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बुधवार, 6 अक्टूबर 2010
at 8:26 pm | 0 comments | अमर जीत कौर
मेरी मां मेरी दोस्त
मेरी मां कुलवंत कौर अत्यंत सहृदय एवं दयालु इंसान थी। हम बहनें और भाई, जब कभी वह हमारे इर्द-गिर्द होती या किसी अन्य स्थान को गयी होती, कभी भी उनसे दूर महसूस नहीं करते थे। अन्य लोग उनकी स्वागतमयी मुस्कान, हर किसी की जरूरत में मदद करने की उनकी भावना और हम बच्चों को उनकी तरफ से दी गयी आजादी की प्रशंसा करते थे। हम बचपन से ही इस पर बड़े गर्वित होते रहे हैं।
उन्हें और हमारे पिता कामरेड दीवान सिंह को कालोनी में आदर्श दम्पत्ति के रूप में माना जाता था। हम तो मां को ‘बीजी’ और पिता को ‘पापाजी’ कहते ही थे, हमारी कालोनी के भी लगभग सभी लोग-भले ही उनकी उम्र कितनी भी रही हो- उन्हें इसी तरह पुकारते थे। कालोनी में किसी परिवार में कोई झगड़ा हो या पड़ोसियों के बीच; लोग उम्मीद करते थे कि ‘बीजी’ और ‘पापाजी’ उनके मामले को अवश्य ही सुलझा देंगे।
हमारे घर को समझा जाता था कि यह घर शांति कायम कर देगा, इंसाफ करेगा और किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं करेगा। हमने अपने माता-पिता से ही सीखा कि जाति व्यवस्था में विश्वास न करें, सभी इंसानों को बरारबर समझें, सबका सम्मान करें। मेरे पिता कोई सरनेम नहीं लगाते थे। हमने भी उसका पालन किया। सभी धर्मों का सम्मान करना, किसी की आस्था को चोट न पहुंचाना-इसके पहले पाठ हमने अपने घर में ही पढ़े।
मां मेरे पापा से 11 वर्ष छोटी थी। जब हमारे पिता विभिन्न धर्मों, दर्शनों और इतिहास के बारे में बताया करते थे तो मां भी उसे सुनने हमारे साथ बैठ जाती।
हमें स्वतंत्रता संग्राम, भारत के विभिन्न भूमिगत क्रांतिकारियों की जीवन गाथाओं, विश्व में हो रहे परिवर्तनों और समाजवादी देशों की उपलब्धियों आदि के बारे में सुनने-जानने का अवसर मिला।
हमने देखा कि हर तरफ जो घटनाक्रम होता, मां उसमें बड़ी दिलचस्पी लेती, उन्हें समझती। बड़ी ग्रहणशील थी वह। वह पार्टी क्लासों में नियमित हिस्सा लेती जो समय-समय पर हमारे घर की छत पर ही ली जाती थी। मैं उस समय सेकंडरी स्कूल में पढ़ रही थी।
मुझे अपने बचपन के दिन याद हैं जब पंजाब एवं अन्य स्थानों के कामरेड हमारे घर आते रहते थे और मां हमेशा उनके स्वागत सत्कार में लगी रहती।
कुछ लोग विभिन्न कारणों से हमारे याहं काफी लम्बे अरसे तक भी ठहरे रहते। बाद में अनेक ऐसे मौके आये जब मैं लोगों को अपने यहां कुछ समय ठहरने के लिए बुलाती। मां उनके स्वागत-सत्कार में भी कभी कोताही नहीं करती थी। हम, उनके बच्चे ही उनकी इस उदारता का फायदा नहीं उठाते थे बाद में उनकी बहुओं ने भी उनकी इस उदारता का फायदा उठाया।
उन्हें तीसरे-चौथे दर्जें से आगे पढ़ने का मौका नहीं मिला था। पर सीखने की उनमें अपार क्षमता थी। अपनी लगन एवं इस क्षमता के बल पर वह न केवल हिंदी और पंजाबी के बल्कि अंग्रेजी के अखबार भी नियमित पढ़ने लगी।
