत्ता में बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है, अतएव उनसे पद छोड़ने की मांग की जायेगी।

भाकपा “जीवनयापन, समानता और न्याय के लिये- भारत और भारत के संविधान की रक्षा के लिये सदा प्रतिबध्द रही है और रहेगी”, इस संकल्प के साथ आंदोलन किया जाएगा।

भाकपा के उत्तर प्रदेश राज्य सचिव डा॰ गिरीश ने कहा कि उत्तर प्रदेश में अपराधों की भरमार, भ्रष्टाचार और शासकीय गुंडागर्दी सहित उन सभी सवालों को उठाया जायेगा जिन्हें भाकपा विगत कई माहों से लगातार उठाती रही है।

डा॰ गिरीश

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शनिवार, 29 अगस्त 2020

उत्तर प्रदेश मेन एक और दिन अपराधियों के नाम


 

सत्ता में बने रहने का नैतिक अधिकार खो चुकी है राज्य सरकार: भाकपा ने दोहराया

 

लखनऊ- गांवों, कस्बों और शहरों में तो स्त्री- पुरुष, दलित- अल्पसंख्यक एवं आम जन, हत्या, बलात्कार, हमलों, अपहरण, लूट जैसी जघन्य वारदातों के निरन्तर शिकार हो रहे हैं और मुख्यमंत्री अपराधों में कमी के फर्जी आंकड़े पेश कर रहे हैं, ऐसे में राजधानी में मुख्यमंत्री आवास के निकट गौतमपल्ली इलाके के हाई सीक्यौरिटी क्षेत्र में रेलवे अधिकारी के सरकारी आवास में दिन- दहाड़े उनकी पत्नी और युवा बेटे की हत्या ने राज्य सरकार के सुशासन के दावों की कलई खोल कर रख दी है।

आज ही मथुरा दिल्ली हाईवे पर स्कूटी सवार युवती से छेड़छाड़ और उसे घसीट कर वाहन में डालने की तथा जमुना एक्सप्रेसवे पर चलती बस में बलात्कार की दिल कंपकंपाने वाली खबरें भी आ रही हैं। मैनपुरी में प्रेमी- प्रेमिका की जूतों से पिटाई, उनका जुलूस और लखीमपुर में परिवार के कई लोगों की हत्या की खबरें भी अन्य आपराधिक खबरों के बीच सुर्खियां बटोर रहीं हैं। हमेशा की तरह मुख्यमंत्री द्वारा संज्ञान लिये जाने और कड़ी कार्यवाही किये जाने की खबरें भी चैनलों पर प्रसारित की जा रही हैं।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उत्तर प्रदेश राज्य सचिव मंडल ने घटना/ घटनाओं पर दुख, आश्चर्य और रोष जताया है। एक प्रेस बयान में पार्टी ने अपने इस स्टैंड को फिर दोहराया है कि उत्तर प्रदेश की मौजूदा सरकार सत्ता में बने रहने का नैतिक अधिकार खो बैठी है।

भाकपा यह निरन्तर कहती रही है कि अपराधियों से निपटने और अपराधों को कंट्रौल करने की राज्य सरकार की कार्यवाहियाँ सुर्खियां बटोरने और लोगों को बरगलाये रखने की द्रष्टि से की जा रहीं हैं ताकि बिखरते वोटों को साधा जा सके। अपने इन मंसूबों को पूरा करने के लिये इस सरकार ने पुलिस- प्रशासन का व्यापक राजनीतिकरण कर डाला है। नतीजे सबके सामने हैं।

भाकपा उम्मीद करती है कि सभी दुर्दांत घटनाओं के आरोपियों को शीघ्र पकड़ा जायेगा। लेकिन सबसे बड़ा काम लोगों के मन में गहराई तक समा चुकी असुरक्षा की भावना को निकालने का है जिसमें योगी सरकार पूरी तरह से विफल है।

डा॰ गिरीश, राज्य सचिव

भाकपा, उत्तर प्रदेश

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शुक्रवार, 28 अगस्त 2020

हालात असामान्य हैं, NEET और JEE को फिलहाल रद्द करे सरकार : भाकपा


लखनऊ-  भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उत्तर प्रदेश राज्य सचिव मंडल ने केन्द्र सरकार को चेतावनी दी कि वह छात्रों और राज्यों पर अपना तुगलकी एजेंडा थोपने से बाज आये और कोविड-19 के इस दौर मे उनके ऊपर NEET एवं JEE न थोपे।

एक प्रेस बयान में भाकपा राज्य सचिव डा॰ गिरीश ने कहा कि आज भारत में कोविड संक्रमित मरीजों की प्रतिदिन संख्या विश्व में सबसे ज्यादा है। जब भारत में मुट्ठी भर मरीज थे तब सरकार ने सारे देश को तालाबन्दी में धकेल दिया था और अब जब यह संख्या बढ़ कर हालातों को भयावह बना रही है तब सरकार NEET और JEE का आयोजन करा रही है।

सरकार अनलाक के दौर में भी केवल अपनी पूंजीपति- माफिया लाबी के हितों में काम कर रही है और आम जनता के हितों को कुचल रही है। वह शराब के ठेकों की तरह उन सभी चीजों में छूट दे रही है जो जनता के हितों पर चोट पहुंचा रहे हैं। विद्यालयों में प्राचार्यों और आचार्यों की तमाम जगहें खाली पड़ीं हैं। अन्य विभागों में भी तमाम रिक्तियाँ हैं। पर सरकार उनकी भर्ती परीक्षाओं को टाल रही है। रोजगार देने के वायदों और दावों से मुकर रही है।

जहां तक कोविड काल में भर्ती परीक्षाओं में व्यवस्थाओं का सवाल है, हम इसे यूपी में बी॰एड॰ प्रवेश परीक्षाओं के दौरान देख चुके हैं, जब इन परीक्षा केन्द्रों को अव्यवस्थाओं ने जकड़ लिया था और ट्रांसपोर्टेशन की अव्यवस्थाओं के चलते कई अभ्यर्थियों की मार्ग दुर्घटनाओं में मौत होगयी थी।

कोविड- प्रकोप के अतिरिक्त उत्तर प्रदेश के एक बड़े भाग में बाढ़ आयी हुयी है, पब्लिक ट्रांसपोर्टेशन अभी 30 प्रतिशत भी चलायमान नहीं है, होटलों और धर्मशालाओं पर ताले लटके हुये हैं, गरीब और मध्यवर्गीय अभ्यर्थी न तो निजी तौर पर आवागमन का खर्च वहन कर सकते हैं न ठहरने का। जबकि एक परीक्षा केन्द्र तक पहुँचने के लिये उन्हें 250 से 500 किमी की दूरी तय करनी पड़ेगी। इन तबकों से जुड़े छात्र तालाबन्दी में कोचिंग लेना तो दूर किताबें तक नहीं खरीद सके हैं।

वैसे भी शिक्षा समवर्ती सूची में आती है, अतएव केन्द्र सरकार राज्य सरकारों पर JEE और NEET थोप नहीं सकती। छात्रहित में कई राज्य सरकारें इसका विरोध कर रही हैं और वे सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँच रही हैं। केन्द्र को अपने अधिकारों को राज्यों पर थोपने से बाज आना चाहिये। भाकपा केन्द्र की माइकले युग में ले जाने वाली शिक्षा नीति का विरोध करती है।

भाकपा राज्य सचिव मंडल ने निर्णय किया कि NEET एवं JEE आयोजित करने के छात्र विरोधी- गरीब विरोधी निर्णय का हर संगठन द्वारा हर स्तर पर विरोध किया जायेगा। भाकपा की राय है कि इन प्रवेश परीक्षाओ को कुछ महीने टाला जा सकता है और शैक्षणिक सत्र को छोटा कर 6 माहों में समेटा जा सकता है, और प्रतिदिन 5- 6 घंटे पढ़ाई करा कोर्स पूरा किया जा सकता है।

डा॰ गिरीश, राज्य सचिव

भाकपा, उत्तर प्रदेश

 

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बुधवार, 19 अगस्त 2020

गरीबों को प्राविधिक शिक्षा से वंचित करने का प्रयास है उत्तर प्रदेश में 40 आईटीआई का निजीकरण


गरीबों को प्राविधिक शिक्षा से बाहर कर उन्हें आज का एकलव्य बनाने का रास्ता उत्तर प्रदेश सरकार ने तैयार कर दिया है। विश्वगुरु बनाने के नारे और उसको लागू करने के खोखलेपन ने उत्तर प्रदेश सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है। मामला 40 आईटीआई के निजीकरण का है।

प्रदेश में पहले ही प्रायवेट के मुक़ाबले सरकारी आईटीआई की संख्या नगण्य है। 2931 निजी तो 307 पुरुष सरकारी और 12 महिला आईटीआई प्रदेश भर में संचालित हैं। अब इनमें से 40 का निजीकरण किया जा रहा है। पहले चरण में 16 और दूसरे चरण में 24 के निजीकरण का खाका तैयार किया जा चुका है।

निजीकरण के लिये गुणवत्ता सुधारने का तर्क दिया जा रहा है। ये कितना भौंथरा है इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है की प्रदेश के तमाम प्रायवेट आईटीआई में उपयुक्त इमारत नहीं है। प्रयोगशाला और महंगे उपकरणों की बात तो जाने ही दीजिये। शिक्षकों के नाम पर वहाँ एक सूची मात्र है और वेतन कागजों पर वितरित कर दिया जाता है। हां, उपयुक्त राशि दे कर छात्रों को पास कराने की गारंटी वहां रहती है।

