भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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मंगलवार, 8 मार्च 2011

बजट चर्चा

देश के अधिसंख्यक लोगांे को बजट का इंतजार रहता है - चाहे वह उत्तर प्रदेश सरकार का हो, केन्द्र सरकार का हो अथवा रेलवे का। केन्द्र सरकार के बजट के प्रति आकर्षण और उत्सुकता अन्य बजटों की अपेक्षा अधिक होती है।

28 फरवरी 2011 को वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने वर्ष 2011-12 का बजट संसद में पेश किया। राजनीतिज्ञों द्वारा समाजवाद का रास्ता छोड़े यानी देश की आम जनता से विमुख होकर देश एवं विदेशी सरमायेदारों की चाकरी के लिए उदारीकरण-निजीकरण-भूमंडलीकरण की व्यवस्था को शुरू किए 20 साल पूरे हो गये। अर्थव्यवस्था की तथाकथित उदारता के दौर में पेश किए गए बजटों की श्रृंखला में यह 21वाँ बजट है। बजट के दिन तीन महीनों से गिरते चले आ रहे सेंसेक्स और निफ्टी ने उछल-उछल कर बजट को सलामी दी और उसके अगले दिन तो यह दोनों खूब उछले। अब यह फिर गिरने लगे हैं। उनके उछाल ने यह संदेश दे दिया कि बजट एक बार फिर देशी और विदेशी पूंजी के हितों की रक्षा करने के लिए बनाया गया है।

अगले दिन पूंजी नियंत्रित कई समाचार-पत्रों पर नजर दौड़ाई। लगभग सभी के मुखपृष्ट पर अर्थव्यवस्था के ‘समाजवाद’ से ‘पूंजीवाद’ में संक्रमण के बीस साल पूरे होने की खुशी स्पष्ट और जोरदार तरीके से दिखाई दी। स्पष्ट जिक्र किया गया है कि 20 सालों पहले जब मनमोहन सिंह वित्तमंत्री बने थे तब भारत के पास विदेशी मुद्रा केवल इतनी थी कि दो सप्ताह के आयात का भुगतान किया जा सके जबकि आज 300 बिलियन अमरीकी डॉलर के बराबर विदेशी मुद्रा भंडार है। तब श्वेत-श्याम टीवी के नाम पर केवल ‘उबाऊ’ दूरदर्शन था आज रंगीन डिजीटल टीवी सेट के साथ सेटटॉप बॉक्स के जरिये सैकड़ों चैनेलों में से किसी एक को देखने का विकल्प है। तब पिता या भाई की मृत्यु का समाचार कोना कटे पोस्टकार्ड अथवा तार से मिलने में हफ्ते से अधिक वक्त लग जाता था आज 2-जी और 3-जी के जरिये हजारों कि.मी. दूर बैठा आदमी अपने पिता के मरने के ‘लाइव’ और रियल टाईम दृश्य देख सकता है और मरते हुए पिता को अपने आंसू दिखा सकता है। यह बात दीगर है कि इस अवधि में वास्तव में गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वालों की तादाद - संख्या और प्रतिशत दोनों में काफी बढ़ गयी है।

ये दो जयघोष काफी कुछ कह गये, यानी बजट उदारीकरण-निजीकरण-भूमंडलीकरण की प्रक्रिया को और तेजी से आगे बढ़ाने के लिए केन्द्रित है, आम जनता महंगाई, बेरोजगारी सहित तमाम आक्रमणों के लिए तैयार रहे। कहीं जिक्र नहीं दिखाई दिया 880 मिलियन उन आदमियों का जो आज भी बीस रूपये या इससे भी कम पर यानी गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर करने को विवश है। ध्यान दीजिएगा कि 880 मिलियन को अपनी भाषा में भी लिखा जा सकता है परन्तु आज-कल ईकाई-दहाई-सैकड़ा-हजार-लाख-करोड़-अरब........... शंख-नील सब छुद्र हो गये हैं, बाते मिलियन, बिलियन, ट्रिलियन लगती हैं औकात वाली। 1.1 बिलियन भारतीय आबादी में 880 मिलियन औकात रखता है। सरकार बना और बिगाड़ सकता है अगर जाति-धर्म और क्षेत्रीयता की संकीर्णता के मकड़जाल में फंसा हुआ न हो।

