भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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गुरुवार, 22 जुलाई 2021

अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर सरकार के हमलों पर भाकपा ने प्रतिरोध जताया


लखनऊ- 22 जुलाई 2021, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव डा॰ गिरीश ने उत्तर प्रदेश के मुखर टीवी चेनल भारत समाचार पर भाजपा सरकार की दमनात्मक कार्यवाही की कड़े शब्दों में भर्त्सना की है। भाकपा ने दैनिक भाष्कर समाचार समूह पर इसी तरह की कार्यवाही की भी भर्त्सना की है।

डा॰ गिरीश ने कहा कि पिछले कई माहों से भारत समाचार सरकार की गंभीर विफलताओं और जनता के प्रति दमनात्मक कार्यवाहियों को बेबाकी से उजागर कर रहा था। इससे एक डरी हुयी, विफल और निरंकुश भाजपा सरकार बौखला रही थी, और आज उसने संपादक ब्रजेश मिश्रा एवं चेनल हैड वीरेंद्र सिंह के घरों और दफ्तर पर आईटी की रेड करा दी।

यह प्रेस की स्वतन्त्रता पर आपातकाल से भी बड़ा हमला है। अब ये अघोषित नहीं घोषित आपातकाल है। यह पेगासस का विस्तार है। यह भाजपा और संघ के कथित हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद का असली चेहरा है, जो अब देश और दुनियां के सामने स्पष्ट उजागर होगया है। ये सब वह भाजपा करा रही है जिसके शीर्ष नेता, प्रवक्ता, आईटी सेल और प्रचार तंत्र दिन भर झूठ, भ्रम और भय फैलाते हैं। जिम्मेदार नागरिकों की जासूसी कराते हैं।

डा॰ गिरीश ने कहा कि भाकपा लोकतन्त्र, संविधान और अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा के लिये आगे बढ़ कर काम करती रही है। इस घटना से भाकपा कार्यकर्ताओं में गहरा रोष है, और वे अपने गुस्से का लोकतान्त्रिक तरीकों से हर जगह इजहार करेंगे।

डा॰ गिरीश  

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गुरुवार, 15 जुलाई 2021

सर्वोच्च न्यायालय की सुस्पष्ट टिप्पणियों के बाद भी उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा कांबड़ यात्रा रद्द न करना आश्चर्यजनक: भाकपा


लखनऊ-15 जुलाई 2021, उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा कांबड़ यात्रा निकलवाने पर अपनी प्रतिक्रिया जताते हुये भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने कहाकि कोरोना की दूसरी लहर का असर इतना व्यापक था कि उसकी चपेट में गांव और शहर के वे गरीब और निम्न मध्यवर्गीय परिवार भी बड़े पैमाने पर आये थे जिनके युवा/ युवतियां अधिकतर कांवड यात्रा पर जाते रहे हैं।

उनमें से अनेक परिवारों ने अपनों को खोया है। असंख्य परिवार ऐसे हैं जिनमें पूरे के पूरे परिवार कोरोना की चपेट में आये और इलाज और अव्यवस्थाओं से आर्थिक रूप से टूट कर रह गये हैं। रही सही कसर लाक डाउन से फैली बेरोजगारी और सरकार प्रायोजित महंगाई ने पूरी कर दी है।

ऐसे में उन्हें रोजगार और आर्थिक सहयोग प्रदान करने के बजाय योगी सरकार उन्हें कांबड़ यात्रा का लालीपाप दिखा रही है। भाकपा ने कहाकि लोग गमजदा हैं, कोरोना की भयावहता से वाकिफ़ हैं तथा वे अपने बचाव के प्रति सजग भी हुये हैं, अतएव कहीं से किसी ने भी कांबड़ यात्रा शुरू करने की मांग नहीं की। लेकिन ये भाजपा की राज्य सरकार है जो कांबड़ यात्रा के लिये लोगों को उकसा रही है।

भाकपा ने कहाकि अभी हम सबने कुम्भ मेले से कोरोना के प्रसार और उसकी तवाही का मंजर खुली आँखों से देखा है। हम यह भी जानते हैं कि भाजपा की इन्हीं सरकारों ने पहली लहर के दौराना दिल्ली में हुये तबलीगी जमात के सम्मेलन पर खूब बावेला मचाया था और तमाम तबलीगियों के जेल के सींखचों के पीछे पहुंचा दिया था। उनमें से कई आज भी जेलों में बंद हैं। यह महामारी पर दोगली राजनीति का स्पष्ट उदाहरण है।