नए सत्र में प्रवेश इन्हीं निजीक्रत आईटीआई में होगा जिसकी फीस 54 गुना तक ज्यादा होगी। अभी रुपए 480 सालाना से बढ़ कर फीस 26 हजार तक हो जायेगी। जो गरीब छात्र अभी 480 रुपये भरने में असमर्थ हैं, वे 26 हजार रुपये कहाँ से लायेंगे पता नहीं। उधर प्रायवेट लाबी को अरबों रुपए कीमत का बना बनाया स्ट्रक्चर कौड़ी कीमत पर हासिल हो जायेगा। इसमें भ्रष्टाचार की संभावनाओं को नकारा नहीं जा सकता। मायावती के शासन में चीनी मिलों की बिक्री में धांधली का मामला सबके सामने है।

इन आईटीआई में कार्यरत स्टाफ के बारे में भी अभी नीति स्पष्ट नहीं की गई है। उनको अब तक मिल रहे उच्चीक्रत वेतन को कोई निजी आईटीआई दे पाएगी, यह असंभव जान पड़ता है।

क्या आत्मनिर्भरता का मोदी-मंत्र गरीबों के लिये उलटा पड़ने वाला है? कोरोना काल में गरीबों के सहारा बने संस्थानों को बेच कर आपदा को अवसर में बदला जा रहा है। आईटीआई के निजीकरण के फैसले से तो यही साबित होता है।

हम प्रदेश के मुख्यमंत्री से अपील करते हैं कि गरीबों को प्राविधिक शिक्षा के हक से वंचित करने के इस फैसले को पलट दें। हम गरीबों के हक में आवाज उठाने का संकल्प लेते हैं, और आप से भी अपील करते हैं कि अपनी आवाज उठायें और गरीबों का सहारा बनें।

जो भी इस मुहिम का भाग बनना चाहते हैं, कम से कम एक चिट्ठी प्रदेश के मुखिया को तत्काल प्रेषित करें। अपनी क्रिया को मीडिया और सोशल मीडिया तक जरूर पहुंचायें। इंसान के जीवन की सार्थकता जरूरतमंदों के हक में आवाज उठाने में है, किसी ढिंढोरची के कहने पर थाली- ताली बजाने में नहीं।

डा॰ गिरीश

9412173664

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रविवार, 16 अगस्त 2020

उत्तर प्रदेश बना बलात्कार प्रदेश


अब लखीमपुर में दलित बालिका से बलात्कार और वीभत्स हत्या से कलंकित हुयी उत्तर प्रदेश सरकार

भाकपा ने राज्य सरकार से अपराधों की ज़िम्मेदारी स्वीकारने और अपरधियों के साथ कड़ी कार्यवाही की मांग की

लखनऊ- 16 अगस्त 2020, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने उत्तर प्रदेश सरकार और उत्तर प्रदेश पुलिस को झूठों और ज़ालिमों का समूह बताते हुये आरोप लगाया कि वे बहू- बेटियों की आबरू और जान बचाने में पूरी तरह फेल है मगर जघन्य अपराधों पर पर्दा डालने अथवा उन्हें हलका करने में माहिर है।

एक प्रेस बयान में भाकपा ने कहा कि उरई, हापुड़ और बुलंदशहर की ह्रदय विदारक घटनाओं की दहशत से अभी समाज उबरा भी नहीं था कि लखीमपुर जनपद के ईसा नगर थाने के पकरिया गांव की एक 13 वर्षीय दलित बालिका के साथ दुष्कर्म के बाद न केवल हत्या कर दी गयी अपितु उसकी आँखें फोड़ दी गयीं और जीभ काट दी गयी। पुलिस की बरबरता देखिये कि पहले बलात्कार की बात को झुठलाती रही और अब जब पोस्ट मार्टम में बलात्कार की पुष्टि होगयी तो वह जीभ काटने और आँखें फोड़ने की बात को झुठला रही है।

ठीक उसी तरह जिस तरह कि बुलंदशहर पुलिस ने सारी ताकत इस बात को साबित करने में झौंक दी है कि सुदीक्षा के साथ छेड़ छाड़ नहीं हुयी।

वैसे तो उत्तर प्रदेश में इस समय हर तरह के अपराध आसमान जैसी ऊंचाइयाँ छू रहे हैं मगर बहिन बेटियों के साथ बदसलूकी, हत्या और दहेज हत्याओं की वारदातों ने तो सारे रिकार्ड तोड़ दिये हैं। उनकी इज्जत आबरू और जान की रक्षा करने में असफल राज्य सरकार और राज्य पुलिस मामलों को हल्का करने अथवा रिकार्ड से हटाने में जुटी है। यह असहनीय है और सरकार के सत्ता में बने रहने पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

भाकपा ने मांग की कि सभी अपराधियों को अविलंब जेल के सींखचों के पीछे भेजा जाये और उनके ऊपर पास्को एक्ट, एनएसए और अन्य दफाएँ आयद की जायें। पीड़ित परिवार को मुआबजा भी दिया जाये।

डा॰ गिरीश, राज्य सचिव

भाकपा, उत्तर प्रदेश

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बुधवार, 12 अगस्त 2020

Left Programes

 

स्वतन्त्रता दिवस पर संविधान की रक्षा और आज़ादी को सुद्रढ़ बनाने का संकल्प लेंगे वामदल

1 सितंबर को भारत को अमेरिका का पिछलग्गू ना बनाओ, दिवस का आयोजन किया जायेगा

लखनऊ- वामपंथी दलों ने 15 अगस्त स्वतन्त्रता दिवस को ‘संविधान की रक्षा और भारत की आज़ादी को सुद्रढ़ करने के संकल्प दिवस’ के रूप में मनाने का आह्वान किया है। साथ ही 1 सितंबर को ‘भारत को अमेरिका का पिछलग्गू बनाने के प्रयासों पर विरोध दिवस’ आयोजित करने का निश्चय किया है। उपर्युक्त जानकारी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उत्तर प्रदेश राज्य सचिव मण्डल ने एक प्रेस बयान में दी।

वामदलों का आरोप है कि  कोविड- 19 एवं राष्ट्रव्यापी  लाकडाउन के दौर में जब भाजपा की केन्द्र सरकार को महामारी से निपटने में अपना पूरा ध्यान केन्द्रित कर जनता को राहत देनी चाहिये, ऐसे समय में आरएसएस के नेत्रत्व वाली केन्द्र और उत्तर प्रदेश की सरकार आक्रामक तौर पर भारतीय संविधान के सिध्दांतों को नष्ट करने पर उतारू है। इसके साथ ही सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को धार देने के उद्देश्य से अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ रही हैं। संविधान के प्रत्येक संस्थानों एवं प्राधिकरणों—संसद, न्यायपालिका, चुनाव आयोग, सीबीआई, ईडी आदि को सीमित करने के हर संभव प्रयास किये जा रहे हैं तथा जनतान्त्रिक अधिकारों एवं नागरिक आज़ादी पर तीखे हमले किये जा रहे हैं। सरकार विरोधी हर आवाज को राष्ट्रद्रोह की संज्ञा दी जा रही है। आम नागरिकों के साथ ही बुद्धिजीवी राजनीतिक, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को राजद्रोह की धाराओं में जेल भेजा जा रहा है।

हमारे संविधान की बुनियादी विशेषता संघवाद है, जिसके सिद्धांतों को नकारते हुये सभी शक्तियों को केन्द्र सरकार में केन्द्रित करने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसी स्थिति में जनता को एकजुट हो कर संविधान की रक्षा और अपनी स्वतन्त्रता को सुद्रढ़ करने के लिए आवाज उठाना जरूरी हो गया है। स्वतन्त्रता दिवस पर हम सबको इसकी शपथ लेनी है।

केन्द्र की भाजपा सरकार दुनियाँ पर बादशाहत कायम करने की अमेरिकी ख़्वाहिशों को पूरा करने के लिये उसका हर तरह से सहयोग कर रही है। यह सब हमारे देश और देश की जनता के हित में नहीं है। भारत को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर कायम रहना चाहिये। अमेरिका या अमेरिकी- इस्रायल गठजोड़ के पक्ष में विदेश नीति हमारी संप्रभुता और आत्मनिर्भर्ता को कमजोर करेगी। अतएव 1 सितंबर को भारत को अमेरिका का पिछलग्गू बनाने का विरोध किया जायेगा।

भाकपा राज्य सचिव मण्डल ने उत्तर प्रदेश के जनमानस से अपील की है कि वे वामपंथी दलों के उपर्युक्त केन्द्रीय आह्वानों को देश और जनता के हित में अमलीभूत करें।

डा॰ गिरीश, राज्य सचिव

भाकपा, उत्तर प्रदेश

 

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मंगलवार, 11 अगस्त 2020

Tribute to Rahat Indauri

 

राहत इंदौरी के निधन पर भाकपा ने शोक जताया

 

लखनऊ- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की उत्तर प्रदेश राज्य काउंसिल ने अवामी शायर श्री राहत इंदौरी के निधन पर गहरा दुख जताया है और उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की है। भाकपा ने उनके शोक संतप्त परिवार और उनके करोड़ों चाहने वालों की पीढ़ा के प्रति सहभागिता की है।

एक प्रेस बयान में भाकपा राज्य सचिव डा॰ गिरीश ने कहा कि श्री इंदौरी के निधन से साहित्य जगत खास कर उर्दू अदब को गहरा धक्का पहुंचा है। मंच से करोड़ों करोड़ पीड़ितों की आवाज को मुखरित करने वाली आवाज आज कोरोना महामारी ने हम से छीन ली। उनके निधन से हुयी क्षति की पूर्ति आसानी से संभव नहीं है।

डा॰ गिरीश, राज्य सचिव

भाकपा, उत्तर प्रदेश

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CPI on Women astrocity in UP

 

बहू- बेटियों की जान खतरे में, इज्जत तार तार: आखिर कौन है इसका जिम्मेदार?

