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गुरुवार, 29 जुलाई 2010
1960 की केन्द्रीय कर्मचारी हड़ताल
संगठन, संस्था, समाज और देश के इतिहास में कुछ जाज्वल्यमान कालखण्ड होते हैं, जिन पर उन्हें नाज होता है। उनकी गौरव गाथाएं होती हैं। समस्त केन्द्रीय कर्मचारी जब अपने संयुक्त संघर्षशील आंदोलन का सिंहावलोकन करते हैं तो देखते हैं, कि 1944 की हड़ताल से पहला वेतन आयोग जन्मा और 1957 के हड़ताल के नोटिस के कारण दूसरे वेतन आयोग का गठन हुआ। उसी आयोग की कर्मचारीविरोधी अनुशंसाओं और केन्द्र सरकार के अड़ियल रूख के कारण 12 जुलाई 1960 से 5 दिवसीय अनिश्चितकालीन हड़ताल प्रारंभ हुई, जिसका स्वर्ण जयंती वर्ष पूरे वर्ष देश में मनाया जा रहा है।
उस हड़ताल को केन्द्रीय गृहमंत्री पं. गोविन्दवल्लभ पंत ने सिविल विद्रोह कहा था। यह भी कहा था कि यदि यह सफल होती, तो आज हम यहां (संसद में) नहीं होते। तत्कालीन एटक के जनरल सेक्रेटरी और सांसद कामरेड एस.ए. डांगे ने उसे पांच दिवसीय शालीन हड़ताल (5 डेज ग्लोरियस स्ट्राइक) कहा था। यह भी तर्क दिया था कि जब मुनाफे बढ़े गये हैं, उत्पादन बढ़ गया है, हर तरह विकास हो रहा है, परन्तु कर्मचारी का वेतन घट गया है। अतः हड़ताल उचित, सामयिक और जायज है।
इस हड़ताल से चार दिन पहले अनिवार्य सेवा अध्यादेश लागू कर दिया गया था। रेलवे, डाक-तार, सिविल एविऐशन, सेक्यूरिटी प्रेस, टकसाल आदि को अनिवार्य सेवाएं घोषित कर दिया गया। हड़ताल को अवैध करार दिया गया। यह धमकी दी गयी, जो हड़ताल में शामिल होगा, उसे एक साल का सश्रम कारावास और 1000 रुपए जुर्माना किया जायेगा। कई अखबार और आकाशवाणी बौखला गये थे। राष्ट्रीय स्तर पर अशोक मेहता, एस.एम. जोशी, फिरोज गांधी, आर.के. खांडिलकर आदि ने मध्यस्थता करने के कई प्रयास किये। केन्द्र सरकार ने किसी की नहीं सुनी और कर्मचारी हड़ताल पर जाने को बाध्य हो गये। नेहरू जी ने भी आकाशवाणी से अपील की। एटक, एचएमएस, यूटीयूसी ने हड़ताल का समर्थन किया। जबकि इंटक ने घोर विरोध किया।
संयुक्त संघर्ष समिति (जेसीए) की मांग थी -
(1) महंगाई भत्ते का आयोग की रिपोर्ट के आधार पर भुगतान हो।
(2) 15वें श्रम सम्मेलन के अनुसार न्यूनतम वेतन 125 रुपये हो, जबकि सरकार ने 80 रुपये माना था
(3) सभी विभागों में कर्मचारी हितों के लिये स्टैंडिंग बोर्ड बनाये जायें,
(4) प्राप्त सुविधाओं व अधिकारों मे कोई कटौती नहीं हो,
(5) एक उद्योग में एक यूनियन हो,
(6) रेल 4(अ) और 4 (ब) को निरस्त किया जाये (जो बाद में कोर्ट ने किया)
11 जुलाई, 1960 को रात्रि शून्यकाल से हड़ताल शुरू हुई, जो रात्रिकालीन ड्यूटी पर थे, वे बाहर आ गए। हड़ताल विरोधी सघन प्रचार और पुलिसिया आतंक के बावजूद देश भर में हड़ताल के अद्भुत नजारे दिखाई दिये। गुजरात के दाहोद में हड़तालियों पर गोलियां चली और पांच रेलवे कर्मचारी शहीद हुए। 22 लाख केन्द्रीय कर्मचारियों में से सरकारी आंकड़ों के अनुसार 5 लाख ने हड़ताल में शिरकत की। उनमें से 94,525 डाक तार कर्मचारी थे। 17,700 गिरफ्तारियों में से 6500 डाक तार वाले थे। 27,700 निलंबित में से 13000 पी एंड टी कर्मचारी थे। अधिकतर गिरफ्तार कर्मचारियों को तुरन्त बर्खास्त किया गया। जेल में आदेश दिए गए। हजारों को आरोप पत्र और स्थानांतरण जारी किये गये। उन्हीं प्रताड़नाओं की तीखी आंच से यह स्वर्णिम जयन्ती वर्ष जन्मा है।
