भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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शनिवार, 10 नवंबर 2012

भाकपा राज्य मंत्रिपरिषद ने लिये आन्दोलन एवं संगठन संबंधी फैसले

लखनऊ 10 नवम्बर। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य मंत्रिपरिषद की यहां राज्य सचिव डा. गिरीश की अध्यक्षता में सम्पन्न बैठक में देश एवं प्रदेश की राजनैतिक स्थिति के साथ-साथ पार्टी एवं जन संगठनों द्वारा किये गये कार्यों की गहन समीक्षा की गई तथा आन्दोलन एवं संगठन संबंधी कई निर्णय लिये गये।
उत्तर प्रदेश में एक के बाद एक हो रही साम्प्रदायिक वारदातों को गंभीरता से लेते हुये पार्टी ने 1 दिसम्बर को ”साम्प्रदायिक सद्भाव एवं धर्मनिरपेक्षता की रक्षा दिवस“ जिलों-जिलों में आयोजित करने का निर्णय लिया गया है। पार्टी कमेटियों को दिये निर्देश में कहा गया है कि साम्प्रदायिक और कट्टरपंथी ताकतें अपने राजनैतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए दंगे भड़का रहीं हैं। उनका स्पष्ट लक्ष्य आगामी लोकसभा चुनाव से पूर्ण साम्प्रदायिक विभाजन पैदा कर वोट हथियाना है। राज्य सरकार भी निहित राजनैतिक स्वार्थों एवं दृढ़ इच्छाशक्ति के अभाव में दंगों से निपटने में उदासीनता बरत रही है। इससे साम्प्रदायिक सद्भाव एवं धर्मनिरपेक्षता के ताने-बाने को जबरदस्त चुनौती खड़ी हो गयी है, जिसको बचाना सभी धर्मनिरपेक्ष एवं लोकतांत्रिक ताकतों का फौरी कर्तव्य है। भाकपा की जिला कमेटियां 1 दिसम्बर को कन्वेंशन, सभायें, शान्ति-मार्च आयोजित करेंगी जिनमें वामपंथी, धर्मनिरपेक्ष तथा लोकतांत्रिक व्यक्तियों एवं शक्तियों को भी आमंत्रित किया जायेगा। 6 दिसम्बर को साम्प्रदायिक शक्तियां जो कुछ करने की सोच रही हैं, उसको देखते हुये भी चौकसी और सक्रियता जरूरी है।
भाकपा राज्य मंत्रिपरिषद ने अपने पिछले फैसले को दोहराते हुये 10 दिसम्बर मानवाधिकार दिवस को ”अनुसूचित जाति, जनजाति उपयोजनाओं को लागू करो दिवस“ के रूप में मनाने का आह्वान किया है तथा जिला केन्द्रों पर धरने/प्रदर्शन आयोजित कर राष्ट्रपति को सम्बोधित ज्ञापन दिये जाने का निर्देश दिया है।
केन्द्र सरकार द्वारा खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश लागू करने और खाद्य सुरक्षा बिल अभी तक लागू न करने के सवाल को गंभीरता से लेते हुये भाकपा मंत्रिपरिषद ने इन दोनों सवालों पर लगातार आन्दोलन एवं जन जागरूकता अभियान चलाने का निश्चय किया है। ‘एफडीआई रद्द करो, सबको खाद्य सुरक्षा दो’ अभियान के तहत पूरे दिसम्बर महीने सभायें, नुक्कड़ सभायें, कन्वेंशन, धरने, प्रदर्शन चलाने का निर्देश जिला कमेटियों को दिये हैं। कन्वेंशनों में राज्य नेतृत्व के साथी भी भेजे जा सकते हैं।
मुस्लिम अल्पसंख्यकों के समक्ष मौजूद समस्याओं, गरीबी, बेरोजगारी, शैक्षिक पिछड़ापन, जान व माल की असुरक्षा, भेदभाव एवं पुलिस उत्पीड़न के अलावा सच्चर कमेटी एवं रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्ट को लागू न करने से उनकी शोचनीय स्थिति को ध्यान में रखते हुये तथा अल्पसंख्यकों में प्रगतिशील सोच का विकास करने हेतु ‘इंसाफ’ तंजीम के माध्यम से प्रदेश में तीन क्षेत्रीय कन्वेंशन आयोजित करने का भी निर्णय लिया गया है। यह कन्वेंशन पूर्व, पश्चिम और मध्य उत्तर प्रदेश में 31 जनवरी तक आयोजित किये जायेंगे। सदस्यता कराके फरवरी माह में इंसाफ का राज्य सम्मेलन कराने का निर्णय भी इंसाफ ने लिया है।
इसके अलावा ट्रेड यूनियनों के राष्ट्रव्यापी अभियान को भाकपा द्वारा पूर्ण समर्थन दिये जाने का निर्णय भी किया गया।
पार्टी शिक्षा हेतु पार्टी स्कूल लगाने तथा इसके लिये जिला कौंसिलों की बैठक बुलाकर रूपरेखा तैयार करने का निर्देश भी जिला कौंसिलों को दिया गया है।
राष्ट्रीय परिषद द्वारा सदस्यता शुल्क की दर बढ़ाने पर विचारोपरान्त निर्णय लिया गया कि अब राज्य केन्द्र पर प्रति सदस्य शुल्क मय लेवी 20 रूपये देय होगा।
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दस दंगे केवल नौ महीने में

