भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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गुरुवार, 4 जून 2020

कोविद-19 की आड़ में लोकतन्त्र की हत्या करने पर आमादा है उत्तर प्रदेश सरकार: अमेरिका में तानाशाही के खिलाफ विद्रोह से सबक लें सरकारें



लखनऊ- 4 जून 2020, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने उत्तर प्रदेश सरकार पर आरोप लगाया है कि वह कोविड- 19 की आड़ में लोकतन्त्र की हत्या करने पर पर आमादा है। इस नापाक उद्देश्य से वह मजदूरों, किसानो और आम लोगों की आवाज को कुचल रही है। सरकार के इन क्रत्यों का विरोध करने पर विपक्ष के नेताओं को जबरिया गिरफ्तार करा रही है।
यहां जारी एक प्रैस बयान में भाकपा राज्य सचिव मंडल ने कहा कि राज्य सरकार ने विपक्ष को कुचलने के अपने राजनैतिक एजेंडे के तहत कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष श्री अजय कुमार लल्लू को गत दिनों आगरा में गिरफ्तार कर लिया। वहां जमानत मिल जाने पर मनमाने तरीके से नये केस गढ़ कर उन्हें दोबारा गिरफ्तार कर लिया। इसी तरह यूपी पुलिस ने 11 मई को बस्ती में वामपंथी दलों के कार्यकर्ताओं को उस समय गिरफ्तार कर लिया जब वे मजदूरों- किसानों की समस्याओं को लेकर जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपने जारहे थे।
अब कल मथुरा में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष की रिहाई की मांग को लेकर जिलाधिकारी को ज्ञापन देने पहुंचे कांग्रेस के लगभग दर्जन भर कार्यकर्ताओं को जबरिया गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
भाकपा इन गिरफ्तारियों की कठोर शब्दों में निन्दा करती है और मांग करती है कि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सहित सभी को तत्काल रिहा किया जाये।
उन्होने कहाकि भाजपा सरकारें कोविड- 19 से निपटने में बुरी तरह विफल होचुकी हैं और संक्रमितों की संख्या 1 लाख से ऊपर पहुँच चुकी है। वह जनता की समस्याओं के समाधान में बुरी तरह विफल होचुकी हैं। ऐसी स्थितियों में भी शासक दल अपने जनविरोधी एजेंडे को धड़ल्ले से चला रहा है और विपक्ष को जनता की समस्याएं उठाने से बाधित कर रहा है। वह कोविड-19 को अपने जनविरोधी कार्यों के कवच के रूप में स्तेमाल कर रहा है।
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष को इस खुन्नस के कारण गिरफ्तार किया गया कि परदेशी मजदूरों को लाने के लिए कांग्रेस ने बसें यूपी बार्डर पर लगा दीं। इससे भाजपा सरकार की किरकिरी हुयी जिसका बदला उन्होने कांग्रेस अध्यक्ष की गिरफ्तारी करके लिया। जब उन बसों को यूपी में घुसने ही नहीं दिया गया तो उनकी कथित सूची को गिरफ्तारी का आधार बनाना कोरा ढकोसला है। सरकार को इससे बाज आना चाहिए।
भाकपा ने कहा कि कोविड-19 के आने से पहले भी सरकार ने सीएए का विरोध कर रहे कई आंदोलनकारियों को गिरफ्तार किया और अन्य कई को गिरफ्तार करने का षडयंत्र रचा। अब वही कार्यवाही वह कोरोना महामारी की आड़ में कर रही है। सरकार लगातार लोकतान्त्रिक कार्यवाहियों को बाधित कर रही है और लोकतन्त्र को कुचल रही है। अमेरिका की घटनाओं से भी सरकार ने कोई सबक नहीं लिया जहां तानाशाही के खिलाफ करोड़ों लोग सड़क पर आगये है।

जारी द्वारा

डा॰ गिरीश, राज्य सचिव
भाकपा,  उत्तर प्रदेश

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गुरुवार, 3 मई 2018

जिन्ना की तस्वीर की आड़ में देश को नफ़रत की आग में झोंकने में जुटे हैं भाजपा और संघ परिवार: भाकपा उत्तर प्रदेश




