भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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शनिवार, 22 मई 2010

Bardhan demands shifting POSCO steel plant site


South Asia Mail today reported as under :


Bhubaneswar, May 21 (IANS) The agitation over the $12 billion steel project by South Korean steel major POSCO in Orissa seemed nowhere near its end Friday with the Communist Party of India demanding a change in the location of the greenfield plant. "We want the whole project to be shifted from the area identified near Paradip," said CPI general secretary A।B. Bardhan, a day after the state government decided to ask Posco to exclude around 300 acres of private land from the site earmarked for the plant in Jagatsinghpur district. “Giving up only 300 acres of private land cannot be a solution, Bardhan told reporters here, demanding a white paper from the government on the project. "The government should come out with a white paper on the cost of the project in terms of land... cost of the water people will be deprived of, what is the status of the forest land," he said। Bardhan also criticized the government for not settling the forest land in favour of the local villagers who have been living their since generations. “It is a matter of surprise that the government is claiming those lands as government land," he said.
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सड़क परिवाहन श्रमिकों का अखिल भारतीय विराट धरना

२३ अप्रैल २०१० को नेशनल फेडरेशन ऑफ इण्डियन रोड ट्रान्सपोर्ट वर्कर्स (एन।एफ.आई.आर.टी.डब्ल्यू.) के आह्वान पर देश के हर कोने से आये हजारों सड़क परिवहन श्रमिकों ने नई दिल्ली में जन्तर-मन्तर पर अखिल भारीतय विराट धरना आयोजित किया। इनमें से अधिकांश राज्य सड़क परिवहन उपक्रमों के श्रमिक थे, जबकि शेष निजी क्षेत्र के यात्री सड़क परिवहन एवं माल सड़क परिवहन के श्रमिक थे।ईशर सिंह, बी. रामाराव, बल्देव सिंह, घनघस एवं एच.वी. अनन्त सुब्बाराव की अध्यक्ष मण्डली ने धरने का संचालन किया।एन.एफ.आई.आर.टी.डब्ल्यू. के महसचिव एम.एल. यादव ने धरने का उद्घाटन करते हुए प्रगतिशील वैकल्पिक राष्ट्रीय सड़क परिवहन नीति एवं अन्य महत्वपूर्ण मांगों के बारे में 16 नवम्बर, 2007 को सकारात्मक विचार करने के लिए प्रस्तुत किये गये ज्ञापन की ओर केन्द्र सरकार का ध्यान आकर्षित करके इस बात पर गहरी नाराजगी जताई कि ना तो अभी तक हमारे प्रस्तावों को स्वीकार किया गया है और ना ही हमारे प्रतिनिधियों को बातचीत के लिये बुलाया गया है। उन्होंने रेखांकित किया कि एक वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार देश के 70 प्रतिशत लोगों की परिवहन आवश्यकता को पूरा करने के लिए 6,72,000 बसों की जरूरत है, किन्तु इस समय सार्वजनिक क्षेत्र एवं निजी क्षेत्र दोनों के पास केवल 2,75,000 बसें ही मौजूद हैं। इस तरह 3,97,000 बसों की कमी है। उन्होंने राज्य सड़क परिवहन उपक्रमों की भूमिका में माल परिवहन की गतिविधियों को जोड़ते हुए देश के लोगों की परिवहन जरूरतों को पूरा करने के लिये इन संस्थानों को मजबूत एवं विस्तारित करने काअनुरोध किया। उन्होंने कहा कि निजी क्षेत्र के यात्री एवं माल परिवहन दोनों में कार्यरत लगभग दो करोड़ असंगठित श्रमिक वेतन, सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा एवं अन्य सुविधाओं के सम्बन्ध में अलग-अलग बन्धनमुक्त नियोक्ताओं के निर्दयतापूर्ण शोषण के शिकार हैं। उन्होंने बताया कि एन.एफ.आई.आर.टी.डब्ल्यू. द्वारा सड़क परिवहन श्रमिकों के विभिन्न केन्द्रीय श्रमिक संगठनो को एक संयुक्त मोर्चे में लोने की पहल की जायेगी ताकि केन्द्र/राज्य सरकारों की निजीकरण की नीतियों के खिलाफ देशव्यापी संयुक्त संघर्ष किया जा सके।सांसद एवं एटक के महासचिव गुरुदास दास गुप्ता ने अपने सम्बोधन में केन्द्र सरकार के कई जन विरोधी कदमों को जिक्र करते हुये देश के सड़क परिवहन श्रमिकों का आह्वान किया कि वे देश की जनता एवं श्रमिक संगठनों पर केन्द्र सरकार के आने वाले तीव्र हमलों का मुकाबला करने के लिये बड़े संयुक्त संघर्ष की तैयारी करें। उन्होंने कहा कि आई.पी.एल. क्रिकेट के नाम पर लाखों करोड़ रुपयों की लूट हो रही है, किन्तु गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों सहित आम मेहनतकशों की समस्याओं पर ध्यान दनेे की फुर्सत केन्द्र सरकार को नहीं है। उन्होंने केन्द्र सरकार कीजनविरोधी नीतियों की कड़ी आलोचना की। धरनार्थियों को ईशर सिंह, बी. रामाराव, बल्देव सिंह घनघस, एच.वी. अनन्त सुब्बाराव, आर.एल. डोगरा एवं निर्मल सिंह धालीवाल आदि ने भीसम्बोधित किया। धरना प्रारम्भ होने से पूर्व राजाराम त्यागी ने सभ सहभागियों का स्वागत किया।केन्द्र सरकार को प्रस्तुत किये गये ज्ञापन में पूर्व में प्रस्तुत प्रगतिशील वैकल्पिक राष्ट्रीय सड़क परिवहन नीति के अलावा निम्न अन्य मांगों को दोहराया गया है:1. राज्य सड़क परिवहन उपक्रमों को उनकी आवश्यकता के अनुसार आसान ऋण देने के लिये राष्ट्रीय विकास वित्त निगम स्थापित किया जाये।2. मजबूत सड़कों का विस्तार करते हुये उनकी पर्याप्त सामयिक मरम्मत की व्यवस्था की जाये।3. राज्य सड़क परिवहन उपक्रमों को आपूर्ति किये जाने वाले डीजल, ऑयल एवं बस चैसिस आदि पर आबकारी शुल्क समाप्त किया जाये।4. निजी क्षेत्र के सड़क परिवहन श्रमिकों को उनकी नियोजित संख्या को दरकिनार करके, उन्हें उनके कार्यस्थानों पर उपलब्ध ई.एस.आई. योजना के माध्यम से चिकित्सा सुविधा दी जाये। यदि उनके कार्यस्थानों पर ई.एस.आई. योजना उपलब नहीं है, तो ऐसे सड़क परिवहन श्रमिकों को उनके नियोजकों या केन्द्र सरकार या राज्य सरकारों द्वारा चिकित्सा सुविधा दी जाने की व्यवस्था की जाये।5. निजी क्षेत्र के सड़क परिवहन श्रमिकों के लिये केन्द्र सरकार एवं राज्य सरकारों द्वारा सामाजिक सुरक्षा योजनायें बनायी जायें।6. सार्वजनिक क्षेत्र एवं निजी क्षेत्र दोनों के सड़क परिवहन श्रमिकों के टेªड यूनियन अधिकारों एवं लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा की जाये। ज्ञापन में निम्न अनुरोध किया गया हैः(अ) हमारे प्रगतिशील वैकल्पिक राष्ट्र सड़क परिवहन नीति दस्तावेज को स्वीकार किया जाये या इस बारे में कोई समय गंवाये बिना हमारे प्रतिनिधियों के साथ विचार विमर्श करने के लिये संयुक्त बैठक आयोजित की जाये, ताकि बारहवीं पंचवर्षीय योजना के मूर्तरूप लेने से पहले उसमें देश के लोगों के अनुकूल, सस्ती, सुरक्षित एवं प्रदूषणमुक्त प्र्रगतिशील सड़क परिवहन सेवायें देने के लिये उपयुक्त प्रावधान जोड़े जा सकें।(ब) उपरोक्त अन्य मांगों पर भी तत्काल सकरात्मक विचार किया जाये। केन्द्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री कमलनाथ द्वारा एन.एफ.आई.आर.टी.डब्ल्यू. के प्रतिनिधि मण्डल को आश्वस्त किया गया कि शीघ्र ही सड़क परिवहन मंत्रालय के अधिकारियों के साथ एन.एफ.आई.आर.टी.डब्ल्यू. के प्रतिनिधियों की संयुक्त बैठक आयोजित करवायी जायेगी। सांसद एवं एटक के महासचिव गुरुदास दास गुप्ता के नेतृत्व में गये एन.एफ.आई.आर.टी.डब्ल्यू. के प्रतिनिधि मण्डल में जी.एल. धर, डी.एल. सचदेव, बी. रामाराव, एच.वी. अनन्त सुब्बाराव, आर.एल. डोगरा एवं एम.एल यादव शमिल थे।
- हरगोविन्द शर्मा
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मुंबई किसकी...?

