भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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शनिवार, 6 अगस्त 2011

लो क सं घ र्ष !: आल इण्डिया स्टूडेन्ट्स फेडरेशन का इतिहास: महेश राठी


आल इण्डिया स्टूडेन्ट्स फेडरेशन भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन का बेहद गौरवमयी और प्रेरणाप्रद हिस्सा है। 0आई0एस0एफ0 भारतीय स्वाधीनता संग्राम का वह भाग है जिसके माध्यम से देश के छात्र समुदाय ने आज़ादी की लड़ाई में अपने संघर्षों और योगदान की अविस्मरणीय कथा लिखी। भारतीय इतिहास में छात्रांे के इस गौरवशाली संघर्ष गाथा का सफर 19वीं सदी से आरम्भ होकर आज़ाद भारत के तमाम उतार-चढ़ावांे से होते हुए 21वीं सदी के वर्तमान पड़ाव तक पहुँचता है।
भारतीय छात्र आन्दोलन का संगठित रूप 1828 में सबसे पहले कलकत्ता में एकेडमिक एसोसिएसन के नाम से दिखाई देता है, जिसकी स्थापना एक पुर्तगाली छात्र विवियन डेरोजियों द्वारा की गई। एकेडमिक एसोसिएसन देश का पहला छात्र संगठन था जिसने सामंतवाद विरोधी, स्वतंत्रता, प्रगति और आधुनिकता जैसे विचारों के प्रचार-प्रसार का काम किया। एकेडमिक एसोसिएसन के पश्चात दूसरा संगठित रूप 1840 से 1860 के मध्य यंग बंगाल मूवमेंट के रूप में दिखाई पड़ता है। यंग बंगाल मूवमेंट ने बंगाल के सामाजिक और राजनैतिक जीवन पर गहरा प्रभाव छोड़ा। इसके बाद भी छात्र संगठनों के रूप में छोटी और लगातार कोशिशंे दिखाई पड़ती हैं। इन सबके अलावा छात्र संगठन के रूप में दूसरी महत्वपूर्ण कोशिश 1948 में दादा भाई नौरोजी की पहल पर मुम्बई में स्टूडेन्ट्स लिटरेरी और साइंटिफिक सोसायटी के रूप में जान पड़ती है। कलकत्ता के आनन्द मोहन बोस और सुरेन्द्र नाथ बनर्जी द्वारा 1876 में स्थापित स्टूडेन्ट्स एसोसिएसन संभवतः 19वीं सदी का सबसे महत्वपूर्ण संगठन था। इस संगठन के नेतृत्व ने संगठन बनाने के लिए पहली बार जनसभाओं एवं जनान्दोलनों का सहारा लिया इसके अलावा इस संगठन ने 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना में विशेष एवं महती भूमिका अदा की। इन कुछ महत्वपूर्ण कोशिशांे के अलावा भी देश के कई अन्य भागों में युवा एवं छात्र संगठनों और छात्र आन्दोलनों की पहल अनेक छात्र नेताओं द्वारा की गई।
19वीं सदी का अन्तिम दशक और 20वीं सदी का शुरुआती दौर काफी घटना प्रधान समय था। विशेषतौर पर शिक्षा के प्रसार के लिए कई काम किए जा रहे थे, जहाँ बम्बई विश्वविद्यालय, मद्रास विश्वविद्यालय, कलकत्ता विश्वविद्यालय और इलाहाबाद विश्वविद्यालय की स्थापना हो चुकी थी तो वहीं कई काॅलेज और विद्यालयों की स्थापना भी इस दौर में हो रही थी। माध्यमिक और उच्चतर शिक्षा लेने वाले छात्रों की संख्या जहाँ दो लाख थी, स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर पर 14 हजार से भी अधिक छात्र शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। एक प्रकार से यह वह समय था जब छात्र आन्दोलन और संगठनों के लिए भौतिक परिस्थितियाँ धीरे -धीरे तैयार हो रही थीं। 20वीं सदी के शुरुआती दशक की परिस्थितियाँ छात्र आन्दोलनों और संगठनों के लिए बेहद उपयुक्त थीं। बंगाल विभाजन ने जहाँ देश की राजनीति पर एक अमिट छाप छोड़ी तो वहीं छात्र एवं युवा भी इस घटना से उद्वेलित और आन्दोलित हुए बिना नहीं रह सके। 1902 में स्थापित डान सोसायटी इस दौर का बेहद प्रभावशाली संगठन था। इंडियन यूनिवर्सिटीज कमीशन की एक रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद छात्र और शिक्षाविदों ने मिलकर 1902 में इस संगठन की स्थापना की। शिक्षा के लिए सबसे पहले स्वदेशी संस्थानों की माँग करने वाले इस संगठन ने ही भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में स्वदेशी और बंग भंग विरोध का आधार तैयार किया। 16 अक्टूबर 1905 में बंगाल का विभाजन हो गया। विभाजन के विरोध स्वरूप देश भर में बंग भंग विरोधी एक आन्दोलन उठ खड़ा हुआ। प्रतिरोध की इस आग के कारण छात्र समुदाय में भी एक जबरदस्त विरोध का उभार दिखाई दिया। इसी विरोध के परिणाम स्वरूप विदेशी वस्तुओं और वस्त्रों के बहिष्कार और स्वदेशी के इस्तेमाल और स्वदेशी शिक्षा की माँग को लेकर देश भर में स्वदेशी आन्दोलन की शुरुआत हुई। बंग भंग विरोध एवं स्वदेशी आन्दोलन भारत का पहला बड़ा छात्र-युवा आन्दोलन था, जिसमें कुछ दूसरे तबकों ने भी भाग लिया। इस आन्दोलन ने भारत के इतिहास में गहरा प्रभाव छोड़ा जिस कारण बाद के वर्षों में कई संगठनो और आन्दोलनांे ने जन्म लिया और इस आन्दोलन का फैलाव भी देश के अन्य भागों में होना शुरू हुआ। यह दौर छात्र समुदाय की संख्या में उतारोतर बढ़ोत्तरी के साथ ही छात्रांे की राजनैतिक गतिविधियों में भी गुणात्मक और मात्रात्मक उभार का था। छात्रों के संगठित होने की इसी कड़ी में 1906 में पटना में बिहारी स्टूडेन्ट्स सेन्ट्रल एसोसिएशन की स्थापना राजेन्द्र प्रसाद की पहल पर हुई। राजेन्द्र प्रसाद आगे चलकर आज़ाद भारत के पहले राष्ट्रपति बने। बिहारी स्टूडेन्ट्स सेन्ट्रल एसोसिएशन ने बिहार के सभी जिलों में अपनी शाखाएँ स्थापित करने के साथ ही कलकत्ता और बनारस तक भी संगठन का फैलाव किया। इस संगठन की स्थापना कोई अस्थायी घटना नहीं थी, यह संगठन 1921 के बाद तक भी संगठन के सम्मेलन नियमित रूप से आयोजित करता रहा और इसके अलावा 1908 में बिहार में कांग्रेस की स्थापना में भी इस छात्र संगठन की महती भूमिका रही।
