भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकारों से मांगी - स्थिति रपट निर्माण मजदूर नियमन कानून का अनुपालन संतोषप्रद नहीं

18 जनवरी 2010 को सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यों के मुख्य सचिवों के नाम सन्निर्माण कामगार (रोजगार नियमन एवं सेवा शर्त) कानून 1996 के कार्यान्वयन की अद्यतन स्थिति रपट (ेजंजने तमचवतज) मांगी है। यह स्थिति रपट 12 सप्ताहों के अंदर अर्थात 17 अप्रैल 2010 तक राज्य सरकारों को सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल करनी है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में केन्द्र सरकार को भी सलाह दी है कि वह इस कानून के प्रावधानोें के कार्यान्वयन की समस्याओं पर एक राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित करने की संभावना पर विचार करे। यह सर्वविदित है कि राज्य सरकारों द्वारा इस कानून के अन्तर्गत भारी रकम कल्याण सेस के रूप में नियोजकों से वसूल की जाती है, किन्तु संबंधित लाभार्थी कामगारों को अत्यल्प रकम ही मुहैया करायी जाती है। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकारों को आदेश दिया है कि वे तुरन्त निम्नांकित ग्यारह उपायों पर कदम उठाकर अब और अधिक बिना किसी देर किये कानून का कार्यान्वयन सुनिश्चित करें। ट्रेड यूनियनों और संबंधित पक्षों के हित में उन सभी ग्यारह उपायों को, जो राज्य सरकारों को करने हैं, ज्यों का त्यों नीचे हम यहां उद्घृत कर रहे हैं।1 - तीन महीने के अन्दर प्रत्येक राज्य में कल्याण बोर्ड का गठन पूरावक्ती स्टाफ के साथ करना है।2 - कल्याण बोर्ड की बैठके कम से कम दो महीने में एक बार करनी हैं और बोर्ड के नियमानुसार तमाम उत्तरदायित्वों का निर्वाह करना है।3 - निर्माण मजदूरों के निबंधन और कानून में उपलब्ध लाभों के बारे में लोगों को बताया जाना चाहिए। रेडियों, दूरदर्शन और मीडिया के सहारे कामगारों को बताना चाहिए कि कानून में क्या लाभ उपलब्ध हैं।4 - प्रत्येक राज्य सरकार निबंधन पदाधिकारी बहाल करे और प्रत्येक जिला पर कामगारों के निबंधक आवेदन पत्र प्राप्त करने के लिए कार्यालय खोलना चाहिए और आवेदन पत्रों की प्राप्ति के प्रमाणक निर्गत करना चाहिए।5 - निबंधित टेªड यूनियनों कानून, सेवा प्राधिकार और गैर सरकारी संगठनों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए कि वे कामगारों को निबंधन आवेदन पत्र दाखिल करने और उन्हें लाभ दिलाने की प्रक्रिया में सहायता करें।6 - सभी सरकारी ठेकों के कामगारों का निबंधन अनिवार्य बनाया जाना चाहिए और कामगारों को लाभ दिलाना चाहिए।7 - कल्याण सेस कानून के मुताबिक कल्याण सेस का संग्रह नियमित रूप से अनवरत करना चाहिए।8 - निबंधित कामगारों को निबंधन की तारीख से 6 महीने के अन्दर लाभ प्रदान करने का सिलसिला शुरू करना चाहिए और इसके लिए नियमावली में समुचित प्रावधान शामिल करना चाहिए।9 - कानून के कार्यान्वयन का जिम्मेदार कल्याण बोर्ड के मेम्बर सेक्रेटरी और श्रम सचिव को बनाया जाना चाहिए। प्रत्येक राज्य के श्रम सचिव का दायित्व निर्धारित करना चाहिए कि वह राज्य में विशेष अभियान चला कर कानून का कार्यान्वयन करे।10 - महालेखापरीक्षक एवं नियंत्रक (सीएजी) को कानून के कार्यान्वयन की सम्पूर्ण प्रक्रिया और कोष के इस्तेमाल का परीक्षण करना चाहिए।11 - कानूनी प्राविधानों के अन्तर्गत प्रत्येक बोर्ड को राज्य सरकार के समक्ष सम्यक कार्य प्रतिवेदन सुपुर्द करना चाहिए।बोर्ड का त्रिपक्षीय होना जरूरीगुजरात सरकार ने एक सदस्यीय बोर्ड बनाया है और यहां कल्याण सेस का पैसा कल्याण कोष के अलग खाता में जमा नहीं करके सामान्य सरकारी ट्रेजरी में जमा किया जाता है। उत्तर प्रदेश भी इसे नक्शे कदम पर चलता नजर आता है। यह बिलकुल गैर कानूनी है। नियमित कोष संग्रह, नियोजक और कामगारों का निबंधन तथा लाभों को मुहैया कराने के लिए अनेक राज्यों में पूरावक्ती स्टाफ नहीं नियत किये गये हैं। दिल्ली बोर्ड का अलग दफ्तर नहीं है। इसका पूरावक्ती स्टाफ नहीं है। इसमें ट्रेड यूनियनों का कोई प्रतिनिधि नहीं है। इसलिए भवन निर्माण कामगार कानून की धारा 18 के अंतर्गत प्रत्येक राज्य में त्रिपक्षीय बोर्ड का गठन सुनिश्चित करना चाहिए, जिसमें नियोजक, कामगार और सरकारी प्रतिनिधि अवश्य शामिल किये जायें। इस काम को कराने में सर्वोच्च न्यायालय का यह आदेश बहुत उपयोगी है क्योंकि इस आदेश में स्पष्ट निर्देश हैं कि राज्य बोर्ड का गठन त्रिपक्षीय होना चाहिए और बोर्ड का अलग स्टाफ और दफ्तर होना चाहिए ताकि वह अपने दायित्वों का पूरा निर्वाह्न कर सके।बोर्ड की बैठकें नियमित नहीं की जाती हैं। कभी-कभी ही बैठक होती है और दायित्वों का कार्य संपादन नहीं किया जाता। कम से कम दो महीने में एक मर्तबा बैठक अनिवार्य होनी चाहिए। बोर्ड के कार्यों, कामगारों के निबंधन, इसके लाभों के बारे में व्यापक प्रचार के उपाय करने चाहिए। निर्माण मजदूर कानूनी लाभों की उपयोगिता के ज्ञान से वंचित हैं। कामगारों को जानकारी देने के लिए सभी प्रकार के प्रचार-प्रसार के उपायों का इस्तेमाल करना चाहिए। इसके लिए कुछ खर्च का प्रावधान भी होना चाहिए।ऐसा देखा गया है कि कहीं-कहीं बोर्ड का गठन तो हुआ है, किन्तु कामगारों के निबंधन पदाधिकारी एवं अन्य स्टाफ बहाल नहीं किये गये हैं। परिणामस्वरूप नियोजकों और कामगारों का निबंधन नहीं होता है। ट्रेड यूनियनों के लिए उचित है कि वह अधिकाधिक कामगारों का निबंधन करायें। ऐसा करने में इसका भी ख्याल रखना चाहिए कि गैर निर्माण-कामगार का निबंधन नहीं हो। ऐसा होने में बोर्ड के कोष पर बुरा असर पड़ेगा। बोर्ड घाटे में जायेगा और वाजिब कामगारों को लाभ कम मिलेंगे या नहीं मिलेंगे। हमें जिम्मेदारी के साथ ऐसा काम करना चाहिए कि कल्याण बोर्ड आदर्श के रूप में काम करें जो अन्यों के लिए उदाहरण बनें।यूनियन प्रमाणीकरणनिर्माण मजदूरों के निबंधन प्रक्रिया में ट्रेड यूनियनों का प्रमाणीकरण स्वीकार किया जाना चाहिए। केरल, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश एवं पांडीचेरी के अनुभव बताते हैं कि यहां किस प्रकार ट्रेड यूनियनों द्वारा निर्माण मजदूरों का निबंधन सफलतापूर्वक किया जा सका। इस बात पर बल दिया जाना चाहिए कि राज्यों की नियमावली में ट्रेड यूनियनों का प्रमाणीकरण निर्माण मजदूरों की निबंधन प्रक्रिया में स्वीकार किया जाये। सर्वोच्च न्यायालय का ताजा आदेश ट्रेड यूनियन का यह अधिकार मंजूर करता है। राज्यों की नियमावली में ऐसे प्राविधानों को शामिल करने की मांग करनी चाहिए।हमारे यूनियनों के लिए यह कर्तव्य है कि सर्वोच्च न्यायालय के उपर्युक्त आदेश के आलोक मंे निर्माण मजदूरों के हक में राज्य सरकारों द्वारा कानून के क्रियान्वयन के लिए समुचित कदम उठाने के लिए वे आंदोलनात्मक दवाब बनायें। कम से कम सरकारी ठेकों में कार्यरत मजदूरों के निबंधन को तुरन्त अनिवार्य बनाया जा सकता है। राज्यों की नियमावली में ऐसा प्राविधान किया जाना चाहिए कि गैर निबंधित कामगारों से काम कराये जाने की स्थिति में नियोजकों पर भारी जुर्माना किया जाये। विशेष अभियान चलाकर कामगारों का निबंधन करके कार्यस्थल पर ही परिचय पत्र का वितरण किया जा सकता है।समय सीमा का निर्धारणबोर्ड बनने के बाद भी कामगारों के निबंधन नहीं किये जाने और सुविधायें नहीं प्रदान किये जाने के तथ्यों के आलोक में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया है कि बोर्ड बनने के बाद एक निश्चित समय-सीमा के अंदर कामगारों का निबंधन पूरा किया जाना चाहिए तथा कामगारों के आवेदन पत्रों का निष्पादन एक निर्धारित सीमा के अंदर सम्पन्न करना चाहिए। ऐसी समय सीमा के निर्धारण का प्रावधान राज्यों की नियमावली में किया जाना चाहिए।कई राज्यों में कल्याण कोष का संग्रह कम हुआ है। यूनियनों द्वारा इसके बारे में दबाव बनाना चाहिए कि नियोजकों का निबंधन समय सीमा के अंदर किया जाये और सेस का आकलन तथा वसूली प्रक्रिया कारगर तरीके से तुरन्त प्रारम्भ की जाये। सेस का आकलन योजना के अनुमानक (इस्टीमेट) के आधार पर परियोजना की स्वीकृति के समय ही किया जा सकता है।कार्यालय और पूरावक्ती स्टाफराज्य कल्याण बोर्ड का मेम्बर सेक्रेटरी पूरावक्ती पदाधिकारी होना चाहिए और उसका अलग कार्यालय होना चाहिए जिसमें पर्याप्त संख्या में कर्मचारी नियुक्त किये जाने चाहिए। दिल्ली जैसे अनेक राज्यों में बोर्ड बनने के सात वर्षों बाद भी निबंधन का काम पूरा नहीं किया गया और लाभार्थियों को लाभ नहीं पहुंचाया जा सका। इसका कारण यह बताया जाता है कि बोर्ड के काम के लिए कार्यालय और कर्मचारियों की सुविधा नहीं है। ऐसे राज्यों के लिए सर्वोच्च न्यायालय का यह आदेश निदेशात्मक है। यूनियनों को इसके लिए दबाव बनाना चाहिए।सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया है कि बोर्ड का लेखा अंकेक्षण लेखा महापरीक्षक और नियंत्रक (सीएजी) द्वारा होना चाहिए। यह महत्वपूर्ण है कि सीएजी लेखा परीक्षण के साथ-साथ बोर्ड के अन्य क्रियाकलापों का भी निरीक्षण करेगा। इसलिए हमारे यूनियनों को तथ्यों को उजागर करने में सक्रिय रहना चाहिए।अंतर्राज्यीय गमनागमननिर्माण उद्योग और उसी प्रकार निर्माण श्रमिक भी अनिवार्य रूप से स्थानांतरणीय हैं। भवन निर्माण और परियोजना कार्य पूरा होने पर बिल्डर्स/कंपनियां/नियोजक अन्य स्थानों में काम करने जाते हैं और उनके साथ श्रमिक भी स्थानांतरित होते हैं। ऐसे स्थानांतरण राज्य के अन्दर भी होता है और राज्य सीमा के बाहर भी। एक राज्य में काम समेट कर अन्य राज्यों में काम के लिए बाहर भी लोग जाते हैं। इसलिये जरूरी है कि एक राज्य में कामगारों का निबंधन और परिचय पत्र अन्य राज्यों में भी स्वीकार्य हो। कामगारों के अन्तर्राज्यीय गमनागमन को सुगम करने के लिये राज्य बोर्ड द्वारा जारी किया गया परिचय पत्र को अन्तर्राज्यीय मान्यता और अन्य राज्यों में इसकी स्वीकार्यता बनाना जरूरी है। ऐसा करना जरूरी है क्योंकि निर्माण उद्योग स्वयं अपने स्वभाव से स्थानांतरणीय है। अनेक बहुराज्यीय निर्माता कंपनियां हैं, जो अनेक राज्यों में एक साथ काम करती हैं, ठीक उसी तरह जैसा औद्योगिक व्यापार कारोबार में बहुराष्ट्रीय कंपनियां एक साथ अनेक राष्ट्रों में कार्यरत हैं।उदाहरण के लिये मान लीजिये कि बिहार बोर्ड में निबंधित एक श्रमिक मुंबई जाकर कुछ वर्ष काम करता है और उसके बच्चे बिहार के स्कूल में पढ़ते हैं तो उन बच्चों को शिक्षा सहायता का भुगतान बिहार बोर्ड द्वारा किया जाना चाहिये। वह कामगार रिटायर होकर फिर वापस बिहार आता है तो उसका मासिक पेंशन बिहार बोर्ड द्वारा किया जाना चाहिये। उसके पेंशन एवं सहायता राशि के खर्च का समायोजन महाराष्ट्र बोर्ड के साथ किया जा सकता है। ऐसा किया जाना सर्वथा उचित है, क्योंकि महाराष्ट्र बोर्ड ने उस परियोजना/निर्माता से कल्याण सेस की धनराशि वसूल की है, जिसके नियोजन में उस बिहारवासी कामगार ने काम किया। इस तरह का अंतर्राज्यीय प्रबंध का प्रावधान नियमावलियों में किया जाना चाहिये।निर्माण उद्योग और निर्माण श्रमिकों के इसी अन्तर्राज्यीय कार्य परिचालन के मद्देनजर एटक की सदा से मांग रही है कि ऐसे कामगारों को शीर्षस्थ राष्ट्रीय बोर्ड द्वारा परिचयपत्र जारी किया जाये, जो कामगार भविष्यनिधि योजना में दाखिले और सामाजिक सुरक्षा सुविधाओं की भुगतान प्रक्रिया को सुगम करें।हर दरवाजे तक पहुंचेंकृषि के बाद निर्माण उद्योग देश का सबसे बड़ा उद्योग है। यह सबसे बड़ा रोजगार दिलाने वाला श्रम प्रधान कारोबार है। अन्य उद्योगों के मुकाबले इसमें अधिकतम निवेश भी है। फिर भी इसमें कार्यरत मजदूरों की वर्गचेतना का स्तर न्यून है। इसका कारण श्रमिकों की कृषि जनित ग्रामीण पृष्ठभूमि है। विसम स्तरीय निर्माण मजदूर यद्यपि अनुभव से कार्यों में कुशल होते हैं, किंतु नियमित शिक्षा प्रमाणपत्र के अभाव में वे अकुशल या अर्द्धकुशल माने जाते हैं। वे गांवों में रहते हैं, शहरों की झुग्गी-झोपड़ियों में वास करते हैं और सड़क किनारे खुले आकाश में सर्दी-गर्मी की असहय पीड़ा सहते हैं। वे यूनियन कार्यालय में नहीं आते क्योंकि वे इसके लिये समय नहीं निकाल पाते। इसलिए ट्रेड यूनियनों को गांवों की झुग्गी-झोपड़ियों में निर्माण श्रमिकों के शरणस्थलियों में पहुंचने की योजना बनानी चाहिये। हमें नारा देना चाहिये - ”श्रमिक शरणस्थलियों में यूनियन, झुग्गी-झोपड़ियों में यूनियन, कार्यस्थलों पर यूनियन“। यूनियन बनाने के लिए हर दरवाजे पहुंचे।नयी कार्यशैलीनिर्माण मजदूरों को संगठित करने की नयी शैली विकसित की जानी चाहिये। निर्माण उद्योग में सब जगह ट्रेड यूनियन बनाने का पारंपरिक तरीका कारगर नहीं होता है। इसका सीधा कारण है कि निर्माण उद्योग का कार्य एक स्थान विशेष पर केन्द्रित नहीं है।निर्माण मजदूरों को संगठित करने की शैली अलग-अलग राज्यों की भिन्न परिस्थितियों में भिन्न-भिन्न हो सकती है। कोई एक बना बनाया फार्मूला सब जगह काम नहीं करता है। हमें कार्यस्थल पर मौजूदा परिस्थितियों के अनुकूल व्यावहारिक अनुभव से काम लेना होगा। जब हम कार्यक्षेत्र में प्रवेश करेंगे तो वहां मौजूदा हालात हमारा मार्गदर्शन करेंगे।यहां हम बताना आवश्यक समझते हैं कि अनेक स्थानों में हमारे कामरेडों ने श्रमिकों के रहने के वासस्थानों से ट्रेड यूनियन प्रारंभ सफलतापूर्वक किया। मजदूरों के कार्यस्थल आमतौर पर बदलते रहते हैं। उनके नियोजक भी बदलते हैं। मजदूर अनेक स्थलों पर कार्य करते हैं, लेकिन उनके रहने का स्थान बहुधा एक ही होता है।मजदूर केवल कार्यस्थल पर ही परेशानी का सामना नहीं करते, बल्कि वे रहने के स्थान पर झुग्गी-झोपड़ियों में कहीं ज्यादा मुसीबत झेलते हैं। आमतौर पर मजदूर सड़कों के किनारे रहते हैं। उन्हें पुलिस, म्युनिसिपल अधिकारी, मुकामी गुंडों और अपराधियों के उत्पात झेलने पड़ते हैं। यद्यपि निर्माण मजदूरों के रहने के क्वार्टर के लिये ठेकेदार/नियोजक कानूनी तौर पर जिम्मेदार होता है, किंतु ऐसी व्यवस्था हर जगह नहीं होती।मजदूरों के राशन कार्ड नहीं होते हैं। उनके बच्चों के लिए स्कूल नहीं होते। पीने का पानी, सफाई, शौचालय, चिकित्सा और सामान्य नागरिक सुविधाओं का अभाव होता है। वे अपने मूल निवास से दूर परदेश में रहते हैं। उनकी अपनी सांस्कृतिक परम्पराएं होती है। स्थानीय लोगों के साथ सांस्कृतिक सम्मिश्रण की उनकी समस्याएं होती हैं। क्या हम इन समस्याओं के प्रति आंखे मूंद सकते हैं? नहीं, हम ऐसा नहीं कर सकते। निर्माण मजदूरों को संगठित करने के सिलसिले में हमें निश्चय ही इन मुद्दों को हाथ में लेना होगा।
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ऑनलाइन आंदोलन की सम्भावना: एक विश्लेषण

