- प्रदीप तिवारी
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गुरुवार, 10 जून 2010
at 6:12 pm | 0 comments | प्रदीप तिवारी
भोपाल की दूसरी त्रासदी के सबक
- प्रदीप तिवारी
at 6:08 pm | 0 comments | AITUC
एटक की शिमला वर्किंग कमेटी का आह्वान - मजदूर वर्ग की संपूर्ण एकता की ओर आगे बढ़ो
बुधवार, 9 जून 2010
at 7:46 pm | 0 comments |
CPI condemns the views expressed by Mr. Bhupinder Hooda Chief Minister of Haryana opposing sagothra marriages and marriages among sub-castes
The argument that sagothra and sub-caste marriages are not approved by the society is not valid in the 21st Century. Inter-caste marriages, Inter religions marriages and international marriages are valid legally, socially and accepted by the society around us. Some sections of the society always resist change and proclaim themselves the right to guide the society and issue mandates against those who do not accept their dictates.
Mr. Hooda is trying to indulge in cheap Vote bank politics. There cannot be two different types of Laws in the country. Why Mr Hooda does not condemn the socalled "Honour Killing" murders. Mr. Hooda is playing soft to those who are trying to take law into their hands. The message should be clear.
It is surprising to understand, why the Indian National Congress is silent on the views of the Hooda who is the Chief Minister of their Party? The silence amounts to support the outdated, pro-caste panchayat outfits in the country.
Mr. Hooda should withdraw his comments, apologize to the nation and take a firm stand against self-proclaimed courts.
मंगलवार, 8 जून 2010
at 6:09 pm | 0 comments |
SECOND TRAGEDY OF BHOPAL
The details of the Bhopal tragedy judgement are now available through the Press. The whole nation is shocked with the judgement which gave only two years of imprisonment and a small amount of fine to 8 Indian officials of Union Carbide India Limited (UCIL), for killing more than 15,000 citizens and damaging the health of lakhs of citizens. It exposes the mockery of our prosecution and judicial system. This is an insult on the injury inflicted on the Bhopal victims.
Justice is delayed as the judgement came after 25 years of tragedy. Justice is denied by awarding small punishments to the biggest tragedy in the world. Justice is buried, as there is not even a mention of Mr. Anderson the then Chairman of UCIL in the judgement.
Mr. Anderson the then chairman was arrested, released on bail, escaped to USA but US refused to arrest and handover to us. Our Government instructs CBI not to press for deporting him to India.