भाकपा ने कहा- बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा देने वाली सरकार ही बनी बेटियों का ‘काल’।   

लखनऊ- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, उत्तर प्रदेश राज्य सचिव मण्डल ने उत्तर प्रदेश में जंगलराज और महिलाओं/ बालिकाओं की जिन्दगी/ आबरू पर उसके कहर पर गहरी चिन्ता, दुख और आक्रोश जताया है। भाकपा ने उत्तर प्रदेश के वामपंथी दलों की इस समझदारी को फिर दोहराया है कि राज्य सरकार स्थितियों को संभाल नहीं पा रही और वह शासन करने का नैतिक अधिकार खो बैठी है।

यहाँ जारी एक प्रेस बयान में पार्टी के राज्य सचिव डा॰ गिरीश ने कहा कि अभी हापुड़ की बच्ची की चीखें विचलित कर ही रहीं थी, उरई ( जालौन ) की लड़कियों की पुलिस प्रताड़ना और उससे विचलित हुयी एक लड़की की आत्महत्या की भयावह खबरें व्यथित कर ही रहीं थीं कि एक और होनहार बेटी- बुलंदशहर की सुदीक्षा आज शोहदों की छेड़छाड़ का शिकार बन कर जान से हाथ धो बैठी। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा देने वाली सरकार आज बेटियों का ‘काल’ बन कर रह गयी है।

उत्तर प्रदेश में हर तरह के अपराधों की बाढ़ आयी हुयी है और हर जनपद में अखबारों के कई कई पन्ने स्थानीय अपराधों की  खबर से भरे रहते हैं। बागपत में भाजपा नेता की हत्या तो सुर्खियों में आनी ही थी, लेकिन, प्रदेश में हत्याओं का अंबार लगा हुआ है। ज़मीनों- जायदादों को लेकर झगड़े भी रिकार्ड तोड़ रहे हैं। अपहरण, फिरौती और फिरौती लेकर भी हत्या, लूट और ठगी की वारदातें भी बढ़ी संख्या में हो रही हैं। अर्थाभाव और अव्यवस्था से लोग बड़े पैमाने पर आत्महत्याएं कर रहे हैं। लेकिन महिला हिंसा ने तो अब तक के सारे रिकार्ड तोड़ दिये हैं।

भाजपा राज आज अपराध राज बन गया है। यह भी तमाम तमाम एंकाउंटर्स के वाबजूद। क्योंकि लोगों की नजर में ये एंकाउंटर राजनैतिक हैं और अपराध करने वालों पर इसका कोई असर नहीं पड़ रहा है। उत्तर प्रदेश की पुलिस की कारगुजारियां अपने आप में सवालों के घेरे में हैं। वह अपराधों को रोक नहीं पा रही है और आम लोगों पर कहर वरपा रही है। इस सबकी कोई ज़िम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है। जनता इस जंगलराज को भोगने को अभिशप्त है। लोगों में यह सवाल गहराता जा रहा है कि जब सरकार अपने दायित्वों का निर्वाह कर नहीं पा रही तो फिर क्यों सत्ता में बनी हुयी है।

भाकपा ने बुलंदशर, हापुड़, उरई और प्रदेश भर की महिला हिसा के दोषियों के विरूध्द कड़ी से कड़ी कार्यवाही की मांग की है। भाकपा राज्य सचिव मंडल ने अपनी जिला इकाइयों और सहयोगी संगठनों से अपील की कि वे स्थानीय स्तर पर तत्काल प्रतिरोध जताएं।

डा॰ गिरीश, राज्य सचिव

भाकपा, उत्तर प्रदेश  

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शुक्रवार, 7 अगस्त 2020

Neharu On Indian Culture


 

भारतीय संस्क्रति के विषय में पं॰ जवाहर लाल नेहरू का द्रष्टिकोण

 

[ अपने निहित राजनैतिक स्वार्थों के लिये दक्षिणपंथियों द्वारा आज भारतीय संस्क्रति पर जो तीखे हमले बोले जारहे हैं और उसे धर्म विशेष से जोड़ कर संकुचित, कुंठित और पथभ्रष्ट करने के भयानक प्रयास किये जा रहे हैं, तब भारतीय संस्क्रति के बारे में पं॰ जवाहर लाल नेहरू के सुष्पष्ट विचार हमें उसकी व्यापकता का दिग्दर्शन कराते हैं। आज के संगीन हालातों में यह और अधिक प्रासंगिक होगये हैं। श्री रामधारीसिंह दिनकर की पुस्तक “संस्क्रति के चार अध्याय” की भूमिका के रूप में यह आलेख 30 सितंबर 1955 को पूरा किया गया था। अंतिम ढाई पंक्तियों को छोड़ यह आलेख अक्षरशः प्रस्तुत किया जा रहा है। इसका शीर्षक भी मेरे द्वारा दिया गया है- डा॰ गिरीश ]

 

मेरे मित्र और साथी दिनकर ने, अपनी पुस्तक के लिये जो विषय चुना है, वह बहुत ही मोहक और दिलचस्प है। यह ऐसा विषय है जिससे, अक्सर, मेरा अपना मन भी ओत- प्रोत रहा है और मैंने जो कुछ लिखा है, उस पर इस विषय की छाप आप से आप पड़ गयी है। अक्सर मैं अपने आप से सवाल करता हूँ, भारत है क्या? उसका तत्व या सार क्या है? वे शक्तियां कौन-सी हैं जिनसे भारत का निर्माण हुआ है तथा अतीत और वर्तमान विश्व को प्रभावित करने वाली प्रमुख प्रव्रत्तियों के साथ उनका क्या संबंध है? यह विषय अत्यंत विशाल है, और उसके दायरे में भारत और भारत के बाहर के तमाम मानवीय व्यापार आ जाते हैं। और मेरा ख्याल है कि किसी भी व्यक्ति के लिये यह संभव नहीं है कि वह इस संपूर्ण विषय के साथ अकेला ही न्याय कर सके। फिर भी, इसके कुछ खास पहलुओं को लेकर उन्हें समझने की कोशिश की जा सकती है। कम से कम, यह तो संभव है ही कि हम अपने भारत को समझने का प्रयास करें, यद्यपि, सारे संसार को अपने सामने न रखने पर भारत-विषयक जो ज्ञान हम प्राप्त करेंगे, वह अधूरा होगा।

संस्क्रति है क्या? शब्दकोश उलटने पर इसकी अनेक परिभाषायें मिलती हैं। एक बड़े लेखक का कहना है कि “संसार भर में जो भी सर्वोत्तम बातें जानी या कही गयी हैं, उनसे अपने आपको परिचित करना संस्क्रति है।“ एक दूसरी परिभाषा में यह कहा गया है कि “संस्क्रति शारीरिक या मानसिक शक्तियों का प्रशिक्षण द्रढ़ीकरण या विकास अथवा उससे उत्पन्न अवस्था है।“ यह “मन आचार या रुचियों की परिष्क्रति या शुद्धि” है। यह “सभ्यता का भीतर से प्रकाशित हो उठना” है। इस अर्थ में, संस्क्रति कुछ ऐसी चीज का नाम हो जाता है जो बुनियादी और अंतर्राष्ट्रीय है। फिर, संस्क्रति के कुछ राष्ट्रीय पहलू भी होते हैं। और इसमें कोई सन्देह नहीं कि अनेक राष्ट्रों में अपना कुछ विशिष्ट व्यक्तित्व तथा अपने भीतर कुछ खास ढंग के मौलिक गुण विकसित कर लिये हैं।

इस नक्शे में भारत का स्थान कहाँ पर है? कुछ लोगों ने हिन्दू-संस्क्रति, मुस्लिम-संस्क्रति और ईसाई-संस्क्रति की चर्चा की है। ये नाम मेरी समझ में नहीं आते, यद्यपि, यह सच है कि जातियों और राष्ट्रों की संस्क्रतियों पर बड़े-बड़े धार्मिक आंदोलनों का असर पड़ा है। भारत की ओर देखने पर मुझे लगता है, जैसा कि दिनकर ने भी ज़ोर देकर दिखलाया है, कि भारतीय जनता की संस्क्रति का रूप सामासिक है और उसका विकास धीरे धीरे हुआ है। एक ओर तो इस संस्क्रति का मूल आर्यों से पूर्व, मोहंजोदड़ों आदि की सभ्यता तथा द्रविड़ों की महान सभ्यता तक पहुंचता है। दूसरी ओर, इस संस्क्रति पर आर्यों की बहुत ही गहरी छाप है जो भारत में मध्य एशिया से आये थे। पीछे चल कर, यह संस्क्रति उत्तर-पश्चिम से आने वाले तथा फिर समुद्र की राह से पश्चिम से आने वाले लोगों से बार-बार प्रभावित हुयी। इस प्रकार, हमारी राष्ट्रीय संस्क्रति ने धीरे धीरे बढ़ कर अपना आकार ग्रहण किया। इस संस्क्रति में समन्वयन तथा नये उपकरणों को पचा कर आत्मसात करने की अद्भुत योग्यता थी। जब तक इसका यह गुण शेष रहा, यह संस्क्रति जीवित और गतिशील रही। लेकिन, बाद को आकर उसकी गतिशीलता जाती रही जिससे यह संस्क्रति जड़ होगयी और उसके सारे पहलू कमजोर पड़ गये। भारत के इतिहास में हम दो परस्पर विरोधी और प्रतिद्वंदी शक्तियों को काम करते देखते हैं। एक तो वह शक्ति है जो बाहरी उपकरणों को पचा कर समन्वय और सामंजस्य पैदा करने की कोशिश करती है, और दूसरी वह जो विभाजन को प्रोत्साहन देती है; जो एक बात को दूसरी से अलग करने की प्रव्रत्ति को बढ़ाती है। इसी समस्या का, एक भिन्न प्रसंग में, हम आज भी मुक़ाबला कर रहे हैं। आज भी कितनी ही बलिष्ठ शक्तियां हैं जो केवल राजनीतिक ही नहीं, सान्स्क्रतिक एकता के लिये भी प्रयास कर रही हैं। लेकिन, ऐसी ताक़तें भी हैं जो जीवन में विच्छेद डालती हैं, जो मनुष्य- मनुष्य के बीच भेद-भाव को बढ़ावा देती हैं।