 लखनऊ- 3 मई, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय छात्र संघ भवन में लगी मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर को हठाने की आरएसएस/ भाजपा की मांग और इसकी आड़ में सांप्रदायिकता फ़ैलाने, गुंडागर्दी करने तथा हिंसा भड़काने की कोशिशों की कड़े शब्दों में निन्दा की है.
यहां जारी एक प्रेस बयान में भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहाकि भाजपा देश चलाने और जनता से किये वायदों को पूरा करने में पूरी तरह विफल रही है. अतएव जनता को विभाजित करने को वह ऐसे संवेदनशील मुद्दे खड़े कर रही है जिनसे देश और समाज को भारी क्षति पहुंचेगी.
ताज़ा मामला एएमयू में लगी जिन्ना की तस्वीर को हठाने का है. डा. गिरीश ने कहाकि आरएसएस और जनसंघ 1977 में जनता पार्टी की सरकार में शामिल थे. 1999 से 2004 तक भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए की सरकार थी. और अब 4 साल से अपार बहुमत वाली भाजपा सरकार केन्द्र में है. उत्तर प्रदेश में भी 1966 से आज तक अनेकों बार भाजपा शासन में रही है. लेकिन कभी संघ परिवार को जिन्ना की तस्वीर हठाने की याद नहीं आयी.
लेकिन अब जबकि भाजपा हर मोर्चे पर पूरी तरह विफल होचुकी है, और काला धन वापस लाने, हर नागरिक को रु. -15 लाख देने, दो करोड़ युवाओं को हर साल रोजगार देने, किसानों की आमदनी दोगुना किये जाने तथा स्वच्छ प्रशासन देने जैसे उसके खास वायदों को पूरा करने से मुकर गयी है तो उसने तमाम विभाजनकारी मुद्दे उठाना शुरू कर दिया है. वोट की राजनीति के लिये वह देश की युवा पीढ़ी के दिलों में नफरत का जहर घोल रही है और उन्हें अपनी घ्रणित राजनीति का मोहरा बना रही है. अपने कुत्सित उद्देश्यों को पूरा करने को पहले उसने कासगंज में विद्यार्थियों को दंगों की आग में झोंका तो अब अलीगढ में छात्र- नौजवानों को नफरत की आग का ईंधन बनाया जारहा है.
जो भाजपा सरकार पूर्ण बहुमत में होते हुये न मंदिर निर्माण करा पायी, न धारा 370 को हठा पायी 2019 के लोक सभा चुनावों के  निकट आने और कर्नाटक विधानसभा चुनावों में फायदा उठाने को वह अब जिन्ना की तस्वीर हठाने के नाम पर हिंसा और उपद्रव पैदा कर रही है. रिकार्ड गवाह हैं कि हर चुनाव से पहले भाजपा गड़े मुर्दे उखाड़ना शुरू कर देती है. आजादी के आन्दोलन से बाहर रहा संघ परिवार कभी भी देश में अनेक जगह लगी अंग्रेज शासकों की मूर्तियों को हठाने की मांग नहीं करता. नहीं भाजपा सरकार ने कभी पाकिस्तान से कूटनीतिक संबंध तोड़े हैं. अपितु श्री मोदी तो वहां बिना आमंत्रण के ही जाचुके हैं. भाजपा को यह भी जबाव देना होगा कि उसके अनुयायी डा. आंबेडकर और पेरियार की प्रतिमाएं क्यों तोड़ा करते हैं? क्या पेरियार और आंबेडकर ने भी पाकिस्तान बनाया था?
डा. गिरीश ने कहाकि जहाँ तक अलीगढ का सवाल है वहां संघी संगठनों को हिंसा और उत्पात भड़काने की खुली छूट स्थानीय प्रशासन ने दी. उन्हें यदि एएमयू परिसर से दूर ही रोकने के बजाय पुलिस- प्रशासन कथित जागरण मंच वालों की सुरक्षा में लगा था. भाकपा का आरोप है कि योगी राज में पुलिस प्रशासन बेहद दबाव में काम कर रहा है. इसीलिये समूचा प्रदेश अराजकता, गुंडागर्दी और सांप्रदायिकता की गिरफ्त में है. मुख्यमंत्री को क़ानून व्यवस्था सुधारने से ज्यादा भाजपा के डूबते जहाज को बचाने की फ़िक्र है. कल आये तूफ़ान में आधा सैकड़ा से अधिक लोगों के मारे जाने और भारी तबाही के बावजूद वे कर्नाटक विधान सभा चुनाव में वोट बटोरने की कबायद में लगे हैं.
भाकपा ने अलीगढ़ में उत्पात मचाने वाले संघियों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत कार्यवाही किये जाने की मांग की है.

डा. गिरीश

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गुरुवार, 27 मार्च 2014

राज्य सरकार ने नहीं निभाया राजधर्म--भाकपा

लखनऊ- २७, मार्च, २०१४. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने कहा कि मुजफ्फरनगर के दंगों पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उत्तर प्रदेश की सरकार इन दंगों के फ़ैलने देने की गुनहगार है और उसे अब इन दंगों की नैतिक जिम्मेदारी कबूल कर लेनी चाहिये. लेकिन इस फैसले की आड़ में भाजपा द्वारा अपने को निर्दोष साबित करने की कोशिशों को भी भाकपा कतई बर्दाश्त नहीं करेगी और दंगों में उसकी संलिप्तता का भी पर्दाफाश करेगी. सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर भाकपा की प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए भाकपा के राज्य सचिव डॉ.गिरीश ने कहा कि वे स्वयं और उनकी पार्टी शुरू से ही कहती आरही है कि मुजफ्फरनगर दंगों में राज्य सरकार अपने राजनैतिक स्वार्थों को पूरा करने में जुटी रही और उसने दंगों को रोकने और फैलने से रोकने के लिये समुचित प्रयास नहीं किये. राज्य सरकार अपने कर्तव्य निर्वहन की दोषी है. अब सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उसे कटघरे में खड़ा कर देने के बाद राज्य सरकार को इसकी नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार कर लेनी चाहिये. भाकपा राज्य सचिव ने कहा कि इस फैसले की आड़ में भाजपा अपने को पाक दामन साबित करने में जुट गयी है. उसकी इस कोशिश का भाकपा पर्दाफाश करेगी. इस हेतु शीघ्र ही एक “खुलासा पत्र” जारी किया जायेगा. डॉ. गिरीश ने राज्य सरकार से मांग की कि वह इस फैसले को अमली जमा पहनाये और दंगे के दोषी वे चाहे किसी भी सम्प्रदाय अथवा पार्टी से सम्बंधित हों को तत्काल गिरफ्तार करे, सभी पीड़ितों को समान मुआबजा दे तथा वहां से पलायित लोगों को उनके गांवों में बसाने को ठोस कदम तत्काल उठाये. डॉ. गिरीश, राज्य सचिव भाकपा , उत्तर प्रदेश
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शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

