भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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Communist Party of India, U.P. State Council

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गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

CPI will expose Demonitization

लखनऊ- कुटिल राजनैतिक उद्देश्यों से, जल्दबाजी में और बिना पूरी तैयारी के तथा अपनों को पहले ही लीक कर दिये गये नोटबंदी को पचास दिन पूरे हो जाने के बाद भी वह जनता के लिये भारी संकट बना हुआ है और मोदी सरकार संकट के समाप्त होने और जनता के नोट्बंदी के कथित तौर पर पक्ष में होने के लगातार दाबे कर रही है. मोदी सरकार के इस ढकोसले को उजागर करने और आम जनता को नोटबंदी की पीडादायक मार से बचाने के लिये भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी पूरे देश में जन अभियान चलायेगी. भाकपा उत्तर प्रदेश के सचिव और पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य डा. गिरीश ने यहाँ जारी एक बयान में बताया कि हैदराबाद में गत दिन संपन्न भाकपा की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में लिये गये निर्णय के अनुसार यह अभियान 3 जनवरी से 10 जनवरी 2017 तक चलाया जायेगा. उत्तर प्रदेश में इस पूरे सप्ताह पदयात्रायें, सभायें और नुक्कड सभायें आयोजित की जायेंगी और 10 जनवरी को जिला व तहसील केंद्रों पर प्रदर्शन किये जायेंगे. काले धन को समाप्त करने, नकली नोटों को प्रचलन से बाहर करने, भ्रष्टाचार को रोके जाने तथा आतंकवाद और माओवाद की कमर तोडने के नाम पर मोदी सरकार के इस बचकाने कदम ने अभूतपूर्व आर्थिक संकट खडा कर दिया है जिसके परिणामस्वरुप आमजनों का जीना दूभर हो गया है. रु. 500 और 1,000 के नोटों को समस्या की जड बता कर बंद किया गया मगर उससे भी बडे रु. 2,000 के नोट ने तो अफरा- तफरी ही पैदा कर दी है. रोजमर्रा के जीवन में कठिनाइयां पैदा करने के अलावा तमाम आर्थिक गतिविधियां बाधित होने से, उद्योगबंदी, व्यापारबंदी, बेरोजगारी और पलायन जैसी समस्याये पैदा होगयी हैं. कृषि और कुटीर उद्योग बुरी तरह प्रभावित हुये हैं, इन सबका अर्थव्यवस्था पर दूरगामी प्रभाव पडेगा. आजादी के बाद देश ने इतने बडे संकट का सामना नहीं किया. यह आम चर्चा और आरोप हैं कि मोदी- शाह की जोट ने भाजपा और उसके समर्थक उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने को यह विनाशकारी कदम उठाया. भाजपा शासित राज्यों और निजी क्षेत्र की बैंकों को अधिक मात्रा में नई करेंसी आबंटित की गयी. छापों में बडी तादाद में मिल रहे 2,000 के नोटों के जखीरे इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं. मोदी सरकार द्वारा बदहवाशी में उठाये गये लगभग पांच दर्जन कदमों के बावजूद आमजनता को वह सब झेलना पडा है जो आवश्यक नहीं था, लगभग डेढ सौ लोग मौत के मुहं में समा गये तथा करोडों बीमारियों से जूझ रहे हैं. अब जनता के आक्रोश को शांत करने को मोदी सरकार पांच राज्यों के चुनावों से पहले कई लोक लुभावन घोषणायें करने की योजना बना रही है. भाकपा के इस अभियान में इसका पर्दाफाश किया जायेगा और पीडित जनता को बताया जायेगा कि जिस उद्देश्य से प्रधानमंत्री ने विमुद्रीकरण योजना की घोषणा की उससे न तो भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा, न जाली नोट चलन से बाहर हुये, न काले धन पर प्रभाव पडा और न आतंकवाद पर रोक लगी. बल्कि इससे नई समस्याये खडी होगयी हैं और देश का व्यापारी किसान मजदूर नौजवान सभी परेशान हैं. नकदी संकट से जूझ रही सरकार अब कैश लेस लेन देन को थोप रही है और चाइना सहित अन्य देशों की कंपनियों को लाभ पहुंचा रही है. भाकपा जनता को इस सबसे उबारने को दबाव बनायेगी. डा. गिरीश
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सोमवार, 28 नवंबर 2016

Akrosh Divas of LEFT in U.P.

लखनऊ- 28, नवंबर: भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव डा. गिरीश ने दाबा किया है कि नोटबंदी के खिलाफ आज वाम दलों द्वारा आयोजित आक्रोश दिवस उत्तर प्रदेश में अभूतपूर्व रहा. लगभग हर एक जिले में भाकपा और वामपंथी दलों के कार्यकर्ताओं ने सडकों पर उतर कर प्रदर्शन किये और अनेक जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पुतले जलाये. वे 500 और 1,000 के नोट 31 दिसंबर तक जारी रखने की मांग कर रहे थे ताकि आम जनता की परेशानियों को दूर किया जासके. साथ ही बैंकों पर लाइन में लगे जिन लोगों की मौतें हुयी हैं अथवा जो धन की कमी से बिना इलाज के मर गये हैं उनको रु. 10 लाख का मुआबजा देने की मांग कर रहे थे. काले धन पर सीधी कार्यवाही और धनपतियों पर बैंकों के बकायों को बसूले जाने की मांग कर रहे थे. भाकपा यह लगातार आवाज उठाती रही है कि मोदी सरकार ने यह नोटबंदी राजनैतिक लाभ उठाने की गरज से की है. जनता काले धन के खिलाफ है और वह काले धन को जब्त करने की आकांक्षा रखती है. सरकार के पास कई कानून और कई विभाग हैं जिनके जरिये वह काले धन पर चोट कर सकती थी. लेकिन काले धन के बलबूते चुनाव लड़ कर सत्ता में आयी मोदी सरकार ने काले धन के सरगनाओं के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की और निरीह जनता को एक एक पैसे के लिये मुहंताज कर दिया. मोदी सरकार की इस अविवेकी कार्यवाही से किसान, मजदूर और व्यापारी बुरी तरह से तबाह हुये हैं. उद्योगों में उत्पादन ठप है और देश एक आर्थिक मंदी की ओर बढ रहा है. नोटबंदी से ना तो आतंकवाद पर रोक लगी न नक्सल गतिविधियों पर. आतंकवादियों पर न केवल नये नोट पहुंच रहे हैं अपितु वे जेलों को तोड कर भाग रहे हैं. निरीह जनता बैंकों के बाहर लाइनों में लगी है. श्रीमती इंदिरा गांधी के द्वारा लगाये गये आपात्काल में जबरिया नसबंदी बड़े पैमाने पर हुयी थी. उसी के चलते उनकी चुनावों में करारी हार हुयी थी. आज दो दो हजार रु. के लिये लोग नसबंदी करा रहे हैं. ये नोट्बंदी और नसबंदी मोदी सरकार को ले डूबेंगे. डा. गिरीश ने कहा कि वामपंथी दलों और विपक्ष ने आक्रोश दिवस आयोजित करने का नारा दिया था, भारत बंद का नहीं. कई राज्यों में बंदी का नारा भी दिया गया. वहाँ वह पूरी तरह सफल भी रहा है. पर मोदी सरकार इसे भारतबंद प्रचारित करती रही. फिर भी जगह जगह व्यापारियों ने अपनी पहल पर बंदी रखी. ये मोदी सरकार के मुहं पर तमाचा है जो आज भी दाबा कर रही है कि नोट बंदी से पूरा देश खुश है और केवल काले धन वाले इसका विरोध कर रहे हैं. उन्होने दावा किया कि भाकपा पूरी तरह काले धन से दूर है. फिर भी वह जनहित में नोटबंदी का प्रबल विरोध कर रही है. पर भाजपा बताये कि उसकी 75 रथयात्रायें और करोड़ों खर्च करने वाली रैलियां कैसे निकल रही हैं. डा. गिरीश ने सपा बसपा पर भी सवाल उठाया कि वे आक्रोश दिवस पर सड़कों पर उतरने से क्यों कतराते रहे. वैसे इन दलों का हमेशा संसद में एक रुख रहता है तो सड़कों पर दूसरा रुख. भाकपा के इस विरोध प्रदर्शन में राज्य नेत्रत्व के साथियों ने अलग अलग स्थानों पर नेत्रत्व प्रदान किया. राज्य सचिव डा. गिरीश ने हाथरस में आंदोलन का नेत्रत्व किया तो सहसचिव द्वय अरविन्दराज स्वरुप और इम्तियाज अहमद ने क्रमश: कानपुर और मऊ में नेत्रत्व किया. मंत्रि परिषद सदस्य आशा मिश्रा ने लखनऊ, अतुल सिन्ह ने फैज़ाबाद तो अजय सिन्ह ने बुलंदशहर में आंदोलन की अगुवाई की. राज्य कार्यकारिणी व राज्य काउंसिल के अन्य साथियों ने अपने अपने जनपदों में भागीदारी की. डा. गिरीश, राज्य सचिव भाकपा, उत्तर प्रदेश
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Akrosh Divas in U.P.

लखनऊ- 28, नवंबर: भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव डा. गिरीश ने दाबा किया है कि नोटबंदी के खिलाफ आज वाम दलों द्वारा आयोजित आक्रोश दिवस उत्तर प्रदेश में अभूतपूर्व रहा. लगभग हर एक जिले में भाकपा और वामपंथी दलों के कार्यकर्ताओं ने सडकों पर उतर कर प्रदर्शन किये और अनेक जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पुतले जलाये. वे 500 और 1,000 के नोट 31 दिसंबर तक जारी रखने की मांग कर रहे थे ताकि आम जनता की परेशानियों को दूर किया जासके. साथ ही बैंकों पर लाइन में लगे जिन लोगों की मौतें हुयी हैं अथवा जो धन की कमी से बिना इलाज के मर गये हैं उनको रु. 10 लाख का मुआबजा देने की मांग कर रहे थे. काले धन पर सीधी कार्यवाही और धनपतियों पर बैंकों के बकायों को बसूले जाने की मांग कर रहे थे. भाकपा यह लगातार आवाज उठाती रही है कि मोदी सरकार ने यह नोटबंदी राजनैतिक लाभ उठाने की गरज से की है. जनता काले धन के खिलाफ है और वह काले धन को जब्त करने की आकांक्षा रखती है. सरकार के पास कई कानून और कई विभाग हैं जिनके जरिये वह काले धन पर चोट कर सकती थी. लेकिन काले धन के बलबूते चुनाव लड़ कर सत्ता में आयी मोदी सरकार ने काले धन के सरगनाओं के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की और निरीह जनता को एक एक पैसे के लिये मुहंताज कर दिया. मोदी सरकार की इस अविवेकी कार्यवाही से किसान, मजदूर और व्यापारी बुरी तरह से तबाह हुये हैं. उद्योगों में उत्पादन ठप है और देश एक आर्थिक मंदी की ओर बढ रहा है. नोटबंदी से ना तो आतंकवाद पर रोक लगी न नक्सल गतिविधियों पर. आतंकवादियों पर न केवल नये नोट पहुंच रहे हैं अपितु वे जेलों को तोड कर भाग रहे हैं. निरीह जनता बैंकों के बाहर लाइनों में लगी है. श्रीमती इंदिरा गांधी के द्वारा लगाये गये आपात्काल में जबरिया नसबंदी बड़े पैमाने पर हुयी थी. उसी के चलते उनकी चुनावों में करारी हार हुयी थी. आज दो दो हजार रु. के लिये लोग नसबंदी करा रहे हैं. ये नोट्बंदी और नसबंदी मोदी सरकार को ले डूबेंगे. डा. गिरीश ने कहा कि वामपंथी दलों और विपक्ष ने आक्रोश दिवस आयोजित करने का नारा दिया था, भारत बंद का नहीं. कई राज्यों में बंदी का नारा भी दिया गया. वहाँ वह पूरी तरह सफल भी रहा है. पर मोदी सरकार इसे भारतबंद प्रचारित करती रही. फिर भी जगह जगह व्यापारियों ने अपनी पहल पर बंदी रखी. ये मोदी सरकार के मुहं पर तमाचा है जो आज भी दाबा कर रही है कि नोट बंदी से पूरा देश खुश है और केवल काले धन वाले इसका विरोध कर रहे हैं. उन्होने दावा किया कि भाकपा पूरी तरह काले धन से दूर है. फिर भी वह जनहित में नोटबंदी का प्रबल विरोध कर रही है. पर भाजपा बताये कि उसकी 75 रथयात्रायें और करोड़ों खर्च करने वाली रैलियां कैसे निकल रही हैं. डा. गिरीश ने सपा बसपा पर भी सवाल उठाया कि वे आक्रोश दिवस पर सड़कों पर उतरने से क्यों कतराते रहे. वैसे इन दलों का हमेशा संसद में एक रुख रहता है तो सड़कों पर दूसरा रुख. भाकपा के इस विरोध प्रदर्शन में राज्य नेत्रत्व के साथियों ने अलग अलग स्थानों पर नेत्रत्व प्रदान किया. राज्य सचिव डा. गिरीश ने हाथरस में आंदोलन का नेत्रत्व किया तो सहसचिव द्वय अरविन्दराज स्वरुप और इम्तियाज अहमद ने क्रमश: कानपुर और मऊ में नेत्रत्व किया. मंत्रि परिषद सदस्य आशा मिश्रा ने लखनऊ, अतुल सिन्ह ने फैज़ाबाद तो अजय सिन्ह ने बुलंदशहर में आंदोलन की अगुवाई की. राज्य कार्यकारिणी व राज्य काउंसिल के अन्य साथियों ने अपने अपने जनपदों में भागीदारी की. डा. गिरीश, राज्य सचिव भाकपा, उत्तर प्रदेश
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बुधवार, 16 नवंबर 2016

Action on Black Money: View of CPI

वास्तविक काले धन वालों पर ठोस कार्यवाही करो: आम जनता को राहत दो- भाकपा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के केंद्रीय सचिव मंडल के वक्तव्य के परिप्रेक्ष्य में भाकपा के उत्तर प्रदेश राज्य सचिव मंडल ने निम्नलिखित बयान जारी किया है— लखनऊ- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी भ्रष्टाचार, काले धन और नकली मुद्रा के खिलाफ संघर्ष के अपने संकल्प को दोहराते हुये महसूस करती है कि श्री मोदी सरकार द्वारा अचानक बड़े नोटों को प्रचलन से बाहर कर देने के आदेश ने आम जनता खास कर खोमचे वालों, रोज कमा कर खाने वालों, वेतनभोगियों, खुदरा कारोबारियों, छोटे किसानों, खेत मजदूरों तथा दस्तकारों के सामने बड़ी कठिनाइयां खड़ी कर दी हैं. सरकार को विमुद्रीकरण की इस कार्यवाही पर तत्काल पुनर्विचार करना चाहिये. राजनैतिक उद्देश्यों से बिना तैयारी के की गयी इस कार्यवाही के बाद से आम लोगों की जेबें खाली हैं. अधिकतर को एटीम अथवा बैंकों से धन मिल नहीं पा रहा है अथवा बहुत कम मिल पारहा है. अतएव अर्थाभाव में बीमार दम तोड़ रहे हैं, तमाम लोग भूखों मर रहे हैं, लंबे समय तक लाइनों में खड़े लोगों की दिल के दौरे पडने से मौतें होरही हैं, अनेक आत्महत्या कर चुके हैं और असहाय लोग आपस में लड़ रहे हैं, पुलिस से लड़ रहे हैं, बैंकों पर तोड़ फोड़ कर रहे हैं अथवा बैंककर्मियों पर गुस्सा उतार रहे हैं. काम के भारी बोझ के चलते बैंक कर्मी बीमार पड़ रहे हैं और कई की मौत तक हो चुकी है. शादी विवाह वाले परिवारों को भारी कठिनाइयां आरही हैं. पर लोगों की समस्याओं का निदान करने के बजाय प्रधानमंत्री जनता को इमोशनली ब्लैकमैल कर रहे हैं. मुद्रा के अभाव में तमाम औद्योगिक व्यापारिक और कृषि संबंधी गतिविधियां ठप पड़ी हैं. उद्योगों में उत्पादन ठप है. निर्माण और विनिर्माण क्षेत्र ओंधे मुहं पड़ा है, ट्रान्सपोर्ट और परिवहन पंगु होचुका है और पर्यटन उद्योग जाम की स्थिति में है. किसान बुआई के लिये खाद बीज नहीं खरीद पारहे और उनके अनाज फल सब्जियां बिक नहीं पारहे. मनरेगा तक ठप पड़ी हैं. शहरी मजदूर पलायन कर रहे हैं और तमाम मजदूर उधार पर काम करने को मजबूर हैं. विकास और अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है. दो हजार के नोट के कारण भारी कठिनाइयां खड़ी होरही हैं क्योंकि इसको छुट्टा करने को छोटे नोट उपलब्ध नहीं है. अतएव 50, 100, 1000, के नोटों को ज्यादा प्रचलन में लाने की जरूरत है. दो हजार के नोट से तो काले धन को संरक्षित करने में और अधिक सुविधा होगी. जिस तरह का यह नोट छपा है उसका डुप्लीकेट भी आसानी से छापा जा सकता है. अतएव दो हजार के नोट को प्रचलन से वापस लेना चाहिये. यदि सरकार को कालेधन की समानांतर अर्थव्यवस्था को खत्म करने को वाकई संजीदा प्रयास करना था तो उसे सबसे पहले विदेशों में जमा 80 हजार करोड़ के उस धन को वापस लाना था जिसे लाने का ढिंढोरा भाजपा लोकसभा के चुनाव अभियान में पीटती रही. विक्की लीक्स द्वारा विदेशों में जमा धन और पनामा पेपर्स लीक के अनुसार विदेशों में निवेशकर्ताओं के खुलासे के आधार पर सरकार को ठोस कार्यवाही करनी चाहिये थी. नकली नोटों के करोबारी, हवाला वालों तथा काले धन के 7 करोड़ सरगनाओं पर कार्यवाही करने के बजाय सरकार ने 118 करोड़ निरीह जनता के खिलाफ युध्द छेड़ दिया. इसके अलावा सरकार को उन बड़े धन्ना सेठों के खिलाफ कार्यवाही करनी चाहिये जिन्होने बैंकों से लिये कर्ज को हड़प लिया और बैंकों ने उसे बट्टे खाते में डाल दिया. सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दी गयी जानकारी के अनुसार 87 व्यक्तियों जिन पर 500 करोड़ से अधिक बकाया है पर कुल 85 हजार करोड़ बकाया है. यदि इस सूची में 100 करोड़ तक के बकायेदारों को भी शामिल कर लिया जाये तो यह बकाया राशि एक लाख करोड़ से अधिक बैठेगी. इसके अलावा 100 करोड़ से कम वाले भी बहुत सारे हैं. सरकार को इन गैर उत्पादित परिसंपत्तियों ( एनपीए ) की बसूली के लिये शीघ्र ठोस कदम उठाने चाहिये तथा इन कर्जदारों की संपत्तियों को जब्त करना चाहिये. इस तरह की रिपोर्ट्स भी मिल रही हैं कि बहुत सारे लोगों, राजनैतिक दलों के नेताओं, भाजपा समर्थक उद्योगपतियों और भाजपा ने करोड़ों करोड़ रुपये पिछले महीनों में बैंकों में डाल दिया और काले धन को सुरक्षित व्यवसायों में निवेशित कर दिया क्योंकि उन्हें विमुद्रीकरण की इस कार्यवाही के बारे में पता था. सभी पूंजीवादी दलों की धड़ल्ले से चल रही गतिविधियां इसका जीता जागता प्रमाण हैं. सबसे आगे भाजपा है जिसकी 75 रथयात्रायें उत्तर प्रदेश/ उत्तराखंड में चल रही हैं और मोदी – शाह की बेहद खर्चीली रैलियां आयोजित की जारही हैं. बैंकों को ऐसे जमाकर्ताओं की सूची जारी करनी चाहिये. भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने पार्टी की समस्त शाखाओं एवं कार्यकर्ताओं से अपील की है कि वे काले धन से संबंधित मांगों, विदेशों में जमा धन और निवेशित धन तथा एनपीए की बसूली तथा दो हजार के नोट को वापस लेने व 50, 100, 500 और एक हजार के नोट को ज्यादा से ज्यादा प्रचलन में लाने की मांग को लेकर केंद्रीय सरकार के कार्यालयों, खासकर आयकर कार्यालयों और बैंकों के समक्ष मार्च, धरने और प्रदर्शन करें. जनता और बैंक कर्मियों की राहत के लिये ठोस कदम उठाने की मांग भी केंद्र सरकार से की जानी चाहिये. भाकपा कार्यकर्ताओं को कठिनाइयां झेल रहे लोगों की भी हर संभव मदद आगे बढ कर करनी चाहिये. डा. गिरीश
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शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

आंगनबाड़ियों के संघर्ष को लाल सलाम

लखनऊ- 23, सितंबर 16, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने उत्तर प्रदेश में आंगनबाड़ी कार्यकर्त्रियों की दयनीय दशा पर खेद जताते हुये उनकी न्यायोचित मांगों को पूरा करने की मांग राज्य सरकार से की है. भाकपा ने आंगनबाड़ियों के संघर्ष के प्रति पूर्ण एकजुटता प्रकट की है. यहाँ जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि बच्चों को कुपोषण से बचाने जैसे महत्वपूर्ण काम को अंजाम देने वाली आंगनबाड़ियों को मनरेगा मजदूरों से भी कम वेतन मिलता है. रु. 3200 व 1600 प्रति माह वेतन से तो वे अपने कपड़े धुलवा कर प्रेस नहीं करा सकतीं. अनेकों अन्य तरीकों से उनका शोषण होता है सो अलग. 2012 में सत्ता में आने के बाद अखिलेश सरकार ने उनकी कई मांगों को पूरा करने का आश्वासन दिया था मगर वह आज तक अधर में लटके हुये हैं. केंद्र सरकार तो उन्हें कर्मचारी मानने को ही तैयार नहीं है. अतएव वे निरंतर संघर्षरत हैं. भाकपा उनके संघर्ष को लाल सलाम पेश करती है और केंद्र तथा राज्य सरकार से मांग करती है कि उनकी मांगों को तत्काल पूरा करे. डा. गिरीश
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गुरुवार, 8 सितंबर 2016

रेल किराये में वृध्दि की भाकपा ने आलोचना की.