It is a shame on Government of India that the culprits neither pay reasonable compensation, nor awarded punishment. The government owes an explanation to the nation. The Judgment on the worst ever industrial disaster of a Multinational Corporation’s chemical unit should be an eye opener to the UPA II government that is trying to push through a Nuclear Liability Legislation that will absolve the nuclear reactor suppliers of all responsibility in case of disaster in nuclear plants
शनिवार, 5 जून 2010
at 6:31 pm | 0 comments | अतुल कुमार अनजान
कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने ग्रामीण भारत और किसानों की दुर्दशा पर लगभग आधी सदी पहले लिखा था ‘‘जिधर देखिऐ उधर पूंजीपतियों की घुड़दौड़ मची हुई थी। किसानों की खेती उजड़ जाये उनकी बला से’’। आज भी स्थिति बदली नहीं है। किसान, खेत मजदूर एवं असंगठित मजदूर यातना झेल रहे हैं। संघर्ष कर रहे है और अपनी आंखों में स्वप्न पाल रहे हैं। वो उस दिन के इंतजार में है जब उनकी जीवन में कुछ तो चमक आएगी। लेकिन सच्चाई तो ये है कि उदारीकरण की इस आंधी में सरकारी नीतियों और उसकी आगोश में खूब मजा लूट रहे देशी-विदेशी पूंजी मालिक अकूत मुनाफा लूट रहे हैं। अब उनकी निगाह ग्रामीण भारत की तस्वीर बदलने के नाम पर, ढांचागत बुनियादी विकास को ग्रामीण क्षेत्र में ले जाने के नाम पर, यह गठजोड़ खेती का कंपनीकरण चाहता है। अगर सचमुच देशी-विदेशी पूंजी के गठजोड़ के चलते किसान अपनी जमीन और किसानी से पूरी तरह बेदखल हो गये तो छोटा-मझोला सीमांत गरीब किसान तो मिट ही जायेगा। साथ ही साथ खेत मजदूरों का विशाल समुदाय भूख-गरीबी, विस्थापन की लपटों का और गंभीर शिकार हो जायेगा। वह समाज में जीवित होकर भी जिंदा नहीं कहलायेंगे। खेती के कंपनीकरण के चलते देश में कृषि व्यापार करने वाली कंपनियों को बढ़ावा मिलेगा। वैसे भी उन्हें बढ़ावा मिल ही रहा है। वास्तव में कृषि व्यापार करने वाली कंपनियां किसानों से नफरत करती हैं। अमरीका और यूरोप में तो किसानों को कंपनियों ने खेती से बाहर ही कर दिया। नतीजे के रूप में देखा जा सकता है कि 30 करोड़ की आबादी वाले अमरीका में खेती करने वालों की संख्या लगभग 7 लाख परिवारों में सिमट गयी है। यूरोप के 15 देशों में महज 70 लाख किसान बचे हुए हैं। इस तरह के कृषि मॉडल के साफ संदेश है कि खेती से किसानों को बाहर निकाला जाये। जब खेती से किसान बाहर निकल जायेंगे तो खेत मजदूरों की हालत तो और भी भयावह हो जायेगी। जनसंख्या की दृष्टि से भारत एक बढ़ता हुआ देश है। भारत आज सबसे जवान देश है। 110 करोड़ की आबादी के 51 प्रतिशत 25 वर्ष की कम आयु के हैं। आबादी का दो तिहाई भाग 35 वर्ष से कम है। अनुमान लगाया जा रहा है कि सन् 2020 में भारत की औसत आयु 29 वर्ष हो जायेगी। हम कैसे अपनी विशाल युवा समुदाय को कृषि एवं औद्योगिक विकास के साथ जोड़कर रोजगार के अवसर देकर उनके जवान जोश और ताकत का इस्तेमाल देश के लिए कर सके यह सबसे बड़ी चुनौती है। आज भी भारत का 70 फीसदी आबादी गांव में रहता है। खेती किसानी से ही लगभग 74 फीसदी लोगों को पूर्ण और अर्ध रोजगार मिलता है। बढ़ते हुए सीमांत और लघु जोतों की संख्या किसानों के सीमांतीकरण की ओर इशारा करती है। 1970-71 में सीमांत जोतों की संख्या 3।