वित्तमंत्री ने अपने बजट भाषण की शुरूआत में ही विकास दर को दो गिनतियों यानी दस से निन्यानवे प्रतिशत के क्षेत्र में शीघ्र ही पहुंचने की बात कही। मनमोहन सिंह बता ही चुके हैं कि विकास दर और महंगाई के बीच ककड़ी और पानी जैसा रिश्ता है। भरपूर पानी मिलने पर जिस तरह ककड़ी की बित्त भर की बतिया रात भर में हाथ भर की ककड़ी हो जाती है उसी तरह विकास-दर दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती है महंगाई को भरपूर बढ़ा कर। जान लेवा महंगाई पर उन्होंने चिन्ता इस लहजे में जाहिर की मानो प्रकृति की वर्षा और बाढ़ जैसी कोई मार हो जिसमें सरकार के लिए कुछ करने और सोचने को ज्यादा होता नहीं है। यानी बजट महंगाई को और बढ़ायेगा।

उल्लेख जरूरी होगा कि सरकार के आंकड़ों के अनुसार विकास दर बढ़ाने के प्रयास में बढ़ाई गयी महंगाई के कारण सन 1990 का बीस हजार रूपया आज के दो लाख रूपयों के बराबर हो चुका है। सरकारी आंकड़े कितने सत्य होते हैं? यह हम सभी जानते हैं। आंकड़े ढूंढ़ने होंगे कि सन 1991 में गरीबी रेखा कितने रूपये प्रतिदिन पर मानी जाती थीऔर आज कितने रूपयों पर। क्या उसमें विकास दर का कोई अनुपात है अथवा नहीं।

कुछ ऐसे समाचार भी बजट से निकलते हैं। अस्पतालों एवं होटल के बिल अब 5 प्रतिशत महंगे हो जायेंगे क्योंकि उन पर सेवा कर लगेगा। सरकार खुद के अस्पतालों को धीरे-धीरे खत्म कर रही है। फ्री इलाज तो भूल जाइये, इलाज के लिए अब ज्यादा पैसे देने के लिए तैयार रहिये। 130 उत्पादों पर से उत्पाद कर की छूट वापस ले ली गयी है जिसके कारण टूथ पाउडर, टूथ पेस्ट, चश्में, लेंस, साईकिल, सिलाई मशीन, पेन, पेंसिल जैसी तमाम चीजें महंगी हो जायेंगी। कुछ अन्य उत्पादों पर उत्पाद कर की दर 4 प्रतिशत से बढ़ाकर 5 प्रतिशत कर देने के कारण चीनी, टॉफी, चाकलेट, बिस्कुट, पेस्ट्री, केक, कागज, दवाईयां और इलाज महंगे हो जायेंगे। जीवन बीमा की किश्तों पर सेवाकर लग जाने के कारण अब ज्यादा प्रीमियम देना होगा और हर साल मिलने वाला लाभांश कम हो जायेगा। कुछ अन्य प्राविधानों के कारण परचून की दुकान का बिल लगभग 5 प्रतिशत तो बढ़ ही जायेगा।

सीमेंन्ट पर उत्पाद कर को बढ़ा कर रू. 160.00 प्रति टन कर देने का बहाना सीमेन्ट कंपनियों को मिल गया है और बजट के दिन ही सीमेन्ट कंपनियों ने पांच रूपये प्रति बैग दाम बढ़ने की आशंका जता दी।

