भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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शनिवार, 22 मई 2010

मुंबई किसकी...?

मुंबई किसकी? दिल्ली किसकी? और फिर चेन्नई और कोलकाता किसका? यह सिलसिला कहां रूकेगा? कोई पूछेगा भारत किसका?दिल्ली छोड़कर बाकी तीनों महानगरों के नाम आजाद भारत में क्षेत्रीय बोलचाल के अनुरुप ढाले गये। पर नये नामकरण का मतलब यह तो नहीं कि मुकामी सरदारों को महानगरों का ठेकेदार बनने दिया जाय और जनगण को इन्हीं ठेकेदारों की मनमर्जी के हवाले कर दिया जाय। इतिहास साक्षी है कि दिल्ली में कोई पंद्रह राजे-महारजे हुए और दिल्ली कम से कम पंद्रह मर्तबा बनी और उजड़ी। तो फिर आज दिल्ली पर किसकी दावेदारी मंजूर की जाय।इतिहास में झांके तो बंबई कभी भी मराठा राज का अंग नहीं बना। नयी दिल्ली की तरह बंबई, मद्रास और कलकत्ता अंग्रेज उपनिवेशवादियों के बसाये नये शहर है। आजादी के बाद इन शहरों के दावे-प्रतिदावे महज वोट-बटोरू छुद्र नारे हैं, जिसका कोई संबंध धर्म, भाषा, क्षेत्र और संस्कृति से दूर-दूर तक नहीं है। दिल्ली के उपराज्यपाल तेजेन्द्र खन्ना और मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने यूपी-बिहारवालों के दिल्ली आने-जाने, चलने-फिरने, काम-धाम और रोजगार करने पर प्रश्न उठाये तो शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने तुरंत उन्हें बधाई का संदेश भेजा। बाल ठाकरे ने अपने अखबार ‘सामना’ में शीलाजी की खूब वाहवाही की। ऐसा उन्होंने संभवतः इसलिए किया कि उन्हें मालूम है कि शीला दीक्षित भी दिल्ली के लिए वैसे ही प्रवासी हैं, जैसे स्वयं बाल ठाकरे मुंबई के लिए प्रवासी हैं। बाल ठाकरे के पिताजी ने अपने परिवार के इतिहास के बारे में लिखा है कि उनके पूर्वज चंद्रसेन कायस्थ थे, जो पाटलिपुत्र (मगध) से चलकर खंडवा (मध्य प्रदेश) पहुंचे और बाद में महाराष्ट्र आकर बस गये। ठाकरे परिवार मूलतः बिहारी हैं, इनके पूर्वज बिहार वासी थे, जो तत्कालीन मगध सम्राट से प्रताड़ित होकर महाराष्ट्र में शरण लिये। मशहूर स्तंभ लेखक मस्तराम कपूर ने (जनसत्ता: 9 मार्च 2009) में इस तथ्य को भली प्रकार उजागर किया है।पुरानी कहावत है, नया मियां बहुत प्याज खाता है। मियां प्याज कम खाता है या ज्यदा, यह विवाद का विषय हो सकता है, किंतु इस पर कोई विवाद नहीं है कि हिटलर स्वयं आस्ट्रियायी था, जिसने सत्ता के लिए जर्मन श्रेष्ठता का सिद्धांत प्रचारित किया और मानवता को भीषण युद्ध की विभीषिका में धकेल दिया। उसी तरह बिहारी मूल के बाल ठाकरे मराठी उन्माद पैदा करते हैं तो इसका मकसद सस्ती लोकप्रियता से सत्ता हथियाना है।मुंबई का नाम 1995 के पहले तक बंबई था। बंबई के मूल निवासी कोली मछुयारे हैं। आठ द्वीपों का यह भूखंड प्रारंभ मंे समुद्री दलदल था। सम्राट अशोक के समय यह मौर्य साम्राज्य का अंग था। बाद में इस द्वीप समूह पर आंघ्र के सातवाहनों का शासन कायम हुआ। सन् 1343 में इसे गुजरात के शासकों ने अपने अधिकार में लिया। सन् 1534 में पुर्तगालियों ने इसे गुजरात के राजा बहादुरशाह से ले लिया। पुर्तगाली इस भूखंड को बोमबहिया पुकारने लगे। खाड़ी को पुर्तगाली भाषा में ‘बहिया’ कहा जाता है। सन् 1661 में पुर्तगाली राजा ने अपनी बेटी बिग्रांजा की शादी अंग्रेज राजकुमार के साथ तय की तो बोमबहिया को उपहार के रूप में उसने अपने अंग्रेज दामाद चार्ल्स द्वितीय को दे दिया। सन् 1668 में चार्ल्स ने बोमबहिया को ईस्ट इंडिया कंपनी को भाड़े पर दे दिया। ईस्ट इंडिया कंपनी बोमबहिया के बतौर भाड़ा सालाना 10 पौंड सोना चार्ल्स को अदा करती थी। यह भूभाग ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों में आने पर इसे एक बंदरगाह के रूप में विकसित किया गया। अंग्रेजों ने ‘बोम’ शब्द को बरकरार रखा, किंतु पुर्तगाली ‘बहिया’ अर्थात् खाड़ी को अंग्रेजी बे (इंल) से बदल दिया, क्योंकि खाड़ी को अंग्रेजी भाषा में ‘बे’ कहा जाता है। इस तरह बोमबहिया बोम्बे (ठवउइंल) हो गया।सन् 1661 से 1675 के बीच बोम्बे की आबादी 10 हजार से बढ़कर 60 हजार हो गयी। 1687 में ईस्ट इंडिया कंपनी का मुख्यालय सूरत से बदलकर बोम्बे आ गया। तब यह बोम्बे प्रिसिडेंसी का मुख्यालय बना। 1857 के बाद बोम्बे ब्रिटिश सरकार के अधीन हो गया। कालक्रम में बोम्बे ब्रिटिश सरकार के अधीन हो गया। कालक्रम में बोम्बे कपास का प्रमुख केंद्र बना। 1869 में स्वेज नहर के निर्माण के बाद बंबई अरब सागर का प्रमुख बंदरगाह बन गया। जाहिर है बिहार का संबंध बंबई से मौर्यकालीन पुराना है।सन् 1955 में जब बंबई राज्य का बंटवारा भाषाई आधार पर गुजरात और महाराष्ट्र के रूप में हुआ तब भी यह विवद तेजी से उठा था कि बंबई गुजरात को मिले या महाराष्ट्र को भाषाई आधार पर बंबई को महाराष्ट्र में मिलाने का बाबा साहब अंबेडकर ने विरोध किया था। अंबेडकर बंबई को अलग राज्य का दर्जा देने के समर्थक थे, क्योंकि बंबई में किसी एक भाषा का बोलबाला नहीं था। बंबई सब दिनों से बहुभाषी शहर रहा है। इसी तरह का विवाद मद्रास प्रिसीडेंसी का बंटवारा किये जाने के समय उठा था कि मद्रास प्रिसीडेंसी का बंटवारा किये जाने के समय उठा था कि मद्रास आंध्र प्रदेश में रहे या तामिलनाडु में। इस तरह के सवाल उठने का सहज कारण यह था कि इन महानगरों के निर्माण में स्थानीय लोगों के मुकाबले बाहर के लोगों का ज्यादा योगदान था।दुनिया के सभी महानगरों का निर्माण निर्विवाद रूप से प्रवासी मजदूरों ने किया है। बंबई द्वीप समूह को विकसित करने में सबसे बड़ा योगदान ईरान से आये पारसियों का है। पारसी 9वीं सदी में भारत आये। बंबई के आठ द्वीपों को एक साथ जोड़ने की योजना में पारसी व्यवसायी समुदाय ने सर्वाधिक धन लगाया। बंबई नगर के विकास में जिन भारतीयों के नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज है, वे हैं भाऊदाजी, जमशेदजी जीजीभाई, दादा भाई नौरोजी, कवासजी जहांगीर, नौरोजी फुर्दनजी, फ्रामजी कवासजी, मंगलदास नाथुभाई, प्रेमचंद रामचंद, गोकुलदास तेजपाल, मो। इब्राहिम, मुहम्मद अली रोधे, बाल श्री जांभेकर और जगन्नाथ शंकर सेठ जो नाना शंकर सेठ के नाम से प्रसिद्ध थे। इनमें जांभेकर को छोड़कर बाकी सभी बाल ठाकरे की परिभाषा में गैरमहाराष्ट्रीयन हैं। नाना शंकर सेठ जिनका बंबई के निर्माण में सर्वाधिक योगदान सर्वमान्य है, वे गुजरात से आकर यहां बसे थे। वे बंबई कार्पोरेशन, बंबई एसेम्बली, बंबई विश्वविद्यालय सहित अनेक संस्थाओं के निर्माता थे। भारतीय रेल के संस्थापकों में उनका नाम है। विक्टोरिया टरमिनस (वीटी) रेलवे स्टेशन, (जिसे इन दिनों छत्रपति शिवाजी के नाम से जाना जाता है) की दीवार पर नाना श्ंाकर सेठ की आदमकद प्रतिमा अंकित है। बंबई नगर निगम परिसर में भी इनकी भव्य प्रस्तर मूर्ति खड़ी है। जिस बंबई ऐसासिएशन की नींव पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 में हुई, उसके 12 वर्षों तक लगातार अध्यक्ष नाना शंकर सेठ थे। बंबई के मराठीकरण का जो आक्रामण अभियान शिवसेना ने चला रखा है, उस पर लगाम नहीं लगायी गयी तो कोई अचरज नहीं कि नाना शंकर सेठ, दादाभार्ठ नौरोजी आदि नामों को मिटाकर छत्रपति शिवाजी के साथ-साथ बाल ठाकरे और राज ठाकरे के नाम लिख दिये जायें।परिस्थिति की विडंबना यह है कि राष्ट्रीय पार्टियां भी आज क्षेत्रीय पार्टियों के दबाव में पहचान खो रही हैं। यह तथ्य छिपा नहीं है कि अपने खिसकते जनाधार पर काबू पाने के लिए कांग्रेस शिवसेना के प्रति हमेशा नरम और सांठगांठ की मुद्रा में रही है। भाजपा शिवसेना प्रेम प्रकट है। मुंबई की आबादी में उत्तर भारतीयों की तादाद 21 प्रतिशत है। मुंबई में गुजराती 18 प्रतिश्ता, तमिल 3 प्रतिशत, सिंधी 3 प्रतिशत और दूसरे 12 प्रतिशत हैं। इस तरह मुंबई में 57 प्रतिशत गैरमराठी हैं। अलबत्ता मुंबई में सबसे बड़ा भाषाई समूह मराठी 43 प्रतिशत है। बाल$राज$ उद्धव ठाकरे के आक्रामक अभियान का मकसद गैरमराठियों को मुंबई से भगना है और जबरन मराठियों का वर्चस्व कायम करना है।इस सिलसेल में यहां एक ताजा वाकया बताना दिलचस्प होगा। पिछले महीने राहुल गांधी मुंबई दौरे पर गये। राहुल गांधी की नाटकियता इन दिनों हमेशा अखबारों की सुर्खियां बनती हैं। मुंबई में राहुल भाड़े की टैक्सियों में चले और ट्राम का सफर किया। ट्राम का भाड़ा चुकाने के लिए बांद्रा की सड़क पर एक एटीएम से पैसे भी निकाले। इसकी चर्चा अखबारों में चटपटी मसालों की तरह हुई। बाल ठाकरे भी पीछे नहीं रहे। उन्होंने अपने अखबार ‘सामना’ में लिखा: ”देखों मराठियों, राहुल मुंबई से पैसे निकाल रहा है। मुंबई का पैसा बाहर जा रहा है। इसे ही मैं रोकना चाहता हूं!“जाहिर है, ऐसा लिखकर जो संदेश बाल ठाकरे मराठियों को देना चाहते हैं, इसे लागू किया गया तो वह संदेश मुंबई तक सीमित नहीं रहेगा। ऐसी ही जहरीली भाषा दूसरे भी बोलने लगे तो देश का क्या होगा। आखिर मुंबइ में कहां का पैसा जमा होता है? राष्ट्रीयकृत बैंकों में जमा रकम का हिसाब बताता है कि यूपी और बिहार से लोगों की बचत जमा रकम का 73 प्रतिशत मुंबई औरे दिल्ली में निवेश होता है। आजादी के बाद बिहार ने अपने खर्चे से कोयला, अबरख और विभिन्न खनिज मुंबई पहुंचाया। भाड़ा मानकीकरण का सिद्धांत अपनाया गया, जिसके मुताबिक बिहारियों को उसी दर से कोयला मिला जिस दर से मुंबई के कारखानों को। इसका नतीजा यह हुआ कि बिहार से मुंबई तक कोयला की ढुलाई का बिल बिहारवासियों ने चुकाया। ख्निज संपदा बिहार में, किंतु उसकी प्रोसेसिंग के कारखाने कलकत्ता और मुंबई में खुले। यह बंदरगाहमुखी औपनिवेशिक व्यापार व्यवस्था थी जिसे आजाद भारत में बदला नहीं गया। बिहार में कार्यरत कंपनियों के मुख्यालय कलकत्ता और मुंबई में रखे गये। फलः बिहार को राजस्व घाटा होता रहा। माल बिहार का तो उसका राजस्व कलकत्ता-मुंबई को क्यों? बाल ठाकरे को यह हिसाब समझाना पड़ेगा कि बिहार का पैसा कैसे महानगरों में जमा होता है। क्या प्रवासी मजदूर स्थानीय लोगों का रोजगार छीनता है? कुछ साल पहले गुवाहटी रेलवे माल गोदाम में ढुलाई का काम करनेवाले बिहारी पल्लेदार मजदूरों को असम के उग्रवादी उल्फावालों ने कहा: “तुम लोग गुवाहाटी छोड़ो, ये काम असमवासी करंेगे।” एटक के नेतृत्व में बिहारी पल्लेदारों ने समझदारी से काम किया उन्होंने काम छोड़ दिया और कहा “असमवासी को पहले काम करने दिया जाएगा और काम बचेगा तो बिहारी पल्लेदार करेंगे।” ऐसा दो-तीन हफ्तों तक चला। बाद में असमवासियों का आना बंद हो गया। बिहारी पल्लेदार पूर्ववत काम करने लगे।अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के अनेक अध्ययन बताते हैं कि प्रवासी मजदूर स्थानीय लोगों के काम नहीं छीनते। प्रवासी मजदूरों के काम दुनिया भर में अंग्रेजी के तीन प्रथमाक्षरों से पहचाना जाता है - डर्टी, डिमीनिंग, डेंजरस अर्थात् गंदा, घटिया और खतरनाक। जाहिर है, ऐसे ही काम आमतौर पर प्रवासी मजदूरों के नसीब होते हैं, जो स्थानीय लोग करना पसंद नहीं करते। अगर बंबई के जनजीवन से प्रवासी मजदूर अलग हो जायें तो बंबई महानगर अस्त-व्यस्त हो जाएगा।संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा पलायन और विकास पर जारी किया गया ताजा प्रतिवेदन बताता है कि किसी राज्य की जनसंख्या में प्रवासी लोगों के कारण एक फीसदी बढ़ोतरी है तो उस राज्य के जीडीपी में कम से कम एक फीसदी की बढ़ोतरी जरूर होगी। प्रतिवेदन में साफ कहा गया कि प्रवासी लोगों के कारण न तो स्थानीय लोगों को रोजगार छीनता है और न ही स्थानीय सार्वजनिक सेवाओं पर प्रवासी लोगों का भार बढ़ता है। सरकारी निकम्मापन छिपाने के लिए और पूंजीवादी मार्ग की विफलता से उत्पन्न जनाक्रोश को बेराह करने के निमित्त मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और बाल ठाकरे जैसे नेता फौरी तौर पर गलतबयानी करके राजनीतिक उन्माद की रोटी सेंकते हैं। पूंजीवाद ने असमानता पैदा की है। पूंजीवादी असमान विकास ने क्षेत्रीय विषमता और क्षेत्रीय तनाव पैदा किये हैं। भारत के हरेक राज्य का मजदूर हरेक राज्य में काम करता है। महाराष्ट्र के छः प्रतिशत प्रवासी मजदूर आंध्र, गुजरात अन्य राज्यों में काम करते हैं। इसी तरह तमिलनाडु, केरल जैसे विकसित राज्यों के लाखों मजदूर अन्य राज्यों में काम करते हैं। फिर भी बिहार, यूपी, मध्यप्रदेश, उड़ीसा जैसे पिछड़े राज्यों के लिये उचित है कि अपने संसाधनों का बेहतर उपयोग केमाध्यम से रोजगार जन्य उद्योगों का जाल बिछायें ताकि राज्य के बाहर रोटी रोजी के लिए पलायन की दिशा रोकी जा सके। आईएलओ द्वारा गठित विश्व आयोग ने अपने प्रतिवेदन में भी लिखा है कि वैश्वीकरण की वर्तमान प्रक्रिया एकांगी है। सीमा पार पूंजी के गमनागमन के साथ प्रवासी मजदूरों के गमनागमन को पूरक बनाना होगा।
- सत्य नारायण ठाकुर
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बैंक कर्मचारियों का वेतन वार्ता हेतु नवॉं वेतन समझौता - दो लाख 60 हजार सेवारत व एक लाख सेवानिवृत्त कर्मचारियों को पेंशन लाभ