एक बार फिर उत्तर प्रदेश के हालात बहुत ही खतरनाक हैं। सपा सरकार को बने केवल नौ महीने हुये हैं और प्रदेश में दस साम्प्रदायिक वारदातें हो चुकी हैं। हर घटना में प्रशासन की लापरवाही ने सरकार की मंशा, कार्यप्रणाली और कार्यकुशलता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। चुनाव के वक्त ही यह आशंका जतायी जा रही थी कि समाजवादी पार्टी की सरकार बनते ही प्रदेश में दंगों और अपराधों की बाढ़ न आ जाये। लोगों ने सरकार तो बना दी परन्तु सरकार ने खुद की साख पर ही बट्टा लगा लिया है। मथुरा, बरेली, प्रतापगढ़, गाजियाबाद, इलाहाबाद, फैजाबाद, बाराबंकी जैसी जगहों पर आज भी तनाव बरकरार है। सरकारी सूत्रों का कहना है कि खुफिया तंत्र ने पहले ही आशंका जता दी थी कि प्रदेश बारूद के ढेर पर बैठा है और कहीं भी कोई भी बड़ी साम्प्रदायिक घटना घट सकती है। सरकारी सूत्रों का यह खुलासा तो सरकार और प्रशासन की मंशा पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगा देता है। सरकार और प्रशासन ने सुधरने के बजाय घटनाओं की शुरूआत में सुस्ती दिखा कर खुद पर ही सवालिया निशान लगा लिया।
सामान्य जनता समझ नहीं पा रही है कि अचानक प्रदेश में इस तरह दंगों की बाढ़ कैसे आ गयी। लोग अपने-अपने हिसाब से इसकी परिभाषा करने में जुटे हैं। मुख्यमंत्री ने फैजाबाद दंगों के बाद कहा कि ‘यह दंगे उनकी सरकार को बदनाम करवाने के लिये करवाये जा रहे हैं। इसके पीछे कुछ लोगों की साजिश है।’ अगर यह विरोधियों की साजिश है तो मुख्यमंत्री खुद कर क्या रहे हैं? फैजाबाद के दंगों के लगभग 14 दिन बाद प्रशासनिक अधिकारियों को हटाने का फैसला लिया गया है। दंगों के लिए इन प्रशासनिक अधिकारियों को उदारता दिखाते हुए अगर दोषी न भी माना जाये तो कम से कम जिस प्रकार घटनायें घटी थीं, उसमें समय पर कार्यवाही न करने का दोष तो कम से कम इन अधिकारियों द्वारा पर था ही। जिस प्रकार इन अधिकारियों ने अपराधिक सुस्ती दिखाई थी, उसी तरह की सुस्ती मुख्यमंत्री ने उन्हें हटाने का फैसला लेने में दिखाई। क्या मुख्यमंत्री जनता को यह बताने का साहस दिखायेंगे कि इसके पीछे किसकी साजिश थी? वैसे दंगों के पीछे किसी की साजिश थी तो फिर मुख्यमंत्री ने उस साजिश का नाकाम करने के लिए क्या किया, इसे भी जनता जानना चाहेगी। केवल साजिश का बहाना बनाने से सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती।
इन घटनाओं की हकीकत यह है कि मरने वालों में अधिसंख्यक मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं। सरकार बनाते ही मुसलमानों के कब्रिस्तानों की बाउंड्री बनवाने की घोषणा की गयी थी। इसके भी निहितार्थ अब तलाशे जाने लगे हैं।
ऐसा नहीं है कि ये हालात सिर्फ इसलिये पैदा हो रहे हैं कि अफसरों का इकबाल खत्म हो चुका है। कानून-व्यवस्था के लिए सरकार लम्बा समय नहीं मांग सकती। वास्तविकता यह है कि मुख्यमंत्री अथवा प्रधानमंत्री का तेवर देख कर ही अधिकारियों के काम करने का रवैया बदल जाता है और अगर तेवर दिखाने के लिए भी समय की जरूरत हो, तो इस पर आश्चर्य जरूर होता है।
2014 के लोकसभा चुनावों में वोटों के ध्रुवीकरण के लिए यहां के राजनैतिक दल अवसरवादी कदम उठा रहे हैं और उनके हाथों में खेल रही साम्प्रदायिक ताकतें कोई मौका छोड़ना नहीं चाहतीं। इन घटनाओं में जानमाल का नुकसान तो होता ही है पूरे सूबे का सौहार्द भी दांव पर लग जाता है।
वैसे प्रदेश में भाई-चारे के माहौल को तार-तार करने के प्रयास सफल नहीं होंगे। उत्तर प्रदेश की गंगा-जमुनी तहजीब बरकरार रही है और बरकरार रहेगी, इसे प्रदेश की जनता एक बार फिर साबित करेगी। ऐसे समय में धर्मनिरपेक्ष ताकतों और आम जनता की यह जिम्मेदारी बन जाती है कि वे सतर्क रहंे और भविष्य में वोटो के ध्रुवीकरण के लिए किए जाने वाले ऐसे किसी भी संकीर्ण और धृणित प्रयास को असफल कर ऐसी ताकतों को मुंहतोड़ जवाब दें।
- प्रदीप तिवारी
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नन्हे हाथ मलाला