अविभाजित मध्य प्रदेश में छत्तीसगढ़ क्षेत्र में जमकर हड़ताल हुए। जेलें भरी गयी। इन्दौर, भोपाल, रीवा में हड़ताल हुई। जबलपुर में जे.पी. पाण्डे जी को डाकघर में गिरफ्तार किया। रीवां और भिलाई में 11.00 बजे सजायें सुनाकर जेल भेज दिया था। बिलासपुर करगी रोड के पोस्ट मास्टर व्ही.जी. खानखोजे को हथकड़ियां पहनाकर सड़क पर पैदल अदालत ले गए। बीएस सिंह, सत्तू शर्मा, खानखोजे, सुन्दरलाल शर्मा, एच.एस. परिहार, महावीर सिंह, मासोदरकर, आर.के. अग्रवाल निलम्बित किए गए। एक समाचार पत्र नेे एक कार्टून छापा था कि अशोक मेहता सम्राट अशोक की भांति कलिंग की रणभूमि में हताहतों को देखकर अत्यंत दुखी खड़े हैं।
22 जुलाई, 1960 को सभी संगठनों और फेडरेशन की मान्यताएं छीन ली गयीं। जबरदस्त दमन हुआ। एस.एम. जोश्ी सांसद संयुक्त संघर्ष समिति के अध्यक्ष थे और एस. मधुसूदन महासिचव। ओ.पी. गुप्ता ने टेलीकॉम पत्रिका के मुख्य पृष्ठ पर चित्र छापा था, उसे शीर्षक दिया था एनएफपीटीआई लायलोन (अंजनयलू इल चेंस)। आंकड़े, जो भी कहें, मगर सारा सरकारी तंत्र ठप्प था। इसी के परिणामस्वरूप 1961 में महंगाई भत्ता और संयुक्त सलाहकार परिषद (जेसीएम) का गठन हुआ। नागपुर से डाक तार विभाग का मुख्यालय भोपाल आया। सबसे बड़ी उपलब्धि ये थी, कि 1960 का एक भी हड़ताली कर्मचारी सेवाओं से बाहर नहीं रहा। देर-सबेर सभी वापस आ गये।
- गोविन्द सिंह असिवाल
उस हड़ताल को केन्द्रीय गृहमंत्री पं. गोविन्दवल्लभ पंत ने सिविल विद्रोह कहा था। यह भी कहा था कि यदि यह सफल होती, तो आज हम यहां (संसद में) नहीं होते। तत्कालीन एटक के जनरल सेक्रेटरी और सांसद कामरेड एस.ए. डांगे ने उसे पांच दिवसीय शालीन हड़ताल (5 डेज ग्लोरियस स्ट्राइक) कहा था। यह भी तर्क दिया था कि जब मुनाफे बढ़े गये हैं, उत्पादन बढ़ गया है, हर तरह विकास हो रहा है, परन्तु कर्मचारी का वेतन घट गया है। अतः हड़ताल उचित, सामयिक और जायज है।
इस हड़ताल से चार दिन पहले अनिवार्य सेवा अध्यादेश लागू कर दिया गया था। रेलवे, डाक-तार, सिविल एविऐशन, सेक्यूरिटी प्रेस, टकसाल आदि को अनिवार्य सेवाएं घोषित कर दिया गया। हड़ताल को अवैध करार दिया गया। यह धमकी दी गयी, जो हड़ताल में शामिल होगा, उसे एक साल का सश्रम कारावास और 1000 रुपए जुर्माना किया जायेगा। कई अखबार और आकाशवाणी बौखला गये थे। राष्ट्रीय स्तर पर अशोक मेहता, एस.एम. जोशी, फिरोज गांधी, आर.के. खांडिलकर आदि ने मध्यस्थता करने के कई प्रयास किये। केन्द्र सरकार ने किसी की नहीं सुनी और कर्मचारी हड़ताल पर जाने को बाध्य हो गये। नेहरू जी ने भी आकाशवाणी से अपील की। एटक, एचएमएस, यूटीयूसी ने हड़ताल का समर्थन किया। जबकि इंटक ने घोर विरोध किया।