एनी बेसेंट ने 1908 में बनारस से सेन्ट्रल हिन्दू कॉलेज नामक पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ किया। जिसमें उन्होंने कई बार एक अखिल भारतीय छात्र संगठन की आवश्यकता पर बल दिया। एनी बेसेंट की इन्हीं कोशिशों के कारण देश के शिक्षित हिस्से, छात्र, अध्यापक और राजनेताओं में अखिल भारतीय छात्र संगठन की जरूरत पर चर्चा होना शुरू हो गई। इन्हीं चर्चाओं के चलते 1917 में रूसी क्रान्ति हो गई जिसके कारण दुनिया में माक्र्सवादी विचारों का तेजी से प्रचार-प्रसार होना शुरू हो गया। समाजवाद के इस प्रचार ने दुनिया के स्वतंत्रता आन्दोलनांे पर गहरा प्रभाव छोड़ा तो वहीं दूसरी तरफ ब्रिटिश साम्राज्यवाद के संकटों को भी बढ़ाया। भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन में भी इन बदली हुई परिस्थितियों के कारण तेजी देखने में आई। भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के क्षितिज पर कई क्रान्तिकारी और जनाधार वाले नेताओं का उदय हुआ इनमें तिलक, महात्मा गांधी, लाला लाजपत राय, जवाहर लाल नेहरू और सुभाष चन्द्र बोस प्रमुख नाम थे। इसके साथ ही समाजवादी और वामपंथी विचारांे के फैलाव में भी तेजी आई। इसी के साथ 1919-20 में कई शहरों और प्रांतों में छात्र सम्मेलनों का आयोजन किया गया। यह असहयोग-आन्दोलन की तैयारियों का समय था। अन्त में दिसम्बर 1920 में कांग्रेस अधिवेशन के मौके पर एक अखिल भारतीय स्तर के छात्र सम्मेलन के आयोजन पर सहमति बनी। जिसके कारण 25 दिसम्बर 1920 को नागपुर में आॅल इंडिया काॅलेज स्टूडेन्ट्स काॅन्फ्रेंस का आरम्भ हुआ। इस सम्मेलन की स्वागत समिति के अध्यक्ष आर0 जे0 गोखले थे और इसका उद्घाटन लाला लाजपत राय ने किया। इस सम्मेलन में निर्णय लिया गया कि सभी छात्र असहयोग-आन्दोलन और स्वदेशी आन्दोलन में बढ़ चढ़कर भाग लेंगे। यह देश का पहला अखिल भारतीय स्तर का छात्र सम्मेलन था। इस पहल की खबर पूरे देश में तेजी से फैली और इसने छात्रांे के अन्दर एक नई तरह की राजनैतिक समझदारी और उत्साह का संचार किया। इस संगठन के कम से कम पंच सम्मेलन आयोजित किए गए और संगठन के तौर पर इस पहल ने कुछ वर्षांे तक सक्रियता के साथ काम किया।
1920 से 1935 के बीच का समय काफी घटना प्रधान था। इस दौरान देश में बड़े स्तर पर विद्याालयों और महाविद्यालयों की भी स्थापना हुई। छात्र समुदाय की संख्या में लगभग तीन गुना बढ़ोत्तरी 20वीं सदी की शुरुआत से अब तक हो चुकी थी। यह देश में एक मजबूत छात्र आन्दोलन के लिए भौतिक परिस्थितियाँ और आधार तैयार होने की प्रक्रिया थी। बड़ी संख्या के साथ ही देश की आजादी के संघर्षो में भी अब छात्रांे की एक महत्वपूर्ण भूमिका दिखाई दे रही थी। छात्र समुदाय अब राष्ट्र के सार्वजनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था। इसी के साथ नए-नए छात्र संगठनों के बनने की प्रक्रिया तेज हो रही थी। इसी दौर में 1928-30 के मध्य देश में यूथ लीग मूवमेंट नामक एक संगठन का निर्माण कुछ छात्र युवाआंे ने मिलकर किया। इस संगठन ने छात्रों और युवाओं के मध्य क्रान्तिकारी विचारांे का तेजी से प्रचार किया। यह संगठन छात्र, युवाओं के मध्य वामपंथी और माक्र्सवादी विचारों को ले जाने का वाहक बनकर उभरा। सोवियत रूसी क्रान्ति के प्रभाव से देश में छात्रों और युवाओं ने एक नई क्रान्तिकारी विचारधारा की राह प्रशस्त की। देश में समाजवादी क्रान्ति का शुरुआती सपना बुनने वालों में जवाहर लाल नेहरू, यूसुफ मैहर अली, सुभाष चन्द्र बोस और पूरन चन्द्र जोशी प्रमुख नाम थे। इस संगठन ने काॅलेज, स्कूल, गली मोहल्लों और बस्तियों के स्तर पर देशभर में संगठन की स्थापना की तथा लगातार पत्र पत्रिकाएँ प्रकाशित करके भी एक देशव्यापी छात्र संगठन के भविष्य की नींव रखी। छात्र आन्दोलनों की इसी कड़ी में पूरे देश में लगातार अलग-अलग प्रांतों में छात्र सम्मेलनों का आयोजन होता रहा। 1928 में कलकत्ता में पं0 जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में एक आॅल इण्डिया सोशलिस्ट यूथ कांफ्रेंस का आयोजन किया गया तो वहीं 1929 में लाहौर में मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में आल इण्डिया स्टूडेन्ट्स कंवेंशन का भी आयोजन किया गया, 1920-30 के मध्य पूरे देश के सभी प्रांतो में मानो छात्र संगठनो, सम्मेलनों और छात्र संघों की बाढ़ सी आ गई थी। लगातार छात्र संगठनों के बनने की ये घटनाएँ दरअसल एक अखिल भारतीय छात्र संगठन की जरुरतांे और उसके बनने की प्रक्रिया को रेखांकित कर रही थीं। पंजाब, बिहार, यूपी, मद्रास, कलकत्ता, इलाहाबाद, आसाम, बंगाल, लाहौर और सिंन्ध सभी जगह छात्र संगठन बन रहे थे जिनमें से अधिकतर का विलय आगे चलकर ए0आई0एस0एफ0 में हो गया। इनमें से कई संगठनों का किसी राजनैतिक धारा से जुड़ाव था तो कई बिल्कुल अराजनैतिक एवं स्वतंत्र संगठन थे।

क्रमश:
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शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

जननी-शिशु सुरक्षा कार्यक्रम: नयी घोषणाओं से क्या होगा जब सार्वजनिक चिकित्सा सेवा है ठप्प