568 करोड़ थी जो 2000-01 में दोगुने से भी अधिक बढ़कर 7।612 करोड़ हो गयी है। लघु जोतों की संख्या 1.343 करोड़ से बढ़कर 2.282 करोड़ हो गयी है। सीमांत और लघु जोतों वाले किसान देश के 82 प्रतिशत किसान हैं और इनकी खेती को किस प्रकार से आर्थिक रूप से सक्षम बनाया जाये यह हमारी पहल का मुख्य केन्द्र होना चाहिए। कृषि जनगणना 2000-01 के अनुसार देश में औसत जोत का आकार 1.39 हेक्टेयर है। विभिन्न राज्यों में इसका आकार अलग-अलग है। 15 प्रमुख राज्यों में से पांच राज्यों में औसत जोत 1 हेक्टेयर से भी कम है। केरल राज्य में सबसे कम 0.24 कम है। इसके बाद क्रमशः बिहार में 0.58 हेक्टेयर और पश्चिम बंगाल में 0.82 हेक्टेयर है। असम, उड़ीसा एवं आंध्र प्रदेश में औसत जोत का आकार राष्ट्रीय औसत से कम है।उपरोक्त तथ्यों से आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है कि विशाल ग्रामीण क्षेत्र और भारत की जनसंख्या का लगभग दो तिहाई हिस्सा आजादी के 62 साल के बाद भी व्यापक बुनियादी परिवर्तन के लिए बेसब्री से इंतजार कर रहा है। वर्ष 2007 के आंकड़ों के अनुसार देश के 533 खरब-अरबपतियों के पास कुल 12 लाख 32 हजार 135 करोड़ रूपये की दौलत थी। वहीं दूसरी तरफ 2004-05 के अध्ययन के आधार पर कांग्रेसी सांसद प्रो. अर्जुन सेन गुप्ता आयोग ने बताया कि देश की 77 फीसदी जनता अर्थात 83 करोड़ 65 लाख लोगों की रोजाना की आमदनी 20 रूपये से कम है। 2007 के सरकारी आंकडों के मुताबिक मुकेश अंबानी के हजारों करोड़ रूपये की सालाना आमदनी है। लेकिन इसके अतिरिक्त अपनी कंपनी के चेयरमैन की हैसियत में वे तनख्वाह भी लेते हैं। उनकी प्रतिमाह तनख्वाह 2 करोड़ 54 लाख रूपये है। ऐसे ही 578 बड़े उद्योगपति अधिकारी प्रतिवर्ष 1497 करोड़ की तनख्वाह लेते है और 230 लोग दो करोड़ से अधिक की तनख्वाह लेते हैं। देश में दौलत का इतना असमान वितरण चौका देने वाला ही नहीं वरन सोचने पर मजबूर करता है कि सामाजिक अन्याय की भी कोई सीमा होगी। असमान आर्थिक स्थितियों के चलते क्या इस बात की आवश्यकता नहीं है कि देश की दौलत का न्यायिक वितरण किया जाये। पूरे देश की जनसंख्या का 9 प्रतिशत आदिवासी और जनजातियां हैं। वह देश के संपूर्ण भौगोलिक क्षेत्र के 15 प्रतिशत क्षेत्र में निवास करते हैं। वह पहाड़ों, जंगलों और प्रकृति के गोद में गुजर-बसर करने वाले लोग हैं। जिन क्षेत्रों में वे रहते हैं वह खनिज संपदा, वनस्पति, कीमती पत्थरों और जीव जंतुओं से भरपूर हैं। परन्तु आदिवासी जनजाति के लोग प्राकृतिक संपदा के हिस्सेदार नहीं मात्र खामोश तामाशायी बन कर रह गये हैं। देश में कुल 700 जनजातियां हैं। सरकारों के नीतियों के चलते 70 जनजातियां खत्म होने की स्थिति में हैं। केन्द्र और राज्य सरकारें बहुराष्ट्रीय कंपनियों, देशी-विदेशी गठजोड़ की निजी कम्पनियों, कार्पोरेट घरानों को उद्योग स्थापित करने के नाम पर आदिवासियों एवं जनजातियों को उजाड़ कर उनकी जमीन दे रही है। उजाड़े हुए लोगों की पुनर्वास की सम्मानजक एवं अर्थपूर्ण कोई योजना भी नहीं है। आजादी के बाद प्रगतिशील भूमिसुधार लागू किये जाने की कोई विशिष्ट पहल नहीं की जा सकी। केरल, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा में भूमि सुधार