- सत्य नारायण ठाकुर
फ़ॉलोअर
शनिवार, 22 मई 2010
at 9:29 pm | 0 comments | सत्य नारायण ठाकुर
मुंबई किसकी...?
- सत्य नारायण ठाकुर
at 9:22 pm | 0 comments | एन.के.बंसल
बैंक कर्मचारियों का वेतन वार्ता हेतु नवॉं वेतन समझौता - दो लाख 60 हजार सेवारत व एक लाख सेवानिवृत्त कर्मचारियों को पेंशन लाभ
- एन.के.बंसल
at 9:19 pm | 0 comments | देवाशीष प्रसून
बंधुआ मजदूरी का बदलता चेहरा
- देवाशीष प्रसून
at 9:17 pm | 0 comments | ए.बी. बर्धन
मई दिवस 2010: नई जिम्मेदारियां
- ए.बी. बर्धन
at 9:16 pm | 0 comments |
बोलीविया से उम्मीदें
at 9:11 pm | 0 comments | डी. राजा
संसद में भाकपा - दंतेवाड़ा में 62वीं बटालियन पर माओवादियों के हमले पर बयान
- डी. राजा
गुरुवार, 20 मई 2010
at 9:40 am | 0 comments | अनिल राजिमवाले
विश्व और भारत में श्रमिक दिवस: कुछ अनजाने पन्ने
- अनिल राजिमवाले
at 9:38 am | 0 comments | डा. गिरीश
सरकारी सेवाओं का निजीकरण जनविरोधी
- डा. गिरीश
”सम्मान“ के नाम पर हत्या करने वालों को सजा
- डा. बी.वी. विजयलक्ष्मी
मंगलवार, 4 मई 2010
at 5:20 pm | 0 comments |
लो क सं घ र्ष !: खोने के लिए बेड़ियां और जीतने के लिए सारा जहान
पिछले वक्त में जो महंगाई बढ़ी और जरूरी चीजों के दाम आसमान छूने लगे तो क्या कारखानों, खेतों में काम करने वाले मजदूरों ने मेहनत करनी कम कर दी थी? या कोई भयानक अकाल, बाढ या कौन सी तबाही सारी दुनिया में आ गई थी जिसकी वजह से सब कुछ तहस-नहस हो गया था? लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था। सारी दुनिया के मजदूर पहले की ही तरह, बल्कि पहले से भी ज्यादा मेहनत कर रहे हैं, लेकिन फिर भी एक तरफ उनका गला बढ़ती हुई महंगाई दबोचती है तो दूसरी तरफ से नौकरी छिन जाने की तलवार सिर पर लटकती रहती है। सब कहते हैं कि इन हालातों की वजह आर्थिक मंदी है, जो सारी दुनिया में संकट बनकर छाई है, लेकिन इस बात पर सभी पर्दा डालते हैं कि इस मंदी या आर्थिक संकट की वजह पूंजीवाद है, जिसका एकमात्र उद्देश्य मुनाफा कमाना है। आज अमरीका, यूरोप और दुबई से लेकर मुंबई, कोलकाता और गाजियाबाद, नोएडा, कोयंबतूर, इन्दौर, पीथमपुर, मालनपुर तक के मजदूर, छोटे कारखानेदार और छोटे व्यवसायी इस आर्थिक मंदी के शिकार होकर अपनी रोजी-रोटी खो बैठे हैं। वे जानते भी नहीं कि भरपूर मेहनत करने के बावजूद ऐसा उनके साथ क्यों हुआ। मुनाफे की होड़ में दनादन कर्ज बांटते गए अमरीकी बैंकों की गलतियों से अमरीकी अर्थव्यवस्था का जो दिवाला पिटा, उसका सबसे खराब नतीजा दुनिया भर के गरीब मजदूरों-किसानों को भुगतना पड रहा है।
उदारीकरण के नाम पर कंपनियों को ज्यादा मुनाफा कमाने की ढील और मजदूरों के जायज हकों में कटौती का जो दौर 20 बरस पहले शुरू हुआ था, वो अब और भी बेशर्म होकर गरीब जनता का शोषण कर रहा है। संगठित उद्योगों के भीतर कपड़ा मिलों के मजदूरों ने लगातार संघर्ष करते हुए जो जीत और मजदूरों के फायदे की जो उपलब्धियां हासिल की थीं, आज वे मजदूर सरकारी नीतियों और पूंजीपतियों की साझा साजिशों का शिकार होकर बेहद खराब जीवन स्थितियों से गुजर रहे हैं। कभी कपडा मिल में नौकरी मिलने को बैंक और शिक्षक की नौकरी से अच्छा माना जाता था। एक वजह तो यही थी कि कपडा मिलों में संगठित मजदूर आंदोलनों से नौकरी की सुरक्षा अधिक थी, कार्य स्थितियां बेहतर