सरकारी आंकडों के ही अनुसार देश में हर साल लगभग अड़सठ हजार महिलाओं की मौत प्रसव के दौरान हो जाती है और जन्म के एक महीने के भीतर ही नौ लाख से ज्यादा बच्चे मर जाते हैं और सरकार का दावा है देश तरक्की कर रहा है और आर्थिक वृद्धि 9 प्रतिशत के लगभग चल रही है।

महंगाई भ्रष्टाचार, घोटालों और काले धन के मुद्दों से बुरी तरह घिरी सरकार को अब जनता के मुद्दे याद आने लगे हैं, जो उसने ”जननी शिशु सुरक्षा“ कार्यक्रम की घोषणा कर दी और दावा कर रही है कि सभी राज्यों को निर्देश दिया गया है कि वे गर्भवती महिलाओं को अस्पताल में रहने के दौरान मुफ्त दवा और भोजन की व्यवस्था करायें और उन्हें सभी तरह की जांॅच और अस्पताल आने-जाने का खर्च या साधन उपलब्ध करायें।

कोई भी समझ सकता है कि सरकार के इस तरह के दावे का कोई मतलब नहीं रह जाता जब सरकार ने स्वयं ही सरकारी डिस्पेंसरियों, जिला अस्पतालों और अन्य बड़े अस्पतालों को पहले ही पंगु बना दिया है। स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में सरकार की सारी कोशिश प्राइवेट अस्पतालों को बढ़ावा देने की और सरकारी अस्पतालों को कमजोर करने की तरफ है। इसी नीति के तहत किसी भी सरकारी अस्पताल में न पूरे डाक्टर है, न नर्स, न फार्मासिस्ट, न एक्सरे स्टाफ, न लेब्रोरेटरी स्टाफ, न अस्पतालों में दवाईयां है, न सरकारी अस्पतालों की एक्सरे मशीन चालू हैं, न अल्ट्रा साउंड मशीनें, न लेबोरेटरियां, कहीं एक्सरे मशीन है तो स्टाफ नहीं। कहीं स्टाफ है तो एक्सरे मशीन नहीं। यदि एक्सरे स्टाफ और मशीनें दोनों हैं तो भी मरीजों का एक्सरे नहीं होता क्योंकि अस्पताल के बाहर कई प्राइवेट निदान केन्द्र एक्सरे मशीनें लिए बैठे हैं जो सरकारी अस्पताल के सुपरिन्टेन्डेन्ट को कमीशन देते हैं। अतः मरीजों को बाहर ही एक्सरे कराने पर मजबूर किया जाता है। खून की जांच और अन्य सभी जांचों के मामले में भी यही होता है।

इस सबके लिए केवल अस्पताल सुपरिडेंन्ट ही जिम्मेदार नहीं। सरकार की ऊपर से नीचे तक यही नीति है कि सभी काम प्राइवेट में ही कराये जायें। सुपरिटेंडेंट भी उसी नीति को अमल में ला रहे हैं।

अब तो सरकारी अस्पतालों में फीस भी ली जाने लगी है। देश की राजधानी दिल्ली में भी सरकार के विभिन्न अस्पतालों में अलग-अलग काम के लिए फीसें तय हैं। फीस दिये बगैर कोई काम नहीं होता और साल-दर-साल अस्पताल की एक बाद दूसरी सेवा पर फीस की व्यवस्था लागू की जा रही है।

जब सरकारी डिस्पेंसरियों और अस्पतालों का सरकार ने यह हाल कर रखा है तो ”जननी-शिशु सुरक्षा कार्यक्रम“ की घोषणा से क्या होगा जबकि सरकार का सारा जोर सरकारी अस्पतालों को ठप्प करने का और प्राइवेट क्लीनिकों, प्राइवेट नर्सिंग होमों और प्राइवेट अस्पतालों को बढ़ावा देने का है।

पिछले सप्ताह दिल्ली के अखबार में खबर छपी कि एक व्यक्ति अपने बच्चे को लेकर एम्स गया, एम्स जो दिल्ली का सबसे बड़ा अस्पताल है। यह सरकारी अस्पताल है। बच्चे को हृदय की कोई समस्या थी उसे कहा गया कि इस इलाज के लिए 21000 रूपये पहले जमा कराओ तब इलाज शुरू होगा। इतने पैसे उसके पास थे नहीं, बच्चे को लेकर वापस अपने घर चला गया। किसी तरह वह इस मामले को हाईकोर्ट ले गया। जाहिर है किसी भले और तेज दिमाग वकील ने इसमें उसकी मदद की होगी। हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि पैसे नहीं है इस कारण बच्चे का इलाज नहीं हो सकता यह गलत बात है। हाईकोर्ट ने दिल्ली के जीबी पंत अस्पताल को, जो दिल्ली का एक अन्य बड़ा सरकारी अस्पताल है और जहां हृदय चिकित्सा के विशेष प्रबंध हैं, आदेश दिया कि इस बच्चे का इलाज किया जाए। अब मामला इतना उछल गया है और हाईकोर्ट का आदेश हो गया है तो उसका इलाज अवश्य ही हो जायेगा। पर देश का हर आदमी तो इस तरह अदालत के जरिये राहत नहीं पा सकता।

स्वयं विश्व बैंक की रिपोर्ट है कि एक तिहाई भारतीय तो पैसे न होने के कारण इलाज के लिए जाते ही नहीं हैं। अन्य रिपोर्टों के अनुसार, सरकारी अस्पतालों में इलाज की समुचित व्यवस्था न होने के कारण जो लोग निजी अस्पतालों में इलाज कराने की हिम्मत करते हैं उनमें से बड़ी तादाद में लोग घर की परिसम्पत्तियां बेचकर ही इलाज का खर्च चुकाते हैं। इस हालत के लिए नवउदारवाद की आर्थिक नीतियां जिम्मेदार है। इन नीतियों को बदले बिना जननी सुरक्षा कार्यक्रम महज घोषणा बन कर रह जाते हैं।

- आर.एस. यादव
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गुरुवार, 14 जुलाई 2011

