भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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Communist Party of India, U.P. State Council

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सोमवार, 28 जून 2010

CPI's Protests against Petroleum Price hike & Gas tragedy

Central Chronicle today published the followings news :
By Our Staff ReporterBhopal, June 27: Communist Party of India, Bhopal district protested against the central government demanding the withdrawal from the sudden price rises in the petroleum products and to provide optimum monetary package to the victims of the Gas tragedy, here in the city on Sunday.The protest was in the form of a rally supported by "Transport Hammal Mazdoor Sabha" affiliated to the Party's labour wing AITUC, which began from Itwara and ended up in Itwara after it went a long march to the different places of the Capital. The rally was leaded by Party's Bhopal district Secretary Sailendra Sailly, comprising a large number of party supporters. During this protest the party activists demanded Maximum package for the gas victims as per the parameters set by the American State against the similar tragedy, Extradition of Anderson and providing harsh punishment, reestablishment of Bhopal Memorial Hospital and representation of the maximum victims, ensuring their Health, job and rehabilitation and withdrawal in the hike in the petroleum products.
http://www.centralchronicle.com/viewnews.asp?articleID=39858
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रविवार, 27 जून 2010

लो क सं घ र्ष !: छोटी-बड़ी बातों का कामरेड - कामरेड राजेन्द्र केसरी

(फोटो कैप्शन: तीन साल पहले जब हमने इंग्लैण्ड की एक शोध छात्रा क्लेर हेस को बीड़ी उद्योग पर अध्ययन करने का काम सौंपा था तो उसने राजेन्द्र केसरी का इस विषय पर लंबा इंटरव्यू लिया था। ये फोटो उसी वक्त उसने इन्दौर में शहीद भवन में लिया था जो उसने कामरेड राजू के प्रति अपनी श्रृद्धांजलि के साथ भेजा है।)

लोहे की हरी अल्मारी के भीतर एक पुराना सा टाइपराइटर इंतजार कर रहा है कि कोई उसे बाहर निकालेगा। कोई दरख्वास्त, कोई नोटिस, कोई सर्कुलर, कोई परचा - कुछ तो होगा जिसे टाइप होना होगा। टाइपराइटर के साथ ही वे सारी दरख्वास्तें, नोटिस, सर्कुलर और परचे भी इन्तजार कर रहे हैं कि कोई उन्हें टाइप करेगा, आॅफिस पहुँचाएगा, कोर्ट ले जाएगा, नोटिस बोर्ड पर लगाएगा। 27 मई को गुजरे आज महीना होने को आया, इंतजार खत्म ही नहीं होता।
एक बूढ़ी अम्मा है। साँवेर के नजदीक एक गाँव में रहती है। मांगल्या के पास की एक गुटखा फैक्टरी में काम करती थी। वहाँ राजू ने यूनियन बनायी हुई है। वहीं से वो राजू केसरी काॅमरेड को जानती है। बस में सत्रह रुपये खर्च करके इन्दौर में पार्टी के आॅफिस शहीद भवन तक आती है। वो शहीद भवन आकर राजू केसरी से मिलना चाहती है कि वो उसके देवर के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट लिखवाये। उसे पुलिस के पास जाकर रिपोर्ट लिखवानी है कि उसके देवर ने उस पर बहुत बड़ा पत्थर उठाकर फेंका। वो शहीद भवन में आकर राजू का कई बार तो घंटों इंतजार करती है। काॅमरेड राजू आते हैं, अम्मा से हँसी-मजाक करते हैं, अपना काम करते हैं लेकिन अम्मा के साथ रिपोर्ट लिखवाने नहीं जाते। बूढ़ी अम्मा खूब गुस्सा हो जाती है। काॅमरेड राजू हँसकर उसका गुस्सा और कोसना सुनते रहते हैं। अम्मा अपने सत्रह रुपये बेकार जाने का हवाला देती है। काॅमरेड राजू हँसते-हँसते उससे कहते हैं कि अम्मा मेरे घर चलकर सो जाना। मैं खाना भी खिला दूँगा और 17 रुपये भी दे दूँगा।
मैं उस दिन वहीं शहीद भवन में ही थी। सब काॅमरेड राजू और बूढ़ी अम्मा की बातचीत सुनकर हँस रहे थे। मैंने राजू केसरी से कहा, ’’काॅमरेड, क्यों बूढ़ी अम्मा को सताते हो? उसकी रिपोर्ट क्यों नहीं लिखवा देते?’’ राजू बोला, ’’काॅमरेड आप जानती नहीं हो। मैं खुद अम्मा के गाँव उसके घर जाकर आया, वो पत्थर भी देखकर आया जो ये बोलती है कि इसके देवर ने इस पर फेंका था, लेकिन इसे लगा नहीं। अब मैं पुलिस को जाके क्या बोलूँ कि इसके देवर ने इसको पत्थर मारा जो इसको लगा नहीं इसलिए उसको गिरफ्तार कर लो? फिर जब इसको इसका देवर कल सचमुच में पत्थर मारेगा तो फिर अम्मा को कौन बचाएगा?’’ अम्मा बड़बड़ाती रही, राजू टाइप करते-करते मुस्कुराते रहे, मैं अम्मा को समझाने की कोशिश करके निकल आयी।
जाॅब कार्ड बनवाना है, राशन कार्ड बनवाना है, लेबर कमिश्नर के पास जाना है, पेंशन दिलवानी है, ऐसे ढेर छोटे-बड़े कामों को काॅमरेड राजू केसरी को करते देखने की यादें हैं। यादें और भी हैं। विनीत ने बताया कि राजू केसरी की पहली याद वो है जब काॅमरेड रोशनी दाजी हमें छोड़ चली गयी थी। रोशनी की अंतिम यात्रा निकलने के पहले राजू केसरी सैकड़ों मजदूरनियों का जुलूस लेकर नारे लगाते हुए पहुँचा था। बेशक राजू सहित सभी रो रहे थे लेकिन सबकी आवाज बुलंद थी - ’काॅमरेड रोशनी दाजी को लाल सलाम’।
बीड़ी मजदूरिनों को संगठित करने, रेलवे हम्मालों की यूनियन बनाने, गुटखा फैक्टरियों में काम करने वाली औरतों का संगठन खड़ा करने जैसे अनेक कामों से राजू केसरी पार्टी का काम आगे बढ़ा रहे थे। बीड़ी के बारे में तो वे बताते भी थे कि इन्दौर की बीड़ी बनाने वाली बाइयाँ दूसरी जगहों की बीड़ी मजदूरों से कितनी अच्छी स्थिति में हैं। इन्दौर में सभी बीड़ी कारखानों के मजदूरों में राजू का काम फैला था और 3 हजार से ज्यादा बीड़ी मजदूर एटक के सदस्य बने थे। हाल में मुंबई में हुए बीड़ी-सिगार मजदूरों के राष्ट्रीय सम्मेलन में राजू को बीड़ी-सिगार फेडरेशन के मध्य प्रदेश के संयोजक की महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गयी थी।
लड़ने में काॅमरेड राजू केसरी नंबर एक थे। मुझे खुद बताते थे कि कामरेड, आज फलाने की धुलाई कर दी। आज किसी को धक्का मारकर बाहर कर दिया। कामरेड बसन्त मुझे एक दिन बोले, ’’ये राजू हर चीज में झगड़ा डालता है। अड़ जाता है तो किसी की सुनता ही नहीं।’’ उनके साथ लगभग हर वक्त रहने वाले कामरेड सत्यनारायण बोले कि हम दोनों हर रोज लड़ते थे। आज शहीद भवन में सब कामरेड्स आँखें नम किये इंतजार करते हैं कि राजू आये और लड़ाई करे।
जब से इन्दौर में महिला फेडरेशन का काम शुरू किया, तभी से कामरेड मोहन निमजे और काॅमरेड राजू केसरी अपनी यूनियन की महिलाओं को महिला फेडरेशन की गतिविधियों में हमेशा भेजते रहे। अभी 8 मार्च 2010 को महिला दिवस के लिए मैंने काॅमरेड राजू से बात की तो वो प्रोमेड लैबोरेटरीज की कर्मचारी महिलाओं से बात करने के लिए हमारे साथ गये, गेट मीटिंग ली और बोले, ’’मैं मैनेजर से बात करूँगा कि 8 मार्च के दिन वो तुम लोगों की जल्दी छुट्टी कर दे ताकि तुम लोग महिला दिवस के जुलूस में शामिल हो जाओ, लेकिन अगर वो न माना तो तुम लोग आधे दिन की तनख्वाह कटवा कर आ जाना। छुट्टी मिले या नहीं लेकिन आना जरूर।’’ सारी महिलाएँ जोर से सिर हिलाकर बोलीं कि बिल्कुल आएँगे और 8 मार्च को आधे दिन की छुट्टी लेकर महिलाएँ आयीं और जुलूस में शामिल हुईं।
27 मई को जब राजू हमें छोड़कर चले गये तो बीड़ी मजदूरनियाँ, रेलवे हम्माल, प्रोमेड लैबोरेटरीज और तमाम कारखानों के मजदूर फिर छुट्टी लेकर आये अपने लड़ाकू काॅमरेड को आखिरी सलाम कहने। सबकी आँखों में आँसू थे लेकिन उन्होंने राजू से सीख लिया था कि आँखों में आँसू भले हों लेकिन किसी भी काॅमरेड को लाल सलाम कहते वक्त आवाज नहीं काँपनी चाहिए।
मिल मजदूर के लड़के थे राजू केसरी। एक दिन अपने बारे में बता रहे थे कि जब सिर्फ 14 बरस की उम्र थी तब उनके पिता दुर्घटना की वजह से काम करने लायक नहीं रह गये थे। सन 1975 में राजू ने पार्टी आॅफिस में पोस्टर चिपकाने की नौकरी 40 रुपये महीने पर की थी। काॅमरेड पेरीन दाजी कहती हैं कि ’’राजू पार्टी आॅफिस में झाड़ू लगाता था। उसका रंग काला था, तो शुरू में तो हम सब उसे कालू ही कहते थे। राजू तो वो बाद में बना।’’ झाड़ू लगाते-लगाते और पोस्टर चिपकाते-चिपकाते काॅमरेड राजू ने दसवीं पास की और टाइपिंग भी सीख ली। पार्टी के तमाम नोटिस और तमाम कागज टाइप करने की जिम्मेदारी तब से राजू ने ही संभाली हुई थी।
एक दिन मैंने उनसे पूछा कि जब आप पार्टी से जुड़े तो कम्युनिज्म से क्या समझते थे? तो बोले कि ’’काॅमरेड, 14 बरस की उम्र में मैं कुछ नहीं समझता था। सिर्फ इतना जानता था कि लाल झण्डा पकड़ना सम्मान की बात है। उस वक्त लाल झण्डे की लोग बहुत इज्जत करते थे। उन दिनों इन्दौर की कपड़ा मिलों में 30-35 हजार मजदूर काम करते थे और मजदूरों की आवाज केवल मिल क्षेत्र में ही नहीं बल्कि पूरे शहर में सुनी जाती थी।’’
सन् 1975 में ही मेरी माँ कामरेड इन्दु मेहता ने भी पार्टी की सदस्यता ली थी। उन्हीं दिनों मुझे एक चिट्ठी में मेरी माँ ने लिखा था कि ’’तुम लोगों के लिए एक बेहतर दुनिया छोड़कर जाना चाहती हूँ। इस दुनिया को बेहतर बनाने के लिए समाजवाद कायम करने का संघर्ष जरूरी है।’’ उस वक्त मेरी माँ की उम्र 53 वर्ष थी। वो काॅलेज में राजनीतिशास्त्र पढ़ाती थीं, उन्होंने समाजवाद और माक्र्सवाद के बारे में कई किताबें पढ़ी थीं। लेकिन राजू केसरी जैसे काॅमरेड्स उतनी किताबें नहीं पढ़ते। माक्र्सवाद के बारे में उनकी समझ पार्टी स्कूल से बनती है। वो मानवता की जरूरत और मानवता के लिए संघर्ष के माक्र्सवादी पाठ वहीं सीखते हैं। राजू केसरी मुझे कहा करते थे कि हमने तो माक्र्सवाद काॅमरेड इन्दु मेहता से ही सीखा।
ट्रेड यूनियन की राजनीति भी राजू केसरी ने काम करते-करते और अपने वरिष्ठ साथियों के काम करने के तरीकों को देखकर सीखी। पिछले 35 बरसों में पार्टी और कम्युनिस्ट विचारधारा से राजू ने गहरा संबंध बना लिया था। सही-गलत के बारे में और नये तरीकों की जरूरत के बारे में भी वो सोचते थे और बात करते थे। एक दिन शहीद भवन में बोले, ’’काॅमरेड, मैं ट्रेड यूनियन के काम से संतुष्ट नहीं हूँ। मजदूर हमारे पास आते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि उनके हकों की लड़ाई लाल झण्डे वाली यूनियन ही लड़ सकती है। हम उनका संगठन बनाते हैं। उनके हक की लड़ाई लड़ते हैं। मैनेजमेंट को मजदूरों के हक में झुकाते हैं, लेकिन जब उनकी माँग पूरी हो जाती है तो उन्हें यूनियन की जरूरत नहीं महसूस होती। वो सब छोड़-छाड़कर चले जाते हैं। बताइए काॅमरेड, अगर हम मजदूरों को उनके स्वार्थों से ऊपर उठाकर उनकी राजनीतिक समझ नहीं बना पाये तो ट्रेड यूनियन का क्या काम किया?’’ इन जायज सवालों का सामना करते हुए भी राजू को इस बात में कभी संदेह नहीं रहा कि रास्ते तभी निकलते हैं जब संघर्ष और कोशिशें जारी रखी जाती हैं। इसीलिए उसने लगातार मजदूरों, कर्मचारियों के नये-नये संगठन बनाना जारी रखा। हाल में आपूर्ति निगम के हम्मालों का संगठन और प्राइवेट स्कूलों के शिक्षकों व कर्मचारियों का संगठन बनाने में राजू ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। अपनी तरह से वो कोशिश भी करते थे कि यूनियन में शामिल मजदूर भत्ते-तनख्वाहों तक ही न रुकें बल्कि उनका सही राजनीतिक विचार भी बने। एक बार 15 अगस्त को हम्माल यूनियन के मजदूरों के बीच झण्डा फहराते हुए राजू केसरी मजदूरों से बोले कि ’’भगतसिंह ने हिन्दुस्तान की ऐसी आजादी के लिए कुर्बानी तो नहीं दी थी जहाँ हमारे बच्चों को दूध न मिले, काॅपी-किताब न मिले, उल्टे हम धर्म के नाम पर लड़ें और सब तरह की बेईमानियाँ करें। ये तो भगतसिंह और आजादी के उन सब दीवानों के साथ नाइन्साफी है।’’
असंगठित क्षेत्र में यूनियन को फैलाने का जो काम काॅमरेड राजू केसरी और उनके साथी काॅमरेडों ने किया, उसका महत्त्व इसलिए और भी बढ़ जाता है कि वो ऐसे वक्त में किया गया काम है जब असंगठित तो दूर, संगठित क्षेत्रों की ट्रेड यूनियनों में भी हताशा का माहौल है।
उदारीकरण के मजदूर विरोधी माहौल में ट्रेड यूनियन की राजनीति कितनी कठिन है, राजू जैसे काॅमरेड्स इस किताब को अपने अनुभव की रोशनी में रोज पढ़ते हैं। मैंने उनसे पूछा था कि, ’’काॅमरेड, फिर आप पार्टी के साथ अभी तक क्यों जुड़े हैं?’’ वो बोले, ’’काॅमरेड मैंने आशा नहीं छोड़ी है कि एक वैकल्पिक समाज, शोषणरहित समाज व्यवस्था एक दिन जरूर आएगी। लोग समाजवाद के महत्त्व को एक दिन जरूर समझेंगे। हमें एक अच्छा नेतृत्व चाहिए बस, एक दिन हम समाजवाद के सपने को जरूर सच कर लेंगे।’’
रात को दस-साढ़े दस बजे तक राजू पार्टी का काम करते रहे और फिर आधी रात अचानक अपने अधूरे काम, अधूरी लड़ाइयाँ और अधूरे सपने छोड़कर वो चले गए। मैं उनके घर गयी तो पूरा मोहल्ला भीगी आँखों के साथ बैठा था। उनकी 17 बरस की लड़की शानो मुझसे बात करने लगी अपने पापा के बारे में। मुझसे बोली, ’’आपकी पार्टी कितनी अच्छी है। मेरा भाई भी पार्टी ज्वाइन कर सकता है क्या? अभी वो सिर्फ 13 साल का है। पापा उसे इन्जीनीयर बनाना चाहते थे।’’
उसकी बात सुनकर मुझे लगा कि इतिहास अपने आपको इस शक्ल में दोहराये, ऐसा नहीं होना चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि जैसे कम उम्र में राजू को पार्टी ज्वाइन करने की जरूरत पड़ी, वैसे ही उसके बेटे को पड़े। हम सब जो बचे हैं, पार्टी में राजू केसरी की खाली जगहों को देर-सबेर भर ही लेंगे। लेकिन राजू के बच्चों को इन्जीनीयर, डाॅक्टर, कलाकार या जो भी बनना हो, वो बनने का उन्हें अवसर मिलना चाहिए। हम सभी को मिलकर राजू के बच्चों की अच्छी पढ़ाई की पूरी व्यवस्था करनी चाहिए। बच्चे जब बड़े हों तो सोच-समझकर पार्टी से जुड़ें, वैसी दुनिया बनाने की कोशिशों में अपना हिस्सा बँटाएँ जिसका सपना उनके पापा देखते थे और जिन्दगी की आखिरी साँस तक उसको सच करने की खातिर वे हर छोटा-बड़ा काम करते रहे।
कामरेड राजू केसरी को लाल सलाम।
जया मेहता,
संदर्भ केन्द्र, 26, महावीर नगर, इन्दौर -452018
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गरीबों के साथ सरकार ने किया छलावा : भाकपा