एक प्रतीक की तलाश में भाजपा

आरएसएस, भाजपा (और भाजपा के पूर्व संस्करण जनसंघ) हमेशा एक प्रतीक की तलाश में रहे हैं। उनका अपना कोई ऐसा नेता पैदा नहीं हुआ जो खुद प्रतीक के रूप में याद किया जा सकता। ऐसे अकाल में निश्चय ही उन्हें एक प्रतीक के लिए भटकना पड़ रहा है। सत्तर के दशक में जनसंघ ने स्वामी विवेकानन्द को अपना प्रतीक गढ़ने का नापाक असफल प्रयास किया परन्तु विवेकानन्द के ऐतिहासिक शिकागो वक्तव्य ने जनसंघ की राह में रोड़े अटकाये जिसमें उन्होंने बड़ी शिद्दत से कहा था कि ”भूखों को धर्म की आवश्यकता नहीं होती है“। विवेकानन्द ने भूखों के लिए पहले रोटी की बात की जबकि जनसंघ और आरएसएस उस समय भारतीय पूंजीपतियों के एकमात्र राजनीतिक प्रतिनिधि के रूप में भारतीय राजनीति में कुख्यात थे।
उसी दशक में जनसंघ का अवसान हुआ और उसके नये संस्करण भाजपा का जन्म। भाजपा ने अपने जन्मकाल से सत्ता प्राप्ति के साधन के रूप में दो रास्ते निर्धारित किये - एक तो समाज के अंध धार्मिक विभाजन के जरिये मतों का ध्रुवीकरण और दूसरा एक प्रतीक को अंगीकार कर उसके आभामंडल के जरिये कुछ लाभ प्राप्त करना। पहले मंतव्य में तो भाजपा कुछ हद तक एक दौर में सफल रही परन्तु दूसरे मोर्चे पर उसके लगातार पराजय मिली है।
उन्होंने भगत सिंह को अपना प्रतीक बनाने की कोशिश इसलिए की क्योंकि शहीदे आजम भगत सिंह निर्विवाद रूप से भारतीय जन मानस में, और विशेष रूप से नवयुवकों में, एक नायक के रूप में जाने और पहचाने जाते हैं। भाजपा की यह बहुत बड़ी गलती थी क्योंकि भारतीय क्रान्तिकारियों में भगत सिंह उन नायकों में शामिल थे जिनके विचारों को पहले से ही बहुत प्रचार मिल चुका था। भगत सिंह के आदर्शों को भाजपा स्वीकार नहीं सकती क्योंकि वह ‘मार्क्सवादी’ दर्शन था। उन्होंने साम्प्रदायिकता के खिलाफ भी बोला और लिखा था जो पहले ही प्रकाशित हो चुका था। भाजपा एक बार फिर बुरी तरह असफल रही।
तत्पश्चात् भाजपा ने महात्मा गांधी को अपना प्रतीक बनाने की एक कोशिश की। अस्सी के दशक में ‘गांधीवादी समाजवाद’ लागू करने का नारा दिया गया। यह पहले की गल्तियों से कहीं बड़ी गलती थी। इस बात में कोई सन्देह नहीं कि गांधी एक महापुरूष थे और दुनियां के तमाम देशों में स्वतंत्रता और दमन के खिलाफ संघर्ष करने वालों ने उनके ‘सत्याग्रह’ के विचारों को लागू करने के सफल प्रयास किये परन्तु गांधी जी कभी समाजवादी नहीं रहे थे। इसलिए आम जनता कथित ‘गांधीवादी समाजवाद’ को स्वीकार भी नहीं कर सकती थी। दूसरे भाजपा की नाभि आरएसएस पर गांधी की हत्या का आरोप उस समय लग चुका था जब न तो जनसंघ वजूद में था और न ही भाजपा।
कांग्रेस नीत संप्रग अपने दो कार्यकाल पूरे कर रही है। निश्चित रूप से उसे पिछले 10 सालों के अपने काम-काज के कारण जनता में व्याप्त असंतोष का सामना आसन्न लोक सभा चुनावों में करना होगा। भाजपा इस अवसर का लाभ उठाने के लिए बहुत व्याकुल है। एक ओर वह अपने एक साम्प्रदायिक प्रतीक नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री का प्रत्याशी घोषित कर ध्रुवीकरण का प्रयास कर रही है तो दूसरी ओर ‘लौह पुरूष’ के नाम से विख्यात कांग्रेसी नेता सरदार पटेल को अपना प्रतीक बना लेने की कोशिशें कर रही हैं।