तीस माह की लम्बी जद्दोजहद के बाद अन्ततोगत्वा ऑल इंडिया बैंक इम्पलाईज एसोसियेषन के नेतष्त्व में यूएफबीयू द्वारा 8 लाख बैंक कर्मचारियों एवं अधिकारियों, जो कि 26 सरकारी बैंकों, 12 निजी बैंकों और 8 विदेषी बैंकों में काम करते हैं, के वेतन वष्द्धि हेतु द्विपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर कर दिये गये जिससे 01।11.2007 से 17.50 प्रतिषत् की वेतन वृद्धि पिछली बकाया राषि के भुगतान सहित कर्मचारियो ंको मिलने का मार्ग प्रषस्त हो गया। इस समझौते से 3 लाख 50 हजार ऐसे कर्मचारी एवं अधिकारी जो वर्ष 1993 से 2010 के बीच सेवानिवृत्त हो चुके हैं और वर्ष 1993 में कतिपय यूनियन नेताओं के बहकावे में आकर पेंषन योजना का विकल्प नहीं दे पाये थे, भी 27.09.2009 से पेंषन प्राप्त कर सकेंगें । इस समझौते से बैंक कर्मचारियों एवं अधिकारियों में अपार खुषी का वातावरण है तथा इससे कर्मचारियों की यूनियन और उसके नेतृत्व में आस्था सुदृढ़ हुई है। इस समझौते की मुख्य बातें निम्न प्रकार हैंः-01. सरकार द्वारा सरकारी कर्मचारियों को हमेेषा से मिलने वाली पेंषन सुविधा को बन्द करने के बावजूद, बैंक प्रबन्धन एवं सरकार के गठजोड़ की तमाम नापाक साजिषों को विफल करते हुये यूनियन सभी कर्मचारियों के लिये पेंषन सुविधा जो कि एक आवष्यक सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बहाल कराने में सफल रही है । 02. पेंषन के समझौते से न केवल वर्तमान में कार्यरत् दो लाख 60 हजार कर्मचारी/अधिकारी सेवानिवृत्ति के बाद पेंषन प्राप्त कर सकेंगें बल्कि पिछले 15 वर्षों में सेवानिवृत्त हो चुके एक लाख से अधिक कर्मचारी एवं उनकी मत्यु की दषा में उनके परिजन पेंषन का लाभ उठा सकेंगें।03. यूनियन ने लिपिक वर्ग जिसके लिये भर्ती की न्यूनतम योग्यता प्रथम श्रेणी में हाई स्कूल है, की भर्ती के समय न्यूनतम वेतन एवं परिलब्धियॉं लगभग 12000/- कराने में सफलता प्राप्त की है ताकि करोड़ो षिक्षित बेरोजगार ईमानदारी से जीवन यापन कर सकें।04. सरकार एवं बैंकर्स के तमाम प्रयासों के बावजूद एआईबीईए के वर्ष 1964 के निर्णय कि हम अपने वेतन का फैसला स्वयं बैंक प्रबन्धन के साथ वार्ता से करेंगें, को एक बार फिर नवीं बार लागू करने में यूनियनें सफल रही हैं। सरकारी कर्मचारियों की तरह बैंक कर्मचारियों का फैसला तीसरे पक्ष के निर्णय पर निर्भर नहीं है। यही कारण है कि छठें वेतन आयोग की घोर कर्मचारी विरोधी सिफारिषें यथा - वर्ग चार के 18 लाख पदों को समाप्त कर देना, ठेके पर काम कराना आदि को बैंक यूनियनों द्वारा मजबूती के साथ नकार दिया गया है। 05. बैंक कर्मचारी अपनी मेहनत से जो लाभ कमाता है, बैंक उसी में से बैंक कर्मचारियों को वेतन एवं सुविधायें देते हैं, सरकारी कर्मचारियो ंकी भॉंति बैंक कर्मचारियों के वेतन की पूर्ति आम जनता पर टैक्स लगाकर नहीं की जाती। अतः वेतन वष्द्धि जो न्यायोचित हो और बैंकों की आर्थिक स्थिति के परिपेक्ष्य में तर्कसंगत हो, पर ही यूनियनें समझौता करती है। 06. बैंक प्रबन्धन एवं सरकार गम्भीर बेरोजगारी के बावजूद ठेके पर काम कराने को बढ़ावा दे रही है। यूनियनों ने इस समझौते में किसी भी प्रकार के काम को ठेके पर देने की अतिरिक्त अनुमति नहीं दी है। 07. बैंक यूनियन की एकता को छिन्न-भिन्न करने एवं सदस्यों का नेतृत्व में विष्वास कमजोर करने के लिये तमाम तरह की अफवाहें पिछले 30 माह से जारी रहीं और पिछले तीन दिनों में ऐसे तत्व यूनियन को बदनाम करने के लिये दिन-रात सक्रिय रहे। संतोष का विषय है कि बैंक कर्मचारियों ने ऐसे तत्वों को पूरी तरह तिरस्कृत कर दिया। 08. सरकार की देष विरोधी एवं जन-विरोधी आर्थिक नीतियों का विरोध करने के लिये गठित यूनाईटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस को छिन्न-भिन्न करने के लिये तमाम प्रयास किये गये। यह गर्व का विषय है कि इन सभी साजिषों को विफल करते हुये शत्-प्रतिषत् बैंक कर्मचारियांे का प्रतिनिधित्व करने वाली 9 यूनियनों ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किये। 09. सरकार द्वारा 35 लाख सरकारी कर्मचारियों को छठे वेतन आयोग की सिफारिषों के अनुरूप दी गयी वेतन वृद्धि पर 12 हजार 5 सौ करोड़ रूपया खर्च किया गया जबकि 8 लाख बैंक कर्मचारियों की वेतन वृद्धि पर समझौते के अंतर्गत 5200 करोड़ रूपया प्रतिवर्ष अतिरिक्त व्यय किया जा रहा है । इसके अलावा पेंषन का विकल्प देने पर जहॉं कर्मचारी 2800 करोड़ रूपये का अंषदान देंगें वहीं प्रबन्घन 6300 करोड़ रूपया खर्च करेंगें। 30 माह के बकाया भुगतान पर बैंकों को 13000 करोड़ रूपया और पेंषन विकल्प सहित कुल 19300 करोड़ रूपया खर्च करना पड़ेगा। कहा जाता है कि सरकारी कर्मचारियों का वेतन 60 प्रतिषत् से 90 प्रतिषत् बढा दिया गया है जो सिवाय गुमराह करने के कुछ नहीं है। यही कारण है किमध्यम एवं निम्न श्रेणी के कर्मचारी अपने को ठगा महसूस करते हुये लगातार आन्दोलनरत् हैं।हम इस अवसर पर जहॉं प्रदेष के बैंक कर्मचारियों को उनकी एकजुटता संघर्षषीलता एवं सफल हड़तालों के बाद मिली इस सफलता के लिये बधाई देते हैं वहीं बैंक कर्मचारियों की जायज मॉंगों का समर्थन करने के लिये सभी ट्रेड यूनियनों एवं प्रेस मीडिया का धन्यवाद करते हैं। हम इस अवसर पर इस बात का पुनः संकल्प लेते हैं कि सरकार द्वारा सरकारी बैंको ंको बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को बेचने के उद्देष्य से इनके निजीकरण की जो साजिष की जा रही है, उनका मजबूती के साथ विरोध किया जायेगा। यह समझौता 31 अक्टूबर, 2012 तक के लिये लागू है, उसके बाद फिर जहॉं हम अपनी वेतन वृद्धि की मॉंग के लिये संघर्ष करेगें वहीं देष की आम जनता विषेषकर बैंक ग्राहकों के हितों की रक्षा करने के लिये सरकार से टकराने में किसी प्रकार की हिचकिचाहट न रखते हुये यूनियन को आगे बढ़ायेगें ।
- एन.के.बंसल
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बंधुआ मजदूरी का बदलता चेहरा

बंधुआ मजदूरों का जिक्र करने पर सरकार का सीधा और साफ जवाब होगा कि अब देश में मजदूरों को बंधुआ नहीं बनाया जा रहा है। केंद्र और राज्य सरकारें दोनों इस बात पर साथ-साथ दिखाई पड़ती हैं। केंद्र व राज्य सरकरों के श्रम मंत्रालय की जारी रपटों से इस बात की हमें जानकारी भी मिलती है कि देश में न तो अब बंधुआ मजदूर हैं और न बनाए जा रहे हैं। देश में बंधुआ मजदूरी उन्मूलन का कानून 1975 से लागू है। इस कानून के लागू होने के बाद से सरकारों ने अपने प्रयासों के जरिए बंधुआ मजदूरी की व्यवस्था को जड़ से उखाड़ फेंका है। यह दावा हर सरकार बढ़-चढ़ कर करती है। लेकिन हकीकत ठीक इसके उलट है।बीते दिनों, बीस राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों के कई शहरों में हुए एक सर्वेक्षण ने देश में बंधुआ मजदूरी के मामले मंे सरकारी दावों की कलई खोल कर रख दी है। असंगठित क्षेत्रों के कामगारों के लिए बनाई गई राष्ट्रीय अभियान समिति के अगुवाई में मजदूरों के लिए काम कर रहे कई मजदूर संगठनों व गैर-सरकारी संगठनों के इस राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण से पता चलता है कि देश मेंबंधुआ मजदूरी खत्म नहीं हुई है। भले ही इसक स्वरूप नई जरूरतों के हिसाब से बदल गया है, लेकिन असंगठित क्षेत्रों में हो रहा ज्यादातर श्रम, किसी न किसी रूप में, बंधुआ मजदूरी का ही एक रूप है। यह तथ्य भी सामने आया है कि आज देश के ज्यादातर इलाकों में बंुधआ मजदूरी की परंपरा के फिर से जड़ पकड़ने की बड़ी वजह पलायन और विस्थापन है।किसी मजदूर को अपना गांव घर छोड़ कर दूसरी जगह मेहनत करने इसलिए जाना पड़ता है, क्योंकि अपने इलाके में उसे दो वक्त की रोटी भी ठीक ढंग से नहीं मिल पाती है। कहीं सूखा, कहीं बाढ़ या फिर किसी के पास खेती के लिए नाकाफी जमीन मजदूरी का एक बड़ा कारण बनते हैं। ऐसे में, वे जो बस ख्ेातिहर मजदूर हैं, दोहरी मार झेलते हैं। एक तो अपने इलाकों में खेती के बदतर स्थिति के कारण मजूरी बहुत कम पाते हैं और फिर दबंगों व सामंतों की धौंस अलग सहते हैं। बेहतरी की उम्मीद में ही वे पलायन करने को मजबूर होते हैं।बंधुआ मजदूरी का नया स्वरूप जो सामने आया है, उसमें मजदूरों का सबसे बड़ा हिस्सा ऐसे मजदूरों का ही है।ख्ेाती, ईंट-भेट्टा, निर्माण-उद्योग और खदानों जैसे कई व्यवसायों में अपना खून-पसीना एक करने वाले मजदूरों को बड़े ही सुनियोजित तरीके से बंधुआ बनाया जाता है। मजदूरों को नियुक्त करवाने वाले दलाल शुरूआत में ही थोड़े से रुपए बतौर पेशगी देकर लोगों को कानूनन अपन कर्जदार बना देता है। रुपयों के चक्कर में पड़ कर मजदूर अपने नियोक्ता या इन दलालों काबंधुआ बन कर रह जाता है।अधिकतर मामलों में, ये दलालसंबंधित उद्योगों की नजर में मजदूरों के ठेकेदार होते हैं। इन ठेकेदारों सेप्रबंधन अपनी जरूरत के मुताबिक मजदूरों की आपूर्ति करने को कहता है और मजदूरों के श्रम का भुगतान भी ये ठेकेदार ही करते हैं। बाद में ये ठेकेदार या दलाल, आप इन्हें जो भी संज्ञा दें, मजदूरों के भुगतान में हर तरह की बेईमानी करते हैं। नियोक्ता और श्रमिक के बीच दलालों की यह महत्वपूर्ण उपस्थिति मजदूरों के शोषण को और गंभीर बना देती है। दलाल मजदूरों का हक मारने में किसी तरह से गुरेज नहीं करते, उन्हें न्यूनतम दिहाड़ी देना तो दूर की बात हैं। मजदूरों का मारा गया हक ही इन दलालों के लिए मुनाफा है। ऐसी स्थिति में मजदूरों के प्रति किसी भी प्रकार की जिम्मेदारी, जैसे कि रहने और आराम करने के जगह की व्यवस्था, स्वास्थ्य सुविधाएं, बीमा, खाने के लिए भोजन और पीने के लिए पानी को सुलभ बनाना और दुर्घटनाओं के स्थिति में उपचार जैसी बातों से अमूमन नियोक्ता अपने आप को विमुख कर लेता है। नियोक्ता इन सब के लिए ठेकेदारों को जिम्मेदार बताता है तो ठेकेदार नियोक्ता को और ऐसे में मजदूर बेचारे बड़े बदतर स्थिति में इसी तरह खटते रहते हैं।महानगरों में काम करने वाली घरेलू नौकरानियों का ही उदाहरण लें। गरीबी और भूख के साथ-साथ विकास परियोजनाओं के कारण विस्थापित हो रहे छत्तीसगढ़ और झाड़खंड के आदिवासी रोजी-रोटी के लिए इधर- उधर भटकते रहते हैं। ऐसे में आदिवासी लड़कियों को श्रम-दलाल महानगर ले आते हैं। उन्हें प्रशिक्षित करके दूसरों के घरों में घरेलू काम करने के लिए भेजा जाता है। इन घरों में ऐसी लड़कियों की स्थिति बंधुआ मजदूरों से ज्यादा नहीं होती। अठारह से बीस घंटे रोज मेहनत के बाद भी नियोक्ता का इनके साथ सलूक आमतौर पर गैरइंसानी ही होता है। इन के यौन शोषण की आशंका तो बनी ही रहती है। इतने प्रतिकूल परिस्थिति में भी इनके बंधुआ बने रहने का मुख्य कारण आजीविका के लिए विकल्पहीन होने के साथ-साथ नियोक्ता के चाहरदीवारी के बाहर की दुनिया से अनभिज्ञता भी है। मजबूरन अत्याचार सहते रहने के बाद भी घरेलू नौकरानियां अपेन नियोक्ता के घर में कैद रह कर चुपचाप खटती रहती है, क्योंकि उनके पास और कोई विकल्प नहीं है।श्रमिकों पर होने वाला शोषण यहां रुकता नहीं है। ईंट-भेट्टे पर काम करने वाले मजदूरों में महिलाओं के साथ-साथ पुरुष और बच्चे भी काम करते हैं। इन्हें भी काम दिलाने वाले दलाल गांवों- जंगलों से कुछ रुपयों के बदले बहला फुसला कर काम करवाने के लिए लाते हैं। ईंट भेट्टे का काम एक मौसमी काम है। पूरे मौसम इन श्रमिकों के साथबंधुआ के तरह ही व्यवहार किया जाता है और इन्हें न्यूनतम दिहाड़ी देने का चलन है ही नहीं। और तो और, अध्ययन के मुताबिक महिलाओं को लेकर यौन-हिंसा ईंट भेट्टे में होने वाली आम घटना है। ईंट-भेट्टें में काम करने वाले मजदूरों की खस्ताहाल स्थिति पूरे देश में एक जैसी है।हद तो तब हो जाती है, तब मजदूरों पर होता यह अन्याय एक तरफ सरकारों को सूझता नहीं, दूसरी ओर, खुलेआम सरकार अपने कुछ योजनाओं के जरिए बंधुआ मजदूरी को प्रश्रय भी देती है। बतौर उदाहरण लें तो बंधुआ मजदूरी का एक स्वरूप तमिलनाडु में सरकार के प्रोत्साहन पर चल रहा है। बंधुआ मजदूरी का यह भयंकर कुचक्र सुमंगली थित्तम नाम की योजना के तहत चलाया जाता है। इस योजना को मंगल्या थित्तम, कैंप कूली योजना या सुबमंगलया थित्तम के नामों से जाना जाता है। इसके तहत सत्रह साल या कम उम्र की किशोरियों के साथ यह करार किया जाता है कि वह अगले तीन साल के लिए किसी कताई मिल में काम करेंगी और करार की अवधि खत्म होने पर उन्हें एकमुश्त तीस हजार रुपए दिए जाएंगे, जिसे वे अपनी शादी में खर्च कर सकती हैं। तमिलनाडु के नौ सौ तेरह कपास मिलों में सैंतीस हजार किशोरियां इस योजना के तहत बंधुआ पाई गई हैं। इनके बंधुआ होने का कारण यह है कि करार के अवधि के दौरान अगर कोई लड़की उसके नियोक्ता कपास मिल के साथ काम न करना चाहे और मुक्त होना चाहे तो उसकी पूरी कमाई को मिल प्रबंधन हड़प कर लेता है। साथ ही, कैंपों में रहने को विवश की गई इन लड़कियों के साथ बड़ा ही अमानवीय व्यवहार होता है। इन्हें बाहरी दुनिया से बिल्कुल अलग रखा जाता है, किसी से मिलने-जुलने की इंजाजत तक नहीं होती है। एक दिन में अठारह घंटों का कठोर परिश्रम करवाया जाता है। हफ्ते में बस एक बार चंद घंटे के लिए बाजार से जरुरी खरीदारी करने की छूट मिलती है। इनके लिए न तो कोई बोनस है, न ही किसी तरह की बीमा योजना और न ही किसी तरह की स्वास्थ्य सुविधा। दंरिदगी की हद तो तब है, जब इन अल्पव्यस्कों को यौन उत्पीड़न का शिकार बनाया जाता है। हाल ही में एक खबर छपी थी कि शंाति नाम की लड़की को ढाई साल मिल में काम के बाद भी बदले में एक कौड़ी नहीं मिली। उलटे, मिल के मशीनों ने उसे अपाहिज बना दिया और प्रबंधन का यह बहाना था कि दुर्घटना के बाद शांति के इलाज में उसकी पूरी कमाई खर्च हो गई।बंधुआ मजदूरी के चक्कर में फंसने वाले ज्यादातर लोग या तो आदिवासी होते हैं या दलित। आदिवासियों काबंधुआ बनने का कारण उनके पारंपरिक आजीविका से उन्हें महरूम करना है। तमिलनाडु की एक जनजाति है इरुला। ये लोग पारंपरिक रूप से सपेरे रहे हैं, लेकिन सांप पकड़ने पर कानूननप्रतिबंध लगने के बाद से कर्ज के बोझ तले दबे इस जनजाति के लोगों को बंधुआ की तरह काम करने के लिए अभिशप्त होना पड़ा। चावल मिलों, ईंट-भट्टें और खदानों में काम करने वाली इस जनजाति पर हर तरह के अत्याचार किए जाते हैं। तंग आकर जब रेड हिल्स के चावल मिलों में बंधुआ मजदूरी करने वाले लगभग दस हजार लोगों ने अपना विरोध दर्ज किया तो उन्हें मुक्त कराने के बजाए एक सक्षम सरकारी अधिकारी ने उन्हें नियोक्ता से कह कर कर्ज की मात्रा कम करवाने के आश्वासन के साथ वापस काम पर जाने को कहा। सरकारी मशीनरी की ऐसी भूमिका मिल मालिकों और अधिकारियों की सांठ-गांठ का प्रमाण है। बंधुआ मजदूरी के पूरे मामले में एक बहुत बड़ा कारण आजीविका के लिए अन्य विकल्पों और अवसरों काउपलब्ध नहीं होना है। साथ ही, अब तक जो हालात दिखे हैं, उनके आधार पर सरकारी लालफीताशाही पर किसी तरह का भरोसा करना ठीक नहीं है। बंधुआ मजदूरी का तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण स्थायी नौकरी के बदले दलालों के मध्यस्था में मजदूरों के श्रम का शोषण करने की रणनीति अंतर्निहित है। ऐसे में संसद और विधानसभा में बैठ कर उन्मूलन के कानून बनाने के अलावा सरकार को इसके पनपने और फलने-फूलने के कारणों पर भी चोट करना पड़ेगा।
- देवाशीष प्रसून
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मई दिवस 2010: नई जिम्मेदारियां

