भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

7 सितम्बर 2010 की राष्ट्रव्यापी हड़ताल जबरदस्त सफ़ल - दस करोड़ मजदूर हड़ताल में शामिल

आठ केन्द्रीय टेªड यूनियनों और कई स्वतंत्र फेडरेशनों के आह्वान पर संगठित एवं असंगठित क्षेत्र के दस करोड़ से भी अधिक मजदूर हड़ताल में शामिल हुए। उन्होंने प्रभावी तरीके से यूपीए-दो सरकार की जनविरोधी और मजदूर विरोधी नीतियों के विरूद्ध रोष व्यक्त किया। मजदूरों ने जबर्दस्त एवं अभूतपूर्व हड़ताल की। महानगरों में बैंकों से लेकर सड़कों पर चलने वाले थ्री-व्हीलर तक बंद रहे, जनजीवन ठप्प हो गया।



देश के मेहनतकश लोगों की इस जबरदस्त प्रतिक्रिया से उत्साहित टेªड यूनियन केन्द्रों ने सही ही घोषणा की है कि यदि सरकार मजदूर वर्ग की मांगों, खासतौर पर महंगाई रोकने के लिए समुचित कदम नहीं उठाती है तो मेहनतकश लोग और अध्ािक जोरदार कदम उठाने पर मजबूर होंगे।



देश की केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों ने 7 सितंबर 2010 को मेहनतकश वर्ग की ज्वंलत मांगों के लिए हड़ताल की राष्ट्रव्यापी सफलता पर देश के मेहनतकश लोगों का हार्दिक अभिनंदन किया है। एक बयान में उन्होंने कहा है:



“देश की केन्द्रीय ट्रेड यूनियनें - इंटक, एटक, हिंद मजदूर सभा, सीटू, एआईयूटीयूसी, टीयूसीसी और यूटीयूसी महंगाई, श्रम कानूनों के उल्लंघन, सार्वजनिक क्षेत्र की मुनाफा कमाने वाली इकाइयों के विनिवेश, छंटनी, ले ऑफ और ठेकाकरण के विरुद्ध ऐतिहासिक हड़ताल के लिये देश के मेहनतकश लोगों का हार्दिक अभिनंदन करती हैं।”



”यह आम हड़ताल असंगठित मजदूरों- जो आज देश की श्रमशक्ति के 90 प्रतिशत से अधिक हैं- के लिए सामाजिक सुरक्षा के लिए पर्याप्त केन्द्रीय धनराशि की मांग के लिए भी थी।“



”अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में हड़ताल का असर पड़ा। ऐसा एक भी राज्य नहीं था जहां हड़ताल न हुई हो, यहां तक कि जम्मू-कश्मीर में भी हड़ताल रही; बैंक बीमा और अन्य अनेक संस्थान बंद रहे। कोयला, बिजली, टेलीकम्युनिकेशन, पेट्रोलियम, डाकघरों, राज्य सरकारों के दफ्तरों, रक्षा, सड़क परिवहन, आंगनबाड़ी और निर्माण में लगे लाखों मजदूरों ने हड़ताल की। गांवों के असंगठित मजदूरों ने भी साहस के साथ हड़ताल के आह्वान पर व्यापक रूप में हड़ताल में हिस्सा लिया। देश भर में हजारों मजदूरों ने जुलूस निकाले, धरने दिये और महंगाई के विरुद्ध प्रदर्शन किये।“



“सभी मेट्रोपेालिटन शहरों पर हड़ताल का जबरदस्त असर पड़ा। पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा मंे ही नहीं, असम, मेघालय, मणिपुर, झारखंड, बिहार, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, राजस्थान, हरियाणा, छत्तीसगढ़, गोआ, हिमाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक एवं अन्य राज्यों में भी मजदूरों ने बढ़चढ़ कर हड़ताल में हिस्सा लिया।”



मजदूर वर्ग के बीच 63 वर्ष बाद हासिल की गयी एकता ने मजदूरों को हड़ताल पर जाने के लिए प्रेरित किया। सार्वजनिक क्षेत्र ही नहीं, निजी क्षेत्र में भी हड़ताल उल्लेखनीय तरीके से सफल रही। हमारे अनुमान के अनुसार, दस करोड़ से अधिक मजदूर हड़ताल में शामिल हुए। इस एकताबद्ध कार्रवाई के लिए मजदूरों का अभिनंदन करते हुए केन्द्र टेªड यूनियनें उनका आह्वान करती हैं कि यदि टेªड यूनियनों द्वारा उठाये गये मुद्दों को सरकार द्वारा सही तरीके से हल नहीं किया जाता है तो फरवरी 2011 के महीने में संसद को विशाल मार्च की तैयारी में जुट जाये।”



विभिन्न राज्यों से हड़ताल की प्रारंभिक रिपोर्ट अत्यंत उत्साहजनक हैंः



सभी केन्द्रीय टेªड यूनियनों (सिवाय भारतीय मजदूर संघ), औद्योगिक एवं स्वतंत्र फेडरेशनों द्वारा 7 सितंबर 2010 को राष्ट्रव्यापी हड़ताल के आह्वान पर सभी राज्यों, उद्योग के सभी क्षेत्रों, संगठित एवं असंगठित उद्योगों, राज्य सरकार और केन्द्र सरकार के सभी कर्मचारियों, मजदूरों ने उत्साहपूर्वक हड़ताल में हिस्सा लेकर इस हड़ताल को एक ऐतिहासिक हड़ताल बना दिया।



हड़ताल के संबंध में क्षेत्रवार संक्षिप्त जानकारी

 बैंकिंग उद्योग



देश भर में बैंकों के कर्मचारियों और अधिकारियों ने अत्यधिक संगठित तरीके से हड़ताल में हिस्सा लिया।



बीमा उद्योग एवं अन्य वित्त क्षेत्र-बीमा कम्पनियों एवं वित क्षेत्र के विभिन्न संस्थानों में काम करने वाले कर्मचारी शत-प्रतिशत हड़ताल पर रहे है।



कोयला मजदूर



देश भर में तमाम खान-खदानों में शत प्रतिशत कोयला मजदूर हड़ताल में शामिल हुए। अनेक खान क्षेत्रों में विशाल प्रदर्शन किए गये।



तेल-पेट्रोलियम उद्योग



लगभग तमाम रिफाइनरियों समेत ओएनजीसी, इंडियन ऑयल और अन्य तेल कंपनियों के कर्मचारियों ने अत्यंत सफल हड़ताल की। इससे स्वाभाविक ही था कि ट्रांसपोर्ट और एयरलाइंस जैसे अन्य क्षेत्रों पर भी असर पड़ा।



सड़क परिवहन



राजस्थान, पंजाब, चंडीगढ़, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, गोआ, पेप्सू ट्रांसपोर्ट, केरल, असम आदि राज्यों में सड़क परिवहन ठहर गया।



रक्षा क्षेत्र



आर्डनेंस फैक्टरियों में तमाम असैन्य कर्मचारियों, डीआरडीओ प्रयोगशालाओं और रक्षा कर्मचारियों ने आम हड़ताल में हिस्सा लिया। जिससे इस क्षेत्र मे काम ठप्प हो गया।



असंगठित क्षेत्र



सभी राज्यों में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों ने शानदार तरीके से हड़ताल में हिस्सा लिया। आंगनबाड़ी, घरेलू, मजदूर, मिड डे मील योजना, आशा, लाखें निर्माण मजदूर, बीडी मजदूर, ठेका मजदूरों आदि ने हड़ताल में हिस्सा लिया। सरकारी दफ्तरों पर पिकेटिंग की और प्रदर्शनों में हिस्सा लिया।



बिजली उद्योग



कई राज्यों में बिजली मजदूरों ने हजारों की संख्या में हड़ताल में हिस्सा लिया जिसका इसके संबंधित अन्य गतिविधियों पर असर पड़ा।



राज्य और केन्द्र सरकार के कर्मचारी



केरल, हरियाणा, राजस्थान, पं. बंगाल, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, गोआ, बिहार, असम आदि राज्यों के काफी संख्या में सरकारी कर्मचारी हड़ताल मंे शामिल हुए। डाकतार, इन्कम टैक्स विभाग एवं अन्य विभागों के कर्मचारी विभिन्न राज्यों में और हड़ताल मंे शामिल हुए।



टेली कम्युनिकेशन



टेलीकम्युनिकेशन (बीएसएनएल) के कर्मचारी कई राज्यों में हड़ताल पर गये क्योंकि उनकी यूनियनें हड़ताल के प्रयोजकों में से थी।



एडयापुर रामगढ़ औद्योगिक इलाके की 1500 छोटी कंपनियों ने हड़ताल की। भावंतपुर लाईम स्टोन, बैंकों, बीमा, बीएसएनएल मजदूरों ने हड़ताल की। केन्द्र एवं राज्य सरकार के 90 प्रतिशत कर्मचारी हड़ताल में शामिल हुए। बीएसएसआर के सेल्स सेक्टर के शतप्रतिशत कर्मचारी हड़ताल पर थे।



- आल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस
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शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

बिहार में वाम समन्वय समिति द्वारा 16 से 22 अगस्त तक राज्यव्यापी अभियान - केन्द्र एवं राज्य सरकार की कारगुजारियों का भंडाफोड़

टीवी चैनलों पर एक फिल्मी गीत की यह पंक्ति बार-बार दुहरायी जा रही है: “सखि सइयां त खूबें कमात हैं, महंगाई डायन खाये जात है। ”इस एक पंक्ति में कमतोड़ महंगाई की पीड़ा उजागर होती है। महंगाई की एक अकेली हकीकत यह साबित करने के लिए काफी है कि यूपीए-दो और उनकी मुख्य पार्टी कांग्रेस का जनता के हित से कोई वास्ता नहीं रह गया है और मनमोहन सिंह सरकार की आर्थिक नीतियां जनविरोधी हैं।



दो साल में दूनी हुई कीमतें



हो सकता है कि आपने पिछले डेढ़-दो साल में कड़ी मेहनत करके अपनी कमाई सवाई या डेढ़ा बढ़ा ली हो। लेकिन इसी डेढ़-दो साल में भोजन और दूसरी जरूरी चीजों के दाम दूने हो गये। इस तरह महंगाई ने आपकी बढ़ी हुई कमाई तो छीन ही ली, पहले वाली कमाई में भी सेंधमारी कर ली।



गेहूं का दाम 7-8 किलो से बढ़ 14-15 रु. किलो, चावल 8-10 से बढ़कर 18-20 रु. किलो, डालडा, सरसो तेल आदि खाद्य तेलों के दाम 35-40 रु. से 80-90 रु. किलो। सब्जियों के दाम तो मौसम के अनुसार घटते-बढ़ते हैं। उनके दाम में भी मोटा-मोटी दूने की बढ़ोत्तरी। मांस-मछली-अंडा, दूध, चाय, चीनी आदि सब का यही हाल है। दवाओं के दाम तो इसी डेढ़-दो साल में दूना से भी ज्यादा बढ़ गये। क्या खाये, कैसे जीये आम आदमी?



बिहार में 90 फीसदी भूखे पेट



100 में से 10-15 परिवारों की आमदनी दूनी, तिगुनी या चार-पांचगुनी बढ़ी है। उनको महंगाई से परेशानी नहीं है। योजना आयोग की सुरेश तेंदुलकर कमेटी ने सर्वे करके बताया है कि हमारे देश में करोड़ो को भरपेट खाना नहीं मिलता। यह 2005 की रिपोर्ट हैं। आज की भीषण महंगाई में तो भूखे पेट सोने वाले की संख्या और भी बढ़ गयी है और तेंदुलकर कमेटी का यह आंकड़ा पूरे देश का औसत है जिनमें पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, तमिलनाडु आदि जैसे अपेक्षाकृत संपन्न राज्य भी शामिल हैं। बिहार जैसे गरीब राज्य में तो 90 फीसद से ज्यादा लोग भूखे सोने या आधा पेट खाकर गुजर करने को मजबूर हैं।



तेंदुलकर कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में 100 में से 55 परिवार गरीबी रेखा के नीचे हैं। केन्द्र सरकार द्वारा गठित अर्जुन सेनगुप्ता आयोग (असंगठित क्षेत्र प्रतिष्ठान आयोग) की रिपोर्ट के मुताबिक देश में करीब 78 फीसद लोग रोजाना 20 रु. या उससे कम खर्च से गुजर करते हैं। यह भी 2007 रिपोर्ट है। आज तो उनकी वास्तविक खपत घटकर रोजाना 10 रु. रह गयी है क्योंकि कीमतें दूनी हो गयीहैं। यह भी पूरे देश के लिए है। इस दृष्टि से भी बिहार का बुरा हाल है। इतने कम पैसे में ये गरीब क्या खायेंगे, क्या बच्चों को खिलाएंगे-पढ़ायेंगे, क्या इलाज कराऐंगे?



सरकार द्वारा थोपी गयी महंगाई



यह महंगाई डायन आयी कहां से? यह जानना बहुत जरूरी है। यह प्रकृति या ऊपर वाले की देन नहीं है। यह केन्द्र और राज्य सरकार द्वारा आम आदमी पर थोपी गयी महंगाई है। महंगाई भी एक तरह का टैक्स है जो दिखायी नहीं देता। सामान खरीदते वक्त महंगाई के कारण आप जो फाजिल दाम देते हैं, वह किसके पास जाता है? वह जाता है मुनाफाखोर खुदरा व्यापारी के पास और उन बड़े पूंजीपतियों के पास जो नये जमाखोर बने हैं। वे खाद्य पदार्थोें और अन्य अनिवार्य वस्तुओं का जखीरा जमा करके ‘कामोडिटी सट्टा बाजार’ में इन जखीरों की सट्टेबाजी करते हैं। ये तमाम व्यापारी कीमतें बढ़ाकर जो नाजायज मुनाफा लूटते हैं, उसका एक हिस्सा सरकारी खजाने में टैक्स के रूप में जाता है। हरेक बिक्री पर केन्द्र और राज्य सरकार उत्पाद कर, पेशा कर, बिक्री कर, ‘वैट’ आदि के रूप में टैक्स उगाहती है- सो अलग।



केन्द्र और राज्य सरकार का सबसे बड़ा अपराध यह है कि भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में लाखों टन अनाज सड़ रहा है और गरीब लोग कुपोषण और भूखमरी के शिकार हो रहे हैं। 1970 के दशक में सरकार ने नीति बनायी थी कि खाद्य निगम किसानों से खाद्यान्न आदि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदेगा और जन वितरण प्रणाली (राशन की दुकान) के जरिये सस्ती दर पर बेचेगा। खाद्य निगम को जो घाटा होगा, उसकी भरपाई के लिए सरकार ‘खाद्य सब्सिडी’ देगी। यह आम आदमी को महंगाई की मार से बचाने की एक कारगर नीति थी।



लेकिन 1991 में कांग्रेस की नरसिम्हा राव सरकार ने विदेशी महाजनों के दबाव में आकर उदारीकरण-निजीकरण -वैश्वीकरण की ‘नयी आर्थिक नीति’ अपनायी। डा. मनमोहन सिंह उस वक्त वित्तमंत्री थे। इस नीति के मुताबिक खाद्य सब्सिडी समेत तमाम सब्सिडियों में कटौती शुरू हुई। खाद्य सब्सिडी घटाने के लिए आम आदमी को ‘एपीएल’ और ‘बीपीएल’ में बांटा गया। सिर्फ बीपीएल को सस्ता राशन देने की नीति अपनायी गयी। गरीबी रेखा को नीचे गिराकर बीपीएल परिवारों की तादाद घटायी गयी। राज्यों को मिलने वाले अनाज का कोटा घटाया गया। बाद में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की वाजपेयी सरकार आयी तो उसने इस नीति को और भी सख्ती से लागू किया।



नतीजा यह हुआ कि सरकारी गोदामों में अनाज का भारी जखीरा जमा हो गया। कानूनन 2.1 करोड़ टन जमा रखना था वहां 6 करोड़ टन जमा हो गया। रखने की जगह नहीं मिली तो आधे अनाज को खुले आसमान के नीचे तिरपाल से ढककर रखा गया। वाजपेयी सरकार के जमाने में दो लाख टन अनाज सड़ गया। यूपीए-2 की मौजूदा सरकार के शासन की ताजा खबर यह है कि 17,000 करोड़ रु. का अनाज सड़ गया, लेकिन इस सरकार ने 500 करोड़ रु. की खाद्य सब्सिडी बचाने के लिए यह अनाज राशन दुकानों के जरिये सस्ती दर पर बेचने के लिए राज्यों को जारी नहीं किया।



पेट्रोल-डीजल-किरासन की मूल्यवृद्धि



गत मई महीने में भोजन सामग्री की महंगाई 17 फीसद और आम चीजों की औसत महंगाई 10 फीसद की अभूतपूर्व तेजी से बढ़ रही थी। ऐसी हालत में केन्द्र सरकार ने 25 जून 2010 को पेट्रोन-डीजन-किरासन और रसोई गैस का दाम बढ़ाकर महंगाई की आग में घी डालने का काम किया। यह आम आदमी की जेब काटकर सरकारी और निजी तेल कंपनियों को खजाना भरने वाला कदम है। सरकार को मालूम है कि पेट्रोलियम पदार्थों का दाम बढ़ने से सभी चीजों के दाम बढ़ते हैं। तब भी यह कदम उठाकर केन्द्र सरकार ने महंगाई की मार से तड़पते आम आदमी के भूखे पेट पर लात मारी है।



यह सफेद झूठ है कि सरकारी तेल कंपनियों को घाटा हो रहा है अव्वल तो सरकार पेट्रोलियत पदार्थों पर भारी टैक्स लगाकर हर साल खरबों रुपये उगाहती है। दूसरे, ये कंपनियां हर साल सरकार को खरबों रु. लाभांश के रूप में देती हैं। इसके बावजूद इन कंपिनयों को हर साल मुनाफा हो रहा है।



दुष्टतापूर्ण दलीलें



केन्द्र सरकार की दुष्टतापूर्ण दलीलें उसके जन-विरोधी चरित्र को बेपर्दा कर रही हैं। दलील दी जा रही है कि तेजी से देश का विकास हो रहा है, इसलिए महंगाई बढ़ रही है। दूसरी दलील यह दी जा रही है महंगाई अच्छी है, क्योंकि इससे किसानों को लाभ हो रहा है। दोनों दलीलें बकवास हैं।



यह कैसा विकास है कि जिसमें करोड़ो लोग भूख से तड़पते हैं और 90 फीसद लोगोें को भरपेट खाना नहीं मिलता? संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में जितने भूखे लोग हैं, उनका एक चौथाई अकेले भारत में हैं। भारत के बिहार समेत आठ राज्यों की जनता की हालत दुनिया के सबसे गरीब अफ्रीकी देशों से भी बदतर है। खाद्यान्नों की महंगाई का लाभ भी किसानों को नहीं मिल रहा। व्यापारी उनका माल सस्ता खरीद कर और उपभोक्ता को महंगा बेचकर मालामाल हो रहे हैं। कृषि और किसान तो 15 साल से संकट में है। दो लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या करने को मजबूर हुए हैं।



हकीकत यह है कि सरकार महंगाई बढ़ाकर किसानों-मजदूरों और आम आदमी की कमाई छीन कर बड़े पूंजीपतियों का खजाना भर रही है। नतीजा यह है कि विकास, पूंजीपतियों का हो रहा है। एक ओर गरीबी बढ़ रही है, दूसरी ओर खरबपतियों की संख्या छलांग लगा रही है। देश के 52 खरबपति परिवारों ने देश की एक चौथाई दौलत पर कब्जा कर रखा है।



ऊपर की बातों से जाहिर है कि सरकार की जन-विरोधी नीतियों और सटोरियों-जमाखोरों-मुनाफाखोरों ने देश में भीषण खाद्य संकट पैदा कर दिया है और 90 फीसद लोगों को भोजन का अधिकार छीना जा रहा है। इसके लिए बिहार सरकार भी समाज रूप से जिम्मेदार है।



वामपक्ष के सुझावों को नहीं माना



महंगाई का मौजूदा दौर दिसंबर 2008 में शुरू हुआ। तभी से वामपंथ इसके खिलाफ लड़ रहा है। जुलाई 2008 तक संसद में यूपीए-एक की सरकार वामपक्ष के समर्थन पर निर्भर थी। तब तक महंगाई अपेक्षाकृत नियंत्रण में थी। उसके बाद सरकार वामपक्ष की लगाम से मुक्त हो गयी और महंगाई बढ़ने लगी। जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष और एनडीए के संयोजक शरद यादव ने भी एक टीवी कार्यक्रम में कहा कि वामपक्ष पर निर्भरता से मुक्त होने के बाद मनमोहन सिंह सरकार बेलगाम हो गयी, जिसकी वजह से महंगाई तेजी से बढ़ने लगी।



महंगाई को काबू में लाने के लिए वामपक्ष ने सरकार को सुझाव दिया किः



1. खाद्य पदार्थो और अनिवार्य वस्तुओं की सट्टेबाजी पर रोक लगायी जाये।



2. पेट्रोलियम पदार्थों का दाम हरगिज नहीं बढ़ाया जाये और अगर पेट्रोलियम कंपनियेां को राहत देनी ही है तो सरकार इन पदार्थों पर अपना टैक्स घटाये,



3. एपीएल-बीपीएल का विभाजन खत्म किया जाये, जनवितरण प्रणाली द्वारा सस्ते राशन की सप्लाई सबके लिए हो और केन्द्र सरकार राज्यों का राशन का कोटा बढ़ाये, दालें, खाद्य तेल आदि भी राशन में शामिल हों।



4. जमाखोरों के गोदामों पर बड़े पैमाने पर छापामारी की जाये और जमाखोरों को गिरफ्तार कर जेल भेजा जाये।



5. जनवितरण प्रणाली में व्याप्त कालाबाजारी और भ्रष्टाचार को खत्म किया जाये और इस प्रणाली को महंगाई की मार से आम आदमी को बचाने का कारगर औजार बनाया जाये।



6. बीपीएल सूची में सुधार किया जाये ताकि कोई भी गरीब परिवार सूची के बाहर न रह जाये।



7. कृषि संकट का समाधान किया जाये ताकि कृषि पैदावार बढ़े और खाद्य संकट का समाधान हो।



लेकिन वामपक्ष के सुझावों को न केन्द्र सरकार ने माना, न राज्य सरकार ने। इसनिए महंगाई के खिलाफ, खाद्य संकट के समाधान के लिए और भोजन का अधिकार हासिल करने के लिए उपरोक्त मांगों केा लेकर आंदोलन चलाने के सिवा कोई चारा न था। वामपक्ष लगातार आंदोलन चलाता रहा है। मिसाल के लिए, पिछले चार महीनों में दो बार, वामपक्ष की पेशकदमी पर ‘भारत बंद’ हुए- 27 अप्रैल और 8 जुलाई को; और सभी टेªड यूनियनों के आह्वान पर 7 सितम्बर 2010 को देशव्यापी आम हड़ताल की गई।



नीतिश सरकार के काले कारनामे बाढ़-सुखाड़ की त्रासदी और लापरवाह सरकार



बिहार कृषि प्रधान राज्य है। लेकिन चिन्ता का विषय है कि यहां की कृषि अत्यंत पिछड़ी है। यहां के किसान हर साल बाढ़-सुखाड़ की त्रासदी झेलने के लिए अभिशप्त हैं।



पिछले साल सम्पूर्ण बिहार सुखाड़ से पीड़ित था। इस संबंध में वामपंथ ने राज्य सरकार को सुझाव दिए थे-



1. संपूर्ण बिहार को सूखा क्षेत्र घोषित किया जाये, लेकिन राज्य सरकार ने सिर्फ 26 जिलों को ही सूखाग्रस्त घोषित किया।



