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मंगलवार, 11 अक्तूबर 2011

सीतापुर को मंडल बनाने की मांग के साथ भाकपा का जिला सम्मेलन सम्पन्न

सीतापुर 9 अक्टूबर। सीतापुर को मंडल बनाने की मांग करते हुए एक विस्तृत प्रस्ताव पारित करते हुए भाकपा का सीतापुर जिला सम्मेलन आज सम्पन्न हो गया। प्रस्ताव में कहा गया है कि सीतापुर और लखीमपुर बड़े जिले हैं तथा इन जिलों के सिदूर अंचलों से लखनऊ मंडल मुख्यालय पहुंचने के लिए 300 कि.मी. तक का सफर तय करना पड़ता है। प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि लखनऊ मंडल में शामिल होने के कारण सीतापुर और लखीमपुर जनपदों का विकास नहीं हो पा रहा है। सत्तर के दशक तक कानपुर के साथ केवल सीतापुर जिला उत्तर प्रदेश में पिछड़ा घोषित नहीं था परन्तु उसके बाद से सीतापुर और लखीमपुर का विकास पूरी तरह अवरूद्ध रहा है और सीतापुर को मंडल बनाने से इन जिलों का विकास संभव हो सकता है। प्रस्ताव में सीतापुर मंडल का मुख्यालय सीतापुर में बनाने की मांग की गयी है। प्रस्ताव में इस मुद्दे पर जनमत तैयार करने का भी फैसला किया गया। प्रस्ताव में भाकपा की लखीमपुर जिला कौंसिल से इस प्रस्ताव पर सहमति देने की अपील की गयी है। प्रस्ताव को वयोवृद्ध साथी जव्वार हुसेन ने पेश किया था जिसका समर्थन सभी प्रतिनिधियों ने किया।
सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए राज्य से आये पर्यवेक्षक प्रदीप तिवारी ने कहा कि आन्दोलन के अस्तित्व को बरकरार रखने और विचारधारा का झंडा थामे रहने का दौर अब खतम हो गया है। अरब एवं दक्षिण अफ्रीकी देशों के नागरिक विद्रोहों तथा दक्षिण अमरीकी महाद्वीप में वामपंथी सरकारों के गठन की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि हिन्दुस्तान में भी माहौल अब हमारे अनुकूल बन रहा है और जनता में वामपंथ की आकर्षण पैदा हो रहा है। उन्होंने कहा कि इन परिवर्तनों से उत्तर प्रदेश भी अछूता नहीं है। उन्होंने कहा कि अब आगे बढ़ने का वक्त है और नौजवानों तथा छात्रों को संगठित किये बगैर और उन्हें मार्क्सवाद की शिक्षा दिये बिना आगे नहीं बढ़ा जा सकता। वक्त का तकाजा है कि हम नई कम्युनिस्ट पौध लगाना शुरू कर आगे बढ़ने की प्रक्रिया को अब आगे बढ़ायें।
सीतापुर के भाकपा के इतिहास का उल्लेख करते हुए प्रदीप तिवारी ने कहा कि जिले में भाकपा की सदस्यता बहुत ज्यादा कभी नहीं रही परन्तु एक लम्बे दौर तक जिले के हर अंचल में पार्टी के सदस्य थे और पार्टी के जन संगठनों का आधार लम्बे दौर तक बीस हजार के आस-पास रहा। पार्टी जिला स्तर पर विरोध प्रदर्शनों में हजारों की संख्या में जन समुदाय को सड़कों पर उतारने तथा लखनऊ या दिल्ली ले जाने की सामर्थ्य रखती थी। उन्होंने कहा कि यहां की भाकपा की यह स्ट्राइकिंग पावर ही थी कि सन 1970 के किसान आन्दोलन में केन्द्रीय भूमिका यहां के साथियों को दी गयी थी और कामरेड एस.ए. डांगे ने लखनऊ में गिरफ्तार होने के बावजूद सीतापुर जेल अपना ट्रान्सफर करवा लिया था। राज्य पार्टी के लिए यह चिन्ता की बात है कि पार्टी संगठन अब एक इलाके में सिकुड़ कर रह गया है। ‘ऐसा क्यों हुआ?’ की मीमंासा में समय बर्बाद करने की जरूरत नहीं है और हमें अब अपने पुराने गौरव को हासिल करने पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने जनपद में नौजवान सभा और स्टूडेन्ट्स फेडरेशन को तुरन्त गठित करने की आवश्यकता रेखांकित करते हुए प्रतिनिधियों से अपील की कि वे आज इसी सम्मेलन में दो नौजवान साथियों को नौजवान सभा बनाने के कार्यभार के लिए नामांकित कर दें और कम से कम दो वर्ष तक उन्हें संगठन बनाने में हर तरह की सुविधा मुहैया करायें।
सम्मेलन में राजनीतिक एवं सांगठनिक रिपोर्ट जिला मंत्री शकील बेग ने पेश करते हुए कहा कि कुछ विशेष परिस्थितियों के कारण उत्तर प्रदेश में राज्य सम्मेलन और जिला सम्मेलन जल्दी करवाने पड़ गये हैं जिसके कारण पार्टी कांग्रेस के दस्तावेजों के प्रारूप अभी उपलब्ध नहीं हैं। हम अगली बैठकों पर उन दस्तावेजों पर भी चर्चा करेंगे। रिपोर्ट को सर्वसम्मति से पारित किया गया।
सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए वयोवृद्ध कम्युनिस्ट नेता जव्वार हुसेन ने वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों की चर्चा करते हुए राज्य से आये पर्यवेक्षक प्रदीप तिवारी को विश्वास दिलाया कि राज्य की अपेक्षाओं पर सीतापुर के साथी खरे उतरेंगे। 18 अक्टूबर को होने वाले वामपंथी दलों के राज्य-स्तरीय अनशन में भी अधिक से अधिक साथियों को भेजने की व्यवस्था की जायेगी।
जिला सम्मेलन की अध्यक्षता वयोवृद्ध कम्युनिस्ट नेता राम किशन मौर्या तथा हरबंस शुक्ला के अध्यक्षमंडल ने की। सम्मेलन ने शकील बेग को अगली अवधि के जिला मंत्री निर्वाचित किया तथा एक 11 सदस्यीय जिला कौंसिल का गठन किया गया। जिला कौंसिल में जिला मंत्री शकील बेग के अलावा जव्वार हुसेन, हरबंस कुमार शुक्ला, नाजिम अली, मोहम्मद कलीम, राम किशन मौर्य, जियाउल हसन खां, ईदरीस, दुर्जन, शिवपाल तथा श्री राम को शामिल किया गया। राज्य सम्मेलन के लिए जव्वार हुसेन को प्रतिनिधि चुना गया तथा दूसरे प्रतिनिधि के लिए निर्वाचित जिला कौंसिल को अधिकृत किया गया।
जिला सम्मेलन ने मोहम्मद जावेद खां तथा नाजिम अली को नौजवान सभा का कार्यभार देखने के लिए नामित किया। जिला सम्मेलन ने ”पार्टी जीवन“ के अधिक से अधिक ग्राहक बनाने का अभियान चलाने का भी फैसला किया।
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प्रगतिशील लेखक संघ का प्लेटिनम जयंती समारोह


नई चुनौतियों से निपटने के लिए नई रणनीति बनाने का संकल्प
प्रगतिशील लेखक संघ का प्लेटिनम जयंती समारोह
लखनऊ 9 अक्टूबर। नई चुनौतियों से निपटने के लिए नई रणनीति बनाने के संकल्प के साथ प्रगतिशील लेखक संघ का प्लेटिनम जयंती समारोह आज कैफी आज़मी एकेडमी में सम्पन्न हो गया। समारोह के प्रथम दिन का आयोजन नेहरू युवा केन्द्र में किया गया था और दूसरे दिन का आयोजन कैफी आजमी एकेडमी में किया गया। प्रथम दिन उद्घाटन सत्र के साथ ”प्रगतिशील लेखक आंदोलन के 75 वर्ष - परिप्रेक्ष्य और चुनौतियां“ विषय पर परिसंवाद आयोजित किया गया तो दूसरे दिन ”प्रगतिशील आंदोलन की विरासत - पक्षधरता के जोखिम“ विषय पर परिचर्चा के साथ समापन समारोह सम्पन्न हुआ।
