भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रकाशन पार्टी जीवन पाक्षिक वार्षिक मूल्य : 70 रुपये; त्रैवार्षिक : 200 रुपये; आजीवन 1200 रुपये पार्टी के सभी सदस्यों, शुभचिंतको से अनुरोध है कि पार्टी जीवन का सदस्य अवश्य बने संपादक: डॉक्टर गिरीश; कार्यकारी संपादक: प्रदीप तिवारी

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मंगलवार, 13 मार्च 2012

उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव परिणाम

जनता के दुर्दिन अभी जारी रहेंगे.......
6 मार्च को पांच राज्यों - उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा के चुनाव परिणाम आ गये। उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणामों की ओर पूरे देश की नजर लगी हुई थी। परिणाम मूलतः चुनावों के दौरान के हमारे आंकलन के अनुरूप ही हैं। बसपा और सपा ने आपस में पाला बदल लिया है। सपा को पहली बार प्रदेश में पूर्ण बहुमत प्राप्त हो गया है और अगले सप्ताह उसकी सरकार शपथ ग्रहण कर लेगी।
आंकड़ों की बात की जाये तो 2007 के विधान सभा चुनावों में सपा को प्राप्त 25.4 प्रतिशत मतों में 3.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ 29.2 प्रतिशत मत पाकर 225 सीटों पर विजय प्राप्त कर ली। इस प्रकार सपा ने पिछले चुनाव की तुलना में 128 अधिक सीटों पर विजय प्राप्त की। बसपा ने 2007 के चुनावों में प्राप्त 30.4 प्रतिशत मतों में 4.5 प्रतिशत की कमी के साथ 25.9 प्रतिशत मत पाकर 79 सीटों पर विजय दर्ज की जोकि पिछले चुनाव की तुलना में 127 सीटें कम हैं। पिछले दो दशकों से प्रदेश में साम्प्रदायिक खतरे के रूप में प्रोजेक्ट की जाने वाली भाजपा दो कदम और पीछे हटी है। पिछले चुनाव में उसे 16.9 प्रतिशत वोट प्राप्त हुये जिसमें 1.9 प्रतिशत की और गिरावट आई है। भाजपा को इस चुनाव में केवल 15 प्रतिशत मत प्राप्त हुये और विधान सभा में उसकी सीटें 51 से घटकर 47 रह गयीं। महंगाई और भ्रष्टाचार के संगीन आरोप झेल रही कांग्रेस को पिछले विधान सभा चुनावों में प्राप्त 8.6 प्रतिशत वोट 3 प्रतिशत बढ़कर 11.6 प्रतिशत हो गये और उसे 6 सीटों के फायदे के साथ 28 सीटों पर विजय प्राप्त हुई। हालांकि ध्यान दिये जाने वाला तथ्य है कि तीन साल पहले हुए लोकसभा चुनावों के उसे प्राप्त मतों की संख्या तथा विधान सभा क्षेत्रों में उसकी बढ़त की तुलना में जनता ने उसे काफी पीछे धकेल दिया है और कांग्रेस सदमे की स्थिति में हैं। अन्य दलों तथा निर्दलियों को प्राप्त वोटों में 0.4 प्रतिशत की कमी आयी है और उन्हें पिछले चुनाव की तुलना में 2 सीटों का नुकसान हुआ है।
जिक्र जरूरी है कि मतगणना के अंतिम चरणों में जब सपा लगभग 185 सीटों पर बढ़त की ओर अग्रसर थी, सपा के हार रहे उम्मीदवारों ने कई स्थानों पर गुण्डागर्दी कर चुनाव अधिकारियों पर मतगणना में हेरफेर कर जितवाने का दवाब बनाया। पूरी रिपोर्टें अभी प्राप्त नहीं हैं परन्तु समाचारपत्रों के अनुसार झांसी में बबीना से सपा उम्मीदवार चन्द्र पाल सिंह ने ईवीएम की सील टूटे होने का बहाना बनाते हुए जम कर पत्रकारों की धुनाई की और मतगणना स्थल पर उपस्थित हजारों सुरक्षाकर्मी इस गुंडई को मूकदर्शक बने देखते रहे। फिरोजाबाद में भाजपा उम्मीदवार मनीष कुमार को सपा कार्यकर्ताओं ने पत्थरबाजी कर घायल कर दिया तो सम्भल में 12 वर्षीय दानिश की विजयी सपा उम्मीदवार इकबाल महमूद ने जीत की खुशी में हत्या कर दी। प्रतापगढ़ में पुलिस वालों द्वारा पत्रकारों की जम कर ठुकाई के अपुष्ट समाचार हैं। अम्बेडकरनगर में बसपा के मंत्री राम अचल राजभर की राईस मिल को जलाकर खाक कर दिया गया तो सीतापुर में बसपा समर्थकों के घरों को जला दिया गया। समय बीतने के साथ-साथ कहां-कहां क्या-क्या हुआ पता चलेगा। वैसे इन घटनाओं ने पांच साल पहले चुनावों में लगे नारे - ”जिस गाड़ी पर सपा का झंडा, समझो उस पर बैठा गुंडा“ की याद जनता को ताजा करवा दी।