2. वामपंथ ने मांग की कि सूखा प्रभावित क्षेत्रों के किसानों की मालगुजारी माफ कर दी जाये। सभी किसानों के लिए संभव नहीं हो तो मध्यम, लघु और सीमांत किसानों की तो अवश्य ही। राज्य सरकार ने किसी भी किसान की मालगुजारी माफ नहीं की।



3. वामपंथ ने मांग की कि सूखा प्रभावित क्षेत्रों के किसानों के सभी तरह के ऋणों की वसूली स्थगित कर दी जायें और मध्यम, लघु और सीमान्त किसानों के ऋण माफ किए जाये। राज्य सरकार ने ऋण वसूली तो तत्काल स्थगित की, किन्तु ब्याज किसी का माफ नहीं किया।



4. वामपंथ ने मांग की कि सभी किसानों को सस्ती ब्याज दर (चार प्रतिशत) पर कृषि ऋण दिया जाय। सरकार ने ऐसा नहीं किया।



5. वामपंथ ने कहा कि राज्य में बंद पड़े सभी लगभग 6 हजार सरकारी नलकूपों को चालू कराया जाय ताकि सुखाड़ का मुकाबला किया जा सके। लेकिन राज्य सरकार ने सिर्फ 1719 नलकूप चालू करने का दावा किया।



6. वामपंथ ने कहा था कि सभी अधूरी परियोजनाओं को ूपरा किया जाये ताकि सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी मिल सके। लेकिन सरकार एक भी परियोजना पूरी नहीं कर सकी।



7. वामपंथ ने सुझाव दिया कि सोन नहर और अन्य नहरों की मरम्मत और उनका आधुनिकीकरण किया जाये। सरकार यह काम भी नहीं कर सकी।



8. वामपंथ ने सुझाव दिया सुखाड़ के कारण ग्रामीण बेराजगारी को दूर करने के लिए नरेगा कानून को शिथिल करते हुए काम चाहने वाले सभी मजदूरों को काम दिया जाये। सरएकार ने यह काम नहीं किया।



9. वामपंथ ने सुझाव दिया, सूखाग्रस्त क्षेत्रों में भुखमरी से राहत दिलाने के लिए सस्ती भोजन की दुकानें खोली जायें। सरकार ने इसे भी नहीं किया।



10. वामपंथ ने मांग की थी कि सूखा प्रभावित क्षेत्रों में मवेशियों के लिए सस्ती दर पर चारा उपलब्ध कराया जाये। सरकार इस काम में भी विफल रही।



वामपंथ के उपर्युक्त सुझावों को अमल में नहीं लाने का परिणाम है कि आज फिर समूचार बिहार सुखाड़ की लौ में झुलस रहा है। इस साल सुखाड़ के कारण अभी तक 1200 सौ करोड़ रुपये का नुकसान किसानों को हो चुका है। राज्य सरकार ने सिर्फ 28 जिलों को सूखा क्षेत्र घोषित किया है। पर इन 28 जिलों में सरकार की ओर से कोई राहत कार्य नहीं चलाया जा रहा है।



बाढ़ की स्थिति बिहार में और ज्यादा भयानक है। हर साल बाढ़ के कारण यहां के किसानों की हजारों करोड़ रुपये की फसल बर्बाद होती है। सैकड़ों जानें जाती हैं। हजारों पशु पानी में बह जाते हैं। लाखों परिवार बेघर हो जाते हैं। अरबों अरब रुपये की सरकारी और गैर-सरकारी सम्पत्तियों की बर्बादी होती है। लेकिन सरकार की ओर से बाढ़-सुखाड़ के स्थायी निदान के लिए कोई भी प्रयास नहीं किया जा रहा है।



अपने साढ़े चार साल की कार्य अवधि में नीतिश सरकार एक भी नयी चीनी मिल नहीं खोल सकी; और न ही किसी पुरानी चीनी मिल का जीर्णोद्वार करके फिर से चालू ही कर सकी। सरकार की इस कार्य अवधि में कृषि आधारित उद्योग बिल्कुल उपेक्षित पड़े रहे।



राज्य में बिजली की स्थिति अत्यंत ही खराब है। सरकार अब तक के कार्यकाल में बिजली की कोई नई इकाई खड़ी नहीं कर सकी और न ही बिजली का एक यूनिट भी अतिरिक्त पैदा कर सकी।



नीतिश सरकार अब तक के अपने कार्यकाल में अपनी कमजोरियों को छिपाने के लिए सारा दोष केन्द्र सरकार पर मढ़ती रही है। अभी सरकार ने 2 8 जिलों को सूखाग्रस्त घोषित किया है। पर यह सरकार जनता को कोई राहत देने वाली नहीं है। उसने आठ हजार करोड़ रुपये की मांग केन्द्र सरकार से की है। मदद नहीं मिलने पर केन्द्र पर दोष मढ़कर हमले करने की यह नीतिश सरकार की पूर्व की तैयारी है।



अपराध रोकने का भी ढिंढोरा नीतिश सरकार पीट रही है। पर अब तक के अपने कार्यकाल में पुलिस के बर्ताव में यह सरकार ऐसा कोई बदलाव नहीं ला सकी है जिसमें एक संगठित अपराधकर्मी के रूप में पुलिस की छवि में सुधार हो सके।



हजारों करोड़ रुपये का महाघोटाला



लोगों में प्रचार किया जा रहा है कि बिहार में अभी सुशासन वाली सरकार चल रही है। लेकिन सरकार के काले कारनामों से साबित होता है कि यहां सुशासन वाली नहीं दुशासन की सरकार चल रही है। भारत के महालेखाकार एवं नियंत्रक की रिपोर्ट से यह उजागर हुआ कि 2002-03 से लेकर 2007-08 तक सरकारी खजाने से विभिन्न कार्यों के लिए 11,412 करोड़ रुपये निकाले गए जिसके खर्च का कोई हिसाब नहीं दिखाया गया। मामला हाईकोर्ट में भी गया। हाईकोर्ट ने सुनवाई करते हुए इस मामले की जांच सीबीआई से कराने का आदेश दिया। यह सरकर ‘चोर न सहे इंजोर’ वाली कहावत को चरितार्थ करने पर तुल गई। सरकार भी पटना हाईकोर्ट की जांच सीबीआई से न कराने की मांग हाईकोर्ट से की। अगर यह घोटाला नहीं है तो राज्य सरकार सीबीआई से जांच से क्यों घबरा रही है। ‘सांच को आंच क्या’ को चरितार्थ करने के लिए सरकार क्यों तैयारी नहीं हो रही? अनुमान किया जा रहा है कि 2010 तक लगभग 25 हजार करोड़ रुपये का हिसाब-किताब सरकार के पास नहीं है। सीबीआई की जांच के इस डर से फर्जी वाउचरों के आधार पर राज्य सरकार खर्चें का हिसाब-किताब महालेखाकार को देने का असफल प्रयास कर रही है।



इतना ही नहीं, ‘एक तो चोरी, दूसरे सीनाजोरी’ वाली कहावत को राज्य सरकार ने विधानमंडल के दोनों सदनों में बड़ी बेशर्मी से चरितार्थ कर दिखाया। इस घोटाले से

संबंधित मामले को जब विपक्ष ने सदन में उठाया तो सत्तापटल की ओर से उन पर जान-लेवा हमला हुआ। इन हमलों में राज्य सरकार के कई मंत्री भी शामिल हुए। दोनों सदनों में वह सब कुछ हुआ जो कभी देखा, सुना नहीं गया। सदन को यातनागृह बना दिया गया। विधानसभा में रातभर धरने पर बैठे विपक्षी सदस्यों को जो यातनाएं दी गई वह निन्दनीय तो हैं ही उसे संसदीय लोकतंत्र का कलयुगी चीरहरण भी कहा जा सकता है। यह सबकुछ मुख्यमंत्री नीतिश कुमार और उपमंख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के इशारे पर और उनकी आंखों के सामने हुआ।



इसके पूर्व में भी एक घोटाला उजागर हुआ जिसे शराब घोटाला कहते हैं। तत्कालीन विभागीय मंत्री ने जब इस घोटाले की जांच निगरानी ब्यूरो से कराने की मांग की तो मुख्यमंत्री ने उन विभागीय मंत्री को ही मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया। स्पष्ट है कि नीतिश कुमार की सरकार घोटालेबाजों और भ्रष्टाचारियों की सरकार है।



वामंपथ ने मांग की है कि-



1. टेªजेरी महाघोटाले की जांच पटना उच्च न्यायलय की निगरानी में सीबीआई से करायी जाये।



2. मुख्यमंत्री सहित घोटाले में संबंधित सभी विभागों के मंत्रियों को बर्खास्त किया जाये।



3. इस घोटाले में नामजद आरोपियों के खिलाफ आर्थिक अपराध का मुकदमा चलाया जाये।



4. नामजद आरोपियों की सम्पत्तियों को जब्त किया जाये।



भूमि सुधार की दुश्मन सरकार



भूमि सुधार के मामले में नीतिश सरकार राज्य की पूर्ववर्ती सरकारों के नक्शे कदम पर चल रही है। पूर्व की राज्य सरकारें और वर्तमान राज्य सरकार भूमि सुधार की दुश्मन है। बिहार में अब तक भूमि सुधार संबंधी जो भी कानून बनाये गये या

भूमिसुधार लागू किया गया है वह सब वामपंथ के कठिन संघर्षों, बलिदानों और आम गरीबों में अपने अधिकारों के प्रति चेतना का परिणाम है।



नीतिश सरकार ने शहरी भूहदबंदी कानून को निरस्त करके शुरू में ही भूमि सुधार विरोधी अपने चरित्र को उजागर कर दिया। आम लोगों को भरमाने और ठगने के लिए एक भूमि सुधार आयोग का गठन किया। इस आयोग ने अपनी अनुशंसाओं के साथ अपनी एक रिपोर्ट सरकार को दी। यह रिपोर्ट नीतिश सरकार के लिए एक कठिन परीक्षा बन गई। रिपोर्ट को लागू करने से मना करके इस सरकार ने यह साबित कर दिया है कि वह भूमाफियाओं, पूर्व-सामंतों और बड़े भूस्वामियों की चाकरी करने वाली सरकार है। इसने यह भी साबित कर दिया है कि भूमिहीनों, बटाईदारों और बेघरों की कोई परवाह इसे नहीं है।



वामपंथ मांग करता रहा है किः-



1. भूमि सुधार कानूनों को सख्ती से पालन किया जाये, लेकिन सरकारी नौकरशाह इन कानूनों का भीतरघात करते रहे हैं। सत्ता में बैठे रालनीतिज्ञ भी इन कानूनों का मखौल उड़ाते हैं।



2. भूहदबंदी कानून, भूदान कानून, आवासीय भूमि कानून आदि रहने के बावजूद बिहार में 20,95,000 एकड़ भूमि भूमाफियाओं, पूर्व-जमींदारों और बड़े भूस्वामियों के अवैध कब्जे में है। न उन्हें कानून की परवाह है और न सरकार ही उन कानूनों को लागू करने की इच्छुक है। आज भी 22 लाख परिवार भूमिहीन हैं। 5 लाख भूमिहीन परिवार बेघर है। सरकार को उनकी कोई चिन्ता नहीं है। बिहार में 30-35 प्रतिशत खेती बटाईदारी पर होती है। बटाईदारी, व्यवस्था राज्य की कृषि में बहुत पुरानी है। लेकिन वर्तमान में इस व्यवस्था को संचालित करने के लिए कोई भी कानून व्यवहार में नहीं है, जिसकी लाठी उसकी भैंस वाले कानून से यह व्यवस्था चलायी जा रही है।



वामपंथी चाहते हैं कि:-



1. बिहार में सख्ती और ईमानदारी से भूमि सुधार किया जाये। भूमि

सुधार का भीतरघात करने वाले सरकारी अधिकारियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाये।



2. बंद्योपाध्याय भूमि सुधार आयोग की सिफारिशों को शीघ्र लागू किया जाये।



3. प्रत्येक भूमिहीन परिवार को एक-एक एकड़ भूमि दी जाए।



4. प्रत्येक भूमिहीन बेघर परिवार को दस डिसमिल आवासीय भूमि दी जाये, भूदान की अवितरित जमीन को भूमिहीनों में बांटा जाये।



5. बेदखल पर्चाधारियों को उनकी जमीन पर कब्जा दिलाया जाये।



6. लम्बे काल से बसे हुए भूमिहीनों को उस जमीन का पर्चा दिया जाये।



7. अदालतों में लंबित भूमि सुधार संबंधी मामलों का शीघ्र निपटारा विशेष अदालत गठित कर किया जाए।



8. बटाई कृषि व्यवस्था में एक ऐसा कानून बनाया जाये जिसमें जमीन मालिकों और बटाईदारों के अधिकारों की सुरक्षा की गारंटी हो।



नीतिश सरकार इन सुझावों में एक भी सुझाव मानने के लिए तैयार नहीं है। तब ऐसी सरकार को भूमि सुधार की दुश्मन नहीं तो और क्या कहा जाए।



महंगाई के मोर्चे पर सरकार विफल



महंगाई के मोर्चे पर भी बिहार की जदयू-भाजपा सरकार के भी काले कारनामे कोई कम नहीं हैं।



1. सरकार ने राज्य कर घटाकर महंगाई से राहत देने को कोई कदम नहीं उठाया (सिर्फ डीजल के भाव में किसानों को थोड़ी राहत दी जो कुछ ही किसानों को मिल सकी)।



2. अनिवार्य वस्तु कानून को हथियार बनाकर न तो जमाखोरों के गोदामों पर छापेमारी की, और न ही किसी जमाखोर को पकड़कर जेल में डाला।



3. महंगाई से राहत दिलाने वाले एक कारगर औजार जनवितरण प्रणाली को काला बाजारी और लूट का अखाड़ा बना दिया। यहां तक कि लाल कार्डधारी अत्यंत गरीबों और पीला कार्डधारी-बेसहारा लोगों को राशन को काला बाजार में बिकने दिया।



4. बीपीएल सूची बनाने में धांधली की खुली छूट दे दी। नतीजा यह हुआ कि नयी सूची में करीब एक तिहाई पुराने लाल कार्डधारियों के नाम गायब हैं जिसको लेकर हंगामा मचा है।



16-22 अगस्त अभियान



वामपंथ की स्पष्ट समझ है कि सशक्त जन आंदोलन से ही केन्द्र और राज्य सरकार को महंगाई पर लगाम लगाने, खाद्य संकट हल करने और सबको भोजन का अधिकार देने के लिए मजबूर किया जा सकता है और महंगाई से पीड़ित जनता की शिरकत से ही जन आंदोलन सशक्त होगा।



इसलिए वामपंक्ष (भाकपा, भाकपा {मा}, फारवर्ड ब्लॉक और आरएसपी) ने पूरे अगस्त महीने में देशव्यापी सघन अभियान चलाने का फैसला किया। बिहार में यह सघन अभियान 16 से 22 अगस्त तक चलाया गया। जिसके दौरान पूरे राज्य में नुक्कड़ सभाएं तथा छोटी-बड़ी सभाएं की गयी।

- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, बिहार राज्य परिषद
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CPI ON AYODHYA JUDGEMENT

The Central Secretariat of the Communist Party of India (CPI) has issued the following statement to the press:


The Central Secretariat of the Communist Party of India congratulates the common people of the country for their show of exemplary maturity and sense of responsibility in the wake of the pronouncement of the verdict by the Lucknow Bench of the Allahabad High Court in the six-decade-old title deed case of the disputed land in Ayodhya. The peace and calm maintained by the people must be preserved and should not be allowed to disturb communal harmony either in the name of celebrating the victory or for launching protest agitation. We must remain vigilant about this.

The Allahabad High Court judgement based more on faith and religious belief than the basic tenets of history, archeology, legal logic and historical facts of other streams of scientific knowledge, can spark a debate on the jurisdiction of the Courts.

The Central Secretariat of the CPI firmly believes that there are enough legal avenues for the people who feel aggrieved. The road to Supreme Court is open. In this case also, the redressal of grievance or affirmation of validity of judicial pronouncement should strictly remain within the confines of judicial procedure.
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गुरुवार, 30 सितंबर 2010

आदिवासी स्वशासन के लिये समग्र एजेण्डा - शांति अभी, न्याय अभी, अनुपालन अभी

“आदिवासियों का संकट और समाधान” विषय पर अखिल भारतीय आदिवासी महासभा द्वारा आयोजित विचार गोष्ठी में प्रस्तुत आधार पत्र:-



छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों में विकास की समस्याओं पर आयोजित इस सेमिनार में हम छत्तीसगढ़ की विशिष्ट समस्याओं पर गहराई से चर्चा करना चाहेंगे। किन्तु छत्तीसगढ़ के साथ अन्य आदिवासी बहुलता वाले राज्यों में समस्याएं एक जैसी हैं। इसलिए हमें समग्र आदिवासी आन्दोलन निर्मित करने के लिए विचार करना होगा।



देश का आदिवासी समाज अपने लंबे इतिहास में सबसे गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है। कई प्रजातियों के मामले में यह ‘इतिहास का अंत’ साबित हो सकता है। यही नहीं, अगर यही हालत बनी रही तो विश्वव्यापी साम्राज्यवादी- पूंजीवादी हल्ले के सामने ‘ग्रामीण भारत’ भी बहुत दिनों तक नहीं टिक सकेगा। ग्रामीण भारत पर इस बढ़ते दबाव के चलते आदिवासी संकट और भी तेज होना समय की बात है। इसलिये हमें ‘अभी नहीं, तो कभी नहीं’ के इस निर्णायक दौर में आदिवासी इलाकों पर अपना ध्यान ‘आज और अभी’ केन्द्रित करना होगा।



आजादी के बाद की विडंबना -



आदिवासियों और राज्य के बीच वर्चस्व का संघर्ष अंग्रेजी राज के समय से ही शुरू हो गया था। ताना भगत उसके सबसे उत्कृष्ट उदाहरण हैं। आजादी के बाद उसमें कुछ ठहराव आया। परन्तु 1960 के दशक बाद वह फिर तीखा होने लगा। वह धीरे-धीरे अब इतना व्यापक हो गया है कि आज शासक वर्ग उसे ‘आन्तरिक सुरक्षा का सबसे बड़ा खतरा’ मान रहा है। सबसे बड़ी विडम्बना तो यह है कि उसी शासक वर्ग ने उनके संरक्षण के लिये औपचारिक रूप से संविधानिक प्रावधानों, कानूनों और नीतियों का अंबार जैसा लगा लिया है। इस नीतिगत ‘व्यवहार संपदा’ को दुनिया में कहीं भी ‘कानून के राज्य’ के प्रति आस्थावान देश के रूप में गर्व के साथ प्रदर्शित किया जा सकता है। परन्तु वहीं दूसरी ओर हमारा महान भारत देश ‘वायदा खिलाफी’ के ओलम्पिक आयोजन में ‘स्वर्ण पदक’ भी आनन-फानन जीत सकता है।



आज तक की कार्रवाई -



हमारे देश के अनेक संवेदनशील और संकल्पित लोगों ने आदिवासी इलाकों में अनगिनत मुद्दों में हस्तक्षेप किया है। उनसे लोगों को राहत भी मिली है। यही नहीं, कई बड़ी उपलब्धियां भी है जिन पर हमें गर्व है। तथापि अभी तक ये लाभ एकाकी और क्षणिक साबित हुये हैं। जागतिक साम्राज्यवादी-पूंजीवादी ताकतों के बढ़ते दबाव के चलते आदिवासी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था लगातार कमजोर होती जा रही है। इसी के चलते कई भोले-भाले आदिवासी समाज विनाश के कगार पर पहुंचते जा रहे हैं। इस विनाश लीला से तब तक बचना असंभव है जब तक ‘अभी नहीं तो कभी नहीं’ वाली स्थिति के गहराई से अहसास के साथ ‘समग्र आदिवासी आन्दोलन’ छेड़ा जाय। इस आन्दोलन में वायदा खिलाफी सहित व्यवस्था के सभी जन-विरोधी पहलुओं को शामिल किया जाय। उसी हालत में, और सिर्फ उसी हालत में राज्य को अपनी गलतियों और कु-कृत्यों को मंजूर करने के लिये मजबूर किया जा सकता है। उसी के साथ-साथ समय-समय पर किये गये ‘वायदों’ को नये संकल्प के साथ पूरा करना सुनिश्चित किया जा सकता है।



मुझे इस बात का पूरा अहसास है कि साम्राज्यवादी पूंजीवादी दुर्दान्त हमले के आज के दौर में मेरे इस प्रस्ताव को आदर्शवादी कह कर खारिज किया जा सकता है। फिर भी आज की चुनौती का मुकाबला करने के लिये किसी भी संघर्ष का पहला कदम यही हो सकता है कि उसके भुक्त-भोगी उस चुनौती के सही रूप को पहिचाने और उसका एक जुट होकर मुकाबला करने का अवसर पैदा करें। मुझे विश्वास है कि वायदा खिलाफी, संकटकालीन एजेंडा और ‘समग्र आदिवासी एजेण्डा’ की यह प्रस्तुति इसके लिये उपयुक्त अवसर प्रस्तुत करेगी।



आइये अब हम वायदा खिलाफी का विन्दुसार जायजा ले कर संकटकालीन एजेंडे पर नजर डालते हुए समग्र आदिवासी एजेण्डे पर विचार विमर्ष के लिए आगे बढे़।



1. वायदा खिलाफी: आदिवासियों केा दिये गये वायदे बार-बार टूटते रहे!