भाकपा राज्य सचिव डा॰ गिरीश ने आरोप लगाया कि योगी सरकार वोट की राजनीति के लिये लोगों के जीवन से खिलबाड़ करने पर आमादा है। उत्तराखंड सरकार द्वारा यात्रा रद्द करने और प्रधानमंत्री और गृह मंत्रालय द्वारा नागरिकों की सुरक्षा के प्रति आगाह करने के बावजूद उसने अभी तक कांबड़ यात्रा रद्द करने का फैसला नहीं लिया है। इसका अर्थ है कि योगी सरकार को लोगों की जान- जीवन की कोई परवाह नहीं है और अपने निहित राजनैतिक स्वार्थों के लिये वह लोगों की आस्था का दोहन करना चाहती है।

भाकपा ने इस बात पर गहरा संतोष जताया कि देश की सर्वोच्च अदालत ने मामले को गंभीरता से लिया है और राज्य/ केन्द्र सरकार को नोटिस जारी किया है। आश्चर्यजनक है कि सर्वोच्च न्यायालय की खरी खरी टिप्पणियों के बाद भी उत्तर प्रदेश सरकार ने अभी अपने फैसले को रद्द नहीं किया है। इसे राज्य सरकार की ढीढता ही कहा जायेगा।

भाकपा ने आशा जताई कि निश्चय ही सर्वोच्च न्यायालय लोगों के जनजीवन की रक्षा के लिये समय रहते उचित निर्णय लेकर मगरूर सरकार को निर्देशित करेगा।

डा॰ गिरीश, राज्य सचिव

भाकपा, उत्तर प्रदेश।

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शनिवार, 10 जुलाई 2021

उत्तर प्रदेश: त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में लोकतन्त्र के चीरहरण पर भाकपा ने गहरी चिन्ता जतायी


लखनऊ-10 जुलाई 2021, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, उत्तर प्रदेश के राज्य सचिव मंडल ने कहा कि तीन दिनों तक चले हिंसक तांडव के बाद आखिर उत्तर प्रदेश में भाजपा ने ब्लाक प्रमुख के अधिकतम पदों पर कब्जा जमा लिया। कमरतोड़ महंगाई, कोरोना के झपट्टे से लोगों के जीवन बचाने में मुजरिमाना असफलता, अर्थव्यवस्था में महा गिरावट, बेरोजगारी और भुखमरी से पीड़ित उत्तर प्रदेश के आम मतदाताओं ने जिला पंचायत और बीड़ीसी सदस्यों के लिये हुये सीधे चुनावों में जिस भाजपा को बाहर का रास्ता दिखा दिया था, भाजपा और उसकी सरकार ने मध्यकालीन बर्बरता के बल पर चुने लोगों के वोटों को हड़प जिला पंचायतों और ब्लाक कमेटियों में कब्जा जमा लिया।

भाकपा राज्य सचिव मंडल ने कहा कि लोकतन्त्र की इस जघन्य हत्या को भाजपा और स्वयं मुख्यमंत्री जी 2022 का सेमी फायनल बता रहे हैं। देश भर में और उत्तर प्रदेश की जनता में इस बात पर गहरी बेचैनी और चिंता जताई जा रही है कि यदि सेमी फायनल ऐसा है तो उत्तर प्रदेश का आम चुनाव कैसा होगा? निश्चय ही बड़ी हिंसा की संभावनायेँ बन गयी हैं।

पहले जिला पंचायत अध्यक्ष चुनावों और अब ब्लाक प्रमुख चुनावों में जिस तरह खुली हिंसा, गोली बारी, महिला प्रतिनिधियों का चीर हरण, प्रतिनिधियों का अपहरण, हत्या, नामांकनों से रोकना और नामांकनों का जबरिया रद्दीकरण किए जा रहे थे, उससे नतीजों का आना तो औपचारिकता मात्र था। नतीजों से साबित होगया है कि ये जनता की जिला पंचायत अथवा ब्लाक कमेटियां नहीं रह गयीं अपितु विकास के धन को हड़पने और आगामी विधान सभा चुनावों में भी सत्ता हथियाने को भाजपा ने अपने शक्तिपीठ स्थापित कर दिये गए हैं।