लागू कर खेत मजदूरों को और ग्रामीण मजदूरों को कुछ न्याय दिया जा सका। अधिकांश राज्य भूमि सुधार से बचते हैं। फलतः समाज के शोषित, पीड़ित जिनमें अधिकांश अनुसूचित जाति, पिछड़ी जाति और आदिवासी हैं वह आज सामाजिक और आर्थिक हासिये पर ढकेल दिये गये हैं। वह आज गरीबी रेखा के नीचे जीने पर विवश हैं। बिहार में डी. बंधोपाध्याय आयोग ने भूमि सुधार संबंधी सिफारिशों को बिहार सरकार के सामने रखा परन्तु सरकार ने अपना हाथ खींच लिया है। अगर सरकार इस कमीशन की सिफारिशों पर काम करे तो ग्रामीण गृहविहीनों को वास भूमि, हदबंदी से फाजिल, भूदान और सरकारी जमीन का वितरण, पर्चाधारियों को जमीन पर कब्जा और बटाईदारों के बेदखली की सुरक्षा संभव हो सकती है। भूमि सुधार के द्वारा हम गांव से खेतिहर मजदूरों, गरीब किसानों के शहर की ओर पलायन को रोक सकते हैं। आज एक अनुमान के अनुसार 7 से 9 प्रतिशत के बीच गांव से शहरों की ओर हर वर्ष पलायन हो रहा है। भूमि सुधार आज एक ज्वलंत राष्ट्रीय कर्तव्य है। किसान, खेत मजदूर एवं असंगठित मजदूरों को सर्वाधिक कठिन चुनौतियों भरे वक्त से गुजरना पड़ रहा है और इससे निपटने के लिए व्यापक एकता बनाकर संघर्ष के मैदान में अपनी हिफाजत के लिए उतरना होगा। गांव, किसान, खेती और खेत मजदूर की हिफाजत से ही भारत के कृषि क्षेत्र की हिफाजत की जा सकती है। यह आइने के सामने बैठकर कंघी काढ़ने का वक्त या तितलियों से प्रेम का दौर नहीं है। (लेखक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय सचिव और अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)
- अतुल कुमार अनजान
शुक्रवार, 4 जून 2010
at 8:25 pm | 0 comments | कार्ल मार्क्स
जेनी के नाम

सबोधित करता हूँ गीत क्यों जेनी को
जबकि तुम्हारी ही ख़ातिर होती मेरी धड़कन तेज़
जबकि कलपते हैं बस तुम्हारे लिए मेरे गीत
जबकि तुम, बस तुम्हीं, उन्हें उड़ान दे पाती हो
जनकि हर अक्षर से फूटता हो तुम्हारा नाम
जबकि स्वर-स्वर को देती हो माधुर्य तुम्हीं
जबकि साँस-साँस निछावर हो अपनी देवी पर !
इसलिए कि अद्भुत्त मिठास से पगा है यह प्यारा नाम
और कहती है कितना-कुछ मुझसे उसकी लयकारियाँ
इतनी परिपूर्ण, इतनी सुरीली उसकी ध्वनियाँ
ठीक वैसे, जैसे कहीं दूर, आत्माओं की गूँजती स्वर-वलियाँ
मानो कोई विस्मयजनक अलौकिक सत्तानुभूति
मानो राग कोई स्वर्ण-तारों के सितार पर !
at 8:23 pm | 0 comments | पाब्लो नेरुदा
नायक के गीत
डरी हुई हो तुम
ग़रीबी से
घिसे जूतों में तुम नहीं चाहतीं बाज़ार जाना
नहीं चाहतीं उसी पुरानी पोशाक में वापस लौटना
मेरे प्यार, हमें पसन्द नहीं है,
जिस हाल में धनकुबेर हमें देखना चाहते हैं,
तंगहाली ।
हम इसे उखाड़ फेंकेंगे दुष्ट दाँत की तरह
जो अब तक इंसान के दिल को कुतरता आया है
लेकिन मैं तुम्हें
इससे भयभीत नहीं देखना चाहता ।
अगर मेरी ग़लती से
यह तुम्हारे घर में दाखिल होती है
अगर ग़रीबी
तुम्हारे सुनहरे जूते परे खींच ले जाती है,
उसे परे न खींचने दो अपनी हँसी
जो मेरी ज़िन्दगी की रोटी है ।
अगर तुम भाड़ा नहीं चुका सकतीं
काम की तलाश में निकल पड़ो
गरबीले डग भरती,
और याद रखो, मेरे प्यार, कि
मैं तुम्हारी निगरानी पर हूँ
और इकट्ठे हम
सबसे बड़ी दौलत हैं