थीं, सामूहिकता का आनंद था और कारखाने में काम करना देश के लिए कुछ करने जैसा समझा जाता था। आज उन्हीं कपडा मिल मजदूरों के हाल ये हैं कि वे अपनी उम्र की अधेड़ अवस्था में कहीं प्राइवेट सुरक्षा गार्ड बनकर खडे हैं, कहीं सब्जी का ठेला लगा रहे हैं, कहीं पंचर जोड रहे हैं या कहीं किराए पर ऑटो रिक्शा चला रहे हैं। मिलें बंद हुए बरसों बीत गए लेकिन मिल मजदूरों को उनके हक की लडाई अभी तक लडनी पड रही है। जो इस सारी व्यवस्था से आजिज आ गए हैं, उनमें से अनेक हैं जिन्होंने अपने आपको निराशा में गर्क कर लिया है। उन्हीं की नई बेरोजगार पीढ़ी आसान शिकार बनती है साम्प्रदायिक, धार्मिक अंधविश्वास के कारोबारियों और अपराधी ताकतों का। इसके बावजूद ठीकरा मजदूर के सिर पर ही फोड़ा जाता है। इल्जाम लगाया जाता है कि मजदूरों की आरामतलबी और ट्रेड यूनियन राजनीति की वजह से कपड़ा मिलें घाटे में गईं। पूछा जाना चाहिए कि क्या अचानक देश की उन 112 कपड़ा मिलों में काम करने वाले मजदूर एकसाथ आरामतलब हो गए थे जिन्हें 1970 के दशक में बीमार घोषित कर नेशनल टेक्सटाइल कॉर्पोरेशन के अधीन लिया गया? दरअसल मालिकों ने करीब पांच दशकों तक इन मिलों से सैकड़ों गुना मुनाफा बनाया और जब मशीनें बदलने, नई तकनीक लाने और मजदूरों की जीवन स्थितियों पर खर्च करने की स्थिति आई तो उन्होंने कपड़ा मिलों को बीमार घोषित कर मजदूरों को सरकार के माथे पर थोपा, अपनी पूंजी मुनाफे के नए रोजगार में लगा दी। उद्योगों के अलावा सेवा क्षेत्र में भी कर्मचारी संगठनों ने कर्मचारियों के लिए बेहतर सेवा स्थितियों व उनकी नौकरी की सुरक्षा के सवाल को लेकर लगातार संघर्ष किया और कामयाबियां हासिल कीं। लेकिन पिछले दिनों जो रवैया सरकार और प्रबंधन ने स्टेट बैंक ऑफ इन्दौर के मामले में अपनाया, वो कर्मचारी संघर्षों के मामले में अभूतपूर्व है और ठोस सबूत है इस बात का कि मुनाफे की मंजिल हासिल करने के लिए पूंजीवादी राज्य व उसके पुर्जे किसी भी हद तक गिर सकते हैं। नब्बे वर्षों से लगातार लाभ में चल रहे स्टेट बैक ऑफ इन्दौर का विलय स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में कराने के लिए स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने न केवल पूरे देश में ख्यातिप्राप्त बैंक यूनियन को तोडा, बल्कि नियमों को ताक पर रखकर यूनियन के पदाधिकारियों के स्थानांतरण किए गए, अचानक विलय का प्रस्ताव लाया गया और उसे लागू कराने के लिए एडी-चोटी का जोर लगाया गया। आनन-फानन में प्रबंधन की बनाई एक दूसरी यूनियन को मान्यता दे दी गई। प्रबंधन के इस कार्य को निश्चित ही राज्य का समर्थन प्राप्त होगा। आज हमारा 'कल्याणकारी राज्य' सेठों और जमींदारों से ज्यादा दमनकारी हो गया है, बल्कि अब तो कंपनियां भी दमन करने के लिए अपनी प्राइवेट पल्टन रखने के बजाय राज्य को ही ठेका दे देती हैं। मध्य प्रदेश से लेकर असम, उडीसा, छत्तीसगढ, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश, सभी जगह यही हाल हैं।