आंगनबाड़ी कार्यकात्रियों के वेतन को रू. 1500.00 से रू. 3,000.00 करने तथा आंगनबाड़ी सहायकों के वेतन को रू. 750.00 से रू. 1500.00 करने की बात अवश्य स्वागत योग्य है। परन्तु यह राशि अभी भी न्यूनतम मजदूरी से बेइंतिहा कम है और इन लोगों पर अत्याचार है। इसमें तथा इसी जैसे अन्य असंगठित क्षेत्र के कर्मियों के वेतन में बढ़ोतरी के लिए संघर्ष को और सघन करना होगा।

सरकार ने मनरेगा के अंतर्गत ग्रामीण मजदूरों को देय मजदूरी को महंगाई के साथ जोड़ने (इंडेक्सिंग) की बात की है लेकिन पिछले साल मनरेगा के अंतर्गत उपलब्ध कराये गये 40,000 करोड़ रूपये की राशि में केवल 100 करोड़ रूपये की बढ़ोतरी सरकार की मंशा पर प्रश्नचिन्ह लगा रही है। एक तो मनरेगा का लाभ गरीबी रेखा के नीचे की शत-प्रति-शत आबादी को मिल नहीं पा रहा है और अगर इंडेक्सिंग की जानी है तो इस राशि में कम से कम 4,000 करोड़ रूपये की बढ़ोतरी की जानी चाहिए थी।

वित्तमंत्री ने पेट्रोलियम पदार्थों, खाद तथा खाद्यान्न पर दी जाने वाली सब्सिडी को नगद देने का ऐलान किया है लेकिन उन्होंने खुद स्वीकार किया कि इसे अगले साल यानी 2012-13 के पहले लागू नहीं किया जा सकता। उन्होंने दी जाने वाली सभी सब्सिडी के लिए प्राविधानों को काफी कम कर दिया है। जैसे पेट्रोलियम पदार्थों - मिट्टी का तेल, एलपीजी आदि पर दी जानी सब्सिडी के लिए राशि को 15000 करोड़ रूपये से अधिक कम कर दिया है। जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार के कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रहीं हैं, तो सरकार इस घटी हुई राशि से जनता को कैसे राहत देना चाहती है, इसका खुलासा उन्होंने नहीं किया है। निश्चित रूप से लोगों को इसकी बढ़ी हुई कीमतें अदा करने के लिए तैयार रहना चाहिए।

खाद्यान्नों पर दी जाने वाली सब्सिडी की राशि को भी कम कर वित्तमंत्री ने स्पष्ट बता दिया है कि सोनिया की अध्यक्षता वाली जिस राष्ट्रीय सलाहकार परिषद द्वारा जिस खाद्य सुरक्षा कानून का ढोल काफी दिनों से पीटा जा रहा है, उसे एक साल अभी लागू करने का कोई इरादा नहीं है।

वित्तमंत्री ने किसानों को उनके उत्पादों के लिए मिलने वाले अलाभकारी मूल्यों तथा बाजार में उन उत्पादों की उच्च कीमतों की तो चर्चा की लेकिन किसानों को लाभकारी मूल्यों को मुहैया कराने के बारे में वे चुप हैं। उन्होंने छोटी अवधि के लिए फसली ऋणों की समय से अदायगी पर एक प्रतिशत ब्याज का अनुदान देने की तो घोषणा की और ब्याज दर को 4 प्रतिशत होने का दावा भी किया परन्तु जब किसानों को समय से पैसा मिलना सुनिश्चित नहीं होगा तो वे ऋण समय से अदा करेंगे कैसे? यह सवाल अभी भी बरकरार है। ज्ञातव्य हो कि गन्ना जैसी फसलों को उगाने वाले किसान का पैसा लम्बे समय तक चीनी मिल मालिक दबाये बैठे रहते हैं और तमाम फसलों के बाजार में आने पर उसके मूल्य बइंतिहा कम होने के कारण किसान दाम बढ़ने की आस में अपना अनाज थोड़े दिनों तक रोकना चाहता है।

किसानों का कोई और चर्चा लायक मुद्दा बजट में नहीं दिखाई दिया। किसानों को अपने उत्पादों के लाभकारी मूल्यों तथा अन्य सुविधाओं के लिए संघर्ष तेज करना होगा।

