भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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सोमवार, 12 जुलाई 2010

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की मीटिंग, हैदराबाद, 12 से 14 जून, 2010 द्वारा पारित राजनीतिक प्रस्ताव

प्रस्तावानाः
राष्ट्रीय परिषद की पिछली बैठक (दिसम्बर, 2009, बंगलौर) के बाद राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक आर्थिक और राजनैतिक घटनाक्रम हुए है, जिनमें कुछ निश्चित आर्थिक एवं राजनैतिक रूझानों के संकेत मिलते हैं, जिनके कुल मिलाकर राजनैतिक व्यवस्था पर दूरगामी परिणाम होंगे। आर्थिक संकट ने विश्व भर में पूंजीवादी आर्थिक नव-उदारवाद को जकड़ लिया है और उसमें एक नया मोड़ आ गया है जिससे आर्थिक स्थिति और अधिक जटिल तथा खराब होगी। इसका निश्चित रूप से विकासशील देशों पर प्रभाव पडे़गा, खासकर चीन और भारत जैसी उभरती आर्थिक व्यवस्थाओं पर जिनकी मजबूती के कुछ आसार दिखाई दे रहे हैं। देश के अंदर यूपीए-दो इस गलत धारणा को पालते हुए कि उसकी आर्थिक नीतियां देश को विकास के रास्ते पर ले जा रही हैं, वह शर्मनाक ढंग से आर्थिक नव-उदारवाद के रास्ते पर चल रही हैं, जिसके कारण बढ़ती महंगाई (मुद्रा स्फीति), के गहराते कृषि संकट और बेराजगारी, मजदूरी में कटौती एवं लगभग सभी क्षेत्रों में छंटनी के रूप में आम लोगों की परेशानियां बढ़ गई हैं।
राजनैतिक क्षेत्र में यूपीए-दो का संकट बना हुआ है क्योंकि उसे अपने अस्तित्व मात्र के लिए बाहर से समर्थन निर्भर करना पड़ रहा है (लोक सभा में यूपीए-दो को बहुमत का समर्थन प्राप्त नहीं है)। इसके अलावा लगातार कटुता तथा घटक दलों द्वारा ब्लैकमेल जारी है। व्यापक भ्रष्टाचार ने, खासकर घटक दलों के मंत्रियों के द्वारा किये जा रहे भ्रष्टाचार से शासन मजाक बनकर रह गया है।
लोकसभा में मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा मुद्दे उठाने के लिए अभी भीअंधेरे मंे तीर मार रही है क्योंकि मुख्य आर्थिक एवं राजनैतिक मुद्दों पर शासक पार्टी और उसके बीच मतभेद बहुत कम है। वास्तव में अधिकांश बुर्जुआ राजनैतिक दलों ने, चाहे वे राष्ट्रीय हैं या क्षेत्रीय दल, भूमंडलीकरण, निजीकरण एवं उदारीकरण (आर्थिक नव-उदारवाद) को स्वीकार कर लिया है जो अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक के निर्देश पर हो रहा है और जो बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के प्रभाव में काम करते है। इससे राजनैतिक स्थिति और जटिल हो जाती है।
यद्यपि वामपंथी पार्टियों ने आर्थिक नीतियों, खासकर आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में असहनीय वृद्धि के खिलाफ एक के बाद दूसरे लगातार अभियान चलाये हैं लेकिन इस संघर्ष को एक ऐसा सुस्पष्ट एवं निश्चित राजनैतिक आकार दिया जाना बाकी है जिसे कांग्रेस नेतृत्व वाले यूपीए (संप्रग-संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन) और भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए (राजग-राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) के विकल्प के तौर पर प्रस्तुत किया जा सके। वामपंथी पार्टियों ने दिल्ली मार्च और राष्ट्रव्यापी हड़ताल के रूप में दो बडे़ अभियान चलाये जिनका अन्य धर्मनिरपेक्ष पार्टियों ने भी समर्थन किया, उनमें से कुछ ने संसद में कटौती प्रस्ताव पर वामपंथी पार्टियों के साथ मतदान नहीं किया। अनेक क्षेत्रीय दलों के नेतृत्व का, जो धर्मनिरपेक्ष विकल्प का हिस्सा हो सकते हैं, समझौतापरस्त रवैया तथा मजबूरी एक ऐसा विकल्प प्रस्तुत करने में सबसे बड़ी बाधा है जिसके बारे में हैदराबाद में 2009 में आयोजित हमारी पार्टी की 20वीं कांग्रेस में खाका खींचा गया था।
केन्द्र सरकार की जनविरोधी नीतियों के विरूद्ध अनेक आंदोलन चल रहे हैं और जनता का असंतोष बढ़ रहा है, आगे आने वाले समय में जो घटनाक्रम सामने आने वाले हैं उनके लिए हमें इंतजार करना होगा।
आर्थिक स्थिति
इस दावे के विपरीत कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद के बदतरीन आर्थिक संकट का हल किया जा रहा है और अर्थव्यवस्था बहाली के रास्ते पर है, यह संकट और भी जटिल हो रहा है। अमरीका में जो आज तक का बदतरीन संकट शुरू हुआ और जिसने विश्व पूंजीवादी व्यवस्था को अपनी चपेट में ले लिया वह मंदी अब नये आकार ले रही है और एक के बाद एक प्रमुख देशों को आर्थिक विभीषिका की दिशा में ले जा रही है और इस तरह उन्हें राजनैतिक संकट में धकेल रही है। ग्रीस का संकट पूंजीवादी आर्थिक संकट के नये लक्षण का उदाहरण पेश करता है।
ग्रीस का संकट पूंजीवादी व्यवस्था का अपरिहार्य नतीजा है और इस व्यवस्था की एक कमजोर कड़ी होने के कारण ग्रीस इसका बदतरीन शिकार हुआ है। वास्तव में पूंजीपति वर्ग शासकों ने हर कहीं मजदूर वर्ग और आम लोगों पर असहनीय बोझ डालकर इस संकट का हल निकालने की कोशिश की है। विश्वव्यापी मंदी और रोजगार छिनने, मजदूरी कम होने, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा में कटौती और रोजगार की गुणवत्ता एवं शर्तों में बदलाव के कारण मेहनतकश लोग सड़कों पर उतरने को मजबूर हुए। ग्रीस का संकट यूरोपीय संघ की साझा मुद्रा (करेंसी) यूरो के संकट से भी जुड़ा है। इससे यूरोपीय यूनियन के लगभग सभी देशों में गहराते संकट का पता चलता है और लगता है कि अब पुर्तगाल की बारी है।
विश्वव्यापी आर्थिक संकट और मंदी का मौजूदा दौर वास्तव में उन सिद्धांतकारों और बुर्जुआ प्रचारकों का पर्दाफाश करता है जिन्होंने सोवियत संघ के पतन और समाजवाद को लगे आघात के बावजूद “इतिहास का अन्त” और इस अतर्कसंगत अवधारणा कि- “कोई विकल्प नहीं है” (टीना-देयर इज नो आल्टरनेटिव)- की घोषणा कर दी थी।
प्रथम विश्व युद्ध के बाद यह सबसे बड़ी मंदी अमेरिका और अन्य पूंजीवादी देशों में कर्ज का बोझ बढ़ाने की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने और जनता के बजाय मुनाफे को प्राथमिकता एवं महत्व देने के पूंजीवादी मंत्र का नतीजा थी। अमरीका एवं अन्य विकसित बुर्जुवा अर्थव्यवस्थाओं में बैंकों एवं अन्य वित्तीय संस्थानों के दिवाला पिटने और फेल हो जाने से विश्व भर में पूंजीवादी अर्थव्यवथा के संकट का पता चलता है। शीघ्र ही इसने विकासशील देशों को अपनी चपेट में ले लिया। इससे “कोई विकल्प नहीं है” के दावे का पूरी तरह से पर्दाफाश हो गया।
सभी पूंजीवादी देशा में सरकारें तथाकथित अर्थव्यवस्था के लिए स्टिमुलस फंड (प्रोत्साहन कोष) के नाम पर बहुत बड़े आर्थिक पैकेज देकर बहुराष्ट्रीय निगमों, कारपोरेट घरानों और बड़े बिजनेस को बचाने के लिए दौड़ पड़ी। इससे पता चलता है कि वे मुनाफे को तो निजी क्षेत्र को देना चाहते हैं जबकि घाटे की पूर्ति सरकारी खजाने से करते हैं। भारत समेत किसी भी देश में उन गरीब लोगों को कोई राहत नहीं दी गई जो संकट के असली शिकार हुए हैं और जिनकी कीमत पर पूंजीपति सरकारों ने इस संकट के समाधान की कोशिश की है।
अनुभव बताता है कि मंदी के संकट को पूंजीवादी रास्ते पर चलकर हल नहीं किया जा सकता। इसको अस्थायी तौर से हल किया भी गया तो वह फिर से सामने आ जाएगा। और यह संकट पहले से भी अधिक विकराल रूप में सामने आएगा जैसा कि ग्रीस और पुर्तगाल में देखा गया।
अर्थव्यवस्था का भूमंडलीकरण हो गया है अतः चीन भी इस विश्व-संकट के असर में आये बिना नहीं रह सका। पर उसने पूंजीपतियों को संकट से निकालने के रास्ते को अपनाने के बजाय मेहनतकश लोगों की क्रय शक्ति को बढ़ाने का रास्ता अपनाया, अतः संकट से बाहर निकलने में वह सबसे पहले देशों में था।
भारत में आर्थिक संकट
विश्वव्यशपी मंदी और आर्थिक संकट ने भारत समेत विकाशसील देशों को भी बुरी तरह प्रभावित किया। हमारे देश में निर्यात से जुड़े उद्योगों, लघु उद्योगों और हस्तशिल्प पर ही नहीं, आईटी (सूचना प्रौद्योगिकी) पर भी इसका गंभीर असर पड़ा। लगभग 30-40 लाख कर्मचारियों को रोजगार छिनने, कारखाना-बंदी, छंटनी और मजदूरी में कटौती की परेशानियों का सामना करना पड़ा। मीडिया मालिकों ने भी मदजूरी/वेतन में कटौती का तरीका अपनाया।
कम्युनिस्टों और अन्य वामपंथी ताकतों द्वारा लगातार विरोध और उनके द्वारा चलाये जा रहे संघर्षों के कारण भारत में शासक वर्ग बैंकों, बीमा और वित्तीय क्षेत्र के अन्य संस्थानों का उस हद तक निजीकरण नहीं कर पाया जितना वह चाहता था। इस कारण भारतीय अर्थव्यवस्था पर इस संकट का असर अपेक्षाकृत कम रहा। इसके बावजूद, विकसित पूंजीवादी देशों की सरकारों के उदाहरण और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन के निर्देशों पर चलते हुए यूपीए-दो सरकार ने भी कारपोरेट घरानों को संकट से निकालने के लिए राहत देने और उन्हें स्टिमुलस पैकेज देने का रास्ता अपनाया। और अर्थव्यवस्था की “बहाली” (रिकवरी) के मिथ्या दावे के बावजूद वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने इस वर्ष के बजट में इन पैकेजों को वापस लेने से मना कर दिया।
आर्थिक संकट के सबसे अधिक शिकार आम लोग हुए हैं जिन्हें रोजगार छिनने, मजदूरी में कटौती और रोजगार की गुणवत्ता और शर्तो में नकारात्मक बदलाव झेलने के अलावा उस नये बोझ को भी सहना पड़ रहा है जो लगभग सभी आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में लगातार वृद्धि से उन पर पड़ रहा है। मैट्रोपेालिटेन शहरों और अन्य शहरों में मकान किराए 40 से 100 प्रतिशत बढ़ गये हैं। फिक्स्ड आमदनी समूह (वे लोग जिनकी आमदनी में कोई वृद्धि नहीं होती) के लोगों के लिए गुजारा करना मुश्किल हो गया हैं
निजी कम्पनियों के साथ ही साथ सार्वजनिक क्षेत्र की इकाईयों की 15 प्रतिशत की अनिवार्य बिक्रीवित्त मंत्री ने कम्पनियों को सूचीबद्ध करने (लिस्टिंग) के लिए जिन नये मानदण्डों की घोषणा की है उनसे सार्वजनिक क्षेत्र की इकाईयों को भी अपने 25 प्रतिशत शेयर पब्लिक को बेचना कानूनन जरूरी हो गया है। इन नए मानदण्डों को कुछ निजी कम्पनियों द्वारा शेयरों की कीमतों में हेरा-फेरी करने को रोकने के बहाने से शुरू किया गया। इन नये मापदण्डों से निजी क्षेत्र में विप्रो, रिलायंस पावर जैसी चंद ही कम्पनियों पर असर पड़ेगा, अधिकांशतः इसका असर सार्वजनिक क्षेत्र की इकाईयों पर ही पड़ने वाला है। पिछले दरवाजे से निजीकरण और विनिवेश करने का यह तरीका लोगों को धोखा देने के लिए शुरू किया गया। सार्वजनिक क्षेत्र कि निम्न बड़ी इकाईयों उनके सामने दिये गए शेयर प्रतिशत में प्रभावित होंगी:
एनटीपीसी 15.5 प्रतिशत
एनएमडीसी 10 प्रतिशत
इंडियन ऑयल 21 प्रतिशत
सेल 14 प्रतिशत
पावर ग्रिड 13 प्रतिशत
पावर फाइनेंस कारपोरेशन 10.22 प्रतिशत
नेशनल एल्युमिनियम 12.85 प्रतिशत
न्येवेली लिग्नाइट 06.44 प्रतिशत
शिपिंग कारपोरेशन ऑफ इंडिया 19.88 प्रतिशत
पहले सरकार ने जीवन बिमा निगम में सरकार के निवेश को पंाच करोड़ से बढ़ाकर एक सौ करोड़ करने का फैसला किया, यद्यपि ऐसी कोई आवश्यकता नहीं थी। इसमें भी जीवन बीमा निगम के भविष्य में विनिवेश का इरादा है।
25 प्रतिशत के नये कानूनी अनिवार्य मानदण्ड से पब्लिक और प्राइवेट क्षेत्र में दो लाख करोड़ रूपये मिलने की अपेक्षा है पर बाद में इससे सार्वजनिक क्षेत्र की इकाईयों को भारी नुकसान होगा।
महंगाईइस संकट के बदतरीन नतीजों में से एक है तमाम आवश्यक वस्तुओं की आसमान छूती कीमतें। महंगाई बुनियादी तौर पर सरकार की नीतियों-खाद्यान्नों एवं अन्य आवश्यक वस्तुओं में वायदा कारोबार की इजाजत देने, जमाखोरी के विरूद्ध कानूनों में व्यापारियों को फायदा पहुंचाने वोल संशोधन एवं ऐसे ही अन्य कदमों-का नतीजा है। मनमोहन सिंह सरकार वायदा कारोबार और जमाखोरी के विरूद्ध कदम उठाने से यह बहाना बनाकर इन्कार करती है कि यह राज्य सरकारों का कार्यक्षेत्र है।
इस मामले में यूपीए-दो की निष्क्रियता के परिणाम स्वरूप दालों और खाद्य-तेलों की कीमतों में सौ प्रतिशत, गेहूं एंव चावल में 50 प्रतिशत की वृद्धि हो गयी है। सरकार ने स्वंय माना है कि मुद्रा स्फीति की दर 15 प्रतिशत से अधिक है। सरकार लोगों की इस परेशानी को दूर करने के लिए कोई कदम उठाने को तैयार नहीं है। इसके बजाय प्रधानमंत्री जनता की आंखों में यह आश्वासन देकर धूल झोंक रहे हैं कि साल के अंत में कीमतें नीचे आ जाएगी। यह उसी किस्म की क्रूरता है जो कृषि मंत्री ने यह कहकर प्रकट की थी कि चीनी महंगी होने से लोगों को डायबिटीज कम होगी।
पार्टी की 20वीं कांग्रेस के फैसले के अनुसार, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने महंगाई के विरूद्ध व्यापक जन आंदोलन खड़ा करने पर ध्यान दिया है। इस साल के दौरान पहले तो उसने भाकपा (मा.), आरएसपी और फारर्वउ ब्लॉक के साथ मिलकर देशव्यापी कार्रवाईयां की और बाद में महंगाई के सीमिति मुद्दे पर संयुक्त कारवाईयां की और बाद में महंगाई के सीमित मुद्दे पर संयुक्त कार्रवाई के लिए कुल मिलाकर 13 राजनैतिक पार्टियों को तैयार किया।
गैर-यूपीए और गैर-राजग तमाम क्षेत्रीय पार्टियां उस अखिल भारतीय हड़ताल में शामिल हुई जो वस्तुतः भारत बंद में बदल गई। हमें इस तथ्य को नोट लेना होगा कि यूपीए-दो सरकार के दबाव और सीबीआई एवं सरकार की ताकत के दुरूपयोग के कारण इनमें से कुछ पार्टियों ने कटौती प्रस्ताव में हमारे साथ मतदान नहीं किया।
यूपीए-2: विफलता और छल-कपट का एक साल
यूपीए-2 ने अपने दूसरे कार्यकाल में एक साल पूरा किया जो आर्थिक मोर्चे पर सरकार की विफलता तथा लोगों को बेवकूफ बनाने के उसके प्रयास से भरा हुआ है। यूपीए-2 के सत्ता में आने की प्रथम वर्षगांठ पर प्रधानमंत्री ने अपनी प्रेस कांफ्रेेंस में विभिन्न मोर्चो खासकर जीडीपी विकासदर, सबको शिक्षा का अधिकार देने और खाद्य सुरक्षा कानून बनाने का आश्वासन देने के बारे में उपलब्धियां हासिल करने का दावा किया। जीडीपी विकासदर मानव विकास इंडेक्स को प्रतिबिम्बित नहीं करती है। जीडीपी विकास दर का दावा कुछ हलकों में झूठा संतोष पैदा करता है। यह भी नोट करना चाहिए कि जीडीपी विकास दर के दावे का आधा सेवा क्षेत्र से है। यह सच है कि संपत्ति का निर्माण हो रहा है लेकिन चार कारपोरेट घरानों के हाथों में यह संपत्ति जमा हो रही है। अमीरों और गरीबों के बीच खाई बढ़ती जा रही है। भारत की सच्चाई यह हैः
 मानव विकास इंडेक्स में भारत का स्थान 123वां है।
 प्रति व्यक्ति जीडीपी में इसका स्थान 126वां है।
जन्म के बाद जिंदा रहने के मामले में इसका स्थान 127वां है।
 व्यस्क निरक्षरता के मामले में इसका स्थान 148वां है।
 एक रिपोर्ट के अनुसार देश के पांच शीर्ष खरबपतियों की संपत्ति का मूल्य 30 करेाड़ लोगों की संपत्ति के बराबर है।
 कार्पोरेट घरानों के आला अधिकारियों का वेतन सलाना 5 करोड़ से 40 करोड़ रू. के बीच है। ऐसे करीब 3000 आला अधिकारी लगभग 20,000 करोड़ रु. केवल वेतन के रूप में लेते हैं।
दूसरी तरफ अर्जुन सेनगुप्ता कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार 77 प्रतिशत लोग (करीब 84 करोड़़) रोजाना 20 रु. से कम पर गुजारा करते हैं।
यह विरोधाभास और हकीकत यूपीए-2 के असली चेहरे को दर्शाती है।
महंगाई रोकने में सरकार की विफलता के अलावा ऐसे मुद्दे हैं जो यूपीए-2 के एक साल के कुशासन का बखान करते हैं। इन मुद्दों में आर्थिक एवं विदेश नीतियों में लगातार ऐसा झुकाव जो अमरीका के हक में है, आंतरिक सुरक्षा की विफलता, आतंकवाद और नक्सलवाद में तेजी, यूपीए में शामिल घटक दलों और मंत्रियों में कटुता, आईपीएल विवाद, राजनीतिक दलों को ब्लैकमेल करने के लिए सीबीआई एवं अन्य सरकारी एजेंसियों का दुरूपयोग जैसा कि बजट सत्र के दौरान कटौती प्रस्ताव पर मतदान के दौरान देखने को मिला तथा शशि थरूर, जयराम रमेश और ममता बनर्जी जैसे मंत्रियों के अनुचित व्यवहार शामिल हैं।
विपक्षी नेताओं के टेलीफोन टेप होने का खुलासा होने तथा राजनीतिकविरोधियों के खिलाफ सीबीआई के दुरूपयोग से कुछ हद तक यूपीए-2 का चेहरा कलुषित होता है। अपने एक साल के शासन में यूपीए-2 को अस्थिरता के खतरे का सामना करना पड़ा तो अब केन्द्र और राज्यों में दूसरी पार्टियों का समर्थन लेने की कोशिश कर रही है ताकि आंतरिक एवं बाहरी दबावों के खतरे का सामना किया जा सके।
सरकार निजीकरण एवं उदारीकरण की आर्थिक नीति पर लगातार आगे बढ़ रही है जैसा कि बहुराष्ट्रीय निगम चाहते हैं। इस दिशा में ताजा कदम पेट्रोल एवं पेट्रोलियत उत्पादों के मूल्यों पर से नियंत्रण हटाने की दिशा में है। इसका कीमतों पर काफी घातक प्रभाव पड़ेगा।
उच्च स्तरों पर भ्रष्टाचार
उच्च स्तरों पर भ्रष्टाचार यूपीए-2 की एक अन्य विशेष बात है। यूपीए के कुछ घटकों द्वारा सरकार के पैसे की लूट इतने खुलेआम हो रही है कि प्रधानमंत्री भी उसका बचाव नहीं कर सके। जी-2 स्पैक्ट्रम घोटाला, जिसमें संचार मंत्री, डीएमके के ए. राजा लिप्त हैं, इसका एक उदाहरण हैं। अनेकों मंत्री आईपीएल घोटाले में शामिल है। आईपीएल का क्रिकेट को बढ़ावा देने से कोई वास्ता नहीं है। इस तरीके को जनता को लूटने और पैसे को हड़प करने के लिए बनाया गया। कुल मिलाकर इससे क्रिकेट को नुकसान पहुंच रहा है।
सरकार और प्रशासन में भ्रष्टचार इतना व्यापक है कि मनमोहन सिंह सरकार बचाव के तरीके खोज रही है। भ्रष्ट तत्वों को बचाने के लिए और प्रशासन में पारदर्शिता को खत्म करने के लिए उसने सूचना के अधिकार कानून में संशोधन की पेशकश की है। इसका कुल नतीजा यह है कि भ्रष्टाचार न्यायापालिका और रक्षा सेवाओं में भी घुस गया है।
कानूनों के नाम पर धोखाधड़ी