आम तौर पर आंदोलन से मीटिंग, जुलूस, सत्याग्रह आदि समझा जाता है। लेकिन अब जमाना बदल रहा है और इसके साथ-साथ कई चीजें भी बदल रहीं हैं। इस बदलाव में कम्प्यूटर और इससे जुड़े इंटरनेट की बड़ी भूमिका है। प्रायः इंटरनेट का इस्तेमाल व्यक्तिगत तथा संस्थागत ईमेल भेजने के लिए किया जाता है।लेकिन हाल में इस क्षेत्र में नए प्रयोग देखने में आये हैं। अभी हाल ही में बीटी बैंगन के संबंध में फैसले के बारे में लोगों ने ईमेल भेजकर फैसला लेने वालों की नाक में दम कर दिया। नतीजा यह हुआ कि हुकूमत को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भारी दबाव के बावजूद उनके विरूद्ध फैसला लेना पड़ा।इसी प्रकार हाल में चर्चा में आये नोएडा के मोबाइल टावरों का मामला है। खबर है कि कुछ लोगों ने आबादी वाले इलाकों से उन टावरों को हटाने के लिए आंदोलन छेड़ने का फैसला किया। उक्त आंदोलन परम्परागत न होकर इंटरनेट के माध्यम से ऑन लाइन होना था। फिर क्या था, कुछ लोगों ने संबंधित प्रशासकों, मीडिया और समाचार पत्र के लोगों तथा अन्य प्रभावशाली व्यक्तियों के साथ-साथ आम लोगों को भी ताबड़तोड़ ईमेल भेजना शुरू कर दिया। ईमेल की इस भरमार ने प्रशासकों में दहशत का माहौल पैदा कर दिया और नतीजतन मोबाइल टावरों को आबादी वाले इलाके से हटाने का फैसला करना पड़ा। यह कार्य अभी सिर्फ नोएडा में हुआ है। लेकिन सम्भव है कि इससे प्रेरणा लेकर देश के अन्य शहरों के निवासी भी इस तरह का कार्य कर सकेंगे।ऐसे तो इस तरह की गतिविधियों में न तो भाषण, न ही जुलूस और न ही किसी तरह का सत्याग्रह का शोरशराबा होता है। इसलिए परम्परागत नजरिये से इसे आंदोलन की संज्ञा नहीं दी जा सकती है। लेकिन अगर हम इसके परिणामों को देखें तो यह भी यथार्थ में आंदोलन ही है।इसकी अच्छाई भी देखिए। इस तरह के आंदोलन के संचालन में कोई शारीरिक परेशानी नहीं होती है। पैसा बस नाममात्र का लगता है। आप घर बैठे लोगों को ईमेल भेज सकते हैं। अगर आपको किसी बड़े अधिकारी या मंत्री से मिलना है तो मीलों दूर आपको रोक दिया जायेगा। अगर चिट्ठी भेजते हैं तो उसका सचिव ही आगे नहीं भेजेगा। लेकिन ईमेल का करिश्मा देखिए। आप किसी को भी ईमेल भेज सकते हैं। आम तौर पर लोग अपना ईमेल खुद देखते हैं। इसलिए उन तक पहुंचना लगभग निश्चित ही है।सबसे बड़ी बात है कि आप देश के बाहर से भी ईमेल भेज सकते हैं। इसी प्रकार अपने यहां से अन्य देश में भी ईमेल भेज सकते हैं।इसके अलावा एक बड़ा फायदा यह है कि अकेला व्यक्ति ही ईमेल के माध्यम से बहुत कुछ कर सकता है, बशर्ते कि उठाया गया मुद्दा सही और लोकप्रिय हो। यहां पर अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता की कहावत भी गलत साबित होती है।देश की राजनीतिक पार्टियों और जन संगठनों को भी आंदोलन के इस परम्परागत तरीके को अपनाना चाहिए। अन्य परम्परागत गतिविधियों के साथ-साथ इसे भी उन्हें अपने गतिविधि का प्रमुख हिस्सा बनाना चाहिए।
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ममता का डि-रेल बजट