जागरण याहू में यह छापा है आज :
Jun 26, 11:58 pm
मुहम्मदाबाद गोहना (मऊ) । केंद्र सरकार ने पेट्रोल, गैस, डीजल एवं मिट्टी के तेल के दामों में बढ़ोत्तरी करके गरीबों की पीठ में छूरा भोंकने जैसा छलावे का काम किया है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी एवं भारती खेत मजदूर यूनियन संघ के लोग इसके विरोध में सड़कों पर निकलेंगे। उक्त बातें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं राज्य कौंसिल सदस्य रामबचन राम ने शनिवार को कही। वे भारतीय खेत मजदूर संघ के कार्यकर्ताओं को संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि पूंजीपतियों के दबाव में सरकार ने यह कदम उठाया है। डीजल महंगा होने से खेतों की सिंचाई एवं जुताई महंगी होगी जो किसानों के लिये सजा से कम नहीं। रसोई गैस के दामों में बढ़ोत्तरी से आम लोगों को भारी दिक्कत होगी।
इस अवसर पर विक्रम कवि, बेचई प्रसाद, डा.बृजराज चौहान, पतिराज, शशिकांत सिंह, शिव प्रसाद, श्यामा यादव आदि लोग उपस्थित रहे। अध्यक्षता बेचई प्रसाद ने किया।
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शनिवार, 26 जून 2010

बचत पर चोट

अमर उजाला कोम्पक्ट ने आज यह समाचार प्रकाशित किया है :
वाराणसी। बढ़ती कीमतों से जूझ रहे आम उपभोक्ताओं की बचत पर एक और चोट हुई है। एलपीजी, पेट्रोल, डीजल और केरोसिन की कीमतों में वृद्धि ने महंगाई की तितलौकी को नीम चढ़ा दिया। आटा, चावल, चीनी, आलू, प्याज, तेल की कीमतों के ताप से रसोई पहले ही तप रही थी। अब रसोई में महंगाई की आग है और जनता आगबबूला।एक बार फिर सोचने पर विवशरसोई गैस समेत पेट्रोल-डीजल की बढ़ी कीमत ने गृहणियों को एक बार फिर बजट पर सोचने पर विवश कर दिया है। शुक्रवार रात बारह बजे से कीमत में इजाफा कर दिया गया। रही सही कसर केरोसीन की बढ़ी कीमत ने भी पूरी कर दी। बढ़ी हुई कीमत ने शहरवासियों को मायूस कर दिया है। प्रीमियम पेट्रोल की कीमत ५२।९५ रुपये से बढ़ कर ५६.९२ रुपये जबकि प्रीमियम डीजल ३९.०५ रुपये से बढ़कर ४१. २० हो गई है।
आज नहीं होगी कोई बुकिंगशनिवार को हजरत अली की जयंती पर राजकीय अवकाश होने पर शहर की गैस एजेंसियां भी बंद रहेंगी। एलपीजी डिस्ट्रीब्यूशन एसोसिएशन के अध्यक्ष कुमार अग्रवाल ने बताया कि रविवार को एजेंसियों को खोल कर बढ़े हुई कीमत पर ही बुकिंग की जाएगी। उन्होंने बताया कि कीमत तय होने से पहले ही प्लांट से लोड कम कर दिया गया था। इसलिए पहले ही शहर में सिलेंडर की कमी हो गई।नहीं दिया पेट्रोलपेट्रोल-डीजल की कीमत वृद्धि का पता चलते ही दोपहर से ही पेट्रोल और डीजल लेने वालों का तांता लग गया। शाम छह बजे के बाद अधिकतर पेट्रोल पंपों ने सौ रुपये से अधिक पेट्रोल देना बंद कर दिया। कइ तो सादा पेट्रोल बंद कर प्रीमियम की बिक्री करते रहे। रात दस बजे तक शहर के अधिकतर पेट्रोल पंपों ने पेट्रोल की बिक्री ही रोक दी थी।
राजनीतिक दलों की कड़ी प्रतिक्रिया
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने मूल्य में वृद्धि करने की कड़ी आलोचना की है। मूल्य वृद्धि के विरोध में शनिवार को टाउनहाल से विरोध जुलूस निकालने का निर्णय किया है। जुलूस चौक, गोदौलिया होते हुए चितरंजन पार्क पर समाप्त होगा।
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Protests in Orissa over fuel price hike

Thaindian News carried the following item today :26 June 2010 16:14:39 by IANS
Hundreds of workers of the Communist Party of India (CPI) staged a demonstration in front of the office of the Bharat Petroleum at Cuttack, 26 km from here.
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Fuel price hike triggers nationwide protests, bandhs

Hindustan Times today carried the following news :
AgenciesNew Delhi, June 26, 2010First Published: 13:16 IST(26/6/2010)Last Updated: 19:10 IST(26/6/2010) The government's fuel price hike provoked protests in many parts of the country and brought life in some regions to standstill as political parties called for bandhs demanding a rollback of the proposed hike.
The price of diesel went up by Rs 2 a litre, kerosene by Rs 3 a litre and cooking gas by Rs 35 per cylinder. The prices of petrol will now be costlier by Rs 3.50 per litre.
Strike in West Bengal
Buses, taxis and autorickshaws went off the roads on Saturday in response to a public transport strike called by the Centre of Indian Trade Unions (CITU) against the fuel price hike in West Bengal as the handful of taxis and autorickshaws that plied made a killing by charging exorbitant fares. Ferry services on various rivers across the state also did not operate.
The strike was called by CITU, the labour arm of the ruling Communist Party of India-Marxist (CPI-M), hours after the central government on Friday ended government curbs on petroleum pricing and hiked the prices of diesel, kerosene and cooking gas.
Desperate commuters got onto trucks to reach their destinations while cycle rickshaws and the city's runner-pulled rickshaws provided relief to many while charging them more money.
"What can I do? I have to appear for my job interview. I paid Rs 100 to the rickshaw puller for travelling from my home to Ballygunge. I don't know why life is disrupted by calling strikes so often in Bengal," said Kolkata resident Amit Biswas.
Though flights and train services were kept outside the purview of the protest, people had trouble getting transport to reach their destinations from the Netaji Subhas Chandra Bose airport or railway stations.
Car owners were lucky as vehicles meant for private use were exempted from the strike. Metro Railway services, also in the exempted category, also functioned normally.
"There are no reports of any untoward incident. The situation is completely peaceful," state Director General of Police Bhupinder Singh said.
Bandh in Kerala
In Kerala public transport and commercial vehicles were off the roads in response to a bandh call by the CPI(M)-led ruling Left Democratic Front (LDF), reports from across the state said. Universities have postponed the examinations scheduled for the day. There were no reports of any untoward incident from anywhere, police said, adding essential services have been exempted from the strike.
Protests in Maharashtra
Senior BJP leader Gopinath Munde led an agitation of party workers in Mumbai protesting the price hike and over all inflation in the country.
Addressing party workers outside state BJP office in South Mumbai, Munde said, "the anti-people policies of the UPA government are responsible for rising inflation," adding, "this will pose additional burden on the common man."
BJP workers organised similar protests against price rise in other places in Maharashtra, he said.
Agitations in Andhra Pradesh
All Opposition parties in Andhra Pradesh on Saturday took to streets in a massive way protesting the steep hike petroleum product prices and organised agitations even as Chief Minister K Rosaiah said government would take a decision on July 1 on reducing the impact of the hike.
The protesters demanded an immediate rollback in fuel price hike. Praja Rajyam Party (PRP) chief Chiranjeevi, as part of the agitation, participated in a padayatra from Tummalapally auditorium to Sub-Collector’s office after riding a bullock cart fitted with lorry steering for some distance in Vijayawada.
Similarly, CPI State Committee secretary K Narayana also participated in a demonstration in Vijayawada.
Slamming the government for increasing the fuel prices, the protesters burnt the effigy of Central government.
Shutdown in Tripura
The Communist Party of India-Marxist (CPI-M)-led ruling Left Front in Tripura called for a 12-hour shutdown in the state on Monday to protest against the hike in fuel prices.
Left Front spokesperson Gautam Das told reporters that by increasing prices of petrol, diesel, kerosene and cooking gas, the central government "has made the greatest assault on people".
"The dawn-to-dusk strike would be observed Monday to condemn the hike in prices of fuel and to demand withdrawal of the decision," he said.
Demonstrations Punjab and Haryana
Opposing the hike in prices of petro-products, BJP leaders on Saturday staged demonstrations across Chandigarh. BJP workers also held demonstrations at other places in Punjab and Haryana.
Criticism in Jammu and Kashmir
Criticising the Centre for hike in fuel prices, the Jammu and Kashmir unit of CPI(M) today said the "callous and anti-people" decision is a crucial blow to the common man, who are already suffering due to the runaway increase in the prices of food and essential commodities.
Criticism in Tamil Nadu
MDMK leader Vaiko and Dravidar Kazhagam general secretary K Veermani today condemned the hike in the prices of petroleum products and asked the Centre to withdraw it immediately as the increase would push inflation further up. In a statement, Vaiko alleged the hike was only to "cover the uncovered deficit" of the union budget.
He said it had become the UPA government's practice to hike the prices of petroleum products at frequent intervals.
Protests in Orissa
Members of Orissa's ruling Biju Janata Dal (BJD) on Saturday staged protests at various places in the state against the fuel price hike, saying it would "bring a lot of hardship to the people". While the BJD members staged protests inside the assembly, party workers and leaders staged a march in Bhubaneswar shouting slogans against the central government's decision.
Criticism in Uttar Pradesh
Slamming the UPA government for the fresh hike in petroleum-products, Bhartiya Kisan Union (BKU) on Saturday said the move will hit overburdened farmers.
(With IANS and PTI inputs)
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CPI flays fuel price hike

Ludhiana Tribune today published the following news :
Our Correspondent
Ludhiana, June 25The Communist Party of India (CPI) has condemned the hike in prices of petrol and diesel and their linkage with the prevailing market prices.
District unit secretary Kartar Singh Bowani, assistant secretary Arun Mitra, Ramesh Rattan and DP Maur said in a press note here today that the rise in oil prices will hit the common man hard as the people, especially those from the weaker sections, were already reeling under the high prices of essential items.
“It is an irony that instead of thinking of the common man, to whom the government owes moral and constitutional responsibility, it is more concerned about the profits of the oil companies,” they said, demanding an immediate rollback.
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Opposition lambasts fuel price hike,commonman's budget shrinks

NetIndia123 today published the following story :
The hike in fuel prices by the government today drew flak from the Opposition parties as well as some allies of the United Progressive Alliance, even though the business community, the Oil Marketing Companies and some experts described the move as a reform which brooked no delay.
The Opposition lambasted the government for its 'anti-people stance' as it will fuel the fires of inflation further. In the same category was Railway Minister Mamata Banerjee who said the hit will be taken by the common man. In fact, Ms Banerjee did not attend the EGOM which decided on the price hike, expressing her annoyance by not doing so. The business community was satisfied that the government was finally moving towards a market driven economy and giving way to the administered price mechanism. The EGoM this morning raised the price of petrol by completely decontrolling it.
As a consequence of this the price of petrol will go up Rs 3.60 litre. While the EGoM decided in principle to deregulate the price of diesel, it decided to increase its price by Rs two a litre. Kerosene will be costlier by Rs three a litre and LPG will go up by Rs 35 a cylinder. The wrath of the Opposition is likely to manifest itself in the next session of Parliament, who refuse to see the logic of the government of preventing the OMCs from bleeding white. The shares of oil firms moved up and the Chief Economic Adviser Kaushik Basu said the deregulated mechanism is better as when international crude prices go down domestic retail prices too will move Southwards. In all this jungle of voices, Laxman's common man was lost for all he understood is that the move will dig a bigger hole in his pocket.
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In Uttar Pradesh, xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx
In a similar reaction, CPI state unit secretary Dr Girish said the party would protest the move of the central government and stage demonstration on June 26 at all the district centers and divisional party offices.
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पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी के खिलाफ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी कार्यकर्ताओं का लखनऊ में प्रदर्शन