पिछले वर्षों के समान इस वर्ष भी दुनिया भर के मजदूर एक मई को इकट्ठा होकर और जुलूसों की शक्ल में अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस मनायेंगे। साथ ही वे अपनी उपलब्धियों और असफलताओं का जायजा लेंगे, समस्याओं पर विचार करेंगे और 21वीं सदी की आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए अपनी शक्ति इकट्ठा करेंगे।हाल में जो समस्या सबसे विकराल रूप धारण कर रही है वह है खाद्यान्नों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की तेजी से बढ़ती हुई कीमतें। इनका मजदूरों और गरीबों पर खास प्रभाव पड़ा है। इसके अलावा नौकरियां खोने और वेतन में कटौती के कारण मजदूरों पर पूंजीपतियों द्वारा दबाव बढ़ता जा रहा है। वर्तमान आर्थिक संकट से निकलने का पूंजीपतियों ने यही रास्ता खोज निकाला है जबकि यह संकट पूंजीवादी व्यवस्था का ही परिणाम है। सारे देश में बड़े पैमाने पर आंदोलन चल रहे हैं लेकिन सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है। शासक वर्गअधिकाधिक घमंडी, प्रभुत्ववादी बनता जा रहा है।यूपीए की जनविरोधी नीतियांयूपीए सरकार पूंजीपति वर्ग के वर्गहितों की रक्षक है। वह लगातार सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का विनिवेश कर रही है और मजदूर प्रतिरोध को दबाने की कोशिश कर रही है। इसके लिए वह निरंतर श्रम कानूनों का उल्लंघन कर रही है, दमन कर रही है और ट्रेड यूनियन तथा जनवादी अधिकारों का हनन कर रही है। कीमतों में बढ़ती वृद्धि सरकार द्वारा अपनायी गई आर्थिक और राजनीतिक नीतियों का ही परिणाम है।पिछले डेढ़ वर्षों में सारे विश्व में वित्तीय और आर्थिक संकट तेजी से फैल गया है। अमरीका से इसकी शुरूआत होकर यह संकट सारे विश्व में फैल गया है। विभिन्न देशों पर इसका प्रभाव अलग-अलग मात्रा में पड़ा है जो इस बात पर निर्भर है कि वे किस हद तक विश्व पूंजीवादी अर्थतंत्र का हिस्सा है। विशाल पैमाने पर महाकाय वित्तीय संस्थाएं जैसे बैंक, बीमा, मार्गेज कम्पनियां और बड़े कारपोरेट कारोबार दिवालिया हो गये और धराशायी हो गये। आज वित्तीय अर्थतंत्र वास्तविक अर्थतंत्र से कहीं बड़ा हो गया है। सट्टेबाजी, जूआ और वित्तीय जोड़तोड़ के जरिये बिना भौतिक उत्पादन के बड़े पैमान पर धन इकट्ठा किया जा रहा है। कई पूंजीवादी अर्थतंत्रों में बिना उत्पादन के मुनाफा एक नियम बन गया है। यह संकट पूंजीवादी उत्पादन पद्धति की कमजोरी दर्शाता है। यह 1930 के आर्थिक संकट से अधिक गहरा है। इस संकट में नवउदारवादियों के उन दावों को झूठा साबित कर दिया है जिसके हिसाब से वर्तमान व्यवस्था संकट मुक्त और आत्मनियमित है।भारत जैसे विकासमान देशों के लिए इस नीति का मतलब है उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण जिसे आमतौर पर आर्थिक सुधारों का नाम दिया जा रहा है। भारतीय पूंजीपति वर्ग ने आर्थिक सुधारों के नये दर्शन को देश विकास की गारंटी के रास्ते के रूप में अपना लिया है।मजदूर संघर्षइन परिस्थितियों में पिछले दशकों में पहली बार सभी केन्द्रीय टेªड यूनियनों को साथ मिलकर सरकार की नीतियों के खिलाफ संयुक्त संघर्ष करने पर मजबूर होना पड़ा है। उनका कहना है कि संयुक्त टेªड यूनियन आंदोलन मूल्यवृद्धि, निगमों के मजदूर वर्ग के खिलाफ अपराधों और सरकार को रास्ते पर लाने का एकमात्र तरीका है।इस वर्ष 5 मार्च को केन्द्रीय टेªड यूनियनों ने सारे देश में जुझारू सत्याग्रह किया और संगठित तथा असंगठित क्षेत्रों के 10 लाख से अधिक मजदूरों ने इसमें हिस्सा लिया। आने वाले समय में इस एकता को बरकरार रखना जरूरी है।वामपंथी राजनैतिक पार्टियां शहरों और गांवों के मजदूरों और शोषित जनता के बीच काम करती हैं। उन्होंने 12 मार्च को पार्लियामंेट के सामने देशव्यापी मार्च किया जिसमें कीमतों की वृद्धि और खाद्य असुरक्षा के विरोध में जनता ने आवाज बुलंद की। उन्होंने मांग की कि कीमतों पर रोक लगायी जाये और सबों के लिए खाद्य सुरक्षा की गारंटी की जाये। उन्होंने अपना ध्यान सबों के लिए भोजन, नौकरियां, भूमि और जनवादी अधिकार मुहैया करने पर केन्द्रित किया। इसके बाद आया 8 अप्रैल का जेलभरो अभियान, जिसमें बड़े पैमाने पर पिकेटिंग की गयी और सारे देश के 25 लाख से भी ज्यादा लोगों ने देश के हर जिले में मंडल, तहसील यहां तक कि केरल में प्रत्येक असेम्बली चुनाव क्षेत्र के स्तर पर संघर्ष किया। इसके बाद 27 अप्रैल को देशव्यापी हड़ताल आह्वान किया गया जिसका सारे देश में और प्रत्येक राज्य के बड़े पैमाने पर पालन किया गया। इसमें वामपंथी पार्टियों ने पहल की और अन्य गैर कांग्रेसी, गैर भाजपा, धर्मनिरपेक्ष जनवादी पार्टियों को मूल्यवृद्धि के संघर्ष में शामिल किया।संसद के अंदर यूपीए सरकार कटौती प्रस्ताव पर किसी तरह से बच गयी है। यह कटौती प्रस्ताव वामपंथी पार्टियों ने अन्य पार्टियों के साथ मिलकर पेश किया था। यह एक विशेष कटौती प्रस्ताव था जिसका निशाना सरकार का वह कदम था जिसके तहत ईंधन और खादों की तथा अन्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि की गई है। कांग्रेस की यह आदत हो गई है कि वह चालबाजी,धोखाधड़ी और डरा-धमका कर कुछ अन्य पार्टियों की मदद से अपने पक्ष में मतदान करवा लेती है।घटनाओं ने दर्शाया है कि पूंजीवाद, गरीबी, बेकारी, भूखमरी और बीमारी की समस्याओं को हल करने में असमर्थ है। नवउदारवाद का हर कदम इन समस्याओं को बढ़ाता है और गरीब और अमीर के बीच की खाई को और भी गहरा करता है। पूंजीवादी तबके पूंजीवादी व्यवस्था को बचाने के लिए वित्तीय पैकेज और वित्तीय बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं। मजदूर वर्ग के आंदोलन और प्रगतिशील शक्तियों की जिम्मेदारी है कि वह पूंजीवादी व्यवस्था की जगह एक नई समाजवादी व्यवस्था कायम करें।बढ़ता आंदोलनपिछले समय में सरकार के नवउदारवादी आर्थिक नीतियों औरसुधारों तथा मुक्त बाजार, बड़े पूंजी और कारपोरेट घरानों के लिए मुनाफा बढ़ाने की नीतियों के खिलाफ बढ़ते आंदोलन का जमाना रहा है। इसमें मजदूरों ने जनता के अन्य हिस्सों के साथ मिलकर महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। यूपीए सरकार बड़ी हठधर्मिता दिखाते हुए कीमतों की परिस्थिति सुधारने के कोई कदम उठाने से इन्कार कर रही है। इसलिए संघर्ष जारी रखना जरूरी होगा और आने वाले दिनों में आंदोलन के नये तरीके अपनाने पड़ेंगे ताकि जनता के ज्यादा से ज्यादा हिस्से इसमें शामिल किये जा सकें।बिहार में भूमि संघर्ष की तीन मंजिले गुजर चुकी हैं अब वहां भूमिहीन मजदूर और ग्रामीण सर्वहारा का नया संघर्ष एजेंडे पर है। भूमि सुधार कमीशन ने प्रत्येक भूमिहीन परिवार को एक एकड़ जमीन और निवास के लिए दस डिस्मल जमीन देने का सुझाव दिया है। यदि राज्य सरकार इसे लागू करने से इन्कार करती है तो ग्रामीण भूमिहीन श्रमिकों के लिए संघर्ष का एक और अवसर पैदा होगा ताकि इन प्रावधानों को लागू करवाया जा सके। दूसरी जगहों पर किसान विकास और प्रोजेक्टों के नाम पर उनकी जमीने जबर्दस्ती लेने के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। इनमें विशेष आर्थिक क्षेत्र अर्थात ‘सेज’ तथा अन्य शामिल हैं। वे औपनिवेशिक काल के भूमिअधिग्रहण अधिनियम की जगह नये एक्ट के लिए संघर्ष कर रहे हैं ताकि किसानों के हितों की रक्षा की जा सके।विदेश नीतियूपीए सरकर ने वाशिगंटन सहमति और मुक्त बाजार अर्थतंत्र का अमरीकी मॉडल एवं नवउदारवद स्वीकार कर लिया है। इसी प्रकार विदेश नीति में भी अमरीका परस्त झुकाव देखा जा रहा है। अमरीका के सथ कृषि, ज्ञान के क्षेत्र और अन्य प्रकार के खुले और छिपे समझौते किये जा रहे हैं। यह न्यूक्लियर लाइबिलिटी बिल के मसविदे से स्पष्ट हो जाता है जो भारत अमरीका न्यूक्लियर समझौते का परिणाम है। इस प्रकार हमारी साम्राज्वाद विरोधी और गुटनिरपेक्ष विदेश नीति कमजोर की जा रही है।फिर भी विकासमान देशों में भारत में अर्थतंत्र का स्थान दूसरा है। अंतर्राष्ट्रीय मामलों में इसकी विशेष रणनीतिक जगह है। भारत गुटनिरपेक्ष आंदोलन के जन्मदाताओं में एक है। इन कारणों से भारत, ब्राजील, चीन, दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों के साथ मिलकर ‘बेसिक’ जैसे बना रहा है। मजदूर वर्ग समेत अन्य प्रगतिशील शक्तियों को अमरीकी परस्त नीतियों का विरोध करने के लिए इस रूझान को मजबूत करना पड़ेगा।बराक ओबामा का अमरीका का राष्ट्रपति बनना अवश्य ही एक महत्वपूर्ण घटना है। लेकिन इससे साम्राज्यवाद का चरित्र बदल नहीं जाता खासकर वैश्वीकरण की वर्तमान मंजिल में।साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष सभी प्रगतिशील शक्तियों की मूलभूत जिम्मेदारी है। 20वीं सदी में साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों के साथ जुड़ा हुआ था। 21वीं सदी में साम्राज्यवादी विरोधी संघर्ष संघर्ष समाजवाद के लिए संघर्ष के साथ अभिन्न रूप से जुड़़ा हुआ है।अति मुनाफे की लूट के चक्कर में पूंजीवाद इस धरती के सीमित स्रोतों का उत्पादन और उपभोग के रूप मेंअंधाधुंध इस्तेमाल कर रहा है। इसके फलस्वरूप सारी मानवता और धरती पर पर्यावरण, प्रदूषण और मौसम के परिवर्तन का खतरा मंडरा रहा है। कोपेनहेगन शिखर सम्मेलन ने दर्शाया है कि अमरीका तथा अन्य विकसित पूंजीवादी देश मानवता को इस भयंकर खतरे से बचाने के लिए अपने उत्पादन और उपभोग के तौर-तरीके बदलना नहीं चाहते। वे ‘समान लेकिन विभेदीकृत जिम्मेदारीयों’ की बात कर रहे हैं।आने वाले समय में राजनैतिक या वैचारिक सम्बद्धता से परे होकर टेªड यूनियनों को व्यापक एकता कायम करनी होगी। इस दिशा में पहले कदम उठाये जा चुके हैं। अब जिम्मेदारी यह है कि इस काम को धैर्य, परस्पर सम्मान और सहमति के जरिये आगे बढ़ाया जाये।वामपंथी पार्टियों को आपस में बेहतर संयोजन करना पड़ेगा, वामपंथी एकता को मजबूत करना होगा ताकि मेहनतकशों के संघर्षों को सही दिशा प्रदान की जा सके।मई दिवस 2010 को जनता के सभी हिस्सों का क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए जोरदार आह्वान करना चाहिए।
- ए.बी. बर्धन
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बोलीविया से उम्मीदें

बोलीविया के कोचाबांबा शहर में 19-24 अप्रैल तक जलवायु परिवर्तन पर सम्मेलन हुआ। इसमें दुनिया भर से सत्तर सरकारों के नुमाइंदों और 15 हजार लोगों ने हिस्सा लिया। बोलिविया का तीसरा सबसे बड़ा शहर कोचाबांबा दुनिया भर में पानी के निजीकरण के खिलाफ महान संघर्ष के लिए जाना जाता है। इस शहर पर सारे विश्व की नजरें टिकीं हुई थीं कि यह एक न्यायसंगत जलवायु परिवर्तन समझौते को अपने मुकाम तक पहुंचाएगा।सम्मेलन से पहले आइसलैंड में हुई घटना के कारण करीब सात लाख लोग उत्तरी यूरोप के हवाई अड्डों पर फंसे रहे, उनमें से कुछ गिन चुने किस्मत वाले ही इस शहर तक पहुंच पाए। पर फिर भी अंतर्राष्ट्रीय समझौतों में एक अहम नेतृत्व प्रदान करने की बोलीविया की भावना और उत्साह मे कोई कमी नहीं आई। कोचाबांबा के पास ही एक छोटा-सा गांव है - टिकीपाद्धा, जहां हमें पंजीकरण के लिए जाना था। वहां पर मौजूद स्थानीय लोगों, छात्रों और पड़ोसी लातिन अमरीकी देशों से आए लोगों के जनसमूह को देखकर यह और भी साफ हो गया कि इस सम्मेलन से लोगों को किस प्रकार की आशाएं हैं। कुछ ऐसा ही माहौल यूनिवाल में देखने को मिला, जहां सभाएं और परिचर्चाए हो रही थीं। भाषा बातचीत में एक बड़ी बाधा साबित हो रही थी, फिर भी भावनाओं को समझने में कोई दिक्कत नहीं हो रही थी। सभी एक स्वर में कह रहे थे - पृथ्वी और विकासशील देशों में रह रहे 45 लाख से ज्यादा लोगों के अधिकारों को तय करने के लिए कड़े कदम उठाने होंगे। विकसित देशों को समझना और स्वीकार करना होगा कि यह केवल अमीर और गरीब के बीच का कोई संघर्ष नहीं है, न ही अत्यधिक हानि और भव्य जीवन-शैली का। यह आवश्यकता पृथ्वी को बचाने की है जिसका दर्जा मां से कम नहीं। यह मसला केवल दुनिया भर से आए 15 हजार लोगों और 70 देशों की सरकारों का ही नहीं है बल्कि पृथ्वी के अधिकारों से जुड़ी दुनिया भर के लोगों की भावनाओं का है। इन लोगों में वे भी शामिल हैं जिन पर ऐतिहासिक रूप से जलवायु और आर्थिक अन्याय और शोषण किया गया। इनमें से कई लोगों के पास इस शहर तक पहुंचने की क्षमता तक नहीं है। इन तमाम लोगों की जिंदगी बोलीवियाई शहर में हो रही चर्चाओं पर टिकी थी।इस प्रकार ‘पीपुल्स वर्ल्ड कांफ्रेंस ऑन क्लाइमेट चेंज’ पर यह विशाल जिम्मेदारी थी कि वह जलवायु परिवर्तन वार्ता में नैतिकता, बराबरी और न्याय को पक्का करे। सम्मेलन को अफ्रीका, एशिया, छोटे द्वीपीय देश लातिन अमरीका के देशों का सहयोग हासिल था। लातिन अमरीकी देशों- खासतौर पर ब्राजील, अर्जेंटीना, वेनेजुएला की -एकजुटता सम्मेलन की सफलता के लिए अहम साबित हुई है। भारत, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण कोरिया, चीन जैसे बड़े विकासशील देश अहम भूमिका निभा सकते थे लेकिन ये सिर्फ संभावनाएं बन कर रह गईं। इन देशों ने इस जन-सम्मेलन को उत्सापूर्वक नहीं लिया है। इन देशों की गैर-भागीदारी ने लोगों, आदिवासियों, मूल निवासियों और नागर समाज संस्थाओं के प्रति इनके विचारों को जाहिर कर दिया है। इन्हें लगता है कि अंतर्राष्ट्रीय वार्ता में भाग लेने की क्षमता लोगों और नागर समाज संस्थाओं में नहीं है। भारत के पर्यावरण एवं वन मंत्री जयराम रमेश से जब एक प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि आगे की वर्तााओं में भारत को कुछ तथ्यों पर जेार देने की जरूरत है तो उनका जवाब था कि समझौता वार्ता करना सरकार का काम है। नागर समाज संस्थाओं को देश में शिक्षा, जागरूकता और अनुकूलन के पहलुओं पर काम करना चाहिए। वार्ता के गूढ़ पहलुओं को समझने की नागरिक समाज की क्षमता के प्रति उपेक्षा चीन में भी थी। दुनिया के अन्य देश विशेष रूप से उत्तरी अमेरिका के लिए यह ‘मसखरों का सम्मेलन’ था। विकसित देशें को यह समझना जरूरी है कि दुनिया भर से आए लोग मसखरे नहीं थे। इन्हें यह भी समझना होगा कि लोग व्यक्तिगत रूप से भले ही गरीब हो सकते हैं लेकिन सामूहिक रूप से इनके पास सबसे ज्यादा संसाधन हैं, जिन पर विकसित देशों ने न्याय, समानता और प्रकृति के नियम की भारी उपेक्षा कर कब्जा किया हुआ है। 2009 में एक अरब से अधिक लोग भूख से लड़ रहे थे। इस सदी में अंत तक इस लड़ाई में करीब 60 करोड़ लोग और शामिल हो जाएंगे। सवाल भोजन की उपलब्धता या लोगों की उस तक पहंुच का नहीं है। सवाल विकास से जुड़े नैतिक मूल्यों का है। मूल सवाल यह है कि एक तरफ तो उपभोग कर पाने से कहींअधिक मात्रा में भोजन, पानी, ऊर्जा और अन्य संसाधन उपलब्ध हैं, वहीं दूसरी ओर बहुतायत में लोगों को उनकेअधिकारों का अंश मात्र भी हासिल नहीे है। सवाल भूख से जुड़ा हो या पृथ्वी के संरक्षण से, दोनों का जवाब बहुत हद तक कृषि में शामिल है। खास तौर पर विकसित देशों में कृषि को जलवायु के साथ-साथ आर्थिक संकट से बचाना होगा। छोटे और मध्यम किसान इन संकटों से खासतौर से प्रभावित हो रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र ने भी राष्ट्रपति इवो मोराले के इस प्रस्ताव का समर्थन किया है कि 22 अप्रैल मां-पृथ्वी के अधिकारों के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस के में मनाया जाए। जरूरत इस बात की है कि सभी मां-पृथ्वी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर करें।
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संसद में भाकपा - दंतेवाड़ा में 62वीं बटालियन पर माओवादियों के हमले पर बयान