मुंबई किसकी? दिल्ली किसकी? और फिर चेन्नई और कोलकाता किसका? यह सिलसिला कहां रूकेगा? कोई पूछेगा भारत किसका?दिल्ली छोड़कर बाकी तीनों महानगरों के नाम आजाद भारत में क्षेत्रीय बोलचाल के अनुरुप ढाले गये। पर नये नामकरण का मतलब यह तो नहीं कि मुकामी सरदारों को महानगरों का ठेकेदार बनने दिया जाय और जनगण को इन्हीं ठेकेदारों की मनमर्जी के हवाले कर दिया जाय। इतिहास साक्षी है कि दिल्ली में कोई पंद्रह राजे-महारजे हुए और दिल्ली कम से कम पंद्रह मर्तबा बनी और उजड़ी। तो फिर आज दिल्ली पर किसकी दावेदारी मंजूर की जाय।इतिहास में झांके तो बंबई कभी भी मराठा राज का अंग नहीं बना। नयी दिल्ली की तरह बंबई, मद्रास और कलकत्ता अंग्रेज उपनिवेशवादियों के बसाये नये शहर है। आजादी के बाद इन शहरों के दावे-प्रतिदावे महज वोट-बटोरू छुद्र नारे हैं, जिसका कोई संबंध धर्म, भाषा, क्षेत्र और संस्कृति से दूर-दूर तक नहीं है। दिल्ली के उपराज्यपाल तेजेन्द्र खन्ना और मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने यूपी-बिहारवालों के दिल्ली आने-जाने, चलने-फिरने, काम-धाम और रोजगार करने पर प्रश्न उठाये तो शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने तुरंत उन्हें बधाई का संदेश भेजा। बाल ठाकरे ने अपने अखबार ‘सामना’ में शीलाजी की खूब वाहवाही की। ऐसा उन्होंने संभवतः इसलिए किया कि उन्हें मालूम है कि शीला दीक्षित भी दिल्ली के लिए वैसे ही प्रवासी हैं, जैसे स्वयं बाल ठाकरे मुंबई के लिए प्रवासी हैं। बाल ठाकरे के पिताजी ने अपने परिवार के इतिहास के बारे में लिखा है कि उनके पूर्वज चंद्रसेन कायस्थ थे, जो पाटलिपुत्र (मगध) से चलकर खंडवा (मध्य प्रदेश) पहुंचे और बाद में महाराष्ट्र आकर बस गये। ठाकरे परिवार मूलतः बिहारी हैं, इनके पूर्वज बिहार वासी थे, जो तत्कालीन मगध सम्राट से प्रताड़ित होकर महाराष्ट्र में शरण लिये। मशहूर स्तंभ लेखक मस्तराम कपूर ने (जनसत्ता: 9 मार्च 2009) में इस तथ्य को भली प्रकार उजागर किया है।पुरानी कहावत है, नया मियां बहुत प्याज खाता है। मियां प्याज कम खाता है या ज्यदा, यह विवाद का विषय हो सकता है, किंतु इस पर कोई विवाद नहीं है कि हिटलर स्वयं आस्ट्रियायी था, जिसने सत्ता के लिए जर्मन श्रेष्ठता का सिद्धांत प्रचारित किया और मानवता को भीषण युद्ध की विभीषिका में धकेल दिया। उसी तरह बिहारी मूल के बाल ठाकरे मराठी उन्माद पैदा करते हैं तो इसका मकसद सस्ती लोकप्रियता से सत्ता हथियाना है।मुंबई का नाम 1995 के पहले तक बंबई था। बंबई के मूल निवासी कोली मछुयारे हैं। आठ द्वीपों का यह भूखंड प्रारंभ मंे समुद्री दलदल था। सम्राट अशोक के समय यह मौर्य साम्राज्य का अंग था। बाद में इस द्वीप समूह पर आंघ्र के सातवाहनों का शासन कायम हुआ। सन् 1343 में इसे गुजरात के शासकों ने अपने अधिकार में लिया। सन् 1534 में पुर्तगालियों ने इसे गुजरात के राजा बहादुरशाह से ले लिया। पुर्तगाली इस भूखंड को बोमबहिया पुकारने लगे। खाड़ी को पुर्तगाली भाषा में ‘बहिया’ कहा जाता है। सन् 1661 में पुर्तगाली राजा ने अपनी बेटी बिग्रांजा की शादी अंग्रेज राजकुमार के साथ तय की तो बोमबहिया को उपहार के रूप में उसने अपने अंग्रेज दामाद चार्ल्स द्वितीय को दे दिया। सन् 1668 में चार्ल्स ने बोमबहिया को ईस्ट इंडिया कंपनी को भाड़े पर दे दिया। ईस्ट इंडिया कंपनी बोमबहिया के बतौर भाड़ा सालाना 10 पौंड सोना चार्ल्स को अदा करती थी। यह भूभाग ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों में आने पर इसे एक बंदरगाह के रूप में विकसित किया गया। अंग्रेजों ने ‘बोम’ शब्द को बरकरार रखा, किंतु पुर्तगाली ‘बहिया’ अर्थात् खाड़ी को अंग्रेजी बे (इंल) से बदल दिया, क्योंकि खाड़ी को अंग्रेजी भाषा में ‘बे’ कहा जाता है। इस तरह बोमबहिया बोम्बे (ठवउइंल) हो गया।सन् 1661 से 1675 के बीच बोम्बे की आबादी 10 हजार से बढ़कर 60 हजार हो गयी। 1687 में ईस्ट इंडिया कंपनी का मुख्यालय सूरत से बदलकर बोम्बे आ गया। तब यह बोम्बे प्रिसिडेंसी का मुख्यालय बना। 1857 के बाद बोम्बे ब्रिटिश सरकार के अधीन हो गया। कालक्रम में बोम्बे ब्रिटिश सरकार के अधीन हो गया। कालक्रम में बोम्बे कपास का प्रमुख केंद्र बना। 1869 में स्वेज नहर के निर्माण के बाद बंबई अरब सागर का प्रमुख बंदरगाह बन गया। जाहिर है बिहार का संबंध बंबई से मौर्यकालीन पुराना है।सन् 1955 में जब बंबई राज्य का बंटवारा भाषाई आधार पर गुजरात और महाराष्ट्र के रूप में हुआ तब भी यह विवद तेजी से उठा था कि बंबई गुजरात को मिले या महाराष्ट्र को भाषाई आधार पर बंबई को महाराष्ट्र में मिलाने का बाबा साहब अंबेडकर ने विरोध किया था। अंबेडकर बंबई को अलग राज्य का दर्जा देने के समर्थक थे, क्योंकि बंबई में किसी एक भाषा का बोलबाला नहीं था। बंबई सब दिनों से बहुभाषी शहर रहा है। इसी तरह का विवाद मद्रास प्रिसीडेंसी का बंटवारा किये जाने के समय उठा था कि मद्रास प्रिसीडेंसी का बंटवारा किये जाने के समय उठा था कि मद्रास आंध्र प्रदेश में रहे या तामिलनाडु में। इस तरह के सवाल उठने का सहज कारण यह था कि इन महानगरों के निर्माण में स्थानीय लोगों के मुकाबले बाहर के लोगों का ज्यादा योगदान था।दुनिया के सभी महानगरों का निर्माण निर्विवाद रूप से प्रवासी मजदूरों ने किया है। बंबई द्वीप समूह को विकसित करने में सबसे बड़ा योगदान ईरान से आये पारसियों का है। पारसी 9वीं सदी में भारत आये। बंबई के आठ द्वीपों को एक साथ जोड़ने की योजना में पारसी व्यवसायी समुदाय ने सर्वाधिक धन लगाया। बंबई नगर के विकास में जिन भारतीयों के नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज है, वे हैं भाऊदाजी, जमशेदजी जीजीभाई, दादा भाई नौरोजी, कवासजी जहांगीर, नौरोजी फुर्दनजी, फ्रामजी कवासजी, मंगलदास नाथुभाई, प्रेमचंद रामचंद, गोकुलदास तेजपाल, मो। इब्राहिम, मुहम्मद अली रोधे, बाल श्री जांभेकर और जगन्नाथ शंकर सेठ जो नाना शंकर सेठ के नाम से प्रसिद्ध थे। इनमें जांभेकर को छोड़कर बाकी सभी बाल ठाकरे की परिभाषा में गैरमहाराष्ट्रीयन हैं। नाना शंकर सेठ जिनका बंबई के निर्माण में सर्वाधिक योगदान सर्वमान्य है, वे गुजरात से आकर यहां बसे थे। वे बंबई कार्पोरेशन, बंबई एसेम्बली, बंबई विश्वविद्यालय सहित अनेक संस्थाओं के निर्माता थे। भारतीय रेल के संस्थापकों में उनका नाम है। विक्टोरिया टरमिनस (वीटी) रेलवे स्टेशन, (जिसे इन दिनों छत्रपति शिवाजी के नाम से जाना जाता है) की दीवार पर नाना श्ंाकर सेठ की आदमकद प्रतिमा अंकित है। बंबई नगर निगम परिसर में भी इनकी भव्य प्रस्तर मूर्ति खड़ी है। जिस बंबई ऐसासिएशन की नींव पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 में हुई, उसके 12 वर्षों तक लगातार अध्यक्ष नाना शंकर सेठ थे। बंबई के मराठीकरण का जो आक्रामण अभियान शिवसेना ने चला रखा है, उस पर लगाम नहीं लगायी गयी तो कोई अचरज नहीं कि नाना शंकर सेठ, दादाभार्ठ नौरोजी आदि नामों को मिटाकर छत्रपति शिवाजी के साथ-साथ बाल ठाकरे और राज ठाकरे के नाम लिख दिये जायें।परिस्थिति की विडंबना यह है कि राष्ट्रीय पार्टियां भी आज क्षेत्रीय पार्टियों के दबाव में पहचान खो रही हैं। यह तथ्य छिपा नहीं है कि अपने खिसकते जनाधार पर काबू पाने के लिए कांग्रेस शिवसेना के प्रति हमेशा नरम और सांठगांठ की मुद्रा में रही है। भाजपा शिवसेना प्रेम प्रकट है। मुंबई की आबादी में उत्तर भारतीयों की तादाद 21 प्रतिशत है। मुंबई में गुजराती 18 प्रतिश्ता, तमिल 3 प्रतिशत, सिंधी 3 प्रतिशत और दूसरे 12 प्रतिशत हैं। इस तरह मुंबई में 57 प्रतिशत गैरमराठी हैं। अलबत्ता मुंबई में सबसे बड़ा भाषाई समूह मराठी 43 प्रतिशत है। बाल$राज$ उद्धव ठाकरे के आक्रामक अभियान का मकसद गैरमराठियों को मुंबई से भगना है और जबरन मराठियों का वर्चस्व कायम करना है।