भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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मंगलवार, 18 अक्टूबर 2011

संघर्षों के रास्ते पर फैलता वामपंथ का उजियारा

82 वर्षीय कॉमरेड पेरिन दाजी की पहली किताब ‘‘यादों की रोषनी में’’ का विमोचन
इंदौर। आमतौर पर राजनेताओं की स्थिति यह रहती है कि जब तक वे सत्ता में रहते हैं, लोगों की भीड़ उनके इर्द-गिर्द मंडराती रहती है। सत्ता से दूर होकर उनके आसपास का दायरा सिमटकर कुछ चमचों तक सिमट जाता है जो धीरे-धीरे सिकुड़ता जाता है। और यदि राजनेता सक्रिय राजनीति से ही संन्यास ले ले तो उसकी पूछ-परख सिर्फ़ कुछ आयोजनों में अध्यक्षता आदि तक सिमट जाती है। कुछ लोगों को उनके सक्षम-संपन्न परिवार वाले कुछ समय तक याद करते हैं और धीरे-धीरे वहाँ भी रौनक घटती जाती है।
लेकिन 2 अक्टूबर 2011 को इंदौर प्रेस क्लब के राजेन्द्र माथुर सभागृह में ठसाठस लोग जिस नेता की याद में आयोजित सभा में इकट्ठे थे वह न कभी सत्ता में रहा और न ही बरसों से राजनीति में सक्रिय था। फिर भी न केवल हॉल में क्षमता से ज़्यादा लोग मौजूद थे बल्कि बाहर लगी स्क्रीन पर भी लोगों की भीड़ जमा थी। और यह सब तब था जब कार्यक्रम स्थल की क्षमता देखते हुए ज़्यादा लोगों को बुलाने की कोषिषों को धीमा करना पड़ा था।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की इंदौर ज़िला परिषद द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में इकट्ठे हुए विभिन्न तबक़ों के लोगों के दिलों में कॉमरेड होमी दाजी का नाम सिर्फ़ इसलिए नहीं था कि वे दो बार विधायक रहे और एक बार सांसद। बल्कि इसलिए कि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उन्होंने चुनावी राजनीति का इस्तेमाल जनता के हक़ में किया और इस पूँजीवादी लोकतंत्र के भीतर, अधिक संसाधन न होते हुए भी जनता का विष्वास कैसे अर्जित किया जाता है, यह करके दिखाया। उन्होंने मज़दूर वर्ग की राजनीति को इतना प्रभावी बनाया कि मेहनतकषों को ये ताक़त महसूस हुई कि ‘‘ये सेठ व्यापारी रजवाड़े, दस लाख तो हम दस लाख करोड़।’’ उनमें ये हिम्मत पैदा हुई कि वे ही हैं जो दुनिया बनाते और बदलते हैं। आज भले ही नयी आर्थिक नीतियों को लागू कर संगठित उद्योगों को  सिलसिलेवार ख़त्म किये जाने से मज़दूर तबक़े की रीढ़ पर ज़बर्दस्त चोट पहुँची हो लेकिन वह अपनी ताक़त के दिनों को भूला नहीं है। बताते हैं कि होमी दाजी जब स्वस्थ और सक्रिय थे तो लोग उन्हें पूँजीपतियों के ख़िलाफ़ ‘जनता का शेर’ कहते थे।
यही नहीं, होमी दाजी के संक्षिप्त राजनीतिक दौर ने बाद की राजनीति व राजनीतिज्ञों पर भी ऐसा असर छोड़ा जिसे आसानी से भुलाया नहीं जा सकता। इसीलिए विरोधी राजनीतिक दलों के लोग भी दाजी का नाम सम्मान से लेते हैं और सिर्फ़ एक बार सांसद रहने के बावजूद आज भी संसद में उनका नाम विषिष्ट कार्यों के लिए लगा हुआ है। दो अक्टूबर के कार्यक्रम में भी श्रोताओं में मज़दूरों के बीच ही सांसद, पूर्व सांसद, विधायक, पूर्व विधायक एवं अन्य राजनेता भी बैठे थे जिन्होंने दो घंटे के कार्यक्रम में सिर्फ़ श्रोता की हैसियत से षिरकत की। न वे मंचासीन हुए और न ही उनके लिए अलग कुर्सियों की व्यवस्था की गई थी।
मंच पर जो थे, उन्हें अगर होमी दाजी देख पाते तो ख़ुष हो जाते। अमरजीत कौर जो एटक में कॉमरेड दाजी की युवा साथी थीं जब दाजी एटक के राष्ट्रीय महासचिव थे; कॉमरेड पेरिन दाजी जो ज़िंदगी के साठ वर्ष दाजी के साथ रहीं और घर से लेकर राजनीति तक दाजी का साथ देती रहीं; महेंद्र कुमार शेजवार जो फल का ठेला लगाते हैं और दाजी को रोज़ घर आकर दो केले देकर जाते थे जिससे दाजी को दवा लेनी होती थी; और श्रीमती मसीना हीरालाल जिन्हें दाजी ने कभी नहीं देखा लेकिन जिनके पति हीरालाल को दाजी प्यार से राजाबाबू कहते थे। हीरालाल की जूते-चप्पल सुधारने व पॉलिष करने की गुमटी दाजी के ऑफ़िस के सामने ही थी। पिछले दिनों हीरालाल का भी निधन हो गया था। एक कम्युनिस्ट का ख़्वाब आख़िरकार उन्हें इज़्ज़त भरी ज़िंदगी और हक़ दिलाना ही तो होता है जो मेहनत करते हैं।
और ये मंच क्यों सजा था? क्योंकि 2009 में जब होमी दाजी नहीं रहे तो उनकी जीवनसंगिनी पेरिन ने हीरालाल के कहने पर दाजी की ज़िंदगी के बारे में एक किताब लिखनी शुरू की थी जिसका विमोचन था 2 अक्टूबर को। कॉमरेड पेरिन दाजी से अनेक बड़े-बड़े नेता, अधिकारी और कॉमरेड्स कहा करते थे कि दाजी के जीवन पर आप लिखो लेकिन वे उन बातों को कभी गंभीरता से नहीं लेती थीं। एक दिन हीरालाल ने उनसे कहा कि बाबूजी, यानी दाजी की ज़िंदगी और उनके विचारों के बारे में लोगों को जानना चाहिए कि उनका दिल कैसे ग़रीबों के लिए प्यार और इज़्ज़त से भरा हुआ था। हीरालाल की बातों से द्रवित पेरिन दाजी ने ठाना कि भले ही उन्हें अच्छी साहित्यिक भाषा न आती हो लेकिन वे हीरालाल जैसे लोगों के लिए दाजी के बारे में लिखेंगी। और इस तरह 82 वर्ष की आयु में पेरिन दाजी ने अपने भीतर की लेखिका को प्रकट किया। जब किताब पूरी की तो हीरालाल को बताने गईं। पता चला कि वह भी नहीं रहा। तो उसका घर ढँूढ़कर उसकी पत्नी से कहा कि हीरालाल को समर्पित इस किताब का विमोचन तुम्हें ही करना है। और ग़रीबी, उम्र व ज़िल्लत के बोझ से दोहरी हो गईं दलित हीरालाल की बेवा श्रीमती मसीना को इस पूरे सभ्य समाज के सामने पूरी इज़्ज़त के साथ मंच पर अपने बराबर बिठाया।
इप्टा इंदौर की सारिका श्रीवास्तव, पूजा त्रिवेदी, सुलभा लागू व रुचिता श्रीवास्तव ने ‘‘सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाषाद हैं, दिल पे रखकर हाथ ये कहिये देष क्या आज़ाद है’?’ और ‘‘रुके न जा,े झुके न जो, दबे न जो मिटे न जो, हम वो इंक़लाब हैं जु़ल्म का जवाब हैं’’ जनगीतों के साथ सभा का स्वागत कर श्रोताओं को एक वाम माहौल में ष्शामिल कर लिया। विमोचित किताब ‘‘यादों की रोषनी में’’ पर साहित्यकार-कवि श्री ब्रजेष कानूनगो ने अपनी पाठकीय टिप्पणी देते हुए कहा कि ये केवल भावुकतापूर्ण यादों की किताब भर नहीं है बल्कि इसकी भाषा, शैली आदि तत्व इसे साहित्य की भी एक उत्कृष्ट कृति बनाते हैं। ये किताब आम लोगों के साथ-साथ साहित्य के पाठकों और नये रचनाकारों के लिए भी ज़रूरी है। इसका संपादन कर विनीत तिवारी ने एक अच्छी किताब और एक अच्छी लेखिका हिंदी साहित्य को दिया हैं।
विमोचन के पूर्व ही किताब के एक अंष की एकल नाट्य प्रस्तुति डॉ. यामिनी ने दी जिसका निर्देषन विनीत तिवारी ने ही किया था। उस संक्षिप्त किन्तु शानदार ब्रेटियन प्रस्तुति ने दर्षकों को पूरी किताब पढ़ने की तीव्र उत्सुकता से भर दिया। इसके उपरांत कॉमरेड पेरिन दाजी ने कहा कि फल के ठेलेवाले हीरा लाल के केलों के पैसे तो वे चुका सकती हैं लेकिन उस प्यार का कोई मूल्य नहीं जो इन जैसे लाखों मेहनतकष लोगों ने दाजी को दिया और जिसकी वजह से अनेक तकलीफ़ों के बावजूद दाजी को आख़िरी साँस तक ज़िंदगी से प्यार रहा। उनके संक्षिप्त किंतु भावुक संबोधन से सभी उपस्थितों की आँखों में आँसू भर आये।
यूँ तो भारत में वामपंथ की विभिन्न धाराएँ मौजूद हैं लेकिन ये भी सच है कि कॉमरेड दाजी जैसे लोग सभी धाराओं में इसलिए आदर से याद पाते हैं क्योंकि उन्होंने हर क्षण और सिद्धांत का इस्तेमाल वंचित वर्ग के भले के लिए ही किया। कॉमरेड होमी दाजी तब वामपंथ के प्रखर प्रतिनिधि थे जब भारत में वामपंथ, चरमपंथ और संसदीय लोकतंत्र के बीच अपनी जगह तलाष कर रहा था। उस वक़्त सक्रिय कॉमरेड्स की जमात ने ये सिखाया कि संसदीय लोकतंत्र अपनाने के बावजूद वामपंथ को धारदार और संघर्षषील कैसे बनाये रखा जा सकता है।
यही सोचकर कॉमरेड दाजी की याद में आयोजित इस कार्यक्रम में ‘‘मौजूदा जनसंघर्ष और वामपंथ की भूमिका’’ विषय पर एटक और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की जुझारू राष्ट्रीय सचिव अमरजीत कौर का व्याख्यान भी साथ रखा गया था। उनका विस्तृत परिचय दिया एटक के ज़िला सचिव रुद्रपाल यादव ने। कॉमरेड दाजी की व्यावहारिक राजनीति पर पकड़ और अपने मार्क्सवादी सिद्धांतों पर अविचल अडिग बने रहने की खूबी की याद करते हुए कॉमरेड अमरजीत ने देषभर के जनसंघर्षों का एक व्यापक कैनवास प्रस्तुत किया। ज़मीनी और ज़मीन की लड़ाइयों का ज़िक्र करते हुए उन्होंने पॉस्को, नारायणपुर, उड़ीसा, महाराष्ट्र आदि के भीतर चल रहे संघर्षों और अगली कतारों में लड़ रहे वामपंथियों का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि नेहरू के ज़माने में खड़े किए गए सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को बेचने की मनमोहन सिंह सरकार की साज़िषों के ख़िलाफ़ भी वामपंथियों ने ही मोर्चा संभाला चाहे वह बाल्को का मसला रहा हो या नाल्को का। छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम के सरकारी आतंक का जवाब देने में, महाराष्ट्र के जैतापुर में परमाणु संयंत्र लगाकर मछुआरों और किसानों की ज़मीनों को हड़पने के ख़िलाफ़ हो रहे संघर्ष में, झारखण्ड, उड़ीसा से लेकर असम, मणिपुर, त्रिपुरा आदि जगहों पर जनता के संघर्षों में वामपंथी ही अपनी जान हथेली पर रख कर लड़ रहे हैं।
देषभर में किसानों की आत्महत्याओं ने किसानी संकट को उजागर किया है। सरकार खेती को कॉर्पोरेट के लिए मुनाफ़ा कमाने की ज़मीन बनाना चाहती है। उसे परवाह नहीं कि किसान मरें या जियें। यहाँ भी वामपंथी सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ डटे हैं। उन्होंने कहा कि आजकल भ्रष्टाचार की बहुत चर्चा हो रही है और अण्णा हजारे के आंदोलन का भी मीडिया ने खूब प्रचार किया है। लेकिन भ्रष्टाचार तो इस पूँजीवादी व्यवस्था का एक ज़रूरी उत्पाद है। अण्णा के आंदोलन को यही पूँजीवादी मीडिया इसलिए जगह देता है क्योंकि यह आंदोलन व्यवस्था परिवर्तन की बात नहीं करता। वह कार्पोरेट के भ्रष्टाचार के खिलाफ कुछ नहीं बोलता। कॉर्पोरेट मीडिया भी इन आंदोलनों को इसीलिए समर्थन दे रहा है क्योंकि इनसे व्यवस्था को कोई ख़तरा नहीं महसूस होता। इससे काफ़ी भ्रम भी फैला है। हमें ऐसे आंदोलनों और जनसंघर्षों के बीच के अंतर को समझना चाहिए।
उन्होंने कहा कि असली लड़ाई अमीरी और ग़रीबी की खाई को पाटने की, भूमिसुधार करने की, श्रम क़ानूनों के उल्लंघन को रोकने की है। आज हालत यह है कि स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं व षिक्षकों को न्यूनतम से भी कम वेतन में काम करना पड़ रहा है। हमें किसानों, गरीबों, वंचितों व बेरोजगारों के हक में अपना संघर्ष जारी रखने की ज़रूरत है। होमी दाजी को याद करने का मतलब भी यही है कि हम इस संघर्ष को आगे बढ़ाएँ।
कार्यक्रम की अध्यक्षता भाकपा जिला परिषद के सदस्य व प्रगतिषील लेखक संघ की इंदौर इकाई के उपाध्यक्ष एस. के. दुबे और भाकपा जिला परिषद के सदस्य एडवोकेट ओमप्रकाष खटके ने की। कार्यक्रम का संयोजन व संचालन किया प्रगतिषील लेखक संघ के राज्य महासचिव विनीत तिवारी ने। कॉमरेड पेरिन दाजी की किताब के संपादक भी वही हैं। यह किताब भारतीय महिला फ़ेडरेषन की केन्द्रीय इकाई व प्रगतिषील लेखक संघ की इन्दौर इकाई द्वारा संयुक्त रूप से प्रकाषित की गई है। कविता पोस्टरों व होमी दाजी के चित्रों की प्रदर्षनी भी इस मौके पर इप्टा इंदौर के सचिव श्री अषोक दुबे ने लगायी थी जो काले-सफ़ेद चित्रों के साथ अतीत के एक चमकदार दौर की याद दिला रही थी और उस दौर को वर्तमान में हासिल करने के लिए उकसा रही थी। कार्यक्रम के दौरान और कार्यक्रम के बाद लगते ‘‘कॉमरेड होमी दाजी को लाल सलाम’’ के जोषीले नारे बुजुर्ग कॉमरेडों की आँखों में उम्मीद की एक चमक पैदा कर रही थीं।
- सारिका श्रीवास्तव
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सोमवार, 17 अक्टूबर 2011