शिक्षा के अधिकार, महिला आरक्षण बिल और खाद्य सुरक्षा बिल जैसे कुछ जनकानूनों के संबध्ंा में सरकार की घोषणाओं से बड़े सब्जबाग दिखाये जा रहे हैं। तथ्य यह है कि महिला आरक्षण बिल को राज्यसभा में पारित कराने के बाद यूपीए-2 इस मुद्दे पर पीछे कदम हटा रही है। बिल को पारित करने की अपनी वचनबद्धता को पूरा करने के बजाय उसने एक बार फिर “सर्वसम्मति” बनाने के संबंध में बोलना शुरू कर दिया है।
इसी प्रकार शिक्षा के अधिकार के बिल को संसद में पास किया गया जिससे शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित नहीं होता क्योंकि इसमें वित्तीय समर्थन के बारे में कोई स्पष्टता नहीं है। केन्द्र सरकार मामले को राज्य सरकार पर डालने की कोशिश कर रही है, जबकि इस बिल को अंतिम रूप देते समय उसने राज्य सरकारों को विश्वास में लेने की फिक्र ही नहीं की थी।
शिक्षाविद, शिक्षक और छात्र संगठन शिक्षा अधिकार कानून पर नाखुश है क्योेंकि यह उनकी अपेक्षाओं से बहुत दूर है और वे महसूस करते हैं कि इससे कोई उद्देश्य हल होने वाला नहीं है। इसके अलावा यूपीए सरकार ने निजी विश्वद्यिालयों को इजाजत देकर और विदेशियों के लिए उच्च शिक्षा क्षेत्र के दरवाजे खोलने की मंशा जाहिर कर उच्च शिक्ष को आम आदमी की पहुंच से दूर कर दिया है।
यही बात बहुप्रचारित खाद्य सुरक्षा बिल पर लागू होती है। यूपीए-2 ने अपने घोषणा पत्र में सभी बीपीएल परिवारों को 35 किलो चावल या गेहूं 3 रु. प्रति किलो दर पर देने का वायदा किया था। उस वायदे पर टिके रहने के बजाये वह खाद्य सुरक्षा बिल में हीला-हवाली कर रही है और मानदंडों को पूरी तरह बदलकर बीपीएल परिवारों की अवधारणा को ही विकृत कर रही है। पहले ही अधिकांश बीपीएल परिवारों को इस कैटेगरी से बाहर किया जा चुका है।कट्टरवादी ताकतों द्वारा साम्प्रदायिक नफरत फैलाये जाने के बावजूद-जिससे देश का धर्मनिरपेक्ष वातावरण दूषित हो रहा है- जिस “साम्प्रदायिक हिंसा रोक एवं नियंत्रण बिल” का वायदा किया गया था, वह अभी लंबित कर दिया गया है।
सरकार जनहित के बिलों की घोषणा मात्र करके संतुष्ट है और वास्तव में परमाणु दायित्व जैसे बिलों पर जोर दे रही है, उन्हें आगे बढा़ रही है। परमाणु दायित्व बिल परमाणु दुर्घटना होने की सूरत में, परमाणु रिएक्टरों (जो दो दशक से भी अधिक से गोदामों में जंग खा रहे हैं) के आपूर्तिकर्ता अमरीकी बहुराष्ट्रीय निगमों को किसी भी मुआवजे के भुगतान की जिम्मेदारी से मुक्त करता है। भोपाल की बदतरीन औद्योगिक दुर्घटना के मामले में जो शर्मनाक फैसला आया उससे स्वष्ट चेतावनी मिल रही है कि संसद में जो परमाणु दायित्व बिल पेश किया गया है उसका लक्ष्य क्या है।
मणिपुर की स्थिति
मणिपुर में नागाओं ने पिछले दो महीने से उन दो राष्ट्रीय राजमार्गों को ब्लॉक कर रखा है जो मणिपुर से एकमात्र जीवित संपर्क हैं। इससे मणिपुर में स्थिति बहुत खराब हो गयी है। मणिपुर चारों तरफ से जमीन से घिरा राज्य है। मणिपुर सरकार ने एनएससीएन नेता मुवेइया की प्रस्तावित यात्रा को इस डर से नामंजूर कर दिया कि 1990 के दशक जैसी नृजातीय हत्याओं का सिलसिला न दोहराया जाने लगे, जिनमें लगभग 1000 कुर्की लोग मारे गये थे और एक लाख लोग घरों से विस्थापित हो गये थे।
नागा संगठन “नागालियम” अर्थात स्वतंत्र वृहत नागालैंड की मांग कर रहे हैं और उसमें मणिपुर के चार जिलों और असम, मिजोरम एवं अन्य राज्यों के कुछ नागा आबादी वाले क्षेत्रों को शामिल करने की मांग कर रहे हैं। जब केन्द्र सरकार नागा संगठनों से बात कर रही थी उसने पहले मणिपुर में भी सीजफायर घोषित कर दिया जिससे बड़ा राजनैतिक आंदोलन भड़क उठा।केन्द्र सरकार द्वारा मणिपुर की स्थिति के संबंध में गैर जिम्मेदार तरीके से निपटने के कारण मणिपुर के लोगों को दिक्कते पैदा हो रही हैं। मणिपुर में छोटे एवं मध्यम अनेक विद्रोही ग्रुप सक्रिय हैं। इस तरह एक संवेदनशील राज्य होने के नाते मणिपुर में स्थिति विस्फोटक है। वहां आवश्यकता इस बात की है कि मणिपुर की जनता और सरकार को साथ लेकर, उनको शामिल कर केन्द्र सरकार अधिक उत्तरदायीपूर्ण और सावधानी के साथ हस्तक्षेप करे।
विदेश नीति
विदेश नीति में अमरीका के पक्ष में झुकाव जारी है। भारत-अमरीकी रणनीतिक वार्ता जिसके लिए विदेश मंत्री के नेतृत्व में एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल वहां गया था, अमरीकापक्षी नीति का ताजा उदाहरण है। अमरीका ने यहां तक कि भारत से उच्च तकनीक के आयात पर रोक को हटाने की मांग स्वीकार नहीं की लेकिन हमने अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए अपना बाजार खोल देने तथा उदारीकरण के तेज करने का आश्वासन दे डाला। भोपाल गैस त्रासदी पर शर्मनाक अदालती फैसले को लेकर देश भर में फैले आक्रोश के बावजूद भारत सरकार परमाणु दायित्व बिल को और नरम करने पर राजी हो गयी है जिसमें परमाणु हादसे होने पर अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को मुआवजा देने से पूरी तरह मुक्त कर दिया गया है।
यद्यपि विश्वव्यापी आर्थिक मंदी ने अनेक विकासशील देशों को विभिन्न तरह के ग्रुप बनाकर अमरीका द्वारा एक ध्रुवीय विश्व व्यवस्था थोपने के प्रयास का विरोध करने के लिए मजबूर किया, भारत अभी अपनी भावी दिशा के बारे में स्पष्ट नहीं है। इसके कारण यूपीए-2 द्विविधा में पड़ गयी है, वास्तव में ऐसी परिस्थिति में पड़ गयी है कि विदेश नीति में विरोधाभासी रवैया अपना रही है। ब्रिक एवं ऐसे ही संगठनों में भारत ने जो सक्रिय भूमिका निभायी वह स्वागतयोग्य है, लेकिन यूपीए-2 शंघाई सहयोग संगठन की पूर्ण सदस्यता ग्रहण करने के बारे में अभी भी बहस ही कर रही है जिसमें बहुध्रवीय विश्व व्यवस्था में एक अन्य स्तंभ बनकर उभरने की क्षमता है।
पाकिस्तान के साथ वार्ता करने में स्वतंत्र रूख अपनाने के बजाय, सरकार अनधिकृत एवं अवांछनीय ‘मध्यस्थता’ के लिए अमरीका की ओर देख रही है। अमरीका ने ही डा. मनमोहन सिंह को पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के साथ शरम-एल-शेख (मिस्र) में एक संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया था जिसमें पाकिस्तानी प्रांत बलूचिस्तान की घटनाओं का अनावश्यक उल्लेख किया गया है।
भारत-पाक संबंधों में मध्यस्थ बनने का दर्जा हासिल करने की अमरीकी कोशिशों को भारत को पूरी तरह खारिज कर देना चाहिए। हमें कश्मीर सहित सभी विवादस्पाद भारत-पाक मुद्दों पर द्विपक्षीय वार्ता को बढ़ावा देना चाहिए। दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक का लाभ उठाकर भारत-पाक व्यापक वार्ता के लिए मार्ग प्रशस्त करना चाहिए जो मुंबई में आतंकवादी हमले के कारण ठप्प पड़ गयी थी। पाकिस्तान को अपने यहां सक्रिय आतंकवादियों एवं उनके संरक्षकों को पकड़ने और दंड देने के लिए भारत के साथ पूरा सहयोग करना चाहिए। यूपीए-2 सरकार श्रीलंका के तमिलों के राजनीतिक समाधान के मुद्दों को श्रीलंका सरकार से उठाने में विफल रही है तथा श्रीलंका के तमिल शरणार्थियों के पुनर्वास और मानवधिकारों के उल्लंधन के मुद्दे को उठाने में विफल रही है।
आतंकवाद का खतरा
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की हमेशा से यह राय रही है कि भारत जिस आतंकवादी खतरे का सामना कर रहा है उसका 2001 में अमरीका के आर्थिक एवं सैनिक शक्ति के प्रतीकों पर हुए हमले क बाद अमरीका जिस आतंकवाद की बात कर रहा है उससे कुछ लेना देना नहीं है। लेकिन दुर्भाग्य से उस समय की एनडीए सरकार ने आतंकवाद पर अमरीकी रूख को मान लिया तथा तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने स्वयं कहा कि “सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं है लेकिन सभी आतंकवादी मुसलमान है।” इस झूठी धारणा के कारण 2001 के बाद भारत में हुए हर आतंकवादी हमले के बाद बड़ी संख्या में मुसलमान युवाओं को झूठे मुकदमों में फंसाया गया।
महाराष्ट्र के मालेगांव में हुए बम विस्फोट के बाद महाराष्ट्र के एटीएस प्रमुख ने कहा था कि हिंदुत्व संगठन अभिनव भारत ने यह आतंकवादी हमला रचा था और उसे अंजाम दिया था। उसके बाद संघ परिवार से जुड़े विभिन्न संगठनों के अनेक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया जिनमें सेना का एक कर्नल और एक साध्वी शामिल थी। लेकिन एनडीए सरकार के दिनों में किये गये इस बारे में भ्रामक प्रचार तथा पुलिस और अन्य एजेंसियों में घुसपैठ के कारण मालेगांव विस्फोट और महाराष्ट्र के अन्य शहरों में हुई ऐसी ही अन्य घटनाओं की जांच जिनमें आरएसएस और विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ता प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शामिल थे, ठीक ढंग से नहीं हो पायी। बल्कि जांच में बाधा डालने की कोशिश की गयी जिससे इस धारण को बल मिला कि नकली मुठभेड़ों की तरह आतंकवादी हमले भी नकली हैं जिससे आतंकवाद के बारे में अमरीकी विचार को मान्यता मिली।
इस आशंका को उस समय और बल मिला जब राजस्थान एटीएस ने कहा कि अजमेर में हुए बम विस्फोट में आरएसएस कार्यकर्ताओं का हाथ था। राजस्थान एटीएस ने आगे दावा किया कि उसके पास साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत हैं कि हैदराबाद में मक्का मस्जिद पर हमला तथा समझौता एक्सप्रेस में विस्फोट में आरएसएस के उसी ग्रुप का हाथ था जो अजमेर विस्फोट में शामिल था। सीबीआई ने भी राजस्थान पुलिस के इस दावे की पुष्टि की है।
यह नोट किया जाना चाहिए कि अधिकांश विस्फोटों के मामलों में मध्य प्रदेश, गुजरात और राजस्थान जहां भाजपा सत्ता में थी, के बीच लिंक होने का पुलिस दावा कर रही है। यहां तक कि अभी इन राज्यों की पुलिस तथा केन्द्रीय एजेंसियों में घुसपैठ करने वाले तत्व जांचों में बाधा डालने की कोशिश कर रहे हैं।
भाकपा को इन आतंकवादी कार्रवाइयों में हिन्दुत्व लिंक होने तथा आतंकवाद के बारे में साम्राज्यवादी विचार को उनके द्वारा मान्यता देने का पर्दाफाश करने के लिए अभियान चलाना चाहिए और 2010 के बाद से हर आतंकवादी हमले के बाद झूठे मुकदमों में फंसाये गये सभी मुसलमान युवाओं को तुरन्त रिाहाई की मांग करने चाहिए। जो पुलिस अधिकारी मुसलमान युवाओं के शामिल होने की मनगढ़ंत कहानी बनाते हैं उन्हें दंडित किया जाना चाहिए। भाकपा माओवादियों की गलत कार्यनीति और वैचारिक भटकाव का पर्दाफाश करना जारी रखेगी जिससे क्रांतिकारी आंदोलन को नुकसान हो रहा है।
माओवादी हिंसा में तेजी
पिछले छह महीनों में देश के अनेक हिस्सों में तथाकथित माओवादियों द्वारा किये जा रहे हिंसक हमलों मंे तेजी आयी है। माओवादी अब सरकारी अधिकारियों की जगह नागरिकों को निशाना बना रहे हैं। रेलों को निशाना बनाया गया है जिनमें बड़ी संख्या में निर्दोष यात्री मारे गये हैं। इसके पहले दांतेवाड़ा में सीआरपीएफ के 76 जवानों की हत्या भी माओवादियों ने ही की थी। बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की साठगांठ से माओवादी राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाकर तथा उनकी हत्या कर के तथा आम लोगों को आतंकित करके अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार करने की कोशिश कर रहे हैं।
माओवादी अपनी कार्यनीति से उनके खिलाफ सेना को इस्तेमाल करने की गृहमंत्री की कोशिश को आसान बना रहे हैं। भाकपा स्पष्ट तौर पर घोषणा करती है कि आंतरिक समस्याओं के समाधान के लिए सेना का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। यह एक गलत परिपाटी होगी तथा भारतीय सेना की प्रतिष्ठा को काफी धक्का लगेगा।
केन्द्रीय गृह मंत्रालय माओवादी हिंसा के मुद्दे पर कड़ा रुख अपना रहा है। हालांकि सरकार मानती है कि यह केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है, लेकिन वास्तव में यह इससे कानून-व्यवस्था की समस्या की तरह निपट रही है।
भाकपा हमेशा इन गुमराह तत्वों के साथ वार्ता के पक्ष में रही है लेकिन साथ ही हिंसा करने वाले तत्वों से सख्ती से निपटने के पक्ष में रही है। इसके साथ ही सरकार को उन लोगों के लिए सामाजिक-आर्थिक पैकेज लाना चाहिए जो माओवादी प्रभाव वाले क्षेत्रों में रहते हैं। लोगों खासकर आदिवासियों की शिकायतों को दूर करने के लिए विकासोन्मुख परियाजनाओं को लागू किया जाना चाहिए। उन परियोजनाओं को तुरन्त बन्द कर देना चाहिए, खासकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा चलायी जाने वाली उन परियोजनाओं को जिनमें आदिवासी अपनी जमीन और वन संसाधनों से वंचित होते हैं।
पश्चिम बंगाल में नगर पालिका चुनाव
पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ वाममोर्चा को हाल में संपन्न कोलकाता नगर निगम और 80 अन्य नगर पालिका बोर्डो के चुनाव में गहरा धक्का लगा है। यद्यपि डाले गये वोट और जीते गये वार्डो के आधार पर कोई यह संतोष कर सकता है कि एक साल पहले लोकसभा चुनावों में जितना नुकसान हुआ था कुछ हद तक उसमें कमी हुई है लेकिन इससे आत्मसंतुष्टि और समस्या की गंभीरता की उपेक्षा नहीं की जा सकती।
यह एक तथ्य है कि वाममोर्चा अपने परंपरागत समर्थकों जैसे शहरी गरीब, मजदूर एवं अल्पसंख्यक के बीच आधार खोता चला जा रहा है। इसके अलावा इनकम्बेंसी कारक, जिसका सामना हर सत्तारूढ़ गठबंधन को करना होता है, व्याप्त भ्रष्टाचार और जमीनी स्तर पर लोकतांत्रिक विरोध को दबाना वाममोवर्चा की हार के मुख्य कारण है।
समय का तकाजा है कि वाममोर्चा के घटकों को व्यक्तिगत तथा सामूहिक रूप से गंभीरतापूर्वक आत्मविश्लेषण और चिंतन करना चाहिए। वाममोर्चा के परंपरागत समर्थक लोगों की आकांक्षाओं के अनुरूप सामाजिक - आर्थिक प्राथमिकताओं को फिर से निर्धारित किया जाना चाहिए तथा आज की वास्तविकताओं को देखते हुए वाममोर्चा का पुनर्गठन किया जाना चाहिए। एक बेहतर वाममोर्चा ही विकल्प है।
कुछ उल्लेखनीय रूझान
राष्ट्रीय परिषद की बंगलौर बैठक के बाद हुए सामाजिक-आर्थिक एवं राजनीतिक घटनाएं निम्नलिखित रूझानों की ओर इंगित करती हैं जिन्हें पार्टी के कर्तव्यों को अंतिम रूप देने में नोट किया जाना चाहिए ये हैं:
आर्थिक संकट एवं मंदी गंभीर बनी हुई है। यह नया रूप ले रहा है तथा रोजगार और वेतन में कटौती से मेहनतकश लोगों को ज्यादा नुकसान हो रहा है। मुद्रास्फीति विश्वव्यापी हो गयी है और पूंजीवादी व्यवस्था के संकट का आंतरिक हिस्सा बन गई है।
 यूपीए-2 की इस गलत धारणा से कि सरकार की नीतियां विकासोन्मुख हैं, भूमंडलीकरण, निजीकरण और उदारीकरण का वह विनाशकारी रास्ते पर चलना जारी रखे हुए हैं। इससे अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी को ज्यादा से ज्यादा रियायतें मिलती रहेंगी। वैकल्पिक आर्थिक रास्ता अपना कर और उचित राजनीतिक नारों के साथ इन नीतियों का विरोध करने की जरूरत है।
समावेशी विकास के बारे में भ्रम पैदा किया जायेगा ताकि आम लोगों को गुमराह किया जा सके। विभिन्न क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों की मजबूरियां और ब्लैकमेल जो हाल में देखने को मिले वे जारी रहेंगे। इसके बावजूद हमें उनके साथ संबंध बनाना है। कम्युनिस्टों को हमेशा राजनीतिक एवं चुनावी कार्यनीतियों में अंतर को ध्यान में रखना चाहिए।
वाम, खासकर कम्युनिस्टों को अलग-थलग करने की कोशिश की जा रही है। पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा हार का कम्युनिस्ट विरोधी शक्तियों और मीडिया द्वारा पूरी तरह फायदा उठाया जा रहा है। वामपंथी शक्तियां और धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक शक्तियों के बीच ज्यादा से ज्यादा सहयोग वक्त का तकाजा है।
आर्थिक विकृति के कारण लोगों में बढ़ रहे असंतोष और कमजोर वर्गो, जिनमें अल्पसंख्यक भी शामिल हैं, में उपेक्षा की भावना को जनआंदोलन में बदलना होगा। इस दिशा में काफी सोच समझकर प्रयास करने होंगे।
आने वाले दिनों में बिहार विधान सभा के चुनाव होने वाले हैं तथा अगले चार राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। पार्टी को इन सभी राज्यों में तुरन्त सांगठनिक तैयारी शुरू कर देनी चाहिए।
आने वाले महीनों में अनेक राज्यों में पंचायत एवं स्थानीय निकायों के चुनाव होने वाले हैं। आमतौर पर हम इन चुनावों पर ध्यान नहीं देते। इस पर जोर देने की जरूरत है कि स्थानीय निकायों के चुनावों के जरिए तथा रोजाना की गतिविधियों से राजनीतिक आधार तैयार किये बिना हम विधानसभा और संसदीय चुनावी चुनौती का सामना नहीं कर सकते।
राज्य परिषदों की बैठक होनी चाहिए जिसमें पार्टी फंड के लिए चंदा वसूलने पर विचार किया जाना चाहिए ताकि पार्टी की गतिविधियां सुचारू रूप से चलती रहे। चूंकि जीवनयापन पर खर्च काफी बढ़ गया है, पूरावक्ती कामरेडों के वेतन/भत्तों में उचित वृद्धि की जानी चाहिए और इसे तुरन्त किया जाना चाहिए।
कर्तव्य
1. मीटिंगों और पार्टी अखबारों के जरिये राजनीतिक अभियान चलाया जाना चाहिए जिसमें पार्टी की राजनीतिक लाइन और नीतियों को बताया जाना चाहिए।
2. बिहार विधान सभा और विभिन्न राज्यों में होने वाले स्थानीय निकायों के चुनावों के लिए राजनीतिक तैयारियां की जानी चाहिए।
3. 2012 के आरंभ में पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु एवं अन्य राज्यों में होने वाले चुनावेां के लिए तैयार रहे।
4. केन्द्रीय एवं राज्य पार्टी की पत्र-पत्रिकाओं तथा दैनिक अखबारों का सर्कुलेशन बढ़ाने का लक्ष्य पूरा करें।
5. जनसंठनों खासकर खेत मजदूरों और किसानों के संगठनों को मजबूत करें जिसमें ग्रामीण गतिविध पर जोर हो।
6. महिलाओं, युवाओं, दलितों एवं अल्पसंख्यकों में से अधिक से अधिक लोगों को पार्टी में लाएं।
7. सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ संघर्ष।
8. विभिन्न राज्यों में भूमिसंघर्ष चलाया जाना चाहिए।
9. ब्रांच से राष्ट्रीय स्तर तक पार्टी फंड की वसूली की योजना बनानी चाहिए और उस पर अमल करना चाहिए।
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महंगाई और मायावती सरकार