लखनऊ 26 जून। पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों पर से सरकारी नियंत्रण हटाकर उसे बाजार की ताकतों के हवाले कर पेट्रोल, डीजल, मिट्टी के तेल तथा रसोई गैस की कीमतों में एक बार फिर बढ़ोतरी के खिलाफ संप्रग-2 सरकार का पुतला लेकर भाकपा कार्यालय से प्रान्तीय कोषाध्यक्ष प्रदीप तिवारी, जिला मंत्री मो. खालिक तथा सह मंत्री ओ.पी. अवस्थी के नेतृत्व में भाकपा कार्यकर्ताओं ने महंगाई और पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी के खिलाफ गगनभेदी नारे लगाते हुए एक जुलूस निकाला जिसे कैसरबाग चौराहे पर भारी संख्या में पुलिस बल ने आकर जलाने नहीं दिया। आक्रोश में भाकपा कार्यकर्ताओं ने चौराहे पर संप्रग एवं बसपा सरकारों के खिलाफ गगनभेदी नारे लगाये। भाकपा द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि महंगाई के खिलाफ चल रहे आन्दोलन में भाकपा कार्यकर्ताओं से पहली बार पुलिस से झड़प महंगाई बढ़ाने और पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों की बढ़ोतरी में मायावती सरकार की संलिप्तता साबित करती है। मायावती को अब यह लगने लगा है कि जनता उनके पुतले फूंक रही है जिसे वह बर्दाश्त नहीं कर पा रही हैं और उनके निर्देश पर ही प्रशासन इस तरह से जनता के आक्रोश को दबाने का प्रयास कर रहा है। ज्ञातव्य हो कि बसपा संसद में लगातार संप्रग-2 सरकार का साथ दे रही है। प्रदर्शन में ट्रेड यूनियन नेता अजीत श्रीवास्तव, ए.के.सिंह गांधी, अनिल श्रीवास्तव, गिर बहादुर, बाबू नन्दन, कमल कुमार, कंधई राम, ए.के.मिश्रा, रंग कर्मी रिजवान, किसान नेता सिया राम यादव, सिया राम लोधी, फूल चन्द, मुख्तार अहमद, शमशेर बहादुर सिंह, परमानन्द, सरजू प्रसाद, सत्य नारायण, सुरेश गौतम आदि विशेष रूप से शामिल थे।
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शुक्रवार, 25 जून 2010

पेट्रोल, डीजेल, मिट्टी के तेल और रसोई गैस की कीमतों में बढ़ोतरी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करो - भाकपा

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की उत्तर प्रदेश राज्य कौंसिल ने अपने सभी साथिओं को पेट्रोल, डीजेल, मिट्टी के तेल और रसोई गैस की कीमतों में बढ़ोतरी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने का आह्वान किया है। लखनऊ में कल २५ जून को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कैसर बाग ऑफिस में दोपहर ११ बजे संप्रग दो सरकार का पुतला फूका जायेगा। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की लखनऊ जिला कौंसिल ने आम जनता से अनुरोध किया है कि वह अधिक से अधिक संख्या में इस प्रदर्शन में शामिल हो.
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CPI UP APPEALS YOU TO DONATE FOR ORGANISING UNORGANISED WORKING CLASS



COMMUNIST PARTY OF INDIA IS THE PARTY OF THE WORKING CLASS.

SINCE 1925, WE ARE FIGHTING FOR THE CAUSE OF TOILING MILLIONS OF THE COUNTRY.

DURING LAST TWO YEARS, WE ARE TRYING REBUILD THE WORKING CLASS MOVEMENT AS WELL AS THE PARTY OF THE WORKING CLASS IN UTTAR PRADESH. WE UNDERTAKEN SO MANY TASKS IN THE PAST.

TO CONTINUE OUR EFFORTS WITH SAME PACE, WE NEED MONEY AND FOR THAT WE URGE & APPEAL ALL.

DONATIONS MAY BE DEPOSITED AT ANY OF THE BRANCHES OF UNION BANK OF INDIA IN A/C NO. 353302010017252 IN THE NAME & STYLE OF “COMMUNIST PARTY OF INDIA, U.P. STATE COUNCIL”

(IFSC CODE FOR NEFT OR RTGS REMITTANCES UBIN0535338

OR

ANY OF THE BRANCHES OF PUNJAB NATIONAL BANK IN A/C NO. 2411000100117691 IN THE NAME & STYLE OF “COMMUNIST PARTY OF INDIA, U.P. STATE COUNCIL”

AFTER DEPOSITING THE AMOUNT, PLEASE INFORM US THE NAME OF THE BANK & BRANCH WHERE THE AMOUNT HAS BEEN DEPOSITED AND ALSO THE DATE & AMOUNT AND ALSO YOUR ADDRESS THROUGH E-MAIL (revolt@sancharnet.in; cpi943@dateone.in) OR THROUGH SMS ON 9450446654 TO FACILITATE RECONCILIATION WITH THE CONCERNED BANK AND DISPATCH OF RECEIPT FROM OUR OFFICE.

WE TRUST TO HEAR YOU SHORTLY & POSITIVELY. WE ALSO REQUEST YOU TO KINDLY FORWARD THIS MESSAGE TO AS MANY COMRADES AS POSSIBLE AND HELP US IN FURTHERANCE OF THIS CAUSE.

WITH GREETINGS.

COMMUNIST PARTY OF INDIAU.P. STATE COUNCIL
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नये मनुष्य, नये समाज के निर्माण की कार्यशाला: क्यूबा-5

साम्राज्यवाद का दुःस्वप्नः क्यूबा और फिदेल
आइजनहावर, कैनेडी, निक्सन, जिमी कार्टर, जानसन, फोर्ड, रीगन, बड़े बुश औरछोटे बुश, बिल क्लिंटन और अब ओबामा-भूलचूक लेनी-देनी भी मान ली जाए तोअमेरिका के 10 राष्ट्रपतियों की अनिद्रा की एक वजह लगातार एक ही मुल्कबना रहा - क्यूबा।1991 में जब सोवियत संघ बिखरा और यूरोप की समाजवादी व्यवस्थाएँ भी एक केबाद एक ढहती चली गईं तो यह सिर्फ पूँजीवादियों को ही नहीं वामपंथियों कोभी लगने लगा था कि अब क्यूबा नहीं बचेगा। फिर जब फिदेल कास्त्रो कीबीमारी और फिर मौत की अफवाह फैलाई गई तब भी यही लगा था कि फिदेल के मरनेके बाद कौन होगा जो इतनी समझदारी और कूटनीति से काम लेते हुए क्यूबा कोअमेरिकी आॅक्टोपस से बचाये रख सके।लेकिन क्यूबा बना रहा। न केवल बना रहा बल्कि अपने चुने हुए रास्ते परमजबूत कदमों के साथ आगे बढ़ता रहा।फिदेल कास्त्रो को मारने और क्यूबा की आजादी खत्म करने की कितनी कोशिशेंअमेरिका की तरफ से हुई हैं, इसकी गिनती लगाते-लगाते ही गिनती बढ़ जाती है।सन 2006 में यू0के0 में चैनल 4 ने एक डाॅक्युमेंट्री प्रसारित की थीजिसका शीर्षक था-कास्त्रो को मारने के 638 रास्ते (638 वेज टु किलकास्त्रो)। फिल्म में फिदेल कास्त्रो को मारने के अमेरिकी प्रयासों का एकलेखा-जोखा प्रस्तुत किया गया था जिसमें सी.आई.ए. की मदद से फिदेल कोसिगार में बम लगाकर उड़ाने से लेकर जहर का इंजेक्शन देने तक के सारेकायराना हथकंडे अपनाए गए थे। तकरीबन 40 बरस तक फिदेल कास्त्रो के सुरक्षाप्रभारी और क्यूबा की गुप्तचर संस्था के प्रमुख रहे फेबियन एस्कालांतेबताते हैं कि ’लाल शैतान’ को खत्म करने के लिए अमेरिका, सी0आई0ए0 औरक्यूबा के भगोड़े व गद्दारों ने हर मुमकिन कोशिश की। फिल्म के निर्देशकडाॅलन कैन्नेल और निर्माता पीटर मूर ने अमेरिका में ऐशो-आराम की जिंदगीबिता रहे ऐसे बहुत से लोगों से मुलाकात की, जिन पर फिदेल की हत्या कीकोशिशों का इल्जाम है। उनमें से एक सी0आई0ए0 का रिटायर्ड अधिकारी फेलिक्सरोड्रिगुएज भी था जो 1961 में क्यूबा पर अमेरिकी हमले के वक्त क्यूबा केविरोधियों का प्रशिक्षक था और जो 1967 में चे ग्वेवारा के कत्ल के वक्तबोलीविया में भी मौजूद था। यहाँ तक कि अमेरिकी जासूसी एजेंसियों कीनाकामियों से परेशान होकर अमेरिकी हुक्मरानों ने फिदेल को मारने के लिएमाफिया की भी मदद ली थी।कुछ बरसों पहले 80 पार कर चुके फिदेल कास्त्रो भाषण देते हुए हवाना मेंचक्कर खाकर गिर गए थे। उनकी पैर की हड्डी भी इससे टूट गई थी। बस, फिरक्या था। अमेरिकी अफवाह तंत्र पूरी तरह सक्रिय होकर फिदेल की मृत्यु कीअफवाहें फैलाने लगा। लेकिन फिदेल ने फिर दुनिया के सामने आकर सब अफवाहोंको ध्वस्त कर दिया। जब फिदेल के डाॅक्टर से किसी पत्रकार ने पूछा कि क्याउनकी जिंदगी का यह आखिरी वक्त है तो डाॅक्टर ने कहा कि फिदेल 140 बरस कीउम्र तक स्वस्थ रह सकते हैं।लेकिन फिदेल ने क्यूबा की जिम्मेदारियों को सँभालने में सक्षम लोगों कीपहचान कर रखी थी। सन् 2004 से ही धीरे-धीरे फिदेल ने अपनी सार्वजनिकउपस्थिति को कम करना शुरू कर दिया था। फिर 2006 में फिदेल ने अपनीजिम्मेदारियाँ अस्थायी तौर पर राउल कास्त्रो को सौंपीं। चूँकि राउलकास्त्रो फिदेल के छोटे भाई भी हैं इसलिए सारी दुनिया में पूँजीवादीमीडिया को फिर दुष्प्रचार का एक बहाना मिला कि कम्युनिस्ट भी परिवारवादसे बाहर नहीं निकल पाए हैं। लेकिन ये बात कम लोग जानते हैं कि राउलकास्त्रो फिदेल के भाई होने की वजह से नहीं बल्कि अपनी अन्य योग्यताओं कीवजह से क्यूबा के इंकलाब के मजबूत पहरेदार चुने गए हैं। सिएरा मास्त्राके पहाड़ों पर 1956 में जिस सशस्त्र अभियान में चे और फिदेल अपने 80 अन्यसाथियों के साथ ग्रान्मा जहाज में मैक्सिको से क्यूबा आए थे, राउल उसअभियान का बेहद महत्त्वपूर्ण हिस्सा थे। बटिस्टा की फौजों से चंद महीनोंके भीतर हुई सैकड़ों मुठभेड़ों में फिदेल, चे, राउल और उनके 10 अन्यसाथियों को छोड़ बाकी सभी मारे गए थे। यह भी कम लोग जानते हैं कि फिदेल केकम्युनिस्ट बनने से भी पहले से राउल कम्युनिस्ट बन चुके थे। न सिर्फ जंगके मैदान में एक फौज के प्रमुख की तरह बल्कि सामाजिक-आर्थिक और राजनैतिकचुनौतियों का भी राउल कास्त्रो ने मुकाबला किया है। मंदी के संकटपूर्ण ौरमें खेती की उत्पादकता बढ़ाने के लिए आज क्यूबा के जिस शहरी खेती केप्रयोग की दुनिया भर में प्रशंसा होती है, वह दरअसल राउल कास्त्रो की हीकल्पनाशीलता का नतीजा है।बेशक पूरी दुनिया में फिदेल एक जीवित किंवदंती हैं इसलिए क्यूबा से बाहरकी दुनिया में हर क्यूबाई उपलब्धि चे और फिदेल के खाते में ही जाती है।लेकिन इसका मतलब यह भी है कि फिदेल ने अपना इतना विस्तार कर लिया है किवहाँ अनेक अनुभवी व नये लोग तैयार हैं। राउल कास्त्रो सिर्फ फिदेल के भाईहोने का नाम ही नहीं, बल्कि इंकलाब की जिम्मेदारी सँभालने के लिए तैयारलोगों में से एक नाम है।
इंकलाब का बढ़ता दायरा
आज सोवियत संघ को विघटित हुए करीब दो दशक पूरे हो रहे हैं। ऐसी कोई बड़ीताकत दुनिया में नहीं है जो अमेरिका को क्यूबा पर हमला करने से रोक सके।क्यूबा से कई गुना बड़े देश इराक और अफगानिस्तान को अमेरिका ने सारीदुनिया के विरोध के बावजूद ध्वस्त कर दिया। चीन में कहने के लिएकम्युनिस्ट शासन है लेकिन बाकी दुनिया के कम्युनिस्ट ही उसे कम्युनिज्मके रास्ते से भटका हुआ कहते हैं। उत्तरी कोरिया ने अपनी सुरक्षा के लिएपरमाणु शक्ति संपन्न बनने का रास्ता अपनाया है। फिर अब अमेरिका को कौन सीताकत क्यूबा को नेस्तनाबूद करने से रोकती है? वह ताकत क्यूबा कीक्रान्तिकारी जनता की ताकत है जिसे पूरी दुनिया की मेहनतकश और इंसाफ पसंदजनता अपना हिस्सा समझती है और अपनी ताकत का एक अंश सौंपती है।पिछले बीस बरसों से वे लगातार चुनौतियों से जूझ रहे हैं अनेक मोर्चों परबिजली की कमी की समस्याएँ, रोजगार में कमी, उत्पादन और व्यापार में कमीऔर बाहरी दुनिया के दबाव अपनी जगह बदस्तूर कायम हैं ही, फिर भी, इतने कमसंसाधनों और इतनी ज्यादा मुसीबतों के बावजूद क्यूबा ने शिक्षा,स्वास्थ्य, सुरक्षा और जन पक्षधर जरूरी चीजों को अपने नागरिकों के लिएअनुपलब्ध नहीं होने दिया। अप्रैल 2010 में क्यूबा के लाखों युवाओं कोसंबोधित करते हुए राउल कास्त्रो ने कहा कि ’इतनी मुश्किलों में से उबरनेकी ताकत सिर्फ सामूहिक प्रयासों और मनुष्यता को बचाने की प्रतिबद्धता सेही आती है, और वह ताकत समाजवाद की ताकत है।’ ये सच है कि कई मायनों मेंक्यूबा की जनता आज सबसे मुश्किल दौर से गुजर रही है। लेकिन वे जानते हैंकि इसका सामना करने और हालातों को अपने पक्ष में मोड़ लेने के अलावा दूसराकोई विकल्प नहीं है। सर्वग्रासी पूँजीवाद अपने जबड़े फैलाए क्यूबा केइंकलाब को निगलने के लिए 50 वर्षों से ताक में है। चे ने 1961 में लिखाथा कि गलतियाँ तो होती हैं लेकिन ऐसी गलतियाँ न हों जो त्रासदी बन जाएँ।क्यूबाई जनता जानती है कि समाजवाद के बाहर जाने की गलती त्रासदियाँलाएगी।आज सिर्फ क्यूबा में ही नहीं, सारी दुनिया में हर उस शख्स के भीतर कीआवाज फिदेल और क्यूबा के लोगों और क्यूबा की आजादी के साथ है जिसके भीतरअन्याय के खिलाफ जरा भी बेचैनी है। आज चे, फिदेल और क्यूबा सिर्फ एक देशतक महदूद नाम नहीं हैं बल्कि वे पूरी दुनिया के और खासतौर पर पूरे दक्षिणअमेरिका के साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन के प्रतीक हैं। अमेरिका जानता हैकि फिदेल और क्यूबा पर किसी भी तरह का हमला अमेरिका के खिलाफ एक ऐसेविश्वव्यापी जबर्दस्त आंदोलन की वजह बन सकता है जिसकी लहरों से टकराकरसाम्राज्यवाद-पूँजीवाद की नाव तिनके की तरह डूब जाएगी।क्यूबा की प्रेरणा, जोश और फिदेल की अनुभवी सलाहों के मार्गदर्शन में आजलैटिन अमेरिका के अनेक देशों में अमेरिकी साम्राज्यवाद और सरमायादारी केखिलाफ आंदोलन मजबूत हुए हैं और वेनेजुएला और बोलीविया में तो परेशानहालजनता ने इन शक्तियों को सत्ता भी सौंपी है। अपनी ताकत को बूँद-बूँदसहेजते हुए पूरी सतर्कता के साथ ये आगे बढ़ रहे हैं। क्यूबा ने उनकी ताकतको बढ़ाया है और वेनेजुएला के राष्ट्रपति चावेज और बोलीवियाई राष्ट्रपतिइवो मोरालेस के उभरने से क्यूबा को भी बल मिला है। अमेरिकी चक्रव्यूह सेअन्य देशों को भी निजात दिलाने के लिए वेनेजुएला की पहल पर लैटिन अमेरिकीदेशों को एकजुट करके ’बोलीवेरियन आल्टरनेटिव फाॅर दि अमेरिकाज’ (एएलबीए)और बैंक आॅफ द साउथ के दो क्षेत्रीय प्रयास किए हैं जिनसे निश्चित हीपूँजीवाद के बनाए भीषण मंदी के दलदल में फँसे देशों को कुछ सहारा भीमिलेगा और साथ ही समाजवादी विकल्प में उनका विश्वास बढ़ेगा। अब तक इनप्रयासों में हाॅण्डुरास, निकारागुआ, डाॅमिनिका, इक्वेडोर, एवं कुछ अन्यदेश जुड़ चुके हैं। यह देश मिलकर अमेरिका की दादागीरी को कड़ी व निर्णायकचुनौती दे सकते हैं। नये दौर में ऐसी ही रणनीतियाँ तलाशनी होंगी।
-विनीत तिवारीमोबाइल : 09893192740
(क्रमश:)
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नये मनुष्य, नये समाज के निर्माण की कार्यशाला: क्यूबा -1