धरती पर जो शायद ही कभी
इकट्ठा की जा पाई हो ।
- पाब्लो नेरुदा
at 8:07 pm | 0 comments | फैज़ अहमद फैज़
बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल ज़बाँ अब तक तेरी है
तेरा सुतवाँ जिस्म है तेरा
बोल कि जाँ अब तक् तेरी है
देख के आहंगर की दुकाँ में
तुंद हैं शोले सुर्ख़ है आहन
खुलने लगे क़ुफ़्फ़लों के दहाने
फैला हर एक ज़न्जीर का दामन
बोल ये थोड़ा वक़्त बहोत है
जिस्म-ओ-ज़बाँ की मौत से पहले
बोल कि सच ज़िंदा है अब तक
बोल जो कुछ कहने है कह ले
- फैज़ अहमद फैज़
at 7:54 pm | 0 comments | साहिर लुधियानवी
ख़ून अपना हो या पराया हो
ख़ून अपना हो या पराया हो
नस्ले आदम का ख़ून है आख़िर
जंग मग़रिब में हो कि मशरिक में
अमने आलम का ख़ून है आख़िर
बम घरों पर गिरें कि सरहद पर
रूहे- तामीर ज़ख़्म खाती है
खेत अपने जलें या औरों के
ज़ीस्त फ़ाक़ों से तिलमिलाती है
टैंक आगे बढें कि पीछे हटें
कोख धरती की बाँझ होती है
फ़तह का जश्न हो कि हार का सोग
जिंदगी मय्यतों पे रोती है
इसलिए ऐ शरीफ इंसानों
जंग टलती रहे तो बेहतर है
आप और हम सभी के आँगन में
शमा जलती रहे तो बेहतर है।
- साहिर लुधियानवी
बुधवार, 2 जून 2010
at 8:21 am | 0 comments | डॉक्टर एस.एम हैदर
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक
घर में नहीं दाने-अम्मा चली भुनाने
यह रहा यह वादा कि कुछ उत्पादन 2014, कुछ 2020 आदि तक बढ़ेगा। तो क्या पतातब तक हो सकता है आप न रहें, हो सकता है हम न रहें-कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक
- डॉक्टर एस.एम हैदर
at 8:11 am | 0 comments |
CPI CONDEMNS ISRAELI ATTACK ON GAZA AID SHIPS
The belligerent act of Israel has once again proved that to what extent Israel could go defying the world public opinion and humanitarian values. It is a fact that Israel is fully backed by US in its war against the Palestinian people.
While the whole world condemns the Israeli attack, the response of the Government of India is weak. This is due to its multiple cooperation with Israel including military one. The Party demands that India should take a firm stand and condemn Israel.
The Communist Party of India calls upon all peace loving and anti imperialist forces to condemn Israeli attack and express solidarity with the people of Palestine.
at 8:08 am | 0 comments | धूमिल
सिलसिला
और धमाका एक हलकी-सी रगड़ का
इंतज़ार कर रहा है
कठुआये हुए चेहरों की रौनक
वापस लाने के लिए
उठो और हरियाली पर हमला करो
जड़ों से कहो कि अंधेरे में
बेहिसाब दौड़ने के बजाय
पेड़ों की तरफदारी के लिए
ज़मीन से बाहर निकल पड़े
बिना इस डर के कि जंगल सूख जाएगा
यह सही है कि नारों को
नयी शाख नहीं मिलेगी
और न आरा मशीन को
नींद की फुरसत
लेकिन यह तुम्हारे हक में हैं
इससे इतना तो होगा ही
कि रुखानी की मामूली-सी गवाही पर
तुम दरवाज़े को अपना दरवाज़ा
और मेज़ को
अपनी मेज कह सकोगे।
- धूमिल
सोमवार, 31 मई 2010
at 10:22 am | 0 comments |
अखिल भारतीय हड़ताल की तैयारी करो - 15 जुलाई को दिल्ली में राष्ट्रीय कनवेंशन होगा
at 10:20 am | 0 comments |