5 जुलाई को पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों को बाजार के हवाले करने तथा महंगाई के खिलाफ वामपंथी दलों ने भारत बंद का नारा दिया था। इसी दिवस तमाम अन्य राजनीतिक दलों ने भी इसमें शिरकत की। तमाम व्यापारिक संगठनों तथा किसानों, खेत मजदूरों, मजदूरों, विद्यार्थियों, नौजवानों, महिलाओं तथा वकीलों आदि के संगठनों ने भी इसे अपना समर्थन दिया। केन्द्र में सरकार चला रहे कांग्रेस नीत संप्रग-2 में शामिल राजनीतिक दल तथा उत्तर प्रदेश में सरकार चला रही बसपा इसमें शामिल नहीं थे।
महंगाई जनता के लिए एक मुद्दा है। पिछले डेढ़ सालों में महंगाई इतनी ज्यादा बढ़ी है कि जनता के अधिसंख्यक तबके त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। बन्द का पूरे देश में अच्छा असर रहा और उत्तर प्रदेश भी इससे अछूता नहीं था।
महंगाई बढ़ाने में केन्द्र सरकार दोषी है लेकिन इसमें बसपा सरकार भी दोषी है। विभिन्न योजनाओं में जो खाद्यान्न राज्य सरकार को आबंटित होता है, भ्रष्टाचार के कारण उसकी कालाबाजारी हो जाती है और वह लक्षित जनता तक नहीं पहुंचता। इस मध्य बसपा सरकार ने कई वस्तुओं पर टैक्स बढ़ाकर उनकी कीमतें बढ़ा दीं। कालाबाजारी, मुनाफाखोरी और खाद्यान्नों की अनैतिक और अवैधानिक जमाखोरी रोकने के लिए बसपा सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया। विकास के लिए केन्द्र सरकार द्वारा धन न देने का उलाहना मुख्यमंत्री अक्सरहां करती रहती हैं लेकिन एक बार भी उन्होंने प्रदेश की आम जनता के लिए नियंत्रित मूल्य पर खाद्यान्न आबंटित किए जाने की मांग तक केन्द्र सरकार से नहीं की। उन्होंने कभी सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुदृढ़ करने की मांग केन्द्र सरकार से नहीं की। पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी से जो वैट की अतिरिक्त राशि इन उत्पादों की कीमत में अपने आप शामिल हो गयी, उसे तो वे वापस ले ही सकती थीं जिससे बजट अनुमानों पर कोई असर नहीं होता। लेकिन उन्होंने न तो ऐसा किया और न ही करना चाहती हैं।
अलबत्ता बन्द के दिन जिस तरह का कहर बसपा सरकार ने बन्द को असफल करने के लिए बरपा, वह महंगाई बढ़ाने और पेट्रोलियम पदार्थों की मूल्यवृद्धि में संप्रग के साथ बसपा और मूलतः उसकी नेता मायावती की संलिप्तता की ओर इशारा है। बन्द को असफल करने के लिए 5 जुलाई को भाकपा सहित तमाम राजनीतिक दलों के कार्यालयों पर भारी पुलिस बल अल सुबह ही पहुंच गया था और उसने इन कार्यालयों को वस्तुतः सील कर दिया था मानों इनके अन्दर बड़े-बड़े आतंकवादी छिपे हों। इन कार्यालयों की ओर आने वाले कार्यकर्ताओं को रास्ते में ही रोक कर गिरफ्तार कर लिया गया।
मंहगाई चूंकि एक फौरी मुद्दा है जिससे प्रदेश की अधिसंख्यक जनता परेशान है, बसपा ने भारत बन्द के अगले दिन 6 जुलाई को देशव्यापी प्रदर्शनों का नारा दिया था। बसपा के इन प्रदर्शनों के प्रति जनता में रंचमात्र उत्साह नहीं था। बसपा के प्रदर्शनों में जिला मुख्यालयों पर जितनी जनता जुटी उससे कहीं ज्यादा वामपंथी दलों के कार्यकर्ताओं की एक दिन पूर्व गिरफ्तारी हुई थी।
ये प्रदर्शन आम जनता के बसपा से हो रहे मोहभंग की ओर इशारा है। जनता के सरोकारों से सरोकार न रखना बसपा और उसकी सुप्रीमो मायावती को खासा महंगा साबित होगा।

