भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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Communist Party of India, U.P. State Council

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शनिवार, 29 दिसंबर 2012

गैंगरेप पीड़ित युवती के निधन पर भाकपा ने व्यक्त किया गहरा शोक

लखनऊ 29 दिसम्बर। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने दिल्ली में हुए बलात्कार से पीड़ित युवती के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। भाकपा ने युवती के परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए युवती को शोक श्रद्धांजलि अर्पित  की है।
यहां जारी एक प्रेस बयान में भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि इस दर्दनाक हादसे से सारा देश स्तब्ध है। हमें इस समस्या पर बहुत गंभीरता से काबू पाना होगा। उदारीकरण-भूमंडलीकरण के परिणामस्वरूप हमारा परम्परागत सामाजिक ताना-बाना टूट रहा है। इससे रिश्ते भी प्रभावित हो रहे हैं। पैदा हो रही नई अपसंस्कृति के परिणामस्वरूप नारी के प्रति दृष्टिकोण में भी भारी बदलाव आया है और उसे भोग की वस्तु के रूप में देखा जाने लगा है। यही वजह है कि देश भर में बलात्कार और महिलाओं के साथ अभद्रता की घटनायें थमने का नाम नहीं ले रही हैं।
भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा है कि ऐसी वारदातों को रोकने के लिये हमें त्वरित न्याय देना होगा और कानूनों में कड़ी सजा का प्राविधान करना होगा। साथ ही सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर भी हमें इस कुत्सित मानसिकता को बदलने के प्रयास करने होंगे। तभी नारी को सुरक्षा मिलेगी और समाज में स्वस्थ वातावरण निर्मित होगा।
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बुधवार, 26 दिसंबर 2012

बलात्कार और मीडिया की भूमिका

16 दिसम्बर की रात दिल्ली में चलती बस में एक 23 साल की मेडिकल छात्रा के साथ घटी घटना से सभ्य समाज का सिर शर्म से झुक गया। हर सभ्य नागरिक उस घटना की निन्दा करेगा और पीड़िता के साथ पूरी सहानुभूति रखेगी। ऐसे लोग ढूंढे नहीं मिलेंगे जिनकी चाहत यह हो कि उस घटना के आरोपियों को सख्त से सख्त सजा न दी जाये। घटना ने समाज में एक कंपन पैदा किया। संसद से लेकर सड़क तक आक्रोश दिखाई दिया। सब कुछ स्वाभाविक था परन्तु जिस तरह देखते-देखते तमाम समाचार चैनल आन्दोलनकारी हो गये, हर कोण से कमेंट्री करने की कोशिश में लग गये, उस पर चिंतन जरूर होना चाहिए।
पहली बात, लगभग सभी चैनलों के लगभग सभी एंकर बार-बार जोर दे रहे थे कि सड़कों पर विरोध करने उतरी जनता की कोई विचारधारा नहीं है। उसकी कोई राजनीति नहीं है। वह किसी राजनीतिक दल का प्रतिनिधित्व नहीं करती। उनकी यह टिप्पणी कोई नई नहीं थी। ऐसा वे इसके पहले अप्रैल 2010 में शुरू हुए अन्ना आन्दोलन के समय भी कह रहे थे। अन्ना आन्दोलन के हस्र और उसकी वर्तमान स्थिति पर कोई टिप्पणी करने की हमारी मंशा इस समय नहीं है।
यह स्पष्ट करना जरूरी है कि आन्दोलनकारियों के रूप में सड़कों पर उतरी जनता के विचारों में एक सामान्य सी साम्यता है, वे सब बलात्कार को गलत मानने वाले हैं, वे एक बालिका पर हुए बहशीपन से आक्रोशित हैं, वे अपराधियों को दण्ड दिये जाने के पक्ष में है और वे सब त्वरित कार्यवाही चाहते हैं। यह एक विचार है। इसी विचार से वे आन्दोलन में उतरे हैं और यही विचार उनके मध्य एकता स्थापित कर रहा है। वे गैर राजनीतिक नहीं हैं। उनका बड़ा तबका किसी न किसी राजनीतिक दल का समर्थक रहा है और उन्हें वोट देता रहा है। मीडिया को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इन प्रदर्शनों में तमाम प्रदर्शन महिला संगठनों के द्वारा किये गये थे और तमाम प्रदर्शनों को तमाम राजनीतिक दलों ने भी आयोजित किया था।
मूलतः पूंजीवाद अपने जन्म काल से ही विचार और विचारधाराओं को नष्ट करने का प्रयास करता रहा है। पूंजीवाद इसके लिए विभिन्न रूप रख कर सामने आता है। 1957 में मिलान में समाजवादियों के अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में ”विचारधाराविहीन मनुष्य“ का नारा भी पूंजीवाद के इसी सोच का परिणाम था, आपातकाल के अंतिम दौर में स्वयंभू युवा हृदय सम्राट संजय गांधी द्वारा विचारधाराविहीनता का दिया गया नारा भी पूंजीवाद के इसी सोच का परिणाम था, 1990 के करीब विचारधारा का अन्त का नारा भी पूंजीवाद के इसी सोच से निकला था तो 2010 में अन्ना आन्दोलन के समय में मीडिया द्वारा विचारधाराविहीन आन्दोलन का नारा भी पूंजीवाद के इसी सोच से निकला था। पूंजीवाद वर्तमान भारत में अपने विरोध को समाप्त करने के लिए राजनीतिक दलों और राजनीतिक विचारों के प्रति शहरी नव मध्यम वर्ग के मध्य एक विरोध पैदा करने की लगातार कोशिश कर रहा है। और इस बार भी मीडिया की यह टिप्पणी अपने आकाओं के इसी उद्देश्य की पूर्ति कर रही है।
मीडिया स्त्रियों की अस्मिता के प्रति कतई गम्भीर नहीं है। मीडिया ने सुषमा स्वराज के लोकसभा में दिये गये भाषण के आपत्तिजनक अंशों को बार-बार प्रसारित कर स्त्री अस्मिता को तार-तार किया। इस घटना के कवरेज के बीच-बीच ”लौंडिया पटाएंगे मिस्ड कॉल से’ के प्रसारण को अश्लील और दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जा सकता है। दबंग-2 के विज्ञापन के लिए चैनलों ने छांट-छांट कर जो संवाद और फुटेज दिखाए, वे मीडिया को कटघरे में खड़ा करते हैं। एक चैनल ने ‘रात में डराती है दिल्ली’ कार्यक्रम के बीच-बीच में स्त्री अस्मिता को तार-तार करने वाले विज्ञापन दिखाए। स्त्री अस्मिता को तार-तार करने वाले विज्ञापनों के अंतःपुर में बैठे मीडिया के लोग किस स्त्री हिंसा के खिलाफ माहौल बनाने में लगे हुए है, यह गौर करने लायक विषय है। सभ्य समाज को यह भी सोचना होगा कि वारदात, जुर्म, सनसनी और एसीपी अर्जुन जैसे कार्यक्रमों की अपनी क्या भूमिका है?
एक समाचार चैनल ने एक दिन अंग्रेजी और हिन्दी दोनों में दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के लम्बे इंटरव्यू दिखाये। इंटरव्यू की विषयवस्तु मूलतः स्पांर्स्ड प्रोग्राम या विज्ञापन की तरह थी। शीला जी बड़ी गंभीरता से दिल्ली में घटने वाली वारदातों का ठीकरा पुलिस वालों और न्यायालयों पर थोप रहीं थीं। दिल्ली में लम्बे समय से राज्य सरकार उनकी है, केन्द्र में लम्बे समय से उनकी सरकार सत्ता में है। आखिरी पुलिस सुधारों को रोक किसने रखा है? आखिर न्यायिक सुधार क्यों नहीं हो रहे हैं? आखिर लोगों को न्याय क्यों नहीं मिलता? इसकी जवाबबदेही क्या सत्ता से दूर वामपंथियों की है?
मीडिया एक बार फिर जनता के मुद्दों को पृष्ठभूमि में ढकेलता नजर आया। मीडिया के इस पूरे खेल को हमें समझना होगा और इसका पर्दाफाश करना होगा।
- प्रदीप तिवारी
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कामरेड कमला राम नौटियाल दिवंगत

लखनऊ 26 दिसम्बर। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता, प्रख्यात पर्वतारोही एवं पर्यावरणवादी कामरेड कमला राम नौटियाल का आज देहरादून में निधन हो गया। वे 80 वर्ष के थे। भाकपा की उत्तर प्रदेश राज्य कौंसिल ने कामरेड नौटियाल के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है और उनके प्रति क्रान्तिकारी श्रद्धांजलि अर्पित की है। पार्टी ने शोक संतप्त परिवार के प्रति भी अपनी हार्दिक संवेदनायें प्रेषित की हैं।
कामरेड नौटियाल इलाहाबाद में अपने विद्यार्थी जीवन के दौरान आल इंडिया स्टूडेन्ट्स फेडरेशन के साथ जुड़ गये थे और छात्र राजनीति में सक्रिय रहे। उन्होंने एक पर्वतारोही की भूमिका निभाते हुए हिमालय के तमाम ग्लेशियरों को खोजा और उनका नामकरण किया। उन्होंने एक पर्यावरणवादी की भूमिका निभाते हुए हिमालय पर पेड़ों की कटान के खिलाफ व्यापक आन्दोलन किया जो बाद में चिपको आन्दोलन के नाम से विख्यात हुआ। वे चौदह वर्षों तक उत्तरकाशी नगर पालिका के चेयरमैन चुने जाते रहे और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद के वर्षों तक सदस्य रहे। उत्तराखण्ड आन्दोलन के वे अगुवा नेताओं में से एक थे। ज्ञातव्य हो कि भाकपा ने राज्य के गठन के पूर्व ही अपनी उत्तराखण्ड कमेटी का गठन कर दिया था, जिसके वे कई सालों तक संयोजक रहे। उनकी लोकप्रियता पहाड़ों के दूरदराज गांवों तक फैली थी।
80 वर्षीय कामरेड नौटियाल कई सालों से अस्वस्थ चल रहे थे। उनके निधन से वामपंथी आन्दोलन ही नहीं उत्तराखण्ड की जनता को भी भारी क्षति पहुंची है जिसके लिए वे निरन्तर संघर्षरत रहे। भाकपा राज्य मंत्रिपरिषद अपने उत्तराखण्ड के सभी कार्यकर्ताओं  को अपनी संवेदना प्रेषित करती है।
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शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का ”केन्द्र सरकार खाद्य सुरक्षा दो - राज्य सरकारी चुनावी वायदे पूरा करो“ अभियान शुरू

लखनऊ 21 दिसम्बर। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के तत्वाधान में ”केन्द्र सरकार खाद्य सुरक्षा दो - राज्य सरकार चुनावी वायदे पूरा करो“ अभियान आज समूचे उत्तर प्रदेश में शुरू हो गया। जिलों-जिलों में भाकपा कार्यकर्ताओं ने शिविर लगाकर प्रधानमंत्री को सम्बोधित ज्ञापन पर बड़े पैमाने पर हस्ताक्षर करवाये। हाथरस में राज्य सचिव डा. गिरीश ने प्रातः 9 बजे ही प्रथम हस्ताक्षर कर अभियान का शुभारम्भ किया। लखनऊ में भाकपा के जिला सह सचिवद्वय ओ. पी. अवस्थी एवं परमानन्द द्विवेदी के नेतृत्व में भाकपा कार्यकर्ताओं ने विधानसभा के सामने धरनास्थल से हस्ताक्षर अभियान शुरू किया। प्रदेश के अन्य जिलों में भी शिविर लगाकर हस्ताक्षर कराये गये।
इस सम्बंध में भाकपा राज्य सचिव की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि भाकपा पिछले कई माहों से हर परिवार को हर महीने 35 किलो अनाज 2 रूपये प्रति किलो की दर मुहैया कराने की कानूनी गारंटी, राशन प्रणाली को व्यापक एवं भ्रष्टाचार से मुक्त बनाने, एपीएल-बीपीएल का भेदभाव मिटा कर सभी को खाद्य सुरक्षा दिये जाने सम्बंधी कानूनी शीघ्र बनाये जाने, हर परिवार को साल में कम से कम 12 गैस सिलेण्डर दिये जाने, खुदरा कारोबार में एफडीआई को दी गयी अनुमति को रद्द करने आदि मांगों पर अभियान चला रही है। इसी अभियान की कड़ी में यह हस्ताक्षर अभियान शुरू किया गया है। पूरे देश में 5 करोड़ हस्ताक्षर जुटाने का लक्ष्य रखा गया है।
इसके अलावा भाकपा का आरोप है कि आठ माह के शासन काल में राज्य सरकार पूरी तरह विफल साबित हुई है। उसने हर तबके के साथ वायदा खिलाफी की है। पहले बेरोजगार नौजवानों को धोखा दिया गया तो अब गन्ना मूल्य और कर्जा माफी के सवाल पर किसानों को छला गया है। भाकपा का यह अभियान राज्य सरकार से चुनावी वायदे पूरा कराने को भी लक्षित है। इसके अंतर्गत सभी जिला केन्द्रों पर सात जनवरी को धरने प्रदर्शन आयोजित किये जायेंगे। भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने बताया कि जिन जिलों में यह अभियान आज शुरू नहीं हो सका है, उनमें 23 दिसम्बर को शुरू हो जायेगा।



कार्यालय सचिव
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सोमवार, 10 दिसंबर 2012

खाद्य सुरक्षा पर भाकपा द्वारा हस्ताक्षर अभियान


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शनिवार, 8 दिसंबर 2012

दो मौतों पर कतारबद्ध पूंजीवादी राजनीतिज्ञ और मीडिया

कुछ ही दिनों पहले की बात है। दो व्यक्तियों की मौत होती है। एक व्यक्ति था - मुम्बई का बाल ठाकरे तो दूसरा था दो दशकों में खाकपति से अरबपति बनने वाला पोंटी चढ्ढा। एक मरा था अपनी उम्र के कारण स्वाभाविक मौत से तो दूसरे की हत्या हुई थी। दोनों ऐसे व्यक्तित्व नहीं थे जिनसे देश के जनमानस का कोई जुड़ाव रहा हो लेकिन उस दिन इलेक्ट्रानिक चैनलों के पास अन्य कोई खबर नहीं थी जो दोनों के ऊंचे कद के बारे में धारा प्रवाह प्रवचन दे रहे थे तो दूसरे दिन के अखबारों के पन्ने उनसे भरे हुए थे। यह तो था मीडिया का चरित्र तो दूसरी ओर देश के तमाम बड़े राजनीतिज्ञ इन दोनों को भरे गले से श्रद्धांजलि दे रहे थे। आश्चर्य हो रहा था इस गिरावट पर, हम कहां से कहां पहुंच गये हैं।
दहशत में मुम्बई बन्द रही क्योंकि वहां बाल ठाकरे के समर्थक कम उनसे आतंकित लोगों की संख्या ज्यादा है। कुछ लोग उन्हें बिहारी मानते हैं जो अन्य सामान्य भारतीयों की तरह बिहार से आकर रोजी-रोटी के लिए मुम्बई में बस गया था। शुरूआती दौर में वह एक स्ट्रग्लिंग कार्टूनिस्ट था। फिर वह बतौर कांग्रेसियों एवं पूंजीपतियों के एजेंट, वामपंथी ट्रेड यूनियनों को तोड़ने के लिए हिंसा के कारण चर्चा में आया था। इस दौर में वामपंथी ट्रेड यूनियनों पर ठाकरे और उसके समर्थकों ने हिंसक हमले किये थे। कामरेड कृष्णा देसाई की हत्या इन्हीं हिंसक घटनाओं के बीच में हुई थी। इसी दौर में मराठियों के रोजगार का प्रश्न उठाकर दक्षिण भारतीयों का विरोध शुरू किया, फिर मुम्बई में गुजरातियों का और अंत में उसने सभी गैर मराठियों पर हमले शुरू कर दिये। अंततः वह हिन्दुत्व के रथ पर सवार हो गया, अयोध्या के विवादित ढांचे को शिव सैनिकों द्वारा गिराये जाने का दावा करते हुए उसने कहा था कि उसे उन पर गर्व है। 1992-93 में मुम्बई में हुये दंगों में उसने जम कर हिस्सेदारी की। उसके भाषण और उसका लेखन हमेशा नागरिकों के मध्य घृणा फैलाता रहा परन्तु कभी भी कांग्रेसी और एनसीपी की सरकारों ने उसके खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया। एक बार चुनाव आयोग ने जरूर उसे 6 सालों के लिए मताधिकार से वंचित कर दिया था। वह मराठी दलितों के खिलाफ भी काम करता रहा और उसे मंडल आयोग तथा दलित महत्वाकांक्षाओं का प्रखर विरोधी माना जाता रहा। अम्बेडकर की एक पुस्तक का महाराष्ट्र सरकार द्वारा प्रकाशन करने का उसने विरोध किया और शिव सैनिकों ने दलितों पर जम कर हमले किये थे।
उसके बाद एक और घटना घटी। मुम्बई की बंदी पर एक बालिका ने किसी सोशल नेटवर्किंग साईट पर अपने विचार लिख दिये और एक दूसरी बालिका ने उस विचार का समर्थन कर दिया। दोनों को पुलिस पकड़ कर थाने ले गयी और शिव सैनिकों ने एक के चाचा के अस्पताल को तहस-नहस कर दिया। देशव्यापी प्रक्रिया होने पर दोनों बालिकाओं को छोड़ दिया गया परन्तु उनके गिरफ्तार किये जाने के तथ्य ने एक बार फिर बाल ठाकरे और कांग्रेस के मध्य दुरभिसंधि की याद जरूर दिला दी।
 जहां तक पोंटी चढ्ढा का सवाल है, कहा जाता है कि दो दशक पहले वह एक देशी शराब के ठेके के सामने मछलियां तल कर बेचता था परन्तु दो दशकों में वह अथाह सम्पत्ति का मालिक बन गया। कैसे का जवाब तो नहीं दिया जा सकता परन्तु कहा जाता है कि उसके कारोबार में तमाम राजनीतिज्ञों की गलत कमाई का पैसा लगा हुआ था। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में शराब की आपूर्ति पर उसका एकाधिकार कायम हो गया था। वह कई मल्टीप्लेक्स एवं मॉल्स का मालिका हो गया था। वह मुलायम सिंह और मायावती का चहेता माना जाता था। मायावती ने उसे चीनी निगम की कई मिलों की बेशकीमती सम्पत्तियों को कौड़ियों के भाव दे दिया था। उसकी मौत पर शोक संतप्त होने वालों में मुलायम सिंह और मायावती के अलावा उत्तराखंड के कांग्रेसी एवं भाजपाई मुख्यमंत्रियों के साथ-साथ पंजाब, हरियाणा, राजस्थान एवं दिल्ली के बड़े-बड़े राजनेता शामिल थे। इनमें से तमाम ने उसके अंतिम संस्कार में तो कईयों ने उसके घर पर बाद में होने वाले कर्मकांडों में शिरकत भी की।
यह दोनों मौतें ऐसी नहीं थीं कि उन पर कुछ लिखा जाये परन्तु उनकी मौतों पर कतारबद्ध हुये मीडिया और राजनीतिज्ञों ने एक बार फिर भारतीय राजनीति की उस गिरावट की ओर संकेत कर दिया है, जिस पर देश के हर नागरिक को चिन्तित होना चाहिए। इस गिरावट को रोकने का काम केवल जनता कर सकती है। कम से कम राजनीतिज्ञों पर नकेल कसने का काम उसका है।
- प्रदीप तिवारी 22.11.2012
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भाकपा चलायेगी - ”प्रदेश सरकार वायदा निभाओ“ अभियान

