भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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शनिवार, 6 अगस्त 2011

लो क सं घ र्ष !: आल इण्डिया स्टूडेन्ट्स फेडरेशन का इतिहास: महेश राठी


आल इण्डिया स्टूडेन्ट्स फेडरेशन भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन का बेहद गौरवमयी और प्रेरणाप्रद हिस्सा है। ए0आई0एस0एफ0 भारतीय स्वाधीनता संग्राम का वह भाग है जिसके माध्यम से देश के छात्र समुदाय ने आज़ादी की लड़ाई में अपने संघर्षों और योगदान की अविस्मरणीय कथा लिखी। भारतीय इतिहास में छात्रांे के इस गौरवशाली संघर्ष गाथा का सफर 19वीं सदी से आरम्भ होकर आज़ाद भारत के तमाम उतार-चढ़ावांे से होते हुए 21वीं सदी के वर्तमान पड़ाव तक पहुँचता है।
भारतीय छात्र आन्दोलन का संगठित रूप 1828 में सबसे पहले कलकत्ता में एकेडमिक एसोसिएसन के नाम से दिखाई देता है, जिसकी स्थापना एक पुर्तगाली छात्र विवियन डेरोजियों द्वारा की गई। एकेडमिक एसोसिएसन देश का पहला छात्र संगठन था जिसने सामंतवाद विरोधी, स्वतंत्रता, प्रगति और आधुनिकता जैसे विचारों के प्रचार-प्रसार का काम किया। एकेडमिक एसोसिएसन के पश्चात दूसरा संगठित रूप 1840 से 1860 के मध्य यंग बंगाल मूवमेंट के रूप में दिखाई पड़ता है। यंग बंगाल मूवमेंट ने बंगाल के सामाजिक और राजनैतिक जीवन पर गहरा प्रभाव छोड़ा। इसके बाद भी छात्र संगठनों के रूप में छोटी और लगातार कोशिशंे दिखाई पड़ती हैं। इन सबके अलावा छात्र संगठन के रूप में दूसरी महत्वपूर्ण कोशिश 1948 में दादा भाई नौरोजी की पहल पर मुम्बई में स्टूडेन्ट्स लिटरेरी और साइंटिफिक सोसायटी के रूप में जान पड़ती है। कलकत्ता के आनन्द मोहन बोस और सुरेन्द्र नाथ बनर्जी द्वारा 1876 में स्थापित स्टूडेन्ट्स एसोसिएसन संभवतः 19वीं सदी का सबसे महत्वपूर्ण संगठन था। इस संगठन के नेतृत्व ने संगठन बनाने के लिए पहली बार जनसभाओं एवं जनान्दोलनों का सहारा लिया इसके अलावा इस संगठन ने 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना में विशेष एवं महती भूमिका अदा की। इन कुछ महत्वपूर्ण कोशिशांे के अलावा भी देश के कई अन्य भागों में युवा एवं छात्र संगठनों और छात्र आन्दोलनों की पहल अनेक छात्र नेताओं द्वारा की गई।
19वीं सदी का अन्तिम दशक और 20वीं सदी का शुरुआती दौर काफी घटना प्रधान समय था। विशेषतौर पर शिक्षा के प्रसार के लिए कई काम किए जा रहे थे, जहाँ बम्बई विश्वविद्यालय, मद्रास विश्वविद्यालय, कलकत्ता विश्वविद्यालय और इलाहाबाद विश्वविद्यालय की स्थापना हो चुकी थी तो वहीं कई काॅलेज और विद्यालयों की स्थापना भी इस दौर में हो रही थी। माध्यमिक और उच्चतर शिक्षा लेने वाले छात्रों की संख्या जहाँ दो लाख थी, स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर पर 14 हजार से भी अधिक छात्र शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। एक प्रकार से यह वह समय था जब छात्र आन्दोलन और संगठनों के लिए भौतिक परिस्थितियाँ धीरे -धीरे तैयार हो रही थीं। 20वीं सदी के शुरुआती दशक की परिस्थितियाँ छात्र आन्दोलनों और संगठनों के लिए बेहद उपयुक्त थीं। बंगाल विभाजन ने जहाँ देश की राजनीति पर एक अमिट छाप छोड़ी तो वहीं छात्र एवं युवा भी इस घटना से उद्वेलित और आन्दोलित हुए बिना नहीं रह सके। 1902 में स्थापित डान सोसायटी इस दौर का बेहद प्रभावशाली संगठन था। इंडियन यूनिवर्सिटीज कमीशन की एक रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद छात्र और शिक्षाविदों ने मिलकर 1902 में इस संगठन की स्थापना की। शिक्षा के लिए सबसे पहले स्वदेशी संस्थानों की माँग करने वाले इस संगठन ने ही भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में स्वदेशी और बंग भंग विरोध का आधार तैयार किया। 16 अक्टूबर 1905 में बंगाल का विभाजन हो गया। विभाजन के विरोध स्वरूप देश भर में बंग भंग विरोधी एक आन्दोलन उठ खड़ा हुआ। प्रतिरोध की इस आग के कारण छात्र समुदाय में भी एक जबरदस्त विरोध का उभार दिखाई दिया। इसी विरोध के परिणाम स्वरूप विदेशी वस्तुओं और वस्त्रों के बहिष्कार और स्वदेशी के इस्तेमाल और स्वदेशी शिक्षा की माँग को लेकर देश भर में स्वदेशी आन्दोलन की शुरुआत हुई। बंग भंग विरोध एवं स्वदेशी आन्दोलन भारत का पहला बड़ा छात्र-युवा आन्दोलन था, जिसमें कुछ दूसरे तबकों ने भी भाग लिया। इस आन्दोलन ने भारत के इतिहास में गहरा प्रभाव छोड़ा जिस कारण बाद के वर्षों में कई संगठनो और आन्दोलनांे ने जन्म लिया और इस आन्दोलन का फैलाव भी देश के अन्य भागों में होना शुरू हुआ। यह दौर छात्र समुदाय की संख्या में उतारोतर बढ़ोत्तरी के साथ ही छात्रांे की राजनैतिक गतिविधियों में भी गुणात्मक और मात्रात्मक उभार का था। छात्रों के संगठित होने की इसी कड़ी में 1906 में पटना में बिहारी स्टूडेन्ट्स सेन्ट्रल एसोसिएशन की स्थापना राजेन्द्र प्रसाद की पहल पर हुई। राजेन्द्र प्रसाद आगे चलकर आज़ाद भारत के पहले राष्ट्रपति बने। बिहारी स्टूडेन्ट्स सेन्ट्रल एसोसिएशन ने बिहार के सभी जिलों में अपनी शाखाएँ स्थापित करने के साथ ही कलकत्ता और बनारस तक भी संगठन का फैलाव किया। इस संगठन की स्थापना कोई अस्थायी घटना नहीं थी, यह संगठन 1921 के बाद तक भी संगठन के सम्मेलन नियमित रूप से आयोजित करता रहा और इसके अलावा 1908 में बिहार में कांग्रेस की स्थापना में भी इस छात्र संगठन की महती भूमिका रही।
एनी बेसेंट ने 1908 में बनारस से सेन्ट्रल हिन्दू कॉलेज नामक पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ किया। जिसमें उन्होंने कई बार एक अखिल भारतीय छात्र संगठन की आवश्यकता पर बल दिया। एनी बेसेंट की इन्हीं कोशिशों के कारण देश के शिक्षित हिस्से, छात्र, अध्यापक और राजनेताओं में अखिल भारतीय छात्र संगठन की जरूरत पर चर्चा होना शुरू हो गई। इन्हीं चर्चाओं के चलते 1917 में रूसी क्रान्ति हो गई जिसके कारण दुनिया में माक्र्सवादी विचारों का तेजी से प्रचार-प्रसार होना शुरू हो गया। समाजवाद के इस प्रचार ने दुनिया के स्वतंत्रता आन्दोलनांे पर गहरा प्रभाव छोड़ा तो वहीं दूसरी तरफ ब्रिटिश साम्राज्यवाद के संकटों को भी बढ़ाया। भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन में भी इन बदली हुई परिस्थितियों के कारण तेजी देखने में आई। भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के क्षितिज पर कई क्रान्तिकारी और जनाधार वाले नेताओं का उदय हुआ इनमें तिलक, महात्मा गांधी, लाला लाजपत राय, जवाहर लाल नेहरू और सुभाष चन्द्र बोस प्रमुख नाम थे। इसके साथ ही समाजवादी और वामपंथी विचारांे के फैलाव में भी तेजी आई। इसी के साथ 1919-20 में कई शहरों और प्रांतों में छात्र सम्मेलनों का आयोजन किया गया। यह असहयोग-आन्दोलन की तैयारियों का समय था। अन्त में दिसम्बर 1920 में कांग्रेस अधिवेशन के मौके पर एक अखिल भारतीय स्तर के छात्र सम्मेलन के आयोजन पर सहमति बनी। जिसके कारण 25 दिसम्बर 1920 को नागपुर में आॅल इंडिया काॅलेज स्टूडेन्ट्स काॅन्फ्रेंस का आरम्भ हुआ। इस सम्मेलन की स्वागत समिति के अध्यक्ष आर0 जे0 गोखले थे और इसका उद्घाटन लाला लाजपत राय ने किया। इस सम्मेलन में निर्णय लिया गया कि सभी छात्र असहयोग-आन्दोलन और स्वदेशी आन्दोलन में बढ़ चढ़कर भाग लेंगे। यह देश का पहला अखिल भारतीय स्तर का छात्र सम्मेलन था। इस पहल की खबर पूरे देश में तेजी से फैली और इसने छात्रांे के अन्दर एक नई तरह की राजनैतिक समझदारी और उत्साह का संचार किया। इस संगठन के कम से कम पंच सम्मेलन आयोजित किए गए और संगठन के तौर पर इस पहल ने कुछ वर्षांे तक सक्रियता के साथ काम किया।
1920 से 1935 के बीच का समय काफी घटना प्रधान था। इस दौरान देश में बड़े स्तर पर विद्याालयों और महाविद्यालयों की भी स्थापना हुई। छात्र समुदाय की संख्या में लगभग तीन गुना बढ़ोत्तरी 20वीं सदी की शुरुआत से अब तक हो चुकी थी। यह देश में एक मजबूत छात्र आन्दोलन के लिए भौतिक परिस्थितियाँ और आधार तैयार होने की प्रक्रिया थी। बड़ी संख्या के साथ ही देश की आजादी के संघर्षो में भी अब छात्रांे की एक महत्वपूर्ण भूमिका दिखाई दे रही थी। छात्र समुदाय अब राष्ट्र के सार्वजनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था। इसी के साथ नए-नए छात्र संगठनों के बनने की प्रक्रिया तेज हो रही थी। इसी दौर में 1928-30 के मध्य देश में यूथ लीग मूवमेंट नामक एक संगठन का निर्माण कुछ छात्र युवाआंे ने मिलकर किया। इस संगठन ने छात्रों और युवाओं के मध्य क्रान्तिकारी विचारांे का तेजी से प्रचार किया। यह संगठन छात्र, युवाओं के मध्य वामपंथी और माक्र्सवादी विचारों को ले जाने का वाहक बनकर उभरा। सोवियत रूसी क्रान्ति के प्रभाव से देश में छात्रों और युवाओं ने एक नई क्रान्तिकारी विचारधारा की राह प्रशस्त की। देश में समाजवादी क्रान्ति का शुरुआती सपना बुनने वालों में जवाहर लाल नेहरू, यूसुफ मैहर अली, सुभाष चन्द्र बोस और पूरन चन्द्र जोशी प्रमुख नाम थे। इस संगठन ने काॅलेज, स्कूल, गली मोहल्लों और बस्तियों के स्तर पर देशभर में संगठन की स्थापना की तथा लगातार पत्र पत्रिकाएँ प्रकाशित करके भी एक देशव्यापी छात्र संगठन के भविष्य की नींव रखी। छात्र आन्दोलनों की इसी कड़ी में पूरे देश में लगातार अलग-अलग प्रांतों में छात्र सम्मेलनों का आयोजन होता रहा। 1928 में कलकत्ता में पं0 जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में एक आॅल इण्डिया सोशलिस्ट यूथ कांफ्रेंस का आयोजन किया गया तो वहीं 1929 में लाहौर में मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में आल इण्डिया स्टूडेन्ट्स कंवेंशन का भी आयोजन किया गया, 1920-30 के मध्य पूरे देश के सभी प्रांतो में मानो छात्र संगठनो, सम्मेलनों और छात्र संघों की बाढ़ सी आ गई थी। लगातार छात्र संगठनों के बनने की ये घटनाएँ दरअसल एक अखिल भारतीय छात्र संगठन की जरुरतांे और उसके बनने की प्रक्रिया को रेखांकित कर रही थीं। पंजाब, बिहार, यूपी, मद्रास, कलकत्ता, इलाहाबाद, आसाम, बंगाल, लाहौर और सिंन्ध सभी जगह छात्र संगठन बन रहे थे जिनमें से अधिकतर का विलय आगे चलकर ए0आई0एस0एफ0 में हो गया। इनमें से कई संगठनों का किसी राजनैतिक धारा से जुड़ाव था तो कई बिल्कुल अराजनैतिक एवं स्वतंत्र संगठन थे।