अतएव आज हमारे सामने जो प्रश्न है वह केवल सैद्धान्तिक नहीं है उसका संबंध हमारे जीवन की सारी प्रक्रिया से है और उसके समुचित निदान और समाधान पर ही हमारा भविष्य निर्भर करता है। साधारणतः, ऐसी समस्याओं को सुलझाने में नेत्रत्व देने का काम मनीषी करते हैं। किन्तु, वे हमारे काम नहीं आये। उनमें से कुछ तो ऐसे हैं जो इस समस्या के स्वरूप को ही नहीं समझते। बाकी लोग हार मान बैठे हैं। वे विफलता-बोध से पीड़ित तथा आत्मा के संकट में ग्रस्त हैं और वे जानते ही नहीं कि जिंदगी को किस दिशा की ओर मोड़ना ठीक होगा।

बहुत से मनीषी मार्क्सवाद और उसकी शाखाओं की ओर आक्रष्ट हुये और इसमें कोई सन्देह नहीं कि मार्क्सवाद ने ऐतिहासिक विकास का विश्लेषण उपस्थित करके समस्याओं पर सोचने और उन्हें समझने के काम में हमारी सहायता की। लेकिन आखिर को, वह भी संकीर्ण मतवाद बन गया और, जीवन की आर्थिक पध्दति के रूप में उसका चाहे जो भी महत्व हो, हमारी बुनियादी शंकाओं का समाधान निकालने में वह भी नाकामयाब है। यह मानना तो ठीक है कि आर्थिक उन्नति जीवन और प्रगति का बुनियादी आधार है; लेकिन जिंदगी यहीं तक खत्म नहीं होती। यह आर्थिक विकास से भी ऊंची चीज है। इतिहास के अंदर हम दो सिद्धांतों को काम करते देखते हैं। एक तो सातत्य का सिद्धान्त है और दूसरा परिवर्तन का। ये दोनों सिद्धान्त परस्पर विरोधी लगते हैं, परन्तु, ये विरोधी हैं नहीं। सातत्य के भीतर भी परिवर्तन का अंश है। इसी प्रकार, परिवर्तन भी अपने भीतर सातत्य का कुछ अंश लिये रहता है। असल में, हमारा ध्यान उन्हीं परिवर्तनों पर जाता है जो हिंसक क्रांतियों या भूकंप के रूप में अचानक फट पड़ते हैं। फिर भी, प्रत्येक भूगर्भ-शास्त्री यह जानता है कि धरती की सतह में जो बड़े-बड़े परिवर्तन होते हैं, उनकी चाल बहुत धीमी होती है और भूकंप से होने वाले परिवर्तन उनकी तुलना में अत्यंत तुच्छ समझे जाते हैं। इसी तरह, क्रान्तियाँ भी धीरे धीरे होने वाले परिवर्तन और सूक्ष्म रूपान्तरण की बहुत लंबी प्रक्रिया का बाहरी प्रमाण मात्र होती है। इस द्रष्टि से देखने पर, स्वयं परिवर्तन एक ऐसी प्रक्रिया है जो परंपरा के आवरण में लगातार चलता रहता है। बाहर से अचल दीखने वाली परंपरा भी, यदि जड़ता और म्रत्यु का पूरा शिकार नहीं बन गयी है, तो धीरे धीरे वह भी परिवर्तित हो जाती है।

इतिहास में कभी कभी ऐसा भी समय आता है जब परिवर्तन की प्रक्रिया और तेजी कुछ अधिक प्रत्यक्ष हो जाती है। लेकिन, साधारणतः, बाहर से उसकी गति दिखाई नहीं देती। परिवर्तन का बाहरी रूप, प्रायः, निस्पंद ही दीखता है। जातियाँ जब अगति की अवस्था में रहती हैं, तब उनकी शक्ति दिनोंदिन छीजती जाती है, उनकी कमज़ोरियाँ बढ़ती जाती हैं। परिणाम यह होता है कि उनकी रचनात्मक कलाओं और प्रव्रत्तियों का क्षय हो जाता है। तथा, अक्सर वे राजनीतिक रूप में गुलाम भी हो जाती हैं।

संभावना यह है कि भारत में संस्क्रति के सबसे प्रबल उपकरण आर्यों और आर्यों से पहले के भारतवासियों, खास कर, द्रविड़ों के मिलन से उत्पन्न हुये। इस मिलन, मिश्रण या समन्वय से एक बहुत बड़ी संस्क्रति उत्पन्न हुयी जिसका प्रतिनिधित्व हमारी प्राचीन भाषा संस्क्रत करती है। संस्क्रत और प्राचीन पहलवी, ये दोनों भाषायें एक ही माँ से मध्य एशिया में जनमी थीं, किन्तु, भारत में आकर संस्क्रत ही यहाँ की राष्ट्रभाषा हो गयी। यहाँ संस्क्रत के विकास में उत्तर और दक्षिण, दोनों ने योगदान दिया। सच तो यह है कि आगे चल कर संस्क्रत के उत्थान में दक्षिण वालों का अंशदान अत्यंत प्रमुख रहा। संस्क्रत हमारी जनता के विचार और धर्म का ही प्रतीक नहीं बनी, वरन भारत की सांस्क्रतिक एकता भी उसी भाषा में साकार हुयी। बुद्ध के समय से लेकर अब तक संस्क्रत यहाँ की जनता की बोले जाने वाली भाषा कभी नहीं रही है, फिर भी, सारे भारतवर्ष पर वह अपना प्रचुर प्रभाव डालती ही आयी है। कुछ दूसरे प्रभाव भी भारत पहुंचे और उनसे भी विचारों और अभिव्यक्तियों को नयी दिशाएं प्राप्त हुयीं।

काफी लंबे इतिहास के अन्दर, भूगोल ने भारत को जो रूप दिया, उससे वह एक ऐसा देश बन गया जिसके दरवाजे बाहर की ओर बन्द थे। समुद्र और महाशैल हिमालय से घिरा होने के कारण, बाहर से किसी का इस देश में आना आसान नहीं था। कई सहस्राब्दियों के भीतर, बाहर से लोगों के बड़े बड़े झुंड भारत आये, किन्तु, आर्यों के आगमन के बाद से कभी ऐसा नहीं हुआ, जबकि बाहरी लोग बहुत बड़ी संख्या में भारत आये हों। ठीक इसके विपरीत, एशिया और यूरोप के आर-पार मनुष्यों के अपार आगमन और निष्क्रमण होते रहे; एक जाति दूसरी जाति को खदेड़ कर वहाँ खुद बसती रही और इस प्रकार, जनसंख्या की बुनावट में बहुत बड़ा परिवर्तन होता रहा। भारत में, आर्यों के आगमन के बाद, बाहरी लोगों के जो आगमन हुये, उनके दायरे बहुत ही सीमित थे। उनका कुछ-न-कुछ प्रभाव तो पड़ा, किन्तु, उससे यहाँ की जनसंख्या के स्वरूप में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आया। लेकिन, फिर भी, याद रखना चाहिये कि ऐसे कुछ परिवर्तन भारत में भी हुये हैं। सीथियन और हूण लोग तथा उनके बाद भारत आने वाली कुछ अन्य जातियों के लोग यहाँ आकर राजपूतों की शाखाओं में शामिल होगये और यह दावा करने लगे कि हम भी प्राचीन भारतवासियों की संतान हैं। बहुत दिनों तक बाहरी दुनियाँ से अलग रहने के कारण, भारत का स्वभाव भी अन्य देशों से भिन्न  हो गया। हम ऐसी जाति बन गये जो अपने आप में घिरी रहती है। हमारे भीतर कुछ ऐसे रिवाजों का चलन होगया जिन्हें बाहर के लोग न तो जानते हैं और न ही समझ पाते हैं। जाति-प्रथा के असंख्य रूप भारत के इसी विचित्र स्वभाव के उदाहरण हैं। किसी भी दूसरे देश के लोग यह नहीं जानते कि छुआछूत क्या चीज है तथा दूसरों के साथ खाने-पीने या विवाह करने में, जाति को ले कर, किसी को क्या उज्र होना चाहिये। इन सब बातों को लेकर हमारी द्रष्टि संकुचित होगयी। आज भी भारतवासियों को दूसरे लोगों से खुल कर मिलने में कठिनाई महसूस होती है। यही नहीं, जब भारतवासी भारत से बाहर जाते हैं, तब वहाँ भी एक जाति के लोग दूसरी जाति के लोगों से अलग रहना चाहते हैं। हममें से बहुत लोग इन सारी बातों कों स्वयंसिद्ध मानते हैं और हम यह समझ ही नहीं पाते कि इन बातों से दूसरे देश वालों को कितना आश्चर्य होता है, उनकी भावना को कैसी ठेस पहुंचती है।