भाजपा द्वारा मोदी को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित किये जाने के पहले ही मोदी यह घोषणा कर चुके थे कि वे नर्मदा जिले में सरदार सरोवर बांध के पास सरदार पटेल की लोहे की एक 182 मीटर ऊंची विशालकाय प्रतिमा बनवायेंगे जो दुनियां की सबसे ऊंची प्रतिमा होगी। इस प्रतिमा के निर्माण के लिए गांव-गांव से खेती में प्रयुक्त होने वाले लोहे के पुराने बेकार पड़े सामानों को इकट्ठा किया जायेगा। अभी हाल में उन्होंने इस प्रतिमा का शिलान्यास समारोह भी सम्पन्न करवा दिया। समारोह के पहले मोदी ने पटेल के प्रधानमंत्री न बनने पर अफसोस जताकर गुजराती अस्मिता को उभारने की कोशिश की। उन्होंने यहां तक कह दिया कि सरदार पटेल की अंतेष्टि में जवाहर लाल नेहरू उपस्थित नहीं थे। एक तरह से मोदी देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू पर आक्रमण के जरिये ‘सोनिया-राहुल’ को भी निशाने पर लेना चाह रहे थे। कांग्रेस का मोदी पर पलट वार स्वाभाविक था।
भाजपा के किसी जमाने के कद्दावर नेता लाल कृष्ण आणवानी आज कल आरएसएस की बौद्धिकी का काम संभाल चुके हैं। सोशल मीडिया पर ब्लॉग लेखन वे काफी समय से कर रहे हैं। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में मोदी के नाम की घोषणा पर उन्होंने कुछ नाक-भौ जरूर सिकोड़ी थी परन्तु आज कल वे अपने ब्लॉग के जरिये मोदी के एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं। आरएसएस की यह पुरानी रणनीति रही है कि वह अपने सभी अस्त्र-शस्त्र एक साथ प्रयोग नहीं करती बल्कि किश्तों में करती है जिससे मुद्दा अधिक से अधिक समय तक समाचार माध्यमों में छाया रहे।
आणवानी जी ने पहला शिगूफा छोड़ा कि नेहरू ने कैबिनेट बैठक में 1947 में सरदार पटेल को साम्प्रदायिक कहा था। इसका श्रोत उन्होंने एक पूर्व आईएएस अधिकारी को बताया। इस बात पर भी प्रश्न चिन्ह है कि जिस अधिकारी का हवाला दिया गया है वह उस समय सेवा में था अथवा नहीं और अगर सेवा में था तो भी वह कैबिनेट बैठक में कैसे पहुंचा। ध्यान देने योग्य बात यह है कि आजादी के पहले आईएएस नहीं आईसीएस होते थे। दो दिन बाद ही उन्होंने पूर्व फील्ड मार्शल मानेकशॉ के हवाले से अपने ब्लॉग में लिखा कि नेहरू 1947 में पाकिस्तान की मदद से कबाईलियों द्वारा कश्मीर पर हमले के समय फौज ही भेजना नहीं चाहते थे और फौज भेजने का फैसला सरदार पटेल के दवाब में लिया गया था। यह मामला भी कैबिनेट बैठक का बताया जाता है। इस पर भी प्रश्नचिन्ह है कि 1947 में मॉनेकशा फौज के एक कनिष्ठ अधिकारी थे और वे कैबिनेट बैठक में मौजूद भी हो सकते थेे अथवा नहीं। आने वाले दिनों में इसी तरह के न जाने कितने रहस्योद्घाटन आरएसएस की फौज करेगी जिससे मामला बहस और मीडिया में लगातार बना रह सके।
उत्सुकता स्वाभाविक है कि आखिर सरदार पटेल को इस गंदे खेल के मोहरे के रूप में क्यों चुना गया है? बात है साफ, दलीलों की जरूरत क्या है। एक तो भाजपा सरदार पटेल के नाम पर गुजराती वोटों का ध्रुवीकरण करना चाहती है। दूसरे पटेल गुजरात की एक ताकतवर जाति है और उत्तर भारत की एक ताकतवर पिछड़ी जाति ‘कुर्मी’ भी अपने को सरदार पटेल से जोड़ती रही है। इस तरह उत्तर भारत में ‘कुर्मी’ वोटरों का ध्रुवीकरण भी उसका मकसद है।
मकसद कुछ भी हो, एक बात साफ है कि जब स्वामी विवेकानन्द भाजपा के न हो सके, न ही भगत सिंह और महात्मा गांधी तो फिर सरदार पटेल भी भाजपा के प्रतीक नहीं बन पायेंगे। सम्भव है कि चुनावों के पहले इसका भी रहस्योद्घाटन हो ही जाये कि महात्मा गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर प्रतिबंध भी सरदार पटेल ने ही लगाया था और तत्कालीन संघ प्रमुख गोलवलकर से माफी नामा भी उन्होंने ही लिखाया था क्योंकि वे उस समय अंतरिम कैबिनेट में गृह मंत्री थे।
- प्रदीप तिवारी
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शुक्रवार, 28 जून 2013