भूमंडलीकरण या लोगों को हाशिये पर धकेलना


गौतमबुद्धनगर के साबेरी गांव के भूमि अधिग्रहण को इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा निरस्त करने के फैसले के खिलाफ उत्तर प्रदेश सरकार, ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण तथा बिल्डरों ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील दाखिल की थी। सर्वोच्च न्यायालय ने 5 जुलाई को अपील पर सुनवाई की तथा 6 जुलाई को अपना निर्णय सुना दिया। सुनवाई के दौरान और फिर अपने निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने जो तल्ख टिप्पणियां की हैं, वे न केवल काबिले तारीफ हैं बल्कि वे उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार के साथ-साथ केन्द्रीय सरकार एवं सरमायेदारों के लिए भूमि अधिगृहीत करने वाली राज्य सरकारों के लिए आईना हैं। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जी.एस. सिंघवी एवं न्यायमूर्ति ए.के.गांगुली की खंड पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार की भूमि अधिग्रहण नीति को जनविरोधी बताते हुए आपात उपबंध के गलत इस्तेमाल का आरोप लगाया। सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार से सवाल किया कि विकास के नाम पर वह कर क्या रही है? किसानों की खेतिहर जमीन मल्टीप्लेक्स और मॉल बनाने के लिए अधिगृहीत की जा रही है जो आम आदमी की पहुंच से दूर हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अगर सरकार नहर या पुल बनाने के लिए जमीन अधिगृहीत करती तो समझ आता लेकिन यहां तो जमीन मॉल, होटल और टाउनशिप के लिए ली गयी है।

बिल्डरों द्वारा लगाये गये ब्रोशरों पर टिप्पणी करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि स्पॉ, स्विमिंग पूल, आयुर्वेदिक मसाज, हेल्थ क्लब वाले ये फ्लैट क्या गरीबों के लिए बन रहे हैं? जिनकी जमीने ली गयीं हैं वे क्या इन्हें खरीद पायेंगे? सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अन्य राज्यों में भी यही बदतर हालात हैं।

मामले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यों की भूमि अधिग्रहण नीति पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकारें इस कानून एवं इन नीतियों को दमन यंत्र की तरह इस्तेमाल कर रहीं हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने सवाल किया आखिर भूस्वामी किसानों को क्या मिला - मुकदमेंबाजी और लाठियां। पुरूष जेल गये और महिलाओं से दुवर््यवहार किया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने सुनवाई के दौरान कहा कि जमीन किसान की मां होती है। इस टिप्पणी को बहुत गंभीरता से लिये जाने की जरूरत है, इसके गहन निहितार्थ हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने आगे कहा कि एक किसान से जमीन लेने पर सिर्फ उसी के जीवन यापन का साधन नहीं जाता। इसके भी बहुत गंभीर अर्थ हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने आगे टिप्पणी की कि किसानों को मिलता है थोड़ा सा मुआवजा जिसे वह मुकदमेबाजी में खर्च करता है।

बिल्डरों के वकीलों ने दलील देने की कोशिश की कि किसानों ने मुआवजा ले लिया है तो सर्वोच्च न्यायालय ने फिर सवाल किया कि अगर वे मुआवजा नहीं लेते तो उनके पास और क्या विकल्प था? सरकारें उनकी जमीने हड़प कर उन्हें गुलाम बना रही है। ये ‘भूमंडलीकरण’ (ग्लोबलाईजेशन) नहीं है बल्कि ‘लोगों को हाशिये पर धकेलना’ (मार्जिनलाइजेशन) है। सरकार किसानों को हाशिये पर डाल रही है। ये किसी विपक्षी दल के आरोप नहीं सरकारों पर देश के सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ की टिप्पणियां हैं, इसलिए इनकी अपनी गंभीरता है।

अगले दिवस अपना फैसला सुनाते हुए सर्वोच्च न्यायालय की खंड पीठ ने भूमि उपयोग को औद्योगिक से आवासीय करने पर ग्रेटर नोएडा अधिकरण पर बिल्डरों के साथ सांठगांठ करने का आरोप लगाते हुए उस पर रू. 10.00 लाख का जुर्माना भी ठोंक दिया जिसे गरीब वादकारियों की मदद करने पर खर्च किया जायेगा। सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार पर कानून के अधीन अपने अधिकारों के भ्रष्ट दुरूपयोग का आरोप लगाते हुए कहा कि भूमि अधिग्रहण कानून के ‘अत्यावश्यक’ प्राविधानों को किसी जन हित में नहीं बल्कि बिल्डर्स को फायदा पहुंचाने के इरादे से उपयोग किया गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात की भी नोटिस ली कि इंडस्ट्रियल टाउनशिप के लिए अधिगृहीत कुल भूमि के 60 फीसदी का उपयोग अब तक नहीं किया जा सका है।

यह तो सर्वोच्च न्यायालय का अभिमत है लेकिन पूंजी नियंत्रित समाचार माध्यमों ने इस फैसले को आशियाने के लिए प्रतीक्षारत मध्यमवर्गीय परिवारों पर हमला करार देने की असफल कोशिश की। इस निर्णय में ही सर्वोचच न्यायालय ने बिल्डरों के ब्रोशरों का जिक्र करते हुए तल्ख टिप्पणी की है। क्या इस देश के मध्यम वर्ग का कोई ईमानदार व्यक्ति इन फ्लैटों को खरीदने का ख्वाब देख सकता है? हरगिज नहीं! पूंजी नियंत्रित समाचार माध्यम पूंजी पर हर हमले पर जनमत अपने पक्ष में बनाने की कोशिश करते हैं। यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि ऐसा करना जनहित में नहीं है। एक बार फिर उन्होंने यह प्रयास किया परन्तु असफल रहे हैं।

पूंजीवाद का जो दंश भारतीय जन-मानस इस समय झेल रहा है, उसमें इस तरह के पूंजी नियंत्रित समाचार माध्यमों के प्रयास सफल नहीं हो सकते। देश को एक वामपंथी समाचार तंत्र की जरूरत है, जिस पर हमें गौर करना होगा।

- प्रदीप तिवारी
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बी.एड. में प्रवेश - उत्तर प्रदेश सरकार का नया स्कैन्डल