1959 में जब क्यूबा में सशस्त्र संघर्ष द्वारा बटिस्टा की सरकार कोअपदस्थ करके फिदेल कास्त्रो, चे ग्वेवारा और उनके क्रान्तिकारी साथियोंने क्यूबा की जनता को पूँजीवादी गुलामी और शोषण से आजाद कराया तो उसकेबाद मार्च 1960 में माक्र्सवाद के दो महान विचारक और न्यूयार्क से निकलनेवाली माक्र्सवादी विचार की प्रमुखतम् पत्रिकाओं में से एक के संपादकद्वयपॉल स्वीजी और लिओ ह्यूबरमेन तीन हफ्ते की यात्रा पर क्यूबा गए थे। अपनेअध्ययन, विश्लेषण और अनुभवों पर उनकी लिखी किताब ’क्यूबाः एनाटाॅमी आॅफ एरिवाॅल्यूशन’ को वक्त के महत्त्व के नजरिये से पत्रकारिता, और गहरीतीक्ष्ण दृष्टि के लिए अकादमिकता के संयोग का बेहतरीन नमूना माना जाताहै। आज भी क्यूबा को, वहाँ के लोगों, वहाँ की क्रान्ति और हालातों कोसमझने का यह एक ऐतिहासिक दस्तावेज है। बहरहाल, अपनी क्यूबा यात्रा की वजहसे उन्हें अमेरिकी सरकार और गुप्तचर एजेंसियों के हाथों प्रताड़ित होनापड़ा था। ऐसे ही मौके पर दिए गए एक भाषण के कारण 7 मई 1963 को उन्हेंअमेरिका विरोधीगतिविधियों में लिप्त होने और क्यूबा की अवैध यात्रा करने और कास्त्रोसरकार के प्रोपेगंडा अभियान का हिस्सा होने के इल्जाम में एक सरकारीसमिति ने जवाब-तलब किया था। वह पूछताछ स्मृति के आधार पर प्रकाशित की गईथी। उसी के एक हिस्से का हिन्दी तर्जुमाःसवालः यह मंथली रिव्यू में 1960 से 1963 के दौरान क्यूबा पर प्रकाशितलेखों की एक सूची है। क्या यह सही है?जवाबः यह सही तो है, लेकिन अधूरी है। हमने क्यूबा पर इससे ज्यादा लेखछापे हैं।सवालः क्या इन लेखों को छापने के लिए आपको क्यूबाई सरकार ने कहा था?जवाबः हर्गिज नहीं। हमने ये लेख अपने विवेक से प्रकाशित किए क्योंकिहमारी दिलचस्पी लम्बे समय से इस बात में है कि गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी,अशिक्षा, रिहाइश के खराब हालात और अविकसित देशों में महामारी की तरहमौजूद असंतुलित अर्थव्यवस्था से उपजने वाली जो बुराइयाँ हैं, उनसे किसतरह निजात पाई जा सकती है। क्यूबा में क्रान्ति की गई और इन समस्याओं कोहल किया गया। लैटिन अमेरिका के दूसरे देशों में ये बुराइयाँ अभी भी मौजूदहैं। सारे अविकसित लैटिन अमेरिकी देशों में सिर्फ एक ही देश है जहाँ येबुराइयाँ खत्म की जा सकीं, और वह है क्यूबा।सवालः क्या आप लैटिन अमेरिका के देशों में कम्युनिस्ट कब्जे/ तख्तापलट कीहिमायत कर रहे हैं?जवाबः मैंने ऐसा नहीं कहा बल्कि आपने कहा। मैंने कहा कि ये सारी बुराइयाँसभी अविकसित देशों के लिए बड़ी समस्याएँ हैं, जिनमें लैटिन अमेरिका के देशभी शामिल हैं, और मेरे खयाल से इन समस्याओं का हल उस तरह के इंकलाब सेनिकलेगा, जो फिदेल कास्त्रो ने क्यूबा में किया है।प्रसंगवश मैं ये भी बता दूँ कि लैटिन अमेरिका के लिए इस तरह के इंकलाब कीतरफदारी मैं तब से कर रहा हूँ जब फिदेल कास्त्रो की उम्र सिर्फ करीब 10बरस रही होगी।सवालः क्या आप क्यूबा की कम्युनिस्ट सरकार के प्रोपेगैंडिस्ट (प्रचारक)हैं?जवाबः मैं क्यूबा की ही नहीं, किसी भी सरकार का, या किसी पार्टी का याकिसी और संगठन का प्रोपेगैंडिस्ट नहीं हूँ, लेकिन हाँ, मैंप्रोपेगैंडिस्ट हूँ-सच्चाई का।इसके भी पहले लिओ ह्यूबरमैन ने जून 1961 में दिए एक भाषण में जो कहा था,वह आज भी प्रासंगिक है।’’मैं एक क्षण के लिए भी स्वतंत्र चुनावों, अभिव्यक्ति की आज़ादी या प्रेसकी आज़ादी के महत्त्व को कम नहीं समझता हूँ। ये उन लोगों के लिए बेहदजरूरी और सबसे महत्त्वपूर्ण आज़ादियाँ हैं जिनके पास खाने के लिए भरपूरहै, रहने, पढ़ने-लिखने और स्वास्थ्य की देखभाल करने के लिए अच्छी सुविधाएँहैं, लेकिन इन आजादियों की जरूरत उनके लिए सबसे पहली नहीं है जो भूखेहैं, निरक्षर हैं, बीमार और शोषित हैं। जब हममें से कुछ भरे पेट वालेखाली पेट वालों को जाकर यह कहते हैं कि उनके लिए मुक्त चुनाव सबसे बड़ीजरूरत हैं तो वे नहीं सुनेंगे; वे बेहतर जानते हैं कि उनके लिए दुनियामें सबसे ज्यादा जरूरी क्या है। वे जानते हैं कि उनके लिए सबसे ज्यादा औरकिसी भी और चीज से पहले जरूरी है रोटी, जूते, उनके बच्चों के लिए स्कूल,इलाज की सुविधा, कपड़े और एक ठीक-ठाक रहने की जगह। जिंदगी की ये सारीजरूरतें और साथ में आत्म सम्मान-ये क्यूबाई लोगों को उनके समूचे इतिहासमें पहली बार हासिल हो रहा है। इसीलिए, जो जिंदगी में कभी भूखे नहीं रहे,उन्हेें ताज्जुब होता है कि वे (क्यूबा के लोग) कम्युनिज्म का ठप्पाचस्पा होने से घबराने के बजाय उत्साह में ’पैट्रिया ओ म्यूर्ते’ (देश यामौत) का नारा क्यों लगाते हैं।’’जुल्म जब हद से गुजर जाए तो1959 में क्यूबा में क्रान्ति होने के पहले तक बटिस्टा की फौजी तानाशाहीवाली अमेरिका समर्थित सरकार थी। बटिस्टा ने अपने शासनकाल के दौरान क्यूबाको वहशियों की तरह लूटा था। अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने पर ही नहीं,शासकों के मनोरंजन के लिए भी वहाँ आम लोगों को मार दिया जाता था। अमेरिकाके ठीक नाक के नीचे होने वाले इस अन्याय को अमेरिकी प्रशासन देखकर भीअनदेखा किया करता था क्योंकि एक तो क्यूबा के गन्ने के हजारों हेक्टेयरखेतों पर अमेरिकी कंपनियों का कब्जा था, चारागाहों की लगभग सारी ही जमीनअमेरिकी कंपनियों के कब्जे में थी, क्यूबा का पूरा तेल उद्योग और खनिजसंपदा पर अमेरिकी व्यावसायिक घराने ही हावी थे। वे हावी इसलिए हो सके थेक्योंकि फौजी तानाशाह बटिस्टा ने अपने मुनाफे के लिए अपने देश का सबकुछबेचना कबूल कर लिया था।
-विनीत तिवारीमोबाइल : 09893192740
(क्रमश:)
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नये मनुष्य, नये समाज के निर्माण की कार्यशाला: क्यूबा -2

