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मंगलवार, 12 मई 2015
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भाकपा का देशव्यापी आन्दोलन 14 मई को
लखनऊ 12 मई। केन्द्र सरकार द्वारा थोपे जा रहे भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को रद्द कराने और मौसम की मार से बरवाद हुए किसान और ग्रामीण मजदूरों को पर्याप्त राहत दिलाने की मांगों को लेकर के भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी 14 मई को पूरे देश में जुझारू आन्दोलन छेड़ रही है। भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार उत्तर प्रदेश में पार्टी के कार्यकर्ता 14 मई को बड़े पैमाने पर सड़कों पर उतर कर जिलों-जिलों में रास्ता रोकेंगे। इस आन्दोलन के लिए भाकपा का नारा है - ”खेत बचाओ, किसान बचाओ, कारपोरेट से देश बचाओ“।
गत दिन उत्तर प्रदेश में आन्दोलन की तैयारियों की समीक्षा करने के लिए पार्टी की मंत्रिपरिषद की बैठक यहां सम्पन्न हुई और पाया गया कि 1 मई से ही जिलों-जिलों में भाकपा कार्यकर्ता जन सम्पर्क अभियान चला रहे हैं और बड़े पैमाने पर पूरे प्रदेश में रास्ता रोकने की तैयारियों में जुटे हैं।
मंत्रिपरिषद ने अपने समस्त राज्य कार्यकारिणी सदस्यों को किसी न किसी जिले में आन्दोलन का नेतृत्व संभालने का निर्देश दिया है। राज्य सचिव डा. गिरीश सुल्तानपुर में आन्दोलन का नेतृत्व करेंगे जबकि सह सचिव अरविन्द राज स्वरूप और राज्य सचिव मंडल सदस्य आशा मिश्रा एवं सदरूद्दीन राना लखनऊ में, राज्य सह सचिव इम्तियाज अहमद मऊ में, मंत्रि परिषद सदस्य अतुल कुमार सिंह फैजाबाद में एवम् अजय सिंह बुलन्दशहर में आन्दोलन का नेतृत्व करेंगे।
भाकपा ने यहां जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में जनता के व्यापक तबकों से अपील की है कि वह अधिक से अधिक संख्या में भाकपा के आन्दोलन में शामिल हो और सहयोग प्रदान करें।
शनिवार, 9 मई 2015
at 4:29 pm | 0 comments | फसिस्म, भाकपा, शमीम फैजी
एक प्रासंगिक वर्षगांठ
9 मई फासीवाद पर जीत की 70वीं वर्षगांठ है। इसे मनाये जाने की आवश्यकता है ना केवल असंख्य लोगों द्वारा किये गए सर्वोच्च बलिदानों, विशेषकर पूर्व सोवियत संघ की लाल सेना के कारण बल्कि इससे भी अधिक अन्तर्राष्ट्रीय और घरेलू दोनों मोर्चों पर सामाजिक आर्थिक विकास के संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता के लिए भी। काफी विकसित अर्थव्यवस्थाएं 2008 में शुरू हुई आर्थिक मंदी के कारण आर्थिक संकट में फंस गयी हैं और अभी भी नव उदारवाद के संरक्षक इसे बड़ी मंदी का नाम दे रहे हैं और फासीवादी रूझानों के शासन तहत आ रहे हैं। अन्तर्राष्ट्रीय वित्त पंूजी के आर्थिक हितों की सेवा करने वाली राजनीतिक शक्तियां इन देशों में सभी विभाजक मतांध नारों का सहारा ले रही हैं जिसमें आप्रवास के विरोध की पकड़ में रहने वाला नस्लवाद भी शामिल है। वैश्विक मंदी पंूजीवाद का नियमित संकट नही है बल्कि यह दुनिया में अपना राजनीतिक और आर्थिक वर्चस्व कायम करने के लिए वित्त पंूजी द्वारा चले जा रहे विशेष दांव के कारण है। वित्त पंूजी के इस संकट से निकलने में विफल रहने के कारण इसके बोझ को विकासशील देशों, विशेषकर उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं और उनके लोगों पर डाल रही है। युद्ध और तनाव थोपे जा रहे हैं, ना केवल प्राकृतिक संसाधनों पर उनका नियंत्रण बनाये रखने के लिए बल्कि युद्ध उद्योग को पुनर्जीवित करने के लिए, विशेषकर सेना और उद्योग गठजोड़ के लिए। दुनिया फासिवादी हमले के गंभीर खतरे का सामना कर रही है और वित्त पंूजी अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए और अपने मुनाफे को बढ़ाने के लिए और प्राकृतिक संसाधनों की लूट के लिए किसी भी हद तक जा सकती है।
घरेलू स्तर पर भी कारपोरेट पंूजी, दक्षिणपंथी विचारधारा और फासीवादी रूझानों वाली सांप्रदायिकता के निकृष्तम रूप वाली नरेन्द्र मोदी सरकार के आने के कारण देश एक बेहद कठिन दौर से गुजर रहा है। सत्ता में आने का इसका इस महीने एक साल पूरा होने वाला है। इस छोटे से समय में ही यह सरकार आपना सामाजिक और आर्थिक चेहरा पूरी तरह बेनकाब करवा चुकी है। पिछली सरकार की तरह ही यह सरकार भी पूरी तरह से आर्थिक नव उदारवाद को लागू करने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। जैसे कारपोरेट पंूजी ने उसे सत्ता में लाने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाया तो मोदी सरकार भी बेशर्मी और नंगई से बचे हुए नव उदारवाद के एजेंडे को ‘‘सुधार प्रक्रिया‘‘ के नाम पर आगे बढ़ा रही है। इसमें प्रत्येक संभावित छूट की बारिश कारपोरेट घरानों और बहुराष्ट्रीय निगमों पर की गई है और मजदूर वर्ग द्वारा लड़ कर हासिल किये गए अधिकारों को कुचलने के लिए एक के बाद एक कानून बनाये जा रहे हैं। यह स्पष्ट है कि “श्रम सुधार“ इसके लिए सरकार का अर्थ केवल पंूजीपतियों को मजबूत करके श्रमिकों के अधिकारों को बेदर्दी से खत्म करने और हायर एण्ड फायर की नीति को थोपने से है।
इसके साथ ही, इसने साफ कर दिया है कि उसमें जनता के जनवादी अधिकारों और जनवादी व्यवस्था के प्रति कोई सम्मान नही है।
संसदीय जनवाद को सोची समझी योजना के तहत अपमानित किया जा रहा है। सरकार अपना आर्थिक एजेंड़ा आगे बढ़ाने के लिए अध्यादेश राज की राह पकड़ रही है। इसके अलावा जनता को अधिकार प्रदान करने वाले कुछ कानून भी संशोधन की सूची में हैं। सूचना का अधिकार अधिनियम और व्हिसिल ब्लोअर की सुरक्षा का कानून विशेषकर इस हिट लिस्ट में हैं। यह भ्रष्टाचार की सुरक्षा करने के लिए भी है।
जनता पर नए आर्थिक बोझ लादे जा रहे हैं। अनिवार्य वस्तुओं के दाम विशेषकर खाद्य वस्तुएं जिसमें अनाज और दालें शामिल हैं नई सरकार के तहत आसमान छू रहे हैं। सरकार को जनता की दुर्दशा की कम ही चिंता है। यह अच्छे दिन सब इनके अपने लोगों के हैं। इसे सुनियोजित तरीके से किया जा रहा जाति और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण दोगुना कर रहा है। मोदी-अमित शाह की जोड़ी द्वारा किया जा रहा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण केवल राजनीतिक रणनीति के आधार पर ही नही है बल्कि इसे जनता का ध्यान उनकी वास्तविक सामाजिक आर्थिक समस्याओं से हटाने के लिए भी किया जा रहा है। एक प्रभुत्ववादी मनोदशा के मुखिया वाली सरकार देश को एक फासीवादी सत्ता को सुपूर्द करने के लिए इन सभी आर्थिक, सामाजिक और सांप्रदायिक हालात को पका रही है।
इन परिस्थितियों में एक अनेकों सर वाले राक्षस का कोई एक पहलू लेने का कोई उपयोग नही होगा। खतरे को संपूर्णता में देखा जाना चाहिए और उससे समग्रता में लड़ा जाना चाहिए। जब सांप्रदायिकता के खिलाफ और धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के लिए एक संभावित एकता की कोशिश कर रहे हैं, हमें जनता को लामबंद करके वैकल्पिक नीतियों के लिए लड़ने के लिए सड़कों पर लाना होगा। इन दोनों को साथ लेकर ही सभी पंूजीवादी राजनीतिक दलों और बुनियादी रूप से उनके नव उदारवाद नीतियों के प्रति प्रतिबद्धता का विकल्प बनाने के लिए जनता को जागरूक बनाने की आवश्यकता है। एक वाम जनवादी विकल्प बनाने का यही रास्ता है जोकि फासीवादी कब्जे के खतरे को विफल करेगा।
(”मुक्ति संघर्ष“ का सम्पादकीय)
गुरुवार, 7 मई 2015
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सोंख और शामली की घटनाओं पर भाकपा ने राज्य सरकार की आलोचना की
लखनऊ 7 मई। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने आरोप लगाया है कि सोंख (मथुरा) और शामली में कानून-व्यवस्था के मामलों को हल न करने के कारण उन्होंने उग्र रूप ले लिया और यह घटनायें साम्प्रदायिकता का रूप लेते लेते बचीं। भाकपा ने इसके लिए राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन की लापरवाही और निष्क्रियता को जिम्मेदार ठहराया है।
यहां जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि सोंख में गत एक सप्ताह से एक मामले को लेकर तनाव व्याप्त था और उसकी खबरें समाचार पत्रों में भी लगातार आ रहीं थीं। इसी तरह शामली में जमातियों पर हुए हमलों के बाद तनाव पैदा हो गया था। लेकिन स्थानीय प्रशासन और राज्य सरकार ने अपरिहार्य कदम नहीं उठाये। शामली में तो सपा के विधायक ही लोगों को भड़काने में अगुआ थे। सरकार, प्रशासन और शासक पार्टी की वजहों से इन स्थानों पर तनाव पैदा हुआ और उन्होंने आपसी मुठभेड़ों का रूप ले लिया। अगर समय रहते जरूरी प्रशासनिक कदम उठाये गये होते तो शायद यह वारदातें नहीं हो पातीं।
भाकपा ने इस बात पर गहरी चिन्ता व्यक्त की है कि इन छोटी-छोटी वारदातों का लाभ साम्प्रदायिक शक्तियां और दूसरे निहित स्वार्थी तत्व बड़े पैमाने पर साम्प्रदायिकता भड़काने को उठा सकते हैं जैसाकि उन्होंने लोक सभा चुनावों के पहले किया था। अतएव भाकपा राज्य सरकार से मांग करती है कि ऐसे मामलों में ठोस राजनैतिक पहल और प्रशासनिक कार्यवाही करने की आदत डाले वरना उत्तर प्रदेश की शान्ति और सौहार्द को ठेस पहुंच सकती है।
कार्यालय सचिव
शनिवार, 2 मई 2015
at 10:29 am | 0 comments |
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की 21वीं कांग्रेस (विशाखापट्नम) के उद्घाटन सत्र में 14 अप्रैल को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव एस. सुधाकर रेड्डी का भाषण
सर्वप्रथम मैं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, जिसकी 22वीं पार्टी कांग्रेस हाल ही में पुडुचेरी में हुई, की नवनिर्वाचित राष्ट्रीय परिषद की तरफ से आप सबका अभिनंदन करता हूं। मजदूर वर्ग के संघर्षों के गौरवपूर्ण इतिहास वाले, ऐतिहासिक बन्दरगाह शहर विशाखापट्नम में यहां आपकी कांग्रेस के उद्घाटन सत्र में हिस्सा लेने के लिए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को दिए गए आमंत्रण के लिए मैं आपकी पार्टी, हमारे देश में सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो सदस्यों को धन्यवाद करता हूं।
पटना में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की 21वीं कांग्रेस के बाद से, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर पिछले तीन सालों की सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक स्थिति पर गंभीर विचार-विमर्श एवं गहन विश्लेषण से ताजा-ताजा आते हुए, मैं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की तरफ से इस तथ्य को रेखांकित करना चाहता हूं कि हमारे देश के हाल के राजनीतिक घटनाचक्र ने हमारे देश और जनता को दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादी सांप्रदायिक एवं फूटपरस्त ताकतों के चंगुल से बचाने की जिम्मेदारी हमको सौंपी है। हमारी पार्टी कांग्रेस विश्व पूंजीवाद के गहरे संकट और हमारे देश में दक्षिणपंथी प्रतिक्रिया के सत्ता में आ जाने की पृष्ठभूमि में हो रही है।