लखनऊ- 8 सितंबर, 2016 – भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने रेल मंत्रालय द्वारा कुछ ट्रेनों के किराये को बुकिंग के आधार पर बढाते चले जाने के कदम को जनविरोधी बताते हुये उसकी कड़े शब्दों में आलोचना की है. यहां जारी एक प्रेस बयान में पार्टी के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि गत 27 महीनों में केंद्र सरकार ने कई बार रेल और माल भाडे में बढोत्तरी की है, आरक्षण रद्द कराने में भारी कटौती लागू कर दी है, सफाई के नाम पर अतिरिक्त कर लगाया है तथा प्लेटफार्म टिकिट रु. 10/- का कर दिया है और अब शताब्दी और राजधानी जैसी ट्रेनों के आरक्षण बढते जाने पर किराया दर बढाते जाने की व्यवस्था लागू की है. मजे की बात यह है कि यह व्यवस्था इन ट्रेनों की सर्वोच्च श्रेणियों में लागू नहीं की गयी जिनमें कि धनबान लोग यात्रा करते हैं. डा. गिरीश ने कहा कि सरकार रेल यात्रा को निरंतर महंगी बना कर आम आदमी के लिये कठिनाइयां खडी कर रही है और महंगाई की मार झेल रही जनता के ऊपर और भी भार बढा रही है. भाकपा की उत्तर प्रदेश इकाई इन बढोत्तरियों को तत्काल रद्द करने की मांग करती है. डा. गिरीश
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बुधवार, 24 अगस्त 2016

भाकपा ने बाढ़ की तबाही पर गहरी चिंता जताई: सरकारों से की फौरी कदम उठाने की मांग

लखनऊ- 24 अगस्त 16, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान आदि में बाढ़ की भीषण तबाही से धन और जन हानि पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुये केंद्र और राज्य सरकारों से लोगों की जान बचाने और तबाही से निपटने को ठोस कदम उठाने की मांग की है. यहाँ जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लगभग 25 जिले आज भयंकर बाढ़ की त्रासदी का सामना कर रहे हैं. केंद्र और राज्य सरकार के प्रयास खतरे और तबाही के मुकाबले काफी कम दिखाई देरहे हैं. अधिकतर राहत और बचाव का काम साधन रहित चंद कर्मचारियों व अधिकारियों के हवाले है. अतएव जनता को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है. यही हाल पड़ौसी राज्यों बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान का है. भाकपा ने कहाकि केंद्र की और राज्यों की सरकारों ने बाढ़ की बिभीषिका से निपटने को यदि समग्र नीति अपनाई होती तो तबाही काफी कम होती. गंगा में जहाज चलाने से ज्यादा उसकी सिल्ट निकाले जाने के काम को प्राथमिकता दी जानी चाहिये थी. अब जरूरत है कि फौरी कदम तेजी से उठाये जायें और आधुनिक साधनों से लैस बचाव दलों को तबाही क्षेत्रों में भेजा जाये. भाकपा राज्य सचिव मंडल ने प्रभावित इलाकों और उसके इर्द गिर्द की अपनी शाखाओं को निर्देश दिया कि वे पीढ़ित जनता की मदद करें, और शासन प्रशासन के समक्ष जनता की समस्याओं को पेश करें. डा. गिरीश ने बताया कि उन समेत भाकपा का एक राज्य स्तरीय प्रतिनिधिमंडल चार दिन की पूर्वी उत्तर प्रदेश की यात्रा पर कल रबाना होरहा है. डा.गिरीश
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पूंजीवाद की गिरफ्त में खेती, किसान और गांव: संकट के कारण और निवारण

देश के किसान आज गहरे संकट से गुजर रहे हैं. गत दो वर्षों में देश के साठ फीसदी किसान सूखे की चपेट में थे, तो आज वे भीषण बाढ की तबाही को झेल रहे हैं. आपदा प्रबंधन हो या राहत आबंटन, सरकारी फायलों में अधिक जमीन पर कम दिखाई देते हैं. पिछले 25 सालों से जारी आर्थिक उदारीकरण की नीतियों ने उनकी माली हालत को खोखला बना कर रख दिया है. आत्महत्या और पलायन उनकी नियति बन गये हैं. खेती और किसान की यह नियति ही आज गांव की नियति भी बन गयी है. केन्द्र और राज्यों में सरकारें बदलती रहीं, लेकिन किसान और कृषि उनकी चिंता के केन्द्र में कभी नहीं रहा. अपने चुनाव अभियान में भाजपा और श्री मोदी ने उनकी उपज पर 50 प्रतिशत लाभ बढा कर दिलाने का वायदा किया था. पर लाभ तो दूर उसे खेती में लगायी हुयी लागत भी पलट कर नहीं मिल रही. हालत यह है कि देश के किसानों की औसत आय घट कर 6426 रुपये रह गयी है. जबकि कृषक परिवारों का औसत बकाया कर्ज 47,000 रुपये होगया है. आय की दर घटी है और कर्ज का औसत बढा है. श्री मोदी जी ने जब वाराणसी से लोक सभा का चुनाव लडने का फैसला लिया था तो गंगा यमुना के दोआब वाले प्रदेश उत्तर प्रदेश के किसानों में एक आशा की किरण जागी थी. उन्हें लगा था कि अब उनके संकट के दिन बीते जमाने की बात होने जा रहे हैं. लेकिन आज उनकी औसत आय घट कर 4923 रुपये रह गयी है. यानी नीचे से चौथे पायदान पर. उत्तर प्रदेश की सरकार भी अखबार और टी. वी. चैनलों पर विज्ञापनों के द्वारा ही किसान हित साधती नजर आरही है. सालों पहले हुयी ओलावृष्टि की याद उसे तब आयी जब चुनाव सिर पर हैं. यदि अनुपूरक बजट में की गयी राहत राशि का आबंटन पहले कर दिया होता तो शायद कई किसान आत्महत्या न किये होते. आज भी जो व्यवस्था की गई है वह ऊंट के मुहं में जीरे के समान है. केंद्र और राज्य सरकारें कितने भी दाबे करें पर यह सच्चाई है कि चीनी मिलों पर किसानों का सैकड़ों करोड़ रुपया बकाया है. पडौस में जब लाभ की नींव पड़ती दिखती है तो पडोसी भी लाभ की उम्मीद लगाता है. पर उम्मीदों के प्रदेश के पडोसी राज्य बिहार के किसानों की औसत आय सबसे नीचे के पायदान पर पहुंच कर 3558 रुपये रह गयी है. वर्तमान में वहां आयी बाढ से उनकी हालत और भी खराब होने जारही है. औसत आय के ग्राफ पर बंगाल नीचे से दूसरे और उत्तराखंड तीसरे पायदान पर है. राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय की इस रिपोर्ट ने सरकारों द्वारा किये जारहे दाबों की कलई खोल कर रख दी है. एक नई कृषि नीति और नई कृषि प्रणाली पर चर्चा शुरू करने की जरूरत आन पडी है. आज खेती का सबसे बढा संकट यह है कि वह हर तरह से पूंजीवाद की जकड में है. आत्मनिर्भर गांव और खेती का हमारा परंपरागत ढांचा पूरी तरह ढह चुका है. आधुनिक खेती के सारे उपादान- खाद, बीज, बिजली, डीजल, उपकरण और कीटनाशक किसानों को भारी कीमत देकर खरीदने होते हैं. लेकिन अपने उद्पादों को वह लागत और लाभ की गणना करके निकाले गये मूल्य पर नहीं बेच सकता. अपने उद्पादों को बेचने के लिये उसे पूंजीवादी संस्थानों की शरण में जाना पढता है, जहाँ कीमतें किसान अथवा किसान संगठन नहीं बाज़ार तय करता है. किसानों के हित में किसान संगठनों ने जिस न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रणाली( MSP) को लागू कराया था पूंजीवादी सरकारों ने उसे भी किसानों की उपज की कीमतों को सीमित करने का माध्यम बना दिया है. यह अक्सर ही होता है कि जब अनाज, सब्जी या फलों की फसल पैदा होती है तो इनकी कीमतें नीचे ला दी जाती हैं और जब किसान अपना उत्पादन बेच चुका होता है तो ये कीमतें बढने लगती हैं. किसान की माली हालत ऐसी नहीं होती कि वो अपने उत्पादों को कीमतें चढने तक रोक सके. उसकी इस हालत का पूरा लाभ वे तत्व उठाते हैं जो उत्पादन प्रक्रिया के अंग नहीं हैं और अपने पैसे के बल पर किसानों की मेहनत को लूट कर मालामाल होरहे हैं. परिवार के विभाजन के साथ साथ कृषि भूमि का विभाजन लगातार होरहा है. अधिकतर किसान आज या तो हाशिये के किसान बन गये हैं या फिर वे लगभग भूमिहीनता की स्थिति में पहुंच गये हैं. इस स्थिति ने एक नये किसान समूह को जन्म दिया है जो इन हाशिये के किसानों की जमीनों को खरीद कर बडा जोतदार बन गया है. सीलिंग कानून के निष्प्रभावी बना दिये जाने के चलते पहले से भी कई बडे जोतदार मौजूद हैं. ये सभी संसाधनों से लैस हैं. बैंक और सरकारों की सुविधाओं का लाभ भी अधिकतर ये लोग ही उठाते हैं. हाशिये के किसानों की जमीन को किराये या बटाई पर लेकर कैश क्रोप पैदा करते हैं. कार्पोरेट कृषि का प्रारंभ यहीं से होता है. उन्नत उपकरणों के चलते इन बड़े किसानों की उपजों का लागत मूल्य कम आता है. वे अपनी पैदावारों को स्टोर करने या कोल्ड स्टोरेज में रखने में सक्षम हैं और उन्हें तभी बेचते हैं जब बाज़ार में कीमतें बढ जाती हैं. इनमें से अधिकतर नेता, अधिकारी, उद्योगपति अथवा दूसरे माफिया समूह हैं. ये शहर अथवा कस्बों में रह कर खेती का संचालन करते हैं. इस तरह की खेती ने ग्रामीण रोजगार की दर को न्यूनतम स्तर पर पहुंचा दिया है. गांवों से रोजगार के लिये पलायन तो बढा ही है, नवोदित उन्नत किसानों के गांव में न रहने से वहाँ की कृषि की कमाई शहरों में व्यय होरही है और गांव कंगाल होरहे हैं. इस स्थिति का प्रमुख कारण यह है कि छोटी जोत वाला किसान न तो ट्रेक्टर खरीद पाता है न ट्यूवबेल लगा सकता है. बैल पालना भी अब भारी महंगा होगया है. जुताई सिंचाई और ओसाई आदि उसे ज्यादा किराया देकर बडे किसानों के उपकरणों से करानी होती है. अतएव उसकी लागत बड़ जाती है. लागत के सापेक्ष वह निरंतर घाटे में जा रहा है और महाजनों और बैंकों के कर्ज के जाल में फंसता जा रहा है. यही कर्ज अनेकों की जान पर भारी पड रहा है. किसानों के जो युवक पढ़ लिख कर अच्छे रोजगार में चले जाते हैं वे पहले अपने हिस्से की जमीनें किराये पर उठा कर धन को शहरों में ले जाते हैं और बाद में जमीन को बेच कर रकम को भी शहरों में ले जाते हैं. गांव की कंगाली और बदहाली में उनका बढा योगदान है. खेती नहीं तो भूमि नहीं का फार्मूला हमारे यहाँ लागू नहीं है. औसत किसान की बदहाली का सीधा असर खेतिहर मजदूरों और ग्रामीण दस्तकारों पर पड़ रहा है. वे आर्थिक मार तो झेल ही रहे हैं, दबंगों के हमलों को भी उन्हें झेलना होता है. गांव में न अच्छे स्कूल हैं न अच्छे अस्पताल. खराब सडकें, बदहाल संपर्क मार्ग, पंगु बनी यातायात व्यवस्था और बिजली की नाममात्र की मौजूदगी किसानों कामगारों के लिये अभिशाप बने हुये हैं. कुटीर और छोटे धंधे टिक नहीं पा रहे हैं. किसानों और अन्य ग्रामीण तबकों की इस स्थिति में बदलाव तभी संभव है जब केंद्र और राज्य सरकार की नीतियां हाशिये के किसान को केंद्र में रख कर बनाई जायें. पर जाति धर्म के नाम पर वोट हथिया कर पूंजीवाद की गोद में जा बैठने वाली सरकारों से यह उम्मीद लगाना व्यर्थ है. यह तभी संभव है जब किसान और ग्रामीण मतदाता ऐसी पार्टियों को मौका दें जो किसानों, ग्रामीण मजदूर और दस्तकारों के हित में काम करती हैं और जो जाति, धर्म, भ्रष्टाचार और मौकापरस्ती से कोसों दूर हैं. कम्युनिस्ट पार्टियां और अन्य वामपंथी समूह ही इस योग्यता को पूरा करते हैं, सत्ता के खेल में रनर- बिनर बनी पार्टियां नहीं. ये कम्युनिस्ट पार्टियां ही हैं जिनके पास किसानों और खेती की कायापलट का ठोस कार्यक्रम है. वे सीलिंग लागू करने, जमीनों के वितरण और भूमि सुधार, कृषि उपादानों को कम कीमत पर दिलाने, उत्पादन और भंडारण के लिये ब्याजमुक्त ऋण दिलाने, प्राकृतिक आपदाओं से बचाव और उसकी त्वरित भरपाई किये जाने, कृषि भूमि का कम से कम अधिग्रहण और उसके बदले भूमि, रोजगार और उचित मुआबजा दिलाने, सचल विपणन केंद्र बनाने, ग्रामों में शिक्षा, स्वास्थ्य, आवागमन की सुविधा और रोजगार के अवसर बढाने और सभी को कानूनी सरंक्षण प्रदान करने को प्रतिबध्द हैं. जाति और सांप्रदायिक विद्वेष खेत्ती किसान और गांव की प्रगति में बाधक हैं. कम्युनिस्ट पार्टियां और वामपंथी शक्तियां उसको समूल उखाड फेंकने को प्रतिबध्द हैं. किसानों का संकट राजनीतिजन्य है तो इसका निदान भी राजनीतिक ही होगा. वामपंथी किसान संगठनों को भी नये संकटों और नयी परिस्थितियों का आकलन कर नये तरीकों से किसानों को संगठित करना होगा. ट्रेड यूनियन मार्का नारेबाजी और पूंजीवादी दलों के पिट्ठू किसान संगठनों द्वारा उछाले गये सबका साथ सबका विकास जैसे छलावों से किसानों का कोई हित होने वाला नहीं. भ्रष्टाचार से मुक्त और सरकार द्वारा सरंक्षित सामूहिक खेत्ती भी हाशिये के किसानों को संकट से निकाल सकती है, अतएव इस दिशा में भी काम किया जाना चहिये. डा. गिरीश
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बुधवार, 17 अगस्त 2016

महंगाई, एफडीआई, दलितों अल्पसंख्यकों के उत्पीड़्न के खिलाफ भाकपा ने प्रदेश भर में प्रदर्शन कर ज्ञापन दिये

लखनऊ- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद के आह्वान और राज्य कमेटी के निर्देश पर आज समूचे उत्तर प्रदेश के अधिकतर जनपदों में जहां भाकपा की जिला कमेटियां कार्यरत हैं, धरने और प्रदर्शनों का आयोजन किया गया. कई जिलों में तो भारी वारिश होरही थी फिर भी कार्यक्रमों का आयोजन किया गया. केंद्र सरकार की नीतियों के चलते जनता पर पड़ रही महंगाई की मार, रक्षा सहित तमाम क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश(एफडीआई) को बढावा देने, युवाओं को रोजगार देने के वायदे से मुकरने, शिक्षा को व्यापार बना कर आम और गरीब लोगों की पहुंच से बाहर कर देने, देश भर में और उत्तर प्रदेश में दलितों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं पर होरहे नृशंस हमलों, राशन की दुकानों पर वस्तुओं के निर्धारित मूल्यों से अधिक दाम बसूलने, कम माल देने, सभी पात्रों को राशन कार्ड न देने तथा फसल बीमा कंपनियों द्वारा किसानों के साथ की जारही धोखाधड़ी आदि सवालों पर आंदोलन किया गया. सूखा ग्रस्त जिलों में सूखा राहत दिलाने, गन्ना उत्पादक किसानों के मिलों पर बकायों का शीघ्र भुगतान कराने और स्थानीय सवालों को भी ज्ञापनों में शामिल किया गया. सभी जगह सभायें की गयीं तथा महामहिम राष्ट्रपति और राज्यपाल को संबोधित ज्ञापन जिलाधिकारियों को सौंपे गये. भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने बताया कि प्रेस नोट जारी करने तक जिलों जिलों से आंदोलन की खबरें लगातार राज्य केंद्र को प्राप्त होरही हैं. लखनऊ में पार्टी कार्यालय से हज़रत गंज स्थित डा. अंबेडकर प्रतिमा तक जुलूस निकाला गया और वहां आम सभा की गयी. मैनपुरी में भारी वारिश के बावजूद प्रभावशाली प्रदर्शन किया गया. गाज़ियाबाद में जिलाधिकारी कार्यालय पर धरना दिया गया. कानपुर देहात में मूसलाधार वारिश के बावजूद माती स्थित जिलाधिकारी कार्यालय पर प्रदर्शन किया गया. बरेली में कलक्ट्रेट पर विशाल धरना दिया गया. इसी तरह गाज़ीपुर में अपर जिलाधिकारी कार्यालय पर विशाल धरना हुआ तो इलाहाबाद में जिलाधिकारी कार्यालय पर धरना प्रदर्शन किया गया. मुरादाबाद में कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन हुआ तो जालौन जिले के उरई स्थित मुख्यालय पर भारी वारिश के मध्य विशाल और शानदार प्रदर्शन किया गया. हाथरस में जिलाधिकारी कार्यालय पर धरना दिया गया. मथुरा में जिलाधिकारी कार्यालय पर प्रदर्शन किया गया. आज़मगढ में कलेक्ट्रेट एरिया में प्रदर्शन किया गया. फैज़ाबाद में गुलाब बाड़ी से विकास भवन तक जुलूस निकाला गया. मऊ में शहर से कलेक्ट्रेट तक प्रदर्शन किया गया तो कानपुर में राम आस्ररे पार्क में धरना और सभा हुयी. बुलंदशहर, आगरा, मेरठ, अमरोहा, शाहजहांपुर, सीतापुर, सहारनपुर, बिजनौर, गोंडा, बलरामपुर, कुशी नगर, देवरिया, गोरखपुर, बलिया, बनारस, भदोही, फतेहपुर, सोनभद्र, कौशांबी, बांदा, चित्रकूट, झांसी, औरय्या, बदायूं, पीलीभीत, हरदोई, आदि जनपदों से कार्यक्रम संपन्न होने की सूचना मिल चुकी है. डा. गिरीश
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मंगलवार, 16 अगस्त 2016