लखनऊ 14 जुलाई। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव डा. गिरीश ने उत्तर प्रदेश सरकार पर बी.एड. प्रवेश के नाम पर एक नया स्कैन्डल करने का आरोप लगाते हुए कहा है कि गैर वित्तपोषित और संसाधन-विहीन संस्थानों को बी.एड. की कक्षाएं चलाने के लिए मान्यता जारी रखने और नई मान्यता दिये जाने के नाम पर सरकार द्वारा शिक्षा माफियाओं से दस लाख पचास हजार रूपये प्रति कालेज लिया गया है तथा उसकी भरपाई कराने के लिए बी.एड. की फीस 51,000/- रूपये तय की गयी है।
लखनऊ के लोग आज भी लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा इसी तरह एक संसाधनविहीन कालेज को बी.एड. कक्षायें चलाने के लिए पिछले साल दी गयी मान्यता के प्रकरण को भूले नहीं हैं।
भाकपा राज्य सचिव ने एक प्रेस बयान में कहा है कि प्रदेश सरकार द्वारा बी.एड. प्रवेश के लिए आज से शुरू हो रही कौंसिलिंग में आरक्षित और अनारक्षित दोनों श्रेणियों में प्रवेश के लिए छात्रों को पूरे साल की फीस रू. 51,000/- का ड्राफ्ट कौंसिलिंग के समय ही जमा कराने की शर्त रख कर प्रदेश के वंचित एवं शोषित तबकों के साथ-साथ मध्यम वर्ग के तमाम विद्यार्थियों को प्रवेश से वंचित रखने का निन्दनीय कार्य किया है जिसके लिए प्रदेश की जनता मायावती सरकार को क्षमा नहीं करेगी। प्रेस बयान में कहा गया है कि विश्वविद्यालयों तथा सहायता प्राप्त कालेजों में तो शिक्षकों का वेतन भुगतान राजकोष से किया जाता है और उसके अतिरिक्त विश्वविद्यालय अनुदान आयोग भी संसाधनों के लिए पैसा मुहैया कराता है, उनके लिए भी रू. 51,000/- की फीस का निर्धारण किसी भी कीमत पर उचित नहीं है। प्रेस बयान में आगे कहा गया है कि जब लखनऊ विश्वविद्यालय और आई.टी. कालेज स्ववित्तपोषित विज्ञान के कोर्सों (जिसमें प्रयोगशालाओं में महंगे उपकरण तथा रसायनों की व्यवस्था करनी होती है) के लिए बीस-तीस हजार रूपये फीस वसूल करते हैं, तब बी. एड. कक्षाओं के लिए 51,000 की फीस समझ से परे है। भाकपा ने विश्वविद्यालयों एवं डिग्री कालेजों द्वारा मासिक एवं द्विमासिक आधार पर शुल्क जमा करने की व्यवस्था समाप्त कर पूरे साल की फीस प्रवेश के समय ही जमा कराने की कटु निन्दा की है।
भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने माननीय राज्यपाल महोदय जोकि प्रदेश के विश्वविद्यालयों के कुलपति भी हैं, तथा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से अपील की है कि वे इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार के इस नए स्कैन्डल की जांच कराने, बी.एड. कक्षाओं का शुल्क घटाने तथा संसाधनविहीन कालेजों की मान्यता रद्द करने के लिए उचित कार्यवाही अविलम्ब करें।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी इस मामले में प्रदेश के बुद्धिजीवी तबके से भी अपील करती है कि वे आगे आयें और प्रदेश के राज्यपाल तथा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष को उचित पत्र भेजें।
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शनिवार, 9 जुलाई 2011

किसान हित में नहीं राहुल की छवि निर्माण के लिए थी कथित किसान पंचायत - भाकपा


लखनऊ 9 जुलाई। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि आज किसानों के नाम पर अलीगढ़ में हुआ कांग्रेस का जमाबड़ा किसानों के हित में नहीं था। केन्द्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस का यह जमाबड़ा केवल राहुल गांधी की छवि निर्माण के लिए था।
भाकपा ने कहा है कि आज पूंजीवादी राजनीति नेतृत्व की विश्वसनीयता के संकट से गुजर रही है। अतः कार्पोरेट घराने, कांग्रेस और कार्पोरेट मीडिया राहुल गांधी को गरीबों के हितैषी के रूप में उछालने में जुटे हैं। वे लोगों का ध्यान इस बात से हटाना चाहते हैं कि भूमंडलीकरण, उदारीकरण, निजीकरण की जिस राजनीति के तहत आज उत्तर प्रदेश सहित देश के तमाम भागों में किसानों की उपजाऊ जमीनों का बेतहाशा अधिग्रहण किया जा रहा है, वह नीतियां कांग्रेस की देन हैं।
डा. गिरीश ने कहा कि भाकपा, वामपंथी दल तथा कई किसान संगठन दादरी से लेकर आज तक जमीनों को बचाने की लड़ाई लड़ते रहे और तमाम जगह किसानों को न्याय दिलाने में कामयाब रहे। मगर मीडिया ने कभी उसकी समुचित चर्चा नहीं की। आज जब अलीगढ़ में केन्द्र सरकार, कांग्रेस संगठन और भ्रष्टाचार के धन के बल पर एक भीड़ जुटाई गई है तो उसकी आड़ में एक व्यक्ति विशेष का महिमामंडन किया जा रहा है। लेकिन जादू सिर पर चढ़ कर बोला और श्री राहुल गांधी उपजाऊ जमीनों को अधिग्रहण से बचाने के लिये 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून का ठोस प्रारूप जनता के सामने नहीं रख पाये और न ही किसानों को आत्म हत्याओं से बचाने और उनके खाद, बीज, डीजल, बिजली के संकट के विषय में कोई ठोस योजना ही पेश कर पाये। यह रैली पूरी तरह कांग्रेस के लिये ‘स्वान्तः सुखाय’ रैली ही साबित हुई, डा. गिरीश ने दावा किया है।
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गुरुवार, 7 जुलाई 2011

भ्रष्टाचार के विरूद्ध संघर्ष और बाबा रामदेव


बाबा रामदेव एक कुशल योग गुरू है। विभिन्न स्थानों पर आयोजित उनके योग कैम्पों में हमेशा अच्छी खासी उपस्थिति रहती है। टीवी चैनल उन्हें देश के लाखों दर्शकों का नियमित रूप से टेलीकास्ट करते हैं। इससे उनके शिष्यों-अनुयायियों और योग अभ्यास करने वालों की संख्या बहुत बड़ी हो गयी है।

पर वह अपने देश के लोगों में योग को लोकप्रिय बनाने वाले बाबा ही नहीं हैं। वह एक चतुर बिजनेस मैन भी हैं। उन्होंने योग का अभूतपूर्व व्यवसायीकरण कर लिया है। उनके कैम्पों में हिस्सा लेने वाले लोगों को भी बड़ी रकम देनी पड़ती है जो इस पर निर्भर है कि वे कौन सी लाइन में बैठते हैं। कहा जा सकता है कि इस समूची प्रक्रिया मंे व्यवसायीकरण में कुछ भी गलत नहीं। आखिर सारे बंदोबस्त का खर्च निकालना होता है।

बाबा हर एक “आसन” और “प्राणायाम” और उससे होने वाले फायदों पर भाषण करते हैं, सीख देते हैं, इस मौके को, जैसा वह ठीक समझते हैं उस तरह के, राजनैतिक प्रवचन देने के लिए भी इस्तेमाल करते हैं यह सच है कि उनके प्रवचनों की विषय वस्तु में भ्रष्टाचार, कालेधन को बाहर निकालने जैसे मुद्दे भी होते हैं।

चतुर-चालाक बाबा ने योग के शिक्षण को वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों, कम्पनियों एवं ट्रस्टों के एक सिलसिले को कायम करने-चलाने, विभिन्न आयुर्वेदिक दवाओं को बेचने, सरकारी पैसे से फूड पार्क चलाने जैसी बातों से जोड़ दिया है। बाबा रामदेव और उनके सहयोगियों के तत्वावधान में सचमुच एक व्यापारिक साम्राज्य कायम हो गया हैं