कई बार तब मैं कुछ दिनों बाहर रहकर दिल्ली वापस आती तो वह मेरे लिए पढ़ने की सामग्री रखती, यह सोच कर कि कहीं ये बातें मेरे पढ़ने से न छूट जायें। वह विभिन्न राजनैतिक घटनाक्रमों के बारे में पूछती रहती थी और उन पर अपनी राय भी जाहिर करती।
हम बिना किसी हिचक अपनी सभी व्यक्तिगत समस्याएं उनके साथ साझा कर सकती थी। हमें उन पर भरोसा रहता था कि एक दोस्त की तरह हमें सलाह दंेगी।
वह बड़ी सादा, अत्यंत परदर्शी इंसान थी। हमारे सारे मिलने-जुलने वाले, हमारे सभी मित्र उन तक पहुंचते थे। सभी को वह सलाह देती।
उनकी उल्लेखनीय बात यह थी कि वह हर उम्र के लोगों के साथ घुल-मिल जाती, उनसे दोस्ताना कर लेती। सब उनके साथ सहज हो जाते। कोई औपचारिकता नहीं रहती थी।
1981 में मेरे पिता का. दीवान सिंह का निधन हो गया था। उसके बाद के इन तमाम 29 वर्षों में वह उसी निष्ठा के साथ न सिर्फ अपनी तमाम जिम्मेदारियां निभाती रही बल्कि उन्होंने हम भाईयों और बहनों के लिए भी बहुत कुछ किया ताकि हम अपने पसंद के रास्ते पर आगे बढ़ सकें। वह अत्यंत संवेदनशील थी, बेटे-बेटियों में भेदभाव नहीं करती थी। सबके साथ एक सा बरताव करती थी।
मेरे जीवन में उनकी बड़ी भूमिका रही। मैं तो पार्टी के कामकाज में अपना पूरा समय लगाती रही, उन्होंने मेरे बेटे का पालन-पोषण किया। अपने दामाद अरूण मिश्रा की वह बड़ी प्रशंसा करती थी। हम आज जो कुछ भी हैं उसके लिए उन्होंने जिस त्याग एवं निष्ठा का परिचय दिया, अपने अंतरंग क्षणों में हम उसे याद कर भावुक हो उठते हैं।
मेरी मां ही नहीं चली गयी, मुझे लगता है मेरी दोस्त भी मुझसे दूर चली गयी। ऐसी दोस्त जिसे मैं चाहती थी कि मेरे इर्द-गिर्द रहे।
- अमर जीत कौर
उन्हें और हमारे पिता कामरेड दीवान सिंह को कालोनी में आदर्श दम्पत्ति के रूप में माना जाता था। हम तो मां को ‘बीजी’ और पिता को ‘पापाजी’ कहते ही थे, हमारी कालोनी के भी लगभग सभी लोग-भले ही उनकी उम्र कितनी भी रही हो- उन्हें इसी तरह पुकारते थे। कालोनी में किसी परिवार में कोई झगड़ा हो या पड़ोसियों के बीच; लोग उम्मीद करते थे कि ‘बीजी’ और ‘पापाजी’ उनके मामले को अवश्य ही सुलझा देंगे।
हमारे घर को समझा जाता था कि यह घर शांति कायम कर देगा, इंसाफ करेगा और किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं करेगा। हमने अपने माता-पिता से ही सीखा कि जाति व्यवस्था में विश्वास न करें, सभी इंसानों को बरारबर समझें, सबका सम्मान करें। मेरे पिता कोई सरनेम नहीं लगाते थे। हमने भी उसका पालन किया। सभी धर्मों का सम्मान करना, किसी की आस्था को चोट न पहुंचाना-इसके पहले पाठ हमने अपने घर में ही पढ़े।
मां मेरे पापा से 11 वर्ष छोटी थी। जब हमारे पिता विभिन्न धर्मों, दर्शनों और इतिहास के बारे में बताया करते थे तो मां भी उसे सुनने हमारे साथ बैठ जाती।