स्वतंत्रता दिवस मोदी जी और मैं

कल लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी के भाषण पर मीडिया में खूब सराहना उंडेली गयी है. क्यों न उंडेली जाय. आखिर मीडिया भी तो उनका है जिनके श्री मोदी जी हैं. कार्पोरेट्स और धन कुबेरों के. लेकिन श्री मोदीजी ने यह नहीं बताया कि कश्मीर में शांति बहाली के लिये उनकी सरकार क्या कदम उठाने जा रही है. सरकार कश्मीर में तनाव खत्म करने, लोगों का विश्वास जीतने और सामान्य स्थिति बहाल करने के लिये क्या कर रही है? न हीं उन्होने कश्मीर में भाजपा की सहभागी मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के इस आरोप का जबाव दिया कि कश्मीर में पूर्व का और आज का राष्ट्रीय नेत्रत्व विफल रहा है. मोदी जी! आपने पाक अधिकृत कश्मीर, बलूचिस्तान और गिलगिट पर जुमले फेंक खूब वाह वाही बटोरी है. पर क्या इसका यह कारण नहीं कि कश्मीर और पाकिस्तान के संबंध में आपकी विफल नीति और कथित गोरक्षकों पर आपकी टिप्पणी से बौखलाये संघियों को आप पुन: प्रशन्न करना चाहते थे. और वे प्रशन्न हो भी गये हैं. मोदी जी, आपसे बेहतर कौन जानता है कि फिल्म शोले गब्बर की वजह से देखी जाती है, तीन सुपर स्टारों और एक सुपर हीरोइन की वजह से नहीं. मोदी जी, जब आप लाल किले की प्राचीर से दहाड़ रहे थे, आपके ही राज्य गुजरात के ऊना में दलितों पर आग्नेयास्त्रों से नृशंस हमले हो रहे थे. आपके मात्र संगठन द्वारा बोयी गयी विष बेल का रस पान कर मदमत्त लोग दलितों और अल्पसंख्यकों पर अमानुषिक हमलों का सिलसिला लगातार चलाये हुये हैं लेकिन आपने अपने संबोधन में उनके लिये एक भी शब्द नहीं बोला. पीड़ितों को अन्याय से छुटकारा कैसे मिलेगा, आप मौन ही रहे. ‘मौनं स्वीकृति लक्षणम’ यह शास्त्रों में विहित है, कोई मार्क्सवादी अवस्थापना नहीं. आपने ठीक कहा मोदी जी कि आपकी सरकार अपेक्षाओं की सरकार है, पर यह नहीं बताया कि गत 27 महीनों में आपने कौनसी अपेक्षाओं को पूरा कर दिया. कोई एक भी की हो तो बताइये जरूर. आपने मुद्रास्फीति 6 फीसदी के भीतर रखने का कीर्तिमान बनाने का दाबा किया है, पर हमें तो दाल रु.- 200 प्रति किलो मिल रही है उसका जिम्मेदार कौन? बेरोजगारों को हर वर्ष दो करोड़ रोजगार और किसानों को पचास फीसदी लाभ देने का क्या हुआ मोदी जी. गन्ना किसानों को सौ फीसद भुगतान दिलाने और हाथरस के ग्राम‌- फतेला में बिजली दौड़ाने के आपके दाबों की सच्चाई तो आपने अपने परमप्रिय मीडिया पर देख ही ली होगी. और भी कुछ लिखना चाहता था. पर आपके स्वच्छता अभियान का शिकार हुआ बैठा हूँ. लखनऊ में थोडी सी वारिश होगयी है, और हमारे 22, केसरबाग स्थित कार्यालय में हर रोज की तरह जल प्लावन होगया है. मेज के पायदान पर पैर रख कर टिप टिप कर रहा हूँ. बिजली भी नहीं है, लेपटाप के स्क्रीन की रोशनी का सहारा मिला हुआ है. बिजली की रोशनी के लिये तो मान लेता हूँ कि अखिलेश बाबू जिम्मेदार हैं. पर यह जलप्लावन तो आपके ही चहेतों की देन है. लखनऊ के मेयर तो सौ प्रतिशत आपके हैं पर आपके स्वच्छता हो या कोई और अभियान. आपके ही लोग पलीता लगा रहे हैं. इससे पहले कि बैटरी भी जबाव देजाय- भवं भवानी, सहितं नमामि, डा. गिरीश, राज्य सचिव भाकपा , उत्तर प्रदेश
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ऊना में दलितों पर हमले बंद करो, हमले के दोषियों को कड़ी सजा दो: भाकपा

लखनऊ- 16, अगस्त 2016. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने कल गुजरात के ऊना में दलितों और अल्पसंख्यकों की संयुक्त रैली में उमडी भारी भीड़ से बौखलाये सामंती और संघी सोच वाले तत्वों द्वारा दलितों पर किये गये जानलेवा हमलों की कठोर शब्दों में निंदा की है. भाकपा ने गुजरात और समूचे देश में अपने भयावह उत्पीड़न के खिलाफ और आर्थिक और सामाजिक आज़ादी पाने के लिये संघर्षरत दलितों, अल्पसंख्यकों, आदिवासियों, महिलाओं और अन्य कमजोर तबकों के आंदोलनों के प्रति पूर्ण एकजुटता प्रदर्शित की है. यहां जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि गुजरात और देश के दूसरे भागों में गौहत्या और अन्य बहानों से दलितों और अल्पसंख्यकों पर होरहे निर्मम हमलों के खिलाफ गुजरात के अहमदाबाद से यात्रा निकाली गयी थी जिसका कल स्वतंत्रता दिवस पर ऊना में समापन होना था. इस रैली में भाग लेने को दलितों के भीतर भारी आक्रोशजनित उत्साह था. अल्पसंख्यकों की इसमें शिरकत की खबरों से यह उत्साह और भी बढ गया था. इससे पहले से ही हमलाबर सामंती और संघी तत्व पूरी तरह बौखला गये. रैली में आने से पूर्व दलितों को गांव गांव में न केवल धमकाया गया अपितु कई जगह तो उन्हें गांवों से बाहर निकलने तक नहीं दिया गया. पुलिस और सामंती तत्व मिल कर उन्हें रैली की ओर जाने वाले रास्तों पर रोक रहे थे. पूरा ऊना शहर छावनी बना दिया गया था ताकि दहशत के मारे दलित रैली में शामिल न हों. लेकिन फिर भी रैली में जब भारी भीड़ जुट गयी तो इन्हीं तत्वों ने रैली से लौट रहे दलितों पर गोलियां बरसाईं और उनके वाहनों में आग लगा दी. सैकडों की तादाद में दलित जख्मी हुये हैं और सरकारी तथा गैर सरकारी अस्पतालों में इलाज करा रहे हैं. आज भी गांवों में दलितों पर हमले होने की खबर है. इतना ही नहीं इस रैली में भाग लेने पहुंचे जेएनयू स्टूडेंट यूनियन के अध्यक्ष कन्हैया कुमार और दलित नेताओं की अहमदाबाद में होने वाली प्रेस कांफ्रेंस को सरकार ने रद्द करा दिया जबकि उसकी पहले से अनुमति थी. यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर शर्मनाक हमला है. डा. गिरीश ने कहा कि यह सब उस समय होरहा है जब कल ही राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दोनों ने दलितों पर अनाचार को लेकर कठोर टिप्पणियां की हैं और कडी कार्यवाही किये जाने पर बल दिया है. इससे श्री मोदी के गुजरात माडल और संघ के कथित हिंदू राष्ट्र का मुखौटा उतर गया है. सवाल उठता है कि ये कठोर कार्यवाही कब होगी. भाकपा का स्पष्ट मत है कि गुजरात सरकार से पीड़ितों को न्याय की उम्मीद नहीं की जा सकती. अतएव इस समूचे प्रकरण की जांच सर्वोच्च न्यायालय के सेवारत न्यायधीश से कराई जानी चाहिये. डा. गिरीश
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शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

दल बदल के खेल के जरिये मुद्दोंं से किनाराकशी में जुटी हैं उत्तर प्रदेश में प्रमुख पार्टियांं- भाकपा

लखनऊ-12 अगस, 2016, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने प्रदेश में सत्ता की दौड में शामिल प्रमुख दलों पर आरोप लगाया है कि वे आगामी विधान सभा चुनाव को जनता के सवालों से भटकाने और मतदाता को एक बटन दबाने वाले रोबोट की हैसियत में पहुंचाने की कवायद में जुटे हैं. दल- बदल और पाला बदल कराने की ताजा कोशिशें इसी उद्देश्य से प्रेरित है. भाकपा इस पर कडी नजर बनाये हुये है और पूंजीवादी, सांप्रदायिक और जातिवादी दलों की इस करतूत को जनता के बीच ले जायेगी और प्रदेश के आगामी चुनाव जनता के बुनियादी सवालों पर लडे जायें इसके लिये हर संभव प्रयास करेगी. भाकपा के राज्य सचिव मंडल ने एक बैठक कर प्रदेश के मौजूदा हालातों का संज्ञान लिया. पार्टी के प्रदेश सचिव डा. गिरीश की अध्यक्षता में संपन्न इस बैठक में शामिल सचिवमंडल के सदस्यों में इस सवाल पर एकमत था कि गत ढाई दशक से अधिक समय से प्रदेश में सपा, बसपा जैसे क्षेत्रीय दलों और सांप्रदायिक भाजपा का शासन रहा है, और इस बीच प्रदेश का अपेक्षित विकास नहीं हुआ है. प्रदेश की जनता गहरे सामाजिक आर्थिक संकटों से गुजर रही है और इन दलों से उसका मोहभंग हुआ है. यही वजह है कि किसी दल को आगामी विधान सभा चुनावों में जीत का भरोसा नहीं है. अतएव इन दलों में कई किस्म के अंतर्विरोध पैदा होगये हैं और उनमें भगदड मची है. पिछले कुछ दिनो में उत्तर प्रदेश में कई विधायकों, पूर्व मंत्रियों और पूर्व विधायकों ने जिस तरह से पाला बदल किया है इसका जनहित, राजनैतिक विचारधारा और सिध्दांतों से कोई लेना देना नहीं है अपितु यह अवसरवादी राजनीति की पराकाष्ठा है और हर कोई सुरक्षित घर की तलाश में है. विधान सभा चुनावों से छह माह पहले ही चल पडे इस घृणित खेल ने दल बदल कानून को भी प्रभावहीन बना डाला है. इस आवाजाही के आने वाले दिनों में और गति पकडने की प्रबल संभावनायें हैं. जनता खुली आंखों से देख रही है कि इस खेल में अपने को ‘औरों से अलग’ पार्टी बताने वाली भाजपा सबसे आगे है. केंद्र की उसकी सरकार की नीतियों और कारगुजारियों का पूरी तरह भंडाफोड होजाने और उसके नेताओं में भी मची भगदड के चलते उसने सारी मर्यादायें ताक पर रख दी हैं और केंद्र की सता का लाभ उठा कर उसने दल बदल को ही मुख्य औजार बना लिया है. अरुणांचल और उत्तराखंड में न्यायालय के हस्तक्षेप के चलते अपने मंसूबों को पूरा करने में विफल रही भाजपा अब उत्तर प्रदेश मे सत्ता हथियाने को बडे पैमाने पर दल बदल का खेल खेल रही है. खराब कानून व्यवस्था और सत्ता विरोधी रुझान से हतप्रभ सपा भरपाई करने को किसी को भी पार्टी में लाने को उतारु है. उसने कई ऐसे लोगों को शामिल किया है जो सीधे आर.एस.एस. से जुडे हैं और जिन पर दंगा फसाद कराने के संगीन आरोप लगे हैं. बहुजन समाज के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव के सपनों से खिलवाड करते हुये सत्ता के लिये पूरी तरह सामंतवाद और पूंजीवाद के सामने घुटने टेक देने की बसपा की नीति अब पूरी तरह उजागर हो चुकी है और वह सर्वाधिक भगदड का शिकार बनी हुयी है. इससे उबरने को बसपा भी दल बदल के काम में जुटी है. इस सबके जरिये प्रदेश के राजनैतिक परिदृश्य से जनता के मुद्दों को पूरी तरह से पृष्ठभूमि में धकेला जारहा है. भाकपा ने जनता के मुद्दों पर जन लामबंदी पर गहनता से विचार किया और तात्कालिक और दूरगामी कदमों पर चर्चा की. डा. गिरीश ने बताया है कि आगामी 17 अगस्त को महंगाई, एफडीआई, बेरोजगारी, महंगी और दोहरी शिक्षा प्रणाली, सूखा और बाढ की तबाही, दलितॉ, महिलाओं और अल्पसंख्यकों पर होरहे हमलों जैसे प्रमुख सवालों पर जिला केंद्रों पर प्रदर्शन आयोजित किये जायेंगे. सांप्रदायिकता के खिलाफ तथा उपर्युक्त सवालों पर प्रदेश के छह वामपंथी दलों के साथ मिल कर कई क्षेत्रीय सम्मेलन आयोजित किये जायेंगे. वाराणसी में 28 अगस्त, मुरादाबाद में 4 सितंबर तथा मथुरा में 10 सितंबर को संयुक्त सम्मेलन होंगे. प्रदेश के आगामी विधान सभा चुनावों को जनता के ज्वलंत सवालों के इर्द-गिर्द रखने की हर संभव कोशिश की जायेगी, भाकपा राज्य सचिव मंडल ने संकल्प व्यक्त किया है. डा. गिरीश
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सोमवार, 1 अगस्त 2016

महंगाई और एफडीआई; दुराचार और गुंडाराज के खिलाफ भाकपा का प्रदेश भर में आंदोलन 17 अगस्त को

लखनऊ- 1 अगस्त 2016, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की उत्तर प्रदेश राज्य काउंसिल की दो दिवसीय बैठक यहां का. फूलचंद यादव की अध्यक्षता में संपन्न हुयी. बैठक में देश और उत्तर प्रदेश की राजनैतिक स्थिति पर रिपोर्ट राज्य सचिव डा. गिरीश और पार्टी द्वारा गत माहों में किये गये क्रियाकलापों और संगठन संबंधी रिपोर्ट सहसचिव का. अरविंदराज स्वरुप ने प्रस्तुत की. रिपोर्ट्स पर गहन चर्चा हुयी और उन्हें सर्वसम्मति से पारित किया गया. चर्चा में दो दर्जन साथियों ने भाग लिया. सहसचिव का. इम्तियाज़ अहमद पूर्व विधायक ने दिवंगत साथियों के लिये शोक प्रस्ताव रखा. बैठक में भाकपा के केंद्रीय सचिव मंडल के सदस्य का. अतुल कुमार सिंह अंजान भी दोनों दिन उपस्थित रहे. बैठक में उत्तर प्रदेश की जनता को हलकान कर रहे सवालों पर पार्टी द्वारा लगातार कई आंदोलन चलाने के निर्णय लिये गये. साथ ही आगामी विधान सभा चुनावों की तैयारियों को रफ्तार देने पर भी चर्चा की गयी. पार्टी की गतिविधियों को विस्तार देने हेतु आम जनता से फंड एकत्रित करने का निर्णय लिया गया तथा सांगठनिक कमजोरियों को दुरुस्त करने की योजना बनाई गयी. वामपंथी दलों के साथ चल रही संयुक्त कार्यवाहियों को और अधिक सुगठित तरीके से चलाने पर भी चर्चा हुयी. बैठक के फैसलों की जानकारी देते हुये भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि केंद्र सरकार की कारपोरेटपरस्त और आमजन विरोधी नीतियों के स्वरुप महंगाई ने अभूतपूर्व छलांग लगायी है. हालात यह हैं कि गरीब ही नहीं मध्यम वर्ग भी जरुरी चीजों की महंगाई से तिलामिला उठा है. मुद्रास्फीति बढी है. स्वदेशी की बात करने वाले संघ और भाजपा की सरकार ने संवेदनशील रक्षा क्षेत्र से लेकर फार्मास्यूटिकल्स तक 9 क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश(एफडीआई) को इजाजत दी है जिससे देश के उद्योग, व्यापार, खेती और चिकित्सा क्षेत्र को भारी हानि होने का रास्ता खुल गया है. बेरोजगारी बढेगी और देश की पूंजी का बढा भाग विदेशों को चला जायेगा. उन्होने कहाकि उत्तर प्रदेश सूखा से हलकान था ही अब पंगु होचुकी कानून व्यवस्था ने लोगों को स्तब्ध कर दिया है. गोवध का बहाना लेकर दलितों और अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जारहा है. उनको मारा पीटा जा रहा है, उनकी हत्यायें की जारही हैं और उन्हें उनके रोजगारों से बाहर धकेला जारहा है. मैनपुरी जनपद के सैफई जो प्रदेश के सत्ताधारी परिवार का विचरण क्षेत्र है, दलित दंपत्ति को कुल्हाडी से काट कर मार डाला. महिलाओं की आबरु और जान न घर में सुरक्षित है न घर के बाहर. बुलंदशहर में नेशनल हाईवे पर मां बेटी के साथ हुयी बदसलूकी की घटना ने सभी को अंदर तक हिला दिया है. भाजपा और संघ परिवार द्वारा बोये जहर और राज्य सरकार से मिली शह के चलते अल्पसंख्यकों को हर तरीके से आतंकित किया जा रहा है और प्रदेश में हर रोज कम से कम दर्जन भर सांप्रदायिक मुठभेडें हो रही हैं. श्री राम मनोहर लोहिया जी का चौखंभा राज का सपना उनके अनुयाइयों ने दंगाराज, गुंडाराज, दुष्कर्मराज और दरोगाराज के रुप में पूरा कर दिया है. किसानों को सूखे से हुयी हानि का मुआबजा और फसलों की बाजिव कीमत नहीं दी जारही है. बेरोजगारों को रोजगार नहीं और छात्रों को शिक्षा से वंचित किया जा रहा है. राशन विक्रेता दो रुपये किलो के सामान को ढाई रुपये किलो और तीन रुपये किलो के सामान को साढे तीन रुपये किलो की दर से सरे आम बेच रहे हैं. प्रति यूनिट 5 किलो राशन देने के बजाय सभी को केवल 20 किलो राशन ही दिया जा रहा है. साधन संपन्नों के राशन कार्ड बना दिये गय्रे हैं. आपूर्ति विभाग की मिली भगत से यह सब होरहा है. प्रशासन की मिली भगत से बीमा कंपनियां किसानों को चीट कर रही हैं. अतएव राज्य काउंसिल ने कमरतोड महंगाई, मुद्रास्फीति, एफडीआई, बेरोजगारी, महंगी शिक्षा, दलितों महिलाओं अल्पसंख्यकों पर अत्याचार, राशन और बीमा में भ्रष्टाचार के खिलाफ पूरे प्रदेश में 17 अगस्त को जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन करने का निर्णय लिया है. इससे पूर्व 9 अगस्त से 14 अगस्त के बीच गांव और शहरों में पदयात्रायें और साईकिल मार्च आयोजित कर जनजाग्रति अभियान चलाया जायेगा. भाकपा ने उपर्युक्त सवालों पर और सांप्रदायिकता के खिलाफ वामपंथी दलों द्वारा आयोजित किये जारहे संयुक्त क्षेत्रीय सम्मेलनों को सफल बनाने का संकल्प लिया. ये सम्मेलन 21 अगस्त को मुरादाबाद में, 28 अगस्त को वाराणसी में तथा 10 सितंबर को मथुरा में आयोजित किये जायेंगे. लखनऊ, मुजफ्फर नगर और फैज़ाबाद में पहले ही ऐसे सम्मेलन होचुके हैं. वाम अभियान को सुदृड बनाने को प्रदेश के वामपंथी दलों की एक बैठक 3 अगस्त को लखनऊ में आयोजित करने का निश्चय भी किया गया है. अपने सभी अभियानों को चलाने हेतु भाकपा 1 सितंबर से 10 सितंबर तक जनता से आर्थिक सहयोग मांगने को सडकों पर उतरेगी. भाकपा ने उत्तर प्रदेश के भावी चुनावी परिदृश्य की समीक्षा की और इस परिदृश्य में भाकपा और वामपंथ की प्रासंगिकता तथा जनहित में आगामी विधान सभा में भाकपा और वामपंथ के प्रवेश को जरूरी मानते हुये चुनावी तैयारियों की रुपरेखा तैयार की. इस उद्देश्य से जिला काउंसिलों की बैठकें अगस्त माह में की जायेंगी और चयनित विधान सभा क्षेत्रों में कार्यकर्ता बैठकें तथा आमसभा आयोजित की जायेंगी. जनता से अपील की जायेगी कि वह जाति धर्म की चहारदीवारी से बाहर आकर जनता के मुद्दों पर राजनीति करने वाली भाकपा और वामपंथ को अपनी प्राथमिकता बनायें. पार्टी काउंसिल ने अगस्त और सितंबर माहों में शाखाओं के सम्मेलन आयोजित करने का निर्देश जिला इकाइयों को दिया है. डा. गिरीश
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शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