वामपंथी दलों का प्रदेश स्तरीय एक दिवसीय अनशन हेतु अपील

    वामपंथी दलों - भाकपा, माकपा, फारवर्ड ब्लाक, आरएसपी का महंगाई, भ्रष्टाचार, उपजाऊ जमीनों के अधिग्रहण, शिक्षा के बाजारीकरण, बेरोजगारी एवं जर्जर हो चुकी कानून-व्यवस्था के खिलाफ तथा मजबूत लोकपाल कानून बनवाने के लिए राज्यस्तरीय एक दिवसीय अनशन स्थानीय झूले लाल पार्क में कल दिनांक 18 अक्टूबर 2011 को सुबह 10.00 बजे से शुरू होगा।

    वामपंथी दल आम जनता से अपील करते हैं कि वे इस अभियान में शामिल होकर अपनी एकजुटता दिखाएं तथा मीडिया कर्मियों से इस कार्यक्रम को कवर करने की अपील करते हैं।
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शनिवार, 15 अक्टूबर 2011

भाकपा की 21वीं कांग्रेस का महत्व

यों प्रत्येक कम्युनिस्ट के लिए तीन साल पर होने वाली हर पार्टी कांग्रेस महत्वपूर्ण होती है, पर पटना में अगले वर्ष होने वाली 21वीं कांग्रेस निश्चय ही विशिष्ट होंगी। इसकी विशिष्टता को भाकपा का राष्ट्रीय परिषद (18-19 जून, 2011) ने अपने प्रस्ताव में निम्नांकित शब्दों में प्रकट किया है।
    ”वामपंथ को स्वयं अपने नेतृत्व में राजनीतिक विकल्प पेश करना होगा, जिसका आधार होगा वैकल्पिक आर्थिक कार्यक्रम और सम्प्रदाय निरपेक्ष लोकतंत्र के लिये प्रतिबद्धता, क्योंकि भारत की अधिकांश राजनीतिक पार्टियां, राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर भी, आर्थिक नव उदारवाद का समर्थन करती है।“
    यहांॅ उपर्युक्त उद्धरण की चार बातें ध्यातव्य हैं -
क.    नवउदारवादी आर्थिक नीति की समर्थक पार्टियों की पहचान,
ख.    सम्प्रदाय निरपेक्ष लोकतंत्र की रक्षा,
ग.    वैकल्पिक आर्थिक कार्यक्रम का निर्माण, और
घ. वैकल्पिक राजनीति का वामपंथी नेतृत्व
    भारत के स्वातंत्रयोत्तर- कालीन युग में गैर कांग्रेस वाद और गैर संप्रदायवाद के आधार पर राजनीतिक धु्रवीकरण होता जा रहा है। प्रकटतः इसके व्यावहारिक परिणाम ने देश में द्विदलीय शासन प्रणाली का दस्तक दी है। इससे आर्थिक कार्यक्रम के आधार पर राजनीतिक धु्रवीकरण का प्रश्न पृष्ठिभूमि में ओझल हुआ है। यही कारण है कि केन्द्र में कमजोर सरकारों के अस्तित्व के बावजूद नवउदारवादी आर्थिक नीति का घोड़ा बेरोकटोक सरपट दौंड़ता गया है। इस परिस्थिति में वामपंथ के नेतृत्व में वैकल्पिक आर्थिक कार्यक्रम के आधार पर राजनीतिक विकल्प तैयार करने का प्रस्ताव वर्तमान अनिश्चित वातावरण में भरोसा पैदा करने वाला महत्वपूर्ण दिशा सूचक निर्णय है। इसका आवश्य ही सर्वत्र स्वागत किया जायेगा।
    बिहार के लिए पार्टी कांग्रेस आयोजित करने का यह तीसरा मौका है। पहला मौका 1968 में आठवीं कांग्रेस आयोजित करने का मिला था। इसे पटना के ऐतिहासिक मैदान में संपन्न किया गया। उस महाधिवेशन के समय बिहार में प्रथम गैर कांग्रेसी संविद सरकार थी, जिसमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी भी शामिल थी। कांग्रेस कुशासन के अंत में पूरे राज्य में जन उत्साह का माहौल था। इस महाधिवेशन में शामिल प्रतिनिधियों के बारे में प्रमाण समिति ने अपने प्रतिवेदन में दर्ज किया कि वे सभी के सभी जेल जीवन बिताये संघर्षों के तपे-तपाये नेता थे। इस
महाधिवेशन की विशेषता थी कि इसमें शामिल एक भी प्रतिनिधि ऐसा नहीं था, जिन्होंने अपने जीवन का एक भाग ब्रिटिश राज में अथवा आजाद भारत में जेल की सलाखों में नहीं बिताया हो। यह संपूर्ण पार्टी द्वारा चलाये गये जनसंघर्षों का इजहार था और साथ ही पार्टी कांग्रेस में उपस्थित प्रतिनिधियों की वर्ग निष्ठा और उनके जुझारूपन का प्रमाण भी।
    दूसरा मौका, 1987 में महाधिवेशन आयोजन का था। यह भी पटना में संपन्न हुआ। इस महाधिवेशन में चतुरानन मिश्रा द्वारा प्रस्तुत महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया गया, जिसमें गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर करने वालों के हितों की रक्षा करने का आह्वान किया गया।
    पार्टी कांग्रेस आयोजित करने का यह तीसरा अवसर बिहार की अपेक्षाकृत विपरीत परिस्थिति में मिला है। राज्य में भाजपा-जदयू की सरकार है। पार्टी को विगत विधान सभा में अपेक्षित सफलता नहीं मिली। बंगाल और केरल के चुनाव परिणामों ने भी असर डाला है। बिहार के साथियों ने पार्टी कांग्रेस आयोजन को एक चुनौती के रूप में लिया है। पार्टी कांग्रेस आयोजन साथियों का प्रथम कर्तव्य बन गया है। इस टास्क को पूरा करने में साथी मुस्तौदी से लग गये हैं। सभी स्तर की कमेटियां कोष संग्रह में लग गयी हैं। साथियों में विश्वास है कि बिहार की गौरवशाली परंपरा के अनुरूप पार्टी कांग्रेस का आयोजन अवश्य ही कामयाब होगा।
निःसंदेह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की 21वीं कांग्रेस सफल होगी और इसके फैसले भारतीय राजनीति में वर्ग आधारित वामपंथी धु्रवीकरण को प्रारंभ करेंगे।
- सत्य नारायण ठाकुर
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भाकपा ने अल्लामा फज़ले हक ”खैराबादी“ को श्रद्धांजलि देने आये चार केन्द्रीय नेताओं का उड़ाया मजाक

    लखनऊ 15 अक्टूबर। भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के महान नायक तथा काले पानी की सजा पाने वाले पहले भारतीय अल्लामा फज़ले हक ”खैराबादी“ के जीवन से जुड़े पहलुओं पर चर्चा के लिए आज कांग्रेस के चार-चार केन्द्रीय नेताओं - दिग्विजय सिंह, सलमान खुर्शीद, श्री प्रकाश जायसवाल तथा बेनी प्रसाद वर्मा के लखनऊ पधारने का मजाक उड़ाते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य कोषाध्यक्ष प्रदीप तिवारी ने कहा है कि आसन्न विधान सभा चुनावों में अल्पसंख्यकों के वोट बटोरने के लिए कांग्रेस यह कवायद कर रही है और श्रद्धेय अल्लामा फज़ले हक ”खैराबादी“ के प्रति इन नेताओं और कांग्रेस में जरा भी सम्मान की भावना नहीं है।
    भाकपा कोषाध्यक्ष प्रदीप तिवारी ने आज यहां जारी एक प्रेस बयान में कहा है प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के डेढ़ सौ वर्ष पूरे होने के पूर्व भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने अगस्त 2006 में बाकायदा एक प्रस्ताव पारित कर संप्रग-1 सरकार से अमौसी हवाई अड्डे का नाम बेगम हजरत महल हवाई अड्डा रखने तथा अल्लामा फज़ले हक ”खैराबादी“ की स्मृति में खैराबाद अथवा सीतापुर में एक विश्वस्तरीय शैक्षिक संस्थान की स्थापना करने एवं उनकी प्रतिमा को खैराबाद रेलवे स्टेशन पर लगाने की मांग की थी। अल्लामा द्वारा प्रथम स्वाधीनता संग्राम का जो आंखों देखा हाल लिखा गया था, उसे हिन्दी और अंग्रेजी में प्रकाशित करने की भी मांग भाकपा ने की थी क्योंकि प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का वह सबसे ज्यादा अधिकारिक दस्तावेज है। चूंकि भाकपा उस समय संप्रग-1 सरकार को बाहर से समर्थन दे रही थी, भाकपा महासचिव ए. बी. बर्धन ने एक पत्र लिख कर सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह से भाकपा की इस मांग को पूरा करने का अनुरोध किया था परन्तु कांग्रेस के इन नेताओं ने अवध के इन बुजुर्गों के प्रति असम्मान जाहिर करते हुए भाकपा की मांग को ठुकरा दिया था। उसके थोड़े दिनों के बाद ही होने जा रहे विधान सभा चुनावों में जाट मतदाताओं को लुभाने के लिए लखनऊ हवाई अड्डे का नाम चौधरी चरण सिंह हवाई अड्डा रख दिया था।
    प्रदीप तिवारी ने कहा है कि अब आसन्न विधान सभा चुनावों में मुसलमानों को अपनी ओर खींचने के लिए कांग्रेस आज की यह कवायद कर रही है और कांग्रेस के इन नेताओं को अल्लामा के जीवन, उनके सोच और उनके कामों के बारे में कुछ भी पता नहीं है।
अल्लामा फज़ले हक ”खैराबादी“ के प्रति भाकपा की श्रद्धा को दोहराते हुए प्रदीप तिवारी ने कहा है कि प्रथम स्वाधीनता संग्राम का फतवा जारी करने वाले अल्लामा शिक्षा के प्रति इतने समर्पित थे कि अंडमान जेल के तत्कालीन अधीक्षक के अनुरोध पर उन्होंने उनका उस्ताद बनना भी स्वीकार कर लिया था। प्रदीप तिवारी ने कहा कि यह अल्लामा की ही देन थी अंडमान जेल के बंदियों के पुत्र-पुत्रियों के नामों से उनके मज़हब और जाति का पता लगना बन्द हो गया था।
    भाकपा कोषाध्यक्ष प्रदीप तिवारी ने भाकपा ने उन पुरानी मांगों को फिर दोहराते हुए प्रेस से अनुरोध किया है कि वे इस कार्यक्रम में आये कांग्रेस के नेताओं से इन बातों पर सवाल करें।
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शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2011