अब रिपोर्टें हैं कि इस तरह की कम्पनियां और वाणिज्यिक संस्थाओं की संख्या 200 से कम नहीं है। प्रश्न पूछा जा सकता हैः क्या सरकार को उनका पता अब रामलीला मैदान की घटना के बाद चला है? या यदि सरकार पहले उनके बारे में जानती थी तो इस तमाम अरसे में चुप क्यों रही? ये प्रासंगिक मुद्दे हैं जिससे ऐसे मुद्दों पर सरकार की मिलीभगत का और जब मौका पड़े तो कार्रवाई करने के उसके दोगलेपन का इशारा मिलता है। बाबा की इस जबर्दस्त आमदनी ने उन्हें पांच सितारा संस्कृति विकसित करने, निजी जेट खरीदने एवं किराये पर लेने और यहां तक कि आराम एवं विश्राम के लिए स्काटलैंड के समुद्रतट के पास एक टापू खरीदने की सामर्थ्य प्रदान कर दी है। संभवतः आज की दुनिया में इन तमाम बातों की भी इजाजत है।

जनता के बड़े तबकों से उन्हें जो रेस्पोंस मिलता है उसे देखकर बाबा ने राजनीति के मैदान में कूदने का फैसला किया। कुछ समय तक वह अपनी स्वयं की एक पार्टी बनाने पर सोचते रहे। पर उनके नजदीक के लोगों ने उन्हें सलाह दी कि पहले ही ऐसी राजनैतिक पार्टियां और रूझान हैं जो उन्हें साथ लेकर चलने के लिए सहर्ष उत्सुक होंगी, देश में आज जो तूफानी राजनैतिक वातावरण बना हुआ है उसमें स्वयं की पार्टी बनाने के मुकाबले वह अधिक फायदे की बात होगी। हमने देखा कि जब उन्होंने अपने आंदोलन की घोषणा की तो संघ परिवार किस कदर तेजी के साथ उनके मंच पर चढ़ गया।

भ्रष्टाचार आज एक ज्वलंत मुद्दा है। यूपीए सरकार के एक के बाद दूसरे भ्रष्टाचारों का जो सिलसिला सामने आया है जनता में उससे जबर्दस्त आक्रोश है। कम्युनिस्ट और वामपंथ इन मुद्दों का निरंतर संसद के अंदर और बहार उठाते रहे हैं और उन पर आंदोलन करते रहे हैं। यह नोट किया जाना चाहिए कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता गुरूदास दासगुप्त ने 2008 में कालेधन के मुद्दे को लोकसभा में विचार-विमर्श के लिए उठाया था और मांग की थी इसे वापस लाया जाये। उस समय श्री लालकृष्ण आडवाणी चुप्पी साधे रहे। 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले, राष्ट्रमंडल खेल घोटाले और अन्य कई घोटालों में इतने बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और उसमें मंत्रियों एवं कुछ राजनेताओं की संलिप्तता ने देश के आम आदमी को स्तब्ध कर दिया है। अन्ना हजारे के अनशन के फलस्वरूप स्वतःस्फूर्त तरीके से व्यापक लहर पैदा हो गयी जिससे मांग उठी कि घोटालेबाजों के विरूद्ध कानूनी कार्रवाई की जाये और भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने, जांच करने, भ्रष्टाचारियों को सजा देने और उनकी परिसम्पत्तियों को जब्त करने के लिए एक प्रभावी जन लोकपाल बिल पारित किया जाना चाहिये ताकि भ्रष्टाचार को रोका जा सके।

भ्रष्टाचारपूर्ण सौदों का एक सबसे बुरा असर देश के अंदर एक सामानांतर अर्थव्यवस्था के रूप में चलने वाले काले धन के प्रचुर सृजन के रूप में सामने आता है जबकि उसका बड़ा हिस्सा उन विदेशी बैंकों में जमा हो जाता है जो टैक्स हेवन (टेक्स चोरी के पैसे को आश्रय देने वाले) देशों में काम करते हैं। स्वाभाविक ही है कि मांग उठी है कि इस काले धन को वापस लाया जाये और राष्ट्र की अपनी परिसम्पत्ति के रूप मंे उसे जब्त किया जाये। कालेधन के अपराधियों के नामों का पर्दाफाश किया जाना चाहिए और उन्हें सख्त सजा दी जानी चाहिए।

इस तरह के बड़े पैमाने के भ्रष्टाचार की जड़ में हैं नव उदारवादी आर्थिक नीतियां। पूंजीवादी सरकार इस तरह की नीतियों पर चलने के लिए जिम्मेवार है। वह कालेधन के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई करने की इच्छुक नहीं। पर बढ़ते जन आक्रोश ने इस अनिच्छुक सरकार को इस तरह के लोकपाल बिल को ड्राफ्ट करने के लिए सहमत होनेे पर मजबूर कर दिया। पर बिल की अनेक धाराओं के बारे में रूकावटें खड़ी की जा रही है। इस पर हम बाद में विचार कर सकते हैं।

इसी बीच बाबा रामदेव अपने अनुयायियों को साथ लेकर मैदान में कूद पड़े। आंदोलन को हाइजैक करने का मुकाबला चल रहा है। उन्होंने अपने हजारों अनुयायियों को साथ लेकर रामलीला मैदान में भूख हड़ताल और सत्याग्रह शुरू कर दिया। अन्ना हजारे के अनशन को मिले जनता के स्वतः स्फूर्त रेस्पोंस से पहले ही बुरी तरह हिली हुई, बदहवास यूपीए सरकार ने बाबा को मनाने की बड़ी तेजी से कोशिश की। जब वह राजधानी पहुंचे तो चार प्रमुख मंत्री उनकी अगवानी के लिए दौड़े-दौड़े दिल्ली हवाई अड्डे पहुंचे। हवाई अड्डे पर उनके साथ उन्होंने ढाई घंटे बातचीत की। उसके बाद अगला पूरा दिन सरकार और रामदेव के बीच घंटों लम्बी वार्ताओं के कई दौर से गुजरा। पूरा दिन इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यम रामदेव और सरकार के बीच कभी सौदेबाजी चल रही है तो कभी टूट गयी है की खबरे परोसते रहे और अनशन और सत्याग्रह के शुरू होने और जारी रहने के बारे में प्रश्न उठते रहे। सार्वजनिक तौर पर घोषणा की गयी कि बाबा द्वारा उठायी गयी मांगों पर लगभग सहमति बन गयी है। जैसा कि बाद मंे पता चला बाबा रामदेव के सहायक ने उनकी तरफ से एक पत्र दिया था कि वह पहले दिन (अर्थात 4 जून) को दोपहर बाद अनशन समाप्त कर देंगे। पुलिस कार्रवाई का औचित्य सामाप्त कर देंगे। पुलिस कार्रवाई का औचित्य बताते हुए सरकार ने आरोप लगाया कि बाबा अपनी बात से मुकर गये और उन्होंने आंदोलन को जारी रखा। अतः दोनों के बीच राजनैतिक “मैच फिक्सिंग” की जो कोशिश हो रही थी और जिस खेल में अन्य खिलाड़ी भी शामिल थे, वह दोनों लिए उलटी पड़ गयी।