गतिशीलता से काम नहीं चलने वाला है। हमें ऐसी गतिशीलता चाहिए जो समाज को आगे ले जाए। मनुष्यता को आगे ले जाए। हम अपनों से भी लड़ रहे हैं जो ज्यादा मुश्किल काम है। इसके बावजूद हम हैं और हमारा आंदोलन जिंदा है। यह उद्गार थे खगेन्द्र ठाकुर के जब वे नेहरू युवा केंद्र में अतीत की उपलब्धियों को रेखांकित करने के साथ ही भावी चुनौतियों और जिम्मेदारी के सन्दर्भ में बोल रहे थे।
प्रलेस के राष्ट्रीय महासचिव अली जावेद ने कहा कि मेहनकश अवाम के साथ लेखक के एकाकार होने की जरूरत है आज के साम्राज्यवादी चुनौतियों के दौर में संगठन की जिम्मेदारियां और बढ़ जाती हैं। शेखर जोशी ने कहा कि प्रगतिशील लेखक आंदोलन न होता तो हम लोग न होते। ‘परिप्रेक्ष्य और चुनौतियां’ विषय पर रीवां से आए युवा साहित्यकार डा. आशीष त्रिपाठी ने अगली पीढ़ी तैयार न होने का मुद्दा उठाकर चर्चा को गरमा दिया। डा. त्रिपाठी ने कहा कि युवा विचारक व लेखक नहीं दिखाई दे रहे हैं। अगली पीढ़ी तैयार करनी होगी। इसके लिए हमें फिर विश्वविद्यालय व दूसरे शैक्षिक संस्थानों की तरफ रुख करना होगा।
नाटककार राकेश ने कहा कि लेखन के केंद्र में अभी भी हाशिए का आदमी है। दलित व महिलाएं हैं। हमारे सामने लेखन में धार देने की चुनौती है। डा. रमेश दीक्षित ने कहा कि नए लोगों को जोड़ने के साथ-साथ प्रगतिशील लेखकों का व्यापक संयुक्त मोर्चा बनना चाहिए। अब नए साम्राज्यवाद का दौर है। समाज का एनजीओकरण हो गया है। जनतांत्रिक संगठनों को एक होकर बड़ा संघर्ष शुरू करने की जरूरत है। महाराष्ट्र के जाने माने लेखक श्रीपाद जोशी ने विचारधारा पर एक्शन प्लान की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि लोगों को हमसे आशा हमेशा बनी रही है लेकिन आज अपनी विरासत को लोगों तक पहुंचाने के माध्यम की चुनौती है। हमें संवाद के माध्यमों के बारे में विचार करना होगा। अवसर खोजने होंगे। लेखक डा. श्रीप्रकाश शुक्ल ने जनता की पक्षधरता का मुद्दा उठाते हुए साहित्य को जनता से जोड़ने की कोशिश करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि धर्म और पूंजी के रिश्ते बड़ी चुनौती हैं। डा. रघुवंश मणि, डा. सुखदेव सिंह, मोहन सिंह ने भी चर्चा में अपने विचार रखे।
समारोह की शुरुआत में विरोधाभासी टिप्पणियां कर चुके डा. नामवर सिंह ने समापन भाषण में उन्हें नसीहत दी। उन्होंने दो दिन की चर्चा के बाद एक नया घोषणापत्र तैयार करने पर बल दिया। नई चुनौतियों पर नए कार्यभार तय करने की जिम्मेदारी उन्होंने साथी साहित्यकारों को थमाई और कहा ‘ये कार्य अकेले नहीं किया जा सकता’। इसके लिए उन्होंने एक कमेटी के गठन की आवश्यकता रेखांकित की। उन्होंने कई भावी चुनौतियों के बारे में आगाह करते हुए उनसे लड़ने के लिए समान विचार वाले साहित्यकारों को एकजुट करने की जरूरत बताई। उन्होंने कई बड़ी चुनौतियों की बात करते हुए साहित्यकारों को उनसे आगाह भी किया। उन्होंने कहा कि नए वैश्विक अर्थ संकट के आने की आशंका है। जनवादी लेखक संघ (जलेस) और जन संस्कृति मंच (जसम) के साथ मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए।
