भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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गुरुवार, 20 मई 2010

”सम्मान“ के नाम पर हत्या करने वालों को सजा

हरियाणा की एक जिला सेशन अदालत ने कथित ‘सामाजिक सम्मान’ के नाम पर (आनर किलिंग) हत्या करने वाले 6 लोगों को कठोर सजा सुनायी है। 6 में से 5 को फांसी की सजा और एक को उम्र कैद की सजा सुनायी गयी है। हरियाणा और राजस्थान के कुछ हिस्सों में जाति पंचायत एवं ग्राम पंचायतों शादी और ऐसे ही मुद्दों पर फैसला सुनाने का अधिकार ले रखा है तथा फैसला नहीं मनाने वालों को जान तक से मारने की सजा सुनाती है।दर्दनाक घटनाऐसा ही एक मामला मनोज और बावली की शादी का था। “खाप पंचायत” ने जाति के बाहर शादी करने के लिए उनकी शादी को अवैध ठहराया था। पंचायत के फैसले के बाद दोनों ने सुरक्षा की गुहार करते हुए अदालत में अर्जी दी। अदालत में अर्जी देकर दोनों करनाल अपने घर लौट रहे थे तो जून 2007 में गांव वालों ने दोनों को बस से जबरन घसीट कर उतार लिया और हत्या कर दी। दोनों के शव नहर में पाये गये, दोनों के हाथ पैर बांध दिये गये थे। सेशन जज ने लड़की के भाई सुरेश, चचेरा भाई गौरव एवं सतीश तथा चाचा बासुराम और राजेन्द्र को फांसी की सजा सुनायी जबकि खाप पंचायत प्रधान गंगाराम को उम्र कैद की सजा सुनायी। बस के चालक पर अपहरण का आरोप लगाते हुए उसे सात साल की सजा सुनायी गयी। लड़के की मां ने अदालत की लड़ाई लड़ी। वह अदालत के फैसले से खुश नहीं है क्योंकि खाप पंचायत के अनेक दोषियों को छोड़ दिया गया। उन्हें षडयंत्र रचने के लिए सजा दी जानी थी।‘तहलका’ पत्रिका के अनुसार गांव की ये समानांतर अदालतें जाति के बहार शादी करने वालों को या तो निर्वासित जीवन बिताने के लिए बाध्य करते हैं या जान से मार डालते हैं। महीने में ऐसी करीब 12 हत्याएं होती हैं। इन जाति पंचायतों पर भ्रूण हत्या को बढ़ावा देने का आरोप है जिसके कारण हरियाणा में लिंग अनुपात काफी कम हो गया हैंकठोर रूढ़िवादिताइस तरह कट्टरपंथी जाति को एक शक्तिशाली हथियार के रूप में इस्तेामल करते हैं। ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान या उससे पहले भी जब न्यायिक प्रणाली का ढंाचा खड़ा नहीं हुआ था, इस प्रकार की जाति पंचायत की शुरूआत हुई होगी। तब न्यायपालिका संपत्ति के विवादों और आपराधिक मामले पर विचार किया करती थी। संभवतः मुगल एवं ब्रिटिश शासकों ने जातिगत मामलों में हस्तक्षेप करना मुनासिब नहीं समझा होगा। इस प्रकार जाति पंचायत परंपरागत रूप में शक्तिशाली हो गयी होगी। जाति पंचायत अंतर्रजाति शादी पर रोक लगाती है। यह एक ही गोत्र में शादी पर भी प्रतिबंध लगाती है। यदि कोई एक ही गोत्र में या अंतर्रजाति विवाह करता है तो जाति पंचायत की बैठक होती है जो शादी को तोड़ने का फैसला सुनाती है। यदि दंपत्ति और उसके परिवार वाले फैसला मानने से इंकार करते हैं तो उन्हें जाति से बाहर कर दिया जाता है और इसकी आधिकारिक घोषणा की जाती है। इसके बाद उनका सामाजिक बहिष्कार किया जाता है तथा उस परिवार के साथ कोई सामाजिक रिश्ता नहीं होता है। धोबी, नाई, दुकानदार कोई उनसे नाता नहीं रखता। शादी या किसी सामजिक समारोह का निमंत्रण उन्हें नहीं दिया जाता। हाल के वर्षों में इस मख्ययुगीन सामंती अदालत ने जाति पंचायत की मर्जी के खिलाफ शादी करने वालों पर हमला करना तथा उनकी हत्या करना जैसा घृणित काम करना शुरू कर दिया है। जाति पंचायत एक ही साथ अभियोजन, जज तथा फैलसे के लागू करने की भूमिका निभाती है।
- डा. बी.वी. विजयलक्ष्मी
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मंगलवार, 4 मई 2010