रेल बजट जब भी पेश किया जाता है तो आम तौर से आम नागरिकों को इसकी चिन्ता सताती है कि कहीं रेल के किराये में तो वृद्धि नहीं की गई? यदि यह वृद्धि नहीं होती है तो नागरिकों को कुछ सन्तोष रहता है।सर्वविदित है कि संसद का बजट सत्र अत्यन्त महत्वपूर्ण सत्र होता है। वास्तव में यह सत्र सरकार की आर्थिक नीतियों का आईना होता है। अगर आप किसी मेले में जायें तो मेले में कभी-कभी शामियाने लगे होते हैं जिनके अन्दर तमाशा दिखाने वाले अलग-अलग प्रकार के आईने लगा देते हैं। इन आईनों में अगर इन्सान अपनी शक्ल देखता है तो कहीं वो मोटी, कहीं पतली, कहीं लम्बी तो कहीं ठिंगनी दिखाई देती है। एक आध आईना ऐसा भी लगा होता है जहां इन्सान को अपनी जैसी शक्ल दिखाई देती है।ममता जी का रेल बजट या उसको कहा जाये डि-रेल बजट कुछ ऐसे ही तमाशों का शामियाना है, आदमी को अपने जैसा कुछ आईना बस रेल किराये न बढ़ने में ही दिखता है। कुछ रेलगाड़ियों को बढ़ा देने से, कुछ रिजर्वेशन शुल्क घटा देने से आम आदमी को मुश्किल भरी जिन्दगी में कुछ और बोझ न बढ़ने से कुछ तसल्ली तो होती है। यदि बात यहीं पर खत्म हो जाये तो सन्तोष हो, लेकिन ममता रेल में सब कुछ ऐसा सीधा-सादा नहीं जैसाकि दिखाया गया है।पश्चिम बंगाल में अगले वर्ष चुनाव होने हैं। सुश्री ममता बनर्जी वहां की सत्ता को हथियाना चाहती हैं, इसलिए उन्होंने अपने रेल बजट को उक्त हेतु को साधने का एक वाहक बनाया है। पश्चिम बंगाल के लिये तो घोषणाओं का पिटारा ही खोल दिया गया हैं। उन घोषणाओं का लागू होना उनका सरोकार नहीं है। इस कर्म में सुश्री ममता अकेली नहीं हैं, यूपीए-2 की पूरी सरकार भी इसमें पूरी तरह शरीक है।क्या वास्तव में यह रेल बजट इतना लोक-लुभावना है जैसाकि उसको एक अटपटी सी भाषा शैली में पेश किया गया था? बजट सत्र का उद्घोष राष्ट्रपति महोदया द्वारा अपने अभिभाषण से किया गया। अभिभाषण में ”आम आदमी“ का जिक्र बराबर आया परन्तु पूरे भाषण का सार तत्व नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों को जारी रखना ही है। उसी की पैरोकारी है, और उसी दृष्टि के अनुरूप यह रेल बजट प्रस्तुत किया गया है।पिछले रेल बजट की घोषणाओं पर यदि दृष्टिपात किया जाये तो पता लगता है कि वो पूरी नहीं की गयीं। जो कुछ कार्य सम्पन्न हुए उसमें भी सरकारी धन प्रस्तावित लक्ष्यों से कम व्यय किया गया और अपेक्षित प्राप्तियाँ बजटिये अनुमानों के प्रतिकूल रहीं। वर्ष 2009-10 की सकल शुल्क प्राप्तियाँ बजट अनुमानों से 65 करोड़ रूपये कम रहीं हैं तथा योजना निवेश में भी 2009-10 के बजटीय लक्ष्यों से 497 रूपये कम पड़े हैं। रेलवे का आपरेटिंग अनुपात भी 2009-10 में 2008-09 की अपेक्षा 90.5 प्रतिशत से बढ़कर 94.7 हो गया। विभिन्न सूचना माध्यमों में छपे यह तथ्य पूंजीपति वर्ग की लोक लुभावन नारों के अन्तर्गत छिपी चालाकी को अच्छी तरह से बयान करते हैं।पश्चिम बंगाल में अपने राजनैतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिये रेलवे मंत्री ने अभिनव प्रयोग किये हैं। रेलवे मंत्रालय तो दिल्ली में है परन्तु सियालदह रेलवे स्टेशन पर रेल मंत्री का एक कार्यालय एवं सचिवालय भी खुल गया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पूरी जानकारी में भारतीय संविधान की आत्मा के विरूद्ध रेल मंत्री का अधिकतर समय वहीं व्यतीत होता है। विचित्र हाल है।रेल मंत्री की दिल्ली से निरन्तर गैरहाजिरी भी एक कारण है जिसकी वजह से रेलवे में चालू वित्त वर्ष में दुर्घटनायें बहुत अधिक बढ़ी हैं। अभी तक रेल दुर्घटनाओं की संख्या 120 से अधिक के आंकड़े को पार कर चुकी है। उनमें हुई जान-माल की हानि का अन्दाजा पाठकगण स्वयं लगा सकते हैं। एक वह भी आदर्श था जब दुर्घटनाओं के कारण रेल मंत्री पद से इस्तीफा तक दे देते थे। परन्तु नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों की संस्कृति में ये आदर्श तो विलुप्त हो गये हैं। सम्भवतः वो पोंगापंथी अथवा पिछड़ी हुई विचारधारा की श्रेणी में आ चुके हैं। नव-उदारवादी आर्थिक नीतियां मानवीय मूल्यों और सरोकारों के विपरीत एक नई स्वार्थवादी संस्कृति को गढ़ रही है।बजट प्रस्तुत करने के पूर्व सुश्री ममता बनर्जी ने ‘विजन 2020’ के नाम से रेल विकास की योजना भी पेश की जिसमें कहा गया कि सन् 2020 तक 25 हजार लम्बी नई रेल लाइनें बिछाई जायेंगी। परन्तु इसके लिए धन कहां से आयेगा, इसका कोई ठोस ब्यौरा नहीं था क्योंकि केन्द्र सरकार के वित्त मंत्रालय ने तो स्वीकृति दी नहीं।आगामी चालू वित्त वर्ष की अनकों घोषणायें योजना आयोग की बिना स्वीकृति के ही की गई हैं। 2010-11 में रेलवे निवेश को मामूली सा कुल 1142 करोड़ रूपये बढ़ाया गया है। अनेकों नई ट्रेनों को चलाने का एलान है परन्तु अच्छी एवं सुविधाजनक यात्रा के सन्दर्भ में समस्त विचार एवं उपाय गायब हैं। यदि यात्री किसी भी एक रात की यात्रा के लिए जाये और उसके पास रिजर्वेशन का टिकट नहीं है तो उसको साधारण डिब्बों में भेड़-बकरियों के बाड़े की तरह बैठकर ही जाना पड़ेगा। डिब्बे में शौचालय तक जाने के लिए लाले पड़ जायेंगे। इन डिब्बों में रेलवे पुलिस के सिपाही यात्रियों को बैठाने हेतु जो वसूली करेंगे उसकी तो मार और सितम ऊपर से है। क्यों नहीं लम्बी दूरी की ट्रेनों में साधारण डिब्बे बढ़ाये जा सकते हैं? जिससे आम आदमी यात्रा कर सके। क्यों नहीं रेलवे के साधारण कोचों में शौचालय, लाईट, पंखों, सीटों एवं सफाई की अच्छी व्यवस्था हो सकती? साधारण डिब्बों की कमी के कारण जब यात्री स्लीपर कोच में बैठ जाते हैं तो वहां टीटी और जेब काटने को तैयार रहते हैं। अगर साधारण कोच बढ़ जायें तो लोगों को इस जेबमारी से मुक्ति मिल जाये। परन्तु इसके सुधार हेतु भी कोई उपाय नहीं किया गया है। गर्मी आते ही रेलवे स्टेशनों पर पानी के नल सूख जाते हैं। अब आम आदमी के पास रेल नीर या अन्य नीर खरीदने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। रेलवे प्लेटफार्मों और रेलवे ट्रैक की गन्दगी की सफाई का भी कुछ असरदार उपाय नहीं किया गया है। कुछ वीआईपी ट्रेनों को छोड़ दें तो बाकी ट्रेनों में भोजन की व्यवस्था अत्यन्त खराब है। पैन्ट्री कारों में भोजन गन्दगी में बनाया जाता है और भोजन की आपूर्ति ठेकेदारों के माध्यम से होती है और यह भोजन अत्यन्त ही घटिया किस्म का होता है। नौकरी पेशा लोगों की तनख्वाहें बढ़ने के कारण अब बहुत से नागरिक ए.सी. श्रेणी में भी यात्रा करते हैं पर वहां भी रेलवे की सुविधाओं में कोई सुधार नहीं हुआ है। वास्तव में गिरावट है। यात्रियों से टिकट के मूल्य में बिछाने के कपड़ों का पैसा ले लिया जाता है परन्तु कोच में चलने वाले ठेकेदारों के कर्मचारी बिना मांगे तौलिया तक नहीं देते हैं। ओढ़ने की चादर एक ही बर्थ पर दो-दो बार दे दी जाती है। इसके सुधार के लिए कोई भी उपाय नहीं किए गये हैं। धुलाई के पैसे बचाने की नियत से ठेकेदार के कर्मी यही करते रहेंगे।वर्ष 2009 के बजट से वर्ष 2010 के बजट में अगर इन बिन्दुओं पर कुछ प्रगति हुई होती तो सबको दिखाई देती पर ऐसा नहीं हुआ। बावजूद इसके कि सुश्री ममता बनर्जी ने अपने 3 जुलाई 2009 को प्रस्तुत बजट भाषण में बड़े रौब से इन बिन्दुओं पर ‘दृष्टिगोचर सुधार करना मेरी प्राथमिकता है’ कहा था। पाठक आगे देखेेंगे कि ममता जी ने सारी समस्याओं का निदान निजीकरण एवं ठेकेदारी प्रथा के आधार पर ही करने के मंत्र का जाप किया है।नव-उदारदवादी आर्थिक नीतियों के स्वपन जाल के महामंत्र के अनुरूप सभी घोषित कार्यक्रम पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) माडल के आधार पर कार्यान्वित किये जायेंगे। रेलवे स्टेशनों का आधुनिकीकरण, नई रेल लाइनों का बिछाना, भाड़ा तथा यात्री कारीडोरों, लोकोमोटिव, वैगन एवं कन्टेनर निर्माण, रेल एक्सल फैक्ट्री, पार्किंग काम्पलेक्स एवं रेल नीर बाटलिंग कारखाने सभी निजी क्षेत्रों को सौंप दिये जायेंगे।वास्तव में पीपीपी माडल सरकारी क्षेत्र का निजीकरण करने का ही एक चाशनीयुक्त नाम है। यह सब करके सुश्री ममता और यह यूपीए-2 सरकार क्या ‘आम आदमी’ की सेवा कर रही है? या उस ‘आम आदमी’ को निजी क्षेत्र के मुनाफे की लूट का चारा बनाने के उपक्रम को ही ‘सर्वसमावेशी’ कहा जाता है?सुश्री ममता बनर्जी का चाहे बजट हो, श्वेत पत्र हो या विजन-2020 दस्तावेज सबमें आर्थिक गतिविधियों के लिए एक ही लक्ष्य है और वो लक्ष्य वही है जो यूपीए-2 सरकार का है कि पूरी अर्थव्यवस्था को पूंजीपतियों के रहमो-करम पर छोड दें और सरकार सिर्फ ‘समर्थकारी’ भूमिका तक ही सीमित रहे। यही व्यवस्था श्री प्रणव मुखर्जी ने अपने बजट में भी की है।अपनी इस असली मंशा को छुपाने की गर्ज से ‘आम-आदमी’ एवं ‘सर्वसमावेशी’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है। बजट भाषण में बंगाल के चुनावों को निगाह में रखते हुए कहा गया है कि ‘अपने रेल परिवार को विश्वास दिलाना चाहूंगी कि हम रेलों का निजीकरण नहीं करने जा रहे हैं, यह एक सरकारी संगठन बना रहेगा।’परन्तु यह घोषणा एवं अन्य शब्द निरे ढपोर शंख हैं। ‘हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और’ की कहावत को सब जानते हैं। कुल दो महीने पहले दिसम्बर 2009 को पेश किये गये ‘श्वेत पत्र’ में ममता जी ने कहा है कि ‘सरकार के साथ तटस्थ सम्बन्ध बनाने के लिए भारतीय रेल निगम का निगमीकरण किया जायेगा’ तथा ‘मेन्टीनेन्स एवं उत्पादन जैसी गतिविधियों को आउटसोर्सिंग’ में दे दिया जायेगा। क्या यह प्रक्रिया निजीकरण की ओर बढ़ने का इशारा नहीं करती है। अगर नहीं करती है तो फिर श्वेत पत्र में सुश्री ममता ने इनका उल्लेख क्यों किया है?अपने ‘विजन 2020’ दस्तावेज में बड़ी-बड़ी बातों का उल्लेख करते हुए सुश्री ममता कहती हैं ”अगले 10 वर्षों में (अर्थात 2020 तक) लगभग 14 लाख करोड़ रूपये की आवश्यकता होगी उसमें से विश्व स्तरीय स्टेशनों और उच्च गतिवाले गलियारों में निवेश सार्वजनिक निजी भागीदारी के माध्यम से जुटाया जायेगा। बंदरगाह, सम्पर्क परियोजनाओं, बिजली/डीजल रेल इंजन निर्माण यूनिटों और नये सवारी डिब्बों के निर्माण यूनिटों को स्थापित करने के लिये अपेक्षित निवेश का एक मुख्य भाग विशेष प्रयोजन योजना या संयुक्त उद्यम के जरिये से निजी क्षेत्र की भागीदारी से जुटाया जायेगा।“ अगर विचारों में कुछ भी निरन्तरता है तो वो यह कि रेलवे को निजीकरण की राह पर चलाया जायेगा।हमने ऊपर उल्लेख किया है कि ‘विजन-2020’ दस्तावेज में यह भी कहा गया है कि अगले 10 वर्षों में 25,000 कि.मी. नई लाइने बिछाई जायेगी। आगामी वित्त वर्ष का लाइन बिछाने का लक्ष्य भी 1000 कि.मी. रखा है। जबकि रेल मंत्री स्वयं अपने बजट भाषण में कहती हैं कि पिछले 5 वर्षों का नई लाइन बिछाने का औसत 219 कि.मी. मार्ग है। तो ऐसा क्या जादू हो जायेगा कि यह औसत एक वर्ष में 1000 कि.मी. हो जायेगा? सिर्फ बातों के बताशे ही बताशें हैं।वो कहती है ‘हमारा कर्म रचनात्मक तथा अभिनव है। हमारे विचार सृजनात्मक है’ वास्तव में कर्म तो अभिनव है परन्तु उसकी नवीनता विध्वंस का वाहक है।घोषणाओं को करने में किसी धन का खर्चा नहीं होता है पर हकीकत स्वयं ममता जी अपने ‘श्वेत-पत्र’ - जिसमें उन्होंने लालू प्रसाद यादव को भी राजनैतिक रूप से फटकार लगाई है - में मुद्दा उठाते हुये बयान करती है कि ‘यह महत्वपूर्ण मुद्दा है कि बड़ी संख्या में स्वीकृत योजनायें लम्बित रहती हैं तथा समयबद्ध तरीके से इन कार्यों को पूरा करने के लिये पर्याप्त वित्त व्यवस्था नहीं होती है।’रेल मंत्री और यूपीए-2 सरकार खोखली नारेबाजी तो कर सकती है पर देश के करोड़ों नर-नारियों को गुमाराह नहीं किया जा सकता।
(अरविन्द राज स्वरुप)
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गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