यह एक हकीकत है कि 2014 में हुए आम चुनावों के बाद भारत की संसद में कम्युनिस्ट पार्टियों का प्रतिनिधित्व अत्यंत कम हो गया है। यद्यपि हम यह महसूस करते हैं कि यह एक गंभीर चुनावी विफलता है परंतु भारत की जनता ने कम्युनिस्टों को अस्वीकार नहीं किया है। इसके बजाय, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व में पूरी तरह बदनाम तत्कालीन यूपीए-2 सरकार के विकल्प के संघर्ष में जनता ने उस समय उपलबध एक मात्र विकल्प अर्थात भाजपा और उसके गठगंधन एनडीए का विकल्प चुना इस उम्मीद के साथ कि एक बार जब वे सत्ता में आ जाएंगे तो हालात में बेहतरी की दिशा में बदलाव होगा।
उनकी उम्मीदों के साथ विश्वासघात हुआ और हमारे समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष एवं सम्प्रभु गणतंत्र के सामने अभूतपूर्व चुनौतियों के साथ हालात जल्दी ही बदतर हो गए। इस समय हमारी देश की जनता विपत्ति, हताशा की स्थिति में है जो धीरे-धीरे आक्रोश में बदल रही है। जब दिल्ली विधानसभा का जनादेश हाल मे बनी आम आदमी पार्टी के पक्ष में जबरदस्त तरीके से आया तो यह बात अच्छी तरह साबित हो गई। भाजपा विधानसभा में नगण्य से छोटे समूह में घटकर रह गई जबकि कांग्रेस पार्टी का पत्ता साफ हो गया। दिल्ली चुनाव ने साबित किया कियदि हम जनता में विश्वास जगा सकें तो भाजपा और उसकी दक्षिणपंथी राजनीति का प्रतिरोध किया जा सकता है और उसे हराया जा सकता है। वामपंथ को इसके सबक लेने की जरूरत है।
पुडुचेरी में कामरेड सी.के. चन्द्रप्पननगर में होने वाले समूचे विचार-विमर्श में और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की 22वीं कांग्रेस के समापन दिवस पर आम सभा में जो बात गूंज रही थी वह थी और अधिक मजबूत वाम एकता और उसे मजबूत करने का आह्वान। मैं यह बात भी रिकॉर्ड पर रखना चाहताूं कि कामरेड प्रकाश करात समेत भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों के शीर्ष नेताओं की उपस्थिति ने न केवल हमारे डेलीगेटों को बल्कि हमारे शुभचिंतकों एवं वामपंथी आंदोलन के मित्रों को भी अनुप्राणित किया जिन्होंने बाद में हमारे पार्टी मुख्यालय को अपने संदेशों के जरिये इसका वामपंथी एकता, जो जीवन के सभी क्षेत्रों में राष्ट्रीय संकट की इस नाजुक घड़ी में सर्वाधिक आवश्क है, के लिए एक सकारात्मक संकेत के रूप में स्वागत किया।
भूख, बेरोजगारी, अल्परोजगार, लोकतांत्रिक एवं मानव अधिकारों का दमन और पूंजीवाद द्वारा निर्मम शोषण- ये सब आज की कठोर एवं नग्न वास्तविकताएं हैं। पूंजीवाद गहरे संकट में है, विशेषकर अमरीका और यूरोप में। सुपर मुनाफों की इसकी ललक के साथ मुक्त बाजार का नजीता हजारों बैंकों एवं वित्तीय संस्थानों के दिवालियेपन के रूप में निकला, इसके फलस्वरूप बेरोजगारी और बढ़ी, महंगाई अधिक बढ़ी और साथ ही जनता की मुश्किलें-तकलीफें बढ़ी।
संकट के बावजूद, कारपोरेटों और अन्य धनी व्यक्तियों की धन-दौलत बढ़ती जा रही है और अमीर और गरीब के बीच का फासला असामान्य तरीके से बढ़ रहा है। संकट के बोझ को बेरहमी के साथ मेहनमकश लोगों, गरीबों और यहां तक कि वृद्ध आयु के पेंशनयाफ्ता लोगों के ऊपर डाला जा रहा है।
मजदूरों, किसानों और आम आदमी को जिंदा रहने और शालीन जिंदगी गुजराने के बुनियादी अधिकार तक से वंचित कर जनता की कीमत पर अमीर परस्त एजेंडे पर अमल किया जा रहा है। भाजपा नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के पहले पूरे केंद्रीय बजट में शिक्षा, स्वास्थ्य एवं सामाजिक क्षेत्र की स्कीमों के बजट आवंटनों में अत्यंत अमानवीय बड़ी कटौती की घोषणा की गई। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम के तहत ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम को खत्म किया जा रहा है। इस प्रकार ग्रामीण भारती में गरीबों को जो न्यूनतम सरकारी मदद मिल रही थी उसे खत्म किया जा रहा है। सबसे बेरहम हमला किसानों पर संशोधित भूमि अधिग्रहण बिल 2015 के रूप में किया गया; प्रधानमंत्री स्वयं अमीरों, कारपोरेट घरानों और बहुराष्ट्रीय निगमों की तरफ से इस संशोधित बिल को पारित कराने के लिए अपनी पूरी ाकत के साथ लगे हुए हैं।
यही गंभीर हमला है कि जिसके विरूद्ध हमारी पार्टी कंाग्रेस ने 14 मई 2015 को पैशाचिक, किसान विरोधी, राष्ट्र विरोधी भूमि अधिग्रहण संशोधन बिल के विरूद्ध अखिल भारती विरोध दिवस मनाने का फैसला किया है। हमारी पार्टी कंाग्रेस ने आगामी अवधि में एकताबद्ध वामपंथ के झंडे के तले वर्ग संघर्ष छेड़ने का आह्वान किया है। हमारा विश्वास है कि यह दशक वर्ग संघर्षों का दशक होगा। मुझे पक्का विश्वास है कि आपकी पार्टी कांग्रेस वामपंथी एकता और संयुक्त संघषोें के संबंध में विचार करेगी। आइए, वर्तमान एनडीए सरकार ने जो चुनौतियां पेश की हैं, क्रांतिकारी पार्टियां होने के नाते उन्हें नाकाम करने के लिए हर संभव कोशिश करेें।
आइए, हम अपने आपको आश्वस्त करें कि हमने सब कुछ नहीं खो दिया है। अंतर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट एवं वर्कर्स पार्टियों के परिवार का हिस्सा होने के नाते हमें यूरोप में महान संघषों के जरिये कम्युनिस्ट पार्टियों के पुनः प्रादुर्भाव के संकेतों पर गर्व होना चाहिए। जनता नव-साम्राज्यवादी ताकतों के एक धु्रवीय, तानाशाही भरे तरीकों को चुनौती े रही है। जहां कहीं भी वामंपथ में कुछ ताकत है जबरदस्त हड़तालें और प्रदर्शन हो रहे हैं। ग्रहस में हाल के चुनावों ने यूरोपीय संघ और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष को एक झटका दिया है।
किफायतशारी के जिन कदमों ने मेहनतकश तबकों की जिंदगी में तबाही ढायी उनके विरूद्ध ग्रीस की जनता के दृढ़ संकल्प से निश्चय ही यूरोप के लोगों को यूरोपीय संघ द्वारा आम आदमी पर किये जाने वाले हमलों के विरूद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा मिलेगी। रूस, जापान और नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टी की ताकत में वृद्धि को संतोष के साथ नोट किया जाना चाहिए। लैटिन अमेरिका में वामपंथी एवं समाजवादी ताकतों की बढ़ती मजबूती और अमेरिका द्वारा यह स्वीकार करना कि क्यूबा के विरूद्ध उसकी पुरानी पड़ी नाकेबंदी एक विफलता थी- ये बातों क्यूबा और लैटिन अमेरिका की ऐहिासिक जीतें हैं। इसी प्रकार बसंत क्रांति अमेरिकी सरकार की उन कठपुतली सरकारों के विरूद्ध अरब के आम लोगों के आक्रोा की अभिव्यक्ति है जो भ्रष्टाचारी और तानाशाही किस्म की है, यद्यपि फिलहाल वह कमजोर पड़ गई है। यह एक ज्वालामुखी है जो कभी भी फिर से फूट सकता है। जनता के विभिन्न समुदायों के बीच गृहयुद्ध छेड़ने के लिए साम्राज्यवादी ताकतें अंध-उन्मादग्रस्त इस्लामिक कट्टरपंथी ताकतों की मदद कर रही है ताकि आम लोगों का ध्यान मुख्यधारा संघर्षों से डायवर्ट हो जाए। साम्राज्यवादी ताकतों द्वारा आईएसआईएस आतंकवादियों को जबरदस्त तरीके से हथियाबंद किया गया जिसका नतीजा भयंकर खून-खराबे और हजारों मासूम लोगों की मौत के रूप में सामने आ रहा है।
हमारे देश में 28 करोड़ लोग घनघोर गरीबी के शिकार हैं और अत्यंत दयनीय हालत में जिंदगी गुजार रहे हैं जबकि 68। परिवार या कारपोरेट घराने हमारी राष्ट्रीय धन-दौलत के 25 प्रतिशत हिस्से को लूट रहे हैं। किसाल बदहाल है; विदर्भ, तेलंगाना, कर्नाटक एवं अन्य स्थानों पर कर्ज के जाल से बचने के लिए आत्महत्या कर रहे हैं। सरकार इन तथ्यों को स्वीकार करने से इंकार करती है।
एक तरफ, सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार हमेशा की तरह बढ़ रहा है, प्रधानमंत्री के कामकाज की शैली तानाशाह, गोपनीय एवं व्यक्तिवादी किस्म की है। दूसरी तरफ, हिन्दुत्ववादी ताकतें “घरवापसी” - जो धर्मांतरण की एक किस्म है- के नाम पर अल्पसंख्यक विरोधी आतंक अभियान छेड़ रही है। ईसाई चर्चों पर दिल्ली एवं अन्य स्थानों पर हमले किए जा रहे हैं, उनमें तोड़-फोड़ की जा रही है। संघ परिवार के मार्ग दर्शन में सांस्कृतिक आतंकवाद पर आचरण किया जा रहा है। ऐतिहासिक पुस्तकों को जलाने का आह्वान, उनकी सनक के अनुसार उनका पुनर्लेखन, वैज्ञानिक मनोवृति, कलाकारों एवं लेखकों पर हमले जैसी घटनाएं अधिकाधिक शुरू की जा रही है। महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलनों के अन्य नेताओं की छवि को उनक स्थान पर गोडसेपंथ को लाने के लिए बिगाड़ा जा रहा है।
देश के प्रमुख मुद्दों से जनता का ध्यान डायवर्ट करने के लिए तनाव एवं भय मनोवृत्ति पैदा करने के लिए देश को धार्मिक लाइनों पर बांटने की तमाम कोशिशें की जा रही हैं, असहिष्णुता एवं घृणा में वृद्धि हो रही है। हमारी पार्टी के वरिष्ठ नेता और दक्षिणपंथी ताकतों के विरूद्ध अनथक योद्ध एवं कामरेड गोविन्द पानसरे सांप्रदायिकता के विरूद्ध और वैज्ञानिक मनोवृत्ति के प्रसार के लिए अपने निरंतर संघर्ष में भाजपा के सत्ता में आने के बाद पहले शहीद बन गए हैं।
परंतु जन विरोधी आर्थिक नीतियों और सांप्रदायिकता की गंदी चालों के विरूद्ध जनता आवाज बुलंद कर रही है। तमाम केंद्रीय टेªड यूनियन संगठनों द्वारा कोयला हड़ताल, बैंक हड़ताल, पोस्टल डिपार्टमेंट कर्मचारियों की हड़ताल, केंद्र सरकार के कर्मचारियों की प्रस्तावित हड़ताल, केंद्रीय टेªड यूनियनों द्वारा राष्ट्रव्यापी आंदोलन, किसान संघर्ष- ये इसका हिस्सा है।
हमारे महान देश की एकता को बचाने के लिए धर्मनिरपेक्षता की हर कीमत पर रक्षा करनी होगी। लोकतंत्र की रक्षा की जानी है। अमीर और ताकतवर लोगों के हमले ने मेहनतकश लोगों के कठिन संघर्षों के बाद प्राप्त अधिकारों को छीन लिया है। इन अधिकारों को वापस हासिल करना है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा की जानी चाहिए।
हमारी पार्टी कांग्रेस ने रेखांकित किया है कि इस कठिन लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए हमें जनता का विश्वास हासिल करने की जरूरत है। हम जिस व्यापक वामपंथी लोकतांत्रिक एकता को हासिल करना चाहते हैं उसके लिए वामपंथी एकता पूर्व शर्त है। आइए, एकताबद्ध हों और जनता में विश्वास पैदा करे। आइए, अपने आधारों को मजबूत बनाएं। आइए, जनता के मुद्दों पर और उनसे फिर से जुड़ने के लिए वर्ग संघर्ष छेड़ें।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का विश्वास है कि हमारा देश आज जिस मुश्किल स्थिति का सामना कर रहा है वामपंथ उस पर अवश्य पार पायेगा और एकताबद्ध होकर आत्मविश्वास एवं साहस के साथ आगे बढ़ेगा। वामपंथ ही अकेला है जो हमारे लेखकों, इतिहासकारों, कलाकारों, धार्मिक एवं भाषायी अल्पसंख्यकों, आदिवासी किसानों एवं मेहनतकश लोगों के तमाम हिस्सों की रक्षा कर सकता है जो बड़ी उम्मीद की नजरों से वामपंथी की तरफ देख रहे हैं।
प्रिय कामरेडों, पश्चिम बंगाल में भाकपा (मा) तृणमूल कांग्रेस के गुंडों का सबसे बड़ा निशाना बन गई है जिसके फलस्वरूप अनेक हत्याएं, हमले, भाकपा (मा) दफ्तरों को जलाने की घटनाएं हो रही हैं। भाकपा (मा) और वामपंथ इस आतंक के विरूद्ध और नागरिक एवं लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली के लिए संघर्ष कर रहे हैं। लोकतंत्र के लिए इस संघर्ष में हम आपके साथ हैं। हम अपने समर्थन एवं एकजुटता का भरोसा दिलाते हैं। पश्चिम बंगाल में हमें भाजपा और तृणमूल कांग्रेस दोनों के विरूद्ध संघर्ष करना है। हमें पक्का विश्वास है कि इन संघर्ष में हमारी जीत होगी।
प्रिय कामरेडों, इन शब्दों के साथ मैं आपकी कांग्रेस की पूर्ण सफलता की कामना करता हूं।
आप सबको लाल सलाम!