दलित उत्पीड़न के खिलाफ आंदोलन करेगी भा क पा

लखनऊ 29 जुलाई। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने उत्तर प्रदेश में दलितों के उत्पीड़न की वारदातों पर गहरा रोष जताया है। भाकपा ने इन घटनाओं की निंदा करते हुये राज्य सरकार से कठोर कदम उठाने की मांग की है। कल जनपद मैनपुरी में एक दलित दंपति की मात्र रु. 15 उधारी न चुका पाने के कारण कुल्हाड़ी से काट कर की गई हत्या, जनपद फतेहपुर में बेगार करने से मना करने पर दबंगों द्वारा खंभे से बांध कर की गई पिटाई जैसी प्रदेश भर से आ रही दलित उत्पीड़न की खबरों पर गंभीर चिन्ता जताते हुए भाकपा के राज्य सचिव मंडल ने राज्य सरकार से दोषियों पर कड़ी कार्यवाही की मांग करते हुए मृतक आश्रितों को 10 लाख का मुआवजा देने और इस तरह की घटनाओं पर पुलिस प्रशासन की जिम्मेदारी तय करके उन्हें दंडित करने की भी मांग की है। भाकपा राज्य सचिव मंडल ने नोटिस लिया है कि प्रदेश में दलितों ही नहीं अल्पसंख्यकों, महिलाओं और अन्य कमजोर तबकों पर अत्याचारों की वारदातें थमने का नाम नहीं ले रही हैं। इन सवालों पर विचार कर आंदोलन की रणनीति बनाने को भाकपा की राज्य कार्यकारिणी और काउंसिल की बैठकें दिनांक 30 एवं 31 जुलाई को राज्य कार्यालय पर बुलाई गयीं हैं।
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मंगलवार, 26 जुलाई 2016

गौरक्षा के नाम पर पशु व्यापारियों को प्रताडित करने वालों के खिलाफ कडी कार्यवाही करे राज्य सरकार: भाकपा

लखनऊ- 26 जुलाई 20016, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने उत्तर प्रदेश में गौरक्षा के नाम पर होरहे पशु व्यापारियों के भारी उत्पीडन और उनके आर्थिक शोषण की कडे से कडे शब्दों में निंदा की है. पार्टी ने राज्य सरकार से मांग की है कि वह पशु व्यापारियों की सुरक्षा करे और गौरक्षा के नाम पर लूट मचाने वाले असामाजिक तत्वों के खिलाफ कडी से कडी कार्यवाही करे. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा है कि समूचे उत्तर प्रदेश में ऐसे अनेक गिरोह काम कर रहे हैं जो स्थानीय पुलिस के साथ साठ- गांठ करके पशु व्यापारियों के पशु लदे वाहनों को जबरिया रोक लेते हैं और उन्हें मार पीट कर, डरा धमका कर, और पुलिस कार्यवाही का भय दिखा कर उनसे धन की उगाही करते हैं. व्यापारियों के द्वारा मना करने पर उनके पशु धन को छीनने से लेकर उन्हें मार-पीट कर जख्मी कर देने की वारदातें आये दिन की बात होगयी है. प्रदेश में यह सारा गोरखधंधा गोरक्षा के नाम पर चल रहा है. वाहनों मे कोई भी पशु ले जाया जारहा हो, भगवा ध्वजधारी और भगवा ब्रिगेड द्वारा संरक्षित ये गिरोह उन्हें वध के लिये लेजायी जारही गाय के नाम पर रोक लेते हैं और फिर उनसे मनमानी वसूली करते हैं. चूंकि ये व्यापारी अधिकतर अल्पसंख्यक समुदाय के होते हैं अत: इन कथित गौरक्षकों को स्थानीय जनता का समर्थन भी मिल जाता है. और व्यापारी क्योंकि परदेशी होते हैं, कम तादाद में होते हैं, अतएव स्थानीय गुंडों और पुलिस के दबाव में आजाते हैं. मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में डा. गिरीश ने बताया है कि कल ही जनपद मथुरा के कोसीकलां की पेंठ (स्थानीय पशु बाज़ार) से भेंस के पड्डे लेकर अलीगढ जारहे व्यापारियों को इन माफियाओं ने रोक लिया और पैसे न देने पर उनमें से कई को बुरी तरह जख्मी कर दिया. पुलिस तब पहुंची जब गुंडे अपना काम निपटा के चले गये. ऐसी घटनायें प्रदेश में हर रोज हर क्षेत्र में घटित होरही हैं लेकिन अपने गंतव्य तक पहुंचने की जल्दी में प्रताडित और भयभीत व्यापारी कोई कार्यवाही भी नहीं कर पाते. डा. गिरीश ने प्रश्न किये हैं कि अल्पसंख्यक व्यापारियों द्वारा ले जाया जारहा क्या हर पशु गाय है? उत्तर प्रदेश में गोवध पर पाबंदी है या गायों के लाने लेजाने पर? यदि गाय भी ले जायी जारही है तो कथित गोरक्षकों को उन्हें रोकने अथवा वसूली करने का कानूनी अधिकार किसने दिया है? अथवा पैसे वसूलने के बाद वही पशु लेजाने वाला वैध कैसे होजाता है? ये सवाल हैं जिसका जबाव सरकार को देना है. मुख्यमंत्री को लिखे गये पत्र में भाकपा राज्य सचिव मंडल ने कहा है कि यूं तो उत्तर प्रदेश में यह गोरखधंधा दशकों से चल रहा है लेकिन गुजरात में हुयी दलितों की पिटाई से पैदा हुये हालात के बाद यह बेहद जरूरी होगया है कि इस नाजायज कारगुजारी पर प्रदेश में फौरन रोक लगे. वरना यहां भी यह कृत्य कोई भी बडी वारदात का कारण बन सकता है. अतएव भाकपा आपसे मांग करती है कि इसकी जांच और शीघ्र समुचित कार्यवाही के लिये ग्रह मंत्रालय के अधीन एक विशेष जांच दल गठित करें और पशु व्यापारियों को न्याय दिलायें. यदि इससे भी कोई बडी कार्यवाही संभव हो तो भाकपा उसका स्वागत करेगी. डा. गिरीश
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गुरुवार, 21 जुलाई 2016

दलित उत्पीडन के खिलाफ उत्तर प्रदेश में भाकपा उतरी सडकों पर

लखनऊ/ हाथरस- 21 जुलाई 2016— गुजरात और देश के अन्य भागों में दलितों के प्रति बढ रही हिंसा, शाब्दिक हिंसा और भाजपा के एक प्रादेशिक नेता द्वारा सुश्री मायावती के बारे में की गयी बेहद घिनौनी टिप्पणी के विरुध्द उत्तर प्रदेश में आज भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं ने कई जनपदों में विरोध प्रदर्शन किये. हाथरस में भी आज भाकपा के कार्यकर्ताओं ने जलेसर बस अड्डे से जुलूस निकाला और चामड गेट चौराहे पर पहुंच कर प्रधान मंत्री श्री मोदी, गुजरात की मुख्यमंत्री और भाजपा नेताओं के पुतले फूंके. प्रदर्शनकारी नारे लगा रहे थे- भाजपाइयो शर्म करो, दलितों का दमन बंद करो; दलितों महिलाओं का अपमान नहीं सहेगा हिंदुस्तान; दलितों की हिंसा और शाब्दिक हिंसा के दोषियों को जेल भेजो, भाजपा के वाचाल नेताओं को लगाम दो; दयाशंकर सिंह को गिरफ्तार करो तथा भाजपा मोदी होश में आओ दलित शक्ति से ना टकराओ आदि. चामड गेट चौराहे पर उपस्थित जनसमुदाय को संबोधित करते हुये भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि केंद्र और कई राज्यों की सत्ता पर काबिज होने के बाद भाजपाइयों और संघियों का गुरूर सातवें आसमान पर है और गुजरात सहित समूचे देश में वे दलितों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं, आदिवासियों और समाज के अन्य कमजोर तबकों के विरुध्द हिंसा और घृणा का अभियान चलाये हुये हैं. भाजपा नेत्रत्व और प्रधानमंत्री से उन्हें शह मिली हुयी है. कल भाजपा के प्रांतीय उपाध्यक्ष द्वारा सुश्री मायावती के खिलाफ की गयी अभद्र टिप्पणी दलितों, महिलाओं और समाज के वंचित वर्गों के प्रति भाजपा/ आरएसएस की दूषित मानसिकता और कुत्सित नीति का प्रतीक है. वह वही सब कुछ कर रहे हैं जो कुछ उन्हें संघ की शाखाओं में सिखाया पढाया गया है. ऐसा कर वे दमन और लूट की पर्याय सामंतवादी और पूंजीवादी व्यवस्था को बनाये रखना चाहते हैं. भाकपा इस सब की कठोर शब्दों में भर्त्सना करती है. वह घृणित बयान देने वाले नेता की अविलंब गिरफ्तारी और देश भर में दलितों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं और अन्य कमजोर तबकों के खिलाफ चल रही हिंसा की कार्यवाहियों को रोके जाने की मांग करती है. डा. गिरीश ने बताया कि भाकपा के ये विरोध प्रदर्शन लगातार जारी रहेंगे. जिन जिलों में आज प्रदर्शन नहीं होसके वे कल अथवा आगे प्रदर्शनों का आयोजन करेंगे. उन्होने सहयोगी संगठनों से भी इस अभियान को सहयोग की अपील की. भाकपा की राज्य कमेटी के आह्वान पर किये गये इस विरोध प्रदर्शन में जिला सचिव चरन सिंह बघेल, राज्य परिषद सदस्य बाबूसिंह थंबार, सह सचिव सत्यपाल रावल व आर.डी.आर्य के अलावा जगदीश आर्य,द्रुगपाल सिंह,संजय खान,पपेंद्र कुमार,गौरीशंकर बघेल,महेंद्रसिंह,ओमप्रकाश सविता, चोबसिंह,किशनस्वरुप सविता,विजयकुमार कुशवाहा,विपिन कुमार तथा ईश्वरी पहलवान आदि प्रमुख रुप से मौजूद थे. डा. गिरीश
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बुधवार, 20 जुलाई 2016

भाजपा नेता की मायावती के खिलाफ टिप्पणी और दलितों कमजोरों के प्रति हिंसा और शाब्दिक हिंसा का मुखर विरोध करेगी भाकप: डा. गिरीश

दलितों के प्रति हिंसा और शाब्दिक हिंसा का मुखर विरोध करेगी भाकपा लखनऊ/अलीगढ- 20 जुलाई, 2016, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष दयाशंकर सिंह द्वारा बसपा सुप्रीमो सुश्री मायावती के विषय में की गयी घृणित टिप्पणी की कडे से कडे शब्दों में निंदा की है. भाकपा ने राज्य सरकार से मांग की है कि वह इन महानुभाव के खिलाफ माकूल दफाओं में मुकदमा दर्ज कर उन्हें जेल के सींखचों के पीछे पहुंचाये. भाकपा के राज्य सचिव मंडल की ओर से जारी बयान में राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि अपनी स्थापना के समय से ही संघ परिवार अपने कार्यकर्ताओं में ‘बौध्दिक’ के नाम पर दलितों, अल्पसंख्यकों, पिछडों, आदिवासियों एवं महिलाओं आदि समाज के सभी कमजोर तबकों के विरुध्द नफरत का जहर घोलता रहा है. आज केंद्र की सत्ता पर एकाधिकार होजाने के बाद उनके मन मस्तिष्क में भरा यह जहर अंगडाई ले रहा है और देश भर में तमाम संघी इन तबकों के विरुध्द हिंसा और शाब्दिक हिंसा का अभियान चलाये हुये हैं. मोदी के गुजरात में पशुओं की खाल उतारने वाले दलितों पर कातिलाना हमला बोला गया. बंबई में डा. भीमराव अंबेडकर प्रतिष्ठान की इमारत को ढहा दिया गय, संघ द्वारा निर्मित घृणा के वातावरण के चलते देश भर में दलितों अल्पसंख्यकों और अन्य कमजोर तबकों के खिलाफ हिंसा और शाब्दिक हिंसा की कारगुजारियां बढी हैं. राज्य की मशीनरी हर जगह उत्पीडकों की हिमायत में खडी हैं. ताजा मामला सुश्री मायावती के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा के प्रयोग का है जो संघ परिवार की घृणित सोच और उसकी नस्लवादी थीसिस का पर्दाफाश कर देता है. भाकपा और वामपंथ इन सभी कार्यवाहियों का पुरजोर विरोध कर रहे हैं. अंबेडकर भवन तोडे जाने के विरुध्द कल बंबई में हुयी विशाल रैली में भाकपा और वामपंथ ने ना केवल भारी भीड जुटाई थी बल्कि रैली को कन्हैया कुमार और का. सीताराम येचुरी ने भी संबोधित किया. संसद में भी कल यह मामला सबसे पहले वामपंथी सदस्यों ने ही उठाया था. हम गुजरात के दलितों के आंदोलन के साथ हैं और कश्मीर के पीडितों की पीडा को साझा करते हैं. एटा के शराब कांड से लेकर उत्पीडन की हर घटना में हम कमजोर तबकों के साथ खडे हैं. डा. गिरीश ने भाकपा की सभी जिला इकाइयों का आह्वान किया कि वे भाजपा नेता के खिलाफ कडी कार्यवाही की मांग को लेकर और दलित कमजोरों और अल्पसंख्यकों पर होरहे हमलों के खिलाफ स्वयं आवाज उठायें या इस तरह की आवाज उठाने वालों का साथ दें. उन्होने यह भी बताया कि 24 जुलाई को फैज़ाबाद में होने जारहे वामदलों के क्षेत्रीय सन्युक्त सम्मेलन में भी मामले पर गौर किया जायेगा और 30 व 31 जुलाई को लखनऊ में होने जारही भाकपा की राज्य काउंसिल की बैठक में भी इस मामले पर गंभीरता से विचार किया जायेगा. डा.गिरीश
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मंगलवार, 19 जुलाई 2016

अलीगंज शराब हत्याकांड: भाकपा ने उत्तर प्रदेश सरकार और प्रशासन को कठघरे में खडा किया

लखनऊ- 19 जुलाई 2016, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी उत्तर प्रदेश के राज्य सचिव मंडल ने एटा जनपद के अलीगंज में जहरीली शराब काण्ड में मृतकों के परिवारों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की है तथा अस्वस्थ बने हुये लोगों के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना की है. सचिव मंडल ने घटना में मृतकों के आश्रितों को रु. 10.00 लाख मुआबजा तथा इलाज करा रहे बीमारों को कम से कम रु. 2.00 लाख की आर्थिक सहायता दिये जाने की मांग की है. यहां जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि अलीगंज में 15 जुलाई को हुयी इस घटना जिसमें कि अब तक अलीगंज और फरुखाबाद जनपद के कायमगंज के 40 लोगों की मौत होचुकी है और एक सौ से भी अधिक लोग गंभीर हालत के चलते सैफई, आगरा और अलीगढ में इलाज करा रहे हैं, राज्य सरकार, प्रशासन और राजनेताओं के सरंक्षण में इस क्षेत्र में दशकों से निर्वाध रुप से चल रहे अवैध शराब के धंधे का परिणाम है. मथुरा के जवाहरबाग कांड से भी अधिक जिन्दगियां निगलने वाला यह कांड उत्तर प्रदेश की सरकार के माथे पर कलंक है और उसे इसकी जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिये. भाकपा राज्य सचिव ने बताया कि अवैध शराब का यह धंधा एटा, मैनपुरी, फरुखाबाद, हाथरस, कासगंज और फिरोजाबाद जनपद के विभिन्न हिस्सों में दशकों से चल रहा है. सरकार भले ही भाजपा की रही हो, बसपा की अथवा सपा की शराब माफिया का जादू हरेक के सिर पर चढ कर बोलता रहा है. आज जबकि प्रदेश में सपा की सरकार है गरीबों के घर उजाडने वाला यह धंधा उसके स्थानीय नेताओं के सरंक्षण में फलफूल रहा है. डा. गिरीश ने कहा कि यह क्षेत्र उद्योगविहीन क्षेत्र है और नकली शराब और अवैध हथियारों का निर्माण तथा अपहरण और फिरौती उद्योग यहाँ माफिया, राजनेताओं और पुलिस प्रशासन की अवैध आय के स्रोत बने हुये हैं. किसी भी दल की सरकार ने यहाँ विकास और औद्योगीकरण पर ध्यान नहीं दिया. उन्होने कहा कि जिस तरह प्रशासन ने इन दो दिनों में कार्यवाही कर बडे पैमाने पर अवैध शराब और उसे बनाने में प्रयुक्त होने वाला लेहन पकडा है, यदि ऐसी ही कठोर कार्यवाही पहले की जाती तो इन दर्जनों लोगों की जानें न जाती और सैकडों बच्चे और परिवार अनाथ न होते. लेकिन पहले या तो कार्यवाही हुयी नहीं और यदि हुयी भी तो अवैध शराब माफिया को नेताओं ने छुडवा दिया और अलीगंज, आजमगढ, लखनऊ और उन्नाव जैसी बडी घटनायें होने पर आबकारी विभाग और पुलिस के कुछ ओहदेदारों को कुछ समय के लिये सस्पेंड करा दिया. एटा क्यूंकि प्रदेश के वर्तमान में सत्ताधारी परिवार का निजी क्षेत्र है अतएव इस दौरान वहाँ के चार चार जिलाधिकारियों और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों को बदला गया. भाकपा की स्पष्ट राय है कि यह मामला सामान्य कानून व्यवस्था का मामला नहीं, राज्य सरकार और उसकी मशीनरी का गरीबों की जान की कीमत पर अपनी तिजौरियां भरने का मामला है. यदि इस कांड और उत्तर प्रदेश में चल रहे अवैध शराब के कारोबार की दो दशकों की जांच होगयी तो शासक दल और विपक्षी दलों से जुडे तमाम राजनेता और अधिकारी जेल के सींखचों के पीछे होंगे. अतएव गरीबों के हित में भाकपा इस प्रकरण और उत्तर प्रदेश में चल रहे अवैध शराब के कारोबार की सीबीआई से जांच कराये जाने की मांग करती है. डा. गिरीश
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बुधवार, 29 जून 2016