आवारा सजदे

इक यही सोज़-ए-निहाँ कुल मेरा सरमाया है
दोस्तो मैं किसे ये सोज़-ए-निहाँ नज़र करूँ
कोई क़ातिल सर-ए-मक़्तल नज़र आता ही नहीं
किस को दिल नज़र करूँ और किसे जाँ नज़र करूँ?
तुम भी महबूब मेरे तुम भी हो दिलदार मेरे
आशना मुझ से मगर तुम भी नहीं तुम भी नहीं
ख़त्म है तुम पे मसीहानफ़सी चारागरी
मेहरम-ए-दर्द-ए-जिगर तुम भी नहीं तुम भी नहीं
अपनी लाश आप उठाना कोई आसान नहीं
दस्त-ओ-बाज़ू मेरे नाकारा हुए जाते हैं
जिन से हर दौर में चमकी है तुम्हारी दहलीज़
आज सजदे वही आवारा हुए जाते हैँ
दूर मंज़िल थी मगर ऐसी भी कुछ दूर न थी
लेके फिरती रही रास्ते ही में वहशत मुझ को
एक ज़ख़्म ऐसा न खाया के बहार आ जाती
दार तक लेके गया शौक़-ए-शहादत मुझ को
राह में टूट गये पाँव तो मालूम हुआ
जुज़ मेरे और मेरा रहनुमा कोई नहीं
एक के बाद ख़ुदा एक चला आता था
कह दिया अक़्ल ने तंग आके ख़ुदा कोई नहीं
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राहुल सांकृत्यायन की दुर्लभ पांडुलिपियों की चोरी - प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा उच्च स्तरीय जांच की मांग

महापंडित राहुल सांकृत्यायन की दुर्लभ पाण्डुलिपियों, पुस्तकों और उनके द्वारा संकलित पुरातात्विक अवशेष चोरी चले गये हैं। यह सनसनीखेज घटना आजमगढ़ के हरिऔध कला भवन में हुई है जहां राहुल जी और अन्य साहित्यकारों की दुर्लभ पुस्तकें एवं पाण्डुलिपियां रखी हुई थीं। इस बाबत सूचना देते हुए प्रगतिशील लेखक संघ के प्रान्तीय महासचिव डा. संजय श्रीवास्तव ने कहा कि इस प्रकरण को प्रशासनिक स्तर पर दबाने का प्रयास किया जा रहा है। डा. श्रीवास्तव के अनुसार जिलाधिकारी ही हरिऔध कला भवन का अध्यक्ष है बावजूद इसके घटना की प्राथमिकी तक दर्ज नहीं कराई गयी है। नगर के साहित्यकार एंव बुद्धिजीवी इस घटना से स्तब्ध हैं और रंगकर्मियों का एक समूह धरने पर बैठा हुआ है।आजमगढ़ से लौट कर इस घटना का विवरण देते हुए डा. श्रीवास्तव ने बताया कि कला भवन में जहां राहुल जी की पाण्डुलिपियां, पुस्तकें एवं पुरातात्विक महत्व की मूर्तियां रखी हुई थीं, उस कमरे में कोई ताला नहीं था और लावारिस पड़े बक्सों और चीथड़े हो गये गट्ठरों की हालत बताती है कि यहां कोई देखरेख नहीं की जाती थी। कमरे का वातावरण तो सहमा देने वाला है। एक डरावना दृश्य देखने को मिला। कमरे में बड़ी-बड़ी अस्थियाँ बिखरी पड़ी थीं। ये अस्थिपिंजर और बिखरे टुकड़े बिलकुल सूखे पड़े थे मानो कई वर्षों से वहां कोई आया ही न हो। यह भवन जर्जर हो चुका है और वैसे भी वहां लोग कम से कम आते-जाते हैं। लेकिन इन कमरों तक तो किसी की आवाजाही नहीं रही है। फिर ये अस्थियाँ किसकी हैं और यहां कैसे आईं, यह चौकाने वाला प्रसंग हो सकता है। धरने पर बैठे लोगों से मिलने आए एक पुलिस अधिकारी ने ही कहा कि यह बंदरों की अस्थियाँ हैं और बक्से व गट्ठर इन बंदरों ने ही तोड़े हैं। धरने पर बैठे साथियों से सुनकर मैं हतप्रभ रह गया। एक पुलिस अधिकारी बिना जांच पड़ताल के इस तरह क्यों बोल रहा है जबकि इन दिनों आपराधिक घटनाओं का दौर तेज है। बहरहाल अंतर्राष्ट्रीय महत्व की वस्तुओं के चोरी चले जाने का गम जिलाधिकारी और दूसरे हुक्मरानों को नहीं है। आजमगढ़ मण्डल मुख्यालय है, यहां कमिश्नर और डीआईजी स्तर के अधिकारी बैठते हैं। हरऔध कला भवन के अध्यक्ष जिलाधिकारी है, तब इस संस्थान का यह हाल हुआ है। घटना के दूसरे दिन आज तक जिलाधिकारी मौके पर नहीं गये लेकिन पूरे प्रकरण को लेकर साहित्यकार, रंगकर्मी और बुद्धिजीवी अपने नागरिक दायित्व का बोध करते हुए धरने पर बैठे हैं। मौके पर प्रसिद्ध विचारक और ‘कारवां’ के सम्पादक डा. रवीन्द्र राय, हरमंदिर पाण्डेय, रंगकर्मी राघवेन्द्र पाण्डेय, अभिषेक पंडित सहित अनेक साथी मिले। कमरे को अभी भी सीलबन्द नहीं किया गया है और न ही मौके पर पुलिस ही मौजूद रही। इस तरह राहुल जी की धरोहर को लेकर यह प्रशासनिक बदहवासी और उपेक्षा समाज और संस्कृति के लिए बड़ा आघात है।इस पूरे प्रकरण की सनसनी बनारस में भी फैल चुकी है। प्रसिद्ध कथाकार काशी नाथ सिंह, वरिष्ठ आलोचक प्रो. चौथी राम यादव, मूल चन्द्र सोनकर, जवाहर लाल कौल ‘व्यग्र’, डा. संजय कुमार, प्रो. राज कुमार, डा. श्री प्रकाश शुक्ल, डा. आशीष त्रिपाठी, शिव कुमार पराग, अलकबीर, डा. गोरख नाथ, डा. संगीता श्रीवास्तव, शशि कुमार सिंह, अशोक आनन्द आदि के साथ प्रगतिशील लेखक संघ ने इस तरह की प्रशासनिक लापरवाही पर दुख व्यक्त करते हुए सरकार से मांग की है कि तत्काल प्राथमिकी दर्ज कर पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच कराई जाये और दोषियों को अविलम्ब दण्डित किया जाये। यह निर्णय लिया गया कि शीघ्र ही यदि प्रशासनिक हस्तक्षेप नहीं हुआ तो धरने पर बैठे लोगों के समर्थन में प्रगतिशील लेखक संघ भी सम्मिलित होगा।
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बुधवार, 7 अप्रैल 2010

विश्व रंगमंच दिवस: 27 मार्च 2010 अंतर्राष्ट्रीय संदेश - डेम जूडी डेंच (प्रसिद्ध ब्रिटिश अभिनेत्री)

इन्टरनेशनल थियेटर इंस्टीट्यूट (यूनेस्को) पेरिसविश्व रंगमंच दिवस: 27 मार्च 2010 अंतर्राष्ट्रीय संदेश - डेम जूडी डेंच (प्रसिद्ध ब्रिटिश अभिनेत्री)विश्व रंगमंच दिवस नाटक को इसके अनगिनत रूपों में मनाने का मौका है। रंगमंच मनोरंजन व प्रेरणा का स्त्रोत है और उसमें सारी दुनिया की विविध संस्कृतियों तथा जनगणों को एकताबद्ध करने की क्षमता है। लेकिन रंगमंच इसके अलावा भी बहुत कुछ है, वह शिक्षा व जानकारी देने के अवसर भी प्रदान करता है।रंगमंच के प्रदर्शन सारी दुनिया में होते हैं और हमेशा केवल पारम्परिक ढंग से मचों पर ही नहीं, ये प्रदर्शन अफ्रीका के किसी छोटे-से गांव में हो सकते हैं, आर्मीनिया के किसी पहाड़ के पास या प्रशांत महासागर के नन्हें-से टापू पर। इसे बस स्थान और दर्शकों की जरुरत है। रंगमंच के पास हमें हंसाने-रुलाने की क्षमता है लेकिन उसे सोचने-विचारने के लिए प्रेरित करना चाहिए।नाटक सामूहिक कर्म से जन्म लेता है। अभिनेता सबको दिखाई पड़ते है लेकिन ऐसे तमाम अदभुत लोग हैं, जो नजर नहीं आते। वे अभिनेताओं की तरह ही महत्वपूर्ण हैं और उनके खास तथा विशेषज्ञतापूर्ण कौशल के कारण ही कोई प्रस्तुति सम्भव हो पाती है। हर उपलब्धि और सफलता का श्रेय उन्हें भी मिलना चाहिए।27 मार्च आधिकारिक रूप से विश्व रंगमंच दिवस है लेकिन कई तरह से हर दिन ही रंगमंच दिवस माना जाना चाहिए क्योंकि हम पर अपने दर्शकों के मनोरंजन, शिक्षण और प्रबोधन की जिम्मेदारी है - दर्शकों के बिना हमारा कोई अस्तित्व ही नहीं।(अनुवाद: डा. जितेन्द्र रघुवंशी)
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खून-ए-दिल में डूबो ली हैं उंगलियां मैंने