क्रमश:
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शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

जननी-शिशु सुरक्षा कार्यक्रम: नयी घोषणाओं से क्या होगा जब सार्वजनिक चिकित्सा सेवा है ठप्प


सरकारी आंकडों के ही अनुसार देश में हर साल लगभग अड़सठ हजार महिलाओं की मौत प्रसव के दौरान हो जाती है और जन्म के एक महीने के भीतर ही नौ लाख से ज्यादा बच्चे मर जाते हैं और सरकार का दावा है देश तरक्की कर रहा है और आर्थिक वृद्धि 9 प्रतिशत के लगभग चल रही है।

महंगाई भ्रष्टाचार, घोटालों और काले धन के मुद्दों से बुरी तरह घिरी सरकार को अब जनता के मुद्दे याद आने लगे हैं, जो उसने ”जननी शिशु सुरक्षा“ कार्यक्रम की घोषणा कर दी और दावा कर रही है कि सभी राज्यों को निर्देश दिया गया है कि वे गर्भवती महिलाओं को अस्पताल में रहने के दौरान मुफ्त दवा और भोजन की व्यवस्था करायें और उन्हें सभी तरह की जांॅच और अस्पताल आने-जाने का खर्च या साधन उपलब्ध करायें।

कोई भी समझ सकता है कि सरकार के इस तरह के दावे का कोई मतलब नहीं रह जाता जब सरकार ने स्वयं ही सरकारी डिस्पेंसरियों, जिला अस्पतालों और अन्य बड़े अस्पतालों को पहले ही पंगु बना दिया है। स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में सरकार की सारी कोशिश प्राइवेट अस्पतालों को बढ़ावा देने की और सरकारी अस्पतालों को कमजोर करने की तरफ है। इसी नीति के तहत किसी भी सरकारी अस्पताल में न पूरे डाक्टर है, न नर्स, न फार्मासिस्ट, न एक्सरे स्टाफ, न लेब्रोरेटरी स्टाफ, न अस्पतालों में दवाईयां है, न सरकारी अस्पतालों की एक्सरे मशीन चालू हैं, न अल्ट्रा साउंड मशीनें, न लेबोरेटरियां, कहीं एक्सरे मशीन है तो स्टाफ नहीं। कहीं स्टाफ है तो एक्सरे मशीन नहीं। यदि एक्सरे स्टाफ और मशीनें दोनों हैं तो भी मरीजों का एक्सरे नहीं होता क्योंकि अस्पताल के बाहर कई प्राइवेट निदान केन्द्र एक्सरे मशीनें लिए बैठे हैं जो सरकारी अस्पताल के सुपरिन्टेन्डेन्ट को कमीशन देते हैं। अतः मरीजों को बाहर ही एक्सरे कराने पर मजबूर किया जाता है। खून की जांच और अन्य सभी जांचों के मामले में भी यही होता है।

इस सबके लिए केवल अस्पताल सुपरिडेंन्ट ही जिम्मेदार नहीं। सरकार की ऊपर से नीचे तक यही नीति है कि सभी काम प्राइवेट में ही कराये जायें। सुपरिटेंडेंट भी उसी नीति को अमल में ला रहे हैं।

अब तो सरकारी अस्पतालों में फीस भी ली जाने लगी है। देश की राजधानी दिल्ली में भी सरकार के विभिन्न अस्पतालों में अलग-अलग काम के लिए फीसें तय हैं। फीस दिये बगैर कोई काम नहीं होता और साल-दर-साल अस्पताल की एक बाद दूसरी सेवा पर फीस की व्यवस्था लागू की जा रही है।

जब सरकारी डिस्पेंसरियों और अस्पतालों का सरकार ने यह हाल कर रखा है तो ”जननी-शिशु सुरक्षा कार्यक्रम“ की घोषणा से क्या होगा जबकि सरकार का सारा जोर सरकारी अस्पतालों को ठप्प करने का और प्राइवेट क्लीनिकों, प्राइवेट नर्सिंग होमों और प्राइवेट अस्पतालों को बढ़ावा देने का है।

पिछले सप्ताह दिल्ली के अखबार में खबर छपी कि एक व्यक्ति अपने बच्चे को लेकर एम्स गया, एम्स जो दिल्ली का सबसे बड़ा अस्पताल है। यह सरकारी अस्पताल है। बच्चे को हृदय की कोई समस्या थी उसे कहा गया कि इस इलाज के लिए 21000 रूपये पहले जमा कराओ तब इलाज शुरू होगा। इतने पैसे उसके पास थे नहीं, बच्चे को लेकर वापस अपने घर चला गया। किसी तरह वह इस मामले को हाईकोर्ट ले गया। जाहिर है किसी भले और तेज दिमाग वकील ने इसमें उसकी मदद की होगी। हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि पैसे नहीं है इस कारण बच्चे का इलाज नहीं हो सकता यह गलत बात है। हाईकोर्ट ने दिल्ली के जीबी पंत अस्पताल को, जो दिल्ली का एक अन्य बड़ा सरकारी अस्पताल है और जहां हृदय चिकित्सा के विशेष प्रबंध हैं, आदेश दिया कि इस बच्चे का इलाज किया जाए। अब मामला इतना उछल गया है और हाईकोर्ट का आदेश हो गया है तो उसका इलाज अवश्य ही हो जायेगा। पर देश का हर आदमी तो इस तरह अदालत के जरिये राहत नहीं पा सकता।

स्वयं विश्व बैंक की रिपोर्ट है कि एक तिहाई भारतीय तो पैसे न होने के कारण इलाज के लिए जाते ही नहीं हैं। अन्य रिपोर्टों के अनुसार, सरकारी अस्पतालों में इलाज की समुचित व्यवस्था न होने के कारण जो लोग निजी अस्पतालों में इलाज कराने की हिम्मत करते हैं उनमें से बड़ी तादाद में लोग घर की परिसम्पत्तियां बेचकर ही इलाज का खर्च चुकाते हैं। इस हालत के लिए नवउदारवाद की आर्थिक नीतियां जिम्मेदार है। इन नीतियों को बदले बिना जननी सुरक्षा कार्यक्रम महज घोषणा बन कर रह जाते हैं।

- आर.एस. यादव
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गुरुवार, 14 जुलाई 2011

भूमंडलीकरण या लोगों को हाशिये पर धकेलना


गौतमबुद्धनगर के साबेरी गांव के भूमि अधिग्रहण को इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा निरस्त करने के फैसले के खिलाफ उत्तर प्रदेश सरकार, ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण तथा बिल्डरों ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील दाखिल की थी। सर्वोच्च न्यायालय ने 5 जुलाई को अपील पर सुनवाई की तथा 6 जुलाई को अपना निर्णय सुना दिया। सुनवाई के दौरान और फिर अपने निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने जो तल्ख टिप्पणियां की हैं, वे न केवल काबिले तारीफ हैं बल्कि वे उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार के साथ-साथ केन्द्रीय सरकार एवं सरमायेदारों के लिए भूमि अधिगृहीत करने वाली राज्य सरकारों के लिए आईना हैं। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जी.एस. सिंघवी एवं न्यायमूर्ति ए.के.गांगुली की खंड पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार की भूमि अधिग्रहण नीति को जनविरोधी बताते हुए आपात उपबंध के गलत इस्तेमाल का आरोप लगाया। सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार से सवाल किया कि विकास के नाम पर वह कर क्या रही है? किसानों की खेतिहर जमीन मल्टीप्लेक्स और मॉल बनाने के लिए अधिगृहीत की जा रही है जो आम आदमी की पहुंच से दूर हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अगर सरकार नहर या पुल बनाने के लिए जमीन अधिगृहीत करती तो समझ आता लेकिन यहां तो जमीन मॉल, होटल और टाउनशिप के लिए ली गयी है।