वामपंथी दलों के नेताओं द्वारा पत्रकार वार्ता में लखनऊ में जारी प्रेस नोट

    लखनऊ 14 अक्टूबर। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), आल इंडिया फारवर्ड ब्लाक तथा रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी के राज्य नेतृत्व ने आज पत्रकार वार्ता में निम्न प्रेस नोट जारी किया:
”कमरतोड़ मंहगाई, भ्रष्टाचार, उपजाऊ जमीनों के अधिग्रहण, शिक्षा के बाजारीकरण, बेरोजगारी एवं जर्जर हो चुकी कानून-व्यवस्था के खिलाफ तथा मजबूत लोकपाल कानून बनवाने के लिए वामपंथी दलों ने उत्तर प्रदेश में एक व्यापक और लगातार जनान्दोलन की रूपरेखा बनाई है। इसके तहत 18 अक्टूबर को प्रातः 10.00 बजे चारों वाम दलों द्वारा एक दिवसीय सामूहिक अनशन लखनऊ के झूले लाल पार्क में किया जायेगा। आन्दोलन के अगले चरण की घोषणा अनशन स्थल से की जायेगी।
उपर्युक्त घोषणा करते हुए चारों वाम दलों के नेताओं ने कहा कि केन्द्र सरकार द्वारा चलाई जा रहीं आर्थिक नवउदारवाद की नीतियों के चलते महंगाई ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया है। आटा, दाल, चीनी, रसोई गैस, सब्जी, मसाले, फल तथा दवाओं के दाम इस कदर बढ़ गये हैं कि आम आदमी इससे कराह उठा है। मूल्यवृद्धि का एक प्रमुख कारण बार-बार बढ़ाई जा रही पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें हैं जिन पर उत्तर प्रदेश की सरकार अगर अपने टैक्स कम कर दे तो जनता को कुछ राहत मिल सकती है। लेकिन जनता की फिक्र न केन्द्र सरकार को है और न ही राज्य सरकार को।
केन्द्र सरकार आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी है। हजारों-हजार करोड़ के घोटाले सामने आ चुके हैं। संप्रग अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री स्वयं घोटालेबाजों का बचाव कर रहे हैं। अब नये खुलासे से पूरी कैबिनेट कटघरे में है और यदि सही जांच और उस पर अमल हो जाये तो इस सरकार के अधिकतर मंत्री जेल के सींखचों के पीछे होंगे। मुख्य विपक्षी दल भाजपा, जिसे अमरीकी साम्राज्यवाद और कार्पोरेट मीडिया विकल्प के तौर पर पेश कर रहा है, के देश में तमाम नेता और कई मंत्री भ्रष्टाचार में लिप्त हैं लेकिन भाजपा बड़ी बेशर्मी के साथ अपने को भ्रष्टाचारमुक्त बताने को तमाम तरह के नाटक कर रही है।
उत्तर प्रदेश में घपले-घोटालों के चलते कई मंत्रीगण सत्ता से हाथ धो बैठे हैं और कई अन्य अभी घोटालों की गिरफ्त में फंसते जा रहे हैं। मुख्यमंत्री पहले मंत्री, विधायकों एवं अफसरों से धन वसूली करवाती हैं और जब उनके भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ हो जाता है तो अपनी छवि बनाने को उनको हटाने का नाटक करती हैं। शासन-प्रशासन में ऊपर से नीचे तक फैले भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के चलते जनता तबाह और बर्बाद हो रही है।
केन्द्र और प्रदेश दोनों की सरकारें किसानों को हर तरह से बर्बाद करने पर अमादा हैं। उनकी उपजाऊ जमीनों का बड़े पैमाने पर अधिग्रहण जारी है। किसान जगह-जगह इसका विरोध कर रहे हैं। उन्हें लाठी-गोली का शिकार बनाया जा रहा है। भूमि अधिग्रहण कानून 1894 को आजादी के 64 साल बाद भी बदला नहीं गया। इसके अलावा किसानों की जरूरत की हर चीज की कीमतें बढ़ाई जा रही हैं जबकि उनके उत्पादों की सही कीमत उन्हें मिल नहीं रही। भूमि अधिग्रहण से विस्थापित मजदूरों और दस्तकारों को भी रोजगार से हाथ धोना पड़ रहा है।
उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है। पूर्व सरकार के जंगलराज से निजात पाने को ही जनता ने इस सरकार को चुना था लेकिन आज इस सरकार के कार्यकाल में हत्या, लूट, बलात्कार की घटनाओं ने सारी सीमायें तोड़ दी हैं। दलित और महिला मुख्यमंत्री के शासनकाल में सबसे ज्यादा उत्पीड़न का शिकार दलित और महिलायें हो रहे हैं। शासक दल के विधायक, मंत्री तथा अन्य ओहदेदार जो अपराधिक और सामंती पृष्ठभूमि से आते हैं, इन अपराधों को सरेआम अंजाम दे रहे हैं। बसपा की सोशल इंजीनियरिंग की नीति इस परिस्थिति के लिये जिम्मेदार हैं।
सरकार निजी क्षेत्र में शिक्षा प्रणाली को बढ़ावा दे रही है। पढ़ाई इस कदर महंगी हो गयी है कि गरीब और आम आदमी बच्चों की पढ़ाई के लिए कर्ज ले रहा है या जमीन-जेवर-जायदाद बेच रहा है। बेरोजगारी के चलते तमाम नौजवान हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। सरकारी विभागों में तमाम रिक्तियां हैं जो भरी नहीं जा रहीं। मनरेगा और विकास योजनाओं में भारी भ्रष्टाचार है। छात्र-नौजवानों में हर तरह की लूट और शोषण के खिलाफ आक्रोश व्याप्त है।
वामपंथी दल सभी वामपंथी एवं जनवादी ताकतों, आम जनता, छात्रों, नौजवानों एवं बुद्धिजीवियों से अपील करते हैं कि वे इस सामूहिक अनशन के भागीदार बनें और वाम दलों के आन्दोलन को मजबूती प्रदान करें।
(डा. गिरीश)
राज्य सचिव, भाकपा    
(डा. एस.पी. कश्यप)
राज्य सचिव, माकपा   
 (राम किशोर)
प्रदेश अध्यक्ष, एआईएफबी   
 (संतोष गुप्ता)
राज्य सचिव, आरएसपी

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गुरुवार, 13 अक्टूबर 2011

वामपंथी दलों का एक दिवसीय अनशन लखनऊ में 18 अक्टूबर सुबह 10 बजे से

इंकलाब जिन्दाबाद!                                                                      वामपंथी एकता - जिन्दाबाद!
मंहगाई, भ्रष्टाचार, उपजाऊ जमीनों के अधिग्रहण, शिक्षा के बाजारीकरण, बेरोजगारी एवं जर्जर हो चुकी कानून-व्यवस्था के खिलाफ
तथा
मजबूत लोकपाल कानून बनवाने के लिए
वामपंथी दलों का एक दिवसीय अनशन लखनऊ में
18 अक्टूबर सुबह 10 बजे से
उत्तर प्रदेश के भाइयों और बहनों,
केन्द्र सरकार द्वारा चलाई जा रहीं आर्थिक नवउदारवाद की नीतियों के चलते महंगाई ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया है। आटा, दाल, चीनी, रसोई गैस, सब्जी, मसाले, फल तथा दवाओं के दाम इस कदर बढ़ गये हैं कि आम आदमी इससे कराह उठा है। मूल्यवृद्धि का एक प्रमुख कारण बार-बार बढ़ाई जा रही पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें हैं जिन पर उत्तर प्रदेश की सरकार अगर अपने टैक्स कम कर दे तो जनता को कुछ राहत मिल सकती है। लेकिन जनता की फिक्र न केन्द्र सरकार को है और न ही राज्य सरकार को।
केन्द्र सरकार आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी है। हजारों-हजार करोड़ के घोटाले सामने आ चुके हैं। संप्रग अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री स्वयं घोटालेबाजों का बचाव कर रहे हैं। अब नये खुलासे से पूरी कैबिनेट कटघरे में है और यदि सही जांच और उस पर अमल हो जाये तो इस सरकार के अधिकतर मंत्री जेल के सींखचों के पीछे होंगे। मुख्य विपक्षी दल भाजपा, जिसे अमरीकी साम्राज्यवाद और कार्पोरेट मीडिया विकल्प के तौर पर पेष कर रहा है, के देष में तमाम नेता और कई मंत्री भ्रष्टाचार में लिप्त हैं लेकिन भाजपा बड़ी बेषर्मी के साथ अपने को भ्रष्टाचारमुक्त बताने को तमाम तरह के नाटक कर रही है।
उत्तर प्रदेश में घपले-घोटालों के चलते कई मंत्रीगण सत्ता से हाथ धो बैठे हैं और कई अन्य अभी घोटालों की गिरफ्त में फंसते जा रहे हैं। मुख्यमंत्री पहले मंत्री, विधायकों एवं अफसरों से धन वसूली करवाती हैं और जब उनके भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ हो जाता है तो अपनी छवि बनाने को उनको हटाने का नाटक करती हैं। शासन-प्रशासन में ऊपर से नीचे तक फैले भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के चलते जनता तबाह और बर्बाद हो रही है।
केन्द्र और प्रदेश दोनों की सरकारें किसानों को हर तरह से बर्बाद करने पर अमादा हैं। उनकी उपजाऊ जमीनों का बड़े पैमाने पर अधिग्रहण जारी है। किसान जगह-जगह इसका विरोध कर रहे हैं। उन्हें लाठी-गोली का शिकार बनाया जा रहा है। भूमि अधिग्रहण कानून 1894 को आजादी के 64 साल बाद भी बदला नहीं गया। इसके अलावा किसानों की जरूरत की हर चीज की कीमतें बढ़ाई जा रही हैं जबकि उनके उत्पादों की सही कीमत उन्हें मिल नहीं रही। भूमि अधिग्रहण से विस्थापित मजदूरों और दस्तकारों को भी रोजगार से हाथ धोना पड़ रहा है।
उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है। पूर्व सरकार के जंगलराज से निजात पाने को ही जनता ने इस सरकार को चुना था लेकिन आज इस सरकार के कार्यकाल में हत्या, लूट, बलात्कार की घटनाओं ने सारी सीमायें तोड़ दी हैं। दलित और महिला मुख्यमंत्री के शासनकाल में सबसे ज्यादा उत्पीड़न का शिकार दलित और महिलायें हो रहे हैं। शासक दल के विधायक, मंत्री तथा अन्य ओहदेदार जो अपराधिक और सामंती पृष्ठभूमि से आते हैं, इन अपराधों को सरे आम अंजाम दे रहे हैं। बसपा की सोशल इंजीनियरिंग की नीति इस परिस्थिति के लिये जिम्मेदार हैं।
सरकार निजी क्षेत्र में शिक्षा प्रणाली को बढ़ावा दे रही है। पढ़ाई इस कदर महंगी हो गयी है कि गरीब और आम आदमी बच्चों की पढ़ाई के लिए कर्ज ले रहा है या जमीन-जेवर-जायदाद बेच रहा है। बेरोजगारी के चलते तमाम नौजवान हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। सरकारी विभागों में तमाम रिक्तियां हैं जो भरी नहीं जा रहीं। मनरेगा और विकास योजनाओं में भारी भ्रष्टाचार है। छात्र-नौजवानों में हर तरह की लूट और शोषण के खिलाफ आक्रोश व्याप्त है।
वामपंथी दलों ने उत्तर प्रदेश में इन प्रमुख सवालों पर एक व्यापक और लगातार जन आन्दोलन की रूप रेखा बनाई है। इसके तहत 18 अक्टूबर को प्रातः 10 बजे से चारों वामदलों द्वारा एक दिवसीय सामूहिक अनशन लखनऊ के झूले लाल पार्क में किया जायेगा। आन्दोलन के अगले चरण की घोषणा अनशन स्थल पर ही कर दी जायेगी।
वामपंथी दल सभी वामपंथी एवं जनवादी ताकतों, आम जनता, छात्रों, नौजवानों एवं बुद्धिजीवियों से अपील करते है कि वे इस सामूहिक अनशन के भागीदार बनें। आशा है आप सभी का सहयोग हमें अवश्य प्राप्त होगा।
निवेदक
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी            भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मा.)
आल इंडिया फारवर्ड ब्लाक            रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी

की
उत्तर प्रदेश राज्य कमेटियां
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मंगलवार, 11 अक्टूबर 2011

सीतापुर को मंडल बनाने की मांग के साथ भाकपा का जिला सम्मेलन सम्पन्न

सीतापुर 9 अक्टूबर। सीतापुर को मंडल बनाने की मांग करते हुए एक विस्तृत प्रस्ताव पारित करते हुए भाकपा का सीतापुर जिला सम्मेलन आज सम्पन्न हो गया। प्रस्ताव में कहा गया है कि सीतापुर और लखीमपुर बड़े जिले हैं तथा इन जिलों के सिदूर अंचलों से लखनऊ मंडल मुख्यालय पहुंचने के लिए 300 कि.मी. तक का सफर तय करना पड़ता है। प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि लखनऊ मंडल में शामिल होने के कारण सीतापुर और लखीमपुर जनपदों का विकास नहीं हो पा रहा है। सत्तर के दशक तक कानपुर के साथ केवल सीतापुर जिला उत्तर प्रदेश में पिछड़ा घोषित नहीं था परन्तु उसके बाद से सीतापुर और लखीमपुर का विकास पूरी तरह अवरूद्ध रहा है और सीतापुर को मंडल बनाने से इन जिलों का विकास संभव हो सकता है। प्रस्ताव में सीतापुर मंडल का मुख्यालय सीतापुर में बनाने की मांग की गयी है। प्रस्ताव में इस मुद्दे पर जनमत तैयार करने का भी फैसला किया गया। प्रस्ताव में भाकपा की लखीमपुर जिला कौंसिल से इस प्रस्ताव पर सहमति देने की अपील की गयी है। प्रस्ताव को वयोवृद्ध साथी जव्वार हुसेन ने पेश किया था जिसका समर्थन सभी प्रतिनिधियों ने किया।
सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए राज्य से आये पर्यवेक्षक प्रदीप तिवारी ने कहा कि आन्दोलन के अस्तित्व को बरकरार रखने और विचारधारा का झंडा थामे रहने का दौर अब खतम हो गया है। अरब एवं दक्षिण अफ्रीकी देशों के नागरिक विद्रोहों तथा दक्षिण अमरीकी महाद्वीप में वामपंथी सरकारों के गठन की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि हिन्दुस्तान में भी माहौल अब हमारे अनुकूल बन रहा है और जनता में वामपंथ की आकर्षण पैदा हो रहा है। उन्होंने कहा कि इन परिवर्तनों से उत्तर प्रदेश भी अछूता नहीं है। उन्होंने कहा कि अब आगे बढ़ने का वक्त है और नौजवानों तथा छात्रों को संगठित किये बगैर और उन्हें मार्क्सवाद की शिक्षा दिये बिना आगे नहीं बढ़ा जा सकता। वक्त का तकाजा है कि हम नई कम्युनिस्ट पौध लगाना शुरू कर आगे बढ़ने की प्रक्रिया को अब आगे बढ़ायें।
सीतापुर के भाकपा के इतिहास का उल्लेख करते हुए प्रदीप तिवारी ने कहा कि जिले में भाकपा की सदस्यता बहुत ज्यादा कभी नहीं रही परन्तु एक लम्बे दौर तक जिले के हर अंचल में पार्टी के सदस्य थे और पार्टी के जन संगठनों का आधार लम्बे दौर तक बीस हजार के आस-पास रहा। पार्टी जिला स्तर पर विरोध प्रदर्शनों में हजारों की संख्या में जन समुदाय को सड़कों पर उतारने तथा लखनऊ या दिल्ली ले जाने की सामर्थ्य रखती थी। उन्होंने कहा कि यहां की भाकपा की यह स्ट्राइकिंग पावर ही थी कि सन 1970 के किसान आन्दोलन में केन्द्रीय भूमिका यहां के साथियों को दी गयी थी और कामरेड एस.ए. डांगे ने लखनऊ में गिरफ्तार होने के बावजूद सीतापुर जेल अपना ट्रान्सफर करवा लिया था। राज्य पार्टी के लिए यह चिन्ता की बात है कि पार्टी संगठन अब एक इलाके में सिकुड़ कर रह गया है। ‘ऐसा क्यों हुआ?’ की मीमंासा में समय बर्बाद करने की जरूरत नहीं है और हमें अब अपने पुराने गौरव को हासिल करने पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने जनपद में नौजवान सभा और स्टूडेन्ट्स फेडरेशन को तुरन्त गठित करने की आवश्यकता रेखांकित करते हुए प्रतिनिधियों से अपील की कि वे आज इसी सम्मेलन में दो नौजवान साथियों को नौजवान सभा बनाने के कार्यभार के लिए नामांकित कर दें और कम से कम दो वर्ष तक उन्हें संगठन बनाने में हर तरह की सुविधा मुहैया करायें।
सम्मेलन में राजनीतिक एवं सांगठनिक रिपोर्ट जिला मंत्री शकील बेग ने पेश करते हुए कहा कि कुछ विशेष परिस्थितियों के कारण उत्तर प्रदेश में राज्य सम्मेलन और जिला सम्मेलन जल्दी करवाने पड़ गये हैं जिसके कारण पार्टी कांग्रेस के दस्तावेजों के प्रारूप अभी उपलब्ध नहीं हैं। हम अगली बैठकों पर उन दस्तावेजों पर भी चर्चा करेंगे। रिपोर्ट को सर्वसम्मति से पारित किया गया।
सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए वयोवृद्ध कम्युनिस्ट नेता जव्वार हुसेन ने वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों की चर्चा करते हुए राज्य से आये पर्यवेक्षक प्रदीप तिवारी को विश्वास दिलाया कि राज्य की अपेक्षाओं पर सीतापुर के साथी खरे उतरेंगे। 18 अक्टूबर को होने वाले वामपंथी दलों के राज्य-स्तरीय अनशन में भी अधिक से अधिक साथियों को भेजने की व्यवस्था की जायेगी।
जिला सम्मेलन की अध्यक्षता वयोवृद्ध कम्युनिस्ट नेता राम किशन मौर्या तथा हरबंस शुक्ला के अध्यक्षमंडल ने की। सम्मेलन ने शकील बेग को अगली अवधि के जिला मंत्री निर्वाचित किया तथा एक 11 सदस्यीय जिला कौंसिल का गठन किया गया। जिला कौंसिल में जिला मंत्री शकील बेग के अलावा जव्वार हुसेन, हरबंस कुमार शुक्ला, नाजिम अली, मोहम्मद कलीम, राम किशन मौर्य, जियाउल हसन खां, ईदरीस, दुर्जन, शिवपाल तथा श्री राम को शामिल किया गया। राज्य सम्मेलन के लिए जव्वार हुसेन को प्रतिनिधि चुना गया तथा दूसरे प्रतिनिधि के लिए निर्वाचित जिला कौंसिल को अधिकृत किया गया।
जिला सम्मेलन ने मोहम्मद जावेद खां तथा नाजिम अली को नौजवान सभा का कार्यभार देखने के लिए नामित किया। जिला सम्मेलन ने ”पार्टी जीवन“ के अधिक से अधिक ग्राहक बनाने का अभियान चलाने का भी फैसला किया।
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प्रगतिशील लेखक संघ का प्लेटिनम जयंती समारोह