फैज अहमद फैज को मैंने तब देखा था, जब सज्जाद जहीर की लंदन में मौत हो गई थी और वह उनकी लाश लेकर हिंदुस्तान आए थे। लेकिन उनसे बाकायदा तब मिला, जब मैं प्रगतिशील लेखक संघ का सचिव था। यह इमरजेंसी के बाद की बात है। उन दिनों मैं खूब भ्रमण करता था। बड़े-बड़े लेखकों से मिलना होता था। एक मीटिंग में प्रगतिशील साहित्य को लोकप्रिय बनाने की बात चल रही थी। मैंने फैज साहब से पूछा कि आप इतना घूमते हैं, लेकिन हर जगह अंग्रेजी में स्पीच देते हैं। ऐसे में हिंदुस्तान और पाकिस्तान में हिंदी-उर्दू के प्रगतिशील साहित्य का प्रचार कैसे होगा? फैज साहब ने कहा, ‘इंटरनेशनल मंचों पर अंग्रेजी में बोलने की मजबूरी होती है। लेकिन आप लोग कम से कम उतना काम तो कीजिए, जितना हमने अपनी जुबान के लिए किया है।’ उसके बाद उनसे मेरा कई बार मिलना हुआ। फैज साहब के बारे में एक बात बहुत कम लोग जानते हैं। इसे ठीक से प्रचारित नहीं किया गया। जब गांधीजी की हत्या हुई थी, तब फैज ‘पाकिस्तान टाइम्स’ के संपादक थे। गांधीजी की शवयात्रा में शरीक होने के लिए वह चार्टर्ड प्लेन से आए थे और जो संपादकीय उन्होंने लिखा था, मेरी चले तो मैं उसकी लाखों करोड़ों प्रतियां लोगों में बांटू। गांधीजी के व्यक्तित्व का ऐतिहासिक मूल्यांकन करते हुए शायद ही कोई दूसरा संपादकीय ऐसा लिखा गया होगा। फैज साहब ने लिखा था - अपनी मिल्लत और अपनी कौम के लिए शहीद होने वाले हीरो तो इतिहास में बहुत हुए हैं, लेकिन जिस मिल्लत से अपनी मिल्लत का झगड़ा हो रहा हो और जिस मुल्क से अपने मुल्क की लड़ाई हो रही हो, उस पर शहीद होने वाले गांधीजी अकेले थे। पार्टीशन के बाद उन दिनों पाकिस्तान में लड़ाई चल रही थी। गांधी जी खुद को बड़े गर्व से हिंदू कहते थे, लेकिन यह इतिहास की विडंबना है कि नाथूराम गोडसे ने सेकुलर पंडित नेहरू को नहीं मारा, राम का भजन गाने वाले गांधी को मारा। फैज अहमद फैज उर्दू के प्रगतिशील रचनाकारों में सबसे प्रसिद्ध कवि हैं। जोश, जिगर और फिराक के बाद की पीढ़ी के कवियों में वह सबसे लोकप्रिय थे। नोबेल प्राइज छोड़कर उन्हें साहित्य जगत का सबसे बड़ा सम्मान और पुरस्कार मिला। फैज उन कवियों में थे, जिन्होंने अपने विचारों के लिए अग्नि-परीक्षा भी दी। मशहूर रावलपिंडी षड्यंत्र केस के वह आरोपी थे। सज्जाद जहीर और फैज साहब पर पाकिस्तान में मुकदमा चलाया गया था। उन्हें कोई भी सजा हो सकती थी। वे काफी दिनों तक जेल में रहे ही। फैज साहब के एक काव्य संकलन का नाम है - ‘जिंदानामा’। इसका मतलब होता है कारागार। अयूबशाही के जमाने में उन्होंने विद्रोहात्मक कविताएं लिखीं। उन्होंने मजदूरों के जुलूसों में गाए जाने वाले कई गीत लिखे, जो आज भी प्रसिद्ध हैं। मसलन,हम देखेंगेलाजिम है कि हम भी देखेंगेवो दिन कि जिसका वादा हैजब जुल्मोसितम के कोह-ए-गरांरूई की तरह उड़ जाएंगे.....जब बिजली कड़-कड़ कड़केगीहम अहल-ए-सफा, मरदूद-ए-हरममसनद पर बिठाए जाएंगेसब ताज उछाले जाएंगेसब तख्त गिराए जाएंगेऔर राज करेगी खुल्क-ए-खुदाजो मैं भी हूं और तुम भी हो। फैज अहमद फैज की इस चर्चित नज्म को पिछले दिनों टेलीविजन पर सुनने का मौका मिला। इसे पाकिस्तानी गायिका इकबाल बानो ने बेहद खूबसूरती से गाया है। फैज प्रेम और जागरण के कवि हैं। उर्दू-फारसी की काव्य परंपरा के प्रतीकों का वे ऐसा उपयोग करते हैं, जिससे उनकी प्रगतिशील कविता एक पारंपरिक ढांचे में ढल जाती है और जो नई बातें हैं, वे भी लय में समन्वित हो जाती हैं। उन्होंने कई प्रतीकों के अर्थ बदले हैं, जैसे उनकी एक कविता है - ‘रकीब’। रकीब प्रेम में प्रतिद्वंद्वी को कहा जाता है। उन्होंने लिखा कि मैं अपनी प्रेमिका के रूप से कितना प्रभावित हूं, यह मेरा रकीब जानता है। उन्होंने लिखा - मुझसे पहली-सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग। इतनी ही नहीं, उन्होंने ही यह लिखा - और भी गम हैं जमाने में मुहब्बत के सिवा। राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा। और लेखकों के लिए उन्होंने लिखा - मता-ए-लौह-ओ-कलम छिन गई, तो क्या गम है। कि खून-ए-दिल में डुबो ली हैं उंगलियां मैंने। दरअसल फैज में जो क्रांति है, उसे उन्होंने एक इश्किया जामा पहना दिया है। उनकी कविताएं क्रांति की कविताएं हैं और सरस भी हैं। सबसे बड़ा कमाल यह है कि उनकी कविताओं में सामाजिक-आर्थिक पराधीनता की यातना और स्वातंन्न्य की कल्पना का जो उल्लास होता है, वह सब है। फैज की दो और खासियतें हैं - एक, वह व्यंग्य कम करते हैं, लेकिन जब करते हैं, तो उसे बहुत गहरा कर देते हैं। जैसे - शेख साहब से रस्मोराह न की, शुक्र है जिंदगी तबाह न की। दूसरी बात फैज रूमानी कवि हैं। वे अपने भावबोध को सकर्मक रूप प्रदान करने वाले कवि हैं। क्रांति सफल नहीं हुई तो ऐसे में जो क्रांतिकारी कवि हैं, निराश होकर बैठ जाते हैं। कई तो आत्महत्या कर लेते हैं और कई जमाने को गालियां देते हैं। फैज वैसे नहीं हैं। उनका एक शेर है - करो कज जबीं पे सर-ए-कफन, मेरे कातिलों को गुमां न हो। कि गुरूर इश्क का बांकपन, पसेमर्ग हमने भुला दिया। अर्थात कफन में लिपटे मेरे शरीर के माथे पर टोपी थोड़ी तिरछी कर दो, इसलिए कि मेरी हत्या करने वालों को यह भ्रम न हो कि मरने के बाद मुझमें प्रेम के स्वाभिमान का बांकपन नहीं रह गया है। यह ऐतिहासिक यातना की अभिव्यक्ति है। यह समूचे समाजवादी आन्दोलन और समाजवादी चेतना की ऐतिहासिक अभिव्यक्ति है। राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन के दिनों में ऐसी अनेक कविताएं बाल कृष्ण शर्मा ‘नवीन’, निराला आदि कवियों ने लिखी थीं। कुछ इसी भावबोध पर लिखी उनकी एक नज्म है, जो मुझे अभी याद नहीं है। हां, एजाज अहमद ने उन पंक्तियों को अपने एक मशहूर लेख आज का मार्क्सवाद में उद्घृत किया है। जिसका भाव है - हमने सोचा था कि हम दो-चार हाथ मारेंगे और यह नदी तैरकर पार कर लेंगे। लेकिन नदी में तैरते हुए पता चला कि कई ऐसी लहरें, धाराएं और भंवरें हैं, जिनसे जूझने का तरीका हमें नहीं आता था। अब हमें नए सिरे से यह नदी पार करनी होगी। सो, फैज केवल रूप, सौंदर्य और प्रेरणा के ही कवि नहीं हैं, बल्कि विफलताओं और वेदना के क्षणों में साथ रहने वाली पंक्तियों के भी कवि हैं।
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मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

शिक्षा गरीबों की पहुंच से बाहर

1915 में केरल के एक गांव अरूहाबलम में दलित क्रांतिकारी अय्यान्कली एक अछूत लड़की पुलैया को एक मलयालम स्कूल में दाखिला दिलाने ले गये। ऊंची जाति वालों ने दाखिला लेने से मना कर दिया और स्कूल में आग लगा दी ताकि अछूत बच्चे ‘शिक्षा संस्था को अपवित्र‘ न कर सकें। इसके बाद देश के इतिहास में पहली कृषि हड़ताल हुई। यह हड़ताल मजदूरी बढ़ाने के लिए नहीं बल्कि स्कूलों में प्रवेश की मांग को लेकर हुई। इस घटना के करीब सौ साल बाद तथा भारतीय गणतंत्र के 60 साल के प्रयासों के बाद आज भी शिक्षा तथा शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश उतना ही दुर्लभ होगा जितना कि उस छोटी लड़की पुलैया के लिए था। इस बार प्रवेश के अधिकार के बारे में पूछा नहीं जायेगा बल्कि शिक्षा के खर्च के बारे में सवाल उठेगा।कर्ज-प्रेरित शिक्षाएक राष्ट्र के रूप में दलितों, आदिवासियों के बच्चों, लड़कियों तथा ग्रामीण इलाकों में छोटे एवं मझोले किसानों और शहरी क्षेत्रों में मेहनतकश औद्योगिक मजदूरों के बच्चों को पढ़ाने में आने वाली कठिनाइयों से गुजर चुके हैं। यहां तक कि नौकरी करने वाले मध्यवर्ग के लोग भी अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए कम फीस वाले सरकारी स्कूलों में जाना पसन्द करते हैं। यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलायंस-2 के मानव संसाधन विकास मंत्री का सपना पूरा होना है तो हमारे देश के नौकरीयाफ्ता तमाम मध्यवर्ग के लोग बैंकों के कर्जों से लद जायेंगे। अब से 10 साल बाद विदर्भ और तेलंगाना के कर्ज से लदे किसानों तथा अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त मध्य एवं उच्च मध्य वर्गों के नौकरी करने वालों के बीच कोई अंतर नहीं रह जायेगा।कोई उन बच्चों के अभिभावकों की पीड़ा की कल्पना कर सकता है जो अपने बच्चों को आस्ट्रेलिया भेजने के लिए बैंकों से कर्ज लेते हैं और कर्ज चुकाने के लिए परेशानी उठाते हैं? निजी बीमा कंपनियां और बैंक टेलीविजन पर लाइव क्रिकेट मैच के दौरान विज्ञापन देते हैं ताकि अभिभावक अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए कर्ज के जाल में फंस सकें। ऐसा इस तथ्य के कारण कि शिक्षा जो अभी तक महंगी, काफी खर्चीली, भूमंडलीकृत एंव निजीकृत बिजनेस की चीज हो गयी है जिसे बेचा जा सकता है। दुर्भाग्यवश ऐसा लगता है कि भारतीय मध्यवर्ग संप्रग-2 द्वारा भावी शिक्षा पर होने वाला खर्च के तैयार किए जा रहे खाके से अनभिज्ञ है। पहला सबूत यह है कि संप्रग-2 सरकार का संविधान के 95वें संशोधन को, जिसने अनुच्छेद 15(5) को शामिल करके दलितों, आदिवासियों एवं पिछड़ों के लिए शिक्षा को सुगम कर दिया है, लागू करने के प्रति न तो दिलचस्पी है और न ही प्रतिबद्धता। इस संविधान संशोधन के जरिए सभी सरकारी तथा सहायता प्राप्त और सहायता नहीं प्राप्त करने वाले शिक्षण संस्थाओं में इन वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है। लेकिन वह संप्रग-2 सरकार में होने वाला नहीं है।महंगी होती शिक्षासंप्रग-2 सरकार के आने के बाद शिक्षा अचानक बिकाऊ चीज बन गयी है और इसीलिए इस तरह का बयान सुनने को मिलता है कि शिक्षा को सरकार के चंगुल से मुक्त किया जा रहा है, उच्च शिक्षा परिदृश्य को बेहतर किया जा रहा है आदि आदि। भविष्य में इस तरह की जो दूसरी बात है वह यह कि शिक्षण संस्थाओं के आवेदन फार्म को ऊंची कीमत पर बेचा जायेगा। निजी शिक्षण संस्थाओं में आवेदन फार्म का मूल्य 500 रू. से शुरू होता है और 500 रू. से कभी कम नहीं रहता है, बाद में सरकारी शिक्षण संस्थाओं में भी यही होने वाला है। उसके बाद गरीबी रेखा से नीचे के छात्र जिनके परिवार की आमदनी अर्जुन सेनगुप्ता कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार रोजाना 20 रू. से अधिक नहीं है, क्या इस खर्च को वहन कर पाएगा? एक आवेदन फार्म खरीदने के लिए पूरे परिवार को एक महीना तक भूखे रहना पड़ेगा। आवेदन फार्म के मूल्य इतने ज्यादा हैं कि वे दैनिक मजदूरी करने वाले दो लोगों के पूरे एक महीने के वेतन के बराबर हैं। इसमें आश्चर्य नहीं कि संप्रग-2 सरकार का इरादा यह है कि शिक्षा को गरीबों की पहुंच के बाहर रखा जाए चाहे उनकी कोई भी जाति हो।दुर्भाग्य से शिक्षा का अधिकार केवल सरकार की संस्थाओं तक सीमित होगा तथा उन गरीब बच्चों को किसी ‘इलीट’ (विशिष्ट) पब्लिक स्कूल में प्रवेश पाने का अधिकार नहीं होगा क्योंकि न तो सरकार पब्लिक स्कूल की ऊंची फीस देगी और न ही पब्लिक स्कूल गरीब बच्चों को लेने के लिए तैयार हैं। इस प्रकार 2015 तक फिर कोई गरीब लड़की पुलैया होगी जो किसी पब्लिक स्कूल के बाहर खड़ी इंतजार कर रही होगी और उस समय तक आत्महत्या करने का दृश्य विदर्भ के किसानों से हटकर शहरी भारत के शिक्षित मध्य वर्ग तक पहुंच जायेगा। संप्रग-2 सरकार जो कुछ भी कर रही है वह है मानव संसाधन विकास मंत्री के इस सपने को साकार करना कि भारत को ‘बिजनेस हब’ बना देना है जहां शिक्षा बिकाऊ है। यह ‘शिक्षा के अधिकार’ के बावजूद होगा।शिक्षा बिल और मुकदमेंइन लक्ष्यों और उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए एचआरडी मंत्री ने शिक्षा ट्रिब्यूनल बिल लाया है जिसमें छात्रों और संस्थाओं के बीच होने वाले विवादों को निपटाया जायेगा। इसका मतलब होगा कि हमारे देश के वकीलों को ज्यादा काम मिल जायेगा। वे फौजदारी और अन्य मुकदमों के अलावा ऐसे मुकदमें भी लड़ेंगे जो शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच होंगे तथा विश्वविद्यालयों एवं कालेजों के विद्यार्थी अपने विवाद सुलझाने के लिए अदालत के चक्कर लगाते रहेंगे जिसका कोई अंत नहीं होगा। इसलिए यह वही है जो संप्रग सरकार चाहती है! यह वही है जो वकील से बने मंत्री चाहते हैं!इसके बाद आता है विदेशी शिक्षा प्रदायक बिल जो देश में विदेशी संस्थाओं को काम करने की इजाजत देंगे। वे शायद डालरों या यूरो में फीस लें जिससे विदेशी शिक्षा के पीछे पागल मध्यवर्गीय लोग बैंकों और कर्जदारों के पीछे भागंेगे ताकि वे शिक्षण शुल्क अदा कर सकें। संप्रग सरकार यहीं नहीं रूकती। अब अधिकृत प्रामाणिकता देने वाली एजेंसियों को देश में कार्य करने का अधिकार होगा, देशी और विदेशी दोनों। वे सारे देश में घूमकर निजी शिक्षण संस्थाओं को अंकित करेंगे - एक से पांच ‘तारे’ देकर। इस प्रकार विदेशी शिक्षण संस्थाएं और तब विदेशी प्रामाणिकता प्रदान करने वाली एजेंसियां हमारी संस्थाओं का मूल्यांकन करेंगी। हमारे देश में पहले ही एन.ए.ए.सी अर्थात राष्ट्रीय आकलन और प्रामाणिकता परिषद है। इसे यूजीसी ने सर्वोत्तम और प्रामाणिक संस्था के रूप में विकसित किया है। यह बंगलौर में है और इसकी देखरेख गोवर्धन महंता और प्र्रो. एच.ए.रंगनाथ सरीखे उच्च कोटि के विद्वान कर रहे हैं। फिर भी सरकार ने विदेशी संस्थाओं के लिए द्वार खोल दिये हैं।हमारे देश में वकीलों के पास अब बड़ा काम रहेगा। अब सरकार एक और बिल ला रही है। इसमें कैपिटेशन फीस पर रोक लगाने की बात की जा रही है। लेकिन वास्तव में अध्यापकों पर तकनीकी, मेडिकल संस्थाओं और विश्वविद्यालयों में अनियमितताओं पर रोक लगाने के नाम पर अंकुश लगाए जाएंगे। इसके पास होने के बाद पुलिस बार-बार किसी न किसी बहाने परिसरों में जाया करेगी। सुविधाएं न होने या अध्यापकों की वास्तविक/अवास्तविक गलतियों के नाम पर पुलिस को छूट मिल जायेगी। बिल में 25 किस्म के उल्लंघनों का जिक्र है। बिल का उल्लंघन करने पर केन्द्र सरकार राज्य सरकारों के अधिकार छीनते हुए शिक्षकों को सीधे 50 लाख रूपयों का दंड या 10 वर्षों तक की सजा दे सकती है! मौका मिलने पर हमारी पुलिस भारतीय दंड संहिता की धारा 420 तथा अन्य धाराएं भी लगा सकती है। यह सब जालसाजी से संबंधित होगा अर्थात हमारे शिक्षक अपराधी कहलाएंगे।इसका अर्थ यह नहीं है कि हमारे देश में लोगों को उल्लू बनाने वाली संस्थाएं नहीं हैं। लेकिन संसद को इस बात का ध्यान देना होगा कि आपराधिक रूझान है या नहीं। आखिर शिक्षण संस्थाएं ज्ञानार्जन के केन्द्र हैं न कि मुकदमेंबाजी के।हमारा मानव संसाधन मंत्रालय और संप्रग सरकार को देश के संघीय ढांचे के अंतर्गत राज्य सरकारों के अधिकारों की जरा भी चिन्ता नहीं है। शिक्षा देने या भाषाई संस्कृति एवं एकता संबंधी उनके अपने कुछ अधिकार हैं। एक समय ऐसा आएगा जब राज्यों में केन्द्रीय सरकार के हस्तक्षेप या किसी मानव संसाधन मंत्री द्वारा शिक्षा क्षेत्र में किसी को दबाने, नियंत्रित करने, प्रमाणपत्र देने, अपराधी घोषित करने के दखल पर पछतावा करना पड़ेगा। विश्व व्यापार संगठन के पीछे चलने के कारण संप्रग-2 शिक्षा के बाजारीकरण और निजीकरण की परिस्थितियां पैदा कर रही है। ये ‘विशेष शिक्षा क्षेत्र’ अलग किस्म के ‘सेज’ होंगे। बिना शक इससे अमीरों और गरीबों के बीच की खाई बढ़ेगी, भेदभाव बढ़ेगा, वह भी एक ऐसे देश में जहां शिक्षा गरीब-अमीर, ग्रामीण-शहरी में विभाजन का मुख्य प्रेरक है।
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सोमवार, 5 अप्रैल 2010