- सन् 1950 में भारतीय संविधान लागू हो गया परंतु आदिवासी परंपरा के लिये कानून में स्थान नहीं बनाया गया जिसमें ‘आदिवासी समाज’ कानून की नजर में ‘अपराधी’ को गया।



- ‘अनुसूचित क्षेत्र’ के रक्षा-कवच को पहले तो सन् 1960 में ‘जरूरी नहीं’ मान लिया गया। उसके बाद 1975 में उसकी पुनर्प्रतिष्ठा हुई। परन्तु 1980 के बाद उसे फिर भुला दिया गया।



- अनुच्छेद 275 (1) के परंतुक में अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन को सुयोग्य बनाने के लिये जो संविधान संकल्प है, उन पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।



- ‘सजा के बतौर नियुक्ति’ के चलन के बने रहने से आदिवासी इलाकों में शंाति और सुशासन के लिये राज्य का संकल्प एक फरेब है।



- आदिम जन जातियों की हालत बद से बदतर होती गई है।



- साहूकारों और जमीन हड़पने वालों के नियंत्रण के लिये कानून और नीतियों के सही अमल के बिना आदिवासी इलाकों में उनका भारी दबदबा है।



- बंधुआ मजदूरी के खिलाफ 1975 में प्रभावी पहल के बाद आज हालत और भी गंभीर हैं।



- शराब के व्यवसाय से राज्य द्वारा आदिवासियों का सीधा शोषण 1974 की आबकारी नीति के चलते समाप्त हुआ। वही शोषण आज और भी बुरी तरह हावी है।



- लघुवनोपज पर, जो आदिवासियों की आजीविका का विशेष आधार है, समाज की मालिकी की तीन बार (1976, 1996 और 2006) घोषणाओं के बावजूद, व्यवहार में आज भी उनकी मालिकी सपने जैसी है।



- पेसा की संवैधानिक व्यवस्था, जिसमें स्व-शासन, स्वयं-सशक्तीकरण और संसाधनों पर स्वाधिकार की मूलभूत व्यवस्थाऐं हैं, आज तक सही तौर से लागू नहीं हुई हैं।



- उन कंपनियों ने, जो आदिवासियों के नैसर्गिक संसाधनों को हड़पने के लिये शिकारी की तरह आमादा हैं, कई इलाकों को तहस-नहस कर दिया है और उसे जारी रखने के लिये भी सरकारी ‘इकरारनामों’ की बाढ़ जैसी आ गई है। इसमें भूरिया समिति व उच्चतम न्यायालय के समता के मामले में निर्णय को नजर-अन्दाज कर दिया गया है।



वन अधिकार अधिनियम, 2006 में जमीन, लघुवनोपज और ग्राम सभा

संबंधी व्यापक अधिकारों की व्यवस्था होने के बावजूद उनका अमल न के बराबर है।



- हर बच्चे के अपने मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा के मौलिक अधिकार की अनदेखी होने से कई आदिवासी समाजों का भविष्य अंधकारमय हो गया है।



- दण्डकारण्य विकास प्राधिकरण (1952) का मूल उद्देश्य आदिवासी- केन्द्रित क्षेत्रीय विकास था परंतु उसे शुरू आती दौर में ही भुला दिया गया।



2. संकटकालीन एजेंडा



- पेसा कानून के तहत जल-जंगल- जमीन और खनिज पर राज्य की प्रभुसत्ता की बजाय समाज की प्रभुसत्ता को स्थापित करना।



- सभी इकरारनामें (एम.ओ.यू.) तत्काल स्थगित हों। संसाधनों पर समाज के नैसर्गिक अधिकार में आस्था के साथ उन सबका पुनरावलोकन किया जाय।



- ग्राम सभाओं से परामर्श के उन सभी मामलों के निर्णयों का पुनरावलोकन कर खारिज किया जाय जहां हेरा-फेरी, जोर-जबरदस्ती या और किसी तरह का कोई गोलमाल हुआ हो।



- सजा के बतौर नियुक्तियों की समाप्ति, एक-रेखीय प्रशासनिक व्यवस्था और ‘पेसा’ की भावना के अनुरूप स्वशासी व्यवस्था सुनिश्चित हो।



- विकास खंडों, तालुक/तहसीलों या जिलों के सीमान्तों पर स्थित सभी आदिवासी इलाकों का प्रशासनिक पुनर्गठन हो।



- आज की घोर अराजकता के सही समाधान के लिये मैदानी हल्कों से लेकर सर्वोच्च स्तर तक स्पष्ट और खुले संवदेनशील व्यवस्था-तंत्र की स्थापना हो।



3. समग्र आदिवासी एजेण्डा: शांति अभी, न्याय अभी, अनुपालन अभी अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा के रूप में समाज द्वारा स्वयं सशक्तीकरण, संसाधनों पर समाज की प्रभुसत्ता और सामाजिक तथा व्यक्तिगत अधिकारों का प्रभावी संरक्षण ‘पेसा’ कानून के सार-तत्व हैं।



- ‘पेसा’ कानून के सभी प्रावधानों को आज और अभी स्वीकार किया जाय और भक्षक तत्वों को दूर किया जाय।



- आदिवासी उपयोजना में शामिल शेष आदिवासी इलाकों को तत्काल अनुसूचित किया जाये और उनके अलावा सभी राज्यों के अन्य आदिवासी इलाकों को एक साल में चिन्हित और अनुसूचित किया जाये।



- अपने कर्तव्यों के लिये ‘सक्षम’ ग्राम सभा सलाह तो किसी से भी कर सकती है परन्तु वह सरकारी नियमों के अधीन काम करने के लिये बाध्य नहीं है।



- अनुसूचित क्षेत्रों में समाज की प्रभुसत्ता के उसूल का पालन हो, जिसमें

संसाधनों के उपयोग पर आधारित उपक्रमों में समाज की मालिकी भी शामिल है।



- आबकारी नीति का पालन हो, संदिग्ध दायित्व खारिज हो, साहूकारी पर अंकुश लगे, बंधुआ व्यवस्था का सख्ती से निर्मूलन हो, अच्छा काम सम्मानित हो।



- पांचवी अनुसूची के तहत् ‘शांति और सुरक्षा’ के लिये संकल्पित पूरा प्रशासन ग्रामसभा के प्रति उत्तरदायी हो।



- सजा के बतौर नियुक्तियों की कुप्रथा समाप्त कर संघ सरकार अनुच्छेद 275 (1) के परंतुक के तहत अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन की वार्षिक समीक्षा कर उसे बेहतर बनाये।

- मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा की व्यवस्था तुरंत की जाय।



आर्थिक व्यवस्था पर प्रभावी अधिकार -



- ‘पेसा’ अधिनियम के तहत् सरकारी कार्यक्रमों सहित सभी आर्थिक

गतिविधियों की नियमित सामाजिक संपरीक्षा सुनिश्चित हो।



- लघु वनोपज पर मालिकी की व्यवस्था तुरंत प्रभावी हो, उसे इकट्ठा करनेवाले को पूरा-पूरा भाव मूल्य मिले, उसकी ढुलाई और अन्य व्यवसायिक खर्च सरकार वहन करे।



- हड़पी गई जमीनें वापिस हों, वनों पर ग्राम सभा के कानूनी अधिकारों पर अमल हो और वनीकरण में आदिवासियों को हिस्सेदार बनाया जाये।



- विलुप्त हो रही जनजातियों पर विशेष व्यक्तिगत ध्यान हो।



- विस्थापन नहीं होगा वरन् परियोजना की प्रकृति के अनुसार जैसे एकरेखीय, औद्योगिक या सिंचाई-बिजली, उनसे जुड़ी नई अर्थ-व्यवस्था में सम्मानपूर्ण स्थान सुनिश्चित हो।



एक श्रमिक के काम की हकदारी इस तरह तय की जाये जिससे ‘श्रमिक और उसके परिवार’ के लिये अच्छी जिन्दगी संभव हो।



आज सवाल है कि सरकार किसके साथ खड़ी है?



उधर आदिवासी के अधिकारों के मामले में माओवादी धीरे-धीरे उसके आगे निकल गये हैं। स्वाधिकार संपन्नता के बिना आदिवासी इलाकों के विकास की बात सिर्फ नौटंकी है।



पहली जीत



मेरा विश्वास है कि हमारी पहली जीत 24 जुलाई 2010 को सम्पन्न राष्ट्रीय विकास परिषद में हो गई है। उसके समापन सत्र में प्रधानमंत्री महोदय ने यह स्वीकार किया कि आदिवासी क्षेत्रों में ‘शांति और सुशासन’ की कुंजी ‘पेसा अधिनियम’ है। परंतु यहां पर मैं आगाह करना चाहूंगा कि अगर हम इस बावत सचेत नहीं रहे तो उनकी यह भंगिमा भी नौटंकी के प्रहसन जैसी हो जायेगी और ‘टूटे वायदों’ की आकाश गंगा में एक नई तारिका जैसी बन कर रह जायेगी।



आवाहन



आज आपकी इस सभा के माध्यम से मैं पूरे देश में सभी संवदेनशील मित्रों का आवाहन करना चाहूंगा कि आज तक के हर तरह के भेद भावों को भुला कर सच्चे अर्थाें में आदिवासी स्वशासन के इस अभियान में शामिल हों। यहां पर मैं पूरे विश्वास के साथ एक बात जोड़ना चाहूंगा कि आदिवासी इलाकों के संदर्भ में लोकतांत्रिक परंपरा की जो बुनियादी मान्यताएं ‘पेसा’ की संविधानिक व्यवस्था में उभरकर सामने आई है, वे सार्वभौम हैं। इसलिए आंदोलन देशव्यापी होना चाहिये। परंतु व्यवहारिक रणनीति के रूप में हमें इस संघर्ष की शुरूआत आदिवासी इलाकों में ही करना होगी जहां स्वशासन की परंपराए अभी भी जीवन्त और प्रभावी हैं।



आदिवासी इलाकों में आम लोग यदि एक बार साम्राज्यवादी ताकतों के सामने अपने ‘नैसर्गिक अधिकारों’ की पुनरस्थापना करने में सफल हो जाते हैं, तो वह विचार जंगल की आग की तरह तेजी से फैलेगा, उसे दुनिया की कोई ताकत रोक नहीं सकेगी।



पहला राष्ट्रीय सम्मेलन



‘आदिवासी एजेंडा’ के बाबत हम साथियों की प्रतिक्रिया को ध्यान में रखकर प्रारंभिक बैठकंे सितम्बर महीने में कुछ क्षेत्रीय केन्द्रों पर करना चाहेंगे। मैं आपको यहां पर इस बात का ध्यान दिला दूं कि हमारे देश में कुल 9 राज्य ऐसे हैं जहां अनुसूचित क्षेत्र हैं। 6 राज्य और 2 संघीय क्षेत्र (यानि यूनियन टेरेटरी) ऐसे हैं जिनमें अनुसूचित जन जातियां तो हैं परन्तु अनुसूचित क्षेत्र नहीं हैं। उत्तर पूर्व के आदिवासी बहुल राज्यों के अलावा अन्य राज्यों में आदिवासी बहुल इलाकों के लिये छठी अनुसूची की विशेष व्यवस्था है। उत्तर- पूर्व को छोड़ शेष राज्यों में प्रस्तावित क्षेत्रीय बैठकों के बाद हम अक्टूबर 2010 के अंत तक ‘आदिवासी एजेण्डा’ को पूरा करने के लिये कार्य-नीति तय करने के लिये एक राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन करेंगे।



मुझे पूरा विश्वास है कि आज के सम्मेलन के सभी साथी हमारे इस आग्रह को स्वीकार करेंगे। मुुझे आपने अपनी बात रखने का अवसर दिया उसके लिये आप सबका और खास तौर से कामरेड चित्तरंजन बक्शी जी और मनीष कुन्जाम का आभारी हूं।



- ब्रह्मदेव शर्मा
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शनिवार, 25 सितंबर 2010

आर्थिक सवालों को पृष्ठभूमि में न जाने दें!

इधर कुछ दिनों से साम्प्रदायिक ताकतें अयोध्या के जिन्न को फिर झाड़-पोछ रहीं हैं। एक बार फिर मन्दिर निर्माण के लिए लोगों को भड़काने का विश्व हिन्दू परिषद ने कार्यक्रम बनाया है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की हाल ही में जोधपुर में सम्पन्न बैठक में इस कार्यक्रम को अंगीकृत किया गया है।

सोलह अगस्त से विहिप अयोध्या से हनुमान शक्ति जागरण अभियान छेड़ चुकी है। इस अभियान को देश के दो लाख गांवों में ले जाने की उसकी महत्वाकांक्षी योजना है। रथ यात्रा और राम शिला पूजन के बाद की यह उसकी सबसे व्यापक योजना है।

ये सब उस समय किया जा रहा है जब अयोध्या के विवादित स्थल के मालिकाना हक के मुकदमें का फैसला आने के करीब है। इस संभावित फैसले को लेकर उत्तर प्रदेश के साथ-साथ पूरे देश में तनाव बढ़ाने की कोशिशें चल रहीं हैं। विहिप और आरएसएस का इरादा यह है कि फैसला कुछ भी हो, उन्हें मन्दिर निर्माण के लिए हिन्दूओं को भड़काना और समाज में सद्भाव के वातावरण को दूषित करना है - यदि वे हारते हैं तो आस्था के नाम पर और जीतते हैं तो सर्वोच्च न्यायालय में अपील के खिलाफ एक उभार पैदा करके। उनके राजनीतिक हित बिना भड़कावे के पूरे नहीं हो सकते हैं।

आज पूरे देश की जनता महंगाई से त्राहि-त्राहि कर रही है। बाजार में खाद्यान्नों की कीमतें आसमान पर पहुंच जाने के बावजूद किसानों को उनकी फसलों का लाभप्रद मूल्य नहीं मिल पा रहा है। सरकार को महंगाई थामने की कोई चिन्ता नहीं है जिसके कारण महंगाई कुलांचे भर रही है। संगठित क्षेत्र में रोजगार कम होते जाने के कारण बेरोजगारी बढ़ रही है। अनौपचारिक क्षेत्रों में रोजगार चले जाने के कारण कहने को तो पूर्णकालिक रोजगार मिलता है परन्तु मिलने वाला वेतन या मजदूरी अर्द्धरोजगार से भी बदतर होती है। अपनी मेहनत से होने वाली कमाई पर निर्भर आम जन-मानस परेशान हाल है।

देश के जन-मानस में महंगाई और आर्थिक नीतियों के खिलाफ आक्रोश बढ़ रहा है। आन्दोलन खड़े हो रहे हैं। किसान जगह-जगह पर सड़कों पर आ रहे हैं। आर्थिक नीतियों और महंगाई के खिलाफ खड़े हो रहे आन्दोलन वर्गीय चेतना से लैस नहीं हैं परन्तु उनका आधार निश्चित रूप से वर्गीय ही है। कोई सरमायेदार अथवा भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा व्यक्ति इन आन्दोलनों में शिरकत नहीं कर रहा है।

केन्द्र एवं कई राज्यों में सत्तासीन कांग्रेस और उसके सहयोगी दल इन आन्दोलनों को भ्र्रमित कर उन्हें समाप्त करना और कुंठित कर देना चाहते हैं। भाजपा भी अच्छी तरह जानती है कि महंगाई एवं आर्थिक नीतियों के खिलाफ पनप रहा जनाक्रोश उसके हित में नहीं है क्योंकि वह भी उन्हीं आर्थिक नीतियों की पैरोकार है जिन्हें कांग्रेस चला रही है। उसका जनाधार सिकुड़ रहा है। अपने जनाधार को व्यापक करने के लिए आक्रोशित जनता का ध्यान आर्थिक मुद्दों से वह भी हटाना चाहती है।

साम्प्रदायिक या किसी अन्य संकीर्ण उभार की क्रिया और प्रतिक्रिया अंतोगत्वा वर्गीय आधार पर संघर्षों के लिए तैयार हो रही जनता की एकता को ही छिन्न-भिन्न करेंगे और उससे फायदा पूंजीवाद और पूंजीवाद के पैरोकार राजनीतिक दलों को ही होगा। इन तथ्यों के मद्देनजर हमें पूरी चौकसी रखनी है और साजिशों को पराजित कर महंगाई और अन्य आर्थिक मुद्दों पर संघर्षों को और तेज करना और उन्हें धार देना है।

- प्रदीप तिवारी
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मंगलवार, 31 अगस्त 2010

Women activist storm into the parliament demanding 33% reservation organised by NFIW and ANHAD

Women activist storm into the parliament demanding 33% reservation organised by NFIW and ANHAD over 30 women activist wearing specially designed aprons with image of parliament 33% women reservation written on the one side and on the other side slogan “Pass the Reservation Bill Now”. They storm the parliament house to protest against the UPA governments lack of political bill to pass the Women Reservation Bill in Lok Sabha. The protesting women surrounding by the police about 15 minutes of the protest arrested and taking to Parliament Street Police Station. Those who have been arrested include Annie Raja (General Secretary, NFIW), Nisha Sidhu, Shyamkali, Aruna Sinha, Deepti Bharati, Rekhana Begum from NFIW and Shabnam Hashmi , Seema Duhan, Priynanka Jaiswal, Sonam Gupta, Lakshmi, Manish Trivedi from ANHAD.



The arrested women are in Parliament Street Police Station Presently.
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सोमवार, 30 अगस्त 2010

किसानों की उपजाऊ जमीनों के अधिग्रहण के खिलाफ भाकपा द्वारा प्रदेशव्यापी आन्दोलन

लखनऊ 30 अगस्त। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के आह्वान पर आज पूरे प्रदेश के सभी जिला मुख्यालयों पर भाकपा कार्यकर्ताओं ने किसानों की उपजाऊ जमीनों के अधिग्रहण के खिलाफ जुलूस निकाले और धरना दिये।



गाजियाबाद, मेरठ एवं नोएडा में किसान मंच और महाराणा संग्राम सिंह किसान कल्याण समिति के कार्यकर्ताओं ने भी भाकपा कार्यकर्ताओं के साथ जुलूस और धरना में अपनी भारी सक्रिय भागीदारी दर्ज की।



प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति एवं राज्यपाल को सम्बोधित ज्ञापन जिलाधिकारियों को दिये जिसमें उन्होंने तथाकथित विकास के नाम पर चल रही उपजाऊ जमीनों के अधिग्रहण की तमाम कार्यवाहियों को तत्काल निरस्त करने, विकास योजनाओं को गैर उपजाऊ जमीनों पर चलाने, भूमि अधिग्रहण कानून 1894 में उचित बदलाव करने जिससे सरकार केवल अस्पताल, स्कूल जैसे जनोपयोगी उद्देश्य के लिए ही भूमि अधिग्रहण कर सके, दादरी आन्दोलन से लेकर आज तक भूमि अधिग्रहण के खिलाफ चलाये गये आन्दोलनों में दर्ज मुकदमों को वापस लेने, गिरफ्तार किसानों को रिहा करने, आजादी के बाद से आज तक अधिगृहीत जिन जमीनों का मुआवजा आज तक नहीं दिया गया है, उसका मुआवजा वर्तमान बाजार-भाव पर करने तथा विवादों को निपटाने के लिए राज्य स्तरीय मुआवजा प्राधिकरण बनाने, बन्द हो चुके उद्योगों की जमीनों को किसानों को वापस करने की मांग की।



लखनऊ में भाकपा कार्यालय से जिला सचिव मो. खालिक के नेतृत्व में जुलूस निकाला जो शहीद स्मारक पहुंच कर धरने में परिवर्तित हो गया। प्रदर्शनकारियों को सम्बोधित करते हुए वक्ताओं ने सरकार पर एक निजी व्यापारिक घराने को फायदा पहुंचाने के लिए औने-पौने दामों पर अंधाधुंध भूमि अधिग्रहण का आरोप लगाया। वक्ताओं ने कहा कि कांग्रेस एवं भाजपा उन आर्थिक नीतियों के जनक और पालनहार हैं जिसके अंतर्गत सरमायेदारों के लिए भूमि अधिग्रहण का खेल चलना शुरू हुआ है तो सपा ने अपने शासनकाल में अंबानी जैसों को फायदा पहुंचाने के लिए दादरी से भूमि अधिग्रहण का खेल शुरू किया था। अब किसानों को भ्रमित करने तथा किसानों के चल रहे आन्दोलन को पटरी से उतारने के लिए यह राजनैतिक दल किसानों के हितैषी बनने का नाटक खेल रहे हैं। वक्ताओं ने कहा कि दादरी हो अथवा किसानों का कोई अन्य भूमि आन्दोलन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी हमेशा किसानों के साथ रही है और हमेशा रहेगी। वक्ताओं ने कहा कि सरकारों को खाद्य सुरक्षा, रोजगार सुरक्षा आदि को ध्यान में रखना चाहिए।



भाकपा राज्य कार्यालय द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में इस आन्दोलन को किसानों की विजय तक अनवरत पूरे प्रदेश में चलाने का संकल्प व्यक्त किया गया है।
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रविवार, 22 अगस्त 2010

17वां विश्व युवा एवं छात्र उत्सव

प्रत्येक विश्व युवा एवं छात्र उत्सव के पहले अंतर्राष्ट्रीय तैयारी बैठक (आईपीएम) का आयोजन एक परंपरा है। 17वें विश्व युवा एवं छात्र उत्सव के लिए आईपीएम का आयोजन काराकस, वेनेजुएला में हुआ जिसने 16वें विश्व युवा एवं छात्र उत्सव की मेजबानी की थी। आपीएम में अगले मेजबान को परंपरागत रूप से झंडा सौंपने का समारोह भी हुआ।



आईपीएम में लंबी बहस के बाद सर्वसम्मति से यह फैसला किया गया कि अगले विश्व युवा एवं छात्र उत्सव का आयोजन दक्षिण अफ्रीका में 13 से 31 दिसंबर 2010 को किया जायेगा। उसका नारा होाग, “साम्राज्यवाद को परास्त करें, विश्व शांति, एकजुटता और सामाजिक बदलाव के लिए”। दक्षिण अफ्रीका मंे उत्सव का आयोजन करने के फैसले से उस देश के प्रगतिशील एवं साम्राज्यवाद-विरोधी युवाओं के प्रति अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता की अभिव्यक्ति होती है जो अतीत में और आज भी विश्व को यह दिखा रहा है कि एक ऐसे देश का निर्माण हो रहा है जो न्याय, एकजुटता एवं मैत्री में विश्वास करता है तथा जिसकी अर्थव्यवस्था जनहित में है और बिना किसी रंग भेद, जातिभेद और धार्मिक भेदभाव के लोगों के बीच गहरा मैत्रीपूण

संबंध है।



पहली आईपीएम में विश्व के सभी युवाओं एवं सदस्य संगठनों को 17वें विश्व युवा एवं छात्र उत्सव के कार्यक्रम के मुख्य दिशानिर्देशों के बारे में एक अपील भेजी गयी जिस पर सभी स्तरों पर विचार किया जाना है। विश्व युवा एवं छात्र उत्सव की विरासत के अंग के रूप मंे यह फैसला स्पष्ट था कि वेनेजुएला उत्सव के अत्यंत सकारात्मक अनुभव को देखते हुए 17वें विश्व युवा एवं छात्र उत्सव के लिए साम्राज्यवाद-विरोधी कार्यक्रम तैयार करना है।



उत्सव के कार्यक्रम में विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों जैसे सम्मेलन, सेमिनार, वर्कशाप, एकजुटता प्रदर्शन, विचारों के आपसी आदान-प्रदान की बैठकंे, मैत्री उत्सव, खेलकूद, सांस्कृतिक गतिविधियां तथा अन्य गतिविधियों को यथा, साम्राज्यवाद विरोधी अदालतें, विभिन्न मुद्दों पर मीटिंग, पश्चिमी सहारा की आजादी के लिए, लैटिन अमरीका के सैन्यीकरण के विरूद्ध, हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराने के 65 साल, फासिस्ट विरोधी विजय के 65 साल, फिलिस्तान की स्वतंत्रता तथा रंगभेद के खिलाफ लोगों एवं युवाओं के बीच एकजुटता आदि को शामिल किया जायेगा।



अफ्रीका, एशिया, अमरीका, मध्यपूर्व और यूरोप के प्रत्येक क्षेत्र के लिए एक पूरे दिन का कार्यक्रम होगा। कार्यक्रम में मुख्य विषयों पर जैसे, शांति, एकजुटता एवं सार्वभौतिकता, रोजगार एवं शिक्षा के अधिकार, विज्ञान एवं संस्कृति, आर्थिक आतंकवाद, ब्लौकेड एवं प्रतिबंध, लोकतांत्रिक अधिकार, बेरोजगार एवं भूख, विसैन्यीकरण एवं शांति समझौते, जल एवं उसके स्रोत, एड्स के खिलाफ संघर्ष, आजादी एवं मानवीधिकार, वैश्वीकरण एवं निजीकरण, साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा मीडिया पर नियंत्रण, स्वास्थ्य का अधिकार, विभिन्न क्षेत्रों में गरीबी से जुड़ी समस्याएं एवं समाधान, भूमि एवं खाद्य सुरक्षा का अधिकार, स्कूल की किताबों में कम्युनिस्ट विरोधी, लोकतंत्र विरोधी एवं विज्ञान विरोधी बातें, भूमंडलीय तापमान वृद्धि और पूंजीवादी व्यवस्था का अंतर्राष्ट्रीय संकट आदि मुद्दों पर फोकस किया जायेगा।



एआईवाईएफ की पहल पर भोपाल गैस त्रासदी पर विचार किया गया तथा उत्सव के कार्यक्रम में इसे शामिल किया गया और इस बारे में भोपाल में एक वर्कशाप का आयोजन किया जायेगा।