इस सिलसेल में यहां एक ताजा वाकया बताना दिलचस्प होगा। पिछले महीने राहुल गांधी मुंबई दौरे पर गये। राहुल गांधी की नाटकियता इन दिनों हमेशा अखबारों की सुर्खियां बनती हैं। मुंबई में राहुल भाड़े की टैक्सियों में चले और ट्राम का सफर किया। ट्राम का भाड़ा चुकाने के लिए बांद्रा की सड़क पर एक एटीएम से पैसे भी निकाले। इसकी चर्चा अखबारों में चटपटी मसालों की तरह हुई। बाल ठाकरे भी पीछे नहीं रहे। उन्होंने अपने अखबार ‘सामना’ में लिखा: ”देखों मराठियों, राहुल मुंबई से पैसे निकाल रहा है। मुंबई का पैसा बाहर जा रहा है। इसे ही मैं रोकना चाहता हूं!“जाहिर है, ऐसा लिखकर जो संदेश बाल ठाकरे मराठियों को देना चाहते हैं, इसे लागू किया गया तो वह संदेश मुंबई तक सीमित नहीं रहेगा। ऐसी ही जहरीली भाषा दूसरे भी बोलने लगे तो देश का क्या होगा। आखिर मुंबइ में कहां का पैसा जमा होता है? राष्ट्रीयकृत बैंकों में जमा रकम का हिसाब बताता है कि यूपी और बिहार से लोगों की बचत जमा रकम का 73 प्रतिशत मुंबई औरे दिल्ली में निवेश होता है। आजादी के बाद बिहार ने अपने खर्चे से कोयला, अबरख और विभिन्न खनिज मुंबई पहुंचाया। भाड़ा मानकीकरण का सिद्धांत अपनाया गया, जिसके मुताबिक बिहारियों को उसी दर से कोयला मिला जिस दर से मुंबई के कारखानों को। इसका नतीजा यह हुआ कि बिहार से मुंबई तक कोयला की ढुलाई का बिल बिहारवासियों ने चुकाया। ख्निज संपदा बिहार में, किंतु उसकी प्रोसेसिंग के कारखाने कलकत्ता और मुंबई में खुले। यह बंदरगाहमुखी औपनिवेशिक व्यापार व्यवस्था थी जिसे आजाद भारत में बदला नहीं गया। बिहार में कार्यरत कंपनियों के मुख्यालय कलकत्ता और मुंबई में रखे गये। फलः बिहार को राजस्व घाटा होता रहा। माल बिहार का तो उसका राजस्व कलकत्ता-मुंबई को क्यों? बाल ठाकरे को यह हिसाब समझाना पड़ेगा कि बिहार का पैसा कैसे महानगरों में जमा होता है। क्या प्रवासी मजदूर स्थानीय लोगों का रोजगार छीनता है? कुछ साल पहले गुवाहटी रेलवे माल गोदाम में ढुलाई का काम करनेवाले बिहारी पल्लेदार मजदूरों को असम के उग्रवादी उल्फावालों ने कहा: “तुम लोग गुवाहाटी छोड़ो, ये काम असमवासी करंेगे।” एटक के नेतृत्व में बिहारी पल्लेदारों ने समझदारी से काम किया उन्होंने काम छोड़ दिया और कहा “असमवासी को पहले काम करने दिया जाएगा और काम बचेगा तो बिहारी पल्लेदार करेंगे।” ऐसा दो-तीन हफ्तों तक चला। बाद में असमवासियों का आना बंद हो गया। बिहारी पल्लेदार पूर्ववत काम करने लगे।अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के अनेक अध्ययन बताते हैं कि प्रवासी मजदूर स्थानीय लोगों के काम नहीं छीनते। प्रवासी मजदूरों के काम दुनिया भर में अंग्रेजी के तीन प्रथमाक्षरों से पहचाना जाता है - डर्टी, डिमीनिंग, डेंजरस अर्थात् गंदा, घटिया और खतरनाक। जाहिर है, ऐसे ही काम आमतौर पर प्रवासी मजदूरों के नसीब होते हैं, जो स्थानीय लोग करना पसंद नहीं करते। अगर बंबई के जनजीवन से प्रवासी मजदूर अलग हो जायें तो बंबई महानगर अस्त-व्यस्त हो जाएगा।संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा पलायन और विकास पर जारी किया गया ताजा प्रतिवेदन बताता है कि किसी राज्य की जनसंख्या में प्रवासी लोगों के कारण एक फीसदी बढ़ोतरी है तो उस राज्य के जीडीपी में कम से कम एक फीसदी की बढ़ोतरी जरूर होगी। प्रतिवेदन में साफ कहा गया कि प्रवासी लोगों के कारण न तो स्थानीय लोगों को रोजगार छीनता है और न ही स्थानीय सार्वजनिक सेवाओं पर प्रवासी लोगों का भार बढ़ता है। सरकारी निकम्मापन छिपाने के लिए और पूंजीवादी मार्ग की विफलता से उत्पन्न जनाक्रोश को बेराह करने के निमित्त मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और बाल ठाकरे जैसे नेता फौरी तौर पर गलतबयानी करके राजनीतिक उन्माद की रोटी सेंकते हैं। पूंजीवाद ने असमानता पैदा की है। पूंजीवादी असमान विकास ने क्षेत्रीय विषमता और क्षेत्रीय तनाव पैदा किये हैं। भारत के हरेक राज्य का मजदूर हरेक राज्य में काम करता है। महाराष्ट्र के छः प्रतिशत प्रवासी मजदूर आंध्र, गुजरात अन्य राज्यों में काम करते हैं। इसी तरह तमिलनाडु, केरल जैसे विकसित राज्यों के लाखों मजदूर अन्य राज्यों में काम करते हैं। फिर भी बिहार, यूपी, मध्यप्रदेश, उड़ीसा जैसे पिछड़े राज्यों के लिये उचित है कि अपने संसाधनों का बेहतर उपयोग केमाध्यम से रोजगार जन्य उद्योगों का जाल बिछायें ताकि राज्य के बाहर रोटी रोजी के लिए पलायन की दिशा रोकी जा सके। आईएलओ द्वारा गठित विश्व आयोग ने अपने प्रतिवेदन में भी लिखा है कि वैश्वीकरण की वर्तमान प्रक्रिया एकांगी है। सीमा पार पूंजी के गमनागमन के साथ प्रवासी मजदूरों के गमनागमन को पूरक बनाना होगा।
- सत्य नारायण ठाकुर
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बैंक कर्मचारियों का वेतन वार्ता हेतु नवॉं वेतन समझौता - दो लाख 60 हजार सेवारत व एक लाख सेवानिवृत्त कर्मचारियों को पेंशन लाभ

तीस माह की लम्बी जद्दोजहद के बाद अन्ततोगत्वा ऑल इंडिया बैंक इम्पलाईज एसोसियेषन के नेतष्त्व में यूएफबीयू द्वारा 8 लाख बैंक कर्मचारियों एवं अधिकारियों, जो कि 26 सरकारी बैंकों, 12 निजी बैंकों और 8 विदेषी बैंकों में काम करते हैं, के वेतन वष्द्धि हेतु द्विपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर कर दिये गये जिससे 01।11.2007 से 17.50 प्रतिषत् की वेतन वृद्धि पिछली बकाया राषि के भुगतान सहित कर्मचारियो ंको मिलने का मार्ग प्रषस्त हो गया। इस समझौते से 3 लाख 50 हजार ऐसे कर्मचारी एवं अधिकारी जो वर्ष 1993 से 2010 के बीच सेवानिवृत्त हो चुके हैं और वर्ष 1993 में कतिपय यूनियन नेताओं के बहकावे में आकर पेंषन योजना का विकल्प नहीं दे पाये थे, भी 27.09.2009 से पेंषन प्राप्त कर सकेंगें । इस समझौते से बैंक कर्मचारियों एवं अधिकारियों में अपार खुषी का वातावरण है तथा इससे कर्मचारियों की यूनियन और उसके नेतृत्व में आस्था सुदृढ़ हुई है। इस समझौते की मुख्य बातें निम्न प्रकार हैंः-01. सरकार द्वारा सरकारी कर्मचारियों को हमेेषा से मिलने वाली पेंषन सुविधा को बन्द करने के बावजूद, बैंक प्रबन्धन एवं सरकार के गठजोड़ की तमाम नापाक साजिषों को विफल करते हुये यूनियन सभी कर्मचारियों के लिये पेंषन सुविधा जो कि एक आवष्यक सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बहाल कराने में सफल रही है । 02. पेंषन के समझौते से न केवल वर्तमान में कार्यरत् दो लाख 60 हजार कर्मचारी/अधिकारी सेवानिवृत्ति के बाद पेंषन प्राप्त कर सकेंगें बल्कि पिछले 15 वर्षों में सेवानिवृत्त हो चुके एक लाख से अधिक कर्मचारी एवं उनकी मत्यु की दषा में उनके परिजन पेंषन का लाभ उठा सकेंगें।03. यूनियन ने लिपिक वर्ग जिसके लिये भर्ती की न्यूनतम योग्यता प्रथम श्रेणी में हाई स्कूल है, की भर्ती के समय न्यूनतम वेतन एवं परिलब्धियॉं लगभग 12000/- कराने में सफलता प्राप्त की है ताकि करोड़ो षिक्षित बेरोजगार ईमानदारी से जीवन यापन कर सकें।04. सरकार एवं बैंकर्स के तमाम प्रयासों के बावजूद एआईबीईए के वर्ष 1964 के निर्णय कि हम अपने वेतन का फैसला स्वयं बैंक प्रबन्धन के साथ वार्ता से करेंगें, को एक बार फिर नवीं बार लागू करने में यूनियनें सफल रही हैं। सरकारी कर्मचारियों की तरह बैंक कर्मचारियों का फैसला तीसरे पक्ष के निर्णय पर निर्भर नहीं है। यही कारण है कि छठें वेतन आयोग की घोर कर्मचारी विरोधी सिफारिषें यथा - वर्ग चार के 18 लाख पदों को समाप्त कर देना, ठेके पर काम कराना आदि को बैंक यूनियनों द्वारा मजबूती के साथ नकार दिया गया है। 05. बैंक कर्मचारी अपनी मेहनत से जो लाभ कमाता है, बैंक उसी में से बैंक कर्मचारियों को वेतन एवं सुविधायें देते हैं, सरकारी कर्मचारियो ंकी भॉंति बैंक कर्मचारियों के वेतन की पूर्ति आम जनता पर टैक्स लगाकर नहीं की जाती। अतः वेतन वष्द्धि जो न्यायोचित हो और बैंकों की आर्थिक स्थिति के परिपेक्ष्य में तर्कसंगत हो, पर ही यूनियनें समझौता करती है। 