बिल्डरों द्वारा लगाये गये ब्रोशरों पर टिप्पणी करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि स्पॉ, स्विमिंग पूल, आयुर्वेदिक मसाज, हेल्थ क्लब वाले ये फ्लैट क्या गरीबों के लिए बन रहे हैं? जिनकी जमीने ली गयीं हैं वे क्या इन्हें खरीद पायेंगे? सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अन्य राज्यों में भी यही बदतर हालात हैं।

मामले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यों की भूमि अधिग्रहण नीति पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकारें इस कानून एवं इन नीतियों को दमन यंत्र की तरह इस्तेमाल कर रहीं हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने सवाल किया आखिर भूस्वामी किसानों को क्या मिला - मुकदमेंबाजी और लाठियां। पुरूष जेल गये और महिलाओं से दुवर््यवहार किया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने सुनवाई के दौरान कहा कि जमीन किसान की मां होती है। इस टिप्पणी को बहुत गंभीरता से लिये जाने की जरूरत है, इसके गहन निहितार्थ हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने आगे कहा कि एक किसान से जमीन लेने पर सिर्फ उसी के जीवन यापन का साधन नहीं जाता। इसके भी बहुत गंभीर अर्थ हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने आगे टिप्पणी की कि किसानों को मिलता है थोड़ा सा मुआवजा जिसे वह मुकदमेबाजी में खर्च करता है।

बिल्डरों के वकीलों ने दलील देने की कोशिश की कि किसानों ने मुआवजा ले लिया है तो सर्वोच्च न्यायालय ने फिर सवाल किया कि अगर वे मुआवजा नहीं लेते तो उनके पास और क्या विकल्प था? सरकारें उनकी जमीने हड़प कर उन्हें गुलाम बना रही है। ये ‘भूमंडलीकरण’ (ग्लोबलाईजेशन) नहीं है बल्कि ‘लोगों को हाशिये पर धकेलना’ (मार्जिनलाइजेशन) है। सरकार किसानों को हाशिये पर डाल रही है। ये किसी विपक्षी दल के आरोप नहीं सरकारों पर देश के सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ की टिप्पणियां हैं, इसलिए इनकी अपनी गंभीरता है।

अगले दिवस अपना फैसला सुनाते हुए सर्वोच्च न्यायालय की खंड पीठ ने भूमि उपयोग को औद्योगिक से आवासीय करने पर ग्रेटर नोएडा अधिकरण पर बिल्डरों के साथ सांठगांठ करने का आरोप लगाते हुए उस पर रू. 10.00 लाख का जुर्माना भी ठोंक दिया जिसे गरीब वादकारियों की मदद करने पर खर्च किया जायेगा। सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार पर कानून के अधीन अपने अधिकारों के भ्रष्ट दुरूपयोग का आरोप लगाते हुए कहा कि भूमि अधिग्रहण कानून के ‘अत्यावश्यक’ प्राविधानों को किसी जन हित में नहीं बल्कि बिल्डर्स को फायदा पहुंचाने के इरादे से उपयोग किया गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात की भी नोटिस ली कि इंडस्ट्रियल टाउनशिप के लिए अधिगृहीत कुल भूमि के 60 फीसदी का उपयोग अब तक नहीं किया जा सका है।

यह तो सर्वोच्च न्यायालय का अभिमत है लेकिन पूंजी नियंत्रित समाचार माध्यमों ने इस फैसले को आशियाने के लिए प्रतीक्षारत मध्यमवर्गीय परिवारों पर हमला करार देने की असफल कोशिश की। इस निर्णय में ही सर्वोचच न्यायालय ने बिल्डरों के ब्रोशरों का जिक्र करते हुए तल्ख टिप्पणी की है। क्या इस देश के मध्यम वर्ग का कोई ईमानदार व्यक्ति इन फ्लैटों को खरीदने का ख्वाब देख सकता है? हरगिज नहीं! पूंजी नियंत्रित समाचार माध्यम पूंजी पर हर हमले पर जनमत अपने पक्ष में बनाने की कोशिश करते हैं। यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि ऐसा करना जनहित में नहीं है। एक बार फिर उन्होंने यह प्रयास किया परन्तु असफल रहे हैं।

पूंजीवाद का जो दंश भारतीय जन-मानस इस समय झेल रहा है, उसमें इस तरह के पूंजी नियंत्रित समाचार माध्यमों के प्रयास सफल नहीं हो सकते। देश को एक वामपंथी समाचार तंत्र की जरूरत है, जिस पर हमें गौर करना होगा।

- प्रदीप तिवारी
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बी.एड. में प्रवेश - उत्तर प्रदेश सरकार का नया स्कैन्डल


लखनऊ 14 जुलाई। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव डा. गिरीश ने उत्तर प्रदेश सरकार पर बी.एड. प्रवेश के नाम पर एक नया स्कैन्डल करने का आरोप लगाते हुए कहा है कि गैर वित्तपोषित और संसाधन-विहीन संस्थानों को बी.एड. की कक्षाएं चलाने के लिए मान्यता जारी रखने और नई मान्यता दिये जाने के नाम पर सरकार द्वारा शिक्षा माफियाओं से दस लाख पचास हजार रूपये प्रति कालेज लिया गया है तथा उसकी भरपाई कराने के लिए बी.एड. की फीस 51,000/- रूपये तय की गयी है।
लखनऊ के लोग आज भी लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा इसी तरह एक संसाधनविहीन कालेज को बी.एड. कक्षायें चलाने के लिए पिछले साल दी गयी मान्यता के प्रकरण को भूले नहीं हैं।
भाकपा राज्य सचिव ने एक प्रेस बयान में कहा है कि प्रदेश सरकार द्वारा बी.एड. प्रवेश के लिए आज से शुरू हो रही कौंसिलिंग में आरक्षित और अनारक्षित दोनों श्रेणियों में प्रवेश के लिए छात्रों को पूरे साल की फीस रू. 51,000/- का ड्राफ्ट कौंसिलिंग के समय ही जमा कराने की शर्त रख कर प्रदेश के वंचित एवं शोषित तबकों के साथ-साथ मध्यम वर्ग के तमाम विद्यार्थियों को प्रवेश से वंचित रखने का निन्दनीय कार्य किया है जिसके लिए प्रदेश की जनता मायावती सरकार को क्षमा नहीं करेगी। प्रेस बयान में कहा गया है कि विश्वविद्यालयों तथा सहायता प्राप्त कालेजों में तो शिक्षकों का वेतन भुगतान राजकोष से किया जाता है और उसके अतिरिक्त विश्वविद्यालय अनुदान आयोग भी संसाधनों के लिए पैसा मुहैया कराता है, उनके लिए भी रू. 51,000/- की फीस का निर्धारण किसी भी कीमत पर उचित नहीं है। प्रेस बयान में आगे कहा गया है कि जब लखनऊ विश्वविद्यालय और आई.टी. कालेज स्ववित्तपोषित विज्ञान के कोर्सों (जिसमें प्रयोगशालाओं में महंगे उपकरण तथा रसायनों की व्यवस्था करनी होती है) के लिए बीस-तीस हजार रूपये फीस वसूल करते हैं, तब बी. एड. कक्षाओं के लिए 51,000 की फीस समझ से परे है। भाकपा ने विश्वविद्यालयों एवं डिग्री कालेजों द्वारा मासिक एवं द्विमासिक आधार पर शुल्क जमा करने की व्यवस्था समाप्त कर पूरे साल की फीस प्रवेश के समय ही जमा कराने की कटु निन्दा की है।
भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने माननीय राज्यपाल महोदय जोकि प्रदेश के विश्वविद्यालयों के कुलपति भी हैं, तथा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से अपील की है कि वे इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार के इस नए स्कैन्डल की जांच कराने, बी.एड. कक्षाओं का शुल्क घटाने तथा संसाधनविहीन कालेजों की मान्यता रद्द करने के लिए उचित कार्यवाही अविलम्ब करें।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी इस मामले में प्रदेश के बुद्धिजीवी तबके से भी अपील करती है कि वे आगे आयें और प्रदेश के राज्यपाल तथा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष को उचित पत्र भेजें।
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शनिवार, 9 जुलाई 2011

किसान हित में नहीं राहुल की छवि निर्माण के लिए थी कथित किसान पंचायत - भाकपा


लखनऊ 9 जुलाई। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि आज किसानों के नाम पर अलीगढ़ में हुआ कांग्रेस का जमाबड़ा किसानों के हित में नहीं था। केन्द्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस का यह जमाबड़ा केवल राहुल गांधी की छवि निर्माण के लिए था।
भाकपा ने कहा है कि आज पूंजीवादी राजनीति नेतृत्व की विश्वसनीयता के संकट से गुजर रही है। अतः कार्पोरेट घराने, कांग्रेस और कार्पोरेट मीडिया राहुल गांधी को गरीबों के हितैषी के रूप में उछालने में जुटे हैं। वे लोगों का ध्यान इस बात से हटाना चाहते हैं कि भूमंडलीकरण, उदारीकरण, निजीकरण की जिस राजनीति के तहत आज उत्तर प्रदेश सहित देश के तमाम भागों में किसानों की उपजाऊ जमीनों का बेतहाशा अधिग्रहण किया जा रहा है, वह नीतियां कांग्रेस की देन हैं।
डा. गिरीश ने कहा कि भाकपा, वामपंथी दल तथा कई किसान संगठन दादरी से लेकर आज तक जमीनों को बचाने की लड़ाई लड़ते रहे और तमाम जगह किसानों को न्याय दिलाने में कामयाब रहे। मगर मीडिया ने कभी उसकी समुचित चर्चा नहीं की। आज जब अलीगढ़ में केन्द्र सरकार, कांग्रेस संगठन और भ्रष्टाचार के धन के बल पर एक भीड़ जुटाई गई है तो उसकी आड़ में एक व्यक्ति विशेष का महिमामंडन किया जा रहा है। लेकिन जादू सिर पर चढ़ कर बोला और श्री राहुल गांधी उपजाऊ जमीनों को अधिग्रहण से बचाने के लिये 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून का ठोस प्रारूप जनता के सामने नहीं रख पाये और न ही किसानों को आत्म हत्याओं से बचाने और उनके खाद, बीज, डीजल, बिजली के संकट के विषय में कोई ठोस योजना ही पेश कर पाये। यह रैली पूरी तरह कांग्रेस के लिये ‘स्वान्तः सुखाय’ रैली ही साबित हुई, डा. गिरीश ने दावा किया है।
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गुरुवार, 7 जुलाई 2011