उप सभापति महोदय। सर्वप्रथम हमारी पार्टी यानि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवानों की हत्या की कड़े से कड़े शब्दों में भर्त्सना करती है। हमारी पार्टी मारे गये उन जवानों के परिवार के सदस्यों के प्रति संवेदना और सहानुभूति प्रगट करती है। छत्तीसगढ़ में हुई घटना पर गृहमंत्री का बयान विशेष है। लेकिन मैं अति विशेष होना चाहता हूं।आज छत्तीसगढ़ में जनजातियों के लोग मजबूरन हाशिये पर आ रहे हैं। उन्हें कठोर यातनाएं दी जा रही हैं। खनन कार्यो, प्रोजेक्ट और विकास कार्यों के नाम पर उन्हें अपने निवास स्थान से हटाया जा रहा है। वन सम्पदा निगमित क्षेत्र और बहुराष्ट्रीय निगमों को सौंपा जा रहा है। छत्तीसगढ़ के आदिवासियों पर थोपी जा रही नवउदारवादी नीतियों के कारण वहां नई स्थिति उत्पन्न हो गई है। सर्वप्रथम इसे समझने की जरूरत है। मैं सभी राजनैतिक दलों से अनुरोध करता हूं कि इस समस्या पर धैर्य से विचार करें। यहां मैं डा। अम्बेडकर को उद्धृत करना चाहूंगा। संविधान पीठ में अपेन अंतिम भाषण में उन्होंने कहा था कि “अगर हम संविधान का इस्तेमाल जनता की समस्याओं को समझने और उसका समाधान करने के लिए एक असरदार औजार के रूप में करने में असफल होते हैं तो इसका परिणाम अराजकता का बोलबाला हो सकता है।” यह डा. अम्बेडकर की चेतावनी थी।उग्रवाद: गलत रास्ताआज वामपंथी उग्रवाद जो कर रहा है वह अराजकतावाद ही है। कम्युनिस्ट होने की हैसियत से हम उनके तरीकों से सहमत नहीं है और हम उनकी भर्त्सना करते हैं। लेनिन के समय भी ऐसा ही था। उन्होनंे कहा था कि वामपंथी उग्रवाद और वामपंथी साम्यवाद ‘बचपन की अराजकता’ है। राजनीति में वामंपथी उग्रवाद का रूझान एक प्रवृत्ति है। इससे वैचारिक और राजनैतिक स्तर पर लड़ना होगा और नियम-कानून के अंतर्गत इसका समाधान करना होगा। इससे निपटने के लिए सरकार को सही नीति बनानी होगी। आज हम देख रहे हैं कि इस संबंध में सरकार की नीति त्रुटिपूर्ण है। यह गलत नीति है और सरकार को नीति का पुनर्निर्धारण करना चाहिए। जहां तक छत्तीसगढ़ का संबंध है सरकार को अपनी नीति के संबंध में पुनर्विचार करनी चाहिए।‘सलवा जुडूम’ से हानिइस सदन में मैंने कई बार ‘सलवा जुडुम’ का मामला उठाया है। आज हम इस समस्या को उठा रहे हैं क्योंकि हम छत्तीसगढ़ की स्थिति पर बहस कर रहे हैं। बयान का संबंध छत्तीसगढ़ में घटी घटना से है। इसलिए पहले भी मैंने ‘सलवा जुडुम’ की समस्या को उठाया था। आज छत्तीसगढ़ में क्या हो रहा है? न्याय देने और ‘सलवा जुडुम’ पीड़ितों को पुनर्वास देने में असफलता के कारण माओवादियों की संख्या बढ़ रही है।सलवा जुडुम के पीड़ितों को न तो न्याय मिला है और न ही उनका पुर्नवास हुआ है। इसका परिणाम माओवादियों के द्वारा भर्ती किये जाने की संख्या में वृद्धि हुई है। मैं खुफिया का आंकड़ा प्रस्तुत कर रहा हूं कि ‘सलवा जुडुम’ शुरू होने के बाद माओवादियों द्वारा भर्ती किये जाने में कम से कम 22 प्रतिशत की वृद्धि हुई हैं। अगर मैं गलत हूं तो गृहमंत्री मेरे बयान को सुधार सकते हैं। भारत सरकार को इसके संबंध में राजनीति नहीं करनी चाहिए। इसे न तो छत्तीसगढ़ में और न ही पश्चिम बंगाल में राजनीति करनी चाहिए। इस समस्या पर न तो गृहमंत्री और न ही रेल मंत्री को राजनीति करनी चाहिए। अगर इस तरह की राजनीति होती है तो हम देश के प्रजातांत्रिक ढांचे को क्षति पहुंचा रहे हैं।सरकारों की उदासीनतामैं इस ओर ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा कि 17.10.2008 को छत्तीसगढ़ सरकार ने स्वीकार किया कि सलवा जुडुम के कारण जलाये गये घरों के कारण पीड़ितों का पुनर्वास करने के साथ ही उनकी क्षतिपूर्ति भी करेगी। लेकिन पिछले दो वर्षों में इसने कुछ नहीं किया है। यह एक तथ्य है। लेकिन भारत सरकार ने अदालत में स्वीकार करने के बाद कि सलवा जुडुम ने घरों को जलाया है ओर अन्य गैरकानूनी काम किए हैं, वह सलवा जुडुम की जय जयकार कर रही है। खुफिया और सुरक्षाकर्मियों के द्वारा किये गये हिंसक कार्यो की भी कोई अनदेखी नहीं कर सकता है। गरीब आदिवासी दो तरह के हिंसकों के बीच फंसे हुए हैं। सलवा जुडुम भी हमारी संसदीय प्रजातंत्र के लिए खतरा है। अगर आप कहते हैं कि वामपंथी उग्रवाद संसदीय प्रजातंत्र के लिए खतरा है तो एक गैर सरकारी संगठन सलवा जुडुम भी प्रजातांत्रिक राजनीति के लिए खतरा है।उच्चतम न्यायालय18.2.2010 को उच्चतम न्यायालय ने आवेदकों से पुनर्वास की विस्तृत योजना प्रस्तुत करने को कहा था। मै आवेदकों का नाम बताता हूं क्योंकि मामला उच्चतम न्यायालय में हैं। ये नाम हैं - नंदिनी सुन्दर तथा अन्य, करतराम जोड़ा, मनीष कुंजाम-हमारी पार्टी के नेता, अखिल भारतीय आदिवासी महासभा के नेता (जो भाकपा का है) तथा अन्य। उच्चतम न्यायालय के द्वारा मांगी गई जानकारी देने में छत्तीसगढ़ राज्य सरकार को दो सप्ताह लगा। लेकिन आज तक उसने कुछ नहीं किया है। उक्त पुनर्वास कार्यक्रम के प्रमुख अवयव निम्नतम लिखित हैं:1. सर्वेक्षण के द्वारा पीड़ित व्यक्तियों की पहचान,2. प्रखण्ड मुख्यालय में जिला न्यायाधीशों आदि की बैठकें3. बलात्कार और हत्या जैसे जघन्य अपराधों से निपटना और गांवों में आवश्यक सेवा बहाल करना।इन सबों की निगरानी वरिष्ठ सेवानिवृत जज या भारत सरकार के सेवानिवृत सचिव करेंगे। शांति बहाल करने का एकमात्र तरीका प्रशासन को बहाल करना और न्याय प्रदान करना है। मैं बता रहा हूं कि प्रमुख सेवा में विलम्ब नहीं होना चाहिए क्योंकि वे आदिवासी कल्पना से परे यातनाओं तथा विपदाओं से गुजरे हैं। मैं फिर कह रहा हूं कि उनकी दशा अति दयनीय है। उनका कुपोषण का स्तर तीसरे दर्जे का है। आप वहां से आये किसी भी व्यक्ति, जो जनजाति का है या उनके बीच काम किया है, से इसकी जानकारी ले सकते हैं। आपकों पता चल जायेगा कि वहां तीसरे दर्जें का कुपोषण है। खाद्य कमिश्नर ने ऐसा बयान उच्चतम न्यायालय के समक्ष दिया है। सभी बाजार बंद हैं जिसे खोलने की जरूरत है। जन वितरण प्रणाली को बहाल करने की जरूरत है। आदिवासियों के लिए खाद्यान्न प्राप्त करने का वही एकमात्र स्रोत है। सभी दुकानों के साथ-साथ स्कूल भी बंद हैं। सवाल है कि इस समस्या से कैसे निपटा जाये? माओवादियों का कहना है कि वे किसी खास तरह के युद्धविराम के लिए राजी है और उन ग्रामों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली को बहाल किये जाने के पक्षधर हैं। उक्त समाचार 14.4.2010 के ‘हिन्दू’ दैनिक में आया है। माओवादियों ने यह भी संकेत दिया है कि वे एक साथ युद्धविराम के लिए तैयार हैं। क्या सरकार अपनी बात पर अड़ी रह सकती है? सरकार का कहना है कि उनके द्वारा हिंसा बंद करने के बाद ही वह बात कर सकती है। लेकिन युद्धविराम या हिंसा को बंद करना दोनों पक्षों के बीच सहमति का मामला है। सरकार को भी खुले दिमाग से सामने आना चाहिए। हमें नागालैंड में समस्याओं से निपटने का अनुभव है। अब एक संकेत है जिसे भी 14.4.2010 के ‘हिन्दू’ में प्रकाशित किया गया है।अब मैं अपने कुछ अनुभवों की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा। मैं लोगों से मिलता हूं। ऐसे लोग भी हैं जो अहिंसा में विश्वास करते हैं। वे छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के बीच काम करते हैं। उन लोगों को वहां काम करने नहीं दिया जाता है। उनको परेशान किया जाता है। उनके विरूद्ध मुदकमा दायर किया गया है और उन्हें वहां से निष्कासित किया जा रहा है। अब वे छत्तीसगढ़ के बाहर हैं। अगर हमारे पास आदिवासी लोगों के पास पहुंचने का प्रजातांत्रिक साधन नहीं है तो हम उनका विश्वास कैसे हासिल कर सकते हैं? माओवादियों और आम ग्रामीणों के बीच पहचान करना असम्भव है। पुलिस की कारवाई से दोनों तरफ हिंसा बढ़ेगी।जीवन अमूल्य है। केन्द्रीय रिजर्व पुलिस के जवानों का जीवन अमूल्य है। एक ग्रामीण या गरीब आदिवासी का भी जीवन अमूल्य है। हमें उन गरीब आदिवासियों के विषय में सोचना होगा। यही मूल समस्या है जिस पर हमें ध्यान देना है। पंचायत के शिड्यूल क्षेत्र में विस्तार के 5वीं शिड्यूल का लगातार उल्लंघन हो रहा है। उसी प्रकार संविधान के अंतर्गत आदिवासियों को दिये गए सभी अधिकारों का भी उल्लंघन हो रहा है। मैं पूछना चाहता हूं कि लगातार ये उल्लंघन क्यों हो रहे हैं? यह किसी एक राजनैतिक दल की समस्या नहीं है। मैं सभी दलों से पूछला चाहता हूं कि स्वतंत्रता के 60 साल से अधिक हो जाने के बाद भी हमारे देश में आदिवासी लोग क्यों उतनी दयनीय और जोखिम भरे हालत में रह रहे हैं। इसके लिए कौन जिम्मेदार है? क्या यह राज्य सरकारों की असफलता नहीं है? क्या यह केन्द्र सरकार की असफलता नहीं है? क्या यह हम लोगों की सामूहिक असफलता नहीं है? मैं यहां उपस्थित सभी व्यक्तियों की अर्न्तआत्मा से अपील करता हूं। मैं पूरी संसद की अर्न्तआत्मा से अपील करता हूं। क्या यह हम लोगों की सामूहिक जिम्मेदारी नहीं है? आदिवासी लोग दयनीय हालत में क्यों रहें? यह मूल समस्या है और इसका समाधान होना चाहिए। मेरी समझ से इस संबंध में केन्द्रीय सरकार के द्वारा अपनाई गई नीति सही नहीं है। यह नीति गलत है। मैं राजनीति और गृह मंत्री के द्वारा संसद के बाहर दिये गये बयान के विवाद में नहीं पड़ना चाहता हूं। मैं इस विवाद में नहीं पड़ना चाहता क्योंकि गृहमंत्री के काम करने का तरीका गलत है। वे पश्चिम बंगाल में कुछ कहते है तो दिल्ली में कुछ और कहते हैं। हमारे देश में यह सब क्या हो रहा है? गृहमंत्री पूरे देश का गृहमंत्री होता है। अगर मामला बंगाल में मुख्यमंत्री के टेबल पर रूकता है तो यह छत्तीसगढ़ में क्यों नहीं रूकता है? अंत में वे कहते हैं कि वे पूरी नैतिक जिम्मेदारी लेते है और मामला दिल्ली में उनके टेबल पर आकर रूकता है। फिर वे बयान देते हैं कि 2-3 साल में वे माओवादियों का खात्मा कर देंगे। आखिर इन सबके पीछे नीति क्या है?सरकार से सवालमैं सरकार से पूछना चाहता हूं। क्या यह बता सकती है? कि उसकी क्या नीति है? जब तक हम आदिवासी लोगों को विश्वास में नहीं लेते है और आदिवासियों के बीच भेद पैदा कर आपस में लड़ाने वाले गैर सरकारी तत्वों को बढ़ावा देना बंद नहीं करते हैं तब तक हम वामपंथी उग्रवाद से लड़ाई में नहीं जीत सकते हैं। यह एक रूझान है जो जारी रहेगी। जब तक हमारे देश में बड़े स्तर पर असमानता और असंतोष है तब तक आपको वामपंथी उग्रवाद मिलता रहेगा। प्रजातंत्र में हमें छत्तीसगढ़ के बहुमत के विषय में सोचना होगा। यह उनके भविष्य का सवाल है। अगर हम आदिवासी लोगों की मनोस्थिति को नहीं समझ सकते हैं तो हम प्रजातंत्र की मूल भावना को भी नहीं समझ सकते हैं। अगर इस देश के आदिवासियों को प्रजातंत्र नहीं सुरक्षा प्रदान कर सकता है तो प्रजातंत्र का क्या मतलब है? आदिवासियों की सुरक्षा ही हमारे देश के संसदीय प्रजातंत्र की सुरक्षा है। भारत सारकार को इन समस्याओं का समाधान निकालना चाहिए और इसके लिए अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करना चाहिए। गृहमंत्री ने कहा है कि वे जांच रिपोर्ट पेश करेंगे। देखना है कि वे क्या रिपोर्ट पेश करते हैं। जांच रिपोर्ट में वे बातें नहीं होनी चाहिए जो गृहमंत्री कहते रहे हैं। यह एक गंभीर समस्या है और सदन को इसे गंभीरता से लेना चाहिए। जो घटनाएं घर्टी हैं उसकी भर्त्सना की जानी चाहिए और आने वाले दिनों में इसकी पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन इसके लिए केन्द्र सरकार को उचित नीति बनानी चाहिए। हमारे सामने सवाल है कि क्या केन्द्र में समुचित नीति बनाने की इच्छाशक्ति है? मैं इन्हीं शब्दों के साथ अपना वक्तव्य समाप्त करता हूं।
- डी. राजा
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गुरुवार, 20 मई 2010