लखनऊ 8 दिसम्बर। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी गन्ना मूल्य निर्धारण तथा किसानों के कर्जे माफ करने के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा किसानों के साथ की गयी धोखाधड़ी के खिलाफ आन्दोलन छेड़ेगी। उक्त आशय का निर्णय आज यहां सम्पन्न भाकपा की राज्य कार्यकारिणी बैठक में लिया गया।
निर्णयों के सम्बंध में जानकारी देते हुए भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि उत्तर प्रदेश की सपा सरकार ने गन्ने के जो मूल्य निर्धारित किये हैं, वे बेहद कम हैं। आज जबकि खाद, डीजल, कीटनाशक, बीज आदि सभी के दाम काफी बढ़ गये हैं और चीनी भी 40 रूपये किलो की दर से बिक रही है, ऐसे में गन्ने की कीमत कम से कम रू. 350.00 प्रति क्विंटल होनी चाहिए। भाकपा राज्य कार्यकारिणी ने इस बात पर भी गहरा रोष व्यक्त किया कि अपने सम्पूर्ण चुनावी अभियान में सपा ने किसानों के पचास हजार रूपये के कर्जों की माफी की घोषणा की थी लेकिन केवल एक वित्तीय संस्थान का कर्ज भी काफी बंदिशों के साथ माफ करना घोषित किया गया है जबकि अधिकतर किसान ‘किसान क्रेडिट कार्ड’ के जरिये राष्ट्रीयकृत बैंकों, सहकारी बैंकों एवं ग्रामीण बैंकों से कर्ज लेते हैं। प्रदेश के लगभग आठ करोड़ किसानों ने यही कर्जा ले रखा है जिसकी कोई माफी नहीं की गयी है। धान के खरीद केन्द्रों पर भी बेहद धांधलेबाजी है। नहरों में पानी आ नहीं रहा और बिजली की सप्लाई गांवों को जा नहीं रही। इन सबके चलते किसान बेहद परेशान है।
भाकपा राज्य कार्यकारिणी ने उपर्युक्त सभी सवालों को केन्द्रीय मुद्दा बनाते हुए 21 दिसम्बर से समूचे उत्तर प्रदेश में ”उत्तर प्रदेश सरकार वायदा निभाओ“ अभियान चलाने तथा 3 जनवरी 2013 को इन्हीं सवालों पर जिला केन्द्रों पर जुझारू धरने-प्रदर्शन करने का निर्णय लिया है।
इसके साथ ही खाद्य सुरक्षा के सवाल पर - हर परिवार को हर महीने 35 किलो अनाज 2 रूपये प्रति किलो की दर पर उपलब्ध कराने की कानूनी गारंटी तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली को वृहत्तर और भ्रष्टाचारमुक्त बनाने के सवाल पर 21 दिसम्बर से ही हस्ताक्षर अभियान प्रारम्भ करने का निर्णय भी लिया है। केन्द्रीय आह्वान पर होने वाले इस कार्यक्रम में भाकपा उत्तर प्रदेश में 10 लाख हस्ताक्षर जुटायेगी। इसके लिए भाकपा के कार्यकर्ता गांव-गांव और घर-चौपाल जायेंगे तथा स्टेशनों, बाजारों, हाटों, चट्टियों, सरकारी दफ्तरों, बैंकों और बस अड्डों के सामने शिविर लगा करके हस्ताक्षर करायेंगे। इसके अलावा एफडीआई के सवाल पर सपा, बसपा और कांग्रेस के रवैये को जनता के बीच उजागर किया जायेगा। भाकपा इस बात को भी जनता के बीच रखेगी कि भाजपा की साम्प्रदायिक एवं संकीर्ण नीतियां और विपक्षी दलों की इन नीतियों पर भाजपा से दूरी बनाने के लिए बहानेबाजी आर्थिक सवालों पर विपक्ष की एकता में बाधक बन रही हैं। इसके लिए विचार गोष्ठियां, सभायें एवं नुक्कड़ सभायें आयोजित की जायेंगी।
भाकपा की जिला इकाईयों द्वारा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिये सरकारी योजनाओं को लागू करने में बरती जा रही उदासीनता के खिलाफ 10 दिसम्बर को जिला केन्द्रों पर प्रदर्शन किया जायेगा।
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शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

आगे साम्प्रदायिकता है

उत्तर प्रदेश में लगातार घट रही साम्प्रदायिक दंगों की वारदातें साम्प्रदायिक और कट्टरपंथी ताकतों के तात्कालिक और दीर्घकालिक राजनैतिक उद्देष्यों की पूर्ति के लिए चलाई जा रही उनकी लगातार मुहिम का परिणाम हैं। अपने राजनैतिक उद्देष्यों की पूर्ति के लिए ये ताकतें आगामी लोकसभा चुनाव में वोटों का साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करना चाहती हैं।
प्रदेष में सत्तारूढ़ दल की दोगली कार्यनीति बार-बार दंगों और दंगाईयों से निपटने में सरकार और प्रषासन की भारी ढिलाई के रूप में हमारे सामने है। बाबरी विध्वंस के बाद अपनी प्रासंगिकता गंवा बैठा संघ परिवार अपनी खोई हुई ताकत और जमीन को फिर से हासिल करने के काम में जुटा है। गोरखपुर, फैजाबाद, वाराणसी, मुरादाबाद, बरेली, मेरठ, सहारनपुर, आगरा, अलीगढ़, कानपुर, इलाहाबाद, लखनऊ, झांसी आदि संवेदनषील मंडल इसके निषाने पर हैं। इस बार ग्रामीण क्षेत्रों पर भी फोकस है। अंतर्राष्ट्रीय हालातों और प्रदेष में सत्ता परिवर्तन से उत्साहित अन्य कट्टरपंथी ताकतें भी उकसावे और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का प्रयास कर रही हैं। हाल ही में जन्मी कुछ मुस्लिम राजनीतिक पार्टियां भी साम्प्रदायिक विभाजन के काम में लगी हैं ताकि धर्मनिरपेक्ष ताकतों से अल्पसंख्यक समुदाय को अलग किया जा सके।
इन परिस्थितियों में धर्मनिरपेक्ष ताकतों की जिम्मेदारी बहुत गंभीर है। प्रस्तुत रिपोर्ट से सबक लिया जाना चाहिए। साम्प्रदायिक सौहार्द को कायम रखना और जन-धन की हानि न होने देना हमारा महत्वपूर्ण कार्यभार है।
- कार्यकारी सम्पादक
 