सरकार बदल गयी परन्तु नई सरकार से जनता के बहुमत को कोई उम्मीद नहीं है। समाजवादी पार्टी अब लोहिया की पार्टी नहीं है बल्कि मुलायम की पार्टी है जिसमें सहारा और अम्बानियों के हित साधन का एजेंडा है। सपा उन्हीं विनाशकारी आर्थिक नीतियों की समर्थक रही है जिसे केन्द्र में मनमोहन सिंह ने चालू किया तो उत्तर प्रदेश में भाजपा और बसपा भी चलती रही हैं। उत्तर प्रदेश के किसान अगर दादरी को नहीं भूले हैं तो बुनकर भी मुलायम के पिछले राज में अपनी बर्बादी  के घटनाक्रम को भी। अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने की बात चल रही है जोकि कारपोरेट कल्चर पर ज्यादा विश्वास करते हैं और राजनीति में अभी भी अपरिपक्व हैं। उत्तर प्रदेश की जनता के दुर्दिन अभी जारी रहने हैं।
कई दशकों के बाद भाकपा प्रत्याशी लगभग 1/8 विधान सभा क्षेत्रों में मैदान में थे। हालांकि 75 जिलों में से केवल 40 जिलों में भाकपा प्रत्याशी मैदान में थे। पिछले चुनावों की विधान सभा क्षेत्र वार तुलना उचित नहीं होगी क्योंकि परिसीमन के बाद विधान सभा क्षेत्रों का आकार बदल गया है। फिर भी पिछली बार केवल एक चुनाव क्षेत्र में 5000 से अधिक वोट प्राप्त हुये थे जबकि केवल 2 विधान सभा क्षेत्रों में मतों की संख्या तीन हजार से साढ़े तीन हजार के बीच थी और 11 क्षेत्रों में दो हजार से तीन हजार के बीच। इस बार तीन विधान सभा क्षेत्रों में मत चार हजार से अधिक प्राप्त हुये हैं जबकि पांच विधान सभा क्षेत्रों में तीन हजार से चार हजार के मध्य मत प्राप्त हुये हैं। 13 विधान सभा क्षेत्रों में प्राप्त मतों की संख्या दो हजार से तीन हजार के बीच है।
चुनावों में भाकपा के कार्यनिष्पादन की समीक्षा नीचे से लेकर ऊपर तक होगी और किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जायेगा। मुद्दे की अति सरलीकरण से बचा जाना चाहिए और भविष्य में बेहतर कार्यनिष्पादन की रणनीति सरलीकरण के रास्ते पर चल कर नहीं बनाई जा सकती। दो साल बाद लोकसभा चुनाव हैं। हमें अभी से उसके लिए रणनीति बनानी होगी और उस पर गम्भीरता से अमल करना होगा।
चुनावों में पैसा भी बांटा गया, शराब भी बांटी गयी, जनता को जांति-पांति और धर्मों में भी बांटा गया। मीडिया को भी खरीदा गया। पेड न्यूज भी छपती और प्रसारित होती रही। भारत निर्वाचन आयोग केवल दिखावा करता रह गया। यथार्थ में कोई सुधारात्मक कदम उसके द्वारा नहीं उठाये गये। जो कदम उठाये गये, उनसे हमारे लिए समस्यायें खड़ी हुईं। मसलन आयोग का कहना था कि चुनाव सामग्री भेजने के लिए तीन-चार ट्रक महीने भर के लिए हम किराए पर ले लें जिनका परमिट वे जारी कर देंगे। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि तीन-चार ट्रकों का महीने भर का किराया हमारे जैसे ईमानदार छोटे राजनीतिक दल कहां से लायेंगे।
हमें चुनाव सुधारों पर चर्चा को भी तेज करना चाहिए जिससे भ्रष्टाचार और जनता के तल्ख संकीर्ण विभाजनों से लोकतंत्र को बचाया जा सके।
जब तक प्रदेश की जनता के सामने हम चारों प्रमुख राजनीतिक दलों के बरक्स कोई विकल्प प्रस्तुत करने की स्थिति में नहीं आते, जिन चंद सीटों से हम चुनाव लड़ रहे होते हैं, उन क्षेत्रों में जनता के मध्य हमारे पक्ष में झुकाव की उम्मीद हमें नहीं करनी चाहिए क्योंकि जनता चुनावों के दौरान अपनी पसन्द की सरकार बनाने के लिए मत देने के लिए निकलती है।