बैंक, बीमा का क्षेत्र हो या बडे उद्योगों का, सभी जगह मुनाफा बढ़ाने के लिए आरी कर्मचारियों और मजदूरों के हितों पर ही चलाई जा रही है। अनेक मजदूर-कर्मचारी यह सोचते हैं कि उनकी नौकरी बची हुई है तो वे क्यों किसी संगठन की राजनीति का हिस्सा बनें। वे इस इतिहास से नावाकिफ हैं कि उन्हें हासिल होने वाली छुट्टियों, तनख्वाह वृद्धि, भविष्यनिधि, पेंशन व अन्य लाभ संगठित मजदूरों के अथक और लंबे संघर्षों का नतीजा हैं। और जैसे ही संगठित मजदूरों की ताकत कम होती है, पूंजीवाद दिए हुए सारे हक मजदूरों-कर्मचारियों से छीन लेता है। पूंजीवाद-साम्राज्यवाद की चाकरी करने के लिए संगठित मजदूर संघर्ष को तोड़ने में खुद सरकार भी कल्याणकारी होने के सारे नकाब उतार कर मजदूर विरोधी भूमिका में आ गई है। रोजगार बचाने की, संघर्षों से हासिल हुए हकों को बचाने की ये लडाई आज हर क्षेत्र के मजदूरों-कर्मचारियों के लिए बडी चुनौती बन गई है। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के प्रति तो मुनाफाखोर बाजार का रवैया और भी भयानक होता है। बीडी बनाने वाले, लघु उद्यागों में काम करने वाले, घरेलू कामकाज करने वाले, ठेला चलाने वाले, हम्माली करने वाले या इसी तरह के तमाम छोटे-बड़े कामों में दिन-रात पसीना बहाकर किसी तरह पेट पालने का जतन करते मजदूरों को रोजगार सुरक्षा और स्वास्थ्य-शिक्षा की सुविधाएं देना तो दूर, उल्टे उनके मुंह का निवाला भी छीना जा रहा है। खेती की हालत तो इससे भी ज्यादा खराब है। भूमिहीन मजदूरों और छोटे किसानों को जिन्दा रहने के लिए अधिकतर घर-परिवार छोड़कर पलायन करना पडता है और औनी-पौनी मजदूरी पर काम करके जीवन चलाना होता है। छोटे और मझोले किसानों के लिए भी खेती लगातार महंगी और मुश्किल होती जा रही है। खेती की बुरी हालत का इससे बडा क्या सबूत होगा कि सरकार खुद मान चुकी है कि पिछले 20 बरसों में 2 लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। इसके बावजूद देश में अरबपति बढ रहे हैं, कई कंपनियों का मुनाफा भी बढ़ रहा है, खिलाडियों की नीलामी वाला अरबों का आईपीएल क्रिकेट बढ रहा है, लेकिन रोजगार नहीं बढ़ रहा। ये सट्टेबाजी का ऐसा दौर है जिसमें उत्पादन कुछ नहीं हो रहा लेकिन पैसा बढ रहा है।
दो साल पहले अमरीका के राष्ट्रपति ने कहा था कि दुनिया में अनाज की कमी इसलिए आ रही है क्योंकि भारत और चीन के लोग ज्यादा खाने लगे हैं। इसी तर्ज पर कुछ और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने कहा है कि भारत के लोग जरूरत से ज्यादा खाते हैं। इस पर हमारी सरकार ये विचार कर रही है कि अभी गरीबों को जो थोड़ा-बहुत अनाज राशन की दुकानों से मिल जाता है, उसमें और कमी कर दी जाए। ऐसा सोचते हुए ये शर्म भी सरकार को नहीं आती कि खुद सरकार के ही अर्जुन सेनगुप्ता आयोग ने कहा है कि देश की 80 प्रतिशत से ज्यादा आबादी की हैसियत 20 रुपए रोज का खर्च करने की भी नहीं है।
एक तरफ सरकार बडी-बड़ी देशी-विदेशी कंपनियों को पूरे देश में कहीं भी आने और प्राकृतिक संपदा से लेकर मजदूरों के शोषण के लिए न्यौता दे रही है और दूसरी तरफ गरीबों से उनकी नमक रोटी भी छीन रही है। अपना हक मांगने वाले किसानों, मजदूरों, कथित विकास परियोजनाओं के विस्थापितों-पीडितों, आदिवासियों और दलितों-शोषितों के बजाय सरकार की चिन्ता ये है कि विदेशी कंपनी के बीटी बैंगन व अमरीका के फायदे के परमाणु समझौते की रुकावटें किसी तरह दूर हो जाएं।