लोकतन्त्र के इस चीर हरण के लिये निर्वाचन आयोग, प्रशासन, पुलिस और भाजपा की दंगा ब्रिगेड सभी बराबर के भागीदार हैं। चुनाव आयोग मूक दर्शक बना रहा, अफसरशाही ऊपरी आदेशों के पालन में जुटी रही और गुंडों दबंगों की फौज कानून और सामाजिक मर्यादाओं को रौंदती रही। कई जगह तो पुलिस प्रशासन के अधिकारी भगवा ब्रिगेड के सामने गिड़गिड़ाते नजर आये।

भाकपा ने कहाकि उसने पहले ही आशंका जता दी थी कि भाजपा और संघ में दिल्ली से लखनऊ तक जो भारी भरकम बैठकों का दौर चल रहा है और कोविड की आड़ में मुख्यमंत्री जी प्रदेश के दौरे कर रहे हैं वह सब इन चुनावों में सत्ताहड़प के लिये गोटें बिछाने के उद्देश्य था। दोनों  नतीजों से ये जगजाहिर होगया है।

भाकपा ने कहा कि गत सरकारों ने भी पंचायती लोकतन्त्र को कम क्षति नहीं पहुंचाई, पर भाजपा ने इसे पूरी तरह नेस्तनाबूद कर दिया है। उत्तर प्रदेश के समूचे विपक्ष को लोकतन्त्र के इस चीरहरण के खिलाफ मिल कर आवाज उठानी चाहिये। सर्वोच्च न्यायालय से स्वतः संज्ञान लेकर जांच कराने का आग्रह करना चाहिये। निर्वाचन आयोग और पुलिस प्रशासन के जिम्मेदार लोगों की ज़िम्मेदारी सुनिश्चित कर उन्हें दंडित किया जाना चाहिए।

डा॰ गिरीश, राज्य सचिव

भाकपा, उत्तर प्रदेश

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बुधवार, 7 जुलाई 2021

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के सौ साल: एक पड़ताल


 

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) ने इसी 1 जुलाई को अपनी स्थापना के सौ साल पूरे किये हैं। दुनियाँ और हमारे देश के समाचार पत्रों में इसकी व्यापक चर्चा हुयी है। परन्तु उतनी नहीं जितनी कि होनी चाहिये। कल्पना कीजिये कि अमेरिका या योरोप की किसी पार्टी ने अपने अक्षुण्ण कार्यकाल के सौ साल पूरे किये होते तो शायद विश्व मीडिया झूम उठता। पर सीपीसी के नेत्रत्व में चीन द्वारा आर्थिक, सामरिक और सामाजिक क्षेत्रों में लगायी महा  छलांग को देख अमेरिकी प्रभुत्व वाला दबंग संसार हतप्रभ है; विचलित है। अतएव उनका समर्थक विश्व मीडिया भी इस जयन्ती के प्रति उत्साहित तो नहीं ही था।

सीपीसी की स्थापना भी जुलाई 1921 में लगभग उसी समय हुयी थी जब रूस की 1917 की समाजवादी क्रान्ति के बाद पूर्वी योरोप सहित दुनियां के विभिन्न हिस्सों में कम्युनिस्ट पार्टियों की स्थापना होरही थी। बाद में उसकी स्थापना की तिथि 1 जुलाई सुनिश्चित कर दी गयी।

इस सौ साल के इतिहास में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की झोली में जितनी उपलब्धियां संकलित हैं विश्व की किसी भी दूसरी पार्टी, चाहे वह कम्युनिस्ट पार्टी हो अथवा गैर कम्युनिस्ट, के पास नहीं हैं। यदि सोवियत संघ का बिखराव न हुआ होता तो निश्चय ही यह गौरव आज तत्कालीन कम्युनिस्ट पार्टी आफ सोवियत यूनियन को हासिल होता।

यही चीन की कम्युनिस्ट पार्टी है जिसने लंबे, कुर्बानीपूर्ण सशस्त्र संघर्ष के बाद 1949 में पूर्ववर्ती शासकों से चीन को मुक्त करा कर प्यूपिल्स रिपब्लिक आफ चाइना की स्थापना की। आज चीनी राज्य और सीपीसी एक दूसरे के पर्याय बने हुये हैं। सीपीसी न केवल अपने जीवन के सौ साल पूरे कर चुकी है अपितु आज वह विश्व की सबसे संगठित और बड़ी पार्टी है। इसीके नेत्रत्व में आज चीन एक उल्लेखनीय आर्थिक शक्ति बन चुका है और आज महाशक्ति बनने की दहलीज पर खड़ा है।

