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बुधवार, 30 जून 2010
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भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक (हैदराबाद, 12 से 14 जून 2010) द्वारा पारित प्रस्ताव - श्रीलंका के तमिल लोगों की समस्याओं पर
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद श्रीलंका की तमिल समस्या, जिसका तमिलनाडु की राजनीति पर सीधा प्रभाव पड़ता है, से निपटने में भारत सरकार की घोषणाओं तथा कार्रवाईयों में असंगति और निर्मम रवैये पर निराशा प्रकट करती है। इसलिए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद भारत सरकार से अनुरोध करती है कि श्रीलंका के तमिल शरणार्थियों की दयनीय स्थिति पर विचार करे जो 1990 से ही लगातार तमिलनाडु आते रहे हैं और तमिलनाडु के शिविरों में जिनकी संख्या करीब चार लाख तक पहुंच गयी है तथा जिनकी देखभाल केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा की जा रही है।
चूंकि वे न तो श्रीलंका वापस जाने की स्थिति में हैं और न ही उन्हें भारतीय नागरिक माना जा रहा है, इसलिए वे एक कैप्टिव की जिंदगी जी रहे हैं, जिसका शीघ्र समाधान होना जरूरी है।
तमिलनाडु में रहने वाले शरणार्थियों को यह विकल्प देना चाहिए कि या तो वे श्रीलंका वापस चले जाएं या उन्हें भारत की नागरिकता दी जाए।
यद्यपि श्रीलंका सरकार ने घोषणा की है कि आतंकवाद के खिलाफ उनकी लड़ाई 17 मई 2009 को सफलतापूर्वक खत्म हो गयी, पर विस्थापित तमिल लोगों को, जिनकी संख्या साढ़े चार लाख है, एक साल से भी अधिक समय से विभिन्न शिविरों में कैप्टिव बनाकर रखा जा रहा है। यह मानवाधिकार उल्लंघन का स्पष्ट मामला है। इसलिए भारत सरकार की श्रीलंका सरकार से कहना चाहिए कि वह शिविरों को समाप्त करे तथा तमिल नागरिकों को अपनी पसंद की जगहों में वापस जाने देना चाहिए।
श्रीलंका सरकार ने अपने देश में लगभग सभी पिं्रट एवं इलेक्ट्रानिक मीडिया को बन्द कर दिया है। इसलिए लोगों को कुछ पता नहीं चल रहा है कि श्रीलंका में क्या हो रहा है यहां तक कि दूरदर्शन को भी श्रीलंका में काम करने की इजाजत नहीं हैं। श्रीलंका सरकार की इस घोर अलोकतांत्रिक कार्रवाई की निन्दा की जानी चाहिए तथा इन प्रतिबंधों को हटाने के लिए कदम उठाये जाने चाहिए ताकि वहां की वास्तविक स्थिति के बारे में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष रिपोर्ट प्राप्त की जा सकें।
भारत सरकार मानवीय आधार पर उदारतापूर्वक सभी प्रकार की सहायता दे रही है। हम भारत सरकार से अपील करते हैं कि वह एक भारतीय एजेंसी का गठन करें जो पुनर्वास कार्यक्रमों पर नजर रखेगी और उसमें हिस्सा लेगी तथा एक समय सीमा में स्थायी राजनीतिक समाधान के लिए काम करेगी।
चूंकि वे न तो श्रीलंका वापस जाने की स्थिति में हैं और न ही उन्हें भारतीय नागरिक माना जा रहा है, इसलिए वे एक कैप्टिव की जिंदगी जी रहे हैं, जिसका शीघ्र समाधान होना जरूरी है।
तमिलनाडु में रहने वाले शरणार्थियों को यह विकल्प देना चाहिए कि या तो वे श्रीलंका वापस चले जाएं या उन्हें भारत की नागरिकता दी जाए।
यद्यपि श्रीलंका सरकार ने घोषणा की है कि आतंकवाद के खिलाफ उनकी लड़ाई 17 मई 2009 को सफलतापूर्वक खत्म हो गयी, पर विस्थापित तमिल लोगों को, जिनकी संख्या साढ़े चार लाख है, एक साल से भी अधिक समय से विभिन्न शिविरों में कैप्टिव बनाकर रखा जा रहा है। यह मानवाधिकार उल्लंघन का स्पष्ट मामला है। इसलिए भारत सरकार की श्रीलंका सरकार से कहना चाहिए कि वह शिविरों को समाप्त करे तथा तमिल नागरिकों को अपनी पसंद की जगहों में वापस जाने देना चाहिए।
श्रीलंका सरकार ने अपने देश में लगभग सभी पिं्रट एवं इलेक्ट्रानिक मीडिया को बन्द कर दिया है। इसलिए लोगों को कुछ पता नहीं चल रहा है कि श्रीलंका में क्या हो रहा है यहां तक कि दूरदर्शन को भी श्रीलंका में काम करने की इजाजत नहीं हैं। श्रीलंका सरकार की इस घोर अलोकतांत्रिक कार्रवाई की निन्दा की जानी चाहिए तथा इन प्रतिबंधों को हटाने के लिए कदम उठाये जाने चाहिए ताकि वहां की वास्तविक स्थिति के बारे में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष रिपोर्ट प्राप्त की जा सकें।
भारत सरकार मानवीय आधार पर उदारतापूर्वक सभी प्रकार की सहायता दे रही है। हम भारत सरकार से अपील करते हैं कि वह एक भारतीय एजेंसी का गठन करें जो पुनर्वास कार्यक्रमों पर नजर रखेगी और उसमें हिस्सा लेगी तथा एक समय सीमा में स्थायी राजनीतिक समाधान के लिए काम करेगी।
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