मेडम बिन्ह और भारत

वियतनाम की क्रांति की योध्दा न्गुऐन थि बिन्ह जो मेडम बिन्ह नाम से प्रसिध्द हैं ने अपनी बहुत ही दिलचस्प आत्मकथा लिखी है. इस आत्मकथा में उन्होंने वियतनाम की क्रांति के दौरान भारत सरकार और भारतीय जनता द्वारा दिये गये सहयोग की कई जगह चर्चा की है. वह स्वाभाविक ही है क्योंकि उस समय हमारा देश साम्राज्यवाद विरोध और गुटनिरपेक्षता की नीति पर दृढता से काम करता था और भारत ने अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर वियतनाम पर अमेरिकी हमलों की खुल कर निंदा की थी. भारत की जनता जिनमें कम्युनिस्ट पार्टियां अग्रणी थीं, ने अपनी आजादी, देश के एकीकरण और शांति की स्थापना के लिये सघर्षरत वियतनाम की जनता के प्रति गहरी एकजुटता का इजहार किया था. मेडम बिन्ह ने अपनी इस आत्मकथा में इस योगदान को कृतज्ञता के साथ रेखांकित किया है. पर एक स्थान पर भारत के संबंध में अपने अनुभव साझा करते हुये उन्होंने जो कुछ लिखा है वह बहुत ही रोचक और प्रासंगिक है. मुझे लगा कि इसे आप सबके साथ शेयर करना चाहिये. अत: मेडम बिन्ह द्वारा लिखित उनकी आत्मकथा- 'परिवार, दोस्त और देश' के पृष्ठ- 186 के पहले और दूसरे पैरों का अविकल पाठ प्रस्तुत है- "समाजवादी चीन के अलावा मुझे एशिया के अनेक देशों की यात्रा का मौका मिला. भारत ने मेरे ऊपर गहरी छाप छोडी. हो ची मिन्ह की भारत में जबरदस्त प्रतिष्ठा और सम्मान है, विशेषकर कोलकता और बंगाल में जहां कम्युनिस्ट पार्टी प्रभावशाली थी. भारत के लोगों को वियतनाम के संघर्ष के प्रति विशेष सहानुभूति थी. परंतु भारत में मुझे अमीर और गरीब के बीच में बहुत अधिक अंतर देखने को मिला. एकतरफ जहां राज्यपाल एक खूबसूरत महल में रहता है जिसके चारों तरफ पार्क हैं या ऐसा वन है जिसमें हिरन विचरण करते रहते हैं; तो दूसरी तरफ नजदीक ही ऐसे लोग हैं जो बेहद गरीब थे. मैं हैरान थी: ऐसी स्थिति क्यों है? क्या यह जातीय व्यवस्था की लंबी चली आरही विरासत के कारण है? क्या यह धर्म के कारण है? राजनीतिक रुझानों के कारण है? लगभग दो सदी के ब्रिटिश आधिपत्य का नकारात्मक परिणाम है? भारत के पास एक अतीत और शानदार संस्कृति है. आज उनके पास विशेषज्ञों की सबसे बडी संख्या है. यह असामान्य है, परंतु भारत में दो कम्युनिस्ट पार्टियां हैं. मुझे यह लगता है कि भारत के लोग यदि अपनी जनता को और अधिक मजबूती से एकताबध्द कर लें और अपने नागरिकों की क्षमताओं एवं अपने प्राकृतिक संसाधनों का पूरा फायदा उठायें, तो वह एक प्रमुख राजनीतिक एवं आर्थिक ताकत बन जायेंगे." दिसंबर 2015 में प्रकाशित इस आत्मकथा का उपर्युक्त अंश अपने आप ही बहुत कुछ कह जाता है और किसी टिप्पणी अथवा व्याख्या का मुहंताज नहीं है. लेकिन में अपनी ओर से केवल इतना जोडना चाहता हूँ कि भारत में आज दो नहीं कई कम्युनिस्ट पार्टियां हैं जो अपने जन्म के वक्त मातृ पार्टी को संशोधनवादी बता कर अलग पार्टी गठित कर लेती हैं लेकिन कुछ दशकों बाद या तो वाम संकीर्णता का शिकार होकर दम तोड देती हैं अथवा उसी रास्ते पर चल पडती हैं जिसकी आलोचना कर वे मातृ पार्टी से अलग हुयी थीं.( गिरीश)
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बुधवार, 15 जून 2016

कैराना- कांधला प्रकरण; भाकपा ने भाजपा को घेरा

लखनऊ- 15 जून 2016, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, के उत्तर प्रदेश राज्य सचिव मंडल ने आरोप लगाया है कि भाजपा एवं संघ परिवार उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनावों से पहले मुजफ्फर नगर दंगों की तर्ज पर जनता को सांप्रादायिक तौर पर विभाजित करना चाहती है ताकि जनता को एक बार फिर से छला जा सके और लोकसभा की तरह विधानसभा पर भी कब्जा जमाया जा सके. कैराना और कांधला से हिंदुओं के पलायन का कथित शिगूफा इसी उद्देश्य से छेडा गया है. कैराना में कथित जांच दल भेजे जाने की भाजपा की कवायद को भाकपा ने लोगों की आंख में धूल झोंकने वाला और प्रकरण में बेनकाव हुये अपने सांसद को बचाने की चेष्टा बताया. यह ठीक ऐसे ही है जैसे अपने गिरोह के एक गुंडे के कुकर्मों पर पर्दा डालने को एक गुंडा गिरोह जांच करने जाये. भाकपा ने मीडिया और कैराना की जनता को बधाई दी कि उसने भाजपा और संघ परिवार की इस साजिश को परवान चढने से पहले ही उसका पर्दाफाश कर दिया है. लेकिन भाजपा चुप बैठने वाली नहीं है और 2017 के विधान सभा चुनावों तक वह इसी तरह के तमाम हथकंडे जारी रखेगी, भाकपा ने खुला आरोप लगाया है. यहाँ जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा.गिरीश ने कहा कि मोदी सरकार अपने दो साल के कार्यकाल में हर मोर्चे पर पूरी तरह विफल साबित हुयी है. हर तरह की उत्पादन दर घटी है, डालर के मुकाबले रुपये की कीमत गिरती ही जारही है, अंतराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कम कीमतें होने के बावजूद महंगाई कुलांचें भर रही है, देश का बडा भाग सूखे की चपेट में है और केंद्र सरकार राहतकारी कदम उठा नहीं पारही है, दो करोड रोजगार देने का वायदा छलावा साबित हुआ है और रोजगार सृजन में कमी आयी है, काला धन वापस आना तो दूर माल्या जैसे भाजपा के दोस्त पूंजीपति माल हडप कर विदेशों में गुलछर्रे उडा रहे हैं तथा उनमें से अनेक बैंकों का कर्जा हडप किये जारहे हैं. इतना ही नहीं दो साल पूरे होते होते भाजपा के कई घपले घोटाले उजागर हो चुके हैं और महाराष्ट्र में तो उसे अपने एक महत्त्वपूर्ण मंत्री को हठाना भी पडा है. विकास का मोदी का वायदा भी पूरी तरह विफल रहा है. इसके अलाबा उत्तर प्रदेश में भाजपा अनेक जातीय और निहित स्वार्थी खांचों में बंटी है और तमाम कोशिशों के बावजूद मुख्यमंत्री पद हेतु एक सर्वसम्मत चेहरा पेश नहीं कर पारही है. ऐसे में अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी से जनता को संदेश देने को भाजपा की झोली में कुछ था ही नहीं अतएव अपनी पूर्व निर्धारित योजना के तहत उसने अपने सांसद के माध्यम से कैराना से हिंदुओं के पलायन का मुद्दा उछलवाया और उसे कश्मीर के पलायन की तरह बताया. जहाँ तक पलायन की बात है, बुंदेलखंड से लगभग 70 फीसदी लोग सूखे की चपेट में आने से पलायन कर चुके हैं. केंद्र और उत्तर प्रदेश में रही सरकारों की गलत नीतियों के चलते हर गांव से तमाम लोग रोजगार के लिये अपनी जन्म और कर्मभूमियों को छोड रहे हैं और गांव गांव घरों पर ताले लटके हुये हैं. जब जब उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार आयी तमाम अल्पसन्ख्यकों को सुरक्षित स्थानों को पलायन करना पडा. हुकुम सिंह, बाल्यान और संगीत सोम जैसे नेताओं के प्रभाव क्षेत्रों से तमाम दलितों को बलपूर्वक खदेड कर उनकी संपत्तियों को हडप लिया गया. भाजपा में हिम्मत है तो इन पलायनों पर भी श्वेतपत्र जारी करे. भाकपा राज्य सरकार से मांग करती है कि वह सांप्रदायिकता भडकाने, अफवाह फैलाने और जान बूझ कर तथ्यों को तोड मरोड कर पेश करने जैसी माकूल दफाओं में हुकुम सिंह को गिरफ्तार कर जेल भेजे और उत्तर प्रदेश खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शांति- सौहार्द की रक्षा करे. इस मोर्चे पर कोई भी ढिलाई अखिलेश सरकार को कठघरे में खडी करेगी, भाकपा ने चेतावनी दी है. डा. गिरीश, राज्य सचिव भाकपा, उत्तर
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मंगलवार, 14 जून 2016

भाकपा ने दी मुद्राराक्षस को श्रध्दांजलि

लखनऊ- 14 जून 2016, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने प्रसिध्द लेखक, आलोचक और समाजसेवी श्री मुद्राराक्षस को विनम्र श्रध्दांजलि अर्पित की है और उनके शोक संतप्त परिवार और अभिन्न मित्रों के प्रति सहानुभूति जताते हुये दुख की इस घडी में उनके साथ खडे रहने का मंतव्य जताया है. यहाँ जारी एक प्रेस बयान में भाकपा राज्य सचिव मंडल ने कहा कि मुद्राराक्षस समाज के यथास्थितिवाद, संप्रदायवाद और शोषण की हर पृवृत्ति के विरुध्द न केवल लेखनी के माध्यम से अपितु अनेक आन्दोलनों में भागीदारी के जरिये आजीवन संघर्ष करते रहे. उन्हें जो कुछ गलत लगा उसके खिलाफ कलम उठाने में उन्होने कोई परहेज नहीं किया. उनका संपूर्ण संघर्ष मानवता, बंधुता, समानता और न्याय के पक्ष में खडा है. वे भाकपा के संघर्षों में भी भागीदार बने और जहाँ भी उन्हें लगा कि कम्युनिस्ट आंदोलन की आलोचना होनी चाहिये उन्होने खुल कर आलोचना की. हम अपने एक मित्र, सहयोगी और आलोचक के रूप में उन्हें सम्मान देते रहे और हमारा यही भाव हमेशा उनके प्रति बना रहेगा, भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा है. आज जब देश की आम और मेहनतकश जनता एक कट्टरपंथी, षडयंत्रकारी और कारपोरेट्स की लूट को बढावा देने वाली सरकार के हमलों को झेल रही है, मुद्राराक्षस जैसी शख्सियत का विदा होजाना देश समाज और आमजनों के हितों के लिये बडी क्षति है. अपेक्षा है कि अवश्य ही नये और युवा साथी आगे आयेंगे और मुद्राराक्षस द्वारा खडे किये गये संघर्ष के प्रतिमानों को आगे बढायेंगे. यही उनके प्रति व्यवहारिक श्रध्दांजलि होगी. डा. गिरीश,
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शुक्रवार, 3 जून 2016

सत्ता और धर्म के बीच घालमेल की देन है मथुरा प्रकरण: भाकपा ने की न्यायिक जांच की मांग.

लखनऊ- 3 जून - भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने कल मथुरा में जयगुरुदेव समर्थकों और पुलिस के बीच हुयी मुठभेड़ जिसमें कि दो पुलिस अफसरों को जान गंवानी पड़ी, गहरी चिंता व्यक्त की है. पार्टी ने दोनों शहीद अफसरों के प्रति अपनी श्रध्दांजलि अर्पित की है. पार्टी ने उनके परिवारों के प्रति संपूर्ण संवेदना का इजहार करते हुए उनकी हर संभव मदद किये जाने की मांग राज्य सरकार से की है. भाकपा की राय है कि मृतक सत्याग्राहियों में कई ऐसे भोले भाले लोग रहे होंगे जिन्हें अपने नेताओं के कुत्सित इरादों का दूर दूर तक पता नहीं रहा होगा. ऐसे लोगों के परिवार भी सहानुभूति के पात्र हैं. पार्टी चाहती है कि इस संगीन मामले की जांच ऐसी संस्था से कराई जाये जो राज्य सरकार के प्रभाव में न हो. मथुरा काण्ड पर जारी एक प्रेस बयान में पार्टी के राज्य सचिव डा.गिरीश ने कहाकि यह सारा प्रकरण सत्ता, धर्म के नाम पर चल रहे पाखण्ड, पाखण्ड के जरिये धनार्जन और इस सबके जरिये वोट की राजनीति के नापाक घालमेल का परिणाम है. बाबा जयगुरुदेव की मृत्यु के बाद प्रदेश के सत्ताधारी परिवार द्वारा इस मामले को जिस तरह डील किया गया उसका यही परिणाम हो सकता था. गुरुदेव की विरासत के लिये जूझ रहे एक ग्रुप को सत्तारूढ़ करा दिया गया तो असंतुष्ट ग्रुप की अराजक कारगुजारियों को नजरंदाज किया गया. यहाँ तक कि प्रशासन को भी निर्देश थे कि बिना कठोर कार्यवाही के जवाहर बाग़ को कब्जामुक्त कराया जाए. अब जब मुख्यमंत्री चारों तरफ से घिरे नजर आरहे हैं, सारी जिम्मेदारी प्रशासन और पुलिस पर डाल रहे हैं. मथुरा में बड़े पैमाने पर गोला बारूद जमा होते रहे और केंद्र व राज्य की खुफिया एजेंसियां सोती रहीं. यह संपूर्ण प्रशासनिक विफलता का मामला है जिस पर गंभीरता से विचार किये जाने की जरुरत है, राजनैतिक रोटियाँ सेंकने की नहीं अतएव भाकपा मांग करती है कि समूचे प्रकरण की जांच उच्च न्यायालय के कार्यरत न्यायधीश से कराई जाये. डा. गिरीश
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बुधवार, 1 जून 2016

दादरी हत्याकांड को लेकर सांप्रदायिकता भडकाने में जुटा संघ गिरोह: भाकपा ने राज्य सरकार से की कडे कदम उठाने की मांग

लखनऊ- 1जून 2016: भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने दादरी के अखलाक हत्याकांड के संबंध में फोरेंसिक लैब की एक कथित रिपोर्ट को लेकर भाजपा और संघ परिवार द्वारा फिर से घृणित सांप्रदायिक राजनीति शुरू करने की कडे शब्दों में निंदा की है. भाकपा ने राज्य सरकार से भी मांग की है कि वह इस जांच के संबंध में भ्रम की स्थिति समाप्त करे और संघ परिवार द्वारा फिर से सांप्रदायिकता फैलाने और न्याय की प्रक्रिया को उलटने की साजिश को विफल करे. यहां जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि अखलाक के घर/ फ्रिज में मिले मीट के बारे में पहले ही एक रिपोर्ट आचुकी है जिसमें उसे गोमांस नहीं, बकरे का मांस बताया गया है. अब यह कथित नई रिपोर्ट को लेकर भाजपा और संघ परिवार ने नया वितंडा खडा कर दिया है. ये वो लोग हैं जो दंगे कराने को मंदिरों में गोमांस और मस्जिदों में सूअर का गोश्त फैंकने की घृणित कार्यवाहियों को अंजाम देते रहे हैं. आज जब वे केंद्रीय सत्ता में हैं तो कुछ भी करने, कोई भी षडयंत्र रचने की स्थिति में हैं. और आये दिन यही किया भी जारहा है. डा. गिरीश ने कहा कि नोएडा की एसएसपी किरन एस ने बीबीसी को दिये इंटर्व्यू में कहा है कि मथुरा की फोरेंसिक लैब ने जिस मीट की रिपोर्ट दी है वह अखलाक के घर से नहीं, घर से दूर ट्रांसफार्मर्स के पास से कलेक्ट किया गया था जहाँ से अखलाक का शव बरामद किया गया था. इसका क्या यह मतलब नहीं कि यदि यह रिपोर्ट सही भी है तो हत्यारों ने षडयंत्र के तहत यह गोमांस वहां प्रायोजित किया. राज्य सरकार को पहेलियां बुझाने के बजाय पूरे मसले पर साफ राय व्यक्त करनी चाहिये ताकि सांप्रदायिक तत्व अपने षडयंत्रों में कामयाब न होपायें. भाकपा राज्य सचिव मंडल ने इस बात को गंभीरता से नोट किया कि इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होते ही भाजपा और संघ के दसों मुख खुल गये हैं और वह अखलाक की सांप्रदयिकता फैलाने और बिहार के चुनाव में उसका लाभ उठाने की गरज से की गयी हत्या को जायज ठहराने में जुट गये हैं. इतना ही नहीं वे अखलाक परिवार पर मुकदमा दर्ज कराने और पीडित परिवार को दी गयी राहत को लौटाने जैसी घृणित बातें कर रहे हैं. वे असहिष्णुता की सारी हदें पार कर रहे हैं. सनातन भारतीय संस्कृति में इसका कोई स्थान नहीं है. यह हिंदुत्त्व के लबादे में लपेटी गयी संघ परिवार की अपनी संस्कृति है जो हिंसा और अंतत: सत्ता तक पहुंचने की उसकी भूख मिटाने के लिये गढी गयी है. सवाल यह भी उठता है कि यदि अखलाक के घर में बीफ पकने का संदेह कुछेक लोगों को था, तो उन्हें कानून के हवाले करने को कदम उठाना चाहिये था. हत्या कर कानून हाथ में लेने का अधिकार उन्हें किसने सौंपा? भाकपा की दृढ राय है कि यह राजनैतिक उद्देश्यों से प्रेरित दर्दनाक हत्या का मामला है और उसे इसी रूप में देखा जायेगा. पूरा मसला कमरतोड महंगाई से ध्यान हठाने में भी भाजपा की मदद कर रहा है, यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिये. डा. गिरीश, राज्य सचिव
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बुधवार, 25 मई 2016