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी जिन्दाबाद!
वामपंथ की एकता जिन्दाबाद!
बुधवार, 29 अप्रैल 2015
at 2:39 pm | 0 comments |
हाशिमपुरा कांड: उच्च न्यायालय की देखरेख में विशेष जाँच दल से करे जाये जाँच.
लखनऊ- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने हाशिमपुरा कांड की उच्च न्यायालय की निगरानी में विशेष जाँच दल द्वारा जाँच कराने की अपनी मांग को पुनः दोहराया है और कहा है कि राज्य सरकार द्वारा उच्च न्यायालय में अपील करने मात्र से कुछ भी हल निकलने वाला नहीं है.
कुछ समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचार कि हाशिमपुरा कांड पर निरंतर आलोचना झेल रही सरकार ने अब उच्च न्यायालय में अपील करने का निर्णय लिया है; पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुये भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि सरकार का यह कदम मामले पर लीपा- पोती करने वाला साबित होगा. भाकपा इसे कदापि स्वीकार नहीं करेगी.
भाकपा का स्पष्ट मानना है कि जब जाँच एजेंसियों ने २७ साल के दरम्यान सही तथ्य व गवाह अदालत के सामने नहीं पेश किये और इस आधार पर आरोपियों को बरी कर दिया गया, उन्हीं तथ्यों, उन्हीं सबूतों तथा उसी मनोदशा के साथ किसी भी अदालत में जाया जाये नतीजा क्या निकलेगा?
इसलिए जरूरी है कि मामले की फिर से जाँच कराके पर्याप्त सबूत और गवाहियाँ कराना जरूरी है. यह तभी संभव है जब मामले की जाँच माननीय उच्च न्यायालय की निगरानी में विशेष जाँच दल से कराई जाये.
डा. गिरीश ने कहा कि भाकपा अपनी इस मांग पर अडिग है और इसको लेकर प्रदेश व्यापी अभियान चलाएगी.
डा. गिरीश
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मंगलवार, 28 अप्रैल 2015
at 12:10 pm | 0 comments |
भूकंप पीड़ितों की हर संभव सहायता करेगी भाकपा
लखनऊ-भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने भारत और नेपाल में भूकंप से हुयी तबाही पर गहरा दुःख जताया है. पार्टी ने इस त्रासदी में मृतकों और घायलों के प्रति गहरी संवेदनाओं का इजहार किया है तथा बड़े पैमाने पर हुयी तबाही पर गहरी चिंता व्यक्त की है. भाकपा ने उत्तर प्रदेश में अपनी समस्त जिला इकाइयों से अनुरोध किया है कि वे संकट की इस घड़ी में नेपाल की हर संभव मदद करने को आगे आयें और जरूरी चीजें और फंड एकत्रित कर जल्द से जल्द राज्य कार्यालय को भेजें ताकि उसे शीघ्र से शीघ्र नेपाल पहुँचाया जा सके.
यहाँ जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि गत दिनों आये प्रचंड भूकंप से भारत और निकट पड़ौसी राज्य नेपाल में भारी जन और धन की हानि हुयी है. नेपाल में जहाँ मृतकों की संख्या दस हजार तक पहुँचने का अनुमान है वहीं लाखों लोग घायल हैं. हर तीसरा आदमी बेघर हुआ है. निर्माणाधीन और चालू तमाम योजनायें ध्वस्त होचुकी हैं. टूरिस्म पर वर्षों के लिए ग्रहण लग गया है. ऐसे में नेपाल को हर स्तर पर भारी मदद की दरकार है.
अच्छी बात है कि भारत- चीन जैसे पड़ौसी देशों और अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी ने हर तरह की मदद के लिए हाथ बढाया है. लेकिन बार बार आरहे भूकंप के झटकों और वारिश ने विपत्ति को गहरा बना रखा है.
भाकपा और समस्त भारतीय जनमानस संकट की इस घड़ी में नेपाल की जनता के साथ है, और नेपाल के नव निर्माण में हर तरह की मदद की जायेगी. इस मदद में हाथ बंटाने में भाकपा पीछे नहीं रहने वाली है. अतएव भाकपा ने अपनी समस्त जिला इकाइयों से आग्रह किया है कि वे नेपाल की जनता की सहायतार्थ तत्काल धन एवं आवश्यक वस्तुओं के संग्रह में जुट जाएँ और शीघ्र से शीघ्र उसे राज्य कार्यालय को प्रेषित करें. भाकपा अपने सभी सहयोगियों से भी अपील करती है कि भाकपा के इस मिशन में ह्रदय से सहयोग करें.
डा. गिरीश
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गुरुवार, 23 अप्रैल 2015
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किसानो! भागो नहीं, परिस्थितियों का मुकाबला करो: भाकपा
लखनऊ- २३ अप्रैल २०१५. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने कल ‘आप’ की रैली के दौरान एक किसान द्वारा की गयी आत्महत्या, प्रतिदिन देश भर में सैकड़ों की तादाद में होरही किसानों की आत्महत्याओं और सदमे से होरही मौतों को अत्यंत दुखद और असहनीय बताया है.
यहाँ जारी एक प्रेस बयान में पार्टी के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि आजादी के बाद यह पहला अवसर है जब राजधानी दिल्ली में किसी किसान ने अपनी आपदा से पीड़ित होकर सरेआम अपनी जान दी हो और प्रशासनिक मशीनरी और राजनीतिक लोग तमाशबीन बने रहे हों. आजादी के बाद यह भी पहला अवसर है जब देश के बड़े हिस्से में किसान जानें देरहे हैं और उनकी सदमे से जानें जारही हैं और पूरी की पूरी व्यवस्था उन्हें ढाढस बंधाने में नाकामयाब रही है.
डा.गिरीश ने कहा कि यह वक्त राजनैतिक रोटियां सैंकने का नहीं ठोस प्रयास करने का है. यदि शीघ्र ही समस्या का ठोस समाधान न निकाला गया तो हालात और भी बिगड़ेंगे. अभी तो किसान ही संकट में है, खाद्यान्नों और रोजगार का संकट पैदा होने से अन्य गरीब तबके भी इन्ही हालातों में पहुंचने जारहे हैं.
भाकपा ने किसान भाइयों से अपील की है कि वे धैर्य न छोड़ें और अपने परिवार और देश के हित में अपनी जानों को यूं ही न गवायें. भाकपा उनके सुख दुःख में उनके साथ खड़ी है और साथ खड़ी रहेगी. किसानों की इस व्यापक पीड़ा की ओर सरकार और व्यवस्था का ध्यान खींचने को ही भाकपा ने पूरे देश में १४ मई को किसानों के प्रति एकजुटता आन्दोलन का निर्णय लिया है. उत्तर प्रदेश में यह आन्दोलन ‘रास्ता रोको’ के रूप में होगा.
डा.गिरीश ने भाकपा के समस्त कार्यकर्ताओं और हमदर्दों से अनुरोध किया है कि ग्रामीण जीवन में आई इस महाविपत्ति की घडी में वे अपना हर पल हर क्षण ग्रामीण जनता के बीच बितायें और आमजनों को “भागो नहीं, समस्या का मुकाबला करो” का संदेश दें. साथ ही १४ मई के आन्दोलन के लिए किसानों कामगारों को लामबंद करें.
डा.गिरीश
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किसानो! भागो नहीं, परिस्थितियों का मुकाबला करो: भाकपा
किसानों की लगातार होरहीं आत्महत्याएं और सदमे से मौतें बेहद दुखद: ठोस प्रयासों की जरूरत, राजनीतिक रोटियां न सैंकें पार्टियाँ- भाकपा
लखनऊ- २३ अप्रैल २०१५. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने कल ‘आप’ की रैली के दौरान एक किसान द्वारा की गयी आत्महत्या, प्रतिदिन देश भर में सैकड़ों की तादाद में होरही किसानों की आत्महत्याओं और सदमे से होरही मौतों को अत्यंत दुखद और असहनीय बताया है.
यहाँ जारी एक प्रेस बयान में पार्टी के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि आजादी के बाद यह पहला अवसर है जब राजधानी दिल्ली में किसी किसान ने अपनी आपदा से पीड़ित होकर सरेआम अपनी जान दी हो और प्रशासनिक मशीनरी और राजनीतिक लोग तमाशबीन बने रहे हों. आजादी के बाद यह भी पहला अवसर है जब देश के बड़े हिस्से में किसान जानें देरहे हैं और उनकी सदमे से जानें जारही हैं और पूरी की पूरी व्यवस्था उन्हें ढाढस बंधाने में नाकामयाब रही है.
