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शनिवार, 10 नवंबर 2012

दस दंगे केवल नौ महीने में

एक बार फिर उत्तर प्रदेश के हालात बहुत ही खतरनाक हैं। सपा सरकार को बने केवल नौ महीने हुये हैं और प्रदेश में दस साम्प्रदायिक वारदातें हो चुकी हैं। हर घटना में प्रशासन की लापरवाही ने सरकार की मंशा, कार्यप्रणाली और कार्यकुशलता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। चुनाव के वक्त ही यह आशंका जतायी जा रही थी कि समाजवादी पार्टी की सरकार बनते ही प्रदेश में दंगों और अपराधों की बाढ़ न आ जाये। लोगों ने सरकार तो बना दी परन्तु सरकार ने खुद की साख पर ही बट्टा लगा लिया है। मथुरा, बरेली, प्रतापगढ़, गाजियाबाद, इलाहाबाद, फैजाबाद, बाराबंकी जैसी जगहों पर आज भी तनाव बरकरार है। सरकारी सूत्रों का कहना है कि खुफिया तंत्र ने पहले ही आशंका जता दी थी कि प्रदेश बारूद के ढेर पर बैठा है और कहीं भी कोई भी बड़ी साम्प्रदायिक घटना घट सकती है। सरकारी सूत्रों का यह खुलासा तो सरकार और प्रशासन की मंशा पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगा देता है। सरकार और प्रशासन ने सुधरने के बजाय घटनाओं की शुरूआत में सुस्ती दिखा कर खुद पर ही सवालिया निशान लगा लिया।
सामान्य जनता समझ नहीं पा रही है कि अचानक प्रदेश में इस तरह दंगों की बाढ़ कैसे आ गयी। लोग अपने-अपने हिसाब से इसकी परिभाषा करने में जुटे हैं। मुख्यमंत्री ने फैजाबाद दंगों के बाद कहा कि ‘यह दंगे उनकी सरकार को बदनाम करवाने के लिये करवाये जा रहे हैं। इसके पीछे कुछ लोगों की साजिश है।’ अगर यह विरोधियों की साजिश है तो मुख्यमंत्री खुद कर क्या रहे हैं? फैजाबाद के दंगों के लगभग 14 दिन बाद प्रशासनिक अधिकारियों को हटाने का फैसला लिया गया है। दंगों के लिए इन प्रशासनिक अधिकारियों को उदारता दिखाते हुए अगर दोषी न भी माना जाये तो कम से कम जिस प्रकार घटनायें घटी थीं, उसमें समय पर कार्यवाही न करने का दोष तो कम से कम इन अधिकारियों द्वारा पर था ही। जिस प्रकार इन अधिकारियों ने अपराधिक सुस्ती दिखाई थी, उसी तरह की सुस्ती मुख्यमंत्री ने उन्हें हटाने का फैसला लेने में दिखाई। क्या मुख्यमंत्री जनता को यह बताने का साहस दिखायेंगे कि इसके पीछे किसकी साजिश थी? वैसे दंगों के पीछे किसी की साजिश थी तो फिर मुख्यमंत्री ने उस साजिश का नाकाम करने के लिए क्या किया, इसे भी जनता जानना चाहेगी। केवल साजिश का बहाना बनाने से सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती।
इन घटनाओं की हकीकत यह है कि मरने वालों में अधिसंख्यक मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं। सरकार बनाते ही मुसलमानों के कब्रिस्तानों की बाउंड्री बनवाने की घोषणा की गयी थी। इसके भी निहितार्थ अब तलाशे जाने लगे हैं।
ऐसा नहीं है कि ये हालात सिर्फ इसलिये पैदा हो रहे हैं कि अफसरों का इकबाल खत्म हो चुका है। कानून-व्यवस्था के लिए सरकार लम्बा समय नहीं मांग सकती। वास्तविकता यह है कि मुख्यमंत्री अथवा प्रधानमंत्री का तेवर देख कर ही अधिकारियों के काम करने का रवैया बदल जाता है और अगर तेवर दिखाने के लिए भी समय की जरूरत हो, तो इस पर आश्चर्य जरूर होता है।
2014 के लोकसभा चुनावों में वोटों के ध्रुवीकरण के लिए यहां के राजनैतिक दल अवसरवादी कदम उठा रहे हैं और उनके हाथों में खेल रही साम्प्रदायिक ताकतें कोई मौका छोड़ना नहीं चाहतीं। इन घटनाओं में जानमाल का नुकसान तो होता ही है पूरे सूबे का सौहार्द भी दांव पर लग जाता है।
वैसे प्रदेश में भाई-चारे के माहौल को तार-तार करने के प्रयास सफल नहीं होंगे। उत्तर प्रदेश की गंगा-जमुनी तहजीब बरकरार रही है और बरकरार रहेगी, इसे प्रदेश की जनता एक बार फिर साबित करेगी। ऐसे समय में धर्मनिरपेक्ष ताकतों और आम जनता की यह जिम्मेदारी बन जाती है कि वे सतर्क रहंे और भविष्य में वोटो के ध्रुवीकरण के लिए किए जाने वाले ऐसे किसी भी संकीर्ण और धृणित प्रयास को असफल कर ऐसी ताकतों को मुंहतोड़ जवाब दें।
- प्रदीप तिवारी

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