समापन समारोह के पूर्व ‘प्रगतिशील आंदोलन की विरासत - पक्षधरता के जोखिम’ विषय पर लेखक एवं बीएसयू के रिटायर्ड प्रोफेसर चौथीराम यादव ने कहा कि प्रलेस को किसानों व मजदूरों के सहवर्ती आंदोलन से जोड़ना होगा। उनके प्रति प्रतिबद्धता लानी होगी। कबीर और प्रेमचंद की तरह जन पक्षधरता के जोखिम उठाने होंगे। उन्होंने कहा कि सोवियत यूनियन के विघटन को साहित्यकारों द्वारा माकर््सवादी समाजवाद के खात्में के बतौर लेना एक भ्रामक विश्लेषण था। उन्होंने कहा कि साहित्य को फिर से माकर््सवाद को एक विकल्प के बतौर प्रस्तुत करना होगा यही प्रगतिशील लेखक संघ की राजनीतिक जिम्मेदारी है। आलोचक वीरेंद्र यादव ने कहा कि लेखक ने अपने को वर्ण से मुक्त किया। तमाम विरोधों के बावजूद प्रलेस का आंदोलन बढ़ा है। प्रगतिशील लेखक संघ आधुनिक भारत का पहला ऐसा लेखक आंदोलन था जिसने साहित्य को राजनीति से जोड़ने का काम किया था। आज इस परम्परा को आगे बढ़ाने की जरुरत है। उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक काल में प्रलेस ब्रिटिश साम्रज्यवाद के साथ-साथ धार्मिक कठमुल्लावाद से भी लड़ा था आज इस आंदोलन को फिर से इस भूमिका में आना होगा।
लेखक आबिद सुहैल ने कहा कि हाशिये के आदमी का साहित्य हाशिये पर आ गया है। लेखन पर चिंतन करना होगा। लेखक एवं पत्रकार श्याम कश्यप ने कहा कि जोखिम उठाने का फैसला लेखक का निजी होता है। हम अपने हथियार को भूलने की कोशिश न करें। प्रो. रमेश दीक्षित ने कहा कि जोखिम तो अभी उठाया ही नहीं गया है। साहित्यकार अफसरपरस्ती छोड़ें। उन्होंने संघर्ष के साथियों के साथ काम करने की सलाह दी। उर्दू के जाने माने लेखक प्रो. अली अहमद फातमी ने सवाल किया कि आम आदमी के सरोकार क्यों गायब होते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि बाजारवाद हमें अपने सरोकारों से भटका रहा है।
लखनऊ दूरदर्शन के निदेशक शशांक ने कहा कि जीवनमूल्य क्षण में खत्म नहीं हो जाते। प्रगतिशील लेखन की विरासत को नई चीजों से जोड़ना होगा। परिवहन विभाग के रिटायर्ड प्रधान प्रबंधक एवं लेखक मूलचंद्र सोनकर ने यह सवाल उठाया कि दलितों के बारे में एक दलित लेखक ही बेहतर लिख सकता है। उन्होंने कहा कि हमारी विरासत का समावेश करने को प्रगतिशील साहित्यकार तैयार नहीं होते हैं। आज दलितों और पिछड़ों के सवालों को भी अपने विमर्श में रखना होगा। उन्होंने कहा कि सावित्री बाई फुले, रमाबाई को आप संज्ञान में नहीं लेंगे तो उनका गलत लोगों द्वारा इस्तेमाल आप नहीं रोक पाएंगे। दिल्ली से आए वरिष्ठ लेखक श्याम कश्यप ने कहा कि संगठन पर अपनी राजनीतिक जिम्मेदारियों का एहसास होना चाहिए जब तक संगठन का पार्टी के साथ संबन्ध रहा, आंदोलन अपनी भूमिका में ज्यादा कारगर साबित रहा।
सम्मेलन में पिछले दिनों लेखिका शीबा असलम फहमी पर हुए हमले की निंदा की गयी।
सम्मेलन को सम्बोधित करने वाले अन्य प्रमुख वक्ता थे - दीनू कश्यप, राजेन्द्र राजन, साबिर रुदौलबी, डा. गया सिंह, जय प्रकाश धूमकेतु, संजय श्रीवास्तव, रवीन्द्र वर्मा, केशव गोस्वामी, पंजाबी लेखक डा. सर्वजीत सिंह, गुरुनाम कंवर व खान सिंह वर्मा, आनन्द शुक्ला, नरेश कुमार, सुभाष चंद्र कुशवाहा, रवि शेखर, एकता सिंह, शाहनवाज आलम आदि शामिल रहे।
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