06. बैंक प्रबन्धन एवं सरकार गम्भीर बेरोजगारी के बावजूद ठेके पर काम कराने को बढ़ावा दे रही है। यूनियनों ने इस समझौते में किसी भी प्रकार के काम को ठेके पर देने की अतिरिक्त अनुमति नहीं दी है। 07. बैंक यूनियन की एकता को छिन्न-भिन्न करने एवं सदस्यों का नेतृत्व में विष्वास कमजोर करने के लिये तमाम तरह की अफवाहें पिछले 30 माह से जारी रहीं और पिछले तीन दिनों में ऐसे तत्व यूनियन को बदनाम करने के लिये दिन-रात सक्रिय रहे। संतोष का विषय है कि बैंक कर्मचारियों ने ऐसे तत्वों को पूरी तरह तिरस्कृत कर दिया। 08. सरकार की देष विरोधी एवं जन-विरोधी आर्थिक नीतियों का विरोध करने के लिये गठित यूनाईटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस को छिन्न-भिन्न करने के लिये तमाम प्रयास किये गये। यह गर्व का विषय है कि इन सभी साजिषों को विफल करते हुये शत्-प्रतिषत् बैंक कर्मचारियांे का प्रतिनिधित्व करने वाली 9 यूनियनों ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किये। 09. सरकार द्वारा 35 लाख सरकारी कर्मचारियों को छठे वेतन आयोग की सिफारिषों के अनुरूप दी गयी वेतन वृद्धि पर 12 हजार 5 सौ करोड़ रूपया खर्च किया गया जबकि 8 लाख बैंक कर्मचारियों की वेतन वृद्धि पर समझौते के अंतर्गत 5200 करोड़ रूपया प्रतिवर्ष अतिरिक्त व्यय किया जा रहा है । इसके अलावा पेंषन का विकल्प देने पर जहॉं कर्मचारी 2800 करोड़ रूपये का अंषदान देंगें वहीं प्रबन्घन 6300 करोड़ रूपया खर्च करेंगें। 30 माह के बकाया भुगतान पर बैंकों को 13000 करोड़ रूपया और पेंषन विकल्प सहित कुल 19300 करोड़ रूपया खर्च करना पड़ेगा। कहा जाता है कि सरकारी कर्मचारियों का वेतन 60 प्रतिषत् से 90 प्रतिषत् बढा दिया गया है जो सिवाय गुमराह करने के कुछ नहीं है। यही कारण है किमध्यम एवं निम्न श्रेणी के कर्मचारी अपने को ठगा महसूस करते हुये लगातार आन्दोलनरत् हैं।हम इस अवसर पर जहॉं प्रदेष के बैंक कर्मचारियों को उनकी एकजुटता संघर्षषीलता एवं सफल हड़तालों के बाद मिली इस सफलता के लिये बधाई देते हैं वहीं बैंक कर्मचारियों की जायज मॉंगों का समर्थन करने के लिये सभी ट्रेड यूनियनों एवं प्रेस मीडिया का धन्यवाद करते हैं। हम इस अवसर पर इस बात का पुनः संकल्प लेते हैं कि सरकार द्वारा सरकारी बैंको ंको बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को बेचने के उद्देष्य से इनके निजीकरण की जो साजिष की जा रही है, उनका मजबूती के साथ विरोध किया जायेगा। यह समझौता 31 अक्टूबर, 2012 तक के लिये लागू है, उसके बाद फिर जहॉं हम अपनी वेतन वृद्धि की मॉंग के लिये संघर्ष करेगें वहीं देष की आम जनता विषेषकर बैंक ग्राहकों के हितों की रक्षा करने के लिये सरकार से टकराने में किसी प्रकार की हिचकिचाहट न रखते हुये यूनियन को आगे बढ़ायेगें ।
- एन.के.बंसल
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बंधुआ मजदूरी का बदलता चेहरा

बंधुआ मजदूरों का जिक्र करने पर सरकार का सीधा और साफ जवाब होगा कि अब देश में मजदूरों को बंधुआ नहीं बनाया जा रहा है। केंद्र और राज्य सरकारें दोनों इस बात पर साथ-साथ दिखाई पड़ती हैं। केंद्र व राज्य सरकरों के श्रम मंत्रालय की जारी रपटों से इस बात की हमें जानकारी भी मिलती है कि देश में न तो अब बंधुआ मजदूर हैं और न बनाए जा रहे हैं। देश में बंधुआ मजदूरी उन्मूलन का कानून 1975 से लागू है। इस कानून के लागू होने के बाद से सरकारों ने अपने प्रयासों के जरिए बंधुआ मजदूरी की व्यवस्था को जड़ से उखाड़ फेंका है। यह दावा हर सरकार बढ़-चढ़ कर करती है। लेकिन हकीकत ठीक इसके उलट है।बीते दिनों, बीस राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों के कई शहरों में हुए एक सर्वेक्षण ने देश में बंधुआ मजदूरी के मामले मंे सरकारी दावों की कलई खोल कर रख दी है। असंगठित क्षेत्रों के कामगारों के लिए बनाई गई राष्ट्रीय अभियान समिति के अगुवाई में मजदूरों के लिए काम कर रहे कई मजदूर संगठनों व गैर-सरकारी संगठनों के इस राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण से पता चलता है कि देश मेंबंधुआ मजदूरी खत्म नहीं हुई है। भले ही इसक स्वरूप नई जरूरतों के हिसाब से बदल गया है, लेकिन असंगठित क्षेत्रों में हो रहा ज्यादातर श्रम, किसी न किसी रूप में, बंधुआ मजदूरी का ही एक रूप है। यह तथ्य भी सामने आया है कि आज देश के ज्यादातर इलाकों में बंुधआ मजदूरी की परंपरा के फिर से जड़ पकड़ने की बड़ी वजह पलायन और विस्थापन है।किसी मजदूर को अपना गांव घर छोड़ कर दूसरी जगह मेहनत करने इसलिए जाना पड़ता है, क्योंकि अपने इलाके में उसे दो वक्त की रोटी भी ठीक ढंग से नहीं मिल पाती है। कहीं सूखा, कहीं बाढ़ या फिर किसी के पास खेती के लिए नाकाफी जमीन मजदूरी का एक बड़ा कारण बनते हैं। ऐसे में, वे जो बस ख्ेातिहर मजदूर हैं, दोहरी मार झेलते हैं। एक तो अपने इलाकों में खेती के बदतर स्थिति के कारण मजूरी बहुत कम पाते हैं और फिर दबंगों व सामंतों की धौंस अलग सहते हैं। बेहतरी की उम्मीद में ही वे पलायन करने को मजबूर होते हैं।बंधुआ मजदूरी का नया स्वरूप जो सामने आया है, उसमें मजदूरों का सबसे बड़ा हिस्सा ऐसे मजदूरों का ही है।ख्ेाती, ईंट-भेट्टा, निर्माण-उद्योग और खदानों जैसे कई व्यवसायों में अपना खून-पसीना एक करने वाले मजदूरों को बड़े ही सुनियोजित तरीके से बंधुआ बनाया जाता है। मजदूरों को नियुक्त करवाने वाले दलाल शुरूआत में ही थोड़े से रुपए बतौर पेशगी देकर लोगों को कानूनन अपन कर्जदार बना देता है। रुपयों के चक्कर में पड़ कर मजदूर अपने नियोक्ता या इन दलालों काबंधुआ बन कर रह जाता है।अधिकतर मामलों में, ये दलालसंबंधित उद्योगों की नजर में मजदूरों के ठेकेदार होते हैं। इन ठेकेदारों सेप्रबंधन अपनी जरूरत के मुताबिक मजदूरों की आपूर्ति करने को कहता है और मजदूरों के श्रम का भुगतान भी ये ठेकेदार ही करते हैं। बाद में ये ठेकेदार या दलाल, आप इन्हें जो भी संज्ञा दें, मजदूरों के भुगतान में हर तरह की बेईमानी करते हैं। नियोक्ता और श्रमिक के बीच दलालों की यह महत्वपूर्ण उपस्थिति मजदूरों के शोषण को और गंभीर बना देती है। दलाल मजदूरों का हक मारने में किसी तरह से गुरेज नहीं करते, उन्हें न्यूनतम दिहाड़ी देना तो दूर की बात हैं। मजदूरों का मारा गया हक ही इन दलालों के लिए मुनाफा है। ऐसी स्थिति में मजदूरों के प्रति किसी भी प्रकार की जिम्मेदारी, जैसे कि रहने और आराम करने के जगह की व्यवस्था, स्वास्थ्य सुविधाएं, बीमा, खाने के लिए भोजन और पीने के लिए पानी को सुलभ बनाना और दुर्घटनाओं के स्थिति में उपचार जैसी बातों से अमूमन नियोक्ता अपने आप को विमुख कर लेता है। नियोक्ता इन सब के लिए ठेकेदारों को जिम्मेदार बताता है तो ठेकेदार नियोक्ता को और ऐसे में मजदूर बेचारे बड़े बदतर स्थिति में इसी तरह खटते रहते हैं।महानगरों में काम करने वाली घरेलू नौकरानियों का ही उदाहरण लें। गरीबी और भूख के साथ-साथ विकास परियोजनाओं के कारण विस्थापित हो रहे छत्तीसगढ़ और झाड़खंड के आदिवासी रोजी-रोटी के लिए इधर- उधर भटकते रहते हैं। ऐसे में आदिवासी लड़कियों को श्रम-दलाल महानगर ले आते हैं। उन्हें प्रशिक्षित करके दूसरों के घरों में घरेलू काम करने के लिए भेजा जाता है। इन घरों में ऐसी लड़कियों की स्थिति बंधुआ मजदूरों से ज्यादा नहीं होती। अठारह से बीस घंटे रोज मेहनत के बाद भी नियोक्ता का इनके साथ सलूक आमतौर पर गैरइंसानी ही होता है। इन के यौन शोषण की आशंका तो बनी ही रहती है। इतने प्रतिकूल परिस्थिति में भी इनके बंधुआ बने रहने का मुख्य कारण आजीविका के लिए विकल्पहीन होने के साथ-साथ नियोक्ता के चाहरदीवारी के बाहर की दुनिया से अनभिज्ञता भी है। मजबूरन अत्याचार सहते रहने के बाद भी घरेलू नौकरानियां अपेन नियोक्ता के घर में कैद रह कर चुपचाप खटती रहती है, क्योंकि उनके पास और कोई विकल्प नहीं है।