डा.गिरीश ने कहा कि यह वक्त राजनैतिक रोटियां सैंकने का नहीं ठोस प्रयास करने का है. यदि शीघ्र ही समस्या का ठोस समाधान न निकाला गया तो हालात और भी बिगड़ेंगे. अभी तो किसान ही संकट में है, खाद्यान्नों और रोजगार का संकट पैदा होने से अन्य गरीब तबके भी इन्ही हालातों में पहुंचने जारहे हैं.
भाकपा ने किसान भाइयों से अपील की है कि वे धैर्य न छोड़ें और अपने परिवार और देश के हित में अपनी जानों को यूं ही न गवायें. भाकपा उनके सुख दुःख में उनके साथ खड़ी है और साथ खड़ी रहेगी. किसानों की इस व्यापक पीड़ा की ओर सरकार और व्यवस्था का ध्यान खींचने को ही भाकपा ने पूरे देश में १४ मई को किसानों के प्रति एकजुटता आन्दोलन का निर्णय लिया है. उत्तर प्रदेश में यह आन्दोलन ‘रास्ता रोको’ के रूप में होगा.
डा.गिरीश ने भाकपा के समस्त कार्यकर्ताओं और हमदर्दों से अनुरोध किया है कि ग्रामीण जीवन में आई इस महाविपत्ति की घडी में वे अपना हर पल हर क्षण ग्रामीण जनता के बीच बितायें और आमजनों को “भागो नहीं, समस्या का मुकाबला करो” का संदेश दें. साथ ही १४ मई के आन्दोलन के लिए किसानों कामगारों को लामबंद करें.
डा.गिरीश
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सोमवार, 20 अप्रैल 2015
at 5:50 pm | 0 comments | नई राज्य कार्यकारिणी, भाकपा
भाकपा की नई राज्य कार्यकारिणी गठित
लखनऊ 20 अप्रैल। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य कौंसिल ने कल यहां सम्पन्न अपनी बैठक में 25 सदस्यीय नई राज्य कार्यकारिणी गठित कर दी जिसमें डा. गिरीश (राज्य सचिव), अरविन्द राज स्वरूप एवं इम्तियाज अहमद, पूर्व विधायक (दोनों राज्य सह सचिव), आशा मिश्रा, सदरूद्दीन राना, अजय सिंह एवं अतुल सिंह (चारों राज्य सचिवमंडल के सदस्य), अशोक मिश्र, विश्व नाथ शास्त्री, पूर्व सांसद, प्रदीप तिवारी (कोषाध्यक्ष), सुरेश चन्द्र त्रिपाठी, दीनानाथ सिंह, हामिद अली, विनोद कुमार राय, शिरोमणि राजपूत, गफ्फार अब्बास, विजय कुमार, जय प्रकाश सिंह, राम रक्षा, सुधीर अवस्थी, नसीम अंसारी, राजेश तिवारी, सुहेव शेरवानी, मोती लाल तथा फूल चन्द्र यादव शामिल हैं।
भाकपा राज्य कौंसिल ने जव्वार हुसैन, वाई. एस. लोहित, जगदीश पाण्डेय, हरि मंदिर पाण्डेय एवं जय राम सिंह, पूर्व विधायक को राज्य कौंसिल का स्थाई आमंत्रित सदस्य नामांकित किया है। इसके साथ ही कैलाश पाठक के नेतृत्व में एक तीन सदस्यीय आडिट कमीशन का भी गठन किया गया जिसके अन्य सदस्य हैं - राम अवतार सिंह तथा कान्ती मिश्रा।
कार्यालय सचिव
रविवार, 19 अप्रैल 2015
मोदी सरकार के भूमि अधिग्रहण का सच
किसानों की जमीन छीन कर पूंजीपतियों को सौंपने पर आमादा मोदी सरकार
14 मई को देशव्यापी विरोध
उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर रास्ता रोको
बहनों एवं भाईयों,
किसानों के निरन्तर आन्दोलनों और बलिदानों के कारण 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून को 2013 में संसद में सर्वसम्मति से बदला गया था।
बदले कानून में सुनिश्चित किया गया था:
- जमीन के मालिक किसानों से उनकी रज़ामंदी के बिना जमीन नहीं ली जा सकेगी और जमीन लेने का क्या सामाजिक प्रभाव पड़ेगा, उसका भी पहले आकलन किया जायेगा।
- किसान को अपनी जमीन के बेहतर मुआवजे के लिए मोल-तोल का अधिकार मिले, उसकी कोई मजबूरी न हो तथा उसका मुआवजा एडवांस में दिया जाये।
- पूरे मुआवजे के भुगतान के बाद और पुनर्वास एवं पुनः व्यवस्थापन के पूरे इंतजाम के बाद ही जमीन पर कब्जा लिया जाये।
- किसानों और पंचायतों की रज़ामंदी के बिना जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू नहीं की जायेगी।
- बहुफसली और सिंचित जमीन का अधिग्रहण नहीं होगा।
- अधिग्रहण की प्रक्रिया के पहले किसानों, आजीविका के लिए निर्भर अन्य लोगों एवं समुदाय पर पड़ने वाले सामाजिक प्रभाव का आकलन किया जायेगा।
- सभी विस्थापित परिवारों को पहले से बेहतर जीवन स्तर सुनिश्चित किया जायेगा।
मोदी सरकार किसानों के इन अधिकारों को छीन कर जमीन को पूंजीपतियों को देना चाहती है। उसने लोकशाही की सारी परम्पराओं को त्याग कर 3 अप्रैल 2015 को पुनः अध्यादेश जारी करके अपने किसान विरोधी इरादों का पुनः परिचय दिया है।
सरकार का यह दावा झूठ और मिथ्यापूर्ण प्रचार है कि विकास कार्य क्योंकि रूके पड़े हैं, इसलिए कानून में संशोधन के लिए अध्यादेश लाना जरूरी है।
दरअसल अध्यादेश का मतलब किसानों से रज़ामंदी के बिना और बिना सामाजिक प्रभाव का आकलन किये जमीनों को किसानों से छीनना है जबकि 2013 का कानून सुनिश्चित करता है कि जिन लोगों से जमीन ली जानी है, उनके 70 प्रतिशत लोग अपनी रज़ामंदी दें और यदि जमीन किसी निजी कम्पनी के लिए ली जा रही है तो उसके लिए 80 प्रतिशत लोगों की रज़ामंदी होनी चाहिए।
सरकारी दावा इससे और भी झूठा साबित हो जाता है कि वर्ष 2013 तक सरकार बड़े पैमाने पर जमीन का अंधाधुंध अधिग्रहण करती रही है। हालत यह है कि बड़ी मात्रा में अधिगृहीत जमीन का कोई इस्तेमाल नहीं हो रहा है। बड़ी मात्रा में भूमि को कारपोरेट भूमाफिया ने हड़प लिया है जो उसे विकास के लिए इस्तेमाल करने के बजाय बढ़े दामों पर बेचकर पैसा कमा रहे हैं।
कैग (नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) की रिपोर्ट दिनांक 28 नवम्बर 2014 के अनुसार विशेष आर्थिक परियोजनाओं के लिए ली गई 45,635.63 हेक्टेयर जमीन में से केवल 28,488.49 हेक्टेयर जमीन का ही इस्तेमाल हुआ है। गुजरात में स्वीकृत 50 विशेष आर्थिक क्षेत्रों में से केवल 15 ही आपरेशनल हैं। वहां प्रधानमंत्री के चहेते अडानी को 2009 में 6,472.86 हेक्टेयर जमीन दी गई जिसमें से 87.11 प्रतिशत जमीन का कोई इस्तेमाल नहीं किया गया है। कैग ने रिलायंस, एस्सार, डीएलएफ, यूनीटेक्स आदि डेवलपरों को फटकार लगाते हुए कहा है कि इन्होंने विशेष आर्थिक क्षेत्रों की स्थापना के नाम पर बड़ी मात्रा में जमीनें हथिया ली हैं परन्तु केवल एक मामूली हिस्से का ही इस्तेमाल किया गया है। मुकेश अंबानी ने महाराष्ट्र के द्रोणगिरि में 1,250 हेक्टेयर जमीन ली परन्तु वहां 2006 से अब तक एक भी कारखाना स्थापित नहीं किया गया है। कैग ने स्पष्ट कहा है - ”सरकार द्वारा किसानों से जमीन का अधिग्रहण ग्रामीण आबादी से कारपोरेट जगत को दौलत का हस्तांतरण साबित हो रहा है।“
वास्तविकता, मोदी सरकार के तमाम दावों को खोखला और मिथ्या साबित करती है। वास्तव में मोदी सरकार कारपोरेट घरानों, धन्नासेठों तथा पूंजीपतियों को जमीनें देने और किसानों को बेसहारा करने के लिए ही यह झूठी और खोखली दलीलें देकर देश की जनता की आंख में धूल झोकना चाहती है।
किसान भाईयों,
18 औद्योगिक गलियारों के लिए मोदी सरकार के प्रस्तावों के द्वारा खेती योग्य भूमि का 35 प्रतिशत से भी अधिक हिस्सा आ जायेगा जिससे हजारों गांव लुप्त हो जायेंगे और करोड़ों लोगों को रोजी-रोटी छीनने का रास्ता साफ हो जायेगा। उसके कारण बड़े पैमाने पर सामाजिक विघटन और सामाजिक अराजकता पैदा हो जायेगी।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई किसानों, खेत मजदूरों, ट्रेड यूनियनों, नागरिक समाज एवं आम जनता का आह्वान करती है कि मोदी सरकार के घृणित मंसूबों को नाकाम करने के लिए बड़े पैमाने पर 14 मई 2015 को ”रास्ता रोको“ कार्यक्रम को सफल बना कर किसान एवं देश विरोधी अध्यादेश का विरोध करें।
भाकपा मनायेगी डा. अम्बेडकर की 125वीं जयंती
भाकपा की स्थापना के 90 साल पूरे होने पर कानपुर में आयोजित होगा राष्ट्रीय समारोह
लखनऊ 19 अप्रैल। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की यहां चल रही राज्य कौंसिल ने डा. भीम रॉव अम्बेडकर के जन्म के 125 साल पूरे होने के अवसर पर पूरे साल पूरे प्रदेश में डा. अम्बेडकर की स्मृति में समारोह आयोजित करने का फैसला किया है। भाकपा राज्य कौंसिल ने इसके हेतु मोती लाल एडवोकेट के संयोजकत्व में एक संचालन समिति गठित कर दी है जो पूरे साल जगह-जगह पर आयोजनों की रूपरेखा तैयार करेगी, जिला नेतृत्व का मार्गदर्शन करेगी और आयोजनों की देखरेख करेगी।
भाकपा की स्थापना के 90 साल 26 दिसम्बर 2015 को पूरे होने पर कानपुर में एक राष्ट्रीय स्तर का कार्यक्रम आयोजित किया जायेगा। ज्ञातव्य हो कि भाकपा का स्थापना सम्मेलन 26 दिसम्बर 1925 को कानपुर में ही आयोजित किया गया था। भाकपा राज्य कौंसिल ने अपनी जिला कौंसिलों तथा ब्रांचों को निर्देश दिया है कि वे इस अखिल भारतीय आयोजन के पूर्व पूरे प्रदेश में राज्य केन्द्र से लेकर ब्रांचों तक पार्टी संगठन को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ें।
भाकपा ने 14 मई को भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को वापस कराने और मौसम की मार से तबाह हुए किसानों एवं खेतिहर मजदूरों को व्यापक आर्थिक राहत दिलाने के लिए हेतु पूरे प्रदेश में “रास्ता रोको“ आन्दोलन को संगठित करने के पूर्व 1 से 13 मई तक लगातार जनता के मध्य जाकर केन्द्र एवं राज्य सरकारों की आर्थिक नीतियों का सच जनता के सामने रख कर जन लामबंदी अभियान चलायेगी और पार्टी संगठन को मजबूत करने के लिए आम जनता से धन संग्रह करेगी। इस दिशा में आगे बढ़ते हुए भाकपा ने आज मोदी सरकार की भूमि अधिग्रहण नीति के सच को उजागर करने हेतु एक पर्चा जारी किया जिसे पूरे प्रदेश में लाखों की संख्या में छपवा कर जनता के मध्य बांटा जायेगा।
कार्यालय सचिव
शनिवार, 18 अप्रैल 2015
at 6:01 pm | 1 comments |
भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को वापस कराने और मौसम की मार से तबाह हुए किसानों एवं खेतिहर मजदूरों को व्यापक आर्थिक राहत दिलाने के लिए भाकपा 14 मई को पूरे प्रदेश में करेगी व्यापक रास्ता जाम
भाकपा की राज्य
कौंसिल बैठक शुरू
भाकपा राष्ट्रीय
सचिव शमीम फैजी ने जारी किया आन्दोलन का पोस्टर
लखनऊ 18
अप्रैल। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी किसान विरोधी भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को
वापस कराने और मौसम की मार से तबाह हुए किसानों एवं खेतिहर मजदूरों को व्यापक
आर्थिक राहत दिलाने के लिये पूरे प्रदेश में 14 मई को व्यापक रास्ता
जाम करेगी। यहां चल रही भाकपा की राज्य कौंसिल के निर्णय से अवगत कराते हुए भाकपा
के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि रास्ता जाम का कार्यक्रम हर जिले में पार्टी की
कतारें मुस्तैदी से लागू करेंगी।
भाकपा के राष्ट्रीय
सचिव ने इस आन्दोलन का पोस्टर भाकपा की राज्य कौंसिल बैठक के दौरान जारी करते हुए
राज्य कौंसिल सदस्यों का आह्वान किया कि वे जिलों-जिलों में वास्तविक रूप से
रास्ता जाम करने के लिए गंभीर रूप से तैयारी करें।
भाकपा की राज्य
कौंसिल को सम्बोधित करते हुए पार्टी के राष्ट्रीय सचिव शमीम फैजी ने कहा कि जब हम
महंगाई के विरोध करने के लिए आन्दोलन चलाते हैं तो सपा और बसपा जैसे दल भी हमारे
साथ आकर खड़े हो जाते हैं परन्तु यही लोग अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी और क्रोनी
पूंजीवाद की चाकरी करते हुए राज्य सभा में विदेशी पूंजी की अनुमति देने वाला बीमा कानून
पास करवाने के लिए मोदी सरकार के साथ खड़े हो जाते हैं। क्षेत्रीय दलों ने पिछले 25
सालों में अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी और क्रोनी पूंजीवाद की मदद ही की है।
इन्होंने सड़क पर हमारा साथ दिया परन्तु हर बार संसद में हमारी मुखालिफत की। ये सभी
दल नव उदारवाद का चारा बन चुके हैं। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा
ने भी अम्बानी सरीखे तमाम पूंजीपतियों को राज्य सभा में पहुंचाया है।
शमीम फैजी ने कहा कि
देश नाजुक दौर से गुजर रहा है और फासीवाद की ओर जा सकता है। इस खतरे का मुकाबला
करने के लिए इस बार सही कार्यनीति का निर्धारण बहुत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि
हमें पूरी शिद्दत के साथ वैकल्पिक आर्थिक नीतियों की बुनियाद पर विकल्प प्रस्तुत
करने के लिए पार्टी निर्माण की ओर आगे बढ़ना होगा। उन्होंने कहा कि अब नारे बाजी
नहीं बल्कि हमें कम्युनिस्ट आन्दोलन के वैचारिक एकीकरण की राह पर चलना होगा और
जनता में वामपंथी-जनपक्षी विकल्प के प्रति विश्वास पैदा करना होगा। इस सपने को
साकार करने के लिए हमें भाकपा को अपने पैरों पर खड़े करना होगा।
राज्य कौंसिल को
सम्बोधित करते हुए भाकपा के राष्ट्रीय सचिव शमीम फैजी ने कहा कि देश के वर्तमान राजनैतिक
हालात निहायत गंभीर हैं। केन्द्र सरकार की सत्ता में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में
गठित भाजपा की सरकार केवल भाजपा की सरकार मात्र नहीं है बल्कि केन्द्र में वस्तुतः
अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी (International Finance Capital) और क्रोनी पूंजीवाद
(Crony Capitalism) की प्रतिनिधि सरकार सत्ता में है जिन्होंने पिछले लोक
सभा चुनावों को देश की लोक सभा के चुनावों के बजाय मोदी और राहुल की व्यक्तिगत जंग
में तब्दील कर दिया था।
उन्होंने कहा कि
मीडिया द्वारा जिस गुजरात मॉडल के आकर्षण को पैदा किया गया,
उसकी असलियत से जनता अभी तक वाकिफ नहीं है। उन्होंने कहा कि कच्छ के रेगिस्तान
में 1965 तक कोई आबादी नहीं थी और इस इलाके में जनता को बसाने
के इरादे से तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री ने पंजाब से ले
जाकर 200 सिख किसान परिवारों को जमीने आबंटित कर बसा दिया था
जिन्होंने उस इलाके को आबाद कर दिया और उससे उत्साहित होकर पंजाब के 700-800
परिवारों ने उस इलाके में जमीने खरीद कर खेती करना शुरू कर दिया। नरेन्द्र
मोदी की गुजरात सरकार ने एक कानून पास करते हुए गुजरात में गुजरात के बाहर के
लोगों को खेती करने से अयोग्य घोषित कर इन सिख किसानों को इस इलाके से बेदखल करते
हुए इस जमीन को गौतम अडानी को सौंप दिया। गुजरात में जहां जाइये आपको 200-300
एकड़ जमीन पर बोर्ड लगा मिलेगा कि सरकार ने इस भूमि को अधिगृहीत कर लिया है और
आप आइये यहां आबाद हो जाइये। सरकार को किसानों से जबरदस्ती अधिगृहीत की गई इस जमीन
को पूंजीपतियों को कौड़ियों के भाव मुहैया कराया जाता रहा है। रिलायंस फ्रेश और
रिलायंस पेट्रोल पम्प स्थापित करने के लिए किसानों की 50-50
एकड़ जमीन जबरदस्ती अधिगृहीत करके अंबानी परिवार को सौंप दी गई और आज वहां न तो
पेट्रोल पम्प हैं और न ही रिलायंस फ्रेश के स्टोर। उन्होंने कहा कि केन्द्र की
सरकार पूंजीपतियों के हितों की रक्षा के लिए राज्य सभा का सत्रावसान कर देती है और
भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को दुबारा जारी कर देती है। उसका यह कदम घोर अलोकतांत्रिक
और किसान तथा खेत मजदूर विरोधी है। केन्द्र सरकार ने जिस प्रकार गुजरात में
अडानी-अम्बानी को कौड़ियों के भाव जमीन मुहैया कराई, उसी प्रकार का खेल
वह पूरे हिन्दुस्तान में खेलना चाहती है। भाकपा राष्ट्रीय सचिव शमीम फैजी ने कहा
पिछले 10 महीनों में 10 अध्यादेश जारी किये
गये और ये सभी अध्यादेश पूंजीपतियों के हित में जारी हुये। एक भी अध्यादेश ऐसा
नहीं है जो जनता के हित में जारी किया गया हो। उन्होंने कहा कि यह असाधारण स्थिति
है और हमें इस असाधारण स्थिति में भी जनता की रक्षा करने के लिए असाधारण तरीके से
अपने आन्दोलनों को तेज करना होगा।
भाकपा के राष्ट्रीय
सचिव शमीम फैजी ने कहा कि मनमोहन सिंह लाख चाहने के बावजूद
अमरीका से परमाणु रियेक्टर खरीद नहीं पाये परन्तु ओबामा के आगमन पर मोदी ने अमरीकी
पूंजी को न्यूक्लीयर लायबिलिटी कानून से मुक्त करने की घोषणा कर दी। उन्होंने कहा
कि ध्यान देने योग्य बात यह है कि अमरीका ने खुद 1970 के बाद इन परमाणु
रियेक्टरों को नहीं खरीदा और इतने सालों पहले बने रियेक्टरों के हिन्दुस्तान में
लगने पर दुर्घटना होना संभावित है परन्तु सरकार अमरीकी पूंजीपतियों को उनके
उत्तरदायित्व से मुक्त कर चुकी है। जर्मनी से जिन जेट विमानों का सौदा किया गया है,
उसे 25 सालों से किसी देश ने नहीं खरीदा परन्तु मोदी इसलिए
खरीद रहे हैं क्योंकि उसका निर्माता रिलायंस का व्यापारिक साझेदार है। उन्होंने
कहा मोदी वह सब करने को तैयार हैं जिससे अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी को मदद मिल
सके।
केन्द्र सरकार के
बजट पर प्रहार करते हुए शमीम फैजी ने कहा कि केन्द्र सरकार ने जनता के लिए चल रही
तमाम योजनाओं में आबंटन को या तो बंद कर दिया है अथवा बहुत अधिक घटा दिया है। जनता
को मिलने वाली सब्सिडी को बंद करने की तैयारी है परन्तु पूंजीपतियों को तमाम तरह
की सब्सिडी मुहैया कराई जा रही है। सम्पत्ति कर समाप्त कर दिया गया और बड़े लोगों
पर लगने वाले आयकर की दर को 30 से घटाकर 25
प्रतिशत करने की घोषणा भी कर दी गई।
भाकपा राष्ट्रीय
सचिव शमीम फैजी ने कहा कि 1990 के बाद अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी ने अपना शासन
पूरे संसार में कायम करने की कोशिश शुरू की थी। तब से देश में कोई बड़ा कारखाना
नहीं लगा है। राज्य सरकारों ने उन्हीं नक्शे कदमों पर चलते हुए कोई कारखाना नहीं
लगाया।
शमीम फैजी ने कहा कि
जिस दिन सरकार पूंजीपतियों के लिए कोई भी फैसला लेती है,
उसकी ओर से जनता और मीडिया का ध्यान हटाने के लिए संघ परिवार का कोई नुमाईंदा
विवादास्पद ब्यान दे देता है जिससे बहस आर्थिक फैसलों के बजाय विवादित बयान पर
केन्द्रित हो जाती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस दिन प्रधानमंत्री ने
स्टेट बैंक की चेयरमैन को अडानी को आस्ट्रेलिया में खदान के लिए 60,000
करोड़ का ऋण देने का निर्देश दिया एक स्वयंभू साधू ने महात्मा गांधी के हत्यारे
को देश भक्त बता दिया। जिस दिन जंतर मंतर पर देश के 100
किसान संगठन भूमि अधिग्रहण अध्यादेश का विरोध करने के लिए इकट्ठा हुए भागवत ने
बयान जारी कर दिया कि मदर टेरेसा जनसेवा नहीं कर रहीं थी बल्कि धर्म परिवर्तन करा
रहीं थीं। उन्होंने कहा कि वित्तीय पूंजी को अपने शासन को कायम रखने के लिए अगर
सम्प्रदायवाद की मदद की जरूरत हो तो वह उसका भी पोषण करने लगता है।
भाकपा की राज्य
कौंसिल की बैठक अभी जारी है और कल तक चलेगी। कौंसिल के निर्णयों से बैठक के बाद
अवगत कराया जायेगा।
गुरुवार, 16 अप्रैल 2015
at 3:58 pm | 0 comments |
सोनभद्र जनपद में किसानों पर हुये पुलिस दमन की निंदा.
लखनऊ- १६ अप्रेल २०१५ : भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी उत्तर प्रदेश के राज्य सचिव मंडल ने गत दिन सोनभद्र जनपद के दुद्धी थाना अंतर्गत कन्हार परियोजना से प्रभावित किसानों के आन्दोलन को कुचलने की गरज से पुलिस द्वारा की गयी निर्मम कार्यवाही की कड़े शब्दों में निन्दा की है. भाकपा ने दमन की इस कार्यवाही के लिये दोषी पुलिस अधिकारियों के विरुध्द कड़ी कार्यवाही की मांग करते हुये घायल आन्दोलनकारियों को इलाज हेतु पर्याप्त आर्थिक मदद देने की मांग भी की है.