इन नन्हे हाथों से होकर,
आवाज़ उठेजी, गूंजेगी।
इन नन्हे हाथों में बन परचम
आजादी खुलकर झूमेगी।।

ये हाथ खींचकर लायेंगे,
तारीक वक़्त में सूरज को।
ये हाथ उड़ा ले जायेंगे,
उस परीदेश में तितली को।।

ये हाथ करेंगे अब हिसाब,
उन दबी सिसकती फसलों का।
ये हाथ लिखेंगे मुस्तकबिल,
अब आने वाली नस्लों का।।

ये हाथ बनायेंगे अपनी,
शफ्फाफ़ सुनहरी दुनिया को।
वो दुनिया जसमें जंग नहीं,
औरत बच्चों पर जुल्म नहीं,
वो दुनिया जो बस अपनी हो,
बस इतनी की मैं हंस तो सकूं
और हंसने से मिरे,
तुम्हें डर ना लगे।।
(दुनिया की सबसे बहादुर बेटी मलाला युसुफजई के लिए)
- पंकज निगम
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बैठक स्थगन सूचना

लखनऊ 8 नवम्बर। पार्टी कार्यक्रम के मसौदे पर चर्चा हेतु 8 एवं 9 दिसम्बर 2012 को उरई में प्रस्तावित भाकपा राज्य कौंसिल की बैठक राष्ट्रीय नेतृत्व के इन तिथियों पर अन्यत्र व्यस्त हो जाने के कारण स्थगित कर दी गयी है।
राष्ट्रीय नेतृत्व से परामर्श के बाद पुनः निर्धारित तिथियों की सूचना बाद में दी जायेगी। साथियों से अनुरोध है कि उरई आने का कार्यक्रम स्थगित कर दें।
- डा. गिरीश, राज्य सचिव
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