हमें स्वतंत्रता संग्राम, भारत के विभिन्न भूमिगत क्रांतिकारियों की जीवन गाथाओं, विश्व में हो रहे परिवर्तनों और समाजवादी देशों की उपलब्धियों आदि के बारे में सुनने-जानने का अवसर मिला।
हमने देखा कि हर तरफ जो घटनाक्रम होता, मां उसमें बड़ी दिलचस्पी लेती, उन्हें समझती। बड़ी ग्रहणशील थी वह। वह पार्टी क्लासों में नियमित हिस्सा लेती जो समय-समय पर हमारे घर की छत पर ही ली जाती थी। मैं उस समय सेकंडरी स्कूल में पढ़ रही थी।
मुझे अपने बचपन के दिन याद हैं जब पंजाब एवं अन्य स्थानों के कामरेड हमारे घर आते रहते थे और मां हमेशा उनके स्वागत सत्कार में लगी रहती।
कुछ लोग विभिन्न कारणों से हमारे याहं काफी लम्बे अरसे तक भी ठहरे रहते। बाद में अनेक ऐसे मौके आये जब मैं लोगों को अपने यहां कुछ समय ठहरने के लिए बुलाती। मां उनके स्वागत-सत्कार में भी कभी कोताही नहीं करती थी। हम, उनके बच्चे ही उनकी इस उदारता का फायदा नहीं उठाते थे बाद में उनकी बहुओं ने भी उनकी इस उदारता का फायदा उठाया।
उन्हें तीसरे-चौथे दर्जें से आगे पढ़ने का मौका नहीं मिला था। पर सीखने की उनमें अपार क्षमता थी। अपनी लगन एवं इस क्षमता के बल पर वह न केवल हिंदी और पंजाबी के बल्कि अंग्रेजी के अखबार भी नियमित पढ़ने लगी।
कई बार तब मैं कुछ दिनों बाहर रहकर दिल्ली वापस आती तो वह मेरे लिए पढ़ने की सामग्री रखती, यह सोच कर कि कहीं ये बातें मेरे पढ़ने से न छूट जायें। वह विभिन्न राजनैतिक घटनाक्रमों के बारे में पूछती रहती थी और उन पर अपनी राय भी जाहिर करती।
हम बिना किसी हिचक अपनी सभी व्यक्तिगत समस्याएं उनके साथ साझा कर सकती थी। हमें उन पर भरोसा रहता था कि एक दोस्त की तरह हमें सलाह दंेगी।
वह बड़ी सादा, अत्यंत परदर्शी इंसान थी। हमारे सारे मिलने-जुलने वाले, हमारे सभी मित्र उन तक पहुंचते थे। सभी को वह सलाह देती।
उनकी उल्लेखनीय बात यह थी कि वह हर उम्र के लोगों के साथ घुल-मिल जाती, उनसे दोस्ताना कर लेती। सब उनके साथ सहज हो जाते। कोई औपचारिकता नहीं रहती थी।
1981 में मेरे पिता का. दीवान सिंह का निधन हो गया था। उसके बाद के इन तमाम 29 वर्षों में वह उसी निष्ठा के साथ न सिर्फ अपनी तमाम जिम्मेदारियां निभाती रही बल्कि उन्होंने हम भाईयों और बहनों के लिए भी बहुत कुछ किया ताकि हम अपने पसंद के रास्ते पर आगे बढ़ सकें। वह अत्यंत संवेदनशील थी, बेटे-बेटियों में भेदभाव नहीं करती थी। सबके साथ एक सा बरताव करती थी।
मेरे जीवन में उनकी बड़ी भूमिका रही। मैं तो पार्टी के कामकाज में अपना पूरा समय लगाती रही, उन्होंने मेरे बेटे का पालन-पोषण किया। अपने दामाद अरूण मिश्रा की वह बड़ी प्रशंसा करती थी। हम आज जो कुछ भी हैं उसके लिए उन्होंने जिस त्याग एवं निष्ठा का परिचय दिया, अपने अंतरंग क्षणों में हम उसे याद कर भावुक हो उठते हैं।
मेरी मां ही नहीं चली गयी, मुझे लगता है मेरी दोस्त भी मुझसे दूर चली गयी। ऐसी दोस्त जिसे मैं चाहती थी कि मेरे इर्द-गिर्द रहे।
- अमर जीत कौर
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