बिखरा राजग, अब संप्रग-2 की बारी

जैसे-जैसे लोक सभा चुनाव 2014 नजदीक आ रहे हैं, राष्ट्रीय राजनीति में नैसर्गिक रूप से एक नए ध्रुवीकरण की प्रक्रिया भी गति पकड़ रही है। जिस राजग में कभी भाजपा के साथ 23 और क्षेत्रीय दल हुआ करते थे, उसमें शुरू हुआ बिखराव एक तरह से अपने चरम पर पहुंच चुका है। सम्प्रति राजग में भाजपा के साथ केवल शिरोमणि अकाली दल और शिव सेना बचे हैं। मोदी के नाम पर शिव सेना भी आक्रामक रूख दिखा रही है, बात दीगर है कि उसे बाद में स्पष्टीकरण देकर नरम कर दिया जा रहा है। शिव सेना के मुखपत्र ‘सामना’ के सम्पादकीय में उत्तराखंड त्रासदी में मोदी के हवाले से किये गये इस दावे पर हमला किया गया था कि उन्होंने देहरादून जाकर उत्तराखंड में फंसे 15,000 गुजरातियों को सुरक्षित निकाल कर गुजरात वापस पहुंचा दिया। वैसे तो यह दावा स्वयं में हास्यास्पद था परन्तु आम जनता पर उसकी प्रतिक्रिया कुछ दूसरी तरह की थी। लोगों को यह कहते सुना गया कि इसी तरह अगर अन्य राज्यों के मुख्यमंत्री भी देहरादून जाकर अपने-अपने राज्य के पर्यटकों को निकाल लाते तो अच्छा होता। इसके मद्देनज़र इस दावे की हकीकत पर यहां गौर करना जरूरी हो जाता है।
मोदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मजबूत कैडर हैं, संघ ने बहुत कुछ हिटलर और मुसोलिनी से सीखा और हिटलर के गुरू का यह कहना था कि किसी झूठ को सौ बार बोलने पर वह सच लगने लगता है। इतिहास में हमने स्टोव बाबा और गणेश जी के दुग्धपान जैसे तमाम झूठों का सच देखा है। मोदी इस गुरूवाणी पर बहुत यकीन रखते हैं और उन्होंने मीडिया - इलेक्ट्रानिक, प्रिन्ट एवं सोशल को प्रभावित करने का एक शक्तिशाली तंत्र विकसित कर रखा है। मोदी उत्तराखंड एक चाटर्ड हवाई जहाज से जाते हैं, वहां वे 80 इनोवा कारों को किराए पर लेते हैं और उसके ठीक 24 घंटों के बाद 15,000 गुजरातियों को बचा कर गुजरात पहुंचाने का दावा कर दिया जाता है। प्राकृतिक विपदा से जहां इतनी बड़ी विभीषिका आई हुई हो, रास्ते बंद हों, 10 दिन से अधिक का समय बीत जाने पर भी सेना हेलीकाप्टरों से लोगों को निकाल नहीं पाई है, वहां 80 इनोवा 24 घंटों में कैसे 15,000 गुजरातियों को गुजरात पहुंचा देती हैं, इसकी मीमांसा हम सुधी पाठकों पर छोड़ देते हैं। वे खुद तय कर लें कि मोदी से बड़ा मक्कार राजनीतिज्ञ हिन्दुस्तान में कोई दूसरा नहीं होगा। इसी के साथ हम अपने मूल विषय पर लौट चलते हैं।
राजग के विघटन के बाद क्या? यह एक सवाल है, जिस पर आज-कल हर आदमी बात करना चाहता है। क्या संप्रग-2 मजबूत हो रहा है? क्या तमाम घपले-घोटालों और महंगाई के बावजूद संप्रग-2 फिर एक बार सत्ता की ओर लौट रहा है? वैसे तो संप्रग-2 का विकल्प राजग नहीं था क्योंकि दोनों की आर्थिक नीतियों में कोई फर्क नहीं है। जनता जो बदलाव चाहती है वह नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के रास्ते आने वाला नहीं है। भाजपा खुद अपनी दुर्गति का एहसास कर छटपटा रही थी और इसी छटपटाहट में उसने मोदी का कार्ड खेलने की कोशिश की। यहां स्पष्ट करना जरूरी हो जाता है कि गुजरात गुजरात है, महाराष्ट्र महाराष्ट्र है और तमिलनाडु तमिलनाडु है। इन राज्यों में जो राजनीतिक युक्तियां कामयाब हो जाती हैं, वे पूरे हिन्दुस्तान में कामयाब हो ही नहीं सकती हैं। आडवाणी और नितीश की छटपटाहट के पीछे यही सत्य था, जिसे भाजपा अपनी छटपटाहट में देखना ही नहीं चाहती क्योंकि ऊपर यानी संघ के आदेश हैं।
संप्रग-2 आसन्न लोकसभा चुनावों में विजय प्राप्त करेगी, ऐसा तो वर्तमान हालातों में लगता नहीं है। जनता में भ्रष्टाचार के खिलाफ गुस्से को शान्त करने का सरमायेदारों ने जो गैर-राजनीतिक तरीका यानी भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल कानून का आन्दोलन चलाया था, उसका असर एक बार फिर समाप्त हो रहा है। जनता में गुस्सा पनप रहा है। जब गुस्सा पनप रहा है तो वह कहीं तो कहीं निकलेगा ही और अगर चुनाव सामान्य परिस्थितियों में हो जाते हैं, तो संप्रग-2 का सत्ता में वापस आना नामुमकिन लगता है।
संप्रग-2 में भी इस समय कुल 24 दल हैं। कुछ अन्दर तक शामिल हैं तो कुछ बाहर बैठ कर सहारा दिये हुये हैं। कोई मंत्री बन कर सहारा दिये हुये है तो कोई सीबीआई के खौफ से सहारा दिये हुये है। काठ की हांड़ी के नीचे जल रही आग ने हाड़ी के अधिसंख्यक हिस्से को जला दिया है। संप्रग-2 एक डूबता हुआ जहाज है और राजनीति में डूबते हुए जहाज से पहले चूहे भागते हैं और एक बार जो भगदड़ शुरू होती है तो रूकने का नाम नहीं लेती। देखना दिलचस्प होगा कि यह भगदड़ कब शुरू होती है - चुनावों के कितना पहले? कांग्रेसी बहुत खुश हैं कि वे 24 हैं लेकिन उनकी खुशी जल्दी ही काफूर होने वाली है। जमाना था जब राजग में 24 दल थे और इतिहास में यही लिखा जाने वाला है कि संप्रग-2 में 24 दल थे।
किसी मोर्चे के रूप में चुनावों के पूर्व कोई विकल्प उभर सकेगा ऐसा नहीं लगता है परन्तु वामपंथ को अपने इतिहास से सबक लेते हुए बहुत संभल-संभल कर चलना होगा। पहली बात, उसे अपनी वैकल्पिक आर्थिक नीतियों की स्पष्ट व्याख्या करनी होगी। जब तक यह अंक आम जनता तक पहुंचेगा, 1 जुलाई को दिल्ली सम्मेलन में वामपंथ उस वैकल्पिक नीति को पेश कर चुका होगा और उसी के इर्द-गिर्द एक सैद्धान्तिक मोर्चा खड़ा करने की शुरूआत करेगा। जनता ऐसे आर्थिक-राजनैतिक विकल्प के इर्द-गिर्द लामबंद हो सकती है। दूसरे उसे पिछले चुनावों की अपेक्षा अपने अधिक उम्मीदवार देने का प्रयास करना चाहिए और अधिक से अधिक सीटों को जीतने के लिए लड़ना चाहिए जिससे वह अपने पिछले आकड़े 60 के आगे निकल सके। 60 से आगे निकलने का मतलब होगा कि चुनाव पश्चात् होने वाले ध्रुवीकरण का केन्द्र यानी न्यूक्लियस वामपंथ होगा न कि कोई अन्य क्षेत्रीय दल। वामपंथी कतारों को भी अभी से ही जुट जाना चाहिए। यह वक्त धन इकट्ठा करने का है, जनता को लामबंद करने का है और जनता के गुस्से को धार देने का है। उन्हें इस समय इसी मुहिम पर जुटना चाहिए।
- प्रदीप तिवारी, 23 जून 2013
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शनिवार, 29 सितंबर 2012