वित्तमंत्री ने बीमा क्षेत्र में 49 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को अनुमति देने, विदेशी संस्थागत निवेशकों को बैंकों में मतदान का अधिकार देने सहित वित्तीय क्षेत्रों से संबंधित लंबित 7 बिलों को पारित करने का इरादा जता दिया और नए बैंक खोलने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक को लाईसेन्स देने को कहा। यह सभी कदम प्रतिगामी होंगे। यह पूंजी को जन सामान्य की बहुमूल्य बचत से मुनाफा कमाने का अवसर देगा। राष्ट्रीयकरण के पहले और उसके बाद हमने निजी बैंकों के साथ उनमें जमा जनता के धन को डूबते देखा है। जनता को इन निजी बैंकों से न केवल होशियार रहना होगा बल्कि इनसे अपनी दूरी बनाये रखनी होगी। वित्तमंत्री ने यह इरादा भी साफ किया कि बैंकिंग सेवाओं को दूरस्थ ग्रामीण अंचलों में बैंक कर्मचारियों के जरिये न पहुंचा कर कारपोरेट घरानों सहित सभी प्रकार के निजी व्यावसायिक सहायकों की आउटसोर्सिंग के द्वारा होगी। यानी रोजगार के अवसरों को बढ़ाने के बजाय कम किया जायेगा।

बजट में घोषित इन उपायों को अमली जामा पहनाने के लिए जरूरी होगा कि सरकार भाजपा से हाथ मिलाकर संसद में संबंधित विधेयकों को पारित कराये। हाथ मिलाने में दोनों को कोई आपत्ति नहीं है क्योंकि दोनों के रास्ते एक ही हैं। दोनों अपने अमरीकी आकाओं के हुक्म की तामील ही तो करते रहे हैं।

सहकारी बैंकों की उपेक्षा की गयी है तथा सहकारिता आन्दोलन के बारे में कोई घोषणा नहीं की गयी है। सहकारी समितियों और बैंकों को आयकर से मुक्त करने की बात नहीं मानी गयी है जबकि कारपोरेट घरानों को आयकर से छूट दी गयी है। यह समितियां एवं बैंक अगर एक रूपये का भी मुनाफा कमाते हैं तो उन्हें आयकर देना होगा।

बैंकों द्वारा दिये जाने वाले प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र को ऋणों का लक्ष्य प्राप्त कराने के लिए पच्चीस लाख रूपये तक के गृह ऋण को प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र में वर्गीकृत करने की बात कही गयी है। एक तरह से कृषि, कारीगरों, छोटे उद्यमियों, छोटे दुकानदारों तथा अन्य छोटे स्तर के सेवा प्रदाताओं को इसके कारण बैंकों से ऋण मिलना कम होगा।

वित्तमंत्री ने सार्वजनिक क्षेत्र में रू. 40,000 हजार करोड़ के विनिवेश द्वारा वित्तीय घाटे को कम करने की कोशिश की है। इन बीस वर्षों में सार्वजनिक क्षेत्र के तमाम उद्यमों का निजीकरण किया जा चुका है। सरकार को इनसे मिलने वाले लाभांश की राशि में भी लगातार गिरावट दिखाई नहीं दे रही है।