विश्व और भारत में श्रमिक दिवस: कुछ अनजाने पन्ने

मई दिवस के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है, फिर भी कुछ ऐसे पहलू हैं जो अज्ञात है। कुछ भ्रांतियों का स्पष्टीकरण और इस विषय पर भारत तथा विश्व के बारे में कम ज्ञात तथ्यों को उजागर करने की आवश्यकता है। यह जानना दिलचस्प होगा कि श्रमिक दिवस का उदय ‘मई दिवस’ के रूप में नहीं हुआ था। वास्तव में अमरीका में श्रमिक दिवस मनाने की पुरानी परम्परा रही है जो बहुत पहले से ही चली आ रही थी। अमरीका में मजदूर आंदोलन यूरोप व अमरीका में आए औद्योगिक सैलाब का हिस्सा था। परिणामस्वरूप जगह-जगह जन आंदोलन रहे थे। इनका संबंध 1770 के दशक की अमरीका की आजादी की लड़ाई तथा 1860 के दशक के गृह युद्ध से भी था।इंग्लैंड के मजदूर संगठन विश्व में सबसे पहले अस्तित्व में आए।यह 18वीं सदी की मध्य का समय था, मजदूर एवं टेªड यूनियन संगठन 19वीं सदी के अंत तक काफी मजबूत हो गए क्योंकि यूरोप के दूसरे देशों में भी इस प्रकार के संगठन अस्तित्व में आने लग गए थे।अमरीका में मजदूर आंदोलनइसी समय अमरीका में भी मजदूर संगठन बन रहे थे। वहां मजदूरों के आरम्भिक संगठन 18वीं सदी के अंत में 19वीं सदी की आरम्भ में बनने शुरू हुए। मिसाल के तौर पर फिलाडेलफिया के शूमेकर्स (जूता बनाने वालों) के संगठन, बाल्टीमोर के टेलर्स (दर्जी) के संगठन तथा न्यूयार्क के प्रिन्टर्स के संगठन 1792 में बन चुके थे। फर्नीचर बनाने वालों में 1796 में और ‘शिपराइट्स’ ने 1803 में न्यूयार्क में संगठन बने। हड़ताल तोड़ने वालों के खिलाफ पूरे अमरीका में संघर्ष चला जो उस देश में संगठित मजदूरों का अपने किस्म का अलग आंदोलन था। हड़ताल तोड़ने वालों के खिलाफ पूरे अमरीका में संघर्ष चला जो उस देश में संगठित मजदूरों का अपने किस्म का अलग आंदोलन था। हड़ताल तोड़ना घोर अपराध माना जाता था और हड़ताल तोड़ने वालों को तत्काल यूनियन से निकाल दिया जाता था।18 का दशक अमरीका में टेªड यूनियनों के शीघ्र गति से विस्तार का समय था, खास करके 1833-37 तक का काल। इस दौरान मजदूरों के जो संगठन बने उनमें शामिल थे - बुनकरों, बुक वाइन्डरों, दर्जियों, जूते बनाने वालों, फैक्ट्री में काम करने वालों तथा महिला मजदूरों के संगठन। उसी दौरान स्थानीय स्तर पर भी मजदूर संगठन बनना शुरू हो गया था; इनमें शामिल थे फिलाडेलफिया मैकेनिकों की टेªड एसोसिएशन तथा इसी प्रकार की अन्य यूनियनें जो दूसरें शहरों जैसे बोस्टन, न्यूयार्क, बाल्टीमोर आदि में बन रही थी। 1836 में 13 सिटी इंटर टेªड यूनियन ऐसासिएशन मोजूद थीं जिसमें जनरल टेªड यूनियन ऑफ न्यूयार्क (1833) भी शामिल थी जो अति सक्रिय थी। इसके पास स्थाई स्ट्राइक फन्ड था तथा एक दैनिक अखबार इसका निकलता था। इसके संबंध दूसरे शहरों में भी थे। राष्ट्रव्यापी संगठन बनाने की कोशिश भी की गयी यानी नेशनल टेªड्स यूनियन जो 1834 में बनायी गयी।दैनिक काम के घंटे घटाने के कुछ पुराने संघर्षकाम के घंटों को घटाने के लिए किया गया संघर्ष अति आरम्भिक तथा प्रभावशाली संघर्षों में एक था जिसमें अमरीकी मजदूर तहरीक का योगदान था। न्यू इंग्लैंड के वर्किंग मेन्स ऐसासिएशन ने सन् 1832 में काम के घंटे घटा कर 10 घंटे प्रतिदिन के संघर्ष की शुरूआत की। आंदोलन के नेता पहले से ही राजनैतिक नारे लगा रहे थे। सेठ लूथर जैसे एसोसिएशन के नेता इग्लैंड को फैक्ट्री व्यवस्था की नकल करने की नीति का विरोध कर रहे थे। अमरीकी मजदूर वर्ग भी आजादी की घोषणा से जुड़ा हुआ था तथा मजदूर मांग कर रहे थे मजदूरो केअधिकारांे का सम्मान हो।यहां यह ऐतिहासिक तथ्य ध्यान देने योग्य है अमरीकी मजदूर वर्ग और नीग्रो के बीच गहरी एकता हो गयी और वे 1776 के अमरीकी क्रांति चाहते थे। 4 जुलाई को अमरीका की आजादी का दिवस मनाया जाता है। बड़ी संख्या में आम मजदूर इसमें भाग लेते रहे थे।बड़ी सक्रियता से मजदूरों तथा आम जनता ने आजादी के संघर्ष में हिस्सा लिया। उदाहरण के तौर पर 11वीं पेन्सिल्वनिया बटालियन के अधिकांश सैनिक मजदूर थे। नीग्रों और आजाद गुलामों को रोड्स आइलैंड, 72 मासचुसेटस शहर और पेन्सिल्वानिया की सेनाओं में भर्ती किया गया। अमरीका क्रांति सेना पीपुल्स आर्मी (जनसेना) थीं। इसने अपने नारों तथा उद्देश्यों से अमरीकी मजदूर तहरीक पर एक अमिट छाप छोड़ी।कई पीढ़ियों तक 4 जुलाई मजदूर तहरीक के दिवस की तर्ज पर मनाया जाता रहा। मजदूरों द्वारा बैठकें आयोजित की जातीं, त्योहार मनाया जाता, परेड निकाली जाती तथा दावत दी जाती थी तथा मजदूरों की मांगे उठाई जाती है।1835 तक अमरीकी मजदूरों ने काम के 10 घंटे प्रतिदिन का अधिकार देश के कुछ हिस्सों में प्राप्त कर लिया था। उस वर्ष मजदूर यूनियनों की एक आम हड़ताल फिलाडेलफिया में हुई। शहर के प्रशासकों को मजबूरन इस मांग को मानना पड़ा। परिणाम स्वरूप पूरे देश में इस मांग को मनवाने के लिए जनसैलाब उमड़ पड़ा।10 घंटे काम का पहला कानून 1847 में न्यायपालिका द्वारा पास करवाकर हेम्पशायर में लागू किया गया। इसी प्रकार के कानून मेन तथा पेन्सिल्वानिया राज्यों द्वारा 1848 में पास किए गए। 1860 के दशक के शुरूआत तक 10 घंटे काम का दिन पूरे अमरीका में लागू हो गया।राजनैतिक संगठनमजदूरों की राजनैतिक पार्टियां यूरोप से पहले अमरीका में अस्तित्व में आ चुकी थी। अमरीका मंे काल्पनिक समाजवादी आंदोलन की एक मजबूत परम्परा रही। इसका एक कारण था विशाल भौगोलिक क्षेत्रफल का होना जहां कोई भी काल्पनिक समाजवादी प्रयोग कर सकता था। थामस स्किडमोर, जार्ज रिप्ले, फ्रांसिस राइट, राबर्ट डेल ओवेन (सुप्रसिद्ध रावट ओवेन का पुत्र), होरेस ग्रीले आदि उस समय अमरीका के मजदूर वर्ग के नेता थे उनमें सेअधिकतर काल्पनिक समाजवादी थे। बहुत से काल्पनिक समाजवादी संगठन ओवेन, फूनरिये आदि के प्रभाव में आए; बाद में बहुतों ने प्रथम इंटरनेशनल से प्रभावित होगर मार्क्सवाद तथा वैज्ञानिक समाजवाद अपनाया।पहली मजदूर राजनैतिक पार्टी सन् 1828 में फिलाडेल्फिया (अमरीका) में बनी। अगले 6 वर्षों में 60 से अधिक शहरों में मजदूर राजनैतिक पार्टियों का गठन हुआ। उनकी मांगों में राजनैतिक सामाजिक मुद्दे जैसे 10 घंटे का कार्य दिवस, बच्चों की शिक्षा, सेना में अनिवार्य सेवा की समाप्ति, कर्जदारों के लिए सजा की समाप्ति, मजदूरी की अदायगी मुद्रा में, आयकर का प्रावधान इत्यादि शामिल थे।मजदूर पार्टियों ने नगर पालिकाओं तथा विधासभाओं इत्यादि में चुनाव भी लड़े। सन् 1829 में 20 मजदूर प्रत्याशी फेडरेलिस्टों तथा डेमोक्रेट्स की मदद से फिलाडेलफिया में चुनाव जीत गए। 10 घंटे कार्य दिवस के संघर्ष की बदौलत न्यूयार्क में वर्किंग मैन्स पार्टी बनी। 1829 के विधानसभा चुनाव में इस पार्टी कोे 28 प्रतिशत वोट मिले तथा इसके प्रत्याशियों को विजय हासिल हुई।अमरीका में फैक्ट्री मजदूरों की पहली रेकार्ड में शामिल हड़ताल सन् 1828 में हुई। कारण यह था कि न्यू जर्सी के पेटरसन में मिल मालिकों ने भोजन अवकाश का समय 12 बजे के बजाय 1 बजे करने की कोशिश की। मजदूर अधिकतर बच्चे थे। उन्हें डर था कि मालिकों का अगला कदम भोजन अवकाश समाप्त करने का हो सकता है। हड़ताल तुड़वाने के लिए सेना को बुलाया गया। 1820 और 1830 के दशकों में महिलाएं आंदोलनों में अलग मोर्चो पर हुआ करती थीं। परिणामस्वरूप 1834 में एक फैक्ट्री गर्ल्स एसोसिएशन बनायी गयी।मजदूर दूसरी पार्टियों में भी सक्रिय थे खासकर डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन पार्टियों में। वास्तव में ये पार्टियां मजदूरों पर काफी हद तक निर्भर थीं।उन दिनों पार्टियां मजदूरों और उनकी मांगों से अधिक घनिष्ठ रिश्ता रखती थी। बाद में ऐसा नहीं रहा।मई दिवस की शुरूआतजैसा हम देख चुके हैं कि मई दिवस के अस्तित्व में आने से पहले भी अमरीका में मजदूर दिवस किसी न किसी रूप में मनाया जाता था। मजदूर दिवस मनाने के लिए सितम्बर में कोई दिन निश्चित किया जाता था, खास करके इसके पहले हफ्ते में। यह बड़े उत्सव का अवसर होता था। मजदूर और उनके परिवार जलसे और मेले के रूप में इकट्ठे होतें।मजदूर दिवस व मई दिवस का जन्म अमरीका में मजदूर आंदोलन तथा उनके टेªड यूनियन संगठनों के कार्यकलापों और घटनाओं के कारण हुआ। अमरीका में दो बड़े टेªड यूनियन संगठन थे। पहला था नाइट्स ऑफ लेबर और दूसरा अमरीकन फैडरेशन ऑफ लेबर या एएफएल। पहले यह फेडरेशन ऑफ आर्गनाइज्ड टेªडर्स एण्ड लेबर यूनियन्स (एफओटीएलयू) ऑफ दी यूएस एण्ड कनाडा के नाम से जाना जाता था। 18 मई 1882 में सेन्ट्रल लेबर यूनियन ऑफ न्यूयार्क की एक बैठक में पीटर मैग्वार ने एक प्रस्ताव रखा जिसमें एक दिन मजदूर उत्सव मनाने की बात थी। उसने इसके लिए सितम्बर के पहले सोमवार का दिन सुझाया। वह साल का वह समय था जो जुलाई और ‘धन्यवाद देने वाला दिन’ के बीच में पड़ता था।विभिन्न व्यवसायों के 30,000 से अधिक मजदूरों ने 5 दिसम्बर को न्यूयार्क की सड़कों पर परेड निकाली तथा नारा दिया: “8 घंटे काम के दिए, 8 घंटे आराम के लिए तथा 8 घंटे हमारी मर्जी पर।“ इसे 1883 में दोहराया गया। 1884 में न्यूयार्क सेंट्रल लेबर यूनियन ने मजदूर दिवस परेड के लिए सितम्बर माह के पहले सोमवार का दिन तय किया। यह सितम्बर की पहली तारीख को पड़ रहा था। दूसरे शहरों में भी इस दिन को अंतर्राष्ट्रीय त्योहार के रूप में कई शहरों में मार्च निकाले गए। मजदूरों ने लाल झंडे, बैनरों तथा बाजूबंदों का प्रदर्शन, मीटिंगों, प्रदर्शनों तथा दूसरे मौकों पर किया।सन् 1884 में एफओटीएलयू ने हर वर्ष सितम्बर के पहले सोमवार को मजदूरों के राष्ट्रीय अवकाश मनाने का निर्णया लिया। पूरे देश में इसका आह्वान किया गया। 7 सितम्बर 1883 को पहली बार राष्ट्रीय पैमाने पर सितम्बर के पहले सोमवार को मजदूर अवकाश दिवस के रूप में मनाया गया। इसके साथ ही अधिक से अधिक राज्यों ने मजदूर दिवस के दिन छुट्टी मनाना शुरू कर दिया।इन यूनियनों तथा उनके राष्ट्रों की संस्थाओं ने अपने वर्ग की एकता, खासकर अपने 8 घंटे प्रतिदिन काम की मांग को प्रदर्शित करने हेतु पहली मई को मजदूर दिवस मनाने का फैसला किया। यह 1 मई 1886 से मानाया जायेग, उन्होंने फैसला किया। कुछ राज्यों में पहले से ही आठ घंटे काम का चलन था परन्तु इसे कानूनी मान्यता नहीं थी; इस मांग को लेकर पूरे अमरीका में 1 मई 1886 को हड़ताल हुई।मई 1886 से कुछ वर्षों पहले देशव्यापी हड़ताल तथा संघर्ष के दिन के बारे में सोचा गया। उदाहरण के तौर पर सितम्बर में राष्ट्रव्यापी संघर्ष राष्ट्रीय टेªड यूनियनों द्वारा 1885 और 1886 में तय किए गए।वास्तव में मजदूर दिवस तथा कार्य दिवस संबंधी आंदोलन राष्ट्रीय यूनियनों द्वारा 1885 और 1886 में सितम्बर के लिए सोचा गया था, लेकिन बहुत से कारणों की वजह से, जिसमें व्यापारिक चक्र भी शामिल था, उन्हें मई के लिए परिवर्तित कर दिया। इस समय तक काम के घंटे 10 प्रतिदिन का संघर्ष बदल कर 8 घंटे प्रतिदिन का बन गया।मई दिवस का बाकी इतिहास सबको अच्छी तरह मालूम है; उसे बताने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन यहां एक बात का स्पष्टीकरण देना आवश्यक है। यह कहना कि लाल झंडे का जन्म मई 1886 में शिकागो में हुआ था, गलत है। वास्तव में अमरीका में लाल झंडे का चलन 1886 से बहुत पहले ही था।इसके अलावा, 1830 के दशक में यूरोप में लाल झंडा मजदूर वर्ग की पहचान बन चुका था। मजदूरों ने अपनी राजनैतिक पहचान का प्रतीक लाल झंडा जून 1832 में पेरिस में फहराया था।भारत में मई दिवसयह ध्यान देने की बात है कि भारत में मजदूरों की होने वाली पहली हड़तालों में अप्रैल-मई 1862 की हड़ताल थी जब 1200 मजदूरों ने हावड़ा रेलवे स्टेशन पर कई दिनों के लिए काम बन्द कर दिया था। इस घटना की खासियत यह है कि मजदूरों की मांग काम के घंटों का घटाकर 8 घंटे प्रतिदिन करने की थी क्योंकि लोकोमोटिव विभाग में काम करने वाले मजदूर 8 घंटे ही काम करते थे। अतः इन मजदूरों ने भी यही मांग उठाई। यह घटना अमरीका में ऐतिहासिक मई दिवस मनाए जाने से करीब 24 वर्ष पहले की थी।अब हम भारत में मई दिवस मनाए जाने के कुछ प्रारंभिक उदाहरणों का संक्षेप में वर्णन करेंगे। जहां तक मालूम है, मई दिवस भारत में 1923 में पहली बार मनाया गया था। सिंगारवेलु चेट्टियार देश के आरम्भ के कम्युनिस्टों में से एक तथा प्रभावशाली टेªड यूनियन और मजदूर तहरीक के नेता थे। उन्होंने अप्रैल 1923 में भारत में मई दिवस मनाने का सुझाव दिया क्योंकि दुनिया भर के मजदूर इसे मनाते थे। उन्होंने फिर कहा कि सारे देश में इस मौके पर मीटिंगे होनी चाहिए। मद्रास में मई दिवस मनाने की अपील की गयी। इस अवसर पर वहां दो जनसभाएं हुई तथा दो जुलूस निकाले गए, पहला उत्तरी मद्रास के मजदूरों का हाईकोर्ट ‘बीच’ पर तथा दूसरा दक्षिण मद्रास के ट्रिप्लिकेन ‘बीच’ पर। सिंगारवेलू ने इस दिन मजदूर किसान पार्टी की स्थापना की घोषणा की तथा उसके घोषणा पत्र पर प्रकाश डाला। कई कांग्रेसी नेताओं ने भी मीटिंगों में भाग लिया।सिंगारवेलू ने हाईकार्ट ‘बीच’ की बैठक की अध्यक्षता की। उनकी दूसरी बैठक की अध्यक्षता एस. कृष्णास्वामी शर्मा ने की तथा पार्टी का घोषणा पत्र पीएस वेलायुथम द्वारा पढ़ा गया।बैठकों की रिपोर्ट कई दैनिक समाचार पत्रों में छपी। मास्को से छपने वाले वैनगार्ड ने इसे भारत में पहला मई दिवस बताया। (15 जून 1923)फिर दुबारा 1927 सिंगारवेलु की पहल पर मई दिवस मनाया गया, लेकिन इस बार उनके घर मद्रास में। इस मौके पर उन्होंने मजदूरों तथा अन्य लोगों को दोपहर की दावत दी। शाम को एक विशाल जूलुस निकाला गया जिसने बाद में एक जनसभा का रूप ले लिया, इस बैठक की अध्यक्षता डा. पी. वारादराजुलू ने की। यह कहा जाता है तत्काल लाल झंडा उपलब्ध न होने के कारण सिंगारवेलु ने अपनी लड़की की लाल साड़ी का झंडा बनाकर अपने घर पर लहराया।इस प्रकार हम मजदूर वर्ग के संघर्ष और मई दिवस तथा खासकर लाल झंडे के इतिहास के कई दिलचस्प तथा ज्ञानवर्धन प्रकरण पाते हैं।
- अनिल राजिमवाले
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सरकारी सेवाओं का निजीकरण जनविरोधी