भ्रष्टाचार के विरूद्ध संघर्ष और बाबा रामदेव


बाबा रामदेव एक कुशल योग गुरू है। विभिन्न स्थानों पर आयोजित उनके योग कैम्पों में हमेशा अच्छी खासी उपस्थिति रहती है। टीवी चैनल उन्हें देश के लाखों दर्शकों का नियमित रूप से टेलीकास्ट करते हैं। इससे उनके शिष्यों-अनुयायियों और योग अभ्यास करने वालों की संख्या बहुत बड़ी हो गयी है।

पर वह अपने देश के लोगों में योग को लोकप्रिय बनाने वाले बाबा ही नहीं हैं। वह एक चतुर बिजनेस मैन भी हैं। उन्होंने योग का अभूतपूर्व व्यवसायीकरण कर लिया है। उनके कैम्पों में हिस्सा लेने वाले लोगों को भी बड़ी रकम देनी पड़ती है जो इस पर निर्भर है कि वे कौन सी लाइन में बैठते हैं। कहा जा सकता है कि इस समूची प्रक्रिया मंे व्यवसायीकरण में कुछ भी गलत नहीं। आखिर सारे बंदोबस्त का खर्च निकालना होता है।

बाबा हर एक “आसन” और “प्राणायाम” और उससे होने वाले फायदों पर भाषण करते हैं, सीख देते हैं, इस मौके को, जैसा वह ठीक समझते हैं उस तरह के, राजनैतिक प्रवचन देने के लिए भी इस्तेमाल करते हैं यह सच है कि उनके प्रवचनों की विषय वस्तु में भ्रष्टाचार, कालेधन को बाहर निकालने जैसे मुद्दे भी होते हैं।

चतुर-चालाक बाबा ने योग के शिक्षण को वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों, कम्पनियों एवं ट्रस्टों के एक सिलसिले को कायम करने-चलाने, विभिन्न आयुर्वेदिक दवाओं को बेचने, सरकारी पैसे से फूड पार्क चलाने जैसी बातों से जोड़ दिया है। बाबा रामदेव और उनके सहयोगियों के तत्वावधान में सचमुच एक व्यापारिक साम्राज्य कायम हो गया हैं

अब रिपोर्टें हैं कि इस तरह की कम्पनियां और वाणिज्यिक संस्थाओं की संख्या 200 से कम नहीं है। प्रश्न पूछा जा सकता हैः क्या सरकार को उनका पता अब रामलीला मैदान की घटना के बाद चला है? या यदि सरकार पहले उनके बारे में जानती थी तो इस तमाम अरसे में चुप क्यों रही? ये प्रासंगिक मुद्दे हैं जिससे ऐसे मुद्दों पर सरकार की मिलीभगत का और जब मौका पड़े तो कार्रवाई करने के उसके दोगलेपन का इशारा मिलता है। बाबा की इस जबर्दस्त आमदनी ने उन्हें पांच सितारा संस्कृति विकसित करने, निजी जेट खरीदने एवं किराये पर लेने और यहां तक कि आराम एवं विश्राम के लिए स्काटलैंड के समुद्रतट के पास एक टापू खरीदने की सामर्थ्य प्रदान कर दी है। संभवतः आज की दुनिया में इन तमाम बातों की भी इजाजत है।

जनता के बड़े तबकों से उन्हें जो रेस्पोंस मिलता है उसे देखकर बाबा ने राजनीति के मैदान में कूदने का फैसला किया। कुछ समय तक वह अपनी स्वयं की एक पार्टी बनाने पर सोचते रहे। पर उनके नजदीक के लोगों ने उन्हें सलाह दी कि पहले ही ऐसी राजनैतिक पार्टियां और रूझान हैं जो उन्हें साथ लेकर चलने के लिए सहर्ष उत्सुक होंगी, देश में आज जो तूफानी राजनैतिक वातावरण बना हुआ है उसमें स्वयं की पार्टी बनाने के मुकाबले वह अधिक फायदे की बात होगी। हमने देखा कि जब उन्होंने अपने आंदोलन की घोषणा की तो संघ परिवार किस कदर तेजी के साथ उनके मंच पर चढ़ गया।

भ्रष्टाचार आज एक ज्वलंत मुद्दा है। यूपीए सरकार के एक के बाद दूसरे भ्रष्टाचारों का जो सिलसिला सामने आया है जनता में उससे जबर्दस्त आक्रोश है। कम्युनिस्ट और वामपंथ इन मुद्दों का निरंतर संसद के अंदर और बहार उठाते रहे हैं और उन पर आंदोलन करते रहे हैं। यह नोट किया जाना चाहिए कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता गुरूदास दासगुप्त ने 2008 में कालेधन के मुद्दे को लोकसभा में विचार-विमर्श के लिए उठाया था और मांग की थी इसे वापस लाया जाये। उस समय श्री लालकृष्ण आडवाणी चुप्पी साधे रहे। 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले, राष्ट्रमंडल खेल घोटाले और अन्य कई घोटालों में इतने बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और उसमें मंत्रियों एवं कुछ राजनेताओं की संलिप्तता ने देश के आम आदमी को स्तब्ध कर दिया है। अन्ना हजारे के अनशन के फलस्वरूप स्वतःस्फूर्त तरीके से व्यापक लहर पैदा हो गयी जिससे मांग उठी कि घोटालेबाजों के विरूद्ध कानूनी कार्रवाई की जाये और भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने, जांच करने, भ्रष्टाचारियों को सजा देने और उनकी परिसम्पत्तियों को जब्त करने के लिए एक प्रभावी जन लोकपाल बिल पारित किया जाना चाहिये ताकि भ्रष्टाचार को रोका जा सके।

भ्रष्टाचारपूर्ण सौदों का एक सबसे बुरा असर देश के अंदर एक सामानांतर अर्थव्यवस्था के रूप में चलने वाले काले धन के प्रचुर सृजन के रूप में सामने आता है जबकि उसका बड़ा हिस्सा उन विदेशी बैंकों में जमा हो जाता है जो टैक्स हेवन (टेक्स चोरी के पैसे को आश्रय देने वाले) देशों में काम करते हैं। स्वाभाविक ही है कि मांग उठी है कि इस काले धन को वापस लाया जाये और राष्ट्र की अपनी परिसम्पत्ति के रूप मंे उसे जब्त किया जाये। कालेधन के अपराधियों के नामों का पर्दाफाश किया जाना चाहिए और उन्हें सख्त सजा दी जानी चाहिए।

इस तरह के बड़े पैमाने के भ्रष्टाचार की जड़ में हैं नव उदारवादी आर्थिक नीतियां। पूंजीवादी सरकार इस तरह की नीतियों पर चलने के लिए जिम्मेवार है। वह कालेधन के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई करने की इच्छुक नहीं। पर बढ़ते जन आक्रोश ने इस अनिच्छुक सरकार को इस तरह के लोकपाल बिल को ड्राफ्ट करने के लिए सहमत होनेे पर मजबूर कर दिया। पर बिल की अनेक धाराओं के बारे में रूकावटें खड़ी की जा रही है। इस पर हम बाद में विचार कर सकते हैं।

इसी बीच बाबा रामदेव अपने अनुयायियों को साथ लेकर मैदान में कूद पड़े। आंदोलन को हाइजैक करने का मुकाबला चल रहा है। उन्होंने अपने हजारों अनुयायियों को साथ लेकर रामलीला मैदान में भूख हड़ताल और सत्याग्रह शुरू कर दिया। अन्ना हजारे के अनशन को मिले जनता के स्वतः स्फूर्त रेस्पोंस से पहले ही बुरी तरह हिली हुई, बदहवास यूपीए सरकार ने बाबा को मनाने की बड़ी तेजी से कोशिश की। जब वह राजधानी पहुंचे तो चार प्रमुख मंत्री उनकी अगवानी के लिए दौड़े-दौड़े दिल्ली हवाई अड्डे पहुंचे। हवाई अड्डे पर उनके साथ उन्होंने ढाई घंटे बातचीत की। उसके बाद अगला पूरा दिन सरकार और रामदेव के बीच घंटों लम्बी वार्ताओं के कई दौर से गुजरा। पूरा दिन इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यम रामदेव और सरकार के बीच कभी सौदेबाजी चल रही है तो कभी टूट गयी है की खबरे परोसते रहे और अनशन और सत्याग्रह के शुरू होने और जारी रहने के बारे में प्रश्न उठते रहे। सार्वजनिक तौर पर घोषणा की गयी कि बाबा द्वारा उठायी गयी मांगों पर लगभग सहमति बन गयी है। जैसा कि बाद मंे पता चला बाबा रामदेव के सहायक ने उनकी तरफ से एक पत्र दिया था कि वह पहले दिन (अर्थात 4 जून) को दोपहर बाद अनशन समाप्त कर देंगे। पुलिस कार्रवाई का औचित्य सामाप्त कर देंगे। पुलिस कार्रवाई का औचित्य बताते हुए सरकार ने आरोप लगाया कि बाबा अपनी बात से मुकर गये और उन्होंने आंदोलन को जारी रखा। अतः दोनों के बीच राजनैतिक “मैच फिक्सिंग” की जो कोशिश हो रही थी और जिस खेल में अन्य खिलाड़ी भी शामिल थे, वह दोनों लिए उलटी पड़ गयी।

उसके बाद रात के अंधेरे में काला कारनामा हुआ। हजारों पुरूषों एवं महिलाओं पर, जो कैम्प में सो रहे थे, एक नृशंस पुलिस कार्रवाई की गयी। आंसू गैस के गोले छोड़े गये और जो लोग कैम्प में थे उन्हें सभी को वहां से हटाने के लिए लाठीचार्ज का आदेश दिया गया। बीसियों लोग जख्मी हो गये और दो लोगों को गंभीर चोटें आयी जिनमें एक महिला है। इस समय वह अस्पताल में जीवन और मौत के बीच झूल रही है। रामदेव ने बच निकलने की कोशिश की पर पुलिस द्वारा पकड़ लिये गये और हवाई जहाज से देहरादून भेज दिये गये।