इन बातों की चर्चा 1 मई के मौके पर इसलिए करना जरूरी है क्यों कि इतिहास गवाह है कि जब सत्ता इतनी अमानवीय और क्रूर हो जाती है तो लोगों के सब्र का पैमाना भी छलकने लगता है। ये असंतोष हम देश में हर जगह उफनता हुआ देख रहे हैं। पूंजीवाद लोगों के गुस्से से पहले तो दमन करके निबटता है। लेकिन जब गुस्सा इतना व्यापक और गहरा हो जाए कि जेलें और गोलियां भी कम पड ज़ाएं तो वो बेचैन शोषित लोगों को साम्प्रदायिक, जातीय, नस्लीय, भाषायी, क्षेत्रीय और तमाम तरह के झगडाें में उलझााने, बांटने और आपस में ही लडाने की कोशिशें करता है। दुनिया का सबकुछ हडप लेने की हवस में साम्राज्यवाद-पूंजीवाद न केवल मजदूरों के हक-अधिकारों को खत्म करना चाहता है बल्कि हमने देखा कि कैसे तेल की खातिर उसने अफगाानिस्तान, इराक, लेबनान, फिलिस्तीन और अन्य देशों के लाखों लोगों और बच्चों का कत्लेआम किया। 1 मई का दिन हमें ये याद दिलाता है कि पूंजीवाद को मेहनतकश जनता की सामूहिक ताकत के सामने आखिरकार झुकना पडता है। सन् 1886 की 1 मई को अमरीका के शिकागो शहर के हे मार्केट में जुलूस निकालते निहत्थे मजदूरों पर गोलियां चलाई गयीं और अनेक मजदूर मारे गए। बाद में चार मजदूर नेताओं को फांसी की सजा दी गई। उनका कसूर सिर्फ ये था कि वे काम के घंटे आठ किए जाने की मांग कर रहे थे। उस वक्त औद्योगिक क्रांति हुई ही थी और नए-नए उद्योग लग रहे थे। मजदूरों से गुलामों की तरह 12-14 घंटे बेहिसाब काम लेना आम बात थी। 1 मई को शहीद हुए उन मजदूर साथियों के खून से रंगा वो लाल झण्डा सारी दुनिया के मजदूर आंदोलन को सुर्ख रंग दे गया। उसके बाद से मजदूर आंदोलन तेज होता गया और तमाम संघर्षों के साथ कामयाबी की सीढ़ियां चढता गया। आज पूंजीवाद फिर अपने मुनाफे की खातिर मजदूरों से वो सारी उपलब्धियां छीन लेना चाहता है जो उन्होंने पीढियों के संघर्ष और अपना खून बहाकर हासिल की हैं। 1 मई हमारे लिए उन मजदूर साथियों और उनकी शहादत को याद करने का दिन है जो समूचे मजदूर-मेहनतकश तबके के हितों और हकों के लिए लडे, ज़ो साम्राज्यवाद-पूंजीवाद के रास्ते में चट्टान बनकर खडे हुए और समाजवाद के सपने को करोड़ों दिलों में बसा गए। 1 मई उस संकल्प को याद करने का भी दिन है कि ये समाज व्यवस्था, जो लालच, स्वार्थ, मुनाफे, भेदभाव और गैर-बराबरी पर टिकी है, ये हमें मंजूर नहीं। इसे हम बदल डालेंगे और एक ऐसा समाज बनाएंगे जहां इंसान का और श्रम का सम्मान हो, न कि पूंजी और मुनाफे का। 1 मई यह याद करने का भी दिन है कि शोषण के खिलाफ लडी ज़ा रहीं तमाम लंडाइयां शोषणविहीन समाज की स्थापना के व्यापक संघर्ष का ही हिस्सा हैं और हम सब मिलकर पूंजीवाद को उखाड़ फेंकने में जरूर कामयाब होंगे। इसी सपने की खातिर लडी ज़ाने वाली लड़ाइयों के लिए इंकलाबी शायर फैज अहमद फैज ने लिखा था -
विनीत तिवारी
देशबन्धु से साभार
शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010
मंगलवार, 27 अप्रैल 2010
at 4:20 pm | 0 comments |
CPI CONGRATULATES PEOPLE ON THE
CENTRAL OFFICE
Ajoy Bhavan, Phones(91-11)23235546,23235099, 23235058
15 Indrajit Gupta Marg, New Delhi.110002 Fax (91-11) 23235543
e-mail: :cpiofindia@gmail.com
General Secretary: A.B. Bardhan
27th April 2010
Press Release
The Central Secretariat of the Communist Party of India has issued the following statement to the press:
CPI CONGRATULATES PEOPLE ON THE
SUCCESS OF THE HARTAL
The Communist Party of India congratulates the people of all over the country who have responded to the call of Hartal against high prices and in protest against Government’s failure to take any steps for bringing down the high prices.