लो क सं घ र्ष !: खोने के लिए बेड़ियां और जीतने के लिए सारा जहान


1 मई हमारे लिए उन मजदूर साथियों और उनकी शहादत को याद करने का दिन है जो समूचे मजदूर-मेहनतकश तबके के हितों और हकों के लिए लडे, ज़ो साम्राज्यवाद-पूंजीवाद के रास्ते में चट्टान बनकर खडे हुए और समाजवाद के सपने को करोड़ों दिलों में बसा गए। 1 मई उस संकल्प को याद करने का भी दिन है कि ये समाज व्यवस्था, जो लालच, स्वार्थ, मुनाफे, भेदभाव और गैर-बराबरी पर टिकी है, ये हमें मंजूर नहीं। इसे हम बदल डालेंगे और एक ऐसा समाज बनाएंगे जहां इंसान का और श्रम का सम्मान हो, न कि पूंजी और मुनाफे का।
पिछले वक्त में जो महंगाई बढ़ी और जरूरी चीजों के दाम आसमान छूने लगे तो क्या कारखानों, खेतों में काम करने वाले मजदूरों ने मेहनत करनी कम कर दी थी? या कोई भयानक अकाल, बाढ या कौन सी तबाही सारी दुनिया में आ गई थी जिसकी वजह से सब कुछ तहस-नहस हो गया था? लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था। सारी दुनिया के मजदूर पहले की ही तरह, बल्कि पहले से भी ज्यादा मेहनत कर रहे हैं, लेकिन फिर भी एक तरफ उनका गला बढ़ती हुई महंगाई दबोचती है तो दूसरी तरफ से नौकरी छिन जाने की तलवार सिर पर लटकती रहती है। सब कहते हैं कि इन हालातों की वजह आर्थिक मंदी है, जो सारी दुनिया में संकट बनकर छाई है, लेकिन इस बात पर सभी पर्दा डालते हैं कि इस मंदी या आर्थिक संकट की वजह पूंजीवाद है, जिसका एकमात्र उद्देश्य मुनाफा कमाना है। आज अमरीका, यूरोप और दुबई से लेकर मुंबई, कोलकाता और गाजियाबाद, नोएडा, कोयंबतूर, इन्दौर, पीथमपुर, मालनपुर तक के मजदूर, छोटे कारखानेदार और छोटे व्यवसायी इस आर्थिक मंदी के शिकार होकर अपनी रोजी-रोटी खो बैठे हैं। वे जानते भी नहीं कि भरपूर मेहनत करने के बावजूद ऐसा उनके साथ क्यों हुआ। मुनाफे की होड़ में दनादन कर्ज बांटते गए अमरीकी बैंकों की गलतियों से अमरीकी अर्थव्यवस्था का जो दिवाला पिटा, उसका सबसे खराब नतीजा दुनिया भर के गरीब मजदूरों-किसानों को भुगतना पड रहा है।
उदारीकरण के नाम पर कंपनियों को ज्यादा मुनाफा कमाने की ढील और मजदूरों के जायज हकों में कटौती का जो दौर 20 बरस पहले शुरू हुआ था, वो अब और भी बेशर्म होकर गरीब जनता का शोषण कर रहा है। संगठित उद्योगों के भीतर कपड़ा मिलों के मजदूरों ने लगातार संघर्ष करते हुए जो जीत और मजदूरों के फायदे की जो उपलब्धियां हासिल की थीं, आज वे मजदूर सरकारी नीतियों और पूंजीपतियों की साझा साजिशों का शिकार होकर बेहद खराब जीवन स्थितियों से गुजर रहे हैं। कभी कपडा मिल में नौकरी मिलने को बैंक और शिक्षक की नौकरी से अच्छा माना जाता था। एक वजह तो यही थी कि कपडा मिलों में संगठित मजदूर आंदोलनों से नौकरी की सुरक्षा अधिक थी, कार्य स्थितियां बेहतर थीं, सामूहिकता का आनंद था और कारखाने में काम करना देश के लिए कुछ करने जैसा समझा जाता था। आज उन्हीं कपडा मिल मजदूरों के हाल ये हैं कि वे अपनी उम्र की अधेड़ अवस्था में कहीं प्राइवेट सुरक्षा गार्ड बनकर खडे हैं, कहीं सब्जी का ठेला लगा रहे हैं, कहीं पंचर जोड रहे हैं या कहीं किराए पर ऑटो रिक्शा चला रहे हैं। मिलें बंद हुए बरसों बीत गए लेकिन मिल मजदूरों को उनके हक की लडाई अभी तक लडनी पड रही है। जो इस सारी व्यवस्था से आजिज आ गए हैं, उनमें से अनेक हैं जिन्होंने अपने आपको निराशा में गर्क कर लिया है। उन्हीं की नई बेरोजगार पीढ़ी आसान शिकार बनती है साम्प्रदायिक, धार्मिक अंधविश्वास के कारोबारियों और अपराधी ताकतों का। इसके बावजूद ठीकरा मजदूर के सिर पर ही फोड़ा जाता है। इल्जाम लगाया जाता है कि मजदूरों की आरामतलबी और ट्रेड यूनियन राजनीति की वजह से कपड़ा मिलें घाटे में गईं। पूछा जाना चाहिए कि क्या अचानक देश की उन 112 कपड़ा मिलों में काम करने वाले मजदूर एकसाथ आरामतलब हो गए थे जिन्हें 1970 के दशक में बीमार घोषित कर नेशनल टेक्सटाइल कॉर्पोरेशन के अधीन लिया गया? दरअसल मालिकों ने करीब पांच दशकों तक इन मिलों से सैकड़ों गुना मुनाफा बनाया और जब मशीनें बदलने, नई तकनीक लाने और मजदूरों की जीवन स्थितियों पर खर्च करने की स्थिति आई तो उन्होंने कपड़ा मिलों को बीमार घोषित कर मजदूरों को सरकार के माथे पर थोपा, अपनी पूंजी मुनाफे के नए रोजगार में लगा दी। उद्योगों के अलावा सेवा क्षेत्र में भी कर्मचारी संगठनों ने कर्मचारियों के लिए बेहतर सेवा स्थितियों व उनकी नौकरी की सुरक्षा के सवाल को लेकर लगातार संघर्ष किया और कामयाबियां हासिल कीं। लेकिन पिछले दिनों जो रवैया सरकार और प्रबंधन ने स्टेट बैंक ऑफ इन्दौर के मामले में अपनाया, वो कर्मचारी संघर्षों के मामले में अभूतपूर्व है और ठोस सबूत है इस बात का कि मुनाफे की मंजिल हासिल करने के लिए पूंजीवादी राज्य व उसके पुर्जे किसी भी हद तक गिर सकते हैं। नब्बे वर्षों से लगातार लाभ में चल रहे स्टेट बैक ऑफ इन्दौर का विलय स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में कराने के लिए स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने न केवल पूरे देश में ख्यातिप्राप्त बैंक यूनियन को तोडा, बल्कि नियमों को ताक पर रखकर यूनियन के पदाधिकारियों के स्थानांतरण किए गए, अचानक विलय का प्रस्ताव लाया गया और उसे लागू कराने के लिए एडी-चोटी का जोर लगाया गया। आनन-फानन में प्रबंधन की बनाई एक दूसरी यूनियन को मान्यता दे दी गई। प्रबंधन के इस कार्य को निश्चित ही राज्य का समर्थन प्राप्त होगा। आज हमारा 'कल्याणकारी राज्य' सेठों और जमींदारों से ज्यादा दमनकारी हो गया है, बल्कि अब तो कंपनियां भी दमन करने के लिए अपनी प्राइवेट पल्टन रखने के बजाय राज्य को ही ठेका दे देती हैं। मध्य प्रदेश से लेकर असम, उडीसा, छत्तीसगढ, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश, सभी जगह यही हाल हैं।
बैंक, बीमा का क्षेत्र हो या बडे उद्योगों का, सभी जगह मुनाफा बढ़ाने के लिए आरी कर्मचारियों और मजदूरों के हितों पर ही चलाई जा रही है। अनेक मजदूर-कर्मचारी यह सोचते हैं कि उनकी नौकरी बची हुई है तो वे क्यों किसी संगठन की राजनीति का हिस्सा बनें। वे इस इतिहास से नावाकिफ हैं कि उन्हें हासिल होने वाली छुट्टियों, तनख्वाह वृद्धि, भविष्यनिधि, पेंशन व अन्य लाभ संगठित मजदूरों के अथक और लंबे संघर्षों का नतीजा हैं। और जैसे ही संगठित मजदूरों की ताकत कम होती है, पूंजीवाद दिए हुए सारे हक मजदूरों-कर्मचारियों से छीन लेता है। पूंजीवाद-साम्राज्यवाद की चाकरी करने के लिए संगठित मजदूर संघर्ष को तोड़ने में खुद सरकार भी कल्याणकारी होने के सारे नकाब उतार कर मजदूर विरोधी भूमिका में आ गई है। रोजगार बचाने की, संघर्षों से हासिल हुए हकों को बचाने की ये लडाई आज हर क्षेत्र के मजदूरों-कर्मचारियों के लिए बडी चुनौती बन गई है। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के प्रति तो मुनाफाखोर बाजार का रवैया और भी भयानक होता है। बीडी बनाने वाले, लघु उद्यागों में काम करने वाले, घरेलू कामकाज करने वाले, ठेला चलाने वाले, हम्माली करने वाले या इसी तरह के तमाम छोटे-बड़े कामों में दिन-रात पसीना बहाकर किसी तरह पेट पालने का जतन करते मजदूरों को रोजगार सुरक्षा और स्वास्थ्य-शिक्षा की सुविधाएं देना तो दूर, उल्टे उनके मुंह का निवाला भी छीना जा रहा है। खेती की हालत तो इससे भी ज्यादा खराब है। भूमिहीन मजदूरों और छोटे किसानों को जिन्दा रहने के लिए अधिकतर घर-परिवार छोड़कर पलायन करना पडता है और औनी-पौनी मजदूरी पर काम करके जीवन चलाना होता है। छोटे और मझोले किसानों के लिए भी खेती लगातार महंगी और मुश्किल होती जा रही है। खेती की बुरी हालत का इससे बडा क्या सबूत होगा कि सरकार खुद मान चुकी है कि पिछले 20 बरसों में 2 लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। इसके बावजूद देश में अरबपति बढ रहे हैं, कई कंपनियों का मुनाफा भी बढ़ रहा है, खिलाडियों की नीलामी वाला अरबों का आईपीएल क्रिकेट बढ रहा है, लेकिन रोजगार नहीं बढ़ रहा। ये सट्टेबाजी का ऐसा दौर है जिसमें उत्पादन कुछ नहीं हो रहा लेकिन पैसा बढ रहा है।
दो साल पहले अमरीका के राष्ट्रपति ने कहा था कि दुनिया में अनाज की कमी इसलिए आ रही है क्योंकि भारत और चीन के लोग ज्यादा खाने लगे हैं। इसी तर्ज पर कुछ और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने कहा है कि भारत के लोग जरूरत से ज्यादा खाते हैं। इस पर हमारी सरकार ये विचार कर रही है कि अभी गरीबों को जो थोड़ा-बहुत अनाज राशन की दुकानों से मिल जाता है, उसमें और कमी कर दी जाए। ऐसा सोचते हुए ये शर्म भी सरकार को नहीं आती कि खुद सरकार के ही अर्जुन सेनगुप्ता आयोग ने कहा है कि देश की 80 प्रतिशत से ज्यादा आबादी की हैसियत 20 रुपए रोज का खर्च करने की भी नहीं है।
एक तरफ सरकार बडी-बड़ी देशी-विदेशी कंपनियों को पूरे देश में कहीं भी आने और प्राकृतिक संपदा से लेकर मजदूरों के शोषण के लिए न्यौता दे रही है और दूसरी तरफ गरीबों से उनकी नमक रोटी भी छीन रही है। अपना हक मांगने वाले किसानों, मजदूरों, कथित विकास परियोजनाओं के विस्थापितों-पीडितों, आदिवासियों और दलितों-शोषितों के बजाय सरकार की चिन्ता ये है कि विदेशी कंपनी के बीटी बैंगन व अमरीका के फायदे के परमाणु समझौते की रुकावटें किसी तरह दूर हो जाएं।
इन बातों की चर्चा 1 मई के मौके पर इसलिए करना जरूरी है क्यों कि इतिहास गवाह है कि जब सत्ता इतनी अमानवीय और क्रूर हो जाती है तो लोगों के सब्र का पैमाना भी छलकने लगता है। ये असंतोष हम देश में हर जगह उफनता हुआ देख रहे हैं। पूंजीवाद लोगों के गुस्से से पहले तो दमन करके निबटता है। लेकिन जब गुस्सा इतना व्यापक और गहरा हो जाए कि जेलें और गोलियां भी कम पड ज़ाएं तो वो बेचैन शोषित लोगों को साम्प्रदायिक, जातीय, नस्लीय, भाषायी, क्षेत्रीय और तमाम तरह के झगडाें में उलझााने, बांटने और आपस में ही लडाने की कोशिशें करता है। दुनिया का सबकुछ हडप लेने की हवस में साम्राज्यवाद-पूंजीवाद न केवल मजदूरों के हक-अधिकारों को खत्म करना चाहता है बल्कि हमने देखा कि कैसे तेल की खातिर उसने अफगाानिस्तान, इराक, लेबनान, फिलिस्तीन और अन्य देशों के लाखों लोगों और बच्चों का कत्लेआम किया। 1 मई का दिन हमें ये याद दिलाता है कि पूंजीवाद को मेहनतकश जनता की सामूहिक ताकत के सामने आखिरकार झुकना पडता है। सन् 1886 की 1 मई को अमरीका के शिकागो शहर के हे मार्केट में जुलूस निकालते निहत्थे मजदूरों पर गोलियां चलाई गयीं और अनेक मजदूर मारे गए। बाद में चार मजदूर नेताओं को फांसी की सजा दी गई। उनका कसूर सिर्फ ये था कि वे काम के घंटे आठ किए जाने की मांग कर रहे थे। उस वक्त औद्योगिक क्रांति हुई ही थी और नए-नए उद्योग लग रहे थे। मजदूरों से गुलामों की तरह 12-14 घंटे बेहिसाब काम लेना आम बात थी। 1 मई को शहीद हुए उन मजदूर साथियों के खून से रंगा वो लाल झण्डा सारी दुनिया के मजदूर आंदोलन को सुर्ख रंग दे गया। उसके बाद से मजदूर आंदोलन तेज होता गया और तमाम संघर्षों के साथ कामयाबी की सीढ़ियां चढता गया। आज पूंजीवाद फिर अपने मुनाफे की खातिर मजदूरों से वो सारी उपलब्धियां छीन लेना चाहता है जो उन्होंने पीढियों के संघर्ष और अपना खून बहाकर हासिल की हैं। 1 मई हमारे लिए उन मजदूर साथियों और उनकी शहादत को याद करने का दिन है जो समूचे मजदूर-मेहनतकश तबके के हितों और हकों के लिए लडे, ज़ो साम्राज्यवाद-पूंजीवाद के रास्ते में चट्टान बनकर खडे हुए और समाजवाद के सपने को करोड़ों दिलों में बसा गए। 1 मई उस संकल्प को याद करने का भी दिन है कि ये समाज व्यवस्था, जो लालच, स्वार्थ, मुनाफे, भेदभाव और गैर-बराबरी पर टिकी है, ये हमें मंजूर नहीं। इसे हम बदल डालेंगे और एक ऐसा समाज बनाएंगे जहां इंसान का और श्रम का सम्मान हो, न कि पूंजी और मुनाफे का। 1 मई यह याद करने का भी दिन है कि शोषण के खिलाफ लडी ज़ा रहीं तमाम लंडाइयां शोषणविहीन समाज की स्थापना के व्यापक संघर्ष का ही हिस्सा हैं और हम सब मिलकर पूंजीवाद को उखाड़ फेंकने में जरूर कामयाब होंगे। इसी सपने की खातिर लडी ज़ाने वाली लड़ाइयों के लिए इंकलाबी शायर फैज अहमद फैज ने लिखा था -