राजनीतिक विरोध की वास्तविकता

संप्रग-2 सरकार एक ऐसे भंवर में फंस गयी है जिससे वह निकल नहीं पा रही है। वह इस भंवर से जितना निकलने की कोशिश करती है वह ही अधिक वह उस भंवर में फंसती चली जा रही है। लोगों को याद होगा कि सन 1991 में देश का विदेशी मुद्रा भंडार इतना कम हो गया था कि तत्कालीन केन्द्रीय सरकार को सोना गिरवी रखकर विदेशी मुद्रा का इंतजाम करना पड़ा था। लोगों ने उस समय इस बात पर ध्यान नहीं दिया था कि ऐसी दुर्गति का कारण क्या था। चूंकि कारण जानने की कोशिश नहीं की गयी तो उस कारण के निदान की भी कोई कोशिश नहीं हुई।
विदेशी मुद्रा की आवश्यकता होती है आवश्यक वस्तुओं के विदेशों से होने वाले निर्यात के लिए, विदेशों से प्राप्त ऋणों की अदायगी के लिए और विदेशी निवेश पर प्राप्त लाभांश की वापसी के लिये। विदेशी मुद्रा की आय का मुख्य जरिया होता है निर्यात से प्राप्त आय। इसके अतिरिक्त जिन श्रोतों से विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है वे हैं विदेशों से प्राप्त ऋण, अनुदान और निवेश के लिए आई राशि। इन दोनों के मध्य संतुलन को भुगतान संतुलन या ‘बैलेन्स आफ पेमेन्ट’ के नाम से जाना जाता है। किसी भी देश के लिए विदेशी मुद्रा का संतुलन बहुत जरूरी होता है। आजादी के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर देने वाले राजनेताओं ने शुरूआत से ही निर्यात से प्राप्त विदेशी मुद्रा की आय के अतिरिक्त अन्य श्रोतों को प्रयोग करने में कोताही बरती। उन्होंने निर्यात से अधिक आयात को हमेशा हतोत्साहित किया और इसी के फलस्वरूप वे भारतीय रूपये की कीमत को अंतर्राष्ट्रीय बाजार में स्थिर रखने में सफल रहे। सन 1980 तक भुगतान संतुलन का ग्राफ एक सीध में हल्के-फुल्के उतार-चढ़ाव के साथ संतुलित रहा। आज की युवा पीढ़ी को सुनकर शायद यह आश्चर्य हो कि उस दौर में अमरीकी डालर की औकात भारतीय रूपये के सामने बहुत कम थी। केवल पौने पांच रूपये खर्च करने पर एक अमरीकी डालर मिल जाया करता था।
राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही सत्ता की राजनीति में नई पीढ़ी सामने आयी जिसने न तो आजादी की लड़ाई में भाग लिया था और न ही उसने अर्थशास्त्र को समझने की इच्छा। संचार क्रांति की ओर देश बढ़ा परन्तु अमरीका से अनाप-शनाप मूल्यों पर कम्प्यूटर एवं दूसरे यंत्रों के अंधाधुंध निर्यात से विदेशी मुद्रा का भंडार खाली होने लगा। आज जो कम्प्यूटर बीस हजार रूपये में मिल जाता है, उससे कई गुना कम क्षमता वाला कम्प्यूटर उस दौर में हिन्दुस्तान में दो-दो लाख रूपये में लाया गया। लोगों को दस साल पहले मिलने वाले मोबाईल की कीमत भी याद ही होगी और उसके फीचर्स भी। कभी यह ध्यान नहीं दिया गया कि इस निर्यात के लिए आवश्यक विदेशी मुद्रा का प्रबंध कैसे होगा। उसी का परिणाम सन 1990 में सामने आया जब विदेशी मुद्रा भंडार पूरी तरह चुक गया था और भारतीय रिजर्व बैंक को अपना सोने का भंडार गिरवी रखना पड़ा था। निश्चित रूप से देश के लिए वह शर्मनाक हालत थी। देश का हर नागरिक इस स्थिति के लिए दुखी था परन्तु अधिसंख्यक को इसका कारण ज्ञात नहीं था।