- प्रदीप तिवारी

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रविवार, 11 जुलाई 2010

ग़रीबी

आह, तुम नहीं चाहतीं--
डरी हुई हो तुम
ग़रीबी से
घिसे जूतों में तुम नहीं चाहतीं बाज़ार जाना
नहीं चाहतीं उसी पुरानी पोशाक में वापस लौटना

मेरे प्यार, हमें पसन्द नहीं है,
जिस हाल में धनकुबेर हमें देखना चाहते हैं,
तंगहाली ।
हम इसे उखाड़ फेंकेंगे दुष्ट दाँत की तरह
जो अब तक इंसान के दिल को कुतरता आया है

लेकिन मैं तुम्हें
इससे भयभीत नहीं देखना चाहता ।
अगर मेरी ग़लती से
यह तुम्हारे घर में दाखिल होती है
अगर ग़रीबी

तुम्हारे सुनहरे जूते परे खींच ले जाती है,
उसे परे न खींचने दो अपनी हँसी

जो मेरी ज़िन्दगी की रोटी है ।
अगर तुम भाड़ा नहीं चुका सकतीं
काम की तलाश में निकल पड़ो
गरबीले डग भरती,
और याद रखो, मेरे प्यार, कि

मैं तुम्हारी निगरानी पर हूँ
और इकट्ठे हम

सबसे बड़ी दौलत हैं
धरती पर जो शायद ही कभी
इकट्ठा की जा पाई हो ।
- पाब्लो नेरूदा
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दो दुश्मन

जरूरी हैं प्रेम और दुलार
इनके बिना हम रह नहीं सकते
अत्याचार और उपेक्षा से
नफ़रत करते हैं हम
लेकिन हमारे दो दुश्मन भी हैं
ये दुश्मन हैं
अहंकार
और दूसरे पर हुक्म चलाने की आदत ।

- तो हू

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शनिवार, 10 जुलाई 2010

तुमने कहाँ लड़ा है कोई युद्ध

कमज़ोर घोड़ों पर चढ़कर युद्ध नहीं जीते गए कभी
कमज़ोर तलवार की धार से मरते नहीं है दुश्मन
कमज़ोर कलाई के बूते उठता नहीं है कोई बोझ
भयानक हैं जीवन के युद्ध
भयानक है जीवन के शत्रु
भयानक हैं जीवन के बोझ
तुमने कहाँ लड़ा है कोई यद्ध ?
कहाँ उठाई है तलवार अभी तुमनें?
कहाँ संभाला है तुमने कोई बोझ ?
यथार्थ के पत्थर
कल्पना की क्यारियों को
तहस-नहस कर देते हैं।
कद्दावर घोड़ों
मजबूत तलवारों
दमदार कलाईयों के बिना
मैदान मारने की बात बे-मानी है।
आत्महत्या का रास्ता उधर से भी है
जिधर से गुजरने की नासमझ तैयारी में
रात को दिन कहने की जिद कर रही हो तुम।
युद्ध
कमज़ोर घोड़ों पर चढ़कर
कभी नहीं जीते गए
- शलभ श्रीराम सिंह
blogger's note :
मैं नहीं जानता कि रचनाकार कवि ने इस कविता को किस सन्दर्भ में लिखा था परन्तु जिस कमजोर वैचारिकी के साथ हिन्दुस्तान और नेपाल के माओवादी खुद को समाजवादी क्रान्ति के संघर्ष का इकलौता खेवनहार बताते हुए वर्ग-शत्रुओं के बजाय निहत्थी जनता पर हमला कर रहे हैं, उन्हें उनकी इस वैचारिक कमजोरी को उन्हें समझाने के लिए मैं इस कविता को उन्हें पेश करना चाहता हूं - प्रदीप तिवारी
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शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है

घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है।
बताओ कैसे लिख दूँ धूप फाल्गुन की नशीली है।।

भटकती है हमारे गाँव में गूँगी भिखारन-सी।
सुबह से फरवरी बीमार पत्नी से भी पीली है।।

बग़ावत के कमल खिलते हैं दिल की सूखी दरिया में।
मैं जब भी देखता हूँ आँख बच्चों की पनीली है।।

सुलगते जिस्म की गर्मी का फिर एहसास वो कैसे।
मोहब्बत की कहानी अब जली माचिस की तीली है।।

- अदम गोंडवी
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दादरी परियोजना से प्रभावित किसानों की समस्याओं के सम्बंध में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव डा. गिरीश का राज्यपाल एवं मुख्यमंत्री को लिखा पत्र

8 जुलाई २०१०
सेवा में,
महामहिम राज्यपाल महोदय
उत्तर प्रदेश
राजभवन
लखनऊ
विषय: रिलायंस पावर लि. दादरी परियोजना से प्रभावित किसानों की समस्याओं के सम्बंध में
महामहिम जी,
जैसाकि आपके संज्ञान में है, प्रदेश सरकार ने रिलायंस पावर प्रोजेक्ट के निर्माण के लिए जनपद गौतमबुद्ध नगर की तहसील दादरी के अंतर्गत ग्राम बझेड़ाखुर्द आदि में किसानों की 2562 एकड़ जमीन का अधिग्रहण कर अनिल अम्बानी को हस्तांतरित किया था।
इसके विरूद्ध भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, किसान मंच एवं महाराणा संग्राम सिंह किसान कल्याण समिति तथा कई अन्य पार्टियों ने देशव्यापी आन्दोलन चलाया था और किसानों की उपजाऊ जमीनें अधिग्रहण न किये जाने की मांग उठाई थी।
बाद में माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने फैसला दिया कि यह अधिग्रहण उचित तरीके से नहीं हुआ था और किसानों को उनकी जमीनें आपत्ति दर्ज करा कर और प्राप्त मुआवजे की राशि वापस लेकर लौटा दी जायें। इस फैसले का व्यापक स्वागत हुआ था।
लेकिन सारे किसान निर्धारित अवधि के भीतर मुआवजा वापस नहीं कर पाये तथा आपत्ति भी दर्ज नहीं करा पाये हैं। आन्दोलन के दौरान तमाम किसानों पर मुकदमें भी दर्ज किये गये थे जो आज भी किसानों के उत्पीड़न की कहानी कह रहे हैं। अब माननीय उच्च न्यायालय द्वारा किसानों के पक्ष को उचित ठहराने के बाद इन मुकदमों के जारी रहने का कोई औचित्य समझ में नहीं आता है।
महामहिम जी,
इसी 25 जून को उन सभी किसानों ने गौतमबुद्ध नगर के धौलाना कस्बे में एक जनसभा आयोजित की थी जिसमें भाकपा महासचिव ए.बी.बर्धन और मैं स्वयं शामिल हुये थे। जनसभा में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास कर प्रभावित किसानों की समस्याओं को आप तक पहुंचाने का अनुरोध हम लोगों से किया गया था। तदनुसार हम आपके पास निम्न मांगें अंकित कर भेज रहे हैं।
1 रिलायंस पावर प्रोजेक्ट के लिए अधिगृहीत जमीन के मुआवजे की राशि को लौटाने और आपत्तियां दर्ज कराने की अवधि बढ़ाकर 31 अक्टूबर 2010 तक कर दी जाये क्योंकि कई किसान आपत्ति दर्ज नहीं करा सके हैं तथा मुआवजे की राशि इसलिए नहीं लौटा सके क्योंकि उन पर धन नहीं है और उसके लिए उन्हें अपनी सम्पत्तियां बेचकर रकम का इंतजाम करना पड़ रहा है।
2 उपर्युक्त आन्दोलन के दौरान किसानों पर लगाये गये मुकदमों को फौरन वापस लिया जाये।
3 मुआवजे की राशि खसरा अनुसार जमा कराई जाये।
4 अधिगृहीत भूमि के बीच से गुजरने वाले रजवाहे को जोकि कैंसिल कर दिया गया था, पुनः चालू कराया जाये ताकि वहां खेती की जमीन पर सिंचाई की जा सके।
अतएव आपसे अनुरोध है कि उपर्युक्त के सम्बंध में उत्तर प्रदेश सरकार को तत्काल आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दें।
सधन्यवाद।
भ व दी य
(डा. गिरीश)
राज्य सचिव
प्रतिलिपि आवश्यक कार्यवाही हेतु।
1 - माननीय मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश सरकार, लखनऊ2 - आयुक्त, मेरठ मंडल, मेरठ

(डा. गिरीश)
राज्य सचिव
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गुरुवार, 8 जुलाई 2010

अज्ञात क्राँतिवीर का शिलालेख



क्राँति का
अज्ञात वीर मारा गया
मैंने उसका शिलालेख
सपने में देखा
वह कीचड़ में पड़ा था
दो शिलांश थे
उन पर कुछ नहीं लिखा था
पर उनमें से एक कहने लगा-
जो यहां सोया है
वह दूसरे की धरती को
जीतने नहीं जा रहा था
वह जा रहा था
अपनी ही धरती को मुक्त करने
उसका नाम कोई नहीं जानता
पर इतिहास की पुस्तकों में
उनके नाम हैं
जिन्होंने उसे मिटा दिया
वह मनुष्य की तरह जीना चाहता था
इसीलिए एक जंगली जानवर की तरह
उसे जिबह कर दिया गया
उसने कुछ कहा था
फँसी-फँसी आवाज़ में
मरने से पहले
क्योंकि उसका गला रेता हुआ था
पर ठंडी हवाओं ने उन्हें चारों ओर फैला दिया
उन हज़ारों लोगों तक
जो ठंड से जकड़े हुए थे।
- बर्तोल ब्रेख्त

अंग्रेज़ी से अनुवाद : रामकृष्ण पांडेय
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बुधवार, 7 जुलाई 2010

लोगों के लिए गीत

आओ ! दुख और जंज़ीर के साथियों

हम चलें कुछ भी न हारने के लिए

कुछ भी न खोने के लिए

सिवा अर्थियों के


आकाश के लिए हम गाएंगे

भेजेंगे अपनी आशाएँ

कारखानों और खेतों और खदानों में

हम गाएंगे और छोड़ देंगे

अपने छिपने की जगह

हम सामना करेंगे सूरज का


हमारे दुश्मन गाते हैं--

"वे अरब हैं... क्रूर हैं..."


हाँ, हम अरब हैं

हम निर्माण करना जानते हैं

हम जानते हैं बनाना

कारखाने अस्पताल और मकान

विद्यालय, बम और मिसाईल

हम जानते हैं

कैसे लिखी जाती है सुन्दर कविता

और संगीत...

हम जानते हैं

- महमूद दरवेश
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सोमवार, 5 जुलाई 2010

भोपाल मामले से कुछ सीख - सेवानिवृत्त न्यायधीश उच्चतम न्यायालय






इस सम्बंध में कोर्ट के निर्णय से ऐसा लगता है कि भारत अब भी विक्टोरियन साम्राज्यवादी, सामन्ती दौर में है, और जो सोशलिस्ट सपनों से बहुत दूर है।
उन वर्षों में जिन राजनैतिक दलों के हाथों में सत्ता थी, वे इस भारी अपराधिक लापरवाही के लिये दोषी है। इस घटना से सम्बंधित असाधारण बात तो यह है कि यूनियन कारबाइड में संलिप्त सब से बड़ा अधिकारी वारेन एंडरसन तो पिक्चर में लाया ही नहीं गया।
2 दिसम्बर 1984 को भोपाल में जो बड़े पैमाने पर हत्याकाण्ड हुआ वह एक अमरीकी बहुराष्ट्रीय कार्पाेरेशन की भारी गलती का परिणाम था। जिसने भारतीयों की जिन्दगियों को अश्वारोही क्रूर योद्धाओं के समान रौंदा। इसमें लगभग 20,000 लोगों की गैस हत्या हुई फिर भी 26 वर्षों की मुकदमें बाजी के बाद अपराधियों को केवल 2 वर्ष की सश्रम कारावास की सजा दी गई। ऐसा तो केवल अफरातफरी वाले देश भारत ही में घटित हो सकता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति एवं श्वेत संसार तथा श्यामल भारतीय, प्रधानमंत्री, तालिबान एवं माओवादी नक्सलवाद पर कर्कश आवाजे उठाते हैं। मगर यह नहीं देखते कि इस जन संहार पर जो, भारत के एक पिछड़े इलाके में अमेरिकन ने किया, अदालती फैसला आने में 26 वर्ष लग गये।
चूँकि भारत एक डालर प्रभावित देश है, इसीलिये गैसजन संहार को एक मामूली अपराध जाना गया। लगता है कि भारत पर मैकाले की विक्टोरियन न्याय व्यवस्था अब भी लागू है। हमारी संसद और कार्यपालिका को उनके जीवन और उस नुकसान से लगता है कोई वास्ता ही नहीं है। न्यायपालिका का भी यही हाल है, वह भी अहम मामलों में तुरन्त फैसला देने के अपने मूल कर्तव्य के प्रति लापरवाह है। संसद को भला इतना समय कहां कि वह अपने नागरिकों के जीवन को सुरक्षित करने के कानून बनाये। वह तो कोलाहल में ही बहुत व्यस्त हैं। इस प्रकार के अपराध के लिये जो तफ़तीशी न्यायिक विलम्ब हुआ वह अक्षम्य है।
अगर कार्यपालिका के पास जरूरी आजादी, तत्परता एवं निष्ठा हो, अगर सही जज नियुक्त हो और सही प्रक्रिया में अपनाई जाये तो भारतीय न्यायालय भी सही न्याय करने में सक्षम होंगे।
विश्वास भंग हुआ
यह भी हुआ कि आम आदमी के लिये यह समाजवादी लोकतंत्र बराबर एक निराशा का कारण बना रहा। यह विरोधाभास समाप्त होना चाहिये। हमारे पास असीमित मानव संसाधन हैं, जिससे हम अपने राष्ट्रपिता की प्रतिज्ञा की पुर्नस्थापना कर सकते हैं, उनकी यह प्रबल इच्छा थी कि हर आंख के आंसू को पोछा जाये। परन्तु भारतीय प्रभु सत्ता के इस विश्वास को भोपाल ने हास्यास्पद ढंग से भंग कर दिया गया। एक समय था जब हर वह गरीब आदमी जो भूखा और परेशान था और ब्रिटिश सामा्रज्य का विरोध कर रहा था, वह कांग्रेसी कहा जाता था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब कांग्रेसी सत्ता में आये, फिर प्रत्येक भूखा लड़ाकू कम्युनिस्ट कहा गया। जब अनेक राज्यों में कम्युनिस्ट सत्ता में आये, और वहां बहुत से भूखे थे, वह भूखे गरीब नक्सलवादी कहे गये। क्या भारत का कुछ भविष्य भी है? हां जरूर है। शर्त यह है कि यहां के गौरवपूर्ण संविधान और अद्भुत सांस्कृति परम्पराओं में कार्ल मार्क्स एवँ महात्मा गाँधी के दष्टिकोण को शमिल करने की समझ पैदा की जाय। क्या हमारे पास इतना विचार-बोध हैं ? क्या न्यायाधीश ऐसी लालसा रखते हैं? भोपाल पर दिया निर्णय तो यही ज़ाहिर करता है कि भारत अब भी साम्राज्यवादी सामंती विकटोरियन युग मे है, और समाजवादी स्वप्नों से कोसों दूर है।
इस परिणाम की असाधारण बात यही है कि युनियन कारबाइड में संलिप्त सब से बड़ा अफ़सर वारेन एनडरसन को मामलो से बाहर रक्खा गया। यह तो इन्साफ का मज़ाक बनाया गया। मुख्य अपराधी को तो व्युह रचना से अलग हीं रक्खा गया। अब जो छोटों को अभियुक्त बनाया तो इससे यही प्रतीत हुआ कि उन लाखों का मज़ाक बना जिन लोगों को भुगतान पड़ा। अपराध क्षेत्र से शक्तिशालियों को मुक्त कर देने का अर्थ क़ानून को लंगड़ा कर देना। क्या एक अमेरिकी अपराधी की भारतीय कोर्ट के आर्डर के अर्न्तगत जांच नहींे की जा सकती ? इस प्रकार के भेद-भाव से न्याय हास्यास्पद बनता है। जब मूल अधिकारों का हनन हो तो जजों के कार्यक्षेत्र कें ऐसे केसों की सुनवाई निहित है, 26वर्ष बीत गये, इतने जज होते हुए भी सुप्रीम कोर्ट नें अब तक क्या किया ? तुरन्त सुनवाई हेतु भारत-सरकार भी कोर्ट तक नहीं गई ? अब क़ानून मंत्री कहते है कि जो दो वर्ष की सश्रम करावास की सज़ा दी गई है, उससे वह प्रसन्न नहीं है। इस 26 वर्ष की अवधि में भारतीय दण्ड विधान की धारा 300 से 304 में कोई संशोधन न प्रस्तावित किया गया न ही किया गया और न सख्त दण्ड का प्रावधान किया गया। यह बात भी संसद एवँ कार्यपालिका की अपने कर्तव्यों के प्रति लापरवाही की द्योतक है। उन दिनों में जो भी राजनैतिक दल सत्ता में रहे वह भी इस अपराधिक चूक के लिये दोषी हैं। क्योंकि भारतीय मानव पर अपराधिक कृत्य हुआ और वे सोते रहे। भुक्त भोगियों को मुनासिब मुआवज़ा तक नहीं दिया गया। यूनियन कारबाइड द्वारा वित्त-पोषित एक बड़े अस्पताल का निर्माण भोपाल में जरूर करवाया गया, लेकिन यह भी गरीबों के लिये नहीं अमीरों के लिए था। यह समझने कि अस्पताल लशों पर बना फिर भी वंचितो की पहुँच वहाँ तक नहीं हुई। सुप्रीम कोर्ट बजाय इसके कि निचले कोर्ट से मुकदमा मंगा कर तुरन्त निर्णय देता, वह अपने ही भत्ते और सुविधायें बढ़ाने में तल्लीन रहा।
यू0एस0 के लिये वारेन एंनडरसन एक बन्द अध्याय है। इस अत्यंत शक्तिशाली परमाणु राष्ट्र की न्याय अध्याय करने की अलग सोच है। इस बात से भारतीय जन मानस में इतना साहस होना चाहिये कि वह ‘डालर-उपनिवेशवाद‘ का कड़ा विरोध करे। अमेरिकन विधि के शासन से मुक्त हैं ? जब बहुं राष्ट्रीय निगम अधिनायकों के दोष की बात आ जाए तब श्यामल भारत को श्वेत-न्याय से संतुष्ट होना ही हैं ? हालांकि वाशिंगटन हमेशा व्यापक मानवाधिकार घोषणा-पत्र के प्रति वफ़ादारी की क़समें खाता है, परन्तु पब परमाणु-सन्धि की बात आती है तो उसकी डंडी अपने हितों की तरफ़ झुका देता है। भारत में यह साहस भी नहीं होता कि वह धोके के विरोध में कोई आवाज़ उठाये। हमारे पास बहुराष्ट्रीय निगम है जिसका वैश्विक अधिकार क्षेत्र है। एंडरसन एक अमेरिकी है और यूनियन कारबाइड थी ?
इसके आज्ञापत्र एशियाई ईधन के लिए ही हैं, भारतीय न्याय व्यवस्था लगता है कि केवल नगर पालिकाओं एवँ पंचायतों के लिये ही है, इससे आगे नहीं।
-वी0आर0 कृष्णा अय्यर
सेवानिवृत्त न्यायाधीश
उच्चतम न्यायलय
हिन्दू से साभारअनुवादक: डॉक्टर एस.एम हैदर
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July 5 Hartal: Unprecedented Success