भाकपा ने की राज्यपाल के बयान की निंदा: राष्ट्रपति से की उचित कार्यवाही की मांग

लखनऊ/अलीगढ: 25 मई, 2016- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव डा.गिरीश ने उत्तर प्रदेश के राज्यपाल श्री राम नाईक के उस बयान पर गहरी चिंता और आक्रोश व्यक्त किया है जिसमें उन्होने उत्तर प्रदेश में बजरंग दल द्वारा अपने कार्यकर्ताओं को आग्नेयास्त्रों सहित तमाम हथियारों की ट्रेनिंग देने को चलाये जारहे शिविरों को जायज ठहराया है. यहाँ जारी एक प्रेस बयान में भाकपा राज्य सचिव ने कहा कि राज्यपाल महोदय अपना कार्यभार संभालने के दिन से ही सांप्रदायिक बयानबाजी करते रहे हैं और हर वह काम करते रहे हैं जो संघ परिवार के एजेंडे को आगे बढाने वाला है. पर कल अलीगढ के अतरौली में दिया गया उनका बयान कानून और संविधान की धज्जियां बिखेरने वाला है. यह मामला इसलिये और गंभीर होजाता है कि यह बयान उस व्यक्ति ने दिया है जो संविधान और कानून की रक्षा करने वाले पद पर आसीन है. प्रमुख अंग्रेजी दैनिक ‘टाइम्स आफ इंडिया’ के अनुसार श्री नाईक ने कहा कि “उन्हें इन शिविरों के आयोजन पर कोई एतराज नहीं है.” उन्होने यह भी कहा कि “इन केम्प्स को आयोजित करने का उद्देश्य ‘हिंदुओं की अन्य धर्मावलम्बियों से रक्षा करना है’.” इससे भी आगे बढ कर राज्यपाल ने कहा कि “ आत्मरक्षा करना कोई गलत बात नहीं है. यदि लोग अपनी रक्षा नहीं कर पायेंगे तो वे अपने समाज की रक्षा कैसे कर पायेंगे? हमें इस तरह की ट्रेनिंग जारी रखनी चाहिये. आपको इस ट्रेनिंग के इरादे को समझना चाहिये. .............. मुझे इस पर कोई आपत्ति नहीं.” आदि. सवाल खडे होते हैं कि क्या अल्पसंखकों, दलितों, आदिवासियों आदि को भी इस तरह के केम्प आयोजित करने की छूट राज्यपाल महोदय देंगे जो संघ परिवार और उसकी विचारधारा के हमलों के शिकार बनते हैं? क्या फिर कश्मीर, पूर्वोत्तर और वामपंथी उग्रवादियों के शिविरों को भी जायज नहीं माना जाना चाहिये? क्या राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति को इस तरह का बयान देना चाहिये? भाकपा ने माननीय राष्ट्रपति महोदय से अपील की कि वे इस प्रकरण पर शीघ्र संविधान सम्मत कदम उठायें ताकि संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति से संविधान की रक्षा की जासके. डा. गिरीश ने उत्तर प्रदेश सरकार से मांग की कि वह अयोध्या, सुल्तानपुर, गोरखपुर, पीलीभीत, नोएडा एवं फतेहपुर आदि में बजरंग दल द्वारा रायफल, तलवार और लाठी की ट्रेनिंग देने वाले शिविरों पर फौरन रोक लगाये और इसके आयोजकों पर देशद्रोह का अभियोग पंजीकृत कर उन्हें गिरफ्तार करे. डा. गिरीश
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मंगलवार, 24 मई 2016

Aisf conference

ए.आई.एस.एफ. का पश्चिमी उत्तर प्रदेश का कार्यकर्ता सम्मेलन संपन्न सम्मेलन में झूठे देशभक्तों और पूंजीवादी ताकतों से लडने का लिया संकल्प: सबको एक समान शिक्षा, शैक्षिक कलेंडर लागू करने, छात्र संघों के चुनाव कराये जाने और सबको रोजगार दिये जाने की मांगों के लिये संघर्ष का किया आह्वान अलीगढ: आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन का पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक क्षेत्रीय सम्मेलन यहां उत्साह और गर्मजोशी के माहौल में संपन्न हुआ. बेहद गर्म मौसम के बावजूद सम्मेलन में आठ जिलों के 60 प्रतिनिधि शामिल हुये. सम्मेलन की अध्यक्षता ए.एम.यू. की एआईएसएफ की संयोजक कु. दूना मारिया भार्गवी भार्गवी ने की तथा संचालन एआईएसएफ अलीगढ के संयोजक अनीश कुमार ने किया. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एआईएसएफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष वलीउल्लाह खादरी ने शिक्षा पर बढते हमले, शिक्षा के बजट में की जारही कटौती, फीस में की जारही भारी वृध्दि, शिक्षा के निजीकरण और व्यापारीकरण तथा शिक्षा के भगवाकरण के प्रयासों पर सवाल खडे किये. उन्होने कहा कि केंद्र हो या राज्यों की सरकारें जन समुदाय को अपढ बना कर रखना चाहती हैं इसीलिये शिक्षा का बजट घटा रही हैं, विद्यार्थियों की फेलोशिप छीन रही है, जहां छात्र इसका विरोध कर रहे हैं उनको हर तरह से दबाया जारहा है. उन्होने सभी छात्रों से शिक्षा को बचाने और छात्रों के बुनियादी अधिकरों की रक्षा के लिये संघर्ष का आह्वान किया. कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि और संगठन के महासचिव विश्वजीत कुमार ने कहा कि जिन्होने अब तक देश व देशवासियों के साथ गद्दारी की है, वे आज देशभक्त होने का प्रमाण बांट रहे हैं. देश व प्रदेश में शिक्षा की हालत बद से बदतर होती जारही है. एकतरफ जहां छात्रों को उपयुक्त शिक्षा व रोजगार नहीं मिल रहे हैं वहीं उनके अधिकारों को कुचला जारहा है. इलाहाबाद विश्वविद्यालय, जे एन यू एवं रोहित वेमूला प्रकरण इसके उदाहरण हैं. इसलिये सभी को मुफ्त व समान शिक्षा , छात्रसंघों के चुनाव और रोजगार के लिये छात्रों का एकजुट संघर्ष ही छात्रों के भविष्य की रक्षा करेगा. एआईएसएफ इस संघर्ष के लिये सबसे उपयुक्त मंच है. सम्मेलन में प्रमुख वक्ता भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि यह गौरव केवल एक छात्र संगठन- 'एआईएसएफ' को ही हासिल है कि उसका जन्म आज़ादी के आंदोलन की कोख से हुआ और उसने आज़ादी की लडाई में हिस्सा लिया. उस दौर में यह आंदोलन की सभी प्रमुख धाराओं- कांग्रेस, सोशलिस्ट तथा कम्युनिस्ट विचारधारा के छात्रों का संयुक्त मंच था. छात्र आंदोलन के हितों और शिक्षा की उपादेयता को देखते हुये एआईएसएफ को छात्रों का संयुक्त मंच ही रहना चाहिये था लेकिन छात्रों को दलगत स्वार्थों की पूर्ति का मौहरा बनाने के लिये कांग्रेस ने एनएसयूआई तथा सोशलिस्टों ने समाजवादी युवजन सभा बनाली. आरएसएस जो स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजी हुकूमत को बचाने के काम में लगा था, ने आज़ादी आने के बाद जनसंघ/ भाजपा बनाली तथा एबीवीपी नामक छात्र संगठन बना लिया. जिसका उद्देश्य छात्रों को केवल सांप्रदायिकता और जाति के नाम पर बांटना है. छात्रों और समाज के बुनियादी सवालों से उसका कोई लेना देना नहीं. केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद केंद्र सरकार ने छात्रों के खिलाफ युध्द छेड रखा है और विद्यार्थी परिषद उसके सह्योग में छात्रों के खिलाफ षडयंत्र कर रही है. जगह जगह वामपंथी और अंबेडकरवादी छात्र संगठनो पर हमले बोले जा रहे हैं. छात्रों को अपने शैक्षिक हितों के साथ साथ विद्यार्थी परिषद के छात्र विरोधी कुकृत्यों का भी जबाव देना होगा. भाकपा के राज्य सहसचिव का. अरविंदराज स्वरुप ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों की शिक्षा और छात्रों को तबाह करने वाली नीतियों के खिलाफ जगह जगह जुझारू छात्र आंदोलन उग रहे हैं और अपने संघर्षो से कई जगह छात्रों ने सफलतायें हासिल की हैं. जेएनयू और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के संघर्ष इसका उदाहरण हैं. आने वाले दिनों में छात्रों, शिक्षा और उसके संस्थानो पर और तीव्र हमले होंगे और छात्रों को उसका जबाव भी मजबूती से देना होगा. छात्र आंदोलन को उचित दिशा देने का काम केवल एआईएसएफ कर सकता है अतएव उसे मजबूत बनाने की जरूरत है. भाकपा के जिला सचिव प्रोफेसर सुहेव शेरवानी ने कहा कि अलीगढ और उत्तर प्रदेश में एआईएसएफ तेजी से कदम बढा रही है. भाकपा हर तरह से उनका साथ देने को प्रतिबध्द है. उन्होने कहा कि माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि वह सभी को समान शिक्षा देने की व्यवस्था करे लेकिन राज्य सरकार ने इस ओर कोई कदम नहीं बढाया. हम सबको मिल कर सरकार पर दबाव बढाना चाहिये. प्रोफेसर शमीम अख्तर ने मोदी सरकार के फासिस्ट्वादी कदमों पर विस्तार से प्रकाश डाला. सम्मेलन को प्रदेश उपाध्यक्ष उत्कर्ष चतुर्वेदी, कु. फसलीन, यशपाल सिंह, देवेंद्र कुमार, गौरव सक्सेना, विनीत कुमार, पंकज सागर, अतुल, रवि शर्मा, अश्वनी कुमार, अभिषेक पचौरी, संतोष, यतेंद्र बघेल और हर्ष पालीवाल विवेक त्रिपाठी आदि ने भी संबोधित किया.
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Aisf conference

