भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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Communist Party of India, U.P. State Council

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सोमवार, 12 दिसंबर 2011

बहस के लिए जारी भाकपा के 21वें राज्य सम्मेलन के लिए राजनीतिक रिपोर्ट का मसविदा

प्रस्तावना
पूरी दुनिया और देश में हर क्षेत्र में भारी उथल-पुथल हो रही है लेकिन यह हमारे लक्ष्यों को साधने में मदद करने वाली है। 2007 में पैदा हुआ विश्वव्यापी आर्थिक संकट दिन-प्रति-दिन गहरा होता चला जा रहा है और अधिक से अधिक देशों को अपनी चपेट में ले रहा है। पूंजीवादी जगत इस संकट से हतप्रभ है और अपने निजी अंतर्विरोधों से पूंजीवाद लड़खड़ा रहा है। आर्थिक रूप से ताकतवर अमरीका और यूपोप में यह संकट सबसे गहरा है और इससे प्रभावित वहां का जनमानस आज सड़कों पर उतर इसका विरोध कर रहा है। संकट भारत में भी शुरू हो चुका है, भले ही वह अभी बेकाबू न हुआ हो। इसी संकट के बीच शुभ लक्षण यह है कि वैकल्पिक रास्ते के नारे पर लातिन अमरीका के कई देशों में वामपंथी ताकतों और व्यक्तियों की जीत हुई है और आर्थिक नव उदारवाद की नीतियों के दुष्परिणामों को भुगत रही जनता ने उन्हें ठुकराना शुरू कर दिया है। मध्यपूर्व और उत्तर अफ्रीका के अरब देशों में भूमंडलीय आर्थिक संकट से पैदा हुई विपन्नता के खिलाफ और जनता के जनवादी अधिकारों को हासिल करने को व्यापक एवं शान्तिपूर्ण ढंग से आन्दोलन हुए हैं और कई जगह जनता विजयी हुई है तो अन्य कई जगह अभी जूझ रही है। मजदूर वर्ग, शिक्षकों, छात्रों, बेरोजगारों एवं बुद्धिजीवियों के संघर्ष लगातार उभर रहे हैं।
हमारे देश की संप्रग-2 सरकार बड़ी बेशर्मी से आर्थिक नव उदारवाद की नीतियों को थोप रही है जिससे कि जनता के ऊपर लगातार भार बढ़ता जा रहा है। लेकिन इससे महंगाई, भ्रष्टाचार और कालेधन के बारे में जनता की चेतना और उसके प्रतिरोध की दर बढ़ती चली जा रही है। पूंजीवादी विपक्षी दल जनता के आक्रोश को भुनाने की कोशिशों में लगे हैं। लेकिन हमारी लड़ाई इन सारी समस्याओं की जड़ आर्थिक नव उदारवाद से है। वामपंथी दलों को इसका विकल्प देते हुए आगामी संघर्षों को नेतृत्व प्रदान करना है।
प्रमुख पूंजीवादी दल आर्थिक बुराइयों के कुछ पहलुओं पर मैत्रीपूर्ण संघर्षों का दिखावा भले ही करें लेकिन आर्थिक नव उदारवाद की नीतियों के वे पूरी तरह समर्थक हैं। तमाम मौकों पर वे अपने एजेण्डे को आगे बढ़ाने को खुलकर एक दूसरे को सहयोग करते हैं। कारपोरेट जगत के हितों की रक्षा के लिये उसी की प्रेरणा से वे एक दूसरे के सहयोगी बने हैं। मरता क्या न करना की तर्ज पर मजदूर, किसान, नौजवान, छात्र, दलित, महिला, बुद्धिजीवी एवं मध्यमवर्ग सभी सड़कों पर उतर रहे हैं और आर्थिक नव उदारवाद के गर्भ से पैदा हुये महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, छंटनी, तालाबंदी, वेतन जाम, भूमि अधिग्रहण एवं बेहद महंगी शिक्षा और इलाज की व्यवस्था के खिलाफ जुझारू संघर्ष कर रहे हैं।
अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियां
एकध्रुवीय विश्व का स्वप्न देख रहे अमरीका के लिए, जौनपुर में 7-9 मार्च 2008 को सम्पन्न हुए हमारे 20वें राज्य सम्मेलन के पहले ही, निराशाजनक हालात पैदा हो चुके थे। लातिन अमरीकी देशों में वामपंथ की बयार बहना शुरू हो चुकी थी। सम्मेलन के पूर्व ही अमरीका में सब प्राइम संकट के साथ बैंकों का डूबना शुरू हो चुका था जो धीरे-धीरे भूमंडलीय मंदी के रूप में फैल गया। इस वैश्विक आर्थिक संकट से निकलने के लिए अमरीका और यूरोप के पूंजीवादी देशों ने बेल आउट पैकेज के द्वारा स्थितियों को संभालने की तमाम कोशिशों से यह जताने की कोशिश की कि परिस्थितियां नियंत्रण में आ रही हैं। परन्तु वह संकट दुनिया के तमाम देशों में फैलता जा रहा है।
आर्थिक नवउदारवाद के प्रतिपादकों ने भी मानना शुरू कर दिया है कि जिन नीतियों को विकास के एकमात्र विकल्प के रूप में पेश किया गया था, उन्हीं नीतियों के फलस्वरूप बेरोजगारी और मुद्रास्फीति पैदा हो रही है। स्वयं अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (अंश्रसं) ने स्वीकार किया है कि वर्तमान आर्थिक संकट का मुख्य लक्षण है बेरोजगारी जो अधिकांश विकसित देशों में दो अंकों की दर पर है।
इसी प्रकार संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने आकलन किया है कि 2010 में जून से दिसम्बर के मध्य खाद्य मूल्य सूचकांक में 32 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। दिसम्बर 2010 का सूचकांक इसके पहले के सर्वाधिक अधिक जून 2008 के सूचकांक से भी अधिक था। एफएओ की रिपोर्ट खाद्य पदार्थों के मूल्यों में इस असाधारण वृद्धि के लिए आवश्यक वस्तुओं के वायदा बाजार को जिम्मेदार बताती है। 2008 में जब एफएओ का खाद्य मूल्य सूचकांक बढ़कर 213.5 पर पहुंच गया था और उसके कारण अनेक देशों में दंगे हो गये थे, तब यह दावा किया गया था कि कच्चे तेल के मूल्य में वृद्धि (जो उस दौरान 170 अमरीकी डालर से परे चला गया था) के कारण खाद्य पदार्थों के मूल्य बढ़ रहे हैं। पर दुबारा जिस अवधि में यह 215 के निशान से भी ऊपर चला गया उस दौरान कच्चे तेल की कीमतें 92 अमरीकी डॉलर प्रति बैरल जितनी नीची कीमत पर थी। एएफओ ने आर्थिक नवउदारवाद की नीतियों पर लगातार और पैतरेबाजी के साथ चलते रहने के फलस्वरूप विश्वभर में खाद्य पदार्थों में और अधिक मूल्य वृद्धि की भविष्यवाणी की है।
अमरीका की कर्ज आधारित अर्थव्यवस्था संकट के दलदल में फंसती चली जा रही है जिसके फलस्वरूप अमरीका बेरोजगारी, मुद्रा के क्षरण तथा आम लोगों की मजदूरी के मूल्य में क्षरण के दलदल में फंसता चला जा रहा है। अमरीकी राष्ट्रपति स्वयं तथा उनके तमाम सहयोगी भारत सहित विकासशील देशों से अमरीका के लिए ऐसे ठेके और कारोबार हासिल करने की जुगत में लगे हुए हैं जिससे अमरीकियों के लिए रोजगार पैदा हों। जुलाई 2011 में अमरीकी सरकार दुनियां भर से लिये गये उधार पर खजाने से दिये जाने वाले ब्याज को भुगतान करने में अक्षमता का भीषण संकट झेल रही थी। ओबामा प्रशासन ने विपक्षी दल के साथ मिलकर ऋण लिये जाने की सीमा को बढ़ाकर अमरीकी खजाने को ब्याज भुगतान में डिफाल्ट से बचा लिया परन्तु अगस्त के पहले सप्ताह में अंतर्राष्ट्रीय क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों - स्टैंडर्ड एंड पुअर्स, डागॉग तथा मूडी ने अमरीकी सरकार की क्रेडिट रेटिंग घटा दी। अमरीका की साख को इस प्रकार की चुनौती 1917 के बाद पहली बार मिली। हाल ही में वहां ”एक्यूपाई वॉल स्ट्रीट“ (अमरीकी शेयर बाजार ‘वॉल स्ट्रीट’ पर कब्जा करो) नारे के साथ मजदूर वर्ग का प्रतिरोध सामने आना शुरू हो गया है।
गहराते भूमंडलीय संकट का विश्व के विभिन्न हिस्सों के लोग अलग-अलग तरीके से विरोध कर रहे हैं। विकसित यूरोप में मेहनतकश लोग सामाजिक सुरक्षा कदमों में कटौती, रोजगार के कम होते अवसरों, बढ़ती बेरोजगारी और एक के बाद दूसरे देश में नजर आने वाले दिवालियेपन के विरूद्ध जी-जान से संघर्ष कर रहे हैं। आयरलैंड और ग्रीस के बाद, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक द्वारा पैकेज दिये जाने के बाद पुर्तगाल और स्पेन दिवालियेपन के कगार पर हैं।
मध्य पूर्व और उत्तर अफ्रीका के अरब देशों के घटनाक्रम वास्तव में पेचीदा लेकिन दिलचस्प हैं। ट्यूनीशिया, मिस्र, बहरीन, कतर, यूएई, कुवैत, लीबिया, ओमान और सउदी अरब आदि व्यापक जन विद्रोह की गिरफ्त में चले गये।
आम तौर पर यह माना जाता है कि अरब देशों में जनता का विद्रोह लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचना के कारण और शेखों और अमीरों के जोरो-जुल्म के खिलाफ है। कुछ हद तक यह सही है पर यह पूरा सच नहीं है। 2007 में शुरू हुई मंदी ने अधिकांश अरब देशों की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया क्योंकि उनकी अधिकांश आमदनी का निवेश उन पश्चिमी बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों में होता है जो ध्वस्त हो गये हैं। इसके परिणामस्वरूप अधिकांश अरब देशों में वित्तीय गिरावट चल रही है। मुद्रास्फीति से जीवन बदहाल हो गया है। मजदूरी कम हो गयी है। जबकि निरंकुश एवं अत्याचारी और शासक परिवार आराम की जिन्दगी गुजार रहे हैं, अरब देशों के आम लोग मुसीबतें झेल रहे हैं। यह चीज उन्हें विद्रोह की ओर ले गयी है। अमरीका के साथ-साथ अरब के निरंकुश शासक भी अधिकांश अरब देशों के जन-विद्रोह को ईरान द्वारा भड़काये गये शिया-सुन्नी टकराव का नाम दे रहे हैं। विद्रोहों में यह साम्प्रदायिक संघर्ष एक तत्व अवश्य है पर यह एक मात्र कारण नहीं है।
अमरीका परिस्थिति को लगातार ऐसी दिशा देने की कोशिश करता रहा है कि सरकार बदल जाने के बाद भी वहां ऐसे लोग शासन में आयें जो अमरीका के इशारों पर चलें। मिस्र में वह मुबारक की पार्टी और अख्वान-उल-मुसलमीन (मुस्लिम ब्रदरहुड) के बीच एक समझौता करा कर इस मामले में कुछ हद तक सफल भी हो गया है हालांकि पिछले तमाम वर्षों में अमरीका परस्त सरकारें मुस्लिम ब्रदरहुड को अत्यधिक घृणित संगठन मानकर उसके विरूद्ध लड़ती रही हैं। यमन में, अमरीकी और सऊदी अरब अलकायदा को अपने साथ मिलाने की कोशिशें कर रहे हैं। हालांकि इसी संगठन के विरूद्ध लड़ने के लिए वे अब्दुल्ला सालेह को पिछले दो दशकों में बिलियनों डॉलर देते रहे हैं। तेल समृद्ध देशों में अपने पिट्ठुओं को गद्दी पर बैठाने के लिए वाशिंगटन उन आग्रहों और आदर्शों को ताक पर रखता रहा है जिनकी नसीहतें वह अन्य देशों को देता थकता नहीं है। गत समय में उभरे जनांदोलनों के बाद अरब क्षेत्र के कुछ देशों में राजनीतिक व्यवस्थाओं ने आकार लेना शुरू कर दिया है। यहां हो रहे परिवर्तनों का प्रभाव विश्व के कुछ अन्य क्षेत्रों पर भी पड़ना स्वाभाविक है।
अरब के आम लोगों और विश्व भर के मुसलमानों को अपने पक्ष में करने के लिये ओबामा ने, उन सीमाओं के आधार पर जो 1967 के अरब-इस्राइल युद्ध से पहले थी, फिलीस्तीन के एक स्वतंत्र राज्य के गठन की वकालत की। पर इस्राइल ने इस प्रस्ताव को एकदम से अस्वीकार कर दिया। हमास, जिसका गाजा पट्टी पर शासन है, और इस्राइल के कब्जे वाले क्षेत्र में पीएलओ नेतृत्व वाली फिलीस्तीनी अथारिटी के बीच बढ़ती घनिष्टता की पृष्ठभूमि में ओबामा यह फैसला लेने पर मजबूत हुए थे।
लातिन अमरीका के लोग अधिकाधिक वाम-उन्मुख विकल्पों का वरण कर रहे हैं। यहां के अधिसंख्यक देशों में जनता ने ऐसे व्यक्तियों और पार्टियों को मतदान कर सत्ता में बैठाया है जो आर्थिक नवउदारवाद का विरोध करते हैं और वाम-उन्मुखी आर्थिक नीतियों को मानते हैं। क्यूबा के नेतृत्व में इन देशों के मंच में नवीनतम शामिल होने वाला देश है पेरू जहां जनता ने एक वाम-उन्मुख व्यक्ति को राष्ट्रपति के रूप में चुना है।
रूस में चुनाव शीघ्र ही होने वाले हैं। वर्तमान राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री द्वारा आपस में पदों के बदलने की बातें सुनने में आयी हैं।
हमारे पड़ोस में, नेपाल की परिस्थिति चिंताजनक और पेचीदा चल रही है। काफी देरी के बाद, संविधान के कार्यकाल को बढ़ाया गया। लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक पार्टियों में नेतृत्व स्तर पर बढ़ते टकराव और गुटबाजी की लड़ाई ने परिस्थिति को अधिक पेंचीदा बना दिया है। हाल में प्रमुख राजनैतिक पार्टियों - कम्युनिस्ट पार्टी आफ नेपाल (यूनीफाइड मार्क्सिस्ट लेनिनिस्ट), नेपाली कांग्रेस, यूनाइटेड कम्युनिस्ट पार्टी आफ नेपाल (माओवादी) और मधेशी पार्टियों ने काफी कटुता, झगड़े और मोल-भाव के बाद शांति प्रक्रिया, संविधान लेखन और संक्रमणवादी दौर में सत्ता की हिस्सेदारी के संबंध में एक समझौते पर दस्तखत कर दिये हैं। यदि इस समझौते पर ईमानदारी से अमल किया गया, तो वह देश के इतिहास में मोड़ साबित हो सकता है।
झगड़े से अस्तव्यस्त श्रीलंका की परिस्थिति गंभीर है। जिन शासकों ने तमिलों का जनसंहार किया है, वे पुनर्वास और राजनीतिक समाधान की आवश्यकता की निरंतर अनदेखी कर रहे हैं।
भारत पाक संबंधों में उतार-चढ़ाव गंभीर चिंता का विषय हैं। पाकिस्तान असल में अस्थिरता के दल-दल में फंसा हुआ है। कट्टरपंथी और आतंकवादी संगठनों का उदय, नागरिकों और सेना के बीच लड़ाई, सम्प्रभुता का बार-बार उल्लंघन और आंतरिक मामलों में अमरीका के निरंतर हस्तक्षेप ने देश को एक असफल राज्य बनने के कगार पर धकेल दिया है। आतंकवादी हमलों, खासकर मुंबई हमले को, अंजाम देने वालों के विरूद्ध ठोस कार्रवाई करने में पाकिस्तान की सरकार की विफलता भारत और पाकिस्तान के बीच कलह का एक निरंतर स्रोत है। चिंता का विषय यह है कि प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह पाकिस्तान से डील करने में एक राष्ट्रीय आम सहमति विकसित करने की जगह अमरीकियों के इशारे पर काम कर रहे हैं।
राष्ट्रीय परिदृश्य
आर्थिक हालात
केन्द्र सरकार द्वारा चलाये जा रहे आर्थिक नव उदारवाद के एजेण्डे के चलते आम जनता की दिक्कतें चारों तरफ से बढ़ रही हैं। इस दरम्यान खाद्य पदार्थों की मुद्रास्फीति दहाई के ऊपर बनी रही है। दालों, फलों, सब्जी, अनाजों, खाद्य तेलों, दवाओं आदि की बेकाबू होती कीमतों से जीवन बेहद कठिन हो चुका है। पेट्रोल की कीमतें बार-बार बढ़ाई जाती रही हैं। कई बार डीजल, रसोई गैस और पेट्रोल के दाम बढ़ाये गये हैं। इन सबके दाम बढ़ने से हर चीज के दाम लाजिमी तौर पर बढ़ते हैं। आवश्यक वस्तुओं के वायदा कारोबार को अनुमति दिये जाने और खाद्यान्नों तथा खाद्य पदार्थों की असीमित कानूनी जमाखोरी के कारण महंगाई दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही है। एक समय तो प्याज 70 से 80 रूपये किलो तक बिकी। जनता तथा भाकपा के प्रतिरोध के बावजूद प्रधानमंत्री ने महंगाई को न्यायोचित ठहराया और इसे विकास का प्रतीक बताते हुये कहा कि यदि लोग महंगी चीजें खरीदने में समर्थ हैं तो इसका तात्पर्य है कि उनकी क्रय क्षमता बढ़ चुकी है।
बेरोजगारी एवं रोजगार के अवसरों की कमी लगातार बढ़ रही है। खुद सरकार ने स्वीकार किया है कि बेरोजगारी की दर 9.4 प्रतिशत है। यह अनुमानित दर 2.8 की चार गुनी है। ज्यादातर सरकारी विभागों में नई भर्तियों पर अघोषित पाबंदी लगाई हुई है। संगठित औद्योगिक क्षेत्र में भी कैजुअल और ठेके पर मजदूर रखने की प्रथा बढ़ती जा रही है।
गरीबी और अमीरी के बीच खाई बढ़ती ही जा रही है। दुनियां के अमीरों की सूची में जहां भारतीय अमीरों की तादाद बढ़कर दहाई में पहुंच गई है वहीं गरीबी की सीमा के नीचे रहने वालों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है। इस तथ्य पर पर्दा डालने को योजना आयोग ने ग्रामीण क्षेत्र में 26 रूपये और शहरी क्षेत्र में 30 रूपये खर्च करने की क्षमता रखने वालों को गरीबी रेखा के ऊपर घोषित कर दिया। इसकी सर्वत्र भर्त्सना हुई। वास्तव में आबादी के 72 प्रतिशत लोग गरीबी की सीमा के नीचे गुजारा कर रहे हैं।
ये सभी पूंजीवादी व्यवस्था के अवश्यंभावी उत्पाद हैं। आर्थिक नवउदारवाद जिसके भूमंडलीकरण, निजीकरण एवं उदारीकरण आवश्यक अंग हैं, पूंजीवाद का वर्तमान अवतार हैं। इसके द्वारा पैदा भ्रष्टाचार एवं कालेधन ने आम लोगों खासकर मध्यवर्ग को जाग्रत किया है। अन्ना हजारे और योग गुरू रामदेव के आन्दोलन ने इन सवालों पर लोगों को झकझोरा है।
मस्तिष्क को झकझोर कर रख देने वाली विशाल धनराशि वाले घपले-घोटालों ने आम आदमी के गुस्से को बढ़ा दिया है। 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाला, राष्ट्र मंडल खेलों के आयोजन में भारी लूट, व्यवसाइयों के साथ मिल कर देश के साथ धोखाधड़ी कर बैंकों के शीर्षस्थ अधिकारियों का दुराचरण जिसमें कि कर्जों को अनुत्पादक परिसंपत्तियों (एनपीए) में बदल दिया गया, आदर्श सोसायटी घोटाला, आयकर प्राधिकरण द्वारा यह पुष्टि कि गांधी परिवार के विश्वस्त व्यक्ति क्वात्रोची और विन चड्ढा को बोफोर्स से कमीशन मिला था, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो), जो सीधे प्रधानमंत्री के अधीन है, द्वारा देवास मल्टीमीडिया को वाणिज्यिक उपयोग के लिये एस बैंड स्पेक्ट्रम का दिया जाना आदि घपलों-घोटालों के चंद उदाहरण मात्र हैं। इनके कारण केन्द्र सरकार के कई मंत्री और नेता पदों से हटाये गये हैं तो कई जेल में हैं। अन्य कई पर कार्यवाही हो सकती है। अब उनमें से कई एक जमानत पर रिहा हुये हैं। 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में गृहमंत्री की लिप्तता भी उजागर हो चुकी है। यह कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए-2 की भद्दी तस्वीर है जिसके प्रधानमंत्री के ईमानदार होने का ढिंढ़ोरा पीटा जाता है।
भाजपा जो मुख्य विपक्षी दल है। को पंजाब में अपने दो मंत्रियों को भ्रष्टाचार में लिप्त होने के कारण हटाना पड़ा। कर्नाटक में उसे अपने मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को हटाना पड़ा और वह जेल पहुंचाये गये। झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और गुजरात की उसकी सरकारें भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण मुश्किल में हैं। येदियुरप्पा और रेड्डी बंधुओं के कारनामों के चलते कर्नाटक को देश के सबसे भ्रष्ट राज्य के रूप में माना गया है।
पूंजीवादी समाज का एक और कलंक है काला धन। व्यवसाई, शासक वर्ग के राजनेता और अफसरशाही अपनी काली कमाई को विदेशी बैंकों में रखते आये हैं। यह सब हवाला के जरिये चलता है। एक अंतर्राष्ट्रीय एजेन्सी का आकलन है कि 1948 से 2008 के बीच 9 लाख करोड़ रूपये से अधिक धन स्विस और अन्य विदेशी बैंको में जमा है। इसमें से लगभग आधा धन कथित ‘आर्थिक सुधारों’ की अवधि में बाहर गया। जर्मनी के एक बैंक ने अपने भारतीय खातेदारों की सूची भारत सरकार को दी है पर सरकार उनके नाम उजागर करने से मना कर रही है। इसके अलावा देश के अंदर वास्तविक अर्थव्यवस्था से भी बड़ी एक समानान्तरण् अर्थव्यवस्था काम कर रही है। वित्तमंत्री ने स्वीकारा है कि उनके पास विदेशी खातेदारों की सूची है पर उसे जारी करने से मुकर रहे हैं।