Date: 5 July 2010

The Left parties, the Communist Party of India, Communist Party of India (Marxist), the Revolutionary Socialist Party and the Forward Bloc have issued the following statement:

July 5 Hartal: Unprecedented Success

The all India hartal to protest against the steep increase in the prices of petroleum products has been an unprecedented success. Despite detention and arrests of thousands of protesters, there was a bandh like situation in all parts of the country with shops, business establishments, transport and educational institutions being closed. Left leaders, A.B. Bardhan, D Raja and Brinda Karat were arrested for picketing in Delhi. This has been the most widespread protest action in the country in recent years.

The Left parties congratulate the people and the tens of thousands of activists who have made the hartal a complete success. By this action the people have expressed their anger and strong opposition to the anti-people policies of inflicting successive burdens on the people through price hikes of petroleum products.

The Left parties in consultation with secular opposition parties will chalk out plans for further intensifying the movement against price rise to compel the government to reverse these harmful steps.


Sd/-

(A.B. Bardhan)

General Secretary, CPI

(Prakash Karat)

General Secretary, CPI(M)

(T.K. Chandrachoodan)

General Secretary, RSP

Debabrata Biswas

General Secretary, AIFB
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CPI INFORMATION ABOUT BANDH

According to the message received from different states, nationwide hartal is completely successful. It is unprecedented success in many states. In North East, Assam, Manipur, Arunachal Pradesh and other places it is total bandh. Several CPI cadres were arrested in the morning at Imphal. But all shops were closed. All transport stopped from 6 a.m. in the morning in Manipur.

Com. A.B. Bardhan, General Secretary, Coms. Sudhakar Reddy, D. Raja, Atul Kumar Anjan, Amarjeet Kaur CPI leaders, Brinda Karat of CPIM) were arrested along with 300 volunteers at ITO Centre after they successfully stopped the traffic for more than 90 minutes.

The Punjab bandh was total with all shops and traffic stopped.

In Jharkhand Com. Bhuvaneswar Mehta Ex M.P., Secretary CPI was arrested at Ranchi with thousands arrested all over Jharkhand. But bandh was total.

Police attacked CPI office and SP Office at Lucknow. There were clashes. CPI Secretary Dr. Girish was injured and number of CPI, CPI(M) leaders were lathicharged and arrested at CPI office, Kaisar Bagh, Lucknow. Lucknow and all other cities observed bandh. Uttarakhand observed successful bandh.

Large number of cadres of opposition parties were arrested all over Maharashtra from early hours but government could not prevent total bandh. Com. Prakash Reddy Mumbai City Secretary, Com. Tukaram Bhamse, Assistant Secretary state party, Narayan Ghagri Rambaheti were arrested.

West Bengal, Tripura, Kerala observed total and peaceful bandh on the call of the Left Parties. Even airport had a desert look at Kolkata. Rajasthan had a big bandh and Left Parties organised rallies at Jaipur and other cities. Gujarat, M.P. Karnataka observed bandh. Chhattisgarh observed bandh, Left and NDA organised separate rallies.

Jammu also observed bandh. Pondicherry several hundreds of CPI leaders and cares were arrested and bandh was successful.

Andhra Pradesh observed successful bandh. Chandrababu Naidu former C.M., Com. Narayana CPI State Secretary Com. B.V. Raghavulu CPI(M) State Secretary and others were arrested. Hyderabad and other cities were totally closed shops and rallies were organised. Large number of arrests were there.

There was bandh in Chennai, Tiruchrapalli, Coimbatore and other cities and towns in Tamilnadu. Himachal Pradesh, Haryana, Delhi and other places also observed bandh.

Peoples’ angry and unhappiness is reflected in the spontaneous response to the bandh.

Left Parties cadre took the challenge and worked hard, to make the bandh success.

The arrogant UPA Governemnt was given a big slap by the people for its anti-peoples policies.
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मज़दूरों का गीत

मिल कर क़दम बढ़ाएँ हम
जय, फिर होगी वाम की !

शोषित जनता जागी है
पीड़ित जनता बाग़ी है
आएँ, सड़कों पर आएँ,
क्या अब चिंता धाम की !

ना यह अवसर छोड़ेंगे
काल-चक्र को मोडेंगे
शक्लें बदलेंगे, साथी
मूक सुबह की, शाम की !

नारा अब यह घर-घर है
हर इंसान बराबर है
रोटी जन-जन खाएगा
अपने-अपने काम की !

झेलें गोली सीने से
लथपथ ख़ून-पसीने से
इज़्ज़त कभी घटेगी ना
‘मेहनतकश’ के नाम की !

- महेंद्र भटनागर
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उत्तर प्रदेश में बन्द की सफलता पर प्रदेश की जनता को वामपंथ की बधाई

लखनऊ 5 जुलाई। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), फारवर्ड ब्लाक और इंडियन जस्टिस पार्टी के नेताओं ने आज महंगाई विरोधी हड़ताल को बसपा सरकार द्वारा दमन का निशाना बनाने की कड़े से कड़े शब्दों में भर्त्सना की है।
यहां जारी एक प्रेस बयान में इन दलों के नेताओं क्रमशः डा. गिरीश, एस.पी.कश्यप, राम किशोर एवं काली चरन सोनकर ने कहा कि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ जब लखनऊ में राजनैतिक दलों के कार्यालयों पर आने जाने वालों को ही पुलिस ने सुबह से ही गिरफ्तार करना शुरू कर दिया और पार्टी दफ्तरों को सील कर दिया। वाम दलों के लखनऊ में अब तक पांच सौ से अधिक पार्टी कार्यकर्ता गिरफ्तार किये चुके हैं।
चारों दलों के नेताओं ने प्रदेश की समस्त जनता को हड़ताल को सफल बनाने के लिये बधाई दी है।
इन दलों के सैकड़ों कार्यकर्ताओं को चारों दलों के उपर्युक्त नेताओं के साथ उस समय भाकपा कार्यालय से बाहर आते ही गिरफ्तार कर लिया गया जब वे हड़ताल की अपील करने बाजारों की ओर जाना चाहते थे। प्रदर्शनकारियों एवं पुलिस के मध्य बारादरी के पास करीब आधा घंटे से संघर्ष चल रहा है जिसमें भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश जख्मी भी हो गये हैं।
वाम दलों ने प्रदेश सरकार की दमनकारी नीतियों की कड़े शब्दों में निन्दा की है और कहा है कि इस दमनचक्र से सिद्ध हो गया है कि बसपा सरकार महंगाई बढ़ाने वाली केन्द्र सरकार के पक्ष में खड़ी है।
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रविवार, 4 जुलाई 2010

महंगाई तथा मूल्यवृद्धि के खिलाफ पांच जुलाई को आंदोलन

दैनिक हिन्दुस्तान ने आज छापा है:

महंगाई तथा पेट्रोलियम में मूल्यवृद्धि के खिलाफ पांच जुलाई को होने वाली आम हड़ताल को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने पूरी तरह सफल बनाने का निर्णय लिया है।
पार्टी के अनुसार भाकपा कार्यकर्ता अन्य वामपंथी दलों के साथ एकजुट होकर हड़ताल के पक्ष में सभाएं, साइकिल मार्च तथा मशाल जुलूस निकालेंगे। पार्टी नेताओं ने प्रदेश में उपजाऊ जमीन का अधिग्रहण किए जाने पर कड़ी आपत्ति प्रकट करते हुए कहा कि यह खेती और किसानों को उजाड़ने का प्रयास है।
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भारत बंद कल, सब एकजुट

दैनिक भाषकर ने आज छापा है:
जोधपुर. महंगाई के मुद्दे पर आहूत भारत बंद को लेकर भारतीय जनपा पार्टी समेत अनेक पार्टियों व संगठनों ने कमर कस ली है। पांच जुलाई को होने वाले बंद को व्यापक समर्थन मिल रहा है।
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विभिन्न पार्टियों का समर्थन
भारत की माकर््सवादी कम्युनिस्ट पार्टी यूनाइटेड, राजस्थान ट्रेड यूनियन केंद्र आरसीटू, ऑटो रिक्शा एकता यूनियन ने बंद को समर्थन दिया है। कामरेड गोपीकिशन, बृजकिशोर, दिलीप जोशी, वाहिद अली, सुबराती उस्ताद, अशोक आचार्य, चांदअली रंगरेज, बाबूखान, अहमद खान, इमामुद्दीन चौहान, अब्दुल रसीद, ताज मोहम्मद, भैरू, जाकिर हुसैन, भाणु भाई, चौनाराम देवासी, सुनील दाधीच, पप्पू गुर्जर व दशरथ ने बंद को सफल बनाने की तैयारी कर ली है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव विजय मेहता ने बंद को समर्थन दिया है।
अमरचंद पुरोहित, बीएम नथानी, चरणदास हंस, सन्नू महाराज, सद्दीक कुरैशी, मोहम्मद आरिफ, रोशन जूनियर, निजाम, चांद मोहम्मद, अब्दुल रसीद, परमेंद्र चौधरी, देवाराम गुर्जर, बृजमोहन चौधरी, विष्णु गांधी, एडब्ल्यू अंसारी ने बंद को समर्थन देने की घोषणा की है। !!!!!!!!!!!!!!!!
भारत की जनवादी नौजवान सभा और अखिल भारतीय किसान सभा ने संयुक्त रूप से बंद को समर्थन देने की घोषणा की है। संयोजक जयदेव सिंह भाटी, सह संयोजिका अफसाना खान ढाका ने बताया कि यूपीए सरकार के कार्यकाल में बढ़ती महंगाई से आम आदमी त्रस्त है। इसलिए बंद को समर्थन दिया जाएगा। महंगाई के विरोध में विपक्षी दलों की ओर पांच जुलाई को आहूत भारत बंद में ट्रांसपोर्टर व ट्रक ऑपरेटर भी भाग लेंगे।
जोधपुर गुड्स ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन के सचिव प्रवीण कुभंट के अनुसार पेट्रोलियम पदार्थाे के मूल्य में हुई बढ़ोतरी से ट्रांसपोर्ट व्यवसाय भी प्रभावित हुआ है। महंगाई के विरोध में विपक्ष के भारत बंद को राजस्थान मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव यूनियन भी सहयोग करेगी। यूनियन के सचिव प्रमोद कश्यप, सह सचिव रणवीर सिंह व राज्य कार्यकारिणी सदस्य सुनील भाटी ने बताया कि यूनियन बंद को समर्थन देगी। !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
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शनिवार, 3 जुलाई 2010

Bharat Bandh on 5th July will change the history?

http://blog.mp3hava.com today published the following :
On July - 2 - 2010

13 Political Parties against of current government Congress called 12 Hour of Bharat Bandh due to price increase in Petrol, Diesel, Gasoline etc… The Communist Party of India (CPI), Biju Janata Dal, Communist Party of India (M), Lok Janshakti Party (LJP), Indian National Lok Dal (INLD), Samajwadi Party (SP) and the Rashtriya Samajwadi Party (RSP).

The Raj Thackeray Mumbai said today that they would also support the ‘Bharat bandh’ on July 5 called by Opposition parties to protest against the fuel price hike. Raj also added to the Marathi people to participate in the shutdown by closing down all their businesses and establishments for the day.

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This is becoming the ridiculous position for a Common Man who just earn 5000 – 6000 INR per month and survive 3-4 people in it. Petrol and Gasoline Price hikes on each and every year after congress comes to rule in india. There was not too much hike when BJP was ruling.

This Bharat Bandh will hack the people life for 12 hours, their may be possibilities to stop the transportation services for 12 hours and it might create a riots between people and government. The Opposition parties are protesting against the Congress government’s economic policies and calling for roll back of gain in prices of petrol, diesel, kerosene and LPG / Gasoline. This is the second time, after the emergency in 1975, that the entire Opposition is ganging up to protest against the ruling regime.

Petroleum Minister Murli Deora added that the recent price hike will have a minimal impact on inflation and hit out at opposition parties for calling a bandh next week. Deora says the diesel deregulation will follow soon but said the government will not remain a silent spectator if oil prices reach abnormal levels.