सब ताज उछाले जायेगें

हम देखेंगेलाजिम है कि हम भी देखेंगेवो दिन कि जिसका वादा हैजो लौह-ए-अजल में लिखा हैजब जुल्म ए सितम के कोह-ए-गरांरुई की तरह उड़ जाएँगेदम महकूमों के पाँव तलेजब धरती धड़ धड़ धड़केगीऔर अहल-ए-हिकम के सर ऊपरजब बिजली कड़ कड़ कड़केगीहम अहल-ए-सफा, मरदूद-ए-हरममसनद पे बिठाए जाएंगेसब ताज उछाले जाएंगेसब तख्त गिराए जाएंगेऔर राज करेगी खुल्क-ए-ख़ुदाजो मैं भी हूँ और तुम भी हो

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वो इन्तज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं

ये दाग़-दाग़ उज़ाला, ये शब गज़ीदा सहर
वो इन्तज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं

ये वो सहर तो नहीं कि जिसकी आरज़ू लेकर चले थे यार
कि मिल जायेगी कहीं न कहीं फ़लक के दश्त में तारों की आखिरी मंज़िल कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त मौज का साहिल कहीं तो जाके रुकेगा सफ़ीना-ए-ग़म-ए-दिल

जवाँ लहू की पुर-असरार शाहराहों में चले जो यार तो दामन पे कितने दाग़ पड़े पुकारती रहीं बाहें, बदन बुलाते रहे बहुत अज़ीज़ थी लेकिन रुखे-सहर की लगन

बहुत करीं था हसीना-ए-नूर का दामन सुबुक सुबुक थी तमन्ना, दबी-दबी थी थकन सुना है हो भी चुका है फ़िराके ज़ुल्मत-ओ-नूर सुना है हो भी चुका है विसाले-मंज़िल-ओ-गाम

बदल चुका है बहुत अहले दर्द का दस्तूर निशाते-वस्ल हलाल-ओ-अज़ाबे-हिज़्र हराम जिगर की आग, नज़र की उमंग, दिल की जलन किसी पे चारे हिज़्राँ का कुछ असर ही नहीं कहाँ से आई निग़ारे-सबा किधर को गयी अभी चिराग़े-सरे-रह को कुछ खबर ही नहीं

अभी गरानी-ए-शब में कमी नहीं आई निज़ाते-दीदा-ओ-दिल की घड़ी नहीं आई चले चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आई
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रविवार, 4 अप्रैल 2010

अंतर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट एवं वर्कर्स पार्टियों के सम्मेलन के कार्यकारी दल की बैठक

पुर्तगाल की कम्युनिस्ट पार्टी और दक्षिण अफ्रीका की कम्युनिस्ट पार्टी के निमंत्रण पर अंतर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट एवं वर्कर्स पार्टियों के सम्मेलन के कार्यकारी दल की बैठक लिस्बन (पुर्तगाल) में 13 और 14 मार्च को हुई।पहले ही तरह ही यह बैठक उन सभी पार्टियों के लिए खुली थी जिन्होंने अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लिया था। बैठक में वर्किंग ग्रुप के सभी सदस्यों सहित 13 पार्टियों - दक्षिण अफ्रीकी कम्युनिस्ट पार्टी, बेल्जियम की वर्कर्स पार्टी, ब्राजील की कम्युनिस्ट पार्टी, बोहमिया और मोराविया की कम्युनिस्ट पार्टी, साइप्रस की कम्युनिस्ट पार्टी, क्यूबा की कम्युनिस्ट पार्टी, स्पेन की कम्युनिस्ट पार्टी, ग्रीस की कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, भाकपा (मा), लेबनान की कम्युनिस्ट पार्टी, पुर्तगाल की कम्युनिस्ट पार्टी तथा रूसी संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के प्रतिनिधि उपस्थित थे।बैठक का उद्देश्य था कम्युनिस्ट एवं वर्कर्स पार्टियों के 12वें अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन की तैयारी करना जो दक्षिण अफ्रीका में होगा और दक्षिण अफ्रीका की कम्युनिस्ट पार्टी उसकी मेजबानी करेगी। बैठक में फैसला किया गया कि अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन जोहान्सबर्ग में इस साल 3, 4 और 5 दिसम्बर को होगा। सम्मेलन का विषय होगा, ”पूंजीवाद का गहरा होता संकट, सार्वभौमिकता की रक्षा, सामाजिक गठबंधनों को गहरा करने तथा शांति, प्रगति एवं समाजवाद के लिए संघर्ष में साम्राज्यवाद विरोधी मोर्चा को मजबूत बनाने में कम्युनिस्टों का कर्तव्य“।बैठक में ताजा अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं, पूंजीवाद के गहराते संकट और पूंजीवाद की बौखलाहट तथा मजदूरों एवं लोगों द्वारा उसका डटकर मुकाबला करने के बारे में सार्थक विचार-विमर्श हुआ। बैठक में समाजवादी क्यूबा के साथ एकजुटता प्रकट की गयी तथा इस संबंध में एक प्रस्ताव पारित किया गया।बैठक में भाग लेने वाली पार्टियों ने भी साइप्रस की जनता के संघर्ष के साथ एकजुटता प्रकट की जो तुर्की के कब्जे के खिलाफ तथा दोनों देशों के एकीकरण के लिए संघर्ष कर रही है।बैठक में भाग लेने वालों ने नवम्बर 2009 में दिल्ली में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में पारित प्रस्ताव के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहरायी। इस संदर्भ में नाजी-फासिस्टवाद पर विजय की 65वीं वर्षगांठ मनाने का फैसला किया गया तथा इस बारे में एक संयुक्त बयान जारी किया गया जिसमें 9 मई 2010 को विभिन्न देशों में प्रदर्शन आयोजित करने का आह्वान किया गया। ”शांति के लिए नोटो के खिलाफ“ शीर्षक से एक घोषणा जारी की गयी जिसमें विश्व भर में मजदूरों एवं सामाजिक संगठनों का आह्वान किया गया कि वे शांति के लिए तथा युद्ध तथा नाटो के खिलाफ संघर्ष में व्यापक भागीदारी करें।सम्मेलन में भाकपा की ओर से उसके अंतर्राष्ट्रीय विभाग के सचिव पल्लब सेनगुप्ता ने भाग लिया।
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बजट 2010-11: गहराते सामाजिक असमानता के खतरनाक आयाम