श्रमिकों पर होने वाला शोषण यहां रुकता नहीं है। ईंट-भेट्टे पर काम करने वाले मजदूरों में महिलाओं के साथ-साथ पुरुष और बच्चे भी काम करते हैं। इन्हें भी काम दिलाने वाले दलाल गांवों- जंगलों से कुछ रुपयों के बदले बहला फुसला कर काम करवाने के लिए लाते हैं। ईंट भेट्टे का काम एक मौसमी काम है। पूरे मौसम इन श्रमिकों के साथबंधुआ के तरह ही व्यवहार किया जाता है और इन्हें न्यूनतम दिहाड़ी देने का चलन है ही नहीं। और तो और, अध्ययन के मुताबिक महिलाओं को लेकर यौन-हिंसा ईंट भेट्टे में होने वाली आम घटना है। ईंट-भेट्टें में काम करने वाले मजदूरों की खस्ताहाल स्थिति पूरे देश में एक जैसी है।हद तो तब हो जाती है, तब मजदूरों पर होता यह अन्याय एक तरफ सरकारों को सूझता नहीं, दूसरी ओर, खुलेआम सरकार अपने कुछ योजनाओं के जरिए बंधुआ मजदूरी को प्रश्रय भी देती है। बतौर उदाहरण लें तो बंधुआ मजदूरी का एक स्वरूप तमिलनाडु में सरकार के प्रोत्साहन पर चल रहा है। बंधुआ मजदूरी का यह भयंकर कुचक्र सुमंगली थित्तम नाम की योजना के तहत चलाया जाता है। इस योजना को मंगल्या थित्तम, कैंप कूली योजना या सुबमंगलया थित्तम के नामों से जाना जाता है। इसके तहत सत्रह साल या कम उम्र की किशोरियों के साथ यह करार किया जाता है कि वह अगले तीन साल के लिए किसी कताई मिल में काम करेंगी और करार की अवधि खत्म होने पर उन्हें एकमुश्त तीस हजार रुपए दिए जाएंगे, जिसे वे अपनी शादी में खर्च कर सकती हैं। तमिलनाडु के नौ सौ तेरह कपास मिलों में सैंतीस हजार किशोरियां इस योजना के तहत बंधुआ पाई गई हैं। इनके बंधुआ होने का कारण यह है कि करार के अवधि के दौरान अगर कोई लड़की उसके नियोक्ता कपास मिल के साथ काम न करना चाहे और मुक्त होना चाहे तो उसकी पूरी कमाई को मिल प्रबंधन हड़प कर लेता है। साथ ही, कैंपों में रहने को विवश की गई इन लड़कियों के साथ बड़ा ही अमानवीय व्यवहार होता है। इन्हें बाहरी दुनिया से बिल्कुल अलग रखा जाता है, किसी से मिलने-जुलने की इंजाजत तक नहीं होती है। एक दिन में अठारह घंटों का कठोर परिश्रम करवाया जाता है। हफ्ते में बस एक बार चंद घंटे के लिए बाजार से जरुरी खरीदारी करने की छूट मिलती है। इनके लिए न तो कोई बोनस है, न ही किसी तरह की बीमा योजना और न ही किसी तरह की स्वास्थ्य सुविधा। दंरिदगी की हद तो तब है, जब इन अल्पव्यस्कों को यौन उत्पीड़न का शिकार बनाया जाता है। हाल ही में एक खबर छपी थी कि शंाति नाम की लड़की को ढाई साल मिल में काम के बाद भी बदले में एक कौड़ी नहीं मिली। उलटे, मिल के मशीनों ने उसे अपाहिज बना दिया और प्रबंधन का यह बहाना था कि दुर्घटना के बाद शांति के इलाज में उसकी पूरी कमाई खर्च हो गई।बंधुआ मजदूरी के चक्कर में फंसने वाले ज्यादातर लोग या तो आदिवासी होते हैं या दलित। आदिवासियों काबंधुआ बनने का कारण उनके पारंपरिक आजीविका से उन्हें महरूम करना है। तमिलनाडु की एक जनजाति है इरुला। ये लोग पारंपरिक रूप से सपेरे रहे हैं, लेकिन सांप पकड़ने पर कानूननप्रतिबंध लगने के बाद से कर्ज के बोझ तले दबे इस जनजाति के लोगों को बंधुआ की तरह काम करने के लिए अभिशप्त होना पड़ा। चावल मिलों, ईंट-भट्टें और खदानों में काम करने वाली इस जनजाति पर हर तरह के अत्याचार किए जाते हैं। तंग आकर जब रेड हिल्स के चावल मिलों में बंधुआ मजदूरी करने वाले लगभग दस हजार लोगों ने अपना विरोध दर्ज किया तो उन्हें मुक्त कराने के बजाए एक सक्षम सरकारी अधिकारी ने उन्हें नियोक्ता से कह कर कर्ज की मात्रा कम करवाने के आश्वासन के साथ वापस काम पर जाने को कहा। सरकारी मशीनरी की ऐसी भूमिका मिल मालिकों और अधिकारियों की सांठ-गांठ का प्रमाण है। बंधुआ मजदूरी के पूरे मामले में एक बहुत बड़ा कारण आजीविका के लिए अन्य विकल्पों और अवसरों काउपलब्ध नहीं होना है। साथ ही, अब तक जो हालात दिखे हैं, उनके आधार पर सरकारी लालफीताशाही पर किसी तरह का भरोसा करना ठीक नहीं है। बंधुआ मजदूरी का तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण स्थायी नौकरी के बदले दलालों के मध्यस्था में मजदूरों के श्रम का शोषण करने की रणनीति अंतर्निहित है। ऐसे में संसद और विधानसभा में बैठ कर उन्मूलन के कानून बनाने के अलावा सरकार को इसके पनपने और फलने-फूलने के कारणों पर भी चोट करना पड़ेगा।
- देवाशीष प्रसून
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मई दिवस 2010: नई जिम्मेदारियां

पिछले वर्षों के समान इस वर्ष भी दुनिया भर के मजदूर एक मई को इकट्ठा होकर और जुलूसों की शक्ल में अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस मनायेंगे। साथ ही वे अपनी उपलब्धियों और असफलताओं का जायजा लेंगे, समस्याओं पर विचार करेंगे और 21वीं सदी की आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए अपनी शक्ति इकट्ठा करेंगे।हाल में जो समस्या सबसे विकराल रूप धारण कर रही है वह है खाद्यान्नों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की तेजी से बढ़ती हुई कीमतें। इनका मजदूरों और गरीबों पर खास प्रभाव पड़ा है। इसके अलावा नौकरियां खोने और वेतन में कटौती के कारण मजदूरों पर पूंजीपतियों द्वारा दबाव बढ़ता जा रहा है। वर्तमान आर्थिक संकट से निकलने का पूंजीपतियों ने यही रास्ता खोज निकाला है जबकि यह संकट पूंजीवादी व्यवस्था का ही परिणाम है। सारे देश में बड़े पैमाने पर आंदोलन चल रहे हैं लेकिन सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है। शासक वर्गअधिकाधिक घमंडी, प्रभुत्ववादी बनता जा रहा है।यूपीए की जनविरोधी नीतियांयूपीए सरकार पूंजीपति वर्ग के वर्गहितों की रक्षक है। वह लगातार सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का विनिवेश कर रही है और मजदूर प्रतिरोध को दबाने की कोशिश कर रही है। इसके लिए वह निरंतर श्रम कानूनों का उल्लंघन कर रही है, दमन कर रही है और ट्रेड यूनियन तथा जनवादी अधिकारों का हनन कर रही है। कीमतों में बढ़ती वृद्धि सरकार द्वारा अपनायी गई आर्थिक और राजनीतिक नीतियों का ही परिणाम है।पिछले डेढ़ वर्षों में सारे विश्व में वित्तीय और आर्थिक संकट तेजी से फैल गया है। अमरीका से इसकी शुरूआत होकर यह संकट सारे विश्व में फैल गया है। विभिन्न देशों पर इसका प्रभाव अलग-अलग मात्रा में पड़ा है जो इस बात पर निर्भर है कि वे किस हद तक विश्व पूंजीवादी अर्थतंत्र का हिस्सा है। विशाल पैमाने पर महाकाय वित्तीय संस्थाएं जैसे बैंक, बीमा, मार्गेज कम्पनियां और बड़े कारपोरेट कारोबार दिवालिया हो गये और धराशायी हो गये। आज वित्तीय अर्थतंत्र वास्तविक अर्थतंत्र से कहीं बड़ा हो गया है। सट्टेबाजी, जूआ और वित्तीय जोड़तोड़ के जरिये बिना भौतिक उत्पादन के बड़े पैमान पर धन इकट्ठा किया जा रहा है। कई पूंजीवादी अर्थतंत्रों में बिना उत्पादन के मुनाफा एक नियम बन गया है। यह संकट पूंजीवादी उत्पादन पद्धति की कमजोरी दर्शाता है। यह 1930 के आर्थिक संकट से अधिक गहरा है। इस संकट में नवउदारवादियों के उन दावों को झूठा साबित कर दिया है जिसके हिसाब से वर्तमान व्यवस्था संकट मुक्त और आत्मनियमित है।भारत जैसे विकासमान देशों के लिए इस नीति का मतलब है उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण जिसे आमतौर पर आर्थिक सुधारों का नाम दिया जा रहा है। भारतीय पूंजीपति वर्ग ने आर्थिक सुधारों के नये दर्शन को देश विकास की गारंटी के रास्ते के रूप में अपना लिया है।मजदूर संघर्षइन परिस्थितियों में पिछले दशकों में पहली बार सभी केन्द्रीय टेªड यूनियनों को साथ मिलकर सरकार की नीतियों के खिलाफ संयुक्त संघर्ष करने पर मजबूर होना पड़ा है। उनका कहना है कि संयुक्त टेªड यूनियन आंदोलन मूल्यवृद्धि, निगमों के मजदूर वर्ग के खिलाफ अपराधों और सरकार को रास्ते पर लाने का एकमात्र तरीका है।