यूं ही हमेशा जुल्म से उलझती रही है खल्क (जनता) उनकी रस्म नई है अपनी रीत नई यूं ही हमेशा खिलाए हैं हमने आग में फूल उनकी हार नई है अपनी जीत नई।


विनीत तिवारी

देशबन्धु से साभार
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शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

उनकी हार नई है न अपनी जीत नई

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मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

CPI CONGRATULATES PEOPLE ON THE

Communist Party of India
CENTRAL OFFICE
Ajoy Bhavan, Phones(91-11)23235546,23235099, 23235058
15 Indrajit Gupta Marg, New Delhi.110002 Fax (91-11) 23235543
e-mail: :cpiofindia@gmail.com

General Secretary: A.B. Bardhan
27th April 2010

Press Release

The Central Secretariat of the Communist Party of India has issued the following statement to the press:


CPI CONGRATULATES PEOPLE ON THE
SUCCESS OF THE HARTAL

The Communist Party of India congratulates the people of all over the country who have responded to the call of Hartal against high prices and in protest against Government’s failure to take any steps for bringing down the high prices.

The Party expresses its grateful thanks to all the 13 Parties who have done everything to make the Hartal a success and also to other Parties who came out in support of the Hartal. This is a vivid example of the common man’s indignation and discontent, and the success owes it to the united action of all who made it their common cause. Even now the UPA Government should take this into account and take the necessary steps which the Left and other Parties have all along been proposing.

This is not the end of the struggle. The Parties will meet soon on a date which will be fixed after consultations to decide the next step which they together will take to force the hands of the Government.



(Kshetra Panda)
Office Secretary
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भारत बंद पर सहयोग के लिए जनता का शत शत नमन

लेफ्ट पार्टिओं के साथ-साथ ९ अन्य दलों द्वारा महंगाई के खिलाफ आज बंद के आह्वान पर पूरा उत्तर प्रदेश बंद रहा। लखनऊ में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कैसरबाग स्थित कार्यालय से भाकपा कार्यकर्ता जुलूस में बंद करते हुए निकले और लोक दल के कार्यालय पर लोक दल, इंडियन जस्टिस पार्टी, लोक जन शक्ति पार्टी के कार्यकर्ता भी शामिल हो गए और जुलूस ने विधान सभा के सामने होते हुए हजरतगंज की तरफ बढ़े जहाँ पर पुलिस ने बैरिकेड लगा कर रोकने का प्रयास किया। कुछ समय तक प्रदर्शनकारियों और पुलिस में धक्का मुक्की हुई। उसके बाद प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार कर पोलिस लाइन ले जाया गया। प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व करने वाले प्रमुख नेता थे भाकपा राज्य सचिव डॉ गिरीश, लोक दल के अध्यक्ष राम आसरे वर्मा, इंडियन जस्टिस पार्टी के अध्यक्ष काली चरण, एल जे पी की चित्रा सिंह, भाकपा के मंत्रिपरिषद सदस्य विश्व नाथ शास्त्री, कार्यकारिणी सदस्य अरविन्द राज स्वरुप, प्रदीप तिवारी, सदरुद्दीन राणा, सुरेन्द्र राम आदि.
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सोमवार, 26 अप्रैल 2010

वर्कला राधाकृष्णन का निधन

खास खबर ने आज छापा है :
तिरूवनंतपुरम। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के वयोवृद्ध नेता वर्कला राधाकृष्णन का सोमवार सुबह निधन हो गया। वह 82 वर्ष के थे।
पार्टी के एक अधिकारी ने बताया कि राधाकृष्णन को पिछले सप्ताह अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। रविवार को उनकी हालत बिग़ड जाने पर उन्हें तिरूवनंतपुरम मेडिकल कॉलेज के आईसीयू ले जाया गया जहां सोमवार सुबह उन्होंने दम तो़ड दिया। उनका अंतिम संस्कार सोमवार रात करीब 9.30 बजे होगा। राजनीति में राधाकृष्णन के केरियर की शुरूआत वर्ष 1952 में ग्राम परिषद के प्रमुख के रूप में हुई। वह 1980 से 1996 तक केरल विधानसभा के सदस्य रहे। 1987 से 1991 के दौरान वह विधानसभा अध्यक्ष थे। वर्ष 1998 से वह चिरयांकीझु लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे थे।
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कल अजमेर बंद का ऎलान

http://www.pressnote.इन ने आज छपा है
26 Apr, 2010 08:14 AM अजमेर। महंगाई के खिलाफ 27 अप्रेल को भारत बंद के समर्थन में वाममोर्चा समर्थक दलों ने अजमेर बंद का ऎलान किया है। बंद की तैयारियों को लेकर अजमेर-मेरवाडा गण परिषद अध्यक्ष सज्जनसिंह चौधरी की अध्यक्षता में बैठक आयोजित की गई। जिसमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के रमेश टेलर, फारवर्ड ब्लाक के धर्मेंद्र लालवानी, जन ??ा दल के घनश्यामसिंह राठौड, जनता दल 'यू' के सी।पी। कोली, समाजवादी विचार मंच के अब्दुल सलाम कुरैशी, बहुजन समाज पार्टी के दयाशंकर राठौडिया, अजमेर-मेरवाडा गण परिषद से अजयपाल, एमएमटी वर्कर्स यूनियन के हरिभाई शर्मा, असंगठित मजदूर एकता यूनियन के के। प्रवीण, सीपीएम के दिनेश गौड, आर।सी. गुप्ता ने भाग लिया। दवाई की दुकानों, दूध-सब्जी विके्रताओं और शिक्षण संस्थाओं को बंद से अलग रखा गया है।
http://www.pressnote.in/hindi/readnews.php?id=76680
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भारत बंद कल

प्रभात खबर ने आज छपा है :
नयी दिल्ली : वामपंथी पार्टियों तथा राष्ट्रीय जनता दल समेत 13 दलों की दिल्ली इकाइयों के नेताओं ने महंगाई के विरोध में कल (मंगलवार) आयोजित भारत बंद की तैयारियों के सिलसिले में आज यहां बातचीत की. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) की दिल्ली इकाई के प्रवक्ता ने बताया कि 13 पार्टियों की दिल्ली शाखा ने कल होने वाले राष्ट्रव्यापी बंद की तैयारियां शु कर दी है. जो पार्टियां कल के भारत बंद में शामिल हो रही हैं उनमें माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय लोक दल, तेलुगू देशम पार्टी, अखिल भारतीय फ़ारवर्ड ब्लॉक, रिवोल्युशनरी सोशलिस्ट पार्टी, जनता दल (एस), लोक जनशक्ति पार्टी, अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुन्न्ोत्र कड़घम, इंडियन नेशनल लोक दल और असम गण परिषद पार्टी भी शामिल हैं. गौरतलब है कि इन 13 गैर कांग्रेसी एवं गैर भाजपाई राजनीतिक दलों ने महंगाई के विरोध में कल संसद में कटौती का प्रस्ताव लाने की भी घोषणा की है. माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो के सदस्य सीताराम येचुरी ने कहा कि आवश्यक वस्तुओं खाद्य, डीजल व उर्वरक आदि के मूल्यों में बेतहाशा वृद्धि हुई है. इसके विरोध में यह बंद आयोजित किया जा रहा है. राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष अजित सिंह ने कहा कि तीसरा मोर्चा एकजुट है और 27 अप्रैल को वह संसद में कटौती का प्रस्ताव लाकर सरकार को घेरेगा. उन्होंने कहा कि सरकार की गलत नीतियों के कारण ही देश में महंगाई बढ़ी है जिसने आम आदमी की कमर तोड़ दी है.
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Anti-price hike strike fixed on April 27

The Sanghai Express published today :
Imphal, April 25 2010: The nation-wide strike being planned by Opposition political parties in protest against escalating price of essential commodities would be joined by the working class of Manipur, said national Secretary of Communist party of India L Sotinkumar.Speaking to newspersons at the irabot Bhavan office of the CPI today, Sotinkumar said the day-long general strike planned for April 27 would be joined by employees/workers of State-based banks, LIC, medical representatives, pharmacists, women vendors, drivers, rickshaw pullers and employees of some flight services.Contending that budgetary provisions of the Congress-led UPA Government is anti-poor, the CPI functionary also alleged that rather than take a holistic look on the negative points being pointed out by Left parties against the Central Government's economic policy, the Communist parties are being projected in poor light.Informing that the strike centred around cessation of economic activities would be held from 6 am till 4 pm, he also disclosed that in continuation of the protest against hike in prices of essential commodities Left parties would insist on a cut motion discussion on the issue.The cut motion with support of 13 opposition political organisations would proposed for a voice vote failing which the entire opposition MPs are ready to stage a walk-out, Sotinkumar maintained.Joining the media briefing, CPI state Secretary Sarat Salam confided that the cut motion would have the support of 278 MPs.All India Forward Block secretary Kh Gyaneswor and RSP secretary N Ratan were also presented at the briefing.
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Even Indian diaspora not free of caste bias, says Raja


The Hindu today published the following news :


डी. Raja, National Secretary of the Communist Party of India (CPI), said that the caste system and untouchability are deep rooted even among the Indian diaspora.