The Party expresses its grateful thanks to all the 13 Parties who have done everything to make the Hartal a success and also to other Parties who came out in support of the Hartal. This is a vivid example of the common man’s indignation and discontent, and the success owes it to the united action of all who made it their common cause. Even now the UPA Government should take this into account and take the necessary steps which the Left and other Parties have all along been proposing.
This is not the end of the struggle. The Parties will meet soon on a date which will be fixed after consultations to decide the next step which they together will take to force the hands of the Government.
(Kshetra Panda)
Office Secretary
at 12:48 pm | 0 comments |
भारत बंद पर सहयोग के लिए जनता का शत शत नमन
सोमवार, 26 अप्रैल 2010
at 10:11 pm | 0 comments |
वर्कला राधाकृष्णन का निधन
तिरूवनंतपुरम। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के वयोवृद्ध नेता वर्कला राधाकृष्णन का सोमवार सुबह निधन हो गया। वह 82 वर्ष के थे।
पार्टी के एक अधिकारी ने बताया कि राधाकृष्णन को पिछले सप्ताह अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। रविवार को उनकी हालत बिग़ड जाने पर उन्हें तिरूवनंतपुरम मेडिकल कॉलेज के आईसीयू ले जाया गया जहां सोमवार सुबह उन्होंने दम तो़ड दिया। उनका अंतिम संस्कार सोमवार रात करीब 9.30 बजे होगा। राजनीति में राधाकृष्णन के केरियर की शुरूआत वर्ष 1952 में ग्राम परिषद के प्रमुख के रूप में हुई। वह 1980 से 1996 तक केरल विधानसभा के सदस्य रहे। 1987 से 1991 के दौरान वह विधानसभा अध्यक्ष थे। वर्ष 1998 से वह चिरयांकीझु लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे थे।
at 9:58 pm | 0 comments |
कल अजमेर बंद का ऎलान
26 Apr, 2010 08:14 AM अजमेर। महंगाई के खिलाफ 27 अप्रेल को भारत बंद के समर्थन में वाममोर्चा समर्थक दलों ने अजमेर बंद का ऎलान किया है। बंद की तैयारियों को लेकर अजमेर-मेरवाडा गण परिषद अध्यक्ष सज्जनसिंह चौधरी की अध्यक्षता में बैठक आयोजित की गई। जिसमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के रमेश टेलर, फारवर्ड ब्लाक के धर्मेंद्र लालवानी, जन ??ा दल के घनश्यामसिंह राठौड, जनता दल 'यू' के सी।पी। कोली, समाजवादी विचार मंच के अब्दुल सलाम कुरैशी, बहुजन समाज पार्टी के दयाशंकर राठौडिया, अजमेर-मेरवाडा गण परिषद से अजयपाल, एमएमटी वर्कर्स यूनियन के हरिभाई शर्मा, असंगठित मजदूर एकता यूनियन के के। प्रवीण, सीपीएम के दिनेश गौड, आर।सी. गुप्ता ने भाग लिया। दवाई की दुकानों, दूध-सब्जी विके्रताओं और शिक्षण संस्थाओं को बंद से अलग रखा गया है।
http://www.pressnote.in/hindi/readnews.php?id=76680
at 9:57 pm | 0 comments |
भारत बंद कल