नीरा राडिया के टेपों के उजागर होने से कार्पोरेट हाउसों के संप्रग-2 सरकार पर दबदबे का पर्दाफाश हुआ है। स्पष्ट हो गया है कि कार्पोरेट लॉबी मंत्री बनवाने में भी भूमिका अदा करती है।
अर्थव्यवस्था और विदेश नीति में एक दक्षिणपंथी परिवर्तन आया है और यह मुनाफा कमाने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के शेयरों को निरंतर बेचने की कोशिशों, सेवाओं के आउटसोर्सिंग और तथाकथित विदेशी निवेश के बेरोकटोक अंतर्प्रवाह में भी दिखाई पड़ता है। खुदरा व्यापार के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) और बहुराष्ट्रीय निगमों को देश भर में मल्टी ब्रांड माल और थोक व्यापार इकाइयां खोलने की इजाजत दे दी गई है। इसके लघु व्यापार और खुदरा दुकानों पर निर्भर करोड़ों लोग रोजी-रोटी से वंचित हो जायेंगे।
गत आम बजट में मुनाफा कमाने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को बेच कर वित्तीय घाटा पूरा करने के प्रावधान हैं। सरकार स्टील अथारिटी आफ इंडिया (सेल) और अन्य नवरत्न कंपनियों के शेयरों को पहले ही बिक्री के लिये पेश कर चुकी है।
चूंकि किसी सरकार की विदेश नीति उसकी आंतरिक नीतियों - खासकर आर्थिक नीतियों का विस्तार होती है, अतः अमरीकी साम्राज्यवादियों की जोड़-तोड़ के सामने अधिकाधिक आत्म-समर्पण किया जा रहा है।
यद्यपि ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत और दक्षिण अफ्रीका समूह) और जी-20 के मंचों पर हमारी भूमिका सकारात्मक है लेकिन आर्थिक मोर्चे पर हम पश्चिमी देशों के सामने लगभग आत्मसमर्पण कर चुके हैं। शंघाई सहयोग परिषद में शामिल होने का भारत का फैसला स्वागत योग्य है पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमरीका का मार्गदर्शन ग्रहण करते हैं। ईरान के सवाल, लीबिया के सवाल तथा अफगानिस्तान के सवाल पर भी हम अमरीकी घेरेबन्दी से बाहर नहीं निकल रहे।
अमरीका के साथ बड़े रक्षा सामग्री समझौते, जिनके परिणामस्वरूप भारी रक्षा खर्च हो रहा है तथा जिसके तहत कम प्रभावकारी एम-4777 हॉविट्जर तोपें खरीदी जा रही हैं, बेहद चिन्ता का विषय है। अमरीका, यूरोप और इजरायल के साथ बड़े सौदों से गरीब एवं मध्यम वर्ग की कीमत पर न केवल अर्थव्यवस्था कमजोर हो रही है बल्कि हमारी विदेश नीति पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।
साथ ही औद्योगिक उत्पादन में मामूली वृद्धि हुई है। रूपये की कीमत तेजी से गिर रही है। यूनान, पुर्तगाल, आयरलैण्ड तथा अन्य यूरोपीय देशों तथा खुद अमरीका में आर्थिक संकट के चलते इसके और गिरने की संभावना बनी हुई है। सरकार बहादुराना चेहरा दिखाने की कोशिश कर रही है पर देश की जनता को और अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र में 40,000 करोड़ रूपये के विनिवेश का काम शुरू कर दिया है। भारतीय ऊर्जा निगम ने रू. 1000 करोड़ का विनिवेश किया है। बीएचईएल तथा दूसरे लाभ देने वाले सार्वजनिक उद्यमों में 8000 करोड़ रूपये का विनिवेश किया जा रहा है। प्रधानमंत्री विकासदर के लिये दूसरी पीढ़ी के सुधारों को आवश्यक बता रहे हैं।
संतोष की बात है कि सरकार के हर नकारात्मक कदम का मेहनतकश अवाम आन्दोलन के जरिये विरोध कर रहे हैं तथा एक बड़े जनांदोलन की पृष्ठभूमि तैयार कर रहे हैं।
राजनैतिक
महंगाई और भ्रष्टाचार इस दौर की गंभीर समस्यायें हैं। महंगाई का सर्वाधिक असर गरीब जनता पर पड़ता है। भ्रष्टाचार गरीब-अमीर सभी की समस्या है। भाकपा लगातार इन समस्याओं पर आन्दोलनरत है। लेकिन कार्पोरेट जगत और उसका मीडिया भ्रष्टाचार को ही मुद्दा बनाने में जुटे हैं। इसी पृष्ठभूमि में समाज सेवी अन्ना हजारे और योग गुरू बाबा रामदेव ने भी भ्रष्टाचार के विरूद्ध आन्दोलन किये हैं। इससे भ्रष्टाचार के विरूद्ध एक जनमत बना है, मध्य वर्ग मैदान में उतरा है पर महंगाई, खाद्य सुरक्षा, बेरोजगारी जैसी समस्याओं से ध्यान हटा भी है।
अन्ना हजारे ने पहले 4 दिवसीय अनशन किया। सभी राजनीतिक दलों को दरकिनार कर टीम अन्ना और कांग्रेस ने तथाकथित जन लोकपाल बिल की एक संयुक्त ड्राफ्ट कमेटी बना ली। लेकिन कुछ मुद्दों पर मतभेदों को लेकर दोनों के रास्ते अलग हो गये और सरकार ने अपने लोकपाल बिल का ड्राफ्ट सदन के पटल पर रख दिया जोकि संसद की स्टैन्डिंग कमेटी के विचाराधीन है। अन्ना टीम ने अपना जन लोकपाल बिल का ड्राफ्ट सरकार को सौंपा और सरकार से मांग की कि उसका ड्राफ्ट भी संसद के विचारार्थ पेश किया जाये। सरकार के रजामन्द न होने पर अन्ना हजारे 16 अगस्त को भूख हड़ताल पर बैठ गये।
लेकिन सरकार ने पहले भूख हड़ताल की इजाजत नहीं दी। अन्ना को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। जनता के जबरदस्त प्रतिरोध के चलते सरकार को अनशन की अनुमति देनी पड़ी और राम लीला मैदान में 13 दिन अनशन चला। मीडिया ने अपने आर्थिक स्वार्थों और प्रतिस्पर्धा के चलते मामले को बेहद तूल दिया। पूरे देश में भ्रष्टाचार पर गर्म बहस चली।
लोकपाल के सम्बंध में सरकारी बिल बेहद कमजोर है। प्रधानमंत्री और सभी सरकारी कर्मचारियों को कानून के दायरे में नहीं लाया गया। इसमें राज्यों के लोकायुक्त के बारे में कुछ भी नहीं कहा गया। लोकपाल केवल सिफारिश करेगा जिसे सरकार माने या न माने। यह केन्द्रीय सतर्कता आयोग की तर्ज पर ही होगा। सरकारी बिल के अनुसार दोषी को सजा 6 माह से शुरू होगी जबकि शिकायतकर्ता यदि आरोपों को साबित नहीं कर पाया तो उसे 25 हजार रूपये से 2 लाख रूपये के जुर्माने सहित 2 से 5 साल की सजा होगी।
दूसरी ओर ”जन लोकपाल बिल“ के जद में कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका को शामिल किया गया है। इसमें 1.32 करोड़ सरकारी कर्मचारियों और सीबीआई की भ्रष्टाचार विरोधी शाखा को भी घेरे में लिया गया है। एक सर्वोच्च संस्था को इतनी अधिक शक्तियां दे देना नुकसानदायक ही होगा।
अरूणा राय और कुछ अन्य के प्रस्ताव इससे बेहतर हैं। लेकिन उन पर भी चर्चा करना जरूरी है। भाकपा और वामपंथी दल अलग से एक राष्ट्रीय न्यायिक जवाबदेही बिल बनवाना चाहते हैं। संसद की संवैधानिक महत्ता की रक्षा की जानी चाहिये तथा प्रधानमंत्री, सांसदों, मंत्रियों को लोकपाल के दायरे में लाया जाना चाहिये। इसका विकेन्द्रीकरण जरूरी है।
लोकपाल बिलों पर चार दशकों से चर्चा चल रही है। इस बीच सरकार, सरकार के विभागों और मंत्रियों के भ्रष्टाचार के उजागर होने से लोग गुस्से में हैं। सरकार ने अपनी विश्वसनीयता खो दी है। इसीलिये अन्ना को इतना बड़ा समर्थन मिला है। इससे सारा ध्यान भ्रष्टाचार, सरकारी मशीनरी, नौकरशाही और राजनेताओं पर लग गया है तथा कार्पोरेट जगत ने अन्ना को हर तरह से मदद की। लोगों की आकांक्षाओं की आड़ में संसद और संवैधानिक मशीनरी को पीछे धकेलने की साजिश भी है। आरएसएस, भाजपा तथा अन्य दक्षिणपंथी ताकतों ने इस स्थिति का फायदा उठाने की कोशिश की। अन्ना की टीम अब अपनी मांगों का दायरा बढ़ाती जा रही है और सरकार एवं देश को अपनी शर्तों पर चलाना चाहती है।
लोग भ्रष्टाचार से निजात चाहते हैं। लेकिन सारी पूंजीवादी पार्टियां भ्रष्टाचार में लिप्त दिखाई पड़ रही हैं। भाकपा और वामपंथ भ्रष्टाचार से मुक्त हैं, जनता यह जानती है। अतएव इस आन्दोलन से पैदा हुई चेतना जनता को वामपंथ की ओर मोड़ सकती है।
 अन्ना आन्दोलन की थाती को अपने आगोश में समेटने, कैश फार वोट मामले में अपने सिपहसालारों के जेल के सींखचों के पीछे चले जाने और अमरीका के उस सन्देश के लीक हो जाने जिसमें मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए प्रोजेक्ट किया गया है, से खिन्न भाजपा नेता श्री लाल कृष्ण आडवाणी ने अपनी रथयात्रा शुरू कर दी। उत्साहित नरेन्द्र मोदी ने भी 3 दिन के उपवास का नाटक किया। उत्तर प्रदेश में भी भाजपा के कई नेता रथों पर सवार होकर निकल पड़े हैं। नाम है भ्रष्टाचार का विरोध, नजर है आगामी विधान सभा चुनावों पर।
भाजपा किस मुंह से भ्रष्टाचार विरोध की बात कर सकती है। कर्नाटक के लोकायुक्त ने भाजपा के मुख्यमंत्री येद्दियुरप्पा को भ्रष्टाचार के लिये दोषी ठहराया। उन्हें इस्तीफा देना पड़ा और जेल जाना पड़ा। भाजपा का आर्थिक स्तंभ एक और मंत्री गाली जनार्दन रेड्डी भी जेल में है। उसके पास अपार सोना और धनराशि पाई गई। लेकिन भाजपा ने आज तक उसे निलंबित तक नहीं किया अपितु उसका बचाव किया। उत्तराखंड के उसके मुख्यमंत्री को भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते इस्तीफा देना पड़ा। बार-बार आगाह किये जाने के बावजूद गुजरात में 7 वर्षों से लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं की गई। अंततः राज्यपाल ने नियुक्ति का विवादास्पद कदम उठाया। छत्तीसगढ़, झारखंड और मध्य प्रदेश की उसकी सरकारों पर भी उंगलियां उठ रही हैं। ऐसे में भाजपा को यात्रायें निकालने का नैतिक अधिकार ही नहीं है। पर सत्ता के लिये भूख उससे यह सब करा रही है।
कांग्रेस और भाजपा दोनों के भ्रष्टाचार को भाकपा को जनता के बीच उजागर करना है। अन्ना आन्दोलन के प्रति हमें संतुलित दृष्टिकोण रखना है। हमें ध्यान रखना है कि जनता में भ्रष्टाचार के विरूद्ध मजबूत और न्यायोचित कार्यवाही की इच्छा हैं अतएव एक मजबूत एवं शक्तिशाली लोकपाल कानून जरूरी है। पर उससे ही भ्रष्टाचार मिट जायेगा, यह सोचना गलत होगा। देश में कई इस तरह के कानून पहले से मौजूद हैं जिनको लागू नहीं किया गया। राज्यों में भी अलग-अलग कानून बनाये गये हैं। हमारा विचार है कि भ्रष्टाचार से निपटने को सरकार में एक मजबूत इच्छाशक्ति होनी चाहिये। असमानता पर आधारित व्यवस्था को बदल कर भी इससे निजात पाई जा सकती है।
भाकपा और वामपंथ ने 2 सितम्बर को निम्न पांच सवालों पर आन्दोलन चलाने की रूपरेखा बनाई है। हमें लगातार और लम्बे समय तक इन मुद्दों पर संघर्ष चलाना है।
1 - एक मजबूत लोकपाल कानून के लिये और भ्रष्टाचार के विरोध में।
2 - न्यायिक जवाबदेही कानून के लिये
3 - महंगाई को काबू में करने
4 - चुनाव सुधार तथा
5 - काले धन की वापसी के लिये ठोस कदम
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर सीबीआई ने ‘कैश फार वोट’ केस में चार्जशीट दाखिल की जिसमें पूर्व समाजवादी अमर सिंह और भाजपा के दो पूर्व सांसद गिरफ्तार हुये। लेकिन सीबीआई ने इस धन के स्रोत का खुलासा नहीं किया और इस तरह संप्रग-2 के प्रबंधकों की मदद की है। 2-जी स्पेक्ट्रम मामले में चिदम्बरम की संलिप्तता के सम्बंध में प्रणव मुखर्जी (वित्तमंत्री) ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा। लेकिन सदैव की भांति प्रधानमंत्री और कांग्रेस नेतृत्व ने इसकी सफाई नहीं दी। बंगाल में कम्युनिस्टों पर हमले हो रहे हैं। तेलंगाना का आन्दोलन लगातार व्यापक हो रहा है। राजस्थान में गुर्जर और अल्पसंख्यकों के झगड़े में पुलिस ने गोली चला दी और 9 अल्पसंख्यक मारे गये। मणिपुर में लम्बे समय से ब्लॉकेड चल रहा है।
लम्बे इंतजार के बाद भूमि अधिग्रहण एवं पुनर्वास बिल संसद में पेश किया गया है। भाकपा पुराने कानून को हटा कर एक बिलकुल नया कानून लाने को संघर्षरत है। इस बिल में तमाम सुधारों की जरूरत है।
इस बीच देश में जमीन का मुद्दा बड़े पैमाने पर उभर कर आया है। सिंगूर और नंदीग्राम की भूमि के सवाल ने पश्चिम बंगाल के चुनाव में उल्लेखनीय भूमिका अदा की। इसी सवाल पर हमने दादरी के किसानों की लड़ाई लड़ी और उन्हें भूमि वापस दिलाने में कामयाबी मिली। अब नोएडा में अन्य जगहों पर किसानों के संघर्ष चल रहे हैं। एक अन्य उल्लेखनीय लड़ाई वनवासियों को विस्थापित कर पोस्को परियोजना को लगाने के विरूद्ध उड़ीसा में चल रही है। भाकपा इस संघर्ष में सबसे अगले मोर्चे पर है। महाराष्ट्र के थाणे जिले में जैतापुर में परमाणु संयंत्र लगाने के लिये भूमि अधिग्रहण किये जाने और परमाणु संयंत्र की स्थापना के विरूद्ध भी वहां व्यापक संघर्ष चल रहा है। किसानों की उपज के उचित मूल्य दिलाने और आर्थिक नवउदारवाद की नीतियों के कृषि पर हमले के विरूद्ध हमें पूरी शिद्दत से जुटना होगा।
बाहर से थोपा आतंकवाद एक जटिल समस्या बना हुआ है। मुंबई पर 26-11 को हुये आतंकी हमले से देश आहत है। लेकिन हमलों का क्रम रूका नहीं है। हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय में हुये हमले में 14 लोग मारे गये और अन्य अनेक घायल हुये। सरकार आतंकी गतिविधियों पर काबू पाने में असमर्थ है। उधर हिन्दुत्व आतंकवाद के बारे में भी खुलासे-दर-खुलासे हो रहे हैं। असीमानन्द के इकबालिया बयान से यह साबित होता है कि संघ परिवार से जुड़े संगठन और लोग उन तमाम घटनाओं में शामिल थे जिनमें जांच एजेंसियों ने कई मुस्लिम युवकों को फांसने की कोशिश की। मालेगांव विस्फोट, हैदराबाद में मक्का मस्जिद विस्फोट, अजमेर दरगाह विस्फोट, समझौता एक्सप्रेस में विस्फोट - ये सभी आतंकी हमले हिन्दुत्व आतंकवाद की करतूतें थीं।
गोधरा कांड के बाद गुजरात दंगों में मोदी और उसकी संघ मंडली की भूमिका जांच एजेंसियों, उस समय के प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारियों ने तो उजागर की ही हैं अब न्यायालय ने भी लोगों को सजा सुनाकर इन आरोपों की पुष्टि कर दी है। आश्चर्यजनक है कि धर्मनिरपेक्षता का राग अलापने वाली संप्रग-2 सरकार साम्प्रदायिक व हिन्दुत्व आतंकवाद की गतिविधियों की एक व्यापक जांच कराये जाने से लगातार बचती रही है।
पांच राज्यों के चुनाव परिणाम
इस मध्य पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु, पुड्डुचेरी तथा असम में विधान सभा चुनाव हुये। इनमें तमिलनाडु में हम कुछ फायदे में रहे और 9 सीटें जीतीं।
पश्चिम बंगाल जहां वाम मोर्चा लगातार 34 वर्षों से शासन कर रहा था तथा केरल जहां हम एक बार जीतते हैं और एक बार हारते हैं, में क्रमशः वामपंथी मोर्चे और वाम जनवादी मोर्चे की हार का देश की राजनीति पर व्यापक असर पड़ा है। पूंजीवादी ताकतें और उनके द्वारा पोषित मीड़िया हवा बांध रहा है कि वहां वामपंथ का सूपड़ा साफ हो गया। यह उसी तर्ज पर है जैसाकि सोवियत संघ में समाजवादी ढांचे के पतन पर किया गया।
जहां तक पश्चिम बंगाल की बात है, वहां सिंगूर और नन्दीग्राम के मुद्दे का असर होना लाजिमी था। वाम मोर्चे ने खोये हुये आधार को पाने की कोशिशें कीं लेकिन वह सफल नहीं रहा। फिर भी उसने 41 प्रतिशत मत हासिल किये। लेकिन सत्ता उसके हाथ से छिन गई। यह वाम मोर्चे की राजनीतिक पराजय है। मोर्चे के बड़े भागीदार दल में सत्ता का अहंकार, राज्य के औद्योगीकरण के सवाल पर मनमाने ढंग से फैसले, धार्मिक एवं भाषाई अल्पसंख्यकों की वास्तविक आशाओं - आकांक्षाओं की उपेक्षा और सबसे प्रमुख बात है वाम मोर्चे के सबसे बड़े घटक द्वारा अन्य की उपेक्षा कर अपने आपको ही सब कुछ समझना, हर सामाजिक मामले में भाकपा (मा) द्वारा मनमाना हस्तक्षेप और शासक गठबंधन के निचले और मध्यम स्तर पर भ्रष्टाचार के चंद प्रमुख कारण हैं जो पराजय के कारणों की तरफ इशारा करती हैं।
भाकपा पश्चिम बंगाल द्वारा की गयी समीक्षा में यह भी रेखांकित किया गया कि उसकी सांगठनिक स्थिति कमजोर थी अतएव पिछली विधान सभा में सात के स्थान पर दो ही स्थान वह पा सकी।
केरल में वाम लोकतांत्रिक गठबंधन जो सत्ता में था, लगातार दूसरी बार चुनाव जीत कर स्थापित परंपरा को पलटने जा रहा था। अपने गत शासन काल में उसने राजनीतिज्ञों के भ्रष्टाचार पर कार्यवाही की, राज्य के सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का जीर्णोद्धार कर आर्थिक नवउदारवाद की बुराइयों से जनता को बचाया, लद्यु उद्योगों को बचाया तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली को विस्तारित किया। वाम लोकतांत्रिक मोर्चे ने लोकसभा तथा पंचायत चुनाव के मुकाबले जबरदस्त वोट हासिल किये। फिर भी सत्ता खो बैठा। दोनों मोर्चों के बीच मतों का अंतर एक प्रतिशत से भी कम है। साम्प्रदायिकता और जातीय ध्रुवीकरण ने भी हानि पहुंचाई। मुख्यमंत्री को विलम्ब से प्रत्याशी बनाये जाने से भी हानि उठानी पड़ी।
तमिलनाडु में कांग्रेस-डीएमके गठबंधन के महाभ्रष्ट परिवार के शासन को जनता ने पूरी तरह अस्वीकार कर दिया। अन्ना द्रमुक गठबंधन तथा उसमें शामिल वामपंथ को भी फायदा पहुंचा।
पुड्डुचेरी में कांग्रेस हार गई और कांग्रेस से निष्कासित नेता एन. रामासामी ने जगह ले ली। हमें कोई सीट नहीं मिली।
असम में शांति और स्थिरता के नारे पर कांग्रेस जीती। हमें वहां भी कोई सीट नहीं मिली।
निष्कर्ष
यद्यपि 27 से 31 मार्च तक पटना में होने जा रहे राष्ट्रीय महाधिवेशन में समूचे आर्थिक, राजनैतिक परिदृश्य पर विस्तृत चर्चा होगी और दस्तावेज पारित होंगे लेकिन उपर्युक्त चर्चा के आधार पर कुछ निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।
  • आर्थिक नव उदारवाद का संकट देश और दुनियां दोनों में ही गहरा होता जा रहा है। अतएव वामपंथ खासकर भाकपा के लिये उचित समय है कि अन्य विकासशील देशों खासकर लातिन अमरीकी देशों के अनुभवों से तथा वियतनाम और क्यूबा की कम्युनिस्ट पार्टियों की गत दिनों हुई कांग्रेसों में अनुमोदित आर्थिक विकास के पैकेजों से सीख लेकर वैकल्पिक आर्थिक नीतियों को मूर्त रूप दे।
  • भारत में, अधिकांश राजनैतिक पार्टियां - राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय, आर्थिक नव उदारवाद का समर्थन करती हैं। ऐसे में वामपंथ को एक वैकल्पिक आर्थिक कार्यक्रम के आधार पर और धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र को सुदृढ़ बनाने को एक ऐसे विकल्प को पेश करना है जिसका नेतृत्व वामपंथ स्वयं करे।
  • चुनावी तैयारी को लापरवाही तरीके से लेने की आदत को छोड़ने की जरूरत है। ऐसी परिस्थिति जहां धनबल और बाहुबल अधिकाधिक निर्णायक कारक बन रहा है, यह केवल संगठन ही है जो हमारी मदद कर सकता है। पार्टी को जमीनी स्तर पर खड़ा करना होगा।