माना जाता है कि सीपीसी समर्पित सदस्यों वाली जन पार्टी है, जिसकी समाज में गहरी जड़ें हैं। आज सीपीसी की सदस्यता 9 करोड़ 20 लाख बतायी जाती है। इस तरह वह भारतीय जनता पार्टी के बाद दुनियां की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है। लेकिन इसकी सांगठानिक सुद्रड़ता और चीनी नागरिकों में इसकी सदस्यता हासिल करने की ललक का अनुमान इसीसे लगाया जा सकता है कि 2014 में इसकी सदस्यता पाने के इच्छुक 2 करोड़ 20 लाख लोगों में से केवल 20 लाख को ही सदस्यता मिल सकी। समाज में सर्वाधिक गहराई से पैठ रखने वाली पार्टी है सीपीसी।

अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में चीन द्वारा लगायी छलांग के बारे में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रकोश का कथन है कि 1980 से 2020 के बीच में चीन की जीडीपी 80 गुना बड़ी है। आज अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर वह अमेरिका को पीछे छोड़ने में लगा है। सीमा पर तमाम तनावों के बावजूद वह भारत का बड़ा व्यापारिक साझेदार है। अर्थव्यवस्था के विकास को अवाम के विकास से जोड़ते हुये चीन ने 80 करोड़ लोगों को गरीबी की सीमा से उबारा है। यह संख्या मामूली नहीं है। यह कई बड़े देशों की जनसंख्या के योग के बराबर है।

सीपीसी शताब्दी समारोह में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इस उपलबद्धि को देश के लोगों द्वारा बानयी गयी नयी दुनियां बताते हुये उसकी सराहना की। “चीन के लोग न सिर्फ पुरानी दुनियां को बदलना जानते हैं बल्कि उन्होने एक नयी दुनियां बनाई है,” जिनपिंग ने कहा।

चीन और वहां की शासक पार्टी का सोच है कि आपके पास शक्ति तभी है जब आप आर्थिक रूप से सक्षम हैं। आज चीन एक बहुध्रुवीय दुनियां में विकास कर रहा है, तदनुसार वह अपनी आंतरिक और बाह्य नीतियों का निर्धारण करता रहा है। अतएव उसने सामरिक रूप से भी अपने को बेपनाह मजबूत किया है। कहने को तो आज पूरे विश्व में अमेरिका एक सुपर पावर है, लेकिन चीन ने एक हद तक इस समीकरण को बदल दिया है।

अपनी वैश्विक आर्थिक और सामरिक घेराबंदी से सशंकित चीन के राष्ट्रपति ने सीपीसी शताब्दी समारोह में कहा “हम किसी भी विदेशी ताकत को अनुमति नहीं देंगे कि वह हमें आँख दिखाये, दबाये या हमें अपने अधीन करने का प्रयास करे।“

इस अवधि में चीन के समाजवादी माडल को लेकर भी प्रश्न खड़े होते रहे हैं। पर सीपीसी शताब्दी समारोह में शी जिनपिन ने द्रड़ता से कहाकि सिर्फ समाजवाद ही देश को बचा सकता है। किसी सार्वजनिक मंच से समाजवाद के प्रति स्पाष्ट द्रड़ता किसी शीर्षस्थ चीनी नेता ने अर्से बाद दिखायी है। 1921 में मार्क्सवादी दर्शन को आदर्श मान कर गठित हुयी चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से ऐसी ही अपेक्षा की भी जाती है।  