इस वर्ष 5 मार्च को केन्द्रीय टेªड यूनियनों ने सारे देश में जुझारू सत्याग्रह किया और संगठित तथा असंगठित क्षेत्रों के 10 लाख से अधिक मजदूरों ने इसमें हिस्सा लिया। आने वाले समय में इस एकता को बरकरार रखना जरूरी है।वामपंथी राजनैतिक पार्टियां शहरों और गांवों के मजदूरों और शोषित जनता के बीच काम करती हैं। उन्होंने 12 मार्च को पार्लियामंेट के सामने देशव्यापी मार्च किया जिसमें कीमतों की वृद्धि और खाद्य असुरक्षा के विरोध में जनता ने आवाज बुलंद की। उन्होंने मांग की कि कीमतों पर रोक लगायी जाये और सबों के लिए खाद्य सुरक्षा की गारंटी की जाये। उन्होंने अपना ध्यान सबों के लिए भोजन, नौकरियां, भूमि और जनवादी अधिकार मुहैया करने पर केन्द्रित किया। इसके बाद आया 8 अप्रैल का जेलभरो अभियान, जिसमें बड़े पैमाने पर पिकेटिंग की गयी और सारे देश के 25 लाख से भी ज्यादा लोगों ने देश के हर जिले में मंडल, तहसील यहां तक कि केरल में प्रत्येक असेम्बली चुनाव क्षेत्र के स्तर पर संघर्ष किया। इसके बाद 27 अप्रैल को देशव्यापी हड़ताल आह्वान किया गया जिसका सारे देश में और प्रत्येक राज्य के बड़े पैमाने पर पालन किया गया। इसमें वामपंथी पार्टियों ने पहल की और अन्य गैर कांग्रेसी, गैर भाजपा, धर्मनिरपेक्ष जनवादी पार्टियों को मूल्यवृद्धि के संघर्ष में शामिल किया।संसद के अंदर यूपीए सरकार कटौती प्रस्ताव पर किसी तरह से बच गयी है। यह कटौती प्रस्ताव वामपंथी पार्टियों ने अन्य पार्टियों के साथ मिलकर पेश किया था। यह एक विशेष कटौती प्रस्ताव था जिसका निशाना सरकार का वह कदम था जिसके तहत ईंधन और खादों की तथा अन्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि की गई है। कांग्रेस की यह आदत हो गई है कि वह चालबाजी,धोखाधड़ी और डरा-धमका कर कुछ अन्य पार्टियों की मदद से अपने पक्ष में मतदान करवा लेती है।घटनाओं ने दर्शाया है कि पूंजीवाद, गरीबी, बेकारी, भूखमरी और बीमारी की समस्याओं को हल करने में असमर्थ है। नवउदारवाद का हर कदम इन समस्याओं को बढ़ाता है और गरीब और अमीर के बीच की खाई को और भी गहरा करता है। पूंजीवादी तबके पूंजीवादी व्यवस्था को बचाने के लिए वित्तीय पैकेज और वित्तीय बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं। मजदूर वर्ग के आंदोलन और प्रगतिशील शक्तियों की जिम्मेदारी है कि वह पूंजीवादी व्यवस्था की जगह एक नई समाजवादी व्यवस्था कायम करें।बढ़ता आंदोलनपिछले समय में सरकार के नवउदारवादी आर्थिक नीतियों औरसुधारों तथा मुक्त बाजार, बड़े पूंजी और कारपोरेट घरानों के लिए मुनाफा बढ़ाने की नीतियों के खिलाफ बढ़ते आंदोलन का जमाना रहा है। इसमें मजदूरों ने जनता के अन्य हिस्सों के साथ मिलकर महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। यूपीए सरकार बड़ी हठधर्मिता दिखाते हुए कीमतों की परिस्थिति सुधारने के कोई कदम उठाने से इन्कार कर रही है। इसलिए संघर्ष जारी रखना जरूरी होगा और आने वाले दिनों में आंदोलन के नये तरीके अपनाने पड़ेंगे ताकि जनता के ज्यादा से ज्यादा हिस्से इसमें शामिल किये जा सकें।बिहार में भूमि संघर्ष की तीन मंजिले गुजर चुकी हैं अब वहां भूमिहीन मजदूर और ग्रामीण सर्वहारा का नया संघर्ष एजेंडे पर है। भूमि सुधार कमीशन ने प्रत्येक भूमिहीन परिवार को एक एकड़ जमीन और निवास के लिए दस डिस्मल जमीन देने का सुझाव दिया है। यदि राज्य सरकार इसे लागू करने से इन्कार करती है तो ग्रामीण भूमिहीन श्रमिकों के लिए संघर्ष का एक और अवसर पैदा होगा ताकि इन प्रावधानों को लागू करवाया जा सके। दूसरी जगहों पर किसान विकास और प्रोजेक्टों के नाम पर उनकी जमीने जबर्दस्ती लेने के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। इनमें विशेष आर्थिक क्षेत्र अर्थात ‘सेज’ तथा अन्य शामिल हैं। वे औपनिवेशिक काल के भूमिअधिग्रहण अधिनियम की जगह नये एक्ट के लिए संघर्ष कर रहे हैं ताकि किसानों के हितों की रक्षा की जा सके।विदेश नीतियूपीए सरकर ने वाशिगंटन सहमति और मुक्त बाजार अर्थतंत्र का अमरीकी मॉडल एवं नवउदारवद स्वीकार कर लिया है। इसी प्रकार विदेश नीति में भी अमरीका परस्त झुकाव देखा जा रहा है। अमरीका के सथ कृषि, ज्ञान के क्षेत्र और अन्य प्रकार के खुले और छिपे समझौते किये जा रहे हैं। यह न्यूक्लियर लाइबिलिटी बिल के मसविदे से स्पष्ट हो जाता है जो भारत अमरीका न्यूक्लियर समझौते का परिणाम है। इस प्रकार हमारी साम्राज्वाद विरोधी और गुटनिरपेक्ष विदेश नीति कमजोर की जा रही है।फिर भी विकासमान देशों में भारत में अर्थतंत्र का स्थान दूसरा है। अंतर्राष्ट्रीय मामलों में इसकी विशेष रणनीतिक जगह है। भारत गुटनिरपेक्ष आंदोलन के जन्मदाताओं में एक है। इन कारणों से भारत, ब्राजील, चीन, दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों के साथ मिलकर ‘बेसिक’ जैसे बना रहा है। मजदूर वर्ग समेत अन्य प्रगतिशील शक्तियों को अमरीकी परस्त नीतियों का विरोध करने के लिए इस रूझान को मजबूत करना पड़ेगा।बराक ओबामा का अमरीका का राष्ट्रपति बनना अवश्य ही एक महत्वपूर्ण घटना है। लेकिन इससे साम्राज्यवाद का चरित्र बदल नहीं जाता खासकर वैश्वीकरण की वर्तमान मंजिल में।साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष सभी प्रगतिशील शक्तियों की मूलभूत जिम्मेदारी है। 20वीं सदी में साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों के साथ जुड़ा हुआ था। 21वीं सदी में साम्राज्यवादी विरोधी संघर्ष संघर्ष समाजवाद के लिए संघर्ष के साथ अभिन्न रूप से जुड़़ा हुआ है।अति मुनाफे की लूट के चक्कर में पूंजीवाद इस धरती के सीमित स्रोतों का उत्पादन और उपभोग के रूप मेंअंधाधुंध इस्तेमाल कर रहा है। इसके फलस्वरूप सारी मानवता और धरती पर पर्यावरण, प्रदूषण और मौसम के परिवर्तन का खतरा मंडरा रहा है। कोपेनहेगन शिखर सम्मेलन ने दर्शाया है कि अमरीका तथा अन्य विकसित पूंजीवादी देश मानवता को इस भयंकर खतरे से बचाने के लिए अपने उत्पादन और उपभोग के तौर-तरीके बदलना नहीं चाहते। वे ‘समान लेकिन विभेदीकृत जिम्मेदारीयों’ की बात कर रहे हैं।आने वाले समय में राजनैतिक या वैचारिक सम्बद्धता से परे होकर टेªड यूनियनों को व्यापक एकता कायम करनी होगी। इस दिशा में पहले कदम उठाये जा चुके हैं। अब जिम्मेदारी यह है कि इस काम को धैर्य, परस्पर सम्मान और सहमति के जरिये आगे बढ़ाया जाये।वामपंथी पार्टियों को आपस में बेहतर संयोजन करना पड़ेगा, वामपंथी एकता को मजबूत करना होगा ताकि मेहनतकशों के संघर्षों को सही दिशा प्रदान की जा सके।मई दिवस 2010 को जनता के सभी हिस्सों का क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए जोरदार आह्वान करना चाहिए।
- ए.बी. बर्धन
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बोलीविया से उम्मीदें

बोलीविया के कोचाबांबा शहर में 19-24 अप्रैल तक जलवायु परिवर्तन पर सम्मेलन हुआ। इसमें दुनिया भर से सत्तर सरकारों के नुमाइंदों और 15 हजार लोगों ने हिस्सा लिया। बोलिविया का तीसरा सबसे बड़ा शहर कोचाबांबा दुनिया भर में पानी के निजीकरण के खिलाफ महान संघर्ष के लिए जाना जाता है। इस शहर पर सारे विश्व की नजरें टिकीं हुई थीं कि यह एक न्यायसंगत जलवायु परिवर्तन समझौते को अपने मुकाम तक पहुंचाएगा।