  • अल्पसंख्यकों, दलितों और आदिवासियों के बीच कार्य करने की हमारी शैली को धारदार बनाने की जरूरत है। ये तबके हमसे दूर हुये हैं। हमें उनकी वास्तविक शिकायतों को उठाना चाहिये और सरकारों द्वारा घोषित विभिन्न कल्याण कार्यक्रमों के अमल के लिये परिणामोन्मुख संघर्ष चलाने चाहिये।
  • समय का तकाजा है कि हम खेत मजदूरों, विद्यार्थियों और युवाओं के बीच काम पर ध्यान केन्द्रित करें। किसानों, मजदूरों में असंतोष बढ़ रहा है, अतः उपरोक्त सभी के जन संगठनों को मजबूत करना चाहिये, उनका विस्तार करना चाहिये।
  • व्यापक स्तर पर पार्टी फंड जमा करना, होल टाइमर कार्यकर्ताओं के भत्तों में वृद्धि करना, होल टाइमरों की संख्या बढ़ाना और पार्टी के सिद्धान्तों एवं कार्यों का प्रचार करना - ये महत्वपूर्ण संगठनात्मक कार्य हैं।
  • मजदूर वर्ग एवं अन्य मेहनतकश लोगों के राजनीतीकरण पर जोर देकर वर्ग चेतना को तेज करना।
  • विश्व भर में, खासकर लातिन अमरीका और अरब देशों के घटनाक्रमों की पृष्ठभूमि में साम्राज्यवाद विरोधी चेतना को तेज करना।
  • हमारी विचारधारात्मक शिक्षा व्यवस्था (स्कूलिंग) को नई दिशा देने एवं काफी विस्तारित करने की जरूरत है।
  • पार्टी पत्र-पत्रिकाओं की विषयवस्तु में और उनके सर्कुलेशन में सुधार लाना और सामयिक विषयों पर अधिकाधिक पुस्तिकाओं का प्रकाशन।
उत्तर प्रदेश
अप्रैल-मई 2007 में विधान सभा के चुनाव हुये थे। उस समय प्रदेश में समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाली मिली-जुली सरकार थी जो सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और प्रतिष्ठानों को बेच रही थी, किसानों की जमीनों का मनमाने तरीके से अधिग्रहण कर उसे अपने फायनेन्सर उद्योगपतियों को सौंप रही थी, भ्रष्टाचार चरम पर था यहां तक कि पुलिस कांस्टेबिलों की भर्ती में भारी पैसा लिया जा रहा था, शिक्षा का बाजारीकरण किया जा रहा था और रिश्वत लेकर नये विद्यालयों को मान्यता दी जा रही थी, मंहगाई चरम पर थी, सार्वजनिक वितरण प्रणाली ध्वस्त पड़ी थी, गुंडागर्दी, माफियागीरी सरे आम चल रही थी, सत्ता पर इन्हीं लोगों का वर्चस्व था, अपराध चरम पर थे और कानून-व्यवस्था ध्वस्त पड़ी थी तथा शासन-प्रशासन पर से जनता का विश्वास पूरी तरह उठ गया था।
ऐसी स्थिति में जब 2007 के विधान सभा चुनाव हुये तो इस सबसे निजात पाने को आम जनता ने बसपा को न केवल पूर्ण बहुमत प्रदान किया अपितु अपेक्षा की कि बसपा सरकार इन सभी समस्याओं पर पूरा ध्यान देगी अपितु स्वच्छ प्रशासन प्रदान कर आम आदमी की सुध लेगी।
लेकिन हुआ उससे ठीक उलट। जो कुछ सपा सरकार के शासन में घटित हो रहा था, वहीं सब कुछ होता चला गया। गत प्रदेश सरकार की भांति और केन्द्र सरकार का अनुकरण करते हुए बसपा सरकार ने आर्थिक नवउदारवाद की नीतियों का अनुशरण करना शुरू कर दिया। इससे उत्तर प्रदेश की जनता खासकर किसानों, मजदूरों, बुनकरों, खेतिहर मजदूरों, दस्तकारों, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों, युवाओं, छात्रों, कर्मचारियों, महिलाओं, दलितों तथा अल्पसंख्यकों की कठिनाइयां लगातार बढ़ती चली गईं। प्रतिरोध के स्वर गूंजने लगे तथा किस्म-किस्म के जनांदोलन फूट पड़े। जनता की समस्याओं का निराकरण करने के बजाय सरकार जनविरोधी होती गई और जनता के आक्रोश को दबाने में जुट गई। जनवादी हकों को छीना गया और आन्दोलनों पर लाठी-गोली चलाई गई। तमाम लोगों को जेल में भी डाला गया। सरकार जनता से दूर होती गई और उद्यमियों, बिल्डरों, माफियाओं को लाभ पहुंचाने में जुट गई।
कानून-व्यवस्था एवं प्रशासनिक दमनचक्र
प्रदेश की कानून-व्यवस्था बदतर हो चुकी हैं एक दलित और महिला मुख्यमंत्री होने के बावजूद सर्वाधिक दमन इन्हीं दोनों पर बढ़ा है। महिलाओं से बलात्कार और उनसे छेड़छाड़ की घटनायें आये दिन का सबब बन चुकी हैं। उनसे न केवल दुष्कर्म किये गये अपितु दुष्कर्म के बाद हत्यायें कर दी गईं। इन अपराधों की जड़ में शासक दल के नेता, उनके पालतू गुण्डे और सामंती तत्व हैं। यहां तक कि पुलिस पर भी कई जगह बलात्कार के आरोप लगे हैं। लखीमपुर जनपद के निघासन थाने में किशोरी की हत्या कर शव पेड़ पर लटका दिया गया। ऐसे कई मामलों में पुलिस मामलों की दबाने में जुटी रही। भ्रष्टाचार और उसके धन की बंदरबांट को लेकर हत्यायें हो रही हैं। स्वयं राजधानी लखनऊ में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यक्रम से संबंधित दो मुख्य चिकित्साधिकारियों की हत्या कर दी गई। इतना ही नहीं इन हत्याओं के आरोप में जेल में बन्द उप मुख्य चिकित्साधिकारी की हत्या कर दी गई। इन घटनाओं ने शासन-प्रशासन में बैठे आर्थिक अपराधियों के दुस्साहस को उजागर कर दिया है। इसके अलावा जगह-जगह दलितों और कमजोरों को न केवल सताया जा रहा है बल्कि उनकी हत्यायें भी हो रही हैं। रमाबाईनगर (कानपुर देहात) भाकपा के सह सचिव दलित प्रधान कामरेड सरजू प्रसाद की हत्या गत सितम्बर माह में कर दी गई। भाकपा राज्य नेतृत्व ने यदि ठोस और त्वरित कदम न उठाये होते तो स्थानीय बसपा विधायक द्वारा संरक्षित अपराधी जेल न पहुंचाये गये होते।
हत्या, लूट, चोरी, दहेज हत्यायें, ऑनर किलिंग आदि सभी अपराध बेधड़क हो रहे हैं। दूसरी तरफ थानों में पीड़ितों की रिपोर्ट तक नहीं लिखी जाती और शासन-प्रशासन आम आदमी की सुनता नहीं। पुलिस हिरासत में कई मौतें इस दरम्यान हुईं। इस सबसे जनता में गुस्सा बढ़ रहा है। थाने, चौकियों पर गुस्साई भीड़ ने कई जगह हमले किये हैं। बौखलाई पुलिस तमाम लोगों को संगीन धाराओं में जेल में ठूंस रही है। लखीमपुर और गाजीपुर में हुई ऐसी वारदातों में दर्जनों लोगों को बन्द कर उन पर गैंगस्टर लगाया गया। गाजीपुर में का. राम बदन सहित विभिन्न दलों के 8 नेताओं को जेल में डाला गया है।
बसपा ने सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर तमाम अपराधी, दबंगों और माफियाओं को चुनवा कर संसद और विधान सभाओं में चुनवा कर पहुंचवाया। वे ही आज इन अपराधों के सूत्रधार हैं। खुलासा होने पर बसपा उन्हें पहले दंडित करने का नाटक करती है तथा बाद में उन पर हुई कार्यवाही वापस ले क्लीन चिट दे देती है। इसलिये सरकार द्वारा कानून-व्यवस्था को दुरूस्त करने के लिये उठाये जा रहे कदम नाकाम साबित हो रहे हैं और सत्ता की उनकी वह हनक आज नहीं रही जो शुरूआती दिनों में दिखाई देती थी। आम जनता को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ रही है और वह दोहरे दमन को झेल रही है।
पूर्व की और वर्तमान सरकार के एक ही ट्रैक पर चलने का एक साफ संदेश है। केवल सरकार बदलने भर से इस समस्या का हल संभव नहीं है। जनता को उन दलों का साथ देना होगा जो अपराधी तत्वों को प्रश्रय नहीं देते तथा राजसत्ता का दोहन स्वयं के धनोपार्जन के लिये नहीं करते। भाकपा और वामपंथी दल इस कसौटी पर खरे उतरते हैं, यह तथ्य जनता के सामने रखना होगा।
खेती और किसान
केन्द्र एवं राज्य सरकार की खेती और किसान विरोधी नीतियों के चलते इन पर गंभीर संकट बना हुआ है। बिजली का संकट, खाद-बीज का, कीटनाशकों की किल्लत और उनकी बढ़ती जाती कीमतें, जमीनों का अधिकाधिक अधिग्रहण, कृषि उत्पादों की उचित कीमत न मिल पाना, कृषि का कार्पोरेटाइजेशन, कर्ज में डूबते जा रहे किसानों द्वारा लगातार की जा रही आत्महत्यायें तथा मौसम की मार के कारण उत्तर प्रदेश में कृषि उत्पादन कम हो गया है और वह राष्ट्रीय उत्पादन में अपनी पूर्व वाली भूमिका नहीं निभा पा रहा।
प्रदेश सरकार किसानों की उपजाऊ जमीनों का बड़े पैमाने पर अधिग्रहण कर भूमाफिया, बिल्डर्स, उद्योगपति, अफसर और नेताओं को भारी लाभ पहुंचा रही है। सपा, बसपा, भाजपा और कांग्रेस सभी के शासन काल से तमाम सरकारी जमीनों को राजनेताओं ने अपने और अपने रिश्तेदारों के नाम करा लिया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दिल्ली से सटे जिले खासकर इस अधिग्रहण की चपेट में आ रहे हैं। वहां यमुना एक्सप्रेस वे, यमुना औद्योगिक विकास प्राधिकरण, रेलवे लाइन के विस्तार, विभिन्न राजमार्गों के निर्माण व विस्तार के नाम पर गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, बुलन्दशहर, महामायानगर, मथुरा एवं आगरा जनपदों की हजारों एकड़ जमीन अधिगृहीत की जा चुकी है तथा इससे कई गुना अधिक रकबे पर अधिग्रहण की तलवार लटकी हुई है। बाजना, भट्टा पारसौल, घोड़ी बछेड़ा आदि ग्रामों में इसके विरोध में आन्दोलन कर रहे किसानों पर गोलियां बरसाई गईं और लगभग एक दर्जन किसान मारे जा चुके हैं। अनेकों को गिरफ्तार कर जेल पहुंचाया गया।
ललितपुर, लखनऊ, इलाहाबाद, चंदौली आदि में भी किसान आन्दोलन हुये। दादरी आन्दोलन में भाकपा अग्रिम मोर्चे पर थी। वहां किसानों की जमीनें कोर्ट के आदेश से वापस हुई हैं। अन्य सभी जगह भी हमने आन्दोलन में भाग लिया और कई जगह जमीनों को बचाया। अब कई न्यायिक निर्णय भी किसानों के पक्ष में आये हैं। हम मांग कर रहे हैं कि सरकार निजी क्षेत्र के लिये जमीन अधिग्रहण न करे, सार्वजनिक क्षेत्र के लिये जरूरी जमीन का अधिग्रहण पर्यावरण, सुरक्षा तथा पुनर्वास की दृष्टि से किया जाये। हम भूमि अधिग्रहण कानून 1894 को पूरी तरह बदले जाने की मांग भी कर रहे हैं।
इस बीच किसानों के समक्ष भारी बिजली संकट बना रहा। खाद महंगे कर दिये गये फिर भी उसका अभाव बना रहा। भारी कालाबाजारी हुई। किसान गन्ने की कीमत 350 रू. प्रति कुंतल एवं बोनस मांगते रह गये, सरकार ने 250 रू. कुंतल ही दाम तय किये हैं। यही हाल धान का है। आलू इस बार फिर लागत वापस नहीं करा पाया। तमाम किसानों ने कोल्ड स्टोरेज से आलू इसलिये नहीं उठाया कि वे उसके भंडारण की ऊंची दर का भुगतान करने में असमर्थ थे। बुन्देलखंड के किसान आज भी तबाह हैं। सरकारी पैकेज भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुका है। डीजल की बढ़ी कीमतों से कृषि लागत और भी बढ़ गई है। उत्पादन खरीद औपचारिकता बन गई है। किसानों में बेहद आक्रोश है।
उद्योग जगत एवं निजीकरण
यद्यपि प्रदेश में शासन कर रही बसपा सरकार कांग्रेस, सपा एवं भाजपा के विरोध में खड़ी दिखाई दे रही है लेकिन आर्थिक, कृषि एवं औद्योगिक क्षेत्रों में उन्हीं की तरह आर्थिक नवउदारवाद के रास्ते पर चल रही है। सार्वजनिक उपक्रमों और सामाजिक सेवाओं का निजीकरण अबाध गति से जारी है। सरकार ने आगरा की विद्युत वितरण व्यवस्था को निजी हाथों में सौंप टोरंट पावर कंपनी को दे दिया। वहां की जनता ने और स्वयं भाकपा ने इसका कड़ा विरोध किया। आज भी वहां कंपनी और जनता के बीच तकरार चल रही है। सरकार ने कानपुर विद्युत वितरण कंपनी (केस्को) को भी टोरंट को सौंपने का निर्णय लिया जो कर्मचारियों, जनता और भाकपा आदि के विरोध के चलते फिलहाल सरकार को टाल देना पड़ा। प्रदेश में कई नये बिजली घर निजी क्षेत्र में बनवाये जा रहे हैं। पावर कारपोरेशन में निर्माण से वितरण तक निजी क्षेत्र और ठेकेदारी प्रथा हावी है। इसके चलते परीछा और हरदुआगंज परियोजनाओं में निर्माणाधीन चिमनियां गिर गईं।
निजीकरण की दूसरी बड़ी गाज सरकारी और सहकारी चीनी मिलों पर गिरी है। चीनी मिलों की बिक्री की प्रक्रिया शुरू हुई और  चालू चीनी मिलें बेच डाली गईं। इनमें से पांच सबसे अच्छी चीनी मिलों को बसपा सुप्रीमो के चहेते पौंटी चढ्ढा को बेच दिया गया। वे हैं - बिजनौर, बुलन्दशहर, अमरोहा, चांदपुर एवं सहारनपुर। इनकी बिक्री निर्धारित न्यूनतम मूल्य से भी कम पर की गई। पांचों मिलें आधे से भी कम मूल्य पर बेच डाली गईं। चांदपुर चीनी मिल के लिये सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी इंडियन पोटाश लि. ने 93 करोड़ रूपये का टेंडर डाला था, लेकिन वह अस्वीकार हो गया। आखिर क्यों? शेष चीनी मिलें जो इंडियन पोटाश लि. ने खरीदी हैं वे घाटे में थीं और उनकी पेराई क्षमता से भी कम थी। फिर भी वे निर्धारित मूल्य से अधिक पर खरीदी गई हैं। ये बड़ा घोटाला है जिसकी सीबीआई जांच की मांग हम करते रहे हैं।
राज्य सरकार स्वास्थ्य सेवाओं का भी निजीकरण चाहती है। गरीब महंगे नर्सिंग होम्स में इलाज नहीं करा सकते, वे राजकीय चिकित्सालयों पर निर्भर हैं। सरकार ने उनको भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा संचालित अस्पतालों को सौंपने की कोशिश की। बस्ती, इलाहाबाद, कानपुर और फिरोजाबाद जनपदों के चार सरकारी जिला स्तरीय अस्पतालों और सैकड़ों प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों को निजी अस्पतालों को बेचने का निर्णय ले लिया गया। भाकपा ने इसका पुरजोर विरोध किया और सरकार को अपने कदम पीछे खींचने पड़े।
शिक्षा, सड़क निर्माण, भवन निर्माण, सफाई आदि सभी कामों को भी निजी क्षेत्र के हवाले किया जा रहा है। प्रदेश की बन्द कताई-बुनाई मिलों को चलाया नहीं जा रहा है। उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम को भी सरकार पीपीपी माडल के तहत बेचना चाहती है। दिग्गज कंपनियों की लक्जरी बसें पहले ही अनुबंध के आधार पर चलाई जा रही हैं।
सरकार की कुनीतियों के चलते मुरादाबाद का पीतल उद्योग, अलीगढ़ का ताला एवं हार्डवेयर उद्योग, भदोही का कालीन, बनारस, मऊ, मुबारकपुर का साड़ी, कानपुर का चमड़ा उद्योग सभी बरबाद हो रहे हैं। यही हाल आगरा के जूता उद्योग का है। सरकारी संरक्षण के अभाव, बिजली बकायों की मार और भारी प्रतिस्पर्धा के कारण हैण्डलूम और पावरलूम उद्वोग बड़े संकट से गुजर रहा है। तमाम बुनकर बेरोजगार बन चुके हैं। बीड़ी उद्योग में भी संकट है।
ऊपर से सरकार ने श्रम कानूनों का ही अपहरण कर लिया। उद्योगों में कार्यरत मजदूर सेवायोजकों की तानाशाह कार्यवाहियों के शिकार हो रहे हैं। असंगठित मजदूर, ठेका प्रथा, कम मजदूरी और अल्प समय रोजगार की यातना से जूझ रहे हैं। मनरेगा मजदूर भी सताये जा रहे हैं। काम के घंटे बढ़ाकर 10-12 घंटे तय कर दिये गये हैं। इससे श्रमिक असंतोष बढ़ रहा है। श्रमिकों के विरोध करने पर सख्त पुलिस कार्यवाहियां की जाती हैं और छंटनी, तालाबंदी, ले आउट कर उन्हें बेरोजगारी की गर्त में धकेल दिया जाता है।
महंगाई के प्रति मुजरिमाना उदासीनता
यद्यपि महंगाई की छलांग के लिये केन्द्र सरकार मुख्य तौर पर जिम्मेदार है लेकिन राज्य सरकार जिसकी प्राथमिकता में आम आदमी है ही नहीं ने भी महंगाई को काबू में रखने हेतु अपने स्तर के प्रयास नहीं किये।
केन्द्र सरकार बार-बार पेट्रोल के दाम बढ़ा देती है। डीजल, रसोई गैस, व केरोसिन के दाम भी बढ़ाये गये हैं। इन तीनों से सरकारी अनुदान हटाने की बार-बार धमकी केन्द्र सरकार देती है। अब खुदरा बाजार को विदेशी कंपनियों के लिये पूरी तरह खोल दिया गया है। पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने से सभी वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती हैं। इन पर केन्द्र और राज्य सरकार के कई टैक्स लगते हैं। उदाहरण के लिये पेट्रोल की मूल कीमत 48 रूपये के लगभग है। इस पर 31 रूपये टैक्स है। इसमें से लगभग आधा राज्य सरकार के हैं। यदि राज्य सरकार उसमें कटौती कर दे तो उपभोक्ताओं को कुछ राहत मिल सकती है। महंगाई पर भी थोड़ा असर पड़ सकता है। पर सरकार इससे साफ मुकरती रही है।
सार्वजनिक प्रणाली को दुरूस्त और विस्तारित करके भी महंगाई को काबू में किसी हद तक लाया जा सकता है। लेकिन राज्य सरकार ने तो सार्वजनिक वितरण प्रणाली को पंगु बना कर रख दिया है। उसमें भारी भ्रष्टाचार है। जब सरकार सत्ता में आई थी तो राशन की दुकानें सस्पेन्ड कर दी थीं। लेकिन बाद में पुनः उन्हीं डीलरों के हवाले कर दी गईं। राज्य में जमाखोरी और कालाबाजारी पर कोई अंकुश नहीं। खाद्य पदार्थों के अलावा रासायनिक खादों की भारी काला बाजारी होती है। कृषि उत्पादन बढ़ा कर उसका उचित मूल्य किसानों को दिलाकर और जरूरी चीजों को नियंत्रित दामों पर जनता तक पहुंचा कर महंगाई को कुछ हद तक घटाया जा सकता है।
सार्वत्रिक भ्रष्टाचार
केन्द्र सरकार की ही भांति और अपनी पूर्ववर्ती सपा सरकार के पदचिन्हों पर चलते हुये मौजूदा सरकार भारी भ्रष्टाचार में लिप्त है। खुद मुख्यमंत्री पर आय से अधिक सम्पत्ति अर्जित करने की जांच सीबीआई द्वारा की गई है और मामला विचाराधीन है। सरकार के दर्जन भर मंत्री आय से अधिक सम्पत्तियों, सरकारी/गैर सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे, अवैध खनन तथा विभागीय भ्रष्टाचारों के आरोपों से घिरे हैं। छवि बचाने को कई को सरकार से हटाया गया तो कई को पार्टी से निष्कासित किया गया है। जरूरत के मुताबिक मयावती उन्हें पुनः वापस ले लेती हैं। कई मंत्रियों के खिलाफ लोकायुक्त की जांच चल रही है। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में बड़ा घोटाला हुआ और 3 डाक्टरों की हत्या हो चुकी है। अब सीबीआई जांच जारी है। मनरेगा में भारी भ्रष्टाचार है जिसकी भी सीबीआई जांच जरूरी है। सरकारी उपक्रमों को बेचने, नौकरियों में भर्ती, ट्रान्सफर एवं पोस्टिंग, फायर सर्विस में खरीद, प्राईवेट कंपनियों से बिजली खरीद, हर विभाग में हो रही खरीद-फरोख्त आदि में सरे आम लूट मची है। थानों में रपट लिखाना हो या अन्य सरकारी विभागों में छोटे से छोटा काम हो, बिना रिश्वत के असम्भव है। सांसद, विधायक निधि की धनराशि का बड़ा भाग भी भ्रष्टाचार की राह निकाला जा रहा है। पूंजीवादी दलों के नेताओं, अफसरों और दलालों की दिन दूनी रात चौगुनी होती जाती संपत्तियां इस बात का सीधा प्रमाण हैं कि प्रदेश में भ्रष्टाचार ने कैंसर का रूप धारण कर लिया है। इसके खिलाफ बड़े जनान्दोलन की जरूरत है। दूसरे दल की सरकार बन जाने मात्र से समस्या का समाधान होने वाला नहीं है।
बेरोजगारी और शिक्षा का बाजारीकरण
मौजूदा प्रदेश सरकार का यह अंतिम दौर है। गत साढ़े चार वर्षों में सरकार ने बेरोजगारी को कम करने को कोई प्रयास नहीं किया। उद्योग बन्द हो रहे हैं। खेती का निगमीकरण और मशीनीकरण हो रहा है। संगठित उद्योग में उच्च तकनीकी और मशीनरी इस्तेमाल हो रही है। सरकार नई भतियों पर कम बैकलाग भरने पर ज्यादा जोर दे रही है। हर विभाग में तमाम जगहें खाली हैं। हर साल उत्तर प्रदेश में बेरोजगारों की संख्या में नये पांच लाख लोग जुड़ जाते हैं। बड़ी तादाद में नौजवान रोजगार के लिये दूसरे प्रदेशों में जाने को मजबूर हैं - खासकर पूर्वांचल और बुन्देलखंड से। इस स्थिति को बदले जाने की जरूरत है।