यहां जारी एक प्रेस बयान में पार्टी के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि सोनभद्र जनपद की कन्हार परियोजना के लिये किसानों की जमीनों का जबरिया अधिग्रहण किया गया है. कई माह से विस्थापित किसान अपनी मांगों के समर्थन में आन्दोलन कर रहे हैं. गत दिन जनपद के दुद्धी थाने की पुलिस ने वहां पहुँच कर किसानों को आतंकित करने के लिए बल प्रयोग किया. पुलिस ने पहले लाठीचार्ज किया और फिर कई राउंड फायरिंग की. इसमें छह महिलाओं सहित कुल ११ किसान घायल हुये हैं. एक प्रदर्शनकारी के बाएं कंधे को फाड़ती हुयी गोली निकल गयी जिसे चिकित्सा हेतु बनारस भेजा गया है.
इस घटना से किसानों में भारी रोष व्याप्त है और किसान किसी भी कीमत पर अपनी जमीनें नहीं देना चाहते. घटना के बाद से प्रतिदिन सैकड़ों की संख्या में किसान प्रदर्शन कर रहे हैं. भाकपा किसानों के इस आन्दोलन का पुरजोर समर्थन करती है और राज्य सरकार को चेतावनी देना चाहती है कि वह किसानों की मांगों को अविलम्ब हल करे.
क्योंकि यह क्षेत्र मध्य प्रदेश की सीमा से सटा है अतएव वहां से भाकपा का एक छह सदस्यीय जाँच दल कन्हार पहुंचा और किसानों के आन्दोलन के प्रति भाकपा की एकजुटता का इजहार किया. प्रतिनिधि मंडल में आशीष स्ट्रगल, संजय नामदेव, रविशेखर, एकता, मंजू और अनिल.
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सोमवार, 13 अप्रैल 2015
at 10:54 am | 0 comments | जया मेहता
भागो-भागो, विकास आया, पहले से तेज आया
वित्त मंत्री द्वारा हर वर्ष बजट पेष करना सरकार और मीडिया के लिए एक वार्षिकोत्सव जैसा होता है। बजट के आँकड़ों और घोषणाओं के साथ-साथ सेंसेक्स का उतार-चढ़ाव नाटकीय ढंग से दिखाया जाता है। राजनेताओं से उनके रुख को जाना जाता है। कॉर्पोरेट घरानों की नुमाइंदगी करने वाले लोग और अर्थषास्त्री स्टूडियो में आकर अपना विषेषज्ञ विष्लेषण देते हैं। मीडिया रिपोर्टर बीच-बीच में आम लोगों से बजट पर उनकी प्रतिक्रिया जानना चाहते हैं। गृहणियों व महिलाओं से और रास्ते चलते युवाओं से भी कुछ सवाल पूछे जाते हैं। ज़ाहिर है कि सरकार और सरकार के हिमायती बजट की तारीफ़ करते हैं और विपक्षी दलों के लोग और सरकार विरोधी सोच से प्रभावित लोग बजट को और कुछ नहीं, बस गलतियों का पुलिंदा भर मानते हैं।
इस बार भी सरकार का कहना है कि मोदी का (माफ़ कीजिए, अरुण जेटली का) वर्ष 2015-16 का बजट बजट देष की अर्थ व्यवस्था का कायाकल्प कर देगा। वहीं काँग्रेस सरकार में वित्तमंत्री रहे चिदाम्बरम का कहना है कि न तो सरकार ने इस बजट में राजकोषीय और वित्तीय संतुलन पर ध्यान दिया है और न ही पुनर्वितरण संबंधी कोई कदम उठाये हैं कि जिनसे ग़रीब तबक़ों को कुछ तो हासिल हो।
इस सारे उत्सव को देखकर कोई अगर यह सोचे कि बजट देष की आर्थिक नीति की दिषा तय करता है तो ये उसका भोलापन ही कहा जाएगा। बजट केवल सरकार द्वारा चुनी गई आर्थिक नीति पर मुहर लगाता है। वो तय तो पहले ही की जा चुकी होती है। मोदी सरकार का ‘मेक इन इंडिया’ का आह्वान, बीमा और ज़मीन अधिग्रहण के अध्यादेष और ऐसे तमाम आदेष स्पष्ट संकेत देते हैं कि सरकार की प्रतिबद्धता देषी और विदेषी पूँजी के मुनाफ़े के रास्ते को आसान और सुविधाजनक बनाना है। अरुण जेटली के शब्दों में कहें तो, ‘कुछ तो फूल खिलाए हमने, और कुछ फूल खिलाने हैं।’ देष की ग़रीब जनता की बढ़ती हुई बदहाली से सरकार का कोई ख़ास सरोकार नहीं है।
वर्ष 1991 से हिंदुस्तान में नई आर्थिक नीति अपनाने के बाद से प्रत्येक वर्ष के बजट का केन्द्र बिंदु वित्तीय घाटे को सीमा में बाँधे रखने का रहता है। राजग-1 के कार्यकाल के दौरान वित्तमंत्री यषवंत सिन्हा ने ‘राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन’ संबंधी विधेयक पेष किया था जिसे 2003 में बाकायदा कानून बना दिया गया। उक्त विधेयक का मकसद राजकोषीय अनुषासन को संस्थागत रूप देना था। इस कानून में कुछ समयबद्ध लक्ष्य तय किये गए। एक लक्ष्य था 2008 तक राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 3 प्रतिषत तक ले आना और दूसरा लक्ष्य था राजस्व घाटे को शून्य पर ले आना।
बहरहाल 2007-8 में वैष्विक वित्तीय संकट से मंदी का खतरा सारी दुनिया पर मंडराया। तब दुनियाभर के देषों ने ‘कीन्सियन’ नसीहत के अनुसार राजकोषीय घाटे से अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने का नुस्खा अपनाया। हिंदुस्तान में भी मंदी का ख़तरा सामने देख 2003 में बनाये गए क़ानून के सारे लक्ष्य भुला दिए गए और 2008-9 और 2009-10 में राजकोषीय घाटा जीडीपी के 5.9 और 6.5 प्रतिषत के स्तर तक पहुँच गया।
अब चिदांबरम कह रहे हैं कि 2008-9 और 2009-10 में जो खर्चीली राजकोषीय नीतियाँ अपनायी गईं, वे ही महँगाई का और इस तरह काँग्रेस नेतश्त्व वाली संप्रग सरकार के चुनाव हारने का कारण बनीं। दरअसल राजकोषीय घाटे का महँगाई या भुगतान संतुलन के संकट के साथ सीधा संबंध स्थापित करना सही नहीं है। लेकिन नवउदारवाद के साँचे में बार-बार यही दुहाई देकर तीसरी दुनिया की राजकोषीय स्वतंत्रता पर यह अंकुष लगाया जा रहा है कि अगर किसी देष को उसकी जनता के लिए कुछ कल्याणकारी काम शुरू करने के लिए खर्च करना की ज़रूरत है तो भी वह देष इस पर खर्च न कर सके। वस्तुतः यह मेट्रोपोलिटन वित्तीय पूँजी का तीसरी दुनिया के व योरप के कमज़ोर अर्थव्यवस्था वाले मुल्कों की आर्थिक संप्रभुता पर सीधा हमला है। जब भी कोई देष व्यापार या कर्ज के संकट में होता है तो उसे मदद करने वाले अंतरराष्ट्रीय समझौतों की ये शर्त होती है कि वह पहले अपने देष में ख़र्च कम करे या तथाकथित ‘ऑस्टेरिटी मेजर्स’ अपनाये जैसा अभी ग्रीस में हुआ। इसका सीधा आषय है कि अगर आप अपने राजकोषीय घाटे को अपने देष की जनता की ज़रूरत के मुताबिक कम या ज़्यादा करना चाहते हैं तो ये अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूँजी को चुनौती देना है। और ये काम न तो संप्रग के बस का था और न ही राजग के बस का है। इसलिए राजकोषीय घाटे को पटरी पर लाना, जैसा कि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूँजी चाहती है, हमारी सरकारों की मजबूरी है। बस यही हमारे वित्तमंत्रियों की योग्यता का पैमाना है। अरुण जेटली की उपलब्धि यह है कि वे पिछले साल के 4.1 प्रतिषत के राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को पूरा करने में समर्थ हैं। उनका वादा है कि इस वर्ष का राजकोषीय घाटा 3.9 प्रतिषत रहेगा और अगले तीन सालों में यह कम होकर 3 प्रतिषत हो जाएगा।
पिछले साल के 4.1 प्रतिषत के लक्ष्य को कायम करने के लिए जो कवायद की गई उसे नज़रंदाज़ नहीं करना चाहिए। पिछले वर्ष के बजट में जो अनुमानित आय करों से और सार्वजनिक क्षेत्र के विनिवेष से बतायी गई, वो वास्तविकता से कहीं ज़्यादा थी। असल में आय अनुमान से काफ़ी कम हुई और राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए ये ज़रूरी था कि ख़र्च को काफ़ी कम किया जाए। यहाँ ये जानना ज़रूरी है कि कुछ ख़र्चों को कम करने का अख़्तियार वित्तमंत्री के वष में भी नहीं होता मसलन ब्याज भुगतान या रक्षा बजट। ये करने ही होते हैं। जो कम किया जा सकता है, वो सामाजिक क्षेत्र पर होने वाला व्यय ही है।
पिछले वर्ष के 4.1 प्रतिषत के लक्ष्य को पूरा करने के लिए मंत्रालयों के केन्द्रीय योजना के बजट समर्थन में 20 से 50 प्रतिषत तक की कमी की गई। इनमें स्वास्थ्य मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय और आवास एवं शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय प्रमुख हैं। इस वर्ष के बजट में ये किस्सा दोहराया जाएगा कि नहीं, ये तो अगले ही साल पता चलेगा लेकिन 3.9 प्रतिषत का लक्ष्य तय करते समय अरुण जेटली ने इस बात का पूरा ध्यान रखा है कि आय और व्यय, दोनों ही दृष्टियों से कॉर्पोरेट सेक्टर और अमीर तबक़े को फायदा हासिल हो। टैक्स से होने वाली आमदनी बढ़ाने के लिए उन्होंने सर्विस टैक्स बढ़ा दिया जिससे रुपये 23383 करोड़ का राजस्व मिलेगा। इसका अपेक्षाकृत अधिक भार ग़रीब तबक़े पर पड़ेगा। दूसरी तरफ़ कॉर्पोरेट टैक्स की दर 30 प्रतिषत से कम करके 25 प्रतिषत कर दी गई है और संपत्तिकर हटा दिया गया है। इससे राजस्व की आमदनी में रुपये 8315 करोड़ की कमी आएगी।
जहाँ तक व्यय का सवाल है, उसमें इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण के लिए भारी वश्द्धि की गई है। इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण का अर्थ कोई गाँव व ग़रीबों के लिए सुविधाजनक जीवन स्थितियों का निर्माण नहीं, बल्कि एक्सप्रेस हाइवे, आधुनिक एयरपोर्ट, आधुनिक सूचना-संचार सुविधाएँ और कॉर्पोरेट सेक्टर के लिए अन्य सुविधाएँ बढ़ाना ही है। मनमोहन सिंह और मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने कोषिष की थी कि देष के इस इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास पब्लिक प्राइवेट पार्टनरषिप के तहत हो। मनमोहन-मोंटेक मॉडल से प्राइवेट और कॉर्पोरेट सेक्टर के लिए बनी जगह में मुनाफ़े की आस में तमाम कंपनियाँ इस क्षेत्र में दाख़िल हो गईं जिन्हें सार्वजनिक बैंकों से सस्ती दरों पर भारी-भरकम कर्ज मुहैया कराया गया। नतीजा ये है कि अब बैंकों के पास नॉन परफॉर्मिंग असेट्स का अंबार लग गया है। जेटली जी ने इस मुष्किल का समाधान ये निकाला कि उन्होंने कॉर्पोरेट को रियायत देते हुए कहा कि कोई बात नहीं। अगर पब्लिक प्राइवेट पार्टनरषिप भी आपको रास नहीं आ रही तो पब्लिक सेक्टर ही आपके लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित कर देगा।
कॉर्पोरेट सेक्टर को ये सुविधाएँ मुहैया कराने के लिए जिन मदों में बजट में कटौती की गई है, वे हैं आईसीडीएस (आँगनवाड़ी और आषा), सर्वषिक्षा अभियान, कृषि, एससी-एसटी सबप्लान, पेयजल, पंचायती राज, आदि वे सभी मदें जो ग़रीबों की ज़िंदगी को थोड़ी राहत पहुँचाती हैं। तर्क ये है कि चूँकि राज्यों को आबंटित किया जाने वाला कोष बढ़ा दिया गया है इसलिए केन्द्र की इस कटौती की भरपाई राज्य सरकारों द्वारा की जाएगी।
अंत में मनरेगा का उल्लेख करना ज़रूरी है। बजट में मनरेगा को 34000 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 34600 करोड़ रुपये कोष आवंटित किया गया है। ये ज़रूरत के सामने कितना अपर्याप्त है इसका अंदाज़ा एक इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि मनरेगा में ऐसे बहुत से मामले हैं जहाँ लोगों से काम करवा लिया गया लेकिन पैसे न होने से भुगतान नहीं किया गया। इसका जो आंषिक भुगतान राज्य सरकारों ने अपने कोष से कर दिया था, अभी उसका ही केन्द्र सरकार को 6000 करोड़ रुपया देना बाकी है। और फिर अब तो मनरेगा पर खर्च की कोई सीमा नहीं बाँधी जा सकती क्योंकि अब यह लोगों का संवैधानिक अधिकार है कि अगर वे काम माँगें तो उन्हें काम देना सरकार की जिम्मेदारी होगी। संक्षेप में इस बजट का विष्लेषण यही है कि मनमोहन सिंह और मोंटेक सिंह देष को जिस दिषा में ले जा रहे थे, मोदी और जेटली हमें उसी दिषा में और तेज रफ्तार के साथ धकका देने के लिए कमर कसे हैं।
- जया मेहता
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हाशिमपुरा का इंसाफ?