बड़े उद्योगपतियों ने बैंकों के दबाए एक लाख करोड़
at 10:16 am | 0 comments | डॉ. कमलानन्द झा
शिकम की आग लिए फिर रहे है शहर-ब-शहर
(उपन्यास)
बादशाह हुसैन रिजवी
सुनील साहित्य सदन
नई दिल्ली-2
मूल्य: 150/- रुपये
बादहशाह रिजवी का ताजा उपन्यास ‘मैं मुहाजिर नहीं हूं’ विभाजन की गहरी पीड़ा और चुभते दंश की सरल-सहज अभिव्यक्ति है। अविभाज्य हिंदुस्तान के कथा नायक शमीम, लाहौर में रेलवे के बड़े अधिकारी हैं। 14 अगस्त 1947 की उस मनहूस रात को उन्हें ज्ञात होता है कि वे हिन्दुस्तान नहीं पाकिस्तान में हैं। बस्ती के एक छोटे से गावं हिल्लौर वासी रेलवे अधिकारी शमीमुल हसन रिज़वी उर्फ शमीम से एक बार यह पूछने की ज़रूरत भी महसूस नहीं की जाती हैं कि वे हिंदुस्तान में रहना चाहते हैं या पाकिस्तान में। इस विकल्प विहीनता की स्थिति में पाकिस्तान छोड़ने का मतलब था नौकरी से हाथ धो बैठना। दिल पर पत्थर रखकर शमीम लाहौर में रह जाते हैं किंतु उनका ‘सब कुछ’ बस्ती के उस छोटे-से गांव हिल्लौर में ही छूट जाता है। ‘सब कुछ’ का मलतब उनका अपना घर-परिवार, दोस्त, हिल्लौर की आबोहवा, वहां की खूबसूरती-बदसूरती, अच्छाई-बुराई, मन की भावनाएं, प्रेम, ईर्ष्या, सुख, दुख... सब कुछ। विभाजन की त्रासदी परशोध कर रहे शोधार्थी को अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए शमीम कहते हैं, “वक्त और लीडरों की सियासत ने मुझ जैसे बहुत सारे लोगों को उनके मां-बाप, भाई-बहन, पत्नियों, तमाम रिश्तेदारों से, उनकी अपनी सरज़मी से अलग कर दिया। मेरी ही मिसाल ले सकते हो, पैसे रहते हुए भी मैं अपने घरवालों के लिए कुछ नहीं कर सकता था। जब-जब उनके बारे में सोचता दिल कट के रह जाता। मां-बाप बड़ी लावारिसी की जिंदगी गुजार के इस दुनिया से गुजर गए। मैं इतना बदनसीब था कि बुढ़ापे में उनकी सेवा-टहल तो दूर, उनका आखिरी दीदार भी नहीं कर सका।”वर्षो बाद कथानायक शमीम अपने नाती के साथ हिल्लौर आते हैं। पूरे उपन्यास में शमीम कभी विगत यादों में खो-से जाते हैं, कभी लंबे अंतराल में हुए परिवर्तन को छोटे बच्चे की तरह चकित-भाव से देखते हैं। उपन्यास में शमीम वह बाइस्कोप हैं जहां से पूरे हिल्लौर के विगत और वर्तमान को देखा जाता है।उपन्यासकार हुसैन रिजवी की स्पष्ट धारणा है कि ‘विभाजन के पीछे अपने ही देसी लीडरों का हाथ था।’ मजे की बात तो यह है कि इन लीडरों ने कौम को दो हिस्सों में बांट दिया और देशभक्ति का खिताब भी पाया। विभाजन के समय आबादी की अदला-बदली की मुहिम जोर पकड़ती चली गई, आजाद हिंदुस्तान में इस मुहिम ने नई शक्लें अख्तियार कर लीं। सांप्रदायिक ताकतों ने अपनी-अपनी कौमें बांट लीं। स्वयं तय कर लिया कि हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ हिंदू समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं और मुस्लिम लीग तथा जमात-ए-इस्लामी मुस्लिम समुदाय का। जिन्हें यह बंटवारा पसंद नहीं था वे राजेश जोशी के शब्दों में ‘मारे जायेंगे, मारे भी गए। आश्चर्य तो यह कि बंटवारे की एवज में इन दलों को महिमामंडित भी किया गया।