प्रो. रघुवंशमणि की तथ्यपरक रिपोर्ट
विगत कुछ वर्षों से हमारे तमाम बुद्धिजीवियों ने यह मान लिया है कि साम्प्रदायिकता अब कोई महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं रह गया है। इसके चलते लोगों की राजनीतिक अभिवृत्तियॉं भी बदलीं हैं। जो लोग भारतीय जनता पार्टी और संघ को 2002 के दंगों के बाद एक कट्टरतावादी हिदुत्ववादी पार्टी के रूप में देखते थे, उन्होंने इस पक्ष को उदारवादी दृष्टि की पार्टी के रूप में देखना शुरू कर दिया था। यहॉं तक कि गुजरात दंगों के खलनायक नरेन्द्र मोदी के भी गुणों की चर्चा होने लगी कि आखिर उनके नेतृत्व में कुछ ऐसी बात तो होगी जो गुजरात में विकास ही विकास दिखायी पड़ता है। दूर से गुजरात की असलियत तो किसी को मालूम नहीं। कांग्रेस के नेताओं के तमाम भ्रष्टाचार सम्बन्धी कारनामों के बाद बहुत से मित्र-परिचित भाजपा को भ्रष्टाचार के विकल्प के रूप में देखने लगे थे। अब गडकरी के भ्रष्टाचरण के सामने आने के बाद जरूर उनका भ्रम टूटा होगा। फैज़ाबाद में हाल में हुए साम्प्रदायिक दंगों और आगजनी की घटनाओं ने यह सिद्ध कर दिया है कि साम्प्रदायिकता वैसी की वैसी है और उसकी राजनीति भी ज्यों की त्यों।
उत्तर प्रदेश में इधर कुछ दिनों में आये साम्प्रदायिक उभार ने यह सिद्ध किया है कि न तो भाजपा कि दुम सीधी होने वाली है और न ही उसकी साम्प्रदायिक राजनीति बदलने वाली है। संघ और संघनीति में भी कोई परिवर्तन होता नहीं दिखायी देता। दंगों के नाम पर राजनीति करने वाले और भी हैं और उनका उत्तर प्रदेश की सत्ता में भागीदारी भी बरकरार है। सब कुछ यथावत् है और अगर सचेत न हुआ गया तो आगे साम्प्रदायिकता की आग धधकाने वाले तैयार बैठे हैं, प्रयासरत हैं।
उत्तर प्रदेश में इधर कुछ दिनों में साम्प्रदायिकता बढ़ी है। मथुरा जिले में कोसीकलां नामक जगह पर हिंसा हुई जिसमें तीन लोगों के मारे जाने की खबर है। प्रतापगढ़ के नवाबगंज थाना क्षेत्र के अस्थाना गॉंव में हिंसा हुई है। बरेली में कांवर यात्रा के दौरान हिंसा हुई है जिसमें दो लोेग मरे हैं। फिर जन्माष्टमी के दिन भी वहॉं हिंसा हुई।  इसी प्रकार गाजियाबाद के मसूरी थाने पर हमला हुआ और छः लोग हिंसा के शिकार हुए। इस सिलसिले को आगे बढ़ाया जाय तो लखनऊ, इलाहाबाद, और कानपुर में भी साम्प्रदायिक हिंसा हुई। बदायूॅं के सहसवा के हिस्से में भी साम्प्रदायिक तनाव हुआ। और अब फैजाबाद तथा बाराबंकी में हिंसा भड़की। ये हिंसा किन कारणों से हुई और किनके द्वारा हुई इसके उत्तर अलग-अलग हैं। इस प्रश्न का कोई खास महत्व इसलिए नहीं क्योंकि साम्प्रदायिकता के झगड़ों में मरने वाला हर व्यक्ति अंततः मनुष्य ही होता है और इसमें होने वाली हर क्षति राष्ट्रीय होती है। मगर इनसे लाभ उन्ही दलों को मिलना है जो साम्प्रदायिकता की राजनीति करते हैं। अतः मनुष्यता के पक्ष में खड़े होने वाले धर्मनिरपेक्ष ताकतों - धर्मनिरपेक्ष राजनीतिज्ञों, बुद्धिजीवियों, कलाकारों, लेखकों और संस्कृतिकर्मियों द्वारा इनका न केवल विरोध आवश्यक है बल्कि प्रदेश के आम जनगण को साम्प्रदायिकता के खिलाफ खड़ा करना भी और उसे सचेत करना भी इन्हीं ताकतों का काम है।
भारतीय जनता पार्टी ने अपने मिशन 2014 के सिलसिले में कई बार यह कहा है कि अयोध्या में राम मन्दिर उसके राजनीतिक एजेण्डे पर बना हुआ है। पार्टी में कल्याण सिंह और उमा भारती जैसे चेहरों के पुनः दिखायी देने से यह तथ्य पुष्ट होता है। अब यह एक अलग बात है कि भारतीय जनता पार्टी के नेता अपने शासनकाल के दौरान इस मुद्दे पर लगातार हकलाते रहे थे और इस एजेण्डे से किनारा कसते रहे थे क्योंकि भाजपा के सभी नेताओं को यह पता है कि अदालत में विचाराधीन इस मुद्दे पर वक्तव्य चाहे जो दे लिया जाय, कुछ किया नहीं जा सकता। मगर यदि झूठ बोलने और धर्म के नाम पर जनभावनाएॅं उभारने और दंगा कराने से कुछ राजनीतिक लाभ होता हो तो ऐसा करने में नुकसान क्या है? फिर हिंसा और दंगा होने पर तो वोट का बटवारा सीधा हो जाता है। कम से कम यह तो होता ही है कि हिन्दू लोग हिन्दुत्व की ओर आकर्षित होते हैं। आखिर रामजन्मभूमि आन्दोलन से चली हवा पर ही तो सवार होकर भाजपा शासन में आयी थी। उन्हें यह विश्वास है कि धर्म और राम के नाम पर उन्हें धर्मभीरु हिन्दू अपना ही लेगें। यह विश्वास है या भ्रम - इसका फैसला तो भारत की जनता को ही करना है।
मगर राजनीति किस सीमा तक अधोगामी हो सकती है, उसका एक बड़ा उदाहरण फैजाबाद में भड़के दंगे रहे जिसमें सारा प्रकरण निहायत ही एकपक्षीय दिखाई देता है। यह विचित्र सी बात है कि इस अतिस्पष्ट तथ्य को लोग अनदेखा कर रहे हैं या देखना नहीं चाहते। फैज़ाबाद शहर में जिस प्रकार मुस्लिम व्यापारियों की दुकाने जलायी गयीं, वह इस तथ्य को बिलकुल स्पष्ट करता है। शहर में सिर्फ मुस्लिमों की दुकाने जली हैं और अभी तक जितना नुकसान हुआ है उसका सिर्फ अनुमान भर लगाया जा सकता है। जिन व्यापारियों की दुकानें जलायी गयी हैं उनमें से अधिकांश बड़े व्यापारी थे और इस कारण नुकसान करोड़ों में गया है, संभवतः साढ़े सात करोड़। प्रदेश की समाजवादी सरकार इस हानि की भरपायी करने की बात कर रही है और मुआवजे की एक किस्त दे भी चुकी है। वह इस क्षति की कितनी भरपायी करेगी यह देखने की बात है। अगर वह आर्थिक भरपायी कर भी दे तो उस मनोविज्ञान का वह क्या करेगी जो विषाद में डूबा हुआ है और अपने को बेहद अकेला महसूस कर रहा है। क्या इस घटना से अल्पसंख्यकों का असुरक्षाबोध और नहीं बढ़ जायेगा? क्या ऐसे में इस धर्म में उपस्थित प्रगतिशील वर्ग पुनः अपनी परम्परागत खोल में नहीं चला जाएगा? क्या इससे इस वर्ग की साम्प्रदायिक शक्तियों को अपना खेल खेलने में मदद नहीं मिलेगी? क्या उस संस्कृति को हुई क्षति की भरपायी हो सकेगी जिस पर शहर के सभी सभ्य नागरिकों को गर्व था? क्या हम यह फिर कह पायेंगे कि यह उस आदर्श गंगा-जमुनी संस्कृति का शहर है जिसके जाग्रत विवेक ने शान्ति और सहिष्णुता को संकटों के दौर में भी बचाये रखा है?
दुर्गापूजा के पहले फैज़ाबाद में एक घटना घटित हुई। वह थी देवकाली मंदिर से मूर्तियों की चोरी। इन मूर्तियों की बरामदी के लिए एक आन्दोलन चलाया गया जिसका उद्देश्य मूर्तियों के लिए आन्दोलन के अलावा अपने को एक बार फिर प्रकाश में लाना था। इस आन्दोलन में सारे हिन्दुत्ववादी लोग ही अगुवाई कर रहे थे। यह एक प्रकार का राजनीतिक कार्यक्रम था जिसके माध्यम से राजनीतिक फुटेज हासिल करने का प्रयास किया जा रहा था। इसे गंभीरतापूर्वक नहीं लिया गया क्योंकि प्रथमदृष्टया इसके उद्देश्य तात्कालिक थे। लेकिन इस आन्दोलन के दौरान यह प्रचार किया गया कि ये मूर्तियॉं मुस्लिमों द्वारा चुराई गई हैं। बाद में मूर्तियॉं प्राप्त भी हुई। सौभाग्य से मूर्तियों का चोर एक हिन्दू ही निकला अन्यथा उसी समय कुछ गड़बड़ हो सकती थी। इससे पहले जुलाई माह में मिरजापुर मोहल्ले में एक मस्जिद के परिसर में दीवार उठाने के मामले को लेकर विवाद हुआ था।
दुर्गापूजा के दौरान साम्प्रदायिकता की एक पृष्ठभूमि लगातार बनायी गयी। ध्वनिविस्तारकों पर बजने वाले गीत अक्सर मुस्लिम समुदाय को चिढ़ाने वाले होते थे। उनकी मंशा मुस्लिमों को उत्तेजित करना था। ये गीत उच्च स्वरों में बजाए जाते थे। उदाहरण के लिए ‘‘बनायेगे मंदिर’’, ‘‘राम राम बोल सब अयोध्या में जायेंगे’’ जैसे गीत जिनका दुर्गा या दुर्गा पूजा से कोई मतलब नहीं था। ये गीत साम्प्रदायिक राजनीति के गीत हैं जिनका भक्ति और खासकर दुर्गाभक्ति से कुछ लेना-देना नहीं है। दुर्गापूजा के अवसर पर इस प्रकार के गीतों का कोई मतलब नहीं। इसका बस एक मतलब मुस्लिम समाज को ठेस पहुॅंचाना या उन्हें उत्तेजित करना था। यह एक बहाने की तलाश भर थी कि कहीं कोई कुछ करे तो देख लिया जाय। अक्टूबर 2012 की बाइस तारीख को यानि कि फैज़ाबाद के सारे घटनाक्रम के दो दिन पहले मैंने अपने फेसबुक के पन्ने पर यह संकेत किया था कि इस प्रकार के गीत धार्मिक परपीड़न के उदाहरण हैं। इस प्रकार की गतिविधियों को किस तरह धर्म का नाम दिया जा सकता है, मुझे पता नहीं। इसे तो अधर्म ही कहना उचित है। बताया जाता है कि ये गीत दुर्गापूजा समिति द्वारा वितरित किये गये थे।
इस सब के बाद भी फैज़ाबाद शहर शान्त ही रहा। मगर 24 अक्टूबर को दुर्गापूजा विसर्जन के दौरान कुछ घटित हुआ जिससे फैजाबाद में आगजनी की घटना प्रारम्भ हुई। कथित तौर पर इसे किसी लड़की के साथ छेड़खानी की घटना बताया जाता है जिसका बहाना लेकर सारी कार्यवाही हुई। स्थानीय पुलिस के पास इस घटना की कोई प्राथमिकी नहीं है। वास्तव में यह सब एक सोची-समझी साजिश के तहत हुआ क्योंकि शहर के बीचोबीच स्थित चौक में मिट्टी का तेल, पेट्रोल या पत्थर के ढेर सारे टुकड़े बिना योजनाबद्ध हुए नहीं आ सकते थे। विसर्जन के दौरान चौक और रिकाबगंज के बीच स्थिति रॉयल प्लाजा के पास से ये घटनाएॅं प्रारम्भ हुईं। रायल प्लाजा के निचले भाग में स्थित दुकानों को आग लगाने से शुरुआत हुई। वहीं करीब स्थित कनक टाकिज के आगे वाले हिस्से में कपड़े की दुकानों में आग लगायी गयी। ये दुकाने अस्थायी थीं। फिर उसी पटरी पर स्थित कई स्थायी दुकानों को जलाया गया जो मुस्लिमों से सम्बन्धित थीं। चौक में स्थित जूतों की मशहूर दूकान शहाब बूट हाउस को लूटा गया और फिर उसमें आग लगायी गयी जो जलकर खाक हो गयी। चौक के दक्षिण में स्थित कुछ दुकानों में आग लगायी गयी। फिर दंगायी चौक की मस्जिद में घुस गये और तोड़फोड़ की। वहॉं मस्जिद की सम्पत्ति को नुकसान पहुॅंचाया गया और वहॉं स्थित दुकानों को जलाया गया। मस्जिद के ऊपर स्थित उर्दू अखबार के एक दफ्तर को क्षति पहुॅंचायी गयी। यह दफ्तर सम्पादक/पत्रकार मंज़र मेहदी का है जो ”आपकी ताकत“ नामक एक द्विभाषीय हिन्दी-उर्दू अखबार निकालते हैं। यह अखबार हिन्दू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा देता है। बगल स्थित सब्जीमंडी की भी कुछ दुकानों को जलाया गया। मस्जिद के बगल में स्थित स्टार बेकरी को भी पत्थरों से क्षतिग्रस्त किया गया। चौक के पश्चिम में स्थित एक दरे के नीचे की दूकानों को भी जलाया गया।
यह उपद्रव शाम से देर रात तक चलता रहा। इस बात पर विश्वास करना कठिन है कि छेड़छाड़ की घटना को लेकर इस प्रकार का लम्बा और व्यवस्थित उपद्रव संभव है। यह कोई स्वतः स्फूर्त घटना नहीं है। यह एक घृणित और सुनियोजित साजिश थी। समय रहते कार्यवाही न कर जिला प्रशासन ने इस पूरे घटनाचक्र को साजिशकर्ताओं के अनुसार होने दिया। दूसरे दिन सुबह प्रशासन की ही लापरवाही के चलते फिर पत्थरबाजी हुई। प्रशासन को रात में ही चौक की परिस्थितियों को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था रखनी चाहिए थी। मगर कर्फ्यू तब लगाया गया जब उत्तेजित भीड़ ने समाजवादी पार्टी के स्थानीय विधायक पवन पाण्डेय पर हमला करने की कोशिश की। बाद में प्रशासन सख्त हुआ लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी।
25 और 26 की रात को अफवाहों का बाजार गर्म रहा। तब हरकत में आया। जगह-जगह पुलिस, पीएसी, अर्धसैनिक कमांडो, एटीएस और एसटीएफ के जवान तैनात किये गये थे। प्रशासन ने मुस्लिमों से बस स्टेशन के पास स्थित ईदगाह पर सामूहिक नमाज पढ़ने के बजाय अपने-अपने इलाकों में नमाज अदा करने का अनुरोध किया जिसे मुस्लिम नागरिकों ने मान लिया। इसी प्रकार प्रशासन ने संक्षिप्त रामलीला करायी और रावण के पुतलों को अपनी उपस्थिति में जलवाया। पूरे समय में एकमात्र आगजनी की घटना साकेत स्टेशनरी की दुकान पर हुई जिसे दुकान के पीछे लगी खिड़की को तोड़कर किया गया। इस घटना से काफी आर्थिक क्षति हुई। मगर इसके अलावा और कोई घटना नहीं घटित हुई। 6 नवम्बर को कुछ युवकों की गिरफ्तारी को लेकर पुलिस द्वारा एक मस्जिद में प्रवेश को लेकर शहर में फिर तनाव का माहौल बना मगर प्रशासन ने तेजी से चौक में चौकसी कायम की और किसी अप्रिय घटना को नहींे होने दिया। मस्जिद से जुड़े लोगों का यह कहना था कि पुलिस ने मस्जिद के अंदर कुछ सामानों को क्षति पहुॅंचायी है।
चौक फैज़ाबाद शहर का हृदय है। शहर के बीचोबीच स्थित यह हिस्सा दुकानों से भरा हुआ है और बेहद सघन है। सामान्य स्थितियों में यहॉं सुबह से लेकर देर रात तक लोग टहलते-घूमते और चाय पीते रहते हैं। रात देर तक मिठाइयों और चाय के ठेले खड़े रहते हैं। राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद आन्दोलन के दौर से ही चौक में हर समय पुलिस की उपस्थिति रहती है। ऐसे स्थान पर आगजनी की घटनाएॅं खुले आम अंजाम दी गयीं और पुलिस चुपचाप देखती रही। इसके भी निहितार्थ स्थानीय धर्मनिरपेक्ष नागरिकों को निकालने चाहिये। वैसे तर्क यह दिया गया कि इतनी भारी भीड़ पर पुलिस के कुछ लोग कैसे नियंत्रण कर सकते थे? मगर आज के सूचना विस्फोट के दौर में क्या पुलिस अपने वायरलेस या फोन से सूचना देकर और पुलिस बल नहीं बुला सकती थी। चौक में जहॉं ये घटनाएॅं घट रही थीं वहॉं से दो-तीन सौ मीटर की दूरी पर कोतवाली है और दो किलोमीटर से भी कम की दूरी पर शहर का पुलिस लाइन स्थित है। आम नागरिकों का यह शक सही भी हो सकता है कि घटनास्थल पर उपस्थित पुलिस ने दंगाइयों का साथ दिया। आखिर पुलिस की निरपेक्षता का यही तो मतलब निकलेगा। बाद में एडीजी कानून व्यवस्था जगमोहन यादव ने यह स्वीकार किया कि सारा कुछ प्रशासन के निकम्मेपन के कारण हुआ। कुछ लोग इस बात को मुद्दा बनाते हैं कि दुर्गाभक्त नशे में धुत्त थे और प्रशासन इसलिए भी दोषी है कि उस दिन शहर में शराब की दुकानें खुली थीं। वास्तव में उन्हें बंद होना चाहिए था। उसी बीच एडीएम सिटी श्रीकांत मिश्र, एसपी सिटी रामजी यादव, तिलकधारी यादव और भुल्लन यादव को राज्य सरकार ने लापरवाही बरतने के कारण निलम्बित कर दिया।
मगर ये बातें इस तथ्य से हमारा ध्यान नहीं हटा सकतीं कि यह सारा घटनाक्रम योजनाबद्ध साजिश था। इसमें मुस्लिम दुकानों को ही निशाना बनाया गया। पड़ोसी होने का खामियाजा कुछ हिन्दू दुकानदारों को भी भुगतना पड़ा। एक-दो हिन्दूओं की दुकानें भी लपटों से क्षतिग्रस्त हुईं जो मुस्लिम दुकानों के अगल-बगल थीं। आग तो हिन्दू और मुस्लिम में भेद तो नहीं करती और न ही उसे साजिश के क्रम में ही हरकत करने के लिए नियंत्रित किया जा सकता है। इस समूचे घटनाक्रम को कुछ सतर्क नागरिकों ने विडियोक्लिपों में कैद भी किया है जिसमें जलती दुकानों के सामने कुछ दंगाई जयश्रीराम बोलते नजर आते हैं। मस्जिद के अंदर लगे क्लोज सर्किट कैमरे में भी बहुत उपद्रवियों की तस्वीरें कैद हैं। इनमें वे काफी निश्चिंत दिखायी देते हैं और उन्हें किसी भी प्रकार से प्रशासन का कोई भय नहीं है। लेकिन ये वीडियो क्लिप्स उन्हें जेल तक ले जा सकती हैं। अद्यतन सूचना यह है कि पुलिस ने पूरे फैज़ाबाद जिले में 85 लोगों को गिरफ्तार भी किया है। बाद में प्रकाश में आये वीडियो क्लिप्स के नकली और फर्जी होने की बात कही जा रही है। फोरेंसिक जॉंच में ये बातें स्पष्ट हो सकती हैं।
फैज़ाबाद के साम्प्रदायिक उपद्रवों से कुछ रेखांकित करने योग्य तथ्य सामने आये हैं।
साम्प्रदायिकता को फैलाने के लिए जिस युक्ति का इस्तेमाल लगभग हर जगह देखने को मिला वह था मुस्लिम धर्मानुयायियों को किसी तरह से उत्तेजित करना। इस कार्य के लिए अबीर का प्रयोग किया गया। मुस्लिम लोगों और मुस्लिम धर्मस्थलों पर अबीर फेककर यह कार्य किया गया। उदाहरण के लिए चौक में स्थित मस्जिद पर अबीर दिखायी दी। भदरसा, रुदौली जैसी जगहों पर भी यह प्रयोग किया गया। फैज़ाबाद में पूरा उपद्रव एकतरफा रहा क्योंकि यहॉं लोग या तो उत्तेजित ही नहीं हुए या फिर वे उपद्रव के स्थानों पर थे ही नहीं। मगर अन्य जगहों पर उन्हें उत्तेजित किया गया और टकराव की स्थितियॉं भी आयीं। मुस्लिम धर्म की संवेदनशीलता को लेकर किया गया यह प्रयोग ज्यादा सफल नहीं रहा। धर्मनिरपेक्ष तत्वों को यह विचार करना चाहिए कि किस प्रकार इन प्रयोगों को निष्फल किया जाय।
साम्प्रदायिकता फैलाने वाले लोगों ने भीड़-भाड़ के समय का उपयोग किया ताकि प्रशासन के लिए कार्यवाही कर पाना संभव न हो। चौक यातायात की दृष्टि से बेहद समस्याग्रस्त रहता है क्योंकि यहॉं सड़क काफी संकरी है और सामान्य स्थितियों में भी यहॉं से गुजरना कठिन हो जाता है। दुर्गापूजा के अवसर पर यहॉं बहुत भीड़ हो जाती है और किसी प्रकार की प्रशासनिक कार्यवाही कठिन हो जाती है। इस बात को देखते हुए आगे के आने वाले त्यौहारों में प्रशासन को सचेत रहना चाहिए। कायदे से तो होना यह चाहिए कि चौक में किसी प्रकार के धार्मिक या राजनीतिक कार्यक्रमों पर रोक हो क्योंकि यह जगह काफी संकरी है। 18वीं शताब्दी के इसके निर्माण काल के समय फैज़ाबाद की जनसंख्या बहुत कम थी। अब यह जनसंख्या दस गुने से भी ज्यादा है। चौक में भारी वाहनों का प्रवेश पहले से ही वर्जित है। तो सवाल यह है कि प्रशासन द्वारा यहॉं धार्मिक और राजनीतिक कार्यक्रमों को क्यों नहीं वर्जित किया जाता। दुर्गापूजा के मार्ग को बदलना जरूरी है ताकि इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो सके।
जैसा पहले कहा जा चुका है प्रशासन के लिए जो संभव कार्यवाही थी वह नहीं की गयी। उदाहरण के लिए फैजाबाद में चौक क्षेत्र जहॉं उपद्रव हुए वहॉं से कुछ सौ मीटर की दूरी पर कोतवाली है और 2 किलोमीटर के भीतर ही पुलिस लाईन है। मगर वहॉं से कोई भी मदद नहीं पहुॅंची। वहॉं अतिसीमित मात्रा मे पुलिस थी। अग्निशामकों का सही प्रयोग न हो सका क्योंकि उनमे पानी ही नहीं था। सवाल यह जरूर उठता है कि तत्काल पानी भरे अग्निशामकों का उपयोग क्यों नहीं किया गया और क्यों वाटरलाईनों में बनाये जाने वाले प्वाइंट्स को प्रयोग में लाने के प्रयास नहीं किये गये। बाद में दुकानों में लग चुकी आग को बुझाना और मुश्किल हो गया। दुकानों में आग सुबह तक सुलगती रही।
रात में आगजनी की इन दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के बाद भी सुबह तक चौक में सुरक्षा का कोई इन्तजाम नहीं था। कफर््यू की घोषणा भी तब हुई जब क्रोधित भीड़ ने शहर के विधायक पवन पाण्डे पर आपना आक्रोष जाहिर किया और उन्हें वहॉं से भाग जाना पड़ा। प्रशासन की निष्क्रियता आलोचना का विषय है। बाद में एडीजी ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया कि प्रशासन की ओर से लापरवाही हुई। इस प्रकार की प्रशासनिक निष्क्रियता के अलग-अलग अर्थ लगाये जा रहे हैं। लम्बा समय बीतने के बाद फैज़ाबाद के जिलाधिकारी दीपक अग्रवाल और वरिष्ठ आरक्षी अधीक्षक रमेश शर्मा हटाये गये। उसके पीछे की भी अलग कहानी है।
इलेक्ट्रानिक मीडिया ने फैज़बाद की घटनाओं को नोटिस में नहीं लिया। मीडिया के चैनल्स उन दिनों गडकरी और वाड्रा के प्रसंगों को लेकर चटखारे मार रहे थे। उन्हें इस मानवीय त्रासदी से कुछ लेना-देना नहीं था। अखबारों में छपने वाले समाचार नयी व्यवस्था के चलते फैजाबाद तक में ही सीमित रह जाते थे। बस्ती जैसे करीबी शहर में केवल संक्षिप्त सूचनाएॅं मिलती थीं।
साम्प्रदायिकता को भड़काने के लिए अफवाहों का बड़े पैमाने पर प्रयोग किया गया। उदाहरण के लिए तनाव की घटनाओं को तोड़-मरोड़कर और बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया। कुछ लोगों ने भदरसा में हिन्दुओं की सामूहिक हत्याओं की अफवाह फैलायी तो कुछ ने हिन्दू गॉवों के बीच स्थिति मुस्लिम गॉंवों के खात्में का प्रचार किया। वास्तव में दोनों बातें सच्चाई से कोई सम्बन्ध नहीं रखती थीं। दोनों समुदाय के लोगों को चाहिए कि किसी भी अपुष्ट और भ्रामक सूचनाओं को सही न मानें और शान्ति बनाए रखें।
फैज़ाबाद में हुए साम्प्रदायिक उपद्रव इस ओर स्पष्ट संकेत करते हैं कि हमारे समाज और राजनीति से साम्प्रदायिकता समाप्त नहीं हुई है। फैज़ाबाद जैसे शान्तिप्रिय शहर में दंगों का होना एक बुरा संकेत है क्योंकि यह शहर बड़ी विपरीत परिस्थितियों में भी शान्त और संयत रहा है। ऐसे में हमें यह जान लेना चाहिए कि आगे साम्प्रदायिकता की राजनीति खड़ी है जिसके रास्ते में हिंसा ही हिंसा है। मिशन 2014 में साम्प्रदायिक राजनीति हावी हो सकती है और वह अपार जन और धन की हानि की ओर ले जा सकती है, यदि उसका ठीक से मुकाबला न किया गया। निश्चित रूप से हमें साम्प्रदायिकता से विभिन्न स्तरों पर निपटना पड़ेगा। समाज, संस्कृति और राजनीति इन तीनों स्तर पर संघर्ष किये बिना उसे पराजित या कमजोर कर पाना संभव न होगा। धर्मनिरपेक्षता तब तक साम्प्रदायिकता पर विजय न प्राप्त कर सकेगी जब तक उसकी संस्कृति को जनसामान्य तक न पहुॅंचाया जाय। यह कार्य धर्मनिरपेक्ष राजनीति अकेले नहीं कर सकती, इसके लिए साहित्य, नाटक, कला और संस्कृति के लोगों को भी जुटना होगा। इस अर्थ में राजनीतिज्ञों के अतिरिक्त बुद्धिजीवियों, विचारकों, लेखको और संस्कृतिकर्मियों की महती साम्प्रदायिकता विरोधी भूमिका बनती है।
 - प्रो. रघुवंशमणि
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कर्जमाफी की घोषणा छूट का पुलिंदा और किसानों के साथ छलावा - हर किसान के कर्ज में से 50 हजार तक का कर्जामाफी को भाकपा चलायेगी अभियान

लखनऊ 23 नवम्बर। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने कल राज्य सरकार द्वारा किसानों के 50 हजार तक के कर्जे माफ करने की घोषणा को छूट का पुलिंदा और किसानों के साथ छलावा बताया है। भाकपा का आरोप है कि एक बार फिर राज्य सरकार की कथनी और करनी का अंतर सामने आ गया है। भाकपा ने सरकार से मांग की है कि वह हर बैंक के हर तरह के किसानों के कर्जे में से 50 हजार रूपये माफ करे। पार्टी ने चेतावनी दी है कि वह इस सवाल को जनता के बीच ले जायेगी और किसानों के हित में आन्दोलन खड़ा करेगी।
भाकपा राज्य सचिव मंडल की ओर से यहां जारी एक प्रेस बयान में राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि मुख्यमंत्री की इस घोषणा में भी झोल ही झोल हैं और इससे किसानों को कोई राहत नहीं मिलने जा रही। चुनाव के बाद से ही कर्ज माफी के इंतजार में बैठा किसान ठगा महसूस कर रहा है और राहत के बजाय वह कर्ज के जाल में उलझ कर रह गया है।
भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि जिस सहकारी ग्राम्य विकास बैंक से दिये गये कर्ज की माफी की घोषणा मुख्यमंत्री ने की है, उससे बहुत ही कम किसान कर्ज लेते हैं। उसकी साख समाप्त हो चुकी है और किसानों की जमीनें जब्त करने के लिए यह बैंक कुख्यात रही है। किसान इसे ‘भूमि विनाश बैंक’ कह कर पुकारते हैं। तभी तो प्रान्त में 10 करोड़ के लगभग किसान हैं और उनमें लगभग 90 प्रतिशत कर्जदार हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री की घोषणा के दायरे में केवल 7 लाख 20 हजार किसान ही आ रहे हैं।
शेष किसानों को इससे कोई राहत नहीं मिल पा रही क्योंकि उन्होंने राष्ट्रीयकृत बैंकों, जिला सहकारी बैंकों तथा ग्रामीण बैंकों से कर्ज ले रखा है। और जब किसान कर्ज लेता है तो 50 हजार तक ही नहीं लेता, अपनी जरूरत के मुताबिक ही अधिक भी कर्ज लेता है। इन बैंकों के कर्जों को सरकार ने माफ नहीं किया है।
दूसरे सरकार ने 50 हजार तक के कर्जे माफ करने की घोषणा की है जबकि हर कर्जदार किसान के हर कर्जे में से 50,000 रूपये माफ किये जाने चाहिए। सरकार की यह शर्त कि उसी किसान का कर्ज माफ होगा जिसने मार्च 2012 तक 10 प्रतिशत रकम अदा कर दी है, पूरी घोषणा को ही बेमानी कर देती है। किसान रबी की फसल के लिए अक्सर अक्टूबर-नवम्बर में कर्ज लेते हैं, जिसकी अदायगी मई-जून में देय होती है। फिर कौन किसान बिना फसल पैदा हुये मार्च में कर्ज का 10 प्रतिशत अदा कर देगा? अतएव अधिकतर किसान इस घोषणा के अंतर्गत कर्जमाफी से वंचित रह जायेंगे।
इसके अलावा कई छोटे किसान डेयरी, मुर्गी, सुअर तथा मछली पालन जैसे कामों के लिए भी कर्ज लेते हैं, उनको भी कोई राहत नहीं दी गयी है।
भाकपा ने इस झूठी घोषणा को सिरे से नकार दिया है और सरकार से मांग की है कि वह सभी बैंकों से सभी तरह के कर्ज लेने वाले किसानों के सभी तरह के कर्जों में से 50 हजार रूपये माफ करने की घोषणा करे। भाकपा ने चेतावनी दी है कि यदि इस सरकार ने किसानों से किये गये वायदे के अनुसार 50 हजार रूपये प्रति किसान कर्ज माफ नहीं किया तो भाकपा जिलों-जिलों में आन्दोलन चलायेगी। पार्टी ने अपनी जिला इकाईयों को स्थानीय स्तर पर आंदोलन संगठित करने के निर्देश भी दिये हैं।

कार्यालय सचिव
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सोमवार, 19 नवंबर 2012

शान्ति एवं सौहार्द के प्रतीक फैजाबाद को बरबाद नहीं होने दिया जायेगा और न ही उत्तर प्रदेश को गुजरात बनने दिया जायेगा - भाकपा