निजीकरण की राह पर चल रही उत्तर प्रदेश सरकार संभवतः आम जनता के हितों को भूल चुकी है। आगरा में बिजली व्यवस्था के निजीकरण से उसने कोई सबक नहीं लिया और अब प्रदेश की गरीब जनता की जीवन रक्षा का सहारा बनी सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण की ठान ली है। पहले चरण में 4 जिला अस्पतालों, 8 उपजिला स्तरीय अस्पतालों, 8 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों, 23 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों तथा 21 0 स्वास्थ्य केन्द्रों के निजीकरण की योजना बनाई गई है।इतना ही नहीं राज्य के स्वास्थ्य महानिदेशालय ने जिला अस्पतालों के मुख्य चिकित्साधिकारियों द्वारा दवाओं तथा पेथौलोजी के लिये जरूरी कैमिकल आदि की खरीद पर रोक लगायी हैंयह दोनों ही कदम प्रदेश की आम जनता खासकर गरीब लोगों पर बड़ा कुठाराघात हैं। प्रायवेट अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवायें बेहद महंगी हैं। पहले महंगी फीस, फिर महंगी जांच और उसके बाद महंगी दवायें गरीब आदमी का तो दिवाला ही निकाल देती हैं। यदि मरीज भर्ती कराया जाये तो बेड या कमरे का चार्ज इतना ज्यादा है कि उससे रक्षा केवल राम ही कर सकते हैं।यद्यपि भ्रष्टाचार के इस युग में सरकारी अस्पताल भी दूध के धुले नहीं हैं फिर भी वहां आज भी स्वास्थ्य परीक्षण, पेथोलोजी, भर्ती फीस बेहद सस्ती है और दवायें भी अधिकतर मुफ्त उपलब्ध हैं। लेेकिन राज्य सरकार को इस बात से कोई लेना देना नहीं है। वह तो पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने में जुटी है और पी।पी.पी. माडल के बहाने निजीकरण करने पर आमादा है।सरकार यह भूल गई है कि उत्तर प्रदेश गरीबी के मामले में नीचे से चौथे पायदान पर है। यहां 60 फीसदी जनता दो जून रोटी के लिये तड़पती है। वहां इन अस्पतालों का निजीकरण उसके इलाज के सारे रास्ते बन्द कर देगा। अब तक उपलब्ध स्वास्थ्य सेवायें भी उसके लिये बन्द हो जायेंगी। केवल धनी लोग ही इलाज करा सकेंगे।सरकार के पी.पी.पी माडल की कलई तो पहले ही खुल चुकी है यह स्पष्ट हो चुका है कि यह जनता के अर्जित संसाधनों को निहित आर्थिक स्वार्थों के चलते पूंजीपतियों को मुहैय्या कराना है। इस मामले में भी इसकी कलई खुल गई है। जनता को स्वास्थ्य सेवायें प्रदान करने को बनाई कंपनी में निजी क्षेत्र की भागीदारी 89 प्रतिशत होगी जबकि 11 प्रतिशत बेहद मामूली स्वास्थ्य सेवायें ही राज्य सरकार के पास बची रह जायेंगी। जाहिर है यह सेवायें आम जनता के लिये कितनी कठिन हो जायेंगी। स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों की छंटनी का रास्ता भी प्रशस्त हो जायेगा सो अलग।एक अन्य फैसले के तहत प्रदेश के स्वास्थ्य महानिदेशक ने जिले के मुख्य चिकित्साधिकारी के दबा एवं कैमीकल आदि खरीदने के अधिकार को ही हड़प लिया है। इससे कुछ ही दिनों में जिले के अस्पतालों में दवाओं और पैथोलोजी के लिये जरूरी रसायनों का अभाव पैदा हो जायेगा। ऐसे समय में जब मौसम की बदमिजाजी के चलते हैजा, दस्त, पेचिस, वायरल बुखार और त्वचीय रोग भारी पैमाने पर फैल रहे हैं, दवाओं के न मिल पाने से मरीजों को कितनी कठिनाई होगी इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है।लगता है सरकार ने आगरा की विद्युत व्यवस्था पूरी तरह निजीकृत करने से वहां पैदा हुई भयावह स्थिति से कोई सबक नहीं लिया है। वहां जनता को बिजली मिल नहीं पा रही, निजी कंपनी टोरंेट द्वारा भर्ती नौसिखिये काम नहीं कर पा रहे हैं, यहां तक कि एक मजदूर की तो मौत भी हो गई तथा भ्रष्टाचार भी सरकारी व्यवस्था की तरह ही बना हुआ है। जनता इसका पुरजोर विरोध कर रही है। लेकिन सरकार मदमस्त हाथी की तरह जनहितों को रौंदती चली जा रही है।सरकार ही नहीं उत्तर प्रदेश के प्रमुख राजनैतिक दलों को इस निजीकरण से कोई परहेज नहीं है। सपा ने चुप्पी साधी हुई है। भूमंडलीकरण व निजीकरण की पैरोकार कांग्रेस और भाजपा से विरोध की उम्मीद करना ही बेकार है। केवल भाकपा और वामपंथी दल ही विरोध जता रहे हैं। लेकिन इस सवाल को जनता के बीच लेजाकर निजीकरण विरोधी जनबल तैयार करना अभी बाकी है।
- डा. गिरीश
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”सम्मान“ के नाम पर हत्या करने वालों को सजा

हरियाणा की एक जिला सेशन अदालत ने कथित ‘सामाजिक सम्मान’ के नाम पर (आनर किलिंग) हत्या करने वाले 6 लोगों को कठोर सजा सुनायी है। 6 में से 5 को फांसी की सजा और एक को उम्र कैद की सजा सुनायी गयी है। हरियाणा और राजस्थान के कुछ हिस्सों में जाति पंचायत एवं ग्राम पंचायतों शादी और ऐसे ही मुद्दों पर फैसला सुनाने का अधिकार ले रखा है तथा फैसला नहीं मनाने वालों को जान तक से मारने की सजा सुनाती है।दर्दनाक घटनाऐसा ही एक मामला मनोज और बावली की शादी का था। “खाप पंचायत” ने जाति के बाहर शादी करने के लिए उनकी शादी को अवैध ठहराया था। पंचायत के फैसले के बाद दोनों ने सुरक्षा की गुहार करते हुए अदालत में अर्जी दी। अदालत में अर्जी देकर दोनों करनाल अपने घर लौट रहे थे तो जून 2007 में गांव वालों ने दोनों को बस से जबरन घसीट कर उतार लिया और हत्या कर दी। दोनों के शव नहर में पाये गये, दोनों के हाथ पैर बांध दिये गये थे। सेशन जज ने लड़की के भाई सुरेश, चचेरा भाई गौरव एवं सतीश तथा चाचा बासुराम और राजेन्द्र को फांसी की सजा सुनायी जबकि खाप पंचायत प्रधान गंगाराम को उम्र कैद की सजा सुनायी। बस के चालक पर अपहरण का आरोप लगाते हुए उसे सात साल की सजा सुनायी गयी। लड़के की मां ने अदालत की लड़ाई लड़ी। वह अदालत के फैसले से खुश नहीं है क्योंकि खाप पंचायत के अनेक दोषियों को छोड़ दिया गया। उन्हें षडयंत्र रचने के लिए सजा दी जानी थी।‘तहलका’ पत्रिका के अनुसार गांव की ये समानांतर अदालतें जाति के बहार शादी करने वालों को या तो निर्वासित जीवन बिताने के लिए बाध्य करते हैं या जान से मार डालते हैं। महीने में ऐसी करीब 12 हत्याएं होती हैं। इन जाति पंचायतों पर भ्रूण हत्या को बढ़ावा देने का आरोप है जिसके कारण हरियाणा में लिंग अनुपात काफी कम हो गया हैंकठोर रूढ़िवादिताइस तरह कट्टरपंथी जाति को एक शक्तिशाली हथियार के रूप में इस्तेामल करते हैं। ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान या उससे पहले भी जब न्यायिक प्रणाली का ढंाचा खड़ा नहीं हुआ था, इस प्रकार की जाति पंचायत की शुरूआत हुई होगी। तब न्यायपालिका संपत्ति के विवादों और आपराधिक मामले पर विचार किया करती थी। संभवतः मुगल एवं ब्रिटिश शासकों ने जातिगत मामलों में हस्तक्षेप करना मुनासिब नहीं समझा होगा। इस प्रकार जाति पंचायत परंपरागत रूप में शक्तिशाली हो गयी होगी। जाति पंचायत अंतर्रजाति शादी पर रोक लगाती है। यह एक ही गोत्र में शादी पर भी प्रतिबंध लगाती है। यदि कोई एक ही गोत्र में या अंतर्रजाति विवाह करता है तो जाति पंचायत की बैठक होती है जो शादी को तोड़ने का फैसला सुनाती है। यदि दंपत्ति और उसके परिवार वाले फैसला मानने से इंकार करते हैं तो उन्हें जाति से बाहर कर दिया जाता है और इसकी आधिकारिक घोषणा की जाती है। इसके बाद उनका सामाजिक बहिष्कार किया जाता है तथा उस परिवार के साथ कोई सामाजिक रिश्ता नहीं होता है। धोबी, नाई, दुकानदार कोई उनसे नाता नहीं रखता। शादी या किसी सामजिक समारोह का निमंत्रण उन्हें नहीं दिया जाता। हाल के वर्षों में इस मख्ययुगीन सामंती अदालत ने जाति पंचायत की मर्जी के खिलाफ शादी करने वालों पर हमला करना तथा उनकी हत्या करना जैसा घृणित काम करना शुरू कर दिया है। जाति पंचायत एक ही साथ अभियोजन, जज तथा फैलसे के लागू करने की भूमिका निभाती है।
- डा. बी.वी. विजयलक्ष्मी
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मंगलवार, 4 मई 2010

लो क सं घ र्ष !: खोने के लिए बेड़ियां और जीतने के लिए सारा जहान


1 मई हमारे लिए उन मजदूर साथियों और उनकी शहादत को याद करने का दिन है जो समूचे मजदूर-मेहनतकश तबके के हितों और हकों के लिए लडे, ज़ो साम्राज्यवाद-पूंजीवाद के रास्ते में चट्टान बनकर खडे हुए और समाजवाद के सपने को करोड़ों दिलों में बसा गए। 1 मई उस संकल्प को याद करने का भी दिन है कि ये समाज व्यवस्था, जो लालच, स्वार्थ, मुनाफे, भेदभाव और गैर-बराबरी पर टिकी है, ये हमें मंजूर नहीं। इसे हम बदल डालेंगे और एक ऐसा समाज बनाएंगे जहां इंसान का और श्रम का सम्मान हो, न कि पूंजी और मुनाफे का।
पिछले वक्त में जो महंगाई बढ़ी और जरूरी चीजों के दाम आसमान छूने लगे तो क्या कारखानों, खेतों में काम करने वाले मजदूरों ने मेहनत करनी कम कर दी थी? या कोई भयानक अकाल, बाढ या कौन सी तबाही सारी दुनिया में आ गई थी जिसकी वजह से सब कुछ तहस-नहस हो गया था? लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था। सारी दुनिया के मजदूर पहले की ही तरह, बल्कि पहले से भी ज्यादा मेहनत कर रहे हैं, लेकिन फिर भी एक तरफ उनका गला बढ़ती हुई महंगाई दबोचती है तो दूसरी तरफ से नौकरी छिन जाने की तलवार सिर पर लटकती रहती है। सब कहते हैं कि इन हालातों की वजह आर्थिक मंदी है, जो सारी दुनिया में संकट बनकर छाई है, लेकिन इस बात पर सभी पर्दा डालते हैं कि इस मंदी या आर्थिक संकट की वजह पूंजीवाद है, जिसका एकमात्र उद्देश्य मुनाफा कमाना है। आज अमरीका, यूरोप और दुबई से लेकर मुंबई, कोलकाता और गाजियाबाद, नोएडा, कोयंबतूर, इन्दौर, पीथमपुर, मालनपुर तक के मजदूर, छोटे कारखानेदार और छोटे व्यवसायी इस आर्थिक मंदी के शिकार होकर अपनी रोजी-रोटी खो बैठे हैं। वे जानते भी नहीं कि भरपूर मेहनत करने के बावजूद ऐसा उनके साथ क्यों हुआ। मुनाफे की होड़ में दनादन कर्ज बांटते गए अमरीकी बैंकों की गलतियों से अमरीकी अर्थव्यवस्था का जो दिवाला पिटा, उसका सबसे खराब नतीजा दुनिया भर के गरीब मजदूरों-किसानों को भुगतना पड रहा है।
उदारीकरण के नाम पर कंपनियों को ज्यादा मुनाफा कमाने की ढील और मजदूरों के जायज हकों में कटौती का जो दौर 20 बरस पहले शुरू हुआ था, वो अब और भी बेशर्म होकर गरीब जनता का शोषण कर रहा है। संगठित उद्योगों के भीतर कपड़ा मिलों के मजदूरों ने लगातार संघर्ष करते हुए जो जीत और मजदूरों के फायदे की जो उपलब्धियां हासिल की थीं, आज वे मजदूर सरकारी नीतियों और पूंजीपतियों की साझा साजिशों का शिकार होकर बेहद खराब जीवन स्थितियों से गुजर रहे हैं। कभी कपडा मिल में नौकरी मिलने को बैंक और शिक्षक की नौकरी से अच्छा माना जाता था। एक वजह तो यही थी कि कपडा मिलों में संगठित मजदूर आंदोलनों से नौकरी की सुरक्षा अधिक थी, कार्य स्थितियां बेहतर थीं, सामूहिकता का आनंद था और कारखाने में काम करना देश के लिए कुछ करने जैसा समझा जाता था। आज उन्हीं कपडा मिल मजदूरों के हाल ये हैं कि वे अपनी उम्र की अधेड़ अवस्था में कहीं प्राइवेट सुरक्षा गार्ड बनकर खडे हैं, कहीं सब्जी का ठेला लगा रहे हैं, कहीं पंचर जोड रहे हैं या कहीं किराए पर ऑटो रिक्शा चला रहे हैं। मिलें बंद हुए बरसों बीत गए लेकिन मिल मजदूरों को उनके हक की लडाई अभी तक लडनी पड रही है। जो इस सारी व्यवस्था से आजिज आ गए हैं, उनमें से अनेक हैं जिन्होंने अपने आपको निराशा में गर्क कर लिया है। उन्हीं की नई बेरोजगार पीढ़ी आसान शिकार बनती है साम्प्रदायिक, धार्मिक अंधविश्वास के कारोबारियों और अपराधी ताकतों का। इसके बावजूद ठीकरा मजदूर के सिर पर ही फोड़ा जाता है। इल्जाम लगाया जाता है कि मजदूरों की आरामतलबी और ट्रेड यूनियन राजनीति की वजह से कपड़ा मिलें घाटे में गईं। पूछा जाना चाहिए कि क्या अचानक देश की उन 112 कपड़ा मिलों में काम करने वाले मजदूर एकसाथ आरामतलब हो गए थे जिन्हें 1970 के दशक में बीमार घोषित कर नेशनल टेक्सटाइल कॉर्पोरेशन के अधीन लिया गया? दरअसल मालिकों ने करीब पांच दशकों तक इन मिलों से सैकड़ों गुना मुनाफा बनाया और जब मशीनें बदलने, नई तकनीक लाने और मजदूरों की जीवन स्थितियों पर खर्च करने की स्थिति आई तो उन्होंने कपड़ा मिलों को बीमार घोषित कर मजदूरों को सरकार के माथे पर थोपा, अपनी पूंजी मुनाफे के नए रोजगार में लगा दी। उद्योगों के अलावा सेवा क्षेत्र में भी कर्मचारी संगठनों ने कर्मचारियों के लिए बेहतर सेवा स्थितियों व उनकी नौकरी की सुरक्षा के सवाल को लेकर लगातार संघर्ष किया और कामयाबियां हासिल कीं। लेकिन पिछले दिनों जो रवैया सरकार और प्रबंधन ने स्टेट बैंक ऑफ इन्दौर के मामले में अपनाया, वो कर्मचारी संघर्षों के मामले में अभूतपूर्व है और ठोस सबूत है इस बात का कि मुनाफे की मंजिल हासिल करने के लिए पूंजीवादी राज्य व उसके पुर्जे किसी भी हद तक गिर सकते हैं। नब्बे वर्षों से लगातार लाभ में चल रहे स्टेट बैक ऑफ इन्दौर का विलय स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में कराने के लिए स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने न केवल पूरे देश में ख्यातिप्राप्त बैंक यूनियन को तोडा, बल्कि नियमों को ताक पर रखकर यूनियन के पदाधिकारियों के स्थानांतरण किए गए, अचानक विलय का प्रस्ताव लाया गया और उसे लागू कराने के लिए एडी-चोटी का जोर लगाया गया। आनन-फानन में प्रबंधन की बनाई एक दूसरी यूनियन को मान्यता दे दी गई। प्रबंधन के इस कार्य को निश्चित ही राज्य का समर्थन प्राप्त होगा। आज हमारा 'कल्याणकारी राज्य' सेठों और जमींदारों से ज्यादा दमनकारी हो गया है, बल्कि अब तो कंपनियां भी दमन करने के लिए अपनी प्राइवेट पल्टन रखने के बजाय राज्य को ही ठेका दे देती हैं। मध्य प्रदेश से लेकर असम, उडीसा, छत्तीसगढ, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश, सभी जगह यही हाल हैं।
बैंक, बीमा का क्षेत्र हो या बडे उद्योगों का, सभी जगह मुनाफा बढ़ाने के लिए आरी कर्मचारियों और मजदूरों के हितों पर ही चलाई जा रही है। अनेक मजदूर-कर्मचारी यह सोचते हैं कि उनकी नौकरी बची हुई है तो वे क्यों किसी संगठन की राजनीति का हिस्सा बनें। वे इस इतिहास से नावाकिफ हैं कि उन्हें हासिल होने वाली छुट्टियों, तनख्वाह वृद्धि, भविष्यनिधि, पेंशन व अन्य लाभ संगठित मजदूरों के अथक और लंबे संघर्षों का नतीजा हैं। और जैसे ही संगठित मजदूरों की ताकत कम होती है, पूंजीवाद दिए हुए सारे हक मजदूरों-कर्मचारियों से छीन लेता है। पूंजीवाद-साम्राज्यवाद की चाकरी करने के लिए संगठित मजदूर संघर्ष को तोड़ने में खुद सरकार भी कल्याणकारी होने के सारे नकाब उतार कर मजदूर विरोधी भूमिका में आ गई है। रोजगार बचाने की, संघर्षों से हासिल हुए हकों को बचाने की ये लडाई आज हर क्षेत्र के मजदूरों-कर्मचारियों के लिए बडी चुनौती बन गई है। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के प्रति तो मुनाफाखोर बाजार का रवैया और भी भयानक होता है। बीडी बनाने वाले, लघु उद्यागों में काम करने वाले, घरेलू कामकाज करने वाले, ठेला चलाने वाले, हम्माली करने वाले या इसी तरह के तमाम छोटे-बड़े कामों में दिन-रात पसीना बहाकर किसी तरह पेट पालने का जतन करते मजदूरों को रोजगार सुरक्षा और स्वास्थ्य-शिक्षा की सुविधाएं देना तो दूर, उल्टे उनके मुंह का निवाला भी छीना जा रहा है। खेती की हालत तो इससे भी ज्यादा खराब है। भूमिहीन मजदूरों और छोटे किसानों को जिन्दा रहने के लिए अधिकतर घर-परिवार छोड़कर पलायन करना पडता है और औनी-पौनी मजदूरी पर काम करके जीवन चलाना होता है। छोटे और मझोले किसानों के लिए भी खेती लगातार महंगी और मुश्किल होती जा रही है। खेती की बुरी हालत का इससे बडा क्या सबूत होगा कि सरकार खुद मान चुकी है कि पिछले 20 बरसों में 2 लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। इसके बावजूद देश में अरबपति बढ रहे हैं, कई कंपनियों का मुनाफा भी बढ़ रहा है, खिलाडियों की नीलामी वाला अरबों का आईपीएल क्रिकेट बढ रहा है, लेकिन रोजगार नहीं बढ़ रहा। ये सट्टेबाजी का ऐसा दौर है जिसमें उत्पादन कुछ नहीं हो रहा लेकिन पैसा बढ रहा है।
दो साल पहले अमरीका के राष्ट्रपति ने कहा था कि दुनिया में अनाज की कमी इसलिए आ रही है क्योंकि भारत और चीन के लोग ज्यादा खाने लगे हैं। इसी तर्ज पर कुछ और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने कहा है कि भारत के लोग जरूरत से ज्यादा खाते हैं। इस पर हमारी सरकार ये विचार कर रही है कि अभी गरीबों को जो थोड़ा-बहुत अनाज राशन की दुकानों से मिल जाता है, उसमें और कमी कर दी जाए। ऐसा सोचते हुए ये शर्म भी सरकार को नहीं आती कि खुद सरकार के ही अर्जुन सेनगुप्ता आयोग ने कहा है कि देश की 80 प्रतिशत से ज्यादा आबादी की हैसियत 20 रुपए रोज का खर्च करने की भी नहीं है।
एक तरफ सरकार बडी-बड़ी देशी-विदेशी कंपनियों को पूरे देश में कहीं भी आने और प्राकृतिक संपदा से लेकर मजदूरों के शोषण के लिए न्यौता दे रही है और दूसरी तरफ गरीबों से उनकी नमक रोटी भी छीन रही है। अपना हक मांगने वाले किसानों, मजदूरों, कथित विकास परियोजनाओं के विस्थापितों-पीडितों, आदिवासियों और दलितों-शोषितों के बजाय सरकार की चिन्ता ये है कि विदेशी कंपनी के बीटी बैंगन व अमरीका के फायदे के परमाणु समझौते की रुकावटें किसी तरह दूर हो जाएं।
इन बातों की चर्चा 1 मई के मौके पर इसलिए करना जरूरी है क्यों कि इतिहास गवाह है कि जब सत्ता इतनी अमानवीय और क्रूर हो जाती है तो लोगों के सब्र का पैमाना भी छलकने लगता है। ये असंतोष हम देश में हर जगह उफनता हुआ देख रहे हैं। पूंजीवाद लोगों के गुस्से से पहले तो दमन करके निबटता है। लेकिन जब गुस्सा इतना व्यापक और गहरा हो जाए कि जेलें और गोलियां भी कम पड ज़ाएं तो वो बेचैन शोषित लोगों को साम्प्रदायिक, जातीय, नस्लीय, भाषायी, क्षेत्रीय और तमाम तरह के झगडाें में उलझााने, बांटने और आपस में ही लडाने की कोशिशें करता है। दुनिया का सबकुछ हडप लेने की हवस में साम्राज्यवाद-पूंजीवाद न केवल मजदूरों के हक-अधिकारों को खत्म करना चाहता है बल्कि हमने देखा कि कैसे तेल की खातिर उसने अफगाानिस्तान, इराक, लेबनान, फिलिस्तीन और अन्य देशों के लाखों लोगों और बच्चों का कत्लेआम किया। 1 मई का दिन हमें ये याद दिलाता है कि पूंजीवाद को मेहनतकश जनता की सामूहिक ताकत के सामने आखिरकार झुकना पडता है। सन् 1886 की 1 मई को अमरीका के शिकागो शहर के हे मार्केट में जुलूस निकालते निहत्थे मजदूरों पर गोलियां चलाई गयीं और अनेक मजदूर मारे गए। बाद में चार मजदूर नेताओं को फांसी की सजा दी गई। उनका कसूर सिर्फ ये था कि वे काम के घंटे आठ किए जाने की मांग कर रहे थे। उस वक्त औद्योगिक क्रांति हुई ही थी और नए-नए उद्योग लग रहे थे। मजदूरों से गुलामों की तरह 12-14 घंटे बेहिसाब काम लेना आम बात थी। 1 मई को शहीद हुए उन मजदूर साथियों के खून से रंगा वो लाल झण्डा सारी दुनिया के मजदूर आंदोलन को सुर्ख रंग दे गया। उसके बाद से मजदूर आंदोलन तेज होता गया और तमाम संघर्षों के साथ कामयाबी की सीढ़ियां चढता गया। आज पूंजीवाद फिर अपने मुनाफे की खातिर मजदूरों से वो सारी उपलब्धियां छीन लेना चाहता है जो उन्होंने पीढियों के संघर्ष और अपना खून बहाकर हासिल की हैं। 1 मई हमारे लिए उन मजदूर साथियों और उनकी शहादत को याद करने का दिन है जो समूचे मजदूर-मेहनतकश तबके के हितों और हकों के लिए लडे, ज़ो साम्राज्यवाद-पूंजीवाद के रास्ते में चट्टान बनकर खडे हुए और समाजवाद के सपने को करोड़ों दिलों में बसा गए। 1 मई उस संकल्प को याद करने का भी दिन है कि ये समाज व्यवस्था, जो लालच, स्वार्थ, मुनाफे, भेदभाव और गैर-बराबरी पर टिकी है, ये हमें मंजूर नहीं। इसे हम बदल डालेंगे और एक ऐसा समाज बनाएंगे जहां इंसान का और श्रम का सम्मान हो, न कि पूंजी और मुनाफे का। 1 मई यह याद करने का भी दिन है कि शोषण के खिलाफ लडी ज़ा रहीं तमाम लंडाइयां शोषणविहीन समाज की स्थापना के व्यापक संघर्ष का ही हिस्सा हैं और हम सब मिलकर पूंजीवाद को उखाड़ फेंकने में जरूर कामयाब होंगे। इसी सपने की खातिर लडी ज़ाने वाली लड़ाइयों के लिए इंकलाबी शायर फैज अहमद फैज ने लिखा था -