फिर उसके बाद दौर शुरू हुआ एक ऐसे दौर का जिसमें सत्ता से जुड़े राजनीतिज्ञों की वह पीढ़ी आई जिसने कभी भी देश के गरीबों की हालत नहीं देखी थी, जिसे कभी बेरोजगारी के दंश का सामना नहीं करना पड़ा था और जिसने देश के लिए कभी कोई ख्वाब नहीं देखा था। उसने जिन आर्थिक नीतियों पर चलने का फैसला किया उसी का परिणाम है कि कहने को तो देश की विकास दर आसमान छू रही है परन्तु अमरीकी डालर के सामने भारतीय रूपया इतना बौना हो गया है कि 55 रूपये खर्च करने पर भी एक अमरीकी डालर नहीं खरीदा जा सकता। इसी का परिणाम है कि आज हमे पेट्रोल और डीजल की कीमतें इतनी अधिक भुगतनी पड़ रही हैं। विदेशी मुद्रा भंडार एक बार फिर शून्य की ओर बढ़ रहा है। हमने आयात को निर्यात से अधिक कर दिया। विदेशी ऋणों से फौरी हल निकालने की कोशिश की जिससे एक ओर तो भ्रष्टाचार बढ़ा तो दूसरी ओर उस ऋण की ब्याज सहित अदायगी के लिए और अधिक विदेशी मुद्रा की जरूरत हुई। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए आया धन मुनाफे के साथ वापस चला गया। जितना लेकर आया था उससे कई गुना ज्यादा विदेशी मुद्रा लेकर गया।
मनमोहन सिंह जैसे अमरीका परस्त नौकरशाह से राजनीतिज्ञ बने लोग अब भी सुधरने का नाम नहीं ले रहे हैं। इस संकट का हल अभी भी वे उसी तरह फौरी तौर पर निकालना चाहते हैं। अमरीका के इशारे पर विदेशी पूंजी को खुदरा व्यापार तक करने की इजाजत दे दी गयी है। वे अभी भी उसी दिवास्वप्न में जी रहे हैं, जिस दिवास्वप्न को उन्होंने 1991 में देखा था। कहते हैं कि ठोकर लगने से आदमी सीखता है परन्तु मनमोहन सिंह और उनके साथी अभी भी सीखने को तैयार नहीं हैं।
संप्रग-2 आज एक डूबता हुआ जहाज है जो अपने साथ पूरे देश को डूबो देना चाहता है। भाजपा अपने जन्मकाल से अमरीका परस्त रही है। इस देश के समाजवादी भी अमरीका परस्त रहे हैं। वे बात तो देश के गरीबों की करते हैं परन्तु आजादी के अगले दशक में ही उन्होंने देश में विचारधाराविहीनता का परचम बुलन्द करने की कोशिश की थी। वे बात अल्पसंख्यकों की करते हैं परन्तु अल्पसंख्यकों के लिए लालू और मुलायम जैसे मुख्यमंत्रियों ने क्या किया, इसे जानने की जरूरत नहीं है क्योंकि बेवकूफ बनाने के सिवा उनके भले के लिए कुछ किया ही नहीं। उल्टे ऐसे-ऐसे कदम उठाये कि क्या कहना। उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यकों का एक बड़ा हिस्सा बुनकरों का है, उसे बर्बाद करने के लिए हैण्डलूम कारपोरेशन से लेकर कताई मिलों को बंद करवा दिया था। बुनकर अब रिक्शा चलाते हैं या फिर अभी भी करघा लेकर भूखों मर रहे हैं। प्रदेश की बेशकीमती सम्पत्ति को औने पौने दामों पर बेच दिया। बसपा की बातें और काम भी इससे अलग नहीं रहे हैं। वास्तव में दोनों ही मौसेरे भाई-बहन हैं।
डीजल के दाम बढ़े, गैस सिलेण्डरों की संख्या अतिसीमित कर दी गयी और खुदरा व्यापार में एफडीआई को अनुमति दे दी गयी तो समाजवादी भी सड़कों पर उतरे विरोध करने के लिए। लेकिन उन्होंने तुरन्त घोषणा कर दी कि साम्प्रदायिकता के प्रेत के डर से वे संप्रग-2 सरकार को समर्थन देना जारी रखेंगे। विरोध और समर्थन की यह फितरत तो केवल हिन्दुस्तान के समाजवादियों में ही देखने को मिलती रही है। संप्रग-2 की तरह साम्प्रदायिकता की नाव पर सवार दल भी आज डूबता जहाज हैं। राजग ने भी भ्रष्टाचार के आरोप में संसद न चलने देकर किस प्रकार संप्रग-2 को वह सब करने का मौका मुहैया कराया जो अमरीका और विदेशी पूंजी चाहती है। उनकी राजनीति तो विरोध के जरिये सहयोग पर चलती रही है।
भाजपा और समाजवादियों की इस फितरत को समझना होगा। जनता के हर तबके को सोचना चाहिए कि कौन विरोध के लिए विरोध कर रहा है और कौन वास्तव में विरोध कर रहा है। केन्द्र सरकार के जन विरोधी कार्यों का विरोध करने के लिए जनता के विशाल तबके को उन वामपंथी ताकतों के इर्दगिर्द ही इकट्ठा होना चाहिए जो वास्तव में इन कदमों का विरोध कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश के नागरिकों को तो इस पर ज्यादा ही गौर करना चाहिए।
- प्रदीप तिवारी, 26 सितम्बर 2012
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रविवार, 10 जून 2012