सबसे अधिक महत्वपूर्ण यह तथ्य है कि अधिसंख्यक साथियों में कोई निराशा नहीं है बल्कि लड़ने की तमन्ना और अधिक बलवती होती दिख रही है। साथियों का यह टेंपरामेन्ट हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।
- प्रदीप तिवारी
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सवालों में घिरती चुनाव प्रणाली

भारत निर्वाचन आयोग यह दावा कर सकता है कि उसने पांच राज्यों में चुनावों को स्वतंत्र एवं निष्पक्ष तरीके से सम्पन्न करा दिया। परन्तु वास्तविकता यह है कि पैसा, जाति और धर्म के घिनौने खेल ने एक बार फिर चुनावों को मखौल बना दिया।
जुलूस निकालने, झंडा लहराने, समूह में निकलने, पोस्टर-झंडिया लगाने, वाल-राईटिंग करने आदि पर पाबंदी लगाकर निर्वाचन आयोग ने अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली। इस बार शराब एवं पैसों की जब्ती के लिए उसके द्वारा चलाये गये अभियान के बावजूद जितना काला धन इन चुनावों में खर्च हुआ, शायद ही इसके पहले किसी भी राज्य के विधान सभा चुनावों में उतना धन खर्च हुआ हो। काले धन की बड़े मात्रा में कहीं बरामदगी नहीं हुई। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी जैसी ईमानदार छोटी पार्टियों के लिए चुनाव आयोग के निर्देश समस्या खड़ी करने वाले रहे हैं। मसलन कोई छोटा राजनीतिक दल अगर दस-बीस हजार की चुनाव सामग्री किसी चुनाव क्षेत्र में भेजना चाहें तो उसे पसीना निकल आयेगा। एक ट्रक किराए पर लीजिए। उसे अपने दफ्तर में खड़ा रखिए। राज्य निर्वाचन आयोग से उस ट्रक का परमिट मांगिये। परमिट मिलने के बाद ही चुनाव सामग्री भेजी जा सकती है। दस-बीस हजार की चुनाव सामग्री भेजने के लिए उससे ज्यादा खर्च कीजिए।
गरीब उम्मीदवार वालराईटिंग कर अपना चुनाव प्रचार नहीं कर सकता परन्तु तमाम समाचार पत्रों में और न्यूज चैनलों पर लगातार विज्ञापन और पेड न्यूज का सिलसिला चलता रहा। हेलीकाप्टर उड़ते रहे। चुनावों की पूर्व संध्या पर रूपये और शराब के पाउच बांटे जाते रहे। जाति और मजहब के नाम पर मतदाताओं के ध्रुवीकरण के लिए रोज भाषण होते रहे। चुनाव आयोग निरीह बना देखता रहा।
चुनाव आयोग ने कुछ करोड़ रूपये और शराब से लदे कुछ ट्रकों को जब्त किया लेकिन यह पूंजीवादी दलों तथा उनके उम्मीदवारों द्वारा खर्च किए गए धन का एक प्रतिशत भी नहीं है।
चुने जाने के लिए इतना अधिक पैसा लगाने वाले उम्मीदवार और राजनीतिक दल कहीं न कहीं से तो इसकी उगाही करेंगे और यह उगाही अंततः गरीब की जेब से ही होती है।
आदर्श आचार संहिता लागू होने के बावजूद कांग्रेस, सपा, बसपा और भाजपा के नेता उसका सरेआम उल्लंघन करते रहे। चुनाव आयोग नोटिस जारी करता रहा, नेताओं की पेशी करता रहा और बिना किसी कार्यवाही के उनको छोड़ता रहा। तमाम राजनीतिज्ञों ने आचार संहिता को ठेंगा दिखाने में कोई कोताही नहीं की। एक मामले में चुनाव आयोग ने राष्ट्रपति तक को चिट्ठी लिख डाली। चिट्ठी लिखने का मंतव्य क्या था, यह साफ नहीं हो सका।
चुनावों के पहले चुनाव आयोग चुनाव सुधारों की बात कर रहा था। “राईट टू रेजेक्ट” समस्या का हल नहीं है। चुनाव सुधारों के लिए अभियान चलना चाहिए और इस बात की बहस होनी चाहिए कि इन चुनावों को धनबल, बाहुबल, जाति-मजहब से कैसे छुटकारा दिलाया जा सकता है। लोकतंत्र को बचाने के लिए फौरी तौर पर इसकी जरूरत है।
- प्रदीप तिवारी
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