नयी दिल्ली : वामपंथी पार्टियों तथा राष्ट्रीय जनता दल समेत 13 दलों की दिल्ली इकाइयों के नेताओं ने महंगाई के विरोध में कल (मंगलवार) आयोजित भारत बंद की तैयारियों के सिलसिले में आज यहां बातचीत की. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) की दिल्ली इकाई के प्रवक्ता ने बताया कि 13 पार्टियों की दिल्ली शाखा ने कल होने वाले राष्ट्रव्यापी बंद की तैयारियां शु कर दी है. जो पार्टियां कल के भारत बंद में शामिल हो रही हैं उनमें माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय लोक दल, तेलुगू देशम पार्टी, अखिल भारतीय फ़ारवर्ड ब्लॉक, रिवोल्युशनरी सोशलिस्ट पार्टी, जनता दल (एस), लोक जनशक्ति पार्टी, अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुन्न्ोत्र कड़घम, इंडियन नेशनल लोक दल और असम गण परिषद पार्टी भी शामिल हैं. गौरतलब है कि इन 13 गैर कांग्रेसी एवं गैर भाजपाई राजनीतिक दलों ने महंगाई के विरोध में कल संसद में कटौती का प्रस्ताव लाने की भी घोषणा की है. माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो के सदस्य सीताराम येचुरी ने कहा कि आवश्यक वस्तुओं खाद्य, डीजल व उर्वरक आदि के मूल्यों में बेतहाशा वृद्धि हुई है. इसके विरोध में यह बंद आयोजित किया जा रहा है. राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष अजित सिंह ने कहा कि तीसरा मोर्चा एकजुट है और 27 अप्रैल को वह संसद में कटौती का प्रस्ताव लाकर सरकार को घेरेगा. उन्होंने कहा कि सरकार की गलत नीतियों के कारण ही देश में महंगाई बढ़ी है जिसने आम आदमी की कमर तोड़ दी है.
at 9:55 pm | 0 comments |
Anti-price hike strike fixed on April 27
Imphal, April 25 2010: The nation-wide strike being planned by Opposition political parties in protest against escalating price of essential commodities would be joined by the working class of Manipur, said national Secretary of Communist party of India L Sotinkumar.Speaking to newspersons at the irabot Bhavan office of the CPI today, Sotinkumar said the day-long general strike planned for April 27 would be joined by employees/workers of State-based banks, LIC, medical representatives, pharmacists, women vendors, drivers, rickshaw pullers and employees of some flight services.Contending that budgetary provisions of the Congress-led UPA Government is anti-poor, the CPI functionary also alleged that rather than take a holistic look on the negative points being pointed out by Left parties against the Central Government's economic policy, the Communist parties are being projected in poor light.Informing that the strike centred around cessation of economic activities would be held from 6 am till 4 pm, he also disclosed that in continuation of the protest against hike in prices of essential commodities Left parties would insist on a cut motion discussion on the issue.The cut motion with support of 13 opposition political organisations would proposed for a voice vote failing which the entire opposition MPs are ready to stage a walk-out, Sotinkumar maintained.Joining the media briefing, CPI state Secretary Sarat Salam confided that the cut motion would have the support of 278 MPs.All India Forward Block secretary Kh Gyaneswor and RSP secretary N Ratan were also presented at the briefing.