He was speaking at the State conference of the CPI at Chidambaram near here on Saturday to mark the birth anniversary of B.R. Ambedkar.
In an era of neo-liberalism, Dalits were put to hardship and the new economic policy had worsened their plight. Mr. Raja said that communists were fighting social ills and if Ambedkar were alive, he would have associated with the communists because he had striven to create a casteless society.
State Secretary of the CPI, D. Pandian, said that caste had become inalienable from birth to death. Even after conversion, it would not fade away.
Horrendous crimes were committed in the name of “honour killings” to do away with youngsters who married ignoring caste delineations.
Unless a genuine social transformation occurred, it was difficult to eradicate untouchability, he said.
Veteran communist leader R. Nallakannu deplored the double-tumbler system and denial of entry to temples that still existed in Tamil Nadu.
Mr. Nallakannu said that the Dalits could not wage a solitary battle; they had to align with like-minded organisations.
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Bharat Bandh against price rise tomorrow


http://www.mynews.in/ ने निम्न समाचार प्रकाशित किया है :


New Delhi: Delhi units of 13 parties, including Communist Party of India (CPI) and Rashtriya Janta Dal (RJD), met here today to discuss the nationwide strike against price rise tomorrow।


''Delhi chapter of 13 parties met today to intensify preparations for the nationwide strike which is on April 27,'' a CPI, Delhi, spokesperson said.
Workers and activists of CPI, CPI (Marxist), RJD, Samajwadi Party (SP), Rashtriya Lok Dal (RLD), Telugu Desam Party (TDP), All India Forward Bloc (AIFB), Revolutionary Socialist Party (RSP), Janta Dal (Secular), Lok Janshakti Party (LJP), All India Anna Dravida Munnetra Kazhagam (AIADMK), Indian National Lok Dal (INLD) and Asom Gana Parishad (AGP) will take out a procession tomorrow in various parts of Delhi to protest the rising prices of essential commodities.
''The procession is to spread the message that the Government's failure to control hoarding, black marketing and future trading in grains is the root cause of continuous rise in prices of essential commodities,''the spokesperson added.
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मई दिवस की चुनौतियां

मई दिवस काम के घंटे कम करने के संघर्षों की प्रारंभिक घटनाओं से संबंधित है। हर साल की पहली मई शिकागो में सन् 1885 की मई के रक्रंजित प्रथम सप्ताह की उन घटनाओं की याद दिलाती है। मजदूरों की मांग थी काम के घंटे कम किये जायें और आठ घंटे काम के, आठ घंटे परिवार के और आठ घंटे आराम के माने जाये। बाद के दिनों में तकनीकी विकास के फलस्वरूप कार्यदिन और भी कम करने की मांग उठने लगी। कई कार्यालयों में साप्ताहिक छुट्टी और काम के घंटे और भी कम किये गये। भारत के 5वें श्रम सम्मेलन में साप्ताहिक छुट्टी के साथ सप्ताह में 48 घंटे तय किये गये। लेकिन अब यह सब बीते दिनों की बात हो गयी। 60 और 70 के दशक के वैज्ञानिक तकनीकी क्रान्ति के बाद उल्टी गंगा बहने लगी। वैज्ञानिक तकनीकी उपकरण के अविष्कार के बाद आशा की जाती थी कि मजदूरों के कार्य हल्के होंगे, खतरनाक काम आसान होंगे और नये रोजगार के अवसर बढे़गे, किन्तु इन सभी आशाओं पर तुषारापात हो गया और तमाम अपेक्षाओं के प्रतिकूल नियोजकों ने कार्य दिवस अत्यधिक बढ़ा दिये हैं तथा कार्यदशा बद से बदतर किये है। वैज्ञानिक तकनीकी क्रान्ति की उपलब्धियों को पूंजीपतियों ने हाथिया लिया हैं और उनका इस्तेमाल वे अपने वर्ग स्वार्थ में करते हैं।भारत सरकार के श्रम मंत्रालय के अधिनस्थ वी वी गिरी राष्ट्रीय श्रम संस्थान ने नोएडा और गुडगांव में अत्याधुनिक तकनीकी के बीपीओ (बिजनेस प्रोसेसिंग आउटसोर्सिंग) और कालसेंटरांे में कार्यरत आधुनिकतमपरिधानों में सजे-सवरें शूटेड-बूटेड नवकार्य-संस्कृति के कर्मचारियों (दरअसल इन्हें कर्मचारी पुकारा जाना पसंद नहीं) की कार्यदशा का अध्ययन किया है। संस्थान के शोधकर्ता िवद्धानों ने विस्तृत छानबीन के बाद अपने तथ्यपूर्ण शोधगं्रथ में उजागर किया है कि कॉल सेंटरों में काम करने वालों की कार्यस्थिति प्राचीन रोम के गुलाम जैसी है। इन्हें प्रतिदिन प्रायः दस घंटे (और ज्यादा भी) बंदी अवस्था में काम करना पड़ता है। इससे नाना प्रकार की नयी शारीरिक एवं मानसिक बीमारियां परिलक्षित हो रही है। आईसीआईसीआई जैसी बैंकिंग कारोबार में भी काम करनेवालों के घंटे निर्धारित नहीं है और इन्हें 10 घंटे और इससे ज्यादा भी रोजाना काम करना पड़ता है। यह अलग-थलग अकेली घटना नहीं है।मैन्यूफैक्चरिंग उद्योग में ठेकाकरण, आउटसोर्सिंग और पीसरेट सिस्टम चल पड़ा है, जहां काम के घंटे निर्धारित नहीं है। उत्पादन प्रक्रिया में मूलचूल बदलाव आया है। कारखानों की भीड़भाड़ कम करके ‘लीन मॉडल’ अपनाया जा रहा है, जिसमें कुछेक अतिकुशल मजदूरों को कार्यस्थल में बुलाकर शेष काम ठेके पर बाहर वहां भेज दिये जाते हैं, जहां किसी प्रकार का श्रम कानून लागू नहीं है। अगर नियमानुसार श्रम कानून लागू भी है तो उसके अनुपालन की बाध्यता नही है। वैज्ञानिक तकनीकी क्रान्ति के बाद मजदूर वर्ग की अपेक्षाएं थी कि उनके कार्यबोझ कम होंगे, उनके आराम तथा रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, किंतु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। वैज्ञानिक उपलब्धियां महाकाय कार्पोरेटियों की चेरी बनकर रह गयी। इसीलिए काम के घंटे कम करने का संघर्ष टेªड यूनियन आंदोलन के सामने प्राथमिक महत्व का है।सन् 1990 में 10 प्रतिशत कर्मचारी कानून सम्मत सामाजिक सुरक्षासुविधाओं के दायरे में आते थे। वह संख्या सरकारी आंकड़ों के मुताबिक सन् 2000 में सात और 2005 में 5।66 प्रतिशत हो गयी। गैरसरकारी अनुमानों के मुताबिक आज 2010 में महज 5 प्रतिशत कर्मचारियों को कानूनी सामाजिक सुरक्षा की सुविधाएं प्राप्त है। इससे यह तथ्य सिद्ध होते हैं कि सन् 1990 के बाद के वर्षों में कोई तीन करोड़ मजदूर और कर्मचारी कानूनी सामाजिक सुरक्षा के दायरे से बाहर धकेल दिये गये।सामाजिक सुरक्षा संवैधानिक मानवधिकार है, जिसकी खुलेआम हत्या की जा रही है। पूंजीपति नियोजक और राज्य सत्ता के मेलजोल से सुविचारित अर्थनीति अख्तियार की गयी जिसके तहत उत्पादन प्रक्रिया में गैरकानूनी फेरबदल करके लोगों को रोजगार से निकाल बाहर किया जा रहा है। सन् 1991 में घोषित नई आर्थिक नीति स्थायी रोजगार को अस्थायी (टेम्पररी) और आकस्मिक (कैजुअल) बनाता और मजदूरों को टिकाऊ रोजगार तथा भरोसे की आय से वंचित करता है। यह गैरकानूनी प्रतिगामी कदम है जो इतिहास के चक्के को पीछे घुमाने पर अमादा है। औद्योगिक विवादअधिनियम की धारा 9ए एवं मजदूरपक्षी श्रम कानूनों को निष्क्रिय किया गया है। इस तरह काम का घंटा कम करने के साथ जीने लायक पारिश्रमिक और टिकाऊ रोजगार हासिल करने का संघर्ष मजदूर वर्ग के समक्ष दूसरी चुनौती आ खड़ी हुई है।हाल के दिनों में मंदी के नाम पर मजदूरों की छटनी बड़े पैमाने पर की गयी। मंदी, मुक्त बाजार व्यवस्था की देन है। इसका जिम्मेदार स्वयं पूंजीपति है मजदूर नहीं। जिस कृत्य का जिम्मेदार मजदूर नहीं उसकी मार मजदूर क्यों भुगते? मजदूरों के कंधे पर मंदी का हल बर्दाश्त-ए-काबिल नहीं है। इसीलिए रोजगार की सुरक्षा की तीसरी चुनौती मजदूर वर्ग के सामने दरपेश है।उपभोक्ता सामानों का दाम बढ़ाकर मुनाफा कमाना पूंजीपति वर्ग का अजमाया हुआ हथियार है। मजदूर वर्गीय संघर्षो से हासिल पारिश्रमिक वृद्धि को चीजों के दाम बढ़ाकर पूंजीपति वर्ग वापस छीन लेता है। महंगाई के मुद्दे पर आमजनों के हितों के साथ मजदूर वर्गीय हित अभिन्न रूप से जुड़ा है। मजदूर वर्ग के सामने यह महंगाई चौथी चुनौती है कि मजदूर वर्ग आम जनों के दुखों के साथ एक होकर वर्ग दुश्मनों की पहचान करे और उन्हें शिकस्त देने के लिए एकताबद्ध संघर्ष करे। सभी संकेत बताते हैं कि आनेवाले दिनों में देहात से शहर की ओर और पिछड़े इलाके से उन्नत क्षेत्र की तरफ जाने लायक रोजगार की तलाश में लोगों का पलायन और भी तेज होगा। इसके साथ ही उद्योग जगत में स्थायी रोजगार से अस्थायी और औपचारिक से अनौपचारिक उत्पादन पद्धति का प्रचलन भी बढ़ेगा। उत्पादन प्रक्रिया में ऐसे बदलाव की रफ्तार अधिकाधिक मुनाफा के निमित्त बढ़ाया जा रहा है। फलतः प्रवासी मजदूरों और अनौपचारिक श्रमजीवियों की बढ़ती तादाद को संविधान प्रदत्त सामाजिक सुरक्षा मुकम्मिल कराने का संघर्ष टेªड यूनियन आंदोलन के समक्ष पांचवी चुनौती है।देश के हर क्षेत्र में कार्पोरेट गवर्नेस का बाजार गर्म है। खुदरा बाजार का कार्पोटीकरण यहां तक कि कृषि क्षेत्र को भी कार्पोरेट के हवाले किया जा रहा है। कार्पोरेट गवर्नेस जिस गति से मजबूत हो रहा है, हमारा लोकतंत्र उसी क्रम में कमजोर हो रहा है। लोकतंत्र और कार्पोरेट सहयात्री नहीं बन सकते। लोकशाही और पूंजीशाही मूल रूप में विपरीतार्थक और परस्पर विरोधी दिशा है।देश की संसद को दरकिनार कर अंतराष्ट्रीय समझौते किये जा रहे हैं। संविधान के प्रावधानों के अंतर्गत कृषि राज्यों के मामले हैं, किन्तु राज्य विधान सभाओं और पार्लियामेंट की पीठ पीछे विश्व व्यापार संघ के समझौते पर हस्ताक्षर किये गये। सन् 1956 में संसद के दोनों सदनों द्वारा सर्वसम्मति से पारित औद्योगिक प्रस्ताव को नयी आर्थिक नीति की सरकारी घोषणा में खारिज कर दिया गया। मुक्त बाजार व्यवस्था को अपनाकर संविधान में वर्णित उदात्त समाजवादी आदर्शों की तिलांजलि दे दी गयी है। आत्मनिर्भर स्वावलंबी राष्ट्रीय अर्थतंत्र को साम्राज्यवादी वैश्वीकरण पर निर्भर बना दिया गया है। चंद व्यक्तियों के हाथों में पूंजी का संकेद्रण तेज गति से हो रहा है। विकास का लाभ देश के कुछेक व्यक्तियों तक सीमित है। देश का विशाल बहुमत विपन्न है। देश की संसद में करोड़पतियों ने बहुमत बना लिया है। इसलिए लोकतंत्र के क्षरण को रोकना और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को सुदृढ़ करना मजदूर वर्ग के सामने निर्णायक चुनौती है। हमें आर-पार की लड़ाई लड़नी है। तो आइये 2010 के मई दिवस के अवसर पर इन चुनौतियों का सामना करने और आम आदमी के हक में खुशहाल भारत बनाने का सामूहिक संकल्प लें।
- सत्य नारायण ठाकुर
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पॉकेटमार बजट