किसी भी देश की तरक्की का बुनियादी आधार शिक्षा है। वह भी ऐसी जो सभी को समान रूप से सुलभ हो। पर यहां दोहरी शिक्षा प्रणाली को और बढ़ावा दिया जा रहा है। प्राथमिक से डिग्री स्तर तक शिक्षा को निजी लोगों की दुकान बनाया जा रहा है। भारी शुल्क दरों के चलते गरीब छात्र शिक्षा से वंचित हो रहे हैं। जो पढ़ पा रहे हैं वे कर्ज लेकर, गहने और जमीन बेचकर पढ़ पा रहे हैं। हर नेता तथा बड़े व्यापारी ने स्कूल खोल दिये हैं जो लूट का अड्डा बने हैं। हमें शिक्षा का बजट बढ़ाने और सभी को समान शिक्षा दिलाने के अभियान को तेज करना होगा।
दलितों, खेत मजदूरों व आदिवासियों की स्थिति
प्रदेश में बड़ी संख्या में दलितों, भूमिहीनों, गरीबों और आदिवासियों की संख्या है। इस बीच छोटा किसान कृषि से हाथ धो बैठा है और भूमिहीनों की कतारों में शामिल होता जा रहा है। इनकी संख्या बढ़ कर लगभग 76 प्रतिशत हो गई है। गरीबी की सीमा के नीचे जाने वाले ये लोग भुखमरी के शिकार हो रहे हैं। इनके उत्थान के लिये चलाई जा रही सरकारी योजनाओं में भारी भ्रष्टाचार है। इन पर बड़ी संख्या में हमले हो रहे हैं। इन्हें इस दरम्यान फालतू जमीनें न तो आबंटित की गईं और जो पहले आबंटित थीं, उन पर कब्जे नहीं दिलाये गये। भूमाफियाओं, पुराने जमींदारों, पूंजीपतियों, नेताओं और अफसरों ने इनकी तमाम जमीनों पर कब्जा कर रखा है। सरकार की इच्छाशक्ति उन पर कार्यवाही करने की नहीं है। यहां तक सीलिंग कानून को भी ठंडे बस्ते में डाल रखा है। आदिवासी तो अपने ही क्षेत्र में बेगाने बना दिये गये हैं। आदिवासी अधिनियम पारित होने के बावजूद उनके जंगल, जमीन, जल पर माफियाओं का कब्जा है। उनमें से अनेक को नक्सलवादी बताकर प्रताड़ना दी जाती है।
सामाजिक-आर्थिक समता हासिल करने के लिये संघर्ष और वर्ग-संघर्ष की जरूरत है। इसके लिये इन तबकों को संगठित करने तथा उनमें संघर्ष की चेतना जगाने की जरूरत हैं। यह भी बताना होगा कि जाति विशेष के व्यक्ति विशेष को सत्ता मिल जाने भर से उनका कोई लाभ कहां हुआ है। दलितों, आदिवासियों, खेत मजदूरों के सरोकार एक ही हैं, अतएव उनके संघर्षों को प्रगाढ़ रूप देना होगा।
अल्पसंख्यकों के हालात

उत्तर प्रदेश के अल्पसंख्यक खासकर मुस्लिम अल्पसंख्यक हर क्षेत्र में बेहद पिछड़े हैं। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट से इनकी स्थिति का पूरी तरह खुलासा हो गया है। इनमें अधिकतर छोटे-छोटे दस्तकार हैं। सर्वाधिक तादाद बुनकरों की है। इसके बाद लोहार, बढ़ई, नाई, अब्बासी जैसे ग्रुप आते हैं। उदारीकरण की नीतियों ने इनको और अधिक बरबाद किया है। बिडंबना यह है कि पूंजीवादी राजनैतिक दल इनकी भावनाओं का दोहन करते हैं - मूल समस्याओं पर ध्यान नहीं देते। भाकपा को इनकी मूल समस्याओं पर अपने आन्दोलन को केन्द्रित करना चाहिये।
उत्तर प्रदेश का विभाजन
उत्तर प्रदेश को बांटकर अलग राज्य बनाने की मांग लगभग 2 दशक से चलती आ रही है। लेकिन कड़वा सच यह है कि इस मांग कांे बहुमत जनता का समर्थन कभी नहीं मिला। किसी भी हिस्से में कोई बड़ा आन्दोलन भी नहीं चला, सिर्फ बुन्देलखण्ड को छोड़कर जहां जब तब छिटपुट धरने/प्रर्दशन/विचार गोष्ठियां होते रहते हैं।
सच पूछा जाये तो राज्य विभाजन जनता का मुद्दा है ही नहीं। यह राजनीतिज्ञों द्वारा पैदा किया हुआ एक शिगूफा है, जिसे वे अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए उछालते रहते हैं। अब ताजा प्रयास बसपा सुप्रीमो मायावती ने किया है। सभी जानते हैं कि वे गत साढ़े चार सालों में हर मोर्चे पर पूरी तरह विफल साबित हुई हैं। मायावती इससे आम लोगों का ध्यान बांटना चाहती हैं। पहले धर्म, फिर जाति और अब क्षेत्रीय आधार पर जनता को विभाजित कर पूंजीवादी ताकतें अपने को सत्ता केन्द्र पर काबिज रखना चाहती हैं। इसके लिए उन्हें राज्य का विभाजन एक अच्छा हथकंडा लगता है।
जहां तक यह तर्क कि क्षेत्रीय विकास के लिए छोटे राज्यों का होना आवश्यक है, एक बेहद भौंडा तर्क है। विकास राज्य सत्ता की इच्छा शक्ति और संसाधनों के सही बंटवारे तथा उसके उपयोग से होता है। छोटे राज्य बना देने मात्र से नहीं। विभाजित राज्यों के अलग-अलग प्रशासनिक ढ़ांचों को खड़ा करने और उन्हें चलाने में भारी धन व्यय होता है, जिससे बुनियादी विकास की धनराशि में कटौती हो जाती है। विकास के लिए आबंटित धन का बड़ा भाग भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है।
विभाजित होने के बाद नया राज्य बना क्षेत्र यदि पिछड़ा है तो और भी पिछड़ जाता है। उसका अपना राजस्व पर्याप्त होता नहीं। वह अधिकाधिक केन्द्र की सहायता पर निर्भर रहता है। केन्द्र में एवं राज्य में यदि अलग-अलग दलों की सरकारें हों तो टकराव के चलते छोटे राज्य की उपेक्षा ही होती है।
यह कहना कि अलग राज्य बन जाने से औद्योगीकरण बढ़ जाएगा, कतई सच नहीं। आर्थिक नव उदारवाद की नीतियों के चलते सार्वजनिक क्षेत्र को बेचने की नीतियां चल रही हैं तो सार्वजनिक क्षेत्र में किसी राज्य में नए उद्योग तो खुलने से रहे। निजी क्षेत्र के उद्यमों को उद्यमी अपनी प्राथमिकता से लगाते हैं। क्षेत्र की जरूरतों के मुताबिक नहीं। उद्योगपतियों को आकर्षित करने को सरकारें किसानों की जमीनों का जबरिया अधिग्रहण करती हैं और उन्हें उद्योगपतियों को सौंप देती हैं। उद्योगपति कुछ दिन उस पर उद्योग चलाते हैं और बाद में जमीन की कीमत बढ़ जाने पर उसे बेच डालते हैं। किसान चंद पैसे पाकर जीवन भर को भूमिहीन हो जाता है।
सबसे बड़ी बात है हाल में बने छोटे राज्यों - उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार चरम पर है। पूंजी ओर पूंजीपतियों, राजनेताओं और दलालों द्वारा संसाधनों की खुली लूट जारी है। आम जनता और शोषित तबकों की सामूहिक सौदेबाजी की ताकत बंटकर कमजोर हो गयी। पूंजीपतियों को छोटे राज्यों की सरकारों को मैनेज करना आसान होता है। दौलत के बल पर वे छोटी विधान सभा के बहुमत को काबू में कर लेते हैं और मनमाने फैसले करा लेते हैं। खनिज, भूमि, वन संपदा और विकास के धन को हड़प कर जाते हैं।
आज उत्तर प्रदेश, जोकि 17 करोड़ की आबादी वाला प्रदेश है, देश की राजनीति में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इससे उत्तर प्रदेश का हर नागरिक गौरव महसूस करता है। हिन्दू-मुसलिम साझी संस्कृति के तमाम प्रतीक उत्तर प्रदेश के आगोश में हैं। पश्चिम का वाशिंदा बनारस, सारनाथ, गोरखपुर, प्रयाग जाकर अपने को धन्य समझता है तो पूरब के वाशिंदे ताजमहल, मथुरा, झांसी का दीदार करते हैं। यह संयुक्त उत्तर प्रदेश की रंगत है।
उत्तर प्रदेश का बुन्देलखंड, पूर्वांचल एवं मध्य का भू-भाग पिछड़ा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश अपेक्षाकृत अधिक खुशहाल है। उसके द्वारा अदा किए गए राजस्व से इन पिछड़े क्षेत्रों के विकास का पहिया घूमता है। यह प्रदेश के अंदर एक स्वाभाविक समाजवाद है। इसे तोड़कर हम इन अपेक्षाकृत पिछड़े क्षेत्रों को क्यों केन्द्र का मोहताज बनायें? किसी दल या नेता की राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के औजार हम क्यों बनें? क्यों हम विभाजन की पीड़ा को अपने ऊपर थोपें? यह सब करने को हम तैयार नहीं हैं - यह उत्तर प्रदेश की जनता का संकल्प है।
उत्तर प्रदेश के राजनीतिक दल
प्रदेश में लगभग 25 सालों में सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक उथल-पुथल काफी तेज रही है। इसके चलते राष्ट्रीय राजनैतिक दल हाशिये पर चले गये हैं। नये क्षेत्रीय दल जो जाति की राजनीति कर रहे हैं, ने यहां अच्छा वर्चस्व स्थापित कर लिया है।
कांग्रेस
देश में अभिकतर शासन इसी पार्टी कारहा है। उत्तर प्रदेश में भी आजादी के बाद काफी अर्से तक इसने राज किया। आजादी के आन्दोलन की विरासत जैसे-जैसे चुकती गई और कांग्रेस का अवसरवाद ज्यों-ज्यों बेनकाब होता गया, यह पार्टी कमजोर होती चली गई और इसका दलित, अल्पसंख्यक एवं सवर्ण जनाधार इससे खिसकता चला गया। आज प्रदेश में यह चौथे स्थान पर है। गत विधान सभा चुनाव में यह यथास्थिति ही हासिल कर पाई थी लेकिन लोकसभा चुनाव में इसने उल्लेखनीय 20 सीटें हासिल कर लीं और केन्द्र में सरकार बनाने में प्रदेश की भूमिका रही। आज वह फिर अपने जनाधार की पुनर्वापसी के लिए छटपटा रही है। पर इसके लिये वह कोई ठोस नीतिगत बदलाव करने के बजाय सोनिया-राहुल के करिश्मे पर ही निर्भर है। राहुल गांधी नित नये नाटक प्रदेश में करते रहते हैं।
लेकिन आर्थिक नव उदारीकरण की नीतियों पर अमल करने के कारण महंगाई एवं भ्रष्टाचार ने जड़ें तो जमाई ही हैं, कृषि, उद्योग, रोजगार, शिक्षा का संकट गहराया है। इससे इस पार्टी का पहिया उत्तर प्रदेश में गहरे दलदल में फंस गया है। आगामी विधान सभा चुनाव में वह फिर सिमट जायेगी और पिछली विधान सभा की स्थिति भी ले दे के ही अख्तियार कर पायेगी - भले ही उसने रालोद से गठबंधन की कवायद जारी रखी हो।
भाजपा
प्रदेश में भाजपा आज भी तीसरे पायदान पर खड़ी है। राम जन्मभूमि का मुद्दा अब काम नहीं आ रहा, धारा 376 तथा कामन सिविल कोड़ के उसके मुद्दे भी अब वो दोहरा नहीं पा रही। वह यदा-कदा साम्प्रदायिक हथकंडे अपनाती है और आतंकी घटनाओं पर राजनैतिक रोटियां सेकने का प्रयास करती है लेकिन रोजी-रोटी के लिये संघर्ष कर रही जनता पर उसका कोई असर नहीं हो पा रहा। वह आर्थिक नव उदारवाद की नीतियों की खुली पोषक है, अतएव महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और महंगी शिक्षा जैसे सवालों पर औपचारिक आवाज उठाकर चुप हो जाती है। भ्रष्टाचार में इसके नेताओं के लिप्त होने के कारण उसके नेता की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम मखौल बन कर रह गई। यू.पी. विधान सभा चुनावों में वोटों को बरगलाने के लिये इसके तमाम क्षत्रपों द्वारा की गई कथित ‘जन स्वाभिमान यात्रा’ भूखी-नंगी जनता के दिल में स्वाभिमान जगाने में असमर्थ रही और इसकी सभाओं से भीड़ नदारद रही। उत्तर प्रदेश में सत्ता पाने को आतुर यह पार्टी बुरी तरह छटपटा रही है। इसने उभा भारती जो बाबरी मस्जिद गिराने की मुख्य गुनहगार हैं, को लोध वोट हथियाने को आयात किया है। पूरी तरह साम्प्रदायिकता में रंगी यह पार्टी जातिवाद और क्षेत्रीयता को भी अपना औजार बनाती है। राज्य विभाजन के मुद्दे को भी भुनाने में उसे गुरेज नहीं। अतएव आगामी विधान सभा चुनावों में वह अपनी पिछली हैसियत को भी हासिल कर पायेगी, इसमें सन्देह है।
बहुजन समाज पार्टी
शोषित-पीड़ितों को न्याय दिलाने के नाम 1984 में इस पार्टी का गठन किया गया लेकिन आज यह अपने घोषित मुद्दों से पूरी तरह दूर जा चुकी हैं। गत विधान सभा चुनावों में इसने पूर्ण बहुमत प्राप्त किया था लेकिन बुनियादी नीतियों से हट जाने के कारण इसे लोकसभा चुनावों में उतनी सफलता नहीं मिली। दलितों को सत्ता में भागीदारी दिलाने के इसके नारे के चलते दलित वोट कांग्रेस एवं भाकपा से अलग हो बसपा के साथ हो लिया। लेकिन अब कथित सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर सामान्य जातियों के माफिया, बाहुबली और सामंतों को सत्ता में भागीदारी देकर इसने बहुमत भले ही हासिल कर लिया हो लेकिन आज इसके दलित वोट बैंक में हताशा है। वह कुछ न कुछ तादाद में बसपा से खिसक रहा है। आर्थिक नव उदारवाद की नीतियों पर यह खुलकर चल रही है। महंगाई, भ्रष्टाचार एवं बेरोजगारी की समस्याओं के निदान में पूरी तरह असमर्थ रही है। कानून-व्यवस्था के सवाल पर इसे सत्ता मिली थी जिसे यह संभाल नहीं पाई। शोषित तबके के आदर्श महापुरूषों के प्रतीक स्थल बनवाने का काम अच्छा है लेकिन इसके नाम पर करोड़ों-करोड़ रूपये के जनता के धन को जुटाना कदापि उचित नहीं कहा जा सकता। जनता में इसके प्रति आक्रोश है। अतएव भावी विधान सभा में इसकी सदस्य संख्या घटेगी जरूर।
समाजवादी पार्टी
पिछले साढ़े चार सालों से सपा सत्ता से बाहर है। अब वह सत्ता हासिल करने के लिए छटपटा रही है। इसके युवराज क्रान्ति रथ लेकर पिता की तर्ज पर यात्रा में निकल पड़े हैं। प्रदेश की दूसरे नम्बर की पार्टी होने के नाते कुछ भीड़ भी जुट रही है लेकिन मुद्दाविहीन उनका यह अभियान बहुत असर जनता पर नहीं डाल पा रहा। दूसरे - भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों से घिरी सपा महंगाई के सवाल पर भी लड़ नहीं पा रही। उलटे इसने परमाणु करार हो या महंगाई केन्द्र सरकार का साथ दिया। इससे जनता की निगाहों में वह उठ नहीं पा रही। विपक्ष की भूमिका निभा नहीं पा रही। आर्थिक नव उदारवाद की नीतियों की यह पूरी तरह पोषक है। साम्प्रदायिकता के पृष्ठभूमि में चले जाने के कारण इसकी मुस्लिम वोट बैंक पर पकड़ कमजोर हुई है। केवल एक जाति के वोट पर ही इसे ज्यादा भरोसा है। सत्ता के विरोध का लाभ यह अपनी कमजोर नीति और रणनीति के कारण उठा नहीं पा रही। अतएव प्रदेश की राजनीति में यह वहीं के वहीं कदमताल कर रही है और आगामी विधान सभा चुनावों में किसी उल्लेखनीय सफलता के प्रति वह खुद आश्वस्त नहीं है।
राष्ट्रीय लोकदल
यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में केन्द्रित एक जाति के आधार वाला क्षेत्रीय दल है। यह किसान हित की बात करता है पर उनके हित में कोई ठोस कार्यक्रम उसके पास नहीं है। पिता की विरासत और हरित प्रदेश के नाम पर राजनीति चलाई जा रही है। सत्ता सुख भोगने को किसी सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल होना इसका स्वाभाविक गुणधर्म है। पुनः वे कांग्रेस गठबंधन का भाग बनने जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में गठबंधन राजनीति से वे हमेशा लाभ में रहे हैं। इस बार भी उनकी नजर अपने लाभ पर टिकी है।
कांग्रेस हो या भाजपा, बसपा हो या सपा आज उत्तर प्रदेश में ठहराव की स्थिति में हैं अथवा पीछे जाने की। यही वजह है कि इन चारों के तमाम नेता दल-बदल रहे हैं और दूसरे-दूसरे दलों में शामिल हो रहे हैं।
वामपंथी
साम्प्रदायिक एवं जातिगत राजनीति के चलते गत 25 सालों में वामपंथी दल प्रदेश में हाशिये पर चले गये थे। इनका मूल जनाधार - खेतिहर मजदूर, किसान और औद्योगिक मजदूर साम्प्रदायिक एवं जातिगत आधार पर विभाजित होकर इनसे दूर हो गया। फलतः पिछली तीन लोकसभाओं में उत्तर प्रदेश से भाकपा तथा माकपा का कोई सांसद नहीं चुना जा सका। गत विधान सभा और वर्तमान विधान सभा में भाकपा का कोई विधायक नहीं चुना गया। माकपा के दो विधायक गत विधान सभा में चुने गये थे लेकिन वर्तमान में उनका भी कोई विधायक नहीं है। 1952 के बाद से यह पहला अवसर है जब विधान सभा में वामपंथ कोई प्रतिनिधि नहीं है।
उत्तर प्रदेश में भाकपा वामपंथ का मुख्य दल है। इसके बाद माकपा है। कई जिलों में फारवर्ड ब्लाक एवं आरएसपी के कुछ कार्यकर्ता मौजूद हैं। भाकपा माले का संगठन कुछ जिलों में कार्यरत है। गत दिनों भाकपा ने लगातार तमाम सवालों पर आन्दोलन चलाये हैं। इससे उसकी मारक क्षमता बढ़ी है तथा जनता में साख बढ़ी है। कई आन्दोलन वामपंथी दलों को साथ लेकर चलाये हैं जिनमें हमारी नेतृत्वकारी भूमिका रही है। इन संघर्षों को और तीखे तथा व्यापक बनाकर और संघर्षों तथा संगठन के बल पर चुनावों में भी संतुलित भागीदारी कर पार्टी और वामपंथ को उत्तर प्रदेश में पुनःस्थापित किया जा सकता है। आगामी दिनों में इस चुनौती को स्वीकार करना ही होगा।
अन्य दल
प्रदेश में छोटे-छोटे कई दल कुछ-कुछ पाकेट्स बनाये हुये हैं। इस बीच पीस पार्टी तेजी से उभरती दिखाई दी। यह पिछड़े मुसलमानों का संगठन था जो मोमिन कांफ्रेंस के बरक्स खड़ा हो रहा था। लेकिन इस दल ने हर दल के निष्कासितों को चाहे वे गुंडे-मवाली ही क्यों न हों, शामिल करना शुरू कर दिया। फिर गोरखपुर के सांसद और हिन्दू युवा वाहिनी के सर्वेसर्वा महन्त आदित्य नाथ से इसके रिश्तों की चर्चा ने जोर पकड़ा। इससे इसका उभार थम गया और लोगों का इससे विश्वास हटने लगा है। फिर भी अंसारी मुसलमानों में इसके प्रति झुकाव है क्योंकि इसके नेता इसी जमात से हैं। अभी इसमें विभाजन भी हुआ है। आने वाले चुनावों में या तो पीस पार्टी किसी बड़े दल से सौदेबाजी कर उसके साथ लड़ेगी या फिर वोट कटवा पार्टी साबित होगी।
इसके अलावा जनता दल (से.) जनता दल (यू.), राजद, लोक जनशक्ति पार्टी, राष्ट्रवादी कांग्रेस, इंडियन जस्टिस पार्टी, भारत समाज पार्टी, अपना दल, जनवादी पार्टी, नेलोपा, कौमी एकता दल, लेबर पार्टी आदि दो दर्जन से अधिक पार्टियां हैं जो अपने नेता की जाति या किसी नामी गिरामी नेता के नाम पर चल रहीं हैं। इनमें से कई किसी पूंजीवादी दल से समझौता कर कुछ सीटें और पैसा हासिल करने की जुगत में लगी हैं तो कई वामपंथ के साथ आ सकती हैं।
मौजूदा परिप्रेक्ष्य में उत्तर प्रदेश में राजनीतिक कार्यनीति
केन्द्र और राज्य सरकारों की विवेच्य नीतियों के चलते जनता में उनके प्रति तीखा आक्रोश है। केन्द्रीय और उत्तर प्रदेश के स्तर पर भाजपा और प्रदेश स्तर पर समाजवादी पार्टी इस आक्रोश को भुनाने में जुटी हैं। लेकिन इनकी नीतियों और कारगुजारियों से वाकिफ जनता उनकी ओर आकर्षित नहीं हो रही है। कांग्रेस एवं बसपा की स्थिति में गिरावट है तो भाजपा एवं सपा की स्थिति में आकर्षणहीन ठहराव। बसपा अपने को अव्वल दिखाने की कोशिशों में जुटी है तो अन्य तीनों उसकी मुख्य प्रतिद्वंदी होने का दावा करने में जुटी हैं। चारों दलों से प्रतिदिन दर्जनों नेता व कार्यकर्ता पलायन कर रहे हैं। प्रदेश की राजनीति एक विकल्पशून्यता की स्थिति में है।
इस विकल्प शून्यता को जनता के सवालों पर गंभीरता से जनान्दोलन खड़ा कर तोड़ने के बजाय घिसे-पिटे और सिद्धांतहीन हथकंडे अपना कर जाति-पांति के गठजोड़ और नाटकबाजी करके चुनावी सफलता हासिल करने के फार्मूले तलाशे जा रहे हैं। प्रदेश की जनता उनके इन झांसों में फंस नहीं रही है।