दूसरी आईपीएम प्योंगयांग, उत्तरी कोरिया में 24 जून से 1 जुलाई 2010 को हुई जिसमें कार्यक्रम के मुख्य दिशा निर्देशों तथा 17वें विश्व युवा एवं छात्र उत्सव के लिए अंतर्राष्ट्रीय आयोजन समिति के चुनाव के कार्यक्रम में मंजूरी दी गयी। इस बैठक में एआईएफवाई (भारत), एएनसीवाईएल (दक्षिण अफ्रीका), एएनएफएसएसयू (नेपाल), सीओएसएएस (दक्षिण अफ्रीका), डीवाईएफआई (भारत), ईडीओएन (साइप्रस), जीयूएएस (वियतनाम), जेसीपी (पुर्तगाल), जेडीवाईयू (जोर्डन), केआईएसएसवाईएल (डीपीआर कोरिया), केएनई (ग्रीस), केवाईएलजे (जापान), एनयूएसएस (सीरिया), एनवाईजी (दक्षिण अफ्रीका), एसडीएजे (जर्मनी), एसवाईयू (श्रीलंका), यूजेसी (क्यूबा), यूजेसीई (स्पेन), यूजेडीएएन (सेनेगल), उज्सारिओ (पश्चिमी सहारा), यूएलडीवाई (लेबनान) और वाईएफ (नेपाल) के 37 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। मेजबान संगठन किमइलसुंग सोशलिस्ट यूथ लीग ऑफ डीपीआर कोरिया ने हिस्सा लिया। विभिन्न देशों से आये प्रतिनिधिमंडलों का प्योंगयांग एयरपोर्ट पर गर्मजोशी के साथ स्वागत किया गया।



उत्तरी कोरिया में प्रवास के दौरान प्रतिनिधिमंडलों ने अनेक ऐतिहासिक महत्व की जगहों का दौरा किया। इनमें फारदलैंड लिब्रेशन वार म्युजियम, सिंचोन म्युजियम, कोरियाई क्रांतिकारी म्युजियम, राष्ट्रपति किमइलसुंग पैतृक घर, किमइलसुग यूनिवर्सिटी एंड एजुकेशन हाल, टावर ऑफ जुचे आईडिया, इंटरनेशल फ्रेंडशिप पैलेस फॉर स्कूल चिल्ड्रेन, कोरिया से संबंधित प्रदर्शनी शामिल है। अंत में प्रतिनिधिमंडल ने अमरीकी साम्राज्यवाद के खिलाफ कोरिया के युद्ध में मारे गये शहीदों को श्रद्धांजलि दी।



आईपीएम की ओर से कोरयिाई यूथ और कोरिया प्रायद्वीप के एकीकरण के लिए अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता मार्च का आयोजन किया गया जिसमें हजारों युवाओं और छात्रों ने हिस्सा लिया तथा अमरीका साम्राज्यवाद के खिलाफ नारे लगाये। कोरिया जनता के समर्थन में पीपुल्स पैलेस ऑफ कल्चर में एक अंतर्राष्ट्रीय मीटिंग का आयोजन किया गया जिसमें करीब 3000 युवाओं और छात्रों ने हिस्सा लिया। कोरियाई युद्ध की 60वीं वर्षगांठ के अवसर पर एक मार्च का आयोजन किया गया जिसमें लगभग दो लाख सैनिक एवं सरकारी अधिकारियों तथा युवाओं और छात्रों ने हिस्सा लिया। इस अवसर पर युवाओं और छात्रों, कोरियाई जनसेना के प्रतिनिधियों ने तथा मजदूर वर्ग एवं कृषि मजदूरों की ओर से कोरिया वर्कर्स पार्टी को केन्द्रीय समिति के सचिव ने भाषण दिया।



कोरिया की सुप्रीम असेम्बली के अध्यक्ष किमयो नॉक और किमइलसुंग सोशलिस्ट यूथ लीग के प्रथम सचिव लीयोंग चोल ने मीटिंग में भाग लेने वालों के सम्मान में एक स्वागत समारोह का आयोजन किया जिसमें उन्होंने घोषणा की कि युवाओं और छात्रों को वैचारिक एवं शारीरिक रूप से प्रशिक्षित किया जायेगा ताकि क्रांति का हिरावल दस्ता तैयार किया जा सके और साथ ही समाजवादी निर्माण का काम जारी रखा जा सके।



दक्षिण अफ्रीका की एनपीसी में शामिल विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने दक्षिण अफ्रीका में चल रही तैयारी के संबंध में एक विस्तृत रिपोर्ट पेश की जिसमें कहा गया कि 17वें विश्व युवा एवं छात्र उत्सव की ज्यादातर गतिविधियों का आयोजन जोंहान्सबर्ग में किया जायेगा जब कि उद्घाटन एवं समापन समारोह का आयोजन ओर्लान्डो स्टेडियम में किया जायेगा। उत्सव के दौरान प्रतिनिधिगण छात्रों के घरों में ठहरेंगे तथा उनके ट्रांसपोर्ट का इंतजाम जोंहान्सबर्ग की नगर पालिका द्वारा किया जायेगा। प्रथम आईपीएम के फैसले के अनुसार वर्ल्ड फेडरेशन डेमोक्रेटिक यूथ (डब्लूएफडीवाई) के सहयोग से सांस्कृति एवं स्पोटर््स गतिविधियों का भी आयोजन किया जायेगा। अधिकांश संगठनों ने तैयारी की वर्तमान स्थिति पर रिपोर्ट पेश की। हरेक देश में विभिन्न तरह की गतिविधियों को विकसित किया जा रहा है। बैठक में इस बात का भी विश्लेषण किया गया कि विश्व युवा एवं छात्र उत्सव की तैयारी के लिए समय की कमी को देखते हुए मोबिलाइजेशन और प्रोमोशन के प्रयासों को तेज कैसे किया जाये। प्रत्येक संगठन को हरेक देश में प्रचार के लिए सामग्रियां एवं वेबसाइट्स का इंतजाम खुद करना है। डब्लूएफडीवाई एक कामन लाइन पर भी काम कर रहा है तथा इसका एक अंतर्राष्ट्रीय वेबसाइट शीघ्र शुरू किया जायेगा।



प्रथम आईपीएम में मंजूर की गयी गतिविधियों और मुख्य दिशा निर्देशों के कार्यान्वयन को स्वीकृति दी गयी। डब्लूएफडीआई और दक्षिण अफ्रीका की एनपीसी ने प्रत्येक गतिविधियों के लिए ठोस नारे तैयार करने की जिम्मेदारी ली जिसे तीसरी आईपीएम के ड्राफ्ट में शामिल किया जायेगा।



आईपीएम में उत्सव के हर दिन विभिन्न क्षेत्रों की विशेषताओं के अनुसार उनके योगदान पर भी विचार किया गया तथा प्रत्येक मुद्दे पर प्रतिनिधियों ने अपने विचार प्रकट किये। तीसरी आईपीएम में प्रत्येक क्षेत्र द्वारा इस बारे में अंतिम फैसला किया जायेगा।



17वें विश्व युवा एवं छात्र उत्सव के लिए अंतर्राष्ट्रीय आयोजन समिति के चुनाव के तरीके, लक्ष्य, कर्तव्य एवं नियमों को स्वीकार किया गया। अंतर्राष्ट्रीय आयोजन समिति (आईओसी) का चुनाव तीसरी आईपीएम में किया जायेगा जो उत्सव के दो महीने पहले से काम करना शुरू कर देगी। आईओसी उत्सव की सारी तैयारियां दक्षिण अफ्रीका में करेगी और आईपीएम के फैसलों को लागू करेगी। आईओसी में डब्लूएफडीवाई, दक्षिण अफ्रीका की एनपीसी, वेनेजुएला की एनपीसी, ओसीएलएई, जेयूएएस, एएसए और एएसयू के प्रतिनिधि होंगे (जो छात्र संगठनों का प्रतिनिधित्व करेंगे)। यह भी फैसला किया गया कि तीसरी आईपीएम का आयोजन साइप्रस में सितम्बर, 2010 में किया जायेगा।



- के. मुरूगन
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शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

एकतरफा तलाक और महिलाओं को घर से बेदखल किए जाने के खिलाफ महिला संगठनों की एकजुटता व प्रदर्शन

सरफराजगंज निवासी तीन महिलाओं को सुल्तानुल मदारिस नाम के एक मदरसे ने 23 जून को एक तरफा तलाक करा कर घर से बेदखल करवा दिया गया था जिसके विरोध में महिलाओं ने कड़े कदम भी उठाए हैं। क्योंकि उन महिलाओं का तलाक नहीं हुआ है और सुप्रीम कोर्ट इस प्रकार के फैसले के सख्त खिलाफ है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से इस बात की पुष्टि भी होती है।



दिनांक 10.08.2010 को सुश्री हिना, सुश्री निशात व सुश्री अर्शी के समर्थन में भारतीय महिला फेडरेशन सहित तमाम महिला संगठनों ने पीड़ित महिलाओं को उनके ससुराली घर जहां से उन्हें बेदखल करने का प्रयास उनके पति व सुसर श्री आबदी ने मिल कर किया, के खिलाफ उनके घर के सामने प्रदर्शन किया और उन्हें घर में रहने के लिए दाखिल कराया।



इस मौके पर बड़ी संख्या में महिला संगठनों व जन संगठनों के प्रतिनिधि शामिल थे। रूपरेखा वर्मा, आशा मिश्रा, बबिता सिंह, नाइश हसन, नाज रजा, शहनाज खान, रहमतुन निसा, मुन्नी बेगम के नेत्रित्व में कार्यक्रम का आयोजन हुआ।
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गुरुवार, 19 अगस्त 2010

25 जून 2010 को दरभंगा जिले के तरौनी गांव में आयोजित - बिहार राज्य प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा ‘यात्री’ जनकवि बाबा नागार्जुन जन्मशताब्दी समारोह




मई महीने की तीखी चिलचिलाती धूप और गर्मी से तप्त वायुमंडल, प्रचंड पछवा हवा के झोंकों के बीच बिहार राज्य प्रगतिशील लेखक संध के महासचिव राजेन्द्र राजन पूर्व विधायक ने जनकवि ‘यात्री’ बाबा नागार्जुन के पैतृक गांव की यात्रा की अभिलाषा व्यक्त करते हुए संदेशा भेजा। बेगूसराय जिले की ‘लाल

धरती’ के गोदरगांवा का यह विप्लवी लाल तरौनी की यात्रा करेंगे- सोचकर मन प्रफुल्लित हो उठा। बात समझ में आ गई। 3 मई को हम सब मिथिलांचल के सकरी रेलवे जंक्शन से पांच किलोमीटर दक्षिण में अवस्थित ‘यात्री’ जनकवि बाबा नागार्जुन की जन्मस्थली तरौनी गांव पहुंचे। बाबा नागार्जुन पुस्तकालय में बैठक हुई, उनके घर आंगन को देखा।



बाबा की अन्येष्टि-क्रिया के समय डा. खगेन्द्र ठाकुर और विमल कान्त चौधरी के साथ शव यात्रा में लाल झंडा प्रदान करने गया था। हजारों लोगों की भीड़ जुटी थी। 5 नवंबर 1998 को राजकीय सम्मान के साथ बाबा की अन्त्येष्टि हुई थी। बड़े-बड़े आश्वासनों की होड़ लगी थी। मंत्रीगण आये थे। किन्तु आज भी वह तरौनी गांव उसी तरह उपेक्षित था।



श्री राजन जी ने सूचित किया कि प्रगतिशील लेखक संघ का निर्णय है ‘यात्री’ जनकवि बाबा नागार्जुन की जन्मशती का समारोह (जन्म 25 जून 1911) 25 जून 2010 को राष्ट्रीय समारोह के रूप में उनके पैतृक गांव तरौनी से ही शुभारम्भ किया जायेगा जो साल भर पूरे राष्ट्र में मनाया जायेगा। उन्होंने मुझे संयोजक बनाने का प्रस्ताव रखा; प्रगतिशील लेखक संध की यूनिट दरभंगा-मधुबनी में कार्यरत नहीं थी। मुझे पार्टी के जिला सचिव के रूप में कार्य व्यस्तता को देखते हुए थोड़ी हिचक हुई किन्तु मैंने देखा कि बाबा नागार्जुन की कविता का “गंवई पगडंडी की चन्दनवर्गी धूल”, “मौलसरी के ताजे टटके फूल”, ‘गंध-रूप-रस-शब्द-स्पर्श’ को राष्ट्रीय स्तर पर फैलाना चाहते हैं तो मैं तुरन्त तैयार हो गया।



15 मई को तरौनी गांव में ही दरभंगा-मधुबनी जिलों के प्रगतिशील साहित्यकारों-नागरिकों तथा प्रबुद्धजनों की बैठक हुई और एक स्वागत समिति का गठन हुआ। राजेन्द्र राजन ने स्वयं स्वागताध्यक्ष का पद संभाला और मुझे स्वागत महासचिव बनाकर डा. हेमचंद झा को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया, मधुबनी के अरविंद प्रसाद कोषाध्यक्ष तथा बाबा के सबसे छोटे पुत्र श्यामाकांत मिश्रा तथा डा. महादेव झा सहित दर्जनों गणमान्य बुद्धिजीवियों को स्वागत समिति का पदाधिकारी एवं सदस्य निर्वाचित किया गया। यह निर्णय हुआ कि 25 जून 2010 को तरौनी में भव्य समारोह के पूर्व संध्या अर्थात् 24 जून को दरभंगा में प्रगतिशील लेखक संघ का स्थापना सम्मेलन किया जाये। यह भी निर्णय लिया गया कि प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय ख्याति के साहित्यकारों को आमंत्रित किया जाये तथा उनसे आलेख प्राप्त कर एक स्मारिका का लोकार्पण इस समारोह के अवसर पर किया जाये।



आयोजन की तैयारी के क्रम में दरभंगा, मधुबनी तथा तरौनी में स्वागत समिति की कई बैठकें हुई। मिथिलांचल में शादी, विवाह उपनयन, मुण्डन आदि संस्कारों की धूम मची थी। किन्तु इसी बीच ‘यात्री’ जय कवि बाबा नागार्जुन जन्म शताब्दी समारोह, 25 जून 2010, तरौनी की भी धूम मची रही। लोगों में अजीब उत्साह था। वर्षा की संभावना थी। मानसून की चेतावनी थी। सभी बाधाओं के बावजूद 24 जून को ही प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव डा. कमला प्रसाद भोपाल से, प्रसिद्ध आलोचक डा. विश्वनाथ त्रिपाठी दिल्ली से, डा. खगेन्द्र ठाकुर रांची से, डा. चौथी राम यादव वाराणसी से, प्रो. अरूण कमल पटना से, प्रो. वेद प्रकाश अलीगढ़ से, गीतेश शर्मा कलकत्ता से, दरभंगा पहुंच गये। प्रलेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. नामवर सिंह अस्वस्थ हो गये और अंतिम समय में उनकी यात्रा रद्द की गयी। उपरोक्त सभी साहित्यकारों, विद्धानों ने 24 जून को ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम सम्मेलन में भाग लिया तथा प्रगतिशील लेखक संघ की दरभंगा जिला इकाई का गठन किया गया। उसके लिए अध्यक्ष डा. कृष्ण कुमार झा, सचिव डा. धर्मेन्द्र कुमार तथा सहायक सचिव मंजर सुलेमान को निर्वाचित कर एक 15 सदस्यीय कार्यकारिणी समिति बनायी गयी।



25 जून 2010 की सुबह मिथिलांचल की हृदयस्थली दरभंगा जिले का एक सुदूर देहात का प्रसिद्ध गांव तरौनी साहित्यिक तीर्थ स्थल के रूप में तीन दिन पहले से सज- धन कर तैयार था। स्वागत समिति द्वारा निर्मित तोरणद्वारों की जगमगाहट, बीच-बीच में आषाढ़ मास की बूंदों की झड़ियां, बाबा नागार्जुन की कविता- “बहुत दिनों के बाद, अबकी मैंने जी भर भोगे, गंध-रूप-रस- ’शब्द-स्पर्श सब साथ-साथ इस भूपर” को यादकर इलाके के लोग झूम रहे थे। सुबह से ही समारोह के आयोजन स्थल पर लोगों का आना शुरू हो गया था। बेगूसराय, मुंगेर, गया, समस्तीपुर, दरभंगा, मधुबनी के साहित्यकारों का आना रात से ही शुरू था।



करीब 3 बजे मंच सज-धजकर तैयार होते ही बिहार राज्य प्रगतिशील लेख संघ के अध्यक्ष डा. ब्रज कुमार पाण्डेय जी की अध्यक्षता में ‘यात्री’ जनकवि बाबा नागार्जुन जन्म शताब्दी समारोह का शुभारंभ हुआ। सर्व प्रथम मिथिला की परम्परा के मुताबिक मैथिली साहित्य परिषद और यात्री विचार मंच तरौनी की ओर से स्वागत समिति के श्यामाकान्त मिश्र, डा. महादेव, लेखनाथ मिश्र, शैलेन्द्र मोहन ठाकुर, कोशलेन्द्र झा ने बारी-बारी से आगत अतिथियों को फूल माला, पाग तथा चादर से सम्मानित किया। स्वागताध्यक्ष राजेन्द्र राजन तथा स्वागत महासचिव रामकुमार झा ने क्रमशः हिन्दी तथा मैथिली भाषाओं में स्वागत भाषण करते हुए आयोजन के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला।



समारोह का उद्घाटन करते हुए प्रसिद्ध आलोचक डा. विश्वनाथ त्रिपाठी ने मैथिली हिन्दी साहित्य में आधुनिक काल में प्रगतिवादी धारा के सर्वश्रेष्ठ साहित्यकार के रूप में बाबा नागार्जुन की रचनाओं की चर्चा की तथा उद्घोषित किया कि निकट भविष्य में तरौनी गांव विश्व का सारस्वत तीर्थस्थल बनेगा। उन्होंने महाकवि विद्यापति, संत तुलसी दास तथा बाबा नागार्जुन को अपने-अपने कालखण्ड का सर्वश्रेष्ठ विद्वान साहित्यकार बताया तथा उनकी ‘प्रतिबद्धता’ की चर्चा की। समारोह को प्रलेस के राष्ट्रीय महासचिव डा. कमला प्रसाद, डा. खगेन्द्र ठाकुर, डा. चौथीराम यादव, प्रो. अरुण कमल, प्रो. वेदप्रकाश, गीतेश शर्मा सहित कई विद्वानों ने संबोधित किया। इस अवसर पर एक भव्य कवि सम्मेलन का भी आयोजन किया गया जिसके संचालक डा. फूलचंद्र झा ‘प्रवीण’ थे। मैथिली हिन्दी के दर्जनों कवियों ने अपने-अपने काव्य पाठ से उपस्थित जन समुदाय की जनचेतना को जागृत किया। मधुबनी इप्टा की ओर से इन्द्रभूषण ‘रमण’ के संयोजकत्व में भव्य सांस्कृतिक आयोजन ने देर रात तक के लोगों को भाव-विभोर कर रखा। परिवर्तन कामी प्रगतिशील काव्य संगीत, अभिनय की धारा प्रवाहित होती रही और हजारों श्रोता दर्शक देर रात तक उसमें मग्न होते रहे।



समारोह में दरभंगा-मधुबनी जिलों के कई गणमान्य जनप्रतिनिधियों, साहित्यकारों, स्वतंत्रता सेनानियों को भी सम्मानित किया गया। सम्मानित होने वालों में प्रमुख रूप से मैथिली फिल्मी निर्माता एवं निदेशक बालकृष्ण झा, स्वतंत्रता सेनानी कमलनाथ झा, स्वतंत्रता सेनानी पूर्व राज्यमंत्री तेजनारायण झा (अनुपस्थित), पूर्व विधायक महेन्द्रनारायण झा आजाद, विद्यापति सेवा संस्थान के महासचिव डा. विद्यानाथ चौधरी, प्रो. शोभाकान्त मिश्र, विमलकान्त चौधरी, डा. हेमचन्द्र झा, राजेन्द्र राजन, अरविन्द प्रसाद, डा. महादेव झा, योगेन्द्र यादव एवं रामकुमार झा शामिल थे। उपरोक्त सभी लोगों को मंचाशीन कर पाग, चादर तथा फूल माला से सम्मानित किया गया।



समारोह के आरम्भ में ही सभी आगत अतिथियों द्वारा नागार्जुन पुस्तकालय परिसर में स्वर्गीय भोगेन्द्र झा द्वारा स्थापित बाबा नागार्जुन की प्रतिमा पर माल्यार्पण तथा पुष्पांजलि अर्पित किया गया। समारोह में एक प्रस्ताव पारित कर तरौनी गांव में प्रस्तावित प्रखंड मुख्यालय बनवाने, सड़कों का निर्माण, नागार्जुन शोध संस्थान तथा राष्ट्रीय धरोहर स्थापित करने की मांग की गई। इस अवसर पर एक भव्य स्मारिका ‘चरैवेति का लोकार्पण डा. विश्वनाथ त्रिपाठी के द्वारा किया गया जिसमें नागार्जुन से संबंधित मैथिली-हिन्दी के आलेखों के साथ-साथ कविताओं तथा अनुपलब्ध चित्रों का भी समावेश किया गया है।



- राम कुमार झा
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बुधवार, 18 अगस्त 2010

हादसा मंत्री

रेल मंत्री ममता बनर्जी हादसा मंत्री बन गयी हैं। 28 मई 2010 को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले में ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस की दुर्घटना में मारे गये 177 लोगों और सैकड़ों जख्मी लोगों के परिवारों की आहें-चीखें अभी थमी भी नहीं थी कि 19 जुलाई को सुबह दो बजे के लगभग पश्चिम बंगाल के ही बीरभूम जिले के साईंथिया स्टेशन पर प्लेटफार्म पर खड़ी भागलपुर-रांची एक्सप्रेस को न्यू कूच बिहार सियालदह उत्तरबंग एक्सप्रेस ने पूरी स्पीड में पीछे से आकर टक्कर मार दी जिसमें 67 यात्री मर चके हैं और अनेक गंभीर हालत में अस्पतालों में पड़े कराह रहे हैं। जब से ममता बनर्जी रेल मंत्री बनी हैं, लगता है दुर्घटना डायन रेलवे के पीछे ही पड़ गयी है; एक के बाद दूसरी ताबड़तोड़ बड़ी दुर्घटनाएं हो चुकी हंेै और इस अरसे में होने वाली कुल दुर्घटनाओं में 428 लोग मारे जा चुके हैं।



ममता बनर्जी रेल मंत्रालय में कम ही आती हैं और वे गैरहाजिर रेलमंत्री के रूप में जानी जाने लगी हैं। जब वे रेल मंत्रालय में कभी हाजिर ही नहीं रहती तो जाहिर है अपने मंत्रालय पर ज्यादा ध्यान भी नहीं दे पाती। उसी का नतीजा हैं ये हादसे। अंग्रेजी की कहावत है - व्हैन कैट इज अवे, दि माईस विल प्ले (जब बिल्ली नहीं पास, चूहे तो मस्ती करेंगे ही)। कहीं रेलवे में यही तो नहीं हो रहा?