चीन और सीपीसी की उपलब्धियों के इस विशाल भंडार के बीच उसके सिर पर अंतर्विरोधों का गट्ठर भी कम नहीं हैं। अंतर्विरोध यदि अमेरिका और उसके खीमे के देशों तक ही सीमित होते तो एक अलग बात होती। भारत जैसे पड़ोसी से सीमा विवाद और सीमा पर तनाव पूरे महाद्वीप को निरन्तर झकझोरता रहता है। समाजवादी देश वियतनाम के साथ भी कई अंतर्विरोध मुंह बायें खड़े हैं। हांगकांग में स्थापित व्यवस्था को बदलने के उस पर आरोप हैं। उसने खुद ही स्पष्ट कर दिया है कि वह ताइवान, हांगकांग और मकाऊ को वापस मिलाना चाहता है। अन्य कई छोटे और पड़ोसी देशों से उसके विश्वसनीय संबंध नहीं हैं। इस सब पर तो चीन को ही विचार करना है।

सोवियत संघ के विघटन के बाद लगा था कि चीन भी अब अपने को शायद ही बचा पाये। लेकिन चीन इस धारणा के सामने अपवाद बन कर खड़ा होगया। आज वह विश्व की एक आर्थिक और सामरिक ताकत है। किसी भी पड़ोसी से उसके अच्छे संबंध पारस्परिक लाभ के हो सकते हैं। समय के साथ रिश्ते बदलते भी रहते हैं। अभी ज्यादा दिन नहीं हुये चीन के राष्ट्रपति का हमने भव्य स्वागत किया। चीन और भारत दोनों को सीमा पर शांति के अनथक प्रयास जारी रखने चाहिये। एक शांतिपूर्ण सह अस्तित्व कायम रखने के लिये दोनों ओर से उच्च स्तरीय प्रयास किए जाने चाहिए। यही दोनों देशों और उसकी जनता के हित में है।

डा॰ गिरीश  

 

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मंगलवार, 6 जुलाई 2021

फादर स्टान स्वामी की हत्या राज्य प्रायोजित है। भाकपा ने जताया दुख और आक्रोश


लखनऊ- 6 जुलाई 2021, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मण्डल ने फादर स्टान स्वामी की मौत पर गहरा आक्रोश और दुख जताया है। भाकपा मांग करती है कि उनकी मौत के लिये जिम्मेदार सभी को गिरफ्तार किया जाये, और बुजुर्ग समाजसेवी के साथ घोर अमानवीय वरताव करने के दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दी जाये।

आदिवासियों के उत्पीड़न और उनके अधिकारों के लिये लड़ने वाले झारखंड के 84 वर्षीय संत को पिछले अक्तूबर में भीमा कोरेगांव केस में गिरफ़्तार कर जेल में डाल दिया गया था। जबकि वे भीमा कोरेगांव गए तक नहीं थे। उनके ऊपर यूआपा UAPA जैसा कठोर कानून लादा गया। यहां तक कि उनकी गंभीर बीमारियों का इलाज तक नहीं किया गया। हाल ही में बंबई हाई कोर्ट के दखल के बाद उन्हें एक निजी अस्पताल में दाखिल कराया गया, जब उनकी सेहत लगभग जबाव देगयी।

उनकी मौत संस्थागत हत्या है जिसने न्यायपालिका, हिरासत के दौरान इलाज, चिकित्सा न कराना एवं हिरासत में उत्पीड़न आदि कई मुद्दों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिये हैं। भाकपा उनके ऊपर झूठे मुकदमे लगाने वालों, उनको लगातार कैद में रखने वालों और उनको यातना देने वाले सभी की गिरफ्तारी की मांग करती है। वे सब उनकी मौत के लिये जिम्मेदार हैं और उन्हें समुचित दंड मिलना ही चाहिए।

भाकपा भीमा कोरेगांव केस में गिरफ्तार सभी की अविलंब की मांग करती है।

भाकपा सभी का आह्वान करती है कि इस लोमहर्षक यातना पर गुस्से का इजहार करने, UAPA एवं देशद्रोह कानून जैसे कठोर क़ानूनों को रद्द करने की मांग को लेकर और भारतीय संविधान में निहित मूलभूत अधिकारों के सरकारों द्वारा किए जारहे हनन के खिलाफ प्रतिरोध प्रदर्शन करें।

भाकपा राज्य सचिव मंडल ने अपनी सभी इकाइयों का आग्रह किया है कि वे गरीबों, किसानों, दलितों, युवाओं और बुद्धिजीवियों को व्यापक पैमाने पर संगठित कर 7 से 11 जुलाई के बीच फादर स्टान स्वामी की श्रद्धांजलि सभाएं आयोजित करें और 12 जुलाई को सभी वामपंथी जनवादी एवं मानवाधिकारों के लिये संघर्षरत संगठनो को लेकर तहसील अथवा जिला जहां संभव हो आक्रोश जताते हुये ज्ञापन दें।