आजादी के बाद के सबसे बड़े जघन्य सामूहिक नरसंहार के मुज़रिमों को दिल्ली की अदालत ने सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। इस न्यायिक निर्णय ने एक बार फिर तमाम सवालात खड़े कर दिये हैं, जिन पर गौर किया जाना जरूरी है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस बर्बर नरसंहार को धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र की सरकार की मशीनरी ने अंजाम दिया था।
इस सामूहिक नरसंहार 1984 में विहिप ने कथित राम जन्मभूमि को मुक्त कराने का आन्दोलन शुरू किया और 1986 में फैजाबाद की एक अदालत ने हिन्दूओं को अयोध्या के विवादित परिसर में पूजा करने की अनुमति दे दी। उस अदालत के विवेक पर चर्चा से हम मूल मुद्दे से भटक सकते हैं। लेकिन यह सच है कि इस निर्णय के बाद देश में साम्प्रदायिक तनाव पैदा होना शुरू हुआ। कट्टरपंथियों ने पूरे देश के माहौल को भड़काने की हर सम्भव कोशिश की और केन्द्र एवं राज्य की तत्कालीन सरकारें मूक दर्शक बनी रहीं। मेरठ में 1987 में भड़के साम्प्रदायिक दंगों की पृष्ठभूमि में यही परिस्थितियां थीं।
बवाल की शुरूआत 14 अप्रैल को हुई जब नशे में धुत एक दरोगा ने एक पटाखा दगने के बाद गोलियां बरसानी शुरू कर दीं जिसमें अल्पसंख्यक समुदाय के दो लोगों को मौत हो गयी। इस तरह इस दंगे की शुरूआत ही सरकारी मशीनरी ने की। उसी दिन भड़के माहौल में अजान के समय लाउडस्पीकर पर फिल्मी गाने बजाने के विवाद में हाशिमपुरा में दो समुदाय के लोगों में भिड़न्त हो गई जिसमें 12 लोग मारे गये। एक महीने बाद हापुड़ रोड पर बम फूटे, एक दुकान को लूटा गया और उसके मालिक की हत्या कर दी गई। 19 मई को सुभाषनगर में छत पर खड़े तीन लोगों को गोली मार कर हत्या कर दी गई। इस घटना के बाद शहर में कफर््यू लगा दिया गया। इस घटना में आरएसएस से सम्बद्ध एक कौशिक परिवार के एक युवक की भी मौत हुई जिसका एक रिश्तेदार उस समय मेरठ में ही सेना में उच्च पद पर तैनात था। सेना में कार्यरत इसी कौशिक अधिकारी ने सेना के कुछ अन्य अधिकारियों और पीएसी के साथ मिल कर 22 मई 1987 को हाशिमपुरा के घर-घर में जाकर तलाशी ली और 48 हट्टे-कट्टे मुसलमानों को उठा लिया गया। उन्हें पीएसी के एक ट्रक में भर कर ले जाकर छलनी कर दिया गया और उनकी लाशों को गाजियाबाद के मुरादनगर के पास गंगा नहर में फेक दिया गया। इस नरसंहार में आधा दर्जन लोग मरने से बच गये और इस बर्बर कहानी का सच जनता के सामने आ सका।
उस समय गाजियाबाद के एसएसपी विभूति नारायण राय ने मामले में हस्तक्षेप करते हुए दो एफआईआर दर्ज कराईं और मामले की विवेचना स्वयं शुरू कर दी। लेकिन केन्द्र एवं राज्य की तत्कालीन कांग्रेसी सरकारें नहीं चाहती थीं कि दोषियों को दंडित किया जाये। 22/23 मई 1987 की रात में मेरठ सर्किट हाउस में राज्य के तमाम प्रशासनिक एवं पुलिस उच्चाधिकारी मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह के साथ मौजूद थे। लेकिन उसमें कोई भी सरकारी मशीनरियों - सेना एवं पीएसी के द्वारा किये गये बर्बर सामूहिक बर्बर हत्याकांड के मुज़रिमों को सज़ा दिलाने का इच्छुक नहीं था। विभूति नारायण राय के हाथ से मामले की विवेचना छीन कर विवेचनाको लटकाये रखने के लिए मामले को सीबी-सीआईडी के हवाले कर दिया गया।
सीबी-सीआईडी ने शुरूआत से ही सबूतों को जुटाने की कोई ईमानदार कोशिश नहीं की। नरसंहार में प्रयुक्त असलहों को सीज़ नहीं किया गया, घटनास्थल से खोके और गोलियां बरामद ही नहीं किये गये, उनकी बैलेस्टिक और फोरेंसिक जांच का सवाल ही नहीं उठता। घटना में प्रयुक्त हथियारों को लगातार प्रयोग में लाया जाता रहा। 19 में से 16 पुलिस वाले अब भी नौकरी में हैं। सेना के जिन अधिकारियों ने इस हत्याकांड में व्यक्तिगत तौर पर भाग लिया था, उन्हें अभियुक्त तक नहीं बनाया गया। सीबी-सीआईडी ने अलबत्ता एक रिपोर्ट प्रधानमंत्री कार्यालय को अवश्य प्रेषित की कि सेना सहयोग नहीं कर रही है परन्तु प्रधानमंत्री कार्यालय ने मामले में हस्तक्षेप करने की रूचि नहीं दिखाई। अभियुक्तों को मुकदमें के दौरान प्रोन्नति भी दी जाती रही।
9 सालों के बाद सन 1996 में न्यायालय में 19 अभियुक्तों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया गया। कोर्ट ने 1996 से 2000 तक 23 बार अभियुक्तों के खिलाफ वारंट जारी किये परन्तु किसी भी अभियुक्त को गिरफ्तार नहीं किया गया। 2000 में अभियुक्तों ने आत्मसमर्पण किया। 2002 में एक याचिका की सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने मुकदमे को गाजियाबाद की अदालत से तीस हजारी सत्र न्यायालय, दिल्ली स्थानांतरित कर दिया परन्तु 2002 से 2005 तक तत्कालीन मुलायम सिंह सरकार ने मुकदमें की पैरवी के लिए सरकारी वकील की नियुक्ति नहीं की। 2006 में अभियुक्तां के खिलाफ आरोप तय किये गये और मुकदमें की सुनवाई शुरू की गई। सिस्टम के मुताबिक सत्र न्यायालयों में आरोप तय होने के बाद दिन-प्रति-दिन आधार पर साक्ष्यों को रिकार्ड किया जाता है। दोनों पक्षों से साक्ष्य आने के बाद बहस को सुनने के बाद 15 दिन के अन्दर न्यायालय निर्णय सुना देता है। परन्तु इस मुकदमें में 2006 से 2015 तक सत्ता में रही अल्पसंख्यकों की खैरख्वाह मायावती और मुलायम सिंह की सरकारों ने मुकदमें में साक्ष्यों को प्रस्तुत करने की कोई कोशिश नहीं की और धीरे-धीरे समय बिताया जाता रहा।
ठीक इसी समय हाशिमपुरा से सटे मलियाना में भी कत्ल-ए-आम किया गया था लेकिन यह मामला पूरी तरह दबा दिया गया।
आश्चर्य की बात है कि न्यायालय भी कछुए की गति से इस मामले का ट्रायल करता रहा और उसने सामूहिक नरसंहार होने के तथ्य को सिद्ध मानने के बावजूद अभियुक्तों को संदेह का लाभ दे दिया। सवाल उठता है कि अगर सामूहिक नरसंहार हुआ था तो उसे किसने अंजाम दिया था? इसकी पड़ताल न्यायालय को भी करनी चाहिए थी। अगर अभियोजन न्यायालय में इस अभियोग को सिद्ध नहीं कर सकता था क्योंकि विवेचना करने वाली एजेंसी ने साक्ष्य एकत्रित करने की कोशिश नहीं की थी तो फिर न्यायालय ने उनके खिलाफ टिप्पणी (न्यायिक शब्दावली में स्ट्रिक्चर) पास करते हुए उनके खिलाफ कार्यवाही के निर्देश सरकार को क्यों नहीं दिये?
उल्लेख आवश्यक है कि अफगुरू के मामले में सर्वांच्च न्यायालय का फैसला कहता है कि सबूत परिस्थितिजन्य है। “अधिकतर साजिषों की तरह, आपराधिक साजिष के समकक्ष सबूत नहीं है और न हो सकते हैं।“ लेकिन न्यायालय ने आगे कहा - ”हमला, जिसका नतीजा भारी नुकसान रहा और जिसने संपूर्ण राष्ट्र को हिला कर रख दिया और समाज की सामूहिक चेतना केवल तभी संतुष्ट हो सकती है, अगर अपराधी को फाँसी की सजा दी जाये।“ क्या हाशिमपुरा काण्ड इसी श्रेणी में नहीं आता?