भारत में दोनों बातें एक साथ बढ़ीं। एक ओर तो विचारों और सिद्धांतों में हमने अधिक-से-अधिक उदार और सहिष्णु होने का दावा किया। दूसरी ओर, हमारे सामाजिक आचार अत्यंत संकीर्ण होते गये। यह विभक्त व्यक्तित्व, सिध्दांत और आचरण का यह विरोध, आज तक हमारे साथ है और आज भी हम उसके विरुध्द संघर्ष कर रहे हैं। कितनी विचित्र बात है कि अपनी द्रष्टि की संकीर्णता, आदतों और रिवाजों की कमजोरियों को हम यह कर नजर-अंदाज कर देना चाहते हैं कि हमारे पूर्वज बड़े लोग थे और उनके बड़े बड़े विचार हमें विरासत में मिले हैं। लेकिन, पूर्वजों से मिले हुये ज्ञान और हमारे आचरण में भारी विरोध है और जब तक हम इस विरोध की स्थिति को दूर नहीं करते, हमारा व्यक्तित्व विभक्त का विभक्त रह जायगा।

जिन दिनों जीवन अपेक्षाक्रत अधिक गतिहीन था, उन दिनों सिध्दान्त और आचरण का यह विरोध इतना उग्र दिखायी नहीं देता था। लेकिन, ज्यों-ज्यों राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तनों की रफ्तार तेज होती गयी, इस विरोध की उग्रता भी अधिक से अधिक प्रत्यक्ष होती आयी है। आज तो हम आणविक युग के दरवाजे पर खड़े हैं। इस युग की परिस्थितियाँ इतनी प्रबल हैं कि हमें अपने इस आंतरिक विरोध का शमन करना ही पड़ेगा और इस काम में हम कहीं असफल होगये तो यह असफलता सारे राष्ट्र की पराजय होगी और हम उन अच्छाइयों को भी खो बैठेंगे जिन पर हम आज तक अभिमान करते आये हैं।

जैसे हम बड़ी-बड़ी राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं का मुकाबला कर रहे हैं वैसे ही, हमें भारत के इस आध्यात्मिक संकट का भी सामना करना चाहिये। भारत में औद्योगिक क्रान्ति बड़ी तेजी से आ रही है और हम नाना रूपों में बदलते जा रहे हैं। राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तनों का यह अनिवार्य परिणाम है कि उससे सामाजिक परिवर्तन उत्पन्न होते हैं; अन्यथा न तो हमारे वैयक्तिक जीवन में समन्वय रह सकता है, न राष्ट्रीय जीवन में। ऐसा नहीं हो सकता कि राजनीतिक परिवर्तन और औद्योगिक प्रगति तो हो, किन्तु, हम यह मान कर बैठें रह जायें कि सामाजिक क्षेत्र में हमें कोई परिवर्तन लाने की आवश्यकता नहीं है। राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तनों के अनुसार समाज को परिवर्तित नहीं करने से हम पर जो बोझ पड़ेगा, उसे हम बर्दाश्त नहीं कर पायेंगे, उसके नीचे हम दब जाएँगे।

ईसा के जन्म के बाद की पहली सहस्राब्दी और उससे पहले के भारत की जो तस्वीर हमारे सामने आती है वह उस तस्वीर से भिन्न है, जो बाद को मिलती है। उन दिनों के भारतवासी बड़े मस्त, बड़े जीवन्त, बड़े साहसी और जीवन के प्रति अद्भुत उत्साह से युक्त थे तथा अपना संदेश वे विदेशों में दूर दूर तक ले जाते थे। विचारों के क्षेत्र में तो उन्होने ऊंची से ऊंची चोटियों पर अपने कदम रखे और आकाश को चीर डाला। उन्होने अत्यंत गौरवमयी भाषा की रचना की और कला के क्षेत्र में उन्होने अत्यंत उच्च कोटी की कारयित्री प्रतिभा का परिचय दिया। उन दिनों का भारतीय जीवन घेरों में बंद नहीं था, न तत्कालीन समाज में ही जड़ता या गतिहीनता की कोई बात थी। उस समय एक छोर से लेकर दूसरे छोर तक, समग्र भारत में सांस्क्रतिक उत्साह भी लहरें ले रहा था। इसी समय, दक्षिण भारतवर्ष के लोग दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर गये और वहाँ उन्होने अपना उपनिवेश स्थापित किया। दक्षिण से ही बौध्द मत का संदेश लेकर बोधि-धर्म चीन पहुंचा। इस साहसिक जीवन की अभिव्यक्ति में उत्तर और दक्षिण दोनों एक थे और वे परस्पर एक दूसरे का पोषण भी करते थे।

इसके बाद, पिछली शताब्दियों का समय आता है, जब पतन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। भाषा में क्रत्रिमता और स्थापत्य में सजावट की भरमार इसी पतनशीलता के प्रमाण हैं। यहाँ आकर हमारे विचार पुराने विचारों की आव्रत्ति बन जाते हैं और कारयित्री शक्ति दिनोंदिन क्षीण होने लगती है। शरीर और मन, दोनों की साहसिकता से हम भय खाने लगते हैं तथा जाति-प्रथा का और भी विकास होता है एवं समाज के दरवाजे चारों ओर से बन्द हो जाते हैं। पहले की तरह बातें तो हम अब भी ऊंची-ऊंची करते हैं, लेकिन, हमारा आचरण हमारे विश्वास से भिन्न हो जाता है।

हमारे आचरण की तुलना में हमारे विचार और उद्गार इतने ऊंचे हैं कि उन्हें देख कर आश्चर्य होता है। बातें तो हम शान्ति और अहिंसा की करते हैं, मगर, काम हमारे कुछ और होते हैं। सिध्दांत तो हम सहिष्णुता का बघारते हैं, लेकिन, भाव हमारा यह होता है कि सब लोग वैसे ही सोचें, जैसे हम सोचते हैं, और जब भी कोई हम से भिन्न प्रकार से सोचता है, तब हम उसे बर्दाश्त नहीं कर सकते। घोषणा तो हमारी यह है कि स्थितप्रज्ञ बनना अर्थात कर्मों के प्रति अनासक्त रहना हमारा आदर्श है, लेकिन, काम हमारे बहुत नीचे के धरातल पर चलते हैं और बढ़ती हुयी अनुशासनहीनता हमें वैयक्तिक और सामाजिक, दोनों ही क्षेत्रों में नीचे ले जाती है।

जब पश्चिम के लोग समुद्र के पार से यहाँ आये, तब भारत के दरवाजे एक खास दिशा की ओर से खुल गये। आधुनिक औद्योगिक सभ्यता बिना किसी शोर-गुल के धीरे-धीरे इस देश में प्रविष्ट होगयी। नये भावों और नये विचारों ने हम पर हमला किया और हमारे बुध्दिजीवी अंग्रेज़ बुध्दिजीवियों की तरह सोचने की आदत डालने लगे। यह मानसिक आंदोलन, बाहर की ओर वातायन खोलने का यह भाव, अपने ढंग पर अच्छा रहा, क्योंकि इससे हम आधुनिक जगत को थोड़ा-बहुत समझने लगे। मगर, इससे एक दोष भी निकला कि हमारे ये बुध्दिजीवी जनता से विच्छिन्न हो गये क्योंकि जनता विचारों की इस नयी लहर से अप्रभावित थी। परंपरा से भारत में चिंतन की जो पध्दति चली आ रही थी, वह टूट गयी। फिर भी कुछ लोग उससे इस ढंग से चिपके रहे, जिसमें न तो प्रगति थी, न रचना की नयी उद्भावना और जो पूर्ण रूप से नयी परिस्थितियों से असंबध्द थी।

पाश्चात्य विचारों में भारत का जो विश्वास जगा था, अब तो वह भी हिल रहा है। नतीजा यह है कि हमारे पास न तो पुराने आदर्श हैं, न नवीन, और हम बिना यह जाने हुये बहते जा रहे हैं कि हम किधर को या कहाँ जा रहे हैं। नयी पीढ़ी के पास न तो कोई मानदंड है, न कोई दूसरी ऐसी चीज, जिससे वह अपने चिंतन या कर्म को नियंत्रित कर सके।

यह खतरे की स्थिति है। अगर इसका अवरोध और सुधार नहीं हुआ तो इससे भयानक परिणाम निकल सकते हैं। हम आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों में संक्रान्ति की अवस्था से गुजर रहे हैं। संभव है, यह उसी स्थिति का अनिवार्य परिणाम हो। लेकिन आणविक युग में किसी देश को अपना सुधार करने के लिए ज्यादा मौके नहीं दिये जायेंगे। और इस युग में मौका चूकने का अर्थ सर्वनाश भी हो सकता है।

यह संभव है कि संसार में जो बड़ी बड़ी ताक़तें काम कर रही हैं, उन्हें हम पूरी तरह न समझ सकें, लेकिन, इतना तो हमें समझना ही चाहिये कि भारत क्या है और कैसे इस राष्ट्र ने अपने सामासिक व्यक्तित्व का विकास किया है। उसके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलू कौन-से हैं और उसकी सुद्रढ़ एकता कहाँ छिपी हुयी है। भारत में बसने वाली कोई भी जाति यह दावा नहीं कर सकती कि भारत के समस्त मन और विचारों पर उसी का एकाधिकार है। भारत, आज जो कुछ है, उसकी रचना में भारतीय जनता के प्रत्येक भाग का योगदान है। यदि हम इस बुनियादी बात को नहीं समझ पाते तो हम भारत को भी समझने में असमर्थ रहेंगे और यदि भारत को नहीं समझ सके तो हमारे भाव, विचार और काम, सब के सब अधूरे रह जायेंगे और हम देश की कोई ऐसी सेवा नहीं कर सकेंगे जो प्रभावपूर्ण और ठोस हो।