सम्मेलन से पहले आइसलैंड में हुई घटना के कारण करीब सात लाख लोग उत्तरी यूरोप के हवाई अड्डों पर फंसे रहे, उनमें से कुछ गिन चुने किस्मत वाले ही इस शहर तक पहुंच पाए। पर फिर भी अंतर्राष्ट्रीय समझौतों में एक अहम नेतृत्व प्रदान करने की बोलीविया की भावना और उत्साह मे कोई कमी नहीं आई। कोचाबांबा के पास ही एक छोटा-सा गांव है - टिकीपाद्धा, जहां हमें पंजीकरण के लिए जाना था। वहां पर मौजूद स्थानीय लोगों, छात्रों और पड़ोसी लातिन अमरीकी देशों से आए लोगों के जनसमूह को देखकर यह और भी साफ हो गया कि इस सम्मेलन से लोगों को किस प्रकार की आशाएं हैं। कुछ ऐसा ही माहौल यूनिवाल में देखने को मिला, जहां सभाएं और परिचर्चाए हो रही थीं। भाषा बातचीत में एक बड़ी बाधा साबित हो रही थी, फिर भी भावनाओं को समझने में कोई दिक्कत नहीं हो रही थी। सभी एक स्वर में कह रहे थे - पृथ्वी और विकासशील देशों में रह रहे 45 लाख से ज्यादा लोगों के अधिकारों को तय करने के लिए कड़े कदम उठाने होंगे। विकसित देशों को समझना और स्वीकार करना होगा कि यह केवल अमीर और गरीब के बीच का कोई संघर्ष नहीं है, न ही अत्यधिक हानि और भव्य जीवन-शैली का। यह आवश्यकता पृथ्वी को बचाने की है जिसका दर्जा मां से कम नहीं। यह मसला केवल दुनिया भर से आए 15 हजार लोगों और 70 देशों की सरकारों का ही नहीं है बल्कि पृथ्वी के अधिकारों से जुड़ी दुनिया भर के लोगों की भावनाओं का है। इन लोगों में वे भी शामिल हैं जिन पर ऐतिहासिक रूप से जलवायु और आर्थिक अन्याय और शोषण किया गया। इनमें से कई लोगों के पास इस शहर तक पहुंचने की क्षमता तक नहीं है। इन तमाम लोगों की जिंदगी बोलीवियाई शहर में हो रही चर्चाओं पर टिकी थी।इस प्रकार ‘पीपुल्स वर्ल्ड कांफ्रेंस ऑन क्लाइमेट चेंज’ पर यह विशाल जिम्मेदारी थी कि वह जलवायु परिवर्तन वार्ता में नैतिकता, बराबरी और न्याय को पक्का करे। सम्मेलन को अफ्रीका, एशिया, छोटे द्वीपीय देश लातिन अमरीका के देशों का सहयोग हासिल था। लातिन अमरीकी देशों- खासतौर पर ब्राजील, अर्जेंटीना, वेनेजुएला की -एकजुटता सम्मेलन की सफलता के लिए अहम साबित हुई है। भारत, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण कोरिया, चीन जैसे बड़े विकासशील देश अहम भूमिका निभा सकते थे लेकिन ये सिर्फ संभावनाएं बन कर रह गईं। इन देशों ने इस जन-सम्मेलन को उत्सापूर्वक नहीं लिया है। इन देशों की गैर-भागीदारी ने लोगों, आदिवासियों, मूल निवासियों और नागर समाज संस्थाओं के प्रति इनके विचारों को जाहिर कर दिया है। इन्हें लगता है कि अंतर्राष्ट्रीय वार्ता में भाग लेने की क्षमता लोगों और नागर समाज संस्थाओं में नहीं है। भारत के पर्यावरण एवं वन मंत्री जयराम रमेश से जब एक प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि आगे की वर्तााओं में भारत को कुछ तथ्यों पर जेार देने की जरूरत है तो उनका जवाब था कि समझौता वार्ता करना सरकार का काम है। नागर समाज संस्थाओं को देश में शिक्षा, जागरूकता और अनुकूलन के पहलुओं पर काम करना चाहिए। वार्ता के गूढ़ पहलुओं को समझने की नागरिक समाज की क्षमता के प्रति उपेक्षा चीन में भी थी। दुनिया के अन्य देश विशेष रूप से उत्तरी अमेरिका के लिए यह ‘मसखरों का सम्मेलन’ था। विकसित देशें को यह समझना जरूरी है कि दुनिया भर से आए लोग मसखरे नहीं थे। इन्हें यह भी समझना होगा कि लोग व्यक्तिगत रूप से भले ही गरीब हो सकते हैं लेकिन सामूहिक रूप से इनके पास सबसे ज्यादा संसाधन हैं, जिन पर विकसित देशों ने न्याय, समानता और प्रकृति के नियम की भारी उपेक्षा कर कब्जा किया हुआ है। 2009 में एक अरब से अधिक लोग भूख से लड़ रहे थे। इस सदी में अंत तक इस लड़ाई में करीब 60 करोड़ लोग और शामिल हो जाएंगे। सवाल भोजन की उपलब्धता या लोगों की उस तक पहंुच का नहीं है। सवाल विकास से जुड़े नैतिक मूल्यों का है। मूल सवाल यह है कि एक तरफ तो उपभोग कर पाने से कहींअधिक मात्रा में भोजन, पानी, ऊर्जा और अन्य संसाधन उपलब्ध हैं, वहीं दूसरी ओर बहुतायत में लोगों को उनकेअधिकारों का अंश मात्र भी हासिल नहीे है। सवाल भूख से जुड़ा हो या पृथ्वी के संरक्षण से, दोनों का जवाब बहुत हद तक कृषि में शामिल है। खास तौर पर विकसित देशों में कृषि को जलवायु के साथ-साथ आर्थिक संकट से बचाना होगा। छोटे और मध्यम किसान इन संकटों से खासतौर से प्रभावित हो रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र ने भी राष्ट्रपति इवो मोराले के इस प्रस्ताव का समर्थन किया है कि 22 अप्रैल मां-पृथ्वी के अधिकारों के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस के में मनाया जाए। जरूरत इस बात की है कि सभी मां-पृथ्वी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर करें।
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संसद में भाकपा - दंतेवाड़ा में 62वीं बटालियन पर माओवादियों के हमले पर बयान

उप सभापति महोदय। सर्वप्रथम हमारी पार्टी यानि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवानों की हत्या की कड़े से कड़े शब्दों में भर्त्सना करती है। हमारी पार्टी मारे गये उन जवानों के परिवार के सदस्यों के प्रति संवेदना और सहानुभूति प्रगट करती है। छत्तीसगढ़ में हुई घटना पर गृहमंत्री का बयान विशेष है। लेकिन मैं अति विशेष होना चाहता हूं।आज छत्तीसगढ़ में जनजातियों के लोग मजबूरन हाशिये पर आ रहे हैं। उन्हें कठोर यातनाएं दी जा रही हैं। खनन कार्यो, प्रोजेक्ट और विकास कार्यों के नाम पर उन्हें अपने निवास स्थान से हटाया जा रहा है। वन सम्पदा निगमित क्षेत्र और बहुराष्ट्रीय निगमों को सौंपा जा रहा है। छत्तीसगढ़ के आदिवासियों पर थोपी जा रही नवउदारवादी नीतियों के कारण वहां नई स्थिति उत्पन्न हो गई है। सर्वप्रथम इसे समझने की जरूरत है। मैं सभी राजनैतिक दलों से अनुरोध करता हूं कि इस समस्या पर धैर्य से विचार करें। यहां मैं डा। अम्बेडकर को उद्धृत करना चाहूंगा। संविधान पीठ में अपेन अंतिम भाषण में उन्होंने कहा था कि “अगर हम संविधान का इस्तेमाल जनता की समस्याओं को समझने और उसका समाधान करने के लिए एक असरदार औजार के रूप में करने में असफल होते हैं तो इसका परिणाम अराजकता का बोलबाला हो सकता है।” यह डा. अम्बेडकर की चेतावनी थी।उग्रवाद: गलत रास्ताआज वामपंथी उग्रवाद जो कर रहा है वह अराजकतावाद ही है। कम्युनिस्ट होने की हैसियत से हम उनके तरीकों से सहमत नहीं है और हम उनकी भर्त्सना करते हैं। लेनिन के समय भी ऐसा ही था। उन्होनंे कहा था कि वामपंथी उग्रवाद और वामपंथी साम्यवाद ‘बचपन की अराजकता’ है। राजनीति में वामंपथी उग्रवाद का रूझान एक प्रवृत्ति है। इससे वैचारिक और राजनैतिक स्तर पर लड़ना होगा और नियम-कानून के अंतर्गत इसका समाधान करना होगा। इससे निपटने के लिए सरकार को सही नीति बनानी होगी। आज हम देख रहे हैं कि इस संबंध में सरकार की नीति त्रुटिपूर्ण है। यह गलत नीति है और सरकार को नीति का पुनर्निर्धारण करना चाहिए। जहां तक छत्तीसगढ़ का संबंध है सरकार को अपनी नीति के संबंध में पुनर्विचार करनी चाहिए।‘सलवा जुडूम’ से हानिइस सदन में मैंने कई बार ‘सलवा जुडुम’ का मामला उठाया है। आज हम इस समस्या को उठा रहे हैं क्योंकि हम छत्तीसगढ़ की स्थिति पर बहस कर रहे हैं। बयान का संबंध छत्तीसगढ़ में घटी घटना से है। इसलिए पहले भी मैंने ‘सलवा जुडुम’ की समस्या को उठाया था। आज छत्तीसगढ़ में क्या हो रहा है? न्याय देने और ‘सलवा जुडुम’ पीड़ितों को पुनर्वास देने में असफलता के कारण माओवादियों की संख्या बढ़ रही है।सलवा जुडुम के पीड़ितों को न तो न्याय मिला है और न ही उनका पुर्नवास हुआ है। इसका परिणाम माओवादियों के द्वारा भर्ती किये जाने की संख्या में वृद्धि हुई है। मैं खुफिया का आंकड़ा प्रस्तुत कर रहा हूं कि ‘सलवा जुडुम’ शुरू होने के बाद माओवादियों द्वारा भर्ती किये जाने में कम से कम 22 प्रतिशत की वृद्धि हुई हैं। अगर मैं गलत हूं तो गृहमंत्री मेरे बयान को सुधार सकते हैं। भारत सरकार को इसके संबंध में राजनीति नहीं करनी चाहिए। इसे न तो छत्तीसगढ़ में और न ही पश्चिम बंगाल में राजनीति करनी चाहिए। इस समस्या पर न तो गृहमंत्री और न ही रेल मंत्री को राजनीति करनी चाहिए। अगर इस तरह की राजनीति होती है तो हम देश के प्रजातांत्रिक ढांचे को क्षति पहुंचा रहे हैं।