- आर.एस. यादव
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मंगलवार, 17 अगस्त 2010

का. लुई कोरवालान को श्रद्धांजलि

नयी दिल्लीः भारतीय कम्यनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद ने 24 जुलाई, 2010 को एक बयान जारी करके चिली की कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व महासचिव कामरेड लुई कोरवालान के निधन पर गहरा शोक प्रकट किया।
राष्ट्रीय परिषद ने कहा कि का. कोरवालान ने पिनोशेट की तानाशाही का दृढ़तापूर्वक विरोध किया और इसके लिए उन्हें राजनीतिक उत्पीड़न और निर्वासन का सामना करना पड़ा लेकिन उन्होंने कभी भी फासिस्ट शासन के आगे घुटने नहीं टेके।
यूनाइटेड पोपुलर फ्रंट के निर्माण में उनके योगदान को चिली की जनता हमेशा याद करेगी। इसी फ्रंट के नेतृत्व में पहली सोशलिस्ट सरकार बनी जिसके प्रधान राष्ट्रपति सल्वाडोर अलैंडे थे।
का. कोरवालान चिली की कम्युनिस्ट पार्टी के निर्माण में जो साम्राज्यवाद के खिलाफ, शांति, लोकतंत्र और समाजवाद के लिए संघर्ष में सबसे आगे हैं, संघर्ष एवं बलिदान की एक विरासत छोड़ कर गये हैं।
का. लुई कोरवालान एक अनुकरणीय कम्युनिस्ट थे जो हमेशा हम लोगों के बीच रहेंगे।भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद चिली की कम्युनिस्ट पार्टी की केन्द्रीय समिति एवं का. कोरवालान के शोक संतप्त परिवार को अपनी गहरी संवेदना भेजती है।
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सोमवार, 16 अगस्त 2010

निर्माण: संगठित उद्योग, किंतु असंगठित मजदूर?

निर्माण उद्योग सभी आर्थिक गतिविधियों को आधार प्रदान करनेवाले देश का उच्च कोटि का संगठित आधुनिक उद्योग है। इसमें अन्य उद्योगों की तुलना में सर्वाधिक पूंजी निवेश और श्रमशक्ति कार्यरत है, किंतु इस उद्योग का विचित्र विरोधाभास इस तथ्य में निहित है कि यह सौ फीसद औपचारिक उद्योग का दर्जा हासिल करने के बावजूद, इसमें काम करने वाले प्रायः अनौपचारिक श्रमिक हैं। यह अजीबोगरीब स्थिति है कि उद्योग संगठित है, जबकि इसमें कार्यरत मजदूर असंगठित। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन; आईएलओ के भारत स्थित कार्यालय के अध्ययन के मुताबिक भारत के निर्माण उद्योग में 82.58 फीसद श्रमिक कैजुअल और टेम्परेरी हैं, जिनके रोजगार बिचौलिये ठेकेदारों की मनमर्जी पर निर्भर है। इन आकस्मिक कहे जानेवाले मजदूरों का रोजगार टिकाऊ नहीं है, इन्हें न्यूनतम पारिश्रमिक नहीं मिलता, इन्हें सामाजिक सुरक्षा का लाभ नहीं है, आवास और स्वास्थ्य चिकित्सा नहीं, कार्यस्थल पर सुरक्षा नहीं, यहां तक कि इनके नियमित वेतन भुगतान की गारंटी भी नहीं है। क्या यह स्वस्थ भारतीय निर्माण उद्योग का प्रमाण है?
भारत के तेज आर्थिक विकास ने अधिसंरचना की जरूरतों, जैसे सड़क, रेल, बंदरगाह, हवाईअड्डा, बांध, नहर, बिजली, सिंचाई, आवास, शहरीकरण, भवन, कल-कारखाने, विशेष आर्थिक क्षेत्र आदि को बढ़ावा दिया है। इन सब जरूरतों को पूरा करने के लिये निर्माण उद्योग का विस्तार अनिवार्य हो गया है। निर्माण उद्योग के विस्तार के साथ अन्य धंधों का विस्तार भी जुड़ा है, जैसे सीमेंट, अलकतरा, लोहा इस्पात, ईंटभट्टा, पत्थरतोड़ आदि। इसके साथ ही इनमें सुरक्षा, कृषि, यातायात, ट्रांसपोर्ट सहित अनेक औद्योगिक गतिविधियां शामिल हैं। इसीलिए 11वीं पंचवर्षीय योजना में निर्माण उद्योग में निवेश का आबंटन 20,00,000 करोड़ रुपये किया गया है।
योजना आयोग के आकलन के मुताबिक निर्माण उद्योग में 36,000 करोड़ रुपये का वार्षिक खर्च होगा। योजना आयोग ने यह भी बताया है कि निवेश की तुलना में इंजीनियरों, तकनीशियनों एवं कुशल श्रमिकों की संख्या में गिरावट हो रही है। मतलब जिस रफ्तार से निर्माण उद्योग में पूंजीनिवेश बढ़ रहा है, उस रफ्तार में कुशल श्रमिकों की संख्या बढ़ने के बजाय घट रही है। इसका मतलब यह निकलता है कि भारतीय निर्माण उद्योग में अकुशल मजदूरों की संख्या बढ़ रही है। योजना आयोग को अंदेशा है कि यह रूझान चिंताजनक है और इसकी परिणति घटिया निर्माण कार्यों में होगी, जिससे भारत की औद्योगिक अधिसंरचना कमजोर पड़ेगी, जो स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि निर्माण उद्योग की घटिया गुणवत्ता से देश को उच्च पथ, बांध, पुल, मेट्रो, रेलमार्गों, बंदरगाह, हवाईअड्डा, विद्युत गृह, सामान्य आवास आदि कमजोर होंेगे।
क्या हम कमजोर और घटिया संरचना स्वीकार करेंगे? इस प्रश्न का उत्तर एक अन्य प्रश्न से किया जाना उचित है। क्या यह कहना सही है कि हमारे पास पर्याप्त कुशल मजदूर नहीं हैं?
नहीं, यह कथन सही नहीं है। हमारे देश में पर्याप्त कुशल श्रमिक मौजूद हैं। रिकार्ड पर कुशल श्रमिकों की बड़ी तादाद को अकुशल की श्रेणी में डाला जाता है, यह बताकर कि उन्हें औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं है। उन्हें अनौपचारिक कहा जाता है। दरअसल रोजगार नियोजन का अनौपचारिक नियोजकों के हाथों में क्रूर शोषण का वह गंदा हथियार है, जिसकी तरकीब से मजदूरों से कुशल श्रम लिया जाता है, किंतु उन्हें अकुशल श्रम का पारिश्रमिक भुगतान किया जाता है। शोषण का यह गंदा तरीका तुरंत खत्म किया जाना चाहिये।
यह सर्वविदित है कि भारत में कुशल श्रमिकों के भारी तादाद को औपचारिक शिक्षा नहीं है। उन्हें औपचारिक डिप्लोमा/डिग्री प्राप्त नहीं है। इसके बावजूद वे कुशल मजदूर हैं और कुशल कोटि के कामों को सफलतापूर्वक अंजाम देने में सक्षम हैं। वे कार्यस्थल पर वर्षों व्यावहारिक काम करते रहने के दौरान अनुभवी प्रशिक्षित मजदूर हैं। वे लंबे समय तक कार्यस्थल पर काम करते हुए प्रशिक्षित हुए हैं। इनके द्वारा संपन्न किया गया काम की गुणवत्त को किसी प्रकार भी डिग्रीधारी लोगों के कामों को गुणवत्ता से कम नहीं आंकी जाती है। वे घटिया काम नहीं करते, प्रत्युत्त वे अच्छे कामों को अंजाम देते हैं। जरूरत इस बात की है कि हम इस हकीकत को मंजूर करें और ऐसे कुशल एवं सक्षम मजदूरों के कौशल को कौशल का प्रमाणपत्र जारी करके मान्यता प्रदान करें।
आईएलओ की गणना के मुताबिक भारत में युवा कर्मियों की विशाल संख्या है, लेकिन उनमें (20 से 24 वर्ष के आयु समूह) सिर्फ पांच प्रतिशत मजदूरों ने औपचारिक तरीके से प्रशिक्षण प्राप्त किया है, जबकि औद्योगिक विकसित देशाों में यह संख्या 60 से 96 प्रतिशत तक है। भारत में कुल श्रमशक्ति का महज 2.3 प्रतिश्ता ने औपचारिक शिक्षा ग्रहण की है। ऊपर के आंकड़े यह साबित करने के लिये दर्शाये गये हैं कि किस प्रकार भारतीय निर्माण उद्योग में बढ़ते पूंजीनिवेश के मुकाबले औपचारिक रूप से प्रशिक्षित कुशल मजदूरों की संख्या में गिरावट हो रही है।
आईएलओ द्वारा प्रदर्शित इस चिंता की हम सराहना करते हैं, जिसमें अनौपचारिक श्रमिकों की बदतर कार्यदशा का वर्णन किया गया है, किंतु उनका यह निष्कर्ष सही नहीं है कि भारतीय निर्माण मजदूर प्रशिक्षित नहीं हैं और वे गुणवत्तापूर्ण कार्य को अंजाम देने में सक्षम नहीं हैं। आईएलओ के ऐसे निष्कर्ष का कोई औचित्य नहीं है। भारतीय निमाण मजदूरों की स्थिति का यह सही मूल्यांकन नहीं है। भारत के निर्माण मजदूर व्यावहारिक तौर पर प्रशिक्षित है। उन्हें भारतीय परिस्थिति में पारंपरिक तरीके से प्रशिक्षित किया गया है। अब यह सरकार का काम है कि श्रमिकों में विद्यमान कौशल की पहचान कर उनका समुचित प्रमाणीकरण किया जाय। इस सम्बंध में हमारा निम्नांकित सुझाव है:
क) अधिकार प्राप्त प्राधिकरण द्वारा उन सभी मजदूरों को समुचित श्रेणियों में योग्यता और कौशल का प्रमाण पत्र जारी करना, जिन्होंने पारंपरिक तरीके से व्यावहारिक कार्य करते हुए प्रशिक्षण प्राप्त किया है।
ख) मजदूरों के कौशल समृद्धि के लिये कार्यस्थल पर काम करते समय प्रशिक्षण के स्थायी विशेष उपाय करना।
ग) श्रम समूह में निरंतर प्रशिक्षित श्रमिकों के आगमन सुनिश्चित करने को निमित्त प्रत्येक हाई स्कूल परिसर में नियोजकों के खर्चें से विभिन्न उद्योगों/धंधों का प्रशिक्षण सत्र चलाना। ऐसे प्रशिक्षण सत्र का खर्च नियोजकों द्वारा उठाना जाना उचित है, क्योंकि श्रमिकों का अंततः एकमात्र लाभार्थी नियोजक ही होता है।
निर्विवाद रूप से भारतीय निर्माण उद्योग में प्रशिक्षित श्रमिकों की भारी संख्या हैं, जिनका प्रशिक्षण व्यावहारिक काम करने की प्रक्रिया में हुआ है। जरूरत है उनकों मान्यता प्रदान करने की, जिसके वे पूर्ण हकदार है।
कुशल मजदूरों की निरंतर प्राप्ति के लिये हाई स्कूलों में निरंतर प्रशिक्षित सत्र आयोजित किया जाना उपयोगी होगा। बहुत से छात्र अनेक कारणों से कालेज में आगे की पढ़ाई के लिए दाखिला नहीं करा पाते हैं। उनको उचित प्रशिक्षित देकर काम का अवसर प्रदान किया जा सकता है। इस प्रकार का प्रशिक्षण शिक्षा की उपयोगिता बढ़ाने में योगदान करेगा और शिक्षा को रोजगारमुखी बनायेगा।
निर्माण उद्योग विभिन्न श्रेणियों के श्रमिकों की संख्या
1995 2005 10 वर्षों में वृद्धि का:
संख्या प्रतिशत संख्या प्रतिशत
इंजीनियर्स 687,000 4.70 822,000 2.65 19.66
टैक्नीशियन और फोरमेन 359,000 2.46 573,000 1.85 59.61
सेक्रेटारियल 646,000 4.42 738,000 2.38 14.24
स्किल्ड वर्कर्स 2,241,000 15.34 3,267,000 10.54 45.78
अनस्किल्ड वर्कर्स 10,670,000 73.08 25,600,000 82.58 139.92
कुल 14,603,000100 31,000,000 100 112.28
- सत्य नारायण ठाकुर
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रविवार, 15 अगस्त 2010

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का कार्यक्रम संबंधी दस्तावेज

आजादी के पहले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने भारतीय क्रांति को दो चरणों वाली प्रक्रिया बताया जिसमें वर्तमान साम्राज्यवाद-विरोधी सामंत-विरोधी चरण (एक राष्ट्रीय जनवादी चरण) के बाद पूंजीवाद-विरोधी (समाजवादी) चरण आयेगा। पार्टी ने मोटे तौर से मजदूर वर्ग, मध्यम वर्ग एवं राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग के राष्ट्रीय जनवादी मोर्चे की रणनीति का अनुसरण किया।
1947 में राष्ट्रीय आजादी की प्राप्ति ने भारत और विश्व के लिए एक नये युग, एक ऐतिहासिक घटना का सूत्रपात किया। यह भारत में एक अभूतपूर्व जन-उभार तथा विश्व में शक्तियों के नये सह-संबंधों का परिणाम था।