 

(जवाहर लाल नेहरू)

नई दिल्ली,

30 सितंबर 1955

 

पुनरुत्पादित और जारी द्वारा

डा॰ गिरीश

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मंगलवार, 4 अगस्त 2020

अयोध्या में शिलान्यास और भूमिपूजन के संघ परिवार के नाटक के ठीक पहले वामदलों का आंदोलन


उत्तर प्रदेश की जनता के ज्वलंत सवालों को लेकर वामपंथी दलों ने राज्य भर में प्रदर्शन किये

जनता के सवालों की अनदेखी करने वाले मुख्यमंत्री से त्यागपत्र की मांग की

लखनऊ- उत्तर प्रदेश को जंगलराज से निजात दिलाने, कोरोना से इलाज और वचाव के पुख्ता इंतजाम करने, महंगाई पर कारगर रोक लगाने, रोजगार और पलायन रोके जाने, बिजली की समस्या से निजात दिलाने, सूखा/ बाढ़ से राहत के कदम उठाने निजीकरण से बाज आने, मंडी क़ानूनों में किये गये किसान विरोधी संशोधनों को रद्द करने और हर तरह से विफल मुख्यमंत्री से त्यागपत्र की मांग को लेकर आज उत्तर प्रदेश के वामपंथी दलों ने समूचे उत्तर प्रदेश में प्रदर्शनों का आयोजन किया। राष्ट्रपति और राज्यपाल को संबोधित 11 सूत्रीय मांग पत्र जिलाधिकारियों को सौंपा गया।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी- मार्क्सवादी, भाकपा- माले एवं फारबर्ड ब्लाक का आरोप है कि देश और उत्तर प्रदेश के हालात बहुत चिंताजनक बने हुये हैं। उत्तर प्रदेश के हालात तो और भी खराब हैं। जहां एक तरफ कोविड-19 संक्रमण के तेजी से प्रसार और उससे हो रही मौतों से जनता को अमानवीय यातनायें झेलनी पड़ रही हैं, वहीं उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था बदतर है और यहां जंगलराज कायम हो गया है।

आये दिन अपहरण हो रहे हैं, फिरौती में बड़ी रक़में बसूल की जारही हैं और रकम ऐंठने के बावजूद हत्या कर दी जा रही हैं। दिन दहाड़े लूट, बलात्कार और दहेज हत्याएं, मजदूरों, किसानों दलितों एवं अल्पसंख्यकों का सामंतों, सांप्रदायिकों और सत्तासीनों द्वारा उत्पीड़न, रोजगार छिनने और अर्थाभाव से पीड़ित प्रवासी मजदूरों एवं दूसरे गरीब लोगों द्वारा आत्महत्यायेँ, साधारण और सामाजिक नागरिकों पर पुलिसिया अत्याचार आदि सातवें आसमान पर हैं। अनेक और फर्जी मुठभेड़ें दिखा कर तमाम अपराधियों को जेल भेजा जा रहा है, फिर भी अपराध थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। रोजगार मिल नहीं रहे, रोजगार देने के सरकार के दाबे खोखले निकले और कई बेरोजगार मजबूरी में और भटक कर अपराध की ओर प्रव्रत्त हो रहे हैं। इन हालातों में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार खो बैठे हैं।  

बिजली की समस्या ने तो सभी को छका रखा है। कोरोना और लाक डाउन से लुटे- पिटे लोगों को बढ़ कर भेजे जा रहे बिलों से भारी परेशानी हो रही है। लोड फैक्टर बढ़ा दिया है और किसानों के नलकूपों का बिल दो गुना आरहा है। आधे उत्तर प्रदेश में सूखा है, बिजली की भारी कटौती से फसलें तवाह होरही हैं। फाल्ट, कटौती से गर्मी में बीमारों, बुजुर्गों, बच्चों और नागरिकों को भीषण कष्ट झेलने पड़ रहे हैं। मंडी कानून समाप्ति ने किसानों के कार्पोरेट्स के हाथों लुटने की राह आसान कर दी है। बिजली समेत हर सरकारी संपदा को  बेचा जा रहा है।  उद्योग बंद होरहे हैं और मजदूर सड़क पर आ रहे हैं।

कोरोना वायरस संक्रमण रोकने और इलाज संबंधी व्यवस्थाएं चरमराई हुयी हैं अतएव लोगों को अपार कष्ट झेलने पड़ रहे हैं। सरकार ने कोरोना पीड़ितों को निजी अस्पतालों के हाथों लुटने को छोड़ दिया है। अन्य बीमारियों के मरीज भी इलाज न मिलने से दम तोड़ रहे हैं। पेट्रोल, डीजल, गैस बिजली की अभूतपूर्व महंगाई से हर चीज महंगी होगयी है और आर्थिक रूप से खोखली हो चुकी जनता को भूख, कुपोषण और मौत के मुंह में धकेल रही हैं। गरीबों को राशन नहीं मिल पा रहा है। भ्रष्टाचार कोरोना की रफ्तार से बढ़ रहा है।

आन लाइन कक्षाओं का लाभ गरीब परिवारों के बच्चों को नहीं मिल पाने से बच्चे और उनके मां बाप मानसिक तौर पर उत्पीड़ित और परेशान हो रहे हैं। आधी से अधिक आबादी के पढ़ाई से वंचित रह जाने से सामाजिक संतुलन और अधिक बिगड़ने जा रहा है। संघ के सांप्रदायिक और पूंजीवाद को बढ़ाने वाले एजेंडे को पनपाने वाली नयी शिक्षा नीति और अधिक संकट खड़ा करने जा रही है। आम लोग अन्य तमाम समस्याओं का सामना कर रहे हैं मगर केन्द्र और उत्तर प्रदेश सरकारें अपने पुश्तैनी सांप्रदायिक एजेंडे को आगे बढ़ाने में व्यस्त हैं। वे संविधान की मर्यादाओं का लगातार उल्लंघन कर रहे हैं।

राष्ट्रपति और राज्यपाल को संबोधित ज्ञापनों में वामदलों ने कहा कि उत्तर प्रदेश और देश की जनता की इस पहाड़ जैसी पीड़ा पर आपका और आपकी सरकार का ध्यान आकर्षित करने को आज उत्तर प्रदेश के वामपंथी दलों ने समूचे उत्तर प्रदेश के जिलों में सामूहिक रूप और लोकतान्त्रिक ढंग से आवाज उठायी है।  

हम मांग कराते हैं कि अप्रत्याशित रूप से बिगड़ चुकी उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था को पटरी पर लाने को ठोस और मानवीय प्रयास किये जायें। पुलिस दमन और सामंती अत्याचारों पर रोक लगायी जाये। अपराधियों, बलात्कारियों और भूमाफियाओं के खिलाफ सख्त कार्यवाही की जाये।

कोरोना काल में बिजली के बिल माफ हों, भुगतान कर चुके लोगों की धनराशि आगे के बिलों में समायोजित कर दी जाये। अधिभार में बढ़ोत्तरी रोकी जाये। विद्युत सप्लाई सुचारु की जाये। विद्युत निगम का निजीकरण रोका जाये। कोरोना के इलाज की व्यवस्थाओं को आमजनों के लिए राहतकारी बनाया जाये। अन्य बीमारियों से पीड़ितों को भी इलाज मुहैया कराया जाये। सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार और सुधार किया जाये।        पेट्रोल, डीजल और गैस की कीमतें पर्याप्त मात्रा में घटायी जायें। यात्री  भाड़ा और जरूरी सामानों की कीमतों को नीचे लाया जाये। अगले छह माह तक आयकर से बाहर सभी को प्रतिमाह रुपए 7500/- दिये जायें, हर व्यक्ति को दस किलोग्राम राशन मुफ्त दिया जाये। किसान विरोधी और कारपोरेटपरस्त मंडी क़ानून संशोधनों को रद्द किया जाये। सूखा/ बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में राहतकारी कदम उठाए जायें। आवारा पशुओं से किसानों को निजात दिलाई जाये।

उत्तर प्रदेश के नौजवानों और मजदूरों को प्रदेश में ही रोजगार दिया जाये। उद्योगबंदी से बेरोजगार होरहे श्रमिकों, पलायन कर लौटे लोगों तथा अन्य बेरोजगारों को रोजगार मिलने तक रु॰ 10 हजार प्रति माह बेरोजगारी भत्ता दिया जाये। कोरोनाकाल में शिक्षा से वंचित गरीब और आम परिवारों के बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था सरकार द्वारा की जाये। भारतीय शिक्षा व्यवस्था को नष्ट करने वाली नयी शिक्षा नीति धोखा है और अलोकतांत्रिक ढंग से थोपी जारही है। उसे रद्द कर प्रस्ताव पर व्यापक बहस चलायी जाये। इसे संसद के सामने लाया जाये।  

सरकारी उद्यमों/ संपत्तियों का निजीकरण बंद किया जाये। सार्वजनिक क्षेत्र को विस्तार दिया जाये। सभी सरकारी विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार को रोका जाये। सरकार की घोषित योजनाओं यथा - पीएम आवास, किसान सम्मान निधि, पेंशन आदि का लाभ सभी तक पहुंचाया जाये।