Tags:Bharat Bandh, Bharat Bandh 5th July, 5th July Bharat Bandh, Bharat Bandh on Monday, Bharat Bandh 2010

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CPI, CPM to join bandh

TOI published the following today :

MANGALORE: The Communist Party of India (CPI), Communist Party of India-Marxist (CPM) and Janata Dal have called for all India bandh opposing the hike in the prices of fuel for the second time on July 5.

At a joint press conference here on Friday, CPI district secretary P Sanjeeva and CPM district secretary B Madhava said the Congress-led UPA government at the Centre has delivered yet another blow by hiking the prices of petrol, diesel, kerosene oil and LPG gas for the second time in a span of one year.

The hartal would be observed from 6am to 6pm. But essential services including supply of water, milk, electricity, hospital and emergency services would be exempted from the hartal, they said.
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महंगाई विरोधी आम हड़ताल को सफल बनाने हेतु भाकपा ने किया जन सम्पर्क एवम् नुक्कड़ सभायें

महंगाई के विरोध में 5 जुलाई को होने वाली आम हड़ताल को सफल यबनाने की आम जनता से अपील करने हेतु भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं ने आज समूचे प्रदेश में जनसम्पर्क अभियान चलाया, पर्चे बांटे एवं नुक्कड़ सभायें कीं।
लखनऊ में पार्टी के राज्य सचिव डा. गिरीश के नेतृत्व में भाकपा के एक जत्थे ने पार्टी के कैसरबाग स्थित कार्यालय से झंडे, बैनर, पर्चों के साथ पैदल जनसम्पर्क शुरू किया। यह जत्था बारादरी, कैसरबाग चौराहा, गणेशगंज, अमीनाबाद, बांसमंडी, लाटूश रोड, विशेश्वरनाथ रोड़ आदि स्थलों पर पहुंचा और व्यापारियों, पटरी दुकानदारों तथा अन्य नागरिकों से महंगाई के खिलाफ आम हड़ताल में भागीदारी की अपील की। कई जगहों पर नुक्कड़ सभायें भी की गयीं।
सभाओं को सम्बोधित करते हुए राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि गत दो वर्ष पूर्व तक केन्द्र सरकार पर वामपंथी दलों का अंकुश था। वामपंथी दलों ने उस दरम्यान या तो पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें बढ़ने नहीं दीं या बहुत मामूली बढ़ोतरी की ही इजाजत दी। लेकिन जब से यह सरकार वाम दलों के समर्थन के बिना अन्य दलों के समर्थन पर चली है तबसे 5 बार और वह भी भारी तादाद में महंगाई बढ़ा चुकी है और पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस, कैरोसिन के दाम बढ़ाती ही चली जा रही है। इस महंगाई से देश की जनता त्राहि-त्राहि कर उठी है। अब इसे और सहना बर्दाश्त के बाहर हो चुका है।
उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में पेट्रोलियम पदार्थों पर वैट टैक्स प्रदेश सरकार ने लगाया हुआ है। इन पदार्थों की अतिरिक्त बढ़ी कीमतों पर वैट टैक्स भी लागू हुआ है और प्रदेश की जनता पर इसका अतिरिक्त भार पड़ा है। राज्य सरकार को इस अतिरिक्त वैट टैक्स को वापस लेकर प्रदेश की जनता को राहत पहुंचाना चाहिये। जमाखोरी, कालाबाजारी और मिलावटखोरी पर कड़ा अंकुश लगाना चाहिये।
भाकपा के इस जत्थे में प्रदीप तिवारी, मो. खालिक, फूल चन्द यादव, मुख्तार अहमद, ओ.पी.अवस्थी, चन्द्रशेखर, रिजवान, मोईद खान आदि प्रमुख लोग शामिल थे।
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LEFT PARTIES APPEAL TO THE PUBLIC OF INDIA

Left Parties along with other secular democratic parties and opposition in general have called for a countrywide hartal on 5th July from 6 a.m. to 6 p.m. The menace of price rise affects all sections of the people.

In this context we appeal to all sections of people to participate massively in the hartal and express their vigorous protest against the UPA Government’s policies which are responsible for inflicting the unbearable burden on the masses.

We appeal to the Trading Community, - retail traders,- market associations etc. to voluntarily suspend business and keep their shutters down.

We appeal to all the transporters’ associations, trucks and buses, both private and public, taxis and rickshaws to keep off the streets as a mark of protest.

We appeal to all student organisations and the teaching community to keep schools, colleges and other educational institutions closed.

We appeal to the organised and unorganized workers, industrial associations of and all sections employees to strike work and join the hartal.

Essential services like milk, water, hospitals are exempt from participation in the hartal.

We hope that the success of the hartal will give a message to the Government to reverse its policies, roll back the decontrol of fuel, and stop any moves for further de-control.

A.B. Bardhan
General Secretary, CPI

Prakash Karat
General Secretary, CPI(M)


Debabrata Biswas
General Secretary, AIFB

T.J. Chandrachoodan
General Secretary, RSP
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भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य कौंसिल बैठक 1-2 जुलाई 2010 द्वारा पारित कार्य रिपोर्ट

पार्टी की राज्य कौंसिल की पिछली बैठक 23 जनवरी 2010 को लखनऊ में सम्पन्न हुई थी। उक्त बैठक में हमने इंगित किया था कि पार्टी की राजनैतिक लाइन को उत्तर प्रदेष की जनता के बीच में ले जाने के लिये पार्टी के दैनंदिन कार्यों को अत्यन्त सक्रियतापूर्वक करना होगा तथा लगातार आन्दोलनात्मक और सांगठनिक गतिविधियों को अंजाम देना पड़ेगा।हमने पिछली राज्य कौंसिल बैठक तक महंगाई, खाद्य सुरक्षा, नरेगा, भ्रष्टाचार, उपजाऊ जमीनों के अधिग्रहण आदि प्रष्नों पर 20 जुलाई 2009 से 30 जुलाई 2009 तक जन जागरण अभियान चलाया था। 31 जुलाई को जिला मुख्यालयों पर प्रदर्षन किये। चारो वामपंथी दलों के साथ मिलकर अभियान चलाया। 9 सितम्बर को जिला मुख्यालयों पर व्यापक धरने प्रदर्षन किये। 25 नवम्बर से 5 दिसम्बर तक जन अभियान चला कर पूरे प्रदेष में सभायें कीं। 7-8-9 दिसम्बर को तहसील मुख्यालयों पर धरने/प्रदर्षन किये। यमुना एक्सप्रेस वे के नाम पर उपजाऊ जमीन को हड़पने के विरोध में अक्टूबर में मथुरा में सम्मेलन किया। वामपंथी एकता बनाये रखते हुए हमने वामपंथी संकीर्णतावाद से भी मुकाबला किया। उक्त समस्त कार्यों का उल्लेख इसलिए पुनः किया है कि 23 जनवरी 2010 के बाद की हमारी गतिविधियाँ इसी सक्रियता को बनाये रखने वाली सिद्ध हुई है।पार्टी की राज्य कौंसिल ने हमको निर्देष दिया था कि आगामी कुछ महीनों के लिये हमको निम्न कार्य करने हैं: 5 मार्च 2010 को ट्रेड यूनियनों के संयुक्त जेल भरो आन्दोलन को सक्रिय सहयोग देना। 12 मार्च को महंगाई, खाद्य सुरक्षा, भूमि अधिग्रहण, नरेगा, रोजगार और षिक्षा के प्रष्न पर वामपंथी दलों की दिल्ली रैली की तैयारी। 20 फरवरी से 8 मार्च तक रैली की सफलता के लिए जन-जागृति एवं जन-सम्पर्क अभियान चलाना। ग्राम पंचायत, ग्राम सभाओं तथा नगर निकायों के चुनावों की तैयारी। उपजाऊ जमीनों के अधिग्रहण के विरूद्ध आन्दोलन।उपरोक्त कार्यों को अंजाम देने के दौरान ही 8 अप्रैल को जेल भरो तथा 27 अप्रैल के भारत बन्द का देषव्यापी नारा आ गया। उन नारों को भी कामयाब बनाना हमारी प्रमुख राजनैतिक जिम्मेदारी थी।आन्दोलन एवं अभियानश्रमिकों का जेल भरो: 5 मार्च को मजदूर वर्ग के संयुक्त आह्वान पर पूरे प्रदेष में जेल भरो आन्दोलन सम्पन्न हुआ। यह पिछले 2-3 दषक के संयुक्त मजदूर आन्दोलन में परिवर्तन का द्योतक था क्योंकि वामपंथी मजदूर संगठनों के अतिरिक्त इंटक एवं भारतीय मजदूर संघ ने भी इस नारे का समर्थन किया। पार्टी ने भी अपना भाई चारा और समर्थन व्यक्त करने हेतु पार्टी के प्रांतीय सचिव के नेतृत्व में लखनऊ में लगभग 150 कार्यकर्ताओं ने गिरफ्तारी दी।12 मार्च की दिल्ली रैली: महंगाई के विरोध में 12 मार्च की दिल्ली रैली अभूतपूर्व थी। केन्द्रीय सरकार के रेल और आम बजट ने ऐसी नीतियों का निरूपण किया था जिसमें देष की अर्थव्यवस्था में निजीकरण को आगे बढ़ाना, पूंजीपतियों को छूट देना और आर्थिक संकट का बोझा आम जनता पर लादना निहित था। उत्तर प्रदेष पार्टी के सूबाई नेतृत्व एवं जिला पार्टी के नेतृत्व के संयुक्त प्रयासों से हम दिल्ली की सड़कों पर 14 हजार से अधिक लोगों को उतारने में सफल हुए। हमारी इस सामूहिक सफलता ने हमको भारी विष्वास प्रदान किया है। उल्लेख करना उचित होगा कि राष्ट्रीय केन्द्र ने हमको 10 हजार लोगों को लाने का कोटा दिया था। वे सभी जिले प्रषंसा के पात्र हैं जिन्होंने यथासंभव जनता के साथ भागीदारी की। जिन जिलों ने उपेक्षा बरती है उनसे अपेक्षा है कि वे अपनी गतिविधियों में सुधार करेंगे।8 अप्रैल 2010 का जेल भरो: 12 मार्च की रैली में ही महंगाई सहित अन्य सवालों पर पूरे देष में जेल भरो आन्दोलन को चलाने का ऐलान किया गया था। उत्तर प्रदेष में भी हमने इस नारे को पूर्ण किया और सूबे के अधिकतर जिलों में पार्टी कार्यकर्ताओं ने जेल भरो आन्दोलन को कामयाब किया। व्यापक रूप से पार्टी द्वारा जेल भरो आन्दोलन में भागीदारी करना पार्टी की निरन्तर क्रियाषीलता का परिचायक है।27 अप्रैल 2010 की आम हड़ताल: महंगाई के विरोध में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी एवं अन्य वामपंथी पार्टियों के द्वारा पूरे देष में बनाये गये राजनैतिक माहौल ने अन्य जनवादी दलों को भी महंगाई विरोधी आन्दोलन को चलाने के प्रष्न को केन्द्र में ला खड़ा किया। आम हड़ताल के लिए वामपंथी दलों के अतिरिक्त समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, राष्ट्रीय लोक दल एवं अन्य जनवादी दल एवं षक्तियां भी सक्रिय हो गईं। भाकपा के सूबाई नेतृत्व के प्रयास से इस बन्द में कई अन्य दल एवं किसान संगठन भी षामिल हो गये।उत्तर प्रदेष में यह बन्द षानदार रूप से कामयाब हुआ। पार्टी सूबा केन्द्र ने आम हड़ताल की तैयारी में अपेन प्रयासों में किसी भी प्रकार की कमी नहीं छोड़ी। अन्य वामपंथी दलों एवं जनवादी दलों से पूरा समन्वय स्थापित किया। जनवादी दलों के साथ संपन्न कई बैठकों में यद्यपि कभी-कभी भागीदारों द्वारा यह भावना व्यक्त की जाती थी कि अब वामपंथी दल और जनवादी दल विषेष रूप से समाजवादी पार्टी साथ आ गये हैं तो ‘तीसरे मोर्चे’ का निर्माण हो जाएगा। अखबारों में भी कुछ इस प्रकार की टीका-टिप्पणी आती थी। परन्तु समाजवादी पार्टी के वर्गीय चरित्र को देखते हुए पार्टी के नेतृत्व ने हमेषा यह कहा कि यह संयुक्त संघर्ष महंगाई के सीमित मुद्दे पर है और इसका कोई अन्य अर्थ न लगाया जाये।उत्तर प्रदेष में षानदार बन्द के बाद समाजवादी पार्टी द्वारा लोकसभा में कटौती प्रस्ताव के समय बर्हिगमन करके केन्द्रीय सरकार की मदद करना जनता के साथ एक बड़ा धोखा था जिसने समाजवादी पार्टी के वर्गीय चरित्र और मजबूरियों को एक बार फिर उजागर कर दिया।फिर भी उत्तर प्रदेष बन्द ने महंगाई के प्रष्न को जन-जन तक पहुंचाने में अपनी भूमिका का निर्वाह किया है।यहां यह भी उल्लेख करना आवष्यक होगा कि 27 अप्रैल को गिरफ्तारी के बाद जब जिला प्रषासन समाजवादी पार्टी के कुछ लोगों को बसें जलाने के आरोप में रिहा नहीं करना चाहता था तो पार्टी का नेतृत्व अड़ गया और स्पष्ट कहा कि जितने लोग गिरफ्तार हुए हैं, वे सभी रिहा होंगे अन्यथा सभी लोगों को जेल लेकर जाना होगा। पार्टी नेतृत्व की उस पहल पर जिला प्रषासन को सभी गिरफ्तार लोगों को रिहा करना पड़ा।निजीकरण विरोधी अभियान: उत्तर प्रदेष सरकार की आर्थिक नीति पूंजीपतिपरस्त है। वह बड़े पैमाने पर सरकारी उद्यमों और सेवा क्षेत्रों का निजीकरण करना चाहती है। उसने आगरा जिले की विद्युत व्यवस्था टोरेन्ट नाम की निजी कम्पनी को सौंप दी है। सरकार की इस नीति का आगरा की जनता बड़े पैमाने पर विरोध कर रही है। पार्टी भी आगरा में जनता की इच्छाओं के अनुकूल आन्दोलनरत है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि बिजली कर्मचारी संगठनों ने सरकार से निजीकरण करने हेतु समझौता किया है।अब सरकार ने कानपुर की बिजली व्यवस्था को टोरेन्ट के हवाले करने की घोषणा की है। परन्तु यह संतोष की बात है कि कानपुर के बिजली कर्मी सरकार की मंषा के खिलाफ मजबूती से संघर्ष कर रहे हैं। पार्टी भी उनको पूरा सहयोग प्रदान कर रही है। अब श्रमिक संगठनों ने भी इसके खिलाफ प्रदेषव्यापी हड़ताल का ऐलान किया है।अस्पतालों के निजीकरण का ऐलान एवं पार्टी का विरोध: सरकार ने अपने निजीकरण करने के भूत पर सवार होकर कानपुर, इलाहाबाद, फिरोजाबाद तथा बस्ती के जिला अस्पतालों तथा सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों एवं प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों को निजी एजेन्सियों को सौंपने का ऐलान किया था। चारों ही षहरों में पार्टी द्वारा इसका विरोध किया गया। कुछ अन्य वामपंथी पार्टियों और जनवादी षक्तियों ने भी इसका विरोध किया। जनता की इस स्वतःस्फूर्त नाराजगी और पार्टी की पहलकदमी ने सरकार को फिलहाल निजीकरण करने के फैसले को रोकने के ऐलान से पीछे हटने को मजबूर कर दिया है।जन-जागरण अभियान तथा धन एवं अन्न संग्रह अभियान: विगत राज्य कौंसिल की बैठक के बाद 20 फरवरी से 8 मार्च तक जनजागरण अभियान का आह्वान किया गया था। अधिकतर जिलों ने इस अभियान को चलाया और प्रदेष के विभिन्न जनपदों में सभायें/जुलूस/प्रदर्षन तथा धरने आदि संगठित किये गये। इस जन-जागरण अभियान से जनता को दिल्ली की 12 मार्च की रैली में ले जाने में बहुत मदद मिली।जिलों एवं राज्य केन्द्र को आर्थिक दृष्टि से मजबूत करने के लिए धन एवं अन्न संग्रह करना बेहद जरूरी है और पार्टी कौंसिल एवं कार्यकारिणी इस ओर बार-बार ध्यान आकर्षित करवाती है। 11, 12, 13 दिसम्बर 2009 की तिथियों के बाद एक बार फिर 6 से 9 मई 2010 तक धन एवं अन्न संग्रह का आह्वान किया गया। कुछ जिलों ने तो किया पर इस अभियान में अभी सम्यक रूप से भारी सुधार की आवष्यकता है। इस मोर्चे पर भी पार्टी कतारों को मुस्तैदी दिखाने की दरकार है। जून माह में विभिन्न जन समस्याओं पर जन आन्दोलन चलाने की रिपोर्ट भी अभी प्राप्त होनी षेष हैं।पार्टी स्कूल एवं कार्यषाला: पार्टी षिक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण है। हर पार्टी सदस्य को पार्टी की रीति-नीति, कार्य व्यवहार, पार्टी संगठन एवं जन संगठनों के निर्माण हेतु मूल सिद्धान्तों से लैस होना अत्यन्त अनिवार्य है।इस दौरान मऊ, गाजियाबाद, षाहजहांपुर, सीतापुर आदि जिलों में पार्टी कार्यषालायें आयोजित की गयीं। आवष्यकता है कि प्रत्येक जिला इस ओर भी अपना ध्यान लगाये।पंचायत एवं नगर निकाय चुनाव: पंचायत चुनावों हेतु सरकार की तैयारियां चल रही हैं। वोटर लिस्टें तैयार हो चुकी हैं। निर्धारित समय पर चुनाव होंगे। पार्टी को इन चुनावों में बड़े पैमाने पर भागीदारी करने के लिए अपने को तैयार रखने की आवष्यकता है।राज्य सरकार ने नगर निकाय चुनावों हेतु पार्टी चिन्ह से चुनाव लड़ने का प्राविधान खत्म कर दिया है। राज्य सरकार का यह फैसला राजनैतिक डर से लिया गया है। वह विधान सभा चुनावों से पहले किसी भी प्रांतव्यापी चुनाव में उलटे संकेत नहीं भेजना चाहती है। संभवतः राज्य सरकार की पूंजीपत परस्त नीतियों और व्याप्त भारी भ्रष्टाचार से उसको डर है कि जनवादी प्रक्रिया में ग्रास-रूट स्तर पर कहीं जनता राज्य सरकार की नीतियों को नकार न दे। पार्टी चिन्ह को समाप्त करने हेतु मुख्यमंत्री अथवा राज्य सरकार का कोई भी तर्क न तो न्याय संगत है और न ही तर्क संगत। राज्य पार्टी नेतृत्व ने इस घोषणा के तत्काल बाद इस पर प्रतिरोध जताते हुए राज्यपाल एवं मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजें। भूमि अधिग्रहण पर विषेष पहल: विकास के नाम पर उपजाऊ जमीनों के प्रदेष सरकार के कारनामों पर लगाम लगाने में पार्टी ने सफलता अर्जित की है। आगरा, अलीगढ़, मथुरा, हाथरस जनपदों के 850 ग्रामों की जमीनों के अधिग्रहण के खिलाफ आन्दोलन जारी है। सरकार अभी तक अधिग्रहण हेतु कदम बढ़ाने से बच रही है। बिजली घर के निर्माण के लिए ललितपुर में ली जा रही बेहद उपजाऊ जमीनों को भी आन्दोलन के जरिये वहां से षिफ्ट कराया गया। लखनऊ के फलपट्टी क्षेत्र की जमीनों को भी पार्टी ने आन्दोलन कर बचाया है। अब वहां कूड़ाघर बनाने के नाम पर ली जा रही जमीनों के सवाल पर आन्दोलन छेड़ा गया है। फ्रेट कारीडोर के निर्माण के नाम पर रेलवे द्वारा चंदौली की उत्तम धान पैदा करने वाली भूमि के अधिग्रहण के खिलाफ आवाज उठाई गयी और उसे निरस्त कराया गया।दादरी में अंबानी की परियोजना के लिये 2762 एकड़ जमीन अधिगृहीत की गई थी। हमने अन्य के साथ मिलकर आन्दोलन चलाया था। बाद में उच्च न्यायालय ने किसानों को मुआवजा लौटाने पर जमीन वापस करने का फैसला सुनाया। लेकिन निष्चित अवधि के भीतर किसान मुआवजा वापस नहीं कर पाये। उन पर तमाम केस भी चल रहे हैं। आन्दोलनकारी किसानों के संयोजकत्व में वहां 25 जून को रैली सम्पन्न हुई जिसमें पार्टी के महासचिव का। ए.बी.बर्धन, राज्य सचिव डा. गिरीष तथा अन्य ने संबोधित किया।पेट्रो मूल्य वृद्धि: हाल ही में हुई इस भारी मूल्यवृद्धि पर राज्य नेतृत्व ने त्वरित कार्यवाही की और जिलों को 26 जून को ही विरोध प्रदर्षनों का निर्देष दिया। तमाम जिलों ने पुतले जलाये। धरने-प्रदर्षनों का क्रम अब भी जारी है। अब 5 जुलाई के भारत बन्द की तैयारी में पूरी षिद्दत से जुटना है।
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भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य कौंसिल बैठक 1-2 जुलाई 2010 द्वारा पारित