लखनऊ 19 नवम्बर। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य एवं राज्य सचिव डा. गिरीश, राज्य कार्यकारिणी सदस्य अतुल कुमार सिंह, जिला सचिव राम तीरथ पाठक, सह सचिव रामजी राम यादव, प्रो. रघुवंशमणि, आफताब रिज़वी तथा अशोक कुमार तिवारी ने दो दर्जन से भी अधिक स्थानीय नेताओं के साथ फैजाबाद जनपद के दंगा प्रभावित क्षेत्रों का सघन भ्रमण किया। भाकपा नेता शाहगंज एवं भदरसा में दंगे में मृतकों के परिवारीजनों से मिले और उनके प्रति अपनी संवेदनाओं का इज़हार किया। उपर्युक्त स्थानों सहित फैजाबाद नगर में दंगों में आगजनी एवं लूट से प्रभावित सम्पत्तियों का जायजा लिया तथा पीड़ितों की आप बीती सुनी।
फैजाबाद से यहां लौट कर भाकपा राज्य सचिव ने निम्न प्रेस वक्तव्य जारी किया है।
”फैजाबाद के दंगा प्रभावित क्षेत्रों का सघन दौरा करने के उपरान्त भाकपा प्रतिनिधिमंडल इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि ये वारदातें साम्प्रदायिक और कट्टरपंथी ताकतों के तात्कालिक और दीर्घकालिक राजनैतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए चलाई जा रही उनकी लगातार मुहिम का परिणाम हैं। अपने राजनैतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ये ताकतें आगामी लोकसभा चुनाव में वोटों का साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण  करना चाहती हैं।
भाकपा प्रतिनिधिमंडल इस नतीजे पर पहुंचा है कि इन दंगों और दंगाईयों से निपटने में शासन-प्रशासन ने भारी ढिलाई दिखाई। इससे प्रदेश में सत्तारूढ़ दल की दोगली कार्यनीति उजागर हुई है। शासन-प्रशासन ने समय रहते कारगर कार्रवाई की होती तो दंगाईयों के मनोबल को तोड़ा जा सकता था तथा जान एवं माल की तबाही को कम किया जा सकता था। राम लीला और दुर्गा पूजा महोत्सवों जैसे आस्था के आयोजनों में आपत्तिजनक कैसेटों को बजाये जाने पर प्रशासन ने यदि उचित कार्यवाही की होती तो संभवतः दंगाइयों का हौसला इतना न बढ़ पाता।
ऐसा लगता है कि बाबरी विध्वंस के बाद अपनी प्रासंगिकता गंवा बैठा संघ परिवार अपनी खोई हुई ताकत और जमीन को फिर से हासिल करने के काम में जुटा है। गोरखपुर, फैजाबाद, वाराणसी, मुरादाबाद, बरेली, मेरठ, सहारनपुर, आगरा, अलीगढ़, कानपुर, इलाहाबाद, लखनऊ, झांसी आदि संवेदनशील मंडल इसके निशाने पर हैं। इस बार ग्रामीण क्षेत्रों पर भी फोकस है, जहां संघ की शाखायें नये सिरे से संगठित की जा रही हैं और दूसरे शहरों से लाकर ट्रेन्ड स्वयंसेवक सांगठनिक काम में जुटाये गये हैं। इन दंगों के बाद ग्रामों की लगने वाली शाखाओं में युवकों की आमद बढ़ी है और यही संघ चाहता भी है। अंतर्राष्ट्रीय हालातों और प्रदेश में सत्ता परिवर्तन से उत्साहित अन्य कट्टरपंथी ताकतें भी उकसावे और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का प्रयास कर रही हैं। हाल ही में जन्मी कुछ मुस्लिम राजनीतिक पार्टियां भी साम्प्रदायिक विभाजन के काम में लगी हैं ताकि धर्मनिरपेक्ष ताकतों से अल्पसंख्यक समुदाय को अलग किया जा सके।
क्षति के आकलन और मुआवजे के मामलों में सरकारी मशीनरी का रवैया बेहद खराब है और राज्य सरकार की घोषित नीतियों के एकदम विपरीत है। बिना गहरी छान-बीन के धकड़-पकड़ का काम भी बेरोकटोक जारी है जिससे आक्रोश बढ़ रहा है। भाकपा प्रदेश में सात माह में हुये दर्जन भर से अधिक दंगों से बेहद चिन्तित है जिनसे कि हमारे साम्प्रदायिक सौहार्द और धर्मनिरपेक्ष ढांचे को भारी क्षति पहुंच रही है। प्रदेश भर में जान-माल का भारी नुकसान हुआ है। विकास की गति को भी क्षति पहुंची है।
भाकपा राज्य कमेटी ने इन हालातों को देखते हुये एक ओर सद्भाव का वातावरण निर्मित करने का बीड़ा उठाया है, वहीं देश एवं प्रदेश की शोषित-पीड़ित जनता के उत्थान और प्रदेश के विकास के लिए आवाज उठाने का कार्यक्रम भी बनाया है। शांति और सौहार्द के प्रतीक फैजाबाद को बर्बाद नहीं होने दिया जायेगा और न ही उत्तर प्रदेश को गुजरात बनने दिया जायेगा, भाकपा ने संकल्प लिया है।
तत्कालिक तौर पर भाकपा 1 दिसम्बर को साम्प्रदायिक सद्भाव एवं धर्मनिरपेक्षता की रक्षा हेतु पूरे प्रदेश में सम्मेलन, सभायें, गोष्ठियां एवं शांति मार्च आयोजित करेगी। 10 दिसम्बर को दलितों एंव आदिवासियों के लिये बनाई गई योजनाओं को अमली जामा पहनाने की मांग को लेकर धरने-प्रदर्शन किये जायेंगे। पूरे नवम्बर और दिसम्बर माह एफडीआई के विरूद्ध कन्वेंशन आयोजित किये जायेंगे तथा एपीएल-बीपीएल के फर्जी वर्गीकरण को समाप्त कर हर परिवार को हर माह 2 रूपये किलो के हिसाब से 35 किलो अनाज मुहैया कराने की कानूनी गारंटी सहित सभी को खाद्य सुरक्षा मुहैया कराने के लिए सभायें एवं हस्ताक्षर अभियान चलाया जायेगा।“
भाकपा नेताओं ने वहां इप्टा एवं नौजवान सभा द्वारा आयोजित सद्भावना मार्च में भी भाग लिया।
भाकपा के प्रतिनिधिमंडल में प्रमुख रूप से शामिल थे - अयोध्या प्रसाद तिवारी, हृदय राम निषाद, यासीन बेग, अवधेश निषाद, मो. मुजीब, लक्ष्मण, गौतम तथा फूल चन्द्र आदि।
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शनिवार, 17 नवंबर 2012

गर्म हवा के निर्देशक एम.एस. सथ्यू से पवन मेराज़ की बातचीत

पवन मेराज : गर्म हवा 1974 में रिलीज हुई, आज गर्म हवा की क्या प्रासंगिकता है ?
एम.एस.सथ्यू: कभी-कभी ऐसी फिल्में बन जाती है जो अपने मायने कभी नहीं खोतीं। वैसे भी आजकल हम धर्म जाति, और क्षेत्रीयता को लेकर अधिक संकीर्ण होकर सोचने लगे हैं। इन सब सच्चाइयों को देखते हुए गर्म हवा की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है।
पवन: ऐसे समय में कला की समाज के प्रति क्या जिम्मेदारी बनती है।
सथ्यू: समाज के यथार्थ को सामने लाना ही कला की मुख्य जिम्मेदारी हैं। मैं इस बात का हामी नहीं कि कला सिर्फ कला के लिये होती है। कला के सामाजिक सरोकार होते हैं।
पवन: लेकिन व्यवसायिक सिनेमा भी तो यथार्थ को अपनी तरह से सामने लाता है फिर समानांतर सिनेमा इससे अलग कैसे ?
सथ्यू: वे बेसिकली पैसा बनाते हैं। उनके लिये समस्याएं भी बिकाऊ माल हैं। गरीबी से लेकर विधवा के आंसू तक के हर संेटीमेंट को वे एक्सप्लाइट करते हैं। समस्याओं को देखने का नजरिया, समाज के प्रति कमिटमेण्ट और समानांतर सिनेमा का ट्रीटमेंट ही इसे व्यावसायिक सिनेमा से अलग करता है।
पवन: अपने ट्रीटमेंट में गर्म हवा कैसे अलग है ?
सथ्यू: देखिये पहली बात हो हम एक विचारधारा से जुड़े हुए लोग थे इसीलिये यह फिल्म बन पायी। ‘पूरी फिल्म इस्मत चुगताई की एक कहानी से प्रभावित है। एक पात्र राजिंदर सिंह बेदी की कहानी से भी प्रेरित था। आपको हैरानी होगी पूरी फिल्म आगरा और फतेहपुर सीकरी में शूट की गयी। इसमें बनावटी चीज कुछ भी नहीं है। आज इस तरह सोचना भी मुश्किल है। आज की फिल्मों में बहुत बनावटीपन है। कहानी हिन्दुस्तान की होती है शूटिंग विदेश में... (हँसते हैं) शादियाँ तो ऐसे दिखाई जाती हैं गोया सारी शादियाँ पंजाबी शादियों की तरह ही होती हैं। इस फिल्म में दृश्यों की अर्थवत्ता और स्वाभाविकता को बनाये रखने के लिये कम से कम सोलह ऐसे सीन हैं जिसमें एक भी कट नहीं है। कैमरे के कलात्मक मूवमेंट द्वारा ही यह सम्भव हो सका। आज के निर्देशक ऐसा नहीं करते।
पवन: बिना कट किये पूरा सीन फिल्माना तो कलाकारों के लिये भी चुनौती रही होगी ?
सथ्यू: वे सब थियेटर के मंजे हुए कलाकार थे जिन्हें डायलाग से लेकर हर छोटी से छोटी बात याद रहती थी... यहां तक भी कितने कदम चलना है और कब घूमना है...रंगमंच का अनुभव कलाकारों को परिपक्व बना देता है। इसलिये कभी कोई दिक्कत पेशन नहीं आयी।
पवन: इस फिल्म के उस मार्मिक सीन में जब नायिका मर जाती है तो पिता के रोल में बलराज साहनी की आँखों से कोई आँसू नहीं गिरता यह बात दुख को और बढ़ा देती है ?
सथ्यू: असल में बलराज जी की जिंदगी में भी ऐसा ही कुछ हुआ था। उनकी एक बेटी ने आत्महत्या कर ली थी। बलराज उस शूटिंग से लौट कर आये थे और उन्होंने कुछ इसी तरह सीढ़ियाँ चढ़ी थीं जैसा फिल्म में था। बलराज उस समय इतने अवसन्न हो गये थे कि रो भी नहीं पाये। उस वक्त उनसे पारिवारिक रिश्तों के चलते मैं वहीं था। फिल्म बनाते समय मेरे जेहन में वहीं घटना थी पर मैं बलराज जी से सीधे-सीधे नहीं कह सकता था इसलिये मैंने सिर्फ इतना कहा कि आपको इस सीन में रोना नहीं है.. बलराज समझ गये और उन्होंने जो किया था आपके सामने है।
पवन: इस फिल्म का अंत भी बहुत सकारात्मक था ?
सथ्यू: दरअसल यह भी बलराज जी का ही योगदान था। उन्होंने ही इस तरह के अंत को सुझाया। वे बहुत समर्थ कलाकार थे। ‘दो बीघा जमीन’, ‘गर्म हवा’ और दूसरी कई फिल्मों में अपने शानदार अभिनय के बावजूद उन्हें कभी नेशनल अवार्ड नहीं मिला तो सिर्फ इसलिये क्योंकि वे कम्युनिस्ट पार्टी के मेम्बर थे। हम डेमोक्रेसी में रहते हैं और फिर भी ऐसी बातें हो जाया करती हैं।
पवन: फिल्म रिलीज होने के बाद खुद बलराज जी की क्या प्रतिक्रिया थी ?
सथ्यू: दुर्भाग्य से वो यह फिल्म रिलीज होने तक जिंदा नहीं रहे। फिल्म के अंत में जब वे कहते कि मै। इस तरह अब अकेला नहीं जी सकता और संघर्ष करती जनता के लाल झण्डे वाले जुलूस में शामिल हो जाते हैं यह उनके अभिनय जीवन का भी अंतिम शॉट था।
पवन: एक कलाकार की राजनैतिक भूमिका को आप किस रूप में देखते हैं ?
सथ्यू: जी हाँ, बिलकुल ! कोई भी चीज राजनीति से अलग नहीं है। कलाकार का भी एक राजनीतिक कमिटमेंट होता है और उनकी कला में भी दिखता भी है। अगर कोई यह कहता है कि उसका राजनीति से कुछ लेना-देना नहीं है तो वह अपनी जिम्मेदारी से भाग रहा है।
पवन: कला, समाज को प्रभावित करती है लेकिन समाज, कला को किस तरह प्रभावित करता है?
सथ्यू: मैं दोनों को अलग करके नहीं देखता। समाज के तत्कालीन प्रश्न ही कलाकृति का आधार बनते हैं। वे बुराइयाँ हैं जिन्हें हम लंबे समय से स्वीकार करते आ रहे हैं, एक कलाकार उन्हेे अपनी कला के जरिये समाज के सामने दुबारा खोलकर रखता है और अपने प्रेक्षक को उन पर सोचने को मजबूर कर देता है।
पवन: 70 के दशक में कम्युनिस्ट पार्टी मूवमेंट के उभार से लगभग हर कला, साहित्य और फिल्म प्रभावित रही, ‘इप्टा’ जैसा सांस्कृतिक आंदोलन भी चला। लेकिन अब वह उतार पर नजर आता है। ऐसा क्यों?
सथ्यू: देखिये, जहां तक मूवमेंट का सवाल है। इसने हमें एक सपना दिया- ‘बेहतर दुनिया का सपना’। हम सब इससे प्रभावित थे। मैंने पहले भी कहा आंदोलन से जुड़े होने के कारण ही हम लोग ‘गर्म हवा’ बना सके। लेकिन यह ग्लोबलाइजेशन का दौर है और हम बदलती परिस्थितियों के हिसाब से खुद को नया नहीं बना सके, इसीलिये ऐसा हुआ। मार्क्स ने भी कहा था-यह परिवर्तन का दर्शन है। हमें इस तरफ भी सोचना होगा।
पवन: लेकिन आज आंदोलन की हर धारा इस पर विचार कर रही है और नित नए प्रयोग हो रहे हैं। नेपाल में माओवादियों का प्रयोग आपके सामने है।
सथ्यू: हाँ, वहाँ कुछ बातें अच्छी हैं। आज कल के जमाने में माओविस्ट रेवोल्यूशन को कंडेम किया जाता है.... लेफ्ट के लोगों ने भी किया है। नक्सलाइट आज भी है। उनकी भी एक आइडियालॉजी है। कहा जाता हैकि वे काफी ंिहंसक भी हो जाते हैं। लेकिन माओवादियों की सरकार के साथ बैठक और उसमें हिस्सा लेने से बहुत फर्क पड़ा है।
पवन: ‘गर्म हवा’ जैसी समानांतर धारा की फिल्में क्या आपको नहीं लगता कि एक विशेष वर्ग में सिमट कर रह जाती हैं। क्या इनका फैलाव आम जनता तक नहीं होना चाहिये ?
सथ्यू: होना चाहिये, यह जरूरी है। लेकिन एक लंबे दौर तक ऐसा हो पाएगा, ऐसा कह पाना संभव नहीं है। फिलहाल ऐसा नहीं हो सकता। साहित्य में भी नहीं होता। घटिया साहित्य ज्यादा छपता और पढ़ा जाता है। मल्टीप्लैक्स में ‘वैलकम’ जैसी फिल्म देखने वाले ऐसी फिल्म नहीं देख सकते। फिल्म देखना भी एक कला है जिसके लिये आँखें होनी चाहिये। इसकी ट्रेनिंग शुरू से ही लोगों को दी जानी चाहिये।
पवन: समानांतर सिनेमा के सामने आज कौन सी चुनौतियाँ हैं ?
सथ्यू: फिल्म बनाना एक महंगा काम है। इसके लिये स्पॉन्सर और प्रोत्साहन की जरूरत होती है। ‘लगान’ की चर्चा ऑस्कर में आने की वजह से भी हुई और इसकी टीम ने फिल्म को वहां प्रदर्शित करने में करोड़ों रूपये फूँक दिए, जिसमें एक नई फिल्म बन सकती थी। मजे की बात यह है कि ‘लगान’ के पास ऑस्कर में नामांकन का वही सर्टिफिकेट है जो ‘गर्म हवा’ को उससे 30-35 साल पहले मिला था। यह फिल्म कान फेस्टिवल में भी दिखाई गई और तब ऑस्कर के चयनकर्ताओं ने इसे ऑस्कर समारोह में दिखाने को कहा। मैं सिर्फ पैसे की तंगी के चलते वहाँ नहीं जा सका। हाँ, मैंने फिल्म भेज दी और इसका सर्टिफिकेट मेरे पास पड़ा है।
पवन: क्या पैसे की तंगी ने फिल्म बनाने की प्रक्रिया में बाधा डाली ?
सथ्यू: फिल्में सिर्फ पैसे से नहीं, पैशन से बनती हैं। (मुस्कराते हैं) लेकिन पैसा भी चाहिये। उस जमाने में 2.5 लाख निगेटिव बनने में लगा। हमारे पास साउंड रिकॉर्डिंग का सामान मुंबई से आता था और उसके साथ एक आदमी भी। इसका 150 रू0 प्रतिदिन का खर्च था और हमारे पास इतने भी नहीं थे। अंततः सारी शूटिंग बिना साउंड रिकार्डिंग के ही हुई। फिल्म बाद में बंबई जाकर डब की गई। तकरीबन 9 लाख कुल खर्चा आया, पूरी फिल्म में। कई कलाकारों को मैं उनका मेहनताना भी नहीं दे सका... मेरे ऊपर बहुत सा कर्जा हो गया और नौ साल लगे इससे उबरने में।
 पवन : इसके अलावा और क्या-क्या समस्याएँ आईं ?
 सथ्यू: खुद की तारीफ नहीं करना चाहिये। लेकिन कहूँगा कि बेहतरीन फिल्म बनी थी और मैं समझता हूँ  कि समाज पर भी सकारात्मक प्रभाव डालती। लेकिन शुरूआत में रिलीज के लिये इसे सेंसर सर्टिफिकेट नहीं मिला। कहा गया इससे समाज में तनाव फैल सकता है... इस बकवास पर कोई माथा ही पीट सकता था क्योंकि उस समय तमाम लोग कुछ ऐसा कर रहे थे जो समाज पर बुरा प्रभाव डाल रहा था। एक साल की जद्दोजहद के बाद इंदिराजी ने जब खुद पूरी फिल्म देखी और कहा रिलीज कर दो... तब ही इसका रिलीज संभव हो पाया... लेकिन यू.पी. में नहीं। (मुस्कराते हैं)...वहाँ चुनाव होने वाले थे। इस तरह 1973 में तैयार फिल्म 74 में सबसे पहले बंगलौर में रिलीज हो सकी।
 पवन: आप रंगमंच में काफी सक्रिय रहे। फिल्म और रंगमंच में आप मुख्यतः क्या अंतर पाते हैं ?
 सथ्यू: अपनी बात कहने की दो अलग-अलग विधाएं हैं...कैमरे की वजह से काफी सहूलियत हो जाती है लेकिन रंगमंच एक संस्कार है। यहां कलाकार और दर्शक का तादात्म्य स्थापित होता है। यह विधा बहुत पुरानी है और कभी नहीं मरेगी।
 पवन : आपकी दूसरी फिल्मों को ‘गर्म हवा’ जितनी चर्चा नहीं मिली ?
 सथ्यू : ‘गर्म हवा’ जैसी फिल्म कोई रोज नहीं बना सकता... ऐसी फिल्में बस बन जाती हैं कभी-कभी। ‘पाथेर पांचाली, सुवर्ण रेखा’ जैसी फिल्में हमेशा नहीं बन सकतीं।
पवन मेराज़ मो. 09179371433
(‘‘प्रगतिशील वसुधा’’ से साभार)
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भाकपा द्वारा गन्ने का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने की मांग