क्रांति का नया चरण
यह राष्ट्रीय क्रांति की विजय का सूचक था, हालांकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने जैसा सोचा था या अनुमान लगाया था उससे भिन्न घटनाक्रम विकसित हुआ। देश का विभाजन हुआ जिसके गंभीर परिणाम सामने आये। फिर भी उसने भारतीय जनता के सामने राजनीतिक आजादी एवं राष्ट्रीय संप्रभुता को मजबूत करने और आर्थिक आजादी के लिए काम करने के वास्ते व्यापक अवसरों का मार्ग प्रशस्त कर दिया। हमारी जनता से क्रांति को एक नये चरण, एक आत्म-निर्भर, लोकतांत्रिक एवं गतिशील अर्थव्यवस्था का निर्माण करने तथा उसका नवीकरण करने, हमारी जनता के बेहतर जीवनस्तर को सुनिश्चित करने और लोकतंत्र के क्षेत्र का विस्तार करने एवं उसे समृद्ध करने, लोकतांत्रिक संस्थाओं का निर्माण करने तथा व्यक्तिगत अधिकारों और स्वतंत्रताओं एवं तेजी से सांस्कृतिक प्रगति को सुनिश्चित करने के साम्राज्यवाद-विरोधी और सामंत-विरोधी कर्तव्यों को पूरा करने के चरण तक ले जाने की अपील की गयी।
प्रगति और नया चरण
इस अवधि में महान उपलब्धियां हासिल की गयीं; एक सार्वभौम राष्ट्रीय राज्य की प्राप्ति, बालिग मताधिकार एवं बहुदलीय प्रणाली के आधार पर चुनावों के साथ सरकार के संसदीय रूप तथा धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र पर आधारित एक संविधान का अपनाया जाना, विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका का अलगाव, एक संघीय किस्म की सरकार जिसमें केन्द्र तथा राज्यों को अधिकार आवंटित किये जायेंगे। सभी वर्गीय सीमाओं के साथ ये बड़े कदम हैं। राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष के दौरान अनेक बुनियादी पहलुओं पर एक आम सहमति कायम हुई।
एक ऐतिहासिक उपलब्धि रही है सामंती रजवाड़े राज्यों की समाप्ति, उनके भूतपूर्व प्रदेशों का पड़ोसी क्षेत्रों में विलय और भाषाई आधार पर और इस बहु-भाषी, बहु-राष्ट्रीय देश में जनता की आकांक्षाओं एवं लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुरूप भारत का पुनर्गठन। यह वास्तव में नीचे से और ऊपर से क्रांति थी जिसमें टालमटोल एवं जनता को खुलेआम तथा बार-बार दिये गये वचनों से शासक हलकों के हटने के प्रयासों पर काबू पाया गया। शक्तिशाली तथा संयुक्त शासक जनांदोलनों ने जिसमें कम्युनिस्टों ने अन्य ठोस सामंत-विरोधी ताकतों के साथ प्रमुख भूमिका अदा की, इस ऐतिहासिक उपलब्धि को संभव बनाया, और भारत के राष्ट्रीय एकीकरण को आगे बढ़ाया गया और भाषाई और जातीय इकाइयों को राजनीतिक रूप से सुदृढ़ किया गया जिनसे उनकी पहचान को स्वीकार किया गया और इस तरह उनके लिए आर्थिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक विकास की व्यापक संभावनाएं उन्मुक्त की गयीं।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राष्ट्रीय पूंजीवादी नेतृत्व ने जिन्हें 1947 में विभाजित भारत में सत्ता हस्तांतरित की गयी, संविधान तैयार करने और स्वतंत्र भारत के नये राज्य का निर्माण करने की पहल की।
अंतर्विरोधों के जरिये राज्य मशीन एवं तंत्र का निर्माण किया गया और साम्राज्यवाद तथा सामंतवाद के साथ समझौता किया गया। एक विशाल अति-केन्द्रीकृत तथा भारी-भरकम राज्य मशीन निर्मित की गयी है। एक विशाल देश का प्रशासन चलाने की प्रक्रिया में जिसका समाज अत्यंत जटिल है, नौकरशाही अति-केन्द्रीकरण, व्यापक भ्रष्टाचार, राजनीतिज्ञ, पुलिस-अपराधी गिरोह पर आधारित माफिया के बढ़ते ताने-बाने जो दोनों आर्थिक तथा राजनीतिक क्षेत्रों में काम करते हैं, के नकारात्मक पहलू भी विकसित हुए हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था और अंतर्विरोध
आर्थिक क्षेत्र में आर्थिक आजादी की दिशा में काफी प्रगति हुई है। दोनों उद्योग तथा कृषि क्षेत्र में उत्पादक शक्तियों का विकास हुआ है।
उपनिवेशी अवधि के अनेक विदेशी प्रतिष्ठानों के राष्ट्रीयकरण, अत्यंत आवश्यक आधारभूत ढांचे के निर्माण के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के निर्माण और अनेक भारी एवं बुनियादी औद्योगिक परियोजनाओं के निर्माण में सोवियत संघ तथा अन्य समाजवादी देशों से बड़ी सहायता मिली, जिससे इस प्रगति में काफी मदद मिली। मजबूत एवं विविधीकृत सार्वजनिक क्षेत्र ने जिसका बुनियादी उद्योग आधार रहा है, एक आत्म-निर्भर अर्थव्यवस्था की बुनियाद रखी।
लेकिन विकास के पूंजीवादी पथ ने जिसका अनुसरण किया गया है, सामाजिक धु्रवीकरण में योगदान दिया है और असमानता बढ़ायी है। इजारेदार घरानों की परिसंपत्ति कई गुना बढ़ गयी है। उसके साथ ही, छोटे एवं मध्यम उद्योग, खासकर लघु क्षेत्र काफी बढ़े हैं। अन्य दस या बारह प्रतिशत ने काफी समृद्धि हासिल की है जबकि 30 से 40 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं। एकदम अपर्याप्त रोजगार के अवसरों, स्वरोजगार की सीमित संभावना, मूलगामी भूमि सुधार की तोड़फोड़ तथा औद्योगिक प्रतिष्ठानों की बंदी एवं छंटनी की वजह से बेरोजगारी में भारी वृद्धि होती रही है।
औद्योगिक विकास की दर धीमी हो रही है। योजना उलट-पुलट हो गयी है। देश का आंतरिक तथा विदेशी कर्ज काफी अधिक बढ़ा गया है और हम कर्ज जाल के निकट पहुंच गये हैं। हाल का वित्तीय-राजकोषीय संकट जो एकदम प्रतिकूल भुगतान संतुलन की स्थिति में अभिव्यक्त हुआ, रोगसूचक था। बढ़ते बजटीय घाटे तथा आसमान कर ढांचे ने अधिकाधिक विकास के बोझ को आम लोगों पर डाल दिया है। वृद्धि तथा विकास में क्षेत्रीय असंतुलन बढ़ गया है। राज्य के संसाधनों तथा सार्वजिनक क्षेत्र की लूट, विशाल कालाधन एवं विदेशी डिपाजिट, मुनाफाखोरी और तस्करी व्यापक हो गयी है।
नयी आर्थिक नीतियां
1974 के दशक के अन्त एवं 1980 के दशक से आर्थिक उदारीकरण की नीतियों को तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है जिसने अब नयी आर्थिक नीति का रूप ले लिया है जिसे “आर्थिक सुधार” के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। इसे उद्योगपतियों, बड़े भूस्वामियों एवं अभिजन वर्ग तथा दक्षिणपंथ और दक्षिण-केन्द्र की राजनीतिक ताकतों का समर्थन प्राप्त है। उसने निजी क्षेत्र तथा ‘मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था’ के दर्शन और ‘समाजवाद विफल हो गया है’ ऐसा दावा करते हुए सशक्त प्रचार के साथ विचारधात्मक स्तर ग्रहण कर लिया है।
“नयी आर्थिक नीति” की ये निम्नलिखित न्यूनतम विशेषताएं हैं:
- सार्वजनिक क्षेत्र को दरकिनार करना और बदनाम करना तथा निजी क्षेत्र पर अधिकाधिक भरोसा करते हुए निजीकरण की ओर बढ़ना;
- इजारेदारों को पूरी तरह छूट देना और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए द्वार खोल देना, आधुनिकीकरण, टेक्नालॉजी एवं पूंजी हासिल करने तथा निर्यात क्षमता बढ़ाने के नाम पर सहयोग को प्रोत्साहित करना;
- आयात को उदार बनाना और निर्यात की दिशा पर जोर डालना;
- एक ऐसी वित्तीय नीति अपनाना जो बड़े औद्योगिक घरानों एवं इजारेदारों का पक्ष पोषण करती हो जिसमें अनिवासी भारतीय एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियां शामिल हैं (अवमूल्यन, स्वर्णनीति आदि);
- एकीकृत विश्व अर्थव्यवस्था के नाम पर विकसित पश्चिम के साथ अर्थव्यवस्था का एकीकरण करने का प्रयास करना।
विश्व बैंक तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष द्वारा खासकर भारत एवं सामान्य रूप से विकासशील देशों के लिए अपने अनेक नुस्खों के रूप में इन सभी कदमों की वकालत की जा रही है। हाल के नीतिगत कदम जो केन्द्रीय बजट तथा उसके पहले निरूपित किये गये हैं जिनमें दो बार रुपये का अवमूूल्यन भी शामिल है, विश्व बैंक तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की शर्तों को स्वीकार करने की विनाशकारी प्रवृत्ति को ही रेखांकित करता है। यदि इसे सुधारा नहीं गया तो यह निश्चित रूप से आर्थिक संकट को और अधिक गहरा करेगा एवं हमारी आत्म-निर्भरता तथा आर्थिक संप्रभुता पर ही खतरा उत्पन्न करेगा।
वैकल्पिक आर्थिक मार्ग
अर्थव्यवस्था संकट का सामना कर रही है, लेकिन विश्व स्तर पर तथा भारत में एक व्यवस्था के रूप में पूंजीवाद के पास विभिन्न तरीकों से संचित आर्थिक कठिनाइयों का समाधान ढूंढ़ने तथा जोड़-तोड़ करने की जो क्षमता है, लचीलापन है, उसे नजरअंदाज करना गलत होगा।
अर्थव्यस्था के सामने विद्यमान बुनियादी समस्याओं का समाधान केवल समाजवादी रास्ते से ही संभव हो सकता है। लेकिन तात्कालिक संदर्भ में हमें एक वैकल्पिक आर्थिक मार्ग के लिए संघर्ष करना होगा जो वर्तमान आर्थिक कठिनाइयों को दूर करने में सहायता दे सकता है, सर्वतोमुखी विकास एवं वृद्धि को प्रोत्साहन दे सकता है और एक आत्मनिर्भर लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्था का निर्माण कर सकता है। एक ऐसे वैकल्पिक मार्ग का तकाजा है:
- भूमि सुधारों, रोजगारोन्मुख योजनाओं के जरिये आंतरिक बाजार का विस्तार करना और कर्ज तथा विपणन सुविधाओं के जरिये स्वरोजगार को बढ़ाना;
- अधिक तेजी से उत्पादक ताकतों को विकसित करना और उन बेड़ियों को खत्म करना जो उनके विकास को रोकती हैं;
- आयात में कमी करना, खासकर अभिजन वर्ग के उपभोग की वस्तुओं के आयात में कमी करना और विदेशी मुद्रा बचाना;
- सार्वजनिक क्षेत्र का पुनर्गठन करना और उसका लोकतंत्रीकरण करना, उसे लागत के रूप में कारगर बनाना, प्रतियोगितात्मक एवं जवाबदेह बनाना जो सामाजिक रूप से प्रतिबद्ध हो;
- विदेशी कर्ज के बोझ को कम करना और देश के कर्ज को पुनर्व्यवस्थित करना, विदेशी कर्ज को एक विवेकपूर्ण स्तर पर विदेशी निवेश में बदला जा सकता है;
- कर ढांचे का पुनर्गठन ताकि इसका अधिक बोझ बड़े भूस्वामी समेत समृद्ध तबकों पर पड़े, विकास के लिए आंतरिक संसाधनों को लामबंद करना;
- अर्थव्यवस्था का गैर- नौकरशाहीकरण करना, लालफीताशाही तथा केन्द्र में लाइसेंसिंग नियमनों के अभेद्य परतों को खत्म करना;
- औद्योगिक लागत मूल्य ब्यूरो को सक्रिय करना, आवश्यक औद्यागिक वस्तुओं के उत्पादन की लागत की जांच करना तथा लागत आडिट रिपोर्ट को प्रकाशित करना ताकि एकाधिकार कीमत एवं दर-मुनाफे पर अंकुश लगाया जा सके;
- उन्हीं उद्योगों में विदेशी निवेश को इजाजत देना एवं आमंत्रित करना जहां उच्च टेक्नालॉजी आवश्यक है या जो सर्वतोमुखी आर्थिक विकास के हित में विकास के लिए आवश्यक है;
- राज्य का हस्तक्षेप जहां कमजोर तबकों तथा पिछड़े क्षेत्रों के लिए आवश्यक हो; लोकतंत्रीकरण एवं विकेन्द्रीकरण के जरिये नियोजन प्रक्रिया का पुनर्गठन करना;
- कानाधन को निकालना, उन सभी खामियों को दूर करना तथा स्रोतों का उन्मूलन करना जो कालाधन पैदा करते हैं;
- छोटे, लघु एवं कुटीर उद्योगों तथा सही कोआपरेटिवों को आसान कर्ज एवं बाजार की सुविधाएं प्रदान करना तथा भारतीय एवं विदेशी इजारेदारियों के खतरे के खिलाफ गैर-एकाधिकार क्षेत्र के हितों की रक्षा करना।
इन कदमों के साथ ही हमारे देश के बेहतर पड़ोसीपन एवं घनिष्ट राजनीतिक संबंधों के सोपान के रूप में हमारे क्षेत्र के देशों और खासकर सार्क के देशों के साथ घनिष्ट आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक संबंध विकसित करना है। इसका लाभकारी प्रभाव पड़ेगा। इससे भारत को रक्षा-खर्च घटाने में भी मदद मिलेगी। इन देशों की अर्थव्यवस्था पूरक रही है और सदियों से घनिष्ट रूप से जुड़ी रही है। साम्राज्यवाद ने इन देशों के बीच अनबन को बनाये रखा है और इनमें प्रत्येक देश से अपनी शर्तों पर सौदा करने का प्रयास करता रहा है तथा इन देशों की अर्थ व्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचाता रहा है। क्षेत्रीय सहयोग विकसित करके तथा एक नयी अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था और व्यापार एवं निवेश की समान शर्तों के लिए संघर्ष में तेजी लाकर इन नीतियों का प्रतिकार किया जाना है।
परिवर्तित कृषि परिदृश्य
इस अवधि में उपनिवेशी सामंती कृषि ढांचे में काफी परिवर्तन हुआ है। देश के बड़े हिस्से में उत्पादन संबंध बदल गये हैं। इस तरह कृषि तरीके एवं फसल तथा फसल के ढ़ांचे भी। निवेश तथा उत्पादन बाजार, भूमि एवं श्रम बाजार में एक एकल राष्ट्रीय बाजार तेजी से उभर रहा है।
बिचौलिया काश्तकारी का उन्मूलन एक महत्वपूर्ण कदम रहा है। पर काश्तकारी तथा हदबंदी कानून जैसे अन्य भूमि सुधारों की काफी हद तक तोड़फोड़ की गयी है, इसका अपवाद केरल, पश्चिम बंगाल तथा जम्मू कश्मीर जैसे कुछ राज्य हैं जहां मूलगामी भूमि सुधार लागू किये गये हैं और कुछ अन्य क्षेत्र जहां शक्तिशाली जन-संघर्षों के फलस्वरूप भूमि सुधार कानूनों को आंशिक रूप से लागू किया जा सका। कृषि योग्य केवल एक प्रतिशत जमीन हदबंदी कानून के अंतर्गत वितरित की गयी। इसके फलस्वरूप भूमि का संकेन्द्रण अभी भी कायम है, हालांकि उसमें अनेक कारकों से काफी कमी आयी है। मध्य तथा पूर्वी भारत में उत्पादन का अर्ध-सामंती संबंध काफी मजबूत है।
पूंजीवादी सरकार ने अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों के राष्ट्रीयकरण तथा कृषि में उत्पादन ताकतों को बढ़ाने के लिए ऋण एवं अन्य कोआपरेटिव ढांचे को मजबूत करने के साथ ही सिंचाई, कृषि बाजार, संचार आदि जैसे ग्रामीण आधारभूत ढांचे के विकास के लिए अनेक कदम उठाये हैं।
इसके लिए शासक वर्ग ने भूस्वामियों के दबाव तथा अपने वर्गीय हित में मझधार में ही भूमि सुधार का परित्याग कर दिया और कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए बीज-उर्वरक टेक्नालॉजी को लागू किया। इस मामले में साम्राज्यवादी दबाव ने भी कुछ भूमिका अदा की।
इस नयी कृषि राजनीति ने जो समृद्ध किसानों और समुन्नत क्षेत्रों पर आधारित है और जो असमान सामाजिक ढांचे पर थोपी गयी, इन सामाजिक एवं क्षेत्रीय असमानताओं को और बढ़ावा है तथा धनी किसानों एवं पूंजीवादी किसानों और ग्रामीण ढांचे पर उनकी पकड़ तथा उनके राजनीतिक प्रभाव और देश के सत्ता ढांचे में उनकी भागीदारी को काफी मजबूत किया है।
इन घटनाओं की वजह से ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक अंतविर्रोध बढ़ा है जिससे गंभीर सामाजिक संघर्ष हुए हैं। अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों एवं अन्य पिछड़े लोगों पर बढ़ता अत्याचार इसका प्रमाण है।
इन सामाजिक अंतविर्रोधों को कम करने के लिए “लघु किसान विकास एजेंसी“, “सीमांत किसान और खेत मजदूर विकास एजेंसिया”, “गरीबी निरोधी कार्यक्रम“, “रोजगार गारंटी योजना”, “आई आर डी पी कार्यक्रम”, आदि शुरू किये गये जिनका उद्देश्य बढ़ती असमानताओं को कम करना था।
इस तरह वर्तमान ग्रामीण ढांचे में एक ओर वर्तमान असमानता के बढ़ने की अंतविरोधीं प्रक्रिया तथा दूसरी ओर अन्य योजनाओं के जरिये उन्हें संतुलित करने की प्रक्रिया चल रही है।
आज जीवन का एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने है और वह यह कि सामाजिक रूप से वंचित तबके जो सामाजिक तथा आर्थिक समानता एवं आत्म-सम्मान के लिए संघर्ष कर रहे हैं, उच्च जाति के शोषकों एवं अन्य उत्पीड़कों के सामाजिक उत्पीड़न को सहन नहीं करने जा रहे हैं।
छोटे तथा सीमांत फार्मों का तेजी से विकास एक सकारात्मक पहलू रहा है, लेकिन कृषि क्षेत्र में एक चिंताजनक पहलू है स्वरोजगार में कमी, अकिंचनता में वृद्धि, खेत मजदूरों की आबादी में वृद्धि तथा कृषि पर अधिकाधिक लोगों की निर्भरता, जबकि 70 प्रतिशत श्रमबल अभी भी कृषि पर निर्भर है। खेत मजदूर पिछड़े क्षेत्रों से रोजगार की तलाश में विकसित राज्यों की ओर पलायन कर रहे हैं और अधिकाधिक शहरी क्षेत्रों की ओर जा रहे हैं।
हरित क्रांति टेक्नालॉजी के साथ ही खाद्यान्न की पैदावार बढ़ी है। छोटे किसानों की जीवन-क्षमता में सुधार हुआ है। 1950-51 की तुलना में खाद्यान्न की पैदावार में साढ़े तीन गुनी वृद्धि हुई है और इस तरह देश करीब आत्म-निर्भरता की स्थिति में पहुंच गया है हालांकि वर्तमान निम्न उपभोग की स्थिति में। कृषि विकास के फलस्वरूप कुछ हद तक हरित क्रांति क्षेत्रों में विविधीकरण हुआ है। क्षेत्रीय असमानताएं बढ़ी हैं।
अधिकांश क्षेत्रों में आजीविका कृषि की जगह बाजार की उन्मुखता के साथ ही आधुनिक वाणिज्यिक कृषि ने ले ली है और इस तरह लघु किसान अर्थव्यवस्था भी बाजार अर्थव्यवस्था के भंवर में फंस गयी है।
बाजार पर निर्भरता तथा कृषि उत्पादन का पण्यकरण और मुद्रा-वस्तु संबंधों में भी वृद्धि हुई है। ग्रामीण बाजार पर इजारेदारियों तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों की पकड़ और मजबूत हुई है तथा वे किसानों को लूटने के लिए बाजार की जोड़-तोड़ कर रहे हैं। असमान व्यापार के साथ ही विशाल संसाधनों को कृषि से औद्योगिक क्षेत्र में स्थानांतरित किया जा रहा है। विभिन्न सार्वजनिक वस्तु निगम भी बिचौलियों की लूट को खत्म करने में समर्थ नहीं हुए हैं।
आदिवासी लोगों की प्राकृतिक अर्थव्यवस्था भी वस्तु-मुद्रा तथा बाजार संबंधों का ग्रास बन गयी है और उनके बीच धीमा विभेदीकरण उत्पन्न हो गया है एवं उनका शोषण बढ़ गया है।
एक ओर हरित क्रांति टेक्नालॉजी और दूसरी ओर उर्वरक एवं कीटनाशक दवा जैसे कृषि निवेश पर अत्यधिक निर्भरता की वजह से हमारे कृषि क्षेत्र खासकर कृषि व्यवसाय के क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कंपनियों का प्रवेश हुआ है। 1980 के दशक में अपनायी गयी उदारीकरण की नीतियों से इस परिघटना में मदद मिली।
बीज-उर्वरक टेक्नालॉजी की वजह से पानी एवं उर्वरक की मांग काफी बढ़ गयी है। नयी किस्म के बीच जिसके लिए अधिक उर्वरक की जरूरत होती है, नाशक कीटों की चपेट में आ जाते हैं और परिणामतः इसके लिए अधिक कीटनाशक दवाओं की जरूरत होती है जिससे अंततः गंभीर पर्यावरणीय समस्याएं उत्पन्न होती हैं। लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि जल-जमाव, खारेपन की वजह से निम्नकोटि की हो गयी और नाशक कीटों का स्वाभाविक प्रतिरोध करने वाली अनेक किस्म की परंपरागत फसलें विनष्ट हो गयीं।
इस अन्य ऊर्जा एवं अन्य लागत तथा सिंचाई आधारित टेक्नालॉजी को बदलने और नयी टेक्नालॉजी अपनाने की जरूरत है जो कम खर्चीली, अधिक उत्पादक हो तथा जो पर्यावरणीय संतुलन बनाये रखे एवं मिट्टी की बनावट तथा उर्वरकता में सुधार करे और जिसका दोनों सिंचाई तथा गैर-सिंचाई की स्थितियों में इस्तेमाल किया जा सकता है। इस संबंध में तेजी से विकासमान जैव-टेक्नालॉजी ने एक अच्छा अवसर प्रदान किया है।
सरकार को एक जैव-टेक्नालॉजी नीति का अनुसरण करने के लिए विवश किया जाना चाहिए जो हमारे देश के हित में होगा और जो रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशक दवाओं पर कम निर्भरशील हो और जो छोटे किसान की ओर उन्मुख हो। हमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दबाव के सामने नहीं झुकना चाहिए और उनकी जैव-टेक्नालॉजी का आयात नहीं करना चाहिए एवं हमारे कृषि क्षेत्र में उनके मुक्त प्रवेश की इजाजत नहीं देनी चाहिए।
इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए पार्टी कृषि क्षेत्र में निम्ननिखित उद्देश्यों के लिए संघर्ष करेगी:
(1) कृषि क्षेत्र में सभी सामंती एवं अर्ध-सामंती अवशेषों का उन्मूलन और हदबंदी तथा काश्तकारी कानूनों का कड़ाई से कार्यान्वन तथा जमीन के सभी बेनामी कारोबार को रद्द करना और भूमि-उद्धार तथा सभी कृषि योग्य परती, अवक्रमित भूमि का वितरण और वन्य बंजर जमीन में वनरोपण।
(2) कृषि तथा खाद्यान्न पैदावार में तेजी से वृद्धि, अंतर-क्षेत्रीय असमानता में कमी, शुष्क भूमि कृषि के विकास पर जोर तथा मध्य एवं पूर्वी भारत में कृषि के विकास पर जोर। सिंचाई, ग्रामीण विद्युतीकरण, बाजार का विकास, सहायता प्राप्त कर्ज, संचार आदि, बहुद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएं जो बाढ़ नियंत्रण, खारापन, तथा जन-प्लावन के निवारण, सिंचाई एवं विद्युत उत्पादन को सुनिश्तिच करे और बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण के लिए जो पारिस्थितिकीय संतुलन को बनाये रखे, आदि अनेक आधारभूतसुविधाओं के विकास के लिए विशाल सार्वजनिक निवेश।
(3) कृषि उत्पादों के लिए लाभाकारी कीमत, व्यापार के रूप में उद्योग तथा कृषि के बीच समानता बरकरार रखना और इजारेदारियों एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियों की लूट काविरोध। कृषि को लाभकारी और सम्मानजनक पेशा बनाना।
(4) खेत मजदूरों के लिए सामाजिक सुरक्षा, जीवन निर्वाह योग्य वेतन तथा जमीन की व्यवस्था करना और व्यापक केन्द्रीय कानून बनाना। काम के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाना और रोजगार या अर्ध-रोजगार भत्ते या उत्पादक स्व-रोजगार के लिए संसाधनों की अवश्य ही गारंटी करना। सामाजिक एवं जातीय उत्पीड़न के खिलाफ और विकेन्द्रीकृत तथा लोकतांत्रिक सत्ता के ढांचे के लिए संघर्ष।
(5) डेयरी, मुर्गी पालन फार्मिंग, रेशम-उत्पादन, सामाजिक वनरोपण, भेड़ पालन, बागवानी तथा मत्स्य पालन आदि सहायक व्यवसायों को प्रोत्साहित करके कृषि का विविधीकरण किया जाना चाहिए जो फसल के उत्पादन के बाहर रोजगार की व्यवस्था करेगा एवं उससे अतिरिक्त आमदनी होगी।
(6) ग्रामांचल में उद्योगों को बढ़ावा देना, छोटे, लघु तथा कुटीर उद्योगों खासकर कृषि उद्योगों को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि अभी कृषि पर निर्भर करने वाले श्रमबल के एक बड़े हिस्से को गैर-कृषि क्षेत्र में लाया जा सके। इस तरह कृषि क्षेत्र में लगी भीड़ को काफी कम किया जाना चाहिए और ग्रामीण जनता की आमदनी के स्तर को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