राष्ट्रीय परिदृश्य
पार्टी की पिछली राज्य कौंसिल की बैठक (23 जनवरी 2010) के बाद से उत्तर प्रदेश, देश और दुनियां में कई राजनैतिक घटनाक्रम हुये हैं जो राजनीति की दिशा बदलने वाले हैं।
लोकसभा में पूर्ण बहुमत न होने के कारण संप्रग-2 सरकार लगातार संकटग्रस्त है। यह बाहर से समर्थन दे रहे अपने समर्थकों के ब्लैकमेल का शिकार है। इसके समर्थक दलों के मंत्रियों सहित तमाम मंत्री भ्रष्टाचार में लिप्त हैं।
मुख्य विपक्षी दल भाजपा यद्यपि विरोध प्रदर्शन करती रहती है लेकिन नीतियों के मामले में वह संप्रग-2 से अलग नहीं है। राष्ट्रीय, क्षेत्रीय अथवा जातिवादी पूंजीवादी दल सभी के सभी भूमंडलीकरण, निजीकरण और उदारीकरण के फार्मूले पर ही काम कर रहे हैं। इससे राजनैतिक संकट बढ़ा है।
वामपंथ यद्यपि आर्थिक नीतियों खासकर आसमान छूती महंगाई के विरूद्ध एक के बाद एक अभियान चलाता रहा है लेकिन अभी तक पूंजीवादी दलों का विकल्प नहीं बन सका है। 12 मार्च का दिल्ली मार्च और 8 अप्रैल का जेल भरो अभियान वामपंथ के अपने अभियान थे जो बेहद सफल रहे। 27 अप्रैल की आम हड़ताल में अन्य धर्मनिरपेक्ष दलों ने भी भाग लिया और वह भी बेहद सफल रही। लेकिन सपा एवं राजद ने लोकसभा में महंगाई पर लाये गये कटौती प्रस्ताव पर सरकार का साथ देकर इस अभियान की उपलब्धि को सीमित कर दिया। बसपा ने तो सीधे ही सरकार का साथ दिया। चर्चा है कि इन दलों के भ्रष्टाचार में लिप्त होने का लाभ सरकार ने उठाया और उन पर दवाब बनाया। इन दलों के अवसरवादी रवैये के चलते जनता को राहत दिलाना कठिन हो गया है। यदि इन दलों ने कटौती प्रस्ताव पर सरकार का साथ नहीं दिया होता तो शायद केन्द्र सरकार की पेट्रोल, डीजल, कैरोसिन और रसोई गैस के दाम दोबारा बढ़ाने की हिम्मत न होती। इनके अवसरवादी रूख को ध्यान में रखते हुए ही हमें आगे की योजनायें निर्धारित करनी होंगी।
विश्वव्यापी आर्थिक मंदी ने भारत सहित तमाम विकासशील देशों पर बुरी तरह प्रभाव डाला। लेकिन भारत पर इसका प्रभाव इसलिये कम पड़ा कि वामपंथ और भाकपा ने सार्वजनिक क्षेत्र के निजीकरण को उस गति से नहीं होने दिया जिस गति से सरकार करना चाहती थी। आसमान छूती मंहगाई इस संकट के सबसे घिनौने रूप में सामने आई है। केन्द्र सरकार द्वारा अनाजों एवं अन्य जरूरी वस्तुओं के वायदा कारोबार को इजाजत देने तथा व्यापारीपरस्त नीतियां अपनाने से महंगाई बढ़ी है। जमाखोरी और कालाबाजारी बेरोकटोक चलती रही है। मनमोहन सरकार इस सबको रोकने की कोई इच्छा नहीं रखती है। अभी-अभी पेट्रोल, डीजल, गैस सिलेंडर और केरोसिन की कीमतों में भारी वृद्धि करके महंगाई की छलांग लगवाने का रास्ता तैयार कर दिया है। अतएव हमें और सघन तथा व्यापक आन्दोलन करना होगा।
संप्रग-2 सरकार का सवा साल का कार्यकाल उथलपुथल भरा रहा है। दौलत पैदा हो रही है लेकिन वह चन्द हाथों में सिमटती जा रही है। अमीरी और गरीबी के बीच फासला लगातार बढ़ रहा है। महंगाई को रोक पाने में विफलता के अतिरिक्त सरकार विदेशी और आर्थिक नीतियों में अमरीकी निर्देशों पर लगातार बदलाव कर रही है। आंतरिक सुरक्षा के मामले में वह विफल है। आतंकवाद और माओवादी गतिविधियां बढ़ रही हैं। संप्रग-2 में शामिल दलों और मंत्रियों के बीच स्वार्थपरक टकराव चल रहे हैं। आईपीएल विवाद, उसके कई मंत्रियों के अशोभनीय व्यवहार के हिचकोले इस सरकार को लगते रहे हैं। रेल दुर्घटनाओं ने जान-माल को भारी हानि पहुंचाई है।
उच्च स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार जिसमें आईपीएल तथा जी-2 स्पेक्ट्रम घोटाले शामिल हैं, संप्रग-2 सरकार को उसकी कथनी से बहुत दूर ले जा खड़ा करते हैं। इसी कारण मनमोहन सरकार ने सूचना के अधिकार में संशोधन प्रस्तावित किया है। भ्रष्टाचार रक्षातंत्र तथा न्यायपालिका तक में घुस गया है।
शिक्षा के अधिकार, महिला आरक्षण एवं खाद्य सुरक्षा बिल के मामले में सरकार का रवैया आंखो में धूल झोंकने वाला साबित हो रहा है। भोपाल गैस त्रासदी के मामले में न्यायालय के फैसले के बाद की परिस्थितियों ने परमाणु जिम्मेदारी बिल के बारे में सरकार के दृष्टिकोण को कटघरे में खड़ा कर दिया है। इन बिलों को जनहित की दृष्टि से दुरूस्त कराने की जरूरत है।
नेशनल स्टूडेन्ट्स कौंसिल आफ नागालैण्उ (एनएससीएन आईएम) के नेता मुइवा को मणिपुर स्थित उसके जन्मग्राम में जाने की केन्द्र सरकार ने इजाजत दे दी। मुइवा ने इस अवसर का लाभ अपने ‘स्वतंत्र महान नागालैण्ड’ आन्दोलन को फैलाने को उठाने की कोशिश की। मणिपुर की जनता एवं भाकपा सहित कई राजनैतिक दलों की मांग पर मणिपुर सरकार ने इस यात्रा पर प्रतिबंध लगा दिया। नागा संगठनों ने प्रतिक्रिया में मणिपुर जाने वाले दो राष्ट्रीय मार्गों को बन्द कर दिया। दो महीने तक मणिपुर की जनता ने भारी यातनाओं को झेला। केन्द्र ने इस बैरीकेड को हटाने में बेहद देरी की। विघटनकारी शक्तियों के प्रति केन्द्र के ढुलमुल और अवसरवादी रवैये से राष्ट्रीय एकता की नींव कमजोर पड़ती है।
आंतरिक आर्थिक नीतियों की ही भांति संप्रग-2 सरकार विदेश नीति में लगातार अमरीकापरस्त रूख अपना रही है जो हमारे राष्ट्रीय हितों के विपरीत है। यह हमारी विकासषील देषों के साथ एकजुटता एवं गुटनिरपेक्षता की नीति को पलटने जैसा है।
सामाजिक-आर्थिक शोषण से पैदा हुई अमीरी-गरीबी की खाई से उत्पन्न असंतोष को भुनाकर माओवादियों ने आदिवासियों, दलितों एवं कमजोरों के बीच जगह बना ली है। लेकिन स्पष्ट राजनैतिक दृष्टिकोण न होने के कारण अब वे आम जनता यहां तक कि रेलों पर हमले कर रहे हैं। केन्द्र सरकार यद्यपि मानती है कि यह खाली कानून-व्यवस्था का मामला नहीं है लेकिन वह कानून-व्यवस्था के तौर पर ही इससे निपटने में लगी है। इस अभियान में सेना को लगाने की बातें भी हो रही हैं जो हमारी सेना की प्रतिष्ठा के लिए नकारात्मक साबित होगा। भ्रमित लोगों से वार्ता करने, माओवाद प्रभावित क्षेत्रों के लिए सामाजिक आर्थिक पैकेज देने, वहां बहुराष्ट्रीय कंपनियों की घुसपैठ रोकने तथा विकास योजनाओं को ठीक से क्रियान्वित करने की जरूरत है।
पश्चिम बंगाल में पहले पंचायत, फिर लोकसभा एवं अब नगर निकायों के चुनावों में वामपंथ की करारी हार हुई है। वह भी तब जब तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस दोनों अलग-अलग चुनाव लड़ रहे थे। यद्यपि वहां वाम मोर्चे ने आमजनों के लिए बहुत कुछ किया। लेकिन आज वह भूमि अधिग्रहण, नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के अपनाने तथा जनता शासन की जगह अफसरशाही तरीके से राज चलाने के कारण किसानों, मजदूरों, अल्पसंख्यकों के बीच पहले की तरह लोकप्रिय नहीं रहा। वहां वामपंथ में जनहितैषी सुधार लाने और भाकपा की स्वतंत्र छवि को स्थापित करने की जरूरत है।
महंगाई, भूमि अधिग्रहण/भूमि सुधार, भ्रष्टाचार, गरीबी, रोजगार, स्वच्छ जल, शिक्षा एवं भारतीय हितों के अनुकूल विदेश नीति जैसे सवालों पर एक कार्यक्रम तैयार कर सघन और व्यापक आन्दोलन ही वामपंथ को मजबूत करेंगे और साम्प्रदायिक भाजपा को परिस्थतियों का लाभ उठाने से रोकेंगे। क्षेत्रीय और जातिवादी दलों, जो समय-समय पर राजनैतिक पलटी मारने को अभिशप्त हैं, हमें बहुत सावधानी के साथ अंतर्क्रिया करनी चाहिये ताकि उनकी अवसरवादी छवि का ग्रहण हमारे ऊपर चस्पा न हो। मौजूदा वामपंथ को बेहतर वामपंथ बनाने को भाकपा को अहम एवं सकारात्मक भूमिका अदा करनी होगी।
उत्तर प्रदेश
निजीकरण की राह पर प्रदेष सरकार:
गत राज्य कौंसिल बैठक में पारित रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश के सम्बंध में कहा गया था - ”उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत वाली बसपा की सरकार है जो राजनैतिक दृष्टि से संप्रग-2सरकार के विपक्ष में खड़ी है। परन्तु यह सरकार भी विकास के पूंजीवादी मार्ग को अपनाते हुए भूमण्डलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण की राह पर चल रही है। लेकिन सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक उथल-पुथल के इस दौर में वह अपने मत आधार (दलित, अति पिछड़े और आदिवासी) को अपने साथ जोड़े रखने को कई कदम उठाती रहती है।“
आज भी प्रदेश सरकार इसी रास्ते पर चल रही है।
सार्वजनिक उपक्रमों और सार्वजनिक सेवाओं का निजीकरण लगातार करने की कोशिशें जारी हैं। आगरा की विद्युत वितरण व्यवस्था को निजी कंपनी टोरंट को सौंप दिया गया। पार्टी ने इसका कड़ा विरोध किया। अब मुख्यमंत्री ने धमकी दी है कि कानपुर आदि शहरों के बिजली वितरण को निजी कंपनियों को सौंप दिया जायेगा। वैसे उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन की नई परियोजनाओं के निर्माण से विद्युत वितरण तक के कई कामों में ठेकेदारी प्रथा और निजीकरण का बोलबाला है। विभागीय भ्रष्टाचार के कारण ही 30 करोड़ रूपये की लागत से बनी परीछा परियोजना की नवनिर्मित चिमनी भरभरा कर गिर गयी। इससे पूर्व दो बार हरदुआगंज की निर्माणाधीन परियोजनायें गिरकर नष्ट हो चुकी हैं। टोरन्ट द्वारा अधिग्रहण के बाद से आगरा की विद्युत व्यवस्था लगभग ध्वस्त पड़ी है। स्पष्ट है कि समस्या का समाधान सुधार है निजीकरण नहीं।
प्रदेश में स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालय तक की शिक्षा पंसारी की दुकान बन गयी है। निजी स्कूलों और अनुदानित विद्यालयों में खोले जा रहे स्ववित्त पोषित पाठ्यक्रमों के शुल्क इतने अधिक हैं कि गरीब और औसत आमदनी वाले परिवार को शिक्षा पाना बेहद कठिन हो गया है।
राज्य सरकार की बदनीयती का शिकार स्वास्थ्य सेवायें भी हो रही हैं। गरीबों को महंगे नर्सिंग होम्स में इलाज कराना बेहद कठिन है। आज भी वह राजकीय चिकित्सालयों में ही इलाज कराते हैं। सरकार ने उनको भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा संचालित बड़े अस्पतालों को सौंपने की चेष्टा की। बस्ती, इलाहाबाद, कानपुर और फिरोजाबाद के चार जिला अस्पतालों तथा इन जिलों में मौजूद सैकड़ों प्राथमिक एवं सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों को निजी अस्पतालों को दे डालने की योजना बना ली थी।
प्रदेश भाकपा ने इसका पुरजोर विरोध किया और सरकार को अपना फैसला वापस लेने को मजबूर होना पड़ा।
14 चीनी मिलों को बेचने की तैयारी चल रही है। सड़क निर्माण, भवन निर्माण सभी में निजी क्षेत्र को भारी भागीदारी दी जा रही है। राज्य की अर्थव्यवस्था को निजीकरण के जरिये चूसा जा रहा है।
नगर निकाय चुनावों का गैर-राजनीतीकरण:
अपने दलीय हितों को पूरा करने हेतु राज्य सरकार ने नगर निकायों के चुनाव दलीय आधार पर होने की प्रक्रिया को उलट दिया। बसपा सरकार को डर है कि जिन जनविरोधी नीतियों पर वह चल रही है, उनके चलते आम जनता निकाय चुनावों में उसे शिकस्त दे देगी। 2012 के भावी विधान सभा चुनावों में इसका विपरीत असर पड़ेगा। उप चुनावों में 16 में से 13 विधान सभा सीटों पर जीतने वाली बसपा इसी कारण से अब किसी मध्यावधि चुनावों में हिस्सा न लने की घोषणा कर चुकी है। भाकपा तथा कई अन्य दलों ने लोकतंत्र का हनन करने वाली इस कार्यवाही का विरोध किया लेकिन बसपा प्रमुख आज भी इस कार्यवाही को उचित ठहरा कर हठवादिता का परिचय दे रही हैं।
कृषि भूमि का अधिग्रहण-दर-अधिग्रहण:
भूमि सुधार का सवाल सरकार की प्रतिकूल नीतियों का शिकार बन चुका है। आगरा, अलीगढ़, हाथरस, मथुरा जनपदों में 850 ग्रामों की जमीन जमुना एक्सप्रेस वे औद्योगिक विकास प्राधिकरण के लिए अधिसूचित कर दी गई। भाकपा, लोकदल के विरोध के कारण फिलहाल सरकार आगे कदम नहीं बढ़ा पा रही है।
लखनऊ के चारों ओर आमों के हरे-भरे बागों से आच्छादित फलपट्टी की भूमि को अधिग्रहण करने की योजना को भी भाकपा और फलपट्टी किसान वेलफेयर एसोसिएशन के संयुक्त आन्दोलन के जरिये फिलहाल विफल बना दिया गया है। अब लखनऊ के कचरे को डम्प करने के नाम पर दशहरी आम के उद्गमस्थल दशहरी गांव एवं अन्य चार गांवों की 88 एकड़ जमीन को अधिगृहीत करने की योजना के खिलाफ भी आन्दोलन छेड़ा गया है। आन्दोलन का बिगुल बजाते हुए 250 वर्ष पुराने दशहरी आम के पितृ वृक्ष पर भाकपा का ध्वज फहरा दिया गया है। 6 जुलाई को वहां संयुक्त रूप से विरोध प्रदर्षन होगा।
दादरी परियोजना में उच्च न्यायालय द्वारा किसानों को मुआवजा लौटाकर जमीन वापस पाने का फैसला होने के बावजूद किसान अभी मुआवजा लौटा नहीं पाये हैं। उन पर आन्दोलन से जुड़े मुकदमें भी चल रहे हैं। भाकपा ने वहां भी हस्तक्षेप किया है। मुआवजा वापसी की अवधि 3 माह बढ़ाने और मुकदमें वापस लेने की मांग को लेकर आन्दोलनरत किसानों की रैली 25 जून को धौलाना कस्बे में की गई जिसमें भाकपा महासचिव का. ए.बी.बर्धन और राज्य सचिव डा. गिरीश और गौतमबुद्धनगर, गाजियाबाद तथा मेरठ के भाकपा कार्यकर्ताओं और नेताओं ने भाग लिया।
हाईवे, कूड़ाघर अथवा अन्य निर्माणों के नाम पर उपजाऊ जमीनों के अधिग्रहण का अन्यत्र भी विरोध किया जा रहा है। भूमि अधिग्रहण कानून 1894 को बदले जाने की आवाज भी उठाई जा रही है। गैरकानूनी तरीके से संचित जमीनों के वितरण की दिशा में भी राज्य सरकार काम नहीं कर रही है।
पेट्रो-पदार्थों की मूल्यवृद्धि और बसपा सरकार:
केन्द्र सरकार द्वारा दोबारा पेट्रोल, डीजल, केरोसिन तथा रसोई गैस के दामों में की गई भारी वृद्धि से महंगाई की मार से पीड़ित प्रदेश की जनता और भी तबाह होने को है। राज्य सरकार ने इन वस्तुओं पर लगने वाले राज्य के करों को यदि घटा दिया होता तो कुछ राहत अवश्य मिलती। जमाखोरी, कालाबाजारी, मिलावटखोरी सूबे में बेधड़क जारी है। बसपा ने महंगाई के खिलाफ कटौती प्रस्ताव का विरोध कर साबित कर दिया है कि वह जनता को महंगाई से निजात दिलाने की इच्छा शक्ति नहीं रखती। राशन प्रणाली भी प्रदेश में अस्तव्यस्त पड़ी है।
निष्कर्ष:
भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था की बदतर स्थिति, अति अल्प विद्युत आपूर्ति, खादों का अभाव, नहर बंबों में पानी न आना, पुलिस दमन, कमजोर तबकों के बेहद उत्पीड़न आदि से जनता बेहद परेशान है। वह एक विकल्प चाहती है लेकिन सक्षम और बेहतर विकल्प का निर्माण नहीं हो पा रहा है।
प्रदेश में भाकपा ने स्वतंत्र रूप से लगातार आन्दोलन चलाये हैं। कई आन्दोलन अन्य वामपंथी दलों के साथ चलाये हैं। 27 अप्रैल के भारत बन्द में अन्य दल भी साथ थे। इससे प्रदेश में भाकपा की प्रतिष्ठा और साख बढ़ी है और पार्टी कार्यकर्ताओं का विश्वास बढ़ा है। यह एक सकारात्मक घटनाक्रम है।
कई जिलों में पार्टी संगठन पर कार्यशालायें एवं पार्टी स्कूल आयोजित किये गये हैं परन्तु मूल तौर पर यह दौर आन्दोलनकारी गतिविधियों का ही रहा है।
इन आन्दोलनों में हम आम जनता को उतारने में अभी कामयाब नहीं हुये हैं। इसके लिए हमें जनता के बीच पहुंचना होगा। जन संगठनों की सक्रियता और विकास इस काम में मददगार होंगे। पार्टी को स्वतंत्र रूप से गतिविधियां जारी रखनी होंगी और वाम दलों के साथ समय-समय पर गतिविधियां चलानी होंगी। जातिवादी दलों, साम्प्रदायिक शक्तियों और आर्थिक आपात्काल खड़ा कर रही शक्तियों के चंगुल से जनता को मुक्त करा अपने साथ लाना होगा। तदनुसार हमें भावी राजनैतिक और सांगठनिक कदम निर्धारित करने होंगे।
भविष्य की कार्यवाहियां
 केन्द्र सरकार द्वारा पेट्रोल, डीजल, केरोसिन और रसाई गैस की कीमतों को वापस लेने, आसमान छूती महंगाई पर रोक लगाने तथा खाद्य सुरक्षा प्रदान करने हेतु अभियान।
 इस विषय में 1 जुलाई को चारों वामदलों के संयुक्त कन्वेंशन में लिये गये फैसलों एवं 5 जुलाई के प्रस्तावित भारत बंद को मुस्तैदी से सफल बनाने की पुरजोर कोशिश।
 विकास हो मगर उपजाऊ जमीनों का अधिग्रहण नहीं, भूमि अधिग्रहण कानून 1894 को बदला जाये। इस अभियान को और जोरदार तरीके से चलाना।
 सीलिंग की जमीन, कालेधन के बल पर बनाये बड़े फार्म हाउसों की जमीन, बंद उद्योगों की वह जमीन जो किसानों से अधिगृहीत की गई थी, का लेखा-जोखा तैयार कराने को प्रदेश में एक भूमि सुधार आयोग गठन करने की मांग को उठाना। इससे भूमिहीनों में भूमि वितरण का रास्ता खुलेगा।
 सार्वजनिक उपक्रमों और सार्वजनिक सेवाओं के निजीकरण रोके जाने को अभियान।
 नगर निकाय के त्रिस्तरीय चुनाव दलीय आधार पर कराने की मांग को अभियान।
 केन्द्र एवं राज्य सरकार की जनहितैषी योजनाओं को अमल में लाने को अभियान।
 भ्रष्टाचार एवं कानून व्यवस्था की स्थिति का पर्दाफाश करना।
सांगठनिक
 राजनैतिक रिपोर्टिंग के लिये जिला कौंसिलों की विस्तारित बैठक/जनरल बॉडी बैठकें बुलाना।
 त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों/नगर निकायों के चुनावों में व्यापक भागीदारी की सांगठनिक तैयारी।
 केन्द्र एवं राज्य के अखबारों के ग्राहक बनाना।
 जन संगठनों की सक्रियता और विस्तार विभिन्न विभागों की बैठकें बुलाना।
 पार्टी में महिला, नौजवान, दलित एवं अल्पसंख्यकों की भर्ती पर विशेष जोर।
 प्रशिक्षण शिविर और कार्यशालायें अधिक से अधिक जिलों में लगाना।
 धन एवं अन्न संग्रह अभियान को गंभीरता से लेना और उसे नियमित तौर पर चलाना।
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पेट्रो कीमतों के बारे में कुछ तथ्य - संप्रग जवाब दे - भाग मनमोहन जनता आती है !!!!