लखनऊ 17 नवम्बर। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिवमंडल ने उत्तर प्रदेश सरकार से गन्ने का न्यूनतम समर्थन मूल्य कम से कम रू. 350.00 प्रति क्विंटल निर्धारित करने की मांग की है।
यहां जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा है कि कृषि उत्पादों - खाद, डीजल, बिजली, पानी, बीज की कीमतों में भारी बढ़ोतरी तथा महंगाई को देखते हुए गन्ना उत्पादन की कीमत में भारी बढ़ोतरी हुई है। लागत में हुई बढ़ोतरी तथा बढ़ती महंगाई के कारण किसानों का जीवन दूभर हो गया है। कृषि उत्पादों की कीमतों में हुई बढ़ोतरी के साथ-साथ चीनी के भावों में एक साल में हुई बढ़ोतरी को मद्देनजर रखते हुए वैसे तो गन्ने का समर्थन मूल्य रू. 350.00 प्रति क्विंटल से भी अधिक निर्धारित होना चाहिए परन्तु प्रदेश का किसान रू. 350.00 प्रति क्विंटल पर संतोष कर सकता है।
भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा है कि प्रदेश की 113 चीनी मिलों में से केवल कुछ ही चीनी मिलों में पेराई अभी शुरू हुई है। आधा नवम्बर गुजर चुका है परन्तु अभी तक अधिकतर चीनी मिलों ने पेराई शुरू नहीं की है। सरकार ने सभी मिलों को पेराई शुरू करने के लिए भी कहना चाहिए जिससे खेतों में खड़ा गन्ना की कीमतें किसानों को मिलना शुरू हो सके।
भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने गन्ना मिलों पर किसानों के बकाये की अदायगी के बारे में भी सरकार के ढुलमुलपन की आलोचना करते हुए मांग की है कि सरकार को किसानों के बकाया धन की अदायगी के बारे में भी सख्ती करनी चाहिए।
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सोमवार, 12 नवंबर 2012

प्रगतिशील लेखक संघ मध्य प्रदेश के राज्य सम्मेलन हेतु आमंत्रण


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शनिवार, 10 नवंबर 2012

भाकपा राज्य मंत्रिपरिषद ने लिये आन्दोलन एवं संगठन संबंधी फैसले

लखनऊ 10 नवम्बर। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य मंत्रिपरिषद की यहां राज्य सचिव डा. गिरीश की अध्यक्षता में सम्पन्न बैठक में देश एवं प्रदेश की राजनैतिक स्थिति के साथ-साथ पार्टी एवं जन संगठनों द्वारा किये गये कार्यों की गहन समीक्षा की गई तथा आन्दोलन एवं संगठन संबंधी कई निर्णय लिये गये।
उत्तर प्रदेश में एक के बाद एक हो रही साम्प्रदायिक वारदातों को गंभीरता से लेते हुये पार्टी ने 1 दिसम्बर को ”साम्प्रदायिक सद्भाव एवं धर्मनिरपेक्षता की रक्षा दिवस“ जिलों-जिलों में आयोजित करने का निर्णय लिया गया है। पार्टी कमेटियों को दिये निर्देश में कहा गया है कि साम्प्रदायिक और कट्टरपंथी ताकतें अपने राजनैतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए दंगे भड़का रहीं हैं। उनका स्पष्ट लक्ष्य आगामी लोकसभा चुनाव से पूर्ण साम्प्रदायिक विभाजन पैदा कर वोट हथियाना है। राज्य सरकार भी निहित राजनैतिक स्वार्थों एवं दृढ़ इच्छाशक्ति के अभाव में दंगों से निपटने में उदासीनता बरत रही है। इससे साम्प्रदायिक सद्भाव एवं धर्मनिरपेक्षता के ताने-बाने को जबरदस्त चुनौती खड़ी हो गयी है, जिसको बचाना सभी धर्मनिरपेक्ष एवं लोकतांत्रिक ताकतों का फौरी कर्तव्य है। भाकपा की जिला कमेटियां 1 दिसम्बर को कन्वेंशन, सभायें, शान्ति-मार्च आयोजित करेंगी जिनमें वामपंथी, धर्मनिरपेक्ष तथा लोकतांत्रिक व्यक्तियों एवं शक्तियों को भी आमंत्रित किया जायेगा। 6 दिसम्बर को साम्प्रदायिक शक्तियां जो कुछ करने की सोच रही हैं, उसको देखते हुये भी चौकसी और सक्रियता जरूरी है।
भाकपा राज्य मंत्रिपरिषद ने अपने पिछले फैसले को दोहराते हुये 10 दिसम्बर मानवाधिकार दिवस को ”अनुसूचित जाति, जनजाति उपयोजनाओं को लागू करो दिवस“ के रूप में मनाने का आह्वान किया है तथा जिला केन्द्रों पर धरने/प्रदर्शन आयोजित कर राष्ट्रपति को सम्बोधित ज्ञापन दिये जाने का निर्देश दिया है।
केन्द्र सरकार द्वारा खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश लागू करने और खाद्य सुरक्षा बिल अभी तक लागू न करने के सवाल को गंभीरता से लेते हुये भाकपा मंत्रिपरिषद ने इन दोनों सवालों पर लगातार आन्दोलन एवं जन जागरूकता अभियान चलाने का निश्चय किया है। ‘एफडीआई रद्द करो, सबको खाद्य सुरक्षा दो’ अभियान के तहत पूरे दिसम्बर महीने सभायें, नुक्कड़ सभायें, कन्वेंशन, धरने, प्रदर्शन चलाने का निर्देश जिला कमेटियों को दिये हैं। कन्वेंशनों में राज्य नेतृत्व के साथी भी भेजे जा सकते हैं।
मुस्लिम अल्पसंख्यकों के समक्ष मौजूद समस्याओं, गरीबी, बेरोजगारी, शैक्षिक पिछड़ापन, जान व माल की असुरक्षा, भेदभाव एवं पुलिस उत्पीड़न के अलावा सच्चर कमेटी एवं रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्ट को लागू न करने से उनकी शोचनीय स्थिति को ध्यान में रखते हुये तथा अल्पसंख्यकों में प्रगतिशील सोच का विकास करने हेतु ‘इंसाफ’ तंजीम के माध्यम से प्रदेश में तीन क्षेत्रीय कन्वेंशन आयोजित करने का भी निर्णय लिया गया है। यह कन्वेंशन पूर्व, पश्चिम और मध्य उत्तर प्रदेश में 31 जनवरी तक आयोजित किये जायेंगे। सदस्यता कराके फरवरी माह में इंसाफ का राज्य सम्मेलन कराने का निर्णय भी इंसाफ ने लिया है।
इसके अलावा ट्रेड यूनियनों के राष्ट्रव्यापी अभियान को भाकपा द्वारा पूर्ण समर्थन दिये जाने का निर्णय भी किया गया।
पार्टी शिक्षा हेतु पार्टी स्कूल लगाने तथा इसके लिये जिला कौंसिलों की बैठक बुलाकर रूपरेखा तैयार करने का निर्देश भी जिला कौंसिलों को दिया गया है।
राष्ट्रीय परिषद द्वारा सदस्यता शुल्क की दर बढ़ाने पर विचारोपरान्त निर्णय लिया गया कि अब राज्य केन्द्र पर प्रति सदस्य शुल्क मय लेवी 20 रूपये देय होगा।
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दस दंगे केवल नौ महीने में

एक बार फिर उत्तर प्रदेश के हालात बहुत ही खतरनाक हैं। सपा सरकार को बने केवल नौ महीने हुये हैं और प्रदेश में दस साम्प्रदायिक वारदातें हो चुकी हैं। हर घटना में प्रशासन की लापरवाही ने सरकार की मंशा, कार्यप्रणाली और कार्यकुशलता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। चुनाव के वक्त ही यह आशंका जतायी जा रही थी कि समाजवादी पार्टी की सरकार बनते ही प्रदेश में दंगों और अपराधों की बाढ़ न आ जाये। लोगों ने सरकार तो बना दी परन्तु सरकार ने खुद की साख पर ही बट्टा लगा लिया है। मथुरा, बरेली, प्रतापगढ़, गाजियाबाद, इलाहाबाद, फैजाबाद, बाराबंकी जैसी जगहों पर आज भी तनाव बरकरार है। सरकारी सूत्रों का कहना है कि खुफिया तंत्र ने पहले ही आशंका जता दी थी कि प्रदेश बारूद के ढेर पर बैठा है और कहीं भी कोई भी बड़ी साम्प्रदायिक घटना घट सकती है। सरकारी सूत्रों का यह खुलासा तो सरकार और प्रशासन की मंशा पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगा देता है। सरकार और प्रशासन ने सुधरने के बजाय घटनाओं की शुरूआत में सुस्ती दिखा कर खुद पर ही सवालिया निशान लगा लिया।
सामान्य जनता समझ नहीं पा रही है कि अचानक प्रदेश में इस तरह दंगों की बाढ़ कैसे आ गयी। लोग अपने-अपने हिसाब से इसकी परिभाषा करने में जुटे हैं। मुख्यमंत्री ने फैजाबाद दंगों के बाद कहा कि ‘यह दंगे उनकी सरकार को बदनाम करवाने के लिये करवाये जा रहे हैं। इसके पीछे कुछ लोगों की साजिश है।’ अगर यह विरोधियों की साजिश है तो मुख्यमंत्री खुद कर क्या रहे हैं? फैजाबाद के दंगों के लगभग 14 दिन बाद प्रशासनिक अधिकारियों को हटाने का फैसला लिया गया है। दंगों के लिए इन प्रशासनिक अधिकारियों को उदारता दिखाते हुए अगर दोषी न भी माना जाये तो कम से कम जिस प्रकार घटनायें घटी थीं, उसमें समय पर कार्यवाही न करने का दोष तो कम से कम इन अधिकारियों द्वारा पर था ही। जिस प्रकार इन अधिकारियों ने अपराधिक सुस्ती दिखाई थी, उसी तरह की सुस्ती मुख्यमंत्री ने उन्हें हटाने का फैसला लेने में दिखाई। क्या मुख्यमंत्री जनता को यह बताने का साहस दिखायेंगे कि इसके पीछे किसकी साजिश थी? वैसे दंगों के पीछे किसी की साजिश थी तो फिर मुख्यमंत्री ने उस साजिश का नाकाम करने के लिए क्या किया, इसे भी जनता जानना चाहेगी। केवल साजिश का बहाना बनाने से सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती।
इन घटनाओं की हकीकत यह है कि मरने वालों में अधिसंख्यक मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं। सरकार बनाते ही मुसलमानों के कब्रिस्तानों की बाउंड्री बनवाने की घोषणा की गयी थी। इसके भी निहितार्थ अब तलाशे जाने लगे हैं।
ऐसा नहीं है कि ये हालात सिर्फ इसलिये पैदा हो रहे हैं कि अफसरों का इकबाल खत्म हो चुका है। कानून-व्यवस्था के लिए सरकार लम्बा समय नहीं मांग सकती। वास्तविकता यह है कि मुख्यमंत्री अथवा प्रधानमंत्री का तेवर देख कर ही अधिकारियों के काम करने का रवैया बदल जाता है और अगर तेवर दिखाने के लिए भी समय की जरूरत हो, तो इस पर आश्चर्य जरूर होता है।
2014 के लोकसभा चुनावों में वोटों के ध्रुवीकरण के लिए यहां के राजनैतिक दल अवसरवादी कदम उठा रहे हैं और उनके हाथों में खेल रही साम्प्रदायिक ताकतें कोई मौका छोड़ना नहीं चाहतीं। इन घटनाओं में जानमाल का नुकसान तो होता ही है पूरे सूबे का सौहार्द भी दांव पर लग जाता है।
वैसे प्रदेश में भाई-चारे के माहौल को तार-तार करने के प्रयास सफल नहीं होंगे। उत्तर प्रदेश की गंगा-जमुनी तहजीब बरकरार रही है और बरकरार रहेगी, इसे प्रदेश की जनता एक बार फिर साबित करेगी। ऐसे समय में धर्मनिरपेक्ष ताकतों और आम जनता की यह जिम्मेदारी बन जाती है कि वे सतर्क रहंे और भविष्य में वोटो के ध्रुवीकरण के लिए किए जाने वाले ऐसे किसी भी संकीर्ण और धृणित प्रयास को असफल कर ऐसी ताकतों को मुंहतोड़ जवाब दें।
- प्रदीप तिवारी
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नन्हे हाथ मलाला

इन नन्हे हाथों से होकर,
आवाज़ उठेजी, गूंजेगी।
इन नन्हे हाथों में बन परचम
आजादी खुलकर झूमेगी।।

ये हाथ खींचकर लायेंगे,
तारीक वक़्त में सूरज को।
ये हाथ उड़ा ले जायेंगे,
उस परीदेश में तितली को।।

ये हाथ करेंगे अब हिसाब,
उन दबी सिसकती फसलों का।
ये हाथ लिखेंगे मुस्तकबिल,
अब आने वाली नस्लों का।।

ये हाथ बनायेंगे अपनी,
शफ्फाफ़ सुनहरी दुनिया को।
वो दुनिया जसमें जंग नहीं,
औरत बच्चों पर जुल्म नहीं,
वो दुनिया जो बस अपनी हो,
बस इतनी की मैं हंस तो सकूं
और हंसने से मिरे,
तुम्हें डर ना लगे।।
(दुनिया की सबसे बहादुर बेटी मलाला युसुफजई के लिए)
- पंकज निगम
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बैठक स्थगन सूचना

लखनऊ 8 नवम्बर। पार्टी कार्यक्रम के मसौदे पर चर्चा हेतु 8 एवं 9 दिसम्बर 2012 को उरई में प्रस्तावित भाकपा राज्य कौंसिल की बैठक राष्ट्रीय नेतृत्व के इन तिथियों पर अन्यत्र व्यस्त हो जाने के कारण स्थगित कर दी गयी है।
राष्ट्रीय नेतृत्व से परामर्श के बाद पुनः निर्धारित तिथियों की सूचना बाद में दी जायेगी। साथियों से अनुरोध है कि उरई आने का कार्यक्रम स्थगित कर दें।
- डा. गिरीश, राज्य सचिव
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मंगलवार, 6 नवंबर 2012

किसानों की जमीन को बिल्डरों को सौंपने से बाज आये सपा सरकार

लखनऊ 6 नवम्बर। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने उत्तर प्रदेश शासन के आवास एवं शहरी नियोजन अनुभाग-3 की 31 अक्टूबर की उस अधिसूचना को रद्द करने की मांग राज्य सरकार से की है जिसमें कि उसने तहसील सदर लखनऊ के सराय शेख, सेमरा और शाहपुर गांवों की जमीन को इंटीग्रेटेड टाउनशिप के लिए अधिगृहण करने की घोषणा की है।
यहां जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि उपर्युक्त गांवों के किसानों की इस बेहद उपजाऊ जमीन को आवासीय प्रयोजन हेतु अधिग्रहण किये जाने की खबर से वहां के किसानों में बेहद आक्रोश व्याप्त है और वे करो-मरो की लड़ाई पर अमादा हैं। किसानों के हितों को मौजूदा सरकार को ध्यान में रखना चाहिये।
डा. गिरीश ने कहा है कि उच्च न्यायालय की लखनऊ खण्ड पीठ ने भी 2 नवम्बर को दिये गये एक फैसले में टिप्पणी की है कि शहरों के विकास की अंधी दौड़ अन्न पैदा करने वाली किसानों की जमीन निगल रही है। उसके भयानक परिणाम हो सकते हैं। अदालत ने कहा कि किसान की कुल जमा रोजी-रोटी का सहारा सिर्फ जमीन और उसकी खेती-बाड़ी है। विकास के नाम पर सरकार मिट्टी के मोल उनकी जमीन को हासिल कर लेती है और तत्पश्चात् किसी योजना और जानकारी के अभाव में मुआविजे का पैसा खत्म हो जाने के बाद किसान और उसका पूरा परिवार आर्थिक विपन्नता का शिकार हो जाता है। यह स्थिति उसके बच्चों को गलत कृत्यों की ओर ढकेल सकती है।
डा. गिरीश ने राज्य सरकार से आग्रह किया कि उच्च न्यायालय की इस टिप्पणी के आलोक में भी राज्य सरकार को अपने इस फैसले को तत्काल रद्द कर देना चाहिये।
ज्ञातव्य हो कि इस इंटीग्रेटेड टाउनशिप का निर्माण लखनऊ के एक जाने-माने बसपा नेता द्वारा किया जा रहा है और इसके अधिग्रहण की धारा 4 के अधीन पहली सूचना एक साल पहले बसपा सरकार के जमाने में जारी की गयी थी। भाकपा ने तब इसका विरोध किया था और बसपा सरकार ने इस मामले को ठंड़े बस्ते में डाल दिया था। लेकिन अब सपा सरकार ने उसे अंतिम रूप से अधिगृहीत करने का फरमान जारी कर दिया है जो यह बताने के लिए काफी है कि किसानों की जमीनों को छीनने के सवाल पर बसपा और सपा में कोई अंतर नहीं है।
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सोमवार, 1 अक्तूबर 2012

भाकपा की राज्य कौंसिल ने बनाई केन्द्र और राज्य सरकार के खिलाफ आन्दोलनों की व्यापक रूपरेखा

