फ़ॉलोअर
सोमवार, 26 अप्रैल 2010
at 6:51 pm | 0 comments | सत्य नारायण ठाकुर
मई दिवस की चुनौतियां
मई दिवस काम के घंटे कम करने के संघर्षों की प्रारंभिक घटनाओं से संबंधित है। हर साल की पहली मई शिकागो में सन् 1885 की मई के रक्रंजित प्रथम सप्ताह की उन घटनाओं की याद दिलाती है। मजदूरों की मांग थी काम के घंटे कम किये जायें और आठ घंटे काम के, आठ घंटे परिवार के और आठ घंटे आराम के माने जाये। बाद के दिनों में तकनीकी विकास के फलस्वरूप कार्यदिन और भी कम करने की मांग उठने लगी। कई कार्यालयों में साप्ताहिक छुट्टी और काम के घंटे और भी कम किये गये। भारत के 5वें श्रम सम्मेलन में साप्ताहिक छुट्टी के साथ सप्ताह में 48 घंटे तय किये गये। लेकिन अब यह सब बीते दिनों की बात हो गयी। 60 और 70 के दशक के वैज्ञानिक तकनीकी क्रान्ति के बाद उल्टी गंगा बहने लगी। वैज्ञानिक तकनीकी उपकरण के अविष्कार के बाद आशा की जाती थी कि मजदूरों के कार्य हल्के होंगे, खतरनाक काम आसान होंगे और नये रोजगार के अवसर बढे़गे, किन्तु इन सभी आशाओं पर तुषारापात हो गया और तमाम अपेक्षाओं के प्रतिकूल नियोजकों ने कार्य दिवस अत्यधिक बढ़ा दिये हैं तथा कार्यदशा बद से बदतर किये है। वैज्ञानिक तकनीकी क्रान्ति की उपलब्धियों को पूंजीपतियों ने हाथिया लिया हैं और उनका इस्तेमाल वे अपने वर्ग स्वार्थ में करते हैं।भारत सरकार के श्रम मंत्रालय के अधिनस्थ वी वी गिरी राष्ट्रीय श्रम संस्थान ने नोएडा और गुडगांव में अत्याधुनिक तकनीकी के बीपीओ (बिजनेस प्रोसेसिंग आउटसोर्सिंग) और कालसेंटरांे में कार्यरत आधुनिकतमपरिधानों में सजे-सवरें शूटेड-बूटेड नवकार्य-संस्कृति के कर्मचारियों (दरअसल इन्हें कर्मचारी पुकारा जाना पसंद नहीं) की कार्यदशा का अध्ययन किया है। संस्थान के शोधकर्ता िवद्धानों ने विस्तृत छानबीन के बाद अपने तथ्यपूर्ण शोधगं्रथ में उजागर किया है कि कॉल सेंटरों में काम करने वालों की कार्यस्थिति प्राचीन रोम के गुलाम जैसी है। इन्हें प्रतिदिन प्रायः दस घंटे (और ज्यादा भी) बंदी अवस्था में काम करना पड़ता है। इससे नाना प्रकार की नयी शारीरिक एवं मानसिक बीमारियां परिलक्षित हो रही है। आईसीआईसीआई जैसी बैंकिंग कारोबार में भी काम करनेवालों के घंटे निर्धारित नहीं है और इन्हें 10 घंटे और इससे ज्यादा भी रोजाना काम करना पड़ता है। यह अलग-थलग अकेली घटना नहीं है।मैन्यूफैक्चरिंग उद्योग में ठेकाकरण, आउटसोर्सिंग और पीसरेट सिस्टम चल पड़ा है, जहां काम के घंटे निर्धारित नहीं है। उत्पादन प्रक्रिया में मूलचूल बदलाव आया है। कारखानों की भीड़भाड़ कम करके ‘लीन मॉडल’ अपनाया जा रहा है, जिसमें कुछेक अतिकुशल मजदूरों को कार्यस्थल में बुलाकर शेष काम ठेके पर बाहर वहां भेज दिये जाते हैं, जहां किसी प्रकार का श्रम कानून लागू नहीं है। अगर नियमानुसार श्रम कानून लागू भी है तो उसके अनुपालन की बाध्यता नही है। वैज्ञानिक तकनीकी क्रान्ति के बाद मजदूर वर्ग की अपेक्षाएं थी कि उनके कार्यबोझ कम होंगे, उनके आराम तथा रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, किंतु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। वैज्ञानिक उपलब्धियां महाकाय कार्पोरेटियों की चेरी बनकर रह गयी। इसीलिए काम के घंटे कम करने का संघर्ष टेªड यूनियन आंदोलन के सामने प्राथमिक महत्व का है।सन् 1990 में 10 प्रतिशत कर्मचारी कानून सम्मत सामाजिक सुरक्षासुविधाओं के दायरे में आते थे। वह संख्या सरकारी आंकड़ों के मुताबिक सन् 2000 में सात और 2005 में 5।