अवांछित एवं नृशंस पुलिस कार्रवाई से लोगों में आक्रोश पैदा हुआ, भले ही वे रामदेव की असंगतता के बारे मंे कुछ भी विचार रखते हो। सरकार जो कुछ भी कहती है या करती है उसे किसी तरह न्यायोचित नहीं माना जा सकता। क्या सरकार जनता के आंदोलन से इस तरह से सलूक करेगी? हमारी पार्टी ने और अन्य पार्टियों ने भी पुलिस कार्रवाई की तीव्र भर्त्सना की है। सर्वोच्च न्यायालय और मानवाधिकार आयोग ने भी मौलिक अधिकाररों की घोर अवहेलना का सही ही स्वतःसंज्ञान लिया है और समूची परिस्थिति से सरकार के हेंडलिंग पर आपत्ति की है।

रामदेव बाबा और सरकार दोनों ने कालेधन और भ्रष्टाचार के विरूद्ध आंदोलन को एक त्रासद घटना में बदल दिया है। तथापि सरकार की कार्रवाई ने इन मुद्दों पर संघर्ष चलाने की जरूरत को रेखांकित कर दिया है। इन मुद्दों पर वामपंथ और वे तमाम लोकतांत्रिक ताकतें ही एक सिद्धांतनिष्ठ और सुसंगत संघर्ष चला सकती हैं जो इन मुद्दों पर सच्चे अर्थ में चिंतित हैं।

जलियांवाला बाग से तुलना करना या आजादी की दूसरी लड़ाई जैसी बातें करना उन पहले की बातों को हल्का करना है। लम्बी चौड़ी हांकने या अतिशयोक्तिपूर्ण बातें करने से, जैसा कि कुछ लोग कर रहे हैं, संघर्ष आगे नहीं जाता।

- ए.बी. बर्धन
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बुधवार, 6 जुलाई 2011

लखनऊ की जनता से अपील


आल इंडिया स्टूडेन्ट्स फेडेरशन की प्लेटिनियम जुबली समारोह का हिस्सा बनिये

AISF Platinium Jubilee Invitation

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गुरुवार, 30 जून 2011

चुभती हुई चुप्पी


प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह ने पिछले दिनों मसूरी में ‘सत्ता और शब्द’ विषय पर आयोजित एक संगोष्ठी में हिंदी के लेखकों से किसानों द्वारा अपनी भूमि बचाने के लिए लड़ी जा रही लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाने की अपील की थी। हिंदी के लेखकों से उनकी अपील कारूणिक अपेक्षा के साथ-साथ एक शिकायत भी थी। शिकायत यह कि इतिहास के इस सर्वग्रासी समय में जब हिंदी समाज के किसान अपनी जमीन और रोजी बचाने के लिए राजसत्ता, कॉरपोरेट जगत और बाजार से जद्दोजहद कर रहे हैं, उनकी लड़ाई में हिंदी के लेखक शामिल क्यों नहीं हो रहे हैं? वे चुप क्यों हैं?

आज उत्तर प्रदेश के बलिया से लेकर नोएडा तक बनने वाले गंगा-यमुना एक्सप्रेस-वे, बनारस के पास कटेसर में जबरन भूमि अधिग्रहण, इलाहाबाद के पास कचरी में लगने वाली जेपी समूह की ताप विद्युत परियोजना आदि के खिलाफ किसान लड़ाई लड़ रहे हैं। नोएडा के पास भट्टा-पारसौल और अच्छेपुर संघर्ष का मैदान बन चुके हैं। जिन लोगों की जमीन का अधिग्रहण हो रहा है उनमें बड़े-छोटे और सीमांत सभी तरह के किसान शामिल हैं। जिनके पास छोटे भूखंड हैं उनके लिए जमीन की लड़ाई ‘जान’ की लड़ाई बन चुकी है।

पहले किसानों को अपने पड़ोसी और शक्तिशाली सामंतों से अपनी जमीन बचानी पड़ती थी। इसमें राजसत्ता, थाना, कचहरी से अपेक्षा थी कि वे इन्हें बचाने में मदद करेंगे। पर आज दुखद है कि राजसत्ता खुद उनकी भूमि हड़प कर उसे जमीन-जायदाद के कारोबारियों और भू-माफिया को महंगे दामों पर बेच रही है। किसानों को बारह सौ रूपए प्रति वर्ग गज जमीन लेकर भवन निर्माताओं को आठ हजार रुपए प्रति वर्ग गज की दर से, वह भी बीस साल में चुकाने की छूट देकर, बेचा जा रहा है। जिस विकास के नाम पर खेती योग्य जमीन का अधिग्रहण जारी है, उसमंे राजसत्ता की छत्र छाया में सिर्फ जमीन-जायदाद के कारोबारियों और भवन निर्माताओं को फायदा पहुंचाया जा रहा है। राजसत्ता का चरित्र धीरे-धीरे ‘बिल्डर्स स्टेट’ और ‘मर्केंटाइल स्टेट’ में बदलता जा रहा है। सरकार का काम जैसे केवल किसानों से जमीन लेकर भू-माफिया को बेचना और इस प्रक्रिया में कमीशन और भ्रष्टाचार को वैधानिक बनाते जाना रह गया है।

बंगाल के नंदीग्राम और सिंगूर में जब खेती लायक जमीन अधिग्रहीत कर टाटा को कारखाना लगाने के लिए दी जा रही थी तो किसानों के संघर्ष में वहां के लेखक, कलाकर, बुद्धिजीवी खुल कर सड़कों पर उतरे थे। उनके फेसबुक, ब्लॉग वगैरह नंदीग्राम और सिंगूर के खिलाफ चल रहे संघर्ष की सूचनाओं और अपीलों से भर गए थे। मगर हिंदी के साहित्यकार-चाहे प्रगतिवादी हों, दलितवादी, जनवादी, आत्मवादी, आत्मरतिवादी, विश्व पर्यटनवादी - सब चुप है।

हिंदी क्षेत्र की युवा पीढ़ी, युवा लेखकों के साइबर स्पेस, फेसबुक आदि से बढ़ते संबंधों को ज्ञान और अभिव्यक्ति के अवसरों के जनतांत्रिकीकरण की दिशा मंे महत्वपूर्ण कदम माना गया था। मगर हिंदी लेखकों के साइबर स्पेस में (कुछ को छोड़ कर) भट्टा-पारसौल जैसी घटनाओं पर बहुत कम संवाद दिखता है। उनका ज्यादातर साइबर स्पेस या तो फूलों की घाटियों, प्रेम, विदेश यात्रा, साहित्यिक उपलब्धि की खबरों, आपसी साहित्य विवरणों से भरा दिखता है। इन जनतांत्रिक - सी माने जानी वाली संचारी जगह में किसानों के दुख, उनके संघर्ष के प्रति बहुत कम लगाव दिखता है। हिंदी पत्र - पत्रिकाओं, अखबारों में भी साहित्यकारों की ऐसे मामलों पर प्रतिबद्ध प्रतिरोध न के बराबर है। कोई विदेशों में काव्यपाठ पर मस्त है, कोई अपने साहित्यक गौरव को ओढ़-बिछा रहा है तो कोई अपने ही साहित्यिक बंधुओं को गला रेतने में लगा है।

नंदीग्राम और सिंगूर मामले में एक सक्षम और जागरूक नागरिक समाज काफी आक्रामक रूप में सक्रिय था। इस मुद्दे पर वहां के समाजशास्त्री और बुद्धिजीवी सार्वजनिक रूझान बनाने वाले माध्यमों में मुखर थे। नाट्य मंडलियां, कलाकर सब लामबंद हो गए थे। वहां का विपक्ष उस लड़ाई को गतिमान बना ही रहा था। मगर हिंदी पट्टी में एक तरह से भू-माफिया का साम्राज्य फैलता जा रहा है और विपक्ष पांच सितारा राजनीति तक महदूद होता गया है। लेखक, बुद्धिजीवी सब चुप हैं। यहां नागरिक समाज राजनीतिक नहीं, एनजीओ केंद्रित हो गया है, जिसमें लगभग दो तिहाई से ज्यादा सिर्फ फर्जी रूप में कागजों पर चल रहे हैं और जो सचमुच अस्तित्व में हैं उनमें से ज्यादातर उसे नौकरी के विकल्प के रूप में देखते हैं। ऐसे में हिंदी क्षेत्र में किसानों को सरकार और बाजार की लूट से कौन बचाए?

आज जब राजसत्ता का दमन इतना संगठित, सुव्यवस्थित और आक्रामक हो चुका है, क्या किसान अकेले खुद को सरकार और बाजार के जुल्म से बचा सकता है? शायद नहीं। क्योंकि अभी किसानों की अपनी कोई राजनीति और राजनीतिक शक्ति बनती नहीं दिख रही है। जो कम्युनिस्ट उनकी लड़ाई लड़ते थे वे आज हाशिये पर है।

आजादी से पहले और दशकों में उत्तर प्रदेश विशेषकर पूर्वी उत्तर प्रदेश में कम्युनिस्टों के नेतृत्व में गरीब, दलित और पिछड़े किसानों का मजबूत संघर्ष उभरा था। प्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेता जेडए अहमद की पुस्तक ‘मेरे जीवन की कुछ यादें’ पर भरोसा करें तो 1935 में मेरठ में गठित अखिल भारतीय किसान सभा अवध, पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में काफी मजबूत हो चुकी थी। 1937 में फैजाबाद में हुए अखिल भारतीय किसान सम्मेलन मंे ही प्रो. एनजी रंगा अध्यक्ष चुने गए थे। अवध में बाबा रामचंद्र, जानकीदास, बिहार में स्वामी सहजानंद सरस्वती, राहुल सांकृत्यायन, पूर्वी उत्तर प्रदेश में सरजू पांडे और जयबहादुर सिंह जैसे किसान नेता लघु और सीमांत किसानों, खेतिहर मजदूरों की लड़ाई लड़ रहे थे। पूर्वी उत्तर प्रदेश में कृषक महिलाओं का नेतृत्व भी आजाद भारत में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा था। सिंहासनी देवी, मराछी देवी, सुबंसा देवी, कुसुमा देवी जैसी कृषक और निचली समूहों की महिलाएं कम्युनिस्टों और किसान सभा के नेतृत्व मंे आजादी के तुरंत बाद, 1950 के आसपास, किसान शक्ति का प्रतीक बन कर उभरी थी।