लखनऊ 1 अक्टूबर। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य कौंसिल की दो द्विवसीय बैठक यहां सुरेन्द्र राम की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई। बैठक में राजनैतिक और संगठन संबंधी रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि केन्द्र सरकार ने इस बीच आम जनता के विरूद्ध हमले तेज कर दिये हैं और जनता के विरूद्ध एक युद्ध छेड़ दिया है। पेट्रोलियम पदार्थों के दामों में बार-बार लगातार वृद्धि की जा रही है, रेलवे फ्रेट और किराया बढ़ा दिया गया है, यहां तक कि पासपोर्ट की फीस तक बढ़ा दी गयी है। इससे पहले से ही आसमान छू रही महंगाई और भी बढ़ती जा रही है जिसके पाटों तले आम जनता पिस रही है। सरकार ने एफडीआई में विदेशी निवेश की इजाजत दे दी है और सरकारी नवरत्न उद्योगों में विनिवेश का निर्णय ले लिया है। सरकार की नीतियों के चलते सकल घरेलू उत्पाद, औद्योगिक उत्पादन और कृषि उत्पादन सभी में गिरावट आयी है और बेरोजगारी ने छलांग लगायी है। इस सरकार की नीतियों और कारगुजारियों से जनता में दिनोंदिन आक्रोश बढ़ता चला जा रहा है।
राज्य सरकार के बारे में चर्चा करते हुए डा. गिरीश ने कहा कि यह सरकार भी पूर्व की बसपा सरकार और केन्द्र सरकार की नीतियों का अनुसरण करते हुए आर्थिक नवउदारवाद के रास्ते पर चल रही है। सरकार की नीतियों की कोख से उपजी कारगुजारियों ने इसके समाजवादी दिखने के प्रयासों को ढांप दिया है। विगत 6 माहों में किसानों की तबाही के तमाम कदम उठाये गये हैं, मजदूरों को बरबाद करने वाली औद्योगिक गतिविधियां जारी हैं। दलितों एवं कमजोर तबकों पर अत्याचार बढ़े हैं, कानून-व्यवस्था की स्थिति बद से बदतर हो गयी है, महिलाओं के साथ बदसलूकी की तमाम वारदातें हो रहीं हैं। भ्रष्टाचार थमने का नाम नहीं ले रहा है। शिक्षा का निजीकरण जारी है। बेरोजगारी बढ़ी है। सार्वजनिक क्षेत्र का निजीकरण लगातार हो रहा है और राज्य सरकार ने महंगाई को बढ़ाने वाले तमाम कदम उठाये हैं, जिनमें पेट्रोलियम पदार्थों पर वैट को न घटाना, बिजली पर टैक्स बढ़ाना और अन्य कई जरूरी सामानों पर वैट की दरों में वृद्धि तथा जमाखोरों के खिलाफ कार्रवाई न करना शामिल है।
केन्द्र और राज्य सरकार की नीतियों के कारण हर तरह की साम्प्रदायिक एवं कट्टरपंथी ताकतें सिर उठा रहीं हैं और उत्तर प्रदेश में 6 माह के अंदर 7 दंगें हो चुके हैं। केन्द्र सरकार की ही तरह राज्य सरकार के अल्प कार्यकाल में जनाक्रोश मुखरित हो रहा है। प्रतिदिन दसियों हजार लोग राजधानी में प्रतिरोध जाहिर करने आ रहे हैं और जिलों-जिलों में जो आन्दोलन चल रहे हैं, वह अलग हैं। मुख्यमंत्री द्वारा जनता दरबार में उमड़ने वाली भीड़ इस बात का सूचक है कि स्थानीय स्तर पर शासन-प्रशासन द्वारा जनता की समस्याओं का समाधान नहीं किया जा रहा है।
दोनों सरकारों की कारगुजारियों के खिलाफ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और उसके सहयोगी संगठनों ने गत दिनों ताबड़तोड़ आन्दोलन चलाये हैं। भविष्य में जनता की समस्याओं के समाधान के लिये कई कार्यक्रमों की रूपरेखा भी बनाई है। इसके तहत कल 2 अक्टूबर गांधी जयंती के अवसर पर धर्मनिरपेक्षता एवं राष्ट्रीय एकता की रक्षा का दिवस मनाया जायेगा। कार्यक्रम के अंतर्गत जिलों-जिलों में सद्भावना सभायें, विचारगोष्ठियां तथा मानवश्रृंखला का निर्माण आदि आयोजित किये जायेगा। देश के खेतिहर मजदूर और किसानों की ज्वलंत समस्याओं को लेकर 1 नवम्बर को दिल्ली में होने जा रही किसान सभा एवं खेत मजदूर यूनियन की रैली को व्यापक समर्थन प्रदान करने का निर्णय भी राज्य कौंसिल ने लिया है। इसके अलावा ट्रेड यूनियनों द्वारा संयुक्त रूप से आन्दोलन की लम्बी रूपरेखा तैयार की गयी है। भाकपा ट्रेड यूनियनों के इस आन्दोलन का भी पुरजोर समर्थन करेगी।
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शनिवार, 29 सितंबर 2012

राजनीतिक विरोध की वास्तविकता

संप्रग-2 सरकार एक ऐसे भंवर में फंस गयी है जिससे वह निकल नहीं पा रही है। वह इस भंवर से जितना निकलने की कोशिश करती है वह ही अधिक वह उस भंवर में फंसती चली जा रही है। लोगों को याद होगा कि सन 1991 में देश का विदेशी मुद्रा भंडार इतना कम हो गया था कि तत्कालीन केन्द्रीय सरकार को सोना गिरवी रखकर विदेशी मुद्रा का इंतजाम करना पड़ा था। लोगों ने उस समय इस बात पर ध्यान नहीं दिया था कि ऐसी दुर्गति का कारण क्या था। चूंकि कारण जानने की कोशिश नहीं की गयी तो उस कारण के निदान की भी कोई कोशिश नहीं हुई।
विदेशी मुद्रा की आवश्यकता होती है आवश्यक वस्तुओं के विदेशों से होने वाले निर्यात के लिए, विदेशों से प्राप्त ऋणों की अदायगी के लिए और विदेशी निवेश पर प्राप्त लाभांश की वापसी के लिये। विदेशी मुद्रा की आय का मुख्य जरिया होता है निर्यात से प्राप्त आय। इसके अतिरिक्त जिन श्रोतों से विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है वे हैं विदेशों से प्राप्त ऋण, अनुदान और निवेश के लिए आई राशि। इन दोनों के मध्य संतुलन को भुगतान संतुलन या ‘बैलेन्स आफ पेमेन्ट’ के नाम से जाना जाता है। किसी भी देश के लिए विदेशी मुद्रा का संतुलन बहुत जरूरी होता है। आजादी के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर देने वाले राजनेताओं ने शुरूआत से ही निर्यात से प्राप्त विदेशी मुद्रा की आय के अतिरिक्त अन्य श्रोतों को प्रयोग करने में कोताही बरती। उन्होंने निर्यात से अधिक आयात को हमेशा हतोत्साहित किया और इसी के फलस्वरूप वे भारतीय रूपये की कीमत को अंतर्राष्ट्रीय बाजार में स्थिर रखने में सफल रहे। सन 1980 तक भुगतान संतुलन का ग्राफ एक सीध में हल्के-फुल्के उतार-चढ़ाव के साथ संतुलित रहा। आज की युवा पीढ़ी को सुनकर शायद यह आश्चर्य हो कि उस दौर में अमरीकी डालर की औकात भारतीय रूपये के सामने बहुत कम थी। केवल पौने पांच रूपये खर्च करने पर एक अमरीकी डालर मिल जाया करता था।
राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही सत्ता की राजनीति में नई पीढ़ी सामने आयी जिसने न तो आजादी की लड़ाई में भाग लिया था और न ही उसने अर्थशास्त्र को समझने की इच्छा। संचार क्रांति की ओर देश बढ़ा परन्तु अमरीका से अनाप-शनाप मूल्यों पर कम्प्यूटर एवं दूसरे यंत्रों के अंधाधुंध निर्यात से विदेशी मुद्रा का भंडार खाली होने लगा। आज जो कम्प्यूटर बीस हजार रूपये में मिल जाता है, उससे कई गुना कम क्षमता वाला कम्प्यूटर उस दौर में हिन्दुस्तान में दो-दो लाख रूपये में लाया गया। लोगों को दस साल पहले मिलने वाले मोबाईल की कीमत भी याद ही होगी और उसके फीचर्स भी। कभी यह ध्यान नहीं दिया गया कि इस निर्यात के लिए आवश्यक विदेशी मुद्रा का प्रबंध कैसे होगा। उसी का परिणाम सन 1990 में सामने आया जब विदेशी मुद्रा भंडार पूरी तरह चुक गया था और भारतीय रिजर्व बैंक को अपना सोने का भंडार गिरवी रखना पड़ा था। निश्चित रूप से देश के लिए वह शर्मनाक हालत थी। देश का हर नागरिक इस स्थिति के लिए दुखी था परन्तु अधिसंख्यक को इसका कारण ज्ञात नहीं था।
फिर उसके बाद दौर शुरू हुआ एक ऐसे दौर का जिसमें सत्ता से जुड़े राजनीतिज्ञों की वह पीढ़ी आई जिसने कभी भी देश के गरीबों की हालत नहीं देखी थी, जिसे कभी बेरोजगारी के दंश का सामना नहीं करना पड़ा था और जिसने देश के लिए कभी कोई ख्वाब नहीं देखा था। उसने जिन आर्थिक नीतियों पर चलने का फैसला किया उसी का परिणाम है कि कहने को तो देश की विकास दर आसमान छू रही है परन्तु अमरीकी डालर के सामने भारतीय रूपया इतना बौना हो गया है कि 55 रूपये खर्च करने पर भी एक अमरीकी डालर नहीं खरीदा जा सकता। इसी का परिणाम है कि आज हमे पेट्रोल और डीजल की कीमतें इतनी अधिक भुगतनी पड़ रही हैं। विदेशी मुद्रा भंडार एक बार फिर शून्य की ओर बढ़ रहा है। हमने आयात को निर्यात से अधिक कर दिया। विदेशी ऋणों से फौरी हल निकालने की कोशिश की जिससे एक ओर तो भ्रष्टाचार बढ़ा तो दूसरी ओर उस ऋण की ब्याज सहित अदायगी के लिए और अधिक विदेशी मुद्रा की जरूरत हुई। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए आया धन मुनाफे के साथ वापस चला गया। जितना लेकर आया था उससे कई गुना ज्यादा विदेशी मुद्रा लेकर गया।
मनमोहन सिंह जैसे अमरीका परस्त नौकरशाह से राजनीतिज्ञ बने लोग अब भी सुधरने का नाम नहीं ले रहे हैं। इस संकट का हल अभी भी वे उसी तरह फौरी तौर पर निकालना चाहते हैं। अमरीका के इशारे पर विदेशी पूंजी को खुदरा व्यापार तक करने की इजाजत दे दी गयी है। वे अभी भी उसी दिवास्वप्न में जी रहे हैं, जिस दिवास्वप्न को उन्होंने 1991 में देखा था। कहते हैं कि ठोकर लगने से आदमी सीखता है परन्तु मनमोहन सिंह और उनके साथी अभी भी सीखने को तैयार नहीं हैं।
संप्रग-2 आज एक डूबता हुआ जहाज है जो अपने साथ पूरे देश को डूबो देना चाहता है। भाजपा अपने जन्मकाल से अमरीका परस्त रही है। इस देश के समाजवादी भी अमरीका परस्त रहे हैं। वे बात तो देश के गरीबों की करते हैं परन्तु आजादी के अगले दशक में ही उन्होंने देश में विचारधाराविहीनता का परचम बुलन्द करने की कोशिश की थी। वे बात अल्पसंख्यकों की करते हैं परन्तु अल्पसंख्यकों के लिए लालू और मुलायम जैसे मुख्यमंत्रियों ने क्या किया, इसे जानने की जरूरत नहीं है क्योंकि बेवकूफ बनाने के सिवा उनके भले के लिए कुछ किया ही नहीं। उल्टे ऐसे-ऐसे कदम उठाये कि क्या कहना। उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यकों का एक बड़ा हिस्सा बुनकरों का है, उसे बर्बाद करने के लिए हैण्डलूम कारपोरेशन से लेकर कताई मिलों को बंद करवा दिया था। बुनकर अब रिक्शा चलाते हैं या फिर अभी भी करघा लेकर भूखों मर रहे हैं। प्रदेश की बेशकीमती सम्पत्ति को औने पौने दामों पर बेच दिया। बसपा की बातें और काम भी इससे अलग नहीं रहे हैं। वास्तव में दोनों ही मौसेरे भाई-बहन हैं।
डीजल के दाम बढ़े, गैस सिलेण्डरों की संख्या अतिसीमित कर दी गयी और खुदरा व्यापार में एफडीआई को अनुमति दे दी गयी तो समाजवादी भी सड़कों पर उतरे विरोध करने के लिए। लेकिन उन्होंने तुरन्त घोषणा कर दी कि साम्प्रदायिकता के प्रेत के डर से वे संप्रग-2 सरकार को समर्थन देना जारी रखेंगे। विरोध और समर्थन की यह फितरत तो केवल हिन्दुस्तान के समाजवादियों में ही देखने को मिलती रही है। संप्रग-2 की तरह साम्प्रदायिकता की नाव पर सवार दल भी आज डूबता जहाज हैं। राजग ने भी भ्रष्टाचार के आरोप में संसद न चलने देकर किस प्रकार संप्रग-2 को वह सब करने का मौका मुहैया कराया जो अमरीका और विदेशी पूंजी चाहती है। उनकी राजनीति तो विरोध के जरिये सहयोग पर चलती रही है।
भाजपा और समाजवादियों की इस फितरत को समझना होगा। जनता के हर तबके को सोचना चाहिए कि कौन विरोध के लिए विरोध कर रहा है और कौन वास्तव में विरोध कर रहा है। केन्द्र सरकार के जन विरोधी कार्यों का विरोध करने के लिए जनता के विशाल तबके को उन वामपंथी ताकतों के इर्दगिर्द ही इकट्ठा होना चाहिए जो वास्तव में इन कदमों का विरोध कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश के नागरिकों को तो इस पर ज्यादा ही गौर करना चाहिए।
- प्रदीप तिवारी, 26 सितम्बर 2012
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शुक्रवार, 28 सितंबर 2012

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का आह्वान


चलो दिल्ली!                                                                                                                         पहुंचो दिल्ली!!
 1 नवम्बर 2012 को दिल्ली पहुंचो
किसान सभा एवं खेत मजदूर यूनियन की विशाल रैली

प्रमुख मांगे
  • कृषि का निगमीकरण रोको! खेतिहर मजदूरों, दस्तकारों तथा किसानों के हितों की रक्षा हेतु नया कानून बनाओ!!
  • विशेष आर्थिक परिक्षेत्र रद्द करो! किसान विरोधी भूमि अधिग्रहण कानून 1894 को बदलो!!
  • भूमिहीनों को भूमि दो! आवासहीनों को आवास दो!! बेरोजगारों को रोजगार दो!!!
  • किसानों की उपज का लाभकारी मूल्य दो! उन्हें जरूरी चीजें कम दामों पर दो!!
  • सभी को खाद्य सुरक्षा दो! हर परिवार को हर माह 35 किलो अनाज 2 रू. किलो पर दो!!
  • पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस तथा केरोसिन पर सब्सिडी बरकरार रखो!
  • मंहगाई को नीचे लाओ! भ्रष्टाचार मिटाने को कड़े कदम उठाओ!!
 निवेदक
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, 
उत्तर प्रदेश राज्य काउंसिल
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बुधवार, 19 सितंबर 2012

केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों का राष्ट्रीय कन्वेंशन

20-21 फरवरी 2013 को राष्ट्रव्यापी आम हड़ताल का फैसला
नई दिल्ली 4 सितम्बर। आज यहां देश के सभी केन्द्रीय ट्रेड यूनियन संगठनों और मजदूरों एवं कर्मचारियों के स्वतंत्र फेडरेशनों के आह्वान पर तालकटोरा स्टेडियम में एक राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। समूचे देश के संगठित एवं असंगठित मजदूरों एवं कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करने वाले लगभग 5000 ट्रेड यूनियन नेताओं ने सम्मेलन में हिस्सा लिया और अपने अधिकारों के लिए, सम्मान के साथ जीने के लिए और संप्रग-2 सरकार की जनविरोधी, मजदूर विरोधी नव उदारवादी नीतियों के विरूद्ध अपने संघर्ष को तेज करने का फैसला किया। सम्मेलन में एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें भारत के मजदूर वर्ग का आह्वान किया गया कि वह सम्मेलन में तय किये गये आन्दोलन कार्यक्रम के लिए आज से ही तैयारियों में जुट जाये। सम्मेलन ने 18-19 दिसम्बर 2012 को पूरे देश में व्यापक स्तर पर कानून तोड़ने और सत्याग्रह/जेल भरो/गिरफ्तारियां देने का कार्यक्रम आयोजित करने, 20 दिसम्बर 2012 को संसद मार्च और उसके बाद 20-21 फरवरी को दो दिन की राष्ट्रव्यापी आम हड़ताल करने का फैसला किया और भारत के मजदूर वर्ग का आह्वान किया कि अपनी एकता की ताकत के बल पर संघर्ष के इन कार्यक्रमों को पूरी तरह सफल बना कर केन्द्र सरकार को जन विरोधी और मजदूर विरोधी नीतियों को वापस लेने के लिए मजबूर करें।
सम्मेलन में बोलते हुए सभी ट्रेड यूनियनों और स्वतंत्र फेडरेशनों के नेताओं ने इस बात पर गंभीर आक्रोश एवं चिन्ता व्यक्त की कि देश के समूचे ट्रेड यूनियन आन्दोलन द्वारा पिछले तीन सालों में राष्ट्रव्यापी आन्दोलन, धरने-प्रदर्शन, यहां तक कि राष्ट्रव्यापी आम हड़तालों के बावजूद सरकार महंगाई को रोकने, असंगठित क्षेत्र मजदूरों के लिए सभी सामाजिक सुरक्षा अधिकार प्रदान करने, समुचित न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित करने, बड़े पैमाने पर ठेके पर काम कराने, श्रम कानूनों के व्यापक स्तर पर उल्लंघन और ट्रेड यूनियन अधिकारों पर हमले जैसे मजदूर वर्ग के ज्वलंत मुद्दों के सम्बंध में कोई भी सार्थक कदम उठाने को तैयार नहीं है और सरकार अपनी मजदूर विरोधी और पूंजीपति परस्त नीतियों पर आगे बढ़ती ही जा रही है।
सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए एटक महासचिव गुरूदास दासगुप्ता ने कहा कि यह भारत के मजदूर वर्ग के अस्तित्व मात्र की लड़ाई है। मजदूर वर्ग की एकता का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा - ”एकताबद्ध होंगे तो हम जीतेंगे, हमारे बीच फूट रहेगी तो नव उदारवाद जीतेगा। देश पर अमीर और ताकतवर लोग हावी हो गये हैं। देश के लोगों को गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार और अन्याय से निजात पाना बाकी है। इसके लिए हमें निरन्तर संघर्ष करना होगा। सम्मेलन में दो दिन की हड़ताल का जो फैसला किया है, उसके लिए हमें अभी से तैयारी में जुट जाना है।
सम्मेलन को सीटू महासचिव एवं राज्य सभा सदस्य तपन सेन, इंटक अध्यक्ष जी. संजीवा रेड्डी, भारतीय मजदूर संघ के महासचिव बी.एन. राय, हिन्दू मजदूर सभा के महासचिव हर भजन सिंह सिद्धू, सेवा नेता मनाली शाह, एआईयूटीयूसी महासचिव कृष्ण चक्रवर्ती, एक्टू महासचिव स्वप्न मुखर्जी, यूटीयूसी महासचिव अशोक घोष, टीयूसीसी महासचिव एस.पी. तिवारी और एलपीएफ महासचिव एम. शन्मुगमे ने सम्बोधित किया और सम्मेलन में मजदूर वर्ग ने जो एकता प्रदर्शित की है, उसकी सराहना करते हुए इस एकता को कायम रखते हुए और बढ़ाते हुए आगे के संघर्षों में जुट जाने की अपील की।
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विश्व रोजगार में डबल डिप-आईएलओ