(7) कृषि क्षेत्र को बहुराष्ट्रीय कंपनियों को खुले प्रवेश तथा मुक्त बाजार की ताकतों एवं प्रतियोगिता के लिए खोले जाने का जैसा कि विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष ने सुझाव दिया है, विरोध किया जाना चाहिए और छोटे तथा सीमांत किसानों की अर्थव्यवस्था को सभी सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए तथा कर्ज, पौध, बीज, उर्वरक की आपूर्ति समुचित टेक्नालॉजी एवं उत्पादों की बिक्री जैसे मामलों में तरजीही सुविधाएं देने के साथ ही अन्य आवश्यक कदम उठाये जाने चाहिए और इन फार्मों को कारगर एवं सक्षम बनाया जाना चाहिए। छोटे और सीमांत किसानों के बीच सहयोग के विभिन्न रूपों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। कुछ कृषि उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देते हुए घरेलू बाजार के विस्तार को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
(8) सभी गरीबी-विरोधी तथा ग्रामीण विकास कार्यक्रमों एवं रोजगार के अवसर पैदा करने वाले कार्यक्रमों को कृषि विकास कार्यक्रमों के साथ जोड़ा जाना चाहिए और उन्हें लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित पंचायतों, जन-संगठनों तथा अन्य स्वैच्छिक एजेंसियों के जरिये चलाया जाना चाहिए। इनके कोषों के दुरुपयोग को रोका जाना चाहिए।
(9) बेहतर स्थानीय जैव-टेक्नालॉजी एवं जेनेटिक इंजीनियरिंग को विकसित किया जाना चाहिए जैसा कि पहले बताया जा चुका है।
जबकि आंतरिक अंतविर्राेध तेज हुआ और सामाजिक तनाव बढ़ा तो आपातकालीन व्यवस्थाओं का दुरुपयोग करते हुए, धारा 356 और 357 एवं राष्ट्रपति के अधिकारों तथा राज्यपाल की संस्थाओं का दुरूपयोग करते हुए लोकतांत्रिक अधिकारों और संस्थाओं पर हमले भी तेज हो गये हैं। अधिनायकवादी प्रवृत्तियां बढ़ने के साथ ही संसदीय मानदंडों तथा संस्थाओं पर हमले बढ़े हैं।
केन्द्र में लंबे समय तक एक पार्टी की सत्ता पर इजारेदारी के फलस्वरूप राज्यों के अधिकारों पर अतिक्रमण बढ़ा है तथा केन्द्र पर उनकी वित्तीय निर्भरता बढ़ी है। इन और दूसरी तरह से बढ़ती हुई एकात्मवादी प्रवृत्तियों के फलस्वरूप केन्द्र-राज्य संबंधों में भी बिगाड़ आयी है।
राजनीति के अपराधीकरण, चुनावी प्रक्रियाओं की विकृतियों तथा बढ़ रही लोकतंत्र-विरोधी प्रवृत्तियों की वजह से जन-प्रतिरोध भी बढ़ा है, लोकतांत्रिक चेतना बढ़ी है और लोकतांत्रिक अधिकारों का दावा भी बढ़ा है। पहले राज्यों में सत्ता पर एक पार्टी के एकाधिकार को तोड़ा गया और अब केन्द्र में भी। इसे पुनर्स्थापित करने में सफलता मिलने की संभावना नहीं है। और न ही वामपंथी पार्टियों को दबाते हुए दो दलीय प्रणाली का कदम ही सफल होगा। राज्यों में गैर-कांग्रेस सरकारें कायम रहेंगी, हालांकि संवैधानिक अधिकारों का दुरुपयोग करते हुए उन पर लगातार हमला किया जाता रहा है। वामपंथ के नेतृत्व में सरकारों ने भी बने रहने का अधिकार हासिल कर लिया है। संसदीय प्रणाली को हटा कर राष्ट्रपति प्रणाली की सरकार स्थापित करने या उसका भीतरधात करने के प्रयासों को नाकाम कर दिया गया है। गंभीर सीमाओं एवं कमजोरियों के बावजूद संसदीय लोकतंत्र काम कर रहा है। उसकी रक्षा की जानी है एवं उसका विस्तार किया जाना है। इसके लिए चुनावी सुधार भी अत्यन्त आवश्यक हो गया है ताकि धनशक्ति और गुंडाशक्ति पर अंकुश लगाया जा सके।प्रतिक्रियावादी हमलों और अधिनायकवादी विकृतियों के खिलाफ संविधान के मूलतत्वों की रक्षा की जानी है। लेकिन कुछ अंतर्निहित खामियों तथा सीमाओं के बावजूद यह महसूस किया जाना चाहिए कि कमोबेश राज्य नीति के अधिकांश निर्देशक सिद्धांतों को जो धारा 39 में निहित है, आंशिक रूप से ही कार्यान्वित किया गया है या उनकी उपेक्षा की गयी है। इसलिए इन कुछ निर्देशक सिद्धांतों को मौलिक अधिकारों में हस्तांतरित करना और उन्हें लागू करने के लिए कारगर कदम उठाना, संविधान में प्रगतिशील संशोधन करना आवश्यक हो गया है ताकि उसे परिवर्तनों एवं नयी चुनौतियों और जन-आकांक्षाओं के अनुरूप बनाया जा सके।
राष्ट्रीय एकता पर बढ़ता खतरा
बढ़ती विखंडनकारी प्रवृत्तियों, सभी किस्म के हिन्दू, मुस्लिम एवं सिख संप्रदायवाद और बढ़ता सामाजिक एवं क्षेत्रीय तनाव तथा जातीय संघर्ष अधिकाधिक हमारे देश की एकता एवं अखंडता पर खतरा उत्पन्न कर रहा है।
शक्तिशाली सामंती अवशेष एवं निहित स्वार्थ जिन पर फैलते जन-जागरण से खतरा उत्पन्न हो रहा है, वोट बैंक, कैरियर तथा प्रतिक्रियावादी उद्देश्यों के लिए धर्म, जाति एवं क्षेत्रीय संबंधों तथा निष्ठा के दोहन, राजनीतिक और खासकर संसदीय लाभों के एक उपकरण के रूप में सांप्रदायिक भड़कावा और उत्तेजना, बेरोजगारों एवं निराश युवकों में वृद्धि, बढ़ती क्षेत्रीय असमानताएं तथा सामाजिक असमानताएं- ये सभी फूटवादी एवं उग्रवादी प्रवृत्तियों को चारा प्रदान करते हैं। समय पर लोकतांत्रिक आधार पर इन समस्याओं के समाधान में विफलता और या ऐसी प्रवृत्तियों तथा ताकतों द्वारा जो सामान्यतः धर्मनिरेपक्षता एवं राष्ट्रवाद का समर्थन करती हैं, अवसरवादी राजनीतिक लाभ उठाने के कदमों से फूटवादी ताकतों को ही बल मिलता है एवं पूरी समस्या और अधिक विकट हो जाती है। राष्ट्रीय अखंडता की रक्षा और इन समस्याओं का समाधान अत्यंत फौरी कर्तव्य हो गया है।
अलगाववादी और आर.एस.एस.-भाजपा खतरा
घोर सांप्रदायिक ताकतें अधिकाधिक हिंसा का सहारा ले रही हैं और हमारे सामाजिक ढांचे पर खतरे उत्पन्न कर रही हैं। अलगाववादी मांगे जिनमें आतंकवाद ने भी योग दिया है जैसे “खालिस्तान”, “आजाद कश्मीर”, आदि अधिकाधिक सशक्त हो रही हैं। हाल ही में धार्मिक कट्टरतावाद तथा धर्मतंत्रवाद जिसमें सबसे अधिक भयानक एवं शक्तिशाली “हिंदुत्व” तथा “हिंदूराष्ट्र” है जिसे आर.एस.एस., विश्व हिंदू परिषद, भाजपा एवं शिवसेना द्वारा प्रचारित किया जा रहा है, देश की एकता और अखंडता, उसके धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक ढांचे, उसकी मिली-जुली संस्कृति की विरासत जिसे युगों तक निर्मित किया गया और हमारे समाज के ढांचे पर ही खतरे उत्पन्न कर रहा है। विदेशी साम्राज्यवादी ताकतों द्वारा समर्थित इन सभी फूटवादी ताकतों को देश के सबसे घृणित प्रतिक्रियावादी निहित स्वार्थों द्वारा समर्थन दिया जा रहा है और उनका उपयोग किया जा रहा है।
अल्पसंख्यक संप्रदायवाद जो तंग एकांतिकता को ही बढ़ाता है, आर.एस.एस. एवं भाजपा को मजबूत बनाने में ही मदद देता है न कि वह उससे लड़ता है।
आर.एस.एस.-भाजपा ने जो रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मसले तथा कश्मीर को लक्ष्य बनाते हुए अभियान चला रहा है, धर्मनिरपेक्षता और भारतीय एकता पर ही गंभीर हमला शुरू कर दिया है। भारतीय इतिहास को विकृत करते हुए वे झूठे दावों द्वारा लोगों की आखांें में धूल झोंकते हैं और हिंदू राष्ट्रवाद को सही राष्ट्रवाद के रूप में पेश करते हैं तथा भारत की धार्मिक सहिष्णुता, सौहार्द एवं मानवीय बंधुत्व की युगों पुरानी परम्परा के विपरीत आक्रामक धर्मोन्माद तथा असहिष्णुता का प्रचार करते हैं। ये ताकतें न केवल जनता को विभाजित करती है बल्कि वे इतिहास के चक्के को पीेछे ले जाना चाहती है और सभी प्रगति तथा लोकतंत्र का विरोध करती है।
येे सभी घोर सांप्रदायिक ताकतें राजनीतिक उद्देश्यों के लिए धर्म का गलत अर्थ लगाती हैं और उसका दुरूपयोग करती हैं। कोई भी धर्म सांप्रदायिक दुश्मनी, घृणा तथा हिंसा का प्रचार नहीं करता है। इसके विपरीत धार्मिक कट्टरतावाद तथा मतांधता के समर्थकों द्वारा सहिष्णुता, सार्वभौम बंधुत्व और प्रेम की विरासत का भीतरघात किया जाता है तथा उसकी तोड़ फोड़ की जाती है। हमारी पार्टी को संयुक्त रूप से इन फूटवादी ताकतों का विरोध करने और धर्मनिरपेक्षता तथा सांप्रदायिक एकता की रक्षा करने के लिए जो बहुधर्मी भारत में राष्ट्रीय एकता की अवश्यक पूर्वापेक्षा है, सभी वामपंथी, देशभक्त तथा धर्मनिरपेक्ष ताकतों को एकजुट करना है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सभी धर्मों के लिए पूजा करने की पूर्ण स्वतंत्रता, आवश्यक धार्मिक कृत्य करने तथा दूसरे धर्मो के प्रति किसी पूर्वाग्रह के बिना धार्मिक संस्थाओं को बढ़ाने की गारंटी का समर्थन करती है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सभी अलसंख्यकों के खिलाफ चाहे धार्मिक हों या जातीय, सभी तरह के परोक्ष या अपरोक्ष भेदभाव का दृढ़ता से विरोध करती है। हम धर्म तथा राज्य के अलगाव का समर्थन करते हैं और सांप्रदायिक घृणा एवं हिंसा पर अंकुश लगाने के वास्ते संयुक्त कार्रवाई के सिलसिले में सच्चे आस्तिकों के साथ बातचीत तथा सहयोग का समर्थन करते हैं। ऐसा सहयोग संभव और आवश्यक है।
जातिवाद और सामाजिक न्याय
एक सर्वाधिक घातक एवं प्रतिक्रियावादी सामंती अवशेष जिसका कुछ प्राचीन धर्मग्रंथो द्वारा भी समर्थन किया गया है, वह है जाति-प्रथा, शोषण तथा उत्पीड़न। वह अमानवीय सामाजिक अत्याचार का एक स्रोत हो गया है और प्रगति तथा लोकतंत्र के लिए एक बड़ा बाधक। उन महान संतों तथा समाज सुधारकों को तो यह श्रेय है कि उन्होंने उसकी असमानताओं को चुनौती दी और उत्पीड़न तथा वंचित जनता केविरोध को एक स्वर दिया। इन विविध सुधार आंदोलनों तथा विभिन्न आरक्षण नीतियों ने एक सकारात्मक भूमिका अदा की है और कुछ सुविधाएं प्रदान की हैं। लेकिन उस घातक प्रथा की जड़े कायम हैं। अनुभव ने उन दृष्टिकोणों की अपर्याप्तता को भी सामने ला दिया है जो आर्थिक पहलू पर एकांगी जोर देते हैं या कानूनी कदमों पर जिनमें अधिकांश कागजों पर ही पड़े हैं। आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों में समस्यााअें का समाधान करने के लिए सर्वतोमुखीं तथा मूलगामी कदम उठाने की जरूरत है। हमारी पूरी व्यवस्था में बुनियादी रूपांतरण की जरूरत है और उसके साथ ही विकास की तेज गति के साथ रोजगार की व्यवस्था, मूलगामी भूमि सुधार, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा अन्य सामाजिक सुविधाओं के विस्तार, गरीबी दूर करने के कारगर कदमों, अनुसूचित जाति एवं पिछड़ी जातियों के लिए लाभकारी कानून के कार्यान्वयन की गारंटी तथा अंतर्जातीय विवाह को प्रोत्साहन एवं समर्थन की भी। जातीय उन्माद जिससे जातीय तनाव एवं संघर्ष, पैदा होता है, का प्रतिकार किया जाना है। सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष, जातीय उत्पीड़न एवं असमानता की समाप्ति के लिए संघर्ष लोकतंत्र तथा राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने के लिए एक आवश्यक शर्त है। हमारा लक्ष्य जाति-प्रथा को जड़-मूल से उखाड़ फेंकना और एक जाति-विहीन समाज की दिशा में बढ़ना है।
महिलाओं का सवाल
लैंगिक असमानता और उस पर आधारित भेदभाव और उत्पीड़न तथा महिलाओं को घटिया दर्जा, ये सब दुर्गुण हमारे समाज में आज भी कायम हैं और उनसे महिलाएं पीड़ित हैं तथा ये एक अन्य घातक आदिमकालीन अवशेष हैं। विकासमान पूंजीवाद भी इसका इस्तेमाल करता है और समस्याओं को बढ़ाता है। हमारा समाज पुरुषों एवं महिलाओं के बीच इस आसमानता तथा दोहरे शोषण को जिससे महिलाएं पीड़ित हैं, खत्म किये बिना एक आधुनिक, लोकतांत्रिक एवं सभ्य समाज नहीं हो सकता है। इसके बिना और महिलाओं की सभी लोकतांत्रिक आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी के बिना कोई भी सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्रांति संभव नहीं है। पुरुषों के साथ समान आधार पर आर्थिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक क्षेत्रों में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी के लिए कारगर कदम उठाया जाना है, उसके लिए संघर्ष करना है तथा उसे लागू करना है। दहेज-विरोधी, सती-विरोधी तथा बाल विवाह-विरोधी जैसे कानूनों को केवल कागज पर ही नहीं रहना चाहिए बल्कि उन्हें कारगर एवं कठोर बनाया जाना चाहिए।
इनके अलावा महिलाओं के लिए संपत्ति का अधिकार, घरों से वंचित या परित्यक्ताओं के लिए कारगर पुनर्वास के कदम, विधवा-विवाह को प्रोत्साहन आदि भी अत्यंत आवश्यक है। जन चेतना जगायी जानी चाहिए और पुरुषों के अहं एवं प्रभुत्व का प्रतिकार किया जाना चाहिए।
बच्चे के जन्म से पहले और बाद में सवेतन अवकाश, शिशुशालाओं एवं नर्सरियों का व्यापक विस्तार अत्यंत आवश्यक है। समान कार्य के लिए समान वेतन, उन सभी अशक्ताओं को दूर करना जिनसे महिलाएं पीड़ित हैं, महिलाओं की मुक्ति और समाज में समान दर्जे के लिए उनके सभी आंदोलनों का समर्थन आदि को हमारे समाज के लोकतांत्रीकरण के संघर्ष के एक हिस्से के रूप में सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
भाषा समस्या
सभी भाषाओं की समानता होनी चाहिए। राज्यों में प्रशासन तथा शिक्षा के माध्यम के रूप में अंग्रेजी की जगह भारतीय भाषाओं को पूरी तरह प्रतिस्थिापित किया जाना चाहिए और सभी राज्यों को सरकारी विभागों, सार्वजनिक संस्थाओं तथा कानून की आदलतों में आंतरिक प्रशासनिक उद्देश्यों के लिए अपनी भाषा का इस्तेमाल करना चाहिए। उसे सभी स्तरों पर शिक्षा का माध्यम होना चाहिए। उर्दू भाषा तथा लिपि की उन राज्यों तथा इलाकों में अवश्य ही रक्षा की जानी चाहिए जहां उसका परंपरागत इस्तेमाल होता है। संविधान की आठवीें अनुसूची में मणिपुरी तथा नेपाली भाषाओं को शामिल किया जाना चाहिए। विभिन्न राज्यों में भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी भाषा में शिक्षा प्राप्त करने की व्यवस्था की जानी चाहिए। अखिल भारतीय सेवाओं के लिए सभी प्रतियोगात्मक परीक्षाएं संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल सभी भाषाओं में ली जानी चाहिए। भाषााअें को शामिल करने की समुचित मांग का प्रतिरोध नहीं किया जाना चाहिए जैसा कि अभी किया जा रहा है।
जातीयता और आदिवासी समस्या
जातीय समस्या हमारे बहु-भाषाई तथा बहु-जातीय देश में एक महत्वपूर्ण समस्या है। भाषाई पुनर्गठन के बावजूद अभी अनेक समस्याएं कायम हैं। छोटी जातियां तथा आदिवासी जनगण में नयी चेतना जागृत हो रही है और वे अपनी भाषा तथा संस्कृति के विकास एवं राजनीतिक अधिकारों और पहचान की स्थापना के लिए संघर्ष कर रहे हैं। 1991 की जनगणना से यह संकेत मिलता है कि करीब 3000 भाषाएं एवं बोलियां है और केवल 59 भाषाओं को ही शिक्षा के लिए स्वीकार किया गया है। अपनी पहचान तथा अपने स्वायत्त राज्य के लिए आदिवासी जनगणों के आंदोलनों ने एक नया आयाम ग्रहण कर लिया है। झारखंड राज्य, बोडोलैंड तथा स्वायत्त राज्य के लिए जिसमें उत्तरी कछार-मिकिर पहाड़ी क्षेत्र शामिल हो, आंदोलन जन आंदोलन हो गया है और केन्द्र को समाधान ढूंढ़ने के लिए बातचीत शुरू करनी है। ऐसे और नारे एवं आंदोलन अस्तित्व में आने वाले हैं। अनेक राज्यों में आदिवासी आबादी का एक अच्छा प्रतिशत है।
केन्द्र-राज्य संबंधों का पुनर्गठन
इस फैसतेे आदिवासी जागरण के साथ ही वर्तमान राज्य राज्यों के अधिकारों पर केन्द्र के दखल तथा वित्तीय अधिकारों और संसाधनों के गभीर अभाव पर काफी आंदोलित है क्योंकि इसके बावजूद विकास की पूरी जिम्मेवारी उन्हीं पर है।संवैधानिक व्यवस्थाओं का दुरुपयोग करके और संशोधनों तथा अन्य कदमों से केन्द्र ने अपने हाथ में अधिकाधिक अधिकार केन्द्रित कर लिया है और वह एकात्मक दिशा में बढ़ा है, न कि संघीय दिशा में। इससे सभी बड़े और छोटे राज्यों को अधिक अधिकार तथा अधिक प्रशासनिक, राजनीतिक एवं वित्तीय स्वायत्तता देने की लगातार मांग उठने लगी। हमारी पार्टी राष्ट्रीय एकता और एक मजबूत केन्द्र का समर्थन करती है। पर उसे यह विश्वास है कि संघीय सिद्धांतों के आधार पर ही हमारे देश की एकता निर्मित की जा सकती है और उसकी रक्षा की जा सकती है।
इसलिए पार्टी मांग करती है कि संघीय सिद्धांतों पर केन्द्र-राज्य संबंधों का पुनर्गठन किया जाये और संविधान में संशोधन किया जाये। संघ तथा राज्यों के बीच अधिकारों के आवंटन में मूलगामी संशोधन (वित्तीय संसाधन भी) अत्यंत आवश्यक है जिसमें राज्यों को अधिक स्वायत्तता दी जाये।
आदिवासी जनगणों एवं अन्य जातीय समूहों तथा ग्र्रुपों की आकांक्षाओं को पूरा करने के वास्ते राजनीतिक-प्रशासनिक व्यवस्था करने के लिए संविधान में संशोधन किया जाना है। उन सभी क्षेत्रों को जहां आदिवासी जन रहते हैं और जहां वे बहुमत में हैं या एक सबसे बड़े गु्रप हैं, वर्तमान राज्य के अंतर्गत एक तरह की क्षेत्रीय स्वायत्तता दी जानी चाहिए या भारतीय संघ की अंगीभूत इकाई के रूप में राज्य का दर्जा दिया जाना चाहिए तो खास आदिवासी क्षेत्रों में विकास के चरण, चेतना तथा अन्य परिस्थितियों पर निर्भर करता है। झारखंड राज्य और उत्तराखंड जैसी मांगों को अविलंब स्वीकार किया जाना चाहिए। आदिवासी जनों को अवश्य ही वन उत्पादों का इस्तेमाल करने की इजाजत दी जानी चाहिए और उनके कब्जे या दखल की जमीन को पूरी सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए। उन्हें अविलंब पट्टा दिया जाना चाहिए और वन कानून में समुचित संशोधन किया जाना चाहिए।
वैज्ञानिक और प्राविधिक क्रांति
भारत औद्योगिक क्रांति में भाग नहीं ले सका क्योंकि वह एक उपनिवेश था और उस समय निष्ठुर साम्राज्यवादी शोषण का शिकार था। बाद में वह केवल आंशिक रूप से ही उसमें भाग ले सका और वह इस क्षेत्र में गंभीर रूप से पीछे है। पूंजीवाद-पूर्व के शक्तिशाली अवशेषों एवं असंतुलित पूंजीवादी विकास के साथ उसके बहु-संरचानात्मक समाज को वर्तमान वैज्ञानिक एवं प्राविधिक क्रांति की नयी चुनौती का सामना करना है।
आजादी के बाद भारत में विज्ञान तथा प्रविधि में काफी प्रगति की है, हालांकि अभी हमें बहुत कुछ करना है। हम समझते हैं कि प्राविधिक प्रक्रिया को जो वैज्ञानिक एवंप्राविधिक क्रांति की देन है, सबसे पहले हमारे लोगों की जरूरतों को पूरा करना चाहिए और फिर उनके जीवन एवं पर्यावरण की बेहतरी के लिए काम करना चाहिए।
विकास के पूंजीवादी पथ ने, जिसे हमारे देश में पूंजीपति वर्ग ने अपनाया, वैज्ञानिक एवं प्राविधिक क्रांति से समाज के अभिजन वर्गों की जरूरतों को पूरा किया। जबकि हम रक्षा उत्पादन, मशीनी-पुर्जा कार्यक्रम तथा इलेक्ट्रानिक्स और कृषि उत्पादन के सीमित क्षेत्रों में प्रगति कर सके हैं, लेकिन हमारी सामान्य औद्योगिक उदत्पादकता अभी भी निम्न है। वैज्ञानिक एवं प्राविधिक कमियों की योग्यता का उपयोग विकास कार्यक्रमों के लिए नहीं किया गया है और सामान्य रूप से विज्ञान एवं प्रविधि के लाभों का प्रभाव बहुमत के जीवन पर बहुत कम पड़ा है।
सरकार की नयी आर्थिक नीतियों जिसने बड़े पैमाने पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को आने की इजाजत दी है और उद्योगों के संबंध में उदारीकरण के कदमों ने प्रविधि के मामले में अनेक सवाल खड़े कर दिये हैं। जबकि हम अपने राष्ट्रीय आर्थिक जीवन में आधुनिकतम टेक्नालॉजी के प्रवेश का स्वागत करते हैं, लेकिन हमारी यह भी राय है कि ऐसी सभी प्रविधि से सस्ता भोजन, कपड़ा, मकान प्राप्त होना चाहिए और जनता के विशाल बहुमत को रोजगार मिलना चाहिए।
यह अनुभव रहा है कि सामान्यतः विज्ञान तथा प्रविधि श्रम बचाती है और इसमें अधिक पूंजी लगती है। यह आवश्यक है कि ऐसी प्रविधि को इजाजत नहीं दी जाये जो मजदूरों को फालतू एवं बेरोजगार बना दे। सहायक उद्योगों में पुनः पूंजी लगाने का कदम उठाया जाना चाहिए और औद्योगिक तथा सेवा क्षेत्रों में विज्ञान एवं प्रविधि लागू करने के फलस्वरूप विस्थापित हुए कर्मियों को पुनर्प्रशिक्षिण दिया जाना चाहिए। ऐसा सुनियोजित तथा चरणबद्ध तरीके से किया जाना चाहिए। वास्तव में हम आयातित प्रविधि को आत्मसात नहीं कर पाते हैं और एक लंबे समय तक बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर ही भरोसा करते हैं या हम पुरानी प्रविधि ही प्राप्त करते हैं। इसे टालने के लिए आयातित प्रविधि को आत्मसात करने और खास समय में विदेशी सहयोग से प्राप्त अनुभव का उपयोग करने के लिए एक औद्योगिक आधार पर निर्माण किया जाना चाहिए।
तेज गति से स्थानीय वैज्ञानिक एवं प्राविधिक आधारभूत ढांचे का विकास हमारे देश की प्रगति के लिए आवश्यक है। इसके लिए और आत्म-निर्भरता के आधार पर हमारे राष्ट्रीय संसाधनों के पुननिर्माण के व्यापक कर्त्तव्य को पूरा करने के लिए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सरकार द्वारा पर्याप्त कोष के आवंटन के लिए संघर्ष करेगी।
नयी प्रविधि के प्रयोग के अनेक मामलों में स्वास्थ्य के लिए खतरा उत्पन्न हो रहा है। मानव जीवन तथा पारिस्थितिकी पर दीर्घकालीन पर्यावरण प्रभाव के संबंध में चिन्ता होनी चाहिए और नियोजन तथा लाइसेंसिंग कार्यविधि में भी इसे प्रतिफलित होना चाहिए। औद्योगिक लाइसेंस को अस्वीकार कर दिया जाना चाहिए यदि वे खास पर्यावरण सुरक्षा मानदंडों का अनुपालन नहीं करते हैं। पर्यावरण प्रदूषण कानूनों को मजबूत बनाया जाना चाहिए और बड़ी कड़ाई से उन्हें लागू किया जाना चाहिए।
वैज्ञानिक तथा प्राविधिक क्रांति ने मजदूर वर्ग की संरचना में काफी परिवर्तन ला दिया है। भौतिक उत्पादन में सीधे लगे मजदूरों की तुलना में सेवा तथा संचार उद्योगों में कार्यरत मजदूरों की संख्या में अपेक्षाकृत वृद्धि हुई है। ह्वाइट कॉलर मजदूर, टेक्निशियन, इंजीनियर एवं विशेषज्ञ भौतिक उत्पादन के क्षेत्र में अधिकाधिक भाग लेते हैं और अधिकांश रोजमर्रे के कार्य करने वाले अकुशल मजदूरों की संख्या भी बढ़ी है जिसका यह तकाजा है कि एक नया ट्रेड यूनियन दृष्टिकोण अपनाया जाये ताकि उन्हें एक सामान्य आंदोलन में शामिल किया जा सके। एक पूंजीवादी व्यवस्था में इजारेदार ग्रुपों के क्षुद्र हितों को पूरा करने के लिए प्रविधि के दुरुपयोग ने वास्तविक खतरा उत्पन्न कर दिया है। स्थानीय पोषक प्रविधि के साथ नयी प्रविधि तभी लाभकारी हो सकती है यदि समुचित संस्थागत और संरचनात्मक परिवर्तन करके खतरे का मुकाबला किया जाये। इन परिस्थितियों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्राथमिक कर्तव्य अन्य लोकतांत्रिक ताकतों के साथ मिलकर इन संस्थागत और संरचनात्मक परिवर्तनों के लिए संघर्ष करना है।