‘मैं मुहाजिर नहीं’ गंगा-जमुना संस्कृति को अधिक से अधिक पुख्ता करने की नीयत से लिखा गया उपन्यास है। यह ठीक है कि औपन्यासिक कला की दृष्टि से यह उपन्यास वह ऊंचाई प्राप्त नहीं कर पाता है जिसमें झूठा-सच, तमस, ‘सत्ती मैया का चौरा’ और‘आधा-गांव’ आदि उपन्यासों को शामिल किया जाता है किन्तु यह उपन्यास हिन्दू-मुस्लिम एकता और सह-संबंध की डोर मजबूत तो करता ही है साथ ही, अद्भुत रूप से आम पाठकों को कनविंस भी करता है। उपन्यासकार इस संबंध की संवेदनशीलता को उद्घाटित करने के लिए हिंदू घर में एक विवाह का दृश्य खींचता है। उस ‘बरहमन’ के यहां शादी में घारातियों और बरातियों में कई मुसलमान थे और वो भी अपनी पूरी पहचान के साथ। कथा नायक शमीम इस संस्कृति पर रीझकर नाज करते हुए कहते हैं, “नुसरत यही है हिंदुस्तान की असली पहचान। जिस पर कभी आंच नहीं आ सकती। जमाना जो भी कर ले। इस पर जितना भी नाज किया जाए कम है।” आगे मुहर्रम के दृश्यों के बहाने तो मीरा बाबा की प्रकृति के बहाने उपन्यासकार ने इस मिली-जुली अनूठी संस्कृति को अत्यंत विश्वसनीयता के साथ प्रस्तुत किया है।उपन्यास मुस्लिम समाज में व्याप्त आंधविश्वास, पिछड़ेपन, अशिक्षा और परंपरावादिता की तीखी आलोचना करता चलता है। इस अंधविश्वास की जड़ की तलाश करते हुए उपन्यासकार इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि “दरअसल हम लोगों को ‘इल्यूजन’ में रहना ज्यादा अच्छा लगता है और यही आधार है, मिथकों के जिंदा रहने का।” इस ‘इल्यूजन’ या भ्रम के शिकार अशिक्षित मुसलमान ही नहीं बल्कि पढ़े-लिखे और विदेशों में ऊंचे ओहदे पर काम करने वाले मुसलमान भी हो जाते हैं। वास्तव में मुस्लिम समाज के विकास में यह ‘इल्यूजन’ बाधक के रूप में हाजिर होता है।इस उपन्यास ने एक और अमरीका की दहशतगर्दी और दूसरी ओर उच्च मुस्लिम समाज का अमरीकी संस्कृति के प्रति बढ़ते मोह के अंतर्द्वद्व को बड़े ही रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है। जिस ‘कॉमेंट्री शैली’ में अमेरिका के साम्राज्यवादी कूटनीतिक षड़यंत्र का पर्दाफाश उपन्यासकार ने किया है, वह गौर-तलब है- ”इजरायल जैसा दहशतगर्द मुल्क, जो एटमी हथियारों से लैस है, उसकी बेशर्मी की हद तक हिमायत कर रहा है और मोहलिक (घातक) हथियारों को तलाश करने का बेबुनियाद बहाना बनाकर अपने हिमायती मुल्कों की फौज के साथ इराक पर हमला करके पूरे इराक को गड्ढे में तब्दील कर दिया। खोदा पहाड़ और चुहिया भी नहीं निकली।“ इत्तफाक ही है कि इस उपन्यास के प्रकाशन वर्ष (2009) में ही शुएब मंसूर निर्मित-निर्देशित पाकिस्तानी फिल्म ‘खुदा के लिए’ में इस एकतरफा रोमांचकारी जंग को अद्भुत प्रतीकात्मक ढंग से दिखाया गया है। यह फिल्म मुस्लिम आतंकवाद, धार्मिक फिरकापरस्ती पर तीखी टिप्पणी भी प्रस्तुत करती हैं फिल्म को दो टूक संवाद ‘दीन में दाढ़ी है, दाढ़ी में दीन नहीं’ मुस्लिम समाज से आत्मलोचन की मांग करता है। रिजवी साहब का उपन्यास भी इस आत्मलोचन के दौर से गुजरता है - ”मजहबी कट्टरपंथी तालिबानी निजाम कायम करना चाहते हैं। फौज की सरपरस्ती में दहशगर्दी के सैकड़ों कैंपों में खुदकुश बमबारों और दहशतगर्दी के टेªनिंग कैंप चल रहे हैं। 