डा॰ गिरीश, राज्य सचिव

भाकपा, उत्तर प्रदेश

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शनिवार, 3 जुलाई 2021

जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव: अध्यक्ष जीत कर भी नैतिक रूप से हारी है भाजपा : भाकपा


 

लखनऊ- 3 जुलाई 2021, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उत्तर प्रदेश राज्य सचिव मंडल ने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश के जिला पंचायत चुनाव में भाजपा ने सरकार, प्रशासन और धन के बल पर बड़ा खेला कर दिया और 67 सीटें हथिया लीं। जिला पंचायत सदस्यों के चुनाव में जिस भाजपा को जनता ने चारों खाने चित्त कर दिया था, अध्यक्ष चुनाव में नैतिकता का दंभ भरने वाली भाजपा ने तमाम अनैतिक हथकंडे अपना कर जनता के मुंह पर करारा तमाचा जड़ दिया।

नामांकन, नाम वापसी और अब निर्वाचन में भाजपा ने प्रशासन, धन और सरकारी गुंडई के बल पर ये घ्रणित खेल खेला है। तमाम जिलाधिकारी और पुलिस कप्तान अपने पद की मर्यादा भूल भाजपा के लिए खुलेआम काम कर रहे थे और विपक्ष के सदस्यों को हर तरह से प्रताड़ित कर, उनका अपहरण कर, उनको भाजपा के लिए मैनेज कर रहे थे। इससे शर्मनाक क्या होगा कि पोलिंग स्टेशन के भीतर तक सदस्यों को पाला बदलने के लिये मजबूर किया गया। भाजपा भले ही अध्यक्ष पद जीत गयी है, पर उसकी नैतिक पराजय हुयी है। ये बात अलग है कि भाजपा के भीतर नैतिकता तलाशना चील के घौंसलों में मांस खोजने जैसा है।

भाकपा ने कहाकि ऐसा नहीं है कि इससे पूर्व के चुनावों में तत्कालीन शासक दलों ने कोई धांधली नहीं की, पर उसकी तुलना में यह धांधली अत्यंत भयावह है। पहले यदि दाल में काला होता था तो अब संपूर्ण दाल ही काली है। भाकपा ने उस समय भी उन धांधलियों की कड़ी निन्दा की थी और आज भी वह इस महा धांधली की कड़ी निन्दा करती है। वह इसलिये कि यह लोकतन्त्र के लिये बेहद अशुभ है।

त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में भारी पराजय के बाद भाजपा को 2022 के विधानसभा चुनावों में पराजय का भूत सता रहा था और वह किसी भी कीमत पर जिला पंचायतों को हड़पने पर आमादा थी। इन चुनावों को जिताने के आश्वासन पर ही संभवतः मुख्यमंत्रीजी को हाई कमांड से अभयदान मिला था जिसे उन्होने बखूवी कर दिखाया है। चर्चा है कि भाजपा ने इन चुनावों पर कई सौ करोड़ रुपये खर्च किये हैं। इस सबकी उच्चस्तरीय और विश्वसनीय जांच तो होनी ही चाहिये।

भाकपा ने कहाकि आज का दिन उत्तर प्रदेश के पंचायती लोकतन्त्र के इतिहास में सबसे काला दिन है। सभी लोकतन्त्र समर्थक व्यक्तियों और शक्तियों को इसे गंभीरता से लेना होगा और पतनशील लोकतान्त्रिक संस्थाओं और लोकतन्त्र को बचाने के लिये मुखर आवाज उठानी होगी। विपक्ष को इस बात पर भी गौर करना होगा कि यदि ब्लाक प्रमुख चुनाव भी इसी धांधली के वातावरण में होते हैं तो उसका रुख क्या होगा।

भाकपा ने कहाकि अब भी समय है जब उत्तर प्रदेश के विपक्ष को तवाहहाल जनता को बदहाली से बचाने और लोकतन्त्र की रक्षा के लिये संयुक्त संघर्ष शुरू कर देना चाहिये। इस संघर्ष को चुनावी संघर्ष से भिन्न समझा जाना चाहिये।

डा॰ गिरीश, राज्य सचिव

भाकपा उत्तर प्रदेश

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