यह बजट क्या है? एक छलावा है, ईमानदार की जेब काटकर बेईमानों के पॉकिट में पैसे डालने की कला है। इसीलिए तो उद्योग जगत ने इस कलाबाजी के लिए वाह-वाह कहा तो आम आदमी में त्राहिमाम मचा है।हरेक बजट का एक राजनीतिक दर्षन होता है। वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने उस दर्षन का संकेत अपने बजट भाषण के प्रारंभ में ही कर दिया कि बजट का फोकस सार्वजनिक क्षेत्र से हटकर निजी खिलाड़ियों (प्राइवेट एक्टर्स) की तरफ किया गया है और उसमें सरकार की भूमिका सहायक की होगी।असंगठित मजदूरों के लिए अर्जुन सेनगुप्ता कमीषन ने कम से कम 32 हजार करोड़ की सामाजिक सुरक्षा निधि की मांग की थी, किंतु इसके लिए बजट में मात्र एक हजार करोड़ के कोष का प्रावधान किया गया है। यह ऊंट के मुंह में जीरा समान है। बजट में सरकारी अस्पतालों, चिकित्सा एवं षिक्षा के पुराने बजटीय आबंटन पर भी कैंची चलायी गयी है। उपकरणों के बढ़े दामों के मद्देनजर पिछले वर्षों के बजट प्रावधानों के मुकाबले इस बजट में कम रकम आबंटित की गयी है। जीवनोपयोगी सामानों के बढ़ते दामों से जनता त्राहि-त्राहि कर रही है। महंगाई कम करने का कोई ठोस उपाय नहीं किया गया है। उल्टा परोक्ष कर का भार बढ़ाकर जले पर नमक छिड़का गया है।मोटी आयवालों को टैक्स चुकाने में रियायतें दी गयी हैं, वहीं उससे कई गुना ज्यादा परोक्ष कर लगाया गया है, जिससे महंगाई बढ़ेगी ही। इससे भूखों और कुपोषणों की संख्या बढ़ना निष्चित है। कार्पोरेट सेक्टर को मंदी के नाम पर दिया गया प्रोत्साहन पैकेज बंद किया जाना चाहिए था, क्योंकि उसका दुरूपयोग मुनाफा लूटने में किया जा रहा है। प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री ने अपील की थी कि मजदूरों की छंटनी नहीं की जाय? लॉक-आउट और ले-ऑफ रोके जायें, किंतु उद्योग जगत ने इस अपील की पूरी तरह उपेक्षा कर दी। फलतः रोजगार का भारी नुकसान जारी रहा। कार्पोरेट सेक्टर पर नये टैक्स लगाने के बजाय बजट में उन्हें रियायतें दी गयी है। अगर कल्याण योजनाओं के लिए पैसों की कमी है तो उद्योगपतियों पर टैक्स क्यों नहीं लगाये गये, जिन्होंने हाल के दिनों में मोटे मुनाफे कमाये हैं?आयात-निर्यात करनेवाले उद्योगपतियों को नयी रियायतें दी गयी हैं। उनके टैक्सों में नयी छूटें दी गयी है। आयात कर में कटौती की गयी है। विदेषी सामानों के आयात पर लगने वाली कस्टम डयूटी आधी कर दी गयी। फलतः विदेषी माल हमारे घरेलू बाजार में और भी धड़ल्ले से आयेंगे। इसका हमारे कल-कारखानों के उत्पादान पर विपरीत असर अवष्यंभावी है। यह अहसास किया जाना चाहिए कि आयात कर में कटौती करना न केवल विदेषी मालों को आमंत्रण देना है, बल्कि यह देष के अंदर बेरोजगारी का सीधा आयात करना है।जीडीपी बढ़ाकर दो अंकों में करने का लक्ष्य रखा गया है, किंतु जीडीपी का संबंध रोजगार बढ़ाने से नहीं जोड़ा गया है। इस प्रकार की जीडीपी बढ़ने से देष की संपदा कुछेक व्यक्तियों के हाथों में सिमटती जा रही है। यह भारतीय संविधान के उन निदेषक सिद्धातों के विपरीत है, जिसमें धन के कुछेक व्यक्तियों के हाथों में संकेन्द्रण की मनाही की गयी है। जीडीपी को आम जनता की खुषहाली के साथ जोड़ा जाना चाहिए। पूंजीपतियों की खुषहाली और आम आदमी की बदहाली भारतीय संविधान के समाजवादी लक्ष्यों का निषेध है।पेट्रोल-डीजल पर दाम बढ़ाना जनता की गाढ़ी कमाई पर डाका डालना है। रेलमंत्री ममता बनर्जी एक तरफ रेल भाड़ा नहीं बढ़ाने की वाहवाही लूट रही है। तो क्या डीजल का दाम बढ़ने से मालभाड़ा नहीं बढ़ेगा? पेट्रोल-डीजल पर दाम बढ़ना परोक्ष कर है, जो सीधे जनता की जेब काटता है। यह महंगाई से पीड़ित जनता के घावों पर नमक छिड़कना है।इससे सभी महसूस करते हैं कि राष्ट्रीयकृत बैंकों की भूमिका के चलते विष्वमंदी और वित्तीय संकट का असर भारत में कम देखा गया। उम्मीद की जाती थी कि राष्ट्रीयकृत बैंकों की वित्तीय प्रणाली मजबूत की जायेगी। इस उम्मीद पर पानी फिर गया। बजट के मुताबिक बैंकिंग क्षेत्र में निजी बैंकिंग प्रणाली के नये दरवाजे खोले गये हैं। यह अषुभ संकेत है। इससे हमारी वित्तीय व्यवस्था में विदेषियों का हस्तक्षेप बढ़ेगा।पूर्वी प्रदेषों में हरित कृषि क्रान्ति लाने के लिए चार हजार करोड़ रुपये के विषेष निवेष का षोर मचाया जा रहा है। देष की 65 प्रतिषत आबादी कृषि पर निर्भर है। इसके लिए यह आवंटन भी ऊंट के मुंह में जीरा का फोरन है। बिहार जैसे राज्य के लिए बाढ़ और सूखा महान आपदा है। इसके समाधान के लिए सम्यक स्थायी जल प्रबंधन की चिर जनाकांक्षा की उपेक्षा की गयी है। इसके बगैर इस क्षेत्र में हरित क्रांति की बात करना थोथा गाल बजाना है। सबसे खतरनाक खेल तो यह है कि कृषि में अमेरिकी कार्पोरेट के प्रवेष के बारे में एक समझौते के मसविदा पर पिछले महीने कैबिनेट ने हरी झंडी दी है। बजट में उन्नत तकनीकी भंडारण और वेस्टेज नियमन के लिये जो धनराषि आबंटन है, वह किसानों के लिये नहीं, प्रत्युत कार्पोरेटियों के लिये है। उसे वास्तविकता में कार्पोरेट सेक्टर ही हथियाएगा। हम आगे देखेंगे यह मसविदा क्या गुल खिलाता है।इसी तरह रेलमंत्री ममता बनर्जी ने पष्चिम बंगाल के आगामीविधानसभा चुनाव के मद्देनजर रेल बजट में चुनावी रंग फंेंट दिया है। वे अपने पिछले साल के रेलबजट का “दृष्य 2020” को भी अदृष्य कर गयीं। तेज रेलगाड़ियों के लायक ट्रैक निर्माण, समुचित सुरक्षा उपाय एवं अन्य अधिसंरचनात्मक (इंफ्राट्रक्चर) निवेष का प्रावधान नहीं किया गया है। रेल चलाने के लिए उन्होंने निजी क्षेत्र को पीपीपी (पब्लिक-प्राइवेट- पार्टनषिप) बुलावा भेजा है और रेलवेबोर्ड को पानी बोतल का कारखाना, इको-फ्रेंडली पार्क बनाने, स्कूल-कालेज और अस्पताल चलाने के काम में लगा दिया है।अब समय आ गया है कि अलग रेल बजट बनाने की औपनिवेषिक परंपरा खत्म की जाय और रेल बजट को सामान्य बजट का हिस्सा बनाया जाय। जब विभागीय रूप में दूरसंचार, डाकतार, उड्डयन, परिवहन, तेल, जहाजरानी, पोट एंड डॉक आदि चल सकते हैं तो रेल क्यों नहीं?वित्त मंत्री प्रणव मुखजी ने आम आदमी का बजट बताकर एक बड़ा झूठ परोसा है। असल में यह बजट पूंजीपतियों को रिझाने के लिए परोसा गया है। अंतर्राष्ट्रीय सट्टेबाजों का अखबार ‘वालस्ट्रीट जर्नल’ वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी के नाम पिछले हफ्ता एक खुला पत्र लिखकर सुझाव दिया था कि “अब आपकी सरकार निडर होकर तथाकथित सामाजिक समावेषिक विकास जैसे वोट बटोरू उपायों से मुक्त होकर सब्सिडी का खात्मा, निवेष को बढ़ावा और आयात-निर्यात सुगम करने के लिए कराधान की बाधा समाप्त कर सकेगी।”प्रतावित बजट प्रावधानों से प्रकट है कि अमेरिकी पूंजीपतियों का प्रतिनिधि अखबार ‘वालस्ट्रीट जनल’ के सुझावों के अनुकूल बजट में बखूबी इंतजाम किये गये हैं। इस बजट में जनता की जेब काटकर पूंजीपतियों की तिजोरी भरी गयी है। यह जनता के लिए एक पॉकेटमार बजट है।
- सत्य नारायण ठाकुर
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World Dance Day: 29th April, २०१० - International Message by Julio Bocca (Argentina)