नई चुनौतियों से निपटने के लिए नई रणनीति बनाने का संकल्प
प्रगतिशील लेखक संघ का प्लेटिनम जयंती समारोह
लखनऊ 9 अक्टूबर। नई चुनौतियों से निपटने के लिए नई रणनीति बनाने के संकल्प के साथ प्रगतिशील लेखक संघ का प्लेटिनम जयंती समारोह आज कैफी आज़मी एकेडमी में सम्पन्न हो गया। समारोह के प्रथम दिन का आयोजन नेहरू युवा केन्द्र में किया गया था और दूसरे दिन का आयोजन कैफी आजमी एकेडमी में किया गया। प्रथम दिन उद्घाटन सत्र के साथ ”प्रगतिशील लेखक आंदोलन के 75 वर्ष - परिप्रेक्ष्य और चुनौतियां“ विषय पर परिसंवाद आयोजित किया गया तो दूसरे दिन ”प्रगतिशील आंदोलन की विरासत - पक्षधरता के जोखिम“ विषय पर परिचर्चा के साथ समापन समारोह सम्पन्न हुआ।
गतिशीलता से काम नहीं चलने वाला है। हमें ऐसी गतिशीलता चाहिए जो समाज को आगे ले जाए। मनुष्यता को आगे ले जाए। हम अपनों से भी लड़ रहे हैं जो ज्यादा मुश्किल काम है। इसके बावजूद हम हैं और हमारा आंदोलन जिंदा है। यह उद्गार थे खगेन्द्र ठाकुर के जब वे नेहरू युवा केंद्र में अतीत की उपलब्धियों को रेखांकित करने के साथ ही भावी चुनौतियों और जिम्मेदारी के सन्दर्भ में बोल रहे थे।
प्रलेस के राष्ट्रीय महासचिव अली जावेद ने कहा कि मेहनकश अवाम के साथ लेखक के एकाकार होने की जरूरत है आज के साम्राज्यवादी चुनौतियों के दौर में संगठन की जिम्मेदारियां और बढ़ जाती हैं। शेखर जोशी ने कहा कि प्रगतिशील लेखक आंदोलन न होता तो हम लोग न होते। ‘परिप्रेक्ष्य और चुनौतियां’ विषय पर रीवां से आए युवा साहित्यकार डा. आशीष त्रिपाठी ने अगली पीढ़ी तैयार न होने का मुद्दा उठाकर चर्चा को गरमा दिया। डा. त्रिपाठी ने कहा कि युवा विचारक व लेखक नहीं दिखाई दे रहे हैं। अगली पीढ़ी तैयार करनी होगी। इसके लिए हमें फिर विश्वविद्यालय व दूसरे शैक्षिक संस्थानों की तरफ रुख करना होगा।
नाटककार राकेश ने कहा कि लेखन के केंद्र में अभी भी हाशिए का आदमी है। दलित व महिलाएं हैं। हमारे सामने लेखन में धार देने की चुनौती है। डा. रमेश दीक्षित ने कहा कि नए लोगों को जोड़ने के साथ-साथ प्रगतिशील लेखकों का व्यापक संयुक्त मोर्चा बनना चाहिए। अब नए साम्राज्यवाद का दौर है। समाज का एनजीओकरण हो गया है। जनतांत्रिक संगठनों को एक होकर बड़ा संघर्ष शुरू करने की जरूरत है। महाराष्ट्र के जाने माने लेखक श्रीपाद जोशी ने विचारधारा पर एक्शन प्लान की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि लोगों को हमसे आशा हमेशा बनी रही है लेकिन आज अपनी विरासत को लोगों तक पहुंचाने के माध्यम की चुनौती है। हमें संवाद के माध्यमों के बारे में विचार करना होगा। अवसर खोजने होंगे। लेखक डा. श्रीप्रकाश शुक्ल ने जनता की पक्षधरता का मुद्दा उठाते हुए साहित्य को जनता से जोड़ने की कोशिश करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि धर्म और पूंजी के रिश्ते बड़ी चुनौती हैं। डा. रघुवंश मणि, डा. सुखदेव सिंह, मोहन सिंह ने भी चर्चा में अपने विचार रखे।
समारोह की शुरुआत में विरोधाभासी टिप्पणियां कर चुके डा. नामवर सिंह ने समापन भाषण में उन्हें नसीहत दी। उन्होंने दो दिन की चर्चा के बाद एक नया घोषणापत्र तैयार करने पर बल दिया। नई चुनौतियों पर नए कार्यभार तय करने की जिम्मेदारी उन्होंने साथी साहित्यकारों को थमाई और कहा ‘ये कार्य अकेले नहीं किया जा सकता’। इसके लिए उन्होंने एक कमेटी के गठन की आवश्यकता रेखांकित की। उन्होंने कई भावी चुनौतियों के बारे में आगाह करते हुए उनसे लड़ने के लिए समान विचार वाले साहित्यकारों को एकजुट करने की जरूरत बताई। उन्होंने कई बड़ी चुनौतियों की बात करते हुए साहित्यकारों को उनसे आगाह भी किया। उन्होंने कहा कि नए वैश्विक अर्थ संकट के आने की आशंका है। जनवादी लेखक संघ (जलेस) और जन संस्कृति मंच (जसम) के साथ मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए।
समापन समारोह के पूर्व ‘प्रगतिशील आंदोलन की विरासत - पक्षधरता के जोखिम’ विषय पर लेखक एवं बीएसयू के रिटायर्ड प्रोफेसर चौथीराम यादव ने कहा कि प्रलेस को किसानों व मजदूरों के सहवर्ती आंदोलन से जोड़ना होगा। उनके प्रति प्रतिबद्धता लानी होगी। कबीर और प्रेमचंद की तरह जन पक्षधरता के जोखिम उठाने होंगे। उन्होंने कहा कि सोवियत यूनियन के विघटन को साहित्यकारों द्वारा माकर््सवादी समाजवाद के खात्में के बतौर लेना एक भ्रामक विश्लेषण था। उन्होंने कहा कि साहित्य को फिर से माकर््सवाद को एक विकल्प के बतौर प्रस्तुत करना होगा यही प्रगतिशील लेखक संघ की राजनीतिक जिम्मेदारी है। आलोचक वीरेंद्र यादव ने कहा कि लेखक ने अपने को वर्ण से मुक्त किया। तमाम विरोधों के बावजूद प्रलेस का आंदोलन बढ़ा है। प्रगतिशील लेखक संघ आधुनिक भारत का पहला ऐसा लेखक आंदोलन था जिसने साहित्य को राजनीति से जोड़ने का काम किया था। आज इस परम्परा को आगे बढ़ाने की जरुरत है। उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक काल में प्रलेस ब्रिटिश साम्रज्यवाद के साथ-साथ धार्मिक कठमुल्लावाद से भी लड़ा था आज इस आंदोलन को फिर से इस भूमिका में आना होगा।
लेखक आबिद सुहैल ने कहा कि हाशिये के आदमी का साहित्य हाशिये पर आ गया है। लेखन पर चिंतन करना होगा। लेखक एवं पत्रकार श्याम कश्यप ने कहा कि जोखिम उठाने का फैसला लेखक का निजी होता है। हम अपने हथियार को भूलने की कोशिश न करें। प्रो. रमेश दीक्षित ने कहा कि जोखिम तो अभी उठाया ही नहीं गया है। साहित्यकार अफसरपरस्ती छोड़ें। उन्होंने संघर्ष के साथियों के साथ काम करने की सलाह दी। उर्दू के जाने माने लेखक प्रो. अली अहमद फातमी ने सवाल किया कि आम आदमी के सरोकार क्यों गायब होते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि बाजारवाद हमें अपने सरोकारों से भटका रहा है।
लखनऊ दूरदर्शन के निदेशक शशांक ने कहा कि जीवनमूल्य क्षण में खत्म नहीं हो जाते। प्रगतिशील लेखन की विरासत को नई चीजों से जोड़ना होगा। परिवहन विभाग के रिटायर्ड प्रधान प्रबंधक एवं लेखक मूलचंद्र सोनकर ने यह सवाल उठाया कि दलितों के बारे में एक दलित लेखक ही बेहतर लिख सकता है। उन्होंने कहा कि हमारी विरासत का समावेश करने को प्रगतिशील साहित्यकार तैयार नहीं होते हैं। आज दलितों और पिछड़ों के सवालों को भी अपने विमर्श में रखना होगा। उन्होंने कहा कि सावित्री बाई फुले, रमाबाई को आप संज्ञान में नहीं लेंगे तो उनका गलत लोगों द्वारा इस्तेमाल आप नहीं रोक पाएंगे। दिल्ली से आए वरिष्ठ लेखक श्याम कश्यप ने कहा कि संगठन पर अपनी राजनीतिक जिम्मेदारियों का एहसास होना चाहिए जब तक संगठन का पार्टी के साथ संबन्ध रहा, आंदोलन अपनी भूमिका में ज्यादा कारगर साबित रहा।
सम्मेलन में पिछले दिनों लेखिका शीबा असलम फहमी पर हुए हमले की निंदा की गयी।
सम्मेलन को सम्बोधित करने वाले अन्य प्रमुख वक्ता थे - दीनू कश्यप, राजेन्द्र राजन, साबिर रुदौलबी, डा. गया सिंह, जय प्रकाश धूमकेतु, संजय श्रीवास्तव, रवीन्द्र वर्मा, केशव गोस्वामी, पंजाबी लेखक डा. सर्वजीत सिंह, गुरुनाम कंवर व खान सिंह वर्मा, आनन्द शुक्ला, नरेश कुमार, सुभाष चंद्र कुशवाहा, रवि शेखर, एकता सिंह, शाहनवाज आलम आदि शामिल रहे।
प्रगतिशील लेखक संघ का प्लेटिनम जयंती समारोह
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मंगलवार, 27 सितंबर 2011

लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्रों की समस्याओं पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा महामहिम राज्यपाल एवं कुलाधिपति को प्रेषित ज्ञापन

27 सितम्बर 2011
महामहिम राज्यपाल/कुलाधिपति
उत्तर प्रदेश सरकार/लखनऊ विश्वविद्यालय
राजभवन
लखनऊ