यूं ही हमेशा जुल्म से उलझती रही है खल्क (जनता) न उनकी रस्म नई है न अपनी रीत नई यूं ही हमेशा खिलाए हैं हमने आग में फूल न उनकी हार नई है न अपनी जीत नई।


विनीत तिवारी

देशबन्धु से साभार
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शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

उनकी हार नई है न अपनी जीत नई

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मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

CPI CONGRATULATES PEOPLE ON THE

Communist Party of India
CENTRAL OFFICE
Ajoy Bhavan, Phones(91-11)23235546,23235099, 23235058
15 Indrajit Gupta Marg, New Delhi.110002 Fax (91-11) 23235543
e-mail: :cpiofindia@gmail.com

General Secretary: A.B. Bardhan
27th April 2010

Press Release

The Central Secretariat of the Communist Party of India has issued the following statement to the press:


CPI CONGRATULATES PEOPLE ON THE
SUCCESS OF THE HARTAL

The Communist Party of India congratulates the people of all over the country who have responded to the call of Hartal against high prices and in protest against Government’s failure to take any steps for bringing down the high prices.

The Party expresses its grateful thanks to all the 13 Parties who have done everything to make the Hartal a success and also to other Parties who came out in support of the Hartal. This is a vivid example of the common man’s indignation and discontent, and the success owes it to the united action of all who made it their common cause. Even now the UPA Government should take this into account and take the necessary steps which the Left and other Parties have all along been proposing.

This is not the end of the struggle. The Parties will meet soon on a date which will be fixed after consultations to decide the next step which they together will take to force the hands of the Government.



(Kshetra Panda)
Office Secretary
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भारत बंद पर सहयोग के लिए जनता का शत शत नमन

लेफ्ट पार्टिओं के साथ-साथ ९ अन्य दलों द्वारा महंगाई के खिलाफ आज बंद के आह्वान पर पूरा उत्तर प्रदेश बंद रहा। लखनऊ में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कैसरबाग स्थित कार्यालय से भाकपा कार्यकर्ता जुलूस में बंद करते हुए निकले और लोक दल के कार्यालय पर लोक दल, इंडियन जस्टिस पार्टी, लोक जन शक्ति पार्टी के कार्यकर्ता भी शामिल हो गए और जुलूस ने विधान सभा के सामने होते हुए हजरतगंज की तरफ बढ़े जहाँ पर पुलिस ने बैरिकेड लगा कर रोकने का प्रयास किया। कुछ समय तक प्रदर्शनकारियों और पुलिस में धक्का मुक्की हुई। उसके बाद प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार कर पोलिस लाइन ले जाया गया। प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व करने वाले प्रमुख नेता थे भाकपा राज्य सचिव डॉ गिरीश, लोक दल के अध्यक्ष राम आसरे वर्मा, इंडियन जस्टिस पार्टी के अध्यक्ष काली चरण, एल जे पी की चित्रा सिंह, भाकपा के मंत्रिपरिषद सदस्य विश्व नाथ शास्त्री, कार्यकारिणी सदस्य अरविन्द राज स्वरुप, प्रदीप तिवारी, सदरुद्दीन राणा, सुरेन्द्र राम आदि.
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सोमवार, 26 अप्रैल 2010

वर्कला राधाकृष्णन का निधन

खास खबर ने आज छापा है :
तिरूवनंतपुरम। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के वयोवृद्ध नेता वर्कला राधाकृष्णन का सोमवार सुबह निधन हो गया। वह 82 वर्ष के थे।
पार्टी के एक अधिकारी ने बताया कि राधाकृष्णन को पिछले सप्ताह अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। रविवार को उनकी हालत बिग़ड जाने पर उन्हें तिरूवनंतपुरम मेडिकल कॉलेज के आईसीयू ले जाया गया जहां सोमवार सुबह उन्होंने दम तो़ड दिया। उनका अंतिम संस्कार सोमवार रात करीब 9.30 बजे होगा। राजनीति में राधाकृष्णन के केरियर की शुरूआत वर्ष 1952 में ग्राम परिषद के प्रमुख के रूप में हुई। वह 1980 से 1996 तक केरल विधानसभा के सदस्य रहे। 1987 से 1991 के दौरान वह विधानसभा अध्यक्ष थे। वर्ष 1998 से वह चिरयांकीझु लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे थे।
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कल अजमेर बंद का ऎलान

http://www.pressnote.इन ने आज छपा है
26 Apr, 2010 08:14 AM अजमेर। महंगाई के खिलाफ 27 अप्रेल को भारत बंद के समर्थन में वाममोर्चा समर्थक दलों ने अजमेर बंद का ऎलान किया है। बंद की तैयारियों को लेकर अजमेर-मेरवाडा गण परिषद अध्यक्ष सज्जनसिंह चौधरी की अध्यक्षता में बैठक आयोजित की गई। जिसमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के रमेश टेलर, फारवर्ड ब्लाक के धर्मेंद्र लालवानी, जन ??ा दल के घनश्यामसिंह राठौड, जनता दल 'यू' के सी।पी। कोली, समाजवादी विचार मंच के अब्दुल सलाम कुरैशी, बहुजन समाज पार्टी के दयाशंकर राठौडिया, अजमेर-मेरवाडा गण परिषद से अजयपाल, एमएमटी वर्कर्स यूनियन के हरिभाई शर्मा, असंगठित मजदूर एकता यूनियन के के। प्रवीण, सीपीएम के दिनेश गौड, आर।सी. गुप्ता ने भाग लिया। दवाई की दुकानों, दूध-सब्जी विके्रताओं और शिक्षण संस्थाओं को बंद से अलग रखा गया है।
http://www.pressnote.in/hindi/readnews.php?id=76680
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भारत बंद कल

प्रभात खबर ने आज छपा है :
नयी दिल्ली : वामपंथी पार्टियों तथा राष्ट्रीय जनता दल समेत 13 दलों की दिल्ली इकाइयों के नेताओं ने महंगाई के विरोध में कल (मंगलवार) आयोजित भारत बंद की तैयारियों के सिलसिले में आज यहां बातचीत की. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) की दिल्ली इकाई के प्रवक्ता ने बताया कि 13 पार्टियों की दिल्ली शाखा ने कल होने वाले राष्ट्रव्यापी बंद की तैयारियां शु कर दी है. जो पार्टियां कल के भारत बंद में शामिल हो रही हैं उनमें माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय लोक दल, तेलुगू देशम पार्टी, अखिल भारतीय फ़ारवर्ड ब्लॉक, रिवोल्युशनरी सोशलिस्ट पार्टी, जनता दल (एस), लोक जनशक्ति पार्टी, अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुन्न्ोत्र कड़घम, इंडियन नेशनल लोक दल और असम गण परिषद पार्टी भी शामिल हैं. गौरतलब है कि इन 13 गैर कांग्रेसी एवं गैर भाजपाई राजनीतिक दलों ने महंगाई के विरोध में कल संसद में कटौती का प्रस्ताव लाने की भी घोषणा की है. माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो के सदस्य सीताराम येचुरी ने कहा कि आवश्यक वस्तुओं खाद्य, डीजल व उर्वरक आदि के मूल्यों में बेतहाशा वृद्धि हुई है. इसके विरोध में यह बंद आयोजित किया जा रहा है. राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष अजित सिंह ने कहा कि तीसरा मोर्चा एकजुट है और 27 अप्रैल को वह संसद में कटौती का प्रस्ताव लाकर सरकार को घेरेगा. उन्होंने कहा कि सरकार की गलत नीतियों के कारण ही देश में महंगाई बढ़ी है जिसने आम आदमी की कमर तोड़ दी है.
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Anti-price hike strike fixed on April 27

The Sanghai Express published today :
Imphal, April 25 2010: The nation-wide strike being planned by Opposition political parties in protest against escalating price of essential commodities would be joined by the working class of Manipur, said national Secretary of Communist party of India L Sotinkumar.Speaking to newspersons at the irabot Bhavan office of the CPI today, Sotinkumar said the day-long general strike planned for April 27 would be joined by employees/workers of State-based banks, LIC, medical representatives, pharmacists, women vendors, drivers, rickshaw pullers and employees of some flight services.Contending that budgetary provisions of the Congress-led UPA Government is anti-poor, the CPI functionary also alleged that rather than take a holistic look on the negative points being pointed out by Left parties against the Central Government's economic policy, the Communist parties are being projected in poor light.Informing that the strike centred around cessation of economic activities would be held from 6 am till 4 pm, he also disclosed that in continuation of the protest against hike in prices of essential commodities Left parties would insist on a cut motion discussion on the issue.The cut motion with support of 13 opposition political organisations would proposed for a voice vote failing which the entire opposition MPs are ready to stage a walk-out, Sotinkumar maintained.Joining the media briefing, CPI state Secretary Sarat Salam confided that the cut motion would have the support of 278 MPs.All India Forward Block secretary Kh Gyaneswor and RSP secretary N Ratan were also presented at the briefing.
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Even Indian diaspora not free of caste bias, says Raja


The Hindu today published the following news :


डी. Raja, National Secretary of the Communist Party of India (CPI), said that the caste system and untouchability are deep rooted even among the Indian diaspora.


He was speaking at the State conference of the CPI at Chidambaram near here on Saturday to mark the birth anniversary of B.R. Ambedkar.
In an era of neo-liberalism, Dalits were put to hardship and the new economic policy had worsened their plight. Mr. Raja said that communists were fighting social ills and if Ambedkar were alive, he would have associated with the communists because he had striven to create a casteless society.
State Secretary of the CPI, D. Pandian, said that caste had become inalienable from birth to death. Even after conversion, it would not fade away.
Horrendous crimes were committed in the name of “honour killings” to do away with youngsters who married ignoring caste delineations.
Unless a genuine social transformation occurred, it was difficult to eradicate untouchability, he said.
Veteran communist leader R. Nallakannu deplored the double-tumbler system and denial of entry to temples that still existed in Tamil Nadu.
Mr. Nallakannu said that the Dalits could not wage a solitary battle; they had to align with like-minded organisations.
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Bharat Bandh against price rise tomorrow


http://www.mynews.in/ ने निम्न समाचार प्रकाशित किया है :


New Delhi: Delhi units of 13 parties, including Communist Party of India (CPI) and Rashtriya Janta Dal (RJD), met here today to discuss the nationwide strike against price rise tomorrow।


''Delhi chapter of 13 parties met today to intensify preparations for the nationwide strike which is on April 27,'' a CPI, Delhi, spokesperson said.
Workers and activists of CPI, CPI (Marxist), RJD, Samajwadi Party (SP), Rashtriya Lok Dal (RLD), Telugu Desam Party (TDP), All India Forward Bloc (AIFB), Revolutionary Socialist Party (RSP), Janta Dal (Secular), Lok Janshakti Party (LJP), All India Anna Dravida Munnetra Kazhagam (AIADMK), Indian National Lok Dal (INLD) and Asom Gana Parishad (AGP) will take out a procession tomorrow in various parts of Delhi to protest the rising prices of essential commodities.
''The procession is to spread the message that the Government's failure to control hoarding, black marketing and future trading in grains is the root cause of continuous rise in prices of essential commodities,''the spokesperson added.
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मई दिवस की चुनौतियां