कुछ देशों में पेट्रोल की वर्तमान कीमतें इस प्रकार है :
  • पाकिस्तान में २६ रूपये लीटर
  • बंगला देश में २२ रूपये लीटर
  • क्यूबा में १९ रुपये लीटर
  • नेपाल में २४ रूपये लीटर
  • बर्मा में ३० रूपये लीटर
  • अफगानिस्तान में ३६ रूपये लीटर
  • क़तर में ३० रूपये लीटर
लेकिन हिंदुस्तान में ५३ रूपये लीटर
जरा देखिये इन ५३ रुपयों में क्या-क्या शामिल करती है जनद्रोही संप्रग और मायावती सरकारें :
  • एक लीटर पेट्रोल की हिंदुस्तान में लागत कीमत : १६-५० रूपये
  • एक लीटर पेट्रोल पर हम से वसूला जाता है ११.८० रूपये का केन्द्रीय कर
  • एक लीटर पेट्रोल पर हम से वसूला जाता है ९.७५ रूपये का एक्साइज ड्यूटी
  • एक लीटर पेट्रोल पर हम से वसूला जाता है ८.०० रूपये का उत्तर प्रदेश सरकार के टैक्स
  • एक लीटर पेट्रोल पर हम से वसूला जाता है ४.०० का सेस
  • बाकी लिया जाता है सरमायेदारों और सरकार का मुनाफा
फिर भी सरकार रोती है अनुदान के बोझ का !
आयल कंपनियों के नुक्सान का !!
तेल कंपनियों के पिछले दस सालों के मुनाफे देखिए जो जा रहे हैं सरमायेदारों और सरकार की जेब में
भाईयों बहुत हो गया है 5 जुलाई को सरकार को दिखा दो अपनी ताकत
लगाओ नारा भाग मनमोहन जनता आती है !!!!
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शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

वाम दलों ने भारत बंद की तैयारियां शुरू की

हिंदी खबर ने आज यह समाचार छापा है :
जयपुर.एनएनआई.01जुलाई। विपक्षी दलों ने पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की बढी दरों के विरोध में पांच जुलाई को भारत बंद की तैयारियां शुरू कर दी है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के तारा सिंह सिद्धू के अनुसार, प्रस्तावित भारत बंद की तैयारियों के लिए वाम दलों की कल सम्पन्न हुई बैठक में प्रदेशवासियों से भारत बंद को सफल बनाने की अपील की गयी। उन्होंने कहा कि बंद से केन्द्र की जन विरोधी आर्थिक नीतियों को पीछे धकलने का दवाब बनेगा। सिद्धू ने कहा कि केन्द्र सरकार मंहगाई पर अंकुश लगाना तो दूर पेट्रोलियम पदाथरे की दरों में वृद्धि कर आम लोगों की तकलीफ बढ़ा दी है।
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Black balloon protest during Manmohan's Kanpur visit

The Hindu today published the following item :
The Left parties will stage protests against fuel price hike during Prime Minister Manmohan Singh's visit to Kanpur on Saturday.
While All-India Forward Bloc members will release black balloons from their homes when the Prime Minister reaches the industrial metropolis in the afternoon, the Kanpur units of the Communist Party of India (Marxist) and Communist Party of India have been authorised to have their own forms of protest.
This was stated by the U.P. unit leaders of the CPI (M), the CPI, the AIFB, the Republican Socialist Party (RSP) and the Janata Dal (Secular) at a press conference here on Friday.
Accusing Dr. Singh of pushing the common man, farmers and labourers further towards ruination by increasing the prices of petrol, diesel, kerosene and LPG, the leaders said the July 5 Bharat bandh and general strike would take the form of a people's struggle.
State CPI(M) secretary S.P. Kashyap said the Prime Minister's announcement that diesel would be decontrolled was a pointer to what lay in store for the common man.
CPI secretary Girish said that under Left pressure UPA-I could not announce fuel price hike and even if there was an increase, it was just marginal. Now, in the absence of Left pressure and as UPA-II allies were a pro-capitalist class, the country witnessed an unprecedented rise in fuel prices, Mr. Girish said.
The CPI leader urged Uttar Pradesh Chief Minister Mayawati to reduce the value added tax on petrol and diesel.
AIFB secretary Ram Kishore said people who were reeling under the impact of the price hike should join the July 5 strike.
Dr. Singh is scheduled to attend a convocation of the Indian Institute of Technology and address the Uttar Pradesh Chamber of Merchant and Commerce
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