केन्द्र और राज्य दोनों की सरकारें भूमि पूजन/ शिलान्यास जैसे संविधान को क्षति पहुँचाने वाले कार्यों में लिप्त हैं। उन्हें संविधान की मर्यादाओं का पालन करने और जनता के प्रति दायित्वों को निभाने के निर्देश दिये जायें।

वामदलों ने कहा कि योगी आदित्यनाथ जनता के प्रति अपने दायित्वों को निभाने में पूरी तरह असफल रहे हैं, अतएव उन्हें मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे देना चाहिए।

डा॰ गिरीश

 


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शनिवार, 1 अगस्त 2020

भड़काऊ विज्ञापन पर भड़की भड़की भाकपा

डा॰ अय्यूब और अखबार की कारगुजारी निंदनीय

भाकपा ने माकूल दफाओं में कार्यवाही की मांग की

लखनऊ- 1 अगस्त 2020, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, उत्तर प्रदेश के राज्य सचिव मंडल ने पीस पार्टी के अध्यक्ष मोहम्मद अय्यूब द्वारा जारी एवं भाजपा के नजदीकी समाचार समूह के उर्दू अखबार में प्रकाशित भड़काऊ और असंवैधानिक विज्ञापन की कड़े शब्दों में निन्दा की है। पार्टी ने अय्यूब और अखबार दोनों के खिलाफ उचित दफाओं में अभियोग चलाने की मांग की है।
एक प्रेस बयान में भाकपा ने कहा कि डा॰ अय्यूब ने भड़कावेपूर्ण एवं असंवैधानिक विज्ञापन जारी किया है। इस विज्ञापन में पं॰ जवाहर लाल नेहरू, डा॰ भीमराव अंबेडकर एवं श्री राम मनोहर लोहिया के लिये भी आपत्तिजनक एवं अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया गया है। यह असहनीय और निंदनीय है।
यह और अधिक आश्चर्यजनक और आपत्तिजनक है कि इस विज्ञापन को संघ और भाजपा के अंध समर्थक समाचारपत्र समूह के उर्दू अखबार ने प्रकाशित किया है। मोहम्मद अय्यूब को गिरफ़्तार कर जेल भेजा जा चुका है, मगर अभी अखबार के विरूध्द कोई कार्यवाही नहीं की है। जबकि विज्ञापन में निहित दुर्भावना को प्रसारित और प्रचारित तो अखबारों ने ही किया है।
भाकपा ने कहा कि अय्यूब की यह कारगुजारी भाजपा के एजेंडे को ही सिंचित करती है। भाजपा निरंतर न केवल संविधान को चुनौती दे रही है अपितु धार्मिक भावनाओं को भी भड़काने की क्रियाएं कर रही है। भाजपा सरकार कानून व्यवस्था, अर्थव्यवस्था, कोरोना से निजात दिलाने, रोजगार दिलाने और गरीबों किसानों कामगारों को राहत दिलाने जैसे तमाम मुद्दों में विफल होचुकी है और इसीलिए वह इस प्रकार के कामों को अंजाम दे रही है। अय्यूब जैसों की कारगुजारी इनसे ध्यान बँटाती है और उससे भाजपा को मदद मिलती है।
भाकपा ने मोहम्मद अय्यूब पर माकूल दफ़ाएं लगाने और वैसी ही दफाओं में प्रकाशकों पर भी कार्यवाही करने की मांग की है। वरना इसे एकतरफा कार्यवाही ही माना जायेगा।
डा॰ गिरीश, राज्य सचिव
भाकपा, उत्तर प्रदेश  

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मंगलवार, 28 जुलाई 2020

CPI on Rising Crime in UP


अपराधों की बाढ़ पर भाकपा ने गहरी चिन्ता जतायी
4 अगस्त को वामपंथी दल प्रदेश भर में प्रदर्शन करेंगे
लखनऊ- 28 जुलाई 2020, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने उत्तर प्रदेश में ताबड़तोड़ आपराधिक वारदातों पर गहरी चिन्ता जतायी है। पिछले 24 घंटे में ही प्रदेश में लगभग एक सैकड़ा संगीन वारदातों ने प्रदेश के नागरिकों को पूरी तरह झकझोर के रख दिया है। भाकपा ने कहाकि राज्य सरकार शासन का अधिकार खो बैठी है और अब उसे त्यागपत्र दे देना चाहिये।  
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नाक के नीचे गोरखपुर में अपराधियों द्वारा व्यवसायी के पुत्र का अपहरण कर हत्या कर दी गयी। कानपुर देहात में भी एक अपह्रत व्यक्ति की हत्या कर दी गयी। गाजियाबाद में दिन दहाड़े एक परिवार को बंधक बना लूट की गयी। नोएडा में कार सवारों ने फीरोजाबाद के व्यवसायी से नकदी लूट ली। दर्जनों महिलाओं की हत्या कर दी गयी है। दर्जनों कत्ल, दर्जनों आत्महत्यायें और कई दर्जन फ़ौजदारियाँ प्रदेश में पिछले 24 घंटों में हुयी हैं। कई जगह तो पुलिस पर भी हमले हुये हैं।
इन वारदातों से प्रदेश सहम गया है। सामान्य नागरिक अपने को असुरक्षित समझने लगे हैं। अपराधों को रोक पाने में राज्य सरकार की विफलता से वे हैरत में हैं। अपराधों से निपटने का योगी सरकार का पैटर्न फ्लाप होगया है। “ कड़ी कार्यवाही के निर्देश दे दिये गये हैं, अफसरों का तबादला कर दिया गया है, मुआबजे की घोषणा कर दी गयी है” आदि जुमलों से अब जनता ऊब चुकी है।
अपराधों की बाढ़ से बदहवास सरकार अब केवल अंधाधुंध एंकाउंटर्स और मनमानी गिरफ्तारियों से अपराधों पर रोक लगाना चाहती है। जबकि भाकपा की द्रढ़ राय है कि भारी पैमाने पर बेरोजगारी के रहते इस समस्या पर काबू नहीं पाया जा सकता। प्रदेश में पहले से ही व्याप्त बेरोजगारी कोविड संकट में और बढ़ गयी है। रोज ब रोज रोजगार देने की मुख्यमंत्री की घोषणायेँ कागजी साबित हुयी हैं। रोजगार छिनने से हताश और पीढ़ित तमाम लोग आत्महत्यायें कर रहे हैं, रोजगार के लिये जान जोखिम में डाल कर अनेक प्रवासी वापस कार्यस्थल लौट रहे हैं और कई गुमराह तत्व अपराधों में लिप्त होरहे है। यदि सभी को रोजगार दे दिया जाये तो अपराधों की इस बाढ़ को बहुत हद तक थामा जा सकता है। लेकिन सरकार के पास रोजगार देने की कोई योजना नहीं है।

भाकपा द्वारा जारी प्रेस बयान में राज्य सचिव डा॰ गिरीश ने कहाकि बढ़ते अपराधों पर लगाम लगाने की मांग और अन्य कई मांगों को लेकर वामपंथी दलों द्वारा 4 अगस्त को समूचे उत्तर प्रदेश में प्रदर्शन कर आवाज उठायेंगे।
डा॰ गिरीश, राज्य सचिव
भाकपा, उत्तर प्रदेश

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शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

Left Criticise Law & Order in UP



फिरौती के बावजूद अपह्रत संजीत यादव की हत्या राज्य सरकार की असफलता की द्योतक
वामदलों ने जताया दुख और आक्रोश, परिवार को फिरौती की वापसी और सहयोग राशि देने की मांग की
लखनऊ- 24 जुलाई 2020, उत्तर प्रदेश के वामपंथी दलों- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी- मार्क्सवादी, भाकपा- माले एवं आल इंडिया फारबर्ड ब्लाक ने कानपुर में लैब असिस्टेंट के अपहरण और  उसके परिवार से 30 लाख रुपये बसूलने के बावजूद उसकी हत्या पर गहरा आक्रोश एवं दुख व्यक्त किया है।
वामपंथी दलों ने कहा कि अभी गाजियाबाद में पत्रकार की हत्या की स्याह खबर की स्याही  सूखी भी न थी कि एक और जघन्य कांड होगया। एक गरीब परिवार द्वारा किसी तरह फिरौती की बड़ी धनराशि अदा करने के बाद भी अपह्रत संजीत यादव की हत्या कर दी गयी। एक दो नहीं पूरे 35 दिनों में पुलिस अपह्रत को बचा नहीं सकी।  अपहरण होने पर यदि पुलिस नाकाम रहती थी तो लोग फिरौती देकर अपनों को बचा लेते थे, लेकिन भाजपा के इस कथित रामराज्य में तो फिरौती की लंबी रकम देने के बाद भी जान- माल सुरक्षित नहीं है।
अपने प्रेस बयान में वामदलों ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार के तमाम खोखले दाबों और मनमानी बहशियाना कार्यवाहियों के बावजूद उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था अस्त- व्यस्त- ध्वस्त होगयी है। हर दिन, हर पल एक से एक घिनौने और जघन्य अपराध होरहे हैं और 6 हजार से अधिक एंकाउंटर्स के बाद भी अपराधों में रत्ती भर कमी नहीं आयी। समस्या की जड़ कहीं और है और योगी सरकार गोलियां कहीं और दाग रही है।
वामदलों ने कहा कि अनेक समस्याओं के बोझ तले दब कर उत्तर प्रदेश की बहुमत जनता कराह उठी है। राज्य सरकार उनमें से किसी का भी निदान करने में विफल हो चुकी है। संपूर्णतः असफल सरकार शासन करने का नैतिक अधिकार खो बैठी है।
वामदलों ने मांग की कि संजीत यादव के सभी हत्यारों को एनएसए/ गैंगस्टर एक्ट में निरुध्द किया जाये, उसके परिवार को फिरौती वाले रुपये 30 लाख वापस कराये जायें, सरकार की विफलता के एवज में उसे 50 लाख दिये जायें तथा कानपुर के सारे पुलिस प्रशासन का ओवरहाल किया जाये।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव डा॰ गिरीश, माकपा के राज्य सचिव डा॰ हीरालाल यादव, भाकपा माले के राज्य सचिव का॰ सुधाकर यादव एवं फारबर्ड ब्लाक के राज्य संयोजक अभिनव कुशवाह ने चेतावनी दी कि बिगड़े हालातों के खिलाफ वामदल आंदोलन को बाध्य होंगे। उन्होने यह भी बताया कि वामदल उत्तर प्रदेश के इन हालातों पर कल वर्चुअल बैठक कर आगे की रणनीति बनायेंगे।
डा॰ गिरीश

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बुधवार, 22 जुलाई 2020

CPI Condemns slain murder of Journalist: Demanded Resignation of UP Govt.