मई दिवस काम के घंटे कम करने के संघर्षों की प्रारंभिक घटनाओं से संबंधित है। हर साल की पहली मई शिकागो में सन् 1885 की मई के रक्रंजित प्रथम सप्ताह की उन घटनाओं की याद दिलाती है। मजदूरों की मांग थी काम के घंटे कम किये जायें और आठ घंटे काम के, आठ घंटे परिवार के और आठ घंटे आराम के माने जाये। बाद के दिनों में तकनीकी विकास के फलस्वरूप कार्यदिन और भी कम करने की मांग उठने लगी। कई कार्यालयों में साप्ताहिक छुट्टी और काम के घंटे और भी कम किये गये। भारत के 5वें श्रम सम्मेलन में साप्ताहिक छुट्टी के साथ सप्ताह में 48 घंटे तय किये गये। लेकिन अब यह सब बीते दिनों की बात हो गयी। 60 और 70 के दशक के वैज्ञानिक तकनीकी क्रान्ति के बाद उल्टी गंगा बहने लगी। वैज्ञानिक तकनीकी उपकरण के अविष्कार के बाद आशा की जाती थी कि मजदूरों के कार्य हल्के होंगे, खतरनाक काम आसान होंगे और नये रोजगार के अवसर बढे़गे, किन्तु इन सभी आशाओं पर तुषारापात हो गया और तमाम अपेक्षाओं के प्रतिकूल नियोजकों ने कार्य दिवस अत्यधिक बढ़ा दिये हैं तथा कार्यदशा बद से बदतर किये है। वैज्ञानिक तकनीकी क्रान्ति की उपलब्धियों को पूंजीपतियों ने हाथिया लिया हैं और उनका इस्तेमाल वे अपने वर्ग स्वार्थ में करते हैं।भारत सरकार के श्रम मंत्रालय के अधिनस्थ वी वी गिरी राष्ट्रीय श्रम संस्थान ने नोएडा और गुडगांव में अत्याधुनिक तकनीकी के बीपीओ (बिजनेस प्रोसेसिंग आउटसोर्सिंग) और कालसेंटरांे में कार्यरत आधुनिकतमपरिधानों में सजे-सवरें शूटेड-बूटेड नवकार्य-संस्कृति के कर्मचारियों (दरअसल इन्हें कर्मचारी पुकारा जाना पसंद नहीं) की कार्यदशा का अध्ययन किया है। संस्थान के शोधकर्ता िवद्धानों ने विस्तृत छानबीन के बाद अपने तथ्यपूर्ण शोधगं्रथ में उजागर किया है कि कॉल सेंटरों में काम करने वालों की कार्यस्थिति प्राचीन रोम के गुलाम जैसी है। इन्हें प्रतिदिन प्रायः दस घंटे (और ज्यादा भी) बंदी अवस्था में काम करना पड़ता है। इससे नाना प्रकार की नयी शारीरिक एवं मानसिक बीमारियां परिलक्षित हो रही है। आईसीआईसीआई जैसी बैंकिंग कारोबार में भी काम करनेवालों के घंटे निर्धारित नहीं है और इन्हें 10 घंटे और इससे ज्यादा भी रोजाना काम करना पड़ता है। यह अलग-थलग अकेली घटना नहीं है।मैन्यूफैक्चरिंग उद्योग में ठेकाकरण, आउटसोर्सिंग और पीसरेट सिस्टम चल पड़ा है, जहां काम के घंटे निर्धारित नहीं है। उत्पादन प्रक्रिया में मूलचूल बदलाव आया है। कारखानों की भीड़भाड़ कम करके ‘लीन मॉडल’ अपनाया जा रहा है, जिसमें कुछेक अतिकुशल मजदूरों को कार्यस्थल में बुलाकर शेष काम ठेके पर बाहर वहां भेज दिये जाते हैं, जहां किसी प्रकार का श्रम कानून लागू नहीं है। अगर नियमानुसार श्रम कानून लागू भी है तो उसके अनुपालन की बाध्यता नही है। वैज्ञानिक तकनीकी क्रान्ति के बाद मजदूर वर्ग की अपेक्षाएं थी कि उनके कार्यबोझ कम होंगे, उनके आराम तथा रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, किंतु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। वैज्ञानिक उपलब्धियां महाकाय कार्पोरेटियों की चेरी बनकर रह गयी। इसीलिए काम के घंटे कम करने का संघर्ष टेªड यूनियन आंदोलन के सामने प्राथमिक महत्व का है।सन् 1990 में 10 प्रतिशत कर्मचारी कानून सम्मत सामाजिक सुरक्षासुविधाओं के दायरे में आते थे। वह संख्या सरकारी आंकड़ों के मुताबिक सन् 2000 में सात और 2005 में 5।66 प्रतिशत हो गयी। गैरसरकारी अनुमानों के मुताबिक आज 2010 में महज 5 प्रतिशत कर्मचारियों को कानूनी सामाजिक सुरक्षा की सुविधाएं प्राप्त है। इससे यह तथ्य सिद्ध होते हैं कि सन् 1990 के बाद के वर्षों में कोई तीन करोड़ मजदूर और कर्मचारी कानूनी सामाजिक सुरक्षा के दायरे से बाहर धकेल दिये गये।सामाजिक सुरक्षा संवैधानिक मानवधिकार है, जिसकी खुलेआम हत्या की जा रही है। पूंजीपति नियोजक और राज्य सत्ता के मेलजोल से सुविचारित अर्थनीति अख्तियार की गयी जिसके तहत उत्पादन प्रक्रिया में गैरकानूनी फेरबदल करके लोगों को रोजगार से निकाल बाहर किया जा रहा है। सन् 1991 में घोषित नई आर्थिक नीति स्थायी रोजगार को अस्थायी (टेम्पररी) और आकस्मिक (कैजुअल) बनाता और मजदूरों को टिकाऊ रोजगार तथा भरोसे की आय से वंचित करता है। यह गैरकानूनी प्रतिगामी कदम है जो इतिहास के चक्के को पीछे घुमाने पर अमादा है। औद्योगिक विवादअधिनियम की धारा 9ए एवं मजदूरपक्षी श्रम कानूनों को निष्क्रिय किया गया है। इस तरह काम का घंटा कम करने के साथ जीने लायक पारिश्रमिक और टिकाऊ रोजगार हासिल करने का संघर्ष मजदूर वर्ग के समक्ष दूसरी चुनौती आ खड़ी हुई है।हाल के दिनों में मंदी के नाम पर मजदूरों की छटनी बड़े पैमाने पर की गयी। मंदी, मुक्त बाजार व्यवस्था की देन है। इसका जिम्मेदार स्वयं पूंजीपति है मजदूर नहीं। जिस कृत्य का जिम्मेदार मजदूर नहीं उसकी मार मजदूर क्यों भुगते? मजदूरों के कंधे पर मंदी का हल बर्दाश्त-ए-काबिल नहीं है। इसीलिए रोजगार की सुरक्षा की तीसरी चुनौती मजदूर वर्ग के सामने दरपेश है।उपभोक्ता सामानों का दाम बढ़ाकर मुनाफा कमाना पूंजीपति वर्ग का अजमाया हुआ हथियार है। मजदूर वर्गीय संघर्षो से हासिल पारिश्रमिक वृद्धि को चीजों के दाम बढ़ाकर पूंजीपति वर्ग वापस छीन लेता है। महंगाई के मुद्दे पर आमजनों के हितों के साथ मजदूर वर्गीय हित अभिन्न रूप से जुड़ा है। मजदूर वर्ग के सामने यह महंगाई चौथी चुनौती है कि मजदूर वर्ग आम जनों के दुखों के साथ एक होकर वर्ग दुश्मनों की पहचान करे और उन्हें शिकस्त देने के लिए एकताबद्ध संघर्ष करे। सभी संकेत बताते हैं कि आनेवाले दिनों में देहात से शहर की ओर और पिछड़े इलाके से उन्नत क्षेत्र की तरफ जाने लायक रोजगार की तलाश में लोगों का पलायन और भी तेज होगा। इसके साथ ही उद्योग जगत में स्थायी रोजगार से अस्थायी और औपचारिक से अनौपचारिक उत्पादन पद्धति का प्रचलन भी बढ़ेगा। उत्पादन प्रक्रिया में ऐसे बदलाव की रफ्तार अधिकाधिक मुनाफा के निमित्त बढ़ाया जा रहा है। फलतः प्रवासी मजदूरों और अनौपचारिक श्रमजीवियों की बढ़ती तादाद को संविधान प्रदत्त सामाजिक सुरक्षा मुकम्मिल कराने का संघर्ष टेªड यूनियन आंदोलन के समक्ष पांचवी चुनौती है।देश के हर क्षेत्र में कार्पोरेट गवर्नेस का बाजार गर्म है। खुदरा बाजार का कार्पोटीकरण यहां तक कि कृषि क्षेत्र को भी कार्पोरेट के हवाले किया जा रहा है। कार्पोरेट गवर्नेस जिस गति से मजबूत हो रहा है, हमारा लोकतंत्र उसी क्रम में कमजोर हो रहा है। लोकतंत्र और कार्पोरेट सहयात्री नहीं बन सकते। लोकशाही और पूंजीशाही मूल रूप में विपरीतार्थक और परस्पर विरोधी दिशा है।देश की संसद को दरकिनार कर अंतराष्ट्रीय समझौते किये जा रहे हैं। संविधान के प्रावधानों के अंतर्गत कृषि राज्यों के मामले हैं, किन्तु राज्य विधान सभाओं और पार्लियामेंट की पीठ पीछे विश्व व्यापार संघ के समझौते पर हस्ताक्षर किये गये। सन् 1956 में संसद के दोनों सदनों द्वारा सर्वसम्मति से पारित औद्योगिक प्रस्ताव को नयी आर्थिक नीति की सरकारी घोषणा में खारिज कर दिया गया। मुक्त बाजार व्यवस्था को अपनाकर संविधान में वर्णित उदात्त समाजवादी आदर्शों की तिलांजलि दे दी गयी है। आत्मनिर्भर स्वावलंबी राष्ट्रीय अर्थतंत्र को साम्राज्यवादी वैश्वीकरण पर निर्भर बना दिया गया है। चंद व्यक्तियों के हाथों में पूंजी का संकेद्रण तेज गति से हो रहा है। विकास का लाभ देश के कुछेक व्यक्तियों तक सीमित है। देश का विशाल बहुमत विपन्न है। देश की संसद में करोड़पतियों ने बहुमत बना लिया है। इसलिए लोकतंत्र के क्षरण को रोकना और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को सुदृढ़ करना मजदूर वर्ग के सामने निर्णायक चुनौती है। हमें आर-पार की लड़ाई लड़नी है। तो आइये 2010 के मई दिवस के अवसर पर इन चुनौतियों का सामना करने और आम आदमी के हक में खुशहाल भारत बनाने का सामूहिक संकल्प लें।
- सत्य नारायण ठाकुर
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पॉकेटमार बजट

यह बजट क्या है? एक छलावा है, ईमानदार की जेब काटकर बेईमानों के पॉकिट में पैसे डालने की कला है। इसीलिए तो उद्योग जगत ने इस कलाबाजी के लिए वाह-वाह कहा तो आम आदमी में त्राहिमाम मचा है।हरेक बजट का एक राजनीतिक दर्षन होता है। वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने उस दर्षन का संकेत अपने बजट भाषण के प्रारंभ में ही कर दिया कि बजट का फोकस सार्वजनिक क्षेत्र से हटकर निजी खिलाड़ियों (प्राइवेट एक्टर्स) की तरफ किया गया है और उसमें सरकार की भूमिका सहायक की होगी।असंगठित मजदूरों के लिए अर्जुन सेनगुप्ता कमीषन ने कम से कम 32 हजार करोड़ की सामाजिक सुरक्षा निधि की मांग की थी, किंतु इसके लिए बजट में मात्र एक हजार करोड़ के कोष का प्रावधान किया गया है। यह ऊंट के मुंह में जीरा समान है। बजट में सरकारी अस्पतालों, चिकित्सा एवं षिक्षा के पुराने बजटीय आबंटन पर भी कैंची चलायी गयी है। उपकरणों के बढ़े दामों के मद्देनजर पिछले वर्षों के बजट प्रावधानों के मुकाबले इस बजट में कम रकम आबंटित की गयी है। जीवनोपयोगी सामानों के बढ़ते दामों से जनता त्राहि-त्राहि कर रही है। महंगाई कम करने का कोई ठोस उपाय नहीं किया गया है। उल्टा परोक्ष कर का भार बढ़ाकर जले पर नमक छिड़का गया है।मोटी आयवालों को टैक्स चुकाने में रियायतें दी गयी हैं, वहीं उससे कई गुना ज्यादा परोक्ष कर लगाया गया है, जिससे महंगाई बढ़ेगी ही। इससे भूखों और कुपोषणों की संख्या बढ़ना निष्चित है। कार्पोरेट सेक्टर को मंदी के नाम पर दिया गया प्रोत्साहन पैकेज बंद किया जाना चाहिए था, क्योंकि उसका दुरूपयोग मुनाफा लूटने में किया जा रहा है। प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री ने अपील की थी कि मजदूरों की छंटनी नहीं की जाय? लॉक-आउट और ले-ऑफ रोके जायें, किंतु उद्योग जगत ने इस अपील की पूरी तरह उपेक्षा कर दी। फलतः रोजगार का भारी नुकसान जारी रहा। कार्पोरेट सेक्टर पर नये टैक्स लगाने के बजाय बजट में उन्हें रियायतें दी गयी है। अगर कल्याण योजनाओं के लिए पैसों की कमी है तो उद्योगपतियों पर टैक्स क्यों नहीं लगाये गये, जिन्होंने हाल के दिनों में मोटे मुनाफे कमाये हैं?आयात-निर्यात करनेवाले उद्योगपतियों को नयी रियायतें दी गयी हैं। उनके टैक्सों में नयी छूटें दी गयी है। आयात कर में कटौती की गयी है। विदेषी सामानों के आयात पर लगने वाली कस्टम डयूटी आधी कर दी गयी। फलतः विदेषी माल हमारे घरेलू बाजार में और भी धड़ल्ले से आयेंगे। इसका हमारे कल-कारखानों के उत्पादान पर विपरीत असर अवष्यंभावी है। यह अहसास किया जाना चाहिए कि आयात कर में कटौती करना न केवल विदेषी मालों को आमंत्रण देना है, बल्कि यह देष के अंदर बेरोजगारी का सीधा आयात करना है।जीडीपी बढ़ाकर दो अंकों में करने का लक्ष्य रखा गया है, किंतु जीडीपी का संबंध रोजगार बढ़ाने से नहीं जोड़ा गया है। इस प्रकार की जीडीपी बढ़ने से देष की संपदा कुछेक व्यक्तियों के हाथों में सिमटती जा रही है। यह भारतीय संविधान के उन निदेषक सिद्धातों के विपरीत है, जिसमें धन के कुछेक व्यक्तियों के हाथों में संकेन्द्रण की मनाही की गयी है। जीडीपी को आम जनता की खुषहाली के साथ जोड़ा जाना चाहिए। पूंजीपतियों की खुषहाली और आम आदमी की बदहाली भारतीय संविधान के समाजवादी लक्ष्यों का निषेध है।पेट्रोल-डीजल पर दाम बढ़ाना जनता की गाढ़ी कमाई पर डाका डालना है। रेलमंत्री ममता बनर्जी एक तरफ रेल भाड़ा नहीं बढ़ाने की वाहवाही लूट रही है। तो क्या डीजल का दाम बढ़ने से मालभाड़ा नहीं बढ़ेगा? पेट्रोल-डीजल पर दाम बढ़ना परोक्ष कर है, जो सीधे जनता की जेब काटता है। यह महंगाई से पीड़ित जनता के घावों पर नमक छिड़कना है।इससे सभी महसूस करते हैं कि राष्ट्रीयकृत बैंकों की भूमिका के चलते विष्वमंदी और वित्तीय संकट का असर भारत में कम देखा गया। उम्मीद की जाती थी कि राष्ट्रीयकृत बैंकों की वित्तीय प्रणाली मजबूत की जायेगी। इस उम्मीद पर पानी फिर गया। बजट के मुताबिक बैंकिंग क्षेत्र में निजी बैंकिंग प्रणाली के नये दरवाजे खोले गये हैं। यह अषुभ संकेत है। इससे हमारी वित्तीय व्यवस्था में विदेषियों का हस्तक्षेप बढ़ेगा।पूर्वी प्रदेषों में हरित कृषि क्रान्ति लाने के लिए चार हजार करोड़ रुपये के विषेष निवेष का षोर मचाया जा रहा है। देष की 65 प्रतिषत आबादी कृषि पर निर्भर है। इसके लिए यह आवंटन भी ऊंट के मुंह में जीरा का फोरन है। बिहार जैसे राज्य के लिए बाढ़ और सूखा महान आपदा है। इसके समाधान के लिए सम्यक स्थायी जल प्रबंधन की चिर जनाकांक्षा की उपेक्षा की गयी है। इसके बगैर इस क्षेत्र में हरित क्रांति की बात करना थोथा गाल बजाना है। सबसे खतरनाक खेल तो यह है कि कृषि में अमेरिकी कार्पोरेट के प्रवेष के बारे में एक समझौते के मसविदा पर पिछले महीने कैबिनेट ने हरी झंडी दी है। बजट में उन्नत तकनीकी भंडारण और वेस्टेज नियमन के लिये जो धनराषि आबंटन है, वह किसानों के लिये नहीं, प्रत्युत कार्पोरेटियों के लिये है। उसे वास्तविकता में कार्पोरेट सेक्टर ही हथियाएगा। हम आगे देखेंगे यह मसविदा क्या गुल खिलाता है।इसी तरह रेलमंत्री ममता बनर्जी ने पष्चिम बंगाल के आगामीविधानसभा चुनाव के मद्देनजर रेल बजट में चुनावी रंग फंेंट दिया है। वे अपने पिछले साल के रेलबजट का “दृष्य 2020” को भी अदृष्य कर गयीं। तेज रेलगाड़ियों के लायक ट्रैक निर्माण, समुचित सुरक्षा उपाय एवं अन्य अधिसंरचनात्मक (इंफ्राट्रक्चर) निवेष का प्रावधान नहीं किया गया है। रेल चलाने के लिए उन्होंने निजी क्षेत्र को पीपीपी (पब्लिक-प्राइवेट- पार्टनषिप) बुलावा भेजा है और रेलवेबोर्ड को पानी बोतल का कारखाना, इको-फ्रेंडली पार्क बनाने, स्कूल-कालेज और अस्पताल चलाने के काम में लगा दिया है।अब समय आ गया है कि अलग रेल बजट बनाने की औपनिवेषिक परंपरा खत्म की जाय और रेल बजट को सामान्य बजट का हिस्सा बनाया जाय। जब विभागीय रूप में दूरसंचार, डाकतार, उड्डयन, परिवहन, तेल, जहाजरानी, पोट एंड डॉक आदि चल सकते हैं तो रेल क्यों नहीं?वित्त मंत्री प्रणव मुखजी ने आम आदमी का बजट बताकर एक बड़ा झूठ परोसा है। असल में यह बजट पूंजीपतियों को रिझाने के लिए परोसा गया है। अंतर्राष्ट्रीय सट्टेबाजों का अखबार ‘वालस्ट्रीट जर्नल’ वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी के नाम पिछले हफ्ता एक खुला पत्र लिखकर सुझाव दिया था कि “अब आपकी सरकार निडर होकर तथाकथित सामाजिक समावेषिक विकास जैसे वोट बटोरू उपायों से मुक्त होकर सब्सिडी का खात्मा, निवेष को बढ़ावा और आयात-निर्यात सुगम करने के लिए कराधान की बाधा समाप्त कर सकेगी।”प्रतावित बजट प्रावधानों से प्रकट है कि अमेरिकी पूंजीपतियों का प्रतिनिधि अखबार ‘वालस्ट्रीट जनल’ के सुझावों के अनुकूल बजट में बखूबी इंतजाम किये गये हैं। इस बजट में जनता की जेब काटकर पूंजीपतियों की तिजोरी भरी गयी है। यह जनता के लिए एक पॉकेटमार बजट है।
- सत्य नारायण ठाकुर
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World Dance Day: 29th April, २०१० - International Message by Julio Bocca (Argentina)

Dance is discipline, work, teaching, communication. With it we save on words that perhaps others would not understand and, instead, we establish a universal language familiar to everyone. It gives us pleasure, it makes us free and it comforts us from the impossibility we humans have to fly like birds, bringing us closer to heaven, to the sacred, to the infinite.
It is a sublime art, different each time, so much like making love that at the end of each performance it leaves our heart beating very hard and looking forward to the next time.
English translation by Marcia De La Garza (Original in Spanish)
History of World Dance Day – 29th April
In 1982 the Dance Committee of the ITI founded International Dance Day to be celebrated every year on the 29th April, anniversary of Jean-Georges Noverre (1727-1810), the creator of modern ballet. The intention of the «International Dance Day Message» is to celebrate Dance, to revel in the universality of this art form, to cross all political, cultural and ethnic barriers and bring people together with a common language - Dance.
Every year a message from an outstanding choreographer or dancer is circulated throughout the world. The personality is selected by the founding entity of the International Dance Day - the International Dance Committee of the ITI, which collaborates with World Dance Alliance, a Cooperating Member of the ITI.
Together with the World Dance Alliance, ITI and its Dance Committee are celebrating International Dance Day at UNESCO in Paris.




Circulated by:
Indian People’s Theatre Association (IPTA).
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