इसके विपरीत भाकपा ने भूमि अधिग्रहण, महंगाई, भ्रष्टाचार के विरूद्ध तथा जनता के विभिन्न शोषित-पीड़ित तबकों की समस्याओं के समाधान के लिये एक के बाद एक तमाम आन्दोलन किये हैं जिनमें से कई में वामपंथी दलों तो कई अन्य में दूसरे दलों को शामिल किया गया है।
इसी रोशनी में भाकपा राज्य कार्यकारिणी ने 13 मार्च 2011 को अपनी महत्वपूर्ण बैठक में फैसला लिया कि भाकपा अब आर्थिक नवउदारवाद की पोषक, भ्रष्टाचारी और जातिवादी पार्टियों के साथ अपने भविष्य को नहीं बांधेगी। भाकपा चारों वामपंथी दलों को एक जुट करेगी और उसके बाद कुछ धर्मनिरपेक्ष छोटे दलों को भी साथ जोड़ने का प्रयास करेगी। अच्छी बात है कि चारों वामपंथी दलों में इस मुद्दे पर सहमति बन गई है और मिल कर चुनाव लड़ा जाना तय हो गया है। इसका आम जनता, मीडिया, वामपंथ समर्थकों तथा स्वयं अपने कार्यकर्ताओं में अच्छा संदेश गया है।
अतएव पार्टी द्वारा किये गये आन्दोलनों से अर्जित ऊर्जा और सांगठनिक स्थिति के आधार पर प्रदेश में एक संतुलित संख्या में सीटें लड़ी जायें और विधान सभा में खाता खोलने का पुरजोर प्रयास किया जाये। हमें जनता के सामने खुलकर अपना पक्ष रखना है कि हम उसके सवालों पर सड़कों पर अनवरत संघर्ष चलाते हैं और यदि भाकपा प्रत्याशियों को जनता सफल बनायेगी तो उन संघर्षों को विधान सभा के पटल पर भी लड़ा जायेगा।
भविष्य की प्रमुख कार्यवाहियां
  1. विभिन्न गैर सरकारी परियोजनाओं के लिये किसानों की उपजाऊ जमीनों के अधिग्रहण के विरूद्ध सघन अभियान। भूमि अधिग्रहण कानून 1894 को पूरी तरह बदलवाने को आवाज उठाना। अधिगृहीत जमीनों का वाजिब मुआवजा दिलाना।
  2. किसानों की जरूरत की चीजों को उचित कीमत पर दिलाने तथा उनकी उपजों का वाजिब मूल्य दिलाने का अभियान।
  3. बन्द हो रहे उद्योग, सार्वजनिक क्षेत्र के निजीकरण एवं संगठित व असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की रक्षा के लिए अभियान।
  4. दलितों, भूमिहीनों, खेत मजदूरों की समस्याओं तथा व्यापक भूमि सुधार के लिये आन्दोलन।
  5. सार्वजनिक वितरण प्रणाली को व्यापक और कारगर बनाने तथा पेट्रोलियम पदार्थों पर राज्य के करों को कम करने को अभियान ताकि महंगाई पर अंकुश लगे।
  6. मनरेगा को सख्ती से लागू कराने, इसमें तथा अन्य राजकीय योजनाओं में भ्रष्टाचार को उजागर करने और उसे रोकने का अभियान।
  7. शिक्षा के बाजारीकरण पर रोक, सभी को समान शिक्षा एवं रोजगार के लिये युवा एवं छात्रों का अभियान।
  8. महिलाओं के उत्पीड़न, भ्रूण हत्या के विरोध में तथा महिलाओं के सशक्तीकरण के लिये जनजाग्रति अभियान।
  9. पर्यावरण, जल संकट, वायु व नदियों के प्रदूषण पर जनजागरण।
  10. अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा और उनके विकास के लिये, सच्चर कमेटी की सिफारिशें लागू कराने को विशेष अभियान।
  11. सभी को सस्ता इलाज सुलभ कराने को अभियान।
  12. बुनकरों, छपाई करने वालों, बीड़ी मजदूरों, दस्तकारों तथा असंगठित क्षेत्र के अन्य मजदूरों एवं आदिवासियों की समस्याओं पर आन्दोलन एवं संगठन का निर्माण।
  13. भ्रष्टाचार उजागर करने को सूचना के अधिकार का प्रयोग। नीचे तबके के भ्रष्टाचार को रोकने को हस्तक्षेप।
  14. प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों में जहां प्रत्याशी लड़ाये जाने हैं, वहां आन्दोलन व बूथ स्तर पर संगठन खड़ा करना।
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भाकपा अलीगढ़ से 16 नवम्बर को करेगी विधान सभा चुनावों हेतु अभियान का आगाज़

लखनऊ 12 दिसम्बर। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का 21वाँ राज्य सम्मेलन 16 से 18 दिसम्बर 2011 को अलीगढ़ के हबीब गार्डन में सम्पन्न होगा, जिसमें पूरे प्रदेष से निर्वाचित 400 प्रतिनिधि भाग लेंगे।
सम्मेलन के पूर्व अलीगढ़ में एक जुलूस 16 दिसम्बर को 11.00 बजे से निकाला जायेगा जो एक जनसभा में परिवर्तित हो जायेगा। जनसभा को भाकपा महासचिव ए. बी. बर्धन, उप महासचिव एस. सुधाकर रेड्डी (पूर्व सांसद), भाकपा के केन्द्रीय सचिव मंडल के सदस्य गुरूदास दासगुप्ता (सांसद) तथा अतुल कुमार अंजान, केन्द्रीय कार्यकारिणी सदस्य सैय्यद अज़ीज पाषा (सांसद), भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीष आदि सम्बोधित करेंगे।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के 21वें राज्य सम्मेलन में विमर्ष ”संवेदनषील, संघर्शषील और मजबूत वामपंथी विकल्प के निर्माण“ तथा ”किसानों, मजदूरों, छात्रों और नौजवानों के बुनियादी सवालों पर जनान्दोलन“ की रणनीति पर केन्द्रित होगा। भाकपा यह महसूस करती है कि केन्द्र एवं राज्य सरकारों द्वारा चलाई जा रही पूंजीवादी नीतियों के परिणामों - महंगाई, भ्रश्टाचार, भुखमरी, बेरोजगारी आदि के फलस्वरूप जनता के तमाम तबकों में बेचैनी है और प्रदेष की जनता कांग्रेस, बसपा, सपा और भाजपा के विकल्प की तलाष कर रही है और भाकपा अपने राज्य सम्मेलन में इसी विकल्प को प्रस्तुत करने के लिए रणनीति तैयार करेगी।
यहां जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में भाकपा ने अस्तित्वहीन तमाम राजनीतिक दलों द्वारा विधान सभा की सभी सीटों पर लड़ने के दावे को हास्यास्पद तथा कांग्रेस-लोकदल के मध्य हुये समझौते को दो हताष दिलों का मिलन बताया। इससे उत्तर प्रदेष विधान सभा चुनावों पर कोई विषेश प्रभाव नहीं पड़ेगा।
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बुधवार, 30 नवंबर 2011

भाकपा का 21वाँ राज्य सम्मेलन 16 से 18 दिसम्बर को अलीगढ़ में

वामपंथ को सुदृढ़ करने पर होगी चर्चा

    लखनऊ 30 नवम्बर। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य कार्यकारिणी की बैठक यहां सम्पन्न हुई। बैठक में पार्टी के राज्य सम्मेलन की तैयारियों की समीक्षा की गई। मौजूदा राजनैतिक परिप्रेक्ष्य पर गहरी चर्चा के उपरान्त प्रदेश में वामपंथ को विस्तार देने की प्रारंभिक रणनीति का खाका तैयार किया गया जिसे राज्य सम्मेलन में अंतिम रूप दिया जायेगा। विधान सभा की कुछ अन्य सीटें और प्रत्याशी चयनित किये गये जिसे केन्द्रीय नेतृत्व से चर्चा के बाद घोषित किया जायेगा।
    बैठक के फैसलों की जानकारी देते हुए राज्य सचिव डा. गिरीश ने यहां जारी एक प्रेस बयान में बताया कि भाकपा अपना 21वाँ राज्य सम्मेलन 16 से 18 दिसम्बर अलीगढ़ में आयोजित करने जा रही है। इस सम्मेलन में भाकपा दुनियाँ, देश और उत्तर प्रदेश की राजनीति पर राज्य कार्यकारिणी द्वारा तैयार प्रस्ताव पर चर्चा करेगी। साथ ही पिछले लगभग चार वर्षों में किये गये आन्दोलन व सांगठनिक कार्यों की समीक्षा भी करेगी। संगठन को चुस्त-दुरूस्त बनाने पर एक सांगठनिक प्रस्ताव पर अलग से चर्चा होगी।
    डा. गिरीश ने कहा कि चूंकि इस समय पूंजीवादी दल अपनी कारगुजारियों के चलते पूरी तरह बेनकाब हो गये हैं, अतएव उत्तर प्रदेश की जनता एक साफ सुथरे नये विकल्प की तलाश में है। एक हद तक इस कमी को वामपंथी दल पूरा कर सकते हैं जो आम जनता की समस्याओं पर लगातार संघर्ष करते रहे हैं, भ्रष्टाचार से पूरी तरह मुक्त हैं और उनके पास संगठन का एक ठीक-ठाक ताना-बाना पूरे प्रदेश में मौजूद हैं। इस उद्देश्य से भाकपा, माकपा, फारवर्ड ब्लाक और आरएसपी पहले ही एकजुट हो चुके हैं और अब दूसरे वाम समूहों का आह्वान किया गया है कि ऐतिहासिक इस घड़ी में मोर्चे के साथ आयें। कुछ धर्मनिरपेक्ष और भ्रष्टाचार से मुक्त छोटे दलों को भी साथ लेने पर विचार किया जा रहा है।
    डा. गिरीश ने बताया कि राज्य सम्मेलन में इन सारे सवालों पर विस्तार से चर्चा होगी। पार्टी का ढांचा 70 जिलों में है जिनसे जिला सम्मेलनों से चुन कर आये 400 के लगभग प्रतिनिधि और वैकल्पिक प्रतिनिधि अलीगढ़ के हबीब गार्डेन में होने वाले 3 दिवसीय सम्मेलन में भाग लेंगे।
    सम्मेलन के प्रथम दिन 16 दिसम्बर की पूर्वान्ह वहां एक रैली का आयोजन भी किया जा रहा है जिसमें भाकपा महासचिव ए. बी. बर्धन, उप महासचिव का. एस. सुधाकर रेड्डी (पूर्व सांसद), भाकपा संसदीय दल के नेता का. गुरूदास दासगुप्ता, सांसद का. अजीज पाशा एवं केन्द्रीय सचिव अतुल कुमार अंजान सहित राज्य के नेतागण भाग लेंगे। भाकपा के इस सम्मेलन में राज्य कौंसिल एवं राज्य सचिव का चुनाव भी किया जाता है। पटना में 27 से 31 मार्च तक होने वाले 21वें महाधिवेशन के लिये प्रतिनिधि भी चुने जायेंगे।
    राज्य कार्यकारिणी बैठक में एक प्रस्ताव पास कर खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को छूट देने की केन्द्र सरकार की कार्यवाही की कड़े शब्दों में निन्दा की गई तथा इसे तत्काल वापस लेने की मांग की गई। इस सम्बंध में 1 दिसम्बर को होने वाले भारत बन्द को पूर्ण समर्थन देने और उसमें सक्रिय भागीदारी करने का भी निर्णय लिया गया।
    बैठक की अध्यक्षता सुरेन्द्र राम ने की।
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सोमवार, 28 नवंबर 2011

संदर्भ: फैज अहमद फ़ैज़ जन्मशती वर्ष

फैज अहमद फै़ज़: अवाम का महबूब शायर
साल 2011 हिंदी- उर्दू के कई बड़े कवियों का जन्मशताब्दी साल है। यह एक महज इत्तेफाक है कि हिंदी में जहां हम इस साल बाबा नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर बहादुर सिंह और अज्ञेय को उनकी जन्मशती पर याद कर रहे हैं वहीं उर्दू के दो बड़े शायर मज़ाज और फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का भी यह जन्मशती साल है। बहरहाल, इन सब दिग्गज कवियों के बीच फ़ैज़ का मुकाम कुछ जुदा है। वे न सिर्फ उर्दूभाषियों के पसंदीदा शायर हैं, बल्कि हिंदी और पंजाबीभाषी लोग भी उन्हें उतने ही शिद्दत से प्यार करते हैं। गोया कि फ़ैज़ भाषा और क्षेत्रीयता की सभी हदें पार करते हैं। एक पूरा दौर गुजर गया, लेकिन फ़ैज़ की शायरी आज भी हिंद उपमहाद्वीप के करोड़ों- करोड़ों लोगों के दिलों दिमाग पर छाई हुई है। उनकी नज्मों- गजलों के मिसरे और टुकड़े लोगों की जबान पर कहावतों की तरह चढ़े हुए हैं। सच मायने में कहंे तो फ़ैज़ अवाम के महबूब शायर हैं और उनकी शायरी हरदिल अजीज।
 अविभाजित भारत के सियालकोट जिले के छोटे से गांव कालाकादिर में 13 फरवरी, 1911 को जन्मे फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शुरूआती तालीम मदरसे में हुई। बचपन में ही उन्होंने अरबी व फारसी की तालीम मुकम्मल कर ली थी। बाद में उन्होंने स्कॉट मिशन स्कूल में दाखिल लिया। अदबी रूझान फ़ैज़ को विरासत में मिला। आपके वालिद सुल्तान मोहम्मद खान की गहरी दिलचस्पी अदब में थी। उर्दू के अजीम शायर इकबाल और सर अब्दुल कदीर से उनके नजदीकी संबंध थे। जाहिर हैं, परिवार के अदबी माहौल का फ़ैज़ पर भी असर पड़ा। स्कूली तालीम के दौरान ही उन्हें शायरी से लगाव हो गया। वे शायरी की किताबें किराये पर ले- लेकर पढ़ते। गोया कि शायरी का जुनून उनके सिर चढ़कर बोलता। शायरी के जानिब फ़ैज़ के इस लगाव को देखकर स्कूल के हेड मास्टर ने एक दिन उन्हें एक मिसरा दिया और उस पर गिरह लगाने को कहा। फ़ैज़ ने उनके कहने पर पाँच-छः अस आर की गजल लिख डाली। जिसे बाद में इनाम भी मिला। इसी के साथ ही उनके नियमित लेखन का सिलसिला शुरू हो गया। स्कूली तालीम के बाद उनकी आगे की पढ़ाई सियालकोट के मरे कॉलेज और लाहौर के ओरियंटन कॉलेज में हुई। वहांॅ उन्होंने अरबी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में एम0ए0 किया। फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का परिवार, बड़ा परिवार था, जिसमें पांॅच बहनें और चार भाई थे। परिवार की आर्थिक मुश्किलों को देखते हुए, तालीम पूरी होते ही उन्होंने 1935 में एमएओ कॉलेज, अमृतसर में नौकरी ज्वाईन कर ली। वे अंग्रेजी के लेक्चरर हो गये।
 अमृतसर में नौकरी के दौरान उनकी मुलाकात महमूदज्जफर, डॉ0 रशीद जहां और डॉ0 मोहम्मद दीन तासीर से हुई। बाद में उनके दोस्तों की फेहरिस्त में सज्जाद जहीर का नाम भी जुड़ा। यह वह दौर था, जब भारत में अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ आजादी का आंदोलन चरम पर था और हर हिंदोस्तानी अपनी- अपनी तरह से इस आंदोलन में हिस्सेदारी कर रहा था। ऐसे ही हंगामाखेज माहौल में सज्जाद जहीर और उनके चंद दोस्तों ने 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की। जिसके पहले अधिवेशन के अध्यक्ष महान कथाकार- उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद चुने गए। बहरहाल, फ़ैज़ भी लेखकों के इस अंादोलन से जुड़ गए। प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ने के बाद फ़ैज़ की शायरी में एक बड़ा बदलाव आया। उनकी शायरी की अंतर्वस्तु का कैनवास व्यापक होता चला गया। इश्क, प्यार- मोहब्बत की रूमानियत से निकलकर फ़ैज़ अपनी शायरी में हकीकतनिगारी पर जोर देने लगे। इसके बाद ही उनकी यह मशहूर गजल सामने आई- ”और भी दुख हैं, जमाने में मुहब्बत के सिवा/ राहतें और भी हैं, वस्ल की राहत के सिवा/ मुझसे पहली सी मुहब्बत, मेरी महबूब न मांग।“ फ़ैज़ की शायरी में ये प्रगतिशील, जनवादी चेतना आखिर तक कायम रही। कमोबेश उनकी पूरी शायदी, तरक्की पसंद ख्यालों का ही आइना है। उनके पहले के ही काव्य संग्रह ”नक्शे फरियादी“ की एक गजल के कुछ अस आर देखिए- ”आजिजी सीखी, गरीबों की हिमायत सीखी/ यासो हिर्मा के दुख दर्द के मानी सीखे/ जेरदस्तों के मसाइब को समझना सीखा/ सर्द आहों के, रूखेजर्द के मानी सीखे।“
 साल 1941 में ‘नक्शे फरियादी’ के प्रकाशन के बाद फ़ैज़ का नाम उर्दू अदब के अहम रचनाकारों में शुमार होने लगा। मुशायरों में भी वे शिरकत करते। एक इंकलाबी शायर के तौर पर उन्होंने जल्द ही मुल्क में शोहरत हासिल कर ली। अपने कलाम से उन्होंने बार- बार मुल्कवासियों को एक फैसलाकुन जंग के लिए ललकारा। ‘शीशों का मसीहा कोई नहीं“ शीर्षक नज्म में वे कहते हैं- ”सब सागर शीशे लालो- गुहर, इस बाजी में बद जाते हैं/ उठो, सब खाली हाथों को इस रन से बुलावे आते हैं।“ फ़ैज़ की ऐसी ही एक दीगर गजल का शेर है- ”लेकिन अब जुल्म की मियाद के दिन थोड़े हैं। इस जरा सब्र कि फरियाद के दिन थोड़े हैं।“ मुल्क में आजादी की यह जद्दोजहद चल रही थी कि दूसरा महायुद्ध शुरू हो गया। जर्मनी ने रूस पर हमला कर दिया। यह हमला हुआ तो लगा कि अब इंग्लैण्ड भी नहीं बचेगा। भारत में फासिज्म की हुकूमत हो जाएगी। लिहाजा, फासिज्म को हराने के ख्याल से फ़ैज़ लेक्चरर का पद छोड़कर फौज में कप्तान हो गए। बाद में वे तरक्की पाकर कर्नल के ओहदे तक पहुंॅचे। आखिरकार, लाखों लोगों की कुर्बानियों के बाद 1947 में भारत को आजादी हासिल हुई। पर यह आजादी हमें बंटवारे के रूप में मिली। मुल्क दो हिस्सों में बंट गया। भारत और पाकिस्तान। बंटवारे सेे पहले हुई साम्प्रदायिक हिंसा ने पूरे मुल्क को झुलसा के रख दिया। रक्तरंजित और जलते हुए शहरों को देखते हुए फ़ैज़ ने ‘सुबहे-आजादी’ शीर्षक से एक नज्म लिखी। इस नज्म में बंटवारे का दर्द जिस तरह से नुमाया हुआ वैसा उर्दू अदब में दूसरी जगह मिलना बमुश्किल हैं- ”ये दाग दाग उजाला, ये शब गजीदा सहर/ वो इंतिजार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं/ये वो सहर तो नहीं, जिसकी आरजू लेकर/ चले थे यार कि मिल जाएगी, कहीं न कहीं।“ इस नज्म में फ़ैज़ यहीं नहीं रूक गए, बल्कि वे आगे कहते हैं- ”नजाते-दीदा-ओ-दिल की घड़ी नहीं आई/चले चलो कि वो मंजिल अभी नहीं आई।“ यानि, फ़ैज़ मुल्क की खंडित आजादी से बेहद गमगीन थे। यह उनके ख्यालों का हिंदोस्तान नहीं था और उन्हें उम्मीद थी कि जल्द ही सब कुछ ठीक हो जाएगा।
 बहरहाल, बंटवारे के बाद फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ पाकिस्तान चले गए। वहां उन्होंने पाकिस्तान टाईम्स, इमरोज और लैलो निहार के संपादक के रूप में काम किया। पाकिस्तान में भी फ़ैज़ का संघर्ष खत्म नहीं हुआ। यहांॅ भी वे सरकारों की गलत नीतियों की लगातार मुखालफत करते रहे। इस मुखालफत के चलते उन्हें कई बार जेल भी हुई। लेकिन उन्होंने फिर भी अपने विचार नहीं बदले। जेल में रहते हुए ही उनके दो महत्वपूर्ण कविता संग्रह ‘दस्ते सबा’ और ‘जिंदानामा’ प्रकाशित हुए। कारावास में एक वक्त ऐसा भी आया, जब जेल प्रशासन ने उन्हें परिवार- दोस्तों से मिलवाना तो दूर, उनसे कागज- कलम तक छीन लिए। फ़ैज़ ने ऐसे ही हालात में लिखा- ”मताए लौहो कलम छिन गई, तो क्या गम है/ कि खूने दिल में डुबो ली है उंगलियां मैने/जबां पे मुहर लगी है, तो क्या कि रख दी है/हर एक हल्का-ए-जंजीर में जबां मैंने।“ कारावास के दौरान फ़ैज़ की लिखी गई गजलों और नज्मों ने दुनिया भर की आवाम को प्रभावित किया। तुर्की के महान कवि नाजिम हिकमत की तरह उन्होंने भी कारावास और देश निकाला जैसी यातनाएं भोगी। लेकिन फिर भी वे फौजी हुक्मरानों के खिलाफ प्रतिरोध के गीत गाते रहे। ऐसी ही प्रतिरोध की उनकी एक नज्म है- ”निसार मैं तेरी गलियों पे ए वतन कि जहांॅॅ/चली है रस्म की कोई न सर उठाके चले/जो कोई चाहने वाला तवाफ को निकले/नजर चुरा के चले, जिस्मों- जां को बचा के चले।“
 फ़ैज़ की सारी जिंदगी को यदि उठाकर देखे तो उनकी जिंदगी कई उतार-चढ़ाव और संघर्षों की दास्तान है। बावजूद इसके उन्होंने अपना लिखना नहीं छोड़ा। उनकी जिंदगानी में और उसके बाद कई किताबें प्रकाशित हुई। दस्ते-तहे-संग, वादी-ए-सीना, शामे-शहरे-यारां, सारे सुखन हमारे, नुस्खहा-ए-वफा, गुबारे अयाम जहां उनके दीगर काव्य संग्रह हैं। वहीं मीजान और मताए-लौहो-कलम किताबों में उनके निबंध संकलित है। फ़ैज़ ने रेडियो नाटक भी लिखें। जिनमें दो नाटक-अजब सितमगर है और अमन के फरि ते काफी मकबूल हुए। उन्होंने जागो हुआ सबेरा नाम से एक फिल्म भी बनाई। जो लंदन के अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में पुरस्कृत हुई। 1962 में उन्हें लेनिन शांति सम्मान से नवाजा गया। फ़ैज़ पहले एशियाई शायर बने, जिन्हें यह सम्मान बख्शा गया।