66 प्रतिशत हो गयी। गैरसरकारी अनुमानों के मुताबिक आज 2010 में महज 5 प्रतिशत कर्मचारियों को कानूनी सामाजिक सुरक्षा की सुविधाएं प्राप्त है। इससे यह तथ्य सिद्ध होते हैं कि सन् 1990 के बाद के वर्षों में कोई तीन करोड़ मजदूर और कर्मचारी कानूनी सामाजिक सुरक्षा के दायरे से बाहर धकेल दिये गये।सामाजिक सुरक्षा संवैधानिक मानवधिकार है, जिसकी खुलेआम हत्या की जा रही है। पूंजीपति नियोजक और राज्य सत्ता के मेलजोल से सुविचारित अर्थनीति अख्तियार की गयी जिसके तहत उत्पादन प्रक्रिया में गैरकानूनी फेरबदल करके लोगों को रोजगार से निकाल बाहर किया जा रहा है। सन् 1991 में घोषित नई आर्थिक नीति स्थायी रोजगार को अस्थायी (टेम्पररी) और आकस्मिक (कैजुअल) बनाता और मजदूरों को टिकाऊ रोजगार तथा भरोसे की आय से वंचित करता है। यह गैरकानूनी प्रतिगामी कदम है जो इतिहास के चक्के को पीछे घुमाने पर अमादा है। औद्योगिक विवादअधिनियम की धारा 9ए एवं मजदूरपक्षी श्रम कानूनों को निष्क्रिय किया गया है। इस तरह काम का घंटा कम करने के साथ जीने लायक पारिश्रमिक और टिकाऊ रोजगार हासिल करने का संघर्ष मजदूर वर्ग के समक्ष दूसरी चुनौती आ खड़ी हुई है।हाल के दिनों में मंदी के नाम पर मजदूरों की छटनी बड़े पैमाने पर की गयी। मंदी, मुक्त बाजार व्यवस्था की देन है। इसका जिम्मेदार स्वयं पूंजीपति है मजदूर नहीं। जिस कृत्य का जिम्मेदार मजदूर नहीं उसकी मार मजदूर क्यों भुगते? मजदूरों के कंधे पर मंदी का हल बर्दाश्त-ए-काबिल नहीं है। इसीलिए रोजगार की सुरक्षा की तीसरी चुनौती मजदूर वर्ग के सामने दरपेश है।उपभोक्ता सामानों का दाम बढ़ाकर मुनाफा कमाना पूंजीपति वर्ग का अजमाया हुआ हथियार है। मजदूर वर्गीय संघर्षो से हासिल पारिश्रमिक वृद्धि को चीजों के दाम बढ़ाकर पूंजीपति वर्ग वापस छीन लेता है। महंगाई के मुद्दे पर आमजनों के हितों के साथ मजदूर वर्गीय हित अभिन्न रूप से जुड़ा है। मजदूर वर्ग के सामने यह महंगाई चौथी चुनौती है कि मजदूर वर्ग आम जनों के दुखों के साथ एक होकर वर्ग दुश्मनों की पहचान करे और उन्हें शिकस्त देने के लिए एकताबद्ध संघर्ष करे। सभी संकेत बताते हैं कि आनेवाले दिनों में देहात से शहर की ओर और पिछड़े इलाके से उन्नत क्षेत्र की तरफ जाने लायक रोजगार की तलाश में लोगों का पलायन और भी तेज होगा। इसके साथ ही उद्योग जगत में स्थायी रोजगार से अस्थायी और औपचारिक से अनौपचारिक उत्पादन पद्धति का प्रचलन भी बढ़ेगा। उत्पादन प्रक्रिया में ऐसे बदलाव की रफ्तार अधिकाधिक मुनाफा के निमित्त बढ़ाया जा रहा है। फलतः प्रवासी मजदूरों और अनौपचारिक श्रमजीवियों की बढ़ती तादाद को संविधान प्रदत्त सामाजिक सुरक्षा मुकम्मिल कराने का संघर्ष टेªड यूनियन आंदोलन के समक्ष पांचवी चुनौती है।देश के हर क्षेत्र में कार्पोरेट गवर्नेस का बाजार गर्म है। खुदरा बाजार का कार्पोटीकरण यहां तक कि कृषि क्षेत्र को भी कार्पोरेट के हवाले किया जा रहा है। कार्पोरेट गवर्नेस जिस गति से मजबूत हो रहा है, हमारा लोकतंत्र उसी क्रम में कमजोर हो रहा है। लोकतंत्र और कार्पोरेट सहयात्री नहीं बन सकते। लोकशाही और पूंजीशाही मूल रूप में विपरीतार्थक और परस्पर विरोधी दिशा है।देश की संसद को दरकिनार कर अंतराष्ट्रीय समझौते किये जा रहे हैं। संविधान के प्रावधानों के अंतर्गत कृषि राज्यों के मामले हैं, किन्तु राज्य विधान सभाओं और पार्लियामेंट की पीठ पीछे विश्व व्यापार संघ के समझौते पर हस्ताक्षर किये गये। सन् 1956 में संसद के दोनों सदनों द्वारा सर्वसम्मति से पारित औद्योगिक प्रस्ताव को नयी आर्थिक नीति की सरकारी घोषणा में खारिज कर दिया गया। मुक्त बाजार व्यवस्था को अपनाकर संविधान में वर्णित उदात्त समाजवादी आदर्शों की तिलांजलि दे दी गयी है। आत्मनिर्भर स्वावलंबी राष्ट्रीय अर्थतंत्र को साम्राज्यवादी वैश्वीकरण पर