होशियार! पेट्रोल कीमतों पर जनता की सहनशीलता को परखा है संप्रग ने

23 मई को जब संप्रग सरकार ने पेट्रोल की कीमतों में साढ़े सात रूपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की घोषणा की, उस समय इतनी ज्यादा मूल्यवृद्धि का कोई आधार नहीं था। उसके बाद दो रूपये प्रति लीटर के करीब दामों में कमी की जा चुकी है और परसो 8 मई को वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने कलकत्ता में पेट्रोल की कीमतों में और कमी के संकेत दिये। कारण तो यही बताया गया है कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कीमतों के कम होने के कारण ऐसा होगा। बात दीगर है जब दाम बढ़ाये गये थे तब भी अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार कमी हो रही थी और इन पन्द्रह दिनों के दौरान सिंगापुर क्रूड की कीमतें 107 से 109 डालर के बीच चल रही हैं।
अगर पेट्रोल की कीमतें और कम होती हैं तो जनता को राहत ही मिलेगी। लेकिन मनमोहन और प्रणव जनता पर बढ़ते बोझ के प्रमुख कारण अमरीका के इशारों पर ईरान से सस्ता कच्चा तेल खरीदना कम करते जाने और डॉलर के सापेक्ष रूपये की गिरती कीमतों के बारे में खामोश हैं। अगर डालर के सामने रूपया इसी तरह गिरता रहा जैसाकि वह पिछले 21 सालों में गिरता रहा है, तो अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की गिरती कीमतों का भी कोई असर नहीं हो पायेगा।
एक दूसरी बात, कल एक निजी टीवी चैनल को दिये गये साक्षात्मकार में केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा कि ”अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों के उतार-चढ़ाव से पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्यों को जोड़ने के राजग के फैसले को बदलकर संप्रग सरकार ने गलत किया है। सरकार को व्यापक राष्ट्रहित में कड़े फैसले लेने चाहिए भले ही वे जनता को न सुहाएं।“ जाने अनजाने शरद पवार कई बातें कह गये। एक तो यह कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दामों तथा अमरीकी डालर से पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों को जोड़ने यानी कीमतों को डीरेगुलेट करने का फैसला भाजपा नीत राजग सरकार ने लिया था। इसके साथ उन्होंने जो नहीं कहा, उसे भी समझ ही लिया जाये कि राजग सरकार के इस फैसले को संप्रग-1 की सरकार ने वाम दलों के दवाब में बदला था और वाम दलों की संसद में ताकत घटते ही बनी संप्रग-2 की सरकार ने एक बार फिर पेट्रोल की कीमतों को डीरेगुलेट कर दिया और बार-बार डीजल की कीमतों को भी डीरेगुलेट करने की बात की जा रही है। दूसरा, पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी सहित देश की तमाम क्षेत्रीय पार्टियों (जिसमें सपा और बसपा दोनों शामिल हैं) के लिए देश हित वही है जो अमरीकी साम्राज्यवाद को सुहाता हो और उन्हें इसकी कतई कोई चिन्ता नहीं है कि जनता को वह सुहाता है कि नहीं। पवार ने इस तरह एक बार फिर यह साफ करने की कोशिश की कि उन्हें न किसानों की चिन्ता है, न ही महाराष्ट्र की और न ही दुनियां के सबसे बड़े लोकतंत्र के लोक (जनता) की। इससे इन पार्टियों का वर्गीय चरित्र साफ हो जाता है।
वैसे अगर देखा जाये तो वास्तविक समस्या इस देश की जनता के साथ है। उसने ”जेहि विधि राखे राम, तेहि विधि रहिये“ की तर्ज पर अपने ऊपर होने वाले आक्रमणों को सहने की जबरदस्त शक्ति विकसित कर ली है। मंहगाई बढ़ रही है तो बढ़े, जनता सड़कों पर नहीं दिखाई देती। भ्रष्टाचार बढ़ रहा है तो बढ़े उसे कोई चिन्ता नहीं है, वह सड़क पर नहीं आ सकती। पेट्रोल की कीमतों में साढ़े सात रूपये लीटर की थर्रा देने वाली बढ़ोतरी कर दी गयी लेकिन वह सड़क पर नहीं आई। वामपंथी दलों ने विरोध जताया, उनके कार्यकर्ता सड़कों पर उतरे तो देखादेखी दूसरे राजनीतिक दलों ने भी फर्ज अदायगी में अपने कार्यकर्ताओं को सड़क पर उतारा लेकिन जनता तो सड़कों पर नहीं आई।
संप्रग-2 सरकार ने एसिड टेस्ट कर लिया कि जनता साढ़े सात रूपये लीटर तक भी बर्दाश्त कर लेती है यानी पूंजीवादी रणनीतिकारों के शब्दों में बर्दाश्त कर सकती है। जब बर्दाश्त कर सकती है तो निश्चित रूप से उसे बर्दाश्त कराया जायेगा, बार-बार बर्दाश्त कराया जायेगा और तब तक बर्दाश्त कराया जायेगा जब तक वह बर्दाश्त करती रहेगी।
हमारे विरोध के तरीके शायद पुराने पड़ चुके हैं। कहीं न कहीं हमारी रणनीतियों में कोई कमी है कि हम इतना जबरदस्त प्रहार होने पर भी जनता को बर्दाश्त न करने के लिए उद्वेलित नहीं कर पा रहे हैं। हम सबको मिल कर इस पर सोचना चाहिए और आन्दोलन के वे तरीके विकसित करने चाहिए जिससे बर्दाश्त करने की जनता की ताकत कम हो सके और वह एक बार फिर से सड़को पर उतरना सीखे जैसा कि वह पिछली शताब्दी के पहले 8 दशकों तक उतरा करती थी।
- प्रदीप तिवारी
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