उसके बाद रात के अंधेरे में काला कारनामा हुआ। हजारों पुरूषों एवं महिलाओं पर, जो कैम्प में सो रहे थे, एक नृशंस पुलिस कार्रवाई की गयी। आंसू गैस के गोले छोड़े गये और जो लोग कैम्प में थे उन्हें सभी को वहां से हटाने के लिए लाठीचार्ज का आदेश दिया गया। बीसियों लोग जख्मी हो गये और दो लोगों को गंभीर चोटें आयी जिनमें एक महिला है। इस समय वह अस्पताल में जीवन और मौत के बीच झूल रही है। रामदेव ने बच निकलने की कोशिश की पर पुलिस द्वारा पकड़ लिये गये और हवाई जहाज से देहरादून भेज दिये गये।

अवांछित एवं नृशंस पुलिस कार्रवाई से लोगों में आक्रोश पैदा हुआ, भले ही वे रामदेव की असंगतता के बारे मंे कुछ भी विचार रखते हो। सरकार जो कुछ भी कहती है या करती है उसे किसी तरह न्यायोचित नहीं माना जा सकता। क्या सरकार जनता के आंदोलन से इस तरह से सलूक करेगी? हमारी पार्टी ने और अन्य पार्टियों ने भी पुलिस कार्रवाई की तीव्र भर्त्सना की है। सर्वोच्च न्यायालय और मानवाधिकार आयोग ने भी मौलिक अधिकाररों की घोर अवहेलना का सही ही स्वतःसंज्ञान लिया है और समूची परिस्थिति से सरकार के हेंडलिंग पर आपत्ति की है।

रामदेव बाबा और सरकार दोनों ने कालेधन और भ्रष्टाचार के विरूद्ध आंदोलन को एक त्रासद घटना में बदल दिया है। तथापि सरकार की कार्रवाई ने इन मुद्दों पर संघर्ष चलाने की जरूरत को रेखांकित कर दिया है। इन मुद्दों पर वामपंथ और वे तमाम लोकतांत्रिक ताकतें ही एक सिद्धांतनिष्ठ और सुसंगत संघर्ष चला सकती हैं जो इन मुद्दों पर सच्चे अर्थ में चिंतित हैं।

जलियांवाला बाग से तुलना करना या आजादी की दूसरी लड़ाई जैसी बातें करना उन पहले की बातों को हल्का करना है। लम्बी चौड़ी हांकने या अतिशयोक्तिपूर्ण बातें करने से, जैसा कि कुछ लोग कर रहे हैं, संघर्ष आगे नहीं जाता।

- ए.बी. बर्धन
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बुधवार, 6 जुलाई 2011

लखनऊ की जनता से अपील


आल इंडिया स्टूडेन्ट्स फेडेरशन की प्लेटिनियम जुबली समारोह का हिस्सा बनिये

AISF Platinium Jubilee Invitation

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गुरुवार, 30 जून 2011

चुभती हुई चुप्पी


प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह ने पिछले दिनों मसूरी में ‘सत्ता और शब्द’ विषय पर आयोजित एक संगोष्ठी में हिंदी के लेखकों से किसानों द्वारा अपनी भूमि बचाने के लिए लड़ी जा रही लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाने की अपील की थी। हिंदी के लेखकों से उनकी अपील कारूणिक अपेक्षा के साथ-साथ एक शिकायत भी थी। शिकायत यह कि इतिहास के इस सर्वग्रासी समय में जब हिंदी समाज के किसान अपनी जमीन और रोजी बचाने के लिए राजसत्ता, कॉरपोरेट जगत और बाजार से जद्दोजहद कर रहे हैं, उनकी लड़ाई में हिंदी के लेखक शामिल क्यों नहीं हो रहे हैं? वे चुप क्यों हैं?

आज उत्तर प्रदेश के बलिया से लेकर नोएडा तक बनने वाले गंगा-यमुना एक्सप्रेस-वे, बनारस के पास कटेसर में जबरन भूमि अधिग्रहण, इलाहाबाद के पास कचरी में लगने वाली जेपी समूह की ताप विद्युत परियोजना आदि के खिलाफ किसान लड़ाई लड़ रहे हैं। नोएडा के पास भट्टा-पारसौल और अच्छेपुर संघर्ष का मैदान बन चुके हैं। जिन लोगों की जमीन का अधिग्रहण हो रहा है उनमें बड़े-छोटे और सीमांत सभी तरह के किसान शामिल हैं। जिनके पास छोटे भूखंड हैं उनके लिए जमीन की लड़ाई ‘जान’ की लड़ाई बन चुकी है।

पहले किसानों को अपने पड़ोसी और शक्तिशाली सामंतों से अपनी जमीन बचानी पड़ती थी। इसमें राजसत्ता, थाना, कचहरी से अपेक्षा थी कि वे इन्हें बचाने में मदद करेंगे। पर आज दुखद है कि राजसत्ता खुद उनकी भूमि हड़प कर उसे जमीन-जायदाद के कारोबारियों और भू-माफिया को महंगे दामों पर बेच रही है। किसानों को बारह सौ रूपए प्रति वर्ग गज जमीन लेकर भवन निर्माताओं को आठ हजार रुपए प्रति वर्ग गज की दर से, वह भी बीस साल में चुकाने की छूट देकर, बेचा जा रहा है। जिस विकास के नाम पर खेती योग्य जमीन का अधिग्रहण जारी है, उसमंे राजसत्ता की छत्र छाया में सिर्फ जमीन-जायदाद के कारोबारियों और भवन निर्माताओं को फायदा पहुंचाया जा रहा है। राजसत्ता का चरित्र धीरे-धीरे ‘बिल्डर्स स्टेट’ और ‘मर्केंटाइल स्टेट’ में बदलता जा रहा है। सरकार का काम जैसे केवल किसानों से जमीन लेकर भू-माफिया को बेचना और इस प्रक्रिया में कमीशन और भ्रष्टाचार को वैधानिक बनाते जाना रह गया है।