निर्भर बना दिया गया है। चंद व्यक्तियों के हाथों में पूंजी का संकेद्रण तेज गति से हो रहा है। विकास का लाभ देश के कुछेक व्यक्तियों तक सीमित है। देश का विशाल बहुमत विपन्न है। देश की संसद में करोड़पतियों ने बहुमत बना लिया है। इसलिए लोकतंत्र के क्षरण को रोकना और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को सुदृढ़ करना मजदूर वर्ग के सामने निर्णायक चुनौती है। हमें आर-पार की लड़ाई लड़नी है। तो आइये 2010 के मई दिवस के अवसर पर इन चुनौतियों का सामना करने और आम आदमी के हक में खुशहाल भारत बनाने का सामूहिक संकल्प लें।
- सत्य नारायण ठाकुर
- सत्य नारायण ठाकुर
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
मेरी ब्लॉग सूची
-
CPI Condemns Attack on Kanhaiya Kumar - *The National Secretariat of the Communist Party of India issued the following statement to the Press:* The National Secretariat of Communist Party of I...7 वर्ष पहले
-
No to NEP, Employment for All By C. Adhikesavan - *NEW DELHI:* The students and youth March to Parliament on November 22 has broken the myth of some of the critiques that the Left Parties and their mass or...9 वर्ष पहले
-
रेल किराये में बढोत्तरी आम जनता पर हमला.: भाकपा - लखनऊ- 8 सितंबर, 2016 – भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने रेल मंत्रालय द्वारा कुछ ट्रेनों के किराये को बुकिंग के आधार पर बढाते चले जाने के कदम ...9 वर्ष पहले
Side Feed
Hindi Font Converter
Are you searching for a tool to convert Kruti Font to Mangal Unicode?
Go to the link :
https://sites.google.com/site/technicalhindi/home/converters
Go to the link :
https://sites.google.com/site/technicalhindi/home/converters
लोकप्रिय पोस्ट
-
MANIFESTO OF PROGRESSIVE WRITERS ASSOCIATION ADOPTED IN THE FOUNDATION CONFERENCE 1936 Radical changes are taking place in India...
-
प्रेस नोट लखनऊ- 22 जुलाई 2023 , भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य तथा उत्तर प्रदेश , मध्य प्रदेश एवं राजस्थ...
-
The following is the text of the political resolution for the 22 nd Party Congress, adopted by the national council of the CPI at its sess...
-
Anshu Kumari Saturday YES...........YES IT'S TRUE,,,,,,,.......!!!!!!!! !!!!!!!!!!1 हां, यह सच है। '"सच ...
-
बिजली की बड़ी दरों के खिलाफ भाकपा ने जिलों में विरोध प्रदर्शन आयोजित किये लखनऊ- 11 सितंबर 2019 , उत्तर प्रदेश की योगी सरकार द्वारा 21 म...
-
लखनऊ- 1 सितंबर 2021 , उत्तर प्रदेश के चार वामपंथी दलों- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी , भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी ) , भाक...
-
लखनऊ ७ अगस्त १३-भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी,लखनऊ के ज़िला मंत्री मो.खालिक के नेत्रित्व में एक प्रतिनिधिमंडल आज नगर मजिस्ट्रेट श्री सीता राम गु...
-
लखनऊ- 9 सितंबर 2021 , भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी , उत्तर प्रदेश के राज्य सचिव मंडल ने कल केन्द्र सरकार द्वारा गन्ने और रबी फसलों के समर्...
-
क्रम चुनाव क्षेत्र जिला प्रत्याशी 1 - नेदुमंगद तिरूअनन्तपुरम एड. पी. रामचन्द्रन नायर 2 - चिरायिकिंल (अ.जा.) तिरूअनन्तपुरम वी. शशि 3 -...
-
ए.आई.एस.एफ. का पश्चिमी उत्तर प्रदेश का कार्यकर्ता सम्मेलन संपन्न सम्मेलन में झूठे देशभक्तों और पूंजीवादी ताकतों से लडने का लिया संकल्प: सबको...
0 comments:
एक टिप्पणी भेजें