पर्यावरण की सुरक्षा
जल और वायु का प्रदूषण, जघन्य वन कटाई, वन्य जीवन की अधांधुंध हत्या, बढ़ता हुआ औद्योगिक प्रदूषण तथा वाहनों के उत्सर्जन से वायुमंडल में जहर का फैलाव आदि जिन्दगी तथा स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा उत्पन्न कर रहा है। हमें पर्यावरण की सुरक्षा के लिए विभिन्न आंदोलनों के प्रति सकारात्मक एवं सहयोगात्मक रुख अख्तियार करना चाहिए और दोनों राष्ट्रीय तथा भूमंडलीय स्तर पर इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए सक्रिय कार्य करना चाहिए और सरकारी तथा गैर-सरकारी स्तर पर दोनों अल्पकालीन एवं दीर्घकालीन कदम उठाना चाहिए तथा कार्रवाई करनी चाहिए।
विदेश नीति कर्तव्य
विदेश नीति के क्षेत्र में प्रारंभिक हिचकिचाहट तथा समझौतों पर काबू पा लिया गया क्योंकि वह स्वतंत्र विकास की अनिवार्यता थी। विदेश नीति एक स्वतंत्र उपनिवेशवाद-विरोधी दिशा में आगे बढ़ी। शीघ्र ही उन ताकतों के साथ सहयोग की दृढ़ विदेश नीति अपनायी गयी जो विश्व शांति, निरस्त्रीकरण तथा एक समान आधार पर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए संघर्ष कर रही थीं और उसके साथ ही मुक्ति संघर्षों के साथ एकजुटता, गुटनिरपेक्ष आंदोलन के निर्माण में सक्रिय भूमिका, समाजवादी देशों, खासकर सोवियत संघ और नवस्वतंत्र देशों के साथ मैत्री एवं सक्रिय सहयोग की नीति अपनायी गयी।
कश्मीर, गोवा में साम्राज्यवादी दुरभिसंघि, दिएगो गार्सिया में सैनिक अड्डे के अनुभवों और समाजवादी देशों के साथ गंभीर सहयोग तथा तीसरी दुनिया के देशों के साथ संयुक्त संघर्ष के लाभों ने प्रगतिशील विदेश नीति के लिए ठोस लोकप्रिय आधार प्रदान किया। इसके फलस्वरूप भारत को लोकतांत्रिक एवं स्वतंत्र अंतर्राष्टीय संबंध बनाने, इस क्षेत्र में एक प्रमुख भूमिका अदा करने तथा गुटनिरपेक्ष आंदोलन का निर्माण करने और प्रतिष्ठा एवं सम्मान हासिल करने में मदद मिली।
आज परिवर्तित स्थिति और शक्तियों के नये संबंधों तथा नयी विश्व प्रवृत्तियों में यह और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है कि इस नीति की दिशा को बरकरार रखा जाये, व्यापक सहयोग विकसित किया जाये तथा अधिक समान आधार पर अंतर्राष्ट्रीय संबंधों एवं विदेश व्यापार का विस्तार किया जाये और एक नयी अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के लिए सुसंगत रूप से संघर्ष किया जाये तथा वर्तमान असमान विश्व वित्तीय व्यवस्था में सुधार किया जाये। दक्षिण-दक्षिण सहयोग को विकसित करने के लिए सुसंगत प्रयासों को और तेज किया जाना चाहिए। गुटनिरपेक्ष आंदोलन को शांति एवं राष्ट्रीय आजादी को और अधिक दृढ़ता से समर्थन देना चाहिए तथा नवउपनिवेशवाद का और सशक्त प्रतिरोध किया जाना चाहिए।
आज चीन, क्यूबा, वियतनाम तथा कोरिया लोक जनवादी गणतंत्र आदि के साथ घनिष्ठ सहयोग एवं मैत्री ने अधिक महत्व ग्रहण कर लिया है। एशिया, अफ्रीका तथा लैटिन अमरीका के देशों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
पड़ोसी देशों (खासकर पाकिस्तान और बंगलादेश) के साथ क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाने एवं संबंध सुधारने और सार्क को मजबूत बनाने के लिएअधिक प्रयासों की जरूरत है।
इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कर्तव्य है संयुक्त राष्ट्र का लोकतांत्रीकरण एवं उसे और मजबूत बनाने तथा उसके ढांचे में संरचनात्मक परिवर्तन लाने के लिए कार्य करना, उसे साम्राज्यवादी दबाव से मुक्त करना (परोक्ष या अपरोक्ष) और उसकी शांति-कामी भूमिका को सुनिश्चित करना। हथियार और युद्ध विहीन विश्व के लक्ष्य के लिए यह आवश्यक है कि संयुक्त राष्ट्र को और अधिक मजबूत किया जाये, उसमें सभी देशों को समान दर्जा प्रदान किया जाये तथा सुयंक्त राष्ट महासभा के प्रस्तावों एवं निर्णयों को समुचित सम्मान देकर तथा नियमित सलाह-मशविरा के जरिये संयुक्त राष्ट्र की नीति-निर्माण प्रक्रिया में गैर-सरकारी संगठनों को भाग लेने की संभावना प्रदान करके उनकी लोकतांत्रिक भागीदारी को सुनिश्चित किया जाये। सुरक्षा परिषद की भूमिका की अवश्य ही समीक्षा की जानी चाहिए ताकि महासभा की सहमति के बिना शांति एवं सुरक्षा के महत्वपूर्ण मसलों पर सदस्य देशों के एक छोटे तबके को निर्णय लेने की इजाजत नहीं दी जा सके। “स्थायी सदस्यों” के ग्रुप की सीमित संरचना में भी इस विश्व निकाय के सर्वव्यापक स्वरूप के अनुरूप परिवर्तन किये जाने की जरूरत है।
सुसंगत लोकतंत्र के लिए
इस बात पर जोर देते हुए कि समाजवाद हमारा अंतिम लक्ष्य है, पूंजीवाद का विकल्प है और गरीबी, बेरोजगारी, निरक्षता, घोर असमानता, वर्ग शोषण एवं सामाजिक उत्पीड़न जैसी समस्याओं का कारगर ढंग से समाधान करने का रास्ता है, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी आज सुसंगत लोकतंत्र, सभी क्षेत्रों- आर्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्रों में समस्त सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के लोकतांत्रिक पुनर्गठन के लिए संघर्ष पर अत्यधिक जोर देती है। आज भारत की ठोस परिस्थितियों में इसका अर्थ हैः
- इजारेदारियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर अंकुश लगाना तथा उनका नियमन करना, नव-उपनिवेशवादी घुसपैठ और हमले का प्रतिकार करना;
- सभी सामंती अवशेषों को समाप्त करना। मूलगामी भूमिसुधार, जातीय शोषण एवं उत्पीड़न तथा पुरुषों एवं महिलाओं के बीच असमानता को समाप्त करने के लिए कारगर कदम, सूदखोरी एवं कर्ज-दासता को खत्म करने के लिए कारगर कदम;
- सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार एवं लोकतंत्रीकरण, गुप्त मतदान के जरिये निर्वाचित प्रतिनिधियों के साथ प्रबंध में मजदूरों की भागीदारी, मजदूरों की पहलकदमी तथा उत्पादकता बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन और “कार्यसंस्कृति” को बढ़ावा;
- किसान उत्पादकों के आपराधिक पूंजीवादी शोषण पर अंकुश लगाना, कृषि उत्पादों के लिए लाभकारी कीमत की व्यवस्था और खेत मजदूरों के लिए व्यापक वेतन कानून;
- सार्वजनिक वितरण प्रणाली का व्यापक विस्तार, छोटे व्यापारियों का इस्तेमाल करना, लेकिन उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए लोकप्रिय समितियों का गठन किया जाये;
- स्वैच्छिक सही कोआपरेटिवों को प्रोत्साहन, छोटे उद्यमियों, उद्योग में मजदूरों एवं परंपरागत हस्तशिल्प तथा स्व-रोजगार में लगे लोगों को प्रोत्साहन;
- सबों के लिए समुचित स्वास्थ्य एवं आवास के लिए कारगर कदम, सार्वजनिक आवास के लिए शहरी जमीन पर हदबंदी, सभी गांवों में पेयजल की व्यवस्था;
-मजदूरों और कर्मचारियों के लिए न्यूनतम जीवन निर्वाह वेतन, सामाजिक सुरक्षा एवं अन्य टेªड यूनियन अधिकारों को सुनिश्चित करना;
- सार्वजनिक क्षेत्र तथा सभी केन्द्रीय, राज्य एवं स्थानीय स्व-शासन संस्थाओं (जैसे-कार्पोरेशनों, म्युनिसिपैलिटियों, पंचायतों आदि) में मजदूरों तथा कर्मचारियों को राजनीतिक एवं लोकतांत्रिक अधिकार प्रदान करना, जिसमें सभी निर्वाचित निकायों के लिए चुनाव लड़ने का भी अधिकार शामिल है और नियुक्तियों, प्रोन्नतियों एवं सेवा दशा के सबंध में उनकी प्रथम मांगों का कार्यान्वयन भी शामिल हैं;
- वेतन, आवास, बच्चों की शिक्षा तथा पर्याप्त पेंशन के लिए समुचित कदम (एक रैंक-एक पेंशन) के संबंध में सेना के लोगों की मांगों को पूरा करना। और सेवानिवृत्ति के बाद पुनर्वास के मामले में अर्धसैनिक बल तथा पुलिस समेत सशस्त्र सेना के सदस्यों के लिए शालीन स्तर को सुनिश्चित करना।
राजनीतिक ढांचे का लोकतंत्रीकरण
इस क्षेत्र में इन कर्तव्यों के साथ महत्वपूर्ण राजनीतिक कर्तव्यों को निम्नलिखित रूप से निरूपित किया जा सकता है:
- लोकतंत्र को सुदृढ़ करना एवं उसका विस्तार करना, लोकतांत्रिक संस्थाओं को साफ-सुथरा करना तथा लोकतांत्रिक मानदंडों एवं मूल्यों को लागू करना, सभी कठोर कानूनों एवं लोकतांत्रिक अधिकारों पर सभी रोक को खत्म करना, चुनावी सुधार जिसमें समानुपातिक प्रतिनिधित्व शामिल है, गुंडाशक्ति एवं धनशक्ति पर रोक लगाना और मतदाताओं के लिए स्वतंत्र रूप से अपने मताधिकार का प्रयोग करने की व्यवस्था करना तथा उनके वास्तविक प्रतिनिधित्व एवं इच्छा की अभिव्यक्ति को सुनिश्चित करना;
- देश के धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक ढांचे की रक्षा करना और मजबूत करना। सभी धर्मांे के लिए पूजा करने एवं अपने आवश्यक धार्मिक कृत्यों का अनुपालन करने की स्वतंत्रता की गारंटी करना और दूसरे धर्मों के प्रति बिना किसी पूर्वाग्रह के धार्मिक संस्थाओं को बढ़ावा देना। अल्पसंख्यकों को वे जहां कहीं भी हों, पूर्ण गारंटी एवं सुरक्षा प्रदान करना, राजनीतिक जीवन के किसी क्षेत्र में धार्मिक विश्वास या मत के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करना, राज्य और धर्म को अलग करना;
- सभी जातियों के लिए तथा पुरुषांे एवं महिलाओं के बीच समान स्तरों और अवसरों के साथ सामाजिक न्याय को सुनिश्चित करने के लिए कारगर कदम उठाना;
- काम के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने के अलावा युवकों के लिए रोजगार के अवसरों के विस्तार के लिए फौरी कदम उठाना, शिक्षा, खेल-कूद तथा सांस्कृतिक कार्यकलाप एवं अन्य कल्याण योजनाओं, लोकतांत्रिक और लोकप्रिय शिक्षा प्रणाली को सुनिश्चित करना;
- सच्चे संघीय आधार पर केन्द्र-राज्य संबंधों का पुनर्गठन करना, (संघ) और राज्यों के बीच अधिकारों का मूलगामी पुर्नआवंटन करना जिसमें राज्यों को पूर्व अवशिष्ट अधिकार तथा पूर्ण स्वायत्तता, राजनीतिक, प्रशासनिक एवं वित्तीय अधिकार प्राप्त हों जो भारत की एकता तथा लोकतांत्रिक आधार पर एक मजबूत केन्द्र के अनुरूप हो। जिला तथा स्थानीय निकायों को सत्ता का हस्तांतरण एवं विकेन्द्रीकरण जिसका लक्ष्य विकासगत और प्रशासनिक कार्य में सक्रिय भागीदारी के लिए आम जनता को शामिल करना है;
- नौकरशाही, लालफीताशाही एवं भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना, उसे सही बनाने के लिए कारगर कदम उठाना जिसमें ऊपर से नीचे तक का हिस्सा शामिल है। नौकरशाही तंत्र में मूलगामी सुधार तथा उसे चुस्त-दुरुस्त करना और उसे जनता के प्रति अधिक जवाबदेह बनाना;
- व्यक्तिगत स्वतंत्रता, भाषण, प्रेस, समामेलन तथा अंतःकरण की स्वतंत्रता की रक्षा करना और विपक्षी पार्टियां बनाने का अधिकार प्रदान करना, बशर्ते कि वे संवैधानिक ढांचे के अंदर कार्य करें।
शिक्षा और संस्कृति
राष्ट्रीय प्रगति और सामाजिक रूपांतरण के लिए एक आवश्यक शर्त है जन-साक्षरता और लोकप्रिय शिक्षा, वैज्ञानिक ज्ञान एवं संस्कृति का बढ़ता स्तर। इसका तकाजा है कि वर्तमान राष्ट्रीय शिक्षा नीति को समाप्त किया जाये जो उच्च वर्गों के हितों को पूरा करने की दिशा में उन्मुख है। जन शिक्षा की कीमत पर अभिजन शिक्षा को बढ़ावा देने की नीति को उलटा जाना है और एक वैकल्पिक लोकप्रिय शिक्षा नीति तैयार की जानी है और उसे लागू किया जाना है। प्राथमिक शिक्षा का अवश्य ही विकेन्द्रीकरण किया जाना चाहिए। अनौपचारिक शिक्षा को अवश्य ही सुदृढ़ किया जाना चाहिए और उसे इस तरह से सांगठित किया जाना चाहिए जिससे मेहनतकश जनता को भी शिक्षित किया जा सके। पाठ्यक्रम अवश्य ही राष्ट्रीय विकास की जरूरतों एवं जनता की व्यावहारिक जरूरतों से संबंधित होना चाहिए और उसके साथ ही उसे मानविकी तथा विज्ञान में अभिरुचि जागृत करनी चाहिए।
हमारे सृजनात्मक सांस्कृतिक जीवन का लोकतंत्रीकरण करने, उसे जीवंत एवं समृद्ध बनाने की जरूरत है। इसके लिए एक राष्ट्रीय संस्कृति नीति की जरूरत है जो हमारी मूल्यवान संस्कृतिक विरासत और मानव सभ्यता द्वारा निर्मित समस्त सांस्कृतिक संपदा तथा हमारे भाषाई एवं जातीय ग्रुपों की बहुमुखी संस्कृति को समन्वित करती हो। भारत की प्रगतिशील विरासत और मिली-जुली संस्कृति पर प्रतिक्रियावादी एवं हृासोन्मुख सांस्कृतिक हमले के खिलाफ रक्षा की जानी है। यह कर्तव्य आज और अधिक आवश्यक हो गया है क्योंकि साम्राज्यवाद नियंत्रित बहुराष्ट्रीय मीडिया संगठनों का हमारे जन-प्रचार माध्यमों पर हमला बढ़ गया है जो वास्तविकता को विकृत करते हैं। वे हमारे दिमाग का उपनिवेशीकरण करने तथा हमें स्वयं हमारी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से अलग करने का प्रयास करते हैं। नये संगठनात्मक रूपों का उपयोग करते हुए और राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय एकता एवं सांप्रदायिक सौहार्द तथा विवेकपूर्ण चिन्तन की हमारी परंपरा और सामाजिक परिवर्तन तथा सामाजिक न्याय के लिए उत्कट आकांक्षा को आगे बढ़ाते हुए एक नया व्यापक सांस्कृतिक आंदोलन अवश्य ही निर्मित किया जाना चाहिए। सत्यनिष्ठा को कायम रखते हुए जीवन और जनता ही उसका आधार होना चाहिए।
वर्गीय पंक्तिबद्धता
समस्त लोकतांत्रिक साम्राज्यवाद-विरोधी, इजारेदार-विरोधी, एवं सामंत-विरोधी ताकतों को लामबंद किया जाना चाहिए और व्यापकतम लोकतांत्रिक एकता निर्मित की जानी चाहिए। कार्यनीति तैयार करते हुए मजदूर वर्ग, खेत मजदूरों, किसानों, सभी अन्य मेहनतकश तबकों, बुद्धिजीवियों एवं मध्यम वर्ग और उसके साथ ही गैर-इजारेदार राष्ट्रीय पूंजीपतिवर्ग की भूमिका को पूरी तरह ध्यान में रखा जाना चाहिए। खेत मजदूरों और बुद्धिजीवियों की बड़ी संख्या एवं बढ़ी हुई भूमिका को भीध्यान में रखा जाना चाहिए। वर्ग गठबंधन के आधार के रूप में मजदूर-किसान गठबंधन की निर्णायक भूमिका को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
आर्थिक, राजनीतिक एवं सैद्धांतिक स्तर पर जन अभियान, कार्रवाई तथा संघर्ष चलाकर ऐसी एकता एवं व्यापक वर्ग गठबंधन निर्मित किया जा सकता है। प्रतिक्रियावादी एवं सांप्रदायिक-फूटवादी ताकतों का पर्दाफाश करते हुए और उन्हें अलग-थलग करते हुए, वामपंथी ताकतों को काफी सुदृढ़ करते हुए तथा सभी धर्मनिरपेक्ष एवं लोकतांत्रिक ताकतों को एकजुट करते हुए लोकतांत्रिक ताकतों के पक्ष में शक्तियों के सहसंबंध में बुनियादी परिवर्तन आवश्यक है।
वामपंथ की भूमिका
सभी वामपंथी पार्टियां, ताकतों तथा तत्वों जिनमें वे वामपंथी पार्टियां भी शामिल हैं जो “वामपंथी मोर्चे” में अभी सम्मिलित नहीं है, सोशलिस्ट तथा बुद्धिजीवियों एवं अलग स्वतंत्र वामपंथियों के बीच कार्रवाईगत एकता के साथ वामपंथ को व्यापक रूप से मजबूत किया जाना है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) और नक्शलवादियों के बीच ऐसे तत्वों जो कम्युनिस्ट एकता के समर्थक हैं, के बीच एकता से वामपंथ के सुदृढ़ीकरण और सहयेाग में बड़ी सहायता मिलेगी।
लोकतांत्रिक जन संगठनों का एकीकरण एक महत्वपूर्ण कर्तव्य है जिससे समाज में तथा फैक्टरियों और खेतों के मजदूरों, युवकों, महिलाओं, शिक्षकों एवं छात्रों की भूमिका काफी बढ़ जायगी।
समाज सुधार संगठनों और सामाजिक कार्रवाई ग्रुपों को भी जो सामाजिक न्याय का समर्थन करते हैं, लामबंद किया जाना है।
एक वामपंथी और लोकतांत्रिक विकल्प निर्मित करने के लक्ष्य के साथ वर्गीय तथा राजनीतिक ताकतों के सहसंबंधों में परिवर्तन लाया जाना है। केन्द्र में सत्ता प्राप्त करना बुनियादी कर्तव्यों को लागू करने की दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रगति होगी।
उपर्युक्त कर्तव्यों को कार्यान्वित करने तथा उसके लिए व्यापकतम सहयोग एवं एकता निर्मित करने में वामपंथ की भूमिका से उसकी प्रतिष्ठा तथा शक्ति में वृद्धि होगी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी इन जिम्मेवारियों को पूरा करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेगी।
शांतिपूर्ण पथ की संभावना
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ऐसी लोकतांत्रिक सत्ता तथा सुसंगत रूप से एक लोकतांत्रिक समाज हासिल करने का प्रयास करना चाहती है जो शांतिपूर्ण तरीकों से समाजवादी लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़े। एक शक्तिशाली जन क्रांतिकारी आंदोलन विकसित करके और सभी वामपंथी एवं लोकतांत्रिक ताकतों की व्यापक एकता निर्मित करके तथा एक ऐसे जन आंदोलन से समर्थित संसद में स्थायी बहुमत हासिल करके मजदूर वर्ग और उसके सहयोगी प्रतिक्रिया की ताकतों के प्रतिरोध को नाकाम करने एवं संसद को आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक ढांचे में मौलिक परिवर्तन लाने की जनता की इच्छा का एक यथार्थ उपकरण बनाने का भरसक प्रयास करेंगे।
उसके साथ ही क्रांतिकारी ताकतों के लिए आवश्यक है कि वे अपने को इस तरह से उन्मुख करें एवं कार्य करें जिससे वे सभी तरह की आकस्मिकताओं तथा देश के राजनीतिक जीवन में किसी तरह के उतार-चढ़ाव का सामान कर सकें।
समाजवाद की दिशा में संक्रमण
अपनी स्थापना के बाद से ही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने समाजवाद को स्वतंत्र भारत के भावी विकास का लक्ष्य स्वीकार किया। इस लक्ष्य को सुसंगत लोकतंत्र के जरिये उपर्युक्त कर्तव्यों को पूरा करके ही हासिल किया जा सकता है। जब उपर्युक्त कर्तव्यों को पूरा किया जायगा तो राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था उत्पादक शक्तियों के उच्च स्तर तथा उच्च उत्पादकता के साथ गतिशील, कारगर एवं स्व-उत्पादक होती जायेगी, जनता के मंगल-कल्याण के लिए विज्ञान तथा प्रविधि की उपलब्धियों को आत्मसात करेगी और करोड़ों जनता की पहलकदमी को व्यापकतम संभावनाएं प्रदान करेगी ताकि पिछड़ेपन की कठोर विरासत को दूर किया जा सके और हमारे विशाल भौतिक तथा मानव संसाधानों के पूर्ण इस्तेमाल के लिए परिस्थितियां निर्मित की जा सकें।
जब लोकतंत्र मजबूत होगा और उसका विस्तार होगा एवं जीवन के सभी क्षेत्रों में जनता को पूर्ण लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति प्रदान करेगा, सभी तरह के भेदभाव, असमानता तथा धर्म, जाति, लिंग एवं भाषा या जातियता के आधार पर सभी तरह के उत्पीड़न का उन्मूलन करेगा और उपर्युक्त प्रक्रियाओं में अधिकाधिक कारगर भूमिका अदा करेगा तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और समाजवाद का समर्थन करने वाली सभी अन्य शक्तियां भी मजबूत होंगी।
यह एक लंबी अवधि होगी जिसके दौरान देश को अनेक राजनीतिक संरचनाओं एवं गठबंधनों के दौर से गुजरना होगा जिसके जरिये प्रतिक्रिया की ताकतें हासिये पर आ जायेंगी और लोकतंत्र तथा समाजवाद की ताकतें अधिकाधिक ताकतवर होकर सामने आयेंगी।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी अपनी जिम्मेवारियां पूरी करते हुए अपने विचार-धारात्मक राजनीतिक आधार और जनाधार में भी काफी मजबूत होगी। इस तरह समाजवाद में संक्रमण के लिए वस्तुगत तथा आत्मगत परिस्थितियां परिपक्व होंगी।
इस पथ और भारतीय परिस्थितियों एवं वर्तमान ऐतिहासिक अवधि में समाजवाद की अवधारणा को पूरी सावधानी से विचार-विमर्श करके पुनर्परिभाषित किया जाना है। अभी यही कहा जा सकता है कि यह एक लोकतांत्रिक बहुसंरचनात्मक अर्थव्यवस्था के साथ जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र एक नेतृत्वकारी भूमिका अदा करेगी, मजदूर वर्ग के नेतृत्व में मजदूरों, किसानों, सभी अन्य मेहनतकश जनता, बुद्धिजीवियों और मध्यवर्ग का राज्य होगा।
किसान स्वामित्च को मूलगामी कृषि सुधार, कृषि विकास नीतियों के पूर्ण कार्यान्वयन और आर्थिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में स्वैच्छिक कोआपरेटिवों को प्रोत्साहन केआधार पर फलने-फूलने की पूरी सुविधाएं दी जायेंगी। औद्योगिक क्षेत्र में उत्पादन के साधनों का सामाजिक स्वामित्व नेतृत्वकारी भूमिका अदा करेगा जबकि निजी क्षेत्र, संयुक्त क्षेत्र, कोआपरेटिव क्षेत्र, लघु क्षेत्र साथ-साथ कायम रहेंगे और पूरी अर्थव्यवस्था में पारस्परिक रूप से हाथ बंटायेंगे। राज्य आर्थिक विकास को नियंत्रित करने और उसे बढ़ाने, जनता के मंगल-कल्याण को बढ़ाने, शोषण समाप्त करने, सामाजिक एवं क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करने, सार्वभौमिकता की रक्षा करने और आत्म-निर्भरता विकसित करने के लिए नियोजन की कार्यविधि का इस्तेमाल करेगा। यह एक मानवीय एवं न्यायोचित समाज होगा जिसमें सबों को समान अवसर प्रदान किया जायगा तथा लोकतांत्रिक अधिकारों की गारंटी दी जायेगी जो मनुष्य के शोषण को खत्म करने का मार्ग प्रशस्त करेगा, एक ऐसा समाज जिसमें मेहनतकश करोड़ों लोगों द्वारा उत्पादित धन पर कुछ लोगों द्वारा कब्जा नहीं किया जायगा।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवाद के विज्ञान को सुसंगत लोकतंत्र और समाजवाद की दिशा में अपने पथ को निर्धारित करने के लिए अपरिहार्य समझती है। वह भारतीय समाज को समझने एवं उसमें परिवर्तन लाने के एक उपकरण के रूप में मार्क्सवादी प्रणाली का इस्तेमाल करने का प्रयास करती है। कठमुल्लावादी तथा पुराने घिसे-पिटे विचार का परित्याग करते हुए वह अपना मार्ग निर्धारित करने के लिए इस विज्ञान तथा भारत की क्रांतिकारी विरासत से निर्देशित होती है जो हमारे देश की खास विशेषताओं, उसके इतिहास, परंपराओं, संस्कृति, सामाजिक संरचना तथा विकास के स्तर से निर्धारित होगा।
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