Dance is discipline, work, teaching, communication. With it we save on words that perhaps others would not understand and, instead, we establish a universal language familiar to everyone. It gives us pleasure, it makes us free and it comforts us from the impossibility we humans have to fly like birds, bringing us closer to heaven, to the sacred, to the infinite.
It is a sublime art, different each time, so much like making love that at the end of each performance it leaves our heart beating very hard and looking forward to the next time.
English translation by Marcia De La Garza (Original in Spanish)
History of World Dance Day – 29th April
In 1982 the Dance Committee of the ITI founded International Dance Day to be celebrated every year on the 29th April, anniversary of Jean-Georges Noverre (1727-1810), the creator of modern ballet. The intention of the «International Dance Day Message» is to celebrate Dance, to revel in the universality of this art form, to cross all political, cultural and ethnic barriers and bring people together with a common language - Dance.
Every year a message from an outstanding choreographer or dancer is circulated throughout the world. The personality is selected by the founding entity of the International Dance Day - the International Dance Committee of the ITI, which collaborates with World Dance Alliance, a Cooperating Member of the ITI.
Together with the World Dance Alliance, ITI and its Dance Committee are celebrating International Dance Day at UNESCO in Paris.




Circulated by:
Indian People’s Theatre Association (IPTA).
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रविवार, 25 अप्रैल 2010

वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण जिन लोगों की नौकरियाँ चली गईं सरकार ने उनकी मदद के लिए क्या किया - गुरुदास दासगुप्ता

सरकार ने सोमवार को लोकसभा में स्पष्ट किया कि फिलहाल शिक्षित बेरोजगारों को भत्ता देने की उसकी कोई योजना नहीं है। हालाँकि सरकार की देश भर के रोजगार कार्यालयों के आधुनिकीकरण करने की योजना है।
सदन में प्रश्नकाल के दौरान समाजवादी पार्टी के शैलेन्द्र कुमार के सवाल के जवाब में श्रम एवं रोजगार मंत्री मल्लिकार्जुन खड्गे ने कहा कि सरकार देश भर के रोजगार कार्यालयों का आधुनिकीकरण करने की योजना बना रही है। पर शिक्षित बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता देने का सरकार का फिलहाल कोई कार्यक्रम नहीं है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के गुरुदास दासगुप्ता ने सरकार से जानना चाहा कि वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण जिन लोगों की नौकरियाँ चली गईं सरकार ने उनकी मदद के लिए क्या किया। खड्गे ने कहा कि मौजूदा व्यवस्था के अनुसार जिनकी नौकरी जाती है उन्हें छह महीने का वेतन दिए जाने की व्यवस्था है।
सांसद दीपेन्द्र हुड्डा ने कहा कि बेरोजगारी एक गंभीर समस्या है जिसकी सही स्थिति का आकलन करने के लिए क्या सरकार कोई नई एवं अधिक प्रभावी व्यवस्था प्रारंभ करने जा रही है।
खड्गे ने कहा देश में बेरोजगारों की वास्तविक स्थिति का आकलन राष्ट्रीय नमूना सर्वे संगठन द्वारा किया जाता है। इसके साथ ही श्रम मंत्रालय हर तीन महीनों में नमूना सर्वेक्षण भी कराता है जिसकी रिपोर्ट समय समय पर मिलती रहती है।
उन्होंने कहा कि नमूना सर्वे पूरी तरह सटीक नहीं माने जाते हैं इसलिए सरकार अभी तक सही आँकड़ों के लिए संगठन की रिपोर्ट पर ही निर्भर रहती है। उन्होंने कहा कि सरकार किसी नए विकल्प पर भी विचार कर सकती है।
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आईपीएल विवाद की जवाबदेही तय की जानी चाहिए : राजा

दैनिक ट्रिब्यून ने आज छापा है कि :
”पुड्डुचेरी, 24 अप्रैल (वार्ता)। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के सचिव डी. राजा ने विवादों में घिरी इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) से जुड़े सभी मामलों की संयुक्त संसदीय समिति से जांच कराने की आज मांग की।
राजा ने यहां संवाददाताओं से कहा कि आईपीएल में लगने वाले धन के श्रोत पर सवालिया निशान लगे हैं और केन्द्र सरकार इस मसले पर निर्णय लेने में ढुलमुल रवैया अपना रही है। उन्होंने कहा कि केन्द्र सरकार को आईपीएल के पूरे ब्यौरे और केन्द्रीय मंत्रियों के इससे संबंधों का खुलासा करना चाहिए। उन्होंने कहा कि कोई नहीं जानता कि इस पूरे मामले में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड और आईपीएल का कौन पदाधिकारी जवाबदेह है और उसकी क्या जवाबदेही है।
उन्होंने कहा कि राजनेताओं के फोन टैप किये जाने की खबरें हैं जो भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में नागरिक अधिकारों को बड़ा आघात है। इसकी कड़ी भर्त्सना किये जाने की जरूरत है। राजनेताओं के खेल संघों और खेलों से जुड़ाव के बारे में पूछे जाने पर कहा कि उनकी भूमिका अब सवालों के घेरे में आ गयी है।
भाकपा नेता कहा कि पूरी खेल नीति की समीक्षा की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि खेल मंत्रालय की भूमिका को भी पुनर्निधारित करना होगा।“
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इस्तीफे के बाद पहली बार केरल पहुंचे थरूर

एन डी टी वी ने बताया है लोगों को कि :
”इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) की कोच्चि फ्रेंचाइजी पर उठे विवाद के बाद विदेश राज्य मंत्री के पद से इस्तीफा देने वाले शशि थरूर शनिवार को जब पहली बार केरल पहुंचे तो कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने जहां उनका स्वागत किया वहीं उन्हें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के कार्यकर्ताओं के विरोध का भी सामना करना पड़ा।
थरूर तिरूवनंतपुरम के सांसद हैं। आईपीएल विवाद के बाद मंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद वह पहली बार यहां पहुंचे। वह दोपहर लगभग 12.50 बजे तिरूवनंतपुरम हवाई अड्डे पहुंचे। ......................................................... भाकपा के कुछ कार्यकर्ताओं ने थरूर का विरोध भी किया। पुलिस ने लगभग 50 प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार कर लिया।“
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brickbats greet Tharoor on Kerala visit

इंडो एशियन न्यूज़ ने आज छापा है कि :
"Waving cricket bats, hundreds of Congress activists gave a roaring welcome to former minister of state for external affairs Shahshi Tharoor as he arrived here Saturday on his first visit to his home state after quitting over the IPL row.
But a smaller group of protesters allied to the Communist Party of India (CPI) held posters of the Congress MP and his friend Sunanda Pushkar, whose links to the Indian Premier League (IPL) Kochi franchise triggered the controversy that has turned into the country's worst sports crisis.
But the police kept the two groups apart. Around 50 opposition activists were arrested.
It was the first time Tharoor, a former senior UN official, returned to Thiruvananthapuram, which he represents in the Lok Sabha, since resigning from Prime Minister Manmohan Singh's government April १८
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As Congress workers sang his praises, members of the CPI's youth wing waved his and his friend Pushkar's posters. Banners carried by them read: "Should Kerala accept Tharoor's behaviour?"
Similar posters were seen pasted in several parts of the Kerala capital."
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शनिवार, 24 अप्रैल 2010

CPI demands JPC probe into IPL

http://www.mynews.in published the following news today :
Puducherry: Communist Party of India Secretary D Raja, MP, today demanded an enquiry by a Joint Parliamentary Committe into the IPL 'gambling." Addressing a press conference here, he said money was flowing from 'questionable sources' and the Union Governemnt was not firm in taking a decision on the issue. The Centre should come out with an explanation and also connection of Ministers in different ways with IPL.
" No one knows to whom the BCCI and IPL are accountable and what is their accountability," he added.
There was also a report of tapping of telephones of political party leaders, which was a blow to civil rights in a democratic country like India and this needs to be condemned strongly, he added.
To a question on the association of politicians with sports, he said their role has now become questionable. The entire sports policy should be revamped, the role of sports ministry would have to be redefined, the CPI leader.
On the arrest of top brass of the Medical Council of India (MCI), Mr Raja said the governemnt should appoint a special officer to look into the affairs of the MCI and none should be allowed to manipulate the its affairs.
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आईपीएल में इतना सारा पैसा आ कहां से रहा हैं? - गुरूदास दासगुप्ता, राष्ट्रीय सचिव, भाकपा