यहां एक अन्य मुकदमें का उल्लेख जरूरी होगा। एक बार एक मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी के यहां एक बड़ी खाद्य मिल के मालिक के खिलाफ खाद्य अपमिश्रण कानून का एक मुकदमा चल रहा था जिसमें अरहर की दाल में 98 प्रतिशत खेसारी दाल पाई गई थी। कानून के मुताबिक सैम्पल की टेस्ट रिपोर्ट आने के बाद उसकी प्रति अभियुक्त को मुकदमा चलाने के पहले भेजना जरूरी होता है और अगर ऐसा न किया जाये तो अभियुक्त को सज़ा नहीं दी जा सकती। इस मामले में अदालत में अभियुक्त को रिपोर्ट भेजने का प्रमाण दाखिल नहीं किया गया था। उसी वक्त उन्नाव जनपद में खेसारी दाल खाने से सैकड़ों लोगों को पैरालिसिस हो जाने की चर्चा आम थी। मजिस्ट्रेट ने कानून के उक्त प्रावधान का पालन का प्रमाण न होने के बावजूद अभियुक्त को कैद एवं जुर्माने दोनों की सजा देते हुए ऐसा करने का कारण स्पष्ट करते हुए अपने निर्णय में उल्लेख किया कि उनके न्यायालय में इस प्रकार के जितने भी मामले आये उसमें कानून के इस प्रावधान का पालन करने का प्रमाण लगा हुआ है जो यह इंगित करता है कि इस बड़े आदमी ने अपने पैसे और प्रभुत्व का प्रयोग करते हुए इस प्रमाण को गायब करवा दिया है। मजिस्ट्रेट ने इस दाल को खाने वालों को हो सकने वाले स्वास्थ्य नुकसानों की चर्चा करते हुए कहा कि जो-जो फुटकर दुकानदार इस मिल से अरहर की दाल ले जाकर बेचता और अगर उसके वहां सैम्पल लिया जाता तो उसे सजा हो जाती जबकि अपमिश्रण का कार्य उनकी कोई भूमिका नहीं होती।
वर्तमान मामले में भी न्यायालय को इस बात की नोटिस लेनी चाहिए थी कि विवेचना उसी विभाग द्वारा की जा रही थी जिसने इस बर्बर सामूहिक हत्याकाण्ड को अंजाम दिया था। पीएसी में उस दिन ड्यूटी पर कौन-कौन आये थे, इसके रिकार्ड को न्यायालय न्याय मुहैया कराने के लिए तलब कर सकती थी। न्याय हित में अन्य आवश्यक साक्ष्य भी प्रस्तुत किये जाने के निर्देश दिये जा सकते थे।
इस मामले में ज्ञान प्रकाश सहित 6 आयोग राज्य सरकारों ने गठित किये परन्तु किसी की भी रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक नहीं की गई।
मामले में तमाम सवालात उठ रहे हैं और आगे आने वाले वक्त में उठेंगे। परन्तु इस पूरे प्रकरण ने अंततः धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र में इस दौरान राज्य में सत्तासीन रही तमाम सरकारों के साथ-साथ कार्यपालिका के चेहरे से भी धर्मनिरपेक्षता की नकाब को उतार कर फेंक दिया है।
- प्रदीप तिवारी
बुधवार, 8 अप्रैल 2015
at 5:55 pm | 0 comments |
मौसम की मार से बेहाल किसानों को राहत दिलाने और भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को वापस कराने को भाकपा ने आन्दोलन का एलान किया.
मौसम की मार से बर्वाद किसानों की केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा की जा रही अनदेखी निंदनीय
भाकपा ने किसानों के समर्थन में आन्दोलन चलाने का किया आह्वान
लखनऊ 8 अप्रैल। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य काउन्सिल ने केन्द्र और प्रदेश की सरकार पर आरोप लगाया है कि वह मौसम की मार से जार-जार हुये किसानों के हितों की अनदेखी कर रही हैं। उनकी इस अनदेखी के चलते उत्तर प्रदेश में हर दिन लगभग 10 से 12 किसान या तो आत्महत्याएं कर रहे हैं अथवा सदमे से मर रहे हैं।
यहां जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि उत्तर प्रदेश में ओला, आंधी और बेमौसम बारिश से गेहूँ, आलू, दलहन, तिलहन की फसल बड़े पैमाने पर नष्ट हो चुकी है। जायद की फसल और आम की फसल पर भी भारी प्रभाव पड़ा है। किसानों ने बैंकों और साहूकारों से कर्ज लेकर फसल उगाई थी जिसके बर्वाद होने से वह पूरी तरह टूट चूका है। हैरान परेशान किसान आत्महत्या कर रहे हैं अथवा भारी सदमे के चलते मौत का शिकार बन रहे हैं। उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा कई सौ तक जा पहुंचा है।
डा. गिरीश ने कहा कि केन्द्र सरकार के प्रधानमन्त्री और गृह मंत्री दोनों ही उत्तर प्रदेश से सांसद हैं। लेकिन कितनी बड़ी बिडम्बना है कि अभी तक केन्द्र सरकार ने कोई राहत पैकेज जारी नहीं किया। राज्य सरकार ने यद्यपि राहत देने को छोटी सी राशि की घोषणा की है लेकिन वह अभी तक किसानों तक पहुँच नहीं पायी है। आत्महत्याओं और मौतों तक पर आशंकाएं खड़ी की जा रही हैं।
भाकपा केन्द्र और राज्य सरकार के इस रवैय्ये की कड़े शब्दों में निन्दा करती है। भाकपा केन्द्र सरकार से मांग करती है कि किसानों की फसल हानि की भरपाई और मृतक किसानों के परिवार को रु. दस लाख का मुआवजा देने को राहत पैकेज की घोषणा फौरन करे, किसानों के कर्जे माफ़ किये जायें और उनको अगली फसल तैयार करने को हर संभव मदद दी जाये। भाकपा राज्य सरकार से मांग करती है की वह हानि के सर्वे के नाम पर विलम्ब न करे हर मध्यम व छोटे किसान किसानों को प्रति एकड़ दस हजार रूपये की दर से मुआवजा दिलाने को ठोस कदम उठाये।
यहां यह उल्लेखनीय है कि जिन किसानों ने बैंकों से कर्जा लिया हुआ है, उनकी फसल बीमा के दायरे में आती है और 70 प्रतिशत फसल हानि पर किसान बीमा का लाभ पाने के हकदार बन जाते हैं। परन्तु निजी बीमा कम्पनियों को फायदा पहुंचाने के लिए सरकार किसानों को हुए नुकसान को 70 प्रतिशत मानने को तैयार नहीं है और 50 प्रतिशत से कम नुकसान बता रही है जोकि बेहद निन्दनीय है।
भाकपा ने उपर्युक्त के संबन्ध में और भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को वापस लेने की मांग को लेकर पूरे प्रदेश में ब्लाक और तहसील स्तर पर लगातार प्रदर्शनों का आयोजन करने तथा 14 मई को जिला स्तर पर व्यापक कार्यक्रम आयोजित करने का निर्देश पार्टी की जिला इकाइयों को दिया है। आन्दोलन को सघन बनाने के उद्देश्य से भाकपा राज्य काउन्सिल की बैठक 18 व 19 अप्रैल को राज्य कार्यालय पर बुलाई गयी है।
भाकपा ने किसानों के समर्थन में आन्दोलन चलाने का किया आह्वान
लखनऊ 8 अप्रैल। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य काउन्सिल ने केन्द्र और प्रदेश की सरकार पर आरोप लगाया है कि वह मौसम की मार से जार-जार हुये किसानों के हितों की अनदेखी कर रही हैं। उनकी इस अनदेखी के चलते उत्तर प्रदेश में हर दिन लगभग 10 से 12 किसान या तो आत्महत्याएं कर रहे हैं अथवा सदमे से मर रहे हैं।
यहां जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि उत्तर प्रदेश में ओला, आंधी और बेमौसम बारिश से गेहूँ, आलू, दलहन, तिलहन की फसल बड़े पैमाने पर नष्ट हो चुकी है। जायद की फसल और आम की फसल पर भी भारी प्रभाव पड़ा है। किसानों ने बैंकों और साहूकारों से कर्ज लेकर फसल उगाई थी जिसके बर्वाद होने से वह पूरी तरह टूट चूका है। हैरान परेशान किसान आत्महत्या कर रहे हैं अथवा भारी सदमे के चलते मौत का शिकार बन रहे हैं। उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा कई सौ तक जा पहुंचा है।
डा. गिरीश ने कहा कि केन्द्र सरकार के प्रधानमन्त्री और गृह मंत्री दोनों ही उत्तर प्रदेश से सांसद हैं। लेकिन कितनी बड़ी बिडम्बना है कि अभी तक केन्द्र सरकार ने कोई राहत पैकेज जारी नहीं किया। राज्य सरकार ने यद्यपि राहत देने को छोटी सी राशि की घोषणा की है लेकिन वह अभी तक किसानों तक पहुँच नहीं पायी है। आत्महत्याओं और मौतों तक पर आशंकाएं खड़ी की जा रही हैं।
भाकपा केन्द्र और राज्य सरकार के इस रवैय्ये की कड़े शब्दों में निन्दा करती है। भाकपा केन्द्र सरकार से मांग करती है कि किसानों की फसल हानि की भरपाई और मृतक किसानों के परिवार को रु. दस लाख का मुआवजा देने को राहत पैकेज की घोषणा फौरन करे, किसानों के कर्जे माफ़ किये जायें और उनको अगली फसल तैयार करने को हर संभव मदद दी जाये। भाकपा राज्य सरकार से मांग करती है की वह हानि के सर्वे के नाम पर विलम्ब न करे हर मध्यम व छोटे किसान किसानों को प्रति एकड़ दस हजार रूपये की दर से मुआवजा दिलाने को ठोस कदम उठाये।
यहां यह उल्लेखनीय है कि जिन किसानों ने बैंकों से कर्जा लिया हुआ है, उनकी फसल बीमा के दायरे में आती है और 70 प्रतिशत फसल हानि पर किसान बीमा का लाभ पाने के हकदार बन जाते हैं। परन्तु निजी बीमा कम्पनियों को फायदा पहुंचाने के लिए सरकार किसानों को हुए नुकसान को 70 प्रतिशत मानने को तैयार नहीं है और 50 प्रतिशत से कम नुकसान बता रही है जोकि बेहद निन्दनीय है।
भाकपा ने उपर्युक्त के संबन्ध में और भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को वापस लेने की मांग को लेकर पूरे प्रदेश में ब्लाक और तहसील स्तर पर लगातार प्रदर्शनों का आयोजन करने तथा 14 मई को जिला स्तर पर व्यापक कार्यक्रम आयोजित करने का निर्देश पार्टी की जिला इकाइयों को दिया है। आन्दोलन को सघन बनाने के उद्देश्य से भाकपा राज्य काउन्सिल की बैठक 18 व 19 अप्रैल को राज्य कार्यालय पर बुलाई गयी है।
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मई दिवस के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है, फिर भी कुछ ऐसे पहलू हैं जो अज्ञात है। कुछ भ्रांतियों का स्पष्टीकरण और इस विषय पर भारत तथा विश्...
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New Delhi : Communist Party of India(CPI) on August 20,2013 squarely blamed the Prime Minister and the F...
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लखनऊ- ९ जनबरी २०१५ : भारत के अंदरूनी मामलों में अमेरिका की दखलंदाजी, भारत के खिलाफ पाकिस्तानी आतंकवाद को अमेरिका द्वारा अप्रत्यक्ष समर्थन द...
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भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के वरिष्ठ सदस्य डा॰ गिरीश का प्रेस बयान- हड़ताली चालकों पर दमन बंद करे सरकार! काले का...
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लखनऊ- २८ जनबरी, २०१५. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने आरोप लगाया है कि उत्तर प्रदेश सरकार जन समस्याओं और जन आन्दोलनों की अनद...
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Kolkata, April 17 - Mayor Bikash Bhattacharya opted out of the fray as West Bengal's ruling Left Front Saturday released its list of can...
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श्रम की लूट सब से खतरनाक नहीं होती पुलिस की मार सब से खतरनाक नहीं होती गद्दारी-लोभ की मुट्ठी सब से खतरनाक नहीं होती बैठे-सोये पकड़े जाना - ब...
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भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की उत्तर प्रदेश राज्य कार्यकारिणी की बैठक दिनांक १० अक्टूबर २००९ को लखनऊ में राज्य कार्यालय पर होगी जिसमें रास्ट्री...
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उत्तर प्रदेश में वामपंथी दलों का दमन विरोधी दिवस बेहद सफल जिला केंद्रों पर किये गये धरने- प्रदर्शनऔर आम सभायें लखनऊ- 12 जून , भारती...