9/11 की दुर्घटना के बाद से अमरीका मुस्लिम मात्र को आंतकवादी ही नहीं समझता है बल्कि सिर्फ संदेह की बिना पर घोर यातना भी देता रहा हैं। ‘खुदा के लिए’ ने इस भयानक यातना का अत्यंत जीवंत रूप में प्रस्तुत किया है। संगीत प्रेमी मंसूर अमरीका में संगीत का प्रशिक्षण ले रहा होता है, अचानक अमरीकी सरकार द्वारा ‘रेशियल प्रोफाइलिंग’ का शिकार हो जाता है। उसे गैर औपचारिक रूप से उठा लिया जाता है और महीनों कैद में असहनीय यातनाएं दी जाती है। ‘मैं मुहाजिर नहीं’ अमरीका की दादागिरी की पोल को परत-दर-परत उधेड़ता चलता है। इस लिहाज से उपन्यासकार की यह व्यंग्यात्मक टिप्पणी गौर करने लायक है। “दुनिया का सबसे बड़ा दहशतगर्द चला है दुनिया से दहशतगर्दी मिटाने“ वाकई ‘सौ चूहे खाकर बिल्ली चली हज को’ मुहावरा अमरीका पर सौ फीसदी सहीबैठता है।युवा इस्लामिक पीढ़ी पर अमरीकी संस्कृति की सेंध की जायज चिंता लेखक को हैं, इस ‘हाईब्रिड संस्कृति’ को लेखक ‘इस्लाम मेड इन अमेरिका’ की संज्ञा देते हैं। गंभीरतापूर्वक देखा जाए तो इसमंे इस्लाम के अंतर्राष्टीªय संगठन और उसकी विचारधारा (पान- इस्लामिज्म) भी कम दोषी नहीं है। पाकिस्तान के लोकप्रिय पत्र ‘हेराल्ड’ (करांची, जनवरी 1996) में एस। अकबर की चिंता उपन्यासकार की चिंता से मिल जाती है जब वे लिखते हैं कि ”पाकिस्तान के शहरी मध्य वर्ग में उर्दू का चलन बहुत कम रह गया है। आश्चर्य यह है कि पढ़ा-लिखा एक तबका एक वाक्य भी बिना अंग्रेजी शब्दों के सहारे नहीं बोल सकता है। उसने स्वयं को अपने अतीत से बिल्कुल अलग कर लिया है। पाकिस्तान बनने के बाद वहां का शहरी मध्य वर्ग, अमेरिका में अपना भविष्य खोजता रहा है।“उपन्यास की सबसे बड़ी सीमा यह है कि लेखक विषय-वस्तु को उचित कथात्मकता प्रदान नहीं कर पाये। डाक्यूमंेट्री की तरह उपन्यास आगे बढ़ता है। अच्छे उपन्यास लेखन के लिए जिस व्यापक औपन्यासिक ‘विजन’ की आवश्यकता होती है उसका अभाव इस उपन्यास में स्पष्ट देखने को मिलता है। रिजवी के वैचारिक आग्रह कथा में कला की दृष्टि से गंुफित नहीं हो पाये हैं। यह उपन्यास एक सामाजिक स्टेटमंेट की तरह है जो भारतीय समाज मेंधर्मनिरपेक्ष संभावनाएं पैदा करना चाहता है। यह उपेदशात्मक अधिक रचनात्मक कम बना पाया है। इसमें दो राय नहीं कि उपन्यासकार का उद्देश्य एकधर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील भारत का निर्माण करना है। भाषा की दृष्टि से इसमें सहज, सरल उर्दू का प्रयोग किया गया है। जहां कहीं कठिन उर्दू के शब्द प्रयुक्त हुए हैं, वहां कोष्ठक में हिंदी का समानार्थी शब्द प्रयुक्त हुआ है। उपन्यास में कहीं-कहीं उत्तर प्रदेश की बोलियों का प्रयेाग सुखकर लगता है- “अरे काका आप! दिल्ली कब अवा गय रहा। उत्तर के हमारा इंहा आवैक लगा रहत है। अच्छा, ई बताई कमवा भवा?” उत्तर भारत के मध्यवर्गीय मुस्लिम समाज को जानने-समझने में यह उपन्यास काफी कारगर है। क्योंकि सामान्यतया मुस्लिम समाज मुख्यतः उर्दू रचनाओं में विन्यस्त होता है या फिर हमें उसके अनुवाद से इस समाज को जानने-समझने में मदद मिलती है। इस उपन्यास का अकादेमिक महत्व मुस्लिम समाज के समाजशास्त्रीय विश्लेषण में है। कथात्मकता, चरित्र- चित्रण आदि औपन्यासिक तत्व तलाशने वालों को इस उपन्यास से थोड़ी निराशा हो सकती है।
- डॉ. कमलानन्द झा
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