इस कृषक शक्ति ने साठ के दशक तक भारतीय राज्य पर कृषक हितों के लिए दबाव बनाए रखा। फिर सत्तर के दशक मंे बिहार के नक्सलवादी आंदोलन ने किसानों के सवाल को महत्वपूर्ण बनाया। पर उसके बाद चौधरी चरण सिंह, देवी लाल जैसे नेताओं के नेतृृत्व में लघु और सीमांत किसानों से जुड़े मुद्दों की जगह बड़े किसानों का हित प्रभावी हो गया। इससे सीमांत और लघु किसानों, कृषक मजदूरों में ऐसे किसान नेतृत्व के प्रति निराशा का भाव पैदा हो गया। उत्तर भारत में कम्युनिस्ट पार्टियों का निष्प्रभावी होते जाना, लघु किसानों और खेतिहर मजदूरों में, जो ज्यादातर दलित और पिछड़े समूहों से थे, किसान अस्मिता के प्रति निराशाभाव, जातीय राजनीतिक अस्मिताओं के उभार, राज्य और बाजारजनित आकांक्षाओं का जनमन पर बढ़ते प्रभाव- सबने मिल कर धीरे-धीरे कृषक अस्मिता और कृषक शक्ति को अप्रासंगिक बना कर रख दिया। ऐसे में क्या कृषक शक्ति फिर से प्रभावी हो सकती है?

आज के संदर्भ में कृषक शक्ति के प्रभावशाली होने के लिए उसे अपने साठ से पहले के संघर्षशील अतीत को आविष्कृत कर अपनी शक्ति को जगाना होगा। विपक्षी राजनेताओं, बुद्धिजीवियों, लेखकों, पत्रकारों को कृषक प्रतिरोध के साथ कंधा मिला कर सरकार और बाजार के इस भूमि लूट को रोकना होगा।

- बद्री नारायण
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बुधवार, 29 जून 2011

ताकतवर कम्युनिस्ट आंदोलन गारंटी करेगा मजबूत भारत की - ए.बी. बर्धन

मानस (पंजाब) में विशाल रैली

ताकतवर कम्युनिस्ट आंदोलन गारंटी करेगा मजबूत भारत की - ए.बी. बर्धन

5 जून को मानसा पंजाब में युवा कामरेड श्योपॉल पाला की पहली पुणयतिथि पर एक राज्य स्तर विशाल रैली और आम सभा का अयोजन किया गया। आमसभा की अध्यक्षता बूटा सिंह ने की। सभा को संबोधित करने वालों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य जोगेन्दर दयाल पार्टी के राज्य सचिव निर्मल सिंह धालीवाल और पंजाब राज्य सचिव मंडल के सदस्य हरदेव अर्शी के अलावा भाकपा महासचिव ए.बी. बर्धन भी शामिल थे।

रैली मंे युवा एवं महिलाऐं भारी संख्या में शामिल थी। वक्ताओं ने युवा का. श्योपॉल को श्रद्धाजंलि अर्पित की जिन्होंने स्वयं को मेहनतकशों के लिए प्रतिबद्ध कर रखा था और जो एक अच्छे आंदोलनकारी और एक विनम्र कम्युनिस्ट थे।

हरदेव अर्शी ने अत्यधिक गर्मी के बावजूद सभा में शामिल होने के लिए आये विशाल जनसमुदाय का स्वागत करते हुए का. श्योपॉल के जीवन और युवा एवं कम्युनिस्अ आंदोलन को उनके योगदान के बारे में बताया। इस बवसर पर का. शिवपाल के पिता का. रूपचंद्र भी वहां मंच पर उपस्थित थे। अर्शी ने बताया की रैली की तैयारियों के दौरान आम लोगों मंे उत्साहपूर्वक पार्टी को चंदा दिया। उन्होंने इस तरह चंदे से जमा पांच लाख रुपयों और रैली में खर्च का अकाउंट सार्वजनिक तौर पर बताया और कहा कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी एक पारदर्शी पार्टी है, और जो जनता उस पर आस्था रखती है उसके प्रति उत्तरदायी है।

ए.बी. बर्धन ने रैली को संबोधित करते हुए यूपीए-दो सरकार की जनविरोधी नीतियों के विरूद्ध भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा चलाये जा रहे निरंतर संघर्ष में अधिकाधिक संख्या में शामिल होने के लिए जनता से अपील की। पार्टी लगातार बढ़ती महंगाई, खाद्य सुरक्षा, भूमि अधिग्रहण, बढ़ते भ्रष्टाचार और योजना आयोग द्वारा पेश गरीबी की परिभाषा के मुद्दों पर राष्ट्रव्यापी संघर्ष चला रही है। बर्धन ने कम्युनिस्ट विरोधी अभियान और कार्पोरेट मीडिया के इस दावे को अनर्गल बताया कि पश्चिम बंगाल में हार के बाद कम्युनिस्ट पूरी तरह हाशिये पर चले गये हैं। उन्होंने कहा कि 34 वर्ष के शासन के बाद चुनावी हार का ये मतलब नहीं कि कम्युनिस्ट खत्म हो गये हैं। भूलना नहीं चाहिये कि ताकतवर कम्युनिस्ट आंदोलन ही भारत को मजबूत बना सकता है। यह कम्युनिस्टांे का ही विश्वास नहीं है बल्कि भारत के व्यापक लोकतांत्रिक एवं प्रगतिशत तबकों का भी यही विचार है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार राष्ट्रविरोधी, जन विरोधी नीतियों-उन नवउदारवाद की नीतियों को जो मजदूर विरोधी, किसान विरोधी और मोटे तौर पर जन विरोधी हैं उन्हें यदि किसी ने लगातार चुनौती दी है और उनके खिलाफ निरंतर संघर्ष किया है तो वह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी है, अन्य वामपंथी पार्टियां और वामपंथी जनसंगठन हैं। यदि इन नीतियों का जबर्दस्त विरोध न किया गया होता तो सरकार अब तक सार्वजिक क्षेत्र को सारे के सारे को बेच चुकी होती, सामाजिक सुरक्षा की सारी बातें बाजार के हवाले की जा चुकी होती।

बर्धन ने कहा कि कम्युनिस्ट संसद में कम संख्या में होते हुए भी मेहनतकश लोगों, समाज के कमजोर तबकों के हितों को बुलंद करने वाली सबसे बड़ी आवाज हैं। उन्होंने पार्टी के कार्यकर्ताओं हमदर्दो और समर्थकों से अपील की कि जनता एवं राष्ट्र हित में संघर्ष को तेज करने के लिए आगे बढ़े।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के केन्द्रीय सचिवमंडल की सदस्य और एटक की राष्ट्रीय सचिव अमरजीत ने रैली को संबोधित करते हुए कहा कि यूपीए-दो सरकार देश में बढ़ते हुए भ्रष्टाचार और बढ़त हुई महंगाई के लिए जिम्मेदार है। महंगाई के कारण लोगों का जीना मुश्किल हो गया है। यूपीए-दो सरकार के कार्यकाल में इतने घोटाले सामने आये हैं कि पुराने रिकार्ड ही टूट गये है। यह भ्रष्टाचार, महंगाई और कालेधन की सरकार है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी तो बहुत पहले से ही भ्रष्टाचार के विरूद्ध आवाज उठाती आयी हैै। पार्टी ने 42 साल पहले ही भ्रष्टाचार से निपटने के लिए कानून बनाने की मांग उठायी थी।

भाकपा नेता इन्द्रजीत गुप्त ने जब वह देवेगौड़ा सरकार में गृहमंत्री थे लोकपाल बिल लाने की प्रक्रिया को शुरू किया था।

अमरजीत कौर ने कहा कि भ्रष्टाचार पूंजीवादी व्यवस्था और नवउदार आर्थिक नीतियों का नतीजा है। ये नीतियां अभूतपूर्व पैमाने पर बढ़ते भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी भ्रष्टाचार विरोधर हर अभियान का समर्थन करती है पर ऐसे किसी अभियान में शामिल होना पसंद नहीं करेगी जो कार्पोरेट घरानों द्वारा प्रायोजित या समर्थित हो या जिसे ऐसे लोग चला रहे हों जो स्वयं भ्रष्टाचार में डूबे हैं। उन्होंने जोर दिया कि भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए व्यवस्था को बदलने की जरूरत है। उन्होंने मांग की कि 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून को बदला जाये, उसे आदिवासियों और किसानों के हितों को ध्यान में रखकर बनाया जाये। उन्होंने ससंद और विधानसभाओं में महिलाओं के अधिक प्रतिनिधित्व की मांग को दोहराया।

जोगेन्दर दयाल और निर्मल धालीवाल ने अपने संबोधनों में पंजाब की अकाली दल-भाजपा सरकार की भर्त्सना करते हुए कहा कि यह सरकार पंजाब की अर्थव्यवस्था को तबाह कर रही है। पंजाब एक बार कांग्रेस की तो दूसरी बार अकालियों की सरकारों को भुगत रहा है जिनमें चंद लोग भ्रष्ट तरीकों से अथाह संसाधनों पर कब्जा कर रहे हैं और किसान आत्महत्या कर रहे हैं। पंजाब में भयानक बेरोजगारी है और पंजाब के लोगों के ऊपर 35000 करोड़ रुपये का कर्ज है। कानून का राज काम नहीं करता, अपराध बढ़ रहे हैं। इन सरकारों के कार्यकाल में इन पार्टियों के कई नेता और मंत्री घोटालों में शामिल रहे हैं। बादल सरकार जन आंदोलन को कुचलने और दबाने के लिए, रोजगार कम करने के लिए, मजदूरी घटाने के लिए नये कानून लेकर आयी है।

उन्होंने जनता का आह्वान किया कि ऐसी जन विरोधी पार्टियांें और ताकतों को हटाने के लिए तैयारियां करे और आगामी चुनावों में वामपंथी और लोकतांत्रिक विकल्प के लिए रास्ता तैयार करे।