डेटलाइन इंडिया में आज छपी अंशू सिंह की रिपोर्ट :
नई दिल्ली, 24 अप्रैल- बीसीसीआई और आईपीएल दोनों अपनी खाल बचाने में लगे हुए हैं और अब यह तय किया गया है कि बीसीसीआई के अध्यक्ष शशांक मनोहर आईपीएल के कार्यकारी कमिश्नर बनेंगे जबकि ललित मोदी बीसीसीआई के उपाध्यक्ष बनें रहेंगे। शरद पवार की पहल पर यह समझौता हुआ है और ललित मोदी इस बात पर राजी हो गए हैं कि 26 अप्रैल को आईपीएल गवर्निंग काउंसिल की बैठक को वे अदालत में नहीं ले जाएंगे।
इसके बदले मोदी को बीसीसीआई से निलंबित नहीं किया जाएगा। मगर मोदी इस बात पर अड़े हुए हैं कि वे 26 अप्रैल वाली बैठक में हिस्सा नहीं लेंगे ताकि निष्पक्ष्तापूर्वक विचार हो सके। बीसीसीआई के भूतपूर्व अध्यक्ष केसी मुथैया इस बीच एक टीम के मालिक एम श्रीनिवासन के बोर्ड का सचिव बने रहने के सवाल पर सर्वाेच्च न्यायालय तक पहुंच गए हैं। उन्होंने सवाल किया है कि बोर्ड का कोई भी सदस्य कैसे किसी फ्रेंचाइज का मालिक हो सकता है? उनका कहना है कि इंडिया सीमेंट एक टीम की मालिक हैं और श्री निवासन के उनसे व्यापारिक और निजी रिश्ते हैं।
उधर सरकार भी बीच का रास्ता खोजती नजर आ रही हैं। सरकार की ओर से अब सूत्रों के जरिए ही सही, ऐलान किया गया है कि सरकार सिर्फ आईपीएल और उसके साथ जुड़ी टीमों के पैसे की जांच करेगी और मैच फिक्सिंग फिलहाल जांच के दायरे में नहीं है। आयकर अधिकारियों ने अपना नाम नहीं छापने के अनुरोध के साथ कहा कि फिलहाल उन्हें मैच फिक्सिंग की जांच करने के आदेश नहीं मिले। वाम मोर्चा भी अब सुर बदल रहा है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता गुरुदास दासगुप्ता ने कहा कि मैंने कभी मैच फिक्सिंग की बात नहीं की मगर सरकार को पता लगाना चाहिए कि इतना सारा पैसा आ कहां से रहा हैं? मैं ललित मोदी पर भी सवाल नहीं कर रहा हूं मगर मेरा सवाल यह है कि शाहरूख खान और शिल्पा शेट्ठी जैसे लोग अचानक क्रिकेट में इतने ज्यादा लीन कैसे हो गए? इनकम टेक्स की रिपोर्ट में ललित मोदी के एक दोस्त पर मैच फिक्सिंग का संदेह जाहिर किया गया है लेकिन इसके बारे कोई विवरण नहीं दिए गए है। यह रिपोर्ट भी इतनी जल्दबाजी में तैयार की गई है कि शाहरूख खान की टीम का नाम कोलकाता नाइट राइडर्स की बजाय कोलकाता रॉयल्स रख दिया गया है। जाहिर है कि यह रिपोर्ट बनाने वाले अधिकारियों की क्रिकेट में कोई खास दिलचस्पी नहीं है। नतीजा क्या निकलेगा इसका अंदाजा अभी से लगाया जा सकता है।
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भाकपा का 6 से 9 मई तक धन एवं अन्न संग्रह अभियान

भाकपा का 6 से 9 मई तक धन एवं अन्न संग्रह अभियान
उठो साथियों, निकलो - पार्टी के लिए धन की व्यवस्था आपको ही करनी है!

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की उत्तर प्रदेश राज्य कार्यकारिणी ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के तमाम सदस्यों एवं जन संगठनों के कार्यकर्ताओं का आह्वान किया है कि वे 6 से 9 मई तक जनता के व्यापकतम तबकों से पार्टी के लिए धन और अन्न एकत्रित करने के लिए सड़कों पर उतरें। पार्टी के राज्य कार्यालय ने इस हेतु भेजे गये सन्देश में इस अभियान को संगठित करने की सांगठनिक प्राथमिकताओं को चिन्हित करते हुए पार्टी सदस्यों से अपील की है कि -
(1) पार्टी की पूरी की पूरी सदस्यता को अभियान में उतरना है।
(2) पार्टी सदस्यों को कम से कम प्रति सदस्य 10 घरों अथवा दुकानों पर जाकर पार्टी चलाने हेतु धन मांगना है यानी अगर जिले में 5 सौ सदस्य हैं तो हमें कम से कम 5 हजार लोगों से सम्पर्क करना है।
(3) किसी भी पार्टी सदस्य को इस अभियान से छूट नहीं दी गयी है।
(4) अभियान को 9 मई के बाद भी चलाया जा सकता है।
साथियों! पार्टी के विस्तार एवं विकास के लिए पार्टी के सदस्यों द्वारा धन संग्रह अभियान चलाना बहुत जरूरी है। होलटाईमर कार्यकर्ताओं को रखने के लिए और उन्हें जीवनयापन लायक धन देने के लिए धन की जरूरत होती है। पार्टी के कार्यालयों को चलाने के लिए धन की जरूरत होती है। पार्टी के संसाधनों की व्यवस्था भी धन के बिना नहीं होती। आन्दोलन चलाने के लिए और आन्दोलन का प्रचार करने के लिए भी धन की जरूरत होती है। पार्टी को धन की जरूरत है, इसे महसूस कीजिए। इस जरूरत को हम सब मिल कर ही पूरा कर सकते हैं।
साथियों! कम्युनिस्ट पार्टियों के पास इस धन की व्यवस्था के लिए जनता के पास जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। हम जिनकी बेहतरी के लिए लगातार संघर्ष करते हैं, उन्हीं से तो हम पैसा मांग सकते हैं। जनता से धन मांगने के लिए पार्टी के सभी सदस्यों को जनता के पास जाना ही होगा, तभी हम अधिक से अधिक संख्या में जनता के व्याकतम तबकों के मध्य पहुंच पायेंगे और तभी हमें पार्टी को चलाने के लिए कुछ धन मुहैया हो सकेगा।
साथियों! भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के दूसरों राज्यों के साथी हर साल कम से कम एक बार इस अभियान पर संगठित रूप से निकलते हैं और पार्टी के लिए धन इकट्ठा करते हैं। फिर उत्तर प्रदेश में हम क्यों नहीं निकल सकते? उत्तर प्रदेश के साथी भी निकल सकते हैं, इस बार वे निकलेंगे और धन मांगेंगे।
”पार्टी संगठन“ पर लखनऊ में पिछले साल आयोजित कार्यशाला में पार्टी की राष्ट्रीय परिषद के सचिव का. सी.के.चन्द्रप्पन आये थे। उन्होंने विस्तार से उत्तर प्रदेश के पार्टी संगठन की खामियों पर चर्चा करते हुए दूसरे राज्यों के काम करने के तौर-तरीकों की चर्चा की थी। उन्होंने विस्तार से बताया था कि केरल के साथी किस प्रकार लक्ष्य निर्धारित कर साल भर में कम से कम एक बार इस अभियान में उतरते हैं और कितना धन एकत्रित कर लेते हैं। उन्होंने स्पष्ट बताया था कि अभियान के बाद केरल की पार्टी - ब्रांचों से लेकर राज्य तक समीक्षा करती हैं कि हम कितने परिवारों तक पहुंच सके। अगले वर्ष केरल की पार्टी का लक्ष्य यह होता है कि पिछले वर्ष हम जितने घरों तक पहुंचे थे इस बार हम उससे कितना ज्यादा पहुंचने का प्रयास करेंगे।
हमारे जिलों के आगे बढ़े हुए नेतृत्वकारी साथी इस कार्यशाला में उपस्थित थे। उन सबके सामने का. चन्द्रप्पन ने हमारा आह्वान किया था कि हम केरल के अनुभवों से सबक लेते हुए इस अभियान को चलायें, अधिक से अधिक जनता के पास पहुंचने का प्रयास करें।
साथियों! ब्रांचों को सक्रिय करिए, पार्टी के सभी सदस्यों को सक्रिय कीजिए और अभियान के लिए निकल चलिये। किसी के अभियान पर न जाने को बहाना मत बनाईये। आप खुद निकलिये, लौट कर देखना कि कौन नहीं निकला, उसे समझाना कि कुछ नहीं बिगड़ा है, अभी भी वह अपने परिचित 10 घरों पर जाकर पार्टी के लिए धन या अन्न मांग सकता है। कितनों को सड़कों पर हम उतारने में सफल रहे, इसकी मीमांशा अभियान के बाद जरूर कीजिए, कमियों को ढूंढिये और अगले साल के लिए नये संकल्प बुनना अभी से शुरू कर दीजिए।
साथियों! पार्टी के राज्य केन्द्र ने इस अभियान को 9 मई को बन्द करने का निर्देश नहीं दिया है। अमूमन यह देखा जाता है कि आन्दोलनात्मक गतिविधियों में सहभागिता से कुछ साथी बहाने तलाश कर लेते हैं कि शादी-विवाह के कारण नहीं जा सकते, बीमारी के कारण नहीं जा सकते, नौकरी के कारण नहीं जा सकते या किन्हीं और व्यस्तताओं के कारण नहीं जा सकते। लम्बे समय में यह कोई बहाना किसी साथी के पास मौजूद नहीं होगा। आज नहीं निकल सकते तो कल निकलिये, कल नहीं निकल सकते तो परसों निकलिये। सभी साथियों को इस कार्यभार को पूरा करने के लिए निकलना होगा। यह केवल ब्रांच अथवा जिले या राज्य के मंत्री की अकेले की जिम्मेदारी नहीं है। यह जिम्मेदारी पार्टी के एक-एक सदस्य की जिम्मेदारी है जिसे उसे पूरा करना चाहिए।
उठिये साथियों! सब पार्टी के लिए धन मांगने निकलें। जिस तरह हमने लगातार अभियान चलाते रहने का रिकार्ड बनाया है, हम इस अभियान को भी सफल बनायें।