 भारत और पाकिस्तान के तरक्कीपसंद शायरों की फेहरिस्त में ही नहीं बल्कि समूचे एशिया उपमहाद्वीप और अफ्रीका के स्वतंत्रता और समाजवाद के लिए किए गए संघर्षों के संदर्भ में भी फ़ैज़ सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रासंगिक शायर है। उनकी शायरी जहां इंसान को शोषण से मुक्त कराने की प्रेरणा देती है, वहीं एक शोषणमुक्त समाज की स्थापना का सपना भी जगाती है। उन्होंने अवाम के नागरिक अधिकारों के लिए, सैनिक तानाशाही के खिलाफ जमकर लिखा। ‘लाजिम है कि हम देखेंगे’, ‘बोल कि लब आजाद है तेरे’, ‘कटते भी चलो बढ़ते भी चलो’ उनकी ऐसी ही कुछ इंकलाबी नज्में हैं। अपने जीवनकाल में ही फ़ैज़ समय और मुल्क की सरहदें लांघकर एक अंतर्राष्ट्रीय शायर के तौर पर मकबूल हो चुके थे। दुनिया के किसी भी कोने में जुल्म होते उनकी कलम मचलने लगती। अफ्रीका के मुक्ति संघर्ष में उन्होंने जहांॅ ‘अफ्रीका कम बैक का’ नारा दिया, वहीं बेरूत में हुए नरसंहार के खिलाफ भी उन्होंने एक नज्म ‘एक नगमा कर्बला-ए-बेरूत के लिए’ शीर्षक से लिखी। गोया कि दुनिया में कहीं भी नाइंसाफी होती, तो वे अपनी नज्मों और गजलों के जरिये प्रतिरोध दर्ज करते थे।
 कुल मिलाकर फ़ैज़ की शायरी आज भी दुनिया भर में चल रहे लोकतांत्रिक संघर्ष को आवाज देती है। स्वाधीनता, जनवाद और सामाजिक समानता उनकी शायरी का मूल स्वर है। फ़ैज़ अपनी सारी जिंदगी में इस कसम को बड़ी मजबूती से निभाते रहे- ”हम परविशे- लौह-ओ-कलम करते रहेंगे/ जो दिल पे गुजरती है, रकम करते रहेंगे।“ एक मुकम्मल जिंदगी जीने के बाद फ़ैज़ ने 20 नवम्बर, 1984 को इस दुनिया से रूखसती ली। अवाम का यह महबूब शायर शारीरिक रूप से भले ही हमसे जुदा हो गया हो, लेकिन उनकी शायरी हमेशा जिंदा रहेगी और प्रेरणा देती रहेगी- ”बोल, कि लब आजाद हैं तेरे/बोल कि अब तक जुबा है तेरी।“
- जाहिद खान
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प्रगतिशील लेखन आन्दोलन के पचहत्तर वर्ष

एक आग है जो जलती है अभी
भारत के सांस्कृतिक इतिहास का यह कोई विरल संयोग अथवा सहसा घटित घटना नहीं है कि युगान्तकारी विकराल मूर्ति भंजक प्रगतिशील लेखन आन्दोलन तथा अपने समय के सामाजिक यथार्थ के सबसे कुशल चित्रेता कथा सम्राट मुंशी प्रेमचन्द्र के काल-जयी उपन्यास ‘गोदान’ की पचहततरवीं वर्षगांठ एक साथ मनायी जा रही है। साथ ही ऐसी यागदार विभूतियों की जन्म शताब्दियांॅ भी, जिन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ व आन्दोलन की संस्थापना, उसकी वैचारिकी व सैद्धान्तिकी रचने एवम् उसके चतुर्दिक विस्तार में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। जैसे कि फैज, नागार्जुन, केदारनाथ अगव्राल, शमशेर बहादुर सिंह, मजाज तथा भगवत् शरण उपाध्याय। सज्जाद जहीर, डॉ0 रशीद जहांॅ, डॉ0 अब्दुल अलीम, मुल्कराज आनन्द इत्यादि की जन्म शताब्दियांॅ निकट अतीत की ही घटनाएंॅ हैं। एक ही वर्ष में प्रगतिशील आन्दोलन का आरम्भ तथा गोदान का प्रकाशन (जून 36) काल विशेष में व्याप्त सामाजिक व्याकुलता तथा बदलाव की छटपटाहट की अभिव्यक्ति के दो रूप ही माने जा सकते हैं। यह कांग्रेस के नेतृत्व से भारतीय बुद्धिजीवियों के मोहभंग का दौर था और सामंती साम्राज्यवाद की संगठित शक्ति से मुठभेड़ की छटपटाहट का भी।
 इतिहास का क्रमिक विकास बताता है कि लन्दन में जुलाई, 1935 में प्रोग्रेसिव राईटर्स एसोसिएशन के गठन, जिसका प्रथम अधिवेशन ई0एम0 फॉस्टर के सभापतित्व में हुआ तथा इसके ऐतिहासिक महत्व के घोषणा पत्र के जारी होने के उपरान्त सज्जाद जहीर की लन्दन से वापसी पर तब की सांस्कृतिक राजधानी इलाहाबाद में जस्टिस वजीर हसन (सज्जाद जहीर के पिता) के आवास पर दिसम्बर, 1935 में प्रेमचन्द्र की उपस्थिति में प्र0ले0सं0 की पहले इकाई के गठन का फैसला हुआ। इसी बैठक में अप्रैल, 1936 में लखनऊ में प्र0ले0सं0 का प्रथम राष्ट्रीय अधिवेशन करने का भी निर्णय किया गया। बैठक में प्रेमचन्द्र व सज्जाद जहीर के अतिरिक्त मुंशी दयानारायण निगम, मौलवी अब्दुल हक, अहमद अली, डॉ0 रशीद जहांॅ, जोश मलीहाबादी व फिराक गोरखपुरी इत्यादि उपस्थित थे। एजाज हुसैन भी। प्रगतिशीलता को ठोस वैचारिक- सांस्कृतिक अभियान का रूप देने के पक्ष में व्यवहारिक रणनीति बनाने का अवसर दिया था, ”हिन्दुस्तान एकेडमी“ (इलाहाबाद) के एक समारोह ने जिसमें हिन्दी- उर्दू के अनेक विख्यात रचनाकार सम्मिलित हुए थे।
 तीव्र होते सघन संक्रमण के उस दौर में अप्रैल 36 आते-आते सृजन व बौद्धिकता के क्षेत्र में बहुत कुछ घटित हो चुका था। रूसी इंकिलाब, हाली का मुकदमा-ए-शेरो शायरी, सरसैय्यद तहरीक, प्रेमाश्रम, सेवासदन और कर्मभूमि, माधुरी, हंस तथा रामेश्वरी नेहरू की पत्रिका स्त्री दर्पण के साथ ही शेख अब्दुल्लाह की खातून (अलीगढ़) और सत्य जीवन वर्मा की पहल पर बना हिन्दी लेखक संघ फांसीवाद के विरूद्ध कला और संस्कृृति की रक्षा के लिए 1935 में पेरिस में सम्पन्न हुआ लेखकों और संस्कृति कर्मियों का ऐतिहासिक सम्मेलन, जिसने सज्जाद जहीर को गहरे तक प्रभावित किया। वे उस सम्मेलन में मौजूद थे। साहित्य, अभिव्यक्ति के दूसरे माध्यमों मेें प्रगतिशीलता, मानवीय कला दृष्टि व जीवन मूल्य की हैसियत पाने के सघर्ष में थी। राम विलास शर्मा जिसे स्वतः स्फूर्त यथार्थवाद कहते आये हैं। सौन्दर्य के प्रति दृष्टिकोण में भी सन् 1936 के बाद जैसी न सही परन्तु तब्दीली अवश्य आई थी। नवम्बर, 1932 में सज्जाद जहीर के सम्पादन में चार कहानीकारों के कहानी संग्रह ‘अंगारे’ का प्रकाशित होना तथा मार्च 1933 में उस पर प्रतिबन्ध लग जाना। 15 अप्रैल, 1933 को महत्वपूर्ण अंग्रेजी दैनिक ”लीडर“ में अंगारे के कहानीकारों द्वारा इस प्रतिबन्ध के विरोध व भर्त्सना में एक संयुक्त बयान प्रकाशित होना, भविष्य में भी ऐसा लेखन जारी रखने का संकल्प प्रकट करना तथा यथास्थितिवादी ह्रासोन्मुख पतन शील सामंती जीवन व कला मूल्य के विरूद्ध प्रगतिशील बदलाव परक दृष्टिकोण के प्रचार- प्रसार केा रचनात्मक अभियान की शक्ल देने के उद्देश् से ”लीग ऑफ प्रोग्रेसिव आथर्स“ का प्रस्ताव इस प्रेस वक्तव्य में प्रस्तुत किया गया था। यह शोध अभी शेष है कि आखिर क्यों प्रगतिशील लेखकों की लीग बनाने के प्रस्ताव को उस समय अमली जाना नहीं पहनाया जा सका। जबकि बाद के वर्षों में प्र्रगतिशील लेखक संगठन- आन्दोलन को बनाने- फैलाने में अंगारे के इन चारों कहानीकारों की भूमिका अत्यन्त महतवपूर्ण थी और यह कि किन कारणों से सज्जाद जहीर ने प्रगतिशील आन्दोलन के दस्तावेज की हैसियत रखने वाली पुस्तक ”रौशनाई“ में ”लीडर“ में प्रकाशित बयान व उसमें ”लीग ऑफ प्रोग्रेसिव आथर्स“ के गठन के प्रस्ताव का उल्लेख नहीं किया। क्या इस कारण कि ‘अंगारे’ के प्रकाशन के बाद से ही उनके और अहमद अली के बीच मतभेद आरम्भ हो गये थे, जो आगे अधिक तीखे होते गये और यह कि लीडर में छपे बयान में मुख्य भूमिका अहमद अली ही की थी। यहांॅ उस विभाजक रेखा पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है जो अंगारे की कहानियों के कथा तत्व, उनकी वैचारिक भूमि तथा प्रेमचन्द्र के अध्यक्षीय सम्बोधन में निहित वृहत्तर सामाजिक यथार्थ की चिन्तनशीलता के बीच ख्ंिाचती दिखाई पड़ी थी, जिसने 1945 में हैदराबाद में हुए प्रगतिशील लेखकों के एक सम्मेलन में बड़े विवाद का रूप ले लिया था। यशपाल के दादा कामरेड (1943) को लेकर भी राम विलास शर्मा ने ऐसी ही एक रेखा खींची है।
 इतिहास का यह भी एक विस्मयकारी तथ्य है कि राम विलास शर्मा ने 1950 में प्र0ले0 संघ में प्रगतिशील शब्द को लेकर भी आशंका प्रकट की थी। उनकी आपत्ति प्रगतिशीलता के लिए बुद्धिवाद की अनिवार्यता पर भी थी। डॉ0 नामवर सिंह के अनुसार, “उन्होंने लेखकों को शिविरों में बांॅटने वाले इस संगठन का नाम अखिल भारतीय जनवादी लेखक संघ, अथवा परिसंघ ;।सस प्दकपं न्दपवद वत थ्मकमतंजपवद व िक्मउवबतंजपब ॅतपजमतेद्ध रखने का प्रस्ताव दिया था।“
 बहरहाल प्रगतिशील आन्दोलन के पचहत्तरवें वर्ष में कई सारे जरूरी प्रश्नों के साथ ही इस प्रकार के लुप्त हो आये प्रश्नों से भी मुठभेड़ की आवश्यकता महसूस की जा सकती है। भुला दिये गये इस प्रसंग को भी याद किया जा सकता है कि लंदन (1935), लखनऊ (1936) घोषणा पत्रों के जारी होने तथा प्रेमचन्द के ऐतिहासिक अध्यक्षीय सम्बोधन से पूर्व 1935 में ही उर्दू में प्रकाशित अख्तर हुसैन रायपुरी के लेख ”अदब और जिन्दगी“ का व्यापक स्वागत हुआ। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने इसका हिन्दी अनुवाद कराकर ”माधुरी“ में प्रकाशित किया। 1936 में नागपुर में हुए हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में इस लेख पर आधारित घोषणा पत्र पर मौलवी अब्दुल हक और प्रेमचन्द के साथ ही पण्डित जवाहर लाल नेहरू तथा आचार्य नरेन्द्र देव ने भी हस्ताक्षर किये। लेख में अख्तर हुसैन रायपुरी का जोर इस बात पर है कि साहित्य को जीवन की समस्याओं से अलग नहीं किया जा सकता, समाज को बदलने की इच्छा जगाने वाला साहित्य ही सच्चा साहित्य है। लन्दन से जारी घोषणा पत्र पर अख्तर हुसैन रायपुरी के भी हस्ताक्षर थे। भारत में प्रगतिशील साहित्य की आवश्यकता विषय पर शिवदान सिंह चौहान के लेख ने जो 1937 में ‘विशाल भारत’ में प्रकाशित हुआ, प्रगतिशीलता के पक्ष में फिज़ा को साज़गर बनाने में मदद की। हालांकि नामवर सिंह ने इसे आन्दोलन को क्षति पहुंॅचाने वाला लेख बताया है। जबकि राम विलास शर्मा इसके प्रशंसक थे।
 यह छोटी सी भूमिका इस कारण कि नित नये आते हिन्दी पाठक आन्दोलन के पचहत्तरवें वर्ष में कुछ अचर्चित रह जाने वाली जरूरी सच्चाईयों से परिचित हो सके। और इसलिए भी कि प्रगतिशील आन्दोलन की सुसंगत वैचारिक शुरूआत की समग्र प्रेरणाएंॅ यूरोपीय नहीं थी, जिसका आरोप इस पर दक्षिणी पंथी प्रतिक्रियावादी धार्मिक व अन्य विभिन्न विचार क्षेत्रों तथा सत्ता समर्थक खेमों की ओर से लगाया जाता रहा है। कभी अंग्रेजी दैनिक ‘स्टेट्रसमैन’ ने इस अभियान में अग्रणी भूमिका ली थी तथा समाज में हिंसा व आराजकता फैलाने का आरोप लगाते हुए प्रगतिशील लेखक संघ पर प्रतिबन्ध लगाने की गुहार लगायी थी। प्रगतिशील दृष्टि सम्पन्न साहित्यिक संगठन के निर्माण की चर्चा के दौर में ही ‘गोदान’ जैसे किसान केन्द्रित महाकाव्यात्मक उपन्यास की, बदलाव की चेतना जिसमें एक आग की तरह प्रवाहित है, रचना प्रक्रिया का गतिशील होना तथा लन्दन प्रवास से वापस आये सज्जाद जहीर का पहले अधिवेशन की अध्यक्षता के लिए प्रेमचन्द से आग्रह करना संकेत करता है कि दोनों की बुनियादी चिन्ताओं में कोई विपरीतता नहीं थी। ठीक उन्हीं दिनों किसानों के अखिल भारतीय संगठन का अस्तित्व में आना और किसान आन्दोलन का तेज होना, इस संकेत को अधिक चमकदार बनाता है। यहांॅ अधिवेशन की तिथियों का भी अपना महत्व है। ये तिथियांॅ (9-10 अप्रैल) लखनऊ में आयोजित किसान सम्मेलन के साथ जोड़ कर निश्चित की गयी थी, कुछ किसान लेखकों के अधिवेशन में शरीक भी हुए थे। (ऐसे ही एक किसान नेता ने पंजाब में आन्दोलन के आरंभिक विस्तार में मदद की थी) तब और भी जब हम पाते हैं कि सज्जाद जहीर आन्दोलन के आरम्भिक दिनों में किसानों के बीच कवि सम्मेलन, मुशायरे तथा साहित्यिक सभाओं की परम्परा स्थापित करने की कोशिश कर रहे थे जैसा कि बाद के वर्षों में कानपुर, बम्बई, अहमदाबाद, मालेगांॅव इत्यादि औद्योगिक नगरों में मजदूरों के बीच घटित होती दिखाई पड़ी। यह आयोजन आमतौर पर टिकट से होते थे। इनके विज्ञापन ‘नया पथ’ तथा दूसरी पत्रिकाओं में अब भी देखे जा सकते हैं। यानि कि ‘गोदान’ प्रगतिशीलता के महाभियान के गति पकड़ने से पहले ही प्रगतिशील रचना कर्म के उच्च प्रतिमान के रूप में सामने आ चुका था। 75वें वर्ष में इसकी आलोचना के कुछ नये आयाम अवश्य निर्मित हुए है।
 फलस्वरूप प्रगतिशील आन्दोलन के पचहत्तर वर्ष के इतिहास को गोदान व प्रेमचन्द से अलग करके नहीं देखा जा सकता। भले ही कथा सम्राट आन्दोलन का भौतिक नेतृत्व बहुत कम समय ही कर पाये हों। उसी तरह जैसे अंगारे, हंस, माधुरी, विशाल भारत, रूपाभ तथा नया अदब व नया साहित्य, इण्डियन लिट्रेचर, परिचय को अलग नहीं किया जा सकता और न ही उसे उन्नीसवीं सदी के भारतीय नवजागरण से असम्बद्ध किया जा सकता है और न सदी के उत्तरार्द्ध में अंकुरित उन बहसों से जो आस्था, ज्ञान जीवन पद्धति तथा मानव अधिकारों से सम्बन्धित थी। नवजागरण ने अपने को खोजने, पाने तथा स्वाधीनता की लालसा को बौद्धिक आवेग दिया था, कारणवष प्रेमचन्द्र का समूचा लेखन तथा प्रगतिशील आन्दोलन परस्पर पूरक होते दिखाई पड़े तो यह स्वाभाविक तरीके से हासिल हुई बड़ी उपलब्धि ही थी। सर सैय्यद तहरीक और प्रेमचन्द्र के साहित्य के समान प्रगतिशील रचनाओं ने भी समाज को प्रभावित किया तथा राष्ट्रीय संस्कृति के निर्माण में अपने हस्तक्षेप की ऐतिहासिकता प्राप्त की। अवश्य ही भक्तिकाल के बाद जीवन व कला कर्म को राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावित करने वाला यह अकेला आन्दोलन था।
 प्रगतिशील कवियों- शायरों की रचनाएंॅ न केवल मजदूरों- किसानों के आन्दोलनों को गति व धार दे रही थी बल्कि आजादी के मतवालों के दिलों में भी आग भर रही थी। बताने की जरूरत नहीं कि इंकलाब की एक काव्य रचना में सबसे पहले राजनैतिक अर्थों में प्रयुक्त हुआ ”इंकिलाब“ शब्द कहांॅ से आया था और कैसे वह बहुत थोड़े समय में समूचे उत्तरी- पूर्वी भारत में परिवर्तनकारी उत्तेजना का प्रतीक बन गया कि उसने क्रान्तिकारी आन्दोलन के भी अति-प्रिय उद्बोधन की हैसियत प्राप्त की। एक शब्द के भीतर छिपे हुए महाप्रलय के संकेत से लोग पहली बार परिचित हुए, याद कीजिए फैज का तराना। एक अकेला शब्द दमित जनता की मूल्यवान पूंॅजी के रूप में जन संघर्ष की थाती बन गया, उसी तरह जैसे भोर, सुबह या सहर शब्द जो उम्मीद और बदलाव का रूपक बन गया। भोर या सुबह होने का मतलब केवल उजाला होना नहीं बल्कि एक अंधकारमयी सामाजिक राजनैतिक व्यवस्था से उजासमयी व्यवस्था में जाना, समय का साम्यवादी होना अथवा अमीरों की हवेली का गरीबों की पाठशाला बनना, तख्तों का गिरना, ताजों का उछलना या राज सिंहासन का डांॅवाडोल होना हो गया। प्रगतिशील आन्दोलन जिन कुछ खास लक्ष्यों को लेकर आगे बढ़ रहा था, उनमें विभिन्न भारतीय भाषाओं के बीच अजनबीपन व दूरियों को कम करना भी था। यह कोई साधारण घटना नहीं है कि सन् 1936 के ठीक दो वर्ष बाद संघ का दूसरा अधिवेशन कलकत्ता में हो रहा था। जहांॅ यदि एक ओर महाकवि रवीन्द्र नाथ टैगोर एक संदेश के द्वारा आन्दोलन व अधिवेशन का स्वागत कर रहे थे, और जनता से अलग-थलग रहने पर अपनी आलोचना तो दूसरी ओर बंगभाषी महानगरी में उर्दू, अरबी व जर्मन भाषाओं के एक विद्वान डॉ0 अब्दुल अलीम को प्र0ले0 संघ का महासचिव बनाया गया था। उनके द्वारा दिया गया भारतीय भाषाओं को रोमन लिपि में लिखे जाने का विवादास्पद प्रस्ताव इसी समय आया था। बांग्ला, उर्दू, हिन्दी के अतिरिक्त अधिवेशन में पंजाबी, तेलुगू इत्यादि भाषाओं के लेखक भी सम्मिलित हुए थे। बलराज साहनी और उनकी नव वधू दमयन्ती थी। छायावाद के इसी अवसान काल में सुमित्रानन्दन पंत व निराला भी प्रगतिशीलता की ओर आकृष्ट हुए थे। अज्ञेय के आकर्षण का भी तकरीबन यही काल है। संयोग से ये तीनों ही आन्दोलन के साथ दूर तक नहीं चल पाये। पन्त ने ‘रूपाभ’ को एक तरह से आन्दोलन के लिए समर्पित कर दिया था। डॉ0 नामवर सिंह इसे संयुक्त मोर्चे की साहित्यिक अभिव्यक्ति कहते हैं। लेकिन आन्दोलन के कर्णधारों को आर्थिक चिंता उत्तरी- पूर्वी भारत में उर्दू- हिन्दी लेखकों के संयुक्त मोर्चा को लेकर थी। नागरी प्रचारिणी सभा, हिन्दी साहित्य सम्मेलन तथा अंजुमन तरक्की उर्दू इत्यादि के भाषागत अभियानों से दोनों भाषाभाषी श्ंाका व संशय के घेरे में थे। हिन्दुस्तानी के विकल्प ने हिन्दी भाषियों की शंका को अधिक गहरा किया था, कारणवश यदि कुछ लोगों को उर्दू लेखकों की पहल पर प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना भी उर्दू के पक्ष में कोई रणनीतिक कार्यवाही महसूस हुई हो तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए और न आरम्भिक वर्षों में आन्दोलन के प्रति उनके ठण्डे रवैये पर। यकीनी तौर पर थोड़े अन्तरालोपरान्त वे बड़ी संख्या में आन्दोलन के साथ आये, उनकी सम्मिलिति से संगठन व आन्दोलन दोनों को अप्रतिम बल व विस्तार प्राप्त हुआ। अपनी शिनाख्त के प्रति संदनशील रहते हुए वे एक दूसरे के निकट आये। फलस्वरूप औपनिवेशक साम्राज्यवाद, फासीवाद, युद्ध सांप्रदायिकता, धर्मोन्माद, बंगाल के महादुर्भिंक्ष के खिलाफ तथा जनसंघर्षों के विविध अवसरों पर दोनों भाषाओं के रचनाकार साझे मंच पर दिखाई पड़े। फासीवादी युद्ध के विरूद्ध उर्दू- हिन्दी लेखकों का साझा बयान इस सिलसिले की महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में सामने आया, जो नया साहित्य में प्रकाशित हुआ। अब इसको क्या कीजिए कि जिस प्रकार अनेक लब्ध प्रतिष्ठित रचनाकारों ने अन्तिम सांॅस तक प्रगतिशील आन्दोलन से अपनी सम्बद्धता को खण्डित नहीं होने दिया उसी प्रकार विडम्बनाओं ने भी इतिहास का साथ नहीं छोड़ा। देश विभाजन से पूर्व यदि 1945 में उर्दू के प्रगतिशील लेखकों का सम्मेलन हैदराबाद में हो रहा था तो सन् 1947 में विभाजन के ठीक एक माह बाद हिन्दी के प्रगतिशील रचनाकारों का अधिवेशन साम्प्रदायिक तनाव के बीच इलाहाबाद में आयोजित हुआ। उसी इलाहाबाद में जहांॅ प्रगतिशील लेखन आन्दोलन की नींव पड़ी थी, रमेश सिन्हा द्वारा लिखित जिसकी रिपोर्ट कम्युनिस्ट पार्टी के साप्ताहिक ”जनयुग“ तथा अन्य पत्र- पत्रिकाओं में प्रकाशित हुर्ठ। उसी अधिवेशन में उर्दू का एक नौजवान जोशीला शायर (अली सरदार जाफरी) उर्दू लेखकों के अकेले प्रतिनिधि के रूप में हिन्दी के प्रगतिशील लेखकों को समूचे सहयोग का आश्वासन देते हुए उनसे राष्ट्र भाषा के मुद्दे पर जल्दबाजी में कोई फैसला न लेने की मार्मिक अपील कर रहा था। जबकि 31 अगस्त को बम्बाई में हुई प्रलेस की बैठक में यह प्रस्ताव पारित किया गया कि पाकिस्तान में उर्दू के साथ हिन्दी को भी राष्ट्रभाषा बनाये जाये। बैठक में उपस्थित सभी लेखक उर्दू के थे। बम्बई में ही 24 सितम्बर की बैठक में अली सरदार जाफरी ने इलाहाबाद सम्मेलन की रिपोर्ट प्रस्तुत की और कहा कि हिन्दी लेखकों में उर्दू का उतना विरोध नहीं है जितना हम समझते हैं। अलग- अलग अधिवेशनों का यह सिलसिला बाद में भी जारी रहा। दूसरे रूपों में भाषा विवाद भी जारी रहा। उत्तर प्रदेश में माहौल ज्यादा उत्तेजना पूर्ण था। कभी-कभी कटुता इतनी गहरी हुई कि एक ही संगठन के लोग भिन्न शिविरों में विभाजित एक दूसरे के खिलाफ ताल ठोंकते नजर आये, जिसका दुखद उदाहरण प्र0ले0 संघ के स्वर्ण जयन्ती समारोह (अप्रैल, 1986, लखनऊ) में देखने में भी आया। गौरवपूर्ण इतिहास के पचहत्तरवें वर्ष का यथार्थ यह है कि प्रमुख रूप से कुछ उर्दू लेखकों द्वारा आरम्भ किये गये इस आन्दोलन में उर्दू रचनाकारों की भागीदारी लगातार कम होती गयी है। वैसे केन्द्रीय धारा के लेखकों एवम् महिला रचनाकारों की दूरी भी आन्दोलन से बढ़ी है।