रैली के अवसर पर पार्टी की मानसा जिला ईकाई ने राज्य पार्टी को 31,000 रुपये की राशि भेंट की। का. श्योपॉल की पत्नी श्रीमती ऊषा और उनके परिवार के लोग इस विशाल स्मृति रैली में मंच पर उपस्थित थे। रैली के दौरान सांस्कृतिक जत्थे ने क्रांतिकारी गीत गाये।
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मंगलवार, 28 जून 2011

उत्तर प्रदेश में असली जंगल राज


गत दिनों बालिकाओं एवं महिलाओं के साथ बलात्कार और फिर उनकी हत्या के इतने मामले अखबारों में प्रकाशित हुए कि प्रदेश सरकार का पूरा अमला उन्हें नकारने में लगा रहा लेकिन सरकार का हर दावा अगले दिन ही झूठा साबित हो गया। लखीमपुर के निघासन थाने के परिसर में एक दलित बालिका का शव लटका हुआ पाया गया था। मायावती सरकार ने इसे खुदकुशी बता कर लीपापोती की भरसक कोशिश की। पुलिस वालों ने लाश को बाकायदा नहला-धुला कर पोस्टमार्टम के लिए भेजा लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट से स्पष्ट हुआ कि दलित बालिका की हत्या की गयी है। अगले ही दिन बाराबंकी के घुंघटेर थाने में एक व्यक्ति की हत्या कर दी गयी। मुजफ्फरनगर के बसपा विधायक के गुर्गों ने दिल्ली की देा लड़कियों का राष्ट्रीय राजमार्ग से अपहरण कर उनकी इज्जत लूटने की सरेआम कोशिश की। विधायक के सरकारी अंगरक्षक भी इस अपराध में शरीक हो गये। फिर भी मायावती के खास सांसद बाबू मुनकाद ने बेशर्मी से बयान दिया कि घटना में शामिल लोगों का बसपा से कोई नाता नही था।

बसपा के नेताओं और पुलिस कर्मियों द्वारा बलात्कारों और हत्याओं को झुठलाने में लगी मुख्यमंत्री मायावती के राज में लखनऊ जेल में निरूद्ध लखनऊ के उप मुख्य चिकित्साधिकारी डा. वाई.एस. सचान की हत्या कर दी गयी। डा. सचान पर मायावती की पुलिस ने लखनऊ के पिछले दो मुख्य चिकित्साधिकारियों की हत्या का आरोप लगाते हुए उनकी पुलिस रिमांड के लिए अदालत में आवेदन दिया था। अदालत ने डा. सचान को अगले दिन अदालत में तलब किया था। उसके एक दिन पहले ही जेल में उनकी हत्या ने कई नये सवाल खड़े कर दिये हैं जिनके जवाब आसानी से मिलने वाले नहीं हैं। आम जनता तक कह रही है कि नेशनल रूरल हेल्थ मिशन में अरबों रूपयों का घोटाला मायावती के दो खास कारिंदों बाबू सिंह कुशवाहा और अनंत मिश्रा ने करवाया है और चूंकि डा. सचान के दिल में इस लूट के तमाम राज दफन थे जिन्हें वे अदालत के सामने सरेआम बोल सकते थे, इसलिए उनकी हत्या मायावती सरकार द्वारा करवाई गयी है। इस मृत्यु को जिस प्रकार आत्महत्या बताने के लिए जेल और पुलिस के उच्चाधिकारियों के साथ ही मायावती के खास कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह व्यस्त थे, उससे कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ नजर आ रहा था। लखनऊ मेडिकल विश्वविद्यालय में पांच डाक्टरों के पैनल ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृत्यु पूर्व के आठ जख्मों तथा मृत्यु के बाद के गर्दन के जिस एक जख्म का जिक्र किया, उससे साफ है कि डा. सचान की हत्या के बाद उनके शव को बेल्ट से लटकाया गया था। लखनऊ की उच्च सुरक्षा जेल के अन्दर बेल्ट से डा. सचान की लाश लटकी बताई गयी थी तथा पोस्टमार्टम में जिन घावों का जिक्र है वह किसी धारदार भारी हथियार से ही किये जा सकते हैं। वो बेल्ट और धारदार हथियार जेल में कैसे पहुंचे, इसका कोई स्पष्टीकरण मायावती के सरकारी कारकुनों के पास नहीं है। जेल में हत्या की यह पहली घटना नहीं है। इसके पहले कविता चौधरी हत्याकांड के आरोपी रवीन्द्र तथा पीएफ घोटाले के मुख्य आरोपी आशुतोष अस्थाना की हत्यायें गाजियाबाद जेल में हुई थीं। जेलों में हुई कुछ अन्य मौतों पर भी सवालिया निशान लगे थे।

दरअसल मायावती के राज में हर कोई लूट में लगा है। निदेशालयों से लेकर थानों तक पर तैनाती की बाकायदा नीलामी होती है। बसपा के सांगठनिक तंत्र में अध्यक्ष और मंत्री जैसे किसी पदाधिकारी की कोई औकात नहीं होती। जिला, मंडलीय और राज्य स्तरीय कोआर्डिनेटर मायावती द्वारा नियुक्त किये जाते हैं। कहा जाता है कि यही कोआर्डिनेटर मायावती के पूरे भ्रष्ट तंत्र के खेवनहार हैं। कोआर्डिनेटर नियुक्त होने के पहले भूखों मरने वाला कोआर्डिनेटर बनने के 3-4 महीने में ही किसी महंगी बड़ी कार (एसयूवी) से चलता हुआ दिखता है। स्थानान्तरण और पोस्टिंग के लिए सरकारी मुलाजिम इनके आगे-पीछे टहलते हुए नजर आते हैं।

अगले साल उत्तर प्रदेश में विधान सभा का चुनाव होना है। इन चुनावों के मद्देनजर कई तरह की बातें की जा रहीं हैं। हर कोई अपने नफा-नुकसान के लिहाज से व्याख्यायें कर रहा है। उससे इतर प्रदेश की आम जनता मायावती के राज को जंगल राज बता रही है।

- प्रदीप तिवारी
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सोमवार, 27 जून 2011

अदालतें भ्रष्टाचार से मुक्त हों

न्यायपालिका के पास विशाल शक्तियां है क्योंकि वह जो कहती है अंतिम बात होती है, अचूक एवं अमोध। इतनी शक्तिशली है न्यायपालिका कि जब कार्यपालिका का कोई अधिकारी कानून का उल्लंघन करता है तो जज उसके आदेश को निरस्त कर सकते हैं और हुक्मनामे की अपनी ताकत से दिशा-निर्देश दे सकते हैं। जब संसद कोई कानून पास करती है और कानून का अतिक्रमण कर देती है या मौलिक अधिकारों की सीमाओं से बाहर निकल कर आदेश जारी करती है तो अदालत उस आदेश और कार्रवाई को खारिज कर सकती है। पर जब उच्च न्यायालय कानून के बेरोकटोक उल्लंघन के अपराधी हों तो उनकी इस चूक, उनकी इस गलती के लिए न कोई तरीका है न संहिता। हर संविधान का एक सामाजिक दर्शन होता है, खासकर भारत के संविधान का एक सामाजिक दर्शन है। हम एक समाजवादी लोकतांत्रिक गणतंत्र हैं। यदि संविधान के इन आदेशों का उल्लंघन होता है और जजों से जिस तरह के बरताव की उम्मीद की जाती है वे उस बरताव को धता बता देते हैं तो किसी को अधिकार नहीं कि उन्हें सही रास्ते पर लाये और उनके दुराचार को ठीक करे।

“जज लोग तत्वतः दूसरे सरकारी अधिकारियों से कुछ अलग नहीं हैं। न्यायिक ड्यूटियों पर आकर भी सौभाग्य से वे इंसान बने रहते हैं। अन्य इंसानों की तरह उन पर भी समय-समय पर गर्व और मनोविकारों का, तुच्छता एवं चोट खायी भावनाओं का, गलत समझ या फालतू जोश का असर पड़ता है।” - ह्यूगो ब्लैक

अपनी पुस्तक में डेविड पैमिक जजों के बारे में लिखते हैंः

“अमरीका के सर्वोच्च न्यायालय के जस्टिस जैक्सन ने 1952 में टिप्पणी की कि “जो लोग कुर्सी पर पहुंच जाते हैं कभी-कभी घमंड, गुस्सेपन, तंग नजरी, हेकड़ी और हैरान करने वाली कमजोरियों जैसी उन कमजोरियों का परिचय देते हैं जो इंसानियत को विरासत में मिली हुई है। यह हैरानी की बात होगी, असल में चिंताजनक बात होगी यदि जो प्रख्यात दिमाग लोग इंग्लैंड की न्यायापालिका में हैं यदि वे अपने अवकाश, जो उन्हें विरले ही मिलता है, के दिनों में गैरन्यायिक तरीके से काम करें। हाल में लॉर्ड चांसलर हेल्शाम ने स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि जो लोग जज की कुर्सी पर बैठते हैं कभी वे उस चीज का शिकार हो जाते हैं जिसे जजी का रोग कहते हैं अर्थात एक ऐसी हालत जिसके लक्षण हैं तड़क-भड़क , चिड़चिड़ापन, बातूनीपन, ऐसी बातें कहने की प्रवृत्ति जो मामले में फैसला करने में जरूरी नहीं होती और शोर्टकट का रूझान।”

दुख की बात है कि कानून के अंदर महाभियोग-जो इस बीमारी के बढ़ने से रोकने के लिए एक राजनैतिक इलाज है- के अलावा इसका अन्य कोई इलाज नहीं। इन चिंताजनक बातों से भी बदतर बात है वो जो लार्ड एक्शन ने ही है- ”सत्ता भ्रष्ट बनाती है और चरम भ्रष्ट बनाती है।” लोकतंत्र में लोगों को न्यायपालिका की आलोचना करने का अधिकार है जिससे पारदर्शी, स्वतंत्र, अच्छे व्यवहार वाली, पक्षपात से दूर और हर किस्म की कमजोरियों से मुक्त होने की अपेक्षा की जाती है। कितना भी महत्वपूर्ण मामला क्यांे न हो हर विवाद मंे जज जो फैसला करते हैं वह उस संबंध में अंतिम फैसला होता है। अतः जजों का चयन जांच-पड़ताल के बाद और उनकी वर्ग राजनीति और वर्ग पूर्वाग्रहों के समीक्षात्मक मूल्यांकन के बाद हद दर्जे की सावधानी के साथ किया जाना चाहिये। (देखिये, पोलिटिक्स ऑफ जुडिशयरी, लेखक प्रो. ग्रिफिथ)।