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शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

भारतीय रिजर्व बैंक में महंगाई से निपटने की इच्छा शक्ति नहीं

मुम्बई में 20 अप्रैल को भारतीय रिजर्व बैंक ने वार्षिक मौद्रिक नीति की घोषणा करते हुए ऐसे कोई कदम नहीं उठाये जिससे यह साबित होता कि भारतीय रिजर्व बैंक में महंगाई से निपटने की इच्छा शक्ति है। वार्षिक मौद्रिक नीति की घोषणा के पहले स्टॉक मार्केट गिर रहा था और समाचार माध्यम एवं पूंजीपति वर्ग की संस्थाएं चीख रहीं थीं कि ऋणों पर ब्याज दरें बढ़ जायेंगी और उससे आर्थिक तबाही आ जायेगी। नीति घोषित होते ही शेयर बाजार कुलांचे भरने लगा। यह इंगित करता है कि वांछित सख्ती नहीं की गयी है।भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंक दर एवं वैधानिक तरलता अनुपात (एसएलआर) को यथावत बनाये रखते हुए नगदी आरक्षित अनुपात (सीआरआर) में केवल 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी की जबकि रेपो एवं रिवर्स रेपो दरों में भी केवल 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गयी है। सीआरआर में बढ़ोतरी से बैंकों के पास ऋण देने हेतु उपलब्ध संसाधनों में केवल 12,500 करोड़ रूपये की कमी आयेगी और बैंकों के पास ऋण देने के लिए रकम इससे कहीं कई गुना अभी भी उपलब्ध रहेगी। रेपो एवं रिवर्स रेपो दरों में बढ़ोतरी का बाजार पर कोई विशेष असर नहीं पड़ेगा।इस प्रकार भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा उठाये गये कदमों से मंहगाई पर कोई प्रभाव पड़ने वाला नहीं है।इस समय जरूरत थी कि भारतीय रिजर्व बैंक सीआरआर और एसएलआर में तीव्र वृद्धि कर बैंकों के पास ऋण हेतु उपलब्ध संसाधनों को बैंकिंग सिस्टम से खींच कर बैंकों के पास तरलता को पर्याप्त कम करता और बैंक दर एवं रेपो-रिवर्स रेपो दरों को भी तेजी से ऊपर लाकर बैंकों का जमाराशियों पर देय ब्याज दर को बढ़ाने का संकेत देता और परिचालन में मुद्रा (मनी इन सर्कुलेशन) को कम करता। परन्तु ऐसा नहीं किया गया है।इस समय महंगाई में विशेष योगदान खाद्य पदार्थों में आई महंगाई का है। भारतीय रिजर्व बैंक ने अपने बयान में यह स्वीकार किया है कि खाद्य पदार्थों की महंगाई दर मार्च 2010 तक 53.3 प्रतिशत थी। बात दीगर है कि यह सरकारी आंकड़ा है और कीमतों में इससे कहीं ज्यादा बढ़ोतरी आम आदमी को भुगतनी पड़ रही है। जिन्सों की कीमतें दो से चार गुना तक बढ़ गयी हैं। जिन्सों का उत्पादन किसान करते हैं परन्तु किसानों को जिन्सों का अभी भी वही मूल्य मिल रहा है जो उन्हें एक-दो साल पहले मिल रहा था। इसके स्पष्ट दो कारण है। पहला खाद्य पदार्थों की सट्टाबाजारी एवं जमाखोरी। इन पर अंकुश लगाने की जरूरत थी। इसके लिए जरूरी था कि खाद्य पदार्थो में सट्टेबाजारी के लिए उपलब्ध धन श्रोतों (जोकि अंततः राष्ट्रीयकृत बैंकों से ऋण एवं सरमायेदारों द्वारा अंधाधुंध मुनाफाखोरी के जरिए उपलब्ध हो रहा है) पर लगाम लगाई जाती। साथ ही खाद्य पदार्थों के लिए दिये जाने वाले गैर-कृषि ऋणों पर लगाम लगाने की भी सख्त जरूरत थी यानी सेलेक्टिव क्रेडिट कंट्रोल उपायों को अमल में लाना चाहिये था। परन्तु इस प्रकार के किसी सख्त कदम की घोषणा नहीं की गयी है।इधर कई सालों से बैंकिंग बिलकुल बदल गयी है। एटीएम और क्रेडिट कार्ड एक तरह से परिचालन में मुद्रा की मात्रा को बढ़ा रहे हैं। आरटीजीएस जैसी मैकेनिज्म से पैसा देश के एक कोने से दूसरे कोने में इतनी तेजी से यात्रा कर रहा है कि बाजार में मुद्रा की उतनी जरूरत ही नहीं है जितनी दस सालं पहले तक होती थी। पहले एक व्यवसायी को दूसरे शहर के व्यवसायी को पैसा भेजने में एक सप्ताह लग जाता था जबकि आज इस पैसे को दिन भर में 5 बार फेंटा जा सकता है यानी यह पैसा एक ही दिन में 6 लोगों के खातों में जमा होकर निकल जाता है।देश के अर्थतंत्र में अंधाधुंध काला धन उपलब्ध है, जो देश में समानान्तर अर्थव्यवस्था चला रहा है। यह काला धन भी अंततः सट्टेबाजी और मुनाफाखोरी में लग रहा है। इस प्रकार किसी अधिकारिक आंकड़े के आधार पर भारतीय रिजर्व बैंक कदम नहीं उठा सकता बल्कि उसे परिस्थितियों की गंभीरता को देखते हुए सख्त कदम उठाने चाहिये थे।वार्षिक मौद्रिक नीति घोषित करते हुए भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर डी. सुब्बाराव ने स्वीकार किया कि 2009-10 में केन्द्र सरकार के रू. 2,98,411 करोड़ रूपये के वित्तीय घाटे को पूरा करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक को 2,51,000 करोड़ रूपये बाजार से उठाने के लिए नई प्रतिभूतियां जारी करनी पड़ी और वर्तमान वित्तीय वर्ष 2010-11 के वित्तीय घाटे को पूरा करने के लिए बाजार में 3,42,300 करोड़ की प्रतिभूतियों को जारी करना होगा। सरकार काले धन को जब्त कर और सरमायेदारों के बढ़ते मुनाफों पर कर लगा कर इस वित्तीय घाटे को पूरा करने के बजाय बाजार से उधारी पर निर्भर है और इसका भी असर मुद्रास्फीति पर पड़ना लाजिमी है।भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर की यह स्वीकारोक्ति कि ”महंगाई को रोकने के लिए जरूरत पड़ने पर और कदम उठाये जायेंगे“ इस तथ्य की पुष्टि के अलावा कुछ नहीं है कि वांछित सख्ती नहीं दिखाई गयी है।
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आगरा इप्टा के नाटक 'किस्सा एक अजनबी का' का आमंत्रण


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बुधवार, 21 अप्रैल 2010

क्यूबा पर अमेरिकी आतंकवाद के खिलाफ ऑन लाइन हस्ताछर अभियान

Dear comrades and friends: A great media campaign has been unleashed against Cuba . It is not new. For the last 50 years we have had to resist and defeat such campaigns. This time President Obama is using not only CIA and other traditional instruments, but also subservient allies of the right wing in Europe, which have condemned _Cuba in the European Parliament because a common prisoner, disguising as a so called political prisoner carried out a hunger strike, and despite all the help from the Cuban medical institutions he died, thus providing the alibi for this campaign.

While providing some articles for your own understanding of the issue, your are kindly requested to spread the news and to sign in favor of Cuba in the website http://www.porcuba.org/index.php?lang=2



Cuba shall overcome!





Miguel Angel Ramírez

Ambassador

Embassy of the Republic of Cuba in India
tel: 2924 2467/68, 2924 2370
fax: :2924 2369
email: embcuind@del6.vsnl.net.in;
web: http://embacuba.cubaminrex.cu/indiaing


The Cuban Five will return!!!
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भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के डी. राजा के ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पर चर्चा

"deshbandhu" mein aaj chhapa hai
नयी दिल्ली। केन्द्र ने इलेक्ट्रानिक एवं जैव. चिकित्सकीय कचरे के कारोबार के नियमन और ऐसे कचरे के विकिरण के शिकार लोगों को मुआवजा देने के लिए कानून बनाने की जररत स्वीकार की है और कहा है कि वह जल्द ही आवश्यक कदम उठायेगा।
परमाणु ऊर्जा राज्यमंत्री पृथ्वीराज चह्वाण ने राजधानी के मायापुरी कचरा बाजार में कोबाल्ट..60 के विकिरण से 7 लोगों के गंभीर रप से ग्रस्त होने की हाल की एक घटना से उत्पन्न स्थिति पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के डी राजा एवं कुछ अन्य सदस्यों के ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पर चर्चा का उत्तर देते हुए राज्यसभा में उक्त आश्वासन दिया। श्री चह्वाण ने बंदरगाहों..हवाईअड्डों पर रोडियोएक्टिव पदार्थ जांच उपकरण लगाने में देरी की भी बात स्वीकार की. लेकिन कहा कि यह प्रक्रिया तेज की जा रही है और नवाशिव बंदरगाह पर 12 .फुल कंटेनर स्कैनर. जल्द ही तैनाती के लिए तैयार है। वैसे उन्होंने साफ किया कि सात अप्रैल की जिस घटना में सात लोग रेडियो एक्टिव पदार्थ के विकिरण से गंभीर रप से अस्वस्थ हुए हैं. उसका पूरे देश में परमाणु ऊर्जा विभाग के प्रतिष्ठानों या गतिविधियों से कोई ताल्लुक नहीं है और सदस्यों को आश्वस्त किया कि देश सार्वजनिक जीवन में रेडियोधर्मी आपतकाल की किसी भी स्थिति से निबटने की पूरी तरह तैयार है।
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