ए.आई.एस.एफ. का पश्चिमी उत्तर प्रदेश का कार्यकर्ता सम्मेलन संपन्न सम्मेलन में झूठे देशभक्तों और पूंजीवादी ताकतों से लडने का लिया संकल्प: सबको एक समान शिक्षा, शैक्षिक कलेंडर लागू करने, छात्र संघों के चुनाव कराये जाने और सबको रोजगार दिये जाने की मांगों के लिये संघर्ष का किया आह्वान अलीगढ: आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन का पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक क्षेत्रीय सम्मेलन यहां उत्साह और गर्मजोशी के माहौल में संपन्न हुआ. बेहद गर्म मौसम के बावजूद सम्मेलन में आठ जिलों के 60 प्रतिनिधि शामिल हुये. सम्मेलन की अध्यक्षता ए.एम.यू. की एआईएसएफ की संयोजक कु. दूना मारिया भार्गवी भार्गवी ने की तथा संचालन एआईएसएफ अलीगढ के संयोजक अनीश कुमार ने किया. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एआईएसएफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष वलीउल्लाह खादरी ने शिक्षा पर बढते हमले, शिक्षा के बजट में की जारही कटौती, फीस में की जारही भारी वृध्दि, शिक्षा के निजीकरण और व्यापारीकरण तथा शिक्षा के भगवाकरण के प्रयासों पर सवाल खडे किये. उन्होने कहा कि केंद्र हो या राज्यों की सरकारें जन समुदाय को अपढ बना कर रखना चाहती हैं इसीलिये शिक्षा का बजट घटा रही हैं, विद्यार्थियों की फेलोशिप छीन रही है, जहां छात्र इसका विरोध कर रहे हैं उनको हर तरह से दबाया जारहा है. उन्होने सभी छात्रों से शिक्षा को बचाने और छात्रों के बुनियादी अधिकरों की रक्षा के लिये संघर्ष का आह्वान किया. कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि और संगठन के महासचिव विश्वजीत कुमार ने कहा कि जिन्होने अब तक देश व देशवासियों के साथ गद्दारी की है, वे आज देशभक्त होने का प्रमाण बांट रहे हैं. देश व प्रदेश में शिक्षा की हालत बद से बदतर होती जारही है. एकतरफ जहां छात्रों को उपयुक्त शिक्षा व रोजगार नहीं मिल रहे हैं वहीं उनके अधिकारों को कुचला जारहा है. इलाहाबाद विश्वविद्यालय, जे एन यू एवं रोहित वेमूला प्रकरण इसके उदाहरण हैं. इसलिये सभी को मुफ्त व समान शिक्षा , छात्रसंघों के चुनाव और रोजगार के लिये छात्रों का एकजुट संघर्ष ही छात्रों के भविष्य की रक्षा करेगा. एआईएसएफ इस संघर्ष के लिये सबसे उपयुक्त मंच है. सम्मेलन में प्रमुख वक्ता भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि यह गौरव केवल एक छात्र संगठन- 'एआईएसएफ' को ही हासिल है कि उसका जन्म आज़ादी के आंदोलन की कोख से हुआ और उसने आज़ादी की लडाई में हिस्सा लिया. उस दौर में यह आंदोलन की सभी प्रमुख धाराओं- कांग्रेस, सोशलिस्ट तथा कम्युनिस्ट विचारधारा के छात्रों का संयुक्त मंच था. छात्र आंदोलन के हितों और शिक्षा की उपादेयता को देखते हुये एआईएसएफ को छात्रों का संयुक्त मंच ही रहना चाहिये था लेकिन छात्रों को दलगत स्वार्थों की पूर्ति का मौहरा बनाने के लिये कांग्रेस ने एनएसयूआई तथा सोशलिस्टों ने समाजवादी युवजन सभा बनाली. आरएसएस जो स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजी हुकूमत को बचाने के काम में लगा था, ने आज़ादी आने के बाद जनसंघ/ भाजपा बनाली तथा एबीवीपी नामक छात्र संगठन बना लिया. जिसका उद्देश्य छात्रों को केवल सांप्रदायिकता और जाति के नाम पर बांटना है. छात्रों और समाज के बुनियादी सवालों से उसका कोई लेना देना नहीं. केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद केंद्र सरकार ने छात्रों के खिलाफ युध्द छेड रखा है और विद्यार्थी परिषद उसके सह्योग में छात्रों के खिलाफ षडयंत्र कर रही है. जगह जगह वामपंथी और अंबेडकरवादी छात्र संगठनो पर हमले बोले जा रहे हैं. छात्रों को अपने शैक्षिक हितों के साथ साथ विद्यार्थी परिषद के छात्र विरोधी कुकृत्यों का भी जबाव देना होगा. भाकपा के राज्य सहसचिव का. अरविंदराज स्वरुप ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों की शिक्षा और छात्रों को तबाह करने वाली नीतियों के खिलाफ जगह जगह जुझारू छात्र आंदोलन उग रहे हैं और अपने संघर्षो से कई जगह छात्रों ने सफलतायें हासिल की हैं. जेएनयू और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के संघर्ष इसका उदाहरण हैं. आने वाले दिनों में छात्रों, शिक्षा और उसके संस्थानो पर और तीव्र हमले होंगे और छात्रों को उसका जबाव भी मजबूती से देना होगा. छात्र आंदोलन को उचित दिशा देने का काम केवल एआईएसएफ कर सकता है अतएव उसे मजबूत बनाने की जरूरत है. भाकपा के जिला सचिव प्रोफेसर सुहेव शेरवानी ने कहा कि अलीगढ और उत्तर प्रदेश में एआईएसएफ तेजी से कदम बढा रही है. भाकपा हर तरह से उनका साथ देने को प्रतिबध्द है. उन्होने कहा कि माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि वह सभी को समान शिक्षा देने की व्यवस्था करे लेकिन राज्य सरकार ने इस ओर कोई कदम नहीं बढाया. हम सबको मिल कर सरकार पर दबाव बढाना चाहिये. प्रोफेसर शमीम अख्तर ने मोदी सरकार के फासिस्ट्वादी कदमों पर विस्तार से प्रकाश डाला. सम्मेलन को प्रदेश उपाध्यक्ष उत्कर्ष चतुर्वेदी, कु. फसलीन, यशपाल सिंह, देवेंद्र कुमार, गौरव सक्सेना, विनीत कुमार, पंकज सागर, अतुल, रवि शर्मा, अश्वनी कुमार, अभिषेक पचौरी, संतोष, यतेंद्र बघेल और हर्ष पालीवाल विवेक त्रिपाठी आदि ने भी संबोधित किया.
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ए.आई.एस.एफ. का पश्चिमी उत्तर प्रदेश का कार्यकर्ता सम्मेलन संपन्न सम्मेलन में झूठे देशभक्तों और पूंजीवादी ताकतों से लडने का लिया संकल्प: सबको एक समान शिक्षा, शैक्षिक कलेंडर लागू करने, छात्र संघों के चुनाव कराये जाने और सबको रोजगार दिये जाने की मांगों के लिये संघर्ष का किया आह्वान अलीगढ: आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन का पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक क्षेत्रीय सम्मेलन यहां उत्साह और गर्मजोशी के माहौल में संपन्न हुआ. बेहद गर्म मौसम के बावजूद सम्मेलन में आठ जिलों के 60 प्रतिनिधि शामिल हुये. सम्मेलन की अध्यक्षता ए.एम.यू. की एआईएसएफ की संयोजक कु. दूना मारिया भार्गवी भार्गवी ने की तथा संचालन एआईएसएफ अलीगढ के संयोजक अनीश कुमार ने किया. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एआईएसएफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष वलीउल्लाह खादरी ने शिक्षा पर बढते हमले, शिक्षा के बजट में की जारही कटौती, फीस में की जारही भारी वृध्दि, शिक्षा के निजीकरण और व्यापारीकरण तथा शिक्षा के भगवाकरण के प्रयासों पर सवाल खडे किये. उन्होने कहा कि केंद्र हो या राज्यों की सरकारें जन समुदाय को अपढ बना कर रखना चाहती हैं इसीलिये शिक्षा का बजट घटा रही हैं, विद्यार्थियों की फेलोशिप छीन रही है, जहां छात्र इसका विरोध कर रहे हैं उनको हर तरह से दबाया जारहा है. उन्होने सभी छात्रों से शिक्षा को बचाने और छात्रों के बुनियादी अधिकरों की रक्षा के लिये संघर्ष का आह्वान किया. कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि और संगठन के महासचिव विश्वजीत कुमार ने कहा कि जिन्होने अब तक देश व देशवासियों के साथ गद्दारी की है, वे आज देशभक्त होने का प्रमाण बांट रहे हैं. देश व प्रदेश में शिक्षा की हालत बद से बदतर होती जारही है. एकतरफ जहां छात्रों को उपयुक्त शिक्षा व रोजगार नहीं मिल रहे हैं वहीं उनके अधिकारों को कुचला जारहा है. इलाहाबाद विश्वविद्यालय, जे एन यू एवं रोहित वेमूला प्रकरण इसके उदाहरण हैं. इसलिये सभी को मुफ्त व समान शिक्षा , छात्रसंघों के चुनाव और रोजगार के लिये छात्रों का एकजुट संघर्ष ही छात्रों के भविष्य की रक्षा करेगा. एआईएसएफ इस संघर्ष के लिये सबसे उपयुक्त मंच है. सम्मेलन में प्रमुख वक्ता भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि यह गौरव केवल एक छात्र संगठन- 'एआईएसएफ' को ही हासिल है कि उसका जन्म आज़ादी के आंदोलन की कोख से हुआ और उसने आज़ादी की लडाई में हिस्सा लिया. उस दौर में यह आंदोलन की सभी प्रमुख धाराओं- कांग्रेस, सोशलिस्ट तथा कम्युनिस्ट विचारधारा के छात्रों का संयुक्त मंच था. छात्र आंदोलन के हितों और शिक्षा की उपादेयता को देखते हुये एआईएसएफ को छात्रों का संयुक्त मंच ही रहना चाहिये था लेकिन छात्रों को दलगत स्वार्थों की पूर्ति का मौहरा बनाने के लिये कांग्रेस ने एनएसयूआई तथा सोशलिस्टों ने समाजवादी युवजन सभा बनाली. आरएसएस जो स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजी हुकूमत को बचाने के काम में लगा था, ने आज़ादी आने के बाद जनसंघ/ भाजपा बनाली तथा एबीवीपी नामक छात्र संगठन बना लिया. जिसका उद्देश्य छात्रों को केवल सांप्रदायिकता और जाति के नाम पर बांटना है. छात्रों और समाज के बुनियादी सवालों से उसका कोई लेना देना नहीं. केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद केंद्र सरकार ने छात्रों के खिलाफ युध्द छेड रखा है और विद्यार्थी परिषद उसके सह्योग में छात्रों के खिलाफ षडयंत्र कर रही है. जगह जगह वामपंथी और अंबेडकरवादी छात्र संगठनो पर हमले बोले जा रहे हैं. छात्रों को अपने शैक्षिक हितों के साथ साथ विद्यार्थी परिषद के छात्र विरोधी कुकृत्यों का भी जबाव देना होगा. भाकपा के राज्य सहसचिव का. अरविंदराज स्वरुप ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों की शिक्षा और छात्रों को तबाह करने वाली नीतियों के खिलाफ जगह जगह जुझारू छात्र आंदोलन उग रहे हैं और अपने संघर्षो से कई जगह छात्रों ने सफलतायें हासिल की हैं. जेएनयू और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के संघर्ष इसका उदाहरण हैं. आने वाले दिनों में छात्रों, शिक्षा और उसके संस्थानो पर और तीव्र हमले होंगे और छात्रों को उसका जबाव भी मजबूती से देना होगा. छात्र आंदोलन को उचित दिशा देने का काम केवल एआईएसएफ कर सकता है अतएव उसे मजबूत बनाने की जरूरत है. भाकपा के जिला सचिव प्रोफेसर सुहेव शेरवानी ने कहा कि अलीगढ और उत्तर प्रदेश में एआईएसएफ तेजी से कदम बढा रही है. भाकपा हर तरह से उनका साथ देने को प्रतिबध्द है. उन्होने कहा कि माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि वह सभी को समान शिक्षा देने की व्यवस्था करे लेकिन राज्य सरकार ने इस ओर कोई कदम नहीं बढाया. हम सबको मिल कर सरकार पर दबाव बढाना चाहिये. प्रोफेसर शमीम अख्तर ने मोदी सरकार के फासिस्ट्वादी कदमों पर विस्तार से प्रकाश डाला. सम्मेलन को प्रदेश उपाध्यक्ष उत्कर्ष चतुर्वेदी, कु. फसलीन, यशपाल सिंह, देवेंद्र कुमार, गौरव सक्सेना, विनीत कुमार, पंकज सागर, अतुल, रवि शर्मा, अश्वनी कुमार, अभिषेक पचौरी, संतोष, यतेंद्र बघेल और हर्ष पालीवाल विवेक त्रिपाठी आदि ने भी संबोधित किया.
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ए.आई.एस.एफ. का पश्चिमी उत्तर प्रदेश का कार्यकर्ता सम्मेलन संपन्न सम्मेलन में झूठे देशभक्तों और पूंजीवादी ताकतों से लडने का लिया संकल्प: सबको एक समान शिक्षा, शैक्षिक कलेंडर लागू करने, छात्र संघों के चुनाव कराये जाने और सबको रोजगार दिये जाने की मांगों के लिये संघर्ष का किया आह्वान अलीगढ: आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन का पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक क्षेत्रीय सम्मेलन यहां उत्साह और गर्मजोशी के माहौल में संपन्न हुआ. बेहद गर्म मौसम के बावजूद सम्मेलन में आठ जिलों के 60 प्रतिनिधि शामिल हुये. सम्मेलन की अध्यक्षता ए.एम.यू. की एआईएसएफ की संयोजक कु. दूना मारिया भार्गवी भार्गवी ने की तथा संचालन एआईएसएफ अलीगढ के संयोजक अनीश कुमार ने किया. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एआईएसएफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष वलीउल्लाह खादरी ने शिक्षा पर बढते हमले, शिक्षा के बजट में की जारही कटौती, फीस में की जारही भारी वृध्दि, शिक्षा के निजीकरण और व्यापारीकरण तथा शिक्षा के भगवाकरण के प्रयासों पर सवाल खडे किये. उन्होने कहा कि केंद्र हो या राज्यों की सरकारें जन समुदाय को अपढ बना कर रखना चाहती हैं इसीलिये शिक्षा का बजट घटा रही हैं, विद्यार्थियों की फेलोशिप छीन रही है, जहां छात्र इसका विरोध कर रहे हैं उनको हर तरह से दबाया जारहा है. उन्होने सभी छात्रों से शिक्षा को बचाने और छात्रों के बुनियादी अधिकरों की रक्षा के लिये संघर्ष का आह्वान किया. कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि और संगठन के महासचिव विश्वजीत कुमार ने कहा कि जिन्होने अब तक देश व देशवासियों के साथ गद्दारी की है, वे आज देशभक्त होने का प्रमाण बांट रहे हैं. देश व प्रदेश में शिक्षा की हालत बद से बदतर होती जारही है. एकतरफ जहां छात्रों को उपयुक्त शिक्षा व रोजगार नहीं मिल रहे हैं वहीं उनके अधिकारों को कुचला जारहा है. इलाहाबाद विश्वविद्यालय, जे एन यू एवं रोहित वेमूला प्रकरण इसके उदाहरण हैं. इसलिये सभी को मुफ्त व समान शिक्षा , छात्रसंघों के चुनाव और रोजगार के लिये छात्रों का एकजुट संघर्ष ही छात्रों के भविष्य की रक्षा करेगा. एआईएसएफ इस संघर्ष के लिये सबसे उपयुक्त मंच है. सम्मेलन में प्रमुख वक्ता भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि यह गौरव केवल एक छात्र संगठन- 'एआईएसएफ' को ही हासिल है कि उसका जन्म आज़ादी के आंदोलन की कोख से हुआ और उसने आज़ादी की लडाई में हिस्सा लिया. उस दौर में यह आंदोलन की सभी प्रमुख धाराओं- कांग्रेस, सोशलिस्ट तथा कम्युनिस्ट विचारधारा के छात्रों का संयुक्त मंच था. छात्र आंदोलन के हितों और शिक्षा की उपादेयता को देखते हुये एआईएसएफ को छात्रों का संयुक्त मंच ही रहना चाहिये था लेकिन छात्रों को दलगत स्वार्थों की पूर्ति का मौहरा बनाने के लिये कांग्रेस ने एनएसयूआई तथा सोशलिस्टों ने समाजवादी युवजन सभा बनाली. आरएसएस जो स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजी हुकूमत को बचाने के काम में लगा था, ने आज़ादी आने के बाद जनसंघ/ भाजपा बनाली तथा एबीवीपी नामक छात्र संगठन बना लिया. जिसका उद्देश्य छात्रों को केवल सांप्रदायिकता और जाति के नाम पर बांटना है. छात्रों और समाज के बुनियादी सवालों से उसका कोई लेना देना नहीं. केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद केंद्र सरकार ने छात्रों के खिलाफ युध्द छेड रखा है और विद्यार्थी परिषद उसके सह्योग में छात्रों के खिलाफ षडयंत्र कर रही है. जगह जगह वामपंथी और अंबेडकरवादी छात्र संगठनो पर हमले बोले जा रहे हैं. छात्रों को अपने शैक्षिक हितों के साथ साथ विद्यार्थी परिषद के छात्र विरोधी कुकृत्यों का भी जबाव देना होगा. भाकपा के राज्य सहसचिव का. अरविंदराज स्वरुप ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों की शिक्षा और छात्रों को तबाह करने वाली नीतियों के खिलाफ जगह जगह जुझारू छात्र आंदोलन उग रहे हैं और अपने संघर्षो से कई जगह छात्रों ने सफलतायें हासिल की हैं. जेएनयू और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के संघर्ष इसका उदाहरण हैं. आने वाले दिनों में छात्रों, शिक्षा और उसके संस्थानो पर और तीव्र हमले होंगे और छात्रों को उसका जबाव भी मजबूती से देना होगा. छात्र आंदोलन को उचित दिशा देने का काम केवल एआईएसएफ कर सकता है अतएव उसे मजबूत बनाने की जरूरत है. भाकपा के जिला सचिव प्रोफेसर सुहेव शेरवानी ने कहा कि अलीगढ और उत्तर प्रदेश में एआईएसएफ तेजी से कदम बढा रही है. भाकपा हर तरह से उनका साथ देने को प्रतिबध्द है. उन्होने कहा कि माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि वह सभी को समान शिक्षा देने की व्यवस्था करे लेकिन राज्य सरकार ने इस ओर कोई कदम नहीं बढाया. हम सबको मिल कर सरकार पर दबाव बढाना चाहिये. प्रोफेसर शमीम अख्तर ने मोदी सरकार के फासिस्ट्वादी कदमों पर विस्तार से प्रकाश डाला. सम्मेलन को प्रदेश उपाध्यक्ष उत्कर्ष चतुर्वेदी, कु. फसलीन, यशपाल सिंह, देवेंद्र कुमार, गौरव सक्सेना, विनीत कुमार, पंकज सागर, अतुल, रवि शर्मा, अश्वनी कुमार, अभिषेक पचौरी, संतोष, यतेंद्र बघेल और हर्ष पालीवाल विवेक त्रिपाठी आदि ने भी संबोधित किया.
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ए.आई.एस.एफ. का पश्चिमी उत्तर प्रदेश का कार्यकर्ता सम्मेलन संपन्न सम्मेलन में झूठे देशभक्तों और पूंजीवादी ताकतों से लडने का लिया संकल्प: सबको एक समान शिक्षा, शैक्षिक कलेंडर लागू करने, छात्र संघों के चुनाव कराये जाने और सबको रोजगार दिये जाने की मांगों के लिये संघर्ष का किया आह्वान अलीगढ: आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन का पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक क्षेत्रीय सम्मेलन यहां उत्साह और गर्मजोशी के माहौल में संपन्न हुआ. बेहद गर्म मौसम के बावजूद सम्मेलन में आठ जिलों के 60 प्रतिनिधि शामिल हुये. सम्मेलन की अध्यक्षता ए.एम.यू. की एआईएसएफ की संयोजक कु. दूना मारिया भार्गवी भार्गवी ने की तथा संचालन एआईएसएफ अलीगढ के संयोजक अनीश कुमार ने किया. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एआईएसएफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष वलीउल्लाह खादरी ने शिक्षा पर बढते हमले, शिक्षा के बजट में की जारही कटौती, फीस में की जारही भारी वृध्दि, शिक्षा के निजीकरण और व्यापारीकरण तथा शिक्षा के भगवाकरण के प्रयासों पर सवाल खडे किये. उन्होने कहा कि केंद्र हो या राज्यों की सरकारें जन समुदाय को अपढ बना कर रखना चाहती हैं इसीलिये शिक्षा का बजट घटा रही हैं, विद्यार्थियों की फेलोशिप छीन रही है, जहां छात्र इसका विरोध कर रहे हैं उनको हर तरह से दबाया जारहा है. उन्होने सभी छात्रों से शिक्षा को बचाने और छात्रों के बुनियादी अधिकरों की रक्षा के लिये संघर्ष का आह्वान किया. कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि और संगठन के महासचिव विश्वजीत कुमार ने कहा कि जिन्होने अब तक देश व देशवासियों के साथ गद्दारी की है, वे आज देशभक्त होने का प्रमाण बांट रहे हैं. देश व प्रदेश में शिक्षा की हालत बद से बदतर होती जारही है. एकतरफ जहां छात्रों को उपयुक्त शिक्षा व रोजगार नहीं मिल रहे हैं वहीं उनके अधिकारों को कुचला जारहा है. इलाहाबाद विश्वविद्यालय, जे एन यू एवं रोहित वेमूला प्रकरण इसके उदाहरण हैं. इसलिये सभी को मुफ्त व समान शिक्षा , छात्रसंघों के चुनाव और रोजगार के लिये छात्रों का एकजुट संघर्ष ही छात्रों के भविष्य की रक्षा करेगा. एआईएसएफ इस संघर्ष के लिये सबसे उपयुक्त मंच है. सम्मेलन में प्रमुख वक्ता भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि यह गौरव केवल एक छात्र संगठन- 'एआईएसएफ' को ही हासिल है कि उसका जन्म आज़ादी के आंदोलन की कोख से हुआ और उसने आज़ादी की लडाई में हिस्सा लिया. उस दौर में यह आंदोलन की सभी प्रमुख धाराओं- कांग्रेस, सोशलिस्ट तथा कम्युनिस्ट विचारधारा के छात्रों का संयुक्त मंच था. छात्र आंदोलन के हितों और शिक्षा की उपादेयता को देखते हुये एआईएसएफ को छात्रों का संयुक्त मंच ही रहना चाहिये था लेकिन छात्रों को दलगत स्वार्थों की पूर्ति का मौहरा बनाने के लिये कांग्रेस ने एनएसयूआई तथा सोशलिस्टों ने समाजवादी युवजन सभा बनाली. आरएसएस जो स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजी हुकूमत को बचाने के काम में लगा था, ने आज़ादी आने के बाद जनसंघ/ भाजपा बनाली तथा एबीवीपी नामक छात्र संगठन बना लिया. जिसका उद्देश्य छात्रों को केवल सांप्रदायिकता और जाति के नाम पर बांटना है. छात्रों और समाज के बुनियादी सवालों से उसका कोई लेना देना नहीं. केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद केंद्र सरकार ने छात्रों के खिलाफ युध्द छेड रखा है और विद्यार्थी परिषद उसके सह्योग में छात्रों के खिलाफ षडयंत्र कर रही है. जगह जगह वामपंथी और अंबेडकरवादी छात्र संगठनो पर हमले बोले जा रहे हैं. छात्रों को अपने शैक्षिक हितों के साथ साथ विद्यार्थी परिषद के छात्र विरोधी कुकृत्यों का भी जबाव देना होगा. भाकपा के राज्य सहसचिव का. अरविंदराज स्वरुप ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों की शिक्षा और छात्रों को तबाह करने वाली नीतियों के खिलाफ जगह जगह जुझारू छात्र आंदोलन उग रहे हैं और अपने संघर्षो से कई जगह छात्रों ने सफलतायें हासिल की हैं. जेएनयू और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के संघर्ष इसका उदाहरण हैं. आने वाले दिनों में छात्रों, शिक्षा और उसके संस्थानो पर और तीव्र हमले होंगे और छात्रों को उसका जबाव भी मजबूती से देना होगा. छात्र आंदोलन को उचित दिशा देने का काम केवल एआईएसएफ कर सकता है अतएव उसे मजबूत बनाने की जरूरत है. भाकपा के जिला सचिव प्रोफेसर सुहेव शेरवानी ने कहा कि अलीगढ और उत्तर प्रदेश में एआईएसएफ तेजी से कदम बढा रही है. भाकपा हर तरह से उनका साथ देने को प्रतिबध्द है. उन्होने कहा कि माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि वह सभी को समान शिक्षा देने की व्यवस्था करे लेकिन राज्य सरकार ने इस ओर कोई कदम नहीं बढाया. हम सबको मिल कर सरकार पर दबाव बढाना चाहिये. प्रोफेसर शमीम अख्तर ने मोदी सरकार के फासिस्ट्वादी कदमों पर विस्तार से प्रकाश डाला. सम्मेलन को प्रदेश उपाध्यक्ष उत्कर्ष चतुर्वेदी, कु. फसलीन, यशपाल सिंह, देवेंद्र कुमार, गौरव सक्सेना, विनीत कुमार, पंकज सागर, अतुल, रवि शर्मा, अश्वनी कुमार, अभिषेक पचौरी, संतोष, यतेंद्र बघेल और हर्ष पालीवाल विवेक त्रिपाठी आदि ने भी संबोधित किया.