महामहिम राज्यपाल/कुलाधिपति महोदय,

    हम आपका ध्यान लखनऊ विश्वविद्यालय में व्याप्त चरम शैक्षिक अराजकता की ओर आकर्षित करना चाहते हैं। उदाहरण के लिए हम कुछ उदाहरण दे रहे हैं।
  • समाचार-पत्रों में लगातार प्रकाशित हो रहे समाचारों से आपको आभास हो चुका होगा कि लखनऊ विश्वविद्यालय में उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन में किस हद तक गैर-जिम्मेदाराना रवैया अख्तियार किया जा रहा है। छात्रों से उत्तर पुस्तिकाओं को दिखाने के लिये प्रति पुस्तिका पांच सौ रूपये वसूला जा रहा है। छात्र उसका पुरजोर विरोध कर रहे हैं। राज्य सूचना आयोग के निर्देशों और न्यायालय के आदेशों के बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन उन्हें दिखाना नहीं चाहता।
  • प्रमाणपत्रों, अंकतालिकाओं तथा बैक पेपर के लिए ली जाने वाली फीस को इतना अधिक बढ़ा दिया गया है कि 80-90 प्रतिशत छात्र उसे अदा करने की क्षमता नहीं रखते। उदाहरण के तौर पर एक बैक पेपर के लिए पांच सौ से लेकर एक हजार रूपये तक की फीस ली जाती है। यह छात्रों की निर्मम लूट है।
  • स्ववित्तपोषित कोर्सों के लिए अत्यधिक फीस वसूलने के बावजूद इन कोर्सों के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के मानकों के मुताबिक व्यवस्था नहीं की जाती। उदाहरण के तौर पर बी.ए. में फिजिकल एजुकेशन को एक विषय के रूप में लेने वाले छात्रों से रू. 10,000/- प्रति सेमेस्टर अतिरिक्त वसूला जाता है (अन्य विश्वविद्यालयों तथा इसी विश्वविद्यालय से सम्बद्ध महाविद्यालयों में यह फीस रू. 3,000 सालाना से भी कम है) जबकि इसकी शिक्षा देने के लिए आवश्यक व्यवस्था ही विश्वविद्यालय में नहीं है।
  • इसी प्रकार पत्रकारिता के लिए तीस हजार रूपये लिये जाते हैं जबकि समसामयिक पत्रकारिता प्रशिक्षण के लिए आवश्यक उपकरण विश्वविद्यालय में उपलब्ध ही नहीं हैं।
  • ऐकेडेमिक टूअर्स के नाम पर छात्रों से अनाप-शनाप पैसा वसूल कर हजम कर लिया जाता है। छात्रों को टूर पर भेजा ही नहीं जाता है।
  • छात्रवृत्ति एवं फीस रिफंड में व्यापक धांधलियां की जा रहीं हैं। बड़ी संख्या में छात्रों को इसका भुगतान मिल ही नहीं पाता है।
  • माइग्रेशन, ट्रांसफर सर्टीफिकेट, डिग्री एवं अंक तालिकाओं की दूसरी प्रति प्राप्त करने को भारी फीस वसूल की जा रही है तथा उनमें अंकित त्रुटि में सुधार कराने के लिये अलग से फीस वसूली जाती है।
  • पाठ्य सहगामी क्रियाओं ;मगजतं बनततपबनसंत ंबजपअपजपमेद्ध यानी खेल-कूद, वाद-विवाद आदि में छात्रों को प्रोत्साहित करने के बजाय उन्हें हर प्रकार से हतोत्साहित किया जाता है। प्रतिभाओं के कैरियर की किस तरह हत्या की जाती है, वह यहां के शिक्षकों की एक लॉबी से सीखा जा सकता है।
  • विश्वविद्यालय के अंदर खिलाड़ियों के लिए किसी कोच की व्यवस्था नहीं की जाती है। निरंतर चलने वाली अंतर-संकाय प्रतियोगिताओं को बिलकुल बन्द कर दिया गया है। इन प्रतियोगिताओं में परफार्मेन्स के बजाय किसी को भी मनमाने तरीके से ऐन मौके पर टीमों में रख लिया जाता है।
  • टीम के चयन के लिए नियमानुसार किसी एनआईएस कोच को बुलाना चाहिए परन्तु कोई भी खड़ा होकर प्रतियोगिता के दो-तीन दिन पहले टीम चुन लेता है। अभी 30 सितम्बर को जालंघर में आयोजित हो रही राष्ट्रीय फुटबाल प्रतियोगिता के लिए अकस्मात 25 सितम्बर को छात्रों को ट्रायल पर बुलाया गया और ट्रायल के पहले उनसे पचासी-पचासी रूपये वसूले गये। टीम को चयनित कर बिना रिजर्वेशन के 28 सितम्बर को जालंधर जाने को कह दिया गया। अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल नहीं है कि ट्रेन की भीड़ में घुस कर जालंधर जाने वाले थके हुए खिलाड़ी 30 सितम्बर को मैच में कैसा खेलेंगे?
  • चयनित छात्रों को किट के नाम पर चार-चार सौ रूपये बांट कर कहा जाता है कि कच्छा-बनियान खरीद लो। कोई भी संवेदनशील व्यक्ति अंदाज लगा सकता है कि बिना विश्वविद्यालय के ”लोगो“ के कोई टीम किसी प्रतियोगिता के उद्घाटन मार्च पास्ट में कच्छा-बनियान पहन कर उतरेगी तो कितनी हतोत्साहित होगी।
  • इस प्रकार खेल-कूद के नाम से सभी छात्रों से ली जा रही फीस तथा सरकार एवं यूजीसी से प्राप्त होने वाली अनुदान राशियों को गबन कर लिया जाता है।
  • चूंकि गरीब छात्र बार-बार न्यायालय का दरवाजा खटखटाने लायक पैसे की व्यवस्था नहीं कर सकते, अतएव न्यायालयों के आदेशों की अवहेलना आम बात हो गयी है।

राज्य एवं विश्वविद्यालय के संवैधानिक मुखिया होने के साथ-साथ आप विश्वविद्यालय के छात्रों के स्थानीय अभिवावक भी हैं। अतएव हम आपसे अनुरोध करते हैं कि लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्रों के इस शोषण के मामले में आप हस्तक्षेप करने का कष्ट करें और सम्पूर्ण मामलों की जांच अपने कार्यालय के किसी उच्चाधिकारी अथवा उच्चाधिकारियों की टीम से करवाने का कष्ट कीजिए जिससे छात्रों को इन संकटों से निजात मिल सके।

हमें विश्वास है कि आपके हस्तक्षेप से लखनऊ विश्वविद्यालय और उससे सम्बद्ध महाविद्यालयों के छात्रों को शोषण से मुक्ति मिलेगी और यहां का शैक्षणिक वातावरण सुधरेगा।

सादर,
भ व दी य


(डा. गिरीश)
राज्य सचिव
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शनिवार, 3 सितंबर 2011

भाकपा द्वारा दलित ग्राम प्रधान कामरेड सरजू प्रसाद कठेरिया की हत्या की भर्त्सना


लखनऊ 3 सितम्बर। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव डा. गिरीश ने राज्य सरकार पर आरोप लगाया है कि वह सामंती एवं गुण्डा तत्वों के हाथ में खेल रही है और दलितों की रक्षा करने में पूरी तरह विफल रही है।
डा. गिरीश ने उपर्युक्त आरोप लगाते हुए बताया है कि आज ही पूर्वान्ह जनपद रमाबाई नगर (कानपुर देहात) के थाना रूरा अंतर्गत ग्राम बनीपारा महराज के ग्राम प्रधान कामरेड सरजू प्रसाद कठेरिया की दिन दहाड़े हत्या कर दी गई। हत्यारे गांव के ही सामंती गुंडे हैं जो कामरेड सरजू प्रसाद द्वारा कराये जा रहे विकास कार्यों से बहुत ईर्ष्या रखते थे।
कामरेड सरजू प्रसाद जोकि भाकपा की जनपद रमाबाईनगर जिला कमेटी के सह सचिव एवं भारतीय खेत मजदूर यूनियन के जिला सचिव थे, अपनी लोकप्रियता के कारण गत चुनावों में ग्राम प्रधान चुने गये थे। जनहित में उनके द्वारा किये जा रहे संघर्षों और ग्राम पंचायत अंतर्गत कराये जा रहे विकास कार्यों से गांव के ही सामंती और गुंडा तत्व बौखलाये हुये थे और उनको लगातार जान से मारने की धमकियां दे रहे थे।
कामरेड सरजू प्रसाद एवं जनपद की भाकपा ने बार-बार पुलिस अधिकारियों यहां तक कि आई.जी. कानपुर तक को सारे मामले की लिखित जानकारियां दीं और ज्ञापन दिये थे लेकिन पुलिस ने न तो गुंडा तत्वों के खिलाफ कोई कार्यवाही की और न कामरेड सरजू प्रसाद की सुरक्षा में कोई कदम उठाया। फलतः आज इन तत्वों ने दिन-दहाड़े कामरेड सरजू प्रसाद को गोलियों और बमों से उस समय भून डाला जब वे गांव के ही स्कूल में निर्माण कार्य की देखरेख कर रहे थे। इस घटना से समूचे इलाके में सनसनी फैल गई है और आक्रोशित खेत मजदूर, किसान और भाकपा कार्यकर्ता गांव में बड़ी संख्या में एकत्रित हो गये हैं।
भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने राज्य सरकार से मांग की है कि वह दोषी अधिकारियों के खिलाफ तत्काल कड़ी कार्यवाही करे, मृतक परिवार को रू. 10.00लाख मुआवजा तथा उसके आश्रितों को नौकरी की घोषणा करे और सबसे ज्यादा जरूरी है कि हत्यारों और उनको शरण देने वालों को जल्द से जल्द जेल के सीखचों के पीछे पहुंचा कर कड़ी से कड़ी सजा दिलाये।