at 9:52 pm | 0 comments |
Even Indian diaspora not free of caste bias, says Raja

He was speaking at the State conference of the CPI at Chidambaram near here on Saturday to mark the birth anniversary of B.R. Ambedkar.
In an era of neo-liberalism, Dalits were put to hardship and the new economic policy had worsened their plight. Mr. Raja said that communists were fighting social ills and if Ambedkar were alive, he would have associated with the communists because he had striven to create a casteless society.
State Secretary of the CPI, D. Pandian, said that caste had become inalienable from birth to death. Even after conversion, it would not fade away.
Horrendous crimes were committed in the name of “honour killings” to do away with youngsters who married ignoring caste delineations.
Unless a genuine social transformation occurred, it was difficult to eradicate untouchability, he said.
Veteran communist leader R. Nallakannu deplored the double-tumbler system and denial of entry to temples that still existed in Tamil Nadu.
Mr. Nallakannu said that the Dalits could not wage a solitary battle; they had to align with like-minded organisations.
at 9:48 pm | 0 comments |
Bharat Bandh against price rise tomorrow

''Delhi chapter of 13 parties met today to intensify preparations for the nationwide strike which is on April 27,'' a CPI, Delhi, spokesperson said.
Workers and activists of CPI, CPI (Marxist), RJD, Samajwadi Party (SP), Rashtriya Lok Dal (RLD), Telugu Desam Party (TDP), All India Forward Bloc (AIFB), Revolutionary Socialist Party (RSP), Janta Dal (Secular), Lok Janshakti Party (LJP), All India Anna Dravida Munnetra Kazhagam (AIADMK), Indian National Lok Dal (INLD) and Asom Gana Parishad (AGP) will take out a procession tomorrow in various parts of Delhi to protest the rising prices of essential commodities.
''The procession is to spread the message that the Government's failure to control hoarding, black marketing and future trading in grains is the root cause of continuous rise in prices of essential commodities,''the spokesperson added.
at 6:51 pm | 0 comments | सत्य नारायण ठाकुर
मई दिवस की चुनौतियां
- सत्य नारायण ठाकुर
at 6:46 pm | 0 comments | सत्य नारायण ठाकुर
पॉकेटमार बजट
- सत्य नारायण ठाकुर
at 6:44 pm | 0 comments | इप्टा
World Dance Day: 29th April, २०१० - International Message by Julio Bocca (Argentina)
It is a sublime art, different each time, so much like making love that at the end of each performance it leaves our heart beating very hard and looking forward to the next time.
English translation by Marcia De La Garza (Original in Spanish)
History of World Dance Day – 29th April
In 1982 the Dance Committee of the ITI founded International Dance Day to be celebrated every year on the 29th April, anniversary of Jean-Georges Noverre (1727-1810), the creator of modern ballet. The intention of the «International Dance Day Message» is to celebrate Dance, to revel in the universality of this art form, to cross all political, cultural and ethnic barriers and bring people together with a common language - Dance.
Every year a message from an outstanding choreographer or dancer is circulated throughout the world. The personality is selected by the founding entity of the International Dance Day - the International Dance Committee of the ITI, which collaborates with World Dance Alliance, a Cooperating Member of the ITI.
Together with the World Dance Alliance, ITI and its Dance Committee are celebrating International Dance Day at UNESCO in Paris.
Circulated by:
Indian People’s Theatre Association (IPTA).
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