जी 20 देशों के नेताओं के शिखर सम्मेलन से ठीक पहले जारी एक कड़े विश्लेषण में, अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने कहा कि विश्वव्यापी अर्थव्यवस्था एक नई और गहरी रोजगार मंदी के कगार पर है। इससे विश्वव्यापी आर्थिक बहाली में और अधिक समय लगेगा। इसका असर अनेक देशों पर पड़ सकता है। वहां सामाजिक अशांति उत्पन्न हो सकती है।
    इस नई रिपोर्ट का शीर्षक है, ‘वर्ल्ड ऑफ वर्क रिपोर्ट 2011: मेकिंग मार्केट्स वर्क फॉर जॉब्स’ (श्रम की दुनिया पर रिपोर्ट 2011ः बाजार को रोजगारो के लिये तैयार करना)। रिपोर्ट कहती है कि एक थकी हुई विश्वव्यापी आर्थिक बहाली ने नाटकीय श्रम से श्रम बाजारों को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। वर्तमान प्रवृत्तियों के अनुसार यह विकसित देशों में संकट के पूर्व के दौर के रोजगारों के स्तरों पर पहुंचने में कम से कम पांच साल का समय लेगी, जो कि पिछले वर्ष की रिपोर्ट में दिये पूर्वानुमान से एक वर्ष ज्यादा है।
    ‘‘हम सच्चाई के बिंदु तक पहुंच चुके हैं। रोजगार में एक गहरा गोता खाने से बचने के लिये हमारे पास एक ही चारा है, वह है अवसरों का लाभ उठाना’। यह कहना है, अंतर्राष्ट्रीय श्रम अध्ययन संस्थान के निदेशक रेमंड टौरेस का। टौरेस ने 31 अक्टूबर 2011 को इस रिपोर्ट को जारी किया था।
    यह बताते हुए कि वर्तमान श्रम बाजार पहले से ही एक आर्थिक धीमेपन और रोजगार पर उसके प्रभावों के छह माह के सामान्य चरण की सीमाओं से बंधा हुआ है, रिपोर्ट संकेत देती है कि संकट पूर्व के दौर की रोजगार दरों पर पहुंचने के लिये अगले दो सालों में आठ करोड़ रोजगारों के सृजन की आवश्यकता है। हालांकि वृद्धि में आई हालिया मंदी से पता चलता है कि विश्वव्यापी अर्थव्यवस्था केवल 50 प्रतिशत रोजगार ही सृजित कर पाई है।
    रिपोर्ट में एक नया सामाजिक अशान्ति सूचकांक भी है जो रोजगारों की कमी के कारण पैदा हुए असंतोष और इस मान्यता के बाद उपजे गुस्से के स्तरों को दिखाता है कि संकट के बोझ का बंटवारा निष्पक्षता से नहीं किया जा रहा है। इससे पता चलता है कि जिन 118 देशों में अध्ययन किया गया है, उनमें से 45 से अधिक देशों में सामाजिक असंतोष का खतरा बढ़ता जा रहा है। विकसित अर्थव्यवस्थाओं, जैसे यूरोपीय संघ, अरब क्षेत्र और कुछ हद तक एशियाई क्षेत्र में यह स्थिति है। इसके विपरीत उपसहारा अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में सामाजिक अशांति का खतरा ठहरा हुआ या काफी कम है।
    अध्ययन दिखाता है कि लगभग दो तिहाई विकसित देशों और उबरते तथा विकासशील देशों में से आधे देशों में हालिया उपलब्ध आंकड़ों से पता चलता है कि वहां रोजगार दर सुस्त है। इससे इन क्षेत्रों में रोजगार की स्थिति खराब हो जाती है। वैसे भी विश्वव्यापी बेरोजगारी अपने अब तक के शीर्ष बिंदु पर है, यानी 20 करोड़ से भी ज्यादा बेरोजगार दुनिया में हैं।
    आर्थिक सुस्ती रोजगार परिदृश्य पर विशेष रूप से क्यों ठोस प्रहार कर रही है, रिपोर्ट इसके तीन कारण बताती है: पहला, संकट की शुरुआत की तुलना में उपक्रम आज श्रमिकों को नौकरी पर बरकरार रखने के मामले में कमजोर स्थिति में है। दूसरा, जैसे-जैसे वित्तीय खर्चों में कटौती के उपायों को अपनाने का दबाव बढ़ रहा है, सरकारें नये रोजगार और आय समर्थक कार्यक्रमों को स्वीकार करने या बनाये रखने के प्रति कम उत्सुक हो गई है। सभी क्षेत्रों में अधिकतर लोग उपलब्ध रोजगार की गुणवत्ता से असंतुष्ट हैं। खासकर यूरोपीय संघ में उत्कृष्ट रोजगार का जबर्दस्त अभाव है। इस क्षेत्र में अस्थायी नौकरियों में ही बढ़त देखी गई।
    मध्य और पूर्वी यूरोप और सीआईएस तथा उपसहारा अफ्रीका में रोजगार के प्रति असंतोष सबसे ज्यादा, 70 और 80 प्रतिशत है। मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में, जहां पिछले दिनों सामाजिक और राजनैतिक अस्थिरता चरम पर थी, रोजगार के प्रति असंतोष थोड़ा कम, 60 प्रतिशत के करीब है। अलग-अलग देशों में यह अलग-अलग दर्ज की गई है। ईजिप्ट, जोर्डन और लेबनान में वर्ष 2010 में तीन चौथाई लोग अच्छी नौकरियों की उपलब्धता से असंतुष्ट थे।
    विकसित अर्थव्यवस्थाओं में ग्रीस, इटली, पुर्तगाल, स्लोवेनिया और स्पेन जैसे देशों में समस्या जटिल है। वहां सर्वे में शामिल 70 प्रतिशत से अधिक लोगों ने बताया कि वे रोजगार बाजार से असंतुष्ट हैं।
    संकट के बाद से जिन देशों ने आर्थिक बहाली की दिशा में अच्छा कार्य किया है, जैसे पूर्वी और दक्षिण पूर्वी एशिया और लैटिन अमेरिका, वहां लोगों में असंतोष कुछ कम है। चीन में 50 प्रतिशत से अधिक लोगों ने असंतोष जताया। इसी तरह लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई देशों, जैसे डोेमिनिक रिपब्लिक, इक्वेडोर, हैती, निकारागुआ और उरुग्वे में 60 प्रतिशत से अधिक लोग रोजगार बाजार से असंतुष्ट हैं।
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सोमवार, 17 सितंबर 2012

वैश्वीकरण के दौर में कफन कहानी की प्रासंगिकता

हिन्दी मंे यथार्थवादी कहानी लेखन की शुरूआत प्रेमचंद ने की। उसका अन्यतम् उदाहरण ‘कफन’ है। इसीलिये बहुत से कथा समीक्षकों ने कथावस्तु तथा शिल्प की दृष्टि से कफन कहानी को पहली नई कहानी स्वीकार किया है। ‘कफन’ कहानी भारत में अंग्रेजी राज के दौर में सामन्ती समाज के क्रूर शोषण के शिकार दलित कृषि मजदूर की कथा है जिसमें धीसू-माधव जैसे पात्र अपने शोषण का प्रतिरोध अकर्मण्यता प्रदर्शित करते हैं।घीसू और माधव उस सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों की उपज हैं जहां गालियां भी पड़ती हैं, लात-घूंसे भी पड़ते हैं बेगार भी लिया जाता है। ऊपर से अस्पृश्यता का दंश।
    कहानी की कथावस्तु से परिस्थितियों के साथ-साथ घीसू-माधव के चरित्र का उद्घाटन होता है। जाड़े की रात, अंधकार में सारा गांव डूबा हुआ है। घीसू और माधव झोपड़े के द्वार पर अलाव के सामने दूसरों के खेत से चोरी किये हुए आलू भूनते हुए बैठे हैं। माधव की जवान बीवी प्रसव-पीड़ा से कराह रही है। दोनों शायद इसी इंतजार में हैं कि वह मर जाये तो आराम से सोयें। लेखक ने घीसू और माधव की प्रकृति का चित्रण इस तरह किया है साक्षात हमारे सामने उपस्थित हो। ‘‘चमारों का कुनबा था और सारे गाँव में बदनाम’’ घीसू एक दिन काम करता तो तीन दिन आराम। माधव आधे घण्टे काम करता तो घण्टे भर चिलम पीता। इसलिये उन्हे कहीं मजदूरी नहीं मिलती थी। घर में फांके की नौबत आ जाती तब दोनों मजदूरी की तलाश करते। गांव मंे काम की कमी नहीं थी। किसानों का गांव था मेहनती आदमी के लिये पचास काम थे, मगर इन दोनों को लोग उसी वक्त बुलाते जब दो आदमियों से एक का काम पाकर भी संतोष कर लेने के सिवा और कोई चारा नहीं होता।’
    बड़ा विचित्र जीवन था, घर में मिट्टी के दो चार-बर्तनों के सिवा कोई संपत्ति नहीं थी, फटे चीथड़ों में अपनी नग्नता को ढंके हुए जी रहे थे, उन्हें कोई सांसारिक चिंता नहीं थी। कर्ज से लदे हुए, गालियां भी खाते, मार भी खाते, मगर कोई गम नहीं। इनकी गरीबी देखकर वसूली की बिल्कुल आशा न रहने पर भी लोग इन्हें कुछ-न-कुछ कर्ज दे ही देते थे। दूसरों के खेत से चोरी कर लाये आलू-मटर भूनकर खाते, गन्ने तोड़कर रात मंे चूसते। बुधिया के आने पर इस घर में व्यवस्था की नींव पड़ी। वह दूसरों के घर चुनाई-पिसाई कर, घास काट कर सेर भर आटे का इन्तजाम कर लेती थी और दोनों का पेट भरती थी। इससे ये दोनोे और आलसी हो गये थे। बल्कि कुछ अकड़ने भी लगे थे। कोई उन्हें कार्य पर बुलाता, तो दुगुनी मजदूरी मांगते। वहीं बुधिया प्रसव-पीड़ा से तड़प रही है और दोनों उसकी मौत की प्रतीक्षा कर रहे हैं। अलाव से गर्म-गर्म आलू निकाल कर खा रहे हैं। घीसू द्वारा उसे देख-आने के लिये कहने पर माधव बहाना बना देता है। उसे डर है वह कोठरी में गया तो आलू का बड़ा भाग भीखू खा जायेगा।
    यह अकर्मण्यता, अमानवीयता घीसू और माधव में कैसे पैदा होती है। प्रेमचंद ने इस कहानी में इसका खुलासा किया है। हमारी व्यवस्था में उसके बीज मौजूद है-प्रेमचंद ने लिखा है-’’ जिस समाज में दिन-रात मेहनत करने वालों की हालत उनकी हालत से कुछ बहुत अच्छी न थी और किसानों के मुकाबले में वे लोग, जो किसानों की दुर्बलताओं से लाभ उठाना जानते थे, कहीं ज्यादा सम्पन्न थे, वहां इस तरह की मनोवृत्ति का पैदा हो जाना कोई अचरज की बात न थी, वे लोग जो किसानों की कमजोरियों का फायदा उठाना जानते थे ज्यादा सम्पन्न थे। मेहनत करने वाले विपन्न थे और शोषण करने वाले फल-फूल रहे थे’’। प्रेमचंद ने घीसू को ज्यादा विचारवान बताया है जो किसानों के विचार शून्य समूह में सम्मिलित होने के बजाय उन लोगों के साथ उठते-बैठते हैं जो गांव के सरगना या मुखिया बने हुए हैं। यद्यपि यहां उन्हें सम्मान नहीं मिलता। उनके इस कृत्य को देखकर सारा गांव उन पर उंगली उठाता है। पर घीसू को  इस बात का संतोष है कि उसे कम से कम किसानों की तरह जी-तोड़ मेहनत नहीं करनी पड़ती। उनकी सरलता और निरीहता से दूसरे लोग फायदा तो नहीं उठाते।
    घीसू और माध्व कामचोरी क्यों करते हैं अकर्मण्यता क्यों करते हैं यहां समझ में आता है। काम की कमी नहीं है गांव में पर काम नहीं करते। भूखों मरने की नौबत आती है तब काम की तलाश करते हैं। शोषण उनसे बेहतर स्थिति वाले किसानों का भी हो रहा है, लेकिन विचार शून्य होने के कारण वे अपना शोषण बर्दाश्त कर रहे हैं घीसू और माधव को यह मंजूर नहीं। बुधिया मर रही है, पर उसे बचाने का उद्यम नहीं करते। अलाव से गर्म-गर्म आलू निकालकर खाते हैं। घीसू को अपने जवानी के समय एक दिन-दरयाव ठाकुर के यहाँ बेटी के विवाह मे दिया गया भोज याद आता है। माधव कहता है ‘‘अब हमें कोई भोज नहीं खिलाता। घीसू कहता है’’ अब कोई क्या खिलायेगा ? अब तो सबको किफायत सूझती है। शादी-ब्याह में मत खर्च करो, क्रियाकर्म में मत खर्च करो, पूछो गरीबों का माल बटोर-बटोर कर कहाँ रखोगे ? बटोरने में तो कभी नहीं है। हाँ खर्च में किफायत सूझती है।’ दोनों इसकी चर्चा करते आलू खाकर पानी पीकर सो जाते हैं। रात में बुधिया मर गई थी। उसके पेट में बच्चा मर गया था दोनों रोते-पीटते हैं। पास-पड़ोस के लोग इकट्ठे होकर सान्त्वना देते हैं। अंतिम संस्कार के लिये बांस, लकड़ी का इंतजाम करते हैं। लेकिन कफन के लिये पैसे नहीं हैं पहले जमींदार के पास जाते हैं। जमींदार उनसे नफरत करता है फिर दो रूपये का ढिंढोरा पीटकर सेठ-साहूकारों से दो-दो चार-चार आने वसूल कर लेते हैं। जब पांच रूपये की अच्छी रकम हो जाती है तब कफन लेने निकलते हैं। लेकिन कफन के पैसे से शराब पीते हैं-दावत उड़ाते हैं।
    प्रेमचंद ने यहां घीसू-माधव की अकर्मण्यता, अमानवीयता की चरम स्थिति का चित्रण किया है। और यह भी बताया है कि घीसू और माधव को अमानवीय कौन बना रहा हैं। ऐसा नहीं है कि घीसू और माधव में मानवीय संवेदना नहीं है-मानवीय संवेदना उनमें भी है-‘‘बुधिया प्रसव पीड़ा से पछाड़ खा रही थी रह-रहकर उसके मुँह से ही ऐसी दिल हिला देने वाली आवाज निकलती थी कि दोनें कलेजा थाम लेते थे।’ यह उद्धरण और दूसरी जगह कफन के पैसे मिलने पर वे कहते हैं-यही पांच रूपये पहले मिलते, तो कुछ दवा-दारू कर लेते।’ कफन के पैसे से दावत उड़ाने के बाद ‘‘बची हुई पूड़ियां-भिखारी को देना’ इस बात के प्रमाण है।
    प्रेमचंद ने उस व्यवस्था के चरित्र को उजागर किया है-जो दान, धर्म, उदारता का नाटक करती है और दोनों हाथों से गरीबों को लूटती है। समाज की यह व्यवस्था ही घीसू माधव को अकर्मण्य, अमानवीय बनाती है।
    प्रेमचंद की इस कहानी को पढ़ते हुए आज की व्यवस्था पर हम दृष्टि डालें तो आज भी घीसू-माधव को मौजूद पाते है। प्रेमचंद की कफन कहानी हमें यह सोचने के लिये विवश करती है कि घीसू-माधव अकर्मण्य, अमानवीय होकर जीते रहे, किसान विचार शून्य बने रहे, अपनी स्थिति को नियति का खेल मानकर उसे स्वीकार करके बदहाली में जीते रहे या उससे उबरने के लिये-उसे अमानवीय बनाने वाली व्यवस्था से मुक्ति के लिये एक होकर संघर्ष करें ? यह सवाल हमारे सामने हैं और आज के समय में इस कहानी के नये सिरे से पाठ की आवश्यकता है।
- थान सिंह वर्मा
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मूल्यवृद्धि और विदेशी निवेश के खिलाफ 20 सितम्बर को सड़कों पर उतरेगी भाकपा

लखनऊ 17 सितम्बर। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य मंत्रिपरिषद की एक आपात्कालीन बैठक राज्य सचिव डा. गिरीश की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई। बैठक में केन्द्र सरकार पर यह आरोप लगाया गया कि वह एक के बाद एक जनता के ऊपर कहर बरपाने वाले कदम उठा रही है। उसने किसानों एवं आम जनता पर भारी बोझ लादने वाला कदम उठाते हुये डीजल के दामों में पांच रूपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी कर दी। उच्च श्रेणी के पेट्रोल की कीमतों में बिना किसी सार्वजनिक घोषणा के रू. 6.74 की वृद्धि कर दी। गैस सिलेंडर प्रति परिवार साल में 6 ही देने और शेष को बाजार के मूल्य पर उपलब्ध कराने जैसा जघन्य कदम उठा दिया। खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश के सारे रास्ते खोल दिये जिससे हमारे छोटे उद्योग एवं व्यापार के सामने संकट खड़ा हो गया। नाल्को जैसे नवरत्न सार्वजनिक उद्योग, जोकि लाभ दे रहे हैं, के शेयर बेचने का फैसला ले डाला। इन सारे कदमों से पहले से ही आसमान छू रही महंगाई तथा बेकारी को और भी बढ़ावा मिलेगा, भाकपा ने आरोप लगाया है।
भाकपा राज्य मंत्रिपरिषद ने निर्णय लिया कि केन्द्रीय नेतृत्व के निर्देशानुसार 20 सितम्बर को उपर्युक्त सवालों के खिलाफ आयोजित प्रतिरोध दिवस में पूरे उत्तर प्रदेश में जन प्रतिरोध आयोजित किये जायें। पार्टी ने अपनी जिला कमेटियों को निर्देश दिया है कि वे बड़ी संख्या में सड़कों पर उतर कर सरकार के इन कदमों का विरोध करें। भाकपा ने किसानों, मजदूरों, महिलाओं से अपील की है कि वे सब इस प्रतिरोध में शामिल हों। पार्टी ने ट्रान्सपोर्र्ट्स, दुकानदारों एवं व्यापारियों के संगठनों से भी अपील की है कि वे इस प्रतिरोध में मजबूती से भागीदारी करें। साथ ही जनता से, खास तौर से देशभक्त नागरिकों से, अपील की कि वे भी इस आन्दोलन में अग्रणी भूमिका निभायें। हमको इन सारी कार्रवाईयों का पुरजोर विरोध करना है ताकि सरकार के जनविरोधी कदमों को वापस कराया जा सके और जनता के जीवन की सुरक्षा की जा सके।
भाकपा ने राज्य सरकार से भी अनुरोध किया है कि वह पेट्रोलियम पदार्थों पर लगने वाले वैट को कम करके और हाल ही में बिजली एवं अन्य जिन्सों के ऊपर बढ़ाये गये करों को वापस ले कर उत्तर प्रदेश की जनता को राहत प्रदान करें।
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शनिवार, 15 सितंबर 2012

भाकपा ने रिटेल में विदेशी भागीदारी पर जताया कड़ा विरोध

डीजल, गैस मूल्यवृद्धि के खिलाफ पूरे प्रदेश में विरोध प्रदर्शन किये
लखनऊ 15 सितम्बर। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने केन्द्र सरकार द्वारा मल्टीब्रांड रिटेल में 51 फीसदी विदेशी निवेश, विमानन क्षेत्र में 49 प्रतिशत विदेशी निवेश, सार्वजनिक क्षेत्र की चार कंपनियों में विनिवेश तथा ब्राडकास्टिंग क्षेत्र में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ा कर 74 प्रतिशत किये जाने के फैसलों को देश को विदेशी आर्थिक शक्तियों का गुलाम बनाने की संज्ञा देते हुए इन फैसलों को तत्काल वापस लेने की मांग की है।
भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने आरोप लगाया कि संप्रग-2 सरकार ने देश और देश की आम जनता के विरूद्ध घृणित युद्ध छेड़ दिया है। अब जनता को भी इस सरकार को इसी भाषा में जवाब देना होगा।
भाकपा राज्य सचिव ने कहा है कि इन फैसलों से घरेलू उद्योग एवं व्यापार बुरी तरह प्रभावित होंगे और बेरोजगारी बेतहाशा बढ़ेगी। भाकपा ने अपेक्षा जाहिर की है कि उत्तर प्रदेश सरकार इन फैसलों को प्रदेश में लागू नहीं करेगी। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि प्रदेश में इस फैसले को लागू किया गया तो भाकपा प्रदेश में विदेशी कंपनियों की घेराबंदी करेगी।
भाकपा राज्य सचिव ने बताया कि डीजल एवं रसोई गैस की मूल्यवृद्धि के विरूद्ध और खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश के खिलाफ भाकपा की राष्ट्रीय परिषद के आह्वान पर आज प्रदेश के जिलों-जिलों में विरोध प्रदर्शन आयोजित किये गये और प्रधानमंत्री के पुतले फूंके गये। लखनऊ में विधान सभा पर प्रधानमंत्री का पुतला फूंका गया। आगरा में तो भाकपा ने इस आन्दोलन को ग्रामीण क्षेत्रों तक फैला दिया है और कई गांवों और कस्बों में प्रधानमंत्री के पुतले दहन किये गये। भाकपा का यह आन्दोलन आगे भी जारी रहेगा और गांव और शहरों में सभायें, नुक्कड़ सभायें, साईकिल मार्च और पद यात्रायें लगातार जारी रहेंगी।
भाकपा ने अपनी जिला कमेटियों को निर्देश दिया है कि वे इस सम्बंध में व्यापारिक एवं सामाजिक संगठनों द्वारा चलाये जा रहे आन्दोलनों का पुरजोर समर्थन करें और एकजुटता कार्रवाईयां आयोजित करें।