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रविवार, 21 अगस्त 2011

23 अगस्त को अखिल भारतीय विरोध दिवस

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रविवार, 14 अगस्त 2011

लो क सं घ र्ष !: आल इण्डिया स्टूडेन्ट्स फेडरेशन का इतिहास: महेश राठी भाग 8


इक्कीसवाँ सम्मेलन
ए0आई0एस0एफ0 का इक्कीसवाँ सम्मेलन त्रिची, तमिलनाडु में 28-31 जनवर 1983 को हुआ। मार्च 1983 को दिल्ली में 7वाँ गुटनिरपेक्ष सम्मेलन आयोजित होना था जिसके समर्थन में ए0आई0एस0एफ0 ने कई सेमिनारों, गोष्ठियों और बैठकांे का आयोजन किया। युवा दिवस के अवसर पर दिल्ली से हुसैनीवाला तक साइकिल रैली आयोजित की गई जिस पर पंजाब के खालिस्तानी नेता भिंडरवाले के भाई की देख-रेख में हमला किया गया। दोहरी शिक्षा पद्धति के विरुद्ध सितम्बर 1983 में बनारस से देहरादून तक एक साइकिल जत्थे का आयोजन किया गया जिसमें 50 सक्रिय कार्यकर्ताओं ने भाग लिया और यह जत्था 1400 किलोमीटर का सफर तय करके 20 दिनोें में देहरादून पहँुचा। जहाँ दून स्कूल के बाहर इस जत्थे पर जबरदस्त लाठीचार्ज हुआ और इसमें कई छात्र नेता घायल हुए अतुल कुमार अंजान के सिर पर भी काफी चोट आईं। बावजूद इस सबके आंदोलनकारी छात्रों को जेल में ठूस दिया गया। ए0आई0एस0एफ0 ने इस दौरान विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की गैर जनवादी रिपोर्ट के खिलाफ जहाँ मार्च 1983 में अखिल भारतीय प्रतिरोध दिवस का आयोजन किया तो वहीं ए0आई0वाई0एफ0 के संसद मार्च में भी सक्रिय सहयोग किया। 13 सितम्बर को भी ए0आई0एस0एफ0-ए0आई0वाई0एफ0 ने मिलकर संयुक्त रुप से प्रतिरोध दिवस का आयोजन किया। जिसमें दिल्ली और उसके आसपास के राज्यों से 5 हजार छात्रों ने भागीदारी की। इसके अलावा और 14 राज्यों में भी इसी दिन प्रतिरोध दिवस मनाया गया। ए0आई0एस0एफ0 ने 1984 में हुई इंटरनेशनल यूनियन आॅफ स्टूडेन्ट्स की 14वीं कांग्रेस में सोफिया (बुल्गारिया) में शिरकत की तो वहीं 1985 में मास्को में संपन्न 12 वें अन्तर्राष्ट्रीय छात्र एवं युवा महोत्सव में भी भाग लिया।
बाइसवाँ सम्मेलन
ए0आई0एस0एफ0 का बाइसवाँ सम्मेलन 13-16 दिसम्बर 1985 को गुंटूर,
आन्ध्र प्रदेश में संपन्न हुआ। सम्मेलन के फौरन बाद 14 फरवरी 1986 को संगठन ने केन्द्र सरकार के शिक्षा पर नकारात्मक रुख वाले एक दस्तावेज के खिलाफ प्रतिरोध दिवस मनाया। इसके बाद 13 सित्मबर 1986 को भी सरकार की नई शिक्षा नीति के खिलाफ प्रतिरोध दिवस मनाया। यह वह समय था जब देश में एक तरफ अलगाववादी, साम्प्रदायिक और जातिवादी ताकतंे सिर उठा रही थीं जो देश की एकता अखण्डता के लिए गंभीर खतरा था तो दूसरी तरफ आम आदमी बढ़ती महँगाई और सरकार की जन विरोधी नीतियों से परेशान था। ऐसे समय में ए0आई0एस0एफ0 और ए0आई0वाई0एफ0 ने संयुक्त रूप से ‘‘बचाओ भारत-बदलो भारत‘‘ नारे के तहत जनवरी से मार्च तक तीन साइकिल जत्थों के रूप में देश की एकता अखण्डता बनाए रखने के लिए और जनविरोधी नीतियांे के खिलाफ एक बड़े अभियान की शुरुआत की। इस कार्यक्रम का समापन 26 मार्च को दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में एक रैली के रूप में हुआ जिसमें हजारों छात्रों नौजवानों ने भाग लिया।
ए0आई0एस0एफ0 की पचासवीं स्वर्ण जयन्ती
ए0आई0एस0एफ0 ने 50 साल पूरे होने पर लखनऊ में 12 से 14 अगस्त 1986 को बेहद शानदार तरीके से अपनी स्वर्ण जयन्ती मनाई। इस आयोजन की शुरुआत पहले दिन की बड़ी रैली से हुई। स्वर्ण जयन्ती समारोह का उद्घाटन महान स्वतंत्रता सेनानी बाबा पृथ्वी सिंह आजाद ने किया। 22 देशों के बिरादराना संगठनों के 27 प्रतिनिधियों ने भी इस समारोह में भागेदारी की। ए0आई0एस0एफ0 की स्थापना करने वालों में एक हरीश तिवारी के साथ एम0 फारुकी, ए0बी0 बर्धन, प्रशान्त सान्याल, विश्वनाथ मुखर्जी, गीता मुखर्जी, रमेश सिन्हा, सुनील सेनगुप्ता, शफीक नकवी, एच0के0 व्यास और प्रो0 संतोष भट्टाचार्य आदि आन्दोलन के कई वरिष्ठ साथियांे ने भी इस सम्मेलन में भाग लिया। समारोह के बहाने पुराने दिनों को याद करना, संगठन के लिए गौरवमयी पलांे को जीने के समान था और पुराने गौरव से मिलने का नए छात्रों का उत्साह भी उल्लेखनीय था।
इस यादगार समारोह के बाद ए0आई0एस0एफ0 ने नई शिक्षा नीति के खिलाफ आन्दोलन की फिर से कमान सँभाल ली। जहाँ सितम्बर 1988 में विरोध दिवस मना कर प्रतिरोध की शुरुआत की तो वहीं दिसम्बर 1986 को रेल रोको आंदोलन ने इस
विरोध को नई ऊँचाइयाँ दीं। 1988, छात्र युवा आंदोलन के उभार का समय था बिहार, बंगाल, महाराष्ट्र, केरल, मणिपुर, यू0पी0, आन्ध्र प्रदेश और दिल्ली में सरकार की नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन हुए। कर्नाटक, राजस्थान में भी आंदोलन और प्रदर्शन हुए तो वहीं हरियाणा, पंजाब और यू0पी0 में छात्र-युवा कंवेंशन भी हुए। इसी समय पंजाब में खालिस्तानी आंदोलन के कारण हालात बद से बदतर हो रहे थे। ए0आई0एस0एफ0 ने अन्य जनवादी और वामपंथी संगठनों के साथ मिलकर खालिस्तानी आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई की कमान सँभाली। ए0आई0एस0एफ0-ए0आई0वाई0एफ0 ने आतंकवाद का सामना करते हुए अपने कई साथियों की कुर्बानी दी। ठीक इसी समय आर0एस0एस0 और भा0ज0पा0 के नेतृत्व में साम्प्रदायिक ताकतें भी मजबूत हो रही थी। राम जन्मभूमि और बाबरी मजिस्द को मुद्दा बनाकर हिंदू और मुस्लिम साम्प्रदायिकों ने देश में राजनैतिक ध्रुवीकरण और साम्प्रदायिक विभाजन के एक नए युग की शुरुआत कर दी थी। देश की एकता अखण्डता को चुनौती देनी वाली इस साम्प्रदायिक विभाजन की राजनीति को भा0ज0पा0 की रथयात्रा ने साम्प्रदायिक सद्भाव की तबाही के रूप में बदल दिया। ए0आई0एस0एफ0 ने दूसरी धर्मनिरपेक्ष शक्तियों के साथ मिलकर देश की एकता अखण्डता को बचाने के लिए सघन अभियान की शुरुआत की। यू0पी0 ए0आई0एस0एफ0 ने खासतौर पर धर्मनिरपेक्षता के लिए और साम्प्रदायिकता के खिलाफ राज्य व्यापी अभियान चलाया। यह वह समय था जब राजीव गाँधी अपनी साफ छवि के साथ सत्ता में आए थे परन्तु थोड़े दिन में ही उनकी यह छवि धूमिल हो चुकी थी। वाम और जनवादी शक्तियों के साथ मिलकर ए0आई0एस0एफ0 ने इस दौरान एक जुझारू आंदोलन की शुरूआत की जिसके तहत दिल्ली में ‘‘राजीव गांधी गद्दी छोड़ो‘‘ के नारे के साथ 9 दिसम्बर 1987 को एक ऐतिहासिक रैली का आयोजन किया गया। इसी कड़ी में आगे चलकर 15 मार्च 1988 को आयोजित भारत बंद में भी ए0आई0एस0एफ0 ने देश भर में शिक्षण संस्थानों को बंद करवाने में बड़ी भूमिका अदा की। ए0आई0एस0एफ0 ने 30 अगस्त के भारत बंद में भी महत्चपूर्ण भाूमिका अदा की। ए0आई0एस0एफ0 -ए0आई0वाई0एफ0 ने मंडल कमीशन के समर्थन में और शिक्षा एवं काम के अधिकार की माँग को लेकर 9 सितम्बर 1990 को संसद के सामने बोट क्लब पर प्रदर्शन किया।
इसके अलावा कई अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दांे को लेकर भी ए0आई0एस0एफ0 ने जुझारू आंदोलन किए। स्टूडेन्ट्स फेडरेशन के 50 छात्रों ने लीबिया पर अमेरिकी हमले के विरोध में दिल्ली के अमेरिकन सेन्टर पर कब्जा किया। 9 सितम्बर 1987 को नेल्सन मंडेला की आजादी और नस्लवाद विरोधी दिवस के रूप में मनाया गया। 2 अक्टूबर 1987 को दक्षिण अफ्रीका और नामीबिया के प्रति एकजुटता दिवस के रूप में मनाया गया। इसी दिन दिल्ली ए0आई0एस0एफ0 के छात्र-छात्राओं ने ब्रिटिश काउंसिल पर कब्जा करके विरोध व्यक्त किया। नेल्सन मंडेला के जन्म दिवस के मौके पर उनकी रिहाई के लिए ए0आई0एस0एफ0 ने ब्रिटिश काउंसिल के समक्ष प्रदर्शन किया और इसके अलावा केरल इकाई ने 50 हजार हस्ताक्षर करा कर विरोध व्यक्त किया। इसी बीच ए0आई0एस0एफ0 ने फिलीस्तीन के समर्थन में भी कईं कार्यक्रमों का आयोजन किया। 18 मई 1988 को फिर ए0आई0एस0एफ0 ने अमरीकन सेन्टर पर कब्जा करके फिलीस्तीन की संयुक्त राष्ट्र से सदस्यता समाप्त करने सम्बंधी बयान का विरोध किया। 8-15 दिसम्बर 1988 को ए0आई0एस0एफ0 केरल ने फिलीस्तीन सप्ताह के रूप में मनाया। 13 वें विश्व छात्र-युवा महोत्सव का आयोजन जुलाई 1987 में किया गया जिसकी तैयारी के लिए कई कार्यक्रम भारत में भी आयोजित किए गए।
23वाँ ए0आई0एस0एफ0 सम्मेलन
ए0आईएसएफ का 23वाँ सम्मेलन फरवरी 1991 में बोकारो में आयोजित किया गया। इस समय तक कई राजनैतिक बदलाव और आंदोलन देश भर के पैमाने पर हो रहे थे जिसमें ए0आई0एस0एफ0 ने सराहनीय एवं महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। 1991 का वह समय था जब नरसिंह राव सरकार विश्व बैंक के पूर्व अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह के निर्देशन में देश में निजीकरण, उदारीकरण और भूमंडलीकरण की नीतियाँ लागू कर रही थी। साथ ही दक्षिणपंथी आर्थिक नीतियों की प्रबल पैरोकार भा0ज0पा0 भी राम जन्मभूमि के अपने प्रतिक्रियावादी एजेंडे के द्वारा लोगांे का ध्यान भटका कर नई आर्थिक नीतियों को लागू करवाने में सहायक की भूमिका अदा कर रही थी। ऐसी स्थिति में ए0आई0एस0एफ0 और ए0आई0वाई0एफ0 ने वाम जनवादी शक्तियों के साथ मिलकर कांग्रेस की नई आर्थिक नीतियों और भा0ज0पा0 के साम्प्रदायिक एजेंडे का एक साथ विरोध किया।
ए0आई0एस0एफ0 का 24वाँ सम्मेलन
7-9 फरवरी 1996 को हैदराबाद में संपन्न हुआ। ए0आई0एस0एफ0 ने दूसरे वामपंथी जनवादी छात्र संगठनों के साथ मिलकर 29 नवम्बर 1995 को अखिल भारतीय हड़ताल करके शिक्षा बचाओ आन्दोलन को आगे बढ़ाया। ए0आई0एस0एफ0 ने 1996 में देशभर में अपनी 60वीं सालगिरह मनाई। ए0आई0एस0एफ0 की छात्राओं ने 1998 में उड़ीसा में धरना आयोजित किया साथ ही देशभर में प्रतिक्रियावादी ताकतों के नारीवादी विरोधी रुख के खिलाफ कार्यक्रम आयोजित किए। 11 दिसम्बर 1998 को अखिल भारतीय छात्र हड़ताल का आयोजन किया गया।
ए0आई0एस0एफ0 का पच्चीसवाँ सम्मेलन
18-21 अक्टूबर 2000 को जालांधर में आयोजित किया गया था। 2000 विभिन्न मुद्दों पर ए0आई0एस0एफ0 के सक्रिय आंदोलनांे का साल था। तमिलनाडु का शिक्षा
अधिकार दिवस, आसाम का विधानसभा मार्च, कोल्लम का छात्र आन्दोलन, बैंगलोर का फाईन आर्टस छात्र आंदोलन, उड़ीसा बाढ़ राहत अभियान और कई राज्यों के सम्मेलन इस साल की मुख्य घटनाएँ थीं। ए0आई0एस0एफ0 ने 6 जुलाई 2001 को शिक्षा के भगवाकरण के खिलाफ विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के समक्ष प्रदर्शन किया। ए0आई0एस0एफ0 ने 8-16 अगस्त 2001 में अलजीरिया में आयोजित 15 वें छात्र युवा महोत्सव में भाग लिया। ए0आई0एस0एफ0 की स्थापना के 65 वर्ष पूरे होने पर हैदराबाद में छात्र एवं युवा राष्ट्रीय महोत्सव का सफल आयोजन किया। बिहार ए0आई0एस0एफ0 ने शिक्षा बोर्ड में भ्रष्टाचार और फीस वृद्धि के खिलाफ विधानसभा का घेराव किया। महाराष्ट्र एस0एफ0 ने भी छात्रांे की विभिन्न समस्याओं को लेकर अक्टूबर 2002 में विधानसभा का घेराव किया। कुछ छात्र विरोध स्वरूप दर्शक दीर्घा से विधानसभा गैलरी में कूद गए। 29 नवम्बर 2002 को ए0आई0एस0एफ0 ने संसद चलो का नारा दिया जिसमें बड़ी संख्या में देशभर से छात्रों ने भाग लिया। केरल ए0आई0एस0एफ0 ने भी छात्रों की विभिन्न समस्याआंे को लेकर 2003 में विधानसभा का घेराव किया। पुलिस ने छात्रांे पर लाठीचार्ज किया और बड़ी संख्या में छात्रों को जेल में भी डाल दिया।
ए0आई0एस0एफ0 का छब्बीसवाँ सम्मेलन
छब्बीसवाँ सम्मेलन 3-6 जनवरी 2006 को चेन्नई में हुआ और सत्ताईसवाँ सम्मेलन 13-15 फरवरी 2010 को पंाडेचेरी में संपन्न हुआ। सम्मेलन का नारा था ‘‘शिक्षा का व्यवसायीकरण और बाजारीकरण बन्द करो‘‘। 24 राज्यों के लगभग 1000 प्रतिनिधियों ने इस सम्मेलन में हिस्सा लिया। सम्मेलन में ‘‘ भारत में शिक्षा व्यवस्था का संकट‘‘ विषय पर एक सेमिनार का आयोजन भी किया गया जिसे सांसद व भा0क0पा0 राष्ट्रीय सचिव डी0 राजा और प्रख्यात शिक्षाविद् अनिल सदगोपालन ने संबोधित किया।
अब ए0आई0एस0एफ0 अपने 75 वर्षांे के गौरवशाली इतिहास को याद करने और भविष्य की चुनौतियों से संघर्षो की तैयारी करने के लिए 12-13 अगस्त 2011 को फिर से लखनऊ के उसी सर गंगा राम मेमोरियल हाॅल में अपनी 75वीं जयन्ती मनाने के लिए एकत्रित हो रहा है जहाँ 1936 में इसकी स्थापना हुई थी।
समाप्त
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शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