 भाषा के प्रश्न पर कम्युनिस्ट पार्टी छोड़ देने वाले राहुल सांकृत्यायन ने देश की तमाम जनपदीय बोलियों को जातीय भाषा मानते हुए उनके अपने- अपने प्रदेश बनाने का सुझाव रखा तो उर्दू के मुद्दे पर उनसे सहमति रखने वाले राम विलास शर्मा ने इस पर घोर आपत्ति की। विडम्बना यहांॅ भी है। पचहत्तर वर्ष के पूर्णता काल में यह मुद्दा नया ताप ग्रहण कर रहा है। जनपदीय बोलियों की रक्षा और अधिकार के प्रति संवेदनशीलता का विस्तार हुआ है। जाहिर सी बात है ऐसे में प्रगतिशील लेखक संघ को निश्चित दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत पड़ सकती है। यों बम्बई प्रलेस की बैठक में प्रो0 मुम्ताज हुसेन ने भी कुछ ऐसे ही प्रस्ताव रखा था।
 पूरी पौन सदी में विभिन्न भारतीय भाषाओं के बीच जीवन्त संवाद- गतिशील आवाजाही का उद्देश्य भले पूर्णतः न प्राप्त कर पाया हो, इन भाषाओं का विशाल एका बनाने का स्वप्न जरूर पूरा हुआ। जहीर कश्मीरी व रंजूर जैसे प्रखर जनवादी रचनाकार देने वाला आन्दोलन कश्मीरी भाषा में खास कारणों से अवश्य शून्य तक पहुंॅच गया। डोगरी में उसकी गतिशीलता बनी रही। देखने वालों ने वह मंजर भी देखा कि उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ से सम्बन्ध रखने वाले परिवार का एक युवा तेलंगाना के निर्माण तथा तेलुगू- उर्दू भाषी आयाम के अधिकारों के लिए जुझारू संघर्ष के मैदान में था। वह अपने उर्दू गीतों से तेलुगू भाषी जनता के दिलों में आग भर रहा था। अकेले मख्दूम के कारण तेलुगू भाषी क्षेत्र में प्रगतिशील आन्दोलन के विस्तार में बड़ी मदद मिली। ठीक उसी तरह जैसे मलियाली क्षेत्र में वल्लत्तोल और बिहार के एक बड़े क्षेत्र में नागार्जुन के कारण। बंगाल में हीरेन मुखर्जी की वजह से तो पंजाब में फैज के प्रयासों से। बम्बई में अली सरदार जाफरी, कैफी आजमी, साहिर लुधियानिवी, मजाज इत्यादि के कारण। जैसे वामिक जौनपुरी की अकेली नज्म ”भूका है बंगाल रे साथी“ से प्र0ले0 संघ व इप्टा दोनों तहरीकों को बड़ी शक्ति प्राप्त हुई। शील के इस गीत से भी कि ”नया संसार बसायेंगे, नया इंसान बनायेंगे.......“
 इस लम्बे दौर में विस्मृति के धंुधलके में चले गये आन्ध्र प्रदेश के वामपंथी- प्रगतिशील संस्कृति कर्मी डॉ0 कृष्णा राव ने अपने एक नाटक के जरिये आन्ध्र प्रदेश के किसानों को उद्वेलित व संगठित करने का जो ऐतिहासिक कारनामा अंजाम दिया, उसे याद रखना आवश्यक है। कृष्णा राव ही उस नाटक के लेखक, निदेशक व केन्द्रीय पात्र थे। इससे इप्टा व प्रलेस दोनों के प्रसार में मदद मिली। एक साथ कई मोर्चों पर सक्रिय डॉ0 राजबहादुर गौड़ को भी हम याद करते चलें।
 आन्दोलन की शुरूआती सैद्धान्तिकी में ही विभिन्न कला माध्यमों के बीच उद्देश्यपरक वैचारिक रागात्मकता की जरूरत को रेखांकित किया गया था, उस ओर उत्तेजक अग्रसरता आन्दोलन की विशिष्ट उपलब्धि है। प्रमुख रूप से साहित्य के पारम्परिक चरित्र को बदलते हुए आन्दोलन ने केन्द्रीय धारा के विभिन्न कला माध्यमों में सक्रिय लोगों, बौद्धिकों व विद्वानों को भी गहरे तक प्रभावित किया था। मई 1943 में इप्टा के अस्तित्व में आने से स्वप्न को नये रंग मिले थे। साहित्य, संगीत, रंग कर्म को सामाजिक लक्ष्यों की पूर्ति के पक्ष में इस तरह एकाकार होते कब किसने देखा था। कला जीवन में उत्साह, उमंग, ऊर्जा और चेतना भर रही थी। आनन्दित होने के क्षणों से गुजरते हुए व्यवस्था द्वारा सताये गये गरीब जन संघर्ष का संकल्प ले रहे थे। लेखन आन्दोलन अपनी समूची सदाशयता के बावजूद लोक साहित्य में वैसी हलचल घटित नहीं कर सका था जैसी जन नाट्य आन्दोलन ने लोक संगीत, लोक नाट्य तथा लोक साहित्य में संभव की। रंगमंच के साथ मजदूरों किसानों का ऐसा जीवन्त रिश्ता पहले कब बन पाया था। इसे संभव करने में प्रगतिशील रचनाकारों की सक्रिय भूमिका थी। हम यहांॅ प्रलेस द्वारा ‘मई दिवस’ के आयोजन की परम्परा को भी याद कर सकते हैं।
 ”आवामी थियेटर और प्रगतिशील लेखकों के आन्दोलन में चोली दामन का साथ था। प्रगतिशील लेखकों की संस्था के बहुत से कार्यकर्ता आवामी थियेटर में भी काम करते थे और उसे संगठित करने में उन्होंने बहुत अहम हिस्सा लिया।“
 मराठी लम्बी कविता पावड़ा और तेलुगू की बुर्रा कथाओं ने प्रासंगिकता के नये शिखर प्राप्त किये। अन्नाभाऊ साठे के पावड़े सर्वाधिक लोकप्रिय हुए। साठे प्रलेस के सक्रिय साथी थे। अवश्य ही विविध लोक नाट्यांे को नया जीवन प्राप्त हुआ, परन्तु उसके पीछे मुख्य भूमिका लोक नाट्य कर्मियों की थी। इप्टा की सफलता ने फिल्म निर्माण की ओर अग्रसरता को सहज बना दिया। इस क्रम में ख्वाजा अहमद अब्बास की किसान केन्द्रित फिल्म ”धरती के लाल“ एक विस्फोट की तरह थी। इस बिन्दु पर जो बात ध्यान देने की है वह यह है कि इन तमाम पड़ावों के दौरान होरी, धनिया और गोबर के तनावों व संघर्षों को केन्द्रीयता प्राप्त रही। एक तरह से ‘गोदान’ आन्दोलन का सहयात्री बना रहा। कभी-कभी पथ प्रदर्शक भी। इससे दूसरी सामाजिक समस्याओं, राजनैतिक चुनौतियों, सांस्कृतिक संकटों व अन्तर्राष्ट्रीय व्याकुलताओं को नेपथ्य में ढकेल देने का तात्पर्य नहीं ले लेना चाहिए।
 विशिष्टताओं की बात जब चल ही निकली है तो यह जिक्र भी होता चले कि प्रगतिशील राजनैतिक शक्तियांॅ जिन मोर्चों पर विजय की मुद्रा बनाये नहीं रख पायीं असफलता उनकी नियति बनी प्रगतिशील साहित्यिक मोर्चे या लेखन आन्दोलन ने उन्हीं मोर्चांे पर ताबनाक कामयाबियांॅ अर्जित की।
 इनमें सबसे प्रमुख है साहित्य में दक्षिण पंथी साम्प्रदायिक पुनरूत्थान वादी शक्तियों का प्रगतिशील जनवादी रचनाकारों की सक्रियता के कारण हाशिये पर चले जाना। जातिवादी, नस्लभेदी, स्त्री विरोधी मानसिकता का व्यापक तिरस्कार। जनविरोधी सामंतवादी शक्तियों के विरूद्ध निरन्तरता प्राप्त करती सजगता, अन्ततः साहित्य में उनका अपदस्थ होना, साहित्यिक जन-तांत्रिकता की वैभवपूर्ण सम्पन्नता के बीच ‘जन’ का केन्द्रीयता प्राप्त करना। बताने की आवश्यकता नहीं कि भारतीय राजनीति के बड़े फलक पर जहांॅ ‘जन’ बहुलता में सत्ता की सीढ़ी के रूप में इस्तेमाल होता रहा है, अपने बारे में अराजकशोर के बीच उसकी निःस्वरता आह में भी नहीं बदल पाती। जबकि साहित्य में उसकी वंचना, अभाव, पीड़ा, चीख, संघर्ष और प्रतिवाद सब लगातार घटित होता आया है। शब्द जैसे उसके भीतर उतर पाने की अपूर्व सामर्थ्य से समृद्ध हुआ।
 ऐसा सत्ता के किसी शिखर पर पहुंॅचने के लिए नहीं बल्कि प्रगतिशीलता की कसौटी के रूप में स्थापित हुई सामाजिक प्रतिबद्धता तथा यथार्थ के प्रति संवेदनशील, मानवीय वैज्ञानिक दृष्टि के कारण संभव हो पाया। यानि ऐसा साहित्यिक जिम्मेदारी के तहत हुआ। एक मोर्चे पर जन की गुहार यदि संभावना पूर्ण अवसरों का निर्माण करती है तो साहित्य में जन प्रतिबद्धता कई अवसरों से वंचित। उदाहरणों की कमी नहीं है। खतरे और भी हैं। तनिक सी जल्दबाजी या असावधानी के कारण ‘जन’ से प्यार पर लिजजिली भावुकता या सपाट समझ का आरोप भी लग सकता है। यानि ”खुदा मिला न विसाले सनम“। बीते पचहत्तर साल ऐसी कई त्रासदियों के साक्षी हैं। इसे प्रगतिशील आन्दोलन की उपलब्धि ही कहा जायेगा कि विपरीतता के बावजूद आन्दोलन से जुड़े या उसकी आंॅच से तपे रचनाकर जनसंघर्षों से भले दूर होते चले गये हैं (वह भी एक दौर था जब अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन में भारत का प्रतिनिधित्व मख्दूम ने किया तो पाकिस्तान का फैज ने। बाद के वर्षों में भी मजदूर मोर्चे पर लेखकों की सक्रिया जारी रही) जन से उसी अनुपात में विमुख नहीं हुए। वह साहित्य के केन्द्र में है। जबकि भारतीय राजनीति में वह हाशिये पर चला गया है। तकरीबन यही स्थिति दलित व स्त्री की भी है। अधिकांश राजनैतिक दलों के लिए ये सत्ता सोपानों से अधिक महत्व नहीं प्राप्त कर पा रहे हैं। जबकि साहित्य में ये अनिवार्यता प्राप्त कर रहे स्थाई विमर्श का विषय है। विमर्श वृहत्तर संदर्भों से सम्बद्ध हुआ है। अनुभूति परक संवेदनशीलता तथा वैचारिक दायित्व बोध जिसका खास अवलम्ब है। जहांॅ समानता और आजादी किसी एक फूल या रंग का नाम नहीं बल्कि समग्र बदलाव का प्रतीक है। रात से भोर की ओर जाने की यात्रा जैसा अल्पसंख्यकों तथा जनजातियों के सामाजिक यथार्थ से यदि साहित्य वंचित नहीं रह गया तो इसमें प्रगतिशील आन्दोलन का कुछ योगदान अवश्य है, जबकि स्त्री मुक्ति के स्वप्न को फ्रायडवादी, यौनकेन्द्रित, मनोविज्ञान एवम् दलित दमित वर्ग के लिए नई सामाजिक व्यवस्था के निर्माण की चेतना को एकान्तिकता, आध्यात्मवादी परोपकारी मानवतावाद से बचाने की चुनौती सामने थी।
 प्रगतिवाद के उभार के तीव्रतम दौर में ही प्रयोगवाद भी बहुत गतिशील रहा है। इसे सिद्धान्त विशेष की शक्ति ही माना जायेगा कि प्रयोगवाद ने प्रगतिशील रचना कर्म को प्रभावित तो अवश्य किया परन्तु वह कोई कठिन चुनौती खड़ी नहीं कर पाया। अवश्य ही अनेकानेक प्रगतिशील रचनाकारों ने परिपाटी तथा शिल्पवादी आवेग से मुठभेड़ करते हुए भाषा व शिल्प के स्तर पर प्रयोग किये। कुछ आलोचक शिल्पवाद को साम्राज्यवादी कुचक्र घोषित करते रहे। अन्तर्वस्तु का पुराना लोक जैसे अदृश्य ही हो गया। कथा परिदृश्य पर ग्रामीण परिवेश के प्रभुत्व, सामान्य पारिवारिक व उपेक्षित जातीय पृष्ठभूमि से आये पात्रों उनके संघर्ष ने पाठकों को पहली बार अपनी जमीन का साहित्य होने की अनुभूति दी। मध्यवर्गीय वर्चस्व ने इसे थोड़ा धुंॅधलाया अवश्य फिर भी वर्णाश्रम व्यवस्था पर प्रहार तथा विस्थापित स्त्री की स्थापना ने यह भरोसा तो दिया ही कि समाज बदल भी सकता है। यथार्थ की खोज में पेड़ से गिरे फल पर उन्होंने भरोसा नहीं किया। सम्पूर्ण मनुष्य के यथार्थ को उद्घाटित करने के क्रम में जीवनानुभव और गहन अन्वेषण के साथ वैज्ञानिक पुनर्रचना की दिशा में वो गये। प्रगतिशील जनवाद की तीव्रता के क्षणों में कला के प्रति बढ़ते सम्मोहन से जो आत्मसंघर्ष निर्मित हुआ उसने कई यादगार कृतियों के लिए फिज़ा साज़गार की।
 प्रगतिशील जीवन दर्शन से हासिल हुई समय व समाज को समझने की अन्तर्दृष्टि ने स्वानुभूति को सामूहिक अनुभूति में रूपान्तरित करते हुए उसे उच्चतम स्तरों तक ले जाने की चुनौती उन्होंने स्वीकार की। दृष्टि की संकीर्णता तथा स्थानीयता के अतिक्रमण की ओर जाते हुए वे जिस विराटता की ओर गये उसने उन्हें सर्वदेशीय विश्व दृष्टिकोण तक पहंॅुचाया। स्थापना के दिन से ही प्रगतिशील आन्दोन के निश्चित अन्तर्रष्ट्रीय सरोकार रहे हैं। ये सरोकार वृहत्तर भारतीय चिंता के रूप में स्थापित हुए, यह याद रखने वाली घटना है। फै़ज़ की कई नज़्में जिसका बेहतर उदाहरण है। शमशेर की कुछ कविताएं भी इस ओर ध्यान खींचती है। विश्वदृष्टि का अर्थ भारतीय सीमाओं के पार की सच्चाईयों को पकड़ना ही नहीं, वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में यथार्थ को देखना था।
 आन्दोलन के कम्युनिस्ट पार्टी से प्रेरित या उससे निर्देशित होने के आरोपों को झुठलाने के प्रयास अब लगभग नहीं होते। स्वयम् संगठन के अन्दर पार्टी की नीतियों से आन्दोलन के प्रभावित होने के मुद्दे पर विवाद उठना अतीत की बात हो चुकी है। पार्टी के प्रति उन्मुखता से जहांॅ एक ओर आन्दोलन के व्यापक विस्तार में मदद मिली वहीं उसकी नीतियों से प्रभावित होने ने कई आघात भी पहुंॅचाये। विश्व युद्ध व भारत छोड़ों आन्दोलन के प्रति दृष्टिकोण, पाकिस्तान की मांॅग का समर्थन,प्रगतिशील आन्दोलन के संस्थापक सज्जाद जहीर को पार्टी निर्माण के लिए पाकिस्तान भेजना, उनका वहांॅ, फैज तथा कई सैनिक अधिकारियों के साथ राजद्रोह के आरोप में पकड़े जाना, कांग्रेस के प्रति भिन्न अनुपातों में आकर्षण का लगातार बने रहना, अन्ततः आपातकाल की हिमायत ने भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के सामान्य नागरिकों, विशेष रूप से मध्य वर्ग के मनोविज्ञान पर नकारात्मक प्रभाव छोड़े। हालांकि इन कारणों से कम्युनिस्ट पार्टी को जितनी क्षति उठानी पड़ी उतनी प्रगतिशील आन्दोलन को नहीं, फिर भी उसे आघात तो पहुंॅचते ही रहे। पार्टी बीस धड़ों में विभाजित हुई तो आन्दोलन प्रमुखतः तीन धड़ों में। जहांॅ आन्दोलन नहीं है, वहांॅ पार्टी भी नहीं है, परन्तु जहांॅ पार्टी नहीं है वहांॅ आन्दोलन शेष है। मध्य प्रदेश जिसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जम्मू, मालेगांॅव, भिवण्डी तथा पाकिस्तान के भी कुछ शहर। यह स्थिति जनता के विराट हृदय से समझ भरे सम्पर्क के कारण ही संभव हो पायी है। जनाकांक्षाओं से जुड़ने के लिए हथियार उठाना अथवा सड़कों पर उत्तेजक नारों के साथ उतरना ही हमेशा जरूरी नहीं होता, आकांक्षाओं की प्रभावपूर्ण कलात्मक अभिव्यक्ति, जनवादी लयात्मकता वंचित वर्ग के लोगों को साथ करने में सहायक हो सकती है। भौतिक आवश्यकताओं से अलग जनता की सांस्कृतिक आकांक्षाएंॅ भी होती हैं। बिहार, मध्य प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र इत्यादि में प्रगतिशीलों ने जनता की सांस्कृतिक आकांक्षाओं की भी चिंता की है। प्रश्न इतना भर है कि नेतृत्व किन लोगों के पास है।
 संयोग नहीं हालात की स्वाभाविक परिणति है कि ऐसे ही समय में जब विशाल कम्युनिस्ट या वामपंथी एका की बात चल रही है तभी वृहद सांस्कृतिक मोर्चा बनाने की जरूरत भी शिद्दत से महसूस की जा रही है। सांस्कृतिक मोर्चे के निश्चित राजनैतिक परिप्रेक्ष्य हो सकते हैं। सावधानी चाहिए तो बस इतनी ही कि वह पार्टी की जरूरतों पर आधारित न हो। ”साहित्य को राजनीतिक चेतना से सम्पन्न बनाने का अर्थ साहित्य- सृजन और चिंतन में राजनीतिक संघर्ष की रणनीति और कार्य नीति का अमल नहीं है।“
 समय का साम्यवादी होना दिवास्वप्न की तरह है तो स्टालिनग्राड के मोर्चे पर हिटलर की सेनाओं के ध्वंस से उत्साहित होकर मख्दूम का झूम-झूमकर गाया गीत ”यह जंग है जंगे आजादी“ दिलों में पहले जैसा ओज भरने की सामर्थ्य खो चुका है। सुमन की लालसेना पूंॅजीवाद की चाकरी में है तो फैज के आश्वासनों के बावजूद सहर अब भी बहुत दूर है, एक हथौड़े वाले से कई हथौड़े वाले और फौलादी हाथों वाले होते चले जाने के बावजूद पूंॅजीवाद का कुछ नहीं बिगड़ा है। कई दिनों बाद घर में दाने आने की दारूण स्थिति अब भी शेष है। वाम दिशा विहान दिशा हो आयी है। कारण वश प्रगतिशील आन्दोलन की प्रासंगिकता भी शेष है और उसकी जरूरत भी। उसी तरह जैसे गोदान की। बावजूद इसके यह नहीं कहा जा सकता कि भोर का स्वप्न अपना समूचा सम्मोहन खो चुका है, भूमण्डलीकरण और बाजार वाद द्वारा प्रस्तुत कलाकर्म को हाशिये पर डालने, इलेक्ट्रानिक चैनल्स द्वारा उसे जीवन से बाहर निकालने तथा सांस्कृतिक प्रदूषण की चुनौती ने प्रगतिशील आन्दोलन, सांस्कृतिक एका तथा अमानवीय लूट के विरूद्ध वैचारिक सृजनात्मकता तथा मानवीय संवेदना के हस्तक्षेप दोनों को अधिक जरूरी बनाया है। बदलाव की इच्छा आवेगपूर्ण हो आई हो तो संकीर्णता व अतिवाद के खतरे पैदा हो ही जाते हैं। कविता नारा बन जाती है। लड़ाई के दौर में नारों की अपनी भूमिका होती है। यह लड़ाई का दौर है। नारे फैज ने भी लगाये, शमशेर, नागार्जुन, मख्दूम, मजाज और केदारनाथ अग्रवाल ने भी, शिवमंगल सिंह सुमन, शील, मजरूह, तोप्पिल भासी और कैफी आजमी, नियाज हैदर ने भी। नारों से साहित्य को उतनी बड़ी क्षति नहीं पहुंॅचती जितनी नारे न होने पर जनसंघर्षों को, इंसान की भलाई की लड़ाई को पहुंॅच सकती है। इससे साहित्य को नारा बनाने की पक्षधरता का तात्पर्य नहीं लेना चाहिए, कहना मात्र इतना है कि यदि साहित्य का इंसानी भलाई से कोई सरोकार है तो नारों के लिए कुछ गंुजाइश तो होनी ही चाहिए। नारा भी कलात्मक अनुभव हो सकता है। अब इसे सम्मानीय आलोचक रोमांटिक और अंधलोकवादी रूझान कहे तो कहें।
 हबीब जालिब की शायरी का बड़ा हिस्सा नारा है। फैज की कुछ नज्में भी। पाकिस्तान की निरंकुश सत्ताएं दोनों से लगातार भयभीत रही। वहांॅ प्रगतिशील आन्दोलन को अपनी यात्रा कठिन परिस्थितियों में तय करनी पड़ी। रावल पिण्डी साजिश केस (1948) ने हालात को अधिक दुरूह बनाया। प्रगतिशील लेखक संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। कई लेखक गिरफ्तार कर लिये गये (1954) इनमें वहांॅ के राष्ट्रीय सचिव अहमद नदीम कासमी भी थे। लाहौर में प्रगतिशील लेखकों के पहले अखिल पाकिस्तान सम्मेलन (नवम्बर, 1949) पर लाठी डण्डों से हमला किया गया। लेखकों पर पाकिस्तान-इस्लाम विरोधी नारों का इल्जाम लगाते हुए उनके विरूद्ध मुकदमें दर्ज हुए। रावल पिण्डी साजिश केस के बाद चालीस मस्जिदों के इमामों ने फैज व दूसरे प्रगतिशील लेखकों के खिलाफ बयान जारी किये। यहांॅ तक कि लन्दन में प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापकों में से एक दीन मुहम्मद तासीर भी मुखालिफों में शामिल हो गये। पंजाब के गवर्नर के रूप में जिनके पुत्र सलमान तासीर की हाल ही में हत्या हुई है। मतलब यह है कि जिनपे तकिया था वही पत्ते हवा देने लगे। पाकिस्तान में प्रलेस द्वारा आयोजित मई दिवस के जलसों पर भी हमले किये गये।