पत्रकार विक्रम जोशी की मौत पर भाकपा ने रोष जताया, सरकार से त्यागपत्र की मांग की

लखनऊ- 22 जुलाई 2020, गाजियाबाद के पत्रकार विक्रम जोशी की हत्या पर गहरा दुख और रोष जताते हुये भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने राज्य सरकार से ज़िम्मेदारी लेने और मुख्यमंत्री के त्यागपत्र की मांग की है।
यहां जारी एक प्रेस बयान में भाकपा ने कहा “ मुख्यमंत्री ने संज्ञान लिया है, कड़ी कार्यवाही के निर्देश दे दिये गये हैं, मुआबजे की घोषणा कर दी गयी है, फलां- फलां को सस्पेंड या तबादला कर दिया गया है, मार दो, ठोक दो “ मुख्यमंत्री द्वारा तीन साल से रोज ब रोज की जा रही घोषणाओं के प्रसारण से उत्तर प्रदेश की जनता तंग आ चुकी है। जनता परिणाम चाहती है और उत्तर प्रदेश सरकार परिणाम दे नहीं पा रही है।
म्रतक पत्रकार पुलिस को लगातार लिखित शिकायतें कर रहे थे, पर पुलिस अकर्मण्यता और अहमन्यता से ग्रसित थी। परिणाम स्वरूप पत्रकार पर जान लेवा हमला हो गया और उनकी दुखद मौत होगयी। हमले से लेकर मौत तक मुख्यमंत्री ने कोई संज्ञान नहीं लिया। पत्रकार का परिवार अनाथ होगया तो अब बड़ी बड़ी घोषणाएँ की जारही हैं। “ इन घोषणाओं को अपने पास रख लीजिये और विक्रम जोशी के परिवार को विक्रम जोशी लौटा दीजिये सम्मानित मुख्यमंत्री जी! “ भाकपा ने आक्रोश के साथ सवाल खड़ा किया है।
भाकपा राज्य सचिव डा॰ गिरीश ने कहा- उत्तर प्रदेश में जंगल राज है। सरकार संरक्षित अपराधी हत्याओं को अंजाम दे रहे हैं, महिलाओं से बलात्कार और उनकी हत्याएं हो रही हैं, ठगी, लूट, छिनेती, अपहरण/ फिरौती और चोरियाँ आदि सरे आम जारी हैं। आपके खोखले दाबों  के बीच कोरोना के मरीज फुटपाथों पर दम तोड़ रहे हैं, अवसाद में लोग आत्महत्याएं कर रहे हैं आदि आदि।
पुलिस आम लोगों के प्रति क्रूर बनी हुयी है। लोगों को पीट रही है, जुर्माने बसूल रही है तथा झूठे मुकदमे दर्ज कर जेल पहुंचा रही है। आम आदमी की शिकायतों पर अमल नहीं किया जाता, जिसका दुष्परिणाम सभी के सामने है। रिश्वतख़ोरी और भ्रष्टाचार सातवें आसमान पर है। फर्जी एंकाउंटरों के जरिये सरकार और पुलिस अपनी ध्वस्त छवि को बचाने में जुटी है। पर जनता की रक्षा एंकाउंटर्स से नहीं होती, उसे सुरक्षा चाहिये, न्याय चाहिये।
भाकपा ने मांग की है कि पत्रकार के परिवार को बिकरू कांड में शहीद पुलिसकर्मियों के समकक्ष पावनायें दी जायें। हत्यारों को एनएसए में निरुध्द किया जाये तथा प्रदेश के सभी नागरिकों के जानमाल की सुरक्षा की जाये। जिम्मेदार अफसरों को दंडित किया जाये तथा व्याप्त अराजकता की सरकार ज़िम्मेदारी ले और त्यागपत्र दे।
डा॰ गिरीश, राज्य सचिव
भाकपा, उत्तर प्रदेश

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शनिवार, 18 जुलाई 2020

हिन्दुत्व की राजनीति गरीब विरोधी : भाकपा


वाराणसी में नेपाली मजदूर को प्रताड़ित करने वालों पर रासुका लगे
घटना से देश की प्रतिष्ठा को धक्का लगा, गरीबों में उपजा आक्रोश
पूर्व की शिकायतों पर कार्यवाही हुयी होती तो दुस्साहसिक घटना न होती 
लखनऊ- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने गत दिन वाराणसी में एक कथित हिंदूवादी संगठन द्वारा नेपाल के एक युवक के जबरिया मुंडन कराने, उसके सिर पर श्रीराम लिखने और उससे नारे लगवा कर वीडियो वायरल कराने की घटना की कठोर शब्दों में निन्दा की है। भाकपा ने इसे हिन्दुत्व के तालिबानियों की गरीब विरोधी और फासीवादी कार्यवाही करार दिया है। भाकपा ने इस कुक्रत्य को अंजाम देने वालों पर रासुका लगाने की मांग की है।
भाकपा ने कहा कि नेपाल के प्रधानमंत्री के अयोध्या संबंधी बयान से आस्थावानों को धक्का लगना स्वाभाविक है, और कई लोगों ने उसकी लोकतान्त्रिक आलोचना की है। बयान या घटनाओं पर विरोध प्रकट करना किसी का भी लोकतान्त्रिक अधिकार है। लेकिन बयान पर विरोध के नाम पर संबन्धित देश के किसी असहाय नागरिक का उत्पीड़न घोर निंदनीय है। यह घटना इसलिये भी पीड़ादायक है कि गरीब नेपाली लोग सहस्रो वर्षों से आजीविका के लिये भारत आते हैं और अत्यल्प पारिश्रमिक वाले कामों को वफादारी से अंजाम देते हैं। यह घटना इसलिये और पीड़ादायक है कि एक पड़ौसी देश के हिन्दू नागरिक के साथ प्रधानमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र और भारतीय संस्क्रति के प्रतीक नगर वाराणसी में हुयी है।
भाकपा ने आरोप लगाया कि एक नामनिहाद हिन्दू संगठन वाराणसी मे लगातार गैर कानूनी कार्यों में संलिप्त है। पिछले सप्ताहों में ही इसने वाराणसी में भाकपा कार्यालय के बोर्ड पर कीचड़ फेंकने की भड़कावे की कार्यवाही की, भाकपा कार्यालय एवं बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी ( BHU ) के मुख्य द्वारों पर उन्माद फैलाने वाले पोस्टर लगाये और लखनऊ में विधान सभा के सामने स्थित माकपा राज्य कार्यालय के बोर्ड पर कीचड़ उंडेलने का काम भी इसी संगठन का लगता है। भाकपा, माकपा और वामपंथी दलों ने बार बार इसकी लिखित शिकायतें कीं। यदि तभी इस गिरोह को दबोच लिया गया होता तो आज सारे संसार में भारत की प्रतिष्ठा गिराने का दुस्साहस करने की उसकी हिम्मत न होती।
भाकपा ने कहा कि 95 वर्षों से एक संगठन धर्म का चोगा पहन कर गरीब, दलित और आम जन विरोधी और एकल प्रभुत्व के सिध्दांत को परवान चड़ा रहा है। इससे कुकुरमुत्तों की तरह असहिष्णुतावादी संगठन पैदा होरहे हैं और निहितस्वार्थी लोग अराजक गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं। वाराणसी के इस कुक्रत्य के अलाबा कोयंबटूर में महान समाज सुधारक ई वी रामस्वामी पेरियार की प्रतिमा को भगवा रंग से पोत दिया गया तो रुड़की में अफ्रीकी देश के छात्रों को बुरी तरह पीटा गया। ऐसी ही मानसिकता रखने वाले एएमयू के एक मुस्लिम छात्र ने हिन्दू छात्रा को हिजाब पहनने की धमकी दी। ऐसे तत्व अपनी फर्जी आस्था की आड़ में समय समय पर अलग अलग बहानों से देश के कमजोर वर्गों को प्रताड़ित करते रहते हैं। अफसोस की बात है कि मौजूदा सत्ताधारियों का इन्हें खुला समर्थन मिलता रहता है।
भाकपा ने कहाकि एनएसए और देशद्रोह के कानून ऐसे ही तत्वों के लिये हैं, लेकिन मौजूदा शासक इनका दुरुपयोग अपने राजनेतिक विरोधियों के खिलाफ कर रहे हैं। वे समुदाय विशेष का चोगा पहन कर गरीबों का उत्पीड़न करने और कानून को ठेंगा दिखाने वालों को प्रश्रय प्रदान कर रहे हैं।
डा॰ गिरीश, राज्य सचिव
भाकपा, उत्तर प्रदेश

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