“जज लोगंों आप कहां निष्पक्ष हैं?” वे सभी कर्मचारियों की तरह उसी गोल चक्कर में चलते रहते हैं और नियोक्ता लोग जिन विचारों में शिक्षित हुए हैं और पले-बढ़े हैं जज लोग भी उन्हीं शिक्षित और पले-बढ़े हैं। किसी मजदूर या टेªड यूनियन कार्यकर्ता को इंसाफ कैसे मिल सकता है? जब विवाद का एक पक्ष आपके वर्ग का होता है और दूसरा आपके वर्ग का नहीं होता तो कभी-कभी यह सुनिश्चित करना बड़ा मुश्किल हो जाता है कि आपने इन दो पक्षों के बीच स्वयं को पूरी तरह निष्पक्ष स्थिति में रखा है।”

- लॉर्ड जस्टिस स्क्रटून

न्याय और न्यायतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता और भाई-भतीजावाद। हाल के दिनों में न्यायापालिका में भ्रष्टाचार बहुत अधिक बढ़ा है यहां तक कि सर्वोच्च स्तर पर भी। गुनाहगार जजों पर संसद में महाभियोग का तरीका पूरी तरह नाकाफी और बेकार साबित हुआ है, इसका ज्वलंत उदाहरण है रामास्वामी का मामला। प्रशांत भूषण ने मुख्य न्यायाधीशों के खिलाफ भ्रष्टाचार का जो आरोप लगाया है, और जिसका समर्थन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस वर्मा ने किया है, क्या उसमें रत्तीभर भी अतिशयोक्ति है? जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप दिन दूना रात चौगुना बढ़ते ही जा रहे हैं। महाभियोग इनका कतई कोई समाधान नहीं है। अदालतों में बकाया पड़े-मुकदमों का अम्बार बढ़ता जा रहा है, पार्किन्सन्स कानून (संख्या बढ़ा दो) और पीटर प्रिंसिपल (अयोग्यता में वृद्धि) कोई इलाज नहीं, इसका इलाज है नियुक्ति आयोग (अपॉइटमेंट कमीशन) और एक ऐसा कार्य निष्पादन आयोग (परफोर्मेन्स) कमीशन जिनके पास काफी अधिक शक्तियां हों। नियुक्ति आयोग के पास यह शक्ति हो कि वह कार्य पालिका द्वारा नियुक्ति के लिए सुझाये गये नामों को खारिज कर सके और नियुक्ति से पहले उनके नाम सार्वजनिक कर सके। परफोर्मेन्स कमीशन के पास जजों के दुराचार के खिलाफ जांच करने की और दोषी पाये जाने पर उन्हें बर्खास्त करने की शक्तियां हों। ये चीजें संविधान में संशोधन कर न्यायिक आचरण संहिता का हिस्सा होना चाहिये। प्रस्तावित उम्मीदवार के बारे में कुछ कहने का अधिकार हर नागरिक को होना चाहिए। क्यों?

एक रोमन कहावत हैः जिस चीज का हम सब पर असर पड़ता है उसका फैसला सबके द्वारा होना चाहिये। हमारी न्यायापालिका अभी भी एक प्रतिष्ठित संस्था है। उनके नियतकालिक पाठ्यक्रम होने चाहिये ताकि वे अपने विषय में पूरी तरह पारंगत रहें।

- वी.आर. कृष्ण अय्यर
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शनिवार, 25 जून 2011

ईंधन की कीमतें बढ़ाने के खिलाफ विरोध प्रदर्शन का आह्वान


लखनऊ 25 जून। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने केन्द्र सरकार द्वारा डीजल, रसोई गैस एवं केरोसिन कीमतों में फिर एक बार बढ़ोतरी की कड़ी आलोचना की है और आम आदमी को तबाह करने वाली इस वृद्धि को तत्काल वापस लेने की मांग की है।
यहां जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि डीजल के दामों में रू. 3 प्रति लीटर, रसोई गैस के सिलेंडर पर रू. 50 तथा केरोसिन के दामों में रू. 2 प्रति लीटर की वृद्धि करके संप्रग-2 सरकार ने महंगाई की मार से पहले से पीड़ित आम आदमी पर एक और कुठाराघात किया है। महंगाई की दर पहले ही 9 अंक का आंकड़ा पार कर चुकी है। डीजल के दामों में वृद्धि से माल भाड़ा बढ़ेगा जो हर जरूरी चीज के दाम बढ़ा देगा। यह पूरी तरह असहनीय है और शासक वर्ग की संवेदनहीनता का जीता-जागता प्रमाण है।
भाकपा राज्य सचिव ने कहा कि पेट्रोलियम पदार्थों की मूल्यवृद्धि का प्रमुख कारण केन्द्र सरकार द्वारा कच्चे तेल पर गत वर्ष बढ़ाया गया आयात कर है तथा बड़ी मात्रा में लगने वाला उत्पाद कर है। अब सरकार ने इसी आयात कर में मात्र 5 प्रतिशत की घटोत्तरी कर जनता की आंखों में धूल झोंकने का काम किया है। ये सरकार अब भी पेट्रोलियम पदार्थों के कर ढांचे को बदलने और मूल्य आधारित करों को त्यागने को तैयार नहीं है। राज्य सरकार भी बढ़ी हुई कीमतों की एवज में अतिरिक्त वैट वसूलने से बाज नहीं आ रही है। हर तरह से तबाही आम और गरीब आदमी की हो रही है।
प्रदेश भाकपा ने अपनी तमाम जिला एवं स्थानीय इकाइयों को निर्देश दिया है कि वे तत्काल इस मूल्यवृद्धि का असरदार तरीके से विरोध करें और जगह-जगह संप्रग-2 सरकार के पुतले जलायें, विरोध प्रदर्शन एवं आम सभायें आयोजित करें। आन्दोलन को और प्रभावी तथा धारदार बनाने को भाकपा ने अपने तमाम राज्य कौंसिल सदस्यों और जिला सचिवों को 2 एवं 3 जुलाई को लखनऊ पहुंचने का निर्देश दिया है ताकि बैठक कर आवश्यक निर्णय लिये जा सकें।

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बुधवार, 22 जून 2011

Observe June 24, 2011 as Anti POSCO Day in Solidarity with the fighting People

Lucknow 22nd June. Communist Party of India has been opposing the approval given to POSCO to set up its plant in Jagatsinghpur district of Orissa by the Central and State governments. The steps so far taken by the governments are all in violation of the laws of the country. The old MOU has expired a year back. Even a new MOU does not exist. Yet government is going ahead. The Orissa government has been resorting to worst form of Police repression and vandalism in order to acquire the land. The land which is proposed for POSCO is a fertile agricultural land in Mahanadi delta. In the name of attracting FDI, Government is determined to do everything possible for the notorious POSCO, not having an iota of concern for the environment, protection of sea shore and above all the huge displacement of the people.

Forest and Environment Ministry, has given all clearance, contrary to its own experts committee’s views. It was due to tremendous political pressure from International Finance Capital. But the people led by POSCO Pratirodh Sangram Samithi headed by Abhay Sahoo have been valiantly fighting and resisting all the moves to acquire land for POSCO for the last six years. Women and children are also in the front ranks of the resistance. It has attracted the attention of the entire country and also at international level.

CPI has been in the forefront of the Anti-POSCO People’s Movement. It is not only a struggle of the people of Orissa. Communist Party of India, Uttar Pradesh calls upon the rank & file and also the public of the state to raise this issue all over the state by observing June 24th 2011 as ‘the Anti-POSO Day’ in solidarity with the fighting people of Jagatsinghpur.

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पॉस्को के खिलाफ संघर्ष जनता के साथ एकजुटता प्रकट करने के लिए 24 जून को पॉस्को विरोधी दिवस मनाओ


लखनऊ 22 जून। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी केन्द्र एवं उड़ीसा सरकार द्वारा जगतसिंहपुर जिले में पॉस्को के संयंत्र की स्थापना के लिए दी गयी मंजूरी के खिलाफ संघर्षरत है। सरकारों द्वारा इस मामले में अब तक उठाये गये सभी कदम देश के कानूनों का उल्लंघन हैं। पुराने एमओयू की अवधि समाप्त हो चुकी है। कोई नया एमओयू अस्तित्व में नहीं है। फिर भी सरकार आगे बढ़ती जा रही है। भूमि के अधिग्रहण के लिए उड़ीसा की राज्य सरकार बदतर पुलिस उत्पीड़न का सहारा ले रही है। सरकार पॉस्को को संयंत्र लगाने के लिए जिस भूमि को देना चाहती है वह महानदी डेल्टा में एक अति उपजाऊ भूमि है। विदेशी प्रत्यक्ष निवेश को आकर्षित करने के बहाने बदनाम पॉस्को को हर सम्भव मदद मुहैया कराने के लिए प्रतिबद्ध है और उसे पर्यावरण, सागर तट की प्रतिरक्षा, बड़ी संख्या में जनता के प्रतिस्थापन की रंचमात्र चिन्ता नहीं है।



अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के बढ़ते राजनीतिक दवाब में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने अपनी खुद की विशेषज्ञ कमेटी की अनुशंसा के विपरीत सभी अनुमतियां जारी कर दी हैं। लेकिन अभय साहू के नेतृत्व में पॉस्को प्रतिरोध संग्राम समिति के बैनर तले वहां की जनता पिछले छः सालों से भूमि के अधिग्रहण के खिलाफ संघर्षरत है। प्रतिरोध की अगुआ कतारों में महिलायें एवं बच्चे के शामिल होने के तथ्य ने पूरे देश एवं पूरी दुनियां का ध्यान इस आन्दोलन की ओर खींचा है।



भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी पॉस्को विरोधी जन आन्दोलन की अगुआ कतारों में रही है। अब यह केवल उड़ीसा की जनता का संघर्ष नहीं रह गया है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की उत्तर प्रदेश राज्य परिषद अपने सभी सदस्यों एवं शुभचिंतकों के साथ उत्तर प्रदेश की जनता का आह्वान करती है कि जगतसिंहपुर की संघर्षरत जनता के साथ एकजुटता प्रकट करने के लिए 24 जून को पॉस्को विरोधी दिवस मनायें।
 
 
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