किसी भी साल के बजट को दो स्तरों या तत्वों के रूप में देखा जा सकता है, कम से कम उसे समझने के प्रयास की शुरूआत के रूप में। एक तो उसमें राजकीय आय और व्यय के पुराने, नये और प्रस्तावित आंकड़े या संख्या होती है जिनका सिलसिलेवार पूरा ब्यौरा विभिन्न मदों में बजट के दस्तावेजों में दर्शाया जाता है। दूसरे कुछ गुणात्मक पहलू होते हैं जो विशेष रूप से चुने हुए जुमलों, वाक्यांशों और सिद्धांतों की दुहाई देते हैं। ये एक ओर तो सरकार के कामकाज और चरित्र को जन-हितैषी साबित करने के मकसद से चुने या गढ़े जाते हैं। दूसरे, उन्हें इस तरह बहु अथवा द्विअर्थी रखा जाता है कि हमारे गैर-बराबरीमय समाज में सत्ता और शक्ति के असली ध्रुवों को भी अपनी सरकार की नीयत, नीतियों, निर्णयों और कार्यों पर भरोसा बना रह सके। वैसे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से बजट तथा नीति निर्माण में इन तबकों की दखल और सीधी भागीदारी पिछले दो दशकों से लगातार बढ़ी है। जैसे-जैसे आम आदमी का जीवन दूभर होता जाता है, उसे अधिकाधिक हाशिये पर डाल दिया जाता है। उसी के साथ-साथ यह आकर्षक जुमलों, मोटी संख्याओं या नम्बरों का खेल भी नटवरलाली रूप ग्रहण करता जाता है। ऐसा ही गुणात्मक, सैद्धांतिक स्तर पर भी किया जाता है।
वर्तमान बजट
सन् 2010-11 के लिये प्रस्तावित बजट के ये दोनों पक्ष काफी अंशों तक इनकी दीर्घकालिक प्रवृत्तियों को प्रकट करते हैं। इस साल पेश बजट पुरानी, जमी-जमायी आर्थिक वृद्धि दर बढ़ाने के लिए निजी निवेश तथा तथाकथित उद्यमिता को बढ़ाने के लिए, राज्य की ‘समर्थकारी’ भूमिका को रेखांकित करने के लिए अपने बड़े मुद्दे के राजकीय खर्च को काफी कड़ाई से नियंत्रित करता है। इसका मकसद है सरकार बाजार से कम कर्ज उठाये ताकि कम ब्याज दरों पर निजी क्षेत्र, खासकर कम्पनी क्षेत्र, को प्रचुर मात्रा में कर्ज उपलब्ध होता रहे। निजी क्षेत्र को बैंक खोलने की इजाजत भी इसी काम को आगे बढ़ायेगी। राज्य खर्च की कानून हदबंदी राज्य को अपने पैर पसारने से भी रोकता है ताकि सार्वजनिक सेवाओं तक राज्य को बाहर रखकर या हाशिये पर डालकर उच्च शिक्षा, जटिल-महंगी चिकित्सा, यातायात, मूलभूत आधार क्षेत्रीय सेवाओं आदि के मलाईदार हमेशा मांग में रहने वाले भारी मुनाफादायक क्षेत्र बड़ी-बड़ी कम्पनियों के हाथ में आ जायें। बस इन कामों के ‘सार्वजनिक’ चरित्र का इस्तेमाल बायेबिली गैप फंड यानी मुनाफे की अप्रर्याप्तता को पूरा करने के लिए सार्वजनिक धन की छद्मरूप से सहायता लेकर किया जा सके।
बजट और जनता
हां, गांवों की पाठशाला या वहां की चिकित्सा व्यवस्था या गांवों को जोड़ने वाली सड़के, गांवों तथा कस्बों की सफाई, पानी आपूर्ति की व्यवस्था, बाढ़ नियंत्रण आदि अनाकर्षक काम जरूर सरकार के हाथों में रहे। किन्तु ये काम भी इतने विशाल हैं, खासकर शिक्षा के अधिकार की कानूनी मान्यता तथा सबके लिए स्वास्थ्य जैसे जुमलों के प्रचलन के कारण कि इनके लिए खर्च की अगर समुचित तजवीज की जाये तो वित्तमंत्री को इस अति धनी तथा समृद्ध से समृद्धतर होते वर्ग की जेब में हाथ डालना ही पड़ेगा। कुछ अंशों तक इस ‘खतरे’ में अपने समतुल्य और बिरादराना तबकों को बचाने के लिए अब सेवाकर तथा अन्य प्रत्यक्ष करों का दामन ज्यादा अंशों तक थामा जा रहा है और आय, सम्पत्ति तथा मुनाफे आदि पर लगने वाले प्रत्यक्ष करों में कटौती की गयी हैं किन्तु एक तीर से दो पंछियों को मार गिराने में माहिर शासक वर्ग ने सरकारी कम्पनियों के शेयर, बाजार में निजी क्षेत्र को बेचकर एक भारी राशि, चालीस हजार करोड़ रुपयों की अपने खर्च को पूरा करने का फैसला भी बजट में जोड़ दिया है। इससे न केवल धनी वर्ग का संभावित कर भार कम होगा, किन्तु मलाईदार, जन धन तथा त्याग से बने नवरत्नों, मुक्त सार्वजनिक क्षेत्र में कई तरह से संेधमारी के रास्ते भी हमारे कम्पनी क्षेत्र के तथा शेयर बाजार के स्टोरियों को मिल जायेंगे।
जो बाजार स्वयं अपने को किसी अनुशासन में नहीं रख पाता है, जहां अरबों के सत्यमनुमा घोटाले आम प्रवृत्ति है जिनका यदाकदा ही और बहुधा आकस्मिक भंडाफोड होता है, जो विकट उतार-चढ़ाव के दौर से केवल मानसिक और ‘एनिमल स्पिरिट्स’ भेड़चाल प्रवृत्ति के कारण अस्थिरता का दूसरा नाम बन गया है, उसके द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के कम्पनियों को अनुशासित करने की कोशिश एक भारी अंर्तविरोध ही दर्शाता है। किन्तु हमारे बाजारवादी शासक जो पश्चिम के भयावह, जनविरोधी अर्थशास्त्र के कायल हैं और उन्हीं के सुझाये रास्ते पर आंखे मूंद कर चलते हैं, अपने राजकोषीय अनुशासन और बजट
प्रबंधन कानून के प्रति इतने संजीदा तथा समर्पित हैं कि वे (जैसा कि कार्ल पोलान्यी ने दशकों पहले कहा था) आर्थिक उन्नयन के लिए किसी भी सामाजिक कीमत को अधिक और गैर वाजिब नहीं मानते हैं।

नवउदारवाद के दुराग्रहों के समावेशी विकास की मखमली चादर में लपेटने के प्रयासों की कुछ अन्य बानगियां इस बजट में खोज पाना कोई मुश्किल काम नहीं है। कहा गया है कि तेज आर्थिक बढ़ोतरी सरकार को समाज तथा आम जन के कल्याण हेतु अधिक संसाधन उपलब्ध कराती है। इस साल के बजट अनुमान चालू कीमतों पर 12.5 प्रतिशत राष्ट्रीय आय वृद्धि की परिकल्पना पर बनाये गये प्रतीत होते हैं। जाहिर है कि राष्ट्रीय आय की वकालत उसके द्वारा ज्यादा बखूबी सामाजिक दायित्व पूरी करने की क्षमता पैदा होने का दावा करने वालों को कम से कम हर सामाजिक सेवा और गरीब तथा खास कर ग्रामीण गरीब तथा हर साल श्रम शक्ति में शामिल होते 120 लाख युवा वर्ग के लिए पुराने आबंटन को कम से कम 12.5 प्रतिशत से ज्यादा तो बढ़ाना ही चाहिए था। किन्तु शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, तंग बस्तियों और गांवों के लिए आधारभूत सेवाओं, रोजगार सृजन, सिंचाई, स्वच्छता तथा पेयजल आदि किसी भी काम के लिए राष्ट्रीय आय की अनुमानित वृद्धि के अनुपात में आबंटन नहीं किया गया है।
रोजगार एवं शिक्षा
इस बार रोजगार वृद्धि का कोई टारगेट भी घोषित नहीं किया गया है। शिक्षा के अधिकार को अमल में लाने के लिए कम से कम 81 हजार करोड़ रुपये सलाना चाहिए, किन्तु तजबीज मात्र 48 हजार रुपयों से कुछ कम की गयी है। उच्च शिक्षा के लिए 16.7 हजार करोड़ रु. की व्यवस्था तो हास्यास्पद लगती है, जब यह देखा जाता है, कि स्वयं छात्र अपनी उच्च शिक्षा के खर्च को निजी स्तर पर पूरा करने के लिए पिछले वर्ष बीस हजार करोड़ रुपयों से ज्यादा का निजी कर्ज बैंकों से लेने को विवश हुए थे। ऊपर तुर्रा यह कि उच्च शिक्षित युवकों को भी बेरोजगारी का सामना भी करना पड़ता है। चिकित्सा खर्च अब अस्पतालों के कम्पनीकरण के कारण निजी जेबों पर इतना भारी पड़ने लगा है कि वह अब किसानों और मध्य आय तबके तक के कर्ज के चक्र में फंसने का एक मुख्य कारण बन गया है। फिर भी सबके लिए स्वास्थ्य बीमा अभी कहीं भी कार्यान्वयन के क्षितिज पर नजर नहीं आता है।
यहां बहु-चर्चित, बहु-प्रशंसित और कई अर्थों में पहली गंभीर जनहितकर योजना ‘मनरेगा’ के बारे में इस साल के बजट की आपराधिक बेरूखी का अलग से उल्लेख बजट और समावेशी विकास की असलियत को समझने के लिए जरूरी है। इस तथाकथित फ्लैगशिप स्कीम के लिये महज एक हजार करोड़ की अतिरिक्त राशि की व्यवस्था संशय पैदा करती है कि यह कहीं घोषित प्राथमिकताओं के बारे में पुनर्विचार का संकेत तो नहीं है। बहरहाल केवल 5 करोड़ से कम परिवार इस योजना का आंशिक लाभ उठा पाये हैं और लाभान्वित से बाहर लोगों का आकलन 70 प्रतिशत तक किया जा रहा है। मात्र 65 लाख लोगों को एक सौ दिन का रोजगार मिल पाने की बात स्वयं गांव विकास मंत्री मानते हैं। इस साल न्यूनतम दिहाड़ी भी 100 रुपये प्रस्तावित है। सबसे गंभीर बात यह कि 15 रुपये से कम दैनिक खर्च पर लोगों को गरीब मानने वाले लोगों ने क्या कभी यह आकलन किया है कि लगभग 20 प्रतिशत खाद्य पदार्थों की कीमत बढ़ने का असर भुखमरी, कुपोषण, श्रम उत्पादकता तथा अपराधों के बढ़ने आदि पर क्या होता है? इस बेरुखी के मुकाबले आमतौर पर करोड़पति-अरबपति निर्यातकों को वैश्विक मंदी के झटके से उबारने के लिए अपनी पहल और लाॅबीज के मिले जुले असर के प्रति अतिउदार शासकों का खुमान इतना प्रबल है कि उनके लिए सहायता कोष जारी करने में राज के बीज अनुशासन को भुला दिया जाता है। अत्यंत शर्मनाक और कारपोरेट समूहों की अंध भक्ति का और उदाहरण क्या हो सकता है सिवा इसके कि कम्पनियों के पक्ष में कर खर्च रूपी ‘प्रोत्साहन’ की मात्रा ‘मनरेगा’ से एक सौ गुणा बढ़ाकर पिछले साल के चार लाख करोड़ रुपये में से अब 5 लाख करोड़ रुपये कर दी गयी है, बदले में खाद्यान्न, भ्रष्टाचार और हवाला रूपी प्रतिफल पाने के लिए। सारे देश में मनरेगा लागू करना वैसा ही है जैसे 98 प्रतिशत गांवों में स्कूल खोल देना। अभी भी 12 करोड़ से ज्यादा बालक-बालिकाएं विद्यमान घटिया और गैर-सार्थक शिक्षा से भी वंचित हैं।
वास्तव में देखा जाये तो मनरेगा में मजदूरी नहीं राहत राशि ही बांटी जा रही है क्योंकि 100 दिन का काम और कमरतोड़ मेहनत के बाद भी पूरी दिहाड़ी का वक्त पर नहीं मिलना इस काम को रोजगार साबित नहीं कर सकता है। बजट के दिन वाॅल स्ट्रीट जर्नल भारत के वित्तमंत्री के नाम खुली चिट्ठी छाप कर यह राय देता है कि अब सरकार के सामने दकियानूसी दक्षिणपंथी तथा वामपंथी कोई चुनौती बाकी नहीं बची है। अतः वे अब तथाकथित सुधारों की सड़क पर दौड़े तथा सामाजिक सेवाओं आदि झंझटो से अपने को आजाद कर ले। क्या मनरेगा के लिए मात्र एक हजार करोड़ रुपये का चालू कीमतों पर अतिरिक्त आवंटन इसी प्रतिष्ठित पत्र की राय के प्रति सकारात्मक रूख तो नहीं दर्शाता है? याद रहे कि सरकार के कई भूतपूर्व और वर्तमान सलाहकार भी नरेगा के खिलाफ लिख चके हैं और गांवों के बड़े धनी किसान भी खेत मजदूरों को मनरेगा द्वारा प्राप्त विकल्प से परेशान हैं।
बजट का फलसफा
चन्द अन्य पहलुओं का खुलासा बजट के अंकों और फलसफे दोनों का असली खाका खींचते हैं। पिछले साल वेतन आयोग के 102 हजार करोड़ रुपये बांट कर तथा चार लाख करोड़ का मंदी-विरोधी प्रोत्साहन पैकेज देकर राष्ट्रीय आय की वृद्धि को हवा दी गयी थी। इस आय तथा उसी बढ़त के असंतुलित तथा जनहित उपेक्षक रूप से चर्चा तक नहीं होती तो फिर उनसे दो-दो हाथ होने की तजबीजों का तो सवाल ही पैदा नहीं होता है। आयकर तथा कम्पनी कर में कमी समृद्ध लोगों को अप्रत्याशित अनायास अतिरिक्त आमदनी देकर आय की असमानता घटाने की मृतप्राय कोशिशों के ताबूत में और अधिक कील ठोक दी गयी है। इसके बलबूते अनप्रयुक्त उत्पादन क्षमता का उपयोग, नए निवेश के अवसर और विदेशी पूंजी को आकर्षित करने का आधार तैयार किया गया लगता है ताकि ‘ग्रोथ बढ़ती रहे चाहे वह एक कैंसर ग्रस्त अर्थव्यवस्था को ही और ज्यादा क्यों न फुलायें’। अप्रत्यक्ष करों का प्रत्यक्ष करों में की गयी कमी से लगभग दोगुना इजाफा कृषि जन्य पदार्थों की महंगाई को औद्योगिक उत्पादों तक ले जायेगा, खासकर ऊर्जा क्षेत्र की कीमतों को बढ़ाकर जहां पहले ही भारी भरकम बोझ विद्यमान है। लगता है कि सरकार केवल अपने द्वारा कर लगाकर आम जनता की जेब हल्की करने भर से संतुष्ट नहीं है। बाजार तक सरकार की साठगांठ से तेजी से बढ़ती महंगाई रूपी दानवी कारारोपण सरकार के चहेते पूंजीपति वर्ग की आय बढ़ाता है और देश के उत्पादन ढांचे के आम आदमी की जरूरतों के लिए उत्पादन तथा रोजगार अवसरों से विमुख करता जा रहा है।
कर संरचना
हमारे अप्रत्यक्ष करों की संरचना भी भारतीय उद्योगों के खिलाफ और आयातों यानी विदेशी उत्पादकों के हितों को बढ़ाने वाली बनती जा रही है। कई सालों से उत्पाद-शुल्क के रूप में भारत के देसी उद्योगों से ज्यादा राजस्व वसूला जा रहा है और काफी तुलना में विदेशी माल से कम राजस्व एकत्रित किया जा रहा है। इस दौरान मुक्त आयात नीति के कारण हमारा आयात बिल बेइन्तहा बढ़ा है। किन्तु सन् 2008-09 में सीमा शुल्क से प्राप्त 99879 करोड़ रुपये के मुकाबले देसी उत्पाद शुल्क से 108613 करोड़ रुपयों का राजस्व एकत्रित किया गया। सन् 2010-11 के अनुमान इसी प्रवृत्ति पर मोहर लगाते है। देसी माल खरीदने वाले साल भर में सत्रह हजार करोड़ रुपये ज्यादा सरकारी खजाने में भेजेंगे। देश के अपने उद्योगों के खिलाफ यह पक्षपात न केवल देश से रोजगार के अवसरों का निर्यात करता है बल्कि व्यापार घाटे को बढ़ता है और विदेशी पूंजी तथा भगौड़ी आवास पूंजी को आकर्षित करने वाली नीतियां अपनाने की बाध्यता को बढ़ाती है। अब तो एक-दो साल पहले यह स्थिति नजर आयी थी कि देश का आंतरिक औद्योगिक उत्पादन देश में आयातित औद्योगिक माल से कम हो चुका था। क्या यह देश के अनौद्योगीकरण की एक नयी किश्त की शुरुआत नहीं हैं?