संयुक्त संघर्ष समिति (जेसीए) की मांग थी -
(1) महंगाई भत्ते का आयोग की रिपोर्ट के आधार पर भुगतान हो।
(2) 15वें श्रम सम्मेलन के अनुसार न्यूनतम वेतन 125 रुपये हो, जबकि सरकार ने 80 रुपये माना था
(3) सभी विभागों में कर्मचारी हितों के लिये स्टैंडिंग बोर्ड बनाये जायें,
(4) प्राप्त सुविधाओं व अधिकारों मे कोई कटौती नहीं हो,
(5) एक उद्योग में एक यूनियन हो,
(6) रेल 4(अ) और 4 (ब) को निरस्त किया जाये (जो बाद में कोर्ट ने किया)
11 जुलाई, 1960 को रात्रि शून्यकाल से हड़ताल शुरू हुई, जो रात्रिकालीन ड्यूटी पर थे, वे बाहर आ गए। हड़ताल विरोधी सघन प्रचार और पुलिसिया आतंक के बावजूद देश भर में हड़ताल के अद्भुत नजारे दिखाई दिये। गुजरात के दाहोद में हड़तालियों पर गोलियां चली और पांच रेलवे कर्मचारी शहीद हुए। 22 लाख केन्द्रीय कर्मचारियों में से सरकारी आंकड़ों के अनुसार 5 लाख ने हड़ताल में शिरकत की। उनमें से 94,525 डाक तार कर्मचारी थे। 17,700 गिरफ्तारियों में से 6500 डाक तार वाले थे। 27,700 निलंबित में से 13000 पी एंड टी कर्मचारी थे। अधिकतर गिरफ्तार कर्मचारियों को तुरन्त बर्खास्त किया गया। जेल में आदेश दिए गए। हजारों को आरोप पत्र और स्थानांतरण जारी किये गये। उन्हीं प्रताड़नाओं की तीखी आंच से यह स्वर्णिम जयन्ती वर्ष जन्मा है।
अविभाजित मध्य प्रदेश में छत्तीसगढ़ क्षेत्र में जमकर हड़ताल हुए। जेलें भरी गयी। इन्दौर, भोपाल, रीवा में हड़ताल हुई। जबलपुर में जे.पी. पाण्डे जी को डाकघर में गिरफ्तार किया। रीवां और भिलाई में 11.00 बजे सजायें सुनाकर जेल भेज दिया था। बिलासपुर करगी रोड के पोस्ट मास्टर व्ही.जी. खानखोजे को हथकड़ियां पहनाकर सड़क पर पैदल अदालत ले गए। बीएस सिंह, सत्तू शर्मा, खानखोजे, सुन्दरलाल शर्मा, एच.एस. परिहार, महावीर सिंह, मासोदरकर, आर.के. अग्रवाल निलम्बित किए गए। एक समाचार पत्र नेे एक कार्टून छापा था कि अशोक मेहता सम्राट अशोक की भांति कलिंग की रणभूमि में हताहतों को देखकर अत्यंत दुखी खड़े हैं।
22 जुलाई, 1960 को सभी संगठनों और फेडरेशन की मान्यताएं छीन ली गयीं। जबरदस्त दमन हुआ। एस.एम. जोश्ी सांसद संयुक्त संघर्ष समिति के अध्यक्ष थे और एस. मधुसूदन महासिचव। ओ.पी. गुप्ता ने टेलीकॉम पत्रिका के मुख्य पृष्ठ पर चित्र छापा था, उसे शीर्षक दिया था एनएफपीटीआई लायलोन (अंजनयलू इल चेंस)। आंकड़े, जो भी कहें, मगर सारा सरकारी तंत्र ठप्प था। इसी के परिणामस्वरूप 1961 में महंगाई भत्ता और संयुक्त सलाहकार परिषद (जेसीएम) का गठन हुआ। नागपुर से डाक तार विभाग का मुख्यालय भोपाल आया। सबसे बड़ी उपलब्धि ये थी, कि 1960 का एक भी हड़ताली कर्मचारी सेवाओं से बाहर नहीं रहा। देर-सबेर सभी वापस आ गये।
- गोविन्द सिंह असिवाल
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इतिहास में जिन्दा रहने से होगा क्या? कुछ भविष्य की भी सोचना शुरू करो।
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