कार्यालय सचिव
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शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

डीजल एवं रसोई गैस की मूल्य वृद्धि के खिलाफ भाकपा विरोध प्रदर्शन आयोजित करेगी

लखनऊ 14 सितम्बर। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने केन्द्र सरकार द्वारा डीजल की कीमतों में की गयी पांच रूपये प्रति लीटर की वृद्धि की आलोचना की है। भाकपा ने नियंत्रित मूल्य पर रसोई गैस के साल में केवल 6 सिलिंडर ही दिये जाने तथा बाकी सिलिंडर साढ़े सात सौ रूपये की कीमत पर दिये जाने की भी निन्दा की है। पार्टी ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा बिजली पर अधिभार बढ़ाये जाने की भी तीखी आलोचना की है।
भाकपा इस भारी वृद्धि के खिलाफ कल दिनांक 15 सितम्बर को समूचे उत्तर प्रदेश में विरोध प्रदर्शन आयोजित करेगी। कई जिलों में आज भी विरोध प्रदर्शन किये गये।
यहां जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि सरकार के इस कदम से पहले से ही आसमान छू रही महंगाई और भी बढ़ेगी। खेती करना किसानों के और कठिन हो जायेगा और कृषि उत्पादनों की लागत भी बढ़ जायेगी। इसी तरह माल भाड़ा एवं यात्री भाड़ा बढ़ने से आम जनता पर भारी बोझ पड़ेगा। उन्होंने कहा कि छोटे से छोटे परिवार को भी साल में कम से कम 12 सिलिंडरों की आवश्यकता होती है। लेकिन सरकार ने इसे 6 सिलिंडरों तक सीमित कर दिया जिससे गैर सिलेंडरों की काला बाजारी तो बढ़ेगी ही खाने पीने की तमाम वस्तुयें और घर की रसोई महंगी हो जायेगी। अतएव भाकपा केन्द्र सरकार से मांग करती है कि डीजल पर की गयी 5 रूपये की वृद्धि को फौरन वापस लिया जाये, गैस सिलिंडर हर परिवार की जरूरत के मुताबिक नियंत्रित मूल्य पर ही दिये जायें तथा राज्य सरकार पेट्रªोलियम पदार्थों पर वैट घटा कर इनकी कीमतें दिल्ली और चंडीगढ़ के समकक्ष लाये और बिजली पर बढ़ाये गये अधिभार को भी वापस ले।
भाकपा राज्य सचिव मंडल ने अपनी समस्त जिला इकाईयों का आह्वान किया है कि वे 15 सितम्बर को अपने-अपने जिलों में इस मूल्य के विरोध में तथा बढ़ी कीमतों को वापस लिये जाने की मांग को लेकर धरने-प्रदर्शन और पुतला दहन के कार्यक्रम आयोजित करें।

कार्यालय सचिव
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गुरुवार, 13 सितंबर 2012

भारतीय वामपंथ: दृष्टि और चुनौतियां

कौंसिल ऑफ सोशल डेवलपमेंट ने 8-9 अगस्त, 2012 को दिल्ली में इंडिया इंटरनेशनल संेटर में एक सेमिनार का आयोजन किया जिसका विषय था: ‘‘ भारतीय वामपंथ: दृष्टि और चुनौतियां’’। सेमिनार की अध्यक्षता विख्यात इतिहासकार रोमिला थापर ने की। सेमिनार में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव एस. सुधाकर रेड्डी ने भाषण दिया, जिसे नीचे दिया जा रहा है:
   "देश आज एक सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक संकट-का सामना कर रहा है। यह एक बड़ी चुनौती है।
    सामंतवाद से पूंजीवाद में संक्रमण से अभूतपूर्व चुनौतियां एवं सामाजिक जीवन में समस्याएं पैदा हुई हैं। अर्थव्यवस्था बड़ी तेजी से बदल रही है। बुनियादी ढांचा, शहरीकरण, संचार, सूचना प्रौद्योगिकी आदि में यह बात नजर आती है। दो दशकों में देश में उदारीकरण, भूमंडलीकरण की जिन नीतियों पर अमल चल रहा है उससे पूंजीवाद की वृद्धि तेज हो गयी है और वह कारपोरेट पंूजीवाद के नये दौर में दाखिल है जो असल में जीहजूरिया पूंजीवाद का एक रूप है।
    इन आर्थिक बदलावों के बावजूद समाज की सामंती सोच-समझ कमोबेशी पहले जैसे ही है। खाप पंचायतें सामने आ रही हैं जो प्रेम विवाह और मोबाइल फोन पर प्रतिबंध लगा रही हैं ओर यहंा तक कि सजा के रूप में मृत्यु दंड तक सुना रही हैं। लिंग भेद चल रहा है जिससे सेक्स अनुपात में अनुचित असंतुलन पैदा हो गया है। आज भी देश में अस्पृश्यता जारी है और दलितों पर शारीरिक हमले भी हो रहे हैं। धार्मिक कट्टरता, और जाति पहचान के संघर्ष धर्मनिरपेक्ष मूल्यों और समाज के लोकतांत्रिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर रहे हैं। इनके विरुद्ध संघर्ष किया जाना है।
    शासक वर्गों द्वारा अनुचित नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के कारण चन्द लोगों के हाथ में धन-दौलत का जबर्दस्त केन्द्रीकरण हुआ है और अमीर और गरीब के बीच फासला बढ़ा है। इससे हमारे आम लोगों के बीच अभूतपूर्व गरीबी ओर कंगाली पैदा हुई है।
    पिछले दो दशकों के दौरान वामपंथी राजनीति और विचारधारा को काफी झटका लगा है। मैं राज्य विधान सभाओं और संसद में चुनावी विफलताओं के संबंध में बात नहीं कह रहा हूं। मैं समाज के दबे कुचले तबकों के बीच वामपंथ और कम्युनिस्ट पार्टियों के प्रभाव में क्षरण की बात कर रहा हूं। परन्तु गरीबों एवं शोषित तबकों के हिमायती के रूप में वामपंथ की छवि आज भी कमोबेश आम जनता के बीच बरकरार है। हमें इस छवि के आधार पर अपने ठोस आधारों को फिर से बनाना है।
    वामपंथ की दृष्टि एवं नीतियां सुस्पष्ट रहनी चाहिए। अनेक सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर वामपंथ की सुस्पष्ट समझ है। पर उन राज्यों में, जहां वामपंथ शासन कर रहा था और जहाँ सत्ता के दृश्यमान अहंकार और वामपंथ के नेतृत्व में सरकारों के कामकाज में पारदर्शिता के अभाव के कारण जनता के कुछ तबके वामपंथ से बेगाने हो गये, इन नीतियों पर अमल एक समस्या बन गया था। इससे कन्फ्यूजन पैदा हुआ और एक गलत छवि बनी कि वामपंथ और अन्य पूंजीवादी पार्टियों के बीच कोई बहुत फर्क नहीं है।
    वर्तमान ढांचे में राज्य सरकारें विस्तारित जिला परिषदों के अलावा और कुछ नहीं है। पूंजीवादी व्यवस्था और संविधान के अंतर्गत अपनी नीतियों पर अमल करने की बहुत कम गुंजाइश रहती है।
    औद्योगिकीकरण एक आवश्यकता है अतः वामपंथ शासित राज्यों को भूमि अधिग्रहण के काम को अन्य राज्यों से अलग तरीके से करना होगा। किसानों को जमीन के बदले जमीन के अलावा अधिक बड़े पैकेज और मुआवजे की पेशकश की जानी चाहिए और उन्हें अधिग्रहण की आवश्यकता के बारे में संतुष्ट किया जाना चाहिए। आदिवासियों एवं अल्पसंख्यकों के प्रति रवैया और अधिक उदार, मानवीय एवं तर्कसंगत रहना चाहिए। कम्युनिस्टों को नौकरशाही एवं नियमों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। जहां कहीं जरूरी हो नियमों को जनता के पक्ष में बदलना होगा। तब ही जाकर कम्युनिस्ट अन्य पार्टियों और सरकारों के लिए मॉडल बनेंगे।
    आत्म आलोचना की यह टिप्पणियां करने के बाद मैं कुछ ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दों को रेखांकित करने की कोशिश करूंगा जिनके संबंध में जनता को एक सुस्पष्ट दृष्टि पेश करने के लिए वामपंथ को अपना ध्यान केन्द्रित करना है। सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर और जनता को और अधिक विस्तार से समझाने की जरूरत है और नवउदारवाद के विनाशकारी रास्ते के एक विकल्प के रूप में एक सुस्पष्ट सामाजिक-आर्थिक कार्यक्रम तैयार करने की जरूरत है।
    अर्थव्यवस्था में हमें कारपोरेट घरानों और उनके लालच पर लगाम लगाने की जरूरत है। यह सबसे बड़ी चुनौती होगी। आज के दौर में वामपंथ को अंधाधुंध राष्ट्रीयकरण की मांग करने की जरूरत नहीं है। परन्तु निश्चय ही ऊर्जा, गैस, खान, खदानें और खनिज पदार्थ और ऐसे ही अन्य प्राकृतिक एवं राष्ट्रीय संसाधन सार्वजनिक क्षेत्र के पूरे नियंत्रण में रहने चाहिए।
    कारपोरेटों को दी गयी सभी सियायतों को वापस किया जाना चाहिए और टैक्सेशन की ग्रेडिड व्यवस्था लागू की जानी चाहिए। धन-दौलत के केन्द्रीयकरण की एक हद से आगे इजाजत नहीं दी जानी चाहिए।
    खाद्यान्नों और अन्य सभी आवश्यक वस्तुओं के वितरण के लिए सार्वभौम जन वितरण प्रणाली होनी चाहिए। सबसे अधिक और सबसे कम वेतन के बीच छह गुने से अधिक का फर्क नहीं होना चाहिए। न्यूनतम वेतन और पेंशन को जरूरत के अनुसार हर तीन साल बाद संशोधित किया जाना चाहिए। देश के लोगों के ठीक-ठाक रहन सहन के लिए मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छ पेयजल उपलब्ध किया जाना चाहिए। सार्थक भूमि सुधारों को लागू किया जाना चाहिए, उन पर सही अमल होना चाहिए।
    केन्द्र-राज्य संबंधों का पुनर्निरीक्षण होना चाहिए। कुछ क्षेत्रों में नये राज्यों और क्षेत्रीय स्वायत्तता के लिए जनता की आकांक्षाओं को स्वीकार करना चाहिए। सरकारिया कमीशन की सिफारिशों पर संसद में बहस की जानी चाहिए और उन पर अमल किया जाना चाहिए। केन्द्र के पास सत्ता का केन्द्रीकरण है और उसने अधिकार के नये क्षेत्रों में भी आर्थिक एवं राजनैतिक शक्तियां हासिल कर ली है, इन्हें वापस किया जाना चाहिए। सशस्त्र बल विशेष शक्ति कानून (अफस्पा), सीमा सुरक्षा बल और एनसीसीटी आदि को दी गई विस्तारित शक्तियों आदि को वापस किया जाना चाहिए।
    वित्त को राज्यों के बीच तर्कसंगत तरीके से बांटा जाना चाहिए ताकि वे केन्द्र के रहमोकरम पर ना रहें। एक मजबूत भ्रष्टाचार विरोधी कानून पारित किया जाना चाहिए और साथ ही सीबीआई और उस जैसी अन्य संस्थाएं स्वतंत्र रहनी चाहिए।
    लिंग, जाति और धार्मिक भेदभाव खत्म किया जाना चाहिए। योजना का लक्ष्य सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि नहीं बल्कि मानव विकास होना चाहिए।
    देश का संघात्मक ढांचे और समाज की धर्मनिरपेक्ष प्रकृति-जिसमें सभी को समान अधिकार मिले और खासतौर पर समाज के सबसे अधिक शोषित एवं दबे कुचले लोगों के अधिकारों की रक्षा की जाये-की जानी चाहिए ताकि भारत की अखंडता बनी रहे।
    दृष्टि साफ है पर इस पर अमल कैसे किया जाए, उसे हासिल कैसे किया जाये? वामपंथ को इन नीतियों का प्रचार करना है और इन मुद्दों पर जनता को लामबंद करना है। अपने संघर्षों के जरिये वामपंथ को जनता की चेतना को जगाना चाहिए, वह समाज के रूपांतरण का अंतिम लक्ष्य है।
    भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने पटना में अपनी पिछली कांग्रेस (21वीं कांग्रेस) में जमीन, आवास स्थल, स्वच्छ पेयजल, शिक्षा एवं स्वास्थ्य के अधिकार जैसे मुद्दों के साथ विशेष आर्थिक क्षेत्र, उद्योग, खान आदि के नाम पर किसानों से उसकी जमीन को जबरन छीेने जाने जैसे मुद्दों की पहचान की है।
    वामपंथ को नीचे संघर्षों को संगठित करना होगा और साथ ही सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों के निजीकरण, एफडीआई, बेरोजगारी, महंगाई जैसे मुद्दों पर राज्य एवं राष्ट्र स्तर पर भी संघर्ष छेड़ने होंगे। वामपंथ की टेªड यूनियनों, इंटक और भारतीय मजदूर संघ द्वारा मिलकर मजदूर वर्ग विभिन्न मुद्दों पर हाल में जो संघर्ष चलाये गये वह एक बड़ी छलांग है। इस संदर्भ में किसान, खेत मजदूर, महिला, युवा और छात्रों को भी ठोस एवं सुस्पष्ट सामाजिक आर्थिक मुद्दों पर संघर्ष छेड़ने के लिए अपने-अपने क्षेत्र में इस तरह के व्यापक मंच बनाने के लिए पहलकदमी करनी चाहिए।
    जनता को लम्बे अरसे तक चलने वाले संघर्षों के लिए तैयार किया जा सकता है। उड़ीसा में कोरिया की कम्पनी पोस्को के विरुद्ध संघर्ष जनता के इस तरह के दृढ़संकल्प का एक ज्वलंत उदारहण है। कोरिया की इस बहुराष्ट्रीय निगम के लिए विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने के लिए जनता से जमीन छीनने की कोशिश के विरुद्ध उड़ीसा के गरीब लोग कई सालों से लगातार संघर्ष कर रहे हैं। देश में कई संघर्ष चल रहे हैं, कुछ एक साथ मिलकर और कुछ स्वतंत्र रूप से। परमाणु प्लांट के विस्तार के विरुद्ध कुडमकुलम में एक वर्ष से चल रहा संघर्ष और परमाणु प्लाटं के ही विरुद्ध जैतापुर में चल रहा संघर्ष-ये ऐसे संघर्ष हैं जो बहुत लम्बे अरसे से चल रहे हैं और जो जापान में परमाणु बिजली घर में विभीषिका के बाद देश में इस खतरे के संबंध में सभी का ध्यान आकर्षित कर सके। अब इन संघर्षों का महत्व और भी बढ़ गया है। वन अधिकारों के मुद्दे पर विभिन्न राज्यों में आदिवासियों और किसानों के संघर्ष चल रहे है।। किसानों के सामने उर्वरक, बिजली ओर उनके उत्पादों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसे मुद्दे संघर्ष के लिए सामने हैं। दलित अपने आत्मसम्मान और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अल्पसंख्यक खासकर मुस्लिम राजनीतिक भावुकतावाद को छोड़ रहे हैं और वास्तविक सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं।
    जनता की बुनियादी समस्याओं पर सरकार की संवदेनशीलता से जनता में बहुत आक्रोश है। कभी-कभी जनता के संघर्ष स्वतःस्फूर्त फैलते चले जाते हैं तो कभी-कभी मारुति जैसे जुझारू आंदोलन भी हो जाते हैं। मारुति में ठेका मजदूरों को प्रबंधन द्वारा शोषण, प्रबंधन का ट्रेड यूनियन विरोधी रुख जैसे बातों ने मजदूरों को जुझारू होकर लड़ने के लिए मजबूर कर दिया। पुडुचेरी में रीजेंसी फैक्ट्री के मजदूरों का संघर्ष भी इसी तरह का था। प्रबंधक देश के कानूनों, खासकर श्रम कानूनों पर अमल करने को तैयार नहीं है। वे इन कानूनों को अपने पक्ष में बदलने की मांग कर रहे हैं। इस तरह के संघर्ष सरकार की नीतियों के विरुद्ध जनता के विभिन्न तबकों के आक्रोश एवं दृढ़ संकल्प को अभिव्यक्त करते हैं। वामपंथ को इन तमाम तबकों को लामबंद करने के लिए पहलकदमी करनी चाहिए और इस तरह का वातावरण उनके बीच बनाने के लिए उन्हें लामबंद करना चाहिए कि उनमें ये विश्वास पैदा हो कि वे सरकार की जनविरोधी नीतियों का विरोध कर सकते हैं और उन्हें उलट कर सकते हैं। इस किस्म के संघर्ष आम जनता के राजनीतिकरण की दिशा में ले जाते हैं।
    सरकार के ऊपर कारपोरेटरों और बहुराष्ट्रीय निगमों का दबाव बढ़ रहा है। सरकार सकल घरेलू उत्पादन वृद्धि दर में तेजी लाने के नाम पर उनकी मांगों को मानने के लिए तत्पर हैं। देश के कई राज्यों में सूखे की स्थिति है और इस हालत में भी कारपारेटों की लूट का हमला तेज हो रहा है। ऐसे में हमारे करोड़ों लोगों के लिए जीना दूभर हो जायेगा।
    मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा की साख भ्रष्टाचार के कारण खत्म हो गयी है और वह जनता के मुद्दों पर आंदोलन करने में नाकामयाब है। ऐसे में वह एक बार फिर हिन्दुत्व का पत्ता खेलने की कोशिश कर सकती है।
    जनता के आंदोलन एवं संघर्षों को सही राह देकर उन्हें कारगर बनाना होगा। ये संघर्ष वर्ग संघर्षों के लिए पथ प्रशस्त करेंगे। बहुत संभव है कि ऐसे आंदोलनों को कुचलने के लिए सरकार दमन का सहारा लेगी।
    वामपंथ में इस तरह के संघर्ष करने की क्षमता है या नहीं, यह एक बड़ा सवाल है। वामपंथ का देश भर में एक समान असर नहीं है। परन्तु मुद्दों के आधार पर कहीं छोटे कहीं बड़े स्तर पर आंदोलन करना सम्भव है। यह वामपंथ की एक ऐतिहासिक जिम्मेदारी है और यदि वामपंथ जनता के मुद्दों पर व्यापक, विशाल और जुझारू संघर्ष चलाने में कामयाब हो जाये तो अन्य धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक ताकतें भी उसमें शामिल होने को मजबूर हो जायेंगी।
    वामपंथ को कभी नहीं भूलना चाहिए कि उसका लक्ष्य समाज का आमूलचूल रूपांतरण करना है। उसे निरंतर वर्ग संघर्षों के जरिये ही हासिल किया जा सकता है। वह एक क्रांतिकारी कार्यदायित्व है। वामपंथ को इसे अपने हाथ में लेना है। यही चीज हमारी दृष्टि और जिस लक्ष्य को हासिल करना है उसे निर्धारित करती है।"
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