हमने बजट में शामिल तत्वों, नीतियों और प्रावधानों की चर्चा अब तक की है। किसानों से कर्ज चुकाने पर ब्याज की दर में दो फीसदी की कमी जैसे कुछ वांछनीय और प्रशंसनीय कदमों पर उल्लास प्रकट किया जाना चाहिए। किन्तु सैकड़ों ऐसे जनहितकारी काम हैं जिनका अतापता बजट के किसी कोने में दिन में चिराग लेकर ढूंढ़ने पर भी नहीं लगेगा। वैसे कृषि के नाम पर बड़ी देसी-परदेसी कम्पनियों के पक्ष में नई सौगातों की बौछार की गयी है तथा 50 करोड़, छोटे, सीमांत किसानों की विशेष जरूरतों को नजरअंदाज किया गया है।
नवउदारवादी नीतियां
कुल मिलाकर इन नवउदारवादी नीतियों का कोई भी समर्थक यह दावा करने में समर्थ नजर नहीं आता है कि जो यह कह सके कि वृद्धि दर के लक्ष्य को प्राप्त करके, देसी-विदेशी पूंजी को चरने के लिए नए हर-भरे चारागाह देकर मुनाफा स्फीति की बेलगाम गति की ओर बढ़ाकर, अगला वित्तमंत्री अपने बजट भाषण में यह दबे स्वर में भी कह सके कि तीव्र बढ़त दर और समावेशी विकास की लघु बुनियादों के मजबूत करके हम कम से कम घटी गरीबी, बढ़ी खाद्य सुरक्षा, कम बेरोजगारी तथा कम से कम अपरिवर्तित विषमताओं और स्वास्थ्य पर्यावरण की दिशा में एक शुरूआत भर तो कर ही पाये हैं। इस साल के सीमांतक नवीन बजटीय
प्रावधान नव-उदारवाद के मृतप्रायः घोड़े को और अधिक हरी घास तथा हरे चने खिलाकर पिछले बीस सालों से मजबूत होती दुष्प्रवृत्तियों और कुविकास के चक्र को उल्टा घुमाना तो दूर रोक तक नहीं पायेंगे। क्या नक्सलवादी चुनौतियों को इन मूलभूत प्रवृत्तियों को मजबूती देकर कुछ छुटमुट प्रादेशिक स्तर तक सीमित प्रयासों से निपटा जा सकेगा? ऐसे अनेक सवाल जनता को इस बजट के निर्णयकर्ताओं और सलाहकारों से पूछने होंगे यदि भारत की जनता का विकास और जीवन जीने के अधिकार को जमीनी सच्चाई बनाना है।

कहा जाता है कि हजारों करोड़ रुपयों का आबंटन जनविकास के सामाजिक तथा कल्याणकारी कार्यक्रमों के लिये किया गया है। खासकर नवउदारवाद का समावेशी विकास से परिणय कराकर, उदाहरणार्थ, इस वर्ष के बजट में सामाजिक सेवाओं के लिये आबंटित योजना तथा योजना इतर राशि (157053 करोड़ रुपयांे), आधारभूत संरचना तथा गांवों और शहरों के गरीबों के लक्षित कार्यक्रमो की लम्बी फेहरिस्त तथा विशाल राशि का हवाला दिया जाता है। हम फिर भी यह मानते हैं कि ऐसा नवउदारवादी समावेशी विकास
अधिसंख्यक भारतवासियों की किसी भी अब तक चिरस्थाई बनी विशाल तथा कष्टकर समस्या का समाधान नहीं कर पायेगा। कुछ तथ्यों और विचारों पर नजर डालने से हमारे मत का औचित्य समझ में आ जाना चाहिए। कुल बजट खर्च करीब ग्यारह लाख करोड़ रुपये का है जो सारी राष्ट्रीय आय के करीब छठे हिस्से के करीब होता है। हमारे गैर-बराबरीमय देश में कम, अनिश्चित आमदनी वाले लोगों को जो कई आर्थिकेत्तर संख्याओं के सहारे जीते हैं, उनका अनुपात अस्सी प्रतिशत से ज्यादा है और उनकी सार्वजनिक खर्च की जरूरत भी सम्पन्न अल्पसंख्य (और आयकरों विभेदित विषमतामय) तबकों से कई गुना ज्यादा होती है। किन्तु खर्च में गरीब बहुमत का तुलनात्मक हिस्सा कम तथा शीर्षस्थ एक प्रतिशत से भी काफी कम लोगों का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष हिस्सा पूर्णमात्रा तथा तुलनात्मक दोनों तरह से बहुत ज्यादा होता है। उदारहरण के लिए लगाये गये करों से कम्पनी तथा बड़े व्यवसायों को अनेक छूटें और रियायतें दशकों से जारी है। पिछले बजट में लगाये गये करों को छोड़कर “प्रोत्साहन“ के बतौर करीब चार लाख करोड़ रुपये का कर-खर्च किया गया था। अब यह 5 लाख करोड़ हो रहा है। कम आय वाले तबकों का दशकों का बजट बमुश्किल इस खर्च के बराबर आता है। इस साल भी इस प्रक्रिया के तहत जनता के नाम पर जारी खाद्य तथा खाद सब्सिडी में कटौती की गयी है। दूसरी ओर कम्पनी कर की छूटों को हटाने की बकाया भर की गयी है और उन्हें सब्सिडी में कटौती से 5.5 गुना से ज्यादा बढ़ा दिया गया है।
सरकारी खर्च का लाभ
सरकारी खर्च का सीधा या अप्रत्यक्ष लाभ सामान तथा सेवाएं सप्लाई करने के रूप में धनी वर्ग को मिलता है। बजट भाषण में सरकारी तंत्र के नकारेपन और अकुशलता को एक भारी दिक्कत माना गया है। इसे और ज्यादा नौकरशाहीपूर्ण तरीकों से नहीं मिटाया जा सकता है। जब तक समावेशन में एक निश्चित तथा घोषित या ज्ञात काल खंड में हर भारतीय को साधिकार, सम्मानजनक मानवीय जीवन बिताने के न्यूनतम संसाधनों की पक्की गारंटी के साथ व्यवस्था नहीं की जाती है और पहले से ही समृद्ध, शीर्षस्थ तबकों के हकों में शक्ति और संसाधनों का अत्यधिक केन्द्रीकरण जारी रहता है, ये आंशिक कवरेज वाली, आंशिक कल्याण तथा संभावित क्षमता निर्माता स्कीमें राजनीतिक तिकड़मबाजी तथा भ्रष्टाचार के स्त्रोत बने रहेंगे। गरीबों से काम कराके उन्हें मजदूरी तक नहीं देने की असंख्य घटनाएं वास्तव में एक नई दास प्रथा तथा कफनचोरों की याद ताजा करते हैं। शीर्षस्थ तबकों और उनके लग्गू-भग्गू लोगों के पास निजी विवेक जो जवाबदेहविहीन मनमानी का दूसरा नाम है, का जितना बड़ा दायरा छोड़ा जायेगा, करोड़ों गरीबों को दिये गये हकों और संसाधनों की चोरी होती रहेगी। सबको पर्याप्त लाभ निश्चित अवधि में गारंटी करके इन आपराधिक अमानवीय रूझानों से मुक्ति की शुरूआत की जा सकती है। सबको लाभार्थी बनाने की गारंटी उनमें गलाकाट स्पर्धा की जगह पारस्परिक समर्थकारी एकजुटता की जड़े मजबूत करेगी। जब हम सम्पन्न लोगों को विकास प्रक्रिया का कर्ताधर्ता बनाते हैं जो शेष लोगों के स्वावलम्बन की नींव खोद देते हैं।

राजकीय दानधीरता और राजनीतिक प्रचार की भावना से पीड़ित तथाकथित विकास और कल्याण योजनाएं एक ओर तो शासन तंत्र और अर्थव्यवस्था के संचालित होते रहने की न्यूनतम जरूरतों का भाग है और दूसरी ओर लोकतांत्रिक व्यवस्था द्वारा आरोपित राजनीतिक तकाजा है। संक्षेप में आय सम्पत्ति और सत्ता के केन्द्रीकरण के साथ जनता को कुछ सीमित और कुछ लोगों को अनुकम्पा और निजीविवेक आधारित “लाभ“ तो दिया जा सके है, किन्तु अनेकों को वंचित रखकर, उन्हें संभावित लाभार्थियों की लम्बी क्यू में इंतजारत रख करके। यह किसी ऐसे विकास का आधार नहीं बन सकता है जो सामाजिक असमावेशन का उन्मूलन कर सके और भावी जनपे्ररित विकास का आधार बन सके।

सन् 2010-11 के बजट के वैचारिक आधार में सच्ची, सर्वसमावेशी, समतामय सामाजिक न्याय को कोई स्थान नहीं दिया गया है। उसका मकसद और वह भी सुदूर तथा अनिश्चित रूप से निचले बीस प्रतिशत लोगों के अन्त्योदय के द्वारा एक प्रतिशत से भी कम सुपर रईसों की सम्पत्ति में इजाफा करते हुए एक शीर्षोदयी रणनीति के द्वारा भारत की राष्ट्रीय आय को दुनिया के अन्य देशों की तुलना में ऊंचे स्तर तक ले जाना है। राष्ट्रीय आय का विशाल एबसोल्यूट आकार मुख्यतः हमारे विशाल भौतिक तथा जंकीय आकार का नतीजा है। नवउदारवादी बार-बार पैंतरे बदलते हैं, नये-नये स्वांग भरते हैं, नये-नये जुमले उछालते हैं ताकि बाजार के शीर्षस्थ अति लघु तबकों के हित को राष्ट्र हित का पर्याय बनाकर पोसा जाये और जनमत से मंजूर भी करा लिया जाये। राज्य की भूमिका घटाने के नाम पर उसे एक अतिलघु वर्ग का हथियार बना लिया गया है।

निरंतर बढ़ती हुई मात्रा में कई छद्म तथा खुले रूपों में ऐसी बजटीय तथा अन्य नीतियों को चलाते हुए हमारे शासक वर्ग ने लोकतंत्र की प्रक्रिया अपनाते हुए लोकतंत्र को एक गैर लोकतांत्रिक प्रतिफलदायक निजाम में बदल दिया है। आज चुनौती इन प्रक्रियाओं को समन्द कर उन्हें बहुमुखी, बहुमतावादी, अनेक संस्थाओं, रणनीतियों और जनउभार के बीच प्रभावी तालमेल स्थापित कर चालबाजियों भरी सामाजिक परिवर्तन को दूषित दिशाओं से हटाकर उन्हें लोकतांत्रिक सात्विक सार तत्वों से विमुखित करना है। हर बजट ऐसी चुनौतियों को नए सिरे से रेखांकित करता आ रहा है और सन् 2010-11 का बजट कोई अपवाद नहीं बल्कि उसकी अगली किश्त है। सीधे-सीधे बजट के संदर्भ में प्रगतिशील सार्वजनिक खर्च पैटर्न को प्रगतिशील कराधान तथा राजस्व प्राप्ति के अन्य तरीकों द्वारा पूरा करवाना एक घोर उपेक्षित किन्तु अति अपेक्षित और वांछित जरूरत है।

कमल नयन काबरा
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