बंगाल के नंदीग्राम और सिंगूर में जब खेती लायक जमीन अधिग्रहीत कर टाटा को कारखाना लगाने के लिए दी जा रही थी तो किसानों के संघर्ष में वहां के लेखक, कलाकर, बुद्धिजीवी खुल कर सड़कों पर उतरे थे। उनके फेसबुक, ब्लॉग वगैरह नंदीग्राम और सिंगूर के खिलाफ चल रहे संघर्ष की सूचनाओं और अपीलों से भर गए थे। मगर हिंदी के साहित्यकार-चाहे प्रगतिवादी हों, दलितवादी, जनवादी, आत्मवादी, आत्मरतिवादी, विश्व पर्यटनवादी - सब चुप है।

हिंदी क्षेत्र की युवा पीढ़ी, युवा लेखकों के साइबर स्पेस, फेसबुक आदि से बढ़ते संबंधों को ज्ञान और अभिव्यक्ति के अवसरों के जनतांत्रिकीकरण की दिशा मंे महत्वपूर्ण कदम माना गया था। मगर हिंदी लेखकों के साइबर स्पेस में (कुछ को छोड़ कर) भट्टा-पारसौल जैसी घटनाओं पर बहुत कम संवाद दिखता है। उनका ज्यादातर साइबर स्पेस या तो फूलों की घाटियों, प्रेम, विदेश यात्रा, साहित्यिक उपलब्धि की खबरों, आपसी साहित्य विवरणों से भरा दिखता है। इन जनतांत्रिक - सी माने जानी वाली संचारी जगह में किसानों के दुख, उनके संघर्ष के प्रति बहुत कम लगाव दिखता है। हिंदी पत्र - पत्रिकाओं, अखबारों में भी साहित्यकारों की ऐसे मामलों पर प्रतिबद्ध प्रतिरोध न के बराबर है। कोई विदेशों में काव्यपाठ पर मस्त है, कोई अपने साहित्यक गौरव को ओढ़-बिछा रहा है तो कोई अपने ही साहित्यिक बंधुओं को गला रेतने में लगा है।

नंदीग्राम और सिंगूर मामले में एक सक्षम और जागरूक नागरिक समाज काफी आक्रामक रूप में सक्रिय था। इस मुद्दे पर वहां के समाजशास्त्री और बुद्धिजीवी सार्वजनिक रूझान बनाने वाले माध्यमों में मुखर थे। नाट्य मंडलियां, कलाकर सब लामबंद हो गए थे। वहां का विपक्ष उस लड़ाई को गतिमान बना ही रहा था। मगर हिंदी पट्टी में एक तरह से भू-माफिया का साम्राज्य फैलता जा रहा है और विपक्ष पांच सितारा राजनीति तक महदूद होता गया है। लेखक, बुद्धिजीवी सब चुप हैं। यहां नागरिक समाज राजनीतिक नहीं, एनजीओ केंद्रित हो गया है, जिसमें लगभग दो तिहाई से ज्यादा सिर्फ फर्जी रूप में कागजों पर चल रहे हैं और जो सचमुच अस्तित्व में हैं उनमें से ज्यादातर उसे नौकरी के विकल्प के रूप में देखते हैं। ऐसे में हिंदी क्षेत्र में किसानों को सरकार और बाजार की लूट से कौन बचाए?

आज जब राजसत्ता का दमन इतना संगठित, सुव्यवस्थित और आक्रामक हो चुका है, क्या किसान अकेले खुद को सरकार और बाजार के जुल्म से बचा सकता है? शायद नहीं। क्योंकि अभी किसानों की अपनी कोई राजनीति और राजनीतिक शक्ति बनती नहीं दिख रही है। जो कम्युनिस्ट उनकी लड़ाई लड़ते थे वे आज हाशिये पर है।

आजादी से पहले और दशकों में उत्तर प्रदेश विशेषकर पूर्वी उत्तर प्रदेश में कम्युनिस्टों के नेतृत्व में गरीब, दलित और पिछड़े किसानों का मजबूत संघर्ष उभरा था। प्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेता जेडए अहमद की पुस्तक ‘मेरे जीवन की कुछ यादें’ पर भरोसा करें तो 1935 में मेरठ में गठित अखिल भारतीय किसान सभा अवध, पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में काफी मजबूत हो चुकी थी। 1937 में फैजाबाद में हुए अखिल भारतीय किसान सम्मेलन मंे ही प्रो. एनजी रंगा अध्यक्ष चुने गए थे। अवध में बाबा रामचंद्र, जानकीदास, बिहार में स्वामी सहजानंद सरस्वती, राहुल सांकृत्यायन, पूर्वी उत्तर प्रदेश में सरजू पांडे और जयबहादुर सिंह जैसे किसान नेता लघु और सीमांत किसानों, खेतिहर मजदूरों की लड़ाई लड़ रहे थे। पूर्वी उत्तर प्रदेश में कृषक महिलाओं का नेतृत्व भी आजाद भारत में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा था। सिंहासनी देवी, मराछी देवी, सुबंसा देवी, कुसुमा देवी जैसी कृषक और निचली समूहों की महिलाएं कम्युनिस्टों और किसान सभा के नेतृत्व मंे आजादी के तुरंत बाद, 1950 के आसपास, किसान शक्ति का प्रतीक बन कर उभरी थी।

इस कृषक शक्ति ने साठ के दशक तक भारतीय राज्य पर कृषक हितों के लिए दबाव बनाए रखा। फिर सत्तर के दशक मंे बिहार के नक्सलवादी आंदोलन ने किसानों के सवाल को महत्वपूर्ण बनाया। पर उसके बाद चौधरी चरण सिंह, देवी लाल जैसे नेताओं के नेतृृत्व में लघु और सीमांत किसानों से जुड़े मुद्दों की जगह बड़े किसानों का हित प्रभावी हो गया। इससे सीमांत और लघु किसानों, कृषक मजदूरों में ऐसे किसान नेतृत्व के प्रति निराशा का भाव पैदा हो गया। उत्तर भारत में कम्युनिस्ट पार्टियों का निष्प्रभावी होते जाना, लघु किसानों और खेतिहर मजदूरों में, जो ज्यादातर दलित और पिछड़े समूहों से थे, किसान अस्मिता के प्रति निराशाभाव, जातीय राजनीतिक अस्मिताओं के उभार, राज्य और बाजारजनित आकांक्षाओं का जनमन पर बढ़ते प्रभाव- सबने मिल कर धीरे-धीरे कृषक अस्मिता और कृषक शक्ति को अप्रासंगिक बना कर रख दिया। ऐसे में क्या कृषक शक्ति फिर से प्रभावी हो सकती है?

आज के संदर्भ में कृषक शक्ति के प्रभावशाली होने के लिए उसे अपने साठ से पहले के संघर्षशील अतीत को आविष्कृत कर अपनी शक्ति को जगाना होगा। विपक्षी राजनेताओं, बुद्धिजीवियों, लेखकों, पत्रकारों को कृषक प्रतिरोध के साथ कंधा मिला कर सरकार और बाजार के इस भूमि लूट को रोकना होगा।

- बद्री नारायण
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