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद हालात और खराब हुए। बटिस्टा ने क्यूबा कोअमेरिका से निकाले गए अपराधियों की पनाहगाह बना दिया। बदले में अमेरिकीमाफिया ने बटिस्टा को अपने मुनाफों में हिस्सेदारी और भरपूर ऐय्याशियाँमुहैया कराईं। उस दौर में क्यूबा का नाम वेश्यावृत्ति, कत्ले आम, औरनशीली दवाओं के कारोबार के लिए इतना कुख्यात हो चुका था कि 22 दिसंबर1946 को हवाना के होटल में कुख्यात हवाना कांफ्रेंस हुई जिसमें अमेरिकाके अंडर वल्र्ड के सभी सरगनाओं ने भागीदारी की। यह सिलसिला बेरोक-टोकचलता रहा।1955 में बटिस्टा ने ऐलान किया कि क्यूबा किसी को भी जुआघर खोलने कीइजाजत दे सकता है बशर्ते कि वह व्यक्ति या कंपनी क्यूबा में होटल उद्योगमें 10 लाख अमेरिकी डालर का या नाइट क्लब में 20 लाख डाॅलर का निवेश करे।इससे अमेरिका में कैसिनो के धंधे में नियम कानूनों से परेशान कैसिनोमालिकों ने क्यूबा का रुख किया। जुए के साथ तमाम नये किस्म के अपराध औरअपराधी क्यूबा में दाखिल हुए। अमेरिका के प्रति चापलूस रहने में बटिस्टाका फायदा यह था कि अपनी निरंकुश सत्ता कायम रखने के लिए उसे अमेरिका सेहथियारों की अबाध आपूर्ति होती थी। यहाँ तक कि अमेरिकी राष्ट्रपतिआइजनहाॅवर के जमाने में क्यूबा को दी जाने वाली पूरी अमेरिकी सहायताहथियारों के ही रूप में होती थी। एक तरह से ये दो अपराधियों का साझा सौदाथा।आइजनहाॅवर की नीतियों का विरोध खुद अमेरिका के भीतर भी काफी हो रहा था।आइजनहाॅवर के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी और उनके बाद अमेरिका के राष्ट्रपतिबने जाॅन एफ0 कैनेडी ने आइजनहाॅवर की नीतियों की आलोचना करते हुए कहा थाः’सारी दुनिया में जिन देशों पर भी उपनिवेशवाद हावी है, उनमें क्यूबाजितनी भीषण आर्थिक लूट, शोषण और अपमान किसी अन्य देश का नहीं हुआ है, औरइसकी कुछ जिम्मेदारी बटिस्टा सरकार के दौरान अपनाई गई हमारे देश कीनीतियों पर भी है।’ इसके भी आगे जाकर आइजनहाॅवर की नीतियों की आलोचनाकरते हुए कैनेडी ने क्यूबा की क्रान्ति का व फिदेल और उनके क्रान्तिकारीसाथियों का समर्थन भी किया।लेकिन यह समर्थन वहीं खत्म भी हो
गया जब उन्हें समझ आया कि क्यूबा की क्रांति सिर्फ एक देश के शासकों काउलटफेर नहीं, बल्कि वह एक नये समाज की तैयारी है और पूँजीवाद के बुनियादीतर्क शोषण के ही खिलाफ है, और इसीलिए उस क्रान्ति को समाजवाद के भीतर हीअपनी जगह मिलनी थी।बटिस्टा सरकार के दौरान जो हालात क्यूबा में थे, उनके प्रति एक ज़बर्दस्तगुस्सा क्यूबा की जनता के भीतर उबल रहा था। फिदेल कास्त्रो के पहले भीबटिस्टा के तख्तापलट की कुछ नाकाम कोशिशें हो चुकी थीं। विद्रोही शहीदहुए थे और बटिस्टा और भी ज्यादा निरंकुश। खुद अमेरिका द्वारा माने गयेआँकड़े के मुताबिक बटिस्टा ने महज सात वर्षों के दौरान 20 हजार से ज्यादाक्यूबाई लोगों का कत्लेआम करवाया था। इन सबके खिलाफ फिदेल के भीतर भीगहरी तड़प थी। जब फिदेल ने 26 जुलाई 1953 को मोंकाडा बैरक पर हमला बोल करबटिस्टा के खिलाफ विद्रोह की पहली कोशिश की थी तो उसके पीछे यही तड़प थी।अगस्त 1953 में फिदेल की गिरफ्तारी हुई और उसी वर्ष उन्होंने वह तकरीर कीजो दुनिया भर में ’इतिहास मुझे सही साबित करेगा’ के शीर्षक से जानी जातीहै। उन्हें 15 वर्ष की सजा सुनायी गई थी लेकिन दुनिया भर में उनके प्रतिउमड़े समर्थन की वजह से उन्हें 1955 में ही छोड़ना पड़ा। 1955 में ही फिदेलको क्यूबा में कानूनी लड़ाई के सारे रास्ते बन्द दिखने पर क्यूबा छोड़मैक्सिको जाना पड़ा जहाँ फिदेल पहली दफा चे ग्वेवारा से मिले। जुलाई 1955से 1 जनवरी 1959 तक क्यूबा की कामयाब क्रान्ति के दौरान फिदेल ने राउलकास्त्रो, चे और बाकी साथियों के साथ अनेक छापामार लड़ाइयाँ लड़ीं, अनेकसाथियों को गँवाया लेकिन क्यूबा की जनता और जमीन को शोषण से आजाद करानेका ख्वाब एक पल भी नजरों से ओझल नहीं होने दिया।
-विनीत तिवारीमोबाइल : 09893192740
(क्रमश:)
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नये मनुष्य, नये समाज के निर्माण की कार्यशाला: क्यूबा-3

हम कम्युनिस्ट नहीं हैं: फिदेल (1959)
1 जनवरी 1959 को क्यूबा में बटिस्टा के शोषण को हमेशा के लिए समाप्त करनेके बाद अप्रैल, 1959 में फिदेल एसोसिएशन आॅफ न्यूजपेपर एडिटर्स केआमंत्रण पर अमेरिका गये जहाँ उन्होंने एक रेडियो इंटरव्यू में कहा कि’मैं जानता हूँ कि दुनिया सोचती है कि हम कम्युनिस्ट हैं पर मैंनेबिल्कुल साफ तौर पर यह कहा है कि हम कम्युनिस्ट नहीं हैं।’ उसी प्रवास केदौरान फिदेल की साढ़े तीन घंटे की मुलाकात अमेरिकी उप राष्ट्रपति निक्सनके साथ भी हुई जिसके अंत में निक्सन का निष्कर्ष यह था कि ’या तोकम्युनिज्म के बारे में फिदेल की समझ अविश्वसनीय रूप से बचकानी है या फिरवे ऐसा कम्युनिस्ट अनुशासन की वजह से प्रकट कर रहे हैं।’ लेकिन फिदेल नेमई में क्यूबा में अपने भाषण में फिर दोहरायाः ’न तो हमारी क्रान्तिपूँजीवादी है, न ये कम्युनिस्ट है, हमारा मकसद इंसानियत को रूढ़ियों से,बेड़ियों से मुक्त कराना और बगैर किसी को आतंकित किए या जबर्दस्ती किए,अर्थव्यवस्था को मुक्त कराना है।’बहरहाल न कैनेडी के ये उच्च विचार क्यूबा के बारे में कायम रह सके और नफिदेल को ही इतिहास ने अपने इस बयान पर कायम रहने दिया। जनवरी 1959 सेअक्टूबर आते-आते जिस दिशा में क्यूबा की क्रान्तिकारी सरकार बढ़ रही थी,उससे उनका रास्ता समाजवाद की मंजिल की ओर जाता दिखने लगा था। मई में भूमिकी मालिकी पर अंकुश लगाने वाला कानून लागू कर दिया गया था, समुंदर केकिनारों पर निजी स्वामित्व पहले ही छीन लिया गया था। अक्टूबर में चे कोक्यूबा के उद्योग एवं कृषि सुधार संबंधी विभाग का प्रमुख बना दिया गया थाऔर नवंबर में चे को क्यूबा के राष्ट्रीय बैंक के डाइरेक्टर की जिम्मेदारीभी दे दी गई थी। बटिस्टा सरकार के दौरान क्यूबा के रिश्ते बाकी दुनिया केतरक्की पसंद मुल्को के साथ कटे हुए थे, वे भी 1960 में बहाल कर लिए गए।सोवियत संघ और चीन के साथ करार किए गए तेल, बिजली और शक्कर का साराअमेरिकी व्यवसाय जो बटिस्टा के जमाने से क्यूबा में फल-फूल रहा था, सरकारने अपने कब्जे में लेकर राष्ट्रीयकृत कर दिया। जुएखाने बंद कर दिए गए।पूरा क्यूबाई समाज मानो कायाकल्प के एक नये दौर में था।यह कायाकल्प अमेरिकी हुक्मरानों और अमेरिकी कंपनियों के सीनों पर साँप कीतरह दौड़ा रहा था। आखिर 1960 की ही अगस्त में आइजनहाॅवर ने क्यूबा पर सख्तआर्थिक प्रतिबंध लगा दिए। क्यूबा को भी इसका अंदाजा तो था ही इसलिए उसनेमुश्किल वक्त के लिए दोस्तों की पहचान करके रखी थी। रूस और चीन ने क्यूबाके साथ व्यापारिक समझौते किए और एक-दूसरे को पँूजीवाद की जद से बाहर रखनेमें मदद की।उधर अमेरिका में आइजनहाॅवर के बाद कैनेडी नये राष्ट्रपति बने थेजिन्होंने पहले आइजनहाॅवर की नीतियों की आलोचना और क्यूबाई क्रान्ति कीप्रशंसा की थी। उनके पदभार ग्रहण करने के तीन महीनों के भीतर ही क्रान्तिको खत्म करने का सीआईए प्रायोजित हमला किया गया जिसे बे आॅफ पिग्स केआक्रमण के नाम से जाना जाता है। चे, फिदेल और क्यूबाई क्रान्ति की प्रहरीजनता की वजह से ये हमला नाकाम रहा। सारी दुनिया में अमेरिका की इस नाकामषड्यंत्र की पोल खुलने से, बदनामी हुई। तब कैनेडी ने बयान जारी किया कियह हमला सरकार की जानकारी के बगैर और क्यूबा के ही अमेरिका में रह रहेअसंतुष्ट नागरिकों का किया हुआ है, जिसकी हम पर कोई जिम्मेदारी नहीं है।
कम्युनिस्ट कहलाना हमारे लिए गौरव की बात हैः फिदेल (1965)
उधर, दूसरी तरफ फिदेल को भी 1961 में बे आॅफ पिग्स के हमले के बाद यह समझमें आने लगा था कि अमेरिका क्यूबा को शांति से नहीं रहने देगा। पहले जोफिदेल अपने आपको कम्युनिज्म से दूर और तटस्थ बता रहे थे, दो साल बाद एकमई 1961 को फिदेल ने अपनी जनता को संबोधित करते हुए कहा कि ’हमारी शासनव्यवस्था समाजवादी शासन व्यवस्था है और मिस्टर कैनेडी को कोई हक नहीं किवे हमें बताएँ कि हमें कौन सी व्यवस्था अपनानी चाहिए, हम सोचते हैं किखुद अमेरिका के लोग भी किसी दिन अपनी इस पूँजीवादी व्यवस्था से थकजाएँगे।’1961 की दिसंबर को उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा कि ’मैं हमेशामाक्र्सवादी-लेनिनवादी रहा हूँ और हमेशा रहूँगा।’तब तक भी फिदेल और चे वक्त की नब्ज को पहचान रहे थे। चे ने इस दौरानसोवियत संघ, चीन, उत्तरी कोरिया, चेकोस्लावाकिया और अन्य देशों कीयात्राएँ कीं। चे को अमेरिका की ओर से इतनी जल्द शांति की उम्मीद नहीं थीइसलिए क्यूबा की क्रान्ति को बचाये रखने के लिए उसे बाहर से समर्थनदिलाना बहुत जरूरी था। क्यूबा तक आने वाली जरूरी सामग्रियों के जहाजरास्ते में ही उड़ा दिए जाते थे और क्यूबा पर अमेरिका के हवाई हमले कभीतेल संयंत्र उड़ा देते थे तो कभी क्यूबा के सैनिक ठिकानों पर बमबारी करतेथे। बेहद हंगामाखेज रहे कुछ ही महीनों में इन्हीं परिस्थितियों के भीतरअक्टूबर 1962 में सोवियत संघ द्वारा आत्मरक्षा के लिए दी गई एक परमाणुमिसाइल का खुलासा होने से अमेरिका ने क्यूबा पर अपनी फौजें तैनात कर दीं।उस वक्त बनीं परिस्थितियों ने विश्व को नाभिकीय युद्ध के मुहाने पर लाखड़ा किया था। आखिरकार सोवियत संघ व अमेरिका के बीच यह समझौता हुआ कि अगरअमेरिका कभी क्यूबा पर हमला न करने का वादा करे तो सोवियत संघ क्यूबा सेअपनी मिसाइलें हटा लेगा।अंतर्राष्ट्रीय घटनाक्रम और परिस्थितियों के भीतर अपना कार्यभार तय करतेहुए अंततः 3 अक्टूबर 1965 को फिदेल ने साफ तौर पर पार्टी का नया नामकरणकरते हुए उसे क्यूबन कम्युनिस्ट पार्टी का नया नाम दिया और कहा किकम्युनिस्ट कहलाना हमारे लिए फ़ख्ऱ और गौरव की बात है।
-विनीत तिवारीमोबाइल : 09893192740
(क्रमश:)
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नये मनुष्य, नये समाज के निर्माण की कार्यशाला: क्यूबा-4