शहर में मध्यमवर्गीय कर्मचारियों की संख्या ज्यादा होती है या फिर छोटे व्यापारियों की। बेचारों को इंकम टैक्स देना खलता है। छोटे-मोटे व्यापारी तो खर्चा-वर्चा दिखाकर और कुछ खर्च-वर्च करके कुछ बचा लेते हैं, इस कर्मचारी वर्ग के पास विकल्प ही नहीं हैं। सरकारी कर्मचारी हुआ तो ऊपरी आमदनी टैक्स देने से बच जाती है। बैंक, बीमा, शिक्षक, डिफेन्स जैसे सूखे क्षेत्र वालों के पास तो वह विकल्प भी नहीं है। हर साल 28 फरवरी को मुंह बाये बजट-बजट बतियाते रहते हैं फिर सिर धुनकर बैठ जाते हैं कि कुछ बचा नहीं। आयकर मुक्त आमदनी की सीमा में पुरूषों के लिए कुछ बढ़ोतरी की गयी है, महिलाओं को तो उससे भी महरूम रखा गया है। वरिष्ठ नागरिकों को कुछ छूट अवश्य दी गयी है। समाचार माध्यमों में छपा कि रू. 1,030.00 से लेकर रू. 26,780 तक की बचत होगी। रू. 1,030.00 तो समझ में आया लेकिन रू. 26,780.00 का आयकर कितनों का बचेगा, यह समझ में नहीं आया। रू. 1,030.00 का मतलब रू. 2.82 रोज। आयकर की सीमा में बढ़ोतरी दो साल बाद हुई है। इन दो सालों में महंगाई बढ़ने पर जो महंगाई भत्ता पा-पाकर संतोष कर रहे थे, वे अगर गणना करें तो पायेंगे कि इस बचत के बाद भी उनकी क्रयशक्ति में भारी गिरावट आयी है। दो साल पहले वे जितना खरीद सकते थे, आज वे उतना नहीं खरीद सकते। जो भविष्य निधि आज बचा-बचा कर रख रहे हैं, सेवानिवृत्त होने पर उसकी क्रयशक्ति भी बहुत कम हो चुकी होगी।

इसके उलट देशी कारपोरेट घरानों की एक करोड़ से अधिक आय पर लगने वाले सरचार्ज को साढ़े सात प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया है। विदेशी कारपोरेट घरानों को तो यह सरचार्ज केवल 2 प्रतिशत की दर से देना होगा। विदेशी सहयोगी कंपनियों से मिलने वाली लाभांश आय पर आयकर को घटाकर 16.22 प्रतिशत कर दिया गया है। कुछ छोटे सरमायेदारों पर थोड़ी सी गाज गिराई गयी है। न्यूनतम वैकल्पिक कर (मैट) को लाभ के 18 प्रतिशत से बढ़ाकर 18.5 प्रतिशत कर दिया गया है। सेज़ में काम कर रही कंपनियों को भी अब न्यूनतम वैकल्पिक कर (मैट) देना होगा। यह स्वागत योग्य है और उनसे पूरा आयकर लेने की मांग की जानी चाहिए।

भ्रष्टाचार और काले धन के बारे में वित्तमंत्री ने मंत्रियों के ग्रुप को दी गयी जिम्मेदारी का संदर्भ ही दिया है। यानी आने वाले दिनों में भी भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने और काले धन की बरामदी/जब्ती होने वाली नहीं है।

बजट के निहितार्थ यही हैं कि जनता पर - मजदूर वर्ग पर और किसानों पर आने वाले दिनों में आर्थिक हमले और तेज होंगे और जनता के पैसे की लूट देशी और विदेशी दोनों तरह की ‘पूंजी’ करती रहेगा। रोजगारों की कोई संभावना नहीं है। असंगठित क्षेत्र का शोषण जारी रहेगा। संगठित क्षेत्र में सेवा सुरक्षा को खतरा बढ़ेगा। बेरोजगारी बढ़ेगी।

इन हमलों से निजात पाने के लिए मजदूर वर्ग और किसानों को अपने वर्गीय संगठनों में अपनी एकजुटता को बढ़ाना होगा, दमन और अत्याचार के खिलाफ अपने संघर्षों को धार देनी होगी। देश में मिस्र और ट्यूनीशिया की तरह विकराल जंगी प्रदर्शनों और आम हड़तालों को आयोजित करना होगा।

ऐसे हालातों में हमें जनता के तमाम तबकों को वर्गीय चेतना से लैस करने के उत्तरदायित्व को तेजी से अमली जामा पहनाना होगा।

- प्रदीप तिवारी
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