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ए.आई.एस.एफ. का पश्चिमी उत्तर प्रदेश का कार्यकर्ता सम्मेलन संपन्न सम्मेलन में झूठे देशभक्तों और पूंजीवादी ताकतों से लडने का लिया संकल्प: सबको एक समान शिक्षा, शैक्षिक कलेंडर लागू करने, छात्र संघों के चुनाव कराये जाने और सबको रोजगार दिये जाने की मांगों के लिये संघर्ष का किया आह्वान अलीगढ: आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन का पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक क्षेत्रीय सम्मेलन यहां उत्साह और गर्मजोशी के माहौल में संपन्न हुआ. बेहद गर्म मौसम के बावजूद सम्मेलन में आठ जिलों के 60 प्रतिनिधि शामिल हुये. सम्मेलन की अध्यक्षता ए.एम.यू. की एआईएसएफ की संयोजक कु. दूना मारिया भार्गवी भार्गवी ने की तथा संचालन एआईएसएफ अलीगढ के संयोजक अनीश कुमार ने किया. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एआईएसएफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष वलीउल्लाह खादरी ने शिक्षा पर बढते हमले, शिक्षा के बजट में की जारही कटौती, फीस में की जारही भारी वृध्दि, शिक्षा के निजीकरण और व्यापारीकरण तथा शिक्षा के भगवाकरण के प्रयासों पर सवाल खडे किये. उन्होने कहा कि केंद्र हो या राज्यों की सरकारें जन समुदाय को अपढ बना कर रखना चाहती हैं इसीलिये शिक्षा का बजट घटा रही हैं, विद्यार्थियों की फेलोशिप छीन रही है, जहां छात्र इसका विरोध कर रहे हैं उनको हर तरह से दबाया जारहा है. उन्होने सभी छात्रों से शिक्षा को बचाने और छात्रों के बुनियादी अधिकरों की रक्षा के लिये संघर्ष का आह्वान किया. कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि और संगठन के महासचिव विश्वजीत कुमार ने कहा कि जिन्होने अब तक देश व देशवासियों के साथ गद्दारी की है, वे आज देशभक्त होने का प्रमाण बांट रहे हैं. देश व प्रदेश में शिक्षा की हालत बद से बदतर होती जारही है. एकतरफ जहां छात्रों को उपयुक्त शिक्षा व रोजगार नहीं मिल रहे हैं वहीं उनके अधिकारों को कुचला जारहा है. इलाहाबाद विश्वविद्यालय, जे एन यू एवं रोहित वेमूला प्रकरण इसके उदाहरण हैं. इसलिये सभी को मुफ्त व समान शिक्षा , छात्रसंघों के चुनाव और रोजगार के लिये छात्रों का एकजुट संघर्ष ही छात्रों के भविष्य की रक्षा करेगा. एआईएसएफ इस संघर्ष के लिये सबसे उपयुक्त मंच है. सम्मेलन में प्रमुख वक्ता भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि यह गौरव केवल एक छात्र संगठन- 'एआईएसएफ' को ही हासिल है कि उसका जन्म आज़ादी के आंदोलन की कोख से हुआ और उसने आज़ादी की लडाई में हिस्सा लिया. उस दौर में यह आंदोलन की सभी प्रमुख धाराओं- कांग्रेस, सोशलिस्ट तथा कम्युनिस्ट विचारधारा के छात्रों का संयुक्त मंच था. छात्र आंदोलन के हितों और शिक्षा की उपादेयता को देखते हुये एआईएसएफ को छात्रों का संयुक्त मंच ही रहना चाहिये था लेकिन छात्रों को दलगत स्वार्थों की पूर्ति का मौहरा बनाने के लिये कांग्रेस ने एनएसयूआई तथा सोशलिस्टों ने समाजवादी युवजन सभा बनाली. आरएसएस जो स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजी हुकूमत को बचाने के काम में लगा था, ने आज़ादी आने के बाद जनसंघ/ भाजपा बनाली तथा एबीवीपी नामक छात्र संगठन बना लिया. जिसका उद्देश्य छात्रों को केवल सांप्रदायिकता और जाति के नाम पर बांटना है. छात्रों और समाज के बुनियादी सवालों से उसका कोई लेना देना नहीं. केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद केंद्र सरकार ने छात्रों के खिलाफ युध्द छेड रखा है और विद्यार्थी परिषद उसके सह्योग में छात्रों के खिलाफ षडयंत्र कर रही है. जगह जगह वामपंथी और अंबेडकरवादी छात्र संगठनो पर हमले बोले जा रहे हैं. छात्रों को अपने शैक्षिक हितों के साथ साथ विद्यार्थी परिषद के छात्र विरोधी कुकृत्यों का भी जबाव देना होगा. भाकपा के राज्य सहसचिव का. अरविंदराज स्वरुप ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों की शिक्षा और छात्रों को तबाह करने वाली नीतियों के खिलाफ जगह जगह जुझारू छात्र आंदोलन उग रहे हैं और अपने संघर्षो से कई जगह छात्रों ने सफलतायें हासिल की हैं. जेएनयू और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के संघर्ष इसका उदाहरण हैं. आने वाले दिनों में छात्रों, शिक्षा और उसके संस्थानो पर और तीव्र हमले होंगे और छात्रों को उसका जबाव भी मजबूती से देना होगा. छात्र आंदोलन को उचित दिशा देने का काम केवल एआईएसएफ कर सकता है अतएव उसे मजबूत बनाने की जरूरत है. भाकपा के जिला सचिव प्रोफेसर सुहेव शेरवानी ने कहा कि अलीगढ और उत्तर प्रदेश में एआईएसएफ तेजी से कदम बढा रही है. भाकपा हर तरह से उनका साथ देने को प्रतिबध्द है. उन्होने कहा कि माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि वह सभी को समान शिक्षा देने की व्यवस्था करे लेकिन राज्य सरकार ने इस ओर कोई कदम नहीं बढाया. हम सबको मिल कर सरकार पर दबाव बढाना चाहिये. प्रोफेसर शमीम अख्तर ने मोदी सरकार के फासिस्ट्वादी कदमों पर विस्तार से प्रकाश डाला. सम्मेलन को प्रदेश उपाध्यक्ष उत्कर्ष चतुर्वेदी, कु. फसलीन, यशपाल सिंह, देवेंद्र कुमार, गौरव सक्सेना, विनीत कुमार, पंकज सागर, अतुल, रवि शर्मा, अश्वनी कुमार, अभिषेक पचौरी, संतोष, यतेंद्र बघेल और हर्ष पालीवाल विवेक त्रिपाठी आदि ने भी संबोधित किया.
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ए.आई.एस.एफ. का पश्चिमी उत्तर प्रदेश का कार्यकर्ता सम्मेलन संपन्न सम्मेलन में झूठे देशभक्तों और पूंजीवादी ताकतों से लडने का लिया संकल्प: सबको एक समान शिक्षा, शैक्षिक कलेंडर लागू करने, छात्र संघों के चुनाव कराये जाने और सबको रोजगार दिये जाने की मांगों के लिये संघर्ष का किया आह्वान अलीगढ: आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन का पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक क्षेत्रीय सम्मेलन यहां उत्साह और गर्मजोशी के माहौल में संपन्न हुआ. बेहद गर्म मौसम के बावजूद सम्मेलन में आठ जिलों के 60 प्रतिनिधि शामिल हुये. सम्मेलन की अध्यक्षता ए.एम.यू. की एआईएसएफ की संयोजक कु. दूना मारिया भार्गवी भार्गवी ने की तथा संचालन एआईएसएफ अलीगढ के संयोजक अनीश कुमार ने किया. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एआईएसएफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष वलीउल्लाह खादरी ने शिक्षा पर बढते हमले, शिक्षा के बजट में की जारही कटौती, फीस में की जारही भारी वृध्दि, शिक्षा के निजीकरण और व्यापारीकरण तथा शिक्षा के भगवाकरण के प्रयासों पर सवाल खडे किये. उन्होने कहा कि केंद्र हो या राज्यों की सरकारें जन समुदाय को अपढ बना कर रखना चाहती हैं इसीलिये शिक्षा का बजट घटा रही हैं, विद्यार्थियों की फेलोशिप छीन रही है, जहां छात्र इसका विरोध कर रहे हैं उनको हर तरह से दबाया जारहा है. उन्होने सभी छात्रों से शिक्षा को बचाने और छात्रों के बुनियादी अधिकरों की रक्षा के लिये संघर्ष का आह्वान किया. कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि और संगठन के महासचिव विश्वजीत कुमार ने कहा कि जिन्होने अब तक देश व देशवासियों के साथ गद्दारी की है, वे आज देशभक्त होने का प्रमाण बांट रहे हैं. देश व प्रदेश में शिक्षा की हालत बद से बदतर होती जारही है. एकतरफ जहां छात्रों को उपयुक्त शिक्षा व रोजगार नहीं मिल रहे हैं वहीं उनके अधिकारों को कुचला जारहा है. इलाहाबाद विश्वविद्यालय, जे एन यू एवं रोहित वेमूला प्रकरण इसके उदाहरण हैं. इसलिये सभी को मुफ्त व समान शिक्षा , छात्रसंघों के चुनाव और रोजगार के लिये छात्रों का एकजुट संघर्ष ही छात्रों के भविष्य की रक्षा करेगा. एआईएसएफ इस संघर्ष के लिये सबसे उपयुक्त मंच है. सम्मेलन में प्रमुख वक्ता भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि यह गौरव केवल एक छात्र संगठन- 'एआईएसएफ' को ही हासिल है कि उसका जन्म आज़ादी के आंदोलन की कोख से हुआ और उसने आज़ादी की लडाई में हिस्सा लिया. उस दौर में यह आंदोलन की सभी प्रमुख धाराओं- कांग्रेस, सोशलिस्ट तथा कम्युनिस्ट विचारधारा के छात्रों का संयुक्त मंच था. छात्र आंदोलन के हितों और शिक्षा की उपादेयता को देखते हुये एआईएसएफ को छात्रों का संयुक्त मंच ही रहना चाहिये था लेकिन छात्रों को दलगत स्वार्थों की पूर्ति का मौहरा बनाने के लिये कांग्रेस ने एनएसयूआई तथा सोशलिस्टों ने समाजवादी युवजन सभा बनाली. आरएसएस जो स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजी हुकूमत को बचाने के काम में लगा था, ने आज़ादी आने के बाद जनसंघ/ भाजपा बनाली तथा एबीवीपी नामक छात्र संगठन बना लिया. जिसका उद्देश्य छात्रों को केवल सांप्रदायिकता और जाति के नाम पर बांटना है. छात्रों और समाज के बुनियादी सवालों से उसका कोई लेना देना नहीं. केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद केंद्र सरकार ने छात्रों के खिलाफ युध्द छेड रखा है और विद्यार्थी परिषद उसके सह्योग में छात्रों के खिलाफ षडयंत्र कर रही है. जगह जगह वामपंथी और अंबेडकरवादी छात्र संगठनो पर हमले बोले जा रहे हैं. छात्रों को अपने शैक्षिक हितों के साथ साथ विद्यार्थी परिषद के छात्र विरोधी कुकृत्यों का भी जबाव देना होगा. भाकपा के राज्य सहसचिव का. अरविंदराज स्वरुप ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों की शिक्षा और छात्रों को तबाह करने वाली नीतियों के खिलाफ जगह जगह जुझारू छात्र आंदोलन उग रहे हैं और अपने संघर्षो से कई जगह छात्रों ने सफलतायें हासिल की हैं. जेएनयू और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के संघर्ष इसका उदाहरण हैं. आने वाले दिनों में छात्रों, शिक्षा और उसके संस्थानो पर और तीव्र हमले होंगे और छात्रों को उसका जबाव भी मजबूती से देना होगा. छात्र आंदोलन को उचित दिशा देने का काम केवल एआईएसएफ कर सकता है अतएव उसे मजबूत बनाने की जरूरत है. भाकपा के जिला सचिव प्रोफेसर सुहेव शेरवानी ने कहा कि अलीगढ और उत्तर प्रदेश में एआईएसएफ तेजी से कदम बढा रही है. भाकपा हर तरह से उनका साथ देने को प्रतिबध्द है. उन्होने कहा कि माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि वह सभी को समान शिक्षा देने की व्यवस्था करे लेकिन राज्य सरकार ने इस ओर कोई कदम नहीं बढाया. हम सबको मिल कर सरकार पर दबाव बढाना चाहिये. प्रोफेसर शमीम अख्तर ने मोदी सरकार के फासिस्ट्वादी कदमों पर विस्तार से प्रकाश डाला. सम्मेलन को प्रदेश उपाध्यक्ष उत्कर्ष चतुर्वेदी, कु. फसलीन, यशपाल सिंह, देवेंद्र कुमार, गौरव सक्सेना, विनीत कुमार, पंकज सागर, अतुल, रवि शर्मा, अश्वनी कुमार, अभिषेक पचौरी, संतोष, यतेंद्र बघेल और हर्ष पालीवाल विवेक त्रिपाठी आदि ने भी संबोधित किया.
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ए.आई.एस.एफ. का पश्चिमी उत्तर प्रदेश का कार्यकर्ता सम्मेलन संपन्न सम्मेलन में झूठे देशभक्तों और पूंजीवादी ताकतों से लडने का लिया संकल्प: सबको एक समान शिक्षा, शैक्षिक कलेंडर लागू करने, छात्र संघों के चुनाव कराये जाने और सबको रोजगार दिये जाने की मांगों के लिये संघर्ष का किया आह्वान अलीगढ: आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन का पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक क्षेत्रीय सम्मेलन यहां उत्साह और गर्मजोशी के माहौल में संपन्न हुआ. बेहद गर्म मौसम के बावजूद सम्मेलन में आठ जिलों के 60 प्रतिनिधि शामिल हुये. सम्मेलन की अध्यक्षता ए.एम.यू. की एआईएसएफ की संयोजक कु. दूना मारिया भार्गवी भार्गवी ने की तथा संचालन एआईएसएफ अलीगढ के संयोजक अनीश कुमार ने किया. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एआईएसएफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष वलीउल्लाह खादरी ने शिक्षा पर बढते हमले, शिक्षा के बजट में की जारही कटौती, फीस में की जारही भारी वृध्दि, शिक्षा के निजीकरण और व्यापारीकरण तथा शिक्षा के भगवाकरण के प्रयासों पर सवाल खडे किये. उन्होने कहा कि केंद्र हो या राज्यों की सरकारें जन समुदाय को अपढ बना कर रखना चाहती हैं इसीलिये शिक्षा का बजट घटा रही हैं, विद्यार्थियों की फेलोशिप छीन रही है, जहां छात्र इसका विरोध कर रहे हैं उनको हर तरह से दबाया जारहा है. उन्होने सभी छात्रों से शिक्षा को बचाने और छात्रों के बुनियादी अधिकरों की रक्षा के लिये संघर्ष का आह्वान किया. कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि और संगठन के महासचिव विश्वजीत कुमार ने कहा कि जिन्होने अब तक देश व देशवासियों के साथ गद्दारी की है, वे आज देशभक्त होने का प्रमाण बांट रहे हैं. देश व प्रदेश में शिक्षा की हालत बद से बदतर होती जारही है. एकतरफ जहां छात्रों को उपयुक्त शिक्षा व रोजगार नहीं मिल रहे हैं वहीं उनके अधिकारों को कुचला जारहा है. इलाहाबाद विश्वविद्यालय, जे एन यू एवं रोहित वेमूला प्रकरण इसके उदाहरण हैं. इसलिये सभी को मुफ्त व समान शिक्षा , छात्रसंघों के चुनाव और रोजगार के लिये छात्रों का एकजुट संघर्ष ही छात्रों के भविष्य की रक्षा करेगा. एआईएसएफ इस संघर्ष के लिये सबसे उपयुक्त मंच है. सम्मेलन में प्रमुख वक्ता भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि यह गौरव केवल एक छात्र संगठन- 'एआईएसएफ' को ही हासिल है कि उसका जन्म आज़ादी के आंदोलन की कोख से हुआ और उसने आज़ादी की लडाई में हिस्सा लिया. उस दौर में यह आंदोलन की सभी प्रमुख धाराओं- कांग्रेस, सोशलिस्ट तथा कम्युनिस्ट विचारधारा के छात्रों का संयुक्त मंच था. छात्र आंदोलन के हितों और शिक्षा की उपादेयता को देखते हुये एआईएसएफ को छात्रों का संयुक्त मंच ही रहना चाहिये था लेकिन छात्रों को दलगत स्वार्थों की पूर्ति का मौहरा बनाने के लिये कांग्रेस ने एनएसयूआई तथा सोशलिस्टों ने समाजवादी युवजन सभा बनाली. आरएसएस जो स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजी हुकूमत को बचाने के काम में लगा था, ने आज़ादी आने के बाद जनसंघ/ भाजपा बनाली तथा एबीवीपी नामक छात्र संगठन बना लिया. जिसका उद्देश्य छात्रों को केवल सांप्रदायिकता और जाति के नाम पर बांटना है. छात्रों और समाज के बुनियादी सवालों से उसका कोई लेना देना नहीं. केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद केंद्र सरकार ने छात्रों के खिलाफ युध्द छेड रखा है और विद्यार्थी परिषद उसके सह्योग में छात्रों के खिलाफ षडयंत्र कर रही है. जगह जगह वामपंथी और अंबेडकरवादी छात्र संगठनो पर हमले बोले जा रहे हैं. छात्रों को अपने शैक्षिक हितों के साथ साथ विद्यार्थी परिषद के छात्र विरोधी कुकृत्यों का भी जबाव देना होगा. भाकपा के राज्य सहसचिव का. अरविंदराज स्वरुप ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों की शिक्षा और छात्रों को तबाह करने वाली नीतियों के खिलाफ जगह जगह जुझारू छात्र आंदोलन उग रहे हैं और अपने संघर्षो से कई जगह छात्रों ने सफलतायें हासिल की हैं. जेएनयू और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के संघर्ष इसका उदाहरण हैं. आने वाले दिनों में छात्रों, शिक्षा और उसके संस्थानो पर और तीव्र हमले होंगे और छात्रों को उसका जबाव भी मजबूती से देना होगा. छात्र आंदोलन को उचित दिशा देने का काम केवल एआईएसएफ कर सकता है अतएव उसे मजबूत बनाने की जरूरत है. भाकपा के जिला सचिव प्रोफेसर सुहेव शेरवानी ने कहा कि अलीगढ और उत्तर प्रदेश में एआईएसएफ तेजी से कदम बढा रही है. भाकपा हर तरह से उनका साथ देने को प्रतिबध्द है. उन्होने कहा कि माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि वह सभी को समान शिक्षा देने की व्यवस्था करे लेकिन राज्य सरकार ने इस ओर कोई कदम नहीं बढाया. हम सबको मिल कर सरकार पर दबाव बढाना चाहिये. प्रोफेसर शमीम अख्तर ने मोदी सरकार के फासिस्ट्वादी कदमों पर विस्तार से प्रकाश डाला. सम्मेलन को प्रदेश उपाध्यक्ष उत्कर्ष चतुर्वेदी, कु. फसलीन, यशपाल सिंह, देवेंद्र कुमार, गौरव सक्सेना, विनीत कुमार, पंकज सागर, अतुल, रवि शर्मा, अश्वनी कुमार, अभिषेक पचौरी, संतोष, यतेंद्र बघेल और हर्ष पालीवाल विवेक त्रिपाठी आदि ने भी संबोधित किया.
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ए.आई.एस.एफ. का पश्चिमी उत्तर प्रदेश का कार्यकर्ता सम्मेलन संपन्न सम्मेलन में झूठे देशभक्तों और पूंजीवादी ताकतों से लडने का लिया संकल्प: सबको एक समान शिक्षा, शैक्षिक कलेंडर लागू करने, छात्र संघों के चुनाव कराये जाने और सबको रोजगार दिये जाने की मांगों के लिये संघर्ष का किया आह्वान अलीगढ: आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन का पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक क्षेत्रीय सम्मेलन यहां उत्साह और गर्मजोशी के माहौल में संपन्न हुआ. बेहद गर्म मौसम के बावजूद सम्मेलन में आठ जिलों के 60 प्रतिनिधि शामिल हुये. सम्मेलन की अध्यक्षता ए.एम.यू. की एआईएसएफ की संयोजक कु. दूना मारिया भार्गवी भार्गवी ने की तथा संचालन एआईएसएफ अलीगढ के संयोजक अनीश कुमार ने किया. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एआईएसएफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष वलीउल्लाह खादरी ने शिक्षा पर बढते हमले, शिक्षा के बजट में की जारही कटौती, फीस में की जारही भारी वृध्दि, शिक्षा के निजीकरण और व्यापारीकरण तथा शिक्षा के भगवाकरण के प्रयासों पर सवाल खडे किये. उन्होने कहा कि केंद्र हो या राज्यों की सरकारें जन समुदाय को अपढ बना कर रखना चाहती हैं इसीलिये शिक्षा का बजट घटा रही हैं, विद्यार्थियों की फेलोशिप छीन रही है, जहां छात्र इसका विरोध कर रहे हैं उनको हर तरह से दबाया जारहा है. उन्होने सभी छात्रों से शिक्षा को बचाने और छात्रों के बुनियादी अधिकरों की रक्षा के लिये संघर्ष का आह्वान किया. कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि और संगठन के महासचिव विश्वजीत कुमार ने कहा कि जिन्होने अब तक देश व देशवासियों के साथ गद्दारी की है, वे आज देशभक्त होने का प्रमाण बांट रहे हैं. देश व प्रदेश में शिक्षा की हालत बद से बदतर होती जारही है. एकतरफ जहां छात्रों को उपयुक्त शिक्षा व रोजगार नहीं मिल रहे हैं वहीं उनके अधिकारों को कुचला जारहा है. इलाहाबाद विश्वविद्यालय, जे एन यू एवं रोहित वेमूला प्रकरण इसके उदाहरण हैं. इसलिये सभी को मुफ्त व समान शिक्षा , छात्रसंघों के चुनाव और रोजगार के लिये छात्रों का एकजुट संघर्ष ही छात्रों के भविष्य की रक्षा करेगा. एआईएसएफ इस संघर्ष के लिये सबसे उपयुक्त मंच है. सम्मेलन में प्रमुख वक्ता भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि यह गौरव केवल एक छात्र संगठन- 'एआईएसएफ' को ही हासिल है कि उसका जन्म आज़ादी के आंदोलन की कोख से हुआ और उसने आज़ादी की लडाई में हिस्सा लिया. उस दौर में यह आंदोलन की सभी प्रमुख धाराओं- कांग्रेस, सोशलिस्ट तथा कम्युनिस्ट विचारधारा के छात्रों का संयुक्त मंच था. छात्र आंदोलन के हितों और शिक्षा की उपादेयता को देखते हुये एआईएसएफ को छात्रों का संयुक्त मंच ही रहना चाहिये था लेकिन छात्रों को दलगत स्वार्थों की पूर्ति का मौहरा बनाने के लिये कांग्रेस ने एनएसयूआई तथा सोशलिस्टों ने समाजवादी युवजन सभा बनाली. आरएसएस जो स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजी हुकूमत को बचाने के काम में लगा था, ने आज़ादी आने के बाद जनसंघ/ भाजपा बनाली तथा एबीवीपी नामक छात्र संगठन बना लिया. जिसका उद्देश्य छात्रों को केवल सांप्रदायिकता और जाति के नाम पर बांटना है. छात्रों और समाज के बुनियादी सवालों से उसका कोई लेना देना नहीं. केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद केंद्र सरकार ने छात्रों के खिलाफ युध्द छेड रखा है और विद्यार्थी परिषद उसके सह्योग में छात्रों के खिलाफ षडयंत्र कर रही है. जगह जगह वामपंथी और अंबेडकरवादी छात्र संगठनो पर हमले बोले जा रहे हैं. छात्रों को अपने शैक्षिक हितों के साथ साथ विद्यार्थी परिषद के छात्र विरोधी कुकृत्यों का भी जबाव देना होगा. भाकपा के राज्य सहसचिव का. अरविंदराज स्वरुप ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों की शिक्षा और छात्रों को तबाह करने वाली नीतियों के खिलाफ जगह जगह जुझारू छात्र आंदोलन उग रहे हैं और अपने संघर्षो से कई जगह छात्रों ने सफलतायें हासिल की हैं. जेएनयू और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के संघर्ष इसका उदाहरण हैं. आने वाले दिनों में छात्रों, शिक्षा और उसके संस्थानो पर और तीव्र हमले होंगे और छात्रों को उसका जबाव भी मजबूती से देना होगा. छात्र आंदोलन को उचित दिशा देने का काम केवल एआईएसएफ कर सकता है अतएव उसे मजबूत बनाने की जरूरत है. भाकपा के जिला सचिव प्रोफेसर सुहेव शेरवानी ने कहा कि अलीगढ और उत्तर प्रदेश में एआईएसएफ तेजी से कदम बढा रही है. भाकपा हर तरह से उनका साथ देने को प्रतिबध्द है. उन्होने कहा कि माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि वह सभी को समान शिक्षा देने की व्यवस्था करे लेकिन राज्य सरकार ने इस ओर कोई कदम नहीं बढाया. हम सबको मिल कर सरकार पर दबाव बढाना चाहिये. प्रोफेसर शमीम अख्तर ने मोदी सरकार के फासिस्ट्वादी कदमों पर विस्तार से प्रकाश डाला. सम्मेलन को प्रदेश उपाध्यक्ष उत्कर्ष चतुर्वेदी, कु. फसलीन, यशपाल सिंह, देवेंद्र कुमार, गौरव सक्सेना, विनीत कुमार, पंकज सागर, अतुल, रवि शर्मा, अश्वनी कुमार, अभिषेक पचौरी, संतोष, यतेंद्र बघेल और हर्ष पालीवाल विवेक त्रिपाठी आदि ने भी संबोधित किया.
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