सरकारों की उदासीनतामैं इस ओर ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा कि 17.10.2008 को छत्तीसगढ़ सरकार ने स्वीकार किया कि सलवा जुडुम के कारण जलाये गये घरों के कारण पीड़ितों का पुनर्वास करने के साथ ही उनकी क्षतिपूर्ति भी करेगी। लेकिन पिछले दो वर्षों में इसने कुछ नहीं किया है। यह एक तथ्य है। लेकिन भारत सरकार ने अदालत में स्वीकार करने के बाद कि सलवा जुडुम ने घरों को जलाया है ओर अन्य गैरकानूनी काम किए हैं, वह सलवा जुडुम की जय जयकार कर रही है। खुफिया और सुरक्षाकर्मियों के द्वारा किये गये हिंसक कार्यो की भी कोई अनदेखी नहीं कर सकता है। गरीब आदिवासी दो तरह के हिंसकों के बीच फंसे हुए हैं। सलवा जुडुम भी हमारी संसदीय प्रजातंत्र के लिए खतरा है। अगर आप कहते हैं कि वामपंथी उग्रवाद संसदीय प्रजातंत्र के लिए खतरा है तो एक गैर सरकारी संगठन सलवा जुडुम भी प्रजातांत्रिक राजनीति के लिए खतरा है।उच्चतम न्यायालय18.2.2010 को उच्चतम न्यायालय ने आवेदकों से पुनर्वास की विस्तृत योजना प्रस्तुत करने को कहा था। मै आवेदकों का नाम बताता हूं क्योंकि मामला उच्चतम न्यायालय में हैं। ये नाम हैं - नंदिनी सुन्दर तथा अन्य, करतराम जोड़ा, मनीष कुंजाम-हमारी पार्टी के नेता, अखिल भारतीय आदिवासी महासभा के नेता (जो भाकपा का है) तथा अन्य। उच्चतम न्यायालय के द्वारा मांगी गई जानकारी देने में छत्तीसगढ़ राज्य सरकार को दो सप्ताह लगा। लेकिन आज तक उसने कुछ नहीं किया है। उक्त पुनर्वास कार्यक्रम के प्रमुख अवयव निम्नतम लिखित हैं:1. सर्वेक्षण के द्वारा पीड़ित व्यक्तियों की पहचान,2. प्रखण्ड मुख्यालय में जिला न्यायाधीशों आदि की बैठकें3. बलात्कार और हत्या जैसे जघन्य अपराधों से निपटना और गांवों में आवश्यक सेवा बहाल करना।इन सबों की निगरानी वरिष्ठ सेवानिवृत जज या भारत सरकार के सेवानिवृत सचिव करेंगे। शांति बहाल करने का एकमात्र तरीका प्रशासन को बहाल करना और न्याय प्रदान करना है। मैं बता रहा हूं कि प्रमुख सेवा में विलम्ब नहीं होना चाहिए क्योंकि वे आदिवासी कल्पना से परे यातनाओं तथा विपदाओं से गुजरे हैं। मैं फिर कह रहा हूं कि उनकी दशा अति दयनीय है। उनका कुपोषण का स्तर तीसरे दर्जे का है। आप वहां से आये किसी भी व्यक्ति, जो जनजाति का है या उनके बीच काम किया है, से इसकी जानकारी ले सकते हैं। आपकों पता चल जायेगा कि वहां तीसरे दर्जें का कुपोषण है। खाद्य कमिश्नर ने ऐसा बयान उच्चतम न्यायालय के समक्ष दिया है। सभी बाजार बंद हैं जिसे खोलने की जरूरत है। जन वितरण प्रणाली को बहाल करने की जरूरत है। आदिवासियों के लिए खाद्यान्न प्राप्त करने का वही एकमात्र स्रोत है। सभी दुकानों के साथ-साथ स्कूल भी बंद हैं। सवाल है कि इस समस्या से कैसे निपटा जाये? माओवादियों का कहना है कि वे किसी खास तरह के युद्धविराम के लिए राजी है और उन ग्रामों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली को बहाल किये जाने के पक्षधर हैं। उक्त समाचार 14.4.2010 के ‘हिन्दू’ दैनिक में आया है। माओवादियों ने यह भी संकेत दिया है कि वे एक साथ युद्धविराम के लिए तैयार हैं। क्या सरकार अपनी बात पर अड़ी रह सकती है? सरकार का कहना है कि उनके द्वारा हिंसा बंद करने के बाद ही वह बात कर सकती है। लेकिन युद्धविराम या हिंसा को बंद करना दोनों पक्षों के बीच सहमति का मामला है। सरकार को भी खुले दिमाग से सामने आना चाहिए। हमें नागालैंड में समस्याओं से निपटने का अनुभव है। अब एक संकेत है जिसे भी 14.4.2010 के ‘हिन्दू’ में प्रकाशित किया गया है।अब मैं अपने कुछ अनुभवों की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा। मैं लोगों से मिलता हूं। ऐसे लोग भी हैं जो अहिंसा में विश्वास करते हैं। वे छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के बीच काम करते हैं। उन लोगों को वहां काम करने नहीं दिया जाता है। उनको परेशान किया जाता है। उनके विरूद्ध मुदकमा दायर किया गया है और उन्हें वहां से निष्कासित किया जा रहा है। अब वे छत्तीसगढ़ के बाहर हैं। अगर हमारे पास आदिवासी लोगों के पास पहुंचने का प्रजातांत्रिक साधन नहीं है तो हम उनका विश्वास कैसे हासिल कर सकते हैं? माओवादियों और आम ग्रामीणों के बीच पहचान करना असम्भव है। पुलिस की कारवाई से दोनों तरफ हिंसा बढ़ेगी।जीवन अमूल्य है। केन्द्रीय रिजर्व पुलिस के जवानों का जीवन अमूल्य है। एक ग्रामीण या गरीब आदिवासी का भी जीवन अमूल्य है। हमें उन गरीब आदिवासियों के विषय में सोचना होगा। यही मूल समस्या है जिस पर हमें ध्यान देना है। पंचायत के शिड्यूल क्षेत्र में विस्तार के 5वीं शिड्यूल का लगातार उल्लंघन हो रहा है। उसी प्रकार संविधान के अंतर्गत आदिवासियों को दिये गए सभी अधिकारों का भी उल्लंघन हो रहा है। मैं पूछना चाहता हूं कि लगातार ये उल्लंघन क्यों हो रहे हैं? यह किसी एक राजनैतिक दल की समस्या नहीं है। मैं सभी दलों से पूछला चाहता हूं कि स्वतंत्रता के 60 साल से अधिक हो जाने के बाद भी हमारे देश में आदिवासी लोग क्यों उतनी दयनीय और जोखिम भरे हालत में रह रहे हैं। इसके लिए कौन जिम्मेदार है? क्या यह राज्य सरकारों की असफलता नहीं है? क्या यह केन्द्र सरकार की असफलता नहीं है? क्या यह हम लोगों की सामूहिक असफलता नहीं है? मैं यहां उपस्थित सभी व्यक्तियों की अर्न्तआत्मा से अपील करता हूं। मैं पूरी संसद की अर्न्तआत्मा से अपील करता हूं। क्या यह हम लोगों की सामूहिक जिम्मेदारी नहीं है? आदिवासी लोग दयनीय हालत में क्यों रहें? यह मूल समस्या है और इसका समाधान होना चाहिए। मेरी समझ से इस संबंध में केन्द्रीय सरकार के द्वारा अपनाई गई नीति सही नहीं है। यह नीति गलत है। मैं राजनीति और गृह मंत्री के द्वारा संसद के बाहर दिये गये बयान के विवाद में नहीं पड़ना चाहता हूं। मैं इस विवाद में नहीं पड़ना चाहता क्योंकि गृहमंत्री के काम करने का तरीका गलत है। वे पश्चिम बंगाल में कुछ कहते है तो दिल्ली में कुछ और कहते हैं। हमारे देश में यह सब क्या हो रहा है? गृहमंत्री पूरे देश का गृहमंत्री होता है। अगर मामला बंगाल में मुख्यमंत्री के टेबल पर रूकता है तो यह छत्तीसगढ़ में क्यों नहीं रूकता है? अंत में वे कहते हैं कि वे पूरी नैतिक जिम्मेदारी लेते है और मामला दिल्ली में उनके टेबल पर आकर रूकता है। फिर वे बयान देते हैं कि 2-3 साल में वे माओवादियों का खात्मा कर देंगे। आखिर इन सबके पीछे नीति क्या है?सरकार से सवालमैं सरकार से पूछना चाहता हूं। क्या यह बता सकती है? कि उसकी क्या नीति है? जब तक हम आदिवासी लोगों को विश्वास में नहीं लेते है और आदिवासियों के बीच भेद पैदा कर आपस में लड़ाने वाले गैर सरकारी तत्वों को बढ़ावा देना बंद नहीं करते हैं तब तक हम वामपंथी उग्रवाद से लड़ाई में नहीं जीत सकते हैं। यह एक रूझान है जो जारी रहेगी। जब तक हमारे देश में बड़े स्तर पर असमानता और असंतोष है तब तक आपको वामपंथी उग्रवाद मिलता रहेगा। प्रजातंत्र में हमें छत्तीसगढ़ के बहुमत के विषय में सोचना होगा। यह उनके भविष्य का सवाल है। अगर हम आदिवासी लोगों की मनोस्थिति को नहीं समझ सकते हैं तो हम प्रजातंत्र की मूल भावना को भी नहीं समझ सकते हैं। अगर इस देश के आदिवासियों को प्रजातंत्र नहीं सुरक्षा प्रदान कर सकता है तो प्रजातंत्र का क्या मतलब है? आदिवासियों की सुरक्षा ही हमारे देश के संसदीय प्रजातंत्र की सुरक्षा है। भारत सारकार को इन समस्याओं का समाधान निकालना चाहिए और इसके लिए अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करना चाहिए। गृहमंत्री ने कहा है कि वे जांच रिपोर्ट पेश करेंगे। देखना है कि वे क्या रिपोर्ट पेश करते हैं। जांच रिपोर्ट में वे बातें नहीं होनी चाहिए जो गृहमंत्री कहते रहे हैं। यह एक गंभीर समस्या है और सदन को इसे गंभीरता से लेना चाहिए। जो घटनाएं घर्टी हैं उसकी भर्त्सना की जानी चाहिए और आने वाले दिनों में इसकी पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन इसके लिए केन्द्र सरकार को उचित नीति बनानी चाहिए। हमारे सामने सवाल है कि क्या केन्द्र में समुचित नीति बनाने की इच्छाशक्ति है? मैं इन्हीं शब्दों के साथ अपना वक्तव्य समाप्त करता हूं।
- डी. राजा
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