लो क सं घ र्ष !: आल इण्डिया स्टूडेन्ट्स फेडरेशन का इतिहास: महेश राठी भाग 7


ए0आई0एस0एफ0 का अठारहवाँ सम्मेलन
ए0आई0एस0एफ0 का अठारहवाँ सम्मेलन दिल्ली में 21-23 दिसम्बर 1969 को सम्पन्न हुआ। सम्मेलन में देशभर से 350 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। सम्मेलन का उद्घाटन प्रो0 हीरेन मुखर्जी ने किया। सम्मेलन में शिक्षा एवं परीक्षा में सुधार, प्रबन्धन में छात्रों की भागीदारी, छात्र संघांे के गठन की अनिवार्यता, रोजगार या बेकारी भत्ता और 18 वर्ष की आयु में मताधिकार के सवालों पर एक माँग पत्र भी तैयार किया गया। 1969 में कई महत्वपूर्ण घटनाएँ घटी और आन्दोलन हुए। इसी दौर में भा0क0पा0, वामपंथ और इंदिरा कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार वी0वी0 गिरी देश के राष्ट्रपति चुने गए। 14 बैंकांे का राष्ट्रीयकरण किया गया और राजाआंे का प्रीवी पर्स भी इसी समय खत्म कर दिया गया। जिसका ए0आई0एस0एफ0 ने भारी स्वागत किया।
इसी समय देश की कई समस्याओं को लेकर भी राजनैतिक बहस का दौर शुरू हुआ। देश में व्याप्त विसंगतियांे, असमानताआंे और आर्थिक सामाजिक समस्याओं के
समाधान के लिए एक सामाजिक-आर्थिक रूपान्तरण की आवश्यकता थी जिसके लिए छात्र-युवा संगठनों में भी वैचारिक प्रतिबद्धता को लेकर एक जबरदस्त बहस छिड़ी हुई थी। इन हालात में ए0आई0एस0एफ0-ए0आई0वाई0एफ0 के सामने भी यह महत्वपूर्ण सवाल था कि क्या उन्हंे वैज्ञानिक समाजवाद को अपने लक्ष्यों में शामिल करना चाहिए। इन्हीं सवालों पर बात करने के लिए जून 1969 को दिल्ली में दोनों संगठनांे की कैडर मीटिंग हुई। लम्बी बहस और चर्चा के बाद तय हुआ कि ए0आई0एस0एफ0 और ए0आई0वाई0एफ0 को अपनी एक वैचारिक दिशा निर्धारित करते हुए वैज्ञानिक समाजवाद के लक्ष्यांे की ओर जाने के लिए छात्रों और युवाओं को वैचाारिक रूप से शिक्षित करना होगा। छात्रों और नौजवानों की एक अन्य कैडर मीटिंग जून 1971 में दिल्ली में हुई जिसमें सांगठनिक ढ़ाँचे और उसके कार्यों को लेकर चर्चा हुई।
भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में विघटन के कारण माक्र्सवादी विचारधारा को कई तरह के वैचारिक भटकावों से होकर गुजरना पड़ा। सी0पी0एम0 के उदय के साथ ही देश का परिचय माओवाद जैसे माक्र्सवादी भटकाव से हुआ। आज बेशक सी0पी0एम0 अपने आप को माओवाद की मुखर आलोचक और प्रमुख शत्रु सिद्ध करने की कोशिश करे परन्तु वास्तविकता यह है कि सी0पी0एम0 का निर्माण माओवादी दर्शन के आधार पर ही हुआ है। यह माओवाद ही है जिसने माक्र्सवाद के मूल सिद्धान्त द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की गलत एवं विध्वसंक परिभाषा दुनिया के सामने पेश की जिसके कारण पूरी दुनिया और विशेषकर तीसरी दुनिया के कम्युनिस्ट आन्दोलन को बिखराव का सामना करना पड़ा। देश में अतिवामपंथी नक्सलवाद भी इसी माकपाई संकीर्णता की देन रहा। इसी संकीर्णतावादी अतिक्रान्तिकारी दुस्साहस ने देश के छात्रों और नौजवानांे में एक राजनैतिक विभ्रम का प्रसार किया जिसका परिणाम पार्टी की टूट के बाद जन संगठनों के विघटन में भी दिखाई दिया। 1970 में एस0एफ0आई0 का निर्माण इसी संकीर्णता का परिणाम था।
वैचारिक प्रश्नांे पर बहस की इस प्रक्रिया में एक ओर छात्र-युवा कैडर मीटिंग 20-22 मई को हैदराबाद में हुई। इन कैडर मीटिंगों में वैज्ञानिक समाजवाद, माक्र्सवाद, लेनिनवाद और अन्ततोगत्वा राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति की संकल्पना को छात्र नौजवान संगठनों के संविधान में शामिल किए जाने का निर्णय हुआ। इन सवालांे पर औपचारिक फैसला ए0आई0एस0एफ0 के 19वें सम्मेलन में लिया गया।
19वाँ सम्मेलन
ए0आई0एस0एफ0 का 19वाँ सम्मेलन 14-17 जनवरी 1974 को कोचीन में संपन्न हुआ। यह सम्मेलन अपने महत्वपूर्ण संवैधानिक बदलावांे के कारण एक विशिष्ट आयोजन था। इस सम्मेलन के पूर्व एवं पश्चात् का समय देश और संगठन के लिए महत्वपूर्ण एवं प्रभावकारी घटनाओं और आंदोलनांे का समय था। जहाँ ए0आई0एस0एफ0 ने छात्रांे के जनवादी अधिकारांे के लिए और बेरोजगारी के खिलाफ देशव्यापी आन्दोलनांे में सक्रिय और निर्णायक भूमिका अदा की, तो वहीं वाम, प्रगतिशील और जनवादी ताकतों के साथ मिलकर महँगाई, काला बाजारी और जमाखोरी के खिलाफ भी ए0आई0एस0एफ0 ने आंदोलनों में भाग लिया। यही वह समय भी था जब देश में जयप्रकाश नारायण का पार्टी विहीन जनवाद और सम्पूर्ण क्रान्ति का आन्दोलन सर उठा रहा था। दक्षिणपंथी और फासीवादी शक्तियांे के कन्धों पर खड़ा यह आन्दोलन भ्रष्टाचार, महँगाई और बेकारी जैसे मुद्दों को लुभावने नारों में बदलकर आगे बढ़ा। इस आन्दोलन के खतरों को उजागर करने के लिए ए0आई0एस0एफ0 ने एक कंवेंशन का आयोजन 26-27 अप्रैल 1974 को पटना में किया। जिसमें कुछ सहयोगी जनवादी प्रगतिशील संगठनांे के साथ 2000 छात्रों ने हिस्सा लिया। इसके अलावा पटना में आयोजित जे0पी0 आन्दोलन विरोधी रैली में लाखों की संख्या में लोगांे ने भाग लिया जिसमें बड़ी संख्या में छात्र और नौजवान भी शामिल थे। आखिरकार यह आन्दोलन जे0पी0 और इंदिरा गांधी दोनांे के लिए अपने अपने वर्चस्व की लड़ाई में बदल गया। इंदिरा गांधी ने अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए देश में जून 1975 में आपात्तकाल की घोषणा कर दी। शुरुआत में आपातकाल का उपयोग दक्षिणपंथी, आर0एस0एस0 और जनसंघ जैसी ताकतों पर लगाम लगाने के लिए किया गया परन्तु बाद में यह जनवादी, प्रगतिशील और वामपंथी ताकतांे के भी दमन का औजार बन गया। ऐसी स्थिति में ए0आई0एस0एफ0 ने आपातकालीन दमन का पुरजोर विरोध किया। ए0आई0एस0एफ0 ने मेडिकल छात्रांे और जूनियर डाॅक्टरांे को लामबद्ध करने का महत्वपूर्ण काम किया। जिनका 26 अक्टूबर 1974 को अमृतसर में सम्मेलन करते हुए आॅल इण्डिया मेडिकोज फेडरेशन की स्थापना की गई।
आपातकाल के बाद का समय
इंदिरा गांधी को आपातकाल के दमन की सजा 1977 के चुनाव नतीजों में मिल गई। इंदिरा गांधी को जबरदस्त हार का सामना करना पड़ा। जनसंघ और अन्य कई दलांे और गुटांे के घालमेल से बनी जनता पार्टी सत्ता में आई परन्तु जल्दी ही जनता पार्टी की वास्तविकता और विफलता लोगांे के सामने आ गई। जनता पार्टी लोगांे की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई, लोगांे में पार्टी के खिलाफ भारी असंतोष व्याप्त हो चुका था। अन्ततोगत्वा जनता पार्टी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई और उसमें टूट हो गई। इसी जनता पार्टी की टूट से भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई।
जनता पार्टी की जन विरोधी नीतियांे और संघीय ढ़ाँचे पर हमले की उसकी दक्षिणपंथी योजनाआंे के खिलाफ ए0आई0एस0एफ0 और ए0आई0वाई0एफ0 ने देशव्यापी जुझारु आंदोलन चलाया। कई अवस्थाओं में चलते इस आंदोलन में कंवेंशन, हस्ताक्षर अभियान, घेराव और गिरफ्तारी हर एक तरीके से ए0आई0एस0एफ0 ने जनता पार्टी सरकार की दक्षिणपंथी नीतियों का विरोध किया। ए0आई0एस0एफ0 ने साम्राज्यवाद के खिलाफ और हिंद महासागर को शान्ति क्षेत्र घोषित करने के लिए भी इस बीच कई आंदोलन चलाए और क्यूबा में होने वाले छात्र-युवा महोत्सव की तैयारी के सिलसिले में भी देश भर में भारत-सोवियत युवा उत्सवांे का आयोजन किया गया।
बीसवाँ सम्मेलन
ए0आई0एस0एफ0 का बीसवाँ सम्मेलन 7-9 फरवरी 1979 को पंजाब के
लुधियाना में सम्पन्न हुआ। जनता पार्टी के दो वर्षों के विफल शासन के बाद ही देश में फिर से इंदिरा गांधी की कांग्रेस (आई) की वापसी हो गई। इंदिरा गांधी राजनैतिक स्थायित्व का नारा देकर वापस सत्ता में आई थीं। मगर नतीजे इसके विपरीत जान पड़ रहे थे साम्प्रदायिक, अलगाववादी और विभाजक शक्तियाँ दिन प्रतिदिन मजबूत हो रही थीं। आर0एस0एस0, जमायत जैसी साम्प्रदायिक शक्तियों के साथ ही खालिस्तान जैसी अलगाववादी शक्तियाँ देश की एकता अखण्डता के लिए लगातार गंभीर चुनौती बन रही थीं। ए0आई0एस0एफ0 और ए0आई0वाई0एफ0 ने जनवादी अधिकारों के लिए और बेरोजगारी के खिलाफ 21-22 जुलाई 1979 से देशव्यापी आंदोलन की शुरुआत की। ‘‘काम दो या जेल दो‘‘ नारे के तहत चला यह जुझारु आंदोलन छात्र एवं युवा संघर्षांे की ऐतिहासिक मिसाल है। इस आंदोलन में भाग लेते हुए हजारांे छात्र नौजवान गिरफ्तार किए गए जिनको लम्बे समय तक जेलांे में गुजारना पड़ा।
इसी दौरान ए0आई0एस0एफ0 और ए0आई0वाई0एफ0 ने एक गौरवशाली परम्परा की शुरुआत की। 23 मई 1979 से शहीदे आज़म भगत सिंह, उनके साथियों राजगुरू और सुखदेव की शहादत को याद करते हुए हर साल 23 मार्च को शहीदी सप्ताह और शहीदी पखवाड़ा मनाने की शुरुआत ए0आई0एस0एफ0 और ए0आई0वाई0एफ0 द्वारा हुई। इस बीच ए0आई0एस0एफ0 ने कई जनवादी, धर्मनिरपेक्ष छात्र-युवा संगठनों से मिलकर धर्मनिरपेक्ष छात्र सम्मेलन, राष्ट्रीय एकता के लिए और मास्को ओलम्पिक के सर्मथन में सम्मेलनों का आयोजन किया। साथ ही 1981-82 के दौरान केरल, बंगाल, यू0पी0, बिहार, मध्य प्रदेश, दिल्ली, उड़ीसा, मणिपुर और तमिलनाडु आदि में छात्र और नौजवानों की विभिन्न माँगों के समर्थन में धरना, प्रदर्शन, घेराव, रैली और जत्थों का आयोजन किया। इस दौर में ए0आई0एस0एफ0-ए0आई0वाई0एफ0 का ‘‘काम या जेल‘‘ छात्र-नौजवान आंदोलन की एक ऐतिहासिक उपलब्धि ही कहा जाएगा। हिन्द महासागर को शान्ति क्षेत्र घोषित करने की माँग को लेकर अगस्त 1981 को तिरूअनन्तपुरम में किया गया सम्मेलन भी संगठन का एक उल्लेखनीय आयोजन था।

क्रमश:
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आल इंडिया स्टूडेन्ट्स फेडरेशन का प्लेटिनम जुबली समारोह शुरू

लखनऊ 12 अगस्त। भारत के प्रथम अखिल भारतीय संगठन - आल इंडिया स्टूडेन्ट्स फेडरेशन (एआईएसएफ) की स्थापना की 75वीं वर्षगांठ पर प्लेटिनम जुबली समारोह आज यहां ऐतिहासिक गंगा प्रसाद मेमोरियल हाल में शुरू हो गया। देश के कोने-कोने से आये एआईएसएफ के प्रतिनिधियों तथा देश के तमाम हिस्सों से आये एआईएसएफ के पुराने कार्यकर्ताओं से खचाखच भरे गंगा प्रसाद मेमोरियल हाल में प्लेटिनम जुबली समारोह का औपचारिक उद्घाटन करते हुए एआईएसएफ की उत्तर प्रदेश इकाई के पूर्व महासचिव रहे न्यायमूर्ति हैदर अब्बास रज़ा ने एआईएसएफ की गौरवशाली परम्पराओं, संघर्षों और उपलब्धियों को याद करते हुए छात्रों की वर्तमान पीढ़ी का आह्वान किया कि वे दोहरी शिक्षा नीति, शिक्षा के बाजारीकरण, गरीबों को शिक्षा के अधिकार से वंचित करने वाली शिक्षा नीतियों तथा काले साहबों को पैदा करनी वाली शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ एआईएसएफ के झण्डे़ के नीचे एकताबद्ध होकर सामाजिक परिवर्तन के लिए शिक्षा सुधारों के लिए संघर्ष को तेज करें और आने वाले वक्त के लिए नागरिकों और राजनीतिज्ञों की ऐसी क्रान्तिकारी पीढ़ी तैयार करें जो देश को सही दिशा में ले जा सके। न्यायमूर्ति रज़ा ने 1953 के अपने छात्र जीवन को याद करते हुए कहा कि उस दौर में लखनऊ में एक महान छात्र आन्दोलन ने जन्म लिया था जिससे भयभीत तत्कालीन सरकार के निर्देशों पर स्थानीय पुलिस ने पुरानी नजीराबाद रोड़ पर डा. गयेन्द्र की हत्या कर दी थी।
न्यायमूर्ति रज़ा ने कहा कि इस समय हम एक अशान्त दौर से गुजर रहे हैं। अमरीकी साम्राज्यवाद अंतिम सांसें ले रहा है। वैश्विक स्तर पर पूंजीवाद दम तोड़ रहा है। इस वक्त एआईएसएफ की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण हो जाती है जिसे वर्तमान पीढ़ी को निभाना ही होगा। न्यायमूर्ति रज़ा ने भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहे वर्तमान आन्दोलन के चेहरों एवं मंतव्यों पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए एआईएसएफ की वर्तमान पीढ़ी से भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान को नेतृत्व देने को कहा।
स्वागत समिति के अध्यक्ष एवं भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने अपने स्वागत भाषण में सभी आगन्तुकों का स्वागत करते हुए स्वतंत्रता संग्राम के दौर से लेकर आज तक उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक अवदानों एवं योगदानों का स्मरण करते हुए कहा कि वर्तमान दौर में हम हर क्षेत्र में भूमंडलीकरण और कारपोरेटाइजेशन द्वारा पैदा की गयी समस्याओं से जूझ रहे हैं। नई व्यवस्था ने प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक को अपनी चपेट में ले लिया है। आम आदमी अपने बच्चों को शिक्षा दिलाने के लिए या तो कर्ज ले रहा है, या गहने-जेवर, बर्तन और सम्पत्ति बेच रहा है अन्यथा उसके बच्चे शिक्षा के अधिकार से ही वंचित हो जा रहे हैं। शिक्षा क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार ने शिक्षा के साथ-साथ देश के भविष्य पर भी खतरा पैदा कर दिया जिसके हम मूक दर्शक बने नहीं रह सकते। उन्होंने आह्वान किया कि छात्रों की वर्तमान पीढ़ी को डा. अम्बेडकर की सीख - ”शिक्षित बनो, संगठित हो और संघर्ष करो“ को अमल में लाते हुए शिक्षा को हासिल करने के संघर्ष को खड़ा करना होगा। (स्वागत भाषण की प्रतिलिपि संलग्न है)।
समारोह को सम्बोधित करते हुए एआईएसएफ के पूर्व महासचिव तथा वर्तमान में भाकपा के उप महासचिव एस. सुधाकर रेड्डी ने एआईएसएफ के गौरवशाली अवदानों तथा सत्तर के दशक के मध्य में एआईएसएफ के संविधान में किये गये संशोधनों का जिक्र करते हुए कहा कि एआईएसएफ लगातार वैज्ञानिक समाजवाद के लिए संघर्षरत रहा है परन्तु आज जब देश की नीतियां प्रतिगामी दिशा में चल रहीं हैं, छात्रों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्होंने एआईएसएफ की वर्तमान पीढ़ी से फैसलाकुन संघर्षों को संगठित करने का आह्वान किया।
समारोह को सम्बोधित करते हुए एआईएसएफ की पूर्व महासचिव तथा वर्तमान में एटक की सचिव अमरजीत कौर ने देश के असंख्य मजदूरों की ओर से समारोह को बधाई देते हुए कहा कि 1936 में इसी ऐतिहासिक हाल में सम्पन्न होने वाले स्थापना सम्मेलन से कहीं बहुत पहले से छात्रों ने पहलकदमी लेना शुरू कर दिया था। उन्होंने उसके पहले के तमाम आजादी के संघर्षों के छात्रों में अवदान को याद करते हुए कहा कि देश में स्वाधीनता संग्राम का कोई युग रहा हो अथवा सुधारों का कोई आन्दोलन रहा हो, उसे गति तभी मिली जब छात्रों ने उसमें हस्तक्षेप किया। उन्होंने कहा कि सती प्रथा के खिलाफ आन्दोलन तभी शुरू हुआ जब एक छात्र ने चुनौती दी कि वह अपनी बहन को सती नहीं होने देगा, विधवा विवाह को तभी गति मिली जब एक छात्र ने एक विधवा से विवाह करने का साहस दिखाया। उन्होंने कहा कि लिंग समानता तथा महिला सशक्तीकरण के आन्दोलन को गति भी छात्रों ने ही उन्हें एआईएसएफ की महासचिव बनाकर दिया। उन्होंने एआईएसएफ की वर्तमान पीढ़ी का आवाह्न किया कि वे अपने घोषित नारों - ”शान्ति, प्रगति, वैज्ञानिक समाजवाद को बदले बिना परिवर्तित वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार अपने काम करने के तरीकों को बदलें, अधिक से अधिक छात्रों को एआईएसएफ की ओर आकर्षित करें और जुझारू संघर्षों के जरिए छात्र आन्दोलन को गति तथा देश की राजनीति को देशा दें।
समारोह को सम्बोधित करते हुए एआईएसएफ के पूर्व अध्यक्ष तथा अखिल भारतीय किसान सभा के महासचिव अतुल कुमार अंजान ने देश के करोड़ों किसानों की ओर से समारोह का अभिनन्दन करते हुए अपने संस्मरणों के जरिये नई पीढ़ी को संघर्षों के लिए प्रेरित किया।
समारोह के औपचारिक उद्घाटन के पहले छेदी लाल धर्मशाला में एक चित्र प्रदर्शनी का उद्घाटन भाकपा के उप महासचिव एस. सुधाकर रेड्डी ने किया तथा झंडोत्तोलन प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी तथा एआईएसएफ के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष नरसिम्हा रेड्डी ने किया।
समारोह में ”लोक संघर्ष“ पत्रिका के एआईएसएफ पर केन्द्रित अंक का विमोचन भाकपा के उप महासचिव एस. सुधाकर रेड्डी ने किया।
समारोह के दूसरे सत्र में एआईएसएफ की विभिन्न पीढ़ियों का प्रतिनिधित्व करने वाले देश की विभिन्न हिस्सों से आये तमाम राजनीतिज्ञों, न्यायविदों, वैज्ञानिकों, चिकित्सकों, शिक्षकों, वकीलों, शिक्षाशास्त्रियों, अर्थशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों, कलाकारों, साहित्यकारों तथा मजदूर नेताओं आदि का अभिनन्दन किया गया।
सायंकाल सांस्कृतिक समारोह आयोजित होगा जिसकी शुरूआत लखनऊ इप्टा के कलाकार ”किस्सा एक लाश का“ नाटक प्रस्तुत कर करेंगे। तत्पश्चात् विभिन्न राज्यों से आये छात्र अपने कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे।
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लो क सं घ र्ष !: आल इण्डिया स्टूडेन्ट्स फेडरेशन का इतिहास: महेश राठी भाग 6


चीनी आक्रमण के प्रतिफल स्वरूप लोगांे के बीच में कम्युनिस्ट पार्टी और कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रति एक गलत संदेश गया। चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में एक समाजवादी व्यवस्था थी और चीन के इस आक्रमण ने समाजवादी विचारधारा पर ही सवालिया निशान लगा दिया। चीनी कम्युनिस्ट नेतृत्व के इस निर्णय ने भारत की कम्युनिस्ट, प्रगतिशील एवं जनवादी ताकतांे के बीच एक स्पष्ट विभाजन की रेखा खींच दी थी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर भी ऐसी शक्तियों ने विभाजक गतिविधयाँ तेज कर दीं। जिसके परिणाम स्वरूप 1964 में पार्टी में विभाजन हो गया और एक नई पार्टी भा0क0पा0एम0 का उदय हुआ। इस विभाजन ने ए0आई0एस0एफ0 को भी एक गंभीर संकट में धकेल दिया।
वास्तव में यह चीनी संकट देश के कम्युनिस्ट आन्दोलन के लिए दोहरा संकट लेकर आया। एक कम्युनिस्ट आन्दोलन में विभाजन और दूसरे आर0एस0एस0 जैसे देश की दक्षिणपंथी और फासीवादी ताकतों को कम्युनिस्ट, प्रगतिशील और जनवादी आन्दोलन पर हमले का सुनहरा मौका मिल गया था। ए0आई0एस0एफ0 की नियमित गतिविधियों के लिए यह एक झटका था। विभाजक शक्तियों ने संगठन की सभी परम्पराओं, नियमों और विचारधारात्मक परम्पराओं को ताक पर रख कर सामानान्तर संगठन खड़ा करने का काम किया। उन्होनंे प्रत्येक स्तर पर सामानान्तर संगठन बनाने अपना साहित्य छापने, समाचार पत्र, पत्रिकाएँ छापने का काम प्रारम्भ कर दिया। ए0आई0एस0एफ0 को भारी नुकसान हो रहा था और यह नुकसान प0 बंगाल, आन्ध्र प्रदेश और केरल में कहीं अधिक था, हालाँकि यह नुकसान लगभग सभी राज्यांे में हो रहा था।
आर0एस0एस0 और जनसंघ ने इस मौके का देश भर में कम्युनिस्ट विरोधी माहौल बनाने में भरपूर लाभ उठाया। परन्तु ए0आई0एस0एफ0 और भा0क0पा0 द्वारा चीनी आक्रमण की स्पष्ट निन्दा किए जाने से स्थिति काफी हद तक सँभली और साथ ही देश की अन्य प्रगतिशील ताकतों ने भी इस समय काफी सहायता की। सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा भारत पर चीनी आक्रमण की आलोचना की गई और देश के
प्रधानमंत्री पं0 जवाहर लाल नेहरू के दक्षिणपंथी छलावांे में नही फँसने के कारण भी स्थिति में काफी हद तक सुधार हुआ। भा0क0पा0 से अलग होकर सी0पी0एम0 बनाने वाले पार्टी विभाजकांे ने छात्र आंदोलन सहित सभी जनांदोलनों में फूट की नींव रख दी थी। 1970 में ए0आई0एस0एफ0 से टूटकर जाने वालों ने एस0एफ0आई0 नामक छात्र संगठन का गठन किया।
ए0आई0एस0एफ0 का पुनर्गठन 1964-66
ए0आई0एस0एफ0 के पुनर्गठन का निर्णय किया गया और 1964 में केरल, बिहार, आन्ध्र प्रदेश और चंडीगढ़ में राज्य सम्मेलनों का आयोजन किया गया। कई राज्यों में राज्य इकाइयों का गठन किया गया। हिंद महासागर में अमेरिकी नौसेना के प्रवेश के खिलाफ बिहार स्टूडेन्ट्स फेडरेशन ने यू0एस0आई0एस0 पर प्रदर्शन किया। चीनी आक्रमण के अस्थाई प्रभाव के बाद यूथ स्टूडेन्ट्स आन्दोलन में फिर उभार दिखने लगा। 1965 में एक यूथ स्टूडेन्ट्स कैडर मीटिंग का आयोजन दिल्ली में किया गया। इस बैठक में आसाम, बंगाल, बिहार, उडीसा, पंजाब, आन्ध्र प्रदेश, केरल और दिल्ली में सम्पन्न राज्य सम्मेलनांे का विशेष उल्लेख किया गया। जब साठ के दशक में छात्र-नौजवान आन्दोलन में एक उभार दिखने लगा था उसी समय 1965 में भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध की शुरुआत हो गई, जिसके कारण अंध राष्ट्रवादी दक्षिणपंथी ताकतों को भारत-सोवियत संघ की दोस्ती के खिलाफ प्रचार का मौका मिल गया। परन्तु कामयाब ताशकंद संधि ने इस अभियान को विफल कर दिया। भारत-पाकिस्तान के इस युद्ध के समय ए0आई0एस0एफ0 ने देश की रक्षा के लिए छात्रों और नौजवानों को आगे आने का आवाह्न किया। यह ऐसा समय था जिसमें विघटनकारी शक्तियाँ काफी सक्रिय हो र्गइं और भाषाई विघटनकारी शक्तियों ने हिन्दी और गैर हिन्दी लोगों के बीच तनाव पैदा करके भाषाई आधार पर दंगे भड़काने का काम किया।
पूरे देश में आर्थिक स्थितियाँ बद से बदतर हो रही थीं। सरकार ने आम जनता पर ढेरों कर लाद दिए थे। भारत ने इसी समय पी0एल0 480 समझौते के तहत अमेरिका से गेहूँ आयात किया। चैथी पंचवर्षीय योजना स्थगित कर दी गई। विश्व बैंक के दबाव में रुपये का अवमूल्यन किया गया। देश पर कर्ज 1300 करोड़ रुपए की बड़ी रकम तक पहँुच गया। बड़े पूँजीपतियों और एकाधिकारियों को बड़ी छूट दी गई जिससे उन्होनें खुले तौर पर आमजन के हितांे पर कुठाराघात कराने शुरू कर दिए। आम आवश्यकता की वस्तुओं के दामो में भारी बढ़ोŸारी हुई जिससे आम आदमी का जीना दूभर हो गया। सरकार की नीतियों के खिलाफ जनाक्रोश दिन पर दिन बढ़ता जा रहा था। छात्र और नौजवान बड़ी संख्या में सरकारी नीतियों के खिलाफ सड़कांे पर उतर रहे थे। सरकार के खिलाफ इस गुस्से की अभिव्यक्ति आम चुनावों में भी दिखाई पड़ रही थी। 1967 के आम चुनावों में कांग्रेस को 17 में से 9 राज्यांे में करारी हार का मुँह देखना पड़ा। इसके अलावा देश में छात्रांे और नौजवानांे ने कई महत्वपूर्ण आंदोलनों की अगुवाई की, इसमें बंगाल में 1965 का आंदोलन और बिहार का अगस्त आन्दोलन प्रमुख थे जिसमें सरकार की दमनकारी नीतियों के कारण कई छात्रों ने अपनी जानों की कुर्बानी दी।
संयुक्त सम्मेलन
ए0आई0एस0एफ0 और ए0आई0वाई0एफ0 ने 29 दिसम्बर 1965 से 3 जनवरी 1966 को पांडेचेरी में संयुक्त सम्मेलन का आयोजन किया। इस सम्मेलन ने भारत-पाक ताशकन्द समझौते का समर्थन करते हुए उसमें सोवियत संघ की भूमिका की भी सराहना की। इसी सम्मेलन में दोनों संगठनांे ने अपने आपको एक दूसरे से संबद्ध घोषित किया। जून 1966 में सरकार ने विश्व बैंक के दबाव में रुपए का अवमूल्यन किया जिससे पूरे देश में सरकार के खिलाफ आंदोलनांे की बाढ़ सी आ गई। 1966 में पूरे समय देश भर में आंदोलन चलते रहे । सितम्बर 1966 में भा0क0पा0 ने संसद मार्च का नारा दिया जिसमें ए0आई0एस0एफ0 ने बढ़-चढ़कर बड़ी तादाद में शिरकत की। सितम्बर-अक्टूबर 1966 में पूरे उत्तर प्रदेश में सरकार विरोधी आंदोलन शुरू हो गए। जिसमें सैंकड़ांे छात्र नौजवान घायल हुए, दर्जनों शहीद हुए और 6000 के लगभग लोगों को जेल जाना पड़ा। कानपुर में एक कालेज प्रधानाचार्य की हत्या हो गई। हत्या के आरोप में कुछ छात्रों को जेल जाना पड़ा। स्टूडेन्ट्स फेडरेशन ने इसके खिलाफ एक मुहिम छेड़ दी। जिसके कारण छात्रांे का दमन शुरू हो गया और दो दिन तक कानपुर में गोलीबारी हुई। यू0पी0 के गर्वनर ने कहा कि यदि ए0आई0एस0एफ0 अपना आंदोलन वापस नहीं लेता है तो इसी तरह दमन और गोलीबारी जारी रहेगी। प्रतिक्रिया स्वरूप यह आंदोलन पूरे देश में फैल गया। 15 अक्टूबर 1966 को पूरे देश में प्रतिरोध दिवस के रूप में मनाया गया।
छात्रों की विभिन्न माँगांे के लिए 4 नवम्बर 1966 को एक व्यापक आधार वाली संयुक्त स्टूडेन्ट्स कमेटी का गठन किया। विभिन्न छात्र समस्याओं और माँगांे को लेकर कमेटी ने 18 नवम्बर 1966 को दिल्ली मार्च का निर्णय किया। सरकार ने इसे एक धमकी की तरह समझकर इस छात्र आंदोलन को कुचलने के उपाय शुरू किए। दिल्ली और आसपास के छात्र नेताओं को रातो-रात गिरफ्तार कर लिया गया। दिल्ली आने के रास्ते बन्द कर दिए गए, दिल्ली की सीमाओं पर भी अवरोध खड़े किए गए। हजारों छात्रों को दिल्ली पहुँचने के रास्ते में ही पकड़ लिया गया। इसी कड़ी में पूरे बिहार में भी विरोध की आग भड़क उठी जो नवम्बर 1966 से जनवरी 1967 तक अभूतपूर्व ऊँचाई पर थी। विभिन्न राज्यों में भी राज्य स्तरीय छात्र एक्शन कमेटी का गठन किया गया। जिसने 8 दिसम्बर 1966 को माँग दिवस के रूप में मनाया। समस्तीपुर और मुजफ्फरपुर में पुलिस ने छात्रांे पर जबरदस्त ज्यादतियाँ कीं। पटना और उसके आसपास के इलाकों में भी बड़ी संख्या में छात्रांे की गिरफ्तारियाँ हुईं।
1967 के चुनाव और उसके बाद का समय
1967 में सम्पन्न चैथे आम चुनाव में आजादी के बाद कांग्रेस को पहली बार हार का मुँह देखना पड़ा। बहुमत राज्यांे में कांग्रेस की हार हुई, 17 में से 9 राज्यों में कांग्रेस को सत्ता से हाथ धोना पड़ा। बहुमत राज्यांे में विपक्षी सरकारांे का गठन हुआ, केरल और प0 बंगाल में वामपंथी सरकार का गठन हुआ। देश में बदलते इन हालातों के बीच सरकारी नीतियों के खिलाफ लगातार आन्दोलनांे का दौर जारी रहा। इसी बीच 17 नवम्बर 1969 को ए0आई0एस0एफ0 और ए0आई0वाई0एफ0 ने संयुक्त रूप से बेरोजगारी के खिलाफ अखिल भारतीय संसद मार्च का आवाह्न किया, जिसमें हजारों छात्रों और नौजवानों ने भागीदारी की। इसीके साथ लाखों हस्ताक्षरों के साथ छात्र और नौजवानों द्वारा तैयार एक माँग पत्र भी संसद को दिया गया। असल में यह बेरोजगारी के खिलाफ छात्र-युवा आंदोलन की तीसरी अवस्था थी, इससे पहले दिसम्बर 1968 में छात्र युवाओं ने दिल्ली में एक कंवेंशन आयोजित किया था और देश भर में बेरोजगारी के सवाल पर जत्थे निकाले गए थे।
क्रमश:

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