 पाकिस्तान बनने के तुरन्त उपरान्त तक उस क्षेत्र यानि कि पश्चिमी पाकिस्तान की कई भाषाओं जैसे सिन्धी, पंजाबी, पश्तो, मुल्तानी, सरायकी इत्यादि भाषाओं में प्रगतिशील आन्दोलन की जड़े कहीं गहरी, कहीं कम गहरी हो चुकी थी। पूर्वी पाकिस्तान की भी लगभग यही स्थिति थी। वहांॅ आन्दोलन के कार्यकर्ता अब भी मौजूद हैं। कुछ साल पहले तक सिन्धी अदबी संगत की शाखाएंॅ सिन्ध से बाहर रावल पिण्डी, कोयटा तथा जद्दा तक में सक्रिय थी। कई बड़े शहरों में प्रगतिशील लेखक कहीं मूल कहीं बदले हुए नामों वाले संगठनों के बैनर तले संगठित हैं। स्वर्ण जयन्ती समारोह (लखनऊ 1986) में वहांॅ से बड़े प्रतिनिधि मण्डल का आना और वहांॅ स्वर्ण जयन्ती का भव्य आयोजन तथा 1936 से 1986 तक के अधिवेशनों की रिपोर्टों पर आधारित दस्तावेज का प्रकाशित होना, एकतरफा, मंशूर, अफकार, आज, फुनून, सीप जैसी पत्रिकाएं, वहांॅ रचे जा रहे साहित्य यह संकेत देते रहे हैं कि 1936 में रौशन चिंगारी वहांॅ बुझी नहीं है। साहित्य का केन्द्रीय स्वर अब भी प्रगतिशील है। साम्राज्यवादी विस्तार, पूंॅजीवादी लूट, जन दमन, एकाधिकार वाद, लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन, स्त्रियों की बाड़े बन्दी तथा धार्मिक उन्माद उससे पैदा हुआ आतंकवाद, उसकी व्यावसायिकता के विरूद्ध लेखक खतरे उठा कर भी लिख रहे हैं। महिला रचनाकारों की साहसिकता ने हदों को तोड़ा है और साबित किया है कि संगठन के बगैर भी आन्दोलन चलते रह सकते हैं। पाकिस्तान के प्रगतिशील रचनाकारों ने अमन व मित्रता के पक्ष में शस्त्रों की होड़ तथा युद्ध विरोधी अभियानों की भी अगुवाई की हैं पाकिस्तान के रचनाकारों ने प्रगतिशीलता के संदेश को कई अमरीकी, यूरोपीय तथा एशियाई देशों में पहंॅुचाने की पहल अर्जित की है। कहीं- कहीं संगठन भी मौजूद है, जैसे लन्दन में जिसने 1985 में स्वर्ण जयन्ती का भव्य आयोजन भी किया। ब्वउउमदजउमदज नाम से एक दस्तावेज भी प्रकाशित किया। पत्रिकाएं तो निकलती ही हैं। निःसन्देह प्युपिल्स पार्टी के शासन काल में प्रलेस की गतिविधियांॅ ज्यादा तेज हुई। बंगाल, केरल, त्रिपुरा में वामपंथी शासन के बावजूद ऐसा नहीं हो पाया यह अलग बात है।
 भारत हो या पाकिस्तान संकरी संकीर्णता ने आन्दोलन को जो क्षति पहुंॅचाई वह अपनी जगह। उल्लेखनीय है कि फैज पाकिस्तान प्र0ले0सं0 से उसके नेतृत्व तथा भारत में कुछ रचनाकार राम विलास शर्मा व अली सरदार जाफरी के अतिवादी रवैये के कारण ही अलग हुए थे। अति उदारता ने भी आन्दोलन को बहुत नुकसान पहुंॅचाया, कृश्नचन्दर के सचिव काल में तो जैसे अराजकता की स्थिति पैदा हो गई थी। राजीव सक्सेना के काल में भी लगभग यही स्थिति थी। भीष्म साहनी तथा डॉ0 कमला प्रसाद का नेतृत्व आन्दोलन की बड़ी उपलब्धि है। सज्जाद जहीर के समय की अखिल भारतीयता आन्दोलन को उन्हीं के काल में प्राप्त हो पायी। उनकी सक्रियता ने आन्दोलन में जैसे नये प्राण फूंॅक दिये। बांॅदा, गया और जबलपुर- जयपुर के अधिवेशनों ने आन्दोलन को विनाश की हद तक पहुंॅचने से बचाया। सिकुड़ती हुई सीमाओं के बीच गया सम्मेलन ने संघ को महासंघ बना दिया। उत्तर प्रदेश में 1975 के बाद आया नया उभार यहीं से प्रेरित था। जबलपुर का अधिवेशन (1980) इस अर्थ में महत्वपूर्ण साबित हुआ कि उसने कम से कम मध्य प्रदेश में संगठनात्मक लक्ष्यों की पूर्ति तथा आन्दोलन के फैलाव में बड़ी मदद की। समूचे उत्तरी पूर्वी व पश्चिमी भारत में आन्दोलन, उससे भी ज्यादा प्रगतिशील लेखन के पक्ष में समर्थन का उत्तेजनापूर्ण वातावरण बनाने में लघु पत्रिका आन्दोलन ऐतिहासिक महत्व का योगदान दे रहा था। ”पहल“ की उसमें विशेष भूमिका थी। बहुत कुछ हार कर खास वर्गों का हित पोषण करने वाली अन्याय परक व्यवस्था के विरूद्ध शब्दकर्म का वह महा अभियान अब अतीत का यथार्थ हो गया है। लेकिन धमनियों में शिथिल होते रक्त को प्रवाह देने का सामर्थ्य अब भी उसके पास हैं। सच पूछिये तो आधुनिकता- स्वच्छंदतावादी, विसर्जोन्मुखी प्रवृत्तियों को, तथा निराकारी आत्मोन्मुखी शमशानी मनोविज्ञान के धराशाई होने में लघुपत्रिका आन्दोलन की शक्ति प्रमुख थी। ऊर्जा समानान्तर सिनेमा से भी मिल रही थी। ”प्रगतिशील आन्दोलन अपनी भूमिका निभा चुका है, उसे भंग कर देना चाहिये“ का उद्घोष करने वाली विसर्जनवादी प्रवृत्ति विभाजन के बाद ज्यादा सक्रिय दिखाई दी थी। हताश होकर उसका स्वयम् विसर्जित हो जाना इतिहास की बड़ी घटना है। कमोवेश यही स्थिति लगभग इसी काल में पारम्परिकता के पूर्ण निषेध आधुनिकतावाद पोषित अमूर्त्तता, कलावाद, वैयक्तिकता, सामाजिक उद्देश्य से विमुखता, अकहानी, नई कहानी, प्रतीक वाद तथा साहित्य की स्वायत्तता आदि प्रवृत्तियों का संगठित आक्रमण भी तेज हुआ। उर्दू में अपेक्षाकृत यह ज्यादा सघन था। इससे आन्दोलन को कुछ चोट अवश्य पहुंॅची। परन्तु इसका अंजाम भी विर्सजनवाद के जैसा ही हुआ। सामाजिक प्रतिबद्धता अग्नि परीक्षा के बाद कुन्दन सी आभामयी हो गयी। 1953 के दिल्ली व 1954 के कराची अधिवेशनों में इसका खास नोटिस लिया गया।
 पूंॅजीवादी प्रलोभनों, अमरीका प्रेरित कल्चरल फ्रीडम के नारों, तीव्र होते व्यवसायीकरण और महंगाई में आटा गीला हो जाने के समान सोवियत संघ तथा दूसरी साम्यवादी सत्ताओं का पतन, लाखों- लाख लोगों को सम्मोहित करने वाला सुनहरा स्वप्न ही बिखर गया, निराशाजन्य अवसद के बीच आन्दोलन की यात्रा अधिक कठिन हो गयी। कामरेड का कोट चीथड़े हो गया। वोदका का मादक स्वाद जीवन की कसैली याद जैसा हो आया। इन हालात में यगाना चंगेजी की वह फब्ती कौन दोहराता जो उन्होंने 1857 के संदर्भ में मिर्जा गालिब पर कसी थी
 शहजादे पड़े फिरंगियों के पाले
 मिर्जा के गले में मोतियों के माले
या यह कि -
 तलवार से गरज न भाण्डे से गरज
 मिर्जा को अपने हलवे माण्डे से गरज
 उपलब्धियों के कई तमगो के बीच एक दाग भी है, लेखकों, विशेष रूप से युवा लेखकों के हित में आन्दोलन या प्र0ले0सं0 का कोई ठोस काम न कर पाना। प्रकाशकों के शोषण से उन्हें बचाने के लिए कोई कारगर रणनीति न अपना सका। एक केन्द्रीय प्रकाशन गृह और पत्रिका का निरन्तरता न प्राप्त कर पाना। प्रलेस के अधिवेशनों की रिपोर्टों का संकलित न हो सकता। दाग और भी है लेकिन यह दाग़ धब्बे दिखाने का अवसर नहीं है। इसकी जिम्मेदारी किसी एक व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह पर नहीं, आन्दोलन में शामिल सभी रचनाकारों पर आती है। यह समय आत्मविश्लेषण का जरूरी है। गहरे आत्ममंथन का समय है। जो आग या मशाल 1936 में रौशन हुई थी, उसकी आंॅच कम हुई है पर वह बुझी नहीं है। उस आग में, मशाल में पूर्वजों ने इतनी आंॅच और रौशनी भर दी है कि वह आसानी से बुझेगी भी नहीं, नये रचनाकार आते रहेंगे वो उसके होने से इंकार करेंगे और उसकी तपन से प्रभावित भी होते रहेंगे। कोई भी रचनाकार भले वह कितना ही ऊर्जावान हो परम्परा से कटकर बहुत दूर तक नहीं जा सकता। जब परम्परा की याद आयेगी तो प्रेमचन्द याद आयेंगे, जब प्रेमचंद याद आयेंगे तो प्रगतिशील लेखन आन्दोलन याद आयेगा। यह स्मरण की उस आग को बाकी रखेगा, यों तो जो लिखा जा रहा है उसका बहुतांश ही उसके शेष रह जाने का संकेत है।
 डॉ0 नामवर सिंह ने 1986 में प्रगतिशील आन्दोलन की पचासवीं वर्षगांॅठ के अवसर पर लिखे गये अपने एक लेख में रेखाकित किया है कि ”वस्तुतः सन् 1936 के बाद का हिन्दी साहित्य प्रगतिशील आन्दोलन के सचेत और संगठित हस्तक्षेप का पात्र है“ और उसे हम चाहें तो वाल्टर वेन्जामिन के शब्दों में ”इतिहास के नैरंतर्य में विस्फोट की संज्ञा दे सकते हैं....“
 इतिहास के इस नैरंतर्य को आगे जारी रखने की कठिन चुनौती आन्दोलन के सहयात्रियों के सम्मुख है। डा0 नामवर सिंह ने लेख की शुरूआत में यह भी याद दिलाया है कि ”पचास साल पहले, जैसी और जिन चुनौतियों का सामना करने के लिए, प्रगतिशील लेखक संघबद्ध हुए थे, आज वैसी ही, किन्तु उनसे भी अधिक गंभीर चुनौतियांॅ हमारे सामने हैं .....“
 तब भी कुछ खास चुनौतियों के संदर्भ अन्तर्राष्ट्रीय थे, आज वे संदर्भ अधिक भयावह रूप में प्रस्तुत है। संयोग से गोदान भी जिन चुनौतियों से टकराते हुए पूर्णता प्राप्त करता है, बिगड़ी हुई शक्ल में वे चुनौतियांॅ भी हमारे सम्मुख है। धार्मिक- सांप्रदायिक फासीवपाद से बाजारवादी शक्तियों के गठजोड़ ने प्रगतिशील लेखन का संकट बढ़ाया। संस्कृति इतिहास के तीव्रतम आक्रमण की चपेट में है, जनपक्षधर शक्तियों के लगातार कमजोर होते जाने के कारण चुनौतियांॅ अधिक दुरूह तथा आक्रमण अधिक सघन हुआ है। लेखन को प्रमुखता देते हुए बहुआयामी सक्रियता से ही इनका कारगर मुकाबला किया जा सकता है। प्रगतिशीलता की आरंभिक अवधारणा भी यही रही है। जाहिर सी बात है इसके लिए दृष्टिकोण में बदली हुई व्यापकता तो लानी ही होगी। प्रगति की समय सापेक्षता का चिंतन तो साथ रहेगा ही।
 ”जो साहित्य मनुष्य के उत्पीड़न को छिपाता है, संस्कृति की झीनी चादर बुनकर उसे ढांॅकना चाहता है, वह प्रचारक न दीखते हुए भी वास्तव में प्रतिक्रियावाद का प्रचारक होता है।
संदर्भ:
1. नामवर सिंह, वाद- विवाद संवाद, पृ. 89
2. वही
3. वही, पृ. 91
4. हमीद अख्तर, रूदादे अन्जुमन, पृ. 190
5. वही, पृ. 198
6. वही, पृ. 190
7. सज्जाद जहीर, रौशनाई (हिन्दी अनुवाद), पृ. 243
8. डा. नामवर सिंह, वाद-विवाद संवाद
9. चन्द्रबली सिंह, ‘कथन’ त्रैमासिक, जुलाई-सितम्बर, 2011
10. नामवर सिंह, वाद-विवाद संवाद, पृ. 87
11. वही
12. राम विलास शर्मा, प्रगति और परम्परा, पृ. 50
- शकील सिद्दीकी
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Uttar Pradesh should not be divided


The demand to divide Uttar Pradesh into separate states has been raised off and on for the last two decades. But the bitter truth remains that such a demand has never received popular support. There has been no movement in any part of the state; only in Bundelkhand one has witnessed infrequent dharna’s, demonstrations and a few meetings on the issue.
 To be honest, the division of Uttar Pradesh is not a peoples’ issue at all. Guided by the whim of politicians the issue of division of Uttar Pradesh is periodically raised merely to serve their selfish political goals.
 The latest attempt in this regard has been made by the BSP supremo Mayawati .It is an open secret that during the last four and a half years her government has miserably failed on every front. This move is an attempt on her part to divert popular attention from her failures.
 Looking back we see that attempts have been made to divide the people in the name of religion, then on caste and now a fresh effort to segregate them on geographical lines in order to help the capitalist forces remain in command.
 The argument that smaller states accelerates  the process of development appears strange. Development depends on the political will of the ruling class and the equitable distribution and utilization of resources across regions. Merely carving out smaller states is definitely not enough.  
To create the very basic infrastructure in the newly created states and to run it efficiently requires huge and recurring investment in infrastructure.  As corruption is most rampant in the creation of infrastructure, a sizable amount of this money would be siphoned off in that direction.
In any case such huge resources being diverted to set up the fresh infrastructure in these new states would impact the availability of resources for the overall development of the states.
If the newly created state is backward and not able to raise sufficient resources then the chances of it further falling back remains high.  It remains dependent on the central government’s largess. If the central government and state government are not from the same party the political tussle between them would be at the cost of development of the newly created state.   
It is also completely misleading to claim that industrialization would pick up pace with the creation of smaller states.  Under the neo liberal polices governments are selling off the existing industries in the public sector. Under such conditions the government is no where near promoting the setting up of new industries in the government sector.
 As regards the private sector, entrepreneurs invest as per their priorities and not as according to the requirements of the state. To attract investments governments forcibly acquire land from farmers and hand it over at throw away prices to industrialists to set up industries. After acquiring such land at dirt cheap prices at times industries never come up or even if they do, industries often closes down due to various reasons. The land is sold off as real estate at huge profits.  In the deal the farmer is left high and dry.
 The rampant crony capitalism witnessed in the recently created states of Uttrakhand, Jharkhand and Chhattisgarh needs no recounting. The unscrupulous nexus between politicians – capitalists and middlemen has led to the open loot of the state’s precious resources – both natural and man made.
 Such capitalists find it easier to ‘manage’ the governments of these smaller states. Controlling the numerically small vidhan sabhas on the strength of their money power is relatively easier just as pushing through legislations which go in their favour.
In such a manner the mineral resources, land and forest resources of these smaller states have become vulnerable to the whims and fancies of such crony capitalism.
Correspondingly the strength of the people’s movement to raise their voice against such a collective sell off diminishes after divisions. For such crony capitalist forces convenient division of states serves the purpose of further decimating the voice of the struggling people fighting for justice and their rights over resources.
Uttar Pradesh  now a state of close to 20 crore  people , plays a politically significant role  in the country’s polity.  Every citizen of Uttar Pradesh is proud of this fact. Many symbols of Hindu-Muslim’s composite culture are visible all over the state.
A resident of West Uttar Pradesh considers it an honor to visit places of religious significance like Varanasi, Sarnath, Prayag, and Gorakhpur. Similarly, any one from East Uttar Pradesh always wishes to visit the Taj Mahal, Mathura and Jhansi.
The proposed Bundelkhand, Purvanchal and Awadh Pradesh are relatively backward compared to the prosperous Pashchim Pradesh. The revenue generated from the better off region helps the development of the remaining parts. This is the natural equity within the state.  Disturbing this arrangement would make the new states completely vulnerable and dependent on the generosity of the central government.
Why should the people of Uttar Pradesh pay for the idiosyncrasy and political ambitions of a certain politician or political party?  Why should the people suffer from the additional burden of a division?  The people should pledge not to accept such a division at any cost. 
- Dr Girish, Secretary. CPI Uttar Pradesh
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खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति के खिलाफ 1 दिसम्बर को प्रस्तावित भारत बन्द को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा समर्थन

लखनऊ 28 नवम्बर। केन्द्रीय मंत्रिमंडल द्वारा मल्टी ब्रांड रिटेल सेक्टर में 51 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति दिये जाने के खिलाफ खुदरा व्यापारियों के संगठनों के महासंघ (सीआरटीओ) द्वारा 1 दिसम्बर को भारत बंद का आह्वान किया गया है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी इस आह्वान का समर्थन करते हुए अपनी सभी पार्टी इकाईयों का आह्वान करती है कि वे इस बंद को सफल बनाने के लिए खुदरा व्यापारियों को हर सम्भव समर्थन और सहयोग दें।
    यहां जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा है कि केन्द्र सरकार उपभोक्ताओं को सस्ता सामान मुहैया होने, किसानों को बेहतर दाम मिलने, महंगाई पर नियंत्रण होने आदि के बहाने कर वालमार्ट, केयरफोर आदि बहुराष्ट्रीय निगमों को भारत में खुदरा व्यापार की अनुमति दे चुकी है जिससे लगभग साढ़े चार करोड़ लोगों के रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सरकार के इस कदम का विरोध करती है और इसके खिलाफ खुदरा व्यापारियों के हर संघर्ष में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी उनके साथ कदम से कदम मिला कर उनका समर्थन करेगी।
    भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने व्यापारियों को आगाह किया है कि उन राजनीतिक दलों - बसपा, सपा और भाजपा से होशियार रहें जो इस समय व्यापारियों के साथ दिखाई पड़ने का प्रयास कर रही हैं परन्तु सत्ता मिलने पर वे उन्हीं आर्थिक नीतियों पर चलती रहीं हैं जिन्हें संप्रग-दो की सरकार इस समय चला रही है।

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