क्यूबा का इंकलाबः एक अलग मामला
क्यूबा की क्रान्ति न रूस जैसी थी न चीन जैसी। वहाँ क्रान्तिकारीकम्युनिस्ट पार्टियाँ पहले से क्रान्ति के लिए प्रयासरत थीं और उन्होंनेनिर्णायक क्षणों में विवेक सम्मत निर्णय लेकर इतिहास गढ़ा। उनसे अलग,क्यूबा में जो क्रान्ति हुई, उसे क्यूबा की कम्युनिस्ट पार्टी का भीसमर्थन या अनुमोदन हासिल नहीं था। उस वक्त क्यूबा की कम्युनिस्ट पार्टीफिदेल के गुरिल्ला युद्ध का समर्थन नहीं करती थी बल्कि बटिस्टा सरकार केऊपर दबाव डालकर ही कुछ हक अधिकार हासिल करने में यकीन करती थी। लेकिनवक्त के साथ न केवल फिदेल ने क्यूबाई इंकलाब को सिर्फ एक देश के इंकलाबसे बाहर निकालकर उसे एक अंतर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन की अहम तारीखबनाया बल्कि अंतर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट बिरादरी ने भी क्यूबा के इंकलाबको साम्राज्यवाद से बचाये रखने में हर मुमकिन भूमिका निभाई।चे ग्वेवारा का प्रसिद्ध लेख ’क्यूबाः एक्सेप्शनल केस?’ क्यूबा कीक्रान्ति की अन्य खासियतों पर और समाजवाद की प्रक्रियाओं पर विलक्षणरोशनी डालता है।करिष्मा दर करिश्मा जनता की ताकत से1961 की 1 जनवरी को 1 लाख हाई स्कूल पास लोगों के साथ पूरे मुल्क कोसाक्षर बनाने का अभियान शुरू किया गया और ठीक एक साल पूरा होने के 8 दिनपहले ही क्यूबा को पूर्ण साक्षर करने का करिश्मा कर दिखाया। दिसंबर 22,1961 को क्यूबा निरक्षरता रहित क्षेत्र घोषित कर दिया गया। ऐसे करिश्मेक्यूबा ने अनेक क्षेत्रों में दिखाए और अभी भी जारी हैं। इंकलाब केतत्काल बाद जमीन पर से विदेशी कब्जे खत्म किए गए और बड़े किसानों वकंपनियों से जमीनें लेकर छोटे किसानों व खेतिहर मजदूरों को बाँटी गईं।इंकलाब के बाद के करीब बीस-पच्चीस वर्षों तक क्यूबा ने तरक्की की अनेकछलाँगें भरीं। बेशक सोवियत संघ व अन्य समाजवादी देशों के साथ सामरिक-व्यापारिक संबंधों की इसमें अहम भूमिका रही। गन्ने की एक फसल वाली खेतीसे शक्कर बनाकर क्यूबा ने सोवियत संघ से शक्कर के बदले पेट्रोल और अन्यआवश्यक वस्तुएँ हासिल कीं। उद्योगों का ही नहीं खेती का भी राष्ट्रीयकरणकरके खेतों में काम करने वाले मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा, छुट्टियाँ,मुफ्त शिक्षा, इलाज की सुविधाएँ और बच्चों के लिए झूलाघर खोले गए।क्रान्ति के महज 7 वर्षों के भीतर क्यूबा की 80 फीसदी कृषि भूमि पर सरकारका स्वामित्व था। निजी स्वामित्व वाले जो छोटे किसान थे, उनके भी सरकारने जगह-जगह कोआॅपरेटिव बनाए और उन्हें प्रोत्साहित किया। सबके लिए भोजन,रोजगार, शिक्षा और सबके लिए मुफ्त इलाज की सुविधा ने क्यूबा को मानवविकास के किसी भी पैमाने से अनेक विकसित देशों से आगे लाकर खड़ा कर दियाथा।
मुश्किल दौर का मुकाबला क्रान्ति के औजारों से
सोवियत संघ के विघटन से निश्चित ही क्यूबा की अर्थव्यवस्था पर बहुतप्रतिकूल असर पड़ा। भीषण मंदी ने क्यूबा को अपनी चपेट में ले लिया। सोवियतसंघ केवल क्यूबा की कृषि उपज का खरीददार ही नहीं था बल्कि क्यूबा की ईंधनऔर रासायनिक खाद की जरूरतों का भी बड़ा हिस्सा वहीं से ही पूरा होता था।सोवियत संघ के ढहने से क्यूबा में रासायनिक खाद और कीटनाशकों की उपलब्धता80 फीसदी तक गिर गई और उत्पादन में 50 फीसदी से ज्यादा गिरावट आई। क्यूबाके प्रति व्यक्ति प्रोटीन और कैलोरी खपत में 30 फीसदी कमी दर्ज की गई।लेकिन क्यूबा इन सभी समस्याओं से बगैर किसी बाहरी मदद के जिस तेजी से फिरसँभला, वह क्यूबाई करिश्मों की गिनती को ही बढ़ाता है। अपने दक्ष वप्रतिबद्ध वैज्ञानिकों और लोगों के प्रति ईमानदार, दृढ़ राजनैतिकइच्छाशक्ति ने 1995 के मध्य तक अपनी कृषि को पूरी तरह बदल कर नये हालातोंके अनुकूल ढाल लिया। रासायनिक खाद के बदले जैविक खाद से खेती की जानेलगी। एक फसल के बदले विविधतापूर्ण फसल चक्र अपनाए गए। आज क्यूबा सारीदुनिया में जैविक खेती और जमीन का सही तरह से इस्तेमाल करने वाले देशोंमें सबसे आगे है।यही स्थिति ऊर्जा के क्षेत्र में भी हुई। सोवियत संघ से पेट्रोलियम कीआपूर्ति बंद हो जाने के बाद क्यूबा के वैज्ञानिकों व इंजीनीयरों ने बड़ेपैमाने पर सौर ऊर्जा और पनबिजली के संयंत्रों पर काम किया। कम बिजली खपतवाले रेफ्रीजरेटर, हीटर, बल्ब इत्यादि बनाए गए और आज क्यूबा वैकल्पिक वप्रकृति हितैषी ऊर्जा उत्पादन में भी दुनिया की अग्रिम पंक्ति में है।पश्चिमी यूरोप में प्रत्येक 330 लोगों की देखभाल के लिए एक डाॅक्टर है;अमेरिका में प्रत्येक 417 लोगों की देखभाल के लिए एक डाक्टर है, जबकिक्यूबा में प्रत्येक 155 लोगों की देखभाल के लिए एक डाॅक्टर है। क्यूबाजैसा छोटा सा देश 70 हजार से ज्यादा डाक्टर्स को प्रशिक्षित कर रहा है औरउन्हें दुनिया के हर हिस्से में मानवता की मदद के लिए भेज रहा है जबकिउससे कई गुना बड़ा अमेरिका करीब 64 से 68 हजार डाक्टरों का ही प्रशिक्षणकर पा रहा है।
-विनीत तिवारीमोबाइल : 09893192740
(क्रमश:)
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भाकपा के प्रदेशव्यापी आन्दोलन के कारण अस्पतालों के निजीकरण से पीछे हटी सरकार

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने प्रदेश सरकार द्वारा चार जनपदों के सरकारी अस्पतालों के निजीकरण को रद्द करने के फैसले को भाकपा के आन्दोलन का नतीजा बताते हुए भाकपा की प्रदेश में सभी जिला इकाइयों को बधाई दी है। ज्ञात हो कि भाकपा ने अस्पतालों के निजीकरण पर आन्दोलन छेड़ रखा था।
यहां जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डॉ. गिरीश ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा अस्पतालों के निजीकरण, विद्युत वितरण व्यवस्था को विदेशी एवं निजी कम्पनियों को सौंपने शिक्षा के व्यवसायीकरण, उपजाऊ भूमि के अधिग्रहण को बढ़ावा देने एवं महंगाई को काबू करने में राज्य सरकार के स्तर से की जाने वाली कार्यवाही में उदासीनता बरतने जैसे ज्वलंत सवालों पर 1 जून से ही आन्दोलन चलाने का बिगुल फूंक दिया था। 1 जून को ही उन चारों जिलों में जहां अस्पतालों का निजीकरण किया जाना है भाकपा ने विरोध प्रदर्शन करते हुए राज्यपाल महोदय के नाम ज्ञापन जिलाधिकारियों को सौंपे थे। अन्य जिलों में भी उपर्युक्त सभी सवालों पर धरना, प्रदर्शनों, सभाओं, नुक्कड़ सभाओं तथा पद यात्राओं का सिलसिला जारी है जो 30 जून तक जारी रहेगा।
भाकपा राज्य सचिव ने अस्पतालों के निजीकरण के फैसले को रद्द करने पर गहरा संतोष जताया क्योंकि इन अस्पतालों के निजीकरण से गरीब जनता इलाज के अभाव में तड़प कर रह जाती और निजी अस्पतालों को जनता की और निरंकुश लूट का मौका मिलता।
लेकिन भाकपा ने राज्य ऊर्जा निगम के शनैः शनैः निजीकरण पर घोर आपत्ति दर्ज करायी है। डॉ. गिरीशने इस बात पर भी अफसोस जताया कि इसके लिये स्वयंः सरकार एवं उसके मंत्री जिम्मेदार रहे हैं। क्या वजह है कि एक साल के भीतर हरदुआगंज एवं परीक्षा में निर्माणधीन परियोजनाओं की चिमनियां ध्वस्त हो गई? क्या इसके लिये भारी भ्रष्टाचार और निर्माण कार्य की फ्रैंचाइजी निजी हाथों को सौंपने के सरकार के फैसले पर नहीं जाती? उन्होंने आरोप लगाया कि आगरा की विद्युत वितरण व्यवस्था निजी कंपनी ‘टोरंट’ को सौंपने के बाद वहां की विद्युत व्यवस्था तहस-नहस हो गयी है और सरकार वहां रामराज्य आने के थोथे दावे कर रही है।
भाकपा इन सभी सवालों पर आपना आन्दोलन जारी रखेगी और उसको और मजबूत बनाने पर विचार भी किया जायेगा, डॉ. गिरीश ने कहा है।
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गोडसे और कसाव

हाँ! उसे फांसी दे दे
मौत के घाट उतार दो उसको
उसने हत्या की है
नृशंस हत्या-आदमी की,
एक नहीं सैकड़ों
निर्दोष लोगों की
जान ली है उसने
जिन्हें वह जानता भी नहीं था
न थी उनसे उसकी कोई अदावत ही
कुछ लेना-देना भी नहीं था
उसका उनसे।
फिर भी बेरहमी से मार डाला उसने
सैकड़ों निर्दोष लोगों को
उसे फांसी दे दे
मौत के घाट उतार दो उसको।
लेकिन मैं सोच रहा हूं,
शायद
बेवजह ही सोच रहा हूं
और मेरा सोचना
शायद गलत भी हो
बेहद गलत।
शायद सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
के खिलाफ भी हो
मेरा सोचना
और मुझे कोई सजा भी सुना दें
वे लोग
लेकिन
सोच को रोक कौन सकता है?
शायद मैं भी नहीं।
इसलिए जो सोच है
उसे आप सब से कह देना चाहता हूं
उसकी सजा जो भी मिलेगी/देखूंगा!
हालांकि मैं चाहता हूँ
कि उस नर पिशाच को
हर हाल फांसी दे दी जाय।
उसने किया ही है
ऐसा अपराध,
देश-धर्म-प्राकृतिक न्याय, इन्सान
और इन्सानियत के खिलाफ
खुल्लम खुल्ला जूर्म किया है
उसने,
उसे फांसी दे दी जाय।
लेकिन क्या वह मरेगा
इस तरह सिर्फ फांसी देने से
(यही सोच रहा हूँ)
ऐसे ही एक फांसी दी गयी थी
गांधी के हत्यारे, गोडसे को
तो क्या वह मरा?
क्या गांधी की हत्या की मंशा वाले
और गांधी की हत्या पर मिठाई बाँट कर खाने वाले
गोडसे-से खतम हो गये।
नहीं!
अभी कुछ दिनों पूर्व गुजरात में
नराधम गोडसे ही तो दिखा था,
हाँ! उसे फांसी दे दी जाय
बल्कि फांसी से गर कोई बड़ी सजा हो
वह दी जाय।
लेकिन/इससे
न गोडसे खतम होगा
न कसाब ही मरेगा
क्येांकि ये कोई हांड-मांस वाले आदमी नहीं है,
ये प्रायोजित अभियान हैं
और हैं संस्थागत जेहाद के विकृत संस्करण
ये देश-धर्म-इन्सान और इन्सानियत के खिलाफ
नफरत की कोख से पैदा हुए हैं,
और एक ही पाठ पढ़े हैं
दूसरे धर्म और कौम के लोग दुश्मन होते हैं
उन्हें मिटा देना चाहिए
स्वधर्म की रक्षा के लिए।
एक से शिक्षण शिविर से सीखा है
उन्होंने लाठियां भाजना
छूरा, भाला, गंड़ासा
यहां तक कि
बम और बन्दूकें चलाना
आदमी और आदमीयत को
मारकर मिटा देने के लिए।
इन्हें खतम करने के लिए
बंद करना होगा
उन शाखा शिविरों को
जो रोज-ब-रोज बना रहे हैं
आदमी की जेहनियत को
आदमी के खिलाफ
- प्रो. जे.के. सिंह
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भाकपा की जिला कौंसिल बैठक सम्पन्न

मुरादाबाद 6.6.2010। भाकपा की मुरादाबाद जिला काउन्सिल की बैठक असालतपुरा में का. नईम कुरैशी के निवास पर का. हरीश भटनागर की अध्यक्षता में हुई। जिला सचिव का. नेम सिंह ने विस्तृति रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए बताया कि आज पूरे विश्व में अमरीका का वर्चस्व होने के कारण पूंजीवाद के पक्ष में हवा बह रही है। विकासशील देशों के लिए निश्चय ही यह अच्छा संकेत नहीं है और काफी सजग रहने की जरूरत है। हमारा देश भी इस अमरीकी आंधी का बुरी तरह शिकार है। दिखावटी तौर पर विकास जरूर हो रहा है किन्तु उंगलियों पर गिनने के लायक ही चन्द लोग ही लखपति से करोड़पति, करोड़पति से अरबपति और अरबपति से खरबपति बनते जा रहे हैं।आम आदमी क्या मध्यम वर्गीय आदमी के लिए भी सामाजिक ताने बाने में गुजर बसर करना कठिन हो गया है। जिस तरह सोवियत संघ के ढह जाने से पूरी दुनिया में समाजवाद की भारी क्षति हुई और ले दे कर उसे विभिन्न रूपों में स्थापित करने के प्रयास किये जा रहे हैं। देश में वामपंथी आन्दोलन आजादी के बाद निश्चय ही कुछ राज्यों तक ही कारगर रूप में स्थापित हो चुका किन्तु माकपा ने समूचे वामपंथ को संजोने, सम्भालने और विकसित करने में भूमिका नहीं निभाई। वामपंथ का कमजोर होना देश की राजनीति और हित के लिए निश्चय ही विनाशकारी साबित हो। इस स्थिति में वामपंथ विशेषकर भाकपा व माकपा को बहुत सम्भल कर और जनता के हित में एकरूपता की लड़ाई को बिना किसी भेदभाव के स्पष्ट रूप से आगे बढ़कर लड़नी चाहिये। उन्होंने प्रदेश के अन्दर जंगल राज की एवं व्याप्त भ्रष्टाचार की ओर भी इशारा करते हुए कहा कि अधिकारी बेलगाम हो चुके हैं। सरकारी तन्त्र पूरी तरह जनहित की उपेक्षा कर रहा है। गरीबों की योजनायें महज सरकारी अफसरों एवं राजनेताओं की लूटमार का साधन बन चुकी हैं। कानून व्यवस्था पूरी तरह चरमरा रही है। सरकारी अस्पतालों को निजी हाथों में बेचने की साजिश कई जिलों में चली जा चुकी है।इन हालात में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को विशेष तौर पर आगे बढ़कर काम करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि मुरादाबाद में जब भी सामूहिक वामपंथ का आन्दोलन का आव्हान हुआ दूसरी पार्टियों ने भाकपा से हटकर ही काम किया जो दुर्भाग्यपूर्ण रहा।स्थानीय मुद्दों पर जैसे - असालतपुरा का सलाटर हाउस, राशनिंग वितरण प्रणाली, महंगाई, बिजली का आभाव, कानून एवं व्यवस्था को दुरूस्त करने केसम्बन्ध में शीघ्र ही कुछ आन्दोलन छेड़ने का निश्चिय भी किया गया। सभा में का. नईम कुरैशी, फराईम, बाबू भाई, जमील अहमद, नथिया बेगम, भूरी बेगम, मुन्नी बेगम, शहनाज, अजय पाल सिंह यादव, ओम पाल सिंह, अशोक अग्रवाल, सतीश चन्द्र अग्रवाल, सलभ शर्मा, अकरम, अंसार, अरकात, रईस आलम आदि ने भी अपने विचार रखे। शीघ्र ही विभिन्न मुद्दों पर रैली, प्रदर्शन व धरनों का आयोजन किया जायेगा। (प्रस्तुति: नेम सिंह)
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जन समस्याओं को लेकर सड़कों पर उतरे कम्युनिस्ट

मुरादाबाद। प्रादेशिक समस्याओं की ओर जनता को लामबन्द कर आन्दोलन के लिये आकर्षित करने के उद्देश्य से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के तत्वाधान में आज रैली के आयोजन के साथ-साथ जिला मुख्यालय पर प्रदर्शन भी किया गया। मांगों के समर्थन में डीएम के माध्यम से मुख्यमंत्री को एक ज्ञापन भी भेजा गया।प्रान्तीय आह्वान पर असालतपुरा से शुरू हुई रैली स्टेशन रोड, चौक ताड़ीखाना, गंज गुरहट्टी, कोर्ट रोड होती हुई जिला मुख्यालय पहुंचकर सभा के रूप में परिवर्तित हुई। सभा को सम्बोधन के दौरान जिला सचिव कामरेड नेम सिंह ने कहा कि प्रदेश में चरम सीमा पर पहुंच चुकी महंगाई को केन्द्र एवं प्रदेश दोनों ही सरकारों ने पूरी तरह से नजरअंदाज कर रखा है। प्रदेश में भ्रष्टाचार का बोलबाला है, स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण कर जनता के आगे परेशानियां खड़ी की जा रही हैं। उन्होंने कहा कि पार्टी का यह आन्दोलन जनता को जागरूक करने के लिये है, जिससे कि जनता केन्द्र एवं प्रदेश सरकार को सबक सिखा सके। ज्ञापन के माध्यम से महंगाई पर काबू पाने के लिये व्यापक कदम उठाये जाने, स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण के प्रयास बंद कर स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने के लिये व्यापक कदम उठाये जाने, प्रदेश में बिजली उत्पादन बढ़ाये जाने, शिक्षा का निजीकरण एवं बाजारीकरण बन्द कराये जाने इत्यादि मांगे की गई हैं।इस मौके पर नईम फराईम, अकरम, जहीर, राजू, जमीन अहमद, नथिया बेगम, भूरी बेगम, हरीश भटनागर, अहसान ठेकेदार, महमूद अली, रईस आलम आदि मौजूद रहे।
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दशहरी गांव में कूड़ाघर न बनाने की भाकपा की मांग

लखनऊ 22 जून, 2010। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और फलपट्टी किसान वेलफेयर एसोसियेशन के नेताओं ने आज भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश के नेतृत्व में जनपद की काकोरी तहसील के दशहरी गांव का दौरा किया जहां कि ऐतिहासिक दशहरी वृक्ष के पास कूड़ाघाट बनवाने की सरकार की योजना है।प्रतिनिधिमंडल ने 150 वर्ष पुराने मदर ट्री दशहरी को देखा और कूड़ाघर के निर्माण से उस वृक्ष और उस क्षेत्र को होने वाली भारी हानि का जायजा लिया। प्रतिनिधिमंडल ने वहां किसानों और बाग मालिकानों से भी चर्चा की। प्रतिनिधिमंडल ने पाया कि यह दशहरी वृक्ष एक राष्ट्रीय धरोहर है जिसे राज्य सरकार नष्ट करने पर आमादा है। यह समूचा क्षेत्र फलपट्टी का भाग है और फलपट्टी अधिनियम के मुताबिक इस क्षेत्र में ऐसा कोई कार्य नहीं किया जा सकता जिससे इस पट्टी को हानि पहुंचे। इतना ही नहीं फलपट्टी के चारों ओर तीन कि.मी. चौड़ा भाग बफर जोन में आता है जिसमें भी उस अधिनियम के अनुसार फलपट्टी को हानि पहुंचाने वाला कोई कार्य नहीं किया जा सकता।वहां उपस्थित जन समुदाय को संबोधित करते हुये डा. गिरीश ने कहा कि सरकार को इस महत्वपूर्ण स्थल पर कूड़ा स्थल बनाने से बाज आना चाहिये और इसे कहीं दूसरी जगह ले जाना चाहिए। यह बाग मालिकानों, बागों, विदेशी व्यापार और पर्यावरण सभी दृष्टियों से उचित होगा। यह दशहरी प्रेमियों की भावनाओं का भी सवाल है। यह देश का एक पेटेण्ट आम है जो सारे विश्व में प्रसिद्ध है। हमारे प्रदेश और देश का नाम भी इससे जुड़ा है। यदि कूड़ा घर निर्माण की प्रक्रिया को रोका नहीं गया तो इस का तीखा विरोध किया जायेगा।प्रतिनिधिमंडल में डा. गिरीश के अतिरिक्त भाकपा के वरिष्ठ नेता का. अशोक मिश्रा, जिला सचिव मो. खालिक, सह सचिव का. ओ.पी. अवस्थी, फलपट्टी किसान वेलफेयर ऐसोसिएयेशन के संरक्षक मिर्जा एहतेशाम बेग, आमिर अब्बासी, नवाब जफर साहब आदि शामिल थे। दशहरी ग्राम के प्रधान श्री जसवन्त सिंह यादव एवं अन्य ग्रामवासियों ने प्रतिनिधिमंडल को महत्वपूर्ण जानकारी दी।
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नगर निकाय निर्वाचन पद्धति में अलोकतांत्रिक परिवर्तन का भाकपा द्वारा विरोध

लखनऊ। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मण्डल ने पार्टी चिन्ह पर निकाय चुनाव न कराये जाने, नगर निकायों में नामित सदस्यों की संख्या-4 से बढ़ाकर 13 किये जाने की तथा उनको वोट का अधिकार दिये जाने जैसे कदमों की कठोर शब्दों में निन्दा करते हुए उन्हें तत्काल रद्द करने की मांग की है।उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री और महामहिम राज्यपाल को फैक्स भेजकर भा.क.पा. राज्य सचिव डॉ. गिरीश ने प्रदेश के नगर निकायों के सभासदों के चुनाव की उस नई नियमावली पर गहरी आपत्ति जतायी है जिसमें सरकार ने उपर्यक्त प्रावधान किये हैं। भाकपा ने इस बात पर गहरा आश्चर्य व्यक्त किया है कि संविधान से खिलवाड़ करने वाली इस कार्यवाही की सूचना राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त दलों तक को नहीं दी गई। यह तीनों ही प्राविधान घनघोर अलोकतांत्रिक है। जिस तरह राज्य सरकार ने गुपचुप तरीके से राजनैतिक दलों को बिना सूचना के नई नियमावली अधिसूचित की है वह भाकपा को कदापित स्वीकार नहीं है। अतएव भाकपा इन संशोधनों का तीखा विरोध करती है तथा इस अधिसूचना को तत्काल रद्द करने की मांग करती है।यहां जारी प्रेस बयान में डॉ. गिरीश ने आरोप लगाया है कि साम-दाम-दण्ड-भेद की नीति अपना कर बसपा ने डुमरियागंज का उपचुनाव भले ही जीत लिया हो, लेकिन वह अपने खिसकते जनाधार से बौखलाहट में आ गई है। इसीलिए बसपा सुप्रीमो ने पहले 2012 तक किसी भी उपचुनाव में भाग न लेने की घोषणा की और अब चोर रास्ते से नगर निकायों पर कब्जा करने की साजिश रच रही है। भाकपा इसका पुरजोर विरोध करेगी और समूचे प्रदेश में इसके विरोध में सड़कों पर उतरेगी।
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निजीकरण के खिलाफ बिहार के विद्युतकर्मी सड़क पर उतरे

पटना। बिहार सरकार एवं बिहार राज्य विद्युत बोर्ड के प्रबन्धक द्वारा राज्य की राजधानी, पटना, मुजफ्फरपुर में विद्युत आपूर्ति का जिम्मा (फ्रेन्चाइजी) सी.ई.एस.सी. कोलकाता को सौंपने सम्बन्धी प्रस्ताव के विरोध में बिहार राज्य विद्युत बोर्ड के कामगारों, अभियंताओं, पदाधिकारियों का एक बड़ा प्रदर्शन 25 मई को राज्य विद्युत बोर्ड मुख्यालय विद्युत भवन (पटना) पर हुआ और हजारों की संख्या में राज्य भर से आये विद्युत कर्मियों, अभियंताओं तथा अधिकारियों ने नारे बुलन्द किये। उनके प्रमुख नारों में विद्युत बेार्ड से फ्रेन्चाइचीज व्यवस्था को समाप्त करो। पटना तथा मुजफ्फरपुर को विद्युत आपूर्ति के लिये सी.ई.एस.सी. को मत बेचो। चुनाव फंड के लिये विद्युत उद्योग से खिलवाड़ बन्द करो। निजी कम्पनियों को बोर्ड के राजस्व की लूट की छूट देना बन्द करो, आदि आदि। प्रदर्शन के बाद प्रदर्शनकारियों की एक महती रैली हुई।बिहार स्टेट इलेक्ट्रिसीटी बोर्ड कमेटी ऑफ इलेक्ट्रिसीटी इम्पलाइज एण्ड इंजिनीयर्स के तत्वावधान में यह आयोजन हुआ जिसमें बिहार राज्य विद्युत बोर्ड के पदाधिकारियों, अधिकारियों एवं कामगारों की टेªड यूनियनें शामिल हैं। ज्ञातव्य है कि इसी कमेटी के अन्दर एकजुट होकर विद्युत कर्मियों ने विद्युत बोर्ड के विखंडन विरोधी लड़ाई लड़ी है। 27.02.2007 की हड़ताल में, मुकम्मिल हड़ताल में, बिहार बंद में, विद्युत आपूर्ति पूरी तरह बन्द हो गई थी और बिहार में भीषण संकट पैदा हुआ था।सरकार और प्रबंधन ने विद्युत कर्मियों की हड़ताल के अधिकार पर बंदिश लगाने की मांग माननीय पटना उच्च न्यायालय से की थी। परन्तु न्यायालय में जब विद्युत कर्मियों की बातें आईं तो फैसला विद्युतकर्मियों के पक्ष में आया। उनकी हड़ताल पर न तो बंदिश, न उनकी सेवा शर्तों, वेतन एवं पेंशन आदि सेवा निवृति लाभों में किसी तरह की तब्दील किसी भी हालत में बाते मानी गयी।लेकिन उसके बाद भी उस दिशा में कोई कार्रवाई सरकार ने अब तक नहीं की और राज्य की राजधानी पटना तथा राज्य का दूसरा बड़ा शहर मुजफ्फरपुर को सी.ई.एस.सी. कोलकाता को फ्रेन्चाइचीज पर देने का प्रस्ताव बनाकर 25 मई 2010 को मंत्रीमंडल की बैठक में स्वीकृति देने का फैसला लिया।इस संबंध में विद्युत बोर्ड के अध्यक्ष को विद्युत कर्मियों का ज्ञापन समर्पित किया गया। फिर एक शिष्टमंडल भी बोर्ड के अध्यक्ष से मिलकर सारी तथ्यात्मक बातों से उन्हें अवगत कराया लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला।महाराष्ट्र के शहर भिवन्डी की राह पर पटना एवं मुजफ्फरपुर को भी सी.ई.एस.सी. कोलकत्ता को सौंपने का प्रस्ताव बनाया गया। जबकि पटना, मुजफ्फरपुर भिवन्डी के बीच कोई समानता है ही नहीं। एक ज्ञापन में सारी बातें अध्यक्ष के सामने रखी गई जो इस प्रकार हैंः-1. भिवन्डी शहर में डिस्ट्रीब्युसन कंपनी द्वारा 1.45 रुपये प्रति यूनिट की औसत दर से राजस्व वसूली जाती थी जबकि वितरण फ्रेन्चाइजी को प्रथम वर्ष में 1.08 रुपये प्रति यूनिट की औसत दर पर सौंपा गया जिससे डिस्ट्रब्युसन कंपनी को भिवन्डी शहर सौंपने के पहले ही दिन 35 पैसे प्रति यूनिट का लाभ होना शुरू हो गया तथा एक वर्ष में लगभग 84 करोड़ रुपये का लाभ हुआ। जबकि बिहार राज्य विद्युत बोर्ड की वर्तमान में वसूली की दर 2.20 रुपये के स्थान पर 1.78 रुपये की दर पर पटना शहर (पेसू) को फ्रेन्चाइचीज को सौंपने पर लगभग 7.22 करोड़ रुपये का मासिक घाटा तथा 86.64 करोड़ रुपये का प्रथम वर्ष में ही घाटा होगा जो आने वाले वर्षों में बढ़ता ही चला जाएगा।2. भिवन्डी शहर को फ्रेन्चाइचीज पर सौंपने के समय 33 के.भी., 11 के.भी. तथा एल.टी. का आधारभूत संरचना जर्जर स्थिति में था तथा इसको सुधारने के लिए फ्रेन्चाइचीज को प्रथम दस महीनों में ही 122 करोड़ रुपये का निवेश करना पड़ा। जबकि पेसू की 33 के.भी. एवं 11 के.भी. का आधारभूत संरचना पर पूर्व में ही ए.पी.डी.आर.पी. तथा अन्य योजनाओं के तहत काफी कार्य हो चुका है जिसके कारण यह काफी हद तक सुदृढ़ स्थिति में है। अतः मूलतः एल.टी. लाइन, डिस्ट्रीब्युसन ट्रांसफार्मर, एल.टी. सिंगल फेज मीटरिंग तथा रख-रखाव हेतु लगभग 25 करोड़ रुपये के लागत से ही पूर्ण वितरण प्रणाली को सुदृढ़ किया जा सकता है।3. भिवन्डी शहर को फ्रेन्चाइचीज पर सौंपने के समय मीटरिंग की स्थिति जर्जर अवस्था में थी तथा केवल 23ः उपभेाक्ताओं के यहां सही मीटरिंग की व्यवस्था थी, जबकि पेसू के लगभग सभी उच्च विभव तथा निम्न विभव के उपभोक्ताओं के यहां हाइटेक स्टैटिक मीटर स्थापित है। सिंगल फेज के लगभग 50ः उपभोक्ताओं के यहां भी इलेक्ट्रोमेकेनिकल मीटर स्थापित है।4. भिवन्डी शहर को फ्रेन्चाइचीज पर सौंपने के समय डिस्ट्रब्युसन ट्रांसफार्मर के जलने की दर लगभग 40ः था, जबकि पेसू में वर्तमान में यह दर लगभग 15ः प्रति वर्ष है।5. भिवन्डी शहर को फ्रेन्चाइचीज पर सौंपने के समय कलेक्सन इफिसियेंसी लगभग 67ः प्रति माह था जबकि पेसू में यह दर लगभग 92.54ः प्रति माह है।6. भिवन्डी शहर को फ्रेन्चाइचीज पर सौंपने के समय तकनीकी एवं वाणिज्यिक हानि 58ः प्रति माह था जबकि पेसू में यह दर 37ः प्रति माह है।7. मुजफ्फरपुर शहरी क्षेत्र की भी स्थिति पेसू से ही मिलती जुलती है।इसके बाद भी पता नहीं क्यों सरकार अड़ी है कि वह बिहार में पटना, मुजफ्फरपुर से प्रारम्भ कर पूरे राज्य में विद्युत आपूर्ति का जिम्मा निजी कम्पनियों को सौंपेगी। नये विद्युत अधिनियम में यह व्यवस्था नहीं है कि किसानों, घरेलू उपभोक्ताओं, कुटीर ज्योति स्कीम के उपभोक्ताओं को रियायती दर पर या उनकी आर्थिक स्थिति के आधार पर विद्युत दर तय की जाय।एक तरफ विकास का नारा दूसरी ओर विद्युत आपूर्ति जैसे लोकोपयोगी सेवाओं को ठेकेदारों को सौंपना दोनों में कोई मेल नहीं है। अब तक 19 राज्य विद्युत बोर्ड़ो के विखंडन के बाद भी विद्युत आपूर्ति का जिम्मा 17 राज्यों में सरकार ही सम्भाले हुए हैं। उड़ीसा और दिल्ली जहां विद्युत आपूर्ति का जिम्मा बड़ी-बड़ी कम्पनियों को दिया गया है एक के बाद एक घोटाला सामने आ रहा है। जनता तथा उपभोक्ता तबाह हैं।रैली की अध्यक्षता श्री सी.एल. प्रकाश, पेसा अध्यक्ष ने की। रैली को संबोधित करने वालों में सभी श्रमिक संघों के पदाधिकारी श्री अरविन्द प्रसाद, सचिव पेसा, श्री भोला नाथ सिंह, महांमंत्री पेसा, चक्रधर प्रसाद सिंह, महासचिव, श्री डी.पी. यादव, उपमहासचिव, कपिलदेव यादव, अवर महासचिव, बिहार स्टेट इलेक्ट्रिक सप्लाई वर्कर्स यूनियन, श्री अमरेन्द्र प्रसाद मिश्र, महासचिव फिल्ड कामगार यूनियन, एस.एस.पी. यादव, कार्यकारी अध्यक्ष बिहार बिजली मजदूर यूनियन, महेश प्रसाद सिन्हा, महासचिव, बिहार पावर वर्कर्स यूनियन, नवल किशोर सिंह, महासचिव, बिहार राज्य विद्युत मजदूर यूनियन, उपेन्द्र चौधरी, तकनीकी कामगार यूनियन, अशोक कुमार महासचिव, प्रशासनिक पदाधिकारी संघ आदि ने अपने विचार व्यक्त करते हुए सरकार तथा बोर्ड प्रबंधन को चेतावनी दी कि यदि सरकार एवं प्रबंधन अपनी जिद पर कायम रहा तो पूरे बिहार में किसी भी समय से मुकम्मिल हड़ताल होगी जो 27.02.2007 की हड़ताल से भी गंभीर होगी।इसके बाद गगनभेदी नारों के साथ रैली की समाप्ति की घोषणा हुई।
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भाकपा ने जुलूस निकाल कर एसडीएम को सौंपा ज्ञापन

मंडी धनौरा: भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी कार्यकर्ताओं ने तहसील मुख्यालय पर धरना प्रदर्शन कर उपजिलाधिकारी को आठ सूत्री मांग पत्र सौंपा।भाकपा कार्यकर्ताओं ने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार तहसील मुख्यालय पर धरना प्रदर्शन किया। आरोप लगाया कि चार वर्ष पूर्व डेढ़ करोड़ की लागत से बनाई गयी पानी की टंकी आज तक नहीं चली। इससे नगरवासियों को पेयजल की समस्या का सामना करना पड़ा रहा है। नगर में घटिया पाइप लगाने के कारण पाइप आए दिन फट जाते हैं जिससे जलापूर्ति बाधित रहती है।वक्ताओं ने कहा कि बाईपास मार्ग पर बनी पुलियों की हालत जर्जर है जिसे पीडब्लूडी विभाग द्वारा ठीक कराया जाए। बिजली की 16 घंटे आपूर्ति दी जाए। तहसीलदार कार्यालय में आय प्रमाण पत्रों में धांधली बरती जा रही है जिसे दूर किया जाए। आर्थिक लाभ योजना के जीओ की अवहेलना पर कड़ी कार्यवाही की जाए। इसके अलावा बीपीएल राशनकार्ड बनावाएं जाएं। इससे पूर्व भाकपा कार्यकर्ताओं ने बाईपास मार्ग पर जुलूस भी निकाला। ज्ञापन सौंपने वालों में नरेश कुमार, घसीटा सिंह, छोटे खां, चन्द्रपाल सिंह, शिवानंद द्विवेदी, ओमप्रकाश, सुरेश चन्द्र आदि मौजूद थे।
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बंद्योपाध्याय आयोग की सिफारिशें लागू कराने हेतु आर-पार की लड़ाई

9 मई 2010 को पटना में वर्ग संघर्ष का एक नया नजारा देखने को मिला। गांधी मैदान में राज्य के बड़े भूस्वामियों के नेतागण “किसान महापंचायत” बुलाकर ऐलान कर रहे थे कि डी. बंद्योपाध्याय भूमि सुधार आयोग की सिफारिशें लागू हुईं तो बिहार में “गृहयुद्ध” होगा। ठीक उसी समय पटना जंक्शन गोलंबर पर किसानों और खेतमजदूरों के नेता ऐलान कर रहे थे कि बंद्योपाध्याय भूमि सुधार आयोग की सिफारिशें लागू करा के रहेंगे और इसके लिए आर-पार की लड़ाई होगी।शासक पार्टी जदयू और विपक्षी राजद के बड़े भूस्वामी पक्षी नेताओं की इस “किसान महापंचायत” के जवाब में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) से संबद्ध किसान और खेत मजदूर संगठनों ने 9 मई को पूरे राज्य में “भूमि सुधार दिवस” मनाया। इस अवसर पर उन्होंने राज्य के सभी जिला मुख्यालयों पर धरना आयोजित करके राज्य सरकार से मांग की कि डी. बंद्योपाध्याय भूमि सुधार आयोग की सिफारिशें लागू करो।इसी क्रम में पटना में जंक्श्न गोलबंर पर संयुक्त धरना का आयोजन किया गया। आयोजक संगठन थे बिहार राज्य किसान सभा (अजय भवन), बिहार राज्य किसान सभा (जमाल रोड), बिहार राज्य खेत मजदूर यूनियन और बिहार प्रांतीय खेतिहर मजदूर यूनियन। धरनास्थल पर आयोजित सभा की अध्यक्षता बिहार राज्य किसान सभा के अध्यक्ष जलालुद्दीन अंसारी और बिहार राज्य खेतिहर मजदूर यूनियन के अध्यक्ष सारंगधर पासवान ने की।अपने अध्यक्षीय भाषण में सारंगधर पासवान ने कहा कि किसान महापंचायत के नाम पर बटाईदारी कानून का विरोध करना वास्तव में गरीबों पर हमला है। यह पंचायत बटाईदारों काअधिकार छिनने के लिए लगाई गयी है। उन्होंने आगे कहा कि जो यह कहते हैं कि राज्य में कोई बटाईदारी कानून नहीं है, वो झूठ बोल रहे हैं और भ्रम फैलाने का काम कर रहे हैं। सच्चाई यह है कि वर्षों से राज्य में बटाईदारी कानून है और न्यायालय का फैसला भी बटाईदारों के पक्ष में ही है। उन्होंने आगे यह आरोप लगाया कि वास्तव में किसान महापंचायत के आयोजक सरकार पर कब्जा करना चाहते हैं, उन्हें किसानों से कुछ लेना-देना नहीं है। उन्होंने अपने भाषण के अंत में यह विश्वास जताया कि बटाईदारों को हक दिलाने के लिए कार्यकर्त्ता हर कुर्बानी देंगे और जमीनचोरों को जमीन छोड़ने के लिए मजबूर करेंगे।अध्यक्षीय भाषण के बाद बिहार राज्य खेत मजदूर यूनियन के महासचिव जानकी पासवान ने उपस्थित कार्यकर्ताओं और आम जनता को संबोधित करते हुए कहा कि आज आयोजित किसान महापंचायत में आदमी से ज्यादा गाड़ियां आई हुई हैं। इससे सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि इस महापंचायत से कैसे लोग जुड़े हैं। किसान महापंचायत के बहाने भूमि-सुधार रोकने के लिए सभी बुर्जुवा दलों के सामंत एक हो गये हैं, उन्होंने अपने भाषण के अंत में यह चेतावनी दी कि भूमिपति और जमींदार ज्यादा दिनों तक भूमि पर नाजायज कब्जा नहीं रख सकते हैं। राज्य की मेहनतकश जनता जल्द ही सीलिंग से अतिरिक्त जमीन पर कब्जा करके रहेगी।इसके बाद बिहार राज्य किसान सभा के कोषाध्यक्ष का. रामाधार सिंह ने कहा कि बंद्योपाध्याय आयोग की रिपोर्ट आने के ठीक बाद से ही उसे लागू नहीं करने का राजनीतिक छल-प्रपंच और नाटक शुरू हो चुका है और इसी का एक नमूना आज भूपतियों द्वारा आयोजित किसान महापंचायत है। उन्होंने आगे कहा कि बंद्योपाध्याय आयोग की अनुशंसाओं के मुताबिक राज्य के भूमिपतियों के कब्जे में यही सीलिंग से अधिक जमीन को भूमिहीन किसानों में बांट दी जाए तो ऐसे प्रत्येक परिवार को एक एकड़ जमीन पर मालिकाना हक मिल जायेगा। रामाधार सिंह के बाद बिहार प्रांतीय खेतिहर मजदूर यूनियन के सचिव का. दिनेश कुमार ने कहा कि बिहार की वर्तमान सरकार सामंतो की सरकार है। बिहार का सही मायनों में विकास करने के लिए भूमिहीनों को जमीन उपलब्ध करवाना पहली शर्त है। इससे न सिर्फ गरीबों को सम्मान मिलेगा बल्कि इससे उत्पादन होगा, पूंजी पैदा होगी और इस पूंजी से उद्योग लगेंगे।सभा में टेªड यूनियन नेता का. अरुण कुमार मिश्र ने कहा कि वर्तामन सरकार खेती पर राज्य के कुल बजट का मात्र 1.5 प्रशित खर्च कर रही है। इससे पता चलता है कि यह सरकार मजदूर-किसानों की कितनी चिंता करती है। इसके बाद का. शिव शंकर शर्मा ने कहा कि हम समग्र भूमि-सुधार के लिए आंदोलन चला रहे हैं, बटाईदारों से जुड़े मामले उसका एक हिस्सा मात्र है। उन्होंने आगे यह स्पष्ट किया कि प. बंगाल में भूमि सुधार सिर्फ-सिर्फ इस कारण नहीं लागू हो गया था कि वहां पर किसी आयोग की सिफारिशें मौजूद थीं। पं. बंगाल में भूमि-सुधार लागू हुआ क्योंकि वहां खेतिहर मजदूरों और किसानों का सशक्त संगठन था और भूमि सुधार लागू करने की इच्छा रखने वाली एक प्रगतिशील और जनवादी सरकार थी। उन्होंने अपने भाषण के अंत में कहा कि वर्तमान में बिहार की जाति आधारित राजनीति अपने वर्ग चरित्र के आधार पर लामबंद हो रही है। यह वर्ग संघर्ष को तेज कर अंजाम तक पहुंचाने का एक अभूतपूर्व अवसर है।प्रतिरोध सभा में बिहार राज्य किसान सभा के प्रदेश सचिव अवधेश कुमार ने कहा कि किसान महापंचायत की असफलता दर्शाती है कि राज्य के गरीब किसानों, भूमिहीनों ने उनकी धमकियों का करारा जवाब दिया है। उन्होंने याद दिलाते हुए कहा कि कुछ दिनों पहले गरीबी पर हुए अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार में सभी विशेषज्ञों ने एक सुर में कहा कि बिहार के विकास के लिए भूमि सुधार पहली शर्त है। लेकिन यह सरकार न जनता की आवाज सुनने को तैयार है और नहीं विशेषज्ञों की सलाह। यह सरकार सिर्फ सभी को बरगला रही है। उन्होंने अंत में कहा कि हम आने वाले दिनों में इस आर-पार की लड़ाई को तेज कर आगामी वि.स. चुनावों में पूंजीवादी दलों को गर्त में डाल देंगे।सभा की अध्यक्षता कर रहे बिहार राज्य किसान सभा के अध्यक्ष एवं पूंर्व सांसद नेता जलालुद्दीन अंसारी ने कहा कि आज की महापंचायत में किसान नहीं, गरीब ढोकर लाये गये हैं। किसान महापंचायत के कर्त्ताधर्त्ता सत्ता पाने के लिए जनता को भ्रम में डाल रहे हैं। उन्होंने कहा कि हम फिर जमीन पर चढ़ेंगे। लड़े हैं। और आगे भी लड़ेंगे। उन्होंने जनता को चेताया कि वह जात-पात और धर्म की राजनीति करने वाले बटमार नेताओं से सावधान रहे। उन्होंने भूमि सुधार के संघर्ष को अंजाम तक पहुंचाने का संकल्प लेते हुए कहा कि लाल झंडे की लड़ाई हजारों एकड़ जमीन रखने वाले जमींदारों के खिलाफ है, छोटे किसानों के खिलाफ नहीं।प्रतिरोध सभा के अंत में भाकपा (मा) के प्रदेश सचिव विजयकांत ठाकुर ने कहा कि आज ही के दिन लाल झंडे की सेना ने हिटलर को नेस्ताबूद कर दिया था और एक बार फिर आज के ही ऐतिहासिक दिन बिहार के गरीब जनता और खेतिहर मजदूरों ने हिटलर की बिहारी औलादों, यहां के भूमिपतियों के मंसूबों को विफल करने का संकल्प लिया है। उन्होंने आगे कहा कि बिना भूमि सुधार के विश्व में कहीं भी विकास संभव नहीं हो पाया है इसलिए बिहार में भी ऐसा करना ही होगा। बिहार में हर साल दाखिल-खारिज संबंधी 5 लाख केस दाखिल होता है। बिहार की गरीब जनता को इस दुष्चक्र से बचाने के लिए भूमि सुधार जरूरी है। उन्होंने अपने भाषण के अंत में कहा कि जमीन किसानों की थी, है और रहेगी। अगर सरकार ने बंद्योपध्याय आयोग की अनुशंसाओं पर अमल नहंी किया तो हम खून-पसीना बहाकर इस पर अमल करने के लिए सरकार को मजबूर करेंगे। सारंगधर पासवान के धन्यवाद ज्ञापन के साथ प्रतिरोध सभा का समापन हुआ और इसके बाद उपस्थित जनता ने का. गजनफर नवाब की आवाज में आवाज मिलाते हुए क्रांतिकारी नारे लगाये।राजधानी पटना सहित राज्य भर में इस चिलचिलाती धूप में हजारों की संख्या में किसानों-मजदूरों ने प्रतिरोध सभा में इकट्ठा होकर यह ऐलान किया कि वह जमींदारों की हर चुनौती का सामना करने के लिए तैयार हैं। भूमि सुधार लागू करने के लिए हर कुर्बानी देने के लिए तैयार हैं। वाम दलों के कार्यकर्ताओं ने इस सभा के माध्यम से बंद्योपाध्याय आयोग की रिपोर्टाें